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Film Review : निकिता रौय

Film Review : जब से बौलीवुड में हिंदी भाषा में फिल्में बननी शुरू हुई हैं तब से ही हौरर फिल्में भी बनती रही हैं. ये हौरर फिल्में कुछ तो सुनीसुनाई बातों पर आधारित होती थीं और कुछ में अंधविश्वासों के कारण भूतिया हवेली, चुड़ैल, बुरी आत्माएं और राक्षसी शक्तियों जैसे विषय शामिल होते थे. तांत्रिकों की वजह से लोगों में हौरर फिल्मों की कहानियों पर काफी प्रभाव पड़ा और लोग कहने लगे कि डायन के पांव उलटे होते हैं और उस का चेहरा अति डरावना होता है या फलां पेड़ पर भूत रहता है. ऐसी अंधविश्वासी बातों के कारण लोगों में भूतप्रेत, डायन आदि का खौफ फैलता गया जबकि वास्तव में भूतप्रेत, डायन आदि इंसान का वहम या डर होता है.

हौरर फिल्में बनाने वालों में रामसे ब्रदर्स का नाम टौप पर लिया जाता है. वर्ष 2000 में बनी ‘राज’ फिल्म को बौलीवुड के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ हौरर फिल्म के रूप में मान्यता मिली हुई है. बौलीवुड में हाल ही में ‘स्त्री 2’ और ‘मुंज्या’ शीर्षक से 2 और हौरर फिल्में बनी हैं. इन फिल्मों ने दर्शकों को डराने के साथसाथ कमाई भी तगड़ी की. इन फिल्मों को कौमेडी की गुदगुदाहट में लपेट कर परोसा गया था.

अब जानेमाने सीनियर ऐक्टर शत्रुघ्न सिन्हा और उन की बेटी अदाकारा सोनाक्षी सिन्हा के भाई कुश सिन्हा ‘निकिता रौय’ के रूप में एक ऐसी साइकोलौजिकल हौरर फिल्म ले कर आए हैं जो वास्तविकता और डिसइल्यूजन के बीच की बारीक परतें खोलती है. यह दर्शकों को डराने के साथसाथ उन की आंखों पर पड़ी अंधविश्वास की पट्टी भी उतार देती है. इस फिल्म को इस तरह बनाया गया है कि यह सोचने पर मजबूर करती है. इस फिल्म की कहानी भूतिया तो कतई नहीं है. यह अंधविश्वासों पर तीखी टिप्पणी तो करती है, साथ ही, यह ढोंगी और पाखंडी बाबाओं का परदाफाश भी करती है. यह फिल्म अंधविश्वास और सच्चाई के बीच के संघर्ष को दिखाती है.

कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है. शुरुआत में एक बियाबान घर में सनल राय (अर्जुन रामपाल) एक अनजाने डर से जू?ा रहा है. दरअसल जहां वह रह रहा है वह उत्तराखंड के जंगलों में बनी एक सुनसान हवेली है. स्थानीय लोगों के अनुसार वहां एक साया चलता है. वहां एक भगवाधारी साधु अमरदेव (परेश रावल) आ कर लोगों से कहता है कि वह उस साए को काबू कर लेगा. सनल राय को लगता है, कोई उसे मारना चाहता है. डर कर वह अपनी जान ले लेता है. सुपरनैचुरल दावों पर रिसर्च करने वाली लेखिका व पत्रकार निकिता रौय (सोनाक्षी सिन्हा) उस की बहन है. वह खुद भी निकिता की तरह घटनाओं की पड़ताल कर रहा था.

पुलिस सनल की मौत को आत्महत्या मानती है, मगर हालात निकिता को जानेमाने आध्यात्मिक गुरु बाबा अमरदेव (परेश रावल) के पास जाने को मजबूर करते हैं. वह खुद को भगवान मानता है. हजारों का चढ़ावा उसे चढ़ाया जाता है. जैसेजैसे निकिता अपनी जांच में आगे बढ़ती है, उसे पता चलता है कि सनल अमरदेव के पाखंड का परदाफाश करना चाहता था, मगर तथ्यों और सुबूतों द्वारा साबित करने से पहले उस की मौत हो जाती है. अपने भाई की मौत का कारण पता लगाने में निकिता का साथ उस का दोस्त जौली (सुहैल नय्यर) देता है. जौली और निकिता को जांच में आगे बढ़ने के साथ भयानक सुपरनैचुरल अनुभवों से गुजरना पड़ता है. सनल की आखिरी रिकौर्डिंग के आखिरी मैसेज उन्हें सच की तह तक ले जाते हैं.

सनल की साथी फेमा (कलिरोई) की मौत उन्हें अमरदेव की ओर इशारा करती है. वह अमरदेव को चैलेंज करती है. क्या वाकई अमरदेव सनल की मौत का जिम्मेदार है? अब निकिता अमरदेव की छाती में खंजर घोप देती है. अमरदेव नहीं मरता और कहता है कि, ‘अब मैं तुम में हूं.’ गांव वाले वहां अंदर भागते हैं मगर वहां कोई अमरदेव नहीं. बस, निकिता अकेली खून में लथपथ पड़ी थी. वह पागल सी हो जाती है और जोरजोर से हंसने लगती है. हवेली के फाटक अपनेआप खुलने लगते हैं. निकिता सोच रही थी कि क्या अमरदेव सचमुच मर गया है या उस का डर निकिता के अंदर जी रहा है. क्या अमरदेव एक इंसान था या लोगों के डर का साया. क्या सच्चाई जीत गई या निकिता हार गई, निकिता रौय को मानसिक रोगी करार दे दिया जाता है.

फिल्म अंधविश्वास और नकली बाबाओं के भंडाफोड़ करने वाली एक लेखिका की कहानी पर आधारित है, जो अपने भाई की मौत के रहस्य की जांच करती है. यह अंधविश्वास और सच्चाई के बीच की लड़ाई है. कुश सिन्हा की यह पहली फिल्म है और उस का निर्देशन परिपक्व है, खासकर मनोवैज्ञानिक डर और अकेलेपन के माध्यम से डर दिखाने के लिए कुश सिन्हा की सराहना की गई है. फिल्म में सस्पैंस और थ्रिल को बनाए रखा गया है. कहींकहीं फिल्म उल?ाने लगती है. सोनाक्षी सिन्हा ने नकली बाबाओं का सच सामने लाने वाली का किरदार निभाया है. परेश रावल ने साबित कर दिया है कि डराने के लिए चीखना जरूरी नहीं होता. सिनेमेटोग्राफी ने फिल्म को शानदार बनाया है. फिल्म का क्लाइमैक्स जल्दी में निबटाया गया है. सभी कलाकारों ने बढि़या ऐक्ंिटग की है.

निकिता रौय’ सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं बल्कि एक ऐसी फिल्म है जो डर के बहाने समाज में फैले अंधविश्वास, झूठे गुरुओं और लोगों को गुमराह करने वाले सिस्टम पर सवाल उठाती है. फिल्म में गाने बहुत कम हैं, मगर बैकग्राउंड म्यूजिक ने कहानी को दिलचस्प बना दिया है. अगर आप हौरर या थ्रिलर फिल्मों के शौकीन हैं तो यह फिल्म आप के लिए बनी है. Film Review

 

 

Short Kahani in Hindi : गाय और शास्त्री जी

Short Kahani in Hindi : शास्त्रीजी का असली नाम तो लोगों को मालूम ही नहीं था. सभी बड़े लोगों के समान वह भी दूसरे नाम से ही प्रसिद्ध हो गए थे. लोग उन्हें ‘गोभक्त शास्त्रीजी’ के नाम से ही जानते थे. उन के लिए संसार में सब से अधिक महत्त्वपूर्ण चीज गाय थी. गाय को ही वह अपना सबकुछ समझते थे. गाय ही उन की माता थी और गाय ही उन का पिता, क्योंकि गोभक्ति के कारण ही उन्हें प्रसिद्धि मिली थी.

लोग कहते हैं कि गांव में उन की मां भीख मांग कर गुजारा करती हैं, पर शहर में वह मां रूपी गाय के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर रहे थे. जब कोई उन से उन की मां के बारे में पूछता तो वह भावुक हो कर कहते, ‘‘मेरी मां तो गाय ही है,’’ पर वास्तविकता यह थी कि अपनी पत्नी के डर से उन्होंने अपनी मां से रिश्ता तोड़ लिया था.

उधर उन की पत्नी को भी गाय से अगाध प्रेम था. भक्त लोगों की ओर से उन्हें प्रतिवर्ष गाएं दान में मिल जाती थीं. जब तक वे दूध देने लायक रहतीं, उन की खूब सेवा की जाती, पर बाद में उन का भी शायद उसी तरह परित्याग कर दिया जाता जैसे उन्होंने अपनी जननी का कर रखा था.

कुछ लोगों ने पूछा, ‘‘पंडितजी, आप को तो हर वर्ष दरजनों गाएं दान में मिलती हैं, पर आप के घर में तो सदा

6-7 गाएं ही रहती हैं?’’

इस पर पंडितजी बड़े नम्र हो कर कहते, ‘‘भैया, इतनी गायों को रख कर मैं क्या करूंगा? मैं भी उन्हें दान में दे देता हूं.’’

पर आज तक कोई ऐसा व्यक्ति देखने या सुनने में नहीं आया कि जिस ने शास्त्रीजी से दान में गाय प्राप्त की हो. गाएं कहां जाती थीं, इस का पता या तो शास्त्रीजी को मालूम था या गोमाता को.

शास्त्रीजी ने गोभक्त सभा की स्थापना की थी, जिस के वह संस्थापक अध्यक्ष थे और आजन्म अध्यक्ष रहने की उन्होंने कसम खा रखी थी. नगर के कई धार्मिक कहे जाने वाले धनाढ्य इस संस्था के संस्थापक थे. ऐसे सभी लोगों को गाय से कुछ ज्यादा ही लगाव होता है.

मानव रक्षा के लिए वे कभी तैयार नहीं होंगे. मनुष्यों की तो वे मुक्ति में विश्वास रखते हैं. नकली दवाइयों, मिलावट की वस्तुओं और नशीले द्रव्यों के माध्यम से वे मानव की मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और उन के लिए स्वर्ग का द्वार खोल रहे हैं. फिर उन्हें उन के लिए चिंता करने की क्या आवश्यकता है? पर गोभक्त शास्त्रीजी के बड़े भक्त थे और उन के द्वारा गायों की रक्षा करना चाहते थे.

गोभक्त सभा के सैकड़ों सदस्य थे और सभी अमीर लोग थे. स्वाभाविक है, अमीर ही गाय की रक्षा कर सकते हैं. गरीब, जो अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह गाय की क्या खाक रक्षा करेगा? गोभक्त सभा में चूंकि सभी अमीर थे, इसलिए गोभक्त सभा का फंड भी तगड़ा था. सभा की बैठकें कम ही होती थीं.

सभा क्या काम करती है, गायों और सभा के बीच कैसा संबंध है, इस का किसी को पता नहीं था. सदस्य शास्त्रीजी की मांगी हुई रकम दे कर पुण्य प्राप्त कर लेते थे और शास्त्रीजी हर 3 महीने में गोरक्षा के बारे में एक जोरदार लेख लिख कर उन से भी ज्यादा पुण्य प्राप्त कर लेते थे. उस लेख को 3 महीनों तक वह सभी को दिखाते फिरते थे.

अलबत्ता 2-3 वर्षों में एक बार गोरक्षा के लिए वह एक बड़ा कार्यक्रम बनाते थे. जब वह यह अनुभव करते कि उन की लोकप्रियता कम हो रही है तो वह इस कार्यक्रम को दोहरा देते थे. अपनी लोकप्रियता का मूल्यांकन वह गोभक्त सभा को मिलने वाले चंदे और स्वयं को दान में प्राप्त होने वाली गायों से लगाते थे. जैसे ही इन में कमी हो जाती वह समझ जाते कि लोग उन्हें भूलने लगे हैं.

इस विशेष कार्यक्रम के अंतर्गत वह सैकड़ों लोगों के हस्ताक्षर ले कर एक ज्ञापन सरकार को देते और मांग करते कि प्रदेश में गोहत्या पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगा दी जाए. इस के अतिरिक्त वह सैकड़ों गायों और हजारों भक्तों को ले कर शहर के मुख्य मार्गों से एक जलूस भी निकालते और सार्वजनिक सभा में घोषणा करते कि 6 महीनों में यदि गोहत्या बंद न हुई तो वह आमरण अनशन कर देंगे.

जिन समाचारपत्रों का संचालन उन के भक्तों द्वारा किया जाता था वे इस समाचार को खूब उछालते थे. पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार जलूस में उन के कार्यकर्ताओं की झड़प पुलिस से हो ही जाती थी जिस से इस खबर को और प्रमुखता मिल जाती थी.

धार्मिक मामलों पर प्रश्न उठाने वाले नेताओं की भी कमी नहीं थी. सरकार भी यथासमय एक वक्तव्य निकाल देती कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. क्योंकि गाय का प्रश्न हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ है. बस, शास्त्रीजी का उद्देश्य पूरा हो जाता और फिर कुछ वर्षों तक वह निश्ंिचत हो जाते थे.

गत 2 वर्षों से शास्त्रीजी कुछ ज्यादा ही चिंतित थे. शहर में धार्मिक गंगा बह रही थी. सभी लोग अधिक से अधिक धार्मिक हो रहे थे. पर इस धार्मिक आंदोलन में गाय का कहीं नाम नहीं था. लोग किसी और पहलू को ले कर धार्मिक हो रहे थे. अब धर्मयुद्ध की बागडोर नए धार्मिक नेताओं ने अपने हाथों में ले ली थी. शास्त्रीजी को अपना सिंहासन डोलता नजर आया.

उन्होंने इस बार अपना कार्यक्रम और भी जोरदार बनाने का प्रयत्न किया. उन्होंने लोगों को गाय की रक्षा के लिए ललकारा. समय पड़ने पर सभी धार्मिक नेता एक हो जाते हैं, चाहे वे अलगअलग धर्मों के ही क्यों न हों. उन के लिए यह एक स्वर्ण अवसर था. उन्होंने शास्त्रीजी की हां में हां मिलाई और कार्यक्रम तैयार हो गया.

इस बार समाचारपत्रों में और भी जोरशोर से वक्तव्य निकाले गए और सरकार को धमकी दी गई कि यदि उस ने देश की संस्कृति को दृष्टि में रखते हुए गोरक्षा के संबंध में शीघ्र ही कदम नहीं उठाया तो एक जोरदार आंदोलन छेड़ा जाएगा. जलूस में इस बार 1 हजार गायों को रखा गया और साथ में लगभग 25 हजार गोभक्त नारे लगाते हुए निकले. शास्त्रीजी प्रसन्न मुद्रा में जलूस में सब से आगे थे. बैंडबाजे के साथ जलूस कोठी चौरास्ते के आगे की सड़क पर धीरेधीरे बढ़ रहा था.

कोठी चौरास्ते के आगे सागसब्जी का बाजार है जो सदा सड़क पर ही लगता है. इस बाजार की विशेषता यह है कि यहां पर जितने सागसब्जी खरीदने वाले होते हैं उस से भी अधिक संख्या में आवारा गायें होती हैं जो सागसब्जी के ढेर को चट करने की कोशिश में रहती हैं. सब्जी बेचने वाले सदा एक बड़ा डंडा अपने साथ रखते हैं, और जब भी कोई गाय सब्जी पर मुंह मारने की कोशिश करती है तो डंडे से उस की पूजा करते हैं.

