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Satirical Story In Hindi : घूंघट उठाना भी है एक कला

Satirical Story In Hindi : कहावत है कि शादी एक ऐसा लड्डू है, जिसे खाने वाला भी पछताता है और न खाने वाला भी. इसलिए हमारी राय है कि जब दोनों ही सूरत में पछताना है, तो फिर लड्डू क्यों छोड़ा जाए?

अब अगर आप ने शादी करने का फैसला कर ही लिया है, तो हमें आप से पूरी हमदर्दी है और इसी हमदर्दी के तहत हम आप को अपने तजरबों से हासिल किए कुछ टिप्स दे रहे हैं, जिन पर गौर कर आप अपनी दुलहन के मन पर अपनी मुहब्बत की मुहर लगा सकते हैं.

हां यह बात अलग है कि हम अपने तजरबों का फायदा न उठा सके, कम से कम आप ही फायदा उठा सकें तो हमें संतोष होगा.

शादी के बाद दूल्हे के इम्तिहान की पहली घड़ी तब आती है जब सुहागरात में उसे दुलहन का घूंघट उठाना पड़ता है. तो जानिए इस इम्तिहान में अच्छे नंबरों से पास होने के ये टिप्स:

– दुलहन का घूंघट उठाना भी एक कला है और जिस तरह दूसरी कलाओं को साधने के लिए प्रैक्टिस की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह घूंघट उठाने के लिए भी प्रैक्टिस की जरूरत होती है. अब यह प्रैक्टिस किस के साथ करें, यह फैसला तो आप ही कर सकते हैं. हम सिर्फ इतना बता सकते हैं कि घूंघट जरा नजाकत के साथ उठाना सीख लें ताकि ऐन वक्त पर आप के हाथ न कांपने लगें.

– कुछ खूबसूरत शेर याद कर लें, जिन्हें दुलहन के चांद से मुखड़े को देखते ही फटाफट बोलना शुरू कर दें. हां, शेर का मतलब जरूर समझ लें वरना पोल खुलने का खतरा हो सकता है.

– अपने चेहरे पर कम से कम डेढ़ सैंटीमीटर मुसकान जरूर रखें, क्योंकि दुलहन भी तो आप का चेहरा देखेगी.

– दुलहन की सुंदरता की तारीफ करने के लिए कुछ फिल्मी संवाद अच्छी तरह याद कर लें. इन में कुछ सुंदर उपमाओं का होना भी जरूरी है. जैसे चांद सा मुखड़ा, हिरनी सी आंखें, गुलाब की पंखुडि़यों जैसे होंठ, सुराहीदार गरदन, रेशमी जुल्फें वगैरहवगैरह.

– घूंघट उठाने से पहले अपनी आवाज साफ और मधुर रखने की कोशिश करें. आवाज को धीमा और रोमांटिक रखें. हकलाने से काम बिगड़ सकता है.

– घूंघट उठाने में न जल्दबाजी करें और न ही इतनी देर लगाएं कि दुलहन खुदबखुद घूंघट उठा कर कहे, लो देखो मेरा चांद सा मुखड़ा.

– घूंघट उठाते समय अपने चेहरे पर मासूमियत का मुरब्बा चढ़ा कर रखें ताकि दुलहन पहली नजर में ही आप को शरीफ इनसान समझने का धोखा खा जाए.

– दुलहन का चेहरा देखने के बाद उसे कोई न कोई कीमती तोहफा जरूर दें, भले ही आप को इस के लिए दोस्त से रुपए उधार लेने पड़ें.

– दुलहन से बातें करते समय उस के मायके वालों की तारीफ के जितने पुल बांध सकें, बांधें.

– दुलहन के सामने भूल कर भी अपनी प्रेमिकाओं का जिक्र न करें वरना सुहाग की सेज जंग का अखाड़ा बन सकती है.

– दुलहन का हाथ अपने हाथ में ले कर प्यार से चूमें और मन ही मन कामना करें कि यह हाथ कभी बेलन या सैंडल को हथियार न बनाए.

– दुलहन के आगे सिर झुका कर बातें करें. आखिर आगे भी तो आप को ऐसा करना है न.

– दुलहन से चांदतारे तोड़ कर लाने और धरती को आकाश से मिलाने का वादा करें, मगर भूल कर भी साड़ीजेवर दिलाने का ऐसा वादा न करें, जिसे पूरा करने में आप गंजे हो जाएं.

– भले ही आप की जेब का दिवाला निकल चुका हो, मगर दुलहन को यही यकीन दिलाएं कि आप उस की हर फरमाइश पूरी करने की ताकत रखते हैं.

– प्यारमुहब्बत के मामले में खुद को अनाड़ी जाहिर करें ताकि दुलहन की गलतफहमी बनी रहे कि आप उस की मुट्ठी में रहेंगे.

– बातबात पर अपनी जिंदादिली का सुबूत पेश करें, हंसीमजाक से दुलहन का मनोरंजन करें, क्योंकि शायद यह आप के हंसने का आखिरी मौका हो.

– दुलहन की अदाओं पर मरने की ऐक्टिंग करें, बाद में भले ही खुदकुशी का इरादा करना पड़े.

– दुलहन को भविष्य के रंगीन सपने जरूर दिखाएं, चाहे आप के सपने ब्लैक ऐंड व्हाइट भी न रहें.

– दूसरों के सामने खुद को निडर भले ही जाहिर करें, मगर दुलहन के सामने अकड़ने का नाम भी न लें वरना जिंदगी भर अकड़ने की नौबत नहीं आएगी.

– दुलहन को अच्छी तरह यकीन दिला दें कि शादी के बाद आप किसी दूसरी लड़की को आंख उठा कर भी नहीं देखेंगे. आप के सिर और आंखों की सलामती इसी में है.

– अपनी समय की पाबंदी का सुबूत दें ताकि दुलहन समझे कि आप औफिस से सीधे घर ही आएंगे.

– अपनी आदतों के बारे में यही कहें कि आप को झूठ बोलने के अलावा और कोई बुरी आदत नहीं है. यही आप का सब से बड़ा झूठ होगा.

– दुलहन से गाना सुनाने की फरमाइश जरूर करें. अगर वह गाने लगे तो आप झूमने लगें, लेकिन गलती से भी संगीतप्रेमी बनने की कोशिश न करें वरना रात भर गाने सुनने पड़ सकते हैं.

– हो सके तो अपने घर वालों की बुराई करें ताकि दुलहन आप को अपना सच्चा हमसफर समझे.

– दुलहन के लाख पूछने पर भी अपनी असली आमदनी बताने की भूल न करें वरना सारी जिंदगी उस के सामने हाथ फैलाना पड़ेगा. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : अब पछताए क्या होत – बाबा बनने का हुनर

Satirical Story In Hindi : उस दिन कई दिनों बाद थोड़ी गुनगुनी धूप निकली हुई थी. सर्दी के मौसम में गुनगुनी धूप और वह भी शनिवार को जब आस्ट्रेलिया में सभी व्यापारिक संस्थान बंद होते हैं, सोने पर सुहागा वाली बात थी.

मैं अवकाश का आनंद लेने किलडा बीच पर चला आया था. काफी देर तक वहां प्राकृतिक दृश्यों का लुत्फ लेता रहा. कुछ ऐसे नजारे भी देखे जो विदेशों में ही देखे जा सकते थे. उस के बाद मैं लूणा पार्क चला आया था. दोपहर के बाद फलिंडर स्ट्रीट स्टेशन के निकट भारतीय रैस्टोरैंट फलोरा में खाना खाने के पश्चात सराइन आप रिमैंबरेंस चला गया और वहां काफी देर बैठा रहा.

जब घर लौटा तो आंसरिंग मशीन और मेरे मोबाइल पर भी एक मित्र के कई संदेश आए हुए थे.

मैं ने तुरंत उस का नंबर डायल किया. उस ने फोन उठाते ही गुस्से से कहा, ‘‘कहां गायब हो गया था सुबह से? मैं तो फोन करकर के थक गया. तुम तो मोबाइल भी नहीं उठा रहे थे.’’

‘‘सौरी यार,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं मोबाइल घर पर ही भूल गया था.’’ उस से मैं ने कह तो दिया लेकिन वास्तव में मैं स्वयं ही जानबूझ कर मोबाइल घर छोड़ गया था. वास्तव में मैं शांति से दिन गुजारना चाहता था.

मेरे यह पूछने पर कि कैसे याद किया, उस ने अत्यंत प्रसन्नता से बताया, ‘‘ओह यार, आजकल इंडिया से अपने गुरु महाराज आस्ट्रेलिया आए हुए हैं. कल वे हमारे घर पर प्रवचन करेंगे. तुम अवश्य आना.’’

‘‘यार, मुझ से कहां आया जाएगा?’’

‘‘क्यों, तुम्हारे क्या पैर भारी हैं?’’

‘‘तुम जानते तो हो, मेरी धार्मिक कार्यों में…’’

‘‘दिलचस्पी नहीं,’’ उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘‘वाइन की तो पूरी बोतल डकार जाता है मगर धार्मिक कार्यों के नाम पर तुम्हारे पेट में मरोड़ उठने लगती है.’’ उस ने अपनत्व की भावना से आगे कहा, ‘‘ज्यादा इधरउधर की मत हांक… और हां, आते हुए बेबी तथा उस के बच्चों को भी साथ ले आना. जीजाजी तो सिडनी गए हुए हैं.’’

लो, एक और मुसीबत गले पड़ गई. मेरे घर से मैलटन, जहां उस की बहन बेबी रहती है, कम से कम 45 किलोमीटर दूर होगा. पहले तो शायद न जाता, मगर अब तो उस की बहन और बच्चों को भी साथ ले कर जाना पड़ेगा. फोन पर मेरी ओर से कोई जवाब न मिलने पर वह बोला, ‘‘क्या हुआ, मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही है?’’

‘‘अरे, सुन रहा हूं भई, निश्ंिचत रह, मैं बेबी तथा बच्चों को साथ ले आऊंगा.’’

‘‘यार, तुम से एक और रिक्वैस्ट है,’’ उस की आवाज अत्यंत हलीमीभरी थी, ‘‘गुरु महाराज को 100 डौलर से कम दक्षिणा मत देना.’’

