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Hindi Family Story : वीकली आफ

Hindi Family Story : साप्ताहिक छुट्टी के दिन खूब मजे करने के इरादे से सुबह उठते ही रवि ने किरण से 2-3 बढ़िया चीजें बनाने को कहा और बताया कि उस के 2 दोस्त सपत्नीक हमारे घर लंच पर आ रहे हैं. इस से पहले कि किरण रवि से पूछ पाती कि नाश्ते में आज क्या बनाया जाए आंखें मलते हुए रवि के बेडरूम से आ रही रोजी और बंटी ने अपनी मम्मी को बताया कि वह इडली और डोसा खाना चाहते हैं.

पति और बच्चों की फरमाइशें सुन कर किरण रसोईघर में जाने के लिए उठी ही थी कि  उसे याद आया कि गैस तो खत्म होने को है.

‘‘रवि, स्कूटर पर जा कर गैस एजेंसी से सिलेंडर ले आओ, गैस खत्म होने वाली है. कहीं ऐसा न हो कि मेहमान घर आ जाएं और गैस खत्म हो जाए.’’

‘‘ओह, एक तो हफ्ते भर बाद एक छुट्टी मिलती है वह भी अब तुम्हारे घर के कामों में बरबाद कर दूं. तुम खुद ही रिकशे पर जा कर गैस ले आओ, मुझे अभी कुछ देर और सोने दो.’’

‘‘मैं कैसे ला सकती हूं, बच्चों के लिए अभी नाश्ता तैयार करना है और साढ़े 8 बज रहे हैं, अब और कितनी देर सोना है तुम्हें,’’ किरण ने अपनी मजबूरी जाहिर की.

‘‘जाओ यार यहां से, तंग मत करो, लाना है तो लाओ, नहीं तो खाना होटल से मंगवा लो, पर मुझे कुछ देर और सोने दो, वीकली रेस्ट का मजा खराब मत करो.’’

‘‘छुट्टी मनाने का तुम्हें इतना ही शौक है तो दोस्तों को दावत क्यों दी,’’ खीझते हुए किरण बोली और माथे    पर बल डालते हुए रसोई की तरफ बढ़ गई.

‘‘बहू, पानी गरम हो गया?’’ जैसे ही यह आवाज किरण के कानों में पड़ी उस का पारा और भी चढ़ गया, ‘‘पानी कहां से गरम करूं, पिताजी, गैस खत्म होने वाली है और रवि को छुट्टी मनाने की पड़ी है.’’

1 घंटे बाद रवि उठा और     गैस एजेंसी से गैस का सिलेंडर और मंडी से सब्जियां ला कर उस ने किरण के हवाले कर दीं.

‘‘स्नान कर के मैं तैयार हो जाता हूं,’’ रवि बोला, ‘‘कहीं पानी न चला जाए, बच्चे कहां हैं?’’

सिलेंडर आया देख किरण थोड़ी ठंडी हुई और फिर बोली, ‘‘बच्चे पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने गए हैं,’’

‘‘चलो, अच्छा हुआ, तुम शांति से काम कर सकोगी, नाश्ता तो कर गए हैं न,’’ कहते हुए रवि बाथरूम में घुस गया.

‘‘नाश्ता कहां कर गए हैं, गैस तो चाय रखते ही खत्म हो गई थी,’’ किरण की आवाज रवि के बाथरूम का दरवाजा बंद करते ही टकरा कर लौट आई.

‘10 बजने को हैं, यह शांति अभी तक क्यों नहीं आई? सारे बर्तन साफ करने को पड़े हैं, कपड़ों से मशीन भरी पड़ी है,’ किरण मन ही मन बुदबुदाई.

‘‘रवि, जरा मीना के यहां फोन कर के पता करना, यह शांति की बच्ची अभी तक क्यों नहीं आई,’’ लेकिन बाथरूम में चल रहे पानी के शोर में किरण की आवाज दब कर रह गई.

स्नान कर के जैसे ही रवि बाथरूम से निकला तो देखा कि किरण बर्तन साफ करने में जुटी है. भूख ने उस के पारे को और बढ़ा दिया, ‘‘अब क्या खाना भी नहीं मिलेगा?’’

‘‘खाओगे किस में, एक भी बर्तन साफ नहीं है.’’

‘‘शांति कहां हैं, जब यह वक्त पर आ नहीं सकती तो किसी और को काम पर रख लो, कम से कम खाना तो वक्त पर मिले,’’ 2 अलगअलग बातों को एक ही वाक्य में समेटते हुए रवि बोला.

‘‘तुम से बोला तो था कि फोन कर के मीना के यहां से शांति के बारे में पूछ लो लेकिन तुम सुनते कब हो. अब छोड़ो, 5 मिनट इंतजार करो, मैं बना देती हूं तुम्हारे लिए कुछ खाने को.’’

‘‘बाबूजी ने नाश्ता कर लिया?’’ रवि ने पूछा.

‘‘हां, उन्हें दूध के साथ ब्रैड दे दी थी. वैसे भी वह हलका ही नाश्ता करते हैं.’’

नाश्ते से फ्री होते ही किरण बिना नहाएधोए रसोई में दोपहर का खाना बनाने में जुट गई.

‘‘आप के दोस्त आते ही होंगे, काम जल्दी निबटाना होगा. ऐसा करो, कम से कम तुम तो तैयार हो जाओ…और तुम ने यह क्या कुर्तापायजामा पहन रखा है, कम से कम कपड़े तो बदल लो.’’

‘‘अरे भई, कपड़े निकाल कर तो दो, और उन्हें आने में अभी 1 घंटा बाकी है.’’

‘‘अलमारी से कपड़े निकाल नहीं सकते. आप को तो हर चीज हाथ में चाहिए,’’ खीजती हुई किरण अलमारी से कपड़े भी निकालने लगी, ‘‘अभी सब्जियां काटनी हैं, आटा गूंधना है, कितना काम बाकी है.’’

सब्जियां गैस पर चढ़ा कर किरण नहाने चली गई. बच्चों को भी नहला कर किरण ने तैयार कर दिया.

थोड़ी देर बाद ही रवि के दोस्त अपने बीवीबच्चों के साथ घर आ गए. हाल में बैठा कर रवि उन की खातिरदारी में लग गया. किरण, पानी लाना, किरण, खाना लगा दो, किरण, ये ला दो, वो ला दो के बीच चक्कर लगातेलगाते किरण थक चुकी थी लेकिन रवि की फरमाइशें पूरी नहीं हो रही थीं.

शाम 4 बजे जब सारे मेहमान चले गए तब जा कर कहीं किरण ने चैन की सांस ली.

वह थोड़ी देर लेटना चाहती थी लेकिन तभी बाबूजी की आवाज ने उस के लेटने के अरमान पर पानी फेर दिया, ‘‘बहू, जरा चाय तो बना दो, सोचता हूं थोड़ी दूर टहल आऊं.’’

किरण ने चाय बना कर जैसे ही बाबूजी को दी कि बच्चे उठ गए, रवि सो चुका था. बच्चों को कुछ खिलापिला कर अभी उसे थोड़ी फुर्सत हुई थी कि काम वाली शांति बाई ने बेल बजा कर उस के चैन में खलल डाल दिया.

शांति को देखते ही किरण भड़क उठी, ‘‘क्या शांति, यह तुम्हारे आने का टाइम है. सारा काम मुझे खुद करना पड़ा. नहीं आना होता है तो कम से कम बता तो दिया करो, तुम्हें मालूम है कि कितनी परेशानी हुई आज,’’ एक ही सांस में किरण बोल गई.

‘‘क्या करूं बीबीजी, आज मेरे मर्द को काम पर नहीं जाना था, सो कहने लगा कि आज तू मेरे पास रह,’’ शांति ने अपनी रामकहानी सुनानी शुरू कर दी.

‘‘चल छोड़ अब रहने दे, जल्दी से कपड़े धो ले, पानी आ गया, सारे कपड़े गंदे हो गए हैं,’’ 2 घंटे शांति के साथ कपड़े धुलवाने और साफसफाई करवाने के बाद किरण डिनर बनाने में जुट गई. सब को खाना खिला कर जब रात को वह बिस्तर पर लेटी तो रवि अपनी रूमानियत पर उतर आया.

‘‘अब तंग मत करो, सो जाओ चुपचाप, मैं भी थक गई हूं.’’

‘‘क्या थक गई हूं, रोज तुम्हारा यही हाल है. कम से कम छुट्टी वाले दिन तो मान जाया करो.’’

‘‘छुट्टी, छुट्टी, छुट्टी, तुम्हारी तो छुट्टी है, पर मुझ से क्यों ट्रिपल शिफ्ट में काम करवा रहे हो?’’ Hindi Family Story

Social Story in Hindi : लड़ाई

Social Story in Hindi : उस दिन चौपाल पर रामखिलावन की रामायण बंच रही थी. उस का लड़का सतपाल बलि का बकरा बनेगा. सरकार ने उस के बाप को जमीन दी थी ठाकुरों वाली, बड़े नीम के उत्तर में नाले की तरफ ठाकुरों का सातपुश्तों का अधिकार था. पहले सरकार ने चकबंदी का चक्कर चलाया, फिर खेत नपाई हुई और आखिर में नाले के उत्तर की जमीन सरकार ने कब्जे में कर ली.

अब भला सरकार का कैसा कब्जा? वहां घूमने वाले सूअरों को क्या सरकार ने रोक दिया? क्या अब भी वहां शौच को लोग नहीं जाते? नाले की सड़ांध सरकार साथ ले गई क्या? जी हां, कुछ भी नहीं बदला. बस, फाइलों में पुराने नाम कट गए, नए नाम लिख गए.

पिछले साल बुढ़ऊ के मेले में मंत्री साहब आए थे. गरीबों का उद्धार शायद उन्हीं के हाथों होना था. गांव के 13 गरीब भूमिहीन लोगों को जमीन के पट्टे दिए गए. रामखिलावन भी उन में से एक था.

उन 13 भूमिहीन लोगों ने गांव से तहसील तक के 365 चक्कर लगाए और अंत में थकहार कर बैठ गए. रामखिलावन भी उधारी का आटा पोटली में बांध कर कचहरी को सलाम कर आया.

सारी जमीन ठाकुर अयोध्यासिंह की थी. गांव के गरीब मजदूर ठाकुर साहब की रैयत के समान थे. ठाकुर साहब को दया आ गई. तहसील वगैरह के चक्कर और खर्चपानी को देख कर उन्होंने 400-400 रुपए उन गरीबों को दान दे कर उन के आंसू पोंछ दिए, साथ ही स्टांप पर उन से हस्ताक्षर करा लिए.

संयोग से रामखिलावन को उन दिनों पेचिश हो गई. गिरिराज की बुढि़या मां के बारहवें में 35 लड्डू निगले तो पेट में नगाड़े बज उठे. और फिर जो पीली नदी का बांध टूटा तो रामखिलावन 20 घंटे लोटा लिए दौड़ते नजर आए. किसी ने सलाह दी कि पीपरगांव के मंगलाप्रसाद हकीम की दवा फांको.

40 कोस तय कर के पीपरगांव जा पहुंचा रामखिलावन. यहां वह 20 दिन रहा. बांध पर पक्की सीमेंट की गिट्टियां चढ़वा कर वह गांव लौटा. सब की सुनी तो दौड़ादौड़ा गया ठाकुर की हवेली. ठाकुर अयोध्यासिंह ‘लाम’ पर गए हुए थे. उसे अज्ञातवास भी कह सकते हैं. कोई नहीं जानता था कि उन का वह ‘लाम पर जाना’ क्या होता था, लेकिन जब लौट कर आते थे तो ढेर सारा मालमत्ता ले कर आते थे.

रामखिलावन का समय ही खराब था. उन्हीं दिनों ठाकुर साहब का साला हरगोविंद आया हुआ था. हरगोविंद थोड़ा बिगड़ा मिजाज रईस था. लेकिन उस के आने से गांव में रौनक आ जाती थी. कल्लू मियां की कव्वाल जमात, गणेशीराम की भगत मंडली, प्यारेदुलारे का स्वांग, शिवशंकर की नौटंकी, गोविंदराम की रामलीला मंडली, हरगोपाल की रासलीला, आगरे की नत्थोबाई, बनारस की सदाबहार सुंदरी शहजादी, कभी मुजरे, कभी नाच, कभी नाटक…मतलब यह कि रातरात भर मेले लगते गांव में.

उस समय रामखिलावन निराश हो कर लौट रहा था कि सामने से हरगोविंद आते दिखाई दिए. हरगोविंद ने नाक सिकोड़ कर उसे देखा और रामखिलावन लगे अपना राग अलापने, ‘‘बड़ा अन्याय हुआ है हमारे साथ, बाबू. ठाकुर साहब ने सब को जमीन के रुपए चुका दिए लेकिन मुझे फूटी कौड़ी भी नहीं मिली. गिरिराज, पंचोली, नथुआ, भुट्टो, दीना, वीरो, भज्जू सब को रुपए मिल गए लेकिन बाबू साहब, मुझे नहीं मिला एक पैसा भी.’’

अब हरगोविंद आए थे छुट्टन की झोंपड़ी से खापी कर झूमते हुए. पहले तो उन्होंने रामखिलावन को पुचकारा. फिर गले लिपट कर प्यार किया, फिर पैर पकड़ कर खूब रोए और फिर जो उन्होंने रामखिलावन की धुनाई की तो रामखिलावन को पुरखे याद आ गए.

वह तो अच्छा हुआ कि गायत्री चाची ने एक लोटा पानी हरगोविंद के सिर पर डाल कर उसे ठंडा कर दिया, नहीं तो उस दिन रामखिलावन की खैर नहीं थी.

रामखिलावन 33 करोड़ कथित देवताओं को रोपीट रहा था. तभी उस का बेटा सतपाल आ गया उस के पास.

सतपाल सेना में रंगरूट बन गया था. सुना था कि अब कोई बड़ा अफसर है. बंदूक चलाता था और हुक्म देता था.

सेना का लीपापोता रंगरूट व जवान सतपाल सूरत और मिजाज दोनों से ही अक्खड़ था. वैसे वह पिता रामखिलावन की ही कौन सी इज्जत करता था. बड़े तालाब के मेले पर भीड़ के सामने उस ने बाप को थप्पड़ मारा था, लेकिन उस समय तो वह सेना का अफसर था, किस की मजाल थी जो उस के बाप को हाथ भी लगा पाता.

सबकुछ सुन कर सतपाल ने अपनी वरदी कसी, टोपी जरा ठीकठाक की, फिर हाथ में बड़ा गंड़ासा ले कर जा पहुंचा ठाकुर की हवेली पर.

हरगोविंद कहीं बाहर निकल चुका था. लेकिन सतपाल खाली हाथ कैसे लौटता, दरवाजे पर खड़ा हरगोविंद का विलायती कुत्ता अंगरेजी में भौंके जा रहा था. सतपाल ने एक ही बार में उसे चीर कर रख दिया. फिर हौज भरे पानी में गंड़ासा धो कर घर लौट आया.

शायद उसी रात ठाकुर अयोध्यासिंह गांव लौट आए थे. वह बहुत देर तक सतपाल की हरकत पर क्रोध से लालपीले होते रहे थे.

शांत होने पर फंटी को सतपाल के घर भेजा. रामखिलावन से फंटी बोला, ‘‘तुम मूर्ख, जल में रह कर मगरमच्छ से बैर करोगे. रामकरन को देखा है. आज भी बैसाखी के सहारे चलता है. कुंती मौसी को तो जानते हो न. ठाकुर साहब को बदनाम करने के लिए होहल्ला किया तो उस का लड़का परमू जंगल में ही रह गया. लाश भी नहीं मिली. कुंती मौसी आज भी ठाकुर के घर रोटी बनाती है और ठाकुर की नजरें गरम रखती है. तुम तो भुनगे हो, भुनगे. अगर ठाकुर साहब की आंख भी टेढ़ी हो गई तो कहीं भी जगह नहीं मिलेगी. सतपाल की लाश कुत्ते की तरह किसी नालेपोखर में पड़ी सड़ती नजर आएगी.’’

तभी सतपाल आ गया. शायद वह फंटी को जानता था. वह मंटो अहीर का लड़का था, ‘बड़ा दादा बनता फिरता है. सुना है कि दूरदूर गांवों में भाड़ा ले कर लट्ठ चलाने जाता है. चलो, आज इस का भी पानी देख लेते हैं.’

‘‘कौन है बे. बिना पूछे घर में कैसे घुस आया?’’

‘‘जानता नहीं है, फंटी बाबू को? सेना में 200 रुपल्ली का सिपाही क्या बन गया, अपनी औकात ही भूल गया. सात पुश्तों से ठाकुरों की पत्तलें चाटचाट कर दिन काट रहे हो. आज चींटी के भी पंख निकल आए हैं. जाओ बच्चू, दूधदही खाके आओ. फिर चोंच लड़ाना हम से. तुम्हारे जैसे तीतरबटेर को तो चुटकी में मसल कर रख देते हैं.’’

सतपाल के गरम खून को वह अपमान बरदाश्त न हुआ. पास ही पड़ा फावड़ा उठा लिया. फंटी भी उस की टांगों में घुस गया और उसे गैंडे की तरह उछाल दिया. पहले तो सतपाल फावड़ा ले कर आंगन की बुखारी में जा पड़ा. उस का सिर फट गया. फिर जो उसे गुस्सा आया तो वह दनादन फावड़ा चलाने लगा. एक फावड़ा सीधा फंटी के कपाल पर लगा और माथे के ऊपर की एक चौथाई चमड़ी फावड़े के साथ नीचे लटक गई. खोपड़ी तरबूज की तरह छिल गई.