जलूस इस बाजार से कोई 25 गज की दूरी पर था. उसी समय एक सब्जी वाली ने एक गाय की पूजा की. गाय घबरा कर मुड़ी पर उतने में ही जलूस वहां तक पहुंच चुका था. अपनी ढेर सारी साथिनों को देख और बैंडबाजे की आवाज सुन गाय घबरा गई. उसे भागने का रास्ता नहीं मिल रहा था. केसरिया शाल पहने शास्त्रीजी नारे लगा रहे थे, गाय को घबराहट में केवल वह ही दिखाई दिए. पहले ही वह परेशान थी. घबरा कर उस ने शास्त्रीजी पर आक्रमण कर दिया और पूरे जोर से अपने दोनों सींग शास्त्रीजी के पेट में घुसेड़ दिए.

यह सब कुछ क्षणों  में  देखतेदेखते हो गया. शास्त्रीजी के पेट से खून की फुहार छूटने लगी और गाय उन्हें गिरा कर भीड़ की ओर भागी. भीड़ तितरबितर हो गई और गाय को रास्ता मिल गया. अब लोगों ने शास्त्रीजी की ओर ध्यान दिया. वह खून से लथपथ बेहोश पड़े थे. तुरंत एक मोटरगाड़ी में उन्हें दवाखाने ले जाया गया. जलूस वहीं पर समाप्त कर दिया गया और आशा की गई कि गोमाता की कृपा से शास्त्रीजी बच जाएंगे.

दूसरे दिन अखबारों में बस शास्त्रीजी का ही नाम था. गाय द्वारा उन के आहत होने की घटना को कुछ वामपंथी अखबारों ने खूब उछाला. उधर धार्मिक पत्रों ने इसे वामपंथियों का षड्यंत्र बताया.

शास्त्रीजी की स्थिति बड़ी गंभीर थी. वह अभी भी बेहोश थे. उन के गुर्दे पूरी तरह नष्ट हो गए थे. अत्यधिक खून बहने के कारण पक्षाघात हो जाने की आशंका बढ़ गई थी. भक्तों ने कोई कसर नहीं छोड़ी. मुंबई से डाक्टरों को बुलाया गया. अवसर पड़ने पर उन को अमेरिका ले जाने की व्यवस्था कर दी गई. 15 दिनों बाद शास्त्रीजी को होश आया. पर उन्हें बातचीत करने से रोक दिया गया. लगभग 10 दिनों तक शास्त्रीजी केवल सोचते ही रहे. डाक्टरों ने कह दिया था कि लगभग 2 वर्षों तक वह ठीक प्रकार से नहीं चल सकेंगे.

जब वह बातें करने लायक हुए तो भक्तों की मंडली उन्हें सांत्वना देने के लिए पहुंची. लोगों ने कहा, ‘‘पंडितजी, गोमाता की कृपा से आप बच गए और उस की कृपा से ही आप शीघ्र अच्छे हो जाएंगे. आप किसी बात की चिंता मत कीजिए. हम और जोरशोर से अभियान चलाएंगे और जब तक सारे देश में गोहत्या पर पाबंदी नहीं लग जाएगी, हम चैन की सांस नहीं लेंगे.’’

शास्त्रीजी थोड़ी देर मौन रहे, फिर उन्होंने कहना प्रारंभ किया, ‘‘नहीं, अब मैं गोहत्या पर पाबंदी का अभियान छोड़ दूंगा. अभी ही इतनी आवारा गाएं सड़कों पर घूम रही हैं और लोगों को आहत कर रही हैं. अगर गोहत्या पर पाबंदी लग जाए तब तो सड़कों पर लोगों से अधिक गाएं ही दिखाई देंगी और लाखों को अस्पताल में इलाज के लिए भरती होना पड़ेगा. अब मैं आवारा गायों को ठिकाने लगाने का अभियान आरंभ करूंगा,’’ इतना कह कर शास्त्रीजी फिर बेहोश हो गए.

उस रात शास्त्रीजी की हालत बहुत गंभीर हो गई. डाक्टरों के लाख प्रयत्न करने पर भी कुछ नहीं हो सका. सूर्योदय से पहले ही शास्त्रीजी का देहावसान हो गया.

सारे शहर में सन्नाटा छा गया. भक्तों ने शास्त्रीजी की शवयात्रा बड़ी शान से निकाली और जोरदार वक्तव्य निकाला, जो इस प्रकार था :

‘‘शास्त्रीजी ने गोवंश की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी. कुछ सूत्रों से पता चला है कि जिस गाय ने शास्त्रीजी पर आक्रमण किया उस का मालिक वामपंथी विचारों वाला है. पर हम चुप नहीं रहेंगे, शास्त्रीजी की हत्या का बदला लेंगे तथा गोहत्या पर पूर्ण पाबंदी लगाने के इस अभियान को और शक्तिशाली बनाएंगे.’’ Short Kahani in Hindi

Short Hindi Stories : सरकारी इनाम

Short Hindi Stories : चौधरी हरचरन दास के बुलाने पर हरिया फौरन हाजिर हो गया. चौधरी साहब निवाड़ के पलंग पर बैठे हुक्का पी रहे थे. चौपाल पर दीनू, बीसे, बांके, बालकिसन और जगदंबा परसाद भी बैठे गप्पें हांक रहे थे. हरिया ने नीची निगाहों से चौधरी साहब को हाजिरी दी. चौधरी साहब ने हुक्के की नली दांतों से पकड़ी और दाईं आंख को कुछ ज्यादा खोल कर हरिया की ओर देखा. हरिया ने जुहार की तो चौधरी साहब के होंठ थोड़े फैल कर पुन: सिकुड़ गए.

‘‘हुकम करो मालिक,’’ हरिया ने बुलाने का कारण जानना चाहा.

‘‘हुकम तो तुम करोगे हरीप्रसादजी, हम तो तुम्हारे गुलाम हैं,’’ चौधरी साहब ने हुक्के को मुंह में ठूंसे हुए ही जवाब दिया.

‘‘आप माईबाप हैं…हम तो गुलाम हैं, हजूर. कोई कुसूर हो गया, मालिक?’’ हरिया ने पिचकते पेट को जरा और अंदर खींच कर पूछा.

‘‘नहीं रे, कुसूर तो हम से हुआ है. हम ने तुम्हें काम दिया था न, उसी का इनाम मिला है हमें. तुम्हें रोटीरोजी दे कर जो अधर्म किया है उस का प्रायश्चित्त करना है हम को. सरकार बड़ी दयालु है रे हरिया. वह तुम जैसे सीधेसच्चे गरीबों को ऊंचा उठाना चाहती है और हम जैसे पापी, नीच लोगों की अक्ल दुरुस्त करना चाहती है.’’

हरिया खड़ाखड़ा थूक निगल रहा था. उस की समझ में आ गया था कि  चौधरी साहब किसी बात पर गुस्सा हैं, लेकिन उस ने तो कुछ भी ऐसावैसा नहीं किया. कल दिन छिपने तक काम किया था. रामेसर के ससुरजी का सामान दिल्लीपुरा तक राजीखुशी पहुंचा दिया था. फिर क्या बात हो गई?

‘‘हरी प्रसादजी, तुम सोच रहे होगे कि चौधरी कैसी उलटीसीधी बक रहा है. अब असली बात सुनो. सरकारी आदेश आया है कि हरी प्रसाद वल्द गया प्रसाद, गांव छीछरपुर, तहसील न्यारा, जिला बदायूं, जो सरकारी योजना के अंतर्गत 320-ए 93 के अंतर्गत प्रार्थी है, के प्रार्थनापत्र को स्वीकार करते हुए उसे 7 बीघा जमीन दी जाती है. इस जमीन का पट्टा पटवारी, न्यारा तहसील के मारफत फाइल करने को भेजा गया है तथा गांव छीछरपुर के पश्चिम नाले के ऊपर 1981 बी के मद से बजरिये पटवारी 7 बीघा जमीन हरी प्रसाद को दी जाएगी,’’ चौधरी ने कागज पढ़ा और फिर संभाल कर जेब में रख लिया.

झुकी गरदन को थोड़ा उठा कर हरिया ने इस का मतलब जानना चाहा.

‘‘अरे बेवकूफ की दुम, सरकार ने 10 पुश्तों से चली आ रही हमारी जोत की धरती में से 7 बीघा जमीन तुम्हें दे दी है. पटवारी राम प्रकाश यह कागज पकड़ा गया है हमें. बोल, कब से संभाल रहा है अपनी जमीन?’’

‘‘मालिक, मैं कैसे संभालूंगा जमीन को? मुझ में ऐसी औकात कहां है?’’

‘‘क्यों? सरकारी दफ्तर में जा कर दरख्वास्त देने की औकात थी तेरी?’’

‘‘माईबाप, मैं ने नहीं दी थी दरख्वास्त. वह तो हरिद्वारीलाल ने अपने मन से लिखी थी.’’

‘‘तेरे दस्तख्त नहीं थे उस पर?’’

‘‘अंगूठा चिपकवाया था हरिद्वारी ने. कहा था कि सरकार सहायता करेगी.’’

‘‘अच्छा, तो सरकारी जमीन दिल्ली से बन के आती और तुम जहां कहते वहां बिछा दी जाती, क्यों?’’

हरिया किसी पेड़ की तरह जड़ हो रहा था. वह जानता था कि चौधरी को गुस्सा आ गया तो जमीन जिंदा गड़वा देंगे, ‘‘अब हम क्या करें मालिक?’’ उस ने झिझकते हुए कहा.

‘‘अरे करेगा क्या? पीली पगड़ी बांध, मिठाई खिला सब को. हम ने तो पटवारी से कह दिया कि तुम जानो तुम्हारा काम जाने. हम हटा लेते हैं अपने हलबैल वहां से. कोई और हमारी धरती की तरफ देखता भी तो आंखें निकाल लेते, लेकिन सरकारी मामला है.

‘‘क्या मैं समझ नहीं रहा हूं कि यह सब तमाशा घनश्याम चौधरी करवा रहा है? पिछले चुनाव की सारी कसर निकाल लेना चाहता है. खैर, अपनीअपनी तूबड़ी है, आज तू बजा ले, कल हम बजाएंगे. अच्छा तो भैया, हरीप्रसादजी, आज से तुम भी जमींदार हो गए. हमारी जमात में आ गए. अब हमारे यहां से तुम्हारी छुट्टी. अब नौकर बन कर नहीं, मालिक बन कर रहो. जाओ भैया, जा कर देख आओ अपनी जमीन. अगले महीने तहसील में मुख्यमंत्रीजी आएंगे. वहां बड़े समारोह में तिलक लगा कर तुम्हें धरती का राज सौंपेंगे. बड़े भाग्यवान हो, हरी प्रसाद. जाओ भैया, जाओ.’’

हरिया चौपाल से निकला. उस के जैसे पंख निकल आए थे. वह उड़ान भरता हुआ अपने नीड़ पर आ पहुंचा. झोंपड़ी में उस की पत्नी नत्थी 4 बच्चों को समेटे पड़ी थी. रात को चूल्हा जलने की उम्मीद में दिन कट ही जाता था. दिन भर मां बच्चों को लोरियां सुनाती और बच्चे कहानी सुनतेसुनते सो जाते.

झोंपड़ी में घुस कर उस ने बड़े प्यार से नत्थी की कमर पर एक लात जमाई. ‘‘अरे उठ री, देख नहीं रही कि हरी प्रसादजी आए हैं?’’

नत्थी ने अपना मैला घाघरा समेटा और बैठ गई. सामने हरिया तन कर खड़ा था. उस के पिचके गालों में हवा भरी थी और बुझीबुझी आंखों में फुलझड़ी सी जल रही थी. उस का होहल्ला सुन कर और तेवर देख कर नत्थी ने समझा कि आज जरूर इस पर बड़े पीपल वाला जिन्न सवार हो गया है. उस ने परीक्षा करनी चाही.

‘‘कौन है रे तू?’’

‘‘मैं जमींदार हरी प्रसाद हूं.’’

‘‘कहां से आया है?’’

‘‘हवेली से आया हूं.’’

नत्थी ने लपक कर कोने में पड़ा डंडा उठा लिया. फिर बिफर कर बोली, ‘‘तेरा सत्यानास हो जमींदार के बच्चे. इस दरिद्र की कोठरी में क्या झख मारने आया है? अरे नासपीटे, यहां तो चूहे भी व्रत रखते हैं. यहां क्या अपनी ऐसीतैसी कराएगा?’’

हरिया समझ गया कि ज्यादा नाटक दिखाया तो अभी पूजा हो जाएगी. वह धम से बैठ गया, फिर अपनी प्यारी हृदयेश्वरी नत्थी को सीने से लगाता हुआ बोला, ‘‘हमारे भाग खुल गए हैं रे नथनिया!’’

नत्थी ने आंखें खोल कर अपने मर्द को देखा, ‘‘लाटरी खुली है, नथनी. सरकार ने 7 बीघा जमीन का मालिक बनाया है तेरे हरी प्रसाद भुक्खड़ को.’’

नत्थी अभी भी उसे टुकुरटुकुर देख रही थी. धीरेधीरे हरिया ने सारी रामकहानी सुना दी. नत्थी का पोरपोर खुशी से भीग उठा था. अपना कालाकलूटा हरिया सचमुच किसी राजकुमार की तरह सुंदर लग रहा था उसे. सारी रात आगामी योजना पर विचार होता रहा.

सुबह उठ कर हरिया को चिंताओं ने आ घेरा. हलबैल कहां से आएगा? बीज के लिए पैसा, कटाई, खलियान, गोदाम…यह सब कहां से होगा?

वह चौधरी साहब के दरवाजे जा पहुंचा. चौधरी साहब के हाथ में पीतल की कटोरी थी. वह सवेरेसवेरे कच्चा दूध पीते थे.

‘‘पां लागन, मालिक.’’

‘‘जै राम जी की. हरिया, क्या हुआ रे? रात को नींद तो आई न?’’

‘‘हां मालिक, एक बात पूछनी थी. मुझे हलबैल और बीज, पानी की मदद तो करेंगे न?’’

‘‘अरे, क्यों नहीं, बस तुम्हें 2-4 कागजों पर अंगूठा मारना होगा. हम सबकुछ कर देंगे. चाहो तो कल से ही जोत लो जमीन. पट्टा तो मिल ही जाएगा. सरकार का कानून तो मानना ही होगा न.’’

हरिया ने अपनी धरती पर जीजान लगा दी. नाले से लगी वह धरती वर्षों से अछूती पड़ी थी. 2 महीने में ही धरती चमेली के फूल सी खिल उठी.

एक दिन चौधरी साहब ने उसे बुला कर बताया कि कल तहसील में मंत्रीजी पधार रहे हैं. सभी लोगों को उन के पट्टों के कागज दिए जाएंगे. उसे भी उन के साथ तहसील चलना होगा.

अगले दिन सुबह पगड़ी कस कर, मूंछों पर असली घी का हाथ फेर कर वह मेले के लिए तैयार हुआ. चौधरी साहब उसे अपने साथ बैलगाड़ी पर बैठा कर ही ले गए.

मेले में बड़ा मजा आया. मंत्रीजी ने ढेर सारे गरीब लोगों को जमीन के पट्टे बांटे. उस की बारी आई तो वह तन कर खड़ा हो गया. मंत्रीजी ने उस से पूछा कि जमीन का क्या करेगा, तो उस ने बताया कि जमीन तो उसे पहले ही सौंप दी गई है और चौधरी साहब ने हलबैल दे कर उस की पूरी मदद की है.

मंत्रीजी ने चौधरी हरचरनजी को मंच पर बुलवाया. सभा को संबोधित करते हुए कहा कि चौधरी साहब महान देशभक्त हैं. देश को उन जैसे महान व्यक्ति पर गर्व होना चाहिए जिन्होंने हरिया जैसे सर्वहारा और गरीब मजदूर को अपनी जमीन खुशीखुशी दी और जुताई- बोआई में भी उस की सहायता की.