‘‘अरे, यह भी कोई कहने वाली बात है,’’ मैं ने तुरंत कह तो दिया, लेकिन मन ही मन यह अवश्य सोचा था कि यहां डौलर छापने की मशीन तो नहीं लगी हुई है. इसे क्या मालूम कि ट्रेन के किराए

के 5-6 डौलर बचाने के लिए मैं 5 किलोमीटर की दूरी पर अपने इंस्टिट्यूट तक प्रतिदिन पैदल आताजाता हूं.

खैर, मैं उस के घर चला गया, वहां उस के कई रिश्तेदार तथा परिचित आए हुए थे.

मैं ने धीरे से 50 डौलर महाराज के सिंहासन के सामने पड़ी थाली में डाल कर माथा टेक दिया, लेकिन अगले ही पल हिसाब भी लगा लिया कि भारतीय करैंसी में कितने रुपए बन गए तथा मन ही मन अपनेआप को कोसते हुए तथा मित्र को भी एक भद्दी सी गाली निकालते हुए कहा, ‘ससुरे ने अढ़ाईतीन हजार रुपए का नुकसान करवा दिया.’

गुरु महाराज प्रवचन देने लगे. उन का एकएक बोल मनमंदिर के किवाड़ खोल रहा था. चांदी जैसे उज्ज्वल वस्त्रों से सुशोभित वे किसी देवर्षि की तरह लग रहे थे. सचमुच ही ऊपर वाले ने इन महापुरुषों को कोई विशेष गुण दिया होता है. मगर गुरु महाराज की ओर देखते हुए यों प्रतीत हो रहा था मानो वे मेरे परिचित हों, लेकिन यह मेरे मन का वहम हो सकता था, क्योंकि मैं तो इंडिया में रहते हुए भी कभी किसी धार्मिक सम्मेलन में नहीं गया था.

महाराज को चढ़ावा भी काफी चढ़ गया था. घर वालों ने भी सोने की मोटी चेन, हाथ का कड़ा तथा डौलरों से भरा लिफाफा उन के चरणों में रख दिया था. तदोपरांत लंगर छक कर संगत चली गई थी.

महाराजजी से परिचय करवाने के लिए मेरा मित्र मुझे उन के निकट ले गया. मगर उस की बात पूरी होने से पहले ही महाराज बोल पड़े थे, ‘‘मैं जानता हूं इन्हें, डा. शुक्ला हैं. समाचारपत्रों में अकसर मैं इन के बारे में पढ़ता रहता हूं.’’ और उन्होंने मुझ से पूछा, ‘‘तू ने पहचाना नहीं मुझे? मैं रमेश हूं, मेछी?’’ और उन्होंने मुसकराते हुए मेरे मित्र से परदाफाश कर दिया, ‘‘यह तो मेरे साथ ही गांव के स्कूल में पढ़ा करता था.’’

पलभर में ही चलचित्र की रील की तरह सबकुछ मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था. तभी तो महाराज का चेहरा मुझे इतना जानापहचाना लग रहा था.

हम दोनों गांव के राजकीय स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे. वह पढ़ाई में नालायक विद्यार्थियों जैसा था, लेकिन बातचीत में इस कदर शातिर था कि आसमान को भी पैबंद लगा देता था. वह इस प्रकार की दलीलें देता कि झूठ भी सच साबित हो जाता था. हमारे अध्यापक अकसर उस से कहा करते थे कि तू इतना चालाक है कि बड़ा हो कर लीडर बनेगा. स्कूल में पढ़ते समय ही वह देसी शराब और सिगरेट भी पीता था.

मुझे अभी तक याद है कि कैसे उस ने एक बार मुझे पीटा था और मुख्य अध्यापक से भी मेरी पिटाई करवाई थी. स्कूल के निकट ही साइकिल पर तिनके वाली कुल्फी बेचने वाला आया करता था. एक टके (2 पैसे) की एक कुल्फी. मेछी (रमेश) ने मुझ से कुल्फी ले कर देने को कहा था. मैं ने मना कर दिया तो उस ने मुझे 3-4 थप्पड़ रसीद कर दिए. मैं ने उसी समय मुख्य अध्यापक से उस की शिकायत कर दी. उन्होंने झटपट उसे बुला लिया. लेकिन मेछी ने सरासर झूठ बोलते हुए पासा ही पलट दिया, ‘सर, यह बिना किसी बात के मुझे गालियां दे रहा था. मुझे क्रोध आ गया और तब मैं ने इस के 2-4 चांटे लगा दिए.’’ मुख्य अध्यापक ने उस की बात पर विश्वास करते हुए 2-3 थप्पड़ मारते हुए मुझे डांटा, ‘‘एक तो गालियां बकता है और फिर शिकायत भी करता है.’’

और तभी उन्होंने झट से मेछी को आदेश दे डाला, ‘‘लगा इस के दोचार थप्पड़ और.’’ मेछी ने फिर मेरे चांटे मार दिए. मैं स्तब्ध सा मुख्य अध्यापक के कार्यालय से जब बाहर आया तो मेछी ने पहले से भी ज्यादा अकड़ कर कहा, ‘‘अब कुल्फी ले कर देगा या तेरी और करवाऊं पिटाई.’’

….और आज वही मेछी मेरे सम्मुख सिंहासन पर विराजमान है.

गुरु महाराज से बहुत सारी बातें हुईं. उन के अमेरिका, कनाडा, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में आश्रम भी थे और उपासक भी. मेरे आकलन के अनुसार, उन के पास करोड़ों की संपत्ति तो अवश्य होगी.

घरपरिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने मुसकराते हुए कहा था, ‘साधुसंतों का परिवार तो उन के शिष्य होते हैं. यही लोग हमारा परिवार हैं तथा समाज भी.’

गुरु महाराज तो शाम की फ्लाइट से अपने भक्तों से मिलने के लिए ब्रिसबेन चले गए थे मगर मेरे मन की यादों की पिटारी खोल गए थे.

मैं बचपन से ही संगीतप्रेमी था और नाटकों में अभिनय भी किया करता था. गाना गाने के लिए स्कूल की ओर से हमेशा मुझे ही भेजा जाता था. और मैं हर बार कोई न कोई पुरस्कार प्राप्त करता था.

कहीं भी ढोल बजने लगता तो स्वयं ही मेरे पैर थिरकने लग जाते.

हमारे गांव से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव में मजार है. कुछ लोग अपने कष्ट दूर करने के बहाने वहां जाते थे. जिन लोगों में पीर की ‘हवा’ आती थी, वे वहां ‘खेलने’ (झूमने) लगते थे. वहां यह मान्यता भी थी कि लगातार 5 बार वहां जाने से मनोकामना पूरी हो जाती है.

मैं भी प्रत्येक वीरवार ऊबड़खाबड़ और कंकड़ोंभरे रास्ते पैदल चल कर वहां जाता था. मगर शायद मेरी भावना में स्वार्थीपन अधिक तथा श्रद्धा कम थी. लेकिन लगातार 5 बार जाने के बावजूद मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई थी. आप यह भी जानना चाहोगे कि मैं वहां क्या मांगता था. वास्तव में मैं वहां जा कर हर बार यही प्रार्थना किया करता था कि पीर मुझे भी ‘खेलने’ में लगा दे.

लेकिन मेरी ख्वाहिश मन में ही रह गई थी.

गांव में एक कुम्हारों यानी मुसलमानों का घर था. अब तो पूरी तरह याद नहीं कि  वे लोग कुम्हार थे या मुसलमान. वर्षों पुरानी बात है. उन के परिवार के सदस्यों में पीर की ‘हवा’ आती थी. वे लोग वीरवार वाले दिन शाम को ढोल बजाने लगते तथा कुछ समय बाद उन के परिवार का कोई सदस्य ‘खेलने’ लग जाता और अपने शरीर पर ‘छेंटे’ मारने लगता.

मैं कभीकभी उन के घर चला जाता था. वे लोग खुले आंगन में ढोल बजा कर ‘खेलते’ थे. लेकिन एक बार न जाने क्या हुआ. कुछ पता ही न चल पाया कि  कब ढोल की थाप मुझ पर हावी हो गई थी और मैं भी ढोल की थाप के साथसाथ झूमने लगा था. उन्होंने मुझे ‘छेंटा’ पकड़ा दिया और मैं ‘छेंटे’ से अपने शरीर पर वार करने लगा था तथा जैसे वे बोलते गए वैसे ही हक, हक… कहता रहा.

मगर शीघ्र ही यह खबर मेरे घर खबर पहुंच गई थी. मेरे घर वाले कुम्हारों को भलाबुरा कहते हुए मुझे घसीटते हुए ले गए थे. घर वालों ने मेरी धुनाई भी कर डाली थी और स्वयं भी बहुत परेशान हुए थे.

जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी कि मुझे भी असर हो गया है और मुझ में भी हवा आने लगी है.

एक दिन शाम को मैं बंजर जमीन की ओर जा रहा था. गांव की एक महिला ने मुझे रोक कर मेरे पांव छुए और गोद में उठाए हुए बालक की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘जी, कहते हैं इस पर किसी प्रेत का साया है. दिनभर रोता रहता है. आप कोई उपाय बताइएगा.’

और मैं ने भी झट से यों कह दिया जैसे मैं तंत्रविद्या में निपुण था. ‘इस के सिर के ऊपर से कलौंजी घुमा कर पक्षियों को डाल देना, शीघ्र ही ठीक हो जाएगा.’

वास्तव में उस महिला के पूछने पर तुरंत ही मुझे कुछ याद आ गया था. एक बार मेरी माताजी ने किसी साधु से मेरे बारे में पूछा था तो उस ने यह उपचार बताया था.

मुझ में हवा आने की खबर हमारे गांव से शीघ्र ही निकटवर्ती गांवों में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. उस महिला की तरह और भी कई लोग अपने दुखों के समाधान के लिए मेरे पास आने लगे थे. दिमाग तो मेरा पहले से ही तेज था. मैं घरपरिवार में सुने टोटके और साथ ही अंधविश्वास से जुड़े ढंग भी बता देता था.

एक बार मैं कुबैहड़ी गांव जा रहा था. एक महिला अपने पोते को मेरे पास ला कर बोली, ‘महाराज, यह कुछ भी खातापीता नहीं है. दूध तो बिलकुल भी नहीं पीता. पहले तो पूरी बोतल पी जाता था. मुझे शक है कि मेरी बड़ी बहू ने इस के लिए टोना कर दिया है.’