दोनों योद्धा लड़तेलड़ते घर से बाहर आ गए थे. फंटी दरवाजे पर ही गिर पड़ा. किसी ने चिल्ला कर कहा, ‘‘मर गया… खून…खून हो गया. भाग सतपाल…भाग रामखिलावन…भागो…’’

लेकिन दोनों में से कोई भी नहीं भागा. ठाकुर के आदमी तुरंत खाट ले कर आए और अपने वीर योद्धा को उठा कर ले गए.

लोग समझ रहे थे कि अब आएंगे ठाकुर के लोग. अब आएगी पुलिस. अब होगा डट कर खूनखराबा. लेकिन कुछ नहीं हुआ.

ठाकुर चुप, सतपाल चुप. सारा गांव चुप. ठाकुर ने कह दिया, ‘‘नहीं पुलिसवुलिस का क्या काम है? हमारा मामला है, हम खुद सुलट लेंगे.’’

फंटी मरा नहीं. फैजाबाद के अस्पताल में ठीक होने लगा. अयोध्या की हवा ने उसे नई जिंदगी दी.

गांव की चौपाल पर रामखिलावन और सतपाल की ही चर्चा थी, ‘‘छोड़ेगा नहीं ठाकुर सतपाल को. इतनी बड़ी बेइज्जती कैसे सह सकता है?’’

कुछ नौजवान सतपाल के गुट में आ गए…ठाकुरों से कटे हुए, पिटे हुए लोग. कुछ ठाकुर अयोध्यासिंह को कुरेदते, ‘‘कुछ करो, ठाकुर साहब. ऐसे तो इन का दिमाग फिर जाएगा. कुछ रास्ता निकालो.’’

ठाकुर ने तो नहीं, चौधरी बदरीप्रसाद ने जरूर रास्ता निकाल लिया.

चौधरी साहब सत्तारूढ़ पार्टी के अनुभवी घाघ नेता थे. 3 बार सांसद रह चुके थे. इस बार ठाकुरों ने इलाके में नहीं घुसने दिया. वह तो कहो कि पहले की कुछ जमापूंजी थी, जो आज तक चूस रहे थे. नहीं तो रोने को मजदूर भी न मिलते.

सतपाल के कारनामे की खबर उन्हें मिली तो तैश में आ गए. सतपाल को शहर बुलवा लिया. फिर समझानेबुझाने लगे. वकीलों, पेशकारों से सलाहमशवरा किया. कानूनी बातें समझ में बैठाई गईं और फिर ठोक दिया ठाकुर अयोध्यासिंह पर 420, मारपीट, धौंसपट्टी, फसाद, शांतिभंग और लूटपाट का अभियोग. पुलिस में रिपोर्ट के साथसाथ अदालत में मुकदमा दायर कर दिया.

उधर ठाकुर अयोध्यासिंह को अपनी गलती का एहसास हुआ. बगल में दुश्मन और फोड़े को उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए था. खैर, ठाकुरों ने अपनी पंचायत जोड़ी, मैदान संभाला. कोर्टकचहरी साधे, वकीलों- पेशकारों को बुलाया और फिर शुरू हुई एक ठंडी लड़ाई.

ठाकुर के ‘लाम’ के आदमी शायद आ टिके थे हवेली में. उन के लकदक ऊंचे लालसफेद घोड़े, जिन के खड़े कान और लंबी पूंछें उन की ऊंची नस्ल का पता दे रहे थे. ठाकुर की चौपाल पर हुक्कापानी का सिलसिला गुलजार होता गया.

इधर सतपाल के कच्चे मकान के पीछे ईश्वरी प्रसाद के अहाते में 8-9 खाटें बिछ जातीं. कुछ लोग शहर से आए थे. एकदम उजड्ड, एकदम ठूंठ, आसपास की बहूबेटियों को ऐसे देखते, जैसे वे औरतें न हों गुलाबजामुन हों.

दोनों तरफ भीड़ बढ़ने लगी थी. कुछ तनातनी भी चल रही थी. इधर एकाएक ठाकुरों ने चुनौती दी कि या तो 2 दिन के अंदर बाहर के लोगों को बाहर कर दो, वरना सारी बस्ती जला कर खाक कर देंगे.

1 दिन गुजर गया. कुछ राजनीति के फंदे तैयार किए गए. उसी दिन आ गया हरगोविंद. बस, उसे ही मुहरा बनाया गया. सारा कार्यक्रम तय हो गया.

शाम को लोटा ले कर हरगोविंद उत्तरी नाले की ओर निकला. एक हाथ में लोटा, एक हाथ में लाठी. लाठी तो वहां आमतौर पर रखते ही थे न. कोई नई बात नहीं थी. आधी धोती लपेटे, आधी कंधे पर डाले.

पीपल के पास वाली बेरिया की झाड़ी के पीछे उस ने लोटा रखा. तभी पिरबी आती दिखाई दी. सिर पर 2 सेर घास का बोझ, हाथ में हंसिया. पास से निकली. हरगोविंद ने उसे देखा. उस ने उसे देखा. वह मुसकराई और हरगोविंद उस के पीछे.

पिरबी फौरन पलटी और हरगोविंद से लिपट गई और फिर तुरंत ही अपने कपड़े फाड़ने लगी. वह किसी फिल्मी दृश्य की तरह चीखनेचिल्लाने लगी, ‘‘बचाओ…मार डाला…बचाओ…बचाओ…’’

बचाने वालों को वहां तक आने में देर नहीं लगी. 30-35 जवान हाथों में लाठियां लिए आ गए. हरगोविंद की सामूहिक धुनाईपिटाई कर के उसे गांव में लाया गया.

नथुआ पहले से ही तहसील रवाना हो चुका था. शायद पुलिस को पहले से ही तैयार रखा गया था. शायद शहर से पुलिस अधीक्षक के आदेश अग्रिम रूप से मिल गए थे. तभी तो तहसील की पुलिस ठाकुर की हवेली के लठैतों से पहले पहुंच गई.

हरगोविंद को तहसील ले जाया गया, फिर वहां से शहर. 2 दिन की अदालत की छुट्टी. पक्का बंदोबस्त.

इधर गांवगांव डुग्गी पिटी. अखबारों में छपा. रेडियो में गूंजा. सरकार ने सिर झुका कर इसे निंदनीय कार्य कहा. एक पिछड़े वर्ग की कन्या पर वहशी आक्रमण, पुलिस की सक्रिय भूमिका की सराहना, थानेदार जनार्दनप्रसाद की पदोन्नति.

दूरदूर के गांवों में संदेशा पहुंचा. 8 तारीख को पिछड़ी जाति की प्रादेशिक सभा, जुर्म के खिलाफ, गुलामी के विरुद्ध, प्रचार के लिए बड़ेबड़े बैनर परचे, लंबाचौड़ा बजट. कौन कर रहा था वह सब खर्च? कौन कर रहा था वह प्रबंध? कोई नहीं जानता था.

लोग भीड़ की इकाई बन कर चुपचाप घिसट रहे थे. सभा में जुड़ रहे थे.

‘‘मुर्दाबाद…मुर्दाबाद’’

‘‘नादिरशाही नहीं चलेगी…’’

‘‘गुंडागर्दी नहीं चलेगी…’’ नारे लग रहे थे.

उधर ठाकुरों की सेना तैयारी कर रही थी. जंगीपुरा की 20 झोंपडि़यों में आग लगा दी गई. 13 आदमी मर गए. किस ने लगाई वह आग? ठाकुरों की जमात में प्रश्न दर प्रश्न.

ठाकुरों के कुएं में मरा हुआ सूअर- 3 टुकड़ों में. पिछड़े वर्ग की सभा में प्रश्न दर प्रश्न…ऐसा किस ने किया?

सतपाल घबरा गया था. चौधरी बदरीप्रसाद का चुनाव क्षेत्र तैयार हो रहा था. उन्होंने खुल कर मैदान पकड़ा था. जानपहचान के नेताओं, मंत्रियों को ले कर गांव में आ गए थे, ‘‘छि:छि:, बहुत बुरी बात है. मरने वालों को 10-10 हजार रुपए…’’

मरने वाले ले जाएं आ कर अपना रुपया? कौन देगा वह रुपया? कलक्टर, तहसीलदार, सरपंच या पटवारी?

झूठ, कुछ नहीं मिलेगा. कुछ भी नहीं मिलेगा. फिर भी, ‘‘चौधरी बदरीप्रसाद जिंदाबाद.’’

‘‘गरीबों का मसीहा…बदरीप्रसाद…’’

उधर फिर नया युद्ध, नई नीति. हरगोविंद को छुड़वा कर शहर रवाना कर दिया गया. नई चाल चली गई और युद्ध का विषय बदल दिया गया.

बदल गया युद्ध का विषय, यानी रमजान रिकशे वाले को दाऊदयाल के लड़के संदीप ने पीट दिया. मकसूद बोल उठे, ‘‘अकेला जान कर पीट रहे हो न. अभी मियांपाडे़ के कसाई आ गए तो काट कर भुस भर देंगे.’’

संदीप अकड़ गया मकसूद से, ‘‘बाप लगता है तेरा. इन जैसे पचासों देखे हैं. चरकटे.’’

और फिर कर दी रमजान की जम कर पिटाई.

मकसूद ले गए उसे निकाल कर. फिर जाने क्या मंत्र फूंका कान में कि शाम को 7 बजे कल्लन, करीम, अकरम और मकसूद को ले कर आ गया रमजान. भरे बाजार में उस ने संदीप को गद्दी से खींच लिया और 10-20 जूते खोपड़ी पर रसीद कर दिए.

बाजार में होहल्ला मच गया. कुछ लोगों ने दूर से पत्थर बरसाने शुरू कर दिए. उन लोगों ने चाकू खोल लिए. फिर सब भाग खड़े हुए.

रात में मंदिरमसजिदों में सभाएं हुईं. प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया गया. रात भर दोनों धर्मों में पत्थरबाजी होती रही.

और उसी दिन सतपाल नौकरी पर लौट गया. ठाकुर अयोध्यासिंह उस लड़ाई को भुलाने का विचार करते-करते सो गए. Social Story in Hindi

Online Storytelling : लौटते हुए

Online Storytelling : विमल को शुगर की बीमारी नहीं थी, फिर भी उस ने रंजना के मातापिता को ईमानदारी से अपने परिवार की इस बीमारी के बारे में बता दिया. बस, फिर क्या था.

धनंजयजी का मन जाने का नहीं था, लेकिन सुप्रिया ने आग्रह के साथ कहा कि सुधांशु का नया मकान बना है और उस ने बहुत अनुरोध के साथ गृहप्रवेश के मौके पर हमें बुलाया है तो जाना चाहिए न. आखिर लड़के ने मेहनत कर के यह खुशी हासिल की है, अगर हम नहीं पहुंचे तो दीदी व जीजाजी को भी बुरा लगेगा…

‘‘पर तुम्हें तो पता ही है कि आजकल मेरी कमर में दर्द है, उस पर गरमी का मौसम है, ऐसे में घर से बाहर जाने का मन नहीं करता है.’’

‘‘हम ए.सी. डब्बे में चलेंगे…टिकट मंगवा लेते हैं,’’ सुप्रिया बोली.

‘‘ए.सी. में सफर करने से मेरी कमर का दर्द और बढ़ जाएगा.’’

‘‘तो तुम सेकंड स्लीपर में चलो, …मैं अपने लिए ए.सी. का टिकट मंगवा लेती हूं,’’ सुप्रिया हंसते हुए बोली.

सुप्रिया की बहन का लड़का सुधांशु पहले सरकारी नौकरी में था, पर बहुत महत्त्वाकांक्षी होने के चलते वहां उस का मन नहीं लगा. जब सुधांशु ने नौकरी छोड़ी तो सब को बुरा लगा. उस के पिता तो इतने नाराज हुए कि उन्होंने बोलना ही बंद कर दिया. तब वह अपने मौसामौसी के पास आ कर बोला था, ‘मौसाजी, पापा को आप ही समझाएं…आज जमाना तेजी से आगे बढ़ रहा है, ठीक है मैं उद्योग विभाग में हूं…पर हूं तो निरीक्षक ही, रिटायर होने तक अधिक से अधिक मैं अफसर हो जाऊंगा…पर मैं यह जानता हूं कि जिन की लोन फाइल बना रहा हूं वे तो मुझ से अधिक काबिल नहीं हैं. यहां तक कि उन्हें यह भी नहीं पता होता कि क्या काम करना है और उन की बैंक की तमाम औपचारिकताएं भी मैं ही जा कर पूरी करवाता हूं. जब मैं उन के लिए इतना काम करता हूं, तब मुझे क्या मिलता है, कुछ रुपए, क्या यही मेरा मेहनताना है, दुनिया इसे ऊपरी कमाई मानती है. मेरा इस से जी भर गया है, मैं अपने लिए क्या नहीं कर सकता?’

‘हां, क्यों नहीं, पर तुम पूंजी कहां से लाओगे?’ उस के मौसाजी ने पूछा था.

‘कुछ रुपए मेरे पास हैं, कुछ बाजार से लूंगा. लोगों का मुझ में विश्वास है, बाकी बैंक से ऋण लूंगा.’

‘पर बेटा, बैंक तो अमानत के लिए संपत्ति मांगेगा.’

‘हां, मेरे जो दोस्त साथ काम करना चाहते हैं वे मेरी जमानत देंगे,’ सुधांशु बोला था, ‘पर मौसीजी, मैं पापा से कुछ नहीं लूंगा. हां, अभी मैं जो पैसे घर में दे रहा था, वह नहीं दे पाऊंगा.’

धनंजयजी ने उस के चेहरे पर आई दृढ़ता को देखा था. उस का इरादा मजबूत था. वह दिनभर उन के पास रहा, फिर भोपाल चला गया था. रात को उन्होंने उस के पिता से बात की थी. वह आश्वस्त नहीं थे. वह भी सरकारी नौकरी में रह चुके थे, कहा था, ‘व्यवसाय या उद्योग में सुरक्षा नहीं है या तो बहुत मिल जाएगा या डूब जाएगा.’

खैर, समय कब ठहरा है…सुधांशु ने अपना व्यवसाय शुरू किया तो उस में उस की तरक्की होती ही गई. उस के उद्योग विभाग के संबंध सब जगह उस के काम आए थे. 2-3 साल में ही उस का व्यवसाय जम गया था. पहले वह धागे के काम में लगा था. फैक्टरियों से धागा खरीदता था और उसे कपड़ा बनाने वाली फैक्टरियों को भेजता था. इस में उसे अच्छा मुनाफा मिला. फिर उस ने रेडीमेड गारमेंट में हाथ डाल लिया. यहां भी उस का बाजार का अनुभव उस के काम आया. अब उस ने एक बड़ा सा मकान भोपाल के टी.टी. नगर में बनवा लिया है और उस का गृहप्रवेश का कार्यक्रम था… बारबार सुधांशु का फोन आ रहा था कि मौसीजी, आप को आना ही होगा और धनंजयजी ना नहीं कर पा रहे थे.

‘‘सुनो, भोपाल जा रहे हैं तो इंदौर भी हो आते हैं,’’ सुप्रिया बोली.

‘‘क्यों?’’

‘‘अपनी बेटी रंजना के लिए वहां से भी तो एक प्रस्ताव आया हुआ है. शारदा की मां बता रही थीं…लड़का नगर निगम में सिविल इंजीनियर है, देख भी आएंगे.’’

‘‘रंजना से पूछ तो लिया है न?’’ धनंजय ने पूछा.

‘‘उस से क्या पूछना, हमारी जिम्मेदारी है, बेटी हमारी है. हम जानबूझ कर उसे गड्ढे में नहीं धकेल सकते.’’

‘‘इस में बेटी को गड्ढे में धकेलने की बात कहां से आ गई,’’ धनंजयजी बोले.

‘‘तुम बात को भूल जाते हो…याद है, हम विमल के घर गए थे तो क्या हुआ था. सब के लिए चाय आई. विमल के चाय के प्याले में चम्मच रखी हुई थी. मैं चौंक गई और पूछा, ‘चम्मच क्यों?’ तो विमल बोला, ‘आंटी, मैं शुगर फ्री की चाय लेता हूं…मुझे शुगर तो नहीं है, पर पापा को और बाबा को यह बीमारी थी इसलिए एहतियात के तौर पर…शुगर फ्री लेता हूं, व्यायाम भी करता हूं, आप को रंजना ने नहीं बताया,’ ऐसा उस ने कहा था.’’

‘‘लड़की को बीमार लड़के को दे दो. अरे, अभी तो जवानी है, बाद में क्या होगा? यह बीमारी तो मौत के साथ ही जाती है. मैं ने रंजना को कह दिया था…भले ही विमल बहुत अच्छा है,    तेरे साथ पढ़ालिखा है पर मैं जानबूझ कर यह जिंदा मक्खी नहीं निगल सकती.’’

पत्नी की बात को ‘हूं’ के साथ खत्म कर के धनंजयजी सोचने लगे, तभी यह भोपाल जाने को उत्सुक है, ताकि वहां से इंदौर जा कर रिश्ता पक्का कर सके. अचानक उन्हें अपनी बेटी रंजना के कहे शब्द याद आए, ‘पापा, चलो यह तो विमल ने पहले ही बता दिया…वह ईमानदार है, और वास्तव में उसे कोई बीमारी भी नहीं है, पर मान लें, आप ने कहीं और मेरी शादी कर दी और उस का एक्सीडेंट हो गया, उस का हाथ कट गया…तो आप मुझे तलाक दिलवाएंगे?’

