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Social Story In Hindi : मुक्ता का सवाल – क्या भोग्या बना दी गई मुक्ता

Social Story In Hindi : स्त्री को कमजोर समझ कामलोलुप पुरुष ऐसे रीतिरिवाज बनाता है कि स्त्री बेबस हो जाती है इन रिवाजों के आगे. लेकिन मुक्ता तैयार नहीं थी भोग्या बनने के लिए अपनी आई की तरह.

‘‘आई, आखिर क्या कमी है मुझ में, मैं देखने में उन लड़कियों से सुंदर हूं. मैं ने कपड़े भी अच्छे पहने हैं. बुद्धि भी तो मेरी अच्छी है. देख, मैं जोड़ कर सकती हूं,’’ कहते हुए वह उंगली पर 2 और 2 अंक जोड़ कर आई को दिखाने लगी, फिर बोली, ‘‘मैं शब्द भी लिख सकती हूं.’’ और उस ने पास ही पड़े ईंट के टुकड़े से जमीन पर आई लिखना शुरू कर दिया.
‘‘अब बता, फिर क्यों उन को इतना सम्मान और मेरा अपमान?’’ मुक्ता आज बाहर अपने हमउम्र साथियों से उपेक्षित हो कर आई थी, इसलिए कलपती हुई अपनी आई से सवाल कर बैठी. जवाब में इतना ही कह पाई सकू कि ‘‘बेटी, यह हमारा प्रारब्ध है.’’
‘‘आई, मैं प्रारब्ध-वारब्ध कुछ नहीं जानती, मुझे पढ़ना है, उन जैसा बनना है, बस,’’ मुक्ता ने अपना फरमान सुना दिया.

सकू भी चाहती थी कि उस की बेटी साक्षर बने, इसलिए उस ने बेटी की इच्छा का मान रखते हुए घर पर ही एक मास्टर उसे पढ़ाने के लिए रखा. भला इंसान था, सो घर आ कर मुक्ता को कुछ सिखा जाया करता था.
एक दिन मुक्ता ने अपनी आई से सवाल किया, ‘‘सब के घर पिता हैं, दादादादी हैं, भाईबहन हैं, हम अकेले क्यों हैं?’’
समझ न पाई सकू अपनी बेटी को, क्या समझाए, ‘‘पोर (बेटी), हम देवदासियां हैं, देवता ही हमारा परिवार है.’’
‘‘देवता हमारा परिवार कैसे हुआ, आई?’’
‘‘क्योंकि तेरी आई का ब्याह देवता से हुआ है और जब एक बार कोई लड़की देवता को ब्याह दी जाती है तो बाकी समाज से उस का नाता टूट जाता है. फिर हम सांसारिक लोगों से ब्याह नहीं कर सकते.’’
‘‘ऐसा क्यों, आई?’’
‘‘क्योंकि हमारी मांग में देवता के नाम का सिंदूर जो भर जाता है. सो, हम इस समाज से संबंध नहीं रख सकते,’’ सकू ने मुक्ता को बहलाने के उद्देश्य से कहा.
‘‘अच्छा, जब देवता से ब्याह हुआ है तो देवता का परिवार हमारा परिवार हुआ न. कहां है वह परिवार?’’ मुक्ता ने जिरह शुरू कर दी.
‘‘मंदिर में रखी पत्थर की मूर्तियां ही हमारा परिवार है, बेटी. और तुम्हें तो पता है, पत्थर की मूर्तियां बोला नहीं करतीं.’’
‘‘अगर ये पत्थर की मूर्तियां हमारा परिवार हैं तो फिर पुजारी का यहां क्या काम, यह क्यों रहता हैं यहां और तू क्यों इस की इतनी सेवा करती है?’’
‘‘क्योंकि देवता के बाद ये ही हमारे पालनहार हैं,’’ सकू का स्वर कुछ लड़खड़ा सा गया.
‘‘वाह, यह क्या बात हुई, सिंदूर देवता के नाम का, उसे भोगने वाला उस देव का उपासक?’’
सकू को समझ नहीं आ रहा था कि बेटी को कैसे समझाए कि हमारा जीवन भी, बिना स्वामी के हम एक खुली शराब की बोतल बन कर रह जाती हैं, जो चाहे उसे उठा कर गले उतार ले. कुछ गलत नहीं कह रही मुक्ता, आखिर यह कैसा पतिदेव है, कहने को सर्वशक्तिमान है, जिस से हम ने सच्चे मन से प्यार तो किया मगर वह अपनी दासी के अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाता? जिस की मरजी हो, देव के नाम पर वधू के रूप में उसे भोग कर आनंद की प्राप्ति कर लेता है.

सकू ने कभी नहीं चाहा कि उस की बेटी भी कभी देवदासी बने. वह तो चाहती थी नगर के सेठ, साहूकारों की तरह उस की बेटी पढ़े, कमाने की ऊंचनीच समझे, किसी अच्छे कुल की शोभा बने मगर इस समाज का क्या करें. यह यों तो खुद के लिए बहुत बदलाव दिखाता है लेकिन जब देवदासियों से जुड़े मुद्दे आते हैं तो पुराणपंथी बन जाता है. आखिर, क्या कमी है मुक्ता में?

रूपरंग तो मुक्ता ने सकू का ही पाया है. सौंदर्य में नगर की कोई बेटी उस के बराबर नहीं लेकिन समय उन बेटियों सा कहां पाया उस बेचारी ने. आखिर मुक्ता कहलाएगी तो देवदासी की ही कन्या न, भले ही उस में लहू बीजापुर के साहूकार का है. यह सब जानते भी हैं लेकिन मानता कोई नहीं. उस की छाया बेटी के लिए काल बनी हुई है.

देवदासी पुत्री होने के चलते समाज की पाबंदियां थीं मुक्ता पर कि किसी भी संभ्रांत परिवार की बेटी उस की सखी नहीं बनती. उसे हेय दृष्टि से देखा जाता, कई स्थलों पर उस के प्रवेश की पाबंदी होती. उसे पाठशाला जाने पर अपमानित कर भगा दिया जाता. तब मुक्ता के सवालों की बौछार आई पर हो जाती.

सकू फरियाद करे तो किस से? समाज के उच्च वर्गों से वह मुक्ता के लिए कोई सहयोग नहीं चाहती थी. कारण, उन की नियत जो जानती है वह. देख रही है इधर कुछ समय से सेठसाहूकारों का मुक्ता के प्रति कुछ अधिक उदार भाव है. सकू समझ रही थी, उम्र का लावण्य मुक्ता पर छा रहा है.

गांव के वे समृद्ध सेठसाहूकार जो अब तक सकू की देह के प्यासे थे, अब उन की नजर में सकू का यौवन ढलते सूरज सा लगने लगा है. उन्हें अब सकू में कोई आकर्षण दिखाई नहीं देता. कारण, मुक्ता का अछूता कौमार्य जो सामने नजर आता. उन की भूखी आंखें अब मुक्ता पर बिछने लगीं. ‘गरीब की भौजाई गांवभर की लुगाई’ कहावत इन्हीं लोगों के आचरण से निर्मित हुई होगी.
असमंजस की स्थिति में थी सकू, तभी मुक्ता बोली, ‘‘आई, क्या कोई नहीं है हमारा अपना इस दुनिया में?’’
‘‘यों तो कहने को रक्त संबंध हैं लेकिन न के समान. लेकिन हां, एक है जिसे हम अपना कह सकते हैं,’’ कहतेकहते अचानक आगे के शब्द मानो उस के मुंह में ही घुल कर रह गए, मुक्ता के कानों तक नहीं पहुंच पाए. वहीं, सकू अपने अतीत के गलियारे में जा खड़ी हुई.

जब से उस ने होश संभाला, उसे बस इतना याद है कि वह अपनी आई के साथ जागरणों में तो कभी रईसों के दरबारों में जा कर उन का मनोरंजन करती, उन के लिए नाचती. 6 बरस की सकू भी अपनी आई के साथ जाया करती थी. आई खूब श्रृंगार कर जब ठुमके लगाती तो साहूकारों की पोटलियां खुल जातीं, खूब सिक्के, रुपए आई की ओर उछलते. उस समय सकू नहीं जानती थी इन सिक्कों या रुपयों की गरिमा क्या है. उस वक्त उसे यह चमकदमक भाती थी.

जब वह अपने आई, बाबा और मंडली के साथ जा कर जगहजगह जागरणों में नाच करती तो उस पर से कितनी चिल्लर उछाली जाती, सिक्कों की खनखनाहट से उस के पैर और भी ऊर्जा से भर नाचने लगते. अच्छा पहनने को मिलता और जहां आयोजन में बुलाया जाता तो वहां जितने भी दिन आयोजन होता, अच्छा भोजन खाने को मिलता. फिर भले ही घर आ कर भाकरी-चटनी नसीब होती. मगर, उतने दिन जिंदगी, जिंदगी सी लगती थी. उन दिनों के बारे में सोचते हुए सकू के चेहरे पर अनायास मुसकान उभर आई.

‘‘क्या सोच रही है, आई, जो तुझे हंसी आ रही है?’’ मुक्ता ने उस के कंधे को झिंझोड़ते हुए कहा तो सकू की तंद्रा भंग हुई.
‘‘कुछ नहीं बेटी, बस यही सोच रही हूं कि काश, बीता वक्त हम लौटा पाते तो कई पीड़ाओं, कई झंझटों से बच जाते.’’
‘‘ऐसा क्या था तेरे अतीत में, आई, जो तू उस में लौटना चाहती है? मैं ने तो जब से होश संभाला है, तुझे इसी हाल में देखा है.’’
‘‘मेरा अतीत आज से कहीं अच्छा था, मेरी बच्ची. यों भी अतीत सदैव वर्तमान से ज्यादा सुखकर लगता है, मगर वर्तमान रहने तक नहीं. तब तो हम, बस, उस की उपेक्षा कर उसे कोसते रहते हैं.’’ सकू की बातों से मुक्ता की जिज्ञासा बढ़ रही थी.
‘‘बता न आई, क्या था तेरा अतीत?’’
‘‘हां बताऊंगी, मेरी बच्ची. सबकुछ बताऊंगी तुझे. अब तू समझदार हो गई है, इसलिए तुझे बतानी ही होगी सच्चाई.’’
‘‘क्या अतीत, कैसी सच्चाई, आई?’’
‘‘बेटी, सब की तरह मेरा भी एक परिवार था, आई और बाबा थे, भाईबहन थे. हम लोग भले ही गरीबी में दिन गुजार रहे थे मगर खुश थे. अधिक ख्वाहिशें नहीं थीं.’’
‘‘फिर अब क्यों नहीं है, आई, वह परिवार? क्या सब मर गए?’’
‘‘नहीं, मेरी बच्ची. हां, उम्र के साथ आई और बाबा तो दुनिया से चले गए लेकिन तेरी मौसी और मामा हैं अभी?’’
‘‘तो वह कभी मिलने क्यों नहीं आए हम से?’’
‘‘क्योंकि अब हम उन के परिवार के सदस्य नहीं रहे न.’’
‘‘परिवार के सदस्य नहीं रहे, मतलब?’’
‘‘मतलब, अब हम देवदासी परिवार से हैं, जिस से संबंध रखना सब के लिए अपमान का विषय है. लोगों को पता चलेगा तो वे क्या कहेंगे?’’
‘‘आई, क्या देवदासी होना इतना बुरा है, तो तू क्यों बनी देवदासी?’’
‘‘कौन स्त्री अपनी मरजी से देवदासी बनना चाहेगी, बेटी. हम जबरन बना दी जाती हैं.’’
‘‘जबरन, क्या किसी को यह अधिकार है कि किसी स्त्री को जबरन देवदासी बना दे. यदि है तो किस ने दिया उन्हें यह अधिकार?’’
‘‘किसी ने नहीं दिया अधिकार, इस पुरुष समाज ने स्वयं अपनी कामना तृप्ति के लिए ले लिया है यह अधिकार.’’
‘‘किस ने की तेरे साथ जबरदस्ती, आई. क्या तेरे आई और बाबा ने नहीं रोका उन्हें?’’