मैं ने मस्तिष्क पर बल डाला तो मुझे शीघ्र ही याद आ गया कि जब मेरे छोटे भाई को भूख नहीं लगती थी तो एक हकीम ने बताया था कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डुबो कर उस दूध को पिलाना  चाहिए. मैं ने भी वही नुस्खा उसे बता दिया. और साथ में यह भी बोल दिया कि इस के गले में सुराख वाला तांबे का सिक्का काले धागे में डाल कर बांध देना.

संभवतया मेरी ख्याति और फैल जाती, अगर भेद न खुलता. दरअसल, उस औरत के बच्चे को भूख लगने लगी थी और वह खुश हो कर दूध की गड़वी तथा गुड़ का बड़ा सा ढेला मेरे घर दे गई थी, क्योंकि मेरे बतलाए उपाय से उस का पोता ठीक हो गया था.

एक वैज्ञानिक होने के नाते अब मैं स्पष्टीकरण दे सकता हूं कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डालने से उस दूध में खनिज पदार्थ लोहे की मात्रा बढ़ गई होगी और बच्चे की रक्ताल्पता (अनीमिया) में सुधार आ गया होगा. बाकी सब तो अंधविश्वास की बातें थीं जिन के बिना लोगों की संतुष्टि नहीं होती.

घरपरिवार में पता चलते ही मेरी खूब पिटाई हुई थी. पिताजी चीखचीख कर पूछ रहे थे, ‘तू कब से सयाना बन कर लोगों को उपाय बताने लगा है.’ उन्होंने मुझे गांव से निकाल दिया और लुधियाना पढ़ने भेज दिया. मैं बस डिगरियां ही प्राप्त करता रहा और एक वैज्ञानिक बन गया. अब तो सेवानिवृत्त भी हो चुका हूं.

….और आज गुरु महाराज से मिल कर सबकुछ याद आने लगा था, लेकिन मेरे मन में यह विचार भी बारबार कौंधता रहा कि इतनी उपाधियां प्राप्त कर के और अंतराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक बन कर मुझे क्या मिला. 34-35 वर्ष की नौकरी के उपरांत सेवानिवृत्त होने पर जितनी राशि मुझे मिली थी उतनी तो गुरु महाराज ने आस्ट्रेलिया के एक फेरे में ही बना ली होगी. फिर उन की और भी कई प्रकार की सेवाएं होती होंगी.

मुझे पछतावा होने लगा था. इस से तो अच्छा होता गांव में ही रहता. मेरी तो उन दिनों भी काफी ख्याति हो गई थी. अब तक मेरे भी कई बंगले व आश्रम बन जाते तथा करोड़ों में बैंक बैलेंस होता. मगर अब तो बहुत देर हो चुकी है. अब तो मेरा मन भी बारबार यही कह रहा है, अब पछताए क्या होत. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : प्याज के आंसू – जब प्याज खरीदने के लिए लगी लंबी कतार

Satirical Story In Hindi : प्याज खरीदने की लंबी कतार में लगे हुए 2 घंटे से ज्यादा का समय बीत चुका था, पर बढ़ती महंगाई की तरह यह लाइन भी दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. किसकिस लाइन में लगे जनता? बिजली का बिल जमा करने, राशन की दुकान, रेल का टिकट, बैंक का काउंटर और सरकारी अस्पतालों की बिना बेहोशी की दवा के बेहोश करने वाली कतारें. सच, नानी याद दिला देती हैं. खैर, लाइन आगे बढ़ी. मुश्किल से 10 लोग अपने मकसद से दूर रह गए. मुझे संतोष हुआ कि चलो अब मंजिल दूर नहीं है कि तभी अचानक स्टे और्डर सा लग गया.

मालूम हुआ कि प्याज का स्टौक खत्म हो गया है. दूसरा स्टौक आने में कुछ देर लग जाएगी. तभी एक सज्जन ने हद कर दी. उन्होंने ‘हद है भैया’ कहते हुए मेरी ओर पान की पीक थूक दी, तभी आगे से एक वाक्य उछल कर मेरे कानों से टकराया, ‘अरे, आप धक्का क्यों दे रहे हैं?’

जवाब आया, ‘मैं ने कोई धक्का नहीं दिया. आप ने इतनी जोर से मेरे पेट में कुहनी मारी कि मैं गिरतेगिरते बचा.’ यह तो अच्छा हुआ कि इस धक्कामुक्की में मेरी जगह नहीं गई. इसी शोरशराबे में मेरा नंबर आ गया. मैं झपट कर पहुंचा तो देखा कि काउंटर पर निर्धन के धन की तरह मुश्किल से पावभर प्याज पड़े थे. मरता क्या न करता, प्याज के आंसू रोते हुए मैं ने झोला आगे कर दिया. आज समझ में आया कि प्याज के आंसू किसे कहते हैं. जो खरीदने से ले कर पकाने तक में सौसौ आंसू गिरवाते हैं.

प्याज खरीद कर मैं ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया. घर की घंटी बजाने से पहले ही पत्नी ने सजग द्वारपाल की तरह ऐसे दरवाजा खोल दिया, जैसे वह पहले ही से दरवाजे पर कान लगाए बैठी थी. ‘‘लो, अब तो खुश हो जाओ,’’ कहते हुए मैं ने झोला पत्नी की ओर बढ़ा दिया और मासूम सी एक मुसकान के साथ उन की ओर देखने लगा.

लेकिन पत्नी ने झोला वापस लौटाते हुए पटक दिया. 2-4 प्याज लुढ़क कर मानो मेरी ओर देखने लगे. जैसे वे कह रहे हों कि क्या बेइज्जती करवाने के लिए तुम हमें यहां लाए थे? इस से अच्छे तो हम कालाबाजारियों के यहां थे. कम से कम बोरों में बंद दूसरे साथियों के साथ सारा दिन गपशप तो होती रहती थी. ठंडीठंडी कूलिंग का मजा अलग था, वरना इस 48 डिगरी टैंपरेचर में क्या हाल होता है, जनता खूब जानती है.

दरअसल, कुछ चीजें ऐसी हैं, जो केवल और केवल जनता के ही हिस्से में आती हैं, जैसे बिन बिजली, बिन पानी सब सून. बिन सड़कें, बिन भ्रष्टाचार जीवन बेकार. बिन महंगाई, जीवन धिक्कार. अहिंसा, परमो धर्म’, ‘संतोषी सदा सुखी’. ‘न बुरा देखो, न बुरा सुनो, न बुरा कहो’. इसी में आम जनता का पूरा जीवन दर्शन छिपा है. जो इन को अपना ले, समझ लीजिए कि उस के सारे दुख खत्म हो गए. पता नहीं, लोग क्यों हर चीज के लिए इतना होहल्ला मचाते हैं? क्या मिट्टी के तेल के लिए लाइन लगाना कोई गुनाह है? आखिर बिजली के जन्म के पहले भी तो आप वहां लाइन लगाते ही थे. पहले भी तो लकड़ी के चूल्हों पर ही खाना बनता था, जो आज से कहीं ज्यादा स्वादिष्ठ और सेहतमंद होता था.

इस बात को मानने से बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी इनकार नहीं कर सकता, तो क्यों भैया इस के लिए झींकते हो? 2-4 घंटे खड़े रहोगे, तो तुम्हारे पैर नहीं टूट जाएंगे. अनुशासन मुफ्त में सीखने को मिल रहा है, जो और जगह लाइन लगाने में काम आएगा. तभी श्रीमतीजी की मधुर आवाज कानों में पड़ी, ‘‘सुनते हो, खाना ले जाओ.’’

मैं विचारों से बाहर निकला और झट से थाली थाम ली. देखा तो रोटियों के साथ आधा कप प्याज खींसें निपोर रहे थे. पहला कौर खाया कि कमबख्त प्याज का तीखापन फिर आंसू रुला गया. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : शादी का पहाड़ा जो कोई बांचे

Satirical Story In Hindi : वे काफी देर तक ऐसे बैठे रहे, जैसे रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए हों. उन्हें झकझोरा गया, तब बड़े अफसोस के साथ उन्होंने आहिस्ता से अपना सिर हिलाया. गहरे कुएं से आती हुई आवाज में वे बोले, ‘‘अच्छे दिनों के हल्ले में कैसे बुरे दिन आ गए हैं कि अभी एक दुलहन ने विवाह मंडप में शादी करने से इसलिए इनकार कर दिया, क्योंकि दूल्हा 15 का पहाड़ा नहीं बोल पाया. लाख मिन्नतों के बावजूद दूल्हे को बैरंग लौटना पड़ा.’’

‘‘यह कहो न कि सेर को सवा सेर मिलने की टीस है. इसे ही अच्छे दिन कहते हैं कि आज की लड़कियां होने वाले पति के हिसाबकिताब करने की ताकत को चैक कर रही हैं, वरना अभी तक तो मर्द ही औरत के हुनर का इम्तिहान लेता आया है,’’ मैं ने इतना कहा, तो उन्होंने मुझे यों घूरा, जैसे वह ठुकराया हुआ दूल्हा मैं ही होऊं. वे मुझे नीचे से ऊपर तक घूरते हुए बोले, ‘‘चलो, एकबारगी बोल भी देता तो क्या, सारे पहाड़े तो वैसे भी शादी के बाद भूल जाने थे.’’

‘‘लगता है कि एक दुलहन द्वारा ठुकराए जाने पर तुम्हारे जैसे मर्दों की मर्दानगी को ठेस पहुंची है.’’ ‘‘देखो, तुम मुझे गलत समझ रहे हो. दरअसल, बात यह है कि…’’

बात को बीच में ही काटते हुए मैं ने टोका, ‘‘तो तुम क्या समझाना चाहते हो? हम जब कोई सामान खरीदते हैं, तो पहले अच्छी तरह ठोंकबजा कर देखते हैं कि नहीं? वैसे भी यह तो होना ही था. बैरंग लौटने वालों की फेहरिस्त अब बढ़ती ही जा रही है. ‘‘अभी पिछले दिनों एक दूल्हे ने वरमाला डालते समय गरदन नहीं झुकाई, तो दुलहन ने उसे चलता कर दिया. एक दूल्हे के मुंह से शराब की गंद आई, तो फेरे उलटे पड़ गए.

