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दागी कंगन- प्रकाश ने कौन सी बात सभी से छुपा रखी थी?

Hindi Story: ‘‘मुन्नी, तुम यहां पर कैसे?’’ ये शब्द कान में पड़ते ही मुन्नी ने अपनी गहरी काजल भरी निगाहों से उस शख्स को गौर से देखा और अचानक ही उस के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘निहाल भैया…’’

वह शख्स हामी भरते हुए बोला, ‘‘हां, मैं निहाल.’’

‘‘लेकिन भैया, आप यहां कैसे?’’

‘‘यही सवाल तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि मुन्नी तुम यहां कैसे?’’ अपनी आंखों में आए आंसुओं के सैलाब को रोकते हुए मुन्नी, जिस का असली नाम मेनका था, बोली, ‘‘जाने दीजिए भैया, क्या करेंगे आप जान कर. चलिए, मैं आप को किसी और लड़की से मिलवा देती हूं. मुझ से तो आप के लिए यह काम नहीं होगा.’’

‘‘नहीं मुन्नी, मैं हकीकत जाने बगैर यहां से नहीं जाऊंगा. आखिर तुम यहां आई कैसे? तुम्हें मालूम है कि तुम्हारा भाई राकेश और तुम्हारे मम्मीपापा कितने दुखी हैं?

‘‘वे सब तुम्हें ढूंढ़ढूंढ़ कर हार गए हैं. पुलिस में रिपोर्ट की, जगहजगह के अखबारों में तुम्हारी गुमशुदगी के बारे में खबर दी, लेकिन तुम्हारा कुछ पता ही नहीं चला.

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‘‘और आज… जब इतने बरसों बाद तुम मिली, तो इन हालात में… एक कालगर्ल के रूप में.

‘‘मुन्नी, सचसच बताओ, तुम यहां कैसे पहुंची. हमें तो लगा कि तुम प्रकाश, वह तुम्हारा प्रेमी, के साथ भाग गई?थी.

‘‘कितनी पूछताछ की राकेश ने उस से तुम्हारे लिए, लेकिन वह तो कुछ दिनों के लिए खुद ही नदारद था.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं निहाल भैया, लेकिन अब सच जान कर भी क्या फायदा? सब मेरी ही तो गलती है, सो सजा भुगत रही हूं.’’

‘‘नहीं मुन्नी, ऐसा मत कहो. तुम मुझे सच बताओ.’’

मुन्नी कहने लगी, ‘‘भैया, आप ने जो सुना था, सच ही था. मैं और प्रकाश एकदूसरे को प्यार करते थे. वह मेरे कालेज का दोस्त था. आप को याद होगा कि हम दोनों कालेज से एक फील्ड ट्रिप के लिए शहर से बाहर गए थे. वहीं पर हमारे मन में प्यार के अंकुर फूटे और धीरेधीरे हमारा प्यार परवान चढ़ गया था. ‘‘कालेज की पढ़ाई पूरी होतेहोते हमारे घर में मेरी सगाई की बातें चलने लगी?थीं. मैं ने पापामम्मी को जैसे ही प्रकाश के बारे में बताया, वे आगबबूला हो उठे. मुझे लगा कि कहीं वे लोग मेरी शादी जबरदस्ती किसी और से न करा दें. सो, मैं ने सारी बात प्रकाश को बताई. ‘‘प्रकाश ने मुझे भरोसा दिलाया और कहा, ‘मेनका, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें अपने से अलग नहीं होने दूंगा. बस, तुम मुझ पर?भरोसा रखो.’

‘‘मुझे उस पर पूरा भरोसा था. अब मैं घर में होने वाली हर बात उसे बताने लगी थी. और जैसे ही मुझे लगा कि पापामम्मी मेरी मरजी के खिलाफ शादी तय करने जा रहे हैं, मैं ने प्रकाश को सब बता दिया. ‘‘उसी शाम वह मुझ से मिला. मैं खूब रोई और बोली, ‘मुझे कहीं भगा कर ले चलो प्रकाश, वरना मैं किसी और की हो जाऊंगी और हम हमेशा के लए बिछड़ जाएंगे.’ ‘‘प्रकाश ने कहा, ‘मैं अपने घर में बात करता हूं मेनका, तुम बिलकुल चिंता मत करो.’

‘‘अगले ही दिन प्रकाश मेरे लिए अपनी मम्मी के दिए कंगन ले कर आया और बड़े ही अपनेपन से बोला, ‘मेनका, यह मां का आशीर्वाद है हमारे लिए. वे तो तुम्हें बहू बनाने के लिए राजी हैं, पर पिताजी नहीं मान रहे हैं. सो, हम दोनों घर से भाग जाते?हैं.’

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‘‘मैं ने पूछा, ‘लेकिन, हम भाग कर जाएंगे कहां?’

‘‘वह बोला, ‘वैसे तो हमारे पास कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन वाराणसी में मेरा एक दोस्त रहता है. मैं ने उस से बात की है. वह वहां नौकरी करता?है. हम उसी के पास चलेंगे. वह अपनी ही कंपनी में मेरे लिए नौकरी का इंतजाम भी कर देगा.’

‘‘प्रकाश ने यह भी समझाया, ‘हम वहां रजिस्टर्ड शादी कर लेंगे और फिर अपने घर का इंतजाम भी वहीं कर लेंगे. शायद कुछ समय में हमारे मम्मीपापा भी इस शादी को रजामंदी दे दें.’

‘‘मुझे उस की बातों में सचाई नजर आई और मैं ने उस के साथ भाग जाने का फैसला कर लिया.

‘‘अगले ही दिन मैं घर से कुछ कपड़े व रुपए ले कर रेलवे स्टेशन पहुंच गई.

‘‘हम दोनों प्रकाश के दोस्त के घर पहुंचे और वहां 2 दिन में ही प्रकाश ने नौकरी शुरू कर दी. ‘‘5 दिन बाद उस का दोस्त मुझ से बोला, ‘भाभी, प्रकाश ने आप को बाहर कहीं बुलाया है. आप तैयार हो जाइए. मैं आप को वहां ले चलता हूं.’

‘‘एक बार तो मुझे लगा कि प्रकाश ने मुझे क्यों नहीं बताया, पर अगले ही पल मैं उस के दोस्त के साथ चली गई. मैं जहां पहुंची, वहां प्रकाश पहले से ही मौजूद था.

‘‘उस ने मुझे एक आंटी से मिलवाया और बोला, ‘जिस कंपनी में मैं काम करता हूं, ये उस की मालकिन हैं.’

‘‘वे आंटी भी मुझ से बड़े प्यार से मिलीं. कुछ देर बाद प्रकाश बोला, ‘मेनका, मैं कुछ देर के लिए बाहर हो कर आता हूं, तब तक तुम यहीं रहो.’

‘‘एक बार को मुझे घबराहट हुई, पर आंटी की प्यार भरी छुअन में मुझे मां का रूप नजर आया, सो मैं वहां रुक गई. उस के बाद मेरी जिंदगी में जैसे तूफान आ गया. मुझे एक ही रात में समझ आ गया कि प्रकाश मुझे थोड़े से रुपयों के लालच में उन आंटी के हाथों बेच गया था. ‘‘अब हर रात अलगअलग तरह के ग्राहक आने लगे. मैं ने आंटी के खूब हाथपैर जोड़े और रोरो कर कहा, ‘आंटी प्लीज मुझे जाने दीजिए, मैं भले घर की लड़की हूं. मेरे मम्मीपापा, भाई क्या सोचेंगे मेरे बारे में.’

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‘‘लेकिन, आंटी ने मेरी एक न सुनी. पहले 2 लड़कों ने मेरा बलात्कार किया और मुझे कई दिन तक भूखा रखा गया. जब मैं मानी, तब खाना दिया गया और इलाज भी कराया गया. सब लड़कियों ने कहा कि इन की बात मान जाओ, क्योंकि बाहर तो अब कोई अपनाएगा ही नहीं. मैं रोज सजधज कर तैयार होने लगी.

‘‘लेकिन, मुझे बारबार अपने किए पर पछतावा होता. एक बार वहां से भागने की कोशिश भी की, पर पकड़ी गई. उस रात आंटी ने मेरी खूब पिटाई की और उन के दलाल भूखे भेडि़यों की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े. ‘‘वहां की एक लड़की प्रिया ने मुझे समझाया, ‘मेनका, अब तुम्हारे पास इस नरक से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं?है. तुम्हारे साथ कितनी बार तो आंटी के आदमियों ने गैंगरेप किया, तुम्हें क्या हासिल हुआ? इस से तो ग्राहकों की भूख मिटाओगी, कम से कम पैसे तो मिलेंगे. समझौता करने में ही समझदारी है.  ‘‘उस समय मुझे प्रिया की बात ठीक ही लगी और मैं ने अपनेआप को आंटी को सौंप दिया. आंटी बहुत खुश हुईं और मुझे प्यार से रखने लगीं. बस, तब से मेरी ग्राहक को पटाने की ट्रेनिंग शुरू हुई.

‘‘मुझे दूसरी औरतों के साथ रात के समय सजधज कर भेज दिया जाता. सड़क के किनारे खड़ी हो कर दूसरी लड़कियां अपनी अदाओं से आतेजाते मर्दों को रिझातीं. मैं उन्हें देख कर दंग रह जाती. हर कोई मोटा मुरगा फंसाने की फिराक में रहती.’’ मेनका की बात सुन कर निहाल ने थोड़ा गुस्से में पूछा, ‘‘तुम जब बाहर निकली, तो रात के समय वहां से भाग क्यों नहीं गई?’’

‘‘कैसी बातें करते हैं भैया आप. इतना आसान होता, तो क्या मैं इस धंधे में टिकी रहती? आंटी के दलाल पूरी चौकसी रखते हैं हम पर.’’

मेनका की कहानी सुन कर निहाल की आंखों से आंसू बह निकले. मेनका आगे बताने लगी, ‘‘दूसरी लड़कियों के साथ मैं भी धीरेधीरे ग्राहक पटाने की ट्रेनिंग ले चुकी थी. शुरू में तो ग्राहक पटाना भी बहुत बुरा लगता था. रात के समय सड़क पर घटिया हरकतें कर अपने अंग दिखा कर उन्हें पटाना पड़ता था. ‘‘उस पर भी लड़कियों में आपस में होड़ मची रहती थी. मैं किसी ग्राहक को जैसेतैसे पटाती, तो रास्ते से ही दूसरी लड़कियां कम पैसों में उसे खींच ले जातीं. ‘‘भैया, मैं नई थी. मुझ से ग्राहक पटते ही नहीं थे, तो आंटी बहुत नाराज होतीं. सड़क पर ग्राहक ढूंढ़ने के लिए खड़ी होती, तो लोगों की लालची मुसकान देख कर मेरा दिल दहल जाता. जब कोई पास आ कर बात करता, तो डर के मारे दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. कोईकोई तो मेरे पूरे बदन को छू कर भी देखता.

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‘‘बस, इतना ही? और उस के लिए तुम्हारी देह का सौदा हर रात होता है,’’ निहाल ने कहा. उस की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे, जिन्हें रोकने की वह नाकाम कोशिश कर रहा था.

‘‘बहुत बुरा हाल था भैया. एक बार एक आदमी बहुत नशे में था. मुझे उस के मुंह से आती शराब की बदबू बरदाश्त नहीं हुई और मैं ने उस से अपना मुंह फेर लिया. वह मुझे गाली देते हुए बोला, ‘तू खुद क्या दूध की धुली है?’ ‘‘और उस ने मुझे पूरे बदन पर सारी रात दांतों से काट डाला. मैं बहुत रोई, चीखीचिल्लाई, पर कोई मेरी मदद को न आया.

‘‘अगले दिन आंटी ने चमड़ी उधेड़ दी और बोली, ‘हर ग्राहक को नाराज कर देती है. तेरे प्रेमी को ऐसा क्या दिखा था तुझ में? क्या सुख देती तू उस को? इसीलिए शायद यहां सड़ने को पटक गया तुझे.’ ‘‘यह सब सुन कर मुझे बहुत बुरा लगा. मैं ने सोच लिया कि अब काम करूंगी, तो ठीक से.’’

‘‘फिर तुम वाराणसी से मुंबई कैसे पहुंच गई मुन्नी?’’ निहाल ने पूछा.

‘‘वाराणसी छोटा सा शहरहै. लोग पैसा कम देते हैं. ऊपर से कई तरह की छूत की बीमारियां हमें दे जाते हैं. जो पैसे मिलते, वे बीमारियों पर ही खर्च हो जाते. ‘‘एक बार मुंबई की कुछ लड़कियां हमें ट्रेनिंग देने आईं, तो मैं ने उन से कहा कि मुझे भी मुंबई ले चलिए. कम से कम बड़े शहर के लोग रकम तो अच्छी देंगे. मैं थोड़ी पढ़ीलिखी हूं और अंगरेजी भी बोलती हूं, इसलिए उन्हें मैं मुंबई के लायक लगी. सो, मुझे यहां भेज दिया. बस, तब से मैं ने इसे अपने कारोबार की तरह अपना लिया. ‘‘कई बार रेड पड़ी. थाने भी गई. शुरू में डरती थी, लेकिन अब मन को मजबूत कर लिया. अब कोई डर नहीं. जब तक जिंदगी है, इसी नरक में जीती रहूंगी. अब तो ग्राहक भी सोशल मीडिया और ह्वाट्सऐप पर मिल जाते हैं. कोडवर्ड होता है, जिस से हमारे दलाल बात करते हैं,’’ और वह ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

निहाल मेनका के चेहरे पर ढिठाई की हंसी पढ़ चुका था, फिर भी उस ने पूछा, ‘‘निकलना चाहती हो इस नरक से?’’ वह बोली, ‘‘कौन निकालेगा भैया… आप? और उस के बाद कहां जाऊंगी? अपने मम्मीपापा के घर या आप के घर? कौन अपनाएगा मुझे?