सकू खामोश निगाहों से बेटी की ओर देखने लगी. उसे लगा, बेटी के रूप में एक सखी मिली है उसे आज. कह डाल मन की सारी व्यथा आज. बहुत लाड़ आ रहा था सकू को अपनी बेटी पर. वह मंत्रमुग्ध सी उसे देखे जा रही थी.
‘‘चुप क्यों है, आई, बोल न तेरे आई और बाबा ने क्यों नहीं रोका?’’
‘‘कहते हैं न कुम्हार का बेटा कुम्हार, मास्टर का बेटा मास्टर. यही हुआ मेरे साथ. तेरी नानी जागरणों में नृत्य करती, सो मैं भी उस के पदचिह्नों पर चल पड़ी. जब कभी आई को कुछ पल विश्राम करना होता तो मंडली ने मुझे उन की भरपाई के रूप में मंच पर उतारना शुरू कर दिया. नयानया जोश था, बहुत भाता था तब ये सजनासंवरना, अच्छेअच्छे कपड़े पहन कर नाचना. उम्र की बेल तेजी से बढ़ रही थी, उस पर मेरा निखार ऐसा कि जो देखे वही आकर्षण में बंध जाए. बला की खूबसूरत दिखने लगी थी मैं, जवानी का रंग जो चढ़ा था.

‘‘14-15 बरस की उम्र में लोग मेरी खूबसूरती की दाद देते तो मुझे भी खुद पर अभिमान हो आता. इस प्रशंसा ने मेरी अदाओं को और भी चंचल बना दिया. अब नृत्य की मुद्राओं के साथ मेरी आंखें, भवें, होंठ, छाती, कमर सभी लटकेझटके की भाषा बोलते. लोग खुल कर मेरी अदाओं पर पैसा लुटाते. आई, भाई और बाबा बलिहारी जाते बेटी की इन भावभंगिमा पर. बस, फिर क्या था मेरे सौंदर्य और लटकोंझटकों की चर्चा दूरदूर तक फैलने लगी.

‘‘एक बार बीजापुर के साहूकार की ओर से आमंत्रण आया.
तब तक यों ही आसपास रात जागरण करते और अपना पेट भरते थे. उस दिन बतौर कलाकार के रूप में आमंत्रण आया, बीजापुर के साहूकार बड़े मालदार थे. आई और बाबा बड़ी खुशी महसूस कर रहे थे. आई ने कहा, ‘सुनोजी, ऐसा नहीं लगता कि सकू के रूप में हमारे यहां साक्षात देवी अलकनंदा आई है?’

‘‘हां, तुम ठीक कहती हो. आज सकू की बदौलत ही हम ने यह दिन देखा है.’ सब मेरी मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहे थे. मैं भी वहां के वैभव की कल्पना कर अपने समय को सराह रही थी. अब तक केवल सुनती ही थी कि काफी खातिरदारी होती है. इस का प्रमाण पहली बार देखा.

साहूकार ने सजीधजी छकड़ी (बैलगाड़ी), साथ में राजसी वस्त्र और आभूषण मेरे लिए भिजवाए जिन्हें पहन कर ही मुझे बीजापुर की धरती पर कदम रखना था. मुझे तो बहुत शौक था बननेसंवरने का और किस युवती को नहीं होगा आखिर श्रृंगार तो नारी का अधिकार है. उस दिन मेरी मां ने खुद मेरी विशेष सज्जा की, सारे आभूषण पहनाए.
‘‘सजेधजे बैलों वाली छकड़ी में बैलों की घंटियों की आवाज के साथ मानो मेरा डोला आगे बढ़ा रहा था. तब आई और बाबा ने बताया कि मेरे जन्म के समय पंडितों ने ठीक ही भविष्यवाणी की थी कि सकू सुख व वैभव में जीवनयापन करेगी. उस का आरंभ हो चुका था.
‘‘मंडली के सदस्य प्रसन्न मन से बाबा को बधाई दे रहे थे- ‘बधाई हो मनु भाई, अपनी सकू रानी लग रही है. देखो, किसी शाही सवारी से कम नहीं लग रही. कितना सम्मान पाया है सकू ने.’

‘सच कहते हो भाई, मेरे मन में भी ठीक यही बात चल रही है कि जिस तरह विवाह होने पर बेटी डोली में बैठ ससुराल जाती है ठीक वैसे ही हमारी सकू लग रही है आज.’ कहते हैं, कभी कोई पल ऐसा होता है कि आप की जबान पर सरस्वती का वास होता है. बाबा ने मेरे ससुराल जाने की बात कल्पना में कही थी मगर क्या पता था कि आज मेरा डोला वाकई इस घर से विदा हो रहा है. आई बारबार नजर उतार रही थी. आगेआगे सकू की छकड़ी तो पीछेपीछे मंडल के सारे कारिंदों की गाड़ी चल रही थी. ऐसा लग रहा था कोई महारानी विश्व विजय कर के आ रही है.’’
‘‘आई, तू तो नृत्य के लिए गई थी न वहां, फिर यह देवदासी, क्या हुआ बीजापुर में, उस बारे में बता न?’’ मुक्ता ने पूछा.
‘‘उस रोज काफिला साहूकार की हवेली पहुंचा तो केवड़े का इत्र छिड़क कर मंडली का भव्य स्वागत किया गया. थकान मिटाने के लिए गुलाब का शरबत पेश किया गया. मैं अपने मातापिता के चेहरे पर आई प्रसन्नता देख कर खुश थी. गरीबी से जूझते अपने परिवार को मैं अगर थोड़ी सा सुख दे पाई तो बड़ा अच्छा महसूस कर रही थी.
‘‘मैं ने पूछा था, ‘कस वाटतय आई, बाबा (कैसा लग रहा है आई, बाबा)’
‘रे देवादेवा, कुदृष्टि ने वाच्वा मा?या लेकरु ला (हे प्रकृति, बुरी नजर से बचाना मेरी बेटी को)’, आई ने मुझ पर से मुट्ठी उसारते हुए कहा था.
‘‘साहूकार के यहां भव्य आयोजन हुआ. दूरदराज से आए श्रीमंतों ने तनमन से आनंद उठाया. खूब पैसे उड़ाए. मैं ने भी अदाओं से सब का मन मोह लिया. उस पूरे आयोजन की नायिका ही मैं थी. सभी मेरे दीवाने हो गए.

‘‘समापन की बेला पर हर अतिथि सकू को अपने साथ ले जाना चाहता था. परिणामतया, उन के बीच विवाद की स्थिति बन गई. मारकाट की स्थिति आ गई. खूनखराबा हो, इस से बेहतर बीजापुर के साहूकार ने सब से ज्यादा दाम दे कर ऐलान कर दिया कि, ‘सकू बीजापुर में ही रहेगी.’ और विवाद खत्म. चूंकि बीजापुर के नगर पति थे साहूकार, इसलिए मुझ पर साहूकार का अधिकार हो गया. देवता तो केवल नाम के पति रहे, साहूकार ही मेरे पति हो गए.

‘‘साहूकार मुझे अपने साथ ले आए. अब उन्हें मेरे आई और बाबा व उन की मंडली की कोई आवश्यकता न थी, सो, मोटी रकम दे कर उन्होंने सब को विदा किया और मुझे अपनी हवेली में ठाट से रहने को घर दिया. माना, मैं साहूकारनी नहीं, न सही, मगर उस से कम रुतबा न था मेरा वहां. बहुत चाहते थे साहूकार मुझे, अपनी ब्याहता से अधिक. हां, उम्र में वे मुझ से काफी बड़े थे.’’
‘‘बड़े थे, तो तू इनकार कर देती न?’’ मुक्ता ने कहा.
‘‘कैसे कर देती, आई ने कहा था, ‘बेटी, घोड़ा और मर्द कभी बूढ़ा नहीं होता. फिर, क्या कमी है तुझे वहां, ऐसे सुख पर उम्र कुर्बान.’ बहुत गरीबी देखी थी, सो इनकार न कर सकी. आखिर, मेरे परिवार के भविष्य का सवाल था.’’
‘‘जब सबकुछ इतना अच्छा था तो फिर आज तू यहां इस हाल में, मां?’’ मुक्ता ने सवाल किया.
‘‘समय, बेटी समय अपनी कोठरी में क्या राज छिपाए रखता है, भला कौन जान सकता है. सच, किसी की कुदृष्टि ही लगी मुझे कि ढाई बरस ही हुए थे मुझे साहूकार के साथ रहते, इस बीच साहूकार का अंश यानी ‘तुम’ गर्भ में आ गईं. अपने समय पर खुद ही बलिहारी जाती मैं, नादान थी तब नहीं जानती थी कि मांग के सिंदूर का क्या महत्त्व होता है. मांग में बिन सिंदूर भरे मां बनना न केवल मां बल्कि बेटी के जीवन को भी नरक कर देता है. यह बात तब नहीं सम?ा पाई. पढ़ीलिखी नहीं थी न. बस, साहूकार के दिए प्यार और सुख व वैभव को ही अपनी गृहस्थी मान बैठी जबकि वह तो डाका था किसी की गृहस्थी में मेरा.’’
‘‘क्या साहूकार ने कभी मेरे प्रति कोई चिंता नहीं दिखाई?’’ मुक्ता का सवाल था.
‘‘दिखाते तो तब, जब वे तुझे देख पाते.’’
‘‘मतलब?’’
‘‘मतलब, समय कब क्या खेल खेल जाए, कौन जानता है. तेरा जन्म होने से पहले ही दिल का दौरा पड़ने से साहूकार चल बसे. साहूकार के जाते ही मानो मेरी दुनिया ही बदल गई. साहूकार के परिवार ने मुझे हवेली से ही नहीं, गांव से भी बेइज्जत कर बेदखल कर दिया. पेट का गर्भ लिए मैं गांव के बाहर मंदिर में पड़ी रही, जहां मैं ने तुझे जन्म दिया.’’
‘‘तो तू अपने आई और बाबा के पास क्यों नहीं चली गई?’’