तब वह बेटी का चेहरा देखते ही रह गए थे. उन्हें लगा सवाल वही है, जिस से सब बचना चाहते हैं. हम आने वाले समय को सदा ही रमणीय व अच्छाअच्छा ही देखना चाहते हैं, पर क्या सदा समय ऐसा ही होता है.

‘पापा…फिर तो जो मोर्चे पर जाते हैं, उन का तो विवाह ही नहीं होना चाहिए…उन के जीवन में तो सुरक्षा है ही नहीं,’ उस ने पूछा था.

‘पापा, मान लें, अभी तो कोई बीमारी नहीं है, लेकिन शादी के बाद पता लगता है कि कोई गंभीर बीमारी हो गई है, तो फिर आप क्या करेंगे?’

धनंजयजी ने तब बेटी के सवालों को बड़ी मुश्किल से रोका था. अंतिम सवाल बंदूक की गोली की तरह छूता उन के मन और मस्तिष्क को झकझोर गया था.

पर, सुप्रिया के पास तो एक ही उत्तर था. उसे नहीं करनी, नहीं करनी…वह अपनी जिद पर अडिग थी.

रंजना ने भोपाल जाने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. वह जानती थी, मां वहां से इंदौर जाएंगी…वहां शारदा की मां का कोई दूर का भतीजा है, उस से बात चल रही है.

स्टेशन पर ही सुधांशु उन्हें लेने आ गया था.

‘‘अरे, बेटा तुम, हम तो टैक्सी में ही आ जाते,’’ धनंजयजी ने कहा.

‘‘नहीं, मौसाजी, मेरे होते आप टैक्सी से क्यों आएंगे और यह सबकुछ आप का ही है…आप नहीं आते तो कार्यक्रम का सारा मजा किरकिरा हो जाता,’’ सुधांशु बोला.

‘‘और मेहमान सब आ गए?’’ सुप्रिया ने पूछा.

‘‘हां, मौसी, मामा भी कल रात को आ गए. उदयपुर से ताऊजी, ताईजी भी आ गए हैं. घर में बहुत रौनक है.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, तुम सभी के लाड़ले हो और इतना बड़ा काम तुम ने शुरू किया है, सभी को तुम्हारी कामयाबी पर खुशी है, इसीलिए सभी आए हैं,’’ सुप्रिया ने चहकते हुए कहा.

‘‘हां, मौसी, बस आप का ही इंतजार था, आप भी आ गईं.’’

सुधांशु का मकान बहुत बड़ा था. उस ने 4 बेडरूम का बड़ा मकान बनवाया था. उस की पत्नी माधवी सजीधजी सब की खातिर कर रही थी. चारों ओर नौकर लगे हुए थे. बाहर जाने के लिए गाडि़यां थीं. शाम को उस की फैक्टरी पर जाने का कार्यक्रम था.

गृहप्रवेश का कार्यक्रम पूरा हुआ, मकान के लौन में तरहतरह की मिठाइयां, नमकीन, शीतल पेय सामने मेज पर रखे हुए थे पर सुधांशु के हाथ में बस, पानी का गिलास था.

‘‘अरे, सुधांशु, मुंह तो मीठा करो,’’ सुप्रिया बर्फी का एक टुकड़ा लेते हुए उस की तरफ बढ़ी.

‘‘नहीं, मौसी नहीं,’’ उस की पत्नी माधवी पीछे से बोली, ‘‘इन की शुगर फ्री की मिठाई मैं ला रही हूं.’’

‘‘क्या इसे भी…’’

‘‘हां,’’ सुधांशु बोला, ‘‘मौसी रातदिन की भागदौड़ में पता ही नहीं लगा कब बीमारी आ गई. एक दिन कुछ थकान सी लगी. तब जांच करवाई तो पता लगा शुगर की शुरुआत है, तभी से परहेज कर लिया है…दवा भी चलती है, पर मौसी, काम नहीं रुकता, जैसे मशीन चलती है, उस में टूटफूट होती रहती है, तेल, पानी देना पड़ता है, कभी पार्ट्स भी बदलते हैं, वही शरीर का हाल है, पर काम करते रहो तो बीमारी की याद भी नहीं आती है.’’

इतना कह कर सुधांशु खिलखिला कर हंस रहा था और तो और माधवी भी उस के साथ हंस रही थी. उस ने खाना खातेखाते पल्लवी से पूछा, ‘‘जीजी, सुधांशु को डायबिटीज हो गई, आप ने बताया ही नहीं.’’

‘‘सुप्रिया, इस को क्या बताना, क्या छिपाना…बच्चे दिनरात काम करते हैं. शरीर का ध्यान नहीं रखते…बीमारी हो जाती है. हां, दवा लो, परहेज करो. सब यथावत चलता रहता है. तुम तो मिठाई खाओ…खाना तो अच्छा बना है?’’

‘‘हां, जीजी.’’

‘‘हलवाई सुधांशु ने ही बुलवाया है. रतलाम से आया है. बहुत काम करता है. सुप्रिया, हम धनंजयजी के आभारी हैं. सुना है कि उन्होंने ही सुधांशु की सहायता की थी. आज इस ने पूरे घर को इज्जत दिलाई है. पचासों आदमी इस के यहां काम करते हैं…सरकारी नौकरी में तो यह एक साधारण इंस्पेक्टर रह जाता.’’

‘‘नहीं जीजी,…हमारा सुधांशु तो बहुत मेहनती है,’’ सुप्रिया ने टोका.

‘‘हां, पर…हिम्मत बढ़ाने वाला भी साथ होना चाहिए. तुम्हारे जीजा तो इस के नौकरी छोड़ने के पूरे विरोध में थे,’’ पल्लवी बोली.

‘‘अब…’’ सुप्रिया ने मुसकरा कर पूछा.

‘‘वह सामने देखो, कैसे सेठ की तरह सजेधजे बैठे हैं. सुबह होते ही तैयार हो कर सब से पहले फैक्टरी चले जाते हैं. सुधांशु तो यही कहता है कि अब काम करने से पापा की उम्र भी 10 साल कम हो गई है. दिन में 3 चक्कर लगाते हैं, वरना पहले कमरे से भी बाहर नहीं जाते थे.’’

रात का भोजन भी फैक्टरी के मैदान में बहुत जोरशोर से हुआ था. पूरी फैक्टरी को सजाया गया था. बहुत तेज रोशनी थी. शहर से म्यूजिक पार्टी भी आई थी.

धनंजयजी को बारबार अपनी बेटी रंजना की याद आ जाती कि वह भी साथ आ जाती तो कितना अच्छा रहता, पर सुप्रिया की जिद ने उसे भीतर से तोड़ दिया था.

सुबह इंदौर जाने का कार्यक्रम पूर्व में ही निर्धारित हुआ था. पर सुबह होते ही, धनंजयजी ने देखा कि सुप्रिया में इंदौर जाने की कोई उत्सुकता ही नहीं है, वह तो बस, अधिक से अधिक सुधांशु और माधवी के साथ रहना चाह रही थी.

आखिर जब उन से रहा नहीं गया तो शाम को पूछ ही लिया, ‘‘क्यों, इंदौर नहीं चलना क्या? वहां से फोन आया था और कार्यक्रम पूछ रहे थे.’’

सुप्रिया ने उन की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया, वह यथावत अपने रिश्तेदारों से बातचीत में लगी रही.

सुबह ही सुप्रिया ने कहा था, ‘‘इंदौर फोन कर के उन्हें बता दो कि हम अभी नहीं आ पाएंगे.’’

‘‘क्यों?’’ धनंजयजी ने पूछा.

सुप्रिया ने सवाल को टालते हुए कहा, ‘‘शाम को सुधांशु की कार जबलपुर जा रही है. वहां से उस की फैक्टरी में जो नई मशीनें आई हैं, उस के इंजीनियर आएंगे. वह कह रहा था, आप उस से निकल जाएं, मौसाजी को आराम मिल जाएगा. पर कार में ए.सी. है.’’

‘‘तो?’’

‘‘तो तुम्हारी कमर में दर्द हो जाएगा,’’ उस ने हंसते हुए कहा.

धनंजयजी, पत्नी के इस बदले हुए मिजाज को समझ नहीं पा रहे थे.

रास्ते में उन्होंने पूछा, ‘‘इंदौर वालों को क्या कहना है, फिर फोन आया था.’’

‘‘सुनो, सुधांशु को पहले तो डायबिटीज नहीं थी.’’

‘‘हां.’’

‘‘अब देखो, शादी के बाद हो गई है, पर माधवी बिलकुल निश्चिंत है. उसे तो इस की तनिक भी चिंता नहीं है. बस, सुधांशु के खाने और दवा का ध्यान दिन भर रखती है और रहती भी कितनी खुश है… उस ने सभी का इतना ध्यान रखा कि हम सोच भी नहीं सकते थे.’’

धनंजयजी मूकदर्शक की तरह पत्नी का चेहरा देखते रहे, तो वह फिर बोली, ‘‘सुनो, अपना विमल कौन सा बुरा है?’’

‘‘अपना विमल?’’ धनंजयजी ने टोका.

‘‘हां, रंजना ने जिस को शादी के लिए देखा है, गलती हमारी है जो हमारे सामने ईमानदारी से अपने परिवार का परिचय दे रहा है, बीमारी के खतरे से सचेत है, पूरा ध्यान रख रहा है. अरे, बीमारी बाद में हो जाती तो हम क्या कर पाते, वह तो…’’

‘‘यह तुम कह रही हो,’’ धनंजयजी ने बात काटते हुए कहा.

‘‘हां, गलती सब से होती है, मुझ से भी हुई है. यहां आ कर मुझे लगा, बच्चे हम से अधिक सही सोचते हैं,’’…पत्नी की इस सही सोच पर खुशी से उन्होंने पत्नी का हाथ अपने हाथ में ले कर धीरे से दबा दिया. Online Storytelling

Family Story in Hindi : लिटिल चैंप का घमासान

Family Story in Hindi : मैं चाहता हूं कि हमारा लाड़ला पिंटू नामीगिरामी क्रिकेटर बने, जिस में नाम, सम्मान और ऐश, सबकुछ है, जबकि करीना चाहती है कि वह ‘लिटिल चैंप’ बने.

कुछ लोग गृहस्थी को युद्ध का मैदान मानते हैं. लड़ने के लिए वैसे भी 2 पक्ष चाहिए ही. सच ही कहा गया है कि पतिपत्नी अलगअलग ग्रह से आते हैं. एक राहु होता है तो दूसरा केतु. सफल दांपत्य जीवन के लिए कितने ही लेख पढ़ लें, फिल्में देख लें, प्रवचन सुन लें, पूजापाठ कर लें, वास्तुशास्त्र के टोटके कर लें मगर आदर्श परिवार बनने का दूध अहमभाव के दही से फट ही जाता है.

सुबह हुई नहीं कि मैं भी फटे हुए दूध को क्षमायाचना की सूई से सीने बैठ गया.

‘‘सुनो प्रिये, मेरी बातों का बुरा मत माना करो. कल दफ्तर में बौस से झड़प हो गई. तुम तो जानती हो करीना कि धोबी अपना गुस्सा गधे पर उतारता है, सो मैं अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा मांगता हूं,’’ मैं ने अपने कान पकड़ लिए.

‘‘तुम ने मुझे गधी कहा,’’ पत्नी दहाड़ी.

‘‘नहीं, भाग्यवान, यह तो मुहावरा है. अब अपना गुस्सा थूक दो,’’ मैं ने पुचकारते हुए कहा.

दांपत्य जीवन में इस प्रकार की तकरार को खुशहाली बनाए रखने का सूत्र माना जाता है. घर में चार बर्तन हों तो खड़केंगे ही. पत्नी करीना के साथ जब घमासान होने का खतरा दिखाई देता है तब मैं सफेद रुमाल निकाल कर समझौते की मुद्रा में आ जाता हूं.

उस से कहता हूं, ‘‘मेरी एग करी, जरा अपना मुंह फुलाने का कारण तो बताइए?’’

करीना का जब पारिवारिक घमासान करने का मूड होता है तो वह बेडरूम, जिसे मैं आधुनिक कोप भवन की संज्ञा देता हूं, में जा कर औंधे मुंह लेट जाती है. उस की घनी बिखरी केश राशि किसी काले चमकीले घने बाल बनाने वाली केश तेल कंपनी का जीवित विज्ञापन लगती है. वह घायल नागिन की तरह फुफकारने लगती है. ऐसी स्थिति में पत्नी को न मनाते बनता है न छेड़ते बनता है.

मैं ने नम्रतापूर्वक कहा, ‘‘हे करीना देवी, अब मान भी जाओ. अपना पिंटू बड़ा हो रहा है. वह तुम्हें इस रौद्र रूप में देखेगा तो उस के बालमन पर बुरा असर पड़ेगा. वह स्कूल से आता ही होगा. चलो, उठ कर कपड़े बदल लो.’’

पिंटू का नाम सुनते ही करीना झटके से उठ खड़ी हुई, ‘‘आप ठीक कहते हैं जी, पिंटू का मुझे तो खयाल ही नहीं रहा. इधर मैं कुछ दिनों से देख रही हूं कि उस का मन पढ़ने में नहीं लग रहा है. बाथरूम में दरवाजा बंद कर घंटों गुनगुनाता रहता है. लगता है उसे लिटिल चैंप बनने की सनक सवार हो गई है.’’

‘‘करीना, अच्छा हुआ जो तुम ने बता दिया. वरना हमारे बीच तूतू मैंमैं होती रहती. पिंटू के कैरियर को ले कर मैं चिंतित हूं. मैं तो उसे क्रिकेट का चैंपियन बनाना चाहता हूं. क्रिकेट में अच्छीखासी कमाई हो जाती है. दोचार टेस्ट खेलो और वारेन्यारे. पहले कहा जाता था :

पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे होगे खराब.’’

अब सबकुछ उलटापुलटा हो रहा है. सोच, स्टेटस सब बदल रहा है. अब बच्चों का कैरियर डाक्टर, इंजीनियर बनने में नहीं बल्कि ‘चक दे इंडिया’ की तर्ज पर फिल्म गोल, लगान के नायक की तरह खेल में है. मैं तो चाह रहा हूं करीना कि हम अपने पिंटू को अच्छा खिलाड़ी बनाएं. लान टेनिस, चेस में क्या कम आमदनी है? खिलाड़ी देश का गौरव होता है. इस में सम्मान है, पैसा है, विदेश यात्रा है,’’ मैं ने अपनी भावना करीना को बतलाई.

‘‘मगर खिलाड़ी बनने के लिए 18 वर्ष की आयु होनी जरूरी है. मैं अपने पिंटू के कैरियर के लिए इतना इंतजार नहीं कर सकती,’’ करीना ने अपना पैंतरा बदलते हुए कहा, ‘‘जब टीवी कार्यक्रम के लिए उम्र आड़े नहीं आती. आप देख रहे हैं कि 10-12 वर्ष के छोटेछोटे बच्चे भी गीतसंगीत के माध्यम से देशविदेश में छा रहे हैं, लाखों में खेल रहे हैं… मैं तो अपने पिंटू को अच्छा गायक बनाऊंगी जी.’’

करीना जिस उत्साह से बोल रही थी उस में उस का गजब का आत्मविश्वास झलक रहा था. मुझे लगा, जिद्दी करीना पिंटू को लिटिल चैंप बना कर ही रहेगी. पिंटू के स्कूल से आते ही मैं बोला, ‘‘बेटा पिंटू, तुम्हारी मम्मी कह रही थीं कि तुम आजकल ठीक से पढ़लिख नहीं रहे हो. दिन भर डीवीडी में फिल्मी गीत सुनते रहते हो, गाने गाते रहते हो, यह ठीक बात नहीं है, बेटा. यह तुम्हारे पढ़नेलिखने के दिन हैं.’’

‘‘मैं सोचता हूं पापा, आखिर पढ़लिख कर वैसे ही तो कमाना है. मैं लिटिल चैंप बन कर 5-10 लाख रुपए हर साल कमा कर आप को दे दूंगा. पढ़ाई तो बाद में भी होती रहेगी.’’

करीना ने पिंटू को पुचकारते हुए कहा, ‘‘बेटा, जब तू लिटिल चैंप के स्टेज पर झूमझूम कर गाएगा तब मुझे भी मंच पर बुलाएगा न?’’ यह कह रोमांचित हो करीना ताली बजाने लगी.

मुझे लगा, करीना व मेरे बीच पिंटू के भविष्य को ले कर घमासान अब हुआ तब हुआ. करीना हवा में उड़ने लगी. भोली करीना को मालूम नहीं कि एक अरब से अधिक की जनसंख्या वाले देश में गायक बनना इतना आसान नहीं है. संगीत के सुरताल को समझने में, उस्ताद के पास रियाज करने में सालों निकल जाएंगे फिर भी गारंटी नहीं होगी कि पिंटू इस स्पर्द्धा में टिका रहेगा. ऐसे में पिंटू न घर का रहेगा न घाट का.

मैं जानता हूं, करीना को समझाना इतना आसान नहीं है. एक बार रेत में से तेल निकाला जा सकता है मगर जिद्दी करीना को उस के भ्रमजाल से निकालना आसान नहीं.