‘‘निहाल भैया, अब तो मेरी अर्थी इन गंदी गलियों से ही उठेगी,’’ वह बोली और फिर जोर से ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

‘‘भैया, मेरी तो सारी बातें पूछ लीं, पर आप ने अपनी नहीं बताई कि

आज आप यहां कैसे? आप की शादी हुई या नहीं? आप तो बहुत नेक इनसान हुआ करते थे, फिर यहां कैसे?’’ मेनका ने पूछा.

‘‘पूछो मत मुन्नी, मेरी पत्नी किसी और के साथ संबंध रखती है. मुझे तो जैसे नकार ही दिया है. 2 बच्चे भी हैं. मन तो उन के साथ लगा लेता हूं, पर तुम से कैसे कहूं? तन की भूख मिटाने यहां चला आता हूं कभीकभी.

‘‘मुझे नहीं मालूम था कि आज इस जगह तुम से मिलना होगा. सच पूछो तो समझ नहीं आ रहा है कि आज मैं तुम्हें गलत समझूं या सही.

‘‘तुम जैसी न जाने कितनी लड़कियां हम मर्दों को सुख देती हैं और हमारे घर टूटने से बचाती हैं. हम मर्द तो एक रात का सुख ले कर खुश हो जाते?हैं. पर हमारे चलते मजबूरी की मारी लड़कियां अपनी जिंदगी को इस नरक में जीने के लिए मजबूर होती हैं और इन बंद गलियों में कीड़ेमकौड़े की जिंदगी जीती?हैं.

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‘‘मुझे माफ करो मुन्नी, यह लो तुम्हारी एक रात की कीमत,’’ इतना कह कर निहाल ने मुन्नी की तरफ पैसे बढ़ा दिए. मेनका ने कहा, ‘‘भैया, मेरा दर्द बांटने के लिए शुक्रिया, पर किसी को घर में न बताना कि मैं यहां हूं. मेरे मम्मीपापा और भाई मुझे गुमशुदा ही समझ कर जीते रहें तो अच्छा, वरना वे तो जीतेजी मर जाएंगे. और इस रात की कोई कीमत नहीं लूंगी आप से.

‘‘आज आप ने मेरा दर्द बांटा है, किसी दिन शायद मैं आप का दर्द बांट सकूं. अपनी बहन समझ कर आना चाहें तो फिर आ जाइए कभी.’’

सुबह होने को थी. निहाल चुपचाप वहां से उठ कर अपने घर आ गया. Hindi Story

गर्लफ्रैंड रिलेशन में है मगर फिजिकल रिलेशन के लिए तैयार नहीं

Physical Relationship: असल में, हमारे बीच फिजिकल रिलेशन को ले कर सोच अलग है. मैं मानता हूं कि यह किसी भी रिलेशनशिप का एक जरूरी हिस्सा होता है, जिस से पार्टनर्स के बीच नजदीकी और समझ बढ़ती है लेकिन मेरी पार्टनर इस मामले में अभी सहज नहीं है. वह कहती है कि वह अभी इस के लिए तैयार नहीं है. समय के साथ मुझे लगने लगा कि शायद वह मुझ से उतनी कनैक्ट नहीं है जितना मैं उस से हूं.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि हमारे बीच पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही. मैं उस से बहुत प्यार करता हूं और उसे खोना नहीं चाहता, लेकिन मेरी अपनी जरूरतें और भावनाएं भी हैं. मैं कन्फ्यूज्ड हूं कि क्या मैं गलत सोच रहा हूं या फिर हमें इस रिश्ते के बारे में गंभीरता से दोबारा सोचना चाहिए?

हर इंसान की सोच, भावनाएं और कन्फर्ट लैवल अलग होता है, खासकर फिजिकल रिलेशन जैसे विषय में. आप की पार्टनर का अभी सहज न होना यह नहीं दिखाता कि वह आप से प्यार नहीं करती, बल्कि यह उस की पर्सनल फीलिंग्स और सीमाओं का हिस्सा है.

किसी भी रिश्ते में फिजिकल नजदीकी तभी अच्छी होती है जब दोनों पार्टनर अपनी इच्छा से और पूरी तरह कन्फर्टेबल हों. अगर इस बात में जल्दबाजी या दबाव डाला जाए तो इस से रिश्ता और ज्यादा कमजोर हो सकता है. इसलिए सब से जरूरी है कि आप उन की भावनाओं का सम्मान करें, उन्हें समय दें.

साथ ही, यह भी जरूरी है कि आप अपनी फीलिंग्स को दबा कर न रखें. शांत तरीके से, बिना किसी दबाव या आरोप के उन से खुल कर बात करें. उन्हें बताएं कि आप कैसा महसूस करते हैं.

इस के अलावा, अपने रिश्ते के बाकी पहलुओं पर ध्यान दें, जैसे इमोशनल कनैक्शन, एकदूसरे का साथ और विश्वास. अगर ये मजबूत हैं तो समय के साथ बाकी चीजें भी सही दिशा में आ सकती हैं.

लेकिन अगर लंबे समय तक आप दोनों की सोच में कोई संतुलन नहीं बन पाता और इस से लगातार तनाव बढ़ता है तो आप को ईमानदारी से यह सोचना होगा कि क्या यह रिश्ता आप दोनों की जरूरतों व खुशियों के अनुसार सही है या नहीं. याद रखें, सच्चा रिश्ता वही होता है जिस में दोनों लोग एकदूसरे की भावनाओं, सीमाओं और जरूरतों का सम्मान करें, न कि किसी एक की इच्छा दूसरे पर हावी हो.

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मेरी गर्लफ्रैंड मुझ से काफी ज्यादा कमाती है

पिछले 2 वर्षों से मैं एक रिलेशनशिप में हूं. मेरी गर्लफ्रैंड भी जौब करती है और सच कहूं तो वह मुझ से काफी ज्यादा कमाती है. शुरुआत में यह बात मेरे लिए इतनी बड़ी नहीं थी क्योंकि हमारे बीच प्यार और समझ बहुत अच्छी थी. हम एकदूसरे का सम्मान करते थे और साथ में खुश रहते थे लेकिन धीरेधीरे यह बात मेरे मन में घर करने लगी. जब भी हम कहीं बाहर जाते हैं या कोई खर्च होता है तो कई बार वह आसानी से पैसे दे देती है.

ऊपर से वह कभीकभी महंगी चीजें खरीद लेती है, जो मैं आसानी से अफोर्ड नहीं कर पाता. ऐसी स्थिति में मुझे अंदर ही अंदर हीनभावना होने लगती है. मुझे लगता है कि मैं उस के सामने छोटा पड़ रहा हूं. हालांकि जब मैं उस से इस बारे में बात करता हूं तो वह कहती है कि उसे पैसों से कोई फर्क नहीं पड़ता और वह मुझ से वैसे ही प्यार करती है, लेकिन फिर भी मेरे मन से यह बात निकल नहीं रही.

अब हालत यह हो गई है कि छोटीछोटी बातों पर भी मुझे असहजता महसूस होती है. मैं खुद की उस से तुलना करने लगता हूं, जिस से मेरा आत्मविश्वास भी कम होता जा रहा है. यह हीनभावना हमारे रिश्ते को धीरेधीरे कमजोर कर रही है. मुझे  समझ नहीं आ रहा कि मैं अपनी सोच कैसे बदलूं और इस स्थिति को कैसे संभालूं?

आप की समस्या सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि खुद के आत्मविश्वास और सोच से जुड़ी हुई है. सब से पहले यह सम?ाना जरूरी है कि किसी भी रिश्ते की मजबूती कमाई से नहीं, बल्कि भरोसे, सम्मान और समझ से तय होती है. आप की गर्लफ्रैंड अगर साफतौर पर कह रही है कि उसे पैसों से फर्क नहीं पड़ता तो इस का मतलब है कि वह आप को आप के व्यक्तित्व और प्यार के लिए महत्त्व देती है, न कि आप की कमाई के आधार पर.

आप को खुद की उस से तुलना करना बंद करना होगा. हर इंसान की अपनी जर्नी होती है और कैरियर में आगेपीछे होना सामान्य बात है. यह जरूरी नहीं कि जो आज ज्यादा कमा रहा है वही हमेशा आगे रहेगा. इसलिए अपने कैरियर और स्किल्स पर ध्यान दें, ताकि आप का आत्मविश्वास मजबूत हो सके.

साथ ही, पैसों को ले कर एक स्पष्ट सम?ा बनानी भी जरूरी है. आप दोनों बैठ कर यह तय कर सकते हैं कि खर्च कैसे बांटे जाएं, ताकि किसी को असहजता न हो. रिश्ते में ‘मैं कम हूं’ या ‘वह ज्यादा है’ जैसी सोच की जगह ‘हम साथ हैं’ वाली सोच लानी होगी.

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गर्लफ्रैंड को लगता है मैं बदल गया हूं, क्या लौंग डिस्टैंस रिश्ते खत्म कर देता है?

मैं 29 वर्ष का हूं, मेरी हाल ही में सरकारी नौकरी लगी है. मेरी  पोस्टिंग दूसरे शहर में हुई है, जबकि मेरी गर्लफ्रैंड दिल्ली में रहती है जहां हम पहले साथ थे. हम पिछले 3 साल से रिलेशनशिप में हैं और एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. लेकिन नौकरी लगने के बाद सब बदल गया है. अब हम दोनों के बीच लौंग डिस्टैंस रिलेशनशिप हो गई है. मेरी जौब में टाइम फिक्स नहीं होता, कभी देर तक काम करना पड़ता है, कभी अचानक ड्यूटी लग जाती है. इस वजह से मैं उसे पहले जितना टाइम नहीं दे पाता. वहीं, मेरी गर्लफ्रैंड को लगता है कि मैं बदल गया हूं. कई बार वह गुस्से में कह देती है कि ‘अगर तुम इतना ही बिजी हो तो रिलेशनशिप क्यों रखी है?’

मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या करूं? एक तरफ मेरी सरकारी नौकरी है, जो मेरे कैरियर और परिवार के लिए बहुत जरूरी है, दूसरी तरफ मेरा रिश्ता है.

सब से पहले, आप को अपनी गर्लफ्रैंड को अपनी नौकरी की वास्तविकता समझनी होगी. उसे यह बताना जरूरी है कि आप का बिजी होना उस की अनदेखी नहीं, बल्कि आप की जिम्मेदारी का हिस्सा है. जब सामने वाला स्थिति को समझेगा, तभी वह आप को सही तरीके से सपोर्ट कर पाएगा. साथ ही, भले ही आप बहुत बिजी हों लेकिन थोड़ा सा क्वालिटी टाइम निकालना जरूरी है, जैसे दिन में एक कौल, एक मैसेज या वीकैंड पर लंबी बातचीत. इस से उसे यह महसूस होगा कि वह आप के लिए अभी भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है.

दूसरी तरफ, आप की गर्लफ्रैंड को भी यह समझना होगा कि हर समय साथ रहना संभव नहीं होता, खासकर जब कैरियर की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं. अगर आप दोनों एकदूसरे की परिस्थितियों को समझ कर चलेंगे तो यह दूरी भी आप के रिश्ते को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत बना सकती है. Physical Relationship

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सोशल मीडिया पर दलित मंच – स्क्रीन पर सिमटता एक्टिविज्म

Social Stories: आज सोशल मीडिया दलित आवाजों के लिए एक बड़ा मंच बन चुका है. इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफौर्म्स पर कई दलित पेज लगातार जातिआधारित भेदभाव, हिंसा, इतिहास और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं. m@dalitfeminist, @dalitfeminismarchive, @dalitcamera, @dalitdesk, @Ba_Bhima जैसे पेज जाति और जैंडर के इंटरसैक्शन, बाबासाहेब अंबेडकर के विचार, दलित महिलाओं की कहानियां, न्यूज अपडेट, ग्राफिक्स, कोट्स और अवेयरनैस पोस्ट शेयर करते हैं. ये पेज उस तबके की बात रखते हैं जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया अकसर नजरअंदाज करता रहा है.

सच यह भी है कि इंटरनैट पर इन पेजों को उतना खुला भेदभाव नहीं  झेलना पड़ता जितना दलित समुदाय को रोजमर्रा की जिंदगी में  झेलना पड़ता है क्योंकि इन्हें फौलो करने वाले लोग भी इसी समुदाय के होते हैं और अगर कोई मजाक उड़ाने या कोई टिप्पणी करने की कोशिश करता है तो उसे कमैंट सैक्शन में ही धो दिया जाता है. इस के अलावा, औनलाइन स्पेस एक तरह की सुरक्षा देता है. यहां आवाज दबाना आसान नहीं होता. पोस्ट वायरल हो सकती है, समर्थन मिल सकता है. यही वजह है कि सोशल मीडिया पर कैंपेन, ट्रैंड और डिजिटल प्रोटैस्ट तेजी से होने लग जाते हैं.