मंत्रीजी ने अपने गले से उतार कर फूलों का हार चौधरी साहब के गले में डाल दिया. चारों ओर ‘चौधरी साहब जिंदाबाद’ के नारे लगने लगे.

दूसरे दिन हरिया जब चौधरी साहब के यहां बैल लेने गया तो परभू काका ने बैल देने से इनकार कर दिया. कहा कि चौधरी साहब का हुक्म नहीं है.

वह दौड़ादौड़ा हवेली में गया.  हरिया को देख कर उन्होंने भौंहें चढ़ा लीं. जब हरिया ने परभू काका की शिकायत की तो चौधरी साहब बही हाथ में ले कर पलंग पर बैठ गए. हरिया हाथ जोड़ कर जमीन पर उकडूं बैठ गया.

‘‘देख बच्चू, तेरा खाता अब ज्यादा हो गया है. तुझे जमीन का पट्टा आज मिला है और तू 3 महीने से हमारी जमीन पर कब्जा किए है. 1 हजार रुपया माहवार किराए के हिसाब से 3 हजार तेरे खाते में जमा है. हलबैल का किराया 5 रुपया रोज के हिसाब से 450 रुपए और ट्यूबवैल के पानी के 300 रुपए. कुल मिला कर 4 हजार रुपए तुझ पर कर्ज हैं. इस के एवज में हम तेरी 7 बीघा जमीन रेहन रख लेते हैं.

‘‘2 रुपए की दर से 80 रुपए का ब्याज तुझे देना है. कल से हमारे खेत पर काम कर के अपना रुपया भर देना. हम तेरी तनख्वाह बढ़ा कर पूरे 100 रुपए कर देते हैं. अब 80 रुपए काट कर 20 रुपए तुझे नगद मिलेंगे. कुछ चनाचबैना भी दे देंगे. जब भी तेरे पास हो मूल रकम का हिसाब कर देना.

‘‘चल, आज से ही हमारे खेत पर काम करना चालू कर दे. और हां, देख, ज्यादा समझदार बनने की कोशिश मत करना. दिल्ली वाले सरकारी आफिसर खाली नहीं बैठे. मंत्रीजी के माथे सौ काम हैं. सरकार को रोजरोज छीछरपुर आने की फुरसत नहीं है. ज्यादा ऊंचा उछलेगा तो हलदीचूना भी उधार न मिलेगा.’’

‘‘लेकिन मालिक, वह पट्टा तो मेरे नाम है,’’ हरिया बड़ी मुश्किल से इतना ही बोल सका.

‘‘भूल जा बच्चू, भूल जा. सबकुछ भूल जा. तू ने ढेर सारे अंगूठे छापछाप कर सब काम सही कर दिए हैं. वे सब फिर हमारे नाम हो जाएंगे. फिर तू इस की परवाह क्यों करता है? तू फौरन अपने काम पर लग जा.’’

हरिया के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह गरदन झुका कर चुपचाप खेत पर चला गया.

कुछ दिनों बाद हरिया एकाएक गायब हो गया. नीचे के तबके में कानाफूसी हुई कि शायद सरकार के पास गया है, न्याय ले कर आएगा.

4 दिन बाद 3 कोस दूर, हरी बाबा के अखाड़े के पीछे वाले नाले में उस की सड़ी हुई लाश दीनू चरवाहे ने देखी थी. सब ने जाना, लेकिन किसी ने कुछ भी नहीं कहा.

लेकिन कर्ज तो पूरा होना ही है. इसलिए अब नत्थी चौधरी साहब के घर की टहल करती है और उस के 2 बच्चे खेत में पसीना बहाते हैं. सुना है वह फिर एक बच्चे को जन्म देने वाली है. Short Hindi Stories

ऐक्टर विजय की रैली में भगदड़: Crowd Management में फेल प्रशासन

Crowd Management: 27 सितंबर को तमिल ऐक्टर जोसेफ विजय की एक पौलिटिकल रैली में भगदड़ के चलते 40 लोगों ने अपनी जान गंवाई. हजारों लोग रैली में शामिल होने आए थे जो विजय की एक झलक देखने आए थे. अक्सर देखा जाता है कि दक्षिण के मुकाबले ऐसा उन्माद उत्तर के कलाकारों के लिए देखने को नहीं मिलता. इस की वजह क्या है, पढ़ें.

तमिलनाडु के करूर में तमिल ऐक्टर विजय की पौलिटिकल पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ यानी टीवीके की चुनावी रैली में 27 सितंबर की शाम भगदड़ मची गई थी. टीवीके का शाब्दिक अर्थ तमिलनाडु विजय पार्टी है. विजय की रैली में भारी संख्या में जुटी भीड़ में भगदड़ में 40 लोगों के मारे और 400 लोगों के घायल होने का मामला सामने आया. अभिनेता से नेता बने विजय की तरफ से मृतकों के परिवार को 20-20 लाख की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है. राज्य पुलिस महानिदेशक जी वेंकटरामन ने बताया कि विजय को रैली स्थल तक पहुंचने में देरी हुई, जिस के कारण भीड़ लगातार बढ़ती चली गई और यह हादसा हो गया.

हमारे देश में इस तरह के हादसे होते रहते हैं. सरकार, समाज और रैली में हिस्सा लेने वाले लोग इस से सबक नहीं लेते हैं. अभी उत्तर प्रदेश में महाकुंभ के दौरान भगदड़ में पचासों लोग मारे गए थे. इस के बाद उत्तर प्रदेश के ही हाथरस में भोलेबाबा के सतसंग में 121 लोगों की भगदड़ में मौत हो गई थी. कई बड़ी घटनाएं मेले और मंदिरों में दर्शन के दौरान हो जाती है. साल में इस तरह की तमाम घटनाएं सामने आती हैं. तमाम घटनाओं के बाद भी हमें भीड़ का प्रबंधन करना नहीं आया जिस की वजह से इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं.

खराब मैनेजमैंट बना दुर्घटना का कारण

टीवीके ने रैली के आयोजन के लिए दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक का समय तय किया था. लेकिन ऐक्टर विजय खुद शाम 7 बजे के बाद रैली स्थल पर पहुंचे. जिस वजह से वहां भीड़ लगातार बढ़ती चली गई. रैली में विजय ने अपना भाषण शुरू किया, लेकिन 7 घंटे से इंतजार कर रहे लोग भूख प्यास से बेहाल हो चुके थे. रैली के दौरान लोगों ने पानी मांगा तो विजय को अपना भाषण बीचबीच में रोकना पड़ा. इस के बाद कुछ लोग बेहोश होने लगे और विजय ने लोगों को गिरते हुए भी देखा. साथ ही मंच से एम्बुलेंस को रास्ता देने की अपील की.

भारी भीड़ और लोगों के बेहोश होने के बाद भी रैली में विजय अपना भाषण जारी रखते हैं. उधर भीड़ के बीच से बेहोश हुए लोगों को निकालने के लिए एम्बुलेंस को भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है. इस के बाद भी विजय का भाषण जारी रहता है. शाम के करीब 7.30 बजे जब विजय अपना भाषण खत्म करते हैं तो वहां खबर फैलती है कि 9 साल की एक लड़की भीड़ में से लापता हो गई है. विजय मदद के लिए कार्यकर्ताओं से अपील करते हैं और घटनास्थल से रवाना हो जाते हैं.

इस के बाद अचानक बिजली गुल हो जाती है और पहले से जमा भीड़ बेकाबू होने लगती है. हर तरफ भगदड़ मच जाती है और लोग अपनी जान मचाने के लिए इधरउधर भागना शुरू कर देते हैं. पहले जो भीड़ नियंत्रित नजर आ रही थी, वह बिजली गुल होने के बाद अचानक से बेकाबू हो जाती है और इतनी बड़ी घटना घटती है. आयोजन वाली जगह से बाहर जाने वाली सड़क काफी संकरी थी और चलनेफिरने तक की जगह नहीं थी.

तमिलनाडु के डीजीपी वेंकटरमन ने बताया कि आयोजकों ने 10 हजार लोगों के आने की उम्मीद जताई थी, लेकिन एक्टर की एक झलक पाने के लिए करीब 27 हजार लोग रैली स्थल पर जुट गए थे. उन्होंने कहा कि टीवीके के एक्स अकाउंट पर कहा गया था कि एक्टर 12 बजे रैली करने आएंगे और सुबह 11 बजे से ही भीड़ आनी शुरू हो गई थी. वह शाम सात बजे के बाद आए, तेज धूप में लोगों के पास पर्याप्त भोजन और पानी तक नहीं था.

विजय का इंतजार काफी लंबा हो गया था. इस बीच शाम 7 से 7.30 बजे तक बिजली गुल रही और उन के आने से ठीक पहले भीड़ उमड़ पड़ी. जिस से बड़े और छोटे बच्चों को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कई लोगों की मौत का कारण दम घुटना बताया गया है. पुलिस और टीवीके के कार्यकर्ता पर्याप्त इंतजाम करने में विफल रहे. किसी को भी यह नहीं पता था कि एम्बुलेंस कहां हैं. पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी और सड़क बहुत ही ज्यादा संकरी थी.

कई लोग भागने की कोशिश में सड़क किनारे निचले नाले में गिर गए. कुछ लोग छप्पर की छतों पर चढ़ गए और गिर गए. पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज भी किया. रैली में आए लोग विजय के नारे लगा रहे थे, जिस से कई लोगों को पता ही नहीं चला कि वहां भगदड़ मच गई है. लोग जमीन पर गिरे हुए लोगों पर पैरों से ठोकर मार रहे थे. अगर सही तरह से भीड़ प्रबंधन किया गया होता तो इस तरह की घटना को रोका जा सकता था.

कौन है अभिनेता से नेता बने विजय

22 जून, 1974 में जन्मे विजय अब तक 68 फिल्मों में एक्टिंग कर चुके हैं. विजय ने एक्टिंग की दुनिया में बतौर बाल कलाकार कदम रखा था. 1984 में उन्होंने महज 10 साल की उम्र में वेत्री नाम की फिल्म में अभिनय किया था. 4 दशक से साउथ के सिनेमा में सक्रिय विजय करोड़ों रुपये की संपत्ति रखते हैं. विजय की संपत्ति लगभग 474 करोड़ रुपए है.

फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक वह भारत के दूसरे महंगे पेड एक्टर हैं. एक फिल्म के लिए वह 130 से 275 करोड़ रुपए तक फीस लेते हैं. चैन्नई के नीलांकरई में कैसुआरिना ड्राइव पर समुद्र किनारे बना उन का सफेद महलनुमा बंगला लोगों को आकर्षित करता है. इस बीच हाउस का आइडिया हौलीवुड स्टार टौम क्रूज के बीच हाउस से लिया है. विजय के पास बीएमडब्ल्यू एक्स5-एक्स6, औडी ए8 एल जैसी 15 लग्जरी कारों का कलेक्शन है. विजय पर फिल्म से हुई कमाई को छिपाने का भी आरोप है. यह मामला अभी कोर्ट में लंबित है.

विजय ने अपनी स्कूलिंग चैन्नई के फातिमा मैट्रिकुलेशन हायर सैकेंडरी स्कूल से शुरू की. बाद में उन्होंने बालालोक मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की. फिर लोयोला कालेज, चैन्नई से वह विजुअल कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन करने लगे. थलापति विजय ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी नहीं की और वह एक्टिंग के क्षेत्र में चले गए. उन की शादी 1999 में ब्रिटेन में रहने वाली श्रीलंकाई मूल की उन की फैन संगीता से हुई. इन का एक बेटा और बेटी है.

राजनीति को पंसद नहीं करते थे विजय

तमिल अभिनेता जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ थलापति विजय का जीवन सिर्फ फिल्मों और ग्लैमर तक सीमित नहीं रहा. 2021 में राजनीति से दूर रहने की शर्त पर वे अपने मातापिता के खिलाफ कोर्ट तक जा चुके थे. उस समय उन के नाम पर नई पार्टी बनाने के मामले में उन्होंने पिता फिल्म डायरेक्टर एस. ए. चंद्रशेखर और मां सिंगर शोभा पर सिविल मुकदमा दर्ज कराया था. विजय का कहना था कि उन के मातापिता ने 2020 में उन के फैन क्लब ‘विजय मक्कल इयक्कम’ को चुनाव आयोग में राजनीतिक पार्टी के रूप में रजिस्टर करा दिया था.

विजय का राजनीति में शामिल होने का कोई इरादा नहीं था. उन्होंने अपने फैंस से भी कहा था कि वे पार्टी ज्वाइन न करें, क्योंकि यह उन के पिता ने शुरू की थी. इस में उन की मां कोषाध्यक्ष थीं. तब विजय ने 11 लोगों के खिलाफ भी केस दर्ज कराया ताकि कोई उन का नाम या छवि राजनीतिक इस्तेमाल के लिए न करे. इस के बाद सितंबर 2021 में उन के पिता ने पार्टी भंग कर दी. अपनी कही बात से मुकरते हुए ढाई साल बाद विजय ने खुद राजनीति में कदम रख लिया.

हिंदी फिल्मों के कलाकारों से अलग होते हैं दक्षिण के कलाकार

2 फरवरी 2024 को उन्होंने अपनी नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके)’ का ऐलान किया और फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने की बात भी कही. फैंस हैरान रह गए. जो शख्स ढाई साल पहले राजनीति से दूर रहना चाहता था. वही अब खुद पूरी तरह राजनीति में उतर आया. दक्षिण भारत के फिल्म कलाकार जनता से जुड़े रहते हैं. जिस की वजह से वह काफी लोकप्रिय होते हैं. वह जितने कलाकार के रूप में पंसद किए जाते हैं उतने ही नेता के रूप में भी पंसद किए जाते हैं. इस का सब से बड़ा कारण यह है कि दक्षिण भारत के कलाकार व्यवस्था के खिलाफ रील और रीयल लाइफ दोनों जगहों पर जनता के साथ खडे होते हैं. हिंदी फिल्मों के कलाकार इस के उलट सत्ता के साथ रहते हैं. जिस तरह की भीड़ विजय की रैली में आई क्या हिंदी फिल्मों का कोई कलाकार इस तरह की भीड़ जुटा सकता है ?

हिंदी फिल्मों के कलाकार सत्ताधारी पार्टियों की पिछलग्गू बने रहते हैं. समाजवादी पार्टी ने फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन को 5वीं बार राज्यसभा में भेजा है. 25-30 साल से वह सपा के साथ जुड़ी हैं. पहले जब कांग्रेस सत्ता में थीं तो इन के पति अभिनेता अमिताभ बच्चन कांग्रेस के साथ थे. कांग्रेस जब सत्ता से बाहर गई तो अमिताभ बच्चन ने कांग्रेस छोड़ दी. अमर सिंह के साथ समाजवादी पार्टी में जुड़े. अमिताभ तो राजनीति में नहीं हैं पर उन की पत्नी जया बच्चन सपा से राज्यसभा की सांसद हैं.

फिल्मों से राजनीति में आए उत्तर भारत के कलाकारों में बड़ी संख्या ऐसे कलाकारों की है जो सत्ताधारी पार्टी के पिछलग्गू बन कर कुर्सी हासिल करने की फिराक में रहते हैं. यह राजनीति में पहुंच कर भी फकत तमाशाई रहते हैं. इस के उलट दक्षिण भारत के फिल्म कलाकार सक्रिय राजनीति करते हैं. यह सत्ता के विरोध में रहते हैं. इस कारण ही जनता इन को पसंद करती है.