मैं ने अपना आखिरी दांव खेलते हुए कहा, ‘‘करी, पहले पिंटू को शिक्षा पूरी कर लेने देते हैं फिर बड़ा होने पर उसे जो बनना है वह बने. मुझे भी पिंटू के उज्ज्वल भविष्य की चिंता है. टीवी कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए जबर्दस्त आत्मविश्वास, साधना, श्रम व धैर्य की जरूरत पड़ती है. गायक बनने के लिए अच्छा गला भी होना चाहिए, जो अपने पिंटू का नहीं है.’’

‘‘पिंटू मेरा बेटा है जी,’’ करीना बोली, ‘‘बस, उस के मन में एक बार बैठ जाए कि उसे लिटिल चैंप बनना है, वह बन जाएगा. गले का क्या है. कालीमिर्च, तुलसी, मुलेठी, अदरक तो गले के लिए वरदान हैं जी. 2 दिन में ही उस की आवाज सुरीली हो जाएगी देखना… बस, अब मैं नहीं जानती और न कुछ सुनना चाहती हूं.’’

करीना रूठ कर कोप भवन में चली गई. जब नारी बेडरूम में जाती है तब वहां किसी घमासान की आधारशिला रखी जाती है, जिस से मजबूत से मजबूत गृहस्थी की ईंटें हिलने लगती हैं. मैं डर रहा हूं कि पिंटू के कैरियर को ले कर हमारे घर के घमासान के आडियो की जगह वीडियो से पड़ोसी मुफ्त का आनंद न लेने लगें.

मैं देख रहा था, पिंटू टीवी पर लिटिल चैंप का प्रोग्राम फुल वाल्यूम के साथ देख कर मजे ले रहा है. करीना खुश हो कर कह रही है, ‘‘जीयो मेरे लिटिल चैंप.’’

मैं लिटिल चैंप की दीवानी करीना को कैसे समझाऊं कि पिंटू को कितने एस.एम.एस. मिलेंगे. मेरे लिए एस.एम.एस. का अर्थ तो सुरीला महासंग्राम होता है. Family Story in Hindi

Best Kahani : अपनाअपना वनवास

Best Kahani : एक बड़े महानगर से दूसरे महानगर में स्थानांतरण होने के बाद मैं अपने कमरे में सामान जमा रही थी कि दरवाजे की घंटी बजी. ‘‘कौन है?’’ यह सवाल पूछते हुए मैं ने दरवाजा खोला तो सामने एक अल्ट्रा माडर्न महिला खड़ी थी. मुझे देख कर उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘गुड आफ्टर नून.’’ ‘‘कहिए?’’ मैं ने दरवाजे पर खड़ेखड़े ही उस से पूछा. ‘‘मेरा नाम बसंती है. मैं यहां ठेकेदारी का काम करती हूं,’’ उस ने मुझे बताया. लेकिन ठेकेदार से मेरा क्या रिश्ता…यहां क्यों आई है?

ऐसे कई सवाल मेरे दिमाग में आ रहे थे. मैं कुछ पूछती उस के पहले ही उस ने कहना जारी रखते हुए बताया, ‘‘आप को किसी काम वाली महिला की जरूरत हो तो मैं उसे भेज सकती हूं.’’ मैं ने सोचा चलो, अच्छा हुआ, बिना खोजे मुझे घर बैठे काम वाली मिल रही है. मैं ने कहा, ‘‘जरूरत तो है…’’ पर मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि वह कहने लगी, ‘‘बर्तन साफ करने के लिए, झाडू़ पोंछा करने के लिए, खाना बनाने के लिए, बच्चे संभालने के लिए…आप का जैसा काम होगा वैसी ही उस की पगार रहेगी.’’

मैं कुछ कहती उस से पहले ही उस ने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘उस की पगार पर मेरा 2 प्रतिशत कमीशन रहेगा.’’ ‘‘तुम्हारा कमीशन क्यों?’’ मैं ने पूछा. ‘‘हमारा रजिस्टे्रेशन है न मैडम, जिस काम वाली को हम आप के पास भेज रहे हैं उस के द्वारा कभी कोई नुकसान होगा या कोई घटनादुर्घटना होगी तो उस की जिम्मेदारी हमारी होगी,’’ उस ने मुझे 2 प्रतिशत कमीशन का स्पष्टीकरण देते हुए बताया. ‘‘यहां तो काम…’’ ‘‘बर्तन मांजने का होगा, आप यही कह रही हैं न,’’ उस ने मेरी बात सुने बिना पहले ही कह दिया,

‘‘मैडम, कितने लोगों के बर्तन साफ करने होंगे, बता दीजिए ताकि ऐसी काम वाली को मैं भेज सकूं.’’ ‘‘तुम ने अपना नाम बसंती बताया था न?’’ ‘‘जी, मैडम.’’ ‘‘तो सुनो बसंती, मेरे घर पर बर्तन मांजने, पोंछने वाली मशीन है.’’ ‘‘सौरी मैडम, कपड़े साफ करने होंगे? तो कितने लोगों के कपड़े होंगे? मुझे पता चले तो मैं वैसी ही काम वाली जल्दी से आप के लिए ले कर आऊं.’’ ‘‘बसंती, तुम गजब करती हो. मुझे मेरी बात तो पूरी करने दो,’’ मैं ने कहा. ‘‘कहिए, मैडमजी.’’ ‘‘मेरे घर पर वाशिंग मशीन है.’’

‘‘फिर आप को झाड़ूपोंछा करने वाली बाई चाहिए…है न?’’ ‘‘बिलकुल नहीं.’’ उस ने यह सुना तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ. कहने लगी, ‘‘कपड़े धोने वाली नहीं, बर्तन मांजने वाली नहीं, झाड़ूपोंछे वाली नहीं, तो फिर मैडमजी…’’ ‘‘क्योंकि मेरे घर पर वेक्यूम क्लीनर है, बसंती.’’ ‘‘फिर खाना बनाने के लिए?’’ उस ने हताशा से अंतिम आशा का तीर छोड़ते हुए पूछा. ‘‘नो, बसंती. खाना बनाने के लिए भी नहीं, क्योंकि मैं पैक फूड लेती हूं और आटा गूंथने से ले कर रोटी बनाने की मेरे पास मशीन है,’’ मैं ने विजयी मुसकान के साथ कहा. उस के चेहरे पर परेशानी झलकने लगी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इस नए घर से उसे 2 प्रतिशत की आमदनी होने वाली थी उस का क्या होगा.

उस ने हताशा भरे स्वर में कहा, ‘‘मैडमजी, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि जब सबकुछ की मशीन आप के पास है तो आखिर आप को काम वाली महिला क्यों चाहिए? उस का तो कोई उपयोग है ही नहीं.’’ मुझे भी हंसी आ गई थी. मुझे हंसता देख कर उस की उत्सुकता और बढ़ गई. उस ने बडे़ आदर के साथ पूछा, ‘‘मैडमजी, बताएं तो फिर वह यहां क्या काम करेगी?’’

कुछ देर चुप रही मैं. उस ने अंतिम उत्तर खोज कर फिर कहा, ‘‘समझ गई.’’ ‘‘क्या समझीं?’’ ‘‘घर की रखवाली के लिए चाहिए?’’ ‘‘नहीं.’’ ‘‘बच्चों की देखरेख के लिए?’’ ‘‘नो, बसंती. मैं ने अभी शादी भी नहीं की है.’’ ‘‘तो मैडमजी, फिर आप ही बता दें, आप को काम वाली क्यों चाहिए?’’ अब मैं ने उसे बताना उचित समझा.

मैं ने कहा, ‘‘बसंती, पिछले दिनों मैं दिल्ली में थी और आज नौकरी के चक्कर में बंगलौर में हूं. मुझे अच्छी पगार मिलती है. मेरा दिन सुबह 5 बजे से शुरू होता है और रात को 11 बजे तक चलता रहता है. मेरी सहेली कंप्यूटर है. मेरे रिश्तेदार सर्वे, डाटा, प्रोजेक्ट रिपोर्ट हैं. सब सिर्फ काम ही काम है. मेरे घर में सब मशीनें हैं. मुझे एक महिला की जरूरत है जो मेरे खाली समय में मुझ से बातचीत कर सके. मुझे इस बात का एहसास कराती रहे कि मैं भी इनसान हूं. मैं भी जिंदा हूं. मैं मशीन नहीं… समाज का अंग हूं.’’

मैं ने उसे विस्तार से अपनी पीड़ा बताई. मेरी बात सुन कर वह ठगी सी रह गई. उस ने आगे बढ़ कर मुझ से कहा, ‘‘मैडमजी, आप को ऐसी काम करने वाली महिला मैं भी नहीं दिला पाऊंगी,’’ कह कर वह कमरे से निकल गई. मुझे लगा कि सब को अपनेअपने एकांत का वनवास खुद ही भोगना होता है. मैं फिर अपने कमरे का सामान जमाने में लग गई. Best Kahani

Best Hindi Kahani : प्रतिकार – क्या आराधना अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन पाई?

Best Hindi Kahani :

आपरेशन टेबल पर पड़े मरीज को देख कर डा. आराधना सकते में आ गई. यह वही दरिंदा था जिस ने उस के हंसतेखेलते परिवार को उजाड़ दिया था. क्या उपकार प्रतिकार के मानसिक अंतर्द्वंद्व में जूझती आराधना अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन पाई?

रात में मां का फोन आया था कि वह सुबह आ रही हैं. उन्हें स्टेशन से लेने के लिए वह निकल ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी. उस ने रिसीवर उठाया तो पता चला कि फोन अस्पताल के आपातकालीन विभाग से आया था और उसे जल्दी पहुंचने के लिए कहा गया था.

कइमहीनों के बाद तो उस ने छुट्टी ली थी. मां उस से मिलने आ रही हैं. पिछली बार जब वह घर गई थी तब केवल 4 दिन की छुट्टियां ली थीं. मां ने उस से पूछा था, ‘अब फिर कब आओगी’ तो उस ने कहा था, ‘मां, अब तुम मुझ से मिलने आना. मेरा आना संभव नहीं हो पाएगा.’

तब मां ने कहा था, ‘तुम छुट्टी लोगी, तभी मैं वहां आऊंगी. स्टेशन से ले जा कर घर बिठा देती हो… अकेले घर में मन ही नहीं लगता. कम से कम उस दिन तो छुट्टी ले ही लिया करो.’

यही सोच कर उस ने मां को अपनी छुट्टी की खबर दी थी और मां आ रही थीं. पर अचानक अस्पताल से फोन आने के बाद उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह जानती थी कि अकेले भी मां को स्टेशन से घर आने में कितनी तकलीफ होगी. भैयाभाभी जानेंगे तो अलग गुस्सा होंगे कि यदि उस के पास मां के लिए इतना भी समय नहीं है तो वह उन्हें अपने पास बुलाती ही क्यों है.

जल्दी में कुछ और उपाय नहीं सूझा तो उस ने डा. कपिल के पापा से मां को स्टेशन से लाने के लिए अनुरोध किया. वह जानती थी कि मां को लाने और घर तक छोड़ने में कम से कम डेढ़ घंटा तो लग ही जाएगा. उधर अस्पताल से दूसरी बार फोन आ चुका था. मां पहली बार जब आई थीं तब कपिल के पापा से उन की मुलाकात हुई थी इसलिए परेशानी की कोई बात नहीं थी.

ताला लगा कर चाबी उस ने कपिल के पापा को दे दी. उन की इस असुविधा के लिए उस ने पहले ही फोन पर उन से क्षमा मांग ली थी. तब उन्होंने फोन पर हंस कर कहा था, ‘‘तुम्हारी मां के आ जाने से मुझ बुड्ढे को भी कोई बात करने वाला मिल जाएगा.’’

उन की बात सुन कर वह भी खिलखिला कर हंस पड़ी थी.

अस्पताल पहुंचते ही वह डा. सिद्धांत के कमरे में गई. उन्होंने ही उसे फोन कर के बुलाया था. मरीज की प्राथमिक चिकित्सा कर दी गई थी पर आपरेशन की तुरंत आवश्यकता थी. समय पर आपरेशन न करने से मरीज की जान को खतरा था.

उस ने देखा कि आपरेशन थिएटर के बाहर एक औरत बुरी तरह से रोते हुए नर्स से कह रही थी, ‘‘सिस्टर, मैं अभी पूरे पैसे जमा नहीं करा सकती पर मैं जल्दी ही बिल चुका दूंगी.’’

सिस्टर ने झिड़कते हुए कहा था, ‘‘पैसा नहीं है तो किसी सरकारी अस्पताल में ले जाओ. इसे यहां क्यों ले कर आई हो?’’

‘‘यहां के डाक्टर योग्य हैं. मेरा इस अस्पताल पर विश्वास है. मैं जानती हूं कि डा. आराधना और डा. सिद्धांत मेरे पति को बचा लेंगे इसीलिए मैं यहां आई हूं. सिस्टर, मैं एकएक पैसा चुका कर ही यहां से जाऊंगी.’’

नर्स से बात करने के बाद वह औरत उस के पास आ कर रोतेरोते कह रही थी, ‘‘प्लीज, मेरे पति को बचा लीजिए. मुझे पता है कि आप मेरे पति को बचा सकती हैं. बचा लेंगी न आप?’’

उस ने उस औरत को सांत्वना दी, ‘‘देखिए, अपनी ओर से डाक्टर पूरा प्रयत्न करता है. यह उस का कर्तव्य होता है. आप चिंता न करें. सब ठीक हो जाएगा. क्या हुआ था आप के पति को?’’

‘‘पता नहीं डाक्टर, रात पेट में दाईं ओर दर्द होता रहा. सुबह उठते ही खून की उलटी हो गई. मैं घबराहट में कुछ कर ही नहीं सकी. जो रुपए घर में रखे थे उन्हें भी नहीं ला सकी. डाक्टर, आप इन का इलाज शुरू कीजिए, मैं घर जा कर पैसे ले आऊंगी.’’

नर्स ने फार्म पर हस्ताक्षर कराते समय उस औरत से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे पति शराब पीते हैं?’’

‘‘हां, सिस्टर, बहुत अधिक पीते हैं. यह शराब ही इन्हें ले डूबी है. शराब के नशे में क्याक्या नहीं किया इन्होंने. सारी संपत्ति गंवा दी. अच्छाखासा कारोबार था, सब समाप्त हो गया. सासससुर बेटे के गम में ही चल बसे. मैं अकेली औरत क्याक्या करूं. कोई संतान भी नहीं हुई जो उस से मेरा जीवन अच्छा कट जाता,’’ कह कर वह औरत फिर रोने लगी.

वह उन की बातों को सुन रही थी लेकिन उस का ध्यान मरीज की ओर था जो अभी भी बेहोशी की हालत में था. डा. सिद्धांत भी आ गए थे. वह उन के साथ ही मरीज के पास आ गई. उस ने नब्ज देखी. ब्लडप्रेशर चेक किया. उस समय सबकुछ सामान्य था.

‘‘आपरेशन किया जा सकता है डा. सिद्धांत,’’ यह कह कर उस ने मरीज की ओर ध्यान से देखा. चेहरा कुछ जाना- पहचाना सा लग रहा था. उस चेहरे की प्रौढ़ता के पीछे वह मरीज की युवावस्था का चेहरा ढूंढ़ने लगी तो उस चेहरे को क्षणांश में ही पहचान गई. उस ने मरीज को फिर से देखा. उस की नजरें धोखा नहीं खा सकतीं. 20 बरसों के बाद भी वह उसे पहचान गई.

एक पल को उसे जोर का झटका लगा. उस के कदम आपरेशन थिएटर की ओर नहीं बढ़ सके. कमरे में जा कर वह कुरसी पर धम से बैठ गई. थोड़ा पानी पीने के बाद उस ने कुरसी के पीछे सिर टिका कर आंखें मूंद लीं.

तब वह 12-13 साल की थी और दीदी 17 की रही होंगी. वह 7वीं कक्षा में थी और दीदी 12वीं में, शिवांक सब से छोटा था. दोनों बहनें एक ही स्कूल में पढ़ने जाती थीं. स्कूल दूर नहीं था इसलिए दोनों पैदल ही जाया करती थीं. मां सुबह उठ कर नाश्ता तैयार करतीं. पापा कभीकभी उन को स्कूटर से भी स्कूल छोड़ आते थे.

दीदी पढ़ने में बहुत तेज थीं. पापा भी उन का पूरा ध्यान रखते थे. शाम को आफिस से आ कर दोनों की पढ़ाई के बारे में, स्कूल की अन्य गतिविधियों के बारे में पूछते रहते और जो भी कठिनाई होती उसे दूर करते थे. चूंकि पापा आफिस के साथसाथ दीदी को नियमित नहीं पढ़ा पाते थे अत: दीदी को विज्ञान पढ़ाने के लिए ट्यूशन लगा दी थी. वह चाहते थे कि दीदी अच्छे अंकों से पास हों क्योंकि पापा दीदी को डाक्टर बनाना चाहते थे.

दीदी भी पापा की इच्छाओं को समझती थीं. वह आज्ञाकारी बेटी बन उन की हर बात को मानती थीं. स्कूल में दीदी एक आदर्श विद्यार्थी मानी जाती थीं और परीक्षा में टौप करेगी ऐसी सभी आशा करते थे.

दीदी स्कूल से आ कर ट्यूशन के लिए जाती थीं. शाम को मां दीदी को अपने साथ लाती थीं. उस दिन शिवांक को बहुत तेज बुखार था. इसलिए मां ने उन दोनों बहनों को एकसाथ भेज दिया था ताकि वापसी में दोनों एकसाथ आ सकें.

जनवरी का महीना था. दोनों बहनें घर की ओर आ रही थीं कि वह अनहोनी हो गई जिस ने उस के घर को तिनकातिनका कर बिखेर दिया. उस अंधेरे ने जीवन में जो अंधकार भर दिया उस की पीड़ा वह आज भी महसूस करती है.