लेकिन सवाल यह है, क्या केवल सोशल मीडिया पर एक्टिव होना ही काफी है?

क्या पोस्ट शेयर करना, स्टोरी लगाना और हैशटैग चलाना जमीनी सच्चाइयों को बदल देता है?

इन पेजों का काम महत्त्वपूर्ण है. ये शिक्षा का काम करते हैं. लोगों को बताते हैं कि हम कोई नीच लोग नहीं हैं, हम भी समाज का अहम हिस्सा हैं. जानें कि अपने पेज के माध्यम से ये क्या बताते हैं-

दलित डैस्क

दलित डैस्क एक मीडिया प्लेटफौर्म है. दलित डैस्क अपने बारे में बताता है कि वह समाज की मार्जिनलाइज्ड कम्यूनिटी की आवाज उठाता है, खासकर, दलित कम्यूनिटी जिसे अतीत में हजारों साल दबाया गया और यह कृत्य आज भी जारी है.mदलित डैस्क का मानना है कि हर कहानी सुनी जानी चाहिए, हर किसी को सुना जाना चाहिए. दलित डैस्क अपने काम को मिशन मान कर चलता है. उस का मिशन हाशिए पर मौजूद लोगों की आवाज को बढ़ाना, रूढि़यों को चुनौती देना है.

दलित डैस्क अपनी वैबसाइट चलाता है, जिस में दलितों से जुड़ी राजनीतिक व सामाजिक रिपोर्ट डाली जाती हैं. इस के अलावा इंस्टाग्राम पेज है जहां वह खुद को इंट्रोड्यूस करता है- ‘अनसुनी आवाजों के लिए तेज, हाशिए से मुख्यधारा तक.’

दलित हिस्ट्री

दलित हिस्ट्री एक तरह का कल्चरल ग्रुप है. इस का मुख्य फोकस दलितों के उस इतिहास पर है जिसे छुआ नहीं गया. अपने डिस्क्रिप्शन में दलित हिस्ट्री कहती है, ‘‘हजारों वर्षों तक दलित, बहुजन और आदिवासी समुदायों को अपना इतिहास व साहित्य रखने से दूर रखा गया.

‘‘दलित समुदाय ने अब अपनी हिस्ट्री और कल्चर के बारे में अधिक बात करना शुरू किया है. टैक्स्ट हिस्ट्री की कमी के कारण दलितों के इतिहास और संस्कृति किन्हीं खास और ताकतवर लोगों द्वारा बदल दिए गए ताकि दलितों को समाज के सब से निचले स्तर पर रखा जा सके.’’ दलित हिस्ट्री ग्रुप बताता है कि वह इतिहास में समुदाय से संबंधित अच्छी तरह से रिसर्च बेस्ड फैक्ट्स देता है.

दलित क्वीर प्रोजैक्ट

यह दलित क्वीर के इशू को ले कर बनाया गया गु्रप पेज है. इस पेज को बनाने वाले आरोह अंकुठ हैं. आरोह प्रोफैशन से आर्टिस्ट हैं. दलित क्वीर प्रोजैक्ट के इंस्टा पेज पर फिलहाल 101 पोस्ट किए गए हैं. इस के 8 हजार से ज्यादा फौलोअर्स हैं जिन में वर्कशौप, कास्ट एंड मीडिया पर बातचीत, पोएट्री सर्कल और इवैंट्स की डिटेल्स शेयर की गई हैं. अपने इंस्टा प्रोफाइल में दलित क्वीर प्रोजैक्ट कहता है कि वह हैट्रो नौर्म्स को तोड़ रहा है और यह पेज एक कोलैबोरेशन स्पेस है जहां दलित और क्वीर की बात होती है.

इस के अलावा @dalitfeminist जैसे पेज यह दिखाते हैं कि दलित महिलाओं का संघर्ष दोहरा होता है- जाति का भी और जैंडर का भी. @dalitcamera दलित मुद्दों को डौक्यूमैंट करते हैं, न्यूज और घटनाओं को सरल भाषा में सामने लाते हैं. @Ba Bhima जैसे पेज ग्राफिक्स और छोटे कंटैंट के जरिए युवाओं को जोड़ते हैं.

लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब एक्टिविज्म सिर्फ स्क्रीन तक सिमट कर रह जाता है. सोशल मीडिया पर गुस्सा, दुख और विरोध दिखता है लेकिन वही ऊर्जा अगर रियल लाइफ में न उतरे तो कोई फायदा नहीं.

ग्राउंड रिऐलिटी में दलित आज भी स्कूलों, नौकरियों, किराए के मकानों, शादीब्याह और मंदिरपानी जैसे मुद्दों पर भेदभाव  झेलते हैं. यहां लाइक और कमैंट काम नहीं आते. यहां कानूनी मदद, स्थानीय सपोर्ट, संगठित आवाज और लगातार मौजूदगी चाहिए.

केवल औनलाइन प्रोटैस्ट का एक खतरा यह भी है कि वह कम्फर्ट जोन एक्टिविज्म बन जाता है. पोस्ट डाली, गुस्सा निकाला, ट्रैंड चलाया और फिर सब नौर्मल. इस का मतलब यह नहीं कि सोशल मीडिया बेकार है, बल्कि सोशल मीडिया एक शुरुआत है, मंजिल नहीं.

इन दलित पेजों की ताकत तब कई गुना बढ़ सकती है जब वे जमीनी आंदोलनों से जुड़ें, लोकल स्तर पर मीट-अप, चर्चा और लीगल अवेयरनैस को बढ़ावा दें. सिर्फ घटनाओं पर पोस्ट न करें, बल्कि समाधान और ऐक्शन की दिशा भी कुछ करें. स्क्रीन पर लिखी बात अगर सड़क, स्कूल, दफ्तर और कोर्ट तक न पहुंचे तो वह सिर्फ कंटैंट बन कर रह जाती है.  \Social Stories

Hindi Story: शक

Hindi Story: दिन के ढाई बजे थे. सुगना थकीहारी काम से लौटी थी. अपने मकान के दरवाजे पर ताला देख कर वह परेशान हो गई. अपने चारों बच्चों को देखने के लिए उस ने इधउधर नजरें दौड़ाईं. बच्चे कहीं नहीं दिखाई दिए तो धम्म से दरवाजे के आगे जमीन पर बैठ गई.

रोज  इसी समय वह काम से लौटती थी. उस के चारों बच्चे वहीं खेलते हुए मिलते थे. उसे ध्यान आया कि हो सकता है कि उस का पति मंगल आज बच्चों को उस की मां के घर छोड़ कर काम पर चला गया हो. वह कराहते हुए उठी और अपनेआप को घसीटते हुए मां के  घर की ओर चल पड़ी, जो उस के घर से मात्र एक फर्लांग की दूरी पर था. वहां पहुंच कर उस ने पाया कि मां अभी तक काम से नहीं लौटी थीं. उन के घर में भी ताला लगा हुआ था. निराश हो कर वह वापस लौटी और घर के सामने जमीन पर बैठ कर पति और बच्चों का इंतजार करने लगी.

वह रोज सवेरे 4 बजे सो कर उठती. घर का कामकाज निबटा कर पति व बच्चों के लिए दालभात पका कर काम पर निकल जाती थी. पति व बच्चे देर से सो कर उठते थे. मंगल बच्चों को खिलापिला कर उन्हें खेलता छोड़ कर काम पर निकल जाता. जब वह दोपहर में लौट कर आती तो उस के बच्चे घर के सामने गली के बच्चों के साथ खेलते मिलते. आज पहला मौका था कि सुगना को घर बंद मिला और बच्चे नहीं मिले. आसपास पूछताछ करने पर पता चला कि किसी ने भी मंगल व बच्चों को नहीं देखा था. ऐसा लगता था कि मंगल बच्चों को ले कर भोर होते ही कहीं चला गया था. सुगना को बाहर बैठेबैठे 2 घंटे हो गए थे. वह धीरेधीरे सुबकने लगी. आसपास औरतों व बच्चों की भीड़ जमा हो गई.

उस की पड़ोसिन केतकी, ईर्ष्यावश उस से बात नहीं करती थी पर सुगना की दयनीय स्थिति देख कर केतकी  को भी उस पर दया आ गई. उस ने उसे अपने घर के अंदर आ कर कुछ खा लेने व आराम करने को कहा पर सुगना नहीं मानी. उस ने रोतेरोते कहा कि जब तक वह मंगल व बच्चों को नहीं देख लेगी तब तक न तो वहां से कहीं जाएगी और न ही कुछ खाएगी.

केतकी का पति, बसंत अकसर सुगना को निहारा करता था, जिस के कारण वह मन ही मन उस से जलती थी और उस से बात नहीं करती थी. बसंत ही नहीं, बस्ती के सभी पुरुषों की नजरों का केंद्रबिंदु थी सुगना. वह 6 धनी परिवारों में मालिश का काम करती थी. उन घरों की मालकिनों को कुछ काम नहीं था. खाली बैठेबैठे उन के बदन में दर्द होता रहता. सुगना उन के हाथपैरों में मालिश करती. साथ ही, इधरउधर की बातें नमकमिर्च लगा कर सुना कर उन का मनोरंजन करती.

ये रईस स्त्रियां प्रसन्न हो कर सुगना को अपनी उतरी हुई पुराने फैशन की साडि़यां दे देतीं. सुगना जब जार्जेट, रेशम, शिफान, टसर व नायलोन की साडि़यां पहन कर निकलती तो बस्ती की स्त्रियों के सीनों पर सांप लोट जाते और पुरुष आहें भरने लगते. सभी उसे पाना चाहते, उस से बातें करने को लालायित रहते. शाम घिरने लगी थी. धीरेधीरे बस्ती के पुरुष काम से लौैटने लगे थे. आते ही सभी मंगल और बच्चों की खोज में लग गए. वास्तव में उन्हें खोजने से ज्यादा उन की दिलचस्पी सुगना की कृपादृष्टि पाने में थी.

जब मंगल व बच्चों का कहीं पता नहीं चला तो सब ने सोचा कि शायद वह पास वाले गांव में अपने मातापिता के पास चला गया होगा. इस विचार के आते ही बस्ती के दारूभट्टी के नौजवान मालिक केवल सिंह ने सुगना की सहायता के लिए अपनेआप को पेश कर दिया. बस्ती के सभी पुरुषों के पास वाहन के नाम पर पुरानी घिसीपिटी साइकिलें ही थीं. केवल सिंह ही ऐसा रईस था जिस के पास एक पुरानी खटारा फटफटी थी.

केवल सिंह ने अपनी फटफटी पर एक और नौजवान को बैठाया और मंगल का पता लगाने पास वाले गांव में चला गया. केवल सिंह का सुगना के घर खूब आनाजाना था. मंगल जब दारू पी कर उस की दुकान में लुढ़क जाता तो वह उसे अपनी गाड़ी में लाद कर घर छोड़ने आता. हर रात ऐसा ही होता.

उसे मंगल से कोई लगाव नहीं था, बल्कि सुगना को आंख भर देखने तथा नशे में बेहोश मंगल की सेवा करने के बहाने सुगना के पास बैठने और उस से देर रात तक बतियाने का मौका पाने के लिए वह ऐसा करता था. मंगल का जब नशा टूटता तो वह आधी रात को सुगना को जगा कर खाना मांगता. जरा भी नानुकुर या देर होने पर वह सुगना को बुरी तरह पीटता. रात के सन्नाटे में सुगना की दर्दभरी चीखें महल्ले वाले सुनते पर क्या करते, पतिपत्नी का मामला था.

धुंधलका गहरा होने लगा था. केवल सिंह लौट आया था. मंगल सिंह अपने बच्चों के साथ अपने गांव भी नहीं गया था. इतना बड़ा ताला लगा कर आखिर गया कहां वह?  सब इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए थे कि तभी किसी को घर के अंदर से बच्चों की दबीदबी सिसकियां सुनाई दीं. सब के कान खड़े हो गए. तुरंत 2 हट्टकट्टे नौजवानों ने दरवाजा तोड़ डाला.

अंदर का मंजर दिल दहलाने वाला था. मंगल का शरीर छत की मोटी बल्ली से लटका हुआ था. गले में बंधी थी सुगना की नाइलोन की साड़ी. वह मर चुका था. चारों बच्चे डरे हुए, सुबक रहे थे. देखते ही सुगना पछाड़ खा कर जमीन पर गिर कर बेहोश हो गई. स्त्रियों ने उस के ऊपर पानी डाला. होश में आते ही वह बच्चों से लिपट कर दहाड़ मार कर रोने लगी.