‘‘खबर भेजी थी. मगर कोई नहीं आया सिवा केशव के. वह बोला, ‘चल सकू, हम फिर से अपनी मंडली सजाएंगे.’ मगर मेरा मन नहीं था तब नाचगाने का.’’ मैं मंदिर में रहती, यहीं अपना मन लगाती. इसी बीच गांव में अचानक रोग फैला, लोग मरने लगे. गांव वालों ने इस का दोष मेरे माथे मढ़ दिया. उन के अनुसार, बिन ब्याहता मां के मंदिर में रहने से यह दैवीय प्रकोप हुआ है.’’
‘‘फिर, क्या सच में ऐसा होता है मां?’’
‘‘नहीं जानती, क्या सच है.’’
‘‘तो क्या किया उन्होंने तेरे साथ?’’
‘‘वही जो आज मैं हूं.’’
‘‘मतलब?’’
‘‘वही बीजापुरवासी, जिन्होंने साहूकार के जाते ही मुझे बदचलन कह कर गांव से बाहर निकाला था, मेरी देह के प्यासे हो गए और गांव में फैली बीमारी को दैवीय प्रकोप बता कर यह ढोंग रचा कि प्रकृति की इच्छा है कि सकू देवदासी के रूप में रहे. मैं तब देवदासी क्या होती है, नहीं जानती थी. बीजापुर के मंदिर में मुझे देवदासी बनाने की रस्म पूरी हुई. ठाटबाट से मेरा ब्याह देव के साथ कराया गया. कहने को देवदासी बना दिया मुझे लेकिन मैं गांवभर की ‘नगरवधू’ बन कर रह गई. साहूकार के न रहने पर नगर का हर इंसान नगरपति बन गया और मैं उन की भोग्या.’’
‘‘आई, इस से तो अच्छा होता तू किसी से शादी कर के घर बसा लेती?’’
‘‘अपना चाहा कब होता है, बेटी. वही न होता है जो समय चाहता/करता है.’’
‘‘सचसच बताना, आई, क्या तुझे अपने जीवन में कभी किसी के प्रति अनुराग नहीं हुआ?’’
‘‘हुआ नहीं, होतेहोते रह गया.’’
‘‘यह क्या बात हुई?’’
‘‘यह भी एक अलग कहानी है.’’
‘‘कौन था वह, आई और तू ने क्यों उस के साथ घर नहीं बसाया? बसा लेती तो आज…’’

‘‘वह हमारी ही मंडली का एक अनाथ लड़का था, केशव, जो ढोलकी बजाता था. मैं भी उस की ढोलकी पर जम कर नाचती. हम दोनों की जात में अंतर था लेकिन संगीत की ताल पर हम दोनों एक हो जाते थे. केशव बचपन से मंडली के साथ ही पलाबढ़ा क्योंकि उस के पिता शर्नप्पा इसी मंडली में तबला बजाते थे. छोटा था केशव जब उस के पिता की मृत्यु हो गई. धीरेधीरे उम्र के पड़ाव के साथ केशव के मन में मेरे प्रति कुछ अतिरिक्त भाव जागृत होने लगे, इस का मु?ो एहसास हो रहा था क्योंकि यह अवस्था ही ऐसी होती है, धड़कनों की भाषा सुनाई दे ही जाती है लेकिन बात कुछ आकार ले पाती, उसी बीच यह बीजापुर का आमंत्रण आ गया और मेरी जिंदगी ने दूसरी करवट ले ली.’’
‘‘आई, तुझे केशव के साथ चले जाना चाहिए था वह आया था न तुझे लेने?’’
‘‘हां, शायद तू सही कहती है लेकिन उस का निश्च्छल प्रेम और मैं एक भोगी हुई स्त्री, कैसे खुद के पापबोध से उबर पाती. बस, इसी तरह गुजर हो रही थी. मैं मंदिर में नृत्य करती, मंदिर में सेवा करती, तथाकथित भगवान के तथाकथित भक्त मेरा भोग लगाते. इसी तरह जीवन व्यतीत हो रहा था. बस, एक तू थी जिसे देख कुछ खुशी मिलती. बहुत थोड़ा सुख का समय देखा था साहूकार के साथ. नगरभर की चहेती पल में नगरसेविका बन गई.’’
‘‘आई, क्या तू देवदासी होने में विश्वास रखती है? क्या सच में देवता किसी का पति हो सकता है?’’
‘‘पता नहीं, पोर समाज ने यह परंपरा बनाई है तो कुछ होगा ही.’’
‘‘नहीं, आई. इस के पीछे समाज की घिनौनी सोच के अलावा कुछ नहीं. यह पुरुष की कामवासना पूर्ति की चाल है. अगर ऐसा होता तो क्यों किसी सेठ, साहूकार या पुजारी ने अपने घर की बहूबेटियों को कभी देवदासी नहीं बनाया? सोच, पति जो होता है उस का फर्ज क्या होता है, अपनी पत्नी की देखभाल करना, उस के सुखदुख का ध्यान रखना, संकट में उस की रक्षा करना, यही न?’’

सकू अपनी बेटी पर बलिहारी जा रही थी, कितनी समझदार हो गई है उस की बेटी. आक्षरज्ञान दे कर मास्टरजी ने उस की बेटी में आत्मविश्वास जगा दिया है. वह मन ही मन नजर उतार रही थी मुक्ता की.
‘‘बोल न, मैं ने तुझ से प्रश्न किया है, क्या तेरे देवता पति ने तुझे समाज के इन भेडि़यों से बचाया?’’
‘‘शायद तू ठीक कहती है, मुक्ता. एक देवदासी की अपनी पीड़ा कौन समझे जिस का पति अमूर्त, न जिस से मन की बात कर पाती, न जज्बात ही निकाल पाती, कड़वे दिन थे मगर काटने तो थे.’’
‘‘तुझे सख्ती से मना कर देना चाहिए था कि नहीं बनना देवदासी, तुम कौन होते हो मुझे देवदासी बनाने वाले?’’

‘‘शायद कह भी देती बेटी मगर नहीं जानती थी देवदासी के नाम पर मैं नगरवधू बन कर रह जाऊंगी. शुरू में तो मुझे बताया गया था कि मेरा काम है देवताओं का श्रृंगार करना और उन को खुश करने के लिए मंदिर में नृत्य करना, क्योंकि वे स्वर्ग में रहने के आदी हैं जहां अप्सराएं उन का इसी तरह नृत्य कर मनोरंजन करती हैं. नृत्य चूंकि मेरा शौक था, इसलिए मुझे कोई आपत्ति नहीं हुई.’’
‘‘सोच आई, तो क्या अप्सराएं मनोरंजन की वस्तु हैं?’’
‘‘नहीं जानती बेटी मगर शुरू से यही देखती आ रही हूं.’’
‘‘क्या?’’

‘‘ये लोग 10-11 साल की मासूम लड़कियों को देवदासी के नाम पर यहां ला कर, उन्हें देवता को प्रसन्न करने के बहाने निर्वस्त्र कर देते हैं, फिर 80-90 किलो के पुजारियों को छोड़ दिया जाता है उन पर भूखेभेडि़यों की भांति.’’
‘‘तो आप ने स्वीकार क्यों किया भूखे भेडि़यों का शिकार बनना, आई?’’
‘‘कैसे न करती बेटी, यही प्रथा जो चली आ रही है सदियों से, किस के दम पर न कहती. इस में अकेले मेरे मना करने की गुंजाइश कहां. उलटे, हाथी जैसे पुजारी को अपने ऊपर पा कर जब दर्द और भय से चीखी तो पुजारी ने यह कह कर मेरे होंठ सी दिए कि, ‘आज मैं तेरा ईश्वर से मिलन करवा रहा हूं, इस तरह हंगामा करेगी तो ईश्वरमिलन में बाधा होगी.’ सो, चुपचाप होने दे, जो हो रहा है.’
‘‘लेकिन आई इतना सब हो कर भी इन पुजारियों की छवि समाज में इतनी पाकसाफ क्यों है, कोई इन का नकाब क्यों नहीं उतारता?’’
‘‘कौन उतारे, यह पुरुष समाज है, अपनी बारी आने पर सब एक स्वर में गुर्राने लगते हैं. लोग दिखावे के लिए ब्रह्मचर्य धारण किए हुए हैं लेकिन अपनी हवस मिटाने के लिए हमारे शरीर का भोग लगाते हैं. एक तरह से मुफ्त में यौन आनंद प्राप्त करना इन का स्वभाव बन गया है, फिर धीरेधीरे यही परंपरा बन गई.
‘‘कुछ लोग हमारी देह के बदले खुश हो हमें कुछ रकम दे देते, तो पुजारियों द्वारा वह भी हम से यह कह कर ले ली जाती कि यह रकम मंदिर की व्यवस्था और रखरखाव के लिए खर्च की जाएगी.’’
‘‘यह तो सरासर अन्याय है, आई?’’
‘‘समझती हैं हम, इतना ही नहीं, अपना शरीर सौंप कर हम ने कई मंदिरों को समृद्धशाली बनाया है. मगर हमारा नाम कोई नहीं लेता, बल्कि घृणा करते हैं हम से.’’
‘‘आई, क्या कभी ग्लानि या लज्जा का अनुभव नहीं होता तुझे?’’
‘‘होता है बेटी, विशेषकर तेरे सामने. काश, साहूकार जीवित होते तो तुझे अपना खून समझ कुछ तो कृपा करते. मगर क्या रास्ता है मेरे सामने, समाज में कौन हमें अपनाएगा. हमारे पेट की भूख को तो हम नहीं मार सकते न. फिर देवदासियों को इस काम के लिए सामाजिक स्वीकृति मिली होती है, इसलिए कोई अपराधबोध नहीं पाला मैं ने.’’

‘‘मुझे किसी की कृपा नहीं चाहिए. एक बात बता, अब तो यह देवदासी परंपरा बंद हो गई न, आई. फिर क्यों अब ये सब लोग मुझे ले तुम्हें बाध्य कर रहे हैं?’’
‘‘बेटी, बंद हुई है लेकिन ठीक वैसे ही जैसे कहने को दहेजप्रथा बंद हुई है मगर समाज में यह आज और भी विकराल रूप में जीवित है. दहेज को ले कर आज बेटियां प्रताडि़त की जा रही हैं. इसलिए हम ने भी कहीं और ठोकरें खाने से वेश्यावृत्ति को ही अपना लिया.’’
‘‘आई, तू कुछ और काम भी तो कर सकती थी?’’
‘‘जैसे?’’
‘‘जैसे, तू रसोई अच्छी बनाती है, खानावल ही खोल लेती?’’
‘‘खानावल, क्या तू नहीं जानती कि हमारे हाथ का खाना वर्जित है समाज के इन तथाकथित सभ्य लोगों को, कौन आता हमारे खानावल में, चोरउचक्के, दारूकुट्टे न?’’
‘‘फिर भी आई, वह जीवन इस से बेहतर होता. अपना कहने को अपना रोजगार तो होता जहां इज्जत से रहते?’’
‘‘तुझे लगता है बेटी, तू जानती नहीं, हर धंधे में चिकल्लस होती है. हां, कभीकभी सोचती हूं कि क्या मिला साहूकार से मुझे. महज ढाई बरस का सहवास और कोख में एक संतान जिस का भविष्य भी तय नहीं. फिर पल में सब छिन गया. ऐसा लगा जिंदगी के सारे रंग ही चले गए. जिंदगी का कैनवास फिर से श्वेतश्याम हो गया. अक्षरों का ज्ञान न सही मुझे लेकिन वक्त की ठोकरों ने इतना तो समझा ही दिया कि देवदासी के नाम पर मेरे जीवन से केवल खिलवाड़ ही हुआ है. गांव वालों के मन में बसी कलुषता मैं भलीभांति जान गई हूं कि सब ने मुझे जीभर भोगा. अब पेट भर गया तो उन की नजर तुझ पर है.’’

समझ रही थी सकू कि समाज के ये तथाकथित ठेकेदार चाहते हैं कि देवदासी की परंपरा बरकरार रहे ताकि उन के दैहिक ताप का समाधान बना रहे लेकिन अपनी बेटी की खातिर उस ने विरोध किया तो गांव के पंच प्रधान से ले कर पंडितपुजारी तक एक ही थाली के चट्टेबट्टे निकले, जिन के आगे एक मां की ममता कमजोर पड़ रही थी. वह क्या करे क्या न करे, कुछ समझ नहीं आ रहा था. फिर समय ने अपना खेल दिखाया, गांव में फिर प्रकृति का प्रकोप हुआ.