ट्यूशन पढ़ाने वाले अध्यापक के घर से निकल कर वे कुछ दूर ही पहुंची थीं कि एक कार तेजी से उन के पास आ कर रुकी और वे कुछ संभल पातीं कि कार खोल कर उतरे युवकों ने उन्हें कार में धकेल दिया. कार चल पड़ी तो उन दोनों युवकों ने अपनी हथेलियों से उन का मुंह जोर से बंद कर दिया ताकि वे चिल्ला न सकें.

तीनों युवकों ने उन्हें ले जा कर एक कमरे बंद कर दिया था. फिर कुछ देर बाद तीनों युवक दोबारा वहां आए. वह डरीसहमी कोने में दुबक  कर खड़ी देखती रही. उस के सामने ही उस की दीदी को नंगा कर दिया गया. एक ने दीदी के बाजू पकड़ लिए और दूसरे ने टांगें और फिर तीसरा…वह राक्षस, दीदी छटपटाती रहीं, चिल्लाती रहीं लेकिन उन के रोने को किसी ने नहीं सुना. वह दीदी को बचाने गई तो एक ने ऐसे जोर से धक्का दिया कि वह दीवार से जा टकराई और बेहोश हो गई.

जब होश आया तो सबकुछ समाप्त हो चुका था. वे तीनों दरिंदे कमरे से जा चुके थे. दीदी बेहोश पड़ी थीं. बाहर निकल कर उस ने देखा तो उस की समझ में नहीं आया कि कौन सी जगह है. सारी रात वह यह सोच कर रोती रही कि उस की मां और पापा कितने परेशान हो रहे होंगे.

सुबह होने पर वह कमरे से बाहर निकल कर आई और किसी तरह अपने घर पहुंच कर मां व पापा को सारी बात बताई. जब उन्हें यह सब पता चला तो उन के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. वे उसे ले कर वहां गए जहां दीदी को वह बेहोश छोड़ कर आई थी. दीदी अभी भी बेहोश पड़ी थीं. पापा दीदी को ले कर अस्पताल गए तो डाक्टरों ने इलाज से ही पहले ढेरों प्रश्न कर डाले. पापा ने जाने कैसेकैसे कह कर सिफारिश कर उस का इलाज शुरू करवाया था. लेकिन तब तक दीदी बहुतकुछ खो चुकी थीं. मानसिक रूप से विक्षिप्त दीदी थोड़ीथोड़ी देर बाद चीखने लगतीं, कपड़े फाड़ने लगतीं.

परीक्षाएं शुरू हुईं और समाप्त भी हो गईं. दीदी बेखबर थीं और फिर एक दिन इसी बेखबरी में दीदी चल बसीं. पापा ने ठान लिया था कि वह इस का बदला ले कर रहेंगे. उन्होंने अपने जीवन का जैसे उद्देश्य ही बना लिया था कि अपराधियों को उस के किए की सजा दिला कर रहेंगे. पुलिस में रिपोर्ट तो लिखाई ही थी. उस की पहचान पर पुलिस ने उन युवकों को पकड़ भी लिया. अदालत में मुकदमा चला, जज के सामने भी उस ने चिल्ला कर उस युवक के बारे में बताया था लेकिन उन लोगों ने ऐसेऐसे गवाह पेश कर दिए जिस से यह साबित हो गया कि वह तो घटना वाले दिन शहर में था ही नहीं. अमीर पिता का बिगड़ा बेटा था सो पैसे के बल पर छूट गया. बाकी दोनों युवकों को 3-3 माह की सजा हुई, बस.

पापा टूट तो पहले ही गए थे, फैसला आने के बाद तो जैसे बिखर ही गए. उन्होंने उस शहर से अपना ट्रांसफर करवा लिया लेकिन वहां भी वह संभल नहीं पाए. दीदी की मृत्यु वह सहन नहीं कर पाए और एक दिन उन्होंने हम सब को छोड़ कर आत्महत्या कर ली.

पापा ने एक मकान ले रखा था. मां उसी में आ कर रहने लगीं. उन्होंने एक कमरा अपने पास रखा और बाकी कमरे किराए पर चढ़ा दिए.

पापा और दीदी की मौत ने उसे कुछ ही समय में बड़ा कर दिया. वह शांत, चुप रहने लगी. पढ़ाई में उस ने मन लगाना शुरू कर दिया. चूंकि पापा दीदी को डाक्टर बनाना चाहते थे इसलिए उस ने ठान लिया था कि वह पापा की इच्छा को अवश्य पूरी करेगी. वह दीदी जैसी प्रतिभावान नहीं थी पर अपनी लगन और दृढ़ निश्चय के कारण वह सफलता की सीढि़यां चढ़ती गई और एक दिन उस ने डाक्टर बन कर दिखा ही दिया. आज वह एक सफल डाक्टर है और लोग उसे डा. आराधना के रूप में जानते हैं. इस इलाके में उस का नाम है.

मां विवाह के लिए पिछले 5 सालों से जिद कर रही हैं लेकिन वह ऐसा सोच भी नहीं सकती. वह मानसिक रूप से इस के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाती. शायद दूसरी वजह यही है कि बचपन में जो वीभत्स दृश्य उस ने देखा था उस कुंठा से वह निकल नहीं पाई है. हार कर मां ने शिवांक का विवाह कर दिया और उसी के पास वह रहती है.

आज जिस पुरुष को अभी देख कर वह आई है, वह कोई और नहीं बल्कि वही दरिंदा था जिस ने उस के सामने ही उस की दीदी की इज्जत से खेल कर उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया था और दीदी को न्याय नहीं दिला पाने की पीड़ा में पापा ने आत्महत्या कर ली थी.

उस के मन में उबाल उठ रहा था, जो न्याय दीदी को पापा नहीं दिला पाए थे वह दिलवाएगी. वह उस व्यक्ति से अवश्य प्रतिकार लेगी. तभी दीदी और पापा की आत्मा को शांति मिल सकेगी. वह उस का इलाज नहीं करेगी जो इस समय जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा है.

वह निश्चिंत हो कर वैसे ही कुरसी पर सिर टिकाए बैठी रही पर उस के मन को अभी भी कुछ कचोट रहा था. उसे लगा जैसे कुछ गलत हो रहा है.

जब वह कोई निर्णय नहीं ले पाई तो उस ने अपने घर आई मां को फोन किया. बड़ी देर तक फोन की घंटी बजती रही, किसी ने रिसीवर उठाया ही नहीं. फिर उस ने कपिल के घर फोन किया. फोन कपिल के पापा ने उठाया. उस ने छूटते ही पूछा, ‘‘अंकल, मां नहीं आईं क्या? घर पर फोन किया था. किसी ने रिसीवर उठाया ही नहीं.’’

‘‘चिंता न करो, बेटी, तुम्हारी मां मेरे घर में हैं. तुम थीं नहीं सो इधर ही उन्हें ले कर चला आया.’’

‘‘अंकल, मां से बात कराएंगे?’’

‘‘क्यों नहीं, अभी करवा देता हूं.’’

‘‘हैलो, मां कैसी हैं आप, सौरी, मैं आप को लेने नहीं आ सकी.’’

‘‘कोई बात नहीं, बेटी. मैं तुम्हारी मजबूरी को समझती हूं. तुम च्ंिता मत करो. चाय पी कर मैं घर चली जाऊंगी. तुम अपना काम कर के ही आना.’’

‘‘मां, आप अस्पताल में आ सकती हैं?’’

‘‘क्यों, क्या बात है, बेटी? तुम्हारी आवाज भर्राई हुई क्यों है?’’

‘‘कुछ नहीं, मां. बस, आप यहां आ जाओ,’’ उस ने छोटे बच्चों की तरह मचलते हुए कहा.

‘‘अच्छा, मैं अभी आ रही हूं,’’ कहते हुए उस ने फोन काट दिया.

मां जब अस्पताल पहुंचीं तब भी वह अपने कमरे में निश्चल बैठी थी. मां को देखते ही वह उन से लिपट कर रोने लगी. मां उसे भौचक देखती रहीं, सहलाती रहीं. थोड़ा मन शांत हुआ तो मां से अलग हो कर फिर से कुरसी पर आंखें मूंद कर बैठ गई. लग रहा था जैसे उस में खड़े होने की शक्ति ही नहीं रही.

मां ने च्ंितित स्वर में पूछा, ‘‘आराधना, क्या बात है. सबकुछ ठीक तो है न, बोल क्यों नहीं रही बेटी.’’

वह फिर से रोने लगी और रोतेरोते उस ने मां को उस व्यक्ति के बारे में सबकुछ बता दिया.

मां भी सकते में आ गईं. जरा संभलीं तो बोलीं, ‘‘मत करना उस का आपरेशन, मरने दे उसे. यही उस की सजा है. मेरा घर बरबाद कर के वह अभी तक जीवित है. हमें कानून से न्याय नहीं मिला, अब समय है, तू बदला ले सकती है. तभी साधना और तुम्हारे पिता की आत्मा को शांति मिलेगी. कुछ सोचने की जरूरत नहीं. चुपचाप घर चल, तू ने छुट्टी तो ले ही रखी है.’’

वह उसी तरह कुरसी पर सिर टिकाए बैठी रही. तभी नर्स ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘डाक्टर, आपरेशन की तैयारी पूरी हो गई है. आप भी जाइए.’’

नर्स तो कह कर चली गई पर वह मां की ओर देखने लगी. मां ने उस से फिर कहा, ‘‘देख ले, आराधना, अच्छा अवसर मिला है. मत जा, कोई और यह आपरेशन कर लेगा.’’

‘‘मां, यह आपरेशन मैं ही कर सकती हूं, इसीलिए तो घर से बुलवाया गया था.’’

‘‘सोच ले.’’

‘‘मैं अभी आती हूं,’’ कह कर वह अपने कमरे से बाहर आ गई. मरीज के साथ आई औरत वहीं खड़ी थी. उस का दिल चाहा कि वह उस से सबकुछ बता दे कि उस के पति ने क्याक्या किया था. पर इस में उस औरत का क्या दोष है.

वह बिना कुछ बोले आपरेशन थिएटर में चली गई. देखा तो वह व्यक्ति अचेतावस्था में आपरेशन टेबल पर लेटा हुआ था. उस की मनोस्थिति से बेखबर यदि और थोड़ी देर उस का आपरेशन नहीं किया गया तो वह बच नहीं पाएगा. वह इस वहशी का अंत देखना चाहती है. वह पापा और दीदी की मृत्यु का बदला लेना चाहती है. लेकिन उस के मन की दृढ़ता पिघलने क्यों लगी है? कभी उस औरत का दारुण रुदन सुनाई देने लगता तो कभी उस का गिड़गिड़ाता हुआ चेहरा सामने आ जाता तो कभी दीदी और पापा सामने आ जाते. कभी मां के शब्द कानों में गूंजने लगते. यह कैसा अंतर्द्वंद्व है. वह बदला ले या अपना कर्तव्य निभाए. मन दीदी का साथ दे रहा था तो अंतरात्मा उस का.

वह थोड़ी देर खड़ी रही. खाली- खाली आंखों से उस व्यक्ति को देखती रही. उस के चेहरे पर भाव आजा रहे थे.

नर्स हैरानी से उसे देख रही थी. बोली, ‘‘डाक्टर, सब ठीक है न?’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर वह ग्लव्स और ऐप्रेन पहनने लगी.

2 घंटे के अथक परिश्रम के बाद आपरेशन पूरा हो गया. वह निढाल सी हो कर बाहर आई. वह औरत उस की ओर बढ़ी पर उस से वह कुछ कह नहीं पाई. उस के कंधे पर हाथ रख वह अपने कमरे की ओर चली आई थी. मां अभी तक वहीं थीं. वह उन की गोद में सिर रख कर फफकफफक कर रो पड़ी. मां उस के सिर को सहलाते हुए खुद भी रो पड़ीं. उन दोनों की आंखों से अब आंसू के रूप में अतीत का दर्द बह रहा था. Best Hindi Kahani

Best Hindi Story : बंटी हुई औरत

Best Hindi Story : असुरक्षा की भावना से ग्रसित लाजवंती ने आकर्षक देह का सहारा ले कर औरत के अस्तित्व को विभिन्न रूपों में बांट दिया. जिंदगी के उतारचढ़ाव झेलती लाजो को शेखर व विजय ने दरकिनार क्यों कर दिया…

लाजवंती को अपनी पत्नी बना कर शेखर ने सभी रिश्तेदारों के साथसाथ अपने पिता की आशाओं पर भी पानी फेर दिया था, क्योंकि वह तो कब से इस बात की उम्मीद लगाए बैठे थे कि बेटा ज्यों ही प्रशासनिक सेवा में लगेगा उस का विवाह किसी कमिश्नर या सेक्रेटरी की बेटी से कर देंगे. इस से शेखर के साथसाथ सारे परिवार का उद्धार होगा.

दूरदर्शी शेखर के पिता यह भी जानते थे कि बड़े ओहदेदारों से पारिवारिक संबंध बनाना बेटे के भविष्य के लिए भी जरूरी है साथ ही स्थानीय प्रशासन पर भी अच्छा रौबदाब बना रहता है.

उधर भाईबहनों में यह धुन सवार थी कि कब भैया की शादी हो और कब घर को संभालने वाला कोई आए. उन्हें तो यह भी विश्वास था कि भाभी अवश्य ही अलादीन का चिराग ले कर आएंगी.

एक मध्यवर्गीय परिवार के टूटेफूटे स्वप्न…

शेखर जब भी अपनी मौसी या बूआ के घर जाता तो उस का स्वागत एक ही वाक्य से होता, ‘‘बेटे, मैं ने तुम्हारे लिए सर्वगुण संपन्न चांद सी दुलहन ढूंढ़ रखी है. बस, नौकरी ज्वाइन करने का इंतजार है.’’

जीवनसाथी के मामले में शेखर की सोच कुछ और थी. उस ने एक गरीब असहाय लड़की को अपना जीवन- साथी बनाने का निर्णय किया था. चूंकि

लाजवंती उस के सोच के पैमाने पर खरी उतरी थी इसीलिए उस ने उसे अपना जीवनसाथी बनाया. बचपन में ही लाजवंती के पिता का देहांत हो चुका था. घर में एक भाई था और 4 बहनें. अब तक 2 बहनों का विवाह हो चुका था. मां थीं जो ढाल बन कर बच्चों को ऊंचनीच से बचाने के प्रयास में लगी रहतीं. शेखर का विचार था कि दरिद्रता में पली हुई लाजवंती जिंदगी के उतारचढ़ाव से परिचित होगी. भलेबुरे की उसे पहचान होगी.

लाजवंती में ऐसा कुछ भी न था. वह उस गंजी कबूतरी की तरह थी जो महलों में डेरा डाल चुकी हो. शेखर की धारणा गलत साबित हुई. इतना ही नहीं लाजवंती अपने साथ अपना अतीत भी समेट कर लाई थी.

मां के कंधों का बोझ कम करने के लिए 14 वर्ष की आयु में ही लाजवंती को उस की सब से बड़ी बहन ने अपने पास बुला कर स्कूल में दाखिल करा दिया. हर सुबह लाजो सफेद चोली और नीला स्कर्ट पहने अपना बस्ता कंधे पर लटकाए स्कूल जाने लगी. घड़ी की टिकटिक चढ़ती जवानी का अलार्म बन गई.

उधर लाजो के रूप में निखार आने लगा. चाल में लचक पैदा होने लगी. आंखें भी चमकने लगीं और यौवन का प्रभाव उन्नत डरोजों पर स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा.

पिता के प्यार की चाहत लिए लाजो अकसर अपने जीजा के सामने बैठ कर अपना पाठ दोहराती या फिर उस की गोद में सिर रख कर एलिस के वंडरलैंड में खो जाती. जीजा लाजो के केशों में अपनी उंगलियां फेरता या फिर उस के मुलायम गालों को सहलाता तो नारी स्पर्श से उस की आंखों में नशा छा जाता.

लाजो भी नासमझी के कारण इस कोमल अनुभूति का आनंद लेने की टोह में लगी रहती. एक दिन पत्नी की गैर- मौजूदगी ने भावनाओं को विवेक पर हावी कर दिया. नदी अपने किनारे तोड़ कर अनियंत्रित हो गई. लाजो को जब होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी.

उस घटना के बाद लाजो अपने आप से घृणा करने लगी. वह हर समय खोईखोई रहती. परिणाम की कल्पना से ही भयभीत हो जाती. बहन से कहने में भी उसे डर लगता था इसलिए अंदर ही अंदर घुटती रहती, हालांकि  उस में उस का कोई दोष नहीं था. जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो असहाय मासूम बच्ची क्या कर सकती थी.

मन पर बोझ लिए लाजो को रात भर भयानक सपने आते. अंधेरे जंगलों में वह जान बचाने के लिए भागती, चीखतीचिल्लाती, मगर उस की सहायता के लिए कोई नहीं आता. सपने में देखा चेहरा जाना- पहचाना लगता पर आंख खुलती तो सपने में देखे चेहरे को पहचानने में असफल रहती. इस तरह एक मासूम बच्ची बड़ी अजीब मानसिक स्थिति में जी रही थी.

बहन इतनी पढ़ीलिखी समझदार नहीं थी कि उस के मानसिक द्वंद्व को समझ सकती.