‘‘इस से भी आगे बढ़ते हुए एक दूल्हे ने दुलहन की सहेलियों पर थोड़ा बेहूदा कमैंट कर दिया, बस फिर क्या था. दूल्हे को कमैंट करना ही भुला दिया गया, इसलिए यह वक्त चोट खाए जख्मों को सहलाने का नहीं, बल्कि सोचनेविचारने का है.’’

वे रोंआसे हो गए और अफसोस में सिर हिलाते हुए बोले, ‘‘काश, किसी ने मुझ से भी शादी के वक्त पहाड़ा बुलवाया होता.’’

‘‘अगर बुलवाया होता, तो आप तो फर्राटे से पहाड़ों के पहाड़ पर चढ़ जाते. शादी का लड्डू जो खाने को बेताब थे,’’ मैं ने मजाकिया लहजे में कहा. मेरे दोस्त खिसियानी हंसी हंसते हुए कहने लगे, ‘‘बात तो तुम्हारी सच है, लेकिन क्या है कि हम गणित में बचपन से ही कमजोर थे. किसी तरह बोर्ड का वाघा बौर्डर पार कर पाए थे. हमारी किस्मत ही खराब थी, जो किसी ने मंडप में हम से पहाड़ा नहीं बुलवाया, वरना हम तो वहीं फेल हो जाते. फिर ताउम्र जिम्मेदारियों के पहाड़े रटने से छुटकारा पा जाते और इस तरह अच्छीखासी जिंदगी पहाड़ा नहीं होती.’’

उन के दर्द का समंदर जैसे बह निकला था. वे कहते गए, ‘‘सारी उम्र रिश्तों के फौर्मूले सुलझाने में गुजार दी, मगर जोड़ हमेशा गलत ही बैठा. किसी ने सही कहा है कि शादी चार दिन की चांदनी है, फिर अंधेरी रात है. चमकता जुगनू है, जिस की कुछ पलों की चमक अच्छी लगती है.’’ ‘‘दोस्त, नर हो न निराश करो मन को… धीरज धरो. वैसे, तुम क्या समझ कर शादी के झाड़ पर चढ़े थे?’’

‘‘काहे के नर, बस वानर समझो, जिन के हिस्से में उछलकूद है. किसी शायर ने सही कहा है, ‘शादी आग का दरिया है और डूब के जाना है’. कई लोग यह कह कर उकसाते पाए जाते हैं कि ‘जो डूबा सो पार गया’, लेकिन यहां जो डूबा, फिर क्या खाक उबरा. ‘‘शादीशुदा जिंदगी नदी के दो किनारों की तरह है, जो जिंदगीभर मिलने की कोशिश करते हैं, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी मिल नहीं पाते हैं. शादी धरती व आसमान का वह किनारा है, जिस में सिर्फ मिलने का भरम है. पास जाओ, तो सबकुछ साफ है.’’

‘‘दुखी आत्मा, जिसे तुम आग का दरिया कह रहे हो, वह शादी नहीं इश्क है. दो किनारों की खूबसूरती इसी में है कि वे तमाम उम्र चाहत, जुनून और जोश के साथ मिलने की कोशिश में लगे रहें. इस से उन का आपसी खिंचाव बना रहता है.’’ ‘‘यह शादी का दार्शनिक पक्ष है जनाब, हकीकत इस के उलट है. यह ऐसा लड्डू है, जिसे देशी घी के भरम में बड़े चाव से मुंह में डालते हैं और वैजीटेबल घी से ठग लिए जाते हैं. वैसे, इश्क हो तो आग का दरिया क्या, तलवार की धार पर भी दौड़ जाएं. मेरा तो इतना कहना है कि शादी सुख का विलोम है,’’ वे बोले.

‘‘यदि यह विलोम है, तो अनुलोम का अभ्यास कर के इसे एक लय देनी चाहिए. वैसे, अनुलोमविलोम से एक लयकारी, संतुलनकारी रिद्म बनती है. शादी एक अनुशासन पर्व है, सुव्यवस्थित जीवनशैली का नाम है. लेकिन मर्दों के लंपट मन को अनुशासन में बांधना शेरों को ब्रश कराने से कम नहीं है. कोई कोशिश कर ले, तो तिलमिला जाते हैं. सबकुछ छूट रहा है, मगर हेकड़ी नहीं जाती. यही तो मर्दवादी नजरिया है.’’ वे हमारी बातें चुपचाप सुनते रहे, अफसोस में घोड़े की तरह हिनहिनाते रहे, लेकिन मानने को तैयार नहीं दिखे. जिन्हें मनाता समय है, उन्हें तो यही कह सकते हैं कि अबे, मान भी जाओ मर्द, वरना बहुत पछताओगे. Satirical Story In Hindi

Crime Reduction Methods : अपराध नियंत्रण में जन भागीदारी

Crime Reduction Methods : बढ़ती अपराध दरों और कम सजा दरों के साथ, गुमनाम रिपोर्टिंग और वास्तविक समय अलर्ट के साथ नागरिकों को सशक्त बनाना सुरक्षा को बढ़ा सकता है. समाज हमेशा अपराध के खिलाफ लड़ने की इच्छा दिखाते हैं अगर उन्हें अवसर और प्रेरणा दी जाए तो.

भारत में अपराधों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय रही है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट (2023) के अनुसार, प्रतिदिन 17,100 गंभीर अपराध दर्ज किए गए, जिन में महिलाओं के खिलाफ 1,227 और बच्चों के खिलाफ 485 अपराध शामिल हैं. दूसरी ओर, केवल 54.2 फीसदी मामलों में ही सज़ा हो पाई. इस के विपरीत, ब्रिटेन में यह आंकड़ा 80 फीसदी और अमेरिका में 90 फीसदी था, जिस का मुख्य कारण वहां की जनता की भागीदारी थी.

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बढ़ते अपराधों में जन भागीदारी मिल का पत्थर साबित होती है.

जब अपराध होते हैं तो जांच का भार पूरी तरह से पुलिस विभाग पर आ जाता है. हालांकि, अगर जनता सहयोग करती है तो सुबूत इकट्ठा करना आसान हो जाता है, जिस से कानून व्यवस्था में सुधार होता है.

क्राइम स्टौपर्स

कई लोग अपराध के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी जानने के बावजूद पुलिस से सीधे बात करने में झिझकते हैं. उन्हें अपनी सुरक्षा का डर रहता है या उन्हें कोर्ट में गवाही देने की चिंता रहती है. वर्तमान में, किसी अपराध की रिपोर्ट करने के लिए व्यक्तियों को हैल्पलाइन नंबर 112 पर कौल करना पड़ता है.

उदाहरण के लिए, अगर कोई छात्र अपने कालेज में अवैध रूप से ड्रग्स बांटने वाले किसी व्यक्ति की पहचान करता है, तो वह तुरंत अपराध को रोकना चाहेगा. पहले, ऐसे कौल के लिए सार्वजनिक टैलीफोन बूथ उपलब्ध थे लेकिन मोबाइल फोन के साथ वह सुविधा खत्म हो गई है. अब उन्हें अपने फोन से कौल करना होगा और प्राप्तकर्ता को उन के नंबर की दृश्यता एक बड़ी बाधा बन जाती है, जिस से अकसर वे असहाय महसूस करते हैं.

इस बाधा को दूर करने के लिए कई देशों ने ‘क्राइम स्टौपर्स’ नामक एक गुमनाम रिपोर्टिंग प्रणाली शुरू की है, जो कानून प्रवर्तन और नागरिक समाज के बीच सहयोग है. जब कोई व्यक्ति किसी अपराध की रिपोर्ट करने के लिए कौल करता है तो यह तकनीक सुनिश्चित करती है कि उन के फ़ोन नंबर अधिकारियों से छिपे रहें. जब तक वे प्रकट नहीं करना चाहते, तब तक उन के नाम और विवरण का पता नहीं लगाया जा सकता.

क्राइम स्टौपर्स की स्थापना सब से पहले 1976 में यूएसए में हुई थी (1-800-222-TIPS). बाद में, इसे ब्रिटेन (0800 555 111), आस्ट्रेलिया (1800 333 000), दक्षिण अफ्रीका (08600 10111) आदि में अपनाया गया. नागरिक समाज की भागीदारी ने इन प्रणालियों को जनता का विश्वास जीतने में मदद की है. कुछ मामलों में, मुखबिरों को गुप्त रूप से पुरस्कृत किया जाता है. कैलिफ़ोर्निया जैसे राज्यों में, गुमनाम रिपोर्टिंग के लिए ‘पी3 मोबाइल क्राइम टिप्स’ ऐप भी उपलब्ध है.

अकेले ब्रिटेन में, क्राइम स्टौपर्स ने 1,51,000 अपराधियों को गिरफ्तार किया है और 360 मिलियन पाउंड मूल्य की अवैध दवाओं की जब्ती की है. आस्ट्रेलिया में, एक अनाम कौलर की जानकारी से अधिकारियों को पिछले साल 896 किलोग्राम मेथामफेटामाइन (जिस का मूल्य 820 मिलियन आस्ट्रेलियाई डौलर है) जब्त करने में मदद मिली.

संख्याओं से परे, क्राइम स्टौपर्स ने अपराध-समस्या के बारे में जनता में जागरूकता बढ़ाई है तथा पुलिस और समुदाय के बीच संबंधों में सुधार किया है.

अपराध अलर्ट

एनसीआरबी के अनुसार, 2023 में 91,296 बच्चे लापता हुए. हाल ही में, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि 2020 से पूरे भारत में लगभग 36,000 बच्चे लापता हैं, जबकि 8 राज्यों का डेटा उपलब्ध नहीं है.

अमेरिका ने 1996 में टेक्सास में 9 वर्षीय अंबर हेगरमैन के अपहरण और हत्या के जवाब में मुख्य रूप से बाल अपहरण जैसे अपराधों के लिए ‘एम्बर (अमेरिका का लापता: प्रसारण आपातकालीन प्रतिक्रिया) अलर्ट कार्यक्रम’ शुरू किया था.

जब गंभीर अपराध होते हैं तो पुलिस सूचना एकत्र करने और मामले को सुलझाने के लिए अलर्ट जारी करती है. अपराध के तुरंत बाद टीवी, रेडियो, सड़क किनारे लगे डिजिटल बोर्ड, सोशल मीडिया और मुख्य रूप से स्थानीय भाषाओं में एसएमएस के ज़रिए चेतावनी भेजी जा सकती है.