गांव के पशु अचानक मरने लगे, पाला पड़ा और खेतों में फसल बैठ गई. सब ने मिल कर इस का दोषी सकू को ठहराया कि इस गांव में प्रथा है देवदासी की, यह सदियों से चली आ रही है, यह देवता का इशारा है कि मुक्ता को देवदासी बनाया जाए. सकू ने विरोध किया इसलिए देव नाराज हो गए और उन्होंने यह दंड गांव वालों को दिया है.

सकू डर गई. वह किसी भी तरह अपनी बच्ची का भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाह रही थी. क्या करे क्या न करे, देवदासी की पीड़ा क्या होती है, उस से बेहतर कौन जान सकता था. एक देवदासी के बिस्तर को सजाने को कई मिल जाते हैं लेकिन उस के मन को सजानेसंवारने को कोई नहीं मिलता. कोई ऐसा कंधा नहीं जिस पर सिर रख कर वह अपने मन का बो?ा हलका कर सके. वह तो एक वस्तु बन कर रह जाती है जिसे केवल भोगा जा सकता है. सकू नहीं चाहती थी कि मुक्ता को भी इसी दौर से गुजरना पड़े. सारी रात वह असमंजस में रही क्योंकि गांव के साहूकार की ओर से आदेश जारी हो गया था कि इस पूर्णिमा को मुक्ता का ब्याह देव से होगा.

ओह, तो क्या पूर्णिमा पर मुक्ता देवदासी बन जाएगी, उस का मन रो रहा था. वह प्रेम से मुक्ता के बालों पर तेल लगा रही थी, मालिश कर रही थी. बेटी को मन भर निहार रही थी. वह जानती थी कि आज उस की बेटी के चेहरे पर जो मुसकराहट दिखाई दे रही है वह चंद दिनों की मेहमान है. उसे मेरी ही तरह इस नरक से गुजरना होगा.

मुक्ता चाहे उम्र में 14 बरस की ही क्यों न हो लेकिन उस ने अक्षर का ज्ञान पाया था. अपनी आई की संवेदना को वह भलीभांति समझ रही थी. बालों में घूमती आई की उंगलियों से वह अंदाजा लगा रही थी कि उन के मन में क्या चल रहा है, बोली, ‘‘आई, वास्तव में यह देवदासी क्या होता है?’’
‘‘बेटी, देवदासी यानी देवताओं की दासी, जिस में एक लड़की का ब्याह देवता से हो जाता है और वह देवता की सेवा में लग जाती है.’’
‘‘ठीक से बताना, आई. देवता से भला ब्याह कैसे हो सकता है, वह तो निर्विकार है. अगर हुआ तो फिर तो देवता ही एकमात्र उस का मालिक यानी पति हुआ न?’’
‘‘हां.’’
‘‘अगर तेरा ब्याह देवता से हुआ तो वह तेरा पति हुआ, ठीक न?’’
‘‘हओ बेटी, अगर मेरा ब्याह देवता से हुआ तो इस नाते देवता मेरा पति ही होगा न.’’
‘‘फिर, मैं तेरी कौन हूं?’’
‘‘कैसी बात कर रही है, मुक्ता. तू पोर (बेटी) है मेरी.’’
‘‘अगर मैं तेरी पोर हूं तो फिर मैं रिश्ते में देवता की क्या हुई?’’
‘‘मैं देवता की पत्नी हूं, वह मेरा पति है, इस नाते तू उन की भी बेटी हुई न?’’
‘‘अच्छा, अगर मैं देवता की बेटी हुई तो वह मेरा पिता हुआ न?’’
‘‘हां, री, तू क्यों इतना पूछ रही है?’’
‘‘फिर अभी तू कह रही थी कि मेरा ब्याह देवता के साथ होगा और अभी तू कह रही है देवता मेरा बाप है, आई. अगर मैं उस की बेटी हूं तो एक बेटी का ब्याह पिता से कैसे हो सकता है?’’ सकू की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.
‘‘बोल न आई, चुप क्यों हो गई, ऐसी प्रथा तो कभी देखी न सुनी?’’
‘‘बेटी, सदियों से यही प्रथा चली आ रही है. अगर इस का पालन नहीं किया तो वे लोग कहते हैं देवता क्रोधित हो जाएंगे. पहले भी ऐसा ही प्रकोप हुआ था और अब भी,’’ सकू असमंजस में बोली.
‘‘आई, अभी तू ने कहा कि देवता तेरा पति और मेरा पिता है तो वह अपनी पत्नी और बेटी पर क्रोधित कैसे हो सकता है?’’
सकू खामोश नजरों से एकटक अपनी बेटी को देखे जा रही थी .

आज अतीत का चलचित्र बहुत तेजी से घूम रहा था सकू के आगे, उस में एक चेहरा उस की आंखों के आगे आ कर ठहर गया. साहूकार द्वारा मु?ो देवदासी बनाने पर अगर कुछ टूटा था तो केशव का दिल, आई और बाबा को तो साहूकार ने मनचाहा पैसा दे दिया था लेकिन केशव अपनी पूंजी हार गया था. आज सकू को उसी बालसखा केशव की याद आई.

अभी 2 दिन थे पूर्णिमा को. उस ने फौरन अपने एक विश्वासपात्र के हाथों एक पत्र दे कर केशव के पास भेजा. निश्च्छल प्रेम में कभी दूरियां नहीं आतीं चाहे उस के बीच समय का कितना ही अंतराल क्यों न आ जाए. परिणामतया, केशव आज सकू बाई के सामने खड़ा था.

सकू बाई ने बेटी को बहुत मन से तैयार किया जैसा उस की आई ने उसे बीजापुर के साहूकार के आमंत्रण हेतु तैयार किया था. वस्त्र-आभूषण पहनाए. मंदिर में मंडप सजवाया. पुजारी वेदी के साथ तैयार था.

सारे गांव वाले आने शुरू हो गए. सकू का आमंत्रण था सब को. सभी उत्सुक थे कि क्यों बुलाया है सकू ने. तब एक मां ने सब के सामने ऐलान कर दिया कि वह मुक्ता का ब्याह आज इसी मंडप में केशव के बेटे वेंकटेश से करने जा रही है.

लेखिका : डा. लता अग्रवाल ‘तुलजा’

Hindi Love Stories : धुआं – किस दुख के सैलाब में डूबी थी रश्मि

Hindi Love Stories : एक अनिश्चित भविष्य की कल्पना कर के रश्मि अमित से दूर चली गई थी लेकिन विडंबना देखो, वही अमित उसे उज्ज्वल भविष्य देने के लिए सामने खड़ा था और उस के पास उसे देने के लिए कुछ न था.

रात के पौने बारह बज रहे थे. ट्रेन खुलने वाली थी. मैं नीचे वाली बर्थ पर खिड़की के पास बैठा खाना खा रहा था. सोचा था, खापी कर तुरंत सो जाऊंगा. ट्रेन रेंगने लगी थी. तभी एक युवती दौड़तेदौड़ते मेरी खिड़की के पास आई.
‘‘यह कोच नंबर 7 है क्या?’’ वह ट्रेन की बढ़ती गति के साथ लगभग दौड़ रही थी.
‘‘हां.’’
उस ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया और बोली, ‘‘17 नंबर बर्थ पर मेरी बहन रश्मि है. जरूर से दे दीजिएगा.’’ ट्रेन की गति बढ़ती गई और वह पीछे छूटती गई. उस ने दोनों हाथ जोड़ कर मुझे मानो धन्यवाद दिया और फिर वह आंखों से ओझल हो गई. बाएं हाथ से मैं ने वह लिफाफा पकड़ा था क्योंकि दाहिने हाथ से खाना खा रहा था. वह लिफाफा मैं ने अपने बैग के ऊपर वाले पौकेट में रख दिया यह सोच कर कि हाथ धो कर लौटता हूं और फिर 17 नंबर पर जा कर रश्मि को दे आऊंगा. खाना खाने के बाद मैं हाथ धोने के लिए वाशबेसिन की ओर बढ़ गया. टौयलेट भी हो आया कि बस निश्चिंत हो कर सो जाऊंगा और यही हुआ. मैं लौट कर आते ही बर्थ पर पसर गया. एक चादर तानी और सो गया.

करीब साढ़े 5 बजे सुबह नींद खुली और मैं अपना सामान सहेजने लगा क्योंकि कुछ ही देर बाद लखनऊ स्टेशन आने वाला था जहां मुझे उतरना था. जब मैं ने चादर रखने के लिए बैग उठाया तो वह लिफाफा दिखा. ओह, मैं तो भूल ही गया. बड़ी शीघ्रता से मैं 17 नंबर बर्थ के पास पहुंचा तो उसे खाली पाया.

मैं ने सामने वाले यात्री से पूछा तो उस ने बताया कि वह तो पहले ही रायबरेली पर उतर गई थी. मुझे उस युवती ने कितने विश्वास से वह लिफाफा पकड़ाया था. मुझे अपने ऊपर ही क्रोध आने लगा. ध्यान से देखा तो यह एक खुला पत्र था. मैं ने निकाला तो पता चला कि यह नियुक्तिपत्र था और उसे आज ही जौइन करना था. रायबरेली के एक कालेज का नाम और अन्य विवरण भी अंकित थे. लिफाफे के ऊपर रश्मि शर्मा, पूरा पता और मोबाइल नंबर लिखा था.

ट्रेन लखनऊ आ पहुंची. स्टेशन से बाहर आया. अपने ऊपर ही झुंझलाहट हो रही थी. एकाएक लिफाफे पर लिखे फोन नंबर का ध्यान आया. तुरंत ही फोन किया, ‘‘हैलो. मैं अमित बोल रहा हूं. आप रश्मिजी हैं?’’ मैं उत्तर सुनने के लिए उतावला था.
‘‘हां, लेकिन आप कौन और आप को यह फोन नंबर कहां से मिला?’’ उस के स्वर में कुछ कड़वाहट थी.
‘‘देखिए, वह सब मैं आप को बता दूंगा. आप का नियुक्तिपत्र मेरे पास है.
मुझे बनारस रेलवे स्टेशन पर किसी ने दिया था. मैं 2 घंटे में रायबरेली पहुंच जाऊंगा. वैसे भी, कार्यालय तो 10 बजे ही खुलेगा. बाकी मिलने पर,’’ मैं ने बिना कुछ सुने फोन बंद किया और औटोरिकशा पकड़ अपने कमरे की ओर निकल पड़ा.

कमरे पर पहुंच कर दैनिक कार्यों से निवृत्त हुआ और रायबरेली के लिए निकल पड़ा. बस, मैं बैठा सोच रहा था कि मैं एक बड़ी उलझन और गहरे अपराधबोध से बच गया.
9 बजतेबजते मैं उस विद्यालय के कार्यालय के पास पहुंच गया. रश्मि को फोन किया.
‘‘मैं आ गया हूं, आप कहां हैं?’’
‘‘कार्यालय के सामने एक रैस्टोरैंट में चाय पी रही हूं. आप कहां हैं?’’
‘‘मैं तो कार्यालय के मुख्य द्वार के पास खड़ा हूं. ऐसा करता हूं कि मैं अपना दाहिना हाथ उठा लेता हूं, नीले रंग का कोट पहने हुआ हूं. आप पहचान लेंगी.’’
2 मिनट बाद ही पीछे से आवाज आई, ‘‘हाथ नीचे कर लीजिए, मैं रश्मि हूं.’’ इस बार उस के स्वर में कड़वाहट नहीं थी.
‘‘लीजिए रश्मिजी अपना पत्र. अब मैं निश्चिंत हूं. बड़ी उलझन में था.’’ और फिर मैं ने पूरी घटना रश्मि को बताई.