फिल्मों में काम करते हुए राजनीति में कदम रखने वाले कलाकारों की लिस्ट लंबी है. इन कलाकारों ने जो दम फिल्मों में दिखाया वैसा दमदार प्रभाव राजनीति में दिखाने में सफल नहीं रहे हैं. इस से उन की पर्दे की नकली छवि का पता चलता है. पर्दे पर हीरो दिखने वाले यह कलाकार राजनीति में जीरो साबित होते हैं. राजेश खन्ना सुपरस्टार थे. एक के बाद 15 हिट फिल्में दी थीं. उन्होंने अपनी फिल्मी कैरियर की शुरुआत अपनी फिल्म ‘आखिरी खत’ से की थी. ये फिल्म 1966 में रिलीज हुई थी. जिस के बाद उन्होंने 166 फिल्मों में बेहतरीन काम किया.

इस के बाद 1991 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के मुकाबले लड़ा पर हार गए. राजेश खन्ना ने बाद में शत्रुघन सिन्हा को हरा कर लोकसभा के सदस्य बने. इतनी हिट फिल्में देने वाले राजेश खन्ना राजनीति में अपनी छाप छोड़ने में सफल नहीं हुए. गोविंदा भी सत्ता के सहारे राजनीति में उतरे थे. वह भी राजनीति में सफल नहीं हुए. कुछ यही हाल बौलीवुड के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन का हुआ.

फिल्मों से ब्रेक ले कर राजीव गांधी के कहने पर वह इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा था और वो जीत भी गए थे. जब कांग्रेस संकट में आई बोफोर्स घोटाले का आरोप लगा तो अमिताभ बच्चन ने राजनीति से पलायन किया. फिर कभी राजनीति में प्रवेश नहीं करने की कसम खाई. ‘जंजीर’ जैसी तमाम फिल्में देने वाले अमिताभ पर्दे पर कैसे दिखते थे और राजनीति में पलायनवादी निकले.

विनोद खन्ना ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत 60 के दशक में आई फिल्म ‘मन का मीत’ से किया था. वह पंजाब के गुरदासपुर से सांसद चुने गए. इस कड़ी में एक नाम मिथुन चक्रवर्ती का भी है. सनी देओल ने 63 की उम्र में राजनीति में एंट्री ली है. 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सांसद सुनील जाखड़ और आप के पीटर मसीह को भारी अंतर से हराने के बाद पंजाब के गुरदासपुर निर्वाचन क्षेत्र से सांसद बने हैं. फिल्म ‘गदर’ उन का किरदार बहुत पंसद किया गया. वैसा दमदार काम राजनीति में नहीं कर सके.

धर्मेन्द्र ने भी साल 2004 में बीजेपी का हाथ थामा था. पार्टी की ओर से उन को बीकानेर से टिकट दे कर लोकसभा में पहुंचाया गया था. जब भी सदन की कार्यवाही या सत्र चलता था तो वो उस में नहीं जाते थे, जिस के चलते राजनीति में उन का कैरियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया.

दिग्गज एक्ट्रैस रेखा भी साल 2012 से राज्यसभा सांसद रही हैं. रेखा भी सदन में सत्र के दौरान कम ही आया करती थीं, जिस का सीधा असर उन के राजनीति कैरियर के लिए भारी साबित हुआ और एक्ट्रैस ने भी राजनीति में एक्टिव रहना कम कर दिया.

शबाना आजमी बौलीवुड की एक बेहतरीन हीरोइन रही हैं. उन्होंने अपनी फिल्मों से बौलीवुड में सिनेमा की रूप रेखा बदलने में बहुत मदद की है. जिस वजह से एक्ट्रैस को राज्यसभा की सदस्यता हासिल है. फिल्मों जैसा प्रभाव वह राजनीति में डालने में सफल नहीं रहीं. फिल्म कलाकार परेश रावल ने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. गुजरात के अहमदाबाद पूर्व निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के सांसद हैं. राजनीति में कुछ नया करने में सफल नहीं हुए हैं.

स्मृति ईरानी ने एक मौडल के तौर पर टीवी इंडस्ट्री में कदम रखा था. उन को टीवी की रानी कहा जाता था. जिस के बाद उन्होंने राजनीति में अपना कदम रखा. स्मृति ईरानी मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रहीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में वह अमेठी से चुनाव हार गईं. इस के बाद उन की राजनीति खत्म हो गई. अब उन को ले कर खबरें आ रही हैं कि वह राजनीति छोड़ कर वापस फिल्मों में जा रही हैं.

शौर्टगन कहे जाने वाले शत्रुघ्न सिन्हा भारतीय जनता पार्टी सरकार में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण और जहाजरानी मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं. इस के बाद वह राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए. 2019 के आम चुनाव में भाजपा ने उन को टिकट नहीं दिया था. राजनीति में फिल्मों जैसी सफलता उन को नहीं मिली. राज बब्बर भी इसी तरह के कलाकार हैं. फिल्मों की दुनिया को अलविदा कहने के बाद वह 3 बार लोकसभा के सदस्य और दो बार भारतीय संसद के राज्य सभा के सदस्य रहे हैं. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. ऐसा कोई उल्लेखनीय काम याद नहीं आता जो समाज के लिए किया हो. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहते पार्टी को चुनाव जितवाने में सफल नहीं रहे.

सुनील दत्त ने अपना सब से ज्यादा समय राजनीति को दिया और उस से उन के पारिवारिक रिश्ते भी बहुत दिक्कत में आ गए थे. उन्होंने 1984 से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की और 5 बार कांग्रेस पार्टी से सांसद रहे. इस के बाद भी फिल्मों जैसा प्रभाव राजनीति में नहीं डाल सके. लोकप्रिय हीरो रहे गोविंदा का फिल्मी कैरियर 80 के दशक में शुरू हुआ था. उन्होंने बौलीवुड में सारी भूमिकाओं में अपना नाम कमाया जिस के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा. 2004 के लोकसभा चुनाव में 15 हजार वोटों से मुंबई उत्तर सीट जीती और राजनीति में अपनी यात्रा शुरू की. राजनीति में फिल्मों जैसी सफलता इन के खाते में भी दर्ज नहीं हुई.

भोजपुरी फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुके एक्टर रवि किशन और मनोज तिवारी सासंद हैं. दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ 2024 का लोकसभा चुनाव हार गए. यह भी भोजपुरी फिल्मों या समाज को नेता के रूप में कुछ भी देने में सफल नहीं रहे हैं. जया प्रदा ने तेलुगू, तमिल, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, बंगाली और मराठी फिल्मों में काम किया है. एक्ट्रैस एक दौर में स्टारडम के मामले में श्रीदेवी को टक्कर देती थीं. लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने फिल्मों का दामन छोड़ राजनीति में आ गईं. वह 2004 से 2014 तक रामपुर से सांसद थीं. वह अपने प्रभाव से कभी चुनाव नहीं जीत सकीं. यही हालत ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की है. वह भाजपा की सांसद हैं. अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकतीं.

प्रभावी रहे हैं दक्षिण के कलाकार

भारत के मुकाबले दक्षिण भारत के कलाकार अधिक सफल रहे हैं. वह राजनीति में केवल तमाशाई ही नहीं रहे. समाज को बदलने का काम किया है. एमजी रामचद्रंन, एनटी. रामाराव और जयललिता तो इस का बड़ा उदाहरण रही ही हैं. दूसरे कलाकारों ने भी अपनी पहचान बनाई है.

इन में कमल हासन का नाम प्रमुख हैं. उन्होंने अपनी फिल्म एक दूजे के लिए 1981 से बौलीवुड में एंट्री ली थी. जिस के बाद अब उन्होंने अपनी खुद की पार्टी से शुरुआत की है. उन की पार्टी का नाम ‘मक्कल निधि मैयम’ है. दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत ने भी 2021 में अपनी नई पार्टी बनाई.

दक्षिण भारत के कलाकार जनता के मुददों से जुड़ कर काम करते हैं. जिस के कारण जनता उन को हीरो मानती है. वह सरकार के खिलाफ जनता के मुददों को ले कर काम करते हैं. इस कारण फिल्मों से राजनीति में आ कर प्रभावी भूमिका अदा करते हैं. यह केवल सांसद विधायक ही नहीं बने रहते हैं. प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बने हैं. इन में एमजी रामचन्द्रन, जयललिता और एनटी रामाराव जैसे कलाकार फिल्मों से राजनीति में आए और यहां भी शिखर तक पहुंचे. उत्तर भारत के कलाकार केवल राजनीति दलों के पिछलग्गू बने रहे. इस वजह से वह कोई बड़ी ताकत नहीं बन पाए. अभिनेता विजय की तरह भीड़ जुटाने में उत्तर का कोई कलाकार कभी नहीं कर सकता है. देश को हादसों से बचने के लिए भीड़ के प्रबंधन का तरीका सोचना पड़ेगा. नहीं तो ऐसे हादसों को रोकना अंसभव है. Crowd Management

Story In Hindi: यह दुनिया उसी की जमाना उसी का

Story In Hindi: रशीद धोबी की अचानक मृत्यु हो गई. संयोगवश या सदमे से या फिर इस खुशी से कि अब उसे बो झ नहीं ढोना पड़ेगा, उस का गधा भी उसी दिन दुनिया से विदा हो गया.

बेचारे रशीद के खाते में कोई गलत काम तो था ही नहीं. सो, वह सीधा स्वर्ग के दरवाजे पर पहुंचा. लेकिन समस्या यह हुई कि पीछेपीछे उस का वफादार गधा भी आ गया और जिद करने लगा कि वह भी अपने मालिक यानी उन के संग स्वर्ग जाएगा. मगर दूतों ने उसे एंट्री देने से साफ इनकार कर दिया क्योंकि गधों के लिए स्वर्ग में रहने का कोई प्रावधान नहीं था.

रशीद ने गधे को सम झाया, ‘‘भाई, तू मेरा टाइम बरबाद मत कर और लौट जा. स्वर्ग में भला गधा कैसे रह सकता है?’’

परंतु गधा अड़ गया, ‘‘वाहवाह, जीवनभर आप की सेवा की, बो झ ढोता रहा, डंडे खाए, डांट सुनी और मरा भी तो आप के साथ. अब आप अकेले ही स्वर्ग में मजे लूटना चाहते हैं. सच है कि मनुष्य जैसा स्वार्थी जीव कोईर् दूसरा नहीं. लेकिन मैं तो आप के साथ ही रहूंगा.’’

रशीद ने कहा, ‘‘देखो भई, यदि तुम कुत्ते होते, तो स्वर्ग जा भी सकते थे. दूसरा कोई जानवर इतना हाईफ्लाइंग नहीं हो सकता.’’

‘‘मैं कुछ सम झा नहीं?’’ गधे ने सिर हिलाते हुए कहा.

रशीद  झुं झला गया, ‘‘बात तो बिलकुल साफ है. तुम जैसे कितने ही जानवर हैं जो मनुष्य की सेवा करने के लिए जीवनभर कड़ी से कड़ी मेहनत करते हैं, जैसे बैल, भैंस, घोड़े, बकरी, भेड़. ऊंट आदि. क्या तुम ने इन सब की सुरक्षा, इलाज, फैशन, मेकअप, ब्यूटी शो या कुछ नहीं तो गुडलिविंग कंडीशन के लिए कभी किसी संस्था, किसी एनजीओ, किसी आश्रम या फेसबुक का नाम सुना है जो इन पशुओं को एडौप्ट करने यानी गोद लेने या सुरक्षा देने के लिए बनाई गई हो?

‘‘फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने अपने कुत्ते के लिए एक फेसबुक अकाउंट ‘बीस्ट’ के नाम से खोल रखा है. कुछ समय पहले नफीसा अली ने अपने कुत्ते ‘माचो’ की सेवा करने के लिए ग्लैमर की दुनिया से कुछ दिनों की छुट्टी ले ली थी. यही नहीं, उन्होंने अपने एक दूसरे पेट डौग की याद में इंग्लिश भाषा में एक पुस्तक भी लिख डाली जिस का नाम है, ‘हाऊ चीका बिकेम अ स्टार ऐंड अदर डौग स्टोरीज.’

‘‘गुल पनाग ऐसी दरियादिल हैं कि अपने कुत्ते माईलो को हवाई जहाज का सफर करवाती हैं और ऐसे होटलों में चेकइन करती हैं जहां कुत्तों के ठहरने की भी व्यवस्था हो. जैसा कि मुंबई के फोर सीजन होटल में.’’

‘‘लेकिन बहुत सारे कुत्ते गरीबी की हालत में इधरउधर मारे फिरते हैं. उन्हें तो कोई नहीं पूछता?’’ गधे ने एतराज किया.

रसीद हंस पड़ा, ‘‘इतनी सी बात नहीं सम झे? आखिरकार हो तो तुम गधे ही. सुनो भाई, फाइवस्टार लाइफ कौन गुजारता है? अमीर और चमकीले लोग. तो, कुत्ते भी वही मौज करते हैं जो उच्च कोटि यानी उच्च वंश के हों. जैसे, अमिताभ बच्चन ने एक शैनौक पाल रखा है. शाहरुख खान ने अपने लिए 2 कुत्ते विदेश से इंपोर्ट करवाए थे, तो प्रियंका चोपड़ा एक कोकर स्पैनियल ब्रांड के इश्क में डूबी हुई थीं.’’

गधे ने रशीद का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘‘आप का सामान्य ज्ञान काफी वीक है. आप को यह पता नहीं कि अब देशी गरीब कुत्तों का समय भी आ गया है. सुना है हौलीवुड की स्टार पामेला एंडरसन ने कुछ दिनों पहले मुंबई के एक अनाथ कुत्ते यानी सड़क पर फिरने वाले आवारा कुत्ते को एडौप्ट किया यानी गोद लिया है.’’

‘‘यह तो एक अपवाद है. प्रश्न यह है कि क्या आज तक किसी ने दूसरे किसी पशु को गोद लिया है? गाय व भैंस जिन के दूध के बिना मनुष्य का जीवन अधूरा है, उन की लिविंग कंडीशन क्या है? वे  कितनी गंदी, गीली, कूड़ेकरकट तथा कीड़ेमकोड़े से भरी हुई जगहों में बांधी जाती हैं. चारे के नाम पर उन्हें जूठन व सूखी घास खाने को मिलती है,’’ गधे के मालिक रशीद ने कहा.

अब गधे ने धीरे से व्यंग्य किया, ‘‘लेकिन, गाय माता का तो बहुत आदरसत्कार करते हैं.’’

रशीद भड़क उठा, ‘‘ऐसे पाखंड से उसे क्या लाभ पहुंचता है? क्या कभी किसी ने गाय को अपना पेट बनाया है? क्या कोई उस के गले में किसी फैशन डिजाइनर का बनाया हुआ बहुमूल्य चमकता हुआ पट्टा डाल कर शान से सैर करने निकला है? पनीर, दही, मक्खन, आइसक्रीम व दूध से बने अन्य हजारों व्यंजन बेच कर मिलियन और बिलियन कमाने वाले किस इंडस्ट्रियलिस्ट ने अपनी गायभैंसों के लिए फेसबुक अकाउंट खोला है?

‘‘उन के रहने की जगह को क्या एयरकंडीशंड बनाया है? उन के गले में बांहें डाल कर क्या अपनी तसवीर छपवाई या पोस्ट की है? प्रतिदिन 100 एवं 200 टन लोहे की छड़ें, पत्थर, सीमेंट और ईंटों आदि से भरी गाड़ी खींचने वाले और उस पर भी गाड़ीवान के हंटर खाने वाले मासूम बेजबान बैल और भैंसे के बारे में किसी ने कोई पुस्तक लिखी है? क्या कोई एनजीओ गठित हुआ?’’

‘‘आखिरकार, ऐसा अन्याय क्यों है?’’ गधा बेचारा बड़ा हैरान था.