मैसाचुसेट्स में, जब एक 11 वर्षीया लड़की का अपहरण किया गया था तो अलर्ट प्राप्त करने वाले गवाहों से मिली महत्त्वपूर्ण जानकारी ने उसे सुरक्षित रूप से बचाने में मदद की. 2024 तक, एम्बर अलर्ट सिस्टम ने अकेले यूएसए में 1,300 से अधिक बच्चों को बचाने में मदद की है. यह वर्तमान में सभी 50 अमेरिकी राज्यों और दुनियाभर के 27 देशों में लागू है.

इस के अलावा, सिल्वर अलर्ट गुमशुदा बुज़ुर्ग व्यक्तियों का पता लगाने में सहायता करते हैं और ब्लू अलर्ट तब सहायता करते हैं जब पुलिस अधिकारियों पर हमला होता है. गंभीर मौसम की स्थिति, सार्वजनिक सुरक्षा खतरों और राष्ट्रीय आपात स्थितियों से निबटने के लिए विभिन्न अलर्ट सिस्टम भी मौजूद हैं.

भारत क्राइम स्टौपर्स और क्राइम अलर्ट सिस्टम को लागू कर के अपराध नियंत्रण में जन भागीदारी को बढ़ाया जा सकता है. भारत ने पहले ही सेल ब्रौडकास्ट तकनीक के साथ कौमन अलर्टिंग प्रोटोकौल (सीएपी) आधारित एकीकृत अलर्ट सिस्टम विकसित किया है जो उपयोगकर्ताओं को क्षेत्रीय भाषाओं में ध्वनि के साथ प्रारंभिक चेतावनी संदेश के साथ सूचित करने के लिए स्थान आधारित लक्षित आपदा अलर्ट प्रदान कर सकता है. वर्तमान में आपदा अलर्ट के लिए उपयोग की जाने वाली तकनीक को अपराध अलर्ट के लिए अनुकूलित किया जा सकता है.

बढ़ती अपराध दरों और कम सजा दरों के साथ, गुमनाम रिपोर्टिंग और वास्तविक समय अलर्ट के साथ नागरिकों को सशक्त बनाना सुरक्षा को बढ़ा सकता है. जैसा कि ‘शार्लोट क्राइम स्टॉपर्स’ सही दावा करता है, समाज हमेशा अपराध के खिलाफ लड़ने की इच्छा दिखाते हैं अगर उन्हें अवसर और प्रेरणा दी जाए. Crime Reduction Methods

Postal Service Privatization : डाक विभाग जनसेवा से व्यावसायिकता की ओर

Postal Service Privatization : डाक विभाग अब ईकौमर्स और निजी कूरियर कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के लिए खुद को पुनर्गठित कर रहा है. पार्सल सेवाओं, प्रीमियम ट्रैकिंग और एयर डिलीवरी जैसी सुविधाओं ने डाक विभाग को एक नए व्यावसायिक मोड़ पर ला दिया है. पर इस व्यावसायिकता की दौड़ में कहीं उस की सामाजिक भूमिका कमजोर न पड़ जाए.

वैसे तो डाकिए की अहमियत आज भी है लेकिन कुछ वर्षों पहले डाकिए की एक अलग ही पहचान होती थी. घर के सभी लोग अपनेअपने पत्रों का इंतजार करते थे. क्योंकि तब मात्र डाकघर ही पत्रों के संप्रेषण का माध्यम हुआ करते थे. पोस्टकार्ड, लिफाफे, मनीऔर्डर, टैलीग्राम आदि ही सूचना के माध्यम हुआ करते थे. इंटरनैट के इस जमाने में आज भी लोग डाक सेवा का प्रयोग कर रहे हैं. डाक पर लोगों का भरोसा आज भी उतना ही कायम है. डाक या पोस्ट एक शहर से दूसरे शहर तक सूचना पहुंचाने का सर्वाधिक विश्वसनीय, सुगम और सस्ता साधन रहा है. इतना ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश में आप अपना संदेश डाक की मदद से पहुंचा सकते हैं.

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इस तरह से पोस्टमैन घरों-घरों डाक पहुंचाया करते हैं जो तस्वीर अब कहीं धुंधलाती जा रही है.

डाक, डाकघर व डाकिया के महत्त्व को बताने के लिए दुनियाभर में हर वर्ष 9 अक्तूबर को ‘वर्ल्ड पोस्ट डे’ मनाया जाता है. वर्ल्ड पोस्ट डे मनाने का उद्देश्य लोगों को डाक सेवाओं और डाक विभाग के बारे में जागरूक करना होता है.

वर्ष 1874 में इसी दिन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) का गठन करने के लिए स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. वर्ष 1969 में टोकियो, जापान में आयोजित सम्मेलन में विश्व डाक दिवस के रूप में इसी दिन को चयन किए जाने की घोषणा की गई. एक जुलाई, 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला पहला एशियाई देश था. जनसंख्या और अंतर्राष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर भारत शुरू से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा. संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के बाद 1947 में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट एजेंसी बन गई.

बदलते तकनीकी दौर में दुनियाभर की डाक व्यवस्थाओं ने मौजूदा सेवाओं में सुधार करते हुए खुद को नई तकनीकी सेवाओं के साथ जोड़ा है और डाक, पार्सल, पत्रों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए एक्सप्रैस सेवाएं शुरू की हैं. डाकघरों द्वारा मुहैया कराई जाने वाली वित्तीय सेवाओं को भी आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया है. नई तकनीक आधारित सेवाओं की शुरुआत तकरीबन 20 वर्ष पहले की गई और उस के बाद से इन सेवाओं का और तकनीकी विकास किया गया. साथ ही, इस दौरान औनलाइन पोस्टल लेनदेन पर भी लोगों का भरोसा बढ़ा है. दुनियाभर में इस समय 55 से भी ज्यादा विभिन्न प्रकार की पोस्टल ईसेवाएं उपलब्ध हैं.

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गांव, शहर, कस्बों में इस तरह के डाक बाक्स आज भी आपको कभीकधार सड़क के किनारे लगे दिख जाते हैं लेकिन आज वो काफी दयनीय स्थिति में हैं.

संप्रेषण के अन्य माध्यमों के आने से भले ही इस की प्रासंगिकता कम हो गई हो लेकिन कुछ मायनों में अभी भी इस की प्रासंगिकता बरकरार है. दुनियाभर में पोस्ट औफिस से संबंधित इन आंकड़ों से हम इसे और अधिक स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं. डाक विभाग से 82 प्रतिशत वैश्विक आबादी को होम डिलीवरी का फायदा मिलता है. एक डाक कर्मचारी 1,258 औसत आबादी को सेवा मुहैया कराता है. इस समय दुनियाभर में 55 प्रकार की पोस्टल ईसेवाएं उपलब्ध हैं. डाक ने 77 फीसदी औनलाइन सेवाएं दे रखी हैं. 5 दिन के मानक समय के अंदर 83.62 फीसदी अंतर्राष्ट्रीय डाक सामग्रियां बांटी जाती हैं.

142 देशों में पोस्टल कोड उपलब्ध हैं. डाक के इलैक्ट्रौनिक प्रबंधन और निगरानी के लिए 160 देशों की डाक सेवाएं यूपीयू के अंतर्राष्ट्रीय पोस्टल सिस्टम सौफ्टवेयर का इस्तेमाल करती हैं. इस तरह 141 देशों ने अपनी यूनिवर्सल पोस्टल सेवा को परिभाषित किया है. भारतीय डाक विभाग पिनकोड नंबर के आधार पर देश में डाक वितरण का कार्य करता है. पिनकोड नंबर का प्रारंभ 15 अगस्त, 1972 को किया गया था. इस के अंतर्गत डाक विभाग द्वारा देश को 9 भौगोलिक क्षेत्रों में बांटा गया है. संख्या 1 से 8 तक भौगोलिक क्षेत्र हैं व संख्या 9 सेना डाकसेवा को आवंटित की गई है. पिन कोड की पहली संख्या क्षेत्र, दूसरी संख्या उपक्षेत्र, तीसरी संख्या जिले को दर्शाती है. अंतिम 3 संख्या उस जिले के विशिष्ट डाकघर को दर्शाती हैं.

150 से अधिक वर्षों के से डाक विभाग देश की रीढ़ है. यह कई मायनों में भारतीय नागरिकों के जीवन को छूता है, मेल डिलीवर करना, लघु बचत योजनाओं के तहत जमा स्वीकार करना, डाक जीवन बीमा और ग्रामीण डाक जीवन बीमा के तहत जीवन बीमा कवर प्रदान करना व बिल जैसी रिटेल सेवाएं प्रदान करना, प्रपत्रों की बिक्री आदि. यह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, वेतन वितरण और वृद्धावस्था पैंशन भुगतान जैसे नागरिकों के लिए अन्य सेवाओं के निर्वहन में भी अभूतपूर्व कार्य करता है.

भारत का डाक विभाग एक समय देश की सब से सशक्त, विश्वसनीय और जनोन्मुख संस्था माना जाता था. चिट्ठी, मनीऔर्डर, पंजीकृत डाक और बचत खाते जैसी सेवाओं के माध्यम से यह करोड़ों भारतीयों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका था. गांवगांव में फैला डाक नैटवर्क न केवल संचार का साधन था बल्कि सरकारी योजनाओं और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी था. किंतु पिछले कुछ वर्षों में डाक विभाग के कार्यदर्शन और नीतियों में जो परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं, वे यह संकेत देते हैं कि संस्था अब अपने पारंपरिक जनसेवा स्वरूप से हट कर व्यावसायिकता की दिशा की ओर अग्रसर हो रही है.

सितंबर 2025 से भारत डाक विभाग ने अपनी ऐतिहासिक ‘पंजीकृत डाक’ सेवा को समाप्त कर उसे ‘स्पीड पोस्ट’ सेवा में विलय करने का निर्णय लिया है. यह परिवर्तन केवल एक तकनीकी सुधार नहीं बल्कि डाक व्यवस्था की मूल भावना में बदलाव का प्रतीक है. पंजीकृत डाक सदियों से आम नागरिकों के लिए एक सस्ता और सुरक्षित माध्यम रहा है. वह माध्यम जिस के जरिए गरीब व्यक्ति भी अपने दस्तावेज या आवेदन सरकारी दफ्तरों तक पहुंचा सकता था. अब जब यह सेवा महंगी स्पीड पोस्ट के साथ जोड़ी गई है, तो निश्चित रूप से साधारण उपभोक्ता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा.