‘‘वे मेरी भाभी हैं. ट्रेन में बैठने के बाद मैं ने अपना फोन बंद कर दिया था कि सोना ही तो है. आप के फोन के आने के कुछ ही देर पहले औन किया. थोड़ी देर बाद ही भाभी का भी फोन आया. आप को कितनी कठिनाई हुई, मैं हृदय से आप की आभारी हूं.’’ इतना कह कर उस ने नमस्कार किया और कार्यालय की ओर मुड़ने लगी.

मुझे न जाने क्या सूझा कि बोल पड़ा, ‘‘आप जौइन कर आइए. मैं प्रतीक्षा कर लूंगा.’’
‘‘न जाने कितना समय लगे, आप वैसे भी यात्रा की भागदौड़ से थके हुए हैं,’’ उस ने टालना चाहा.
‘‘यदि इच्छुक नहीं हैं आप तो मैं भी विवश नहीं करूंगा. चलिए. यह भेंट इतनी ही सही. लेकिन क्या कभी फोन कर सकता हूं? विश्वास मानिए, कोई अभद्रता नहीं होगी.’’
मैं उस के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा. उस ने कहा तो कुछ नहीं. बस, हाथ जोड़े और आगे बढ़ गई. मैं समझ रहा था कि कोई भी युवती एक अपरिचित शहर में किसी अपरिचित व्यक्ति से मेलजोल भला क्यों बढ़ाना चाहेगी? पत्र वाली घटना तो संयोगवश घट गई. कोई भी संवेदनशील व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में संभवतया वही करता जो मैं ने किया. मैं इस बात को भूलने का प्रयास करते हुए वापस लखनऊ लौट पड़ा. लेकिन न जाने किस भावनावश उस का फोन नंबर मैं ने सुरक्षित कर लिया.

मैं लखनऊ में एक वृद्धाश्रम के संचालक के रूप में कार्यरत था. परिवार और समाज से पीडि़त वृद्धजनों के सहज और स्वस्थ जीवनयापन में सहायता करना हमारा उद्देश्य था. मेरे परिवार में एक बड़े भाई थे, इंजीनियर थे जो सपरिवार पुणे में बस गए थे. हमारा घर बनारस में ही था. भैया तो कभीकभी आते थे पर मैं महीने दो महीने में बनारस हो आता था. एक किराएदार रख छोड़ा था. लखनऊ में अकेला ही किराए पर रहता था.
कभीकभी रश्मि वाली घटना याद आ ही जाती थी. शायद अब मन को किसी साथी की तलाश थी. एक दिन न जाने किस भावनावश मैं ने रश्मि को फोन कर ही दिया.
‘‘हैलो, मैं अमित बोल रहा हूं. पहचाना आप ने? मैं ने उस की प्रतिक्रिया भांपने की कोशिश की.
‘‘जी हां. आप ने ही वह पत्र पहुंचाया था. मैं भी आप को फोन करने वाली थी. उस दिन मेरा व्यवहार बड़ा रूखा रहा. सोचती थी कि यदि कभी भेंट होती तो उस अशिष्टता के लिए आप से क्षमा मांग लेती,’’ उस के स्वर में संकोच था.
‘‘तो इस में क्या बड़ी बात है. कल रविवार है. आप का विद्यालय बंद ही रहेगा. आ जाता हूं रायबरेली. आप मुझ से क्षमा मांग लीजिएगा और मैं क्षमा कर भी दूंगा,’’ यह कहते हुए मैं हंस पड़ा.
कोई उत्तर न पा कर मैं ने पूछा, ‘‘तो मैं सुबह 10 बजे उसी रैस्टोरैंट में मिलता हूं. मना मत कीजिएगा.’’
‘‘जी ठीक है.’’ लग रहा था कि बड़े पसोपेश में उस ने स्वीकार किया. अगले दिन मैं उसी रैस्टोरैंट के सामने प्रतीक्षा करने लगा. थोड़ी देर में वह रिकशे से आई. मैं ने रिकशेवाले को पैसे दिए जो उसे अच्छा नहीं लगा.
‘‘रश्मिजी, यह शिष्टता है और कुछ नहीं.’’
वह कुछ न बोली. हम सब से पीछे वाली सीट पर जा बैठे.
‘‘अमितजी, मैं ने सारी बातें भाभी को भी बताईं तो उन्होंने भी मुझ से कहा कि तुम्हें ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था. अपने इस रूखे और अशोभनीय व्यवहार पर वास्तव में बहुत लज्जित हूं.’’ उस के शब्दों और चेहरे पर आ रहे भावों ने स्पष्ट कर दिया कि वह सच बोल रही है.
बातों ही बातों में पता चला कि उस के मातापिता नहीं रहे. बनारस में भाभी अपनी बेटी नमिता के साथ रहती हैं. वह वहीं पढ़ती है.
‘‘आप के बड़े भाई कहीं बाहर नौकरी करते हैं क्या?’ इस प्रश्न के पूछते ही रश्मि की आंखें भर आईं और रुंधे कंठ से उस ने कहा, ‘‘भाभी विधवा हैं. मुझ से मात्र 4 वर्ष बड़ी हैं. वैधव्य और एक बेटी के जीवन की जिम्मेदारी के साथ जी रही हैं. कुल हम ही 3 लोग हैं एकदूसरे के सुखदुख के साथी,’’ कहतेकहते रश्मि ने दुपट्टे से अपने आंसुओं को पोंछ लिया.
‘‘ओह, मुझे नहीं पूछना चाहिए था.’’
‘‘आप का क्या दोष? जीवन के घाव सब को नहीं दिखाए जाते पर यह प्रश्न ही ऐसा है कि इस का उत्तर मेरी आंखें देने लगती हैं और फिर आंसू कहां छिपते हैं?’’ वह असहज हो उठी थी.

मैं ने उसे धीरज बंधाने का प्रयास किया. उस ने खाया कुछ नहीं, बस चाय पी और फिर हम लोग रैस्टोरैंट से बाहर आ गए. मैं ने एक रिकशे वाले को बुलाया. वह बैठ गई तो मैं ने थोड़ा मुसकराते हुए कहा, ‘‘इस बार पैसे मैं नहीं दूंगा.’’ मैं ने स्थिति सहज करने के लिए ऐसा कहा. वह धीमे से मुसकराई, दोनों हाथ जोड़े और बोली, ‘‘आप का नंबर अब मेरे मोबाइल में सुरक्षित है, अमितजी.’’

वह चली गई और मैं उस के इस वाक्य के मधुर अर्थ निकालते हुए वापस लखनऊ आ गया. यह एक सुखद स्मृति थी.

समय बीतता रहा. हम मिलते रहे और अब हम एकदूसरे के लिए आप न हो कर तुम हो गए. मैं मान बैठा था कि हम एकदूसरे के हृदय में बस चुके हैं. एक दिन बातचीत के क्रम में मेरे मुंह से अकस्मात ही निकल गया, ‘‘भाभी कब से अकेली हैं?’’

रश्मि कुछ पलों तक तो चुप रही, फिर बोली, ‘‘भैया एकलौते बेटे थे. मातापिता का दुलार और प्यार पा कर वे न जाने कब ऐसे लोगों की संगत में आ गए जिन के जीवन में कोई बंधन और अंकुश नहीं था. भैया को सिगरेट पीने की बुरी आदत लग गई. बहुत समझाया गया लेकिन सब व्यर्थ. सोचा गया कि शादी हो जाए तो शायद पत्नी के कहने पर सुधर जाएं पर ऐसा न हुआ. इतना ही करते कि मम्मीपापा के सामने न पीते. अपने कमरे को बंद कर लेते और सिगरेट पीते. उस धुएं और घुटनभरे कमरे में ही भाभी रहने को विवश थीं.’’
‘‘यह तो आप के भैया की निष्ठुरता थी जो वे अपनी पत्नी की इच्छाओं व भावनाओं का भी सम्मान नहीं करते थे.’’
‘‘बस, अचानक ही एक दिन पता चला कि सिगरेट की इस आदत के कारण भैया ‘क्रौनिक औब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज’ के गंभीर रोगी बन चुके थे.’’
‘‘यह कौन सी बीमारी है?’’ मैं जानना चाहता था.
‘‘हमें तो यही बताया गया कि लंबे समय तक तंबाकू के धुएं से या फेफड़ों में जलन पैदा करने वाले पदार्थों के संपर्क में रहने से व्यक्ति के फेफड़े और वायुमार्ग क्षतिग्रस्त हो जाते हैं. इस बीमारी का प्रमुख कारण धूम्रपान ही है,’’ वह बोली.
‘‘तो भैया को परेशानी क्या होने लगी?’’
‘‘समझ अमित कि एक नहीं, कई परेशानियों को ले कर वे जी रहे थे. खूब खांसी आती थी, बलगम भी अधिक बनने लगा था, सांस लेने में कठिनाई, थकान और लगता था कि वजन भी धीरेधीरे कम होने लगा था. कहते थे भैया कि उन्हें घरघराहट जैसे लक्षणों के साथ छाती में जकड़न का भी अनुभव होता है.’’
‘‘तो डाक्टर ने उपचार क्या बताया?’’ मैं ने पूछा.
‘‘कुछ विशेष नहीं. इन्हेलर का प्रयोग करने को कहा. कुछ दवाएं भी दीं और समयसमय पर दिखाते रहने को कहा.’’
रश्मि की इन बातों को सुन कर बड़ा दुख हुआ. एक बुरी आदत ने पूरे परिवार से सुखशांति छीन ली थी. मैं ने पूछा, ‘‘क्या किसी और डाक्टर से परामर्श नहीं लिया?’’
‘‘किया था यह भी. बिना किसी को बताए एक दिन भैया की सारी रिपोर्ट और चल रहे उपचार का विवरण ले कर मैं ने एक और वरिष्ठ डाक्टर से भेंट की और उन्होंने जो कहा, वह सुन कर मैं सन्न रह गई.’’
‘‘क्या कहां उन्होंने?’’ मैं भी जानना चाहता था.
‘‘बोले कि लंबे समय तक सिगरेट पीने से फेफड़ों की स्थिति बिगड़ चुकी है. कई बार ऐसे लोग कुछ और रोगों से भी प्रभावित हो जाते हैं, जैसे हृदय रोग, फेफड़े का कैंसर, औस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों का कमजोर होना आदि. दवा तो ठीक ही चल रही है. कुछ विशेष करने को नहीं बचा है अब.’’ डाक्टर एक बुरा संकेत दे कर चुप हो गए.
‘‘3 वर्ष बीततेबीतते वे चल बसे. जिन घूटों को वे पीते रहे, एक दिन वही धुआं उन्हें पी गया और हमारे जीवन को धुएं से भर कर भैया छोड़ गए हम सब को.’’
इस दुखद, बोझिल और हताशाभरे माहौल में मैं भला क्या बोलता. सांत्वना के 2 शब्द कह कर उसे पीड़ामय अतीत की परिधि से वापस लाने का प्रयास करने लगा. कुछ देर और बैठे रहे हम लोग और फिर वह कमरे की ओर निकलने के लिए उठ खड़ी हुई.
‘‘चलती हूं, अमित. अपना दुख तुम से कह चुकने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो डांवांडोल हृदय को कोई आसरा मिल गया हो. तुम्हें भी लौटना ही है.’’
वह रिकशे पर बैठ गई और मैं बस स्टैंड की ओर बढ़ चला.

मैं ने अब निश्चित कर लिया कि अपने मन की बात उस से कह ही डालूंगा. फोन कर के उसे आगामी रविवार का दिन और समय भी बता दिया. शायद उसे भी आभास हो गया है कि मैं उस से क्या कहने वाला था.