भीड़ में से ही किसी ने पुलिस को शिकायत कर दी. पुलिस ने आते ही जांचपड़ताल शुरू कर दी. ऐसा लगता था कि शराब के नशे में मंगल ने आत्महत्या कर ली थी. कमरे की एकमात्र खिड़की अंदर से बंद थी. बस्ती वाले मंगल की बुरी आदतों से परेशान तो थे ही. सभी ने उस के विरोध में बयान दिया. किसी पर भी शक की सुई नहीं घूम रही थी. पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि मंगल ने बाहर से ताला लगाया तथा खिड़की से कूद कर अंदर आ गया. अंदर से दरवाजा बंद कर के उस ने आत्महत्या कर ली. उस ने बच्चों को भी मारने की कोशिश की थी. पतीली में बचेखुचे दालभात की जांच से पता चला कि उस में अफीम मिलाई गई थी. मात्रा कम होने के कारण बच्चे बच गए थे.

आत्महत्या का कारण किसी को समझ में नहीं आ रहा था. एक नशेड़ी इतने ठंडे दिमाग से योजनाबद्ध काम करेगा यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. बच्चे कुछ भी बताने में असमर्थ थे. कई दिन तक गहन पूछताछ और जांचपड़ताल के बाद भी पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. सभी के बयान समान थे और केवल मंगल की ओर इशारा करते थे. पुलिस ने भी इस गरीब बस्ती के एक नशेड़ी की मौत के मामले में ज्यादा  सिर खपाने की जरूरत नहीं समझी और आत्महत्या का मामला दर्ज कर तुरंत फाइल बंद कर दी.

मिसेज दिवाकर के यहां सुगना काम करती थी. उन्हें घर के अन्य नौकरों से मंगल की मौत के बारे में पता चला तो उन्हें शराब की भट्ठी के मालिक केवल सिंह पर शक हुआ, क्योंकि वही ऐसा व्यक्ति था जिस का सुगना के यहां अधिक आनाजाना था. वह उस में जरूरत से ज्यादा रुचि भी लेता था. पर उन्होंने इस मामले में अपनी टांग अड़ाना उचित नहीं समझा.

मंगल की मौत को 1 माह ही बीता था कि केवल सिंह ने सुगना को चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया. एक दिन की अनुपस्थिति के बाद सुगना सजीसंवरी, नई चूडि़यां खनकाती काम पर आई तथा मिसेज दिवाकर को अपने विवाह की सूचना दी. सुनते ही मिसेज दिवाकर भड़क गईं और बोलीं, ‘‘हाय मरी, तुझे तो रोज रात की मारपीट से मुक्ति मिल गई थी. फिर से क्यों जा पड़ी नरक में उसी मुए के साथ, जिस ने तेरे मंगल को मारा?’’

अनजाने में उन के मुख से उन के अंदर का दबा हुआ शक उजागर हो गया, पर अविचलित सुगना बोली, ‘‘अपने आदमी की मार भी कोई मार होती है. इस से बस्ती में इज्जत बढ़ती है. रही शादी की बात, तो महल्ले के सब बदमाशों से बचने के लिए किसी एक का हाथ थामना अच्छा है. आप क्या जानो, एक औरत का अकेले रहना कितना मुश्किल होता है. बिना आदमी के बस्ती के मनचले दारू पी कर मेरा दरवाजा पीटते थे. रात को सोने नहीं देते थे.’’

मिसेज दिवाकर को कुछ अटपटा सा लगा कि केवल सिंह पर उन के द्वारा लगाए हत्या के इल्जाम को सुन कर भी कोई प्रतिक्रिया उस ने व्यक्त नहीं की थी. एक वर्ष बीत गया था. सुगना के पांव भारी थे. जच्चगी के लिए अस्पताल जाने से पहले उस ने अपनी छोटी बहन फागुन को घर व बच्चों की देखभाल के लिए बुलवा लिया. जब वह अस्पताल से नवजात बेटे के साथ घर लौटी तो उसे यह देख कर जबरदस्त धक्का पहुंचा कि उस के पति केवल सिंह ने उस की अनुपस्थिति में उस की बहन को चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया है.

क्रोधित हो सुगना ने फागुन को बालों से पकड़ कर घसीटा और खदेड़ कर बाहर निकाल दिया. केवल सिंह के ऊपर फागुन का जबरदस्त नशा चढ़ा हुआ था. उसे अपनी नईनवेली पत्नी का अपमान सहन नहीं हुआ. उस ने कोने में  पड़ी हुई  कुल्हाड़ी उठा कर सुगना की टांग पर दे मारी. कुल्हाड़ी मांस फाड़ कर हड्डी के अंदर तक धंस गई. सुगना बेहोश हो कर गिर पड़ी. टांग से बहते खून की धार तथा रोते हुए नवजात शिशु को देख केवल सिंह के मन में पश्चाताप होने लगा. शोरगुल सुन सब पड़ोसी इकट्ठे हो गए. जिस अस्पताल से सुगना थोड़ी देर पहले वापस आई थी फिर वहीं दोबारा भरती हो गई.

केवल सिंह बड़ी लगन से तब तक उस की सेवा करता रहा जब तक वह पूरी तरह स्वस्थ व समर्थ नहीं हो गई. सुगना उस की सेवा से खुश कम थी और दुखी ज्यादा थी क्योंकि केवल सिंह ने फागुन को घर से नहीं निकाला था.

बेचारी दुखी सुगना क्या करती. उस ने अपनी पूरी आशाएं अपने नवजात बेटे पर टिका दी थीं. उस ने निश्चय किया कि वह बेटे को सेना में भरती कराएगी. जब वह लड़ाई में मारा जाएगा तो उसे सरकार लाखों रुपया देगी और उन रुपयों से वह अपनी मालकिनों की तरह ऐशोआराम से रहेगी. इसलिए उस ने अपने बेटे का नाम कारगिल रख दिया. सुगना की विचित्र निष्ठुर कामना सुन कर मिसेज दिवाकर के रोंगटे खड़े हो गए. बड़ा ही क्रूर लगा उन्हें नवजात शिशु को बड़ा कर उस की मौत की कल्पना करना और अपने ऐशोआराम के लिए उसे भुनाना.

थोड़े ही दिन बीते थे कि एक दिन केवल सिंह अपनी नई  पत्नी फागुन के साथ हमेशा के लिए कहीं चला गया. साथ में ले गया अपना नन्हा पुत्र कारगिल. सुगना का धनपति बनने का सपना धरा रह गया. 2 बार ब्याही सुगना फिर से अकेली रह गई थी.

वर्षा के दिन थे. सुगना की टांग का घाव भर गया था, पर दर्द की टीस अब भी उठती थी. पति और उस की सगी बहन ने मिल कर जो छल उस के साथ किया था उस ने उसे अंदर से भी घायल कर दिया था. एक दिन वर्षा में भीगती सुगना जब मिसेज दिवाकर के यहां पहुंची तो उसे तेज बुखार था. अपनी साइकिल बाहर खड़े उन के ड्राइवर को थमा बड़ी मुश्किल से वह बरामदे तक पहुंची ही थी कि गिर कर बेहोश हो गई. जब वह होश में आई तो मिसेज दिवाकर ने अपने ड्राइवर से उस को कार में ले जा कर डाक्टर गर्ग से दवा दिलवा कर घर छोड़ आने को कहा.

आगे की सीट पर बैठी सुगना का सिर निढाल हो कर ड्राइवर गोपी के कंधे पर लुढ़क गया तो उस ने उसे हटाया नहीं. उसे बड़ा भला सा लग रहा था. डाक्टर से दवा दिलवा कर गोपी उस को घर पहुंचाने गया. वहां उस को सहारा दे कर अंदर तक ले गया. इस के बाद भी उस का मन नहीं माना. वह उसे देखने उस के घर बराबर जाता तथा यथासंभव उस की सहायता करता. 3 दिन के बुखार में गोपी और सुगना बहुत करीब आ गए थे. चौथे ही दिन गोपी ने सुगना के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. सुगना सहर्ष तैयार हो गई. गोपी ने उसे चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया.

मिसेज दिवाकर को सुगना का पुनर्विवाह तनिक भी नहीं भाया. वह गुस्से से चीखीं, ‘‘कुदरत तुझे बारबार खराब  पुरुषों से मुक्ति दिलाती है, फिर चैन से अकेले क्यों नहीं रहती? अपनी मां के साथ रहने में तुझे क्या तकलीफ है?’’

सुगना बड़ी सहजता से बोली, ‘‘अकेली औरत जात को कोई तो रखवाला चाहिए.’’

मिसेज दिवाकर ने सुगना की समस्या से अपने को अलग रखने की ठान ली.

एक दिन मिसेज दिवाकर ने सुगना से धुले कपड़ों का गट्ठर इस्तरी वाले के ठेले तक अपनी साइकिल पर रख कर पहुंचाने को कहा. गट्ठर बड़ा होने के कारण साइकिल के कैरियर पर ठीक से नहीं बैठ रहा था. यह देख कर मिसेज दिवाकर बोलीं, ‘‘सुगना, तुझे ठीक से गांठ बांधनी भी नहीं आती. कपड़े बाहर निकल रहे हैं.’’

‘‘मांजी, चिंता मत कीजिए. गांठ लगानी मुझे खूब आती है. मंगल के लिए कैसी मजबूत गांठ लगाई थी मैं ने,’’ अकस्मात सुगना के मुंह से निकला.

ऐसा कहते हुए उस ने आंखें ऊपर उठाईं. उस की आंखों में शैतानी चमक देख कर मिसेज दिवाकर सहम उठीं. अंदर दबा हुआ शक उभर कर ऊपर आ गया था. उन्होंने सोचा, ‘तो मेरा शक सही था. मंगल ने आत्महत्या नहीं की थी. सुगना ने ही उसे मारा था.’

स्तब्ध मिसेज दिवाकर अपना सिर दोनों हाथों में थाम कर सोफे पर धम्म से बैठ गईं.

‘सुगना, हत्यारिन मेरे घर में, और मुझे पता ही नहीं चला.’ सोचसोच कर वह हैरान व परेशान थीं.

उन के शरीर में भय से सिहरन दौड़ गई. अब इतने अरसे बाद किस से कहें और किस से शिकायत करें. अपराधी को अपने दुष्कर्म की सजा मिलनी ही चाहिए. पर उन के पास कोई सुबूत भी नहीं था. था केवल शक. कौन सुनेगा उन के शक को? अगर सुगना को सजा दिलवा भी दी तो उस के बच्चों का क्या होगा? सोचते सोचते उन के सिर में दर्द होने लगा.

और सुगना, अनजाने में अपना अपराध प्रकट कर बैठी थी. अपने अपराध के प्रकटीकरण से बेखबर मिसेज दिवाकर के हृदय की हलचल से अनभिज्ञ बढ़ी चली जा रही थी अपने गंतव्य की ओर. Hindi Story

Hindi Stories: पांव पड़ी जंजीर    

Hindi Stories: सुबह दाढ़ी बनाते समय अचानक  बिजली चली गई. नीरज ने जोर  से आवाजदे कर कहा, ‘‘रितु, बिजली चली गई, जरा मोमबत्ती ले कर आना.’’

‘‘मैं मुन्ने का दूध गरम कर रही हूं,’’ रितु ने कहा, ‘‘एक मिनट में आती हूं.’’

तब तक नीरज आधी दाढ़ी बनाए ही भागे चले आए और गुस्से से बोले, ‘‘कई दिनों से देख रहा हूं कि तुम मेरी बातों को सुन कर भी अनसुनी कर देती हो.’’

खैर, उस समय तो रितु ने नीरज को मोमबत्ती दे दी थी लेकिन नाश्ता परोसते समय वह उस से बोली, ‘‘आप तो ऐसे न थे. बातबात पर गुस्सा करने लग जाते हो. मेरी मजबूरी भी तो समझो. सुबह से ले कर देर रात तक घर और बाहर के कामों में चरखी की तरह लगी रहती हूं. रात होतेहोते तो मेरी कमर ही टूट जाती है.’’

‘‘मैं क्या करूं अब,’’ नीरज ठंडी सांस लेते हुए बोले, ‘‘समय पर आफिस नहीं पहुंचो तो बड़े साहब की डांट सुनो.’’

फिर थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘लगता है, इस बार इनवर्टर लेना ही पड़ेगा.’’

‘‘इनवर्टर,’’ रितु ने मुंह बना कर कहा, ‘‘पता भी है कि उस की कीमत कितनी है. कम से कम 7-8 हजार रुपए तो चाहिए ही. कोई लोन मिल रहा है क्या?’’

‘‘लोन की बात कर क्यों मेरा मजाक उड़ा रही हो. तुम्हें तो पता ही है कि पिछला लोन पूरा करने में ही मेरे पसीने छूट गए थे. मैं तो सोच रहा था कि तुम अपने पापा से बात कर लो….उधार ही तो मांग रहा हूं.’’

‘‘क्याक्या उधार मांगूं?’’ रितु तल्ख हो गई, ‘‘गैस, टेलीफोन, सोफा, दीवान और भी न जाने क्याक्या. सब उधार के नाम पर ही तो आया है. अब और यह सबकुछ मुझ से नहीं होगा.’’

‘‘क्यों, क्या मुझ में उधार चुकाने की सामर्थ्य नहीं है?’’ नीरज बोेले, ‘‘इतने ताने मत दो. आखिर, जो हुआ उस में कहीं न कहीं तो तुम्हारी भी सहमति थी.