पूर्व में जहां पंजीकृत डाक की कीमत लगभग 26 रुपए के आसपास थी, वहीं स्पीड पोस्ट की प्रारंभिक दर लगभग 41 रुपए से शुरू होती है. दोनों सेवाओं के विलय के बाद शुल्क में लगभग 20 से 25 प्रतिशत की वृद्धि मानी जा रही है. डाक विभाग का तर्क है कि पंजीकृत डाक का उपयोग घट रहा था और आधुनिक युग में डिजिटल व तेज संचार की आवश्यकता को देखते हुए सेवाओं का पुनर्गठन आवश्यक था. परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि भारत के अधिकांश ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के लोग अभी भी डिजिटल माध्यमों तक पहुंच नहीं रखते. उन के लिए डाकघर ही सब से सुलभ और विश्वसनीय संस्था है.

विभाग ने हाल के वर्षों में अपने ढांचे को आधुनिक बनाने के लिए आईटी प्रणालियों पर भारी निवेश किया है. रिपोर्टों के अनुसार, अब तक लगभग 445 रुपए करोड़ रुपए केवल तकनीकी आधुनिकीकरण पर व्यय किए जा चुके हैं. इस में औनलाइन ट्रैकिंग, ओटीपी आधारित डिलीवरी और डिजिटल भुगतान जैसी नई सुविधाएं शामिल हैं. निस्संदेह यह प्रयास स्वागतयोग्य हैं, लेकिन इन के साथसाथ सेवा शुल्कों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. एक ओर उपभोक्ता को ‘तेज और सुरक्षित सेवा’ का वादा मिलता है, वहीं दूसरी ओर उसी सुविधा की कीमत भी उसे पहले से कहीं अधिक चुकानी पड़ती है.

यह भी देखा जा रहा है कि डाक विभाग अब ईकौमर्स और निजी कूरियर कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के लिए खुद को पुनर्गठित कर रहा है. पार्सल सेवाओं, प्रीमियम ट्रैकिंग और एयर डिलीवरी जैसी सुविधाओं ने डाक विभाग को एक नए व्यावसायिक मोड़ पर ला दिया है. परंतु इस व्यावसायिकता की दौड़ में कहीं उस की सामाजिक भूमिका कमजोर पड़ती जा रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में जहां डाकिया एक सामाजिक प्रतिनिधि की तरह जाना जाता था, वहीं अब सेवाओं की सीमित पहुंच और ऊंचे शुल्कों के कारण उस की भूमिका घटती जा रही है.

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पोस्ट आफिस के अंदर का नजारा कुछ यूं हुआ करता है.

इस परिवर्तन का सब से बड़ा प्रभाव उन छोटे व्यापारियों, किसानों और छात्रों पर पड़ेगा जो पहले कम लागत में दस्तावेज या सामग्री भेज पाते थे. न्यायिक प्रयोजनों के लिए रजिस्टर्ड पोस्ट की कानूनी मान्यता थी, जिस से आम व्यक्ति सस्ती दर पर सुरक्षित रूप से अपने दस्तावेज भेज सकता था. अब उसी कार्य के लिए उसे महंगी स्पीड पोस्ट का सहारा लेना होगा. इस से न केवल आम उपभोक्ता की जेब पर बोझ बढ़ेगा, बल्कि न्याय और शासन तक उस की पहुंच भी कठिन हो सकती है.

कई विशेषज्ञों का मानना है कि डाक विभाग के इस बदलाव को पूरी तरह ‘कमर्शियल होना’ कहना उचित नहीं है, क्योंकि यह अभी भी एक सरकारी उपक्रम है. परंतु यह भी स्पष्ट है कि उस की सेवाओं में अब जनकल्याण की भावना की जगह व्यावसायिक सोच हावी होती दिख रही है. विभाग का ध्यान अब अधिकतर लाभप्रद सेवाओं, प्रीमियम ग्राहक वर्ग और ईकौमर्स डिलीवरी पर केंद्रित है. इस दृष्टि से यह चिंता स्वाभाविक है कि क्या भविष्य में डाक सेवा वास्तव में सभी नागरिकों के लिए समान रूप से सुलभ रह पाएगी?

यह सच है कि समय के साथ संस्थाओं को बदलना ही पड़ता है. तकनीकी विकास और डिजिटल संचार ने पारंपरिक डाक व्यवस्था की उपयोगिता को प्रभावित किया है. लेकिन परिवर्तन का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि संस्था अपने मूल उद्देश्य को ही भुला दे. डाक विभाग की सब से बड़ी पहचान उस की पहुंच और सस्ती सेवा रही है. यदि यह पहुंच अब केवल भुगतान-सक्षम वर्ग तक सीमित हो जाए, तो यह देश के सामाजिक संतुलन के लिए चिंताजनक संकेत होगा.

इसलिए आवश्यक है कि डाक विभाग अपने आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के साथसाथ जनसेवा की भावना को भी जीवित रखे. उसे दोहरी नीति अपनानी चाहिए.  एक ओर शहरी उपभोक्ताओं और डिजिटल सेवाओं के लिए आधुनिक प्रणालियां विकसित करे, तो दूसरी ओर ग्रामीण एवं निम्न आय वर्ग के लिए किफायती दरों पर पारंपरिक सेवाएं जारी रखे. सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि डाक विभाग केवल लाभ का केंद्र न बन जाए, बल्कि वह जनसंपर्क और सामाजिक विश्वास का माध्यम भी बना रहे. इस तरह देखा जाए तो डाक विभाग में परिवर्तन वास्तव में जन-सेवा की जगह व्यवसाय-उन्मुख दिशा में है जो एक चेतावनी का ही संकेत है. यदि शुल्क बढ़ते रहे और सेवा-मान नीचे जाए, तो ‘सार्वजनिक डाक सेवा’ का सामाजिक उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है. इसलिए इस विषय को सामने लाना, उपयोगकर्ताओं को जागरूक करना और संभावना के उपाय तलाशना महत्त्वपूर्ण है. Postal Service Privatization

Single Life Benefits : अकेले रहो मजे करो

Single Life Benefits : अकेले रहने का चलन बढ़ रहा है तो महज इसलिए नहीं कि लोग घर, परिवार और समाज की बंदिशों से परे आजादी से रहना चाहते हैं बल्कि इसलिए भी कि लोग जिंदगी में कुछ नया ट्राई करना चाहते हैं जो रोमांच भी है और सिस्टम को चुनौती भी है. जिन देशों ने इसे स्वीकार किया है वे खुशहाल और संपन्न हैं. अकेले रहने को मौज का पर्याय भी माना जाता है जो बहुत ज्यादा गलत भी नहीं.

तुम इस दुनिया में अकेले आए थे और अकेले ही जाओगे, इस जैसी चलताऊ बात बताने के एवज में लाखोंकरोड़ों रुपए झटक लेने वाले बाबा लोग खुद अकेले नहीं रहते बल्कि भव्य मठों और आश्रमों में रहते हैं. उन के इर्दगिर्द सोने के वक्त में भी कोई न कोई साथ होता है (या होती है, यह हकीकत के ज्यादा करीब है). निचोड़ यह कि अकेलेपन का भी डर दिखा कर अपना अरबोंखरबों का साम्राज्य खड़े करने वाले धर्मगुरुओं की पहली और आखिरी कोशिश यही रहती है कि कोई और अकेला न रहे. क्योंकि, लोग अगर अकेले रहना सीख लेंगे तो इन की दुकान खतरे में पड़ जाएगी. फिर न तो लोग भगवान को मानेंगे और न ही धर्मस्थलों पर जा कर जेब ढीली करेंगे.

जिस असुरक्षा ने आदमी को समूह यानी परिवार और समाज में रहना सिखाया वह असुरक्षा अब दम तोड़ रही है. अब लोगों को अकेले रहना ज्यादा सहूलियत और सुख वाला काम लगने लगा है, जहां कोई रोकटोक, लड़ाईझगड़ा या क्लेशकलह नहीं होते. सोने, उठनेबैठने और आनेजाने पर कोई पाबंदी नहीं होती. और तो और, आप के रिमोट तक पर पूरा कब्जा आप का होता है. मोबाइलफोन बिना पासवर्ड के रहने पर कोई रिस्क नहीं रहता.

बिस्तर पर गीला तोलिया पड़ा हो तो कोई खीझ कर यह कहने वाली नहीं होती कि यह क्या बेहूदगी है, रोजरोज समझाती हों पर आप को समझ ही नहीं आता. सैंटर टेबल पर रखी एश ट्रे में पड़ी सिगरेटें अचार में भी तबदील हो जाएं तब भी कोई नहीं कहता कि यह क्या लापरवाही  है. सिंक में मैगी के अवशेष वाली झूठी प्लेटें अपने समय को महीनों रोती रहें तो रोती रहें उन की बला से, उन का काम तो अख़बार या मैगजीन के पन्ने फाड़ कर भी लिया जा सकता है.

दीवारों पर मकड़िया बिना किसी डर के अपना वंश बढ़ाती रहें और आम घरों में उन का परिवार नियोजन करने वाली झाड़ू किसी कोने में पड़ी उबासियां लेती सोचती ही रह जाए कि क्या पता मुझे क्यों ख़रीदा गया था. मकड़ियों समेत तमाम कीटपतंगों का स्वच्छंद विचरण, जो बुद्ध की करुणा और महावीर की अहिंसा सहित ओशो की उच्छंखलता का मिक्सचर होता है, किसी अकेले के यहां ही देखने को मिलता है. ऐसा और इस से भी बहुत ज्यादाकुछ किसी अकेले के घर में ही मुमकिन है.