‘‘इसलिए कि मनुष्य को पक्षपात की आदत पड़ चुकी है. सो, हमारी हाईटैक मौडर्न सोसाइटी केवल ऊंची नस्ल के विदेशी कुत्तों को ही महत्त्व देती है. साईं आश्रम डौग एडौप्शन हो या फैंडीकोज, इन साइटों के सारे पेज इसी तरह के कुत्तों की तसवीरों से भरे पड़े हैं. सो, अब तुम भी मेरा रास्ता छोड़ दो, और जा कर विधाता से शिकायत करो,’’ रशीद ने अपनी बात रखी.

रशीद के तर्कों को सुन कर बेचारा गधा लाजवाब हो कर वापस जाने लगा. इतनी देर में स्वर्ग में एंट्री का समय समाप्त होने लगा और द्वार बंद किए जाने लगे.

रशीद के पैरोंतले मानो आकाश सरकने लगा. गधा भी पछता रहा था. गधे को सहसा एक आइडिया, फ्लैशलाइट की भांति कौंधा. जल्दी से उस ने कुत्ते की आवाज बना कर भौं…भौं…भौं… जोर व शोर से भूंकना शुरू कर दिया. रशीद को भी इशारा मिल गया था. उस ने तुरंत गधे  के गले में बांहें डाल दीं और बड़े गर्व से दूतों से बोला, ‘‘जी, यह मेरा पेट अलसेशियन गुड्डू है. यह एक फैंसी ड्रैस शो, मेरा मतलब है डौग फैंसी ड्रैस शो, में भाग लेने गया था. सहसा इसे मेरी मृत्यु की खबर मिली तो मेकअप और कौस्ट्यूम चेंज किए बिना ही मेरे पीछेपीछे भागता हुआ आ गया. प्रेम और वफा तो इसे कहते हैं. आई लव माई गुड्डू.’’

रशीद ने भावविभोर होने की अच्छी अदाकारी की. दूत प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. ‘‘औफकोर्स, लव और वफादारी का यह अतुल्य नमूना है.’’ एक दूत ने प्रशंसाभरी निगाहों से उसे निहारते हुए कहा.

दूसरे दूत गधे की ओर देखते हुए नम्रता से बोले, ‘‘वाट अ वंडरफुल डौग. यू कैन टेक योर मास्टर विद यू. रशीद भी तुम्हारे साथ स्वर्ग जा सकता है. वी हैव नो औब्जैकशन.’’

‘‘हिपहिपहुरररे’’ रशीद और उस का गधा शीघ्रता से दौड़ कर स्वर्ग के भीतर प्रवेश कर गए.

उन दोनों में आज भी यह विवाद जारी है कि कौन किस की चतुराई के कारण स्वर्ग के मजे लूट रहा है.

पाठक महोदय, आप किस का झ्र साथ देंगे… Story In Hindi

Hindi Story: साब… ‘भारत’ नाम भी बदल दो!

Hindi Story: हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को किसी देशवासी ने एक पत्र लिखा, और फेंक दिया शायद, अब यह मुझे सड़क पर पड़ा मिला है. पहले तो सोचा, डाक के डिब्बे में डाल दूं. फिर जाने क्या मन में आया की खोला और पढ गया.किसी अज्ञात भारतीय ने मोदी जी की कार्यप्रणाली पर मन का गुबार निकाला है .मैं ने इसे पढ़कर सोचा, क्यों न हमारे प्रिय पाठक भी इसे एक नजर देख ले. सो नीचे पत्र शब्दश:प्रकाशित किया जा रहा है.

नरेंद्र मोदी साहब!

आप हमारे प्रधानमंत्री हैं.काफी अरसे से मैं आपके कामकाज पर नजरें गड़ाए हुए हूं .मैं देख रहा हूं आप उस धावक के जैसे व्यवहार कर रहे हैं, जो एक बार में ही 50, 100, 200, 500 मीटर की दौड़ में गोल्ड मेडल पाना चाहता है. मैं देख रहा हूं, आप उस बाॅलर की तरह है जो एक बाल में सारे खिलाड़ियों को आउट करने पर तुला हुआ है.

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क्या यह संभव है?आप जैसा गुणी आदमी, यह कैसी भूल कर रहा है. आप तो हीरे हैं!हीरे!! फिर अपनी चमक, आभा को बढ़ाने के बजाय ऐसी स्थिति क्यों पैदा किए जा रहे हैं की जो आपको देखे वह अपना सर पीटता रह जाए.
आप तो अपने समय काल मे सब कुछ बदल देने पर तुले हैं. यह बदल दो, वह बदल दो, इसे ठीक कर दो, उसे फैक दो… यह सब क्या है .

कभी योजना आयोग को भंग करने की तैयारी करते है. अभी नोटबंदी करते हैं, कभी पाकिस्तान पहुंचकर पाक को नमन करते हैं कभी पाक को नापाक बताते हैं…क्यों ? क्या इसलिए की इस रास्ते पर गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव चले थे सिर्फ इसलिए सबकुछ बदल देना चाहते हैं ? योजना आयोग को भंग करके आप देश को ऐसी नवीन संस्था देने की चाहत रखते हैं ताकि हम देशवासियों आपको याद करें और उस पहले प्रधानमंत्री को भूल जाएं जो कांग्रेस का प्रतिनिधि था, जो खुद कांग्रेस था, भारत था, देश था. आपके इस देश में क्या हो रहा है कभी गाय मुद्दा बन जाती है कभी मुसलमान और हिंदू! आज नागरिक संहिता को लेकर सड़कों पर लोग निकल पड़े हैं मोदी साब… यह क्या हो रहा है संसद में आपके गृहमंत्री मंत्री कुछ कहते हैं और संसद के बाहर आप कुछ कहते हैं.

क्यों हर उस संस्था पर आपकी निगाह है, जो कांग्रेस ने खड़ी की है .संविधान में अगर कमियां हैं तो आप उसे सर्व अनुमति से दुरुस्त करें .आप तो एक सुयोग्य तीक्ष्ण दृष्टि वाले प्रधानमंत्री है. सब जानते हैं, सर्व जानकार हैं , आप सब कुछ बदलने पर क्यों तुले हुए हैं . इसलिए मुझे आपकी नियत पर शक हो रहा है.

मोदी साब… आप बड़ी चालाकी से वह सब कुछ करना चाहते हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आपके ‘कान’ में पढता रहा है .मुझे तो लगता है,आप मोहन भागवत के हाथों की “कठपुतली’ मात्र हो. उन्हें खुश किए जा रहे हो .जबकि आपको इस देश ने प्रधानमंत्री चुना है .अब आपका दायित्व देश के प्रति है या किसी संस्था विशेष के प्रति, यह हम गरीब गुरबों को जरुर बताना चाहिए. आपकी आकर्षक बाते, आपके व्यक्तित्व, देश के प्रति समर्पण, विकास की भावना को देखकर हम लोगों ने आपको मत दिया था .

अब आप चतुराई का प्रदर्शन कर रहे हैं. कहते हैं हम सबकुछ सर्वसम्मति से कर रहे हैं. मुख्यमंत्रियों की राय ले रहे हैं .अरे! आपने तो वह सब कर दिखाया है जिसकी तो कल्पना तक हम आम लोगों ने नहीं की थी.

मोदी साब… आपको याद है की नहीं, हमारे देश का नाम भी अब बहुत प्राचीन हो गया है. लगे हाथ इसे भी बदल दीजिए. भारत नाम मे भी शायद आपको कोई बात नजर नहीं आती होगी. या इंडिया… को ही बदल दीजिए. इस पर भी कैबिनेट में फैसला ले लीजिए और ज्यादा हो तो आप अपने आका से परामर्श ले लीजिए.

आप में बदलाव और अपने नाम के प्रति बड़ा आकर्षण है .मुझे लगता है, आप जल्दी बाजी में है और जल्द से जल्द अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखाना चाहते हैं .इसलिए जो भाजपा, भाजपा के नारे लगाता है आपको पसंद नहीं आते और जो मोदी मोदी चिल्लाता है उसे आप सर आंखों पर बैठा लेते हैं.

गोकि मोदी साब… अब देश का नाम बदल ही दीजिए. आप अमर हो जाओगे .संसार और देश के इतिहास में आपका नाम हमेशा याद किया जाएगा कि आपने प्रधानमंत्री बनने के साथ भारतवासियों को भारत से निजात दिलाई और एक नए देश का, जो उज्जवल है, उजास से भरा है स्पूर्ति दायक है ऐसा नाम दिया है की सारे देशवासी गर्वान्वीत है! आपका भी काम हो जाएगा और हमारा भी कल्याण हो जाएगा.

अन्यथा, आप बेवजह परेशान रहेंगे .यह बदल दूं, वह बदल दूं. क्या करूं जो छा जाऊं क्या करूं की आका प्रसन्न हो, यह सोचते-सोचते आपका टैलेंट चुकने लगेगा और कुछ गलत हो जाएगा .मोदी साब… आप सौ सुनार की एक लोहार की तर्ज पर सीधे देश का नाम ही बदल दे. बस ! हो गया आपका काम.

क्या टुकुर टुकुर. आप को यह शोभा नहीं देता .यह योजना आयोग, यह राष्ट्रपिता, यह नेहरू की प्रतिमा यह इंदिरा गांधी ये राजीव टर्मिनल क्या-क्या बदलोगे भाई. साठ सालों में इन कांग्रेसियों ने हर चौक चौराहे पर कब्जा कर लिया है आप परेशान हो जाओगे.

मैं आपका एक बहुत बड़ा फैन हूं. मैं आपको नित्य प्रति दिन देखता हूं. सुनता हूं. मुझे लगा, आप परेशान हो, मैं आपके मनोविज्ञान को थोड़ा-थोड़ा समझ रहा हूं. इसलिए यह पत्र लिख रहा हूं .कहीं धृष्टता हुई तो क्षमा करना . अच्छा लगे तो लौटती डाक से एक लाईन का ही सही, ‘धन्यवाद’ का पत्र भेजना. Hindi Story

Hindi Story : अब पछताए होत क्या 

Hindi Story : दामोदर के ऊपर कामिनी समेत 20 औरतों ने छेड़छाड़ करने का केस दायर किया था. प्रधानमंत्री ने सख्ती दिखाते हुए उन्हें मंत्री पद से हटा दिया. चूंकि वे वरिष्ठ मंत्री रहे हैं इसलिए उन से इस्तीफा लिया गया और अदालत के फैसले के आधार पर उन के ऊपर कार्यवाही होगी.

इस सब में प्रधानमंत्री का बयान आग में घी का काम कर रहा था, ‘मैं ने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारियों का पालन करते हुए दामोदर से इस्तीफा ले कर मंत्रिपरिषद से बाहर कर दिया है. अदालत बिना किसी दबाव के इस मसले पर फैसला लेगी.’

‘‘बड़ा ईमानदार बनता है. सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली,’’ दामोदर गुस्से में बड़बड़ा रहे थे. वे राजनीति में 50 साल यों ही नहीं गुजार चुके थे. उस में भी वे 30 साल से ज्यादा पत्रकारिता जगत में गुजार चुके थे. कामिनी को वे ही पत्रकारिता में लाए थे.

शाम को अपनी सफाई में दी गई प्रैस कौंफ्रैंस में दामोदर वहां आए पत्रकारों पर फट पड़े, ‘‘मैं खुद पत्रकार के रूप में सालों से आप के साथ रहा हूं और काम कर रहा हूं. इन आरोपों में कोई दम नहीं है, पर पत्रकार के रूप में आप सब जांच में सहयोग दें और सच को छापें.

‘‘मैं ने भी मंत्री पद से इसलिए इस्तीफा दिया क्योंकि न्यायपालिका में मेरा पूरा विश्वास है कि वह सही जांच करेगी. दूसरी बात यह है कि जिस दिन की बात कामिनी बता रही हैं, उस दौरान मैं प्रधानमंत्री के श्रीलंका दौरे को कवर करने वहां गया था और एक वक्त में मैं 2 जगह नहीं रह सकता.’’

‘‘फिर कामिनी ने आप पर आरोप क्यों लगाया?’’ एक पत्रकार का यह सवाल था.

‘‘आरोप तो कोई भी किसी पर लगा सकता है, मेरे इतने साल के पत्रकारिता और राजनीति के कैरियर में जब कोई गलती नहीं दिखाई दी तो मेरा सीधा चरित्र हनन कर डाला,’’ दामोदर मानो सफाई देते हुए बोले.

मीटिंग खत्म कर के वे कमरे में लौटे तो उन का कामिनी की पुरानी बातों और यादों पर ध्यान चला गया.

‘कामिनी, आप क्या लिखती हैं?’ दामोदर उस की रचनाओं और बायोडाटा को देखते हुए बोले थे.

‘कुछ नहीं बस आज से जुड़े विषयों पर छिटपुट रचनाएं लिखी हैं.’

‘अभी तुरंत कुछ लिख कर दीजिए,’ दामोदर 4 पेज देते हुए बोले थे.

कामिनी ने थोड़ी ही देर में एक ज्वलंत विषय पर रचना लिख कर दे दी थी. इस के बाद इतिहास से एमए पास कामिनी अकसर लिखती और उस की रचना छपने लगी थी.

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उस दिन भी कवरेज के लिए जब दामोदर कानपुर गए थे, तो कामिनी उन के साथ थी. बारिश हो रही थी. रात के 11 बजे जब वे कमरे में पहुंचे तो दोनों भीग चुके थे.

इस के बाद दामोदर ने कामिनी के साथ होटल में छक कर मजे लूटे थे. कामिनी ने भी भरपूर सहयोग दिया था. आग में घी तब पड़ा था, जब दामोदर कामिनी के बजाय राधा से शादी कर बैठे थे.

‘इतने दिनों तक मेरा इस्तेमाल किया, फिर…’ कामिनी बिफरते हुए बोली थी.

‘फिर क्या, हम दोनों ने एकदूसरे का इस्तेमाल किया है. तुम ने मेरे नाम का और मैं ने तुम्हारा. यह दुनिया ऐसे ही कारोबार पर चलती है,’ दामोदर सपाट लहजे में बोले थे.‘मैं आप को बदनाम कर दूंगी. आखिर उस राधा ने क्या दिया है आप को?’ कामिनी गुस्सा में बड़बड़ा रही थी.

‘तुम खुद टूट जाओगी. दूसरी बात यह कि मैं ने मंत्री की बेटी से शादी की है, तो अब सब अपनेआप मिल जाएगा,’ दामोदर सफाई देते हुए बोले थे.

फिर धीरेधीरे दोनों दूर हो गए थे. दामोदर ने सालों से कामिनी का चेहरा नहीं देखा था. इतने सालों के बाद वह न जाने कहां से टपक पड़ी थी.

अगर कामिनी ने अदालत में सुबूत पेश कर दिया तो उन्हें जेल होगी और हर्जाना भी देना पड़ेगा. सांसद की कुरसी भी छिन जाएगी.

‘क्या करूं…’ दामोदर सोच रहे थे कि उन्हें जग्गा याद आ गया. वे जग्गा के पास खुद पहुंचे थे.

‘‘आप जाइए, मैं इस का इलाज कर देता हूं. आप बस 20 औरतों के लिए 25 लाख रुपए का इंतजाम कर दें,’’ वह शराब पीता हुआ बोला.

‘‘पैसा कल तक पहुंच जाएगा. तुम काम शुरू कर दो,’’ दामोदर हामी भरते हुए बोले.

अगले दिन दोपहर के 12 बजे प्रैस कौंफ्रैंस कर उन सभी 20 औरतों ने नाम समेत माफी मांगी और आरोप वापस ले लिया.