इस के बावजूद लाजो को बारबार उसी दलदल में कूदने की तीव्र इच्छा होती. डर और चाह चोरसिपाही का खेल खेलते. कई महीने के बाद जब उस की बहन को अचानक ही इस संबंध की भनक पड़ी तो उस ने लाजो को वापस मायके भेज दिया.

उस मासूम बच्ची की आत्मा घायल हो चुकी थी. अब हर पुरुष उस को भूखा और खूंखार नजर आने लगा था. फिर भी मुंह से खून लगी शेरनी की तरह उस को मर्दों की बारबार चाह सताती रहती थी. कालिज के यारदोस्तों ने जब घर के दरवाजे खटखटाने शुरू किए तो वह अपनी मां के साथ गांव चली आई. कुनबे के प्रयास से लाजवंती को देखने के लिए शेखर आया और उस ने लाजो को पसंद कर लिया.

लाजवंती ने कभी सपने में भी न सोचा था कि उस को ऐसा जीवनसाथी मिल जाएगा और वह भी किसी मोल- तोल के बिना. वह फूली न समा रही थी.

पहली रात में एक औरत के अंदर सेक्स के प्रति जो झिझक, घबराहट होती है ऐसा कुछ लाजवंती में न पा कर शेखर को उस पर शक होने लगा. उस  पर लाजवंती के व्यवहार ने उस के शक को यकीन में बदल दिया. यद्यपि शेखर ने इस बात को टालने की बहुत कोशिश की मगर उस के दिमाग में अंगारे सुलगते रहे. वह किस को दोषी ठहराता. विवाह के लिए उस ने खुद ही सब की इच्छा के खिलाफ हां की थी. अत: परिस्थितियों से समझौता करना ही उस ने उचित समझा.

लाजवंती अपने अतीत को भूल जाना चाहती थी, मगर अपने द्वारा लूटे जाने की जो पीड़ा उस के मन में घर कर चुकी थी वह अकसर उसे झिंझोड़ती रहती. शेखर ने उस के अतीत को कुरेद कर जानने का कभी प्रयास नहीं किया, शायद यही वजह थी कि लाजवंती खुद ही अपने गुनाहों के बोझ तले दब रही थी. कई बार उस के दिमाग में आया कि जा कर शेखर के सामने अपनी भूल को स्वीकार कर ले. फिर जो भी दंड वह दे उसे हंसीखुशी सह लेगी पर हर बार मां की नसीहत आड़े आ जाती.

अपनी असुरक्षा की भावना को दूर करने के लिए लाजवंती ने अपनी आकर्षक देह का यह सोच कर सहारा लिया कि शेखर की सब से बड़ी कमजोरी औरत है.

अब वह हर रोज नएनए पहनावे व मेकअप में शेखर के सामने अपने आप को पेश करने लगी. वह शेखर को किसी भी हालत में खोना नहीं चाहती थी. वह अपनी बांहों की जकड़ शेखर के चारों तरफ इतनी मजबूत कर देना चाहती थी कि वह उस में से जीवन भर निकल न सके. इस के लिए लाजवंती ने शेखर के हर कदम पर पहरा लगा दिया. उस के सामाजिक जीवन की डोर भी अपने हाथों में ले ली. वह चाहती थी कि शेखर जहां भी जाए उसी के शरीर की गंध ढूंढ़ता फिरे.

यह पुरुष जाति से लाजवंती के प्रतिशोध का एक अनोखा ढंग था. अकसर ऐसा होता है कि करता कोई है और भरता कोई. लाजवंती शेखर के चारों तरफ अपना शिकंजा कसती रही और वह छटपटाता रहा.

आखिर तनी हुई रस्सी टूट गई. शेखर ने अपने एक नजदीकी दोस्त से परामर्श किया.

‘‘तुम तलाक क्यों नहीं ले लेते?’’ दोस्त ने कहा.

तलाक…शब्द सुनते ही शेखर के चेहरे का रंग उड़ गया. वह बोला, ‘‘शादी के इतने सालों बाद ढलती उम्र में तलाक?’’

‘‘अरे भई, जब तुम दोनों एक छत के नीचे रहते हुए भी एकदूसरे के नहीं हो और तुम्हारी निगाहें हमेशा औरत की तलाश में भटकती रहती हैं. बच्चों को भी तुम लोगों ने भुला दिया है. कभी तुम ने सोचा है कि इस हर रोज के लड़ाईझगड़े से बच्चों पर क्या असर पड़ता होगा.’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ शेखर बोला, ‘‘वह पढ़ीलिखी औरत है. मैं ने सोचा था कि स्थिति की गंभीरता को समझ कर या तो वह संभल जाएगी या फिर तलाक के लिए सहमत हो जाएगी पर वह है कि जोंक की तरह चिपटी हुई है.’’

‘‘तुम खुद ही तलाक के लिए आवेदन क्यों नहीं कर देते? वैसे भी हमारे देश में औरतें तलाक देने में पहल नहीं करतीं. एक पति को छोड़ कर दूसरे की गोद का आसरा लेने का चलन अभी मध्यवर्गीय परिवारों में आम नहीं है.’’

‘‘मैं ने इस बारे में बहुत सोचविचार किया है. मुसीबत यह है कि इस देश का कानून कुछ ऐसा है कि कोर्ट से तलाक मिलतेमिलते वर्षों बीत जाते हैं. फिर तलाक की शर्तें भी तो कठिन हैं. केवल मानसिक स्तर बेमेल होने भर से तलाक नहीं मिलता. तलाक लेने के लिए मुझे यह साबित करना पड़ेगा कि लाजवंती बदचलन औरत है.

‘‘इस के लिए झूठी गवाही और झूठे सुबूत के सहारे कोर्ट में उस की मिट्टी पलीद करनी पड़ेगी और तुम तो जानते हो कि यह सब मुझ से नहीं हो सकता’’.

‘‘शेखर, जब तुम तलाक नहीं दे सकते तो भाभी के साथ बैठ कर बात कर लो कि वह ही तुम्हें तलाक दे दें.’’

‘‘यही तो रोना है मेरी जिंदगी का. लाजवंती तलाक क्यों देगी? इतने बड़े अधिकारी की बीवी, यह सरकारी ठाटबाट, नौकरचाकर, मकान, गाड़ी, सुविधाओं के नाम पर क्या कुछ नहीं है उस के पास. जिन संबंधियों के सामने आज वह अभिमान से अपना सिर ऊंचा कर के अपनी योग्यता की डींगें मारती है उन्हीं के पास कल वह कौन सा मुंह ले कर जाएगी. ऐसे में वह भला तलाक क्यों देगी?’’

‘‘देखो शेखर, तुम्हारा मामला बहुत उलझा हुआ है, फिर भी मैं तुम्हें यही सलाह दूंगा कि कोर्ट में आवेदन देने में कोई हर्ज नहीं है.’’

‘‘बात तो सही है. अगर तलाक होने में 10 साल भी लग गए तो इस आजीवन कारावास से तो छुटकारा मिल ही सकता है,’’ शेखर अपने दिल की गहराइयों में डूब गया.

उन्हीं दिनों शेखर का तबादला पटना हो गया. वह लाजवंती को अकेला छोड़ कर बच्चों के साथ पटना चला गया. लाजवंती उसी शहर में इसलिए रुक गई क्योंकि एक कालिज में वह लेक्चरर थी.

घर में अब वह पहली सी रौनक न थी. शेखर के जाते ही तमाम सरकारी साधन, नौकरचाकर भी चले गए. सारा घर सूनासूना हो गया. रात के समय तो मकान की दीवारें काटने को दौड़तीं. इस अकेलेपन से वह धीरेधीरे उकता गई और फिर हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष विजयकुमार की शरण में चली गई.

विजयकुमार और लाजवंती के सोचने- समझने का ढंग एक जैसा ही था, रुचियां एक जैसी थीं. यहां तक कि दोनों के मुंह का स्वाद भी एक जैसा ही था. दोपहर में खाने के दौरान लाजवंती अपना डब्बा खोलती तो विजयकुमार भी स्वाद लेने आ जाता.

‘‘तुम बहुत अच्छा खाना बना लेती हो. कहां से सीखी है यह कला,’’ विजय ने पूछा तो लाजवंती उस की आंखों में कुछ टटोलते हुए बोली, ‘‘अपनी मां से सीखी है मैं ने पाक कला.’’

‘‘कभी डिनर पर बुलाओ तब बात बने,’’ विजयकुमार ने लाजवंती को छेड़ते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं, आने वाले रविवार को मेरे साथ ही डिनर कीजिए,’’ लाजवंती को मालूम था कि पुरुष का दिल पेट के रास्ते से ही जीता जा सकता है.

अगले रविवार को विजयकुमार लाजवंती के घर पहुंच गया.

इस तरह एक बार विजयकुमार को घर आने का मौका मिला तो फिर आने- जाने का सिलसिला ही चल पड़ा. अब विजयकुमार न केवल खाने में बल्कि लाजवंती के हर काम में रुचि लेने लगा. उसे तो अब लाजो में एक आदर्श पत्नी का रूप भी दिखाई देने लगा. उस की निकटता में विजय अपनी गर्लफ्रेंड अर्चना को भी भूल गया जिस के प्रेम में वह कई सालों से बंधा था. अब उस के जीवन का एकमात्र लक्ष्य लाजवंती को पाना था और कुछ भी नहीं.

उधर लाजवंती जैसा चल रहा था वैसा ही चलने देना चाहती थी. इस बंटवारे से उस के जीवन के विविध पहलू निखर रहे थे. भौतिक सुख, ऐशोआराम और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए शेखर का सहारा काफी था और मानसिक संतुष्टि के लिए था विजयकुमार. लाजवंती चाहती थी कि बचीखुची जिंदगी इसी तरह व्यतीत हो, मगर विजय इस बंधन को कानूनी रंग देने पर तुला हुआ था.

विजयकुमार की अपेक्षाओं से घबरा कर लाजवंती ने अपनी छोटी बहन अमृता को आगे कर दिया. उस ने अमृता को अपने पास बुलाया, विजयकुमार से परिचय करवाया और फिर स्वयं पीछे हो गई.

लाजो का यह तीर भी निशाने पर लगा. शारीरिक भूख और आपसी निकटता ने दो शरीरों को एक कर दिया. लाजवंती तो इसी मौके की तलाश में थी. उस ने फौरन दोनों की शादी का नगाड़ा बजवा दिया. विवाह के शोर में लाजवंती के चेहरे पर विजय की मुसकान झलक रही थी.

विजयकुमार ने सोचा कि अमृता के साथ रिश्ता जोड़ने पर लाजवंती भी उस के समीप रहेगी मगर वह औरत की फितरत से अपरिचित था. लाजवंती बहन का हाथ पीला करते ही उस के साए से भी दूर हो गई.

विजयकुमार की आंखों से जब लाजवंती के सौंदर्य का परदा हटा तो उसे पता चला कि वह तो लाजो के हाथों ठगा गया है. अत:  उस ने सोचा एक गंवार को जीवन भर ढोने से तो अच्छा है कि उस से तलाक ले कर छुटकारा पाया जाए.

मन में यह फैसला लेने के बाद विजयकुमार अपनी पूर्व प्रेमिका अर्चना के पास पहुंचा. प्रेम का हवाला दिया. अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी. यही नहीं सारा दोष लाजवंती के कंधों पर लाद कर उस ने अर्चना के मन में यह बात बिठा दी कि वह निर्दोष है. अर्चना अपने प्रेमी की आंखों में आंसू देख कर पसीज गई और उस ने विजयकुमार को माफ कर दिया.

एक दिन अदालत परिसर में शेखर की विजयकुमार से भेंट हुई.

‘‘हैलो विजय, आप यहां… अदालत में?’’ शेखर ने विजयकुमार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए कहा.

‘‘आज तारीख पड़ी है,’’ विजय कुमार ने उत्तर दिया.

‘‘कैसी तारीख?’’ शेखर ने फिर पूछा.

‘‘मैं ने अमृता को तलाक देने के लिए कोर्ट में आवेदन किया है,’’ विजयकुमार ने अपनी बात बता कर पूछा बैठा, ‘‘पर शेखर बाबू, आप यहां अदालत में क्या करने आए हैं?’’

‘‘विजय बाबू, आज मेरे भी मुकदमे की तारीख है, मैं भी तो लाजवंती से अलग रह रहा हूं. मैं ने तलाक लेने का मुकदमा दायर कर रखा है,’’ शेखर ने गंभीरता से उत्तर दिया.

फिर 10 साल यों ही बीत गए तारीखें लगती रहीं. काला कोट पहने वकील आते रहे और जाते रहे. फाइलों पर धूल जमती रही और फिर झड़ती रही.

बारबार एक ही नाम दुहराया जाता शेखर सूरी सुपुत्र रामलाल सूरी हाजिर हो… लाजवंती पत्नी शेखर सूरी हाजिर हो… Best Hindi Story

Holi Story in Hindi : जीजाजी से होली – कैसी खेली सोनू-मोनू ने होली?

Holi Story in Hindi : होली पर सोनू व मोनू के जीजाजी पहली बार अपनी ससुराल आ रहे थे. सोनूमोनू थे तो करीब 13 और 14 साल के ही, पर शैतानियों में बड़ेबड़ोें के कान काटते थे. दोनों ने निश्चय किया कि जीजाजी से ऐसी होली खेलनी है कि वे इसे जिंदगी भर न भूल पाएं. इस बारे में दोनों भाई रोज तरहतरह की योजनाएं बनाते रहते.

आखिर होली के 4 दिन पहले  ही जीजाजी आ गए. जीजाजी ने आते ही सब को बता दिया कि उन्हें रंगों से सख्त नफरत है. वे केवल धुलेंडी के दिन ही होली खेलेंगे और वह भी केवल सूखे रंगों से.

सनूमोनू के पिताजी ने अपने लाड़लों की शैतानियों को ध्यान में रखते हुए दोनों को चेतावनी दी, ‘‘देखो बच्चो, तुम्हारे जीजाजी को गीला रंग पसंद नहीं है इसलिए उन पर रंग मत डालना.’’

‘‘नहीं डालेंगे, पर अगर रंग इन के ऊपर अपनेआप लग गया तो?’’ दोनों ने एकसाथ पूछा.

‘‘अरे वाह, रंग अपनेआप मुझ पर कैसे गिरेगा? क्या रंग कोई जादू है?’’ जीजाजी बोले.

‘‘तो ऐसा है कि…’’ सोनू कुछ बोल ही रहा था कि उस के पिताजी ने बीच में ही टोका, ‘‘बस, तुम लोग रंग मत डालना. रंग अपनेआप लग जाए तो लगने देना. तब तुम लोगों का कोई कुसूर नहीं होगा. बस, तुम अपने वादे पर अटल रहना.’’

‘‘हम वादा करते हैं कि जीजाजी पर रंग नहीं डालेंगे,’’ दोनों बोले.

जीजीजी प्रसन्न हो उठे. दूसरे दिन सोनूमोनू ने जीजाजी के साथ जरा भी शरारत नहीं की. दोनों ध्यान से दिनभर जीजाजी की दिनचर्या देखते रहे तथा गुपचुप अपना कार्यक्रम उसी हिसाब से तय करते रहे. दोनों ने दिनभर कोई शैतानी नहीं की खूब घुलमिल कर जीजाजी से बातें करते रहे. इस से जीजाजी की नजर में वे अच्छे बच्चे बन गए. जीजाजी अपनी दिनचर्या के अनुसार सुबह उठ कर अधमुंदी आंखों से पलंग के पास रखी कुरसी पर बैठ जाते और चाय पीते. उस के बाद घर के पीछे वाले छोटे बगीचे में थोड़ी देर टहलते, फिर नहाते. तीसरे दिन जीजाजी पलंग से उठ कर ज्यों ही कुरसी पर बैठे तो चौंक कर इस तरह उछले जैसे सांप पर बैठ गए हों. वहां कुरसी पर रंगीन पानी से भरे रबड़ के कई गुब्बारे रखे हुए थे. जीजाजी के बैठने से कई गुब्बारे फूट गए और जीजाजी नीचे से एकदम रंगीन हो गए.

‘‘इस कुरसी पर गुब्बारे किस ने रख दिए?’’ पूछते हुए जीजाजी स्नानघर की तरफ भागे.

यह देख मोनू चीखा, ‘‘जीजाजी, आप ने हमारे गुब्बारे क्यों फोड़ दिए?’’

उधर सोनू ने स्नानघर वाले नल को पीछे से बंद कर दिया था और एक जग चाशनी का भर कर वहां रख दिया था. जीजाजी ने उस चाशनी को ही पानी समझ कर उस से अपने शरीर के निचले हिस्से पर लगा रंग धोया और अकड़ते हुए निकले तथा बगीचे में टहलने चले गए.

चाशनी के कारण जीजाजी का पाजामा शरीर से चिपक गया और थोड़ा सा रस पाजामे से बाहर भी आ गया. इस रस में सोनू थोड़ा गुलाब जल भी डालना न भूला था. अत: थोड़ी देर में कई मधुमक्खियां आ कर जीजाजी के पीछे भिनभिनाने लगीं. खुशबूदार मीठे रस की गंध पा कर गली की एक कुतिया भी जीजाजी के पीछे लग गई. अब आगेआगे जीजाजी तथा पीछेपीछे मधुमक्खियां और कुतिया चक्कर लगाने लगीं. जीजाजी की हालत देखते ही बनती थी. तब तक 10-12 और मधुमक्खियां कहीं से आ गईं और वे भी जीजाजी के पीछे लग गईं. सोनू तो मौके की ताक में था ही. वह जीजाजी से बोला, ‘‘जीजाजी, आप फौरन घर के अंदर भाग जाइए और दरवाजा बंद कर लीजिए.’’