रविवार को मैं समय से पहले ही पहुंच गया और प्रतीक्षा करने लगा. यह अवसर आनंद का अतिरेक था या हृदय की बात कह देने की अकुलाहट या फिर अपने जीवन के एक मधुर निर्णय को उस से बता डालने की व्यग्रता, मैं समझ नहीं पा रहा था.

एक अद्भुत मनोदशा में था कि रश्मि अभी तक आई क्यों नहीं. प्रतीक्षा के उन बोझिल क्षणों को व्यतीत करने के लिए मैं ने एक सिगरेट सुलगाई, कश लेते हुए चहलकदमी करने लगा. अब 11 बज रहे थे लेकिन रश्मि नहीं आई. फोन किया तो कट गया. दोतीन प्रयास किए पर उस ने फोन उठाया नहीं. मैं समझता था कि वह काट दे रही है. इसी बेचैनी में घंटेभर और टहलता रहा पर न वह आई और न ही उस ने फोन उठाया.

मुझे यह भी नहीं मालूम था कि वह रहती कहां है. थकहार कर वापस लखनऊ आ गया. बिना कुछ खाएपिए लेट गया. ऐसी परिस्थिति में मनुष्य अनहोनी ही सोचता है. सोचा, कल बात करूंगा. अशांत हृदय और आशंकाओं के झंझावात के झेलते हुए न जाने कब नींद आ गई.
अगले दिन सुबह ही फोन की घंटी बजी. रश्मि का फोन था.
‘हैलो रश्मि. क्या हुआ? कल आईं क्यों नहीं? फोन भी काट दे रही थी. तुम ठीक तो हो न? मेरा मन बहुत घबरा रहा है. कुछ बोलतीं क्यों नहीं? मैं तुम से मिलना चाहता हूं.’’ मैं अपनी ही धुन में बोलता ही जा रहा था कि उस की आवाज सुनाई दी.
‘‘लेकिन अब मैं तुम से कभी भी नहीं मिलना चाहूंगी. कुछ देर से पहुंची थी कि रिकशे पर से ही मैं ने तुम्हें सिगरेट के धुएं से छल्ले बनाबना कर उड़ाते देखा. तुम ने कभी अपनी इस बुरी आदत के बारे में मुझे नहीं बताया. जिस धुएं के कारण मेरा पूरा परिवार उजड़ गया, भाभी विधवा हो गईं, बेटी बिना बाप की हो गई. तुम भी उसी राह पर चल रहे थे. फोन केवल इसलिए किया कि तुम्हें यह सच्चाई बता कर इस संबंध को यहीं समाप्त करना था. मिलने या फोन करने का प्रयास न करना, कहीं अपमानित न होना पड़ जाए.’’
‘‘रश्मि मेरी बात सुनो. वह तो बस समय काटने के लिए मैं कभीकभी सिगरेट पीता हूं, हमेशा नहीं.’’ मैं अपनी बात कह भी न पाया था कि उस ने फोन बंद कर दिया.

मैं सिर पकड़ कर बैठ गया. क्या से क्या हो गया? सारे सपने, सारी आशाएं पलक झपकते ही समाप्त हो गईं. जीवन के सामने एकाकीपन का वही विराट दैत्य फिर आ खड़ा हुआ. कार्यालय गया पर काम में मन न लगा. अकारण ही घूमघूम कर समय काटता रहा. होटल से ही खाना खा कर कमरे में लौटा. आंखों में नींद न थी, हृदय में हाहाकार मचा था. बस, रश्मि की वह बात याद आई, ‘हम सभी के जीवन में धुआं भर कर भैया हम सब को छोड़ कर चले गए.’ शायद इसी कल्पना से भयभीत हो कर रश्मि मुझे छोड़ कर चली गई.

जो होना था, सो हो गया. समय के साथ घटनाएं और उन की यादें अतीत के अंधकूप में समाती गईं. इस शहर से मन बुरी तरह उचट गया. तय कर लिया, यहां नहीं रहूंगा. कई बातें कई बार सोचीं, फिर मन में एक क्षण विचार और निश्चय ले कर यह शहर छोड़ कर मैं बनारस आ गया.

अपने शहर में तो आ गया लेकिन अब यहां मेरा कोई अपना न था. मैं ने यहां एक देखभाल के नाम से संस्था खोली. मुझे अनुभव तो था ही, यहां कुछ दक्ष लोगों और एजेंसियों के साथ मिल कर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का कार्य प्रारंभ कर दिया. एक दिन फोन की घंटी बजी.
‘‘हैलो, क्या आप देखभाल संस्था से बोल रहे हैं?’’
‘‘जी, मैं अमित बोल रहा हूं,’’ मैं ने उत्तर दिया.
‘‘मुझे एक महिला सहायिका की आवश्यकता है जो मेरी देखरेख कर सके और सप्ताह में 2 दिन मुझे डायलिसिस के लिए अस्पताल ले कर जा सके. मुझे अपनी फीस और औपचारिकताएं पहले बता दीजिए.’’ यह एक दुर्बल आवाज थी लेकिन मुझे न जाने क्यों कुछ जानीपहचानी सी लगी.
‘‘मैं सब से पहले आप के घर आऊंगा. आप की आवश्यकताएं जानूंगा, कितने घंटे के लिए आप को सहायिका चाहिए और इस बात की भी पुष्टि करूंगा कि जो महिला सहायिका आप के यहां जाएंगी, वे वहां कितनी सुरक्षित होंगी. इसी प्रकार हम आप को उक्त महिला से जुड़ी सारी सूचनाएं देंगे और उन के बारे में पुलिस द्वारा सत्यापित तथ्यों का एक प्रमाणपत्र भी देंगे. फीस तब तय होगी जब हम आप की पूरी आवश्यकताएं जान जाएंगे और इन सब बातों के लिए अधिकृत व्यक्ति और आप की ओर से कोई जिम्मेदार व्यक्ति हस्ताक्षर करेंगे,’’ मैं ने संक्षिप्त सा विवरण उन को बता दिया.

‘‘ठीक है. आप कल सुबह 10 बजे तक आ जाइए. मैं अपना पता और फोन नंबर नोट करा देती हूं. आइएगा जरूर क्योंकि कल मुझे अस्पताल भी जाना है.’’ उस महिला की वाणी में इतनी करुणा और पीड़ा थी कि सहज ही मेरा मन द्रवित हो उठा.

अपनी संस्था की परिचारिका निर्मला को ले कर अगले दिन मैं उक्त पते पर पहुंचा. एक दुर्बल सी और क्षीणकाय महिला ने द्वार खोला. मैं उसे देखते ही चौंक गया और मेरे मुंह से निकला, ‘अरे रश्मि, तुम, इस हालत में?’’
‘‘अरे अमित, तुम?’’ ऐसी ही आश्चर्य से भरी प्रतिक्रिया उस की भी थी. हम लोग अंदर आ गए. 30 वर्ष की उस समय की युवा रश्मि आज मेरे सामने एक अधेड़ और बीमार महिला के रूप में बैठी थी. मैं ने अपनी संस्था की परिचारिका से कहा, ‘‘तुम दूसरे कमरे में बैठ जाओ. मैं बुला लूंगा.’’
‘‘अरे, इस में क्या बात है. ये तब तक चाय बना लें, फिर आगे की सोचते हैं,’’ यह कहते हुए रश्मि निर्मला को ले कर किचन में चली गई.
हम दोनों एकदूसरे के सामने मौन बैठे थे. चुप्पी रश्मि ने तोड़ी.
‘‘मैं अपनी दशा और दुर्दशा तुम्हें बताऊं, उस के पहले मैं उस दिन की घटना का उल्लेख करना चाहूंगी जिस दिन तुम ने मुझ से कुछ कहने के लिए बुलाया था. मुझे पूरी आशा और विश्वास था कि तुम उस दिन हम दोनों के आगामी जीवन से जुड़ा कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय ले कर आए थे.’’
‘‘छोड़ो उन बातों को,’’ मैं ने उस का ध्यान भटकाना चाहा.
‘‘नहीं अमित. मैं जब तक कह न लूंगी तब तक अपने को अपराधबोध से मुक्तनहीं कर पाऊंगी. उस दिन रिकशे पर बैठेबैठे जब मैं ने तुम्हें सिगरेट पीते देखा तो मेरे हृदय को गहरा आघात लगा और मैं बिना मिले ही चली आई. और तो और, दूसरे दिन मैं ने तुम से फोन पर बहुत ही असभ्य और अपमानजनक ढंग से बात की,’’ कहतेकहते रश्मि का गला रुंध गया.
‘‘भूल जाओ उन बातों को रश्मि,’’ मैं उसे अतीत से आज में लाना चाहता था.
‘‘मैं तो तुम्हें भी बड़े व्यथित मन से भूल जाना चाहती थी पर ऐसा हुआ नहीं. मुझे लगा कि मुझे तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी. यह मेरी अक्षम्य भूल थी,’’ रश्मि ने कहा.
‘‘रश्मि, जीवनभर हम अपने कर्मों की व्याख्या ही तो करते हैं. उचितअनुचित, पापपुण्य, उपकारअपकार और न जाने क्याक्या. इस प्रकार से हम अपने कर्मों का लेखाजोखा करने लगे तो सारा जीवन प्रायश्चित्त, पश्चात्ताप और प्रतिशोध में ही चला जाएगा. मैं तुम्हारा अतीत नहीं, आज जानना चाहता हूं.’’
‘‘तुम ठीक ही कह रहे हो लेकिन हम सभी का आज किसी न किसी रूप में हमारे अतीत से जुड़ा होता है,’’ रश्मि ने कहा.
‘‘लेकिन तुम इस दशा में कैसे पहुंचीं और तुम ने रायबरेली क्यों छोड़ दिया?’’

‘‘अमित, हमारे विद्यालय में सभी विद्यार्थियों व शिक्षकशिक्षिकाओं और अन्य स्टाफ का वर्ष में एक बार स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता था. मेरी जांच हुई तो मेरा रक्तचाप काफी बढ़ा हुआ आया. डाक्टर ने चिंता जताई और यह कहा कि वे रक्त की कुछ रूटीन जांचें और एक्सरे भी करा लें.’’
‘‘क्या परिणाम रहा जांच का?’’ मैं ने पूछा.
‘‘जब डाक्टर ने रिपोर्ट्स देखीं तो पूछने लगे, ‘क्या आप को सिरदर्द रहता है? क्या आप की सांस फूलती है? पैरों में कभी आप ने सूजन का अनुभव किया? मूत्र त्याग करते समय कोई कठिनाई होती है क्या? और उन्होंने बहुत सारे प्रश्न पूछे और कहा कि आप एक अल्ट्रासाउंड जांच करा लीजिए.’’
‘‘अल्ट्रासाउंड में क्या आया?’’ मैं व्यग्र था जानने के लिए.
‘‘मेरी एक किडनी निष्क्रिय थी, न जाने कब से और दूसरी सिकुड़ती जा रही थी. इतना ही नहीं, अमित, डाक्टर ने यह भी कह दिया कि आने वाले चारपांच वर्षों में आप को डायलिसिस की आवश्यकता होगी और आप अभी से गुरदा प्रत्यारोपण के बारे में सोचना शुरू कर दीजिए. कुछ दवाएं लिख देता हूं जो बचाव कर सकती हैं कुछ वर्षों तक. डाक्टर के इस अप्रत्याशित कथन को सुन कर मैं कांप गई.
‘‘और कोई उपाय है डाक्टर साहब?’’ मैं ने सशंकित मन से पूछा था.
‘‘दुर्भाग्य से अभी तक इन 2 विकल्पों के सिवा कुछ नहीं. आप को डायटीशियन के पास भेज रहा हूं जो आप को आहार संबंधी परामर्श और परहेजों के बारे में बताएंगी.’’ डाक्टर साहब ने अपनी जिम्मेदारी पूरी की.
‘‘डायटीशियन ने क्या कहा?’’ मैं ने पूछा.
‘‘डाक्टर की बातों को सुन कर तो मैं टूट ही चुकी थी और डायटीशियन से मिलने के बाद तो जीवन की बचीखुची आशाओं पर भी वज्रपात हो गया.’’
‘‘उन्होंने ऐसा क्या बता दिया?’’
रश्मि ने अपने पास पड़ी एक फाइल में से एक आहारतालिका निकाल कर दी, ‘‘पढ़ लो, खुद ही समझ जाओगे.’’