‘‘मेरी सहमति,’’ रितु फैल गई, ‘‘मैं जिस प्रकार तुम्हें निभा रही हूं मैं ही जानती हूं.’’

‘‘तो ठीक है, निभाओ अब, कह क्यों रही हो,’’ नीरज गुस्से से उठते हुए बोले.

‘‘मैं तो निभा ही रही हूं. इतना ही गरूर था तो बसाबसाया घर क्यों छोड़ कर आ गए. तब तो बड़ी शान से कहते थे कि मैं अपना अलग घर ले कर रहूंगा. कोई मोहताज तो नहीं किसी का. और अब…मैं पापा से कुछ नहीं मांगूंगी,’’ रितु गुस्से से कहती गई.

‘‘अच्छा बाबा, गलती हो गई तुम से कुछ कह कर,’’ नीरज कोट पहनते हुए बोले, ‘‘अब तक यह घर चला ही रहा हूं, आगे भी चलाऊंगा. कोई भूखे तो नहीं मर रहे.’’

आज सुबहसुबह ही मूड खराब हो गया. अभाव में पलीबढ़ी जिंदगी का यही हश्र होता है. आएदिन किसी न किसी बात पर हमारी अनबन रहती है और फिर न समाप्त होने वाला समझौता. आज स्कूल जाने का रहासहा मूड भी जाता रहा सो गुमसुम सी पड़ी रही. मन में छिपी परतों से बीते पल चलचित्र की तरह एकएक कर सामने आने लगे.

अपना नया नियुक्तिपत्र ले कर आफिस में प्रवेश किया तो मैं पूरी तरह घबराई हुई थी. इतना बड़ा आफिस. सभी लोग चलतेफिरते रोबोट की तरह अपने में व्यस्त. एक कोने में मुझे खड़ा देख कर एक स्मार्ट से लड़के ने पूछा, ‘आप को किस से मिलना है?’

बिना कुछ बोले मैं ने अपना नियुक्तिपत्र उस की ओर बढ़ाया था.

‘ओह, तो आप को इस दफ्तर में आज ज्वाइन करना है,’ कहते हुए वह लड़का मुझे एक केबिन में ले गया और एक कुरसी पर बैठाते हुए बोला, ‘आप यहां बैठिए, मेहताजी आप के बौस हैं. वह आएंगे तो आप के काम और बैठने की व्यवस्था करेंगे.’

मैं इंतजार करने लगी. थोड़ी देर बाद वह लड़का फिर आया और कहने लगा, ‘सौरी, मैडम, मेहताजी आज थोड़ी देर में आएंगे. आप चाहें तो नीचे रिसेप्शन पर इंतजार कर सकती हैं. कुछ चाय वगैरह लेंगी?’

मुझे इस समय चाय की सख्त जरूरत थी किंतु औपचारिकतावश मना कर दिया.

‘आर यू श्योर,’ उस ने चेहरे पर मुसकराहट बिखेर कर पूछा तो इस बार मैं मना न कर सकी.

‘अच्छा, मैं अभी भिजवाता हूं,’ फिर अपना परिचय देते हुए बोला, ‘मेरा नाम नीरज है और मैं सामने के हाल में उस तरफ बैठता हूं. यहां सेल्स एग्जीक्यूटिव हूं.’

नीरज मुझे बेहद सहायक और मधुर से लगे. बस, फिर तो क्रम ही बन गया. हर रोज सुबह नीरज मुझ से मिलने आ जाते या कभी मैं ही चली जाती. इस तरह सुबह की गुडमार्निंग कब और कहां अनौपचारिक ‘हाय’ में बदल गई पता ही न चला.

नीरज का मधुर स्वभाव मुझे अपनी ओर अनायास ही खींचता चला गया. अंतत: इस खिंचाव ने प्रगति मैदान जा कर ही दम लिया. हम दोनों प्राय: इसी मैदान में आते और हाथों में हाथ डाले शकुंतलम थिएटर की फिल्में देखते.

एक दिन मैं ने नीरज से कहा, ‘अब बहुत हो चुकी डेटिंग, नीरज. अब शादी के लिए गंभीर हो जाओ. कहीं किसी ने यों ही देख लिया तो आफत आ जाएगी. आफिस का स्टाफ तो पहले से ही शक करता है.’

‘गंभीर क्या हो जाऊं,’ वह मेरी लटों को संभालते हुए बोले, ‘यही तो दिन हैं घूमने के. फिर ये कभी हाथ नहीं आएंगे. पर तुम शादी के लिए इतनी उत्सुक क्यों हो रही हो? क्या रात में नींद नहीं आती? इतना कह कर नीरज ने मेरा हाथ जोर से दबा दिया. उन का स्पर्श मुझे अभिभूत कर गया. लजा कर रह गई थी मैं. थोड़ी देर के लिए सपनों की दुनिया में चली गई थी. समय का आभास होते ही मैं ने पूछा, ‘क्या सोचा तुम ने?’

‘मुझे क्या सोचना है,’ नीरज थोड़ा चिंतित हो कर बोले, ‘मैं तो तुम्हारे साथ ही शादी करूंगा, पर…’

‘पर क्या?’ उन के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए मैं ने पूछा.

‘मां को मनाने में थोड़ा समय लगेगा. दरअसल, उन्होंने एकदम सीधीसादी सलवारकमीज वाली धार्मिक लड़की की कल्पना की है, जो हमारे घर के पास रह रही है. किंतु वह लड़की मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगती.’

‘फिर क्या होगा?’ मैं ने गंभीर होते हुए पूछा.

‘होगा वही जो मैं चाहूंगा. आखिर रखना तो मुझे है न. तुम चिंता न करो. समय देख कर किसी दिन मां से बात करूंगा, पर डरता हूं, कहीं वे मना न कर दें.’

एक दिन शाम को नीरज अपनी मां से मिलवाने के लिए मुझे ले गए. मेरी नानुकुर नीरज के सामने ज्यादा न चल सकी. कहने लगे, ‘मां को अपनी पसंद भी बता दूं क्योंकि सीधा कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती है. तुम्हें मेरे साथ देख कर शायद बातचीत का कोई रास्ता निकल आए.’

नीरज ने थोड़े शब्दों में मेरा परिचय दिया. मां की अनुभवी नजरों से कुछ भी छिपा न रह सका. नीरज की जिद और इच्छा को देखते हुए मां ने बेमन से शादी के लिए हां तो कह दी किंतु जिस तरह दुलहन को इस घर में आना चाहिए था वह सारी रस्में फीकी पड़ गईं. मेरी सारी सजने- संवरने की आशाएं धरी की धरी रह गईं. मां ने कोई खास उत्सुकता नहीं दिखाई क्योंकि शादी उन की मरजी के खिलाफ जो हुई थी.

कुछ दिन तो हंसीखेल में बीत गए पर हमारा देर रात तक घूमना और बाहर खा कर आना ज्यादा दिन तक न चल सका. मां ने एक दिन नाश्ते पर कह दिया कि हम से देर रात तक इंतजार नहीं किया जाता. समय पर घर आ जाया करो. फिर घर की तरफ बहू को थोड़ा ध्यान देना चाहिए.

इस पर नीरज तुनक कर बोले, ‘मां, इस के लिए तो सारी उम्र पड़ी है. हम दूसरी चाबी ले कर चले जाया करेंगे आप सो जाया करो, क्योंकि पार्टी में दोस्तों के साथ देर तो हो ही जाती है.’

मेरे मन में न जाने क्यों शांत स्वभाव वाले मां और बाबूजी के प्रति सहानुभूति उभर आई. बोली, ‘मां ठीक कहती हैं, नीरज. हम समय पर घर आ जाएंगे. अपनी पार्टियां अब हम वीकेंड्स में रख लेंगे.’

मांजी के व्यवहार में आई सख्ती को मैं कम करना चाहती थी. इस के लिए अपनी एक हफ्ते की छुट्टी और बढ़ा ली ताकि मांजी के व्यवहार को समझ सकूं.

एक दिन नीरज शाम को मुसकराते हुए आए और कहने लगे, ‘रितु, सब लोग तुम्हें बहुत याद करते हैं. देखना चाहते हैं कि तुम शादी के बाद कैसी लगती हो.’

मैं खिलखिला कर हंस पड़ी. मुझे आफिस का एकएक चेहरा याद आने लगा. मैं ने कहा, ‘ठीक है, कुछ दिनों की ही तो बात है. अगले सोमवार से तो आफिस जा ही रही हूं?’

‘‘मांजी पास में बैठी चाय पी रही थीं. बड़े शांत स्वर में बोलीं, ‘बेटा, हमारे घरों में शादी के बाद नौकरी करने की रीति नहीं है. बहू को बहू की तरह ही रहना चाहिए, यही अच्छा लगता है. आगे जैसा तुम को ठीक लगे, करो.’

मां का यह स्वर मुझे भीतर तक हिला कर रख गया था. उन के यह बोल अनुभव जन्य थे. जोर से डांटडपट कर कहतीं तो शायद मैं प्रतिकार भी करती. मुझे मां का इस तरह कहना अच्छा भी लगा और उन का सामीप्य पाने का रास्ता भी.

नीरज फट से बोल पड़े थे, ‘मां, आजकल दोनों मिल कर कमाएं तभी तो घर ठीक से चलता है. फिर यह तो अकेली यहां बोर हो जाएगी.’

‘क्यों? क्या कमी है यहां जो दोनों को काम करने की आवश्यकता पड़ रही है. भरापूरा घर है. तेरे बाबूजी भी अच्छा कमाते हैं. सबकुछ ठीक चल रहा है. हम कौन सा तुम से कुछ मांग रहे हैं,’ मांजी का स्वर तेज हो गया, ‘फिर भी तू बहू से काम करवाना चाहता है तो तेरी मरजी.’

मैं खामोश ही रही. पर इस तरह नीरज का बोलना मुझे अच्छा नहीं लगा था. भीतर जा कर मैं ने नीरज से कहा, ‘नौकरी मुझे करनी है. मांजी को अच्छा नहीं लगता तो मैं नहीं जाऊंगी. बस.’

‘नहीं, तुम नौकरी करने जरूर जाओगी. मैं ने जो कह दिया सो कह दिया,’ नीरज ने कठोर स्वर में कहा.

मन के झंझावात में मैं अंतत: कोई निर्णय नहीं ले पाई. मैं ने हार कर मां से पूछा, ‘मैं क्या करूं, मां?’

‘जो नीरज कहता है वही कर,’ मां ने सीधासपाट सा उत्तर दिया.

उस दिन काम पर तो चली गई किंतु मां के मूक आचरण से एहसास हो गया था कि उन को यह सब ठीक नहीं लगा.

मैं, मां और बाबूजी को खुश करने के लिए हरसंभव प्रयास करती रही. नीरज को भी समझाया कि यह सब उन को ठीक नहीं लगता पर उन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया. क्या पता था कि ऊपर से इतने मृदुभाषी और हंसमुख इनसान अंदर से इतने अस्वाभाविक और सख्त हो सकते हैं.

इस प्रपंच से जल्दी ही मुझे मुक्ति मिल गई. मेरा पांव भारी हो गया और आफिस न जाने का बहाना मिल गया. इस में मां ने मेरी तरफदारी की तो अच्छा लगा.

मुन्ना के होने के बाद तो मांबाबूजी के स्वभाव में पहले से कहीं ज्यादा बदलाव आ गया. आफिस के साथियों ने पार्टी की जिद पकड़ ली तो मैं ने नीरज को कहा कि पार्टी घर पर ही रख लेते हैं. किसी होटल या रेस्तरां में पार्टी करेंगे तो बहुत महंगा पड़ेगा. फिर मां और बाबूजी को भी अच्छा लगेगा. नीरज भी बजट को देखते हुए कुछ नहीं बोले. सारा दिन मैं घर संवारने में लगी रही. मां को घर में आ रहे इस बदलाव से अच्छा लगने लगा था. सारे सामान का आर्डर पास ही के रेस्तरां में दे दिया था.

‘मांजी कहां हैं,’ मेरी एक आफिस की सहेली ने पूछ लिया. मैं मां को बुलाने उन के कमरे में गई तो मां हंस कर बोलीं, ‘मैं वहां जा कर क्या करूंगी. बच्चों की पार्टी है, तुम लोग मौजमस्ती करो.’

‘नहीं, मां, आप वहां जरूर चलो. बस, मिल कर आ जाना…अच्छा लगता है,’ मैं ने स्नेहवश मां को कहा तो मेरा दिल रखने के लिए उन्होंने कह दिया, ‘अच्छा, तुम चलो, मैं तैयार हो कर आती हूं.’

मैं मुन्ने को ले कर ड्राइंगरूम में आ गई. मांबाबूजी अभी ड्रांइगरूम में आए ही थे कि दरवाजे की घंटी बजी. बाबूजी दरवाजे की तरफ जाने लगे तो मैं ने नीरज को इशारा किया.

‘बाबूजी, आप बैठिए. मैं जा रहा हूं. बाजार से खाना मंगवाया है, वही होगा.’

‘अरे, कोई बात नहीं,’ बाबूजी बोले.