अकेले रह रहे आदमी की मौज क्या होती है, यह तो कोई घरग्रहस्थी वाला ही बता सकता है जो रात नौ बजे से ही घड़ी देखने लगता है. मोबाइल की घंटी बजते ही उस के चेहरे का रंग उड़ जाता है और थोड़ी देर महफिल से न उठने की झूठी मर्दानगी दिखा कर आख़िरकार बोल ही पड़ता है, चलता हूं यार, बहुत देर हो गई, पत्नी इंतजार कर रही होगी. सुबह मुन्ने को स्कूल बस पर भी छोड़ना है और पापा की दवाई का भी वक्त हो रहा है. इस वक्त उस की आवाज और जिंदगी की बेबसी घायल की गति घायल ही जाने वाली तर्ज पर कोई गृहस्थ ही समझ सकता है. ऐसा लगता है मानो कश्मीर की हसीन वादियों में विचर रहे उस लाचार पुरुष को उठा कर सीधे यूपी के गोंडा शहर में ला कर छोड़ दिया गया हो.

अकेले रहना एक नेमत है जो भाग्यवाग्य से नहीं बल्कि कोशिश और दिलेरी से मिलती है. दुनियाजहांन की नश्वरता छोड़ पाने की कूवत किसी ऐरेगैरे में नहीं हो सकती. यह उसी मर्द में हो सकती है जो स्वार्थी रिश्तेनातों और मोहमाया के फंदों को काट चुका होता है. अकेला आदमी मेहनती और स्वावलंबी होता है जो सुबह की चाय के लिए अलालों की तरह बिस्तर पर पड़ा किसी मांबहन या बीवी का मुहताज नहीं होता.

निडरता भी अकेले आदमी में ही पाई जाती है जो वह भूतप्रेतचुड़ैलपिशाचों के अस्तित्व को नकारता आधीआधी रात तक जाग कर तनहाई को मात देता रहता है. वह जय हनुमान ज्ञान गुण सागर…नुमा भूत भगाऊ दोहेचौपाई नहीं पढ़ता. यह और बात है कि इस चक्कर में वह महीनेभर का डाटा दोतीन रातों में ही खत्म कर फिर से मोबाइल रिचार्ज करवाता रहता है. सो, टैलीकाम कंपनियों के आर्थिक विकास में उस का योगदान किसी कर्ण से कम नहीं होता.

वह समझौतावादी और संयमी भी होता है. रातभर लिहाफ को सीने से लगाए करवटें बदलता रहेगा पर क्या मजाल जो शादी कर चौबीसों घंटे बजने वाला ढोल गले में लटका कर दूसरों की तरह किलपता यह कहता फिरे कि इस से तो अकेले ही अच्छे थे, सुबहशाम की खिचखिच तो नहीं थी. यह ज्ञान चूंकि उसे दुकेले होने से पहले ही प्राप्त हो चुका होता है, इसलिए वह स्त्री दुख से खुद को वंचित ही रखता है. परिवार नियोजन में अगर किसी की सच्ची आस्था होती है तो वह अकेले रह रहे अघोषित ब्रह्मचारी में ही होती है.

आजकल ऐसे फर्जी ब्रह्मचारी, जो संगठित रहते हैं, ही राष्ट्रवादी होते हैं जिन का घोषित मकसद देश की तरक्की और उस को विश्वगुरु बनाना होता है जबकि अघोषित मकसद धार्मिक एजेंडा होता है. उन का फलसफा बड़ा नेक होता है कि तुम शादी करो, बालबच्चे पैदा करो, देश की आबादी बढ़ाओ, घरगृहस्थी के झंझटों में पड़ो. उस पर धर्म की दुकान हम चलाएंगे. चूंकि हम देश को खुशहाल बनाना चाहते हैं इसलिए तुम्हें दुखों में डाल कर, दुख दूर करने के टोटके बता कर देश को हम हांकेंगे. अकेला आदमी वास्तविक और नास्तिक संत होता है. उस की नजर में दुनियादारी में पड़े लोग कीड़ेमकोड़ों की तरह होते हैं जो दुख को ही सुख समझने की गलतफहमी पाले दुनिया को बायबाय कर जाते हैं. वे जिंदगीभर सुख और मौज का भोग ही नहीं कर पाते.

अकेला आदमी ही चाहता है कि देश वाकई में खुशहाल हो और तरक्की करे, इस के बेहतर उदाहरण यूरोपियन और नार्डिक देश हैं जहां अकेलों की तादाद दिनोंदिन बढ़ रही है. इसलिए ये देश खुशहाली के इंडैक्स पर टौप पर रहते हैं.

दुनियाभर के देशों के सांखियकीय कार्यालयों सहित आर्गनाइजेशन फौर इकोनौमिक कोऔआपरेशन एंड डैवलपमैंट यानी ओईसीडी और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक आयोग फौर यूरोप जैसी एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि नार्वे में 45.8 फीसदी लोग अकेले रहते हैं. डेनमार्क में 44.1 फीसदी, फिनलेंड में 43 फीसदी और स्वीडन में 42.5 फीसदी लोग अकेले रहते हैं. ये वे देश हैं जो खुशहाली के अलावा प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में भी टौप देशों में शुमार होते हैं.

यह लिस्ट बहुत लंबी है जो बताती है कि जरमनी में 41.7, एस्तोनिया में 40.3, नीदरलैंड में 36 और आस्ट्रिया में 33.5 फीसदी लोग अकेले रहते हैं. ये सभी देश हाई इनकम वाले हैं जबकि लो इनकम वाले देशों की लिस्ट में अफ्रीका और साउथ एशिया के देश नीचे से टौप पर हैं. वहां अकेले रहने वालों की औसत दर महज 4 फीसदी है. भारत में यह दर 4.2 के लगभग है. इन देशों की गरीबी, धार्मिक और सांप्रदायिक हिंसा सहित भ्रष्टाचार वगैरह किसी सुबूत के मुहताज नहीं.

जाहिर है, अकेले रहने वाले चाहे वे 4 हों या 40 फीसदी, जहां भी हों हर तरह की दरिद्रता से मुक्त रहते हैं. वे दूसरों के दबाव में फैसले लेने को मजबूर नहीं होते और वही वास्तविक सभ्य शहरी भी होते हैं. जो जरूरत से ज्यादा न किसी की जिंदगी में दखल देते और न ही अपनी जिंदगी में लेते. न काहू से दोस्ती न काहू से बैर की तर्ज पर जीने और रहने वाले अकेले लोग आमतौर पर मस्तमौला होते हैं. जिस ने अकेले रहने का चैलेंज स्वीकार लिया उस के लिए जिंदगी मुश्किल नहीं रह जाती.

न जाने क्यों अपने देश में अकेलापन बदनाम है. अकेले आदमी को किराए का मकान तक मिलने में दुश्वारियां झेलने पडती हैं. समाज उसे उसी निगाह से देखता है जैसे सब्जी विक्रेता सब्जी मंडी में घूमते छुट्टे सांड को देखते हैं. अकेले आदमी के कैरेक्टर पर भी शक किया जाता है. उसे पारिवारिक व सामाजिक मान्यता नहीं मिलती. दरअसल, ये पूर्वाग्रह उन जिम्मेदार लोगों ने रचेबुने हैं जो जिंदगीभर गृहस्थी की गाड़ी में बैल की तरह जुते रहते हैं. इन से अकेलों का सुख और मौज बरदाश्त नहीं होती. और अगर वह महिला हो तो उस का राह चलना दूभर कर दिया जाता है.

लेकिन, अच्छी बात यह है कि अब अकेली युवतियों की तादाद भी बढ़ रही है जो धर्म और समाज की परवा किए बगैर माई लाइफ का नारा बुलंद करते अनिरुद्धाचार्यों से ले कर कुमार विश्वासों तक को ठेंगा दिखा रही हैं जो औरत को आजाद देखने भर से तिलमिला उठते हैं. ये धर्मगुरु और सैमी धर्मगुरु रूढ़ियों, परंपराओ और अंधविश्वासों के स्वयंभू गार्जियन बने बैठे अपना पेट पाल रहे हैं. Single Life Benefits

Satirical Story In Hindi : प्यार की तलाश में

Satirical Story In Hindi : सोहनलाल बचपन से ही सच्चे प्यार की खोज में यहांवहां भटक रहे हैं. वैसे तो वे 60 साल के हैं, पर उन का मानना है कि दिल एक बार जवान हुआ तो जिंदगीभर जवान ही रहता है. रही बात शरीर की तो उस महान इनसान की जय हो जिस ने मर्दाना ताकत बढ़ाने वाली दवाओं की खोज की और जो उन्हें ‘साठा सो पाठा’ का अहसास करा रही हैं.

उन्होंने कसरत कर के अपने बदन को भी अच्छाखासा हट्टाकट्टा बना रखा है और नएनए फैशन कर के वे हीरो टाइप दिखने की भी लगातार कोशिश करते रहते हैं.

सोहनलाल का रंग भले ही सांवला हो, पर खोपड़ी के बाल उम्र से इंसाफ करते हुए विदाई ले चुके हैं, पान खाखा कर दांत होली के लाल रंग में रंगी गोपी से हो चुके हैं, पर ठीकठाक आंखें, नाक और कसरती बदन… कुलमिला कर वे हैंडसम होने के काफी आसपास हैं. उन के पास रुपएपैसों की कमी नहीं है इसलिए उन की घुमानेफिराने से ले कर महंगे गिफ्ट देने तक की हैसियत हमेशा से रही है. लिहाजा, न तो कल लड़कियां मिलने में कमी थी और न ही आज है.

ऐसी बात नहीं है कि सोहनलाल को प्यार मिला नहीं. प्यार मिलने में तो न बचपन में कमी रही, न जवानी में और न ही अब है, क्योंकि प्यार के मामले में हमारे ये आशिक मैगी को भी पीछे छोड़ दें. मैगी फिर भी

2 मिनट लेगी पकने में, पर इन्हें सैकंड भी नहीं लगता लड़की पटाने में. इधर लड़की से आंखें चार, उधर दिल ‘गतिमान ऐक्सप्रैस’ हुआ.

कुलमिला कर लड़की को देखते ही प्यार हो जाता है और लड़की को भी उन से प्यार हो, इस के लिए वे भी प्रेमपत्र से ले कर फेसबुक और ह्वाट्सऐप जैसी हाईटैक तकनीक तक का इस्तेमाल कर डालते हैं.

सोहनलाल अनेक बार कूटे भी गए हैं, पर ‘हिम्मत ए मर्दा, मदद ए खुदा’ कहावत पर भरोसा रखते हुए उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

प्यार के मामले में सोहनलाल ने राष्ट्रीय एकता को दिखाते हुए ऊंचनीच, जातिभेद, रंगभेद जैसी दीवारों को तोड़ते हुए अपनी गर्लफ्रैंड की लिस्ट लंबी कर डाली, जिस में सब हैं जैसे धोबन की बेटी, मेहतर की भांजी, पंडितजी की बहन, कालेज के प्रोफैसर की बेटी, स्कूल मास्टर की भतीजी वगैरह.