मैं ने पढ़ना शुरू किया तो मैं कांप सा गया. दिनभर में 3 ग्राम नमक, सारे फल करीबकरीब मना थे, सूखे मेवे नहीं खाना था. गिनीचुनी सब्जियां, बहुत सारे खाद्य पदार्थों को या तो मना कर दिया गया था या मात्रा सीमित कर दी गई थी. हर 3 महीने पर रक्त की जांच खासकर के क्रिएटिन, पोटैशियम, सोडियम और अन्य चीजों की स्थिति देखने के लिए करानी ही करानी थी. इतने कठोर परहेज और प्रतिबंधों के साथ जीवन जीना किसी यातना से कम न था.
मैं ने तालिका रश्मि को लौटाते हुए पूछा, ‘‘फिर आगे क्या हुआ?’’
‘‘वही जो डाक्टर ने कहा था. 4 वर्ष बीततेबीतते डायलिसिस पर आ गई. नौकरी छोड़नी पड़ी. कुछ फंड के रुपए मिले. ले कर वापस यहां बनारस आ गई. जब मैं नौकरी में थी तो भाभी को भी कुछ पैसे भेजती थी. उन की बेटी नमिता की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी निभाई. इन विपत्तियों के बीच एक संतोषजनक बात यह हुई कि नमिता की नौकरी लग गई.

‘‘जब नमिता नौकरी के लिए हैदराबाद जाने लगी तो भाभी को भी साथ जाना पड़ा और मैं यहां टुकड़ोंटुकड़ों में मरने के लिए जी रही हूं. महीनों बाद तुम्हारी आवाज सुन रही हूं, अमित. वरना इस घर में मैं अपनी आवाज के सिवा दूसरे की आवाज सुनने को तरसती थी.’’ यह सब कहतेकहते रश्मि फूटफूट कर रो पड़ी.

एकाएक उसे खयाल आया कि 2 बजने वाले हैं और डायलिसिस के लिए अस्पताल पहुंचना था. उस के लाख मना करने के बावजूद मैं रश्मि के साथ निकल गया और निर्मला से कहा कि वह रात 8 बजे तक आ जाएगी. रश्मि के घर पर ही रुक जाएगी. रास्ते में मैं ने रश्मि के गले में घाव के सूखे निशान देखे. पूछा, तो कहने लगी, ‘‘पहले यहीं गले से 6 महीने तक डायलिसिस होती रही. इसे ‘जुगलर’ कहते हैं. जब इस में संक्रमण हो गया तो बाईं बांह में सूई डालने के लिए स्थान बनाया गया जिसे फिस्टुला कहते हैं.’’

करीब 5 घंटे बाद शाम को 7 बजे उस की डायलिसिस पूरी कराने के बाद उसे ले कर घर लौटा. रास्ते में कोई बातचीत नहीं हुई. मेरे पास पूछने को बहुतकुछ था पर उस के पास बताने को शायद कुछ शेष नहीं बचा था. घर पहुंच कर निर्मला की प्रतीक्षा की. उस के आने के बाद रश्मि को उस के भरोसे छोड़ कर मैं अपने कमरे में लौट आया. खापी कर जब मैं बिस्तर पर लेटा तो आंखों के सामने रश्मि से पहली भेंट, उस से जुड़ाव, दुखद अलगाव और इन पीड़ामयी परिस्थितियों में पुनर्मिलन. सबकुछ एक चलचित्र की भांति गुजर गया.
अगले दिन सुबह ही रश्मि का फोन आया.
‘‘निर्मला आ गई हैं, मैं ने अपनी आवश्यकताएं समझ दी हैं. बहुत भली महिला हैं. तुम आते समय अपना रजिस्ट्रेशन फौर्म अवश्य लेते आना. तुम्हें भुगतान भी तो करना है.’’
‘‘आऊंगा तो इन सब बातों पर चर्चा करूंगा,’’ मैं ने यह बात यहीं खत्म की.
शाम को रश्मि के घर पहुंचा तो रश्मि लेटी हुई थी. मेरे पहुंचने पर निर्मला चाय ले कर आई. मैं ने रश्मि से पूछा, ‘‘तुम चाय क्यों नहीं पी रही हो?’’
‘‘क्या बताऊं, अमित. इस रोग ने मेरे जीवन को 2 भागों में बांट दिया है. एक डायलिसिस के पहले वाला जिस के बारे में तुम्हें सबकुछ बता ही दिया है और दूसरा डायलिसिस के साथ वाला जीवन. इस में कुछ अलग प्रकार की हिदायते हैं लेकिन सब से अधिक तकलीफदेह बात यह है कि 2 डायलिसिस के बीच में मुझे तरल पदार्थ बहुत कम मात्रा में लेना है. करीब डेढ़दो लिटर. चाहे इतनी मात्रा में पानी पीना हो, दवा के साथ पानी लेना हो. चाय पीनी हो या किसी भी रूप में. मैं तो यही हिसाब लगाती रहती हूं कि कितना तरल पदार्थ शरीर में गया. इतनी कठिन जीवनशैली से कभीकभी मन इतना घबरा उठता है कि…’’
‘‘सचमुच बड़ा कठिन जीवन हो गया तुम्हारा,’’ मैं भी दुखी हुआ.
‘‘इतना ही नहीं, अमित. डायलिसिस के दौरान की विपत्तियां तो हिम्मत ही तोड़ देती हैं. कभी सिरदर्द, कभी असहनीय पेटदर्द, कभी बढ़ा हुआ रक्तचाप तो कभी पैरों में भयानक ऐंठन.’’
मैं ने विषय बदलते हुए पूछा, ‘‘तुम ने भाभी को बता दिया होगा कि यहां देखरेख के लिए व्यवस्था हो गई है?’’
‘‘हां. मैं ने तुम्हारे बारे में सारी बातें बताईं तो कहने लगीं, ‘रश्मि, तुम्हारी ओर से मैं निश्चिंत हो गई.’’
‘‘इतना गहरा विश्वास मुझ पर?’’
‘‘हां अमित. मैं ही तुम पर विश्वास न कर पाई. कभीकभी सोचती हूं, यदि हमारा विवाह हो गया होता और उस के बाद मेरी यह बीमारी सामने आती तो क्या होता? तुम सोचते कि मैं ने यह बात जानबूझ कर छिपाई.
‘‘अतीत को छोड़ो, रश्मि. कुछ घटनाएं कब कैसे घटित हो जातीं या किन परिस्थितियों में हम कोई निर्णय ले बैठते हैं, इस का अनुमान लगाना संभव नहीं.’’
‘‘ठीक है, अमित. अच्छा बताओ कि निर्मलाजी को कितना देना है और अभी 4 घंटे सुबह, 4 घंटे शाम के लिए ही बुलाना चाहूंगी क्योंकि भुगतान के बारे में भी तो मुझे सोचना है.’’
‘‘तुम भुगतान के बारे में न सोचो. भावनाओं का सम्मान किया जाता है. भावनाओं के इस व्यवसाय में भुगतान के नियम कुछ अलग ही हैं,’’ यह कहते हुए मैं लौटने के लिए उठ खड़ा हुआ.
अगली तिथि पर डायलिसिस कराने के बाद जब मैं रश्मि को उस के घर छोड़ने गया तो रास्ते में मैं ने पूछा, ‘‘तुम ने गुरदा प्रत्यारोपण के बारे में क्या सोचा, रश्मि?’’
‘‘इस में सोचने को बचा ही क्या है? प्रथम प्राथमिकता मांपिता, भाईबहन या रिश्ते वाले हैं जो गुर्दादाता हो सकते हैं. मेरे मांपिता या भाईबहन हैं ही नहीं. पतिपत्नी भी एकदूसरे को दान कर सकते हैं लेकिन मैं तो इस बिंदु पर भी शून्य हूं.’’ इतना कहते हुए रश्मि का गला भर आया.

उसे छोड़ कर अपने घर पर आ कर रश्मि के बारे में सोचने लगा. जब तक जीना है डायलिसिस और पीड़ा के साथ जीना है क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है. मेरे मन में एक विचार आया कि यदि मैं उस से विवाह कर लूं तो उस की प्राणरक्षा… दूसरे दिन जैसे ही मैं ने यह बात रश्मि को बताई, वह अवाक रह गई.

‘‘यह कैसे हो सकता है, मैं क्या कहूं ऐसी स्थिति में? किस मुंह से यह बात स्वीकार कर लें. मैं ने तो तुम्हें अस्वीकार कर दिया था जब तुम पूरी पवित्रता और समर्पण की भावना से मुझे अपनाना चाहते थे और तुम मुझे आज तक अपनाना चाहते हो जब इस समस्या का मेरे पास कोई समाधान नहीं, कोई सहारा नहीं. यदि मैं स्वीकार भी कर लूं तो यह सिवा स्वार्थ के और क्या हो सकता है? यह संभव नहीं है, अमित,’’ कहतेकहते वह रो पड़ी.

यह कहना कठिन था कि ये आंसू विवशता के थे, पश्चात्ताप के थे या प्रायश्चित्त के थे. मैं ने समझना चाहा, ‘‘तुम भावुकता में बह रही हो, रश्मि. तुम ने मुझे इसलिए अस्वीकार कर दिया था क्योंकि तुम ने मुझे सिगरेट पीते हुए देख लिया था और तुम्हारे भाई की मृत्यु का कारण भी सिगरेट ही थी. तुम्हें भी अपने भविष्य में धुआं दिखने लगा और तुम मुझ से बिना मिले, बिना मेरी सुने एक निर्मम निर्णय ले कर उस समय लौट गईं. तुम ने मुझे अपनी बात कहने का अवसर नहीं दिया और आज फिर तुम आवेश में मुझे और मेरे निर्मल प्रस्ताव को अस्वीकार कर रही हो,’’ मैं ने अपने मन की सारी बात कह ही डाली.

‘‘मैं तुम्हें स्वीकार भी लूं तो मैं तुम्हें क्या दे पाऊंगी भला? मेरे पास इस दुर्बल देह के सिवा क्या शेष है? एक पत्नी से अपेक्षाएं, जो किसी को भी होती हैं, भला मैं कैसे पूरी कर पाऊंगी. नहीं, अमित. नहीं. मैं अपने डूबते जीवन के साथसाथ तुम्हारे जीवन को नहीं डूबने दूंगी.’’

‘‘अब क्या तुम्हारा जीवन और क्या मेरा जीवन? क्या तुम अकेले यों टुकड़ोंटुकड़ों में जी पाओगी? तुम्हें इस दारुण दुख में देख कर क्या मैं जी पाऊंगा? आज से 13 वर्ष पूर्व मुझे तुम्हारे देह की लालसा हो सकती थी लेकिन आज मुझे तुम्हारे उसी देह की कुशलता चाहिए. सोच लो. भाभी से बात कर लो. भले ही तुम्हारा उत्तर ‘हां’ न हो पर मैं जब तक और जितना तुम्हारा साथ दे पाऊंगा, देता रहूंगा. जब भी मेरी जरूरत हो, अधिकारपूर्वक बुलाना. अब चल रहा हूं.’’ मैं वापस अपने घर पर आ गया.