‘नहीं, बाबूजी,’ नीरज थोड़ी तेज आवाज में बोले, ‘इसे हाथ न लगाना. इस में चिकन है. बाजार से दोस्तों के लिए मंगवाया है.’

‘नानवैज?’

मां और बाबूजी बिना किसी से मिले चुपचाप अपने कमरे में चले गए. मैं नीरज के साथ उन के पीछेपीछे कमरे तक गई तो देखा, मांजी माथा पकड़ कर एक तरफ पसर कर बैठी कह रही थीं, ‘अब यही दिन देखना रह गया था. जिस घर में अंडा, प्याज और लहसुन तक नहीं आया चिकन आ रहा है.’

‘मां, हम लोग तो खाते नहीं. बस, दोस्तों के लिए मंगवाया था. मैं ने घर पर तो नहीं बनवाया,’ नीरज ने सफाई देते हुए कहा.

मेरा चेहरा पीला पड़ गया था.

‘तुम लोग भी खा लो, रोका किस ने है…मैं क्या जानती नहीं कि तुम लोग बाहर जा कर क्या खाते हो…और अब यह घर पर भी….’ मां सुबक पड़ीं, ‘मेरा सारा घर अपवित्र कर दिया तू ने. मैं अब इस घर में एक पल भी नहीं रहूंगी.’

‘नहीं, मां, तुम क्यों जाती हो, हम ही चले जाते हैं. हमारी तो सारी खुशियां ही छीनी जा रही हैं. मैं ही अलग घर ले कर रह लेता हूं, कहते हुए नीरज बाहर चले गए.

सुबह नाश्ते पर बैठते ही नीरज ने कहा, ‘मां, कल रात के लिए मैं माफी मांगता हूं किंतु मैं ने अलग रहने का फैसला ले लिया है.’

‘नीरज,’ मैं चौंक कर बोली, ‘आप क्या कह रहे हो, आप को पता भी है.’

‘तुम बीच में मत बोलो, रितु,’ वह एकाएक उत्तेजित और असंयत हो उठे. मैं सहम गई. वह बोलते रहे, ‘अच्छा कमाताखाता हूं, अलग रह सकता हूं… अब यही एक रास्ता रह गया है. आप को हमारे देर से आने में परेशानी होती है. यह करो वह न करो, कितने समझौते करने पड़ रहे हैं. मेरा अपना कोई जीवन ही नहीं रहा.’

‘ठीक है, बेटा, जैसा तुम को अच्छा लगे, करो. हम ने तो अपना जीवन जैसेतैसे काट दिया. किंतु इस घर के नियमों को तोड़ा नहीं जा सकता. मन के संस्कार हमें संयत रखते हैं. खेद है, तुम में ठीक से वह संस्कार नहीं पड़ सके. तुम चाहते हो कि तुम्हारे मिलनेजुलने वाले यहां आएं, हुड़दंग मचाएं, खुल कर शराब पीएं और जुआ खेलें…इस घर को मौजमस्ती का अड्डा बनाएं…’ बाबूजी पहली बार तेज आवाज में अपने मन की भड़ास निकाल रहे थे. कहतेकहते बाबूजी की आंखें भर आईं.

मेरे बहुत समझाने के बाद भी नीरज ने अलग घर ले कर ही दम लिया. 2-3 महीने तो घर को व्यवस्थित करने में लग गए पर जब घर का बजट हिलने लगा तो पास के एक स्कूल में मुझे भी नौकरी करनी पड़ी. मुन्ने की आया और के्रच के खर्चे बढ़ गए. असुविधाएं, अभाव और आधीअधूरी आशाओं के सामने प्यार ने दम तोड़ दिया. कभी सोचा भी न था कि मुझ पर दुनिया की जिम्मेदारियां पड़ेंगी. मुन्ने के किसी बात पर मचलते ही मैं अतीत से वर्तमान में आ गई.

एक दिन सुबह कपड़े धोतेधोते पानी आना बंद हो गया. मैं ने उठ कर नीरज से कहा कि सामने के हैंडपंप से पानी ला दो.

‘‘सौरी, यह मुझ से नहीं होगा,’’ उन्होंने साफ मना कर दिया.

‘‘तो फिर वाशिंग मशीन ला दो, कुछ काम तो आसान हो जाएगा,’’ मैं ने उठते हुए कहा.

‘‘मैं कहां से ला दूं,’’ बड़बड़ाते हुए नीरज बोले, ‘‘तुम भी तो कमाती हो. खुद ही खरीद लो.’’

‘‘मेरी तनख्वाह क्या तुम से छिपी है. सबकुछ तो तुम्हारे सामने है. जितना कमाती हूं उस का आधा तो क्रेच और आया में चला जाता है. आनेजाने और खुद का खर्च निकाल कर बड़ी मुश्किल से हजार भी नहीं बच पाता.’’

‘‘कमाल है,’’ नीरज नरम होते हुए बोले, ‘‘तो फिर यह सब पहले मां के घर पर कैसे चलता था.’’

‘‘वहां काम करने वाली आया थी. बाबूजी का सहारा था. कोई किराया भी नहीं देना पड़ता था और उन सब से ऊपर मांजी की सुलझी हुई नजर. वह घर जो सुचारु रूप से चल रहा था उस के पीछे सार्थक श्रम और निस्वार्थ समर्पण था. पर यह सब तुम्हारी समझ में नहीं आएगा क्योंकि सहज से प्राप्त हुई वस्तु का कोई मोल नहीं होता,’’ मैं ने झट से बालटी उठाई और पानी लेने चली गई.

पानी ले कर वापस आई तो नीरज वहीं गुमसुम बैठे थे. उन के चेहरे के बदलते रंग को देखते हुए मैं ने कहा, ‘‘क्या सोचने लगे.’’

‘‘चलो, मां से मिल आते हैं,’’ उन की आंखें नम हो गईं.

अभावों में पलीबढ़ी जिंदगी ने वे सारे सुख भुला दिए जिन के लिए नीरज ने घर छोड़ा था. चिकनआमलेट तो छोड़ उन का दोस्तों के साथ आनाजाना भी कम होता गया. मांजी कभीकभी मिलने चली आतीं और शाम तक लौट जातीं. बस, बंटी हुई जिंदगी जी रही थी मैं.

एक दिन बाबूजी का फोन आया. बोले, ‘‘2 दिन के लिए लंदन वाले चाचा आए हैं. खाना रखा है तुम्हारी मां ने….ठीक समय से पहुंच जाना.’’

‘‘ठीक है, बाबूजी, मैं पूरी कोशिश करूंगी,’’ मैं ने औपचारिकतावश कह दिया.

‘‘कोशिश,’’ वे थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘क्यों, कहीं जाना है क्या?’’

‘‘नहीं, बाबूजी,’’ मैं सुबक पड़ी. मेरे सारे शब्द बर्फ बन कर गले में अटक गए. मैं ने आंसू पोंछ कर कहा, ‘‘हफ्ते भर से इन की तबीयत ठीक नहीं है. दस्त और उलटियां लगी हुई हैं. डाक्टर की दवा से भी आराम नहीं आया.’’

‘‘अरे, तो हमें फोन क्यों नहीं किया?’’

‘‘मना किया था इन्होंने,’’ मैं बोली.

‘‘नालायक,’’ बाबूजी भारीभरकम आवाज में बोले, ‘‘चिंता न करो, मैं अभी आता हूं.’’

थोड़ी देर में मां और बाबूजी भी पहुंच गए. नीरज एक तरफ सिमट कर पड़े हुए थे. मां को देखते ही उन की रुलाई फूट पड़ी. बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘अरे, किसी से कहलवा दिया होता. देख तो क्या हालत बना रखी है. थोड़ा सा भी उलटासीधा खा लेता है तो हजम नहीं होता.’’

बाबूजी भी पास ही बैठे रहे. मैं चाय बना कर ले आई.

मांजी बोलीं, ‘‘चल, घर चल, अब बहुत हो चुका. अब तेरी एक न सुनूंगी. परीक्षा की घडि़यां तो जीवन में आती ही रहती हैं. चंचल मन इधरउधर भटक ही जाता है. कोई इस तरह मां को छोड़ कर भी चला आता है क्या. चल, बहुत मनमानी कर ली.’’

वात्सल्यमयी मां के स्वर सुन कर मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मांजी मेरी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछते हुए बोलीं, ‘‘इस तरह की जिद बहू करती तो समझ में आता. उस ने तो स्वयं को घर के वातावरण के अनुसार ढाल लिया था पर तुझ से तो ऐसी उम्मीद ही नहीं थी. तुझ से तो मेरी बहू ही अच्छी है.’’

‘‘मां, मुझे माफ कर दो,’’ नीरज रो पड़े. उन का रोना मां और बाबूजी दोनों को रुला गया.

‘‘मैं ने दवाई के लिए नीरज को सहारा दे कर उठाया तो बड़े ही आत्मविश्वास से बोले, ‘‘अब इस की जरूरत नहीं पड़ेगी. मां आ गई हैं, अब मैं जल्दी ही अच्छा हो जाऊंगा.’’ मैं मुन्ने को उठा कर सामान समेटने में लग गई. Hindi Stories

बच्चों के फ्यूचर को दांव पर लगाते पेरैंट्स

Children Future: आ ज सोशल मीडिया पर रील्स की दुनिया ने बच्चों की सोच और पेरैंट्स की सोच को काफी हद तक बदल दिया है. पहले जहां ‘पढ़ाई करो, आगे बढ़ो’ सब से बड़ा मंत्र था, वहीं अब ‘वायरल हो जाओ, फेमस हो जाओ’ का ट्रैंड बनता जा रहा है.

सोशल मीडिया पर हमें लाखों फौलोअर्स, ब्रैंड डील्स, पैसा और पहचान दिखती है. इस के पीछे की सच्चाई यह है कि हर 1,000 में से शायद एक ही इंसान सच में बड़ा क्रिएटर बन पाता है. एल्गोरिदम कब बदल जाए, कुछ पता नहीं और आज जो ट्रैंड है, वह कल खत्म भी हो सकता है. ऐसे में पढ़ाईलिखाई छोड़ कर रील्स बनाना कहीं की सम?ादारी नहीं है क्योंकि सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफौर्म है जो एक एल्गोरिदम पर काम करते हैं और आएदिन हर दूसरा इंसान वायरल हो जाता है. ऐसे में आप की दुकान कब बंद हो जाए, कुछ पता नहीं.

सो, पढ़ाई ही ऐसा माध्यम है जिस से आप आने वाले समय के लिए सफलता हासिल कर सकते हैं. इसी बीच कुछ ऐसे पेरैंट्स हैं जो बच्चों को रील बनाने को उकसाते हैं.

इन में कुछ ऐसे बच्चे हैं जिन्हें थोड़ाबहुत खाना बनाना आता है और इसी थोड़ीबहुत स्किल के चलते आज वे सोशल मीडिया पर खाना बनाते दिखते हैं. इन का कंटैंट चलता भी है क्योंकि अकसर बच्चे खाना खाने को ले कर नखरे करते दिखते हैं लेकिन ये तो आप को एक से एक

रैसिपी बनाते दिख जाएंगे. जानें कौन हैं ये किड्स शेफ-

शेफ सभ्य

रील स्क्रौल करते समय अगर शेफ सभ्य के वीडियो सामने आ जाएं तो आप स्क्रौल करना तुरंत बंद कर देंगे. वह एक छोटी सी रसोई में खाना बनाता है. उस की डिशेज बारीकियों और रंगों से भरपूर होती हैं. बिरयानी से ले कर जलेबी से ले कर ?ाटपट बनने वाले स्नैक्स तक, उस का पेज ऐसी रेसिपीज से भरा है.

वह चीजों को इतनी डिटेल से समझता है कि आप का मन भी उस रेसिपी को आजमाने का कर सकता है. शेफ सभ्य

का यह अकाउंट mymom_ taughtmethis   नाम से इंस्टाग्राम पर है जिस में अब तक 3 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं. 1 हजार से ज्यादा पोस्ट हैं. सभ्य की उम्र सिर्फ 11 साल है.

लिटिल शेफ किचा

लिटिल शेफ किचा के पेज पर एक दिन आप को कोई दक्षिण भारतीय डिश देखने को मिल सकती है. किसी और दिन, कोई मिठाई, बेक्ड आइटम या कोई रंगबिरंगा स्नैक हो सकता है. उस के वीडियो हंसमुख और जीवंत होते हैं. वह जो कुछ भी बनाता है उस में एक जिज्ञासा होती है, जो आप को वीडियो देखते रहने के लिए प्रेरित करती है. किचा के इंस्टाग्राम पर लगभग 15,000 फौलोअर्स हैं. क्या इस बच्चे का कैरियर सिर्फ सोशल मीडिया पर सिमट कर रह जाएगा.

गांव का लड़का

इस के वीडियोज देखने पर लगता है कि यह गांव का लड़का है. उस के वीडियो में मसाला मैगी और अचार से ले कर लड्डू और अन्य लोकप्रिय व्यंजनों तक, कई जानेपहचाने, ललचाने वाले और देसी स्वाद से भरपूर व्यंजन दिखाए गए हैं. उस के खाना पकाने के अंदाज में एनर्जी ?ालकती है. उस का खाना रोजमर्रा के स्वाद से प्रेरित होता है. इसी वजह से उस के वीडियो आसानी से देखे और याद रखे जा सकते हैं. उस के इंस्टाग्राम पेज पर 24 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं.