अब तो दामोदर मंत्री पद पर दोबारा आ गए. इस मसले पर जब उन से पूछा गया तो वे झट बोल उठे, ‘‘वे सब

मेरी बहन जैसी हैं. मैं तो उन से कभी मिला नहीं, उन्हें जानता तक नहीं. बस राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल की गई मुहरें थीं. मुझे साजिश करने वाला चाहिए मुहरें नहीं.’’

‘‘मगर, वे सब औरतें कहां गईं?’’ एक पत्रकार ने पूछा.

‘‘यह सवाल आप उन से पूछिए जिन्होंने मुझ पर ऐसा घिनौना आरोप लगवाया है. वह तो भला हो उन बहनों का, जिन का जमीर जाग गया और आज मैं आप के सामने हूं. मेरे सामने खुदकुशी के सिवा कोई रास्ता नहीं था,’’ घडि़याली आंसू बहाते दामोदर के इस जवाब ने सब को चुप कर दिया था.

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दामोदर दोबारा सही हो गए, तो झट रात में जग्गा को फोन लगाया.

‘आप चिंता मत करो, सारा काम ठीक से हो गया है,’ जग्गा ने कहा.

‘‘फिर भी कहीं कुछ…’’ दामोदर थोड़े शंकित थे.

‘कोई अगरमगर नहीं… जग्गा पूरे पैसे ले कर आधा काम नहीं करता है.’

अब दामोदर ने चैन की सांस ली. अब वे कभी ऐसा कुछ नहीं करेंगे, ऐसा सोच कर वे हलका महसूस करने लगे और धीरेधीरे नींद के आगोश में चले गए. Hindi Story

Short Story : एक रिक्त कोना

Short Story :  सुशांत मेरे सामने बैठे अपना अतीत बयान कर रहे थे:

‘‘जीवन में कुछ भी तो चाहने से नहीं होता है. इनसान सोचता कुछ है होता कुछ और है. बचपन से ले कर जवानी तक मैं यही सोचता रहा…आज ठीक होगा, कल ठीक होगा मगर कुछ भी ठीक नहीं हुआ. किसी ने मेरी नहीं सुनी…सभी अपनेअपने रास्ते चले गए. मां अपने रास्ते, पिता अपने रास्ते, भाई अपने रास्ते और मैं खड़ा हूं यहां अकेला. सब के रास्तों पर नजर गड़ाए. कोई पीछे मुड़ कर देखता ही नहीं. मैं क्या करूं?’’

वास्तव में कल उन का कहां था, कल तो उन के पिता का था. उन की मां का था, वैसे कल उस के पिता का भी कहां था, कल तो था उस की दादी का.

विधवा दादी की मां से कभी नहीं बनी और पिता ने मां को तलाक दे दिया. जिस दादी ने अकेले रह जाने पर पिता को पाला था क्या बुढ़ापे में मां से हाथ छुड़ा लेते?

आज उन का घर श्मशान हो गया. घर में सिर्फ रात गुजारने आते हैं वह और उन के पिता, बस.

‘‘मेरा तो घर जाने का मन ही नहीं होता, कोई बोलने वाला नहीं. पानी पीना चाहो तो खुद पिओ. चाय को जी चाहे तो रसोई में जा कर खुद बना लो. साथ कुछ खाना चाहो तो बिस्कुट का पैकेट, नमकीन का पैकेट, कोई चिप्स कोई दाल, भुजिया खा लो.

‘‘मेरे दोस्तों के घर जाओ तो सामने उन की मां हाथ में गरमगरम चाय के साथ खाने को कुछ न कुछ जरूर ले कर चली आती हैं. किसी की मां को देखता हूं तो गलती से अपनी मां की याद आने लगती है.’’

‘‘गलती से क्यों? मां को याद करना क्या गलत है?’’

‘‘गलत ही होगा. ठीक होता तो हम दोनों भाई कभी तो पापा से पूछते कि हमारी मां कहां है. मुझे तो मां की सूरत भी ठीक से याद नहीं है, कैसी थीं वह…कैसी सूरत थी. मन का कोना सदा से रिक्त है… क्या मुझे यह जानने का अधिकार नहीं कि मेरी मां कैसी थीं जिन के शरीर का मैं एक हिस्सा हूं?

‘‘कितनी मजबूर हो गई होंगी मां जब उन्होंने घर छोड़ा होगा…दादी और पापा ने कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा होगा उन के लिए वरना 2-2 बेटों को यों छोड़ कर कभी नहीं जातीं.’’

‘‘आप की भाभी भी तो हैं. उन्होंने घर क्यों छोड़ दिया?’’

‘‘वह भी साथ नहीं रहना चाहती थीं. उन का दम घुटता था हमारे साथ. वह आजाद रहना चाहती थीं इसलिए शादी के कुछ समय बाद ही अलग हो गईं… कभीकभी तो मुझे लगता है कि मेरा घर ही शापित है. शायद मेरी मां ने ही जातेजाते श्राप दिया होगा.’’

‘‘नहीं, कोई मां अपनी संतान को श्राप नहीं देती.’’

‘‘आप कैसे कह सकती हैं?’’

‘‘क्योंकि मेरे पेशे में मनुष्य की मानसिकता का गहन अध्ययन कराया जाता है. बेटा मां का गला काट सकता है लेकिन मां मरती मर जाए, बच्चे को कभी श्राप नहीं देती. यह अलग बात है कि बेटा बहुत बुरा हो तो कोई दुआ भी देने को उस के हाथ न उठें.’’

‘‘मैं नहीं मानता. रोज अखबारों में आप पढ़ती नहीं कि आजकल मां भी मां कहां रह गई हैं.’’

‘‘आप खूनी लोगों की बात छोड़ दीजिए न, जो लोग अपराधी स्वभाव के होते हैं वे तो बस अपराधी होते हैं. वे न मां होते हैं न पिता होते हैं. शराफत के दायरे से बाहर के लोग हमारे दायरे में नहीं आते. हमारा दायरा सामान्य है, हम आम लोग हैं. हमारी अपेक्षाएं, हमारी इच्छाएं साधारण हैं.’’

बेहद गौर से वह मेरा चेहरा पढ़ते रहे. कुछ चुभ सा गया. जब कुछ अच्छा समझाती हूं तो कुछ रुक सा जाते हैं. उन के भाव, उन के चेहरे की रेखाएं फैलती सी लगती हैं मानो कुछ ऐसा सुना जो सुनना चाहते थे.

आंखों में आंसू आ रहे थे सुशांत की.

मुझे यह सोच कर बहुत तकलीफ होती है कि मेरी मां जिंदा हैं और मेरे पास नहीं हैं. वह अब किसी और की पत्नी हैं. मैं मिलना चाह कर भी उन से नहीं मिल सकता. पापा से चोरीचोरी मैं ने और भाई ने उन्हें तलाश किया था. हम दोनों मां के घर तक भी पहुंच गए थे लेकिन मां हो कर भी उन्होंने हमें लौटा दिया था… सामने पा कर भी उन्होंने हमें छुआ तक नहीं था, और आप कहती हैं कि मां मरती मर जाए पर अपनी संतान को…’’

‘‘अच्छा ही तो किया आप की मां ने. बेचारी, अपने नए परिवार के सामने आप को गले लगा लेतीं तो क्या अपने परिवार के सामने एक प्रश्नचिह्न न खड़ा कर देतीं. कौन जाने आप के पापा की तरह उन्होंने भी इस विषय को पूरी तरह भुला दिया हो. क्या आप चाहते हैं कि वह एक बार फिर से उजड़ जाएं?’’

सुशांत अवाक् मेरा मुंह देखते रह गए थे.

‘‘आप बचपना छोड़ दीजिए. जो छूट गया उसे जाने दीजिए. कम से कम आप तो अपनी मां के साथ अन्याय न कीजिए.’’

मेरी डांट सुन कर सुशांत की आंखों में उमड़ता नमकीन पानी वहीं रुक गया था.

‘‘इनसान के जीवन में सदा वही नहीं होता जो होना चाहिए. याद रखिए, जीवन में मात्र 10 प्रतिशत ऐसा होता है जो संयोग द्वारा निर्धारित किया जाता है, बाकी 90 प्रतिशत तो वही होता है जिस का निर्धारण व्यक्ति स्वयं करता है. अपना कल्याण या अपना सर्वनाश व्यक्ति अपने ही अच्छे या बुरे फैसले द्वारा करता है.

‘‘आप की मां ने समझदारी की जो आप को पहचाना नहीं. उन्हें अपना घर बचाना चाहिए जो उन के पास है…आप को वह गले क्यों लगातीं जबकि आप उन के पास हैं ही नहीं.

‘‘देखिए, आप अपनी मां का पीछा छोड़ दीजिए. यही मान लीजिए कि वह इस संसार में ही नहीं हैं.’’

‘‘कैसे मान लूं, जब मैं ने उन का दाहसंस्कार किया ही नहीं.’’

‘‘आप के पापा ने तो तलाक दे कर रिश्ते का दाहसंस्कार कर दिया था न… फिर अब आप क्यों उस राख को चौराहे का मजाक बनाना चाहते हैं? आप समझते क्यों नहीं कि जो भी आप कर रहे हैं उस से किसी का भी भला होने वाला नहीं है.’’

अपनी जबान की तल्खी का अंदाज मुझे तब हुआ जब सुशांत बिना कुछ कहे उठ कर चले गए. जातेजाते उन्होंने यह भी नहीं बताया कि अब कब मिलेंगे वह. शायद अब कभी नहीं मिलेंगे.

सुशांत पर तरस आ रहा था मुझे क्योंकि उन से मेरे रिश्ते की बात चल रही थी. वह मुझ से मिलने मेरे क्लीनिक में आए थे. अखबार में ही उन का विज्ञापन पढ़ा था मेरे पिताजी ने.

‘‘सुशांत तुम्हें कैसा लगा?’’ मेरे पिता ने मुझ से पूछा.

‘‘बिलकुल वैसा ही जैसा कि एक टूटे परिवार का बच्चा होता है.’’

पिताजी थोड़ी देर तक मेरा चेहरा पढ़ते रहे फिर कहने लगे, ‘‘सोच रहा हूं कि बात आगे बढ़ाऊं या नहीं.’’

पिताजी मेरी सुरक्षा को ले कर परेशान थे…बिलकुल वैसे जैसे उन्हें होना चाहिए था. सुशांत के पिता मेरे पिता को पसंद थे. संयोग से दोनों एक ही विभाग में कार्य करते थे उसी नाते सुशांत 1-2 बार मुझे मेरे क्लीनिक में ही मिलने चले आए थे और अपना रिक्त कोना दिखा बैठे थे.

मैं सुशांत को मात्र एक मरीज मान कर भूल सी गई थी. उस दिन मरीज कम थे सो घर जल्दी आ गई. फुरसत थी और पिताजी भी आने वाले थे इसलिए सोचा, क्यों न आज  चाय के साथ गरमागरम पकौडि़यां और सूजी का हलवा बना लूं.

5 बजे बाहर का दरवाजा खुला और सामने सुशांत को पा कर मैं स्तब्ध रह गई.

‘‘आज आप क्लीनिक से जल्दी आ गईं?’’ दरवाजे पर खड़े हो सुशांत बोले, ‘‘आप के पिताजी मेरे पिताजी के पास गए हैं और मैं उन की इजाजत से ही घर आया हूं…कुछ बुरा तो नहीं किया?’’

‘‘जी,’’ मैं कुछ हैरान सी इतना ही कह पाई थी कि चेहरे पर नारी सुलभ संकोच तैर आया था.

अंदर आने के मेरे आग्रह पर सुशांत दो कदम ही आगे बढे़ थे कि फिर कुछ सोच कर वहीं रुक गए जहां खड़े थे.

‘‘आप के घर में घर जैसी खुशबू है, प्यारीप्यारी सी, मीठीमीठी सी जो मेरे घर में कभी नहीं होती है.’’

‘‘आप उस दिन मेरी बातें सुन कर नाराज हो गए होंगे यही सोच कर मैं ने भी फोन नहीं किया,’’ अपनी सफाई में मुझे कुछ तो कहना था न.

‘‘नहीं…नाराजगी कैसी. आप ने तो दिशा दी है मुझे…मेरी भटकन को एक ठहराव दिया है…आप ने अच्छे से समझा दिया वरना मैं तो बस भटकता ही रहता न…चलिए, छोडि़ए उन बातों को. मैं सीधा आफिस से आ रहा हूं, कुछ खाने को मिलेगा.’’

पता नहीं क्यों, मन भर आया मेरा. एक लंबाचौड़ा पुरुष जो हर महीने लगभग 30 हजार रुपए कमाता है, जिस का अपना घर है, बेघर सा लगता है, मानो सदियों से लावारिस हो.

पापा का और मेरा गरमागरम नाश्ता मेज पर रखा था. अपने दोस्तों के घर जा कर उन की मां के हाथों में छिपी ममता को तरसी आंखों से देखने वाला पुरुष मुझ में भी शायद वही सब तलाश रहा था.

‘‘आइए, बैठिए, मैं आप के लिए चाय लाती हूं. आप पहले हाथमुंह धोना चाहेंगे…मैं आप के लिए तौलिया लाऊं?’’

मैं हतप्रभ सी थी. क्या कहूं और क्या न कहूं. बालक की तरह असहाय से लग रहे थे सुशांत मुझे. मैं ने तौलिया पकड़ा दिया तब एकटक निहारते से लगे.

मैं ने नाश्ता प्लेट में सजा कर सामने रखा. खाया नहीं बस, देखते रहे. मात्र चम्मच चलाते रहे प्लेट में.

‘‘आप लीजिए न,’’ मैं ने खाने का आग्रह किया.

वह मेरी ओर देख कर कहने लगे, ‘‘कल एक डिपार्टमेंटल स्टोर में मेरी मां मिल गईं. वह अकेली थीं इसलिए उन्होंने मुझे पुकार लिया. उन्होंने बड़े प्यार से मेरा हाथ पकड़ लिया था लेकिन मैं ने अपना हाथ छुड़ा लिया.’’

सुशांत की बातें सुन कर मेरी तो सांस रुक सी गई. बरसों बाद मां का स्पर्श कैसा सुखद लगा होगा सुशांत को.

सहसा सुशांत दोनों हाथों में चेहरा छिपा कर बच्चे की तरह रो पड़े. मैं देर तक उन्हें देखती रही. फिर धीरे से सुशांत के कंधे पर हाथ रखा. सहलाती भी रही. काफी समय लग गया उन्हें सहज होने में.

‘‘मैं ने ठीक किया ना?’’ मेरा हाथ पकड़ कर सुशांत बोले, ‘‘आप ने कहा था न कि मुझे अपनी मां को जीने देना चाहिए इसलिए मैं अपना हाथ खींच कर चला आया.’’

क्या कहती मैं? रो पड़ी थी मैं भी. सुशांत मेरा हाथ पकड़े रो रहे थे और मैं उन की पीड़ा, उन की मजबूरी देख कर रो रही थी. हम दोनों ही रो रहे थे. कोई रिश्ता नहीं था हम में फिर भी हम पास बैठे एकदूसरे की पीड़ा को जी रहे थे. सहसा मेरे सिर पर सुशांत का हाथ आया और थपक दिया.

‘‘तुम बहुत अच्छी हो. जिस दिन से तुम से मिला हूं ऐसा लगता है कोई अपना मिल गया है. 10 दिनों के लिए शहर से बाहर गया था इसलिए मिलने नहीं आ पाया. मैं टूटाफूटा इनसान हूं…स्वीकार कर जोड़ना चाहोगी…मेरे घर को घर बना सकोगी? बस, मैं शांति व सुकून से जीना चाहता हूं. क्या तुम भी मेरे साथ जीना चाहोगी?’’