जीजाजी घर के अंदर जाने वाले दरवाजे की तरफ लपके पर वह तो बंद था. सोनू बोला, ‘‘यह दरवाजा बड़ी कठिनाई से खुलता है. मैं तो इसे खोल ही नहीं पाता. आप जरा जोर लगा कर खोल लें.’’ अपनी योजना के मुताबिक मोनू दरवाजे को अंदर से बंद कर के सिटकिनी लगाए खड़ा था तथा दोनों ने पहले से ही दरवाजे के हैंडिल के कुछ पेच खोल रखे थे. जीजाजी ने आव देखा न ताव, झट दरवाजे के हैंडिल को पकड़ कर अपनी तरफ पूरी ताकत से खींचा, क्योंकि वे मधुमक्खियोें तथा कुतिया के पीछा करने से बुरी तरह तंग हो चुके थे.

पूरी ताकत लगाने से हैंडिल उखड़ कर जीजाजी के हाथ में आ गया और जीजाजी धड़ाम से नीचे जा गिरे. सोनू ने अंदाजा लगा लिया था कि जीजाजी कहां गिरेंगे इसलिए उस ने पहले से ही एक गहरे रंग से भरा टब खिसका कर निशाने पर रख दिया था. अत: जीजाजी धड़ाम से उसी टब में गिरे. अब उन की हालत देखने लायक हो गई थी. जीजाजी गिरते ही चिल्लाए, ‘‘यह टब यहां किस नालायक ने रख दिया था?’’

मोनू झट से दरवाजा खोल कर बाहर आया और जीजाजी की हालत पर हंसते हुए बोला, ‘‘जीजाजी, यह टब मैं ने अपने दोस्तों के लिए भरा था. आप ने तो इस का सत्यानाश ही कर दिया है. हम ने अपने वादे के मुताबिक आप पर रंग नहीं डाला आप तो खुद ही रंग में जा कर गिरे हैं.’’ हंगामा सुन कर मोनू के मातापिता, बहन सभी दौड़े आए. जीजाजी की हालत देख कर सारे खिलखिला कर हंसने लगे. जरा देर बाद सोनू के पिताजी ने गंभीर होते हुए दोनों को डांटा, ‘‘नालायको, अभी होली में 2 दिन बाकी हैेें, तुम लोग ये सारी शरारतें बंद करो और चुपचाप अपने कमरे में जा कर पढ़ो. खबरदार, अगर दिनभर बाहर निकले. यदि जीजाजी के कमरे की तरफ झांका भी तो…’’ सोनूमोनू मुंह लटकाए अपने कमरे में चले गए और जीजाजी नहानेधोने चले गए.

अगले दिन तक सोनूमोनू एकदम शांत रह कर आदर्श बच्चों की तरह अपने कमरे से बाहर नहीं निकले तथा वहीं पढ़ते रहे. दोपहर बाद जीजाजी ने सोचा, ‘अकेले बोर हो रहा हूं, थोड़ी देर सोनूमोनू के कमरे में ही जा कर गपशप कर लूं.’ सोनूमोनू के पढ़ाई के कमरे में एक मेज तथा 2 कुरसियां थीं, जिन पर बैठे दोनों भाई पढ़ रहे थे. वहां केवल एक खाट और थी. जीजाजी गुनगुनाते हुए उन के कमरे में गए.

‘‘सोनूमोनू, अब तो खूब जम कर पढ़ाई कर रहे हो,’’ कहते हुए वे मस्ती से उस खाट पर बैठे तो धड़ाम से फिर रंग से भरे टब में जा गिरे. सोनूमोनू ने यहां भी शैतानी की योजना बना ली थी. खाट को बीच में से काट कर चादर बिछा रखी थी तथा नीचे निशाने पर वही रंग से भरा टब रख दिया था. ‘‘अरे नालायको, तुम बाज नहीं आओगे अपनी शरारतों से,’’ कहते हुए जीजाजी स्नानघर की तरफ भागे और दरवाजे पर फिसल कर बुरी तरह गिरे सोनू ने एक गिलास में केले का गूदा तैयार कर रखा था. ज्यों ही जीजाजी टब में गिरे, वह फौरन स्नानघर के बाहर फर्श पर थोड़ी दूरी पर उसे फैला आया तथा स्नानघर से करीब 6 फुट की दूरी पर एक स्टूल रख दिया जिस पर एक थाल गुलाल से भरा था.

स्नानघर की तरफ भागते हुए जीजाजी को होश कहां था? ज्यों ही वे फिसले तो गिरतेगिरते उन का हाथ अपने बचाव के लिए स्टूल के पाए की तरफ गया, जिसे बदहवासी में उन्होंने पकड़ लिया. इस से स्टूल पर रखी गुलाल से भरी थाली उन के मुंह पर आ गिरी. जजाजी लाल मुंह वाले बंदर बन गए. वे फिर गुस्से से चिल्लाए. सोनू के पिताजी फिर दौडे़दौड़े आए. जीजाजी की हालत देख कर उन की भी हंसी नहीं रुक रही थी.

सोनूमोनू ने सफाई दी, ‘‘हम ने जीजाजी पर रंग नहीं डाला है. आप खुद इन से पूछ लो.’’

आखिर सोनू के पिताजी ने उन्हें उठाया और स्नानघर में पहुंचाया. सोनूमोनू ने स्नानघर में साबुन की टिकिया को हटा कर उस की जगह बूट पौलिश में काला रंग मिला कर एक टिकिया बना कर पहले ही वहां रख दी थी. जीजाजी उसे खूब रगड़रगड़ कर जब काले हब्शी बने बाहर आए तो उन्हें देख कर सभी का हंसी के मारे बुरा हाल हो गया. जीजाजी कुछ देर तक तो कुछ भी नहीं समझ सके, फिर हकीकत जान कर चिल्लाए, ‘‘ठहरो नालायको, तुम दोनों ने तो मेरी ऐसी हालत बनाई है कि मैं इस होली को जिंदगीभर याद रखूंगा.’’

‘‘हम यही तो चाहते थे,’’ दोनों एकसाथ बोले, ‘‘पर जीजाजी, हम ने अपने वादे के मुताबिक अभी तक आप पर रंग नहीं डाला है. क्या आप हमारे साथ होली खेलेंगे?’’ ‘‘अब भी कोई कसर बाकी है क्या? ठहरो, मैं खेलाता हूं तुम दोनों को असली होली,’’ कहते हुए जीजाजी डंडा ले कर उन दोनों के पीछे दौड़े.

आखिर होली का दिन भी आ गया. उस दिन सोनूमोनू के कुछ मित्र भी होली खेलने आए. जीजाजी घर के पीछे बने बगीचे में टहल रहे थे. उन्हें देखते ही सोनूमोनू और उन की मित्रमंडली उन के पीछे फिल्मी गाना गाते हुए भागी, ‘‘आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली…’’ जीजाजी उन्हें देख कर सिर पर पांव रख कर भागे और उन्होंने कमरे के दरवाजे को जोर से धक्का दिया. दरवाजा एक झटके से खुल गया और उस के ऊपर एक कुंदे से लटकी हुई रंग की बालटी का सारा रंग उन के सफेद कपड़ों पर आ गिरा. जीजाजी ने खीज कर उन की ओर देखा. तभी सोनू बोला, ‘‘जीजाजी, देखिए अभी तक हम ने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी है. तब भी आप हमारे रंगों से बच नहीं पाए हैं. फिर क्यों न जम कर रंगों से होली खेल ली जाए.’’

जीजाजी भी अब होली के रंगों में पूरी तरह रंग चुके थे और यह जान चुके थे कि इन शैतानों से जितना दूर भागा जाएगा, उतनी मुसीबत और आएगी. अत: हथियार डाल दिए और फिर जम कर होली खेली. Holi Story in Hindi

Hindi Social Story : होली के रंग प्रवासियों के संग – विदेश जाकर क्या तारा खुश थी?

Hindi Social Story :

“अरे, उठो उठो, तुम अब तक सो ही रहे हो,” तारा ने कमरे के सभी पर्दों को खोलते हुए कहा.

ध्रुव ने अपनी नींदभरी आंखों को मलते हुए कहा, “क्या यार, सोने दो न.”

“क्यों, आज औफिस नहीं जाना है क्या?”

“हां, आज नहीं जाना. आज मैं ने छुट्टी ली हुई है, यार, स्पैशली सोने के लिए,” कहते हुए ध्रुव ने दूसरी ओर करवट ले ली.

“अरे, मुझे कुछ नहीं सुनना. तुम फटाफट उठ कर रेडी हो जाओ, आज होली है, भई.”

“हां तो, उस के लिए कौन रेडी होता है. होली तो खेलने के बाद रेडी होने वाला त्योहार है न.”

“कैसी बातें करते हो, ध्रुव, अपने परिवार में नहाधो कर ठाकुर जी को भोग और रंग लगाने के बाद ही होली शुरू होती है.”

“अरे, यह मत भूलो, अपन अपने देश में नहीं, विदेश में रह रहे हैं जानेमन.”

“हां, हां, पता है मुझे. सब याद है मुझे,” मन में एक हलकी सी निराशा लिए तारा ने ध्रुव से कहा.

ध्रुव तारा की ज़बान पर आई ख़ामोशी को ताड़ गया और झट उठ कर तैयार होने को बाथरूम में चला गया.

इधर तारा एक गीत गुनगुनाते हुए गुलदस्ते में फूल लगा रही है कि ‘रंगरंग के फूल खिले, मुझे भाय कोई रंग न, अब आन मिलो सजना, आन मिलो…’

तभी ध्रुव ने आ कर पीछे से तारा को अपनी बांहों में भरते हुए कहा, “तुम ने पुकारा और हम चले आए…”

“अरे वाह, तुम तो बड़ी जल्दी तैयार हो गए.”

“हां, तुम ने जो कहा था.”

“अच्छा जी.”

“जी.”

“तो चलो फिर, अब क्रिया कर लेते हैं.”

“हां, चलो.”

वहीं, ध्रुव ने देखा कि तारा ने तो बहुत से पकवान बनाए हुए हैं भोग के लिए.

“अरे बाप रे, इतना कुछ. यह सब तुम ने बनाया?”

“हां तो, और कौन है यहां जो बनाएगा.”

“हां…नहीं, मेरे कहने का मतलब था कि इतना सारा कौन खाएगा, तारा?”

“क्या हांनहीं, हांनहीं कर रहे हो, मैं खाऊंगी और तुम खाओगे.”

“इतना?”

“यह इतनाउतना मत करो, यार. तुम बस क्रिया में ध्यान लगाओ.”

“हां, गुलाल तो लाओ.”

“ओह हां, यह लो.”

“यह गुलाल है, इतना फीका?”

“वही तो, देखो न कितना फीका रंग है इस का, लग ही नहीं रहा है कि यह गुलाल है. अपने वहां कितना सुंदर चटक रंग का गुलाल मिलता है. नहीं?”

“हां, और एक यह है.”

“हां, वही तो, अब क्या करें यह ‘सो-कौल्ड और्गेनिक’ जो ठहरा.”

“हां, सो तो है. पर यह तुम्हें मिला कहां से?”

“औनलाइन मंगवाना पड़ा और क्या,” कहते हुए क्रिया कर दोनों ने एकदूजे को गुलाल लगते हुए कहा- “हैप्पी होली.”

“बताओ, क्या खाओगे?”

“जो तुम खिलाओ.”

“ओके, तो मैं तुम्हारे लिए दहीबड़े ले कर आती हूं, साथ बैठ कर खाएंगे, ठीक है न?”

हां चलेगा,” कहते हुए ध्रुव ने टीवी का रिमोट उठा लिया और देखने लगा, सभी हिंदी धारावाहिक या अन्य सभी हिंदी चैनलों पर होली के प्रोग्राम चल रहे थे.

इतने में तारा 2 प्लेटों में दहीबड़े, गुजिया, गुलाबजामुन, नमकपारे आदि सजा कर ले आई.

दोनों साथ बैठ कर टीवी देखते हुए खाने लगे. थोड़ी ही देर में ध्रुव ने गुजिया उठा ली खाने के लिए और मुंह में रखते ही इतना बुरा मुंह बनाया जैसे पता नहीं क्या खा लिया हो उस ने.

“यह क्या है, कितना अजीब सा स्वाद है इस का, मेरे मुंह का सारा स्वाद खराब कर दिया इस ने?”

“अरे, तुम वह छोड़ो, तुम यह खाओ न मठरी. यह बहुत स्वादिष्ठ बनी है.”

“हां,” कहते हुए ध्रुव ने मुट्ठीभर कर मठरियां उठा लीं औरर कहा, “वाओ. यह हुई न बात. यह बहुत बढ़िया बनी है. मगर गुजिया के नाम पर वह क्या था?”

“था क्या, गुजिया ही थी और क्या था.”

“ऐसी? तुम तो बहुत अच्छी गुजिया बनाती हो, यार. मैं मान ही नहीं सकता कि ये तुम ने बनाई हैं.”

“अब सच तो यही है, यार. तुम मानो या ना मानो. यहां मावा ही नहीं मिलता तो मिठाई अच्छी बने कैसे, मिल्क पाउडर से बने मावे की गुजिया तो ऐसी ही बनती है. इस में मेरी गलती नहीं है.”

“पर गुलाबजामुन तो ठीकठाक ही बने हैं.”

“उस के लिए गिट्स को धन्यवाद दो.”

“हां, अंधों में काना राजा तो वही है यहां, जो कुछ नहीं से, कुछ तो देता है.”

इस बीच, “ओ नहीं ओए, हल्दीराम नू ना भूल, वो भी तो मिठाई बनाता है. हम गरीबों का तो वही सहारा है,” बोलते हुए पा जी आ गए.

“अरे पाजी, आप. आओआओ जी, बड़े दिनों बाद आना हुआ.?”

“हैप्पी होली, ओए हैप्पी होली.”

“बैठिए न.”

“और सुनाओ जी, की हाल है तुअडा?”

“बस जी, सब बढ़िया.”

अभी बात चल ही रही थी कि टीवी पर होली के गाने बजने लगे. अचानक से तारा का खिला हुआ चेहरा किसी मुरझाए फूल की तरह मुरझा सा गया और वह अंदर चली गई.

“ओए ध्रुव, क्या हुआ कुड़ी नू?”

“कुछ नहीं पाजी, वह होली का प्रोग्राम देख कर थोड़ी अपसैट हो गई होगी. अभी थोड़ी देर में ठीक हो जाएगी. तुस्सी चिंता न करो. लो, ये मठरियां खाओ, तारा ने खुद अपने हाथों से बनाई हैं.”

“अच्छा जी, फिर तो मैं जरुरत खावान्गा. ओए, ये तो बड़ी ही चंगी बनी हैं, वाह जी वाह, बड़ी स्वाद है, सच्ची.”

इतने में तारा चाय लाती हुई बोली, “इस के साथ यह चाय भी लो, पाजी. आप को और भी ज्यादा चंगा लगेगा.”

“ओ हां जी, हां जी. क्यों नहीं, क्यों नहीं. ला, इतथे रख दे. अब एक गल दस मैंनू?”

“की होय पाजी?”

“ओए, तू चुप कर. मैं कुड़ी दे नाल गल्ल कर रिया सी.”

तारा जरा सकपका सी गई, “क्या हुआ पाजी?”

“ओए, तू मैंनू यह दस कि होया है तैंन्नू? तू होली दा प्रोग्राम देख के उदास क्यों हो गई? अरे बोल न, चुप क्यों है? तू मैंनू पाजी बुलाती है न, और पंजाबी में पाजी मतलब वडा भाई होंदा है. बोल हिरिये कि गल है दस मैंनू? इस खोत्ते दे पुत्र ध्रुव ने कुछ बोल्या है तैंन्नू? तू दस मैं अभी ठीक करता हूं इसनु.”

“नहींनहीं, पाजी. ऐसी कोई बात नहीं है. वो तो बस होली मेरा सब से पसंदीदा त्योहार है न, तो बस देस की बहुत याद आ रही है मुझे. और कुछ नहीं. वह क्या है न, यहां तो कोई माहौल होता ही नहीं है होली का, हां थोड़ाबहुत दीवाली पर तो फिर भी कुछकुछ देखने को मिल जाता है. होली पर तो छुट्टी भी नहीं होती, न बाज़ारों में ही रंग, गुलाल या पिचकारियां दिखाई देती हैं. तो पता ही नहीं चलता कि कौन सा त्योहार कब आया और कब चला गया.”

“बस, इत्ती सी बात? और मैं समझा पाता नी क्या हो गया कुड़ी नू. ऐसी बात है, चल मेरे नाल, आज तुझे विदेश में भी तेरा भाई देश की सैर करवाएगा. चल, ओए, तू भी चल.”

सभी एक कार में बैठ कर पहुंचे एक ऐसे मैदान में जहां होली के पूरे जश्न का माहौल था. एक तरफ ठंडाई तो दूजी तरफ खानेपीने की अलगअलग चीजों के स्टौल लगे हुए थे, जैसे चाट पनीपूरी, इडलीडोसा, छोलेभटूरे और विदेशियों के लिए पिज्जाबर्गर आदि. “कमाल हो गया, पाजी. यह क्या जगह है दोस्तों,” तारा ने खुशी के मारे आंखें चौड़ी करते हुए पाजी से कहा.