 

मेरा बौयफ्रैंड प्यार करता है, लेकिन शादी के लिए तैयार नहीं

Relationship Confusion: मैं 25 साल की हूं. बौयफ्रैंड और मेरे बीच अच्छी बौन्डिंग है. एकदूसरे से बातें शेयर करना, मिलनाजुलना और एकदूसरे के लिए हमेशा उपस्थित रहते हैं लेकिन एक बात मु  झे काफी परेशान करती है कि वह मु  झ से शादी नहीं करना चाहता.  उस का कहना है कि उस के घर वाले लव मैरिज के लिए नहीं मानेंगे. हालांकि उस का कहना है कि वहमु  झ से प्यार करता है, लेकिन शादी के लिए कभी हामी नहीं भरता. रिलेशनशिप की शुरूआत में ही उस ने मु  झे आगाह कर दिया था लेकिन अब हम इस रिलेशनशिप में काफी आगे बढ़ चुके हैं. मु  झे उस से अटैचमैंट हो चुकी है. क्या करूं?

आप जिस स्थिति में हैं वह बहुत कौमन है. यह स्थिति अंदर से काफी उल  झन और दर्द देने वाली भी होती है. सब से पहले एक बात साफ सम  झ लीजिए, आप का रिश्ता भले ही प्यार, केयर और अटैचमैंट से भरा हो लेकिन अगर उस के अंत में दोनों के लक्ष्य अलग हैं तो यह आगे चल कर आप को ही ज्यादा चोट पहुंचा सकता है.

आप के बौयफ्रैंड ने शुरुआत में ही साफ कर दिया था कि वह शादी नहीं करेगा, यानी उस ने अपनी सीमा पहले ही तय कर दी थी. इस का मतलब यह नहीं कि वह आप से प्यार नहीं करता, लेकिन उस का प्यार आप की उम्मीदों जैसा नहीं है. यहां सब से बड़ा सवाल यह है कि आप क्या चाहती हैं? अगर आप इस रिश्ते को शादी तक ले जाना चाहती हैं तो आप को खुद से ईमानदारी से बात करनी होगी.

अटैचमैंट होना नैचुरल है. सिर्फ अटैचमैंट के कारण ऐसे रिश्ते में बने रहना जहां भविष्य साफ नहीं है, आप को धीरेधीरे इमोशनली थका सकता है. आज आप को लगता है कि वह अच्छा इंसान है, आप को सम  झता है, लेकिन कुछ वर्षों बाद जब वह किसी और से शादी करेगा या यह रिश्ता खत्म होगा, तब यह दर्द कई गुना बढ़ सकता है.

आप के पास 2 रास्ते हैं- पहला, आप इस रिश्ते को वैसे ही स्वीकार करें जैसा यह है यानी बिना शादी की उम्मीद के. लेकिन इस के लिए आप को अपने दिल को तैयार करना होगा कि आगे चल कर यह रिश्ता खत्म भी हो सकता है. दूसरा, आप अपने भविष्य और इमोशनल जरूरतों को प्राथमिकता दें. अगर शादी आप के लिए जरूरी है तो आप को हिम्मत कर के इस रिश्ते से बाहर आने के बारे में सोचना चाहिए, भले ही यह अभी मुश्किल लगे. आखिर में, प्यार सिर्फ साथ बिताए गए अच्छे समय का नाम नहीं है, बल्कि एक सिक्योर और क्लियर फ्यूचर का भी नाम है. आप किसी ऐसे इंसान की हकदार हैं जो सिर्फ आप से प्यार ही नहीं करे, बल्कि आप को अपने जीवन का स्थायी हिस्सा भी बनाना चाहे.

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मेरा बौयफ्रैंड मुझे ले कर बहुत पजैसिव हो गया है

मैं 23 साल की हूं, पिछले 2 वर्षों से रिलेशनशिप में हूं. शुरुआत में सब बहुत अच्छा था, लेकिन अब मेरा बौयफ्रैंड मु  झे ले कर बहुत पजैसिव हो गया है. वह मेरे दोस्तों से मिलने पर सवाल करता है, फोन चैक करना चाहता है और बारबार लोकेशन पूछता है. अगर मैं देर से रिप्लाई करूं तो गुस्सा हो जाता है. वह कहता है कि यह सब वह मेरे प्यार में करता है, लेकिन मु  झे घुटन महसूस होने लगी है. मैं उसे खोना भी नहीं चाहती, लेकिन ऐसे रिश्ते में रहना भी मुश्किल हो रहा है.

प्यार और कंट्रोल में बहुत फर्क होता है. शुरुआत में पजैसिवनैस केयर जैसी लग सकती है, लेकिन जब यह आप की आजादी छीनने लगे तो यह एक रैड फ्लैग बन जाता है. सब से पहले आप को अपने बौयफ्रैंड से खुल कर बात करनी होगी. उसे शांत तरीके से सम  झाएं कि उस का यह बिहेवियर आप को असहज करता है और इस से आप का भरोसा कमजोर हो रहा है. रिलेशनशिप में ट्रस्ट सब से जरूरी होता है. अगर हर बात पर शक और कंट्रोल रहेगा तो रिश्ता धीरेधीरे दम तोड़ने लगेगा. आप को अपने पर्सनल स्पेस की जरूरत है और यह बिलकुल गलत नहीं है. अगर बात करने के बाद भी उस का बिहेवियर नहीं बदलता तो आप को थोड़ा सख्त कदम उठाना पड़ेगा. अपनी सीमाएं तय करें- क्या आप को स्वीकार है और क्या नहीं. अगर वह उन सीमाओं का सम्मान नहीं करता तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या आप ऐसे रिश्ते में लंबे समय तक खुश रह पाएंगी. सही प्यार आप को आजादी देता है, डर या दबाव नहीं.

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मेरी गर्लफ्रैंड इमोशनली बहुत दूर रहती है

मैं 26 साल का हूं और मेरी रिलेशनशिप करीब डेढ़ साल से चल रही है. मेरी गर्लफ्रैंड अच्छी इंसान है, वह मेरा खयाल रखती है, लेकिन वह इमोशनली बहुत दूर रहती है. जब भी मैं अपनी फीलिंग्स शेयर करना चाहता हूं, वह बात को टाल देती है या मजाक में बदल देती है. वह अपने मन की बातें भी कभी शेयर नहीं करती. इस वजह से मु  झे अकेलापन महसूस होता है, जैसे मैं इस रिश्ते में अकेला ही कोशिश कर रहा हूं.

इमोशनल कनैक्शन किसी भी रिश्ते की नींव होता है. अगर आप की पार्टनर अपनी फीलिंग्स शेयर नहीं करती तो इस का मतलब यह नहीं कि वह आप को प्यार नहीं करती. कई लोग स्वभाव से ही अपनी भावनाएं व्यक्त करने में कमजोर होते हैं. सब से पहले आप को उसे जज करने के बजाय सम  झने की कोशिश करनी चाहिए. उस से आराम से बात करें और बताएं कि आप को उस के साथ इमोशनल कनैक्शन की जरूरत है. उसे यह महसूस कराएं कि अपनी फीलिंग्स शेयर करना कमजोरी नहीं, बल्कि रिश्ते को मजबूत बनाने का तरीका है.

आप खुद भी अपनी बातें शेयर करते रहें ताकि उसे धीरेधीरे खुलने में सहजता महसूस हो लेकिन अगर लंबे समय तक कोशिश करने के बाद भी वह बिलकुल नहीं बदलती और आप को लगातार खालीपन महसूस होता है तो आप को अपने बारे में सोचना होगा.

रिश्ता सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एकदूसरे को सम  झने व महसूस करने का भी है. अगर आप को लगातार इमोशनल सपोर्ट नहीं मिल रहा तो यह आप की जरूरतों के खिलाफ है. ऐसे में अपने मन की शांति और खुशी को प्राथमिकता देना जरूरी है. , Relationship Confusion

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सफेद चादर पर काले धब्बे

Suspense Story Hindi: किरपाल की शादी की रात गांव की हवा मिश्री और उल्लास से भरी थी लेकिन नई दुलहन प्रीति के कमरे की हवा में एक अजीब सी गरमी थी. वह खिड़की से बाहर देख रही थी जहां अमन बरगद के पेड़ के नीचे अकेला खड़ा था. उस की निगाहें नीची थीं, मानो वह अपने ही भाई की शादी में शरीक होने का पाप कर रहा हो.

उस रात, जब किरपाल गहरी नींद में सो गया, प्रीति ने अपनी डायरी निकाली. पन्ने पलटे, एक तसवीर निकली अमन की. उस ने उसे चूमा और लिखा : ‘आज मैं ने इस घर में प्रवेश किया. दरवाजा किरपाल ने खोला, पर मंजलि तुम हो, अमन. यह शादी मेरी नहीं, हमारे मिलन की पहली सीढ़ी है. धैर्य रखो, हमारा समय आएगा.’

‘‘तुम यहां क्यों खड़े हो?’’ उधर किरपाल ने पीछे से आ कर अमन के कंधे पर हाथ रखा.

अमन चौंका, ‘‘कुछ नहीं, भैया. बस, तुम्हारी खुशी देख रहा था.’’

‘‘प्रीति को देखा?’’ किरपाल की आंखों में गर्व था, ‘‘सुंदर है न?’’

अमन ने सिर हिलाया, पर उस का गला सूख गया, बोला, ‘‘हां. बहुत.’’

शादी के 2 महीने बाद किरपाल चंडीगढ़ एयरपोर्ट जा रहा था. प्रीति ने उसे दरवाजे तक छोड़ा. ‘‘सावधानी से जाना,’’ उस ने कहा और हाथ उस के गाल पर रखा.

‘‘तुम चिंता मत करो,’’ किरपाल मुसकराया.

प्रीति की आंखों में एक चमक दौड़ गई. ‘‘जल्दी लौटना.’’

वह खिड़की से तब तक देखती रही जब तक कार आंखों से ओ?ाल नहीं हो गई. फिर वह अंदर गई, फोन उठाया और एक नंबर डायल किया.

‘‘हां, वह चला गया अब तुम्हारा काम है इसे पूरा करना.’’

फोन के दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘मैं ट्रक ड्राइवर हूं. ब्रेक फेल होने का नाटक करूंगा. कोई शक नहीं करेगा. पैसे मिल गए हैं.’’

प्रीति ने फोन रख दिया. उस के हाथ नहीं कांप रहे थे. उस की आंखों में कोई पछतावा नहीं था. बस, एक ठंडी काली संतुष्टि थी.

शाम को खबर आई. किरपाल की कार से ट्रक टकराया. कोई बच नहीं पाया.

पूरा गांव स्तब्ध था. प्रीति ने सफेद साड़ी पहनी, सिर के बाल खोले, जोरजोर से रोने लगी. उस का अभिनय इतना प्रभावशाली था कि सब ने सच्चा दुख मान लिया. पर जब रात हुई और सब चले गए तो वह अपने कमरे में गई. दर्पण के सामने खड़ी हो कर उस ने अपने चेहरे पर पड़े आंसुओं के निशान पोंछे और मुसकरा दी.

‘अब तुम मेरे हो, अमन. बस, थोड़ा और इंतजार.’

ट्रक पुराना था और ड्राइवर कुछ तेजी से चला रहा था, इसलिए हादसे को महज एक और मौत मान कर मामला ज्यादा न चला.

किरपाल की तेरहवीं के बाद बलविंदर सिंह ने परिवार को इकट्ठा किया.

‘‘हमारी परंपरा है,’’ उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘बड़े बेटे की मौत के बाद छोटा बेटा विधवा पर चादर डाल कर उसे अपनी पत्नी बनाता है. यह हमारा रिवाज है.’’

प्रीति के पिता दलजीत सिंह आगबबूला हो गए. ‘‘यह कैसा रिवाज है? हमारी बेटी को जिंदा जला देंगे क्या? वह अभी बच्ची है.’’

‘‘यह रिवाज नहीं, गणित है,’’ बलविंदर सिंह ने ठंडे दिल से कहा, ‘‘अगर प्रीति बाहर ब्याही गई तो किरपाल का हिस्सा भी उस के साथ चला जाएगा. खेत बंट जाएंगे. हमारी तीन पीढि़यों की जमीन टुकड़ों में बंट जाएगी. चादर डालने से सबकुछ परिवार के भीतर रहेगा.’’

सुखवंत कौर रो पड़ीं, ‘‘आप लोगों के खेत ही सबकुछ हैं क्या? हमारी बेटी की जिंदगी नहीं?’’

इसी बीच, प्रीति और अमन की मुलाकात गुपचुप तरीके से पीपल के पेड़ के नीचे हुई. चांदनी रात थी, पर दोनों के चेहरों पर छाया थी.

‘‘तुम जानती हो, मैं तुम्हें हमेशा से चाहता था,’’ अमन ने कहा, आवाज कांप रही थी.

‘‘और मैं भी,’’ प्रीति ने कहा, उस का हाथ थाम लिया, ‘‘यह चादर की रस्म, हमारे लिए वरदान है.’’