डबडबाई आंखों से मुझे देख रहे थे सुशांत. एक रिश्ते की डोर को तोड़ कर दुखी भी थे और आहत भी. मुझ में सुशांत क्याक्या तलाश रहे होंगे यह मैं भलीभांति महसूस कर सकती थी. अनायास ही मेरा हाथ उठा और दूसरे ही पल सुशांत मेरी बांहों में समाए फिर उसी पीड़ा में बह गए जिसे मां से हाथ छुड़ाते समय जिया था.

‘‘मैं अपनी मां से हाथ छुड़ा कर चला आया? मैं ने अच्छा किया न…शुभा मैं ने अच्छा किया न?’’ वह बारबार पूछ रहे थे.

‘‘हां, आप ने बहुत अच्छा किया. अब वह भी पीछे मुड़ कर देखने से बच जाएंगी…बहुत अच्छा किया आप ने.’’

एक तड़पतेबिलखते इनसान को किसी तरह संभाला मैं ने. तनिक चेते तब खुद ही अपने को मुझ से अलग कर लिया.

शीशे की तरह पारदर्शी सुशांत का चरित्र मेरे सामने था. कैसे एक साफसुथरे सचरित्र इनसान को यों ही अपने जीवन से चला जाने देती. इसलिए मैं ने सुशांत की बांह पकड़ ली थी.

साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछने का प्रयास किया तो सहसा सुशांत ने मेरा हाथ पकड़ लिया और देर तक मेरा चेहरा निहारते रहे. रोतेरोते मुसकराने लगे. समीप आ कर धीरे से गरदन झुकाई और मेरे ललाट पर एक प्रगाढ़ चुंबन अंकित कर दिया. फिर अपने ही हाथों से अपने आंसू पोंछ लिए.

अपने लिए मैं ने सुशांत को चुन लिया. उन्हें भावनात्मक सहारा दे पाऊंगी यह विश्वास है मुझे. लेकिन उन के मन का वह रिक्त स्थान कभी भर पाऊंगी ऐसा विश्वास नहीं क्योंकि संतान के मन में मां का स्थान तो सदा सुरक्षित होता है न, जिसे मां के सिवा कोई नहीं भर सकता. Short Story

Indian Society: कट्टरता के उफान पर सेकुलर इंडिया

Indian Society: भारत आज उस दोराहे पर खड़ा है जहां आस्था, पहचान और राजनीति आपस में गड्डमड्ड हो चुकी हैं. मुसलमान हों या हिंदू, सिख हों या जैन—हर कोई अपनेअपने धर्म के नाम पर सड़क पर है. सवाल यह है कि क्या यह आस्था का उफान है या फिर कट्टरता का विस्फोट? संविधान ने सब को धार्मिक स्वतंत्रता दी, मगर सेकुलर भारत में सेकुलर होना आज गाली क्यों बन गया है?

मुसलमान अपने धर्म को ले कर सड़कों पर हैं तो हिंदू भी अपनी आस्थाओं के नाम पर सड़कों पर तांडव कर रहे हैं. सेक्युलर देश में सेकुलर होना गाली बन गया है. आस्था अपनी जगह है. सभी को अपनी अपनी आस्था के साथ जीने का हक है. भारत का संविधान भी धार्मिक आजादी की बात करता है लेकिन धार्मिक आजादी के नाम पर देश भर में यह कैसा तमाशा चल रहा है?

4 सितंबर 2025 को उत्तर प्रदेश के कानपुर के रावतपुर इलाके में बारावफात (ईद-ए-मिलाद-उन-नबी) का जुलूस निकला. इस दौरान कुछ मुसलिम समुदाय के लोगों ने जुलूस मार्ग पर ‘आई लव मोहम्मद’ का बैनर लगाया. हिंदू संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि यह साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश है. पुलिस ने बैनर हटाने का आदेश दिया. विवाद बढ़ा तो 9 सितंबर को कानपुर पुलिस ने 5 नामजद और 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की.

मुसलिम संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 25) पर हमला बताया. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “आई लव मोहम्मद कहना कोई अपराध नहीं है.” इस से शोशल मीडिया पर #आईलवमोहम्मद ट्रैंड करने लगा. इस विवाद में ओवैसी के कूदने के बाद बरेली, लखनऊ, उन्नाव, महाराजगंज, कौशांबी, मऊ में रैलियां निकली. बरेली में मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर जुमे की नमाज के बाद पथराव हुआ, पुलिस ने लाठीचार्ज किया. 12 लोग गिरफ्तार, 21 एफआईआर और 1,324 मुसलिमों पर मुकदमे हुए. कश्मीर, तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और कर्नाटक में पथराव हुए जिस से देश भर में सांप्रदायिक तनाव और बढ़ा. शोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट्स में लोग प्रोफाइल पिक्चर बदल कर ‘आई लव मोहम्मद’ शेयर करने लगे.

वाराणसी में जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रनंद ने ‘आई लव महादेव’ का बैनर ले कर मार्च निकाला और इसे क्रिया की प्रतिक्रिया का नाम देते हुए मुसलमानों के कारनामे को “देश को बर्बाद करने की साजिश” बताया.

इस बात में कोई दो राय नहीं कि हाल के वर्षों में मुसलमानों के अंदर कट्टरता बढ़ी है. फ़्रांस के कार्टून विवाद के मामले में भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुए. हजरत मुहम्मद पर नूपुर शर्मा के बयान के बाद भी मुसलमान सड़कों पर उतर आए थे. इन मामलों के अलावा बीजेपी सरकार की ओर से तीन तलाक, सीएए, वक्फ बोर्ड और औरंगजेब जैसे मुद्दों को भी लगातार उठाया जाता रहा जिन से मुसलमान विरोध के लिए सड़कों पर उतर आए.

इस तरह की तमाम घटनाक्रमों में मुसलिम समाज लगातार हाशिये पर ही गया है. इस से मुसलमानो में कट्टरता बढ़ी है और मुसलमान भारतीय समाज की मुख्यधारा से कटता चला गया है. ‘आई लव मुहम्मद’ वाला प्रकरण इसी कट्टरता का नतीजा है.

बहुसंख्यक हिंदूओं के धार्मिक चेतना का यह ताज़ा उभार अल्पसंख्यक वर्गों को बेचैन कर रहा है. मुसलमानों की बात छोड़ दी जाए तो पिछले एक दशक में देश के दूसरे अल्पसंख्यक तबकों में भी धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ती हुई नजर आई है. जैन, बौद्ध या सिख ये सब भी तेजी से कट्टरता की ओर बढ़ रहे हैं.

सिखों में कट्टरता तेजी से बढ़ी है. इशनिंदा (ब्लासफेमी) या बेअदबी के नाम पर हत्याएं इस बात का प्रमाण हैं. 2024 में पंजाब के फिरोजपुर जिले के बडाला गांव में 19 साल के एक मानसिक रूप से अस्वस्थ सिख युवक बक्शीश सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब के कुछ पन्ने फाड़ दिए. गुस्साए ग्रामीणों ने उसे पीटपीट कर मार डाला.

सांप्रदायिकता की राजनीती कितनी खतरनाक?

जातिवाद और सांप्रदायिकता यह भारत की दो सब से बड़ी समस्याएं हैं. यहां दोनों तरह की राजनीति साथसाथ चलती है. जातिवाद पर आधारित राजनीती सामाजिक न्याय और शोषित वर्गो के अधिकारों के नाम पर की जाती है तो सांप्रदायिकता की राजनीति बहुसंख्यक हिंदूओं के हितों के नाम पर होती है.

2014 से पहले देश में जातिवाद पर आधारित राजनीती का जोर रहा तो 2014 के बाद सत्ता में सांप्रदायिक विचारधारा ने जगह बनाई और तब से लगातार यह विचारधारा मजबूती की ओर बढ़ रही है. आज देश में भयंकर बेरोजगारी है, किसानों की समस्याएं हैं, आम जनता शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रही हैं, कहीं सूखा और कहीं बाढ़ से त्रासदी की स्थितियां पैदा हो रही हैं, मनीपुर, असम और लद्दाख जैसे शांतिपूर्ण राज्य जल रहे हैं लेकिन सत्ता के टुकड़ों पर पलने वाले मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए इनमें से कोई मुद्दा जरूरी नहीं है. दिन रात उन फिजूल के मुद्दों पर चर्चा होती है जिससे देश की गंगा जमुनी तहजीब में आग लगाई जा सके.

पाकिस्तान में जियाउल हक की कट्टरपंथी सोच का खामियाजा पाकिस्तान के बहुसंख्यक मुसलमान आज तक भुगत रहे हैं. खुमेनी की इसलामिक क्रांति के बाद वहां की बहुसंख्यक शिया आबादी को ही सब से ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा. पाकिस्तान में जियाउल हक और ईरान में आयतुल्लाह खुमेनी की कट्टरता ने पिछले 4 दशकों में दोनों देशों को धार्मिक उन्माद में धकेल रखा है. इस बीच शिक्षा बर्बाद कर दी गई और शिक्षा के धार्मिककरण से नस्ले तबाह हो गईं. आज भारत भी ईरान और पाकिस्तान की राह पर है.

नफरत एकतरफा नहीं

धर्म की राजनीति से पैदा हुआ उन्माद एकतरफा नहीं होता. बहुसंख्यक वर्ग की धार्मिक चेतना को हवा दी जाती है तो इस की प्रतिक्रिया में अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी धार्मिक उन्माद कुलांचे मारता है. इस से सांप्रदायिक राजनीति और मजबूत होती है.

दक्षिणपंथ की राजनीती बहुसंख्यक हिंदूओं के वोट बैंक पर आधारित है. हिंदूओं को हिंदू होने पर गर्व होना जरूरी है तभी हिंदुत्ववाद की राजनीति निर्बाध रूप से मजबूती और स्थिरता की ओर आगे बढ़ पाएगी हिंदू होने पर गर्व तभी होगा जब हिंदू अस्मिता के नाम पर धार्मिकता, आस्था, संस्कृति और परंपराओं का ढोल पीटा जाता रहेगा. इस के लिए पिछले एक दशक से तमाम तरह के प्रोपगेंडे और हठकंडे अपनाए जा रहे हैं. यही कारण है कि पिछले एक दशक में बहुसंख्यक हिंदूओं के अंदर धार्मिकता तेजी से बढ़ी है. धार्मिकता के साथ कट्टरता और पाखंडवाद भी तेजी से बढ़ा है.

रामनवमी के नाम पर जुलूस व्यापक स्तर पर बढ़े हैं. गणेश उत्सव, कांवड़ यात्रा, रथयात्रा, सरस्वती पूजा, माता के जागरण, नवरात्रि और दशहरा जैसे आयोजनों में बेतहाशा भीड़ दिखाई देने लगी है. इन धार्मिक आयोजनों के अलावा बड़ी संख्या में संतों और धर्मगुरुओं के आयोजन भी हो रहे हैं. इन धार्मिक आयोजनों के जरिये सांप्रदायिकता को हवा दी जा रही है. सांप्रदायिकता की इस राजनीति का शिकार अब सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि जैन सिख और बौद्ध भी हो रहे हैं.

पिछले 10 वर्षों में लगातार मुसलिमों के साथ मौब लिंचिंग की घटनाएं हुईं. मस्जिदों को निशाना बनाया गया. दुकानें जलाई गईं. तथाकथित हिंदू संतों ने सार्वजनिक मंचों से मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार की बातें कीं. टीवी डिबेट्स में लगातार मुसलमानो के खिलाफ जहर उगला गया. रेड़ी पटरी वाले मुसलमानों के रोजगार बंद करवाए गए. मुसलमानों के घरों पर बुलडोजर चलाए गए. इस तरह सांप्रदायिक नफरत की यह आग पूरे देश में फैली लेकिन सांप्रदायिकता की इस घिनौनी राजनीती की जद में अब केवल मुसलमान ही नहीं हैं बल्कि सिख, जैन और बौद्ध भी इस की चपेट में आ चुके हैं.

जैनियों के विरुद्ध हिंसा

हाल के वर्षो में BJP शासित राज्यों में जैन समाज पर हमले बढ़े हैं. मुंबई में जैन मंदिर ध्वस्त किया गया, मूर्तियां तोड़ी गईं. हिंदुत्ववादियों द्वारा गुजरात के गिरनार और झारखंड के शिखरजी पर कब्जे की कोशिशें की गईं. मध्य प्रदेश के जबलपुर में बीजेपी नेताओं के औडियो में जैनों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों का मामला सामने आया तो उत्तर प्रदेश के बागपत के एक जैन कालेज में मूर्ति लगाने को ले कर हिंदुत्वदियों ने जम कर विरोध किया. इन सभी घटनाओं को ले कर जैन समाज ने जोधपुर, इंदौर और अन्य जगहों पर विशाल विरोध प्रदर्शन किए. जैन समाज का आरएसएस / बीजेपी के साथ ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है इस के बावजूद जैन समाज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है.

20 मई 2022 को एक मानसिक रूप से विक्षिप्त जैन बुजुर्ग, भंवरलाल जैन (उम्र लगभग 65 वर्ष), को कुछ लोगों ने मुसलिम समझ कर बेरहमी से पीटपीट कर हत्या कर दी थी. वीडियो फुटेज में आरोपी उन्हें चांटे मारते हुए पूछते सुनाई देता है, “क्या तेरा नाम मोहम्मद है? आधार कार्ड दिखा.” पिटाई इतनी क्रूर थी कि भंवरलाल को गंभीर चोटें आईं, और अगले दिन (21 मई 2022) अस्पताल में उन की मौत हो गई.

अल्पसंख्यक समाज के खिलाफ इस तरह की घटनाएं भारत में बढ़ती सांप्रदायिक नफ़रत का उदाहरण हैं जहां एक मानसिक रूप से बीमार आदमी भी सुरक्षित नहीं है.

पूरी दुनिया में धर्म क्यों हावी हो रहा है

धर्म ने हमेशा विज्ञान का विरोध किया लेकिन इसी विज्ञान के सहारे धर्म पनपा भी है. तमाम धर्म मौडर्न इन्फौर्मेशन टैक्नोलौजी को अपना रहे हैं और इस के जरिये नई पीढ़ी के अंदर पुरानी रूढ़ियों को फिट कर रहे हैं. केथौलिक चर्च ने 16वीं सदी के बाद से लगातार वैज्ञानिकों के विरुद्ध षड्यंत्र किए उन्हें प्रताड़ित किया लेकिन 19वीं और 20वीं सदी में इसी केथौलिक चर्च ने विज्ञान का सहारा लेना शुरू किया. 1975 में तबके पोप पोल आई ने सभी केथौलिक चर्चों को टीवी और कंप्यूटर को अपनाने को कहा.

आज सभी धर्म एक तरफ विज्ञान की भर्त्सना करते हैं और दूसरी ओर आधुनिक टैक्नोलौजी से मंदिर मस्जिद चर्च बनवा रहे हैं. ईश्वर के नाम पर उल्लू बनाने वाले बड़े बड़े धर्मगुरु ईश्वर के बिना जीवन भर रह सकते हैं लेकिन विज्ञान और टैक्नोलौजी के बिना एक दिन नहीं रह सकते. यही धर्मगुरु समाज में कट्टरता पैदा करने के लिए तकनीक का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं. कट्टरता फैलाने के नए तरीके आ गए हैं. रामलीलाओं के हनुमान अब नई तकनीक के सहारे उड़ने लगे हैं तो “आई लव मोहम्मद” के लिए बिजली के ग्लो साइन का इस्तेमाल किया जा रहा है.