सोहनलाल की पहली सैटिंग मतलब पहले प्यार का किस्सा भी मजेदार है. उन के महल्ले की सफाई वाली की भांजी छुट्टियों में ननिहाल आई हुई थी और अपनी मामी के साथ शाम को खाना मांगने आती थी (उन दिनों मेहतर शाम को घरघर बचा हुआ खाना लेने आते थे).

उन्हीं दिनों ये महाशय भी एकदम ताजेताजे जवान हो रहे थे. लड़कियों को देख कर उन के तन और मन दोनों में खनखनाहट होने लगी थी. हर लड़की हूर नजर आती थी. सो, जो पहली लड़की आसानी से मिली, उसी पर लाइन मारना शुरू हो गए.

दोनों के नैना चार हुए और इशारोंइशारों में प्यार का इजहार भी हो गया.

लड़की भी इन के नक्शेकदम पर चल रही थी यानी नईनई जवान हो रही थी इसलिए अहसास एकदम सेम टू सेम थे.

कनैक्शन एकदम सही लगा. दोनों के बदन में करंट बराबर दौड़ रहा था. सो, आसानी से पट गई. बाकी काम मां की लालीलिपस्टिक ने कर दिया जो इन्होंने चुरा कर लड़की को गिफ्ट में दी थी.

एक दिन मौका देख कर सोहनलाल उस लड़की को ले कर घर के पिछवाड़े की कोठरी में खिसक लिए, यह सोच कर कि किसी ने नहीं देखा.

अभी प्यार का इजहार शुरू ही हुआ था कि लड़की की मामी आ धमकीं और झाड़ू मारमार कर इन की गत बिगाड़ डाली और धमकी भी दे डाली, ‘‘आगे से मेरी छोरी के पीछे आया तो झाड़ू से तेरा मोर बना दूंगी और तेरे मांबाप को भी बता कर तेरी ठुकाई करा डालूंगी.’’

बेचारे आशिकजी का यह प्यार तो हाथ से गया, पर जान में जान आई कि घर वालों को पता नहीं चला.

इस के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. वे पूरी हिम्मत से नईनई लड़कियों पर हाथ आजमाने लगे. कभी पत्थर में प्रेमपत्र बांध कर फेंके तो कभी आंखें झपका कर मामला जमा लिया और सच्चे प्यार की तलाश ही जिंदगी का एकमात्र मकसद बना डाला.

वैसे भी बाप के पास रुपएपैसों की कमी नहीं थी और जमाजमाया कारोबार था. सो, लाइफ सैट थी.

यह बात और है कि लड़की के साथ थोड़े दिन घूमफिर कर सोहनलाल को अहसास हो जाता था कि यह सच्चा प्यार नहीं है और फिर वे दोबारा जोरशोर से तलाश में जुट जाते.

सोहनलाल की याददाश्त तो इतनी मजबूत है कि शंखपुष्पी के ब्रांड एंबेसडर बनाए जा सकते हैं. मिसाल के तौर पर उन की गर्लफ्रैंड की लिस्ट पढ़ कर किसी भी भले आदमी को चक्कर आ जाएं, पर मजाल है सोहनलाल एक भी गर्लफ्रैंड का नाम और शक्लसूरत भूले हों.

कृपया सोहनलाल को चरित्रहीन टाइप बिलकुल न समझें. उन का मानना है कि हम कपड़े खरीदते वक्त कई जोड़ी कपड़े ट्राई करते हैं तब जा कर अपनी पसंद का मिलता है. तो बिना ट्राई करे सच्चा प्यार कैसे मिलेगा?

एक बार तो लगा भी कि इस बार तो सच्चा प्यार मिल ही गया. सो, उन्होंने चटपट शादी कर डाली.

सोहनलाल बीवी को ले कर घर पहुंचे तो मां और बहनों ने खूब कोसा. बाप ने तो पीट भी डाला… दूसरी जाति की लड़की को बहू बनाने की वजह से. पर उन पर कौन सा असर होने वाला था, क्योंकि इतनी बार लड़कियों के बापभाई जो उन्हें कूट चुके थे, इसलिए उन का शरीर यह सब झेलने के लिए एकदम फिट हो चुका था.

सब सोच रहे थे कि प्यार का भूत सिर पर सवार था इसलिए शादी की, पर बेचारे सोहनलाल किस मुंह से बताते कि इस बार वे सच्ची में फंस चुके थे. यह रिश्ता प्यार का नहीं, बल्कि मजबूरी का था.

दरअसल, कहानी में ट्विस्ट यह था कि वह लड़की यानी वर्तमान पत्नी सोहनलाल के एक खास दोस्त की बहन थी और दोस्त से मिलने अकसर उस के घर जाना होता था, इसलिए इन का नैनमटक्का भी दोस्त की बहन से शुरू हो गया.

दोस्त चूंकि उन पर बहुत भरोसा करता था और उस कहावत में विश्वास रखता था कि ‘चुड़ैल भी सात घर छोड़ कर शिकार बनाती है’ तो बेफिक्र था.

लेकिन सोहनलाल तो आदत से मजबूर थे और ऐसे टू मिनट मैगी टाइप आशिक का किसी चुड़ैल से मुकाबला हो भी नहीं सकता, इसलिए उन्होंने लड़की पूरी तरह पटा भी ली और पा भी ली जिस के नतीजे में सोहनलाल ने कुंआरे बाप का दर्जा हासिल करने का पक्का इंतजाम कर लिया था.

पर चूंकि मामला दोस्त के घर की इज्जत का था और दोस्त पहलवान था इसलिए छुटकारा पाने के बजाय पत्नी बनाने का रास्ता सेफ लगा. इस में दोस्त की इज्जत और अपनी बत्तीसी दोनों बच गए.

प्यार का भूत तो पहले ही उतर चुका था सोहनलाल का, अब जो मुसीबत गले पड़ी थी, उस से छुटकारा भी नहीं पा सकते थे… इसलिए मारपीट और झगड़ों का ऐसा दौर शुरू हुआ जो आज तक नहीं थमा और न ही थमी है सच्चे प्यार की तलाश.

इन लड़ाईझगड़ों के बीच जो रूठनेमनाने के दौर चलते थे, उन्होंने सोहनलाल को 4 बच्चों का बाप भी बना डाला. उन की बीवी ने भी वही नुसखा आजमाया जो अकसर भारतीय बीवियां आजमाती हैं यानी बच्चों के पलने तक चुपचाप भारतीय नारी बन कर जितना हो सके सहन करो और बच्चों के लायक बनते ही उन के नालायक बाप को ठिकाने लगा डालो.

सोहनलाल की हालत घर में पड़ी टेबलकुरसी से भी बदतर हो गई.

बीवी ने घर में दानापानी देना बंद कर दिया था. अब बेचारे ने पेट की आग शांत करने के लिए ढाबों की शरण ले ली और बाकी की भूख मिटाने के लिए फेसबुक व दूसरे जरीयों से सहेलियों की तलाश में जुट गए, जिस में काफी हद तक वे कामयाब भी रहे.

वैसे भी 60 पार करतेकरते बीवी के मर्डर और सच्चे प्यार की तलाश 2 ही सपने तो हैं जो वे खुली आंखों से भी देख सकते थे.

सोहनलाल में एक सब से बड़ी खासीयत यह है, जिस से लोग उन्हें इज्जत की नजर से देखते हैं. उन्होंने हमेशा अपनी हमउम्र लड़की या औरत के अलावा किसी को भी आंख उठा कर नहीं देखा. छिछोरों या आशिकमिजाज बूढ़ों की तरह हर किसी को देख कर लार नहीं टपकाते, न ही छेड़खानी में यकीन रखते हैं.

बस, जो औरत उन के दिल में उतर जाए, उसे पाने के सारे हथकंडे आजमा डालते हैं. वह ऐसा हर खटकरम कर डालते हैं जिस से उस औरत के दिल में उतर जाएं.

प्यार की कला में तो वे इतने माहिर?हैं कि कोई भी तितली माफ कीजिए औरत एक बार उन के साथ कुछ वक्त बिता ले तो उन के प्यार के जाल में खुदबखुद फंसी चली आएगी और तब तक नहीं जाएगी जब तक सोहनलाल खुद आजाद न कर दें.

वैसे भी महोदय को इस खेल को खेलते हुए 40 साल से ऊपर हो चुके हैं इसलिए वे इस कला के माहिर खिलाड़ी बन चुके हैं. साइकिल के डंडे से ले कर कार की अगली सीट तक अनेक लड़कियों और लड़कियों की मांओं को वे घुमा चुके हैं.

आज सोहनलाल जिस तरह की औरत के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहते हैं, उसे छोड़ कर हर तरह की औरत उन्हें मिल रही है.

सब से बड़ी बात तो यह है कि वे अपनी वर्तमान पत्नी को छोड़े बिना ही किसी का ईमानदार साथ चाहते हैं.

एक बार धोखा खा चुके हैं इसलिए इस बार अपनी ही जाति की सुंदर, सुशील, भारतीय नारी टाइप का वे साथ पाना चाहते हैं.

अब कोई उन से पूछे कि कोई सुंदर, सुशील और भारतीय नारी की सोच रखने वाली औरत इस उम्र में नातीपोते खिलाने में बिजी होगी या प्रेम के चक्कर में पड़ेगी? लेकिन सोहनलाल पर कोई असर होने वाला नहीं. वे बेहद आशावादी टाइप इनसान हैं और खुद को कामदेव का अवतार मानते हुए अपने तरकश के प्रेम तीर को छोड़ते रहते हैं, इस उम्मीद के साथ कि किसी दिन तो उन का निशाना सही बैठेगा ही और उस दिन वे अपने सच्चे प्यार के हाथों में हाथ डाल कर कहीं ऐसी जगह अपना आशियाना बनाएंगे जहां यह जालिम दुनिया उन्हें तंग न कर पाए.

हमारी तो यही प्रार्थना है कि हमारे सोहनलालजी को उन की खोज में जल्दी ही कामयाबी मिले. Satirical Story In Hindi

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