‘‘पर,’’ अमन ने संकोच से कहा, ‘‘भैया की मौत, वह?’’

‘‘दुर्घटना थी,’’ प्रीति ने तुरंत कहा, उस की आंखों में एक खतरनाक चमक, ‘‘हमें अब आगे देखना चाहिए. हमारा भविष्य.’’

अमन ने सिर हिलाया, पर उस की आंखों में एक सवाल था जो वह पूछ नहीं पा रहा था.

चादर की रस्म का दिन आया. प्रीति ने लाल साड़ी पहनी थी, पर उस के चेहरे पर उदासी का मुखौटा था. अमन हाथ में चादर लिए खड़ा था. उस का सिर शर्म से ?ाका हुआ था.

सुखवंत कौर ने प्रीति को गले लगा लिया, ‘‘नहीं बेटी, मत मान. हम तेरे साथ हैं. हम इन से लड़ेंगे.’’

प्रीति ने आंसू बहाए, ‘‘मां, मेरा समय ही कुछ ऐसा है. मैं मान लेती हूं.’’ यह कह कर वह अंदर चली गई जहां अमन ने चादर उस पर डाली. कपड़े के नीचे, प्रीति ने अमन का हाथ थाम लिया.

एक गुप्त इशारा, ‘हम जीत गए.’

पर वे नहीं जानते थे कि दलजीत सिंह ने उन का वह इशारा देख लिया था और उन के मन में एक शक ने जन्म ले लिया.

दिल्ली के फ्लैट में प्रीति और अमन को आजादी मिल गई थी. पहली रात, प्रीति ने अमन के कमरे का दरवाजा खटखटाया.

‘‘मैं डर रही हूं,’’ उस ने कहा, आंखें नीची किए हुए.

अमन ने उसे अंदर आने दिया. और फिर, सालों के दबे हुए प्यार ने विस्फोट किया. चादर अब उन के प्यार का प्रतीक बन गई थी. उन्होंने मैरिज औफिस से रजिस्टर्ड मैरिज भी कर ली ताकि कोई बाद में आपत्ति न करे. पर खुशियां लंबी नहीं चलीं. एक दिन दलजीत सिंह दिल्ली आए, बिना बताए. जब उन्होंने दरवाजा खोला तो प्रीति और अमन एकदूसरे के गले लगे हुए थे. हंस रहे थे, प्यार में डूबे हुए. दलजीत सिंह का चेहरा पत्थर की तरह सख्त हो गया.

‘‘तो यह सब एक नाटक था?’’ उन की आवाज में गुस्सा और दर्द था, ‘‘तुम दोनों, तुम पहले से ही…’’

‘‘पापा, मैं सम?ा सकती हूं,’’ प्रीति ने कहा, घबराई हुई.

‘‘समझने की जरूरत नहीं,’’ दलजीत सिंह ने कहा, ‘‘मैं सब देख रहा हूं. तुम ने हमारा विश्वास तोड़ा. तुम ने किरपाल के साथ विश्वासघात किया.’’

उसी हफ्ते, बलविंदर सिंह को एक अजनबी का फोन आया.

‘‘मैं वह ट्रक ड्राइवर हूं जिस की गाड़ी आप के बेटे से टकराई थी. मुझे एक औरत ने पैसे दिए थे. उस ने कहा था कि सिर्फ डराना है, मारना नहीं. पर ब्रेक वाकई फेल हो गए थे.’’ बलविंदर सिंह का दिल धक से रह गया. ‘‘उस औरत का नाम?’’

‘‘मुझे नहीं पता. पर वह युवा थी. उस की आवाज में कोई पछतावा नहीं था.’’

बलविंदर ने पूछा, ‘‘इतने दिनों बाद क्यों फोन कर रहे हो?’’ ट्रक ड्राइवर बोला, ‘‘मेरा लाइसैंस जब्त हो गया था और मैं फिर ओडिशा अपने गांव चला गया था.’’

बलविंदर सिंह दिल्ली पहुंचे. सीधे अमन के कालेज गए.

‘‘तुम्हें पता है कुछ?’’ उन्होंने सीधे पूछा.

अमन हैरान, ‘‘किस बारे में पापा?’’

‘‘तुम्हारे भैया की मौत के बारे में. क्या वह सच में दुर्घटना थी?’’

अमन की आंखों में डर दौड़ गया. ‘‘हां, क्यों? आप को क्या लगता है?’’

‘‘मुझे लगता है,’’ बलविंदर सिंह ने धीरे से कहा, ‘‘कि तुम्हारी पत्नी ने उसे मरवाया, तुम्हारे लिए.’’

वह प्रीति से पहले ही प्रेम करता था पर भाई को मरवा कर वह प्रीति से शादी नहीं करना चाहता था. यह शादी उस ने प्रेम और परिवार की चाह के कारण की थी. भाई उसे आज भी याद आता था. अमन का सिर चकराने लगा. उस रात, उस ने प्रीति का सामना किया.

‘‘सच बताओ मुझे. किरपाल भैया की मौत…’’

प्रीति चुप रही. फिर बोली, ‘‘क्या फर्क पड़ता है? वह अब नहीं है. हम हैं. हमारा प्यार है.’’

‘‘फर्क पड़ता है,’’ अमन चिल्लाया, ‘‘अगर तुम ने, अगर तुम ने ट्रक ड्राइवर से उसे मरवाया तो तुम एक हत्यारिन हो.’’

प्रीति की आंखों में आंसू आ गए, पर ये आंसू गुस्से के थे. ‘‘हत्यारिन? मैं? मैं ने तो बस वह पाया जो मेरा था. तुम मेरे थे, अमन. किरपाल सिर्फ एक रुकावट था.’’

उस पल अमन ने प्रीति को देखा – सच्चाई में. और उसे डर लगा. यह वह औरत नहीं थी जिस से वह प्यार करता था. यह एक अजनबी थी. एक खतरनाक अजनबी.

अमन ने प्रीति को छोड़ दिया. वह वापस गांव चला गया. प्रीति अकेली रह गई, उस काले फ्लैट में जहां उस का सपना टूटा था. अब उस के पास किसान की विधवा वाला पैसा भी नहीं था. बलविंदर सिंह ने चादर ओढ़ाने के साथसाथ सारे कागज ठीक करा लिए थे.

एक रात, उसे सपना आया. किरपाल खड़ा था, उस के सामने. उस की आंखों में दर्द था, गुस्सा नहीं.

‘तुम ने मुझे मार डाला, प्रीति,’ वह बोला, ‘पर तुम्हारी हार तो हो गई क्योंकि जिसे पाने के लिए तुम ने यह सब किया, वह भी तुम्हें छोड़ गया.’

प्रीति की आंख खुल गई. वह चीखना चाहती थी, पर आवाज नहीं निकली.

सुबह उठ कर उस ने वह चादर  निकाली लाल रंग की, जरी की कढ़ाई वाली. वही चादर जो उस की शादी में उसे ओढ़ाई गई थी. उस ने कैंची निकाली और एकएक कर के उस चादर के टुकड़े करने लगी. जरी के धागे टूटते गए.

जब सब टुकड़े हो गए तो प्रीति ने उन्हें एक बौक्स में डाला. और उस पर लिखा : ‘एक सपने के अवशेष. जो सपना कभी प्यार था और अब सिर्फ एक चादर के टुकड़े हैं.’ एक साल बाद अमन गांव के स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहा था. वह सुखी था, शांत. उस ने अपने पिता के साथ मिल कर खेतों को बांट दिया था गांव के गरीबों में, परंपरा को तोड़ कर. एक दिन कोरियर एक पार्सल ले कर आया प्रीति की ओर से. इस में वह बौक्स था और एक चिट्ठी.

‘‘अमन,

‘‘मैं जहां हूं, वहां से यह भेज रही हूं. मैं तुम्हें माफ करना नहीं चाहती, क्योंकि मैं अब भी मानती हूं कि प्यार सबकुछ है पर शायद तरीका सही नहीं था मेरा.

‘‘ये चादर के टुकड़े हैं. इन्हें जला देना या फेंक देना.

‘‘तुम्हारी,

प्रीति.’’

अमन ने बौक्स खोला. टुकड़ों को देखा. फिर उस ने उन्हें वापस बौक्स में रखा और अपनी अलमारी के ऊपर रख दिया. उस ने जवाब नहीं लिखा क्योंकि कभीकभी, सब से अच्छा जवाब होता है- चुप्पी. बाहर सूरज डूब रहा था. गांव की गलियों में बच्चों की हंसी गूंज रही थी और अमन ने महसूस किया- कभीकभी, टूटी हुई चीजों से ही नई शुरुआत का रास्ता बनता है.

कुछ प्यार इतने जहरीले होते हैं कि उन से फूल नहीं, काले कांटे ही उगते हैं और कुछ चादरें इतनी भारी होती हैं कि वे प्यार को नहीं, सिर्फ अतीत के भूतों को ढक पाती हैं. प्रीति और अमन की कहानी एक चेतावनी थी- प्यार अगर साजिश बन जाए तो वह प्यार नहीं रहता. वह एक अभिशाप बन जाता है. जो चादर उन्हें जोड़ने आई थी, वही उन्हें हमेशा के लिए अलग कर गई. और शायद, यही थी उन की सच्ची नियति. Suspense Story Hindi

लेखक – नवनीत अरोड़ा

मई सेकंड इश्यू में “आपके अनुभव व पत्र”

आशाजनक अंक

Indian society: अप्रैल (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘आशा भोसले : सुरों से बंधी एक बागी आवाज’ के माध्यम से भारतीय सिनेमा की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका आशा भोसले को करीब से जानने का मौका मिला. लेख के माध्यम से आशा के जीवन से जुड़ी कई ऐसी बातें ज्ञात हुईं जो सिनेप्रेमियों को पहले ज्ञात नहीं थीं.

आशा भोसले कर्णप्रिय आवाज की मल्लिका होने के साथसाथ अपने ग्लैमरस व आइकौनिक अंदाज के लिए भी फिल्म इंडस्ट्रीज में जानी जाती थीं. लता और आशा एक ही परिवार से ताल्लुक रखने के बाद भी गायनशैली की अलगअलग विधा में अपनाअपना महत्त्व रखती थीं. नब्बे के दशक में पश्चिमी सभ्यता की तर्ज पर गाने गा कर आशा गायकों की श्रेणी में एक अलग स्थान पर काबिज हो गई थीं. आशा भोसले जैसी गायिका का अधिकतर जीवन एकाकीपन में गुजरा. यह जान कर थोड़ा स्तब्ध हूं.

इस के अलावा इसी अंक में प्रकाशित दूसरा लेख ‘युवाओं को भा रहीं बड़ी उम्र की महिलाएं’ महिलाओं के मनमुताबिक जिंदगी जीने के अधिकार की पैरवी करता हुआ महसूस हुआ. हमेशा से पुरुषप्रधान समाज ने खुद को किसी भी उम्र में जिंदगी का मजा लेने के लिए स्वतंत्र रखा जबकि औरतों को बेसिरपैर के रीतिरिवाजों के बंधन में जकड़े रखा ताकि औरत ताउम्र उन के पैरों की जूती बनी रहे. समाज ने कभी नहीं चाहा कि औरत पुरुष की बराबरी करे.

औरत को केवल शारीरिक भोग विलास की वस्तु एवं बच्चा पैदा करने की मशीन तक सीमित रखा गया. रहीसही कसर अनंत पौराणिक कपोलकल्पित कहानियों ने पूरी कर दी, जिन में बड़े सुनियोजित तरीके से स्त्री की औकात पुरुष के पैरों की जूती के समान बताई गई है. औरत या पुरुष सभी को मनमुताबिक जीवन जीने का अधिकार है. हमेशा की तरह अन्य स्थायी स्तंभ भी बेहद पसंद आए.    लेखिका – रुचि कश्यप

बच्चों के मुख से

मेरा 7 वर्षीय बेटा प्रांशुल दोपहर में अपनी मिस से पढ़ रहा था. मेरे पति उस दिन घर पर ही थे. उन के सिग्नेचर लेने के लिए उन के औफिस से उन का एक स्टाफ मेंबर आया था. जब वह जाने लगा तो मेरे पति बोले, ‘बौस, चा खेये जा.’ तो वह बैठ गया. उधर प्रांशुल आश्चर्यचकित हो कर अपनी मिस से बोलने लगा, ‘‘मिस, मेरे पापा ही तो बौस (मालिक-1) हैं, फिर उस अंकल को बौस क्यों कह रहे हैं?’’

यह सुन कर उस की मिस, जोकि बंगाली थी, हंसने लगी. हुआ यों कि उस के पापा अपने स्टाफ मेंबर को बोल रहे थे कि, ‘‘बैठो, चाय पी कर जाना.’’ (बौस ‘चा’ खेये जा).

मेरे हाजिरजवाब और तेजतर्रार बेटे ने सोचा कि उस के पापा अपने स्टाफ मेंबर को अपना बौस बोल रहे हैं जबकि यहां ‘बौस’ का मतलब ‘बैठाना’ हुआ. जब उस की टीचर ने हमें बुला कर बताया तो हम भी उस की बालसुलभ जिज्ञासा के कारण हंसे बिना न रह सके.     लेखिका – अंजु सिंगडोदिया  

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