सभी चर्च मंदिर मस्जिद एअर कंडीशन्ड हो रहे हैं. इन धर्मस्थलों में फर्श से ले कर छत तक हाई टेक होते जा रहे हैं. औनलाइन पूजा करवाई जा रही है. दान वैब साइट पर मांगा जा रहा है. औनलाइन दर्शन हो रहे हैं. जलाभिषेक तक वर्चुअल हो रहे हैं. व्हाट्सएप्प पर तलाक देना जायज माना जा रहा है. वाट्सअप पर भक्तों के ग्रुप बन रहे हैं. इस तरह नई तकनीक के सहारे पुराने धर्मों की मार्केटिंग जोरों पर चल रही है. धर्म के नजरिये में विज्ञान कुछ नहीं है लेकिन सच यह है की आज तकनीक के बिना धर्म कुछ नहीं है.

दरअसल आम आदमी के जीवन को सरल बनाने में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती. धर्म से एक वक़्त की रोटी हासिल नहीं होती. दुनिया धर्म से नहीं चलती और इस दुनिया में सांस लेने वाले प्राणियों का जीवन भी धर्म से नहीं चलता लेकिन पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर राजनीति जरूर चलती है. आज भारत की राजनीती में धर्म हावी है और आम आदमी हाशिये पर पहुंच चुका है. आज के वक़्त भारत में चारों ओर बस धर्म ही धर्म नजर आ रहा है. धार्मिक त्यौहार, धार्मिक जमावड़े और धर्म के नाम पर बेलगाम उदंडता, यही देश की सच्चाई बन चुकी है. सांप्रदायिक राजनीति का शिकार अल्पसंख्यक मुस्लमान तो हैं ही लेकिन इस घिनौनी राजनीति में सब से ज्यादा बहुसंख्यक हिंदू ही पिस रहा है लेकिन यह बात फिलहाल किसी को समझ नहीं आ रही. Indian Societ.

Online Harassment: अपस्कर्टिंग, प्राइवेसी और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स

Online Harassment: फेसबुक पर एक अजीबोगरीब वीडियो दिखी जिस में किसी अनजान सब्जी मार्किट में भीड़ में एक लड़का वीडियो शूट कर रहा होता है. वह शूट करते हुए कैमरा उस जगह ले कर जाता है जहां महिलाएं सब्जियां खरीद रही हैं. अब है तो यह साधारण सी व्लौग वीडियो मगर इस की बारीकियां कैमरे के पीछे छुपे इंसान की मंशा से पता चलती है. वह जानबूझ कर कैमरे का एंगल कुछ इस तरह रखता है कि महिलाओं की आपत्तिजनक फूटेज दिखाई दे. कभी कैमरा उन के पीछे की तरफ जूमइन करता है कभी उन के ब्रैस्ट की तरफ.

ठीक ऐसे ही भरी ट्रेन में किसी डब्बे में ऊपर वाली सीट पर बैठा लड़का नीचे खड़ी लड़कियों की छुप कर वीडियो इस एंगल से बनाता है कि उन की क्लीवेज दिखाई दे. या हावभाव दिखाई दे. आखिर वह बना क्यों रहा है सवाल इस पर है. यह बेरोकटोक है.

एक वीडियो में ट्रेन एक कपल किसी कम्पार्टमेंट में सोते हुए इंटिमेट होते दिखाई देते हैं. उसी समय कोई उन की वीडियो चुपके से बना लेता है और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर देता है.

ऐसे ही मेट्रो वाली कई वीडियो सोशल मीडिया पर दिखाई पड़ती हैं, जहां कोई कपल एकदूसरे को किस कर रहे होते हैं. कोई गले मिल रहे होते हैं. इसे शूट कर के कोई सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देता है और लिखता है “दिल्ली मेट्रो में आप का स्वागत है.” अरे भाई, तुम्हे उन के व्यवहार से आपत्ति है तो जहां तुम्हारी इच्छा है, शिकायत करो, मगर बिना उन की मर्जी के उन की प्राइवेट वीडियो शूट कर के पोस्ट करना कहां तक सही है.

बात अब सीसीटीवी कैमरे तक नहीं रह गई है अब हर हाथ में फ़ोन है, जो बेलगाम है. ये कैमरे जो चाहे शूट कर रहे हैं. बिना किसी की मर्जी के बिना किसी परमिशन के.

इमेज बेज्ड सैक्सुअल हरासमेंट

डिजिटल युग ने हमें अनगिनत सुविधाएं दी हैं. हम हर रोज इंटरनेट पर फोटो शेयर करते हैं, वीडियो अपलोड करते हैं और हर पल को सोशल मीडिया पर दर्ज करने के फितूर में रहते हैं. नेपाल में युवा आंदोलन कर रहे हैं क्योंकि वहां सोशल मीडिया पर ही बैन लगा दिया है और उन के पास सोशल मीडिया से पैसे कमाने के अलावा कोई और काम ही नहीं है. जिस दुनिया में ‘कंटेंट ही करंसी’ बन चुका है, वहां लोग लाइक्स, फौलोअर्स और वायरल होने की भूख में किसी भी हद तक चले जाते हैं.

इस का एक अंधेरा पक्ष अपस्कर्टिंग और इमेज-बेस्ड सैक्सुअल एब्यूज यानी बिना सहमति किसी की प्राइवेट फोटोज या वीडियो बनाना व शेयर करना है.

अपस्कर्टिंग पहले विदेशों में खूब था, उन की कुछ छटीकटी वीडियो देख कर लगता है कि वहां यह आज भी है. जैसे, कुछ वीडियो इस तरह की भी दिखाई देती हैं जहां सड़क पर किसी सीवर के नीचे एयर ब्लोअर लगा दिया जाता है और जो स्कर्ट वाली लड़की उस के आसपास से गुजरती है तो हवा ब्लो की जाती है जिस से उन की स्कर्ट हवा में उड़ती है और उन की क्लिप बना ली जाती है.

वहां की फिल्मों में यह अभी भी दिखाया जाता है. जहां हाई स्कूल में कोई लड़का अपनी बेंच के आगे स्कर्ट में बैठी लड़की की नीचे से चुपके से पिक्चर ले लेता है.

सुनने में यह मामूली और हंसी में टालने जैसी बात लग सकती है, लेकिन हकीकत में यह मेंटल और इमोशनल लेवल पर गहरा हमला करता है. बात केवल एक वीडियो या फोटो तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह किसी इंसान की पूरी प्राइवेसी और सेल्फ रिसपेक्ट को तोड़ कर रख देती है. दिक्कत यह कि डिजिटल प्लेटफौर्म्स के पहले जो हरकतें छिप कर की जाती थीं, आज वे खुले तौर पर “कंटेंट” का हिस्सा बन गई हैं.

अपस्कर्टिंग का ताजा मामला

राजधानी दिल्ली का ताजा मामला इसे समझने में बिल्कुल सटीक उदाहरण है. हाल ही में दिल्ली पुलिस ने एक पायलट को गिरफ्तार किया, जो मेट्रो और भीड़भाड़ वाली जगहों पर महिलाओं के प्राइवेट हिस्सों की चोरीछुपे वीडियो बनाता था.

उस के पास से करीब 74 ऐसी क्लिप्स बरामद की गईं, जिन्हें उस ने एडवांस स्पाई कैमरे के जरिये रिकौर्ड किया था. यह कैमरा उस ने जूते में बारीकी से लगाया था, जिस से वह महिलाओं के बिल्कुल पास खड़ा हो कर उन के कपड़ों के नीचे वीडियो बना लेता था, और उन्हें भनक तक नहीं लगती थी. यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति के अपराध की कहानी नहीं बताती, बल्कि यह समाज में टैक्नोलौजी और यौन कुंठा के खतरनाक जोड़ को सामने लाती है.

अब सोचिए इन जैसे लोगों के चलते लड़कियों को कितना सतर्क रहना पड़ता होगा. कैसे हर समय अपने कपड़े संभालने पड़ते होंगे. कई मामलों में उन का सामाजिक जीवन पूरी तरह बदल जाता है.

साल 2018 में, इंग्लैंड में इस पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था. कई महिलाओं और एक्टिविस्ट्स ने एक कैम्पेन चलाया कि सरकार अपस्कर्टिंग को अपराध घोषित करे. लंबे समय तक चली बहस के बाद इसे सैक्सुअल औफेंस की श्रेणी में शामिल तो किया गया, लेकिन तब तक सैकड़ों महिलाएं ऐसी हरकतों का शिकार बन चुकी थीं. औस्ट्रेलिया ने भी इस दिशा में कदम उठाया और कानून ला कर साफ कर दिया कि बिना सहमति किसी भी प्रकार की निजी तस्वीर बनाना, चाहें असली हो या डीपफेक, एक सीधा अपराध है.

क्यों हो रही सामान्य

भारत की स्थिति और चिंताजनक है. दिल्ली मेट्रो का उदाहरण लीजिए. हम अकसर सुनते हैं कि यहां से लगातार “वायरल वीडियोज” निकलते रहते हैं. किसी के फैशन स्टाइल या किसी लड़की के पहनावे को ले कर जानबूझ कर वीडियो बनाना और फिर उसे सोशल मीडिया पर डालना अब कौमन हो गया है. धीरेधीरे यह ट्रैंड सिर्फ बौडी-शेमिंग तक सीमित नहीं रहा. अब इस में छिपे कैमरों से अपस्कर्टिंग कर क्लिप्स बनाई जाने लगीं हैं. इन वीडियोस को ‘मज़ाक’ या ‘प्रैंक’ कह कर शूट किया जाता है, लेकिन असल में यह सीधेसीधे सैक्सुअल हैरेसमेंट के दायरे में आता है.

इस तरह की आप कोई भी वीडियो उठा कर देखिए, कंटेंट के नाम पर क्या दिखाने की कोशिश की जा रही है. आज यूथ के दिमाग में यह फितूर भर गया है कि अगर आप इंस्टाग्राम पर ट्रेंड नहीं कर रहे, अगर आप के रील्स पर हजारों लाइक नहीं आ रहे, तो आप किसी काम के नहीं हैं. इस दबाव ने लाखों युवाओं को ऐसा शौर्टकट ढूंढने पर मजबूर कर दिया है जिस की कीमत किसी दूसरे को चुकानी पड़ रही है. सोचिए, अगर किसी लड़की को यह पता चले कि उस की चोरीछिपे ली गई एक फोटो या वीडियो आज सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है, तो उस की मानसिक स्थिति कैसी होगी?

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर लड़की को अपनी कोई ऐसी वीडियो का पता भी चलता है तो इंग्लैंड में ऐसे 70 प्रतिशत मामले दर्ज ही नहीं हो पाते क्योंकि लड़कियां पुलिस तक जाने से हिचकती हैं. उन्हें डर रहता है कि केस दर्ज करने से उन का नाम सामने आ जाएगा और वीडियो और ज्यादा फैल जाएगी.

भारत में भी लगभग यही हाल है. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2023 में 18 हजार से ज्यादा साइबर उत्पीड़न और अश्लील कंटेंट शेयरिंग के केस दर्ज हुए, लेकिन यह आंकड़ा असल संख्या की तुलना में बहुत कम है. असली हकीकत यह है कि ज्यादातर लड़कियां डर और शर्म की वजह से चुप रह जाती हैं. यह तो वो मामले हैं जो जांच के दायरे में आ गए हैं. मगर हर दिन ऐसी सैकड़ों वीडियो रोज बन रही हैं कुछ इन्फ्लुएंसर्स के द्वारा जो कभी जांच के दायरे में आते ही नहीं क्योंकि उन के लिए तो यह कंटेंट क्रिएशन है.

दरअसल, अब केवल चोरीछिपे मोबाइल कैमरा ही खतरा नहीं है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने हालात को और खतरनाक बना दिया है. किसी लड़की की इंस्टाग्राम से ली गई तस्वीर को एआई टूल्स के जरिए बदल कर अश्लील वीडियो बना देना सेकेंडो का खेल बन गया है. वह वीडियो व्हाट्सएप ग्रुप्स या टेलीग्राम चैनलों पर फैलतेफैलते हजारों हाथों में पहुंच जाती है. कई बार तो असल और नकल में फर्क करना तक मुश्किल हो जाता है.

इन्फ्लुएंसर्स कल्चर से बढ़ावा

यहां एक और गंभीर सवाल उठता है, इन्फ्लुएंसर कल्चर इस पूरे खेल को कितना बढ़ावा दे रहा है? आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के युवा इन्फ्लुएंसर्स की गिरफ्त में फंसे हैं. अच्छाखराब जो भी कंटेट वो दिखाते हैं वही उन की दुनिया बनते जा रहे हैं.

लेकिन समस्या यह है कि कई इन्फ्लुएंसर फौलोअर्स की भूख में किसी भी हद तक चले जाते हैं. वे बिना सोचेसमझे पब्लिक जगहों पर वीडियो बनाते हैं, कभी राह चलती लड़कियों से छेड़छाड़ को मजाक की तरह दिखाते हैं और कभी ऐसी क्लिप शूट कर देते हैं जो सीधे किसी लड़की की प्राइवेसी का उल्लंघन करती है.

भारत में कानूनी स्थिति अभी बहुत कमजोर है. अपस्कर्टिंग को अभी तक कानून में अलग अपराध नहीं माना गया है. हालांकि आईपीसी सेक्शन 354सी यानी वोयुरिज्म और 509 यानी महिलाओं की अस्मिता का अपमान करने से जुड़े प्रावधान लागू हो सकते हैं, लेकिन इन की सीमाएं स्पष्ट हैं. डीपफेक जैसे आधुनिक अपराध इन धाराओं में फिट नहीं बैठते. जब तक कोई खास, अलग कानून नहीं बनेगा, तब तक पीड़ितों को न्याय मिलना बहुत मुश्किल है. इस के साथ ही पीड़िता को गुमनामी (anonymity) का भी अधिकार मिलना चाहिए, ताकि वह शिकायत दर्ज कराने में सहज महसूस करे. लेकिन भारत में ऐसे मामलों में अभी यह सुरक्षा बहुत सीमित है.

पुलिस और न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार अलग समस्या है. अकसर सुनवाई लंबी खिंच जाती है, सबूत इकट्ठा करना मुश्किल हो जाता है और पीड़िता की हिम्मत टूट जाती है. अफसोस की बात यह है कि एक पीड़िता के पास केवल दो ही रास्ते बचते हैं. या तो वह कोर्ट का चक्कर लगाए और अपनी प्राइवेसी के उजागर होने का खतरा उठाए, या फिर चुपचाप यह सब झेले और जिंदगी भर उसे याद रखे. ऐसे में ज्यादातर लड़कियां शिकायत करने के बजाय चुप रहना बेहतर समझती हैं.

इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टेलीग्राम जैसे प्लेटफौर्म्स को तुरंत ऐसे कंटेंट हटाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. बेशक वे सिर्फ प्लेटफौर्म हैं और उन्हें इस के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, मगर उन्हें ऐसे कंटेंट देखना पड़ेगा कि बारबार किसी यूजर का अकाउंट आपत्तिजनक कंटेंट डाल रहा है, तो उस पर उपयुक्त कार्यवाही हो. दूसरा वीडियो डालने से ज्यादा जरूरी यह है कि वीडियो देखने वाला ही इस तरह के कंटेंट क्रिएटर को बायकोट करें, क्योंकि आज किसी के साथ हो रहा है तो कल को उन के साथ भी हो ही सकता है.

जेन जेड को यह समझना होगा कि किसी की प्राइवेसी कभी भी मजाक नहीं है. असली ‘कूलनेस’ यह है कि आप दूसरों की प्राइवेसी का ख्याल रखें, और यह दिखाएं कि आप डिजिटल सिटीज़नशिप निभा सकते हैं. अगर आप देखते हैं कि कोई दोस्त ऐसे वीडियो बना रहा है या अनजाने में किसी को शर्मिंदा कर रहा है, तो उसे रोकना भी जिम्मेदारी है. Online Harassment

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