“ओए, यह समिति मैं ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर बनाई है प्रवासियों दे नाल. इस समिति मेन कुल 10-12 सदस्य हैं और सभी की ज़िम्मेदारी है कि अपनेअपने क्षेत्र में माने महल्ले में, शहर में जहां भी जिस को कोई ऐसा प्रवासी भारतीय मिलता है जो रहता तो परदेस में हैं पर हर त्योहार पर मिस देस को किया करता है. क्यूंकि कोई माने या ना माने, कुड़िए हर भारतीय रहे चाहे कहीं भी लेकिन अपने दिल विच भारत लिए घूमता है तेरी तरह. जैसे तू अभी कुछ देर पहले मिस कर रही थी अपने देस नू, है कि नहीं,” हंसते हुए पाजी ने दोनों से कहा, “जाओ, ओए जाओ, एंजौय करो और बुरा न मानो होली है.”

ध्रुव और तारा यह जगह देख कर हैरान थे. ध्रुव को लगा विदेश है, तो एंट्री फीस भी लगेगी. यह सोच कर उस ने जेब में हाथ डाला, तो पाजी ने कहा, “फ्री है, ओए फ्री. यहां कोई एंट्री फीस नहीं लगनी. जाओ एंजौ करो.”

तारा फिर भी चुप है.

“क्या हुआ तारा, अब क्यों उदास हो, अब तो खुश हो जाओ?”

“ध्रुव, ऐसे कैसे, यहां हम किसी को जानते तक नहीं और तुम ने आते ही शोर मचाना शुरू कर दिया.”

“अरे, तुम ही तो कहती हो, ‘त्योहार होते ही हैं नाचने, गाने और शोर मचाने के लिए. तो फिर, तुम भी झूमो, नाचो, गाओ.” डीजे की तेज़ आवाज़ पर और लोगों की भीड़ के संग ध्रुव थिरकने लगा है. संगीत की आवाज़ इतनी तेज है कि कौन किस से, क्या कह रहा है, यह किसी को सुनाई नहीं दे रहा. बिन पिए ही सब बहक रहे हैं.

“ध्रुव, ध्रुव, सुनो न,” तारा ने ध्रुव को कई बार नाम से बुलाया पर वह सुन नहीं पा रहा है.

तारा भीड़ से अलग हट कर खड़ी हो गई. और ध्रुव को देखने लगी. कई महिलाओं ने आ कर ध्रुव को रंग लगाया, तारा को जलन हो रही है. वह ध्रुव को घूर भी रही है. ध्रुव उसे अपने पास बुला रहा है.

“आओ न तारा, देखो तो सही, कितना मजा आ रहा है.”

‘हां, वह तो दिख ही रहा है कि तुम को कितना मजा आ रहा है. घर चलो, फिर दिलवाती हूं तुम को असल मजे,’ मन ही मन तारा ने खुद से कहा.

“नहीं, मुझे नहीं आना. न किसी से ‘जान न पहचान,मैं तेरा मेहमान.’ तुम चलो यहां से.”

“पागल हो गई हो क्या, पाजी क्या सोचेंगे? मैं कहीं नहीं जाने वाला.” इतने में तारा कुछ कहे, उस के पहले ही बहुत से लोगों ने आ कर तारा को रंग लगा दिया, “हैप्पी होली, होली है.” तारा को थोड़ा गुस्सा आया कि यह क्या तरीका है.

“अरे, यहां तो हिंदुस्तान इकठ्ठा हुआ है, भई. यहां कोई किसी को नहीं जानता और जानपहचान हो, इसलिए तो यह कार्यक्रम रखा गया है,”

उसी भीड़ में से एक महिला ने तारा से कहा और उस से उस का पूरा परिचय ले लिया कि कौन हो, कहां से आई हो, क्या करती हो, वगैरहवगैरह और अपना भी नामपता सब तारा को दे दिया.

चारों तरफ जश्न का माहौल है. हिंदी फिल्मों के पुराने से ले कर नए गाने सभी बज रहे हैं. अभी तो पार्टी शुरू हुई है, मानो दुनिया थिरक रही है.

गुलाल से ले कर रंगबिरंगी टोपियां, रंगीन पिचकारियां सभी कुछ तो मिल रहा था वहां. उस दिन वहां के सजे हुए बाज़ार को देख कर एक पल के लिए भी तारा को ऐसा नहीं लगा कि वह देश में नहीं, विदेश में रह रही है. वैसे तो, प्रोग्राम केवल प्रवासी भारतीयों के लिए ही था लेकिन गोरों के आने की मनाही नहीं थी. सो, पीने वालों को पीने का बहाना मिल गया था.

इसी तरह थोड़ी ही देर में तारा की दोस्ती भी वहां नाचगा रहे, त्योहार माना रहे लोगों से होनी शुरू हो गई. और होली का रंग जमना भी शुरू हो गया. अब तारा का चेहरा पहले सा खिल गया. उस ने खूब धूमधाम से होली मनाई, खूब रंग खेला, लगाया, लगवाया और खूब फोटो खींचे व खूब सोशल मीडिया पर डाले. अब इस काम के बिना तो होली पूरी हो ही नहीं सकती थी न.

और आखिरकार, अंत में विदेश पर भी देश का रंग चढ़ ही गया. और इस तरह ध्रुव व तारा का विदेश में होली खेलने का सपना, प्रवासियों के साथ ही सही, पूरा हो ही गया.

Hindi Social Story

Holy Family Story : होली के रंग – उस दिन सुजाता ने क्या किया?

Holy Family Story : वह होली का दिन था जब सुबहसवेरे नितिन ने सुजाता से कहा था, ‘मां, मैं अन्नू के घर जा रहा हूं.’ ‘आज और अभी? क्या तुम्हारा अभी जाना ठीक रहेगा?’ सुजाता ने नितिन से पूछा.

‘हां, मां, अभी होली का हुड़दंग शुरू नहीं हुआ है, अभी रास्ते में परेशानी नहीं होगी,’ नितिन ने एक पुरानी कमीज पहनते हुए कहा.

‘लेकिन, आज त्योहार है, बेटा,’ सुजाता यह सोच कर घबरा उठी थी कि अगर नितिन चला गया तो उस के सिवा इस घर में कौन बचेगा? सूना घर उसे काटने को दौड़ेगा. कैसे झेल सकेगी वह इस सूनेपन को? घर के बाहर की दुनिया होली के उत्साह भरे कोलाहल में डूबी रहेगी मगर घर के भीतर श्मशान का सन्नाटा छाया रहेगा. नहीं…नहीं, उस से यह सब सहन नहीं होगा. सुजाता ने घबरा कर नितिन को एक बार फिर रोकने का प्रयास किया.

‘बेटा, अन्नू तो अपने मायके में होली मनाना चाहती थी इसलिए मैं ने उसे नहीं रोका लेकिन अब तू भी उस के पास चला जाएग तो तेरी यह बूढ़ी मां यहां अकेली रह जाएगी. अगर तू रुक सके तो…’

‘नहीं मां, अन्नू का फोन आया था वह चाहती है कि मैं उस के साथ उस के मायके में होली मनाऊं…और मां, अन्नू की छोटी बहन वीनू भी जिद कर रही थी कि जीजाजी, आप चले आइए. अब, अगर मैं नहीं जाऊंगा तो वे लोग नाराज हो जाएंगे,’ नितिन ने अपने जूते का तस्मा बांधते हुए उत्तर दिया.

‘ठीक है बेटा, जैसे तेरी इच्छा,’ सुजाता ने धीरे से स्वीकृति में अपना सिर हिलाते हुए कहा.

‘बात इच्छा की नहीं मां, और फिर तुम होली खेलती ही कहां हो जो मेरा यहां रहना जरूरी है,’ नितिन की कही यह बात सुजाता की दुखती रग को छू गई थी.

नितिन अन्नू के घर चला गया. अब सूना घर और सुजाता एकदूसरे से जूझने लगे. नितिन का आखिरी वाक्य सुजाता के मन में बारबार कौंध रहा था… ‘और फिर तुम होली खेलती ही कहां हो…’

लगभग 12 साल पहले, उस दिन भी होली के हुड़दंगी सड़कों पर ‘होली है.’ ‘होली है’ का शोर मचाते हुए घूम रहे थे. उस समय नितिन 14 साल का था और सुनीति 10 साल की थी. दोनों बच्चे बहुत छोटे तो नहीं थे लेकिन होली का त्योहार बड़ेबूढ़ों को भी बच्चा बना देता है.

नितिन और सुनीति सेवेरे से उत्साहित थे. सुजाता जानती थी कि उस की भाभी को उन दोनों बच्चों का यों खेलनाकूदना रास नहीं आता है. फिर भी वह बच्चों को मना नहीं कर पाई. जब बच्चे होली के रंग से सराबोर हो कर घर लौटे तो सब से पहले दौड़ कर अपनी मां सुजाता से लिपट गए. सुजाता के कपड़े भी उन के शरीर पर लगे रंगों से रंग गए. उसी समय भाभी आ धमकीं. भाभी अपनी सहेलियों के साथ होली खेल कर चली आ रही थीं लेकिन वे सुजाता और उस के बच्चों को देख कर भड़क उठीं.

‘यह देखो, कैसा जमाना आ गया है…अब तुझे इतना भी धरम- करम याद नहीं रहा कि विधवाएं रंग नहीं खेलती हैं. जैसे तू वैसी तेरी औलादें. मैं तो तंग आ गई हूं तुम सब से. इतना ही होली खेलने का शौक है तो दूसरा घर बसा ले, फिर जी भर कर होली खेलना,’ भाभी ने कहना शुरू किया और फिर देर तक अपने मन की भड़ास निकालती रहीं.

सुजाता ने उसी दिन तय कर लिया था कि चाहे जो भी हो मगर वह अपने भाई के घर किसी शरणार्थी की भांति जीवन नहीं व्यतीत करेगी और न ही कभी होली खेलेगी. जब उस के जीवन में ही सुहाग का रंग नहीं रहा तो वह रंग खेल कर करेगी भी क्या? वह छोटीमोटी कोई भी नौकरी कर लेगी मगर अपने बच्चों को अपने दम पर पढ़ाएगी, पालेगी.

सुजाता ने उसी शाम को अपने भाई का घर छोड़ दिया था और अपने दोनों बच्चों को ले कर अपनी एक सहेली के घर जा पहुंची थी. उस की सहेली ने उसे दूसरे दिन ही एक सिलाई सेंटर में काम दिला दिया था. अपनी मेहनत और लगन के दम पर सुजाता ने जल्दी ही अपना स्वयं का सिलाई सेंटर खोल लिया. इस तरह सुजाता के जीवन की गाड़ी चल निकली थी. उस ने अपने दोनों बच्चों को पढ़ाया और एकएक कर के दोनों का विवाह भी कर दिया. पहले नितिन की शादी हुई और अन्नू बहू के रूप में घर आई. इस के बाद सुनीति की शादी हुई और वह अपने ससुराल चली गई.

कुछ ही महीने बाद सुनीति के पति को विदेश में नौकरी मिल गई और सुनीति भी अपने पति के साथ विदेश चली गई. सुजाता के लिए लेदे कर नितिन और अन्नू का ही सहारा बचा लेकिन अन्नू को सुजाता का सादा जीवन बिलकुल रास नहीं आया. ऊपर से तो वह कुछ कहती नहीं है लेकिन भीतर ही भीतर नितिन को भड़काती रहती है कि वह अपनी मां से अलग रहने लगे.

सुजाता सबकुछ देखती, समझती हुई भी मौन रह जाती है. कहे भी तो क्या? अपने भाई का घर छोड़ने के साथ ही मानो वह जीवन के रंगों को भी छोड़ आई. अब उसे कोई भी रंग नहीं भाता है. अन्नू का भी इस में उसे कोई दोष नजर नहीं आता. आखिर नई उम्र की अन्नू रंगों से, जीवन के उल्लास से नाता रखना ही चाहेगी. भला वह क्यों नीरस, बेरंग जीवन जिए?

सुजाता, अन्नू और नितिन को किसी बात के लिए कभी मना नहीं करती. जब नितिन को हनीमून पर जाने के लिए छुट्टियां नहीं मिल पा रही थीं तो उस ने खुद ही नितिन से कहा था कि वह प्रतिदिन शाम को दफ्तर से घर लौटने के बाद अन्नू को कहीं घुमाने ले जाया करे ताकि उसे हनीमून पर न जा पाने का दुख न हो.

सुजाता की तमाम अभिलाषाएं मानो मर चुकी थीं. वह न तो कभी सिनेमा देखने जाती और न कहीं घूमने. सुजाता के रूप में घर के वातावरण में एक अव्यक्त उदासी छाई रहती और इसी उदासी से अन्नू को चिढ़ होती. परिवार का एक व्यक्ति हमेशा एक उदासी ओढ़े रहे तो बाकी सदस्य भला कैसे हंस बोल सकते हैं? एक मर्यादा उन्हें भी हंसने, चहकने से रोकती. इसीलिए अपने विवाह के बाद की यह तीसरी होली अन्नू ने अपने मायके में मनाने का निश्चय किया. सुजाता चाह कर भी उसे रोक न सकी. रोकती भी तो भला किस आधार पर? सभी को अपनी खुशियां अपने ढंग से मनाने का अधिकार होता है, अन्नू को भी है.

अन्नू अपने मायके गई, वह तो ठीक है लेकिन अब नितिन भी अन्नू के पास चला गया है. पति छूटा, मायका छूटा और अब बच्चे भी उस से दूर होते जा रहे हैं, यह सोच कर सुजाता की आंखें डबडबा गईं. अकेलापन उसे चुभने लगा. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? तभी दरवाजे की घंटी ने उसे चौंका दिया.

कौन आया होगा? सुजाता सोचती हुई दरवाजे के पास पहुंची. उस ने ‘स्पाईआई’ से झांक कर देखा. बाहर 1-2 चेहरे नजर आए लेकिन रंगों से पुते हुए. पहचानना कठिन था. दरवाजा खोले या न खोले? पल दो पल सुजाता ने सोचा, फिर उसे एक परिचित सी आवाज सुनाई दी. शायद यह उस के पड़ोस में रहने वाली मनोरमा की बेटी दिव्या की आवाज थी. सुजाता ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही 7-8 लड़केलड़कियां भीतर चले आए.

‘‘होली मुबारक हो, आंटी,’’ वे समवेत स्वर में बोल उठे. उन में से एक लड़के ने आगे बढ़ कर सुजाता के माथे पर गुलाल लगाया और झुक कर पैर छू लिया. उस के बाद एक लड़की आगे आई. उस ने सुजाता के माथे पर गुलाल लगातेलगाते गालों को भी रंग दिया. चंद ही पलों में वहां का दृश्य बदल गया. वे सारे लड़केलड़कियां सुजाता को खींच कर बाहर ले गए और उस के साथ होली खेलने लगे. पहले तो सुजाता ने झिझकते हुए कहा, ‘‘नहींनहीं, रंग मत लगाओ. मैं विधवा हूं.’’

‘‘ओह आंटी, आप भी कैसी दकियानूसी बातें करती हैं,’’ दिव्या ने सुजाता को झिड़क दिया और बाकी लड़कियां उसे रंग लगाने लगीं. सुजाता भी अपनेआप को रोक नहीं सकी, वह भी उन के चेहरों पर रंग लगाने लगी.

होली के रंगों ने उस के भीतर घिरे हुए अंधेरे को मानो साफ कर दिया. वह अपने भीतर हलकापन महसूस करने लगी. अचानक उसे झटका सा लगा. वह अवाक् खड़ी सी रह गई. नितिन और अन्नू उस के सामने खड़े थे. अब क्या अन्नू भी कहेगी कि ‘विधवाएं रंग नहीं खेलतीं.’

तभी अन्नू और नितिन ने आगे बढ़ कर उस के पैर छू लिए.

‘‘मुझे क्षमा कर दीजिए, मां. जो काम इन लोगों ने किया वह मुझे करना चाहिए था. मगर मैं आप के अकेलेपन को समझ नहीं सकी. हर इनसान के भीतर उत्साह के स्रोत पाए जाते हैं, यह तो परिस्थितियां हैं जो उन्हें दबाए रहती हैं. मैं आप की परिस्थितियों को समझ नहीं पाई और आप को उत्साहहीन मानती रही, जबकि आप के भीतर उत्साह जगाना तो हमारा कर्तव्य था न,’’ अन्नू ने सुजाता से कहा.

‘‘हां मां, आज मुझे भी अपनी गलती का एहसास हुआ और इसीलिए हम दोनों लौट आए. मैं ने आप को हमेशा ताना मारा कि आप होली नहीं खेलती हैं मगर मैं ने भी तो आप के साथ कभी होली नहीं खेली. अब तक होली के रंग भले ही आप से दूर थे लेकिन अब ये आप से दूर नहीं रहेंगे,’’ यह कहते हुए नितिन ने ढेर सारा गुलाल मां के सिर में डाल दिया.

‘‘गलती मेरी भी है. मुझे भी किसी बात को यों पकड़ कर नहीं बैठ जाना चाहिए था. भाभी ने जो भी कहा था वह उन का अपना विचार था, उन के विचारों को आत्मसम्मान का प्रश्न बना कर मुझे भी जीवन के रंगों से यों मुंह नहीं मोड़ना चाहिए था. कम से कम तुम बच्चों की खुशियों को ध्यान में रखते हुए तो हरगिज नहीं,’’ सुजाता ने भी मुट्ठी भर गुलाल अन्नू के चेहरे पर मल दिया. अन्नू खुशी से खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘होली है’ के स्वर से सारा वातावरण गूंज उठा. सुजाता के जीवन में खुशियां एक बार फिर झूम उठीं. Holy Family Story

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