अगली बार जब मैं उसे डायलिसिस के लिए ले गया तो प्रतीक्षा की घडि़यों को मैं ने व्यर्थ नहीं जाने दिया. मैं रश्मि के डाक्टर से मिलने चला गया.
‘‘डाक्टर साहब, रश्मि आप की पेशेंट है. उसी के साथ आया हूं.’’
‘‘जी, मुझे जानकारी है. रश्मि का सप्ताह में 2 बार ‘होमोडायलिसिस चल रहा है लेकिन यह स्थिति पीड़ादायक भी है और महंगी भी. मैं ने तो उन से कहा है कि शीघ्र से शीघ्र गुरदा प्रत्यारोपण के बारे में निर्णय लें.’’ डाक्टर ने कहा.
‘‘उसी सिलसिले में आप से बात करने आया हूं. मैं उस के लिए गुरदा दान करने को तैयार हूं,’’ मैं ने अपना मंतव्य बताया.

‘‘बहुत अच्छी बात है और इस से भी अच्छी बात है कि आप लोगों ने समय से निर्णय ले लिया है. आप कौन हैं रश्मि के?’’ डाक्टर के इस प्रश्न ने मुझे सोच में डाल दिया. मैं ने सोचा, सारी बातें सचसच बता ही देता हूं. मैं ने कहा, ‘‘मैं रश्मि का कुछ लगता नहीं हूं.’’ इतना ही कहा था मैं ने.
‘‘यानी, आप रश्मि के भाई या पति नहीं हैं?’’ डाक्टर कुछ हैरान हुए.
‘‘मैं उस का हृदय से दोस्त हूं. यदि गुरदा दान करने के लिए रक्त के रिश्ते की प्राथमिकता और आवश्यकता है तो मैं उस से विवाह कर लूंगा और एक पति के रूप में खुद को प्रस्तुत करूंगा.’’
डाक्टर मेरे इस प्रस्ताव को सुन कर सोच में पड़ गए.
‘‘आप का निर्णय मानवीय और भावनात्मक दृष्टिकोण से तो अत्यंत ही स्वागतयोग्य है लेकिन इस में कुछ व्यावहारिक, चिकित्सकीय और वैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा. आप के इस प्रस्ताव को मैं ‘गुरदा प्रत्यारोपण समित’ के समक्ष प्रस्तुत करूंगा. वे ही आप के इस निवेदन को स्वीकृति देंगे तब हम आप की और रश्मि की चिकित्सकीय जांचों के लिए आगे बढ़ेंगे,’’ डाक्टर ने कहा.
‘ऐसी लंबी प्रक्रिया क्यों और इस में इतनी बाधाएं क्यों हैं? क्या एक पति अपनी पत्नी को गुरदा दान नहीं कर सकता जब उस की जान पर बन आई हो?’’ मैं कुछ आवेश में आ गया.

‘‘अमितजी, मैं समझ सकता हूं कि आप के निर्णय में कहीं कोई नहीं है. लेकिन आज की दुनिया में गुरदा प्रत्यारोपण को कई लोगों ने एक बिजनैस बना लिया है. इसीलिए सघन जांच के बाद ही निर्णय लिया जाता है जिस में ‘सोटो’ यानी स्टेट औरगन एंड टिश्यू ट्रासंप्लांट और्गेनाइजेशन के दिशानिर्देशों का कड़ाई से अनुपालन किया जाता है,’’ डाक्टर ने मुझे मेरी बातों का जवाब दे कर समझाया.
‘‘तो आप मेरे लिए क्या सलाह देना चाहेंगे?’’ मैं ने पूछा.
‘‘आप हताश मत होइए. पहले रश्मि और उन के जो भी उपलब्ध अभिभावक हों, उन से मिल कर अपने विचार और निर्णय को साझा कीजिए. यदि विवाह में कोई बाधा न हो तो पहले यह शुभकार्य कीजिए. अपने विवाह को रजिस्टर्ड भी कराइए. इस के बाद आप लोग मु?ा से मिलिए, जो भी संभव सहायता होगी, मैं करूंगा. डाक्टर के रूप में मैं भी यही चाहूंगा कि किसी की प्राणरक्षा की जा सके,’’ डाक्टर साहब ने संतुलित उत्तर दिया.
डायलिसिस पूरी हुई तो मैं रश्मि को ले कर उस के घर आया. वह मेरे चेहरे को देख कर भांप गई कि मैं किसी उलझन में हूं, पूछ बैठी, ‘‘क्या बात है, बहुत चिंतित दिखाई दे रहे हो?’’

मैं ने रश्मि को सारी बातें बता दीं. सुनने के बाद उस ने कहा, ‘‘मैं तो कह ही रही हूं जैसे मैं जी रही हूं वैसे ही मुझे जीने दो. भावुकता और मोह में आ कर तुम अपना भी जीवन नष्ट कर लोगे. मैं ने भी ढेरों जानकारियां जुटाई हैं,’’ वह बोली.
‘‘तुम्हारे पास कौन सी जानकारी है?’’ मैं ने पूछा.
‘‘कहते हैं कि डायलिसिस के साथ का जीवन बहुत सफलतापूर्वक बीता तो शायद अधिकतम 10 वर्ष तक और गुरदा प्रत्यारोपण बेहद सफल रहा तो अनेक परहेजों, नियंत्रित जीवन और लंबे समय तक चलने वाली दवाओं के साथ भी जीवन की अवधि पंद्रहबीस वर्षों तक भी चल गई तो समझ बहुत जी लिया पर यह एक सामान्य जीवन नहीं होगा,’’ रश्मि के इन शब्दों में पीड़ा और विवशता झलक रही थी.

रश्मि की बातें सच थीं या नहीं, मैं इस अंतर्द्वद्व में पड़ना ही नहीं चाहता था. मैं ने निश्चय कर लिया था कि उस से विवाह कर के खुशियों का एक छोटा सा अंग उसे जरूर दूंगा. मेरे इस हठपूर्ण निर्णय के आगे रश्मि की एक न चली. उस ने अपनी भाभी और भतीजी को कुल चार दिनों के लिए बुला लिया और हम बिना किसी दिखावे के एकदूसरे के हो गए.

रश्मि की भाभी ने उस से कहा, ‘‘अब तुम्हारे 2 घर हो गए. लेकिन आज तुम्हें अपनी ससुराल अवश्य जाना चाहिए. एक नवदंपती के नवजीवन का प्रारंभ तभी आनंददायक होगा. जब केवल वे तीनों ही साथ हों.’’

रश्मि मेरे घर आई. कुछ देर बेहद खामोशी से हम दोनों एकदूसरे को देखते हुए बैठे रहे. एकाएक रश्मि उठी और दौड़ कर मेरे सीने से लग कर रोने लगी. यह उस के अनुराग की पवित्रतम प्रस्तुति थी. मैं ने भी भावविभोर हो कर अपने हृदय में उसे भींच लिया. न मेरे पास कुछ खोने को था, न उस के पास कुछ खोने को था. हां, हम दोनों के पास यों मिल कर पाने को शायद बहुतकुछ था.

बस, कुछ ही दिनों बाद हम दोनों अब पतिपत्नी के रूप में डाक्टर से मिले. उन्होंने भी हमें सराहना और सांत्वना के शब्दों से प्रोत्साहित किया. मैं जो आवेदनपत्र अपने साथ लाया था, उसे मैं ने डाक्टर साहब को सौंप दिया. अस्पताल के कुछ प्रपत्र उन्होंने भी दिए जो मुझे भर कर देने थे.

उन्होंने एक बार फिर सारी बातें दोहराईं, प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं की जानकारी दी. उन्होंने हमें गुरदा प्रत्यारोपण के बारे पक्षों को समझाते हुए यह भी कहा, ‘‘मैं आप लोगों की भावनाओं के साथ हूं. चिकित्सा विज्ञान रोज ही नएनए चमत्कार कर रहा है. अनेक देशों में इस समस्या के समाधान के लिए शोध किए जा रहे हैं और आशा है कि आने वाले वर्षों में चिकित्सा विज्ञान ऐसे रोगियों के लिए ‘आर्टिफिशियल वियरेबल किडनी’ यानी कृत्रिम किडनी भी तैयार कर लेगा. तब तक डायलिसिस कराते रहिए और आशावान रहिए,’’ डाक्टर साहब के इन शब्दों ने मानो हमारे अंदर आशा की एक नई ऊर्जा भर दी.

मैं ने रश्मि का हाथ पकड़ा. एक सुखद भावना और एकदूसरे के प्रति प्रेम के आवेग व समर्पण की निश्छल संवेदना लिए हम उस पथ पर बढ़ चले जिस पर प्रकाश ही प्रकाश था. आहत अतीत और अनदेखे आगामी भय का धुआं छंटने लगा था. Hindi Love Stories

Romantic Story In Hindi : स्वीकार – प्रेमियों के अनकहे शब्द

Romantic Story In Hindi : अभिमन्यु और अनूमेहा एकदूसरे के करीब खड़े थे. कहना बहुतकुछ चाहते थे लेकिन जबान से शब्द ठहरठहर कर निकल रहे थे. यही तो था प्यार.

शाम का धुंधलका धीरेधीरे सैमिनार हौल के बाहर फैल रहा था. 3 दिनों का यह साहित्य और संस्कृति सैमिनार अपनी समापन बेला पर था. हौल में तालियों की गूंज थम चुकी थी. लोग अब अपनेअपने बैग समेट कर विदाई की तैयारी में थे. अभिमन्यु अपनी नोटबुक को बैग में रखते हुए अजीब सी बेचैनी महसूस कर रहा था. उस का मन बारबार अनूमेहा की ओर खिंच रहा था, जो हौल के दूसरे कोने में कुछ सहभागियों से हंसते हुए बातें कर रही थी.

3 दिनों पहले जब वह पहली बार अनूमेहा से मिला था तो उसे नहीं पता था कि यह मुलाकात उस के दिल में इतनी गहरी छाप छोड़ेगी. अनूमेहा की मुसकान, उस की बुद्धिमत्ता और सब से बढ़ कर उस की वो नजरें जो हर बार अभिमन्यु से कुछ कहना चाहती थीं- ये सब अब उस के मन में एक मधुर संगीत की तरह गूंज रहा था. लेकिन आज, विदाई की इस बेला में, एक सवाल उस के मन को मथ रहा था : क्या यह सब यहीं खत्म हो जाएगा?

‘अभिमन्यु,’ अनूमेहा की आवाज ने उसे विचारों के भंवर से बाहर खींचा.
वह मुसकराते हुए उस की ओर बढ़ी अपने दुपट्टे को कंधे पर ठीक करते हुए बोली, ‘‘किस सोच में डूबे हो? सैमिनार खत्म हो गया, अब तो खुश होना चाहिए.’’
अभिमन्यु हलके से मुसकराया, लेकिन उस की आंखों में एक गंभीरता थी, बोला, ‘‘खुशी तो है, लेकिन थोड़ा सा खालीपन भी है.’’
अनूमेहा ने उस की बात को ध्यान से सुना, फिर धीरे से बोली, ‘‘खालीपन? क्यों? कुछ छूट रहा है क्या?’’
उस के इस सवाल ने अभिमन्यु के दिल की धड़कन तेज कर दी. वह चाहता था कि कह दे हां, तुम छूट रही हो. लेकिन शब्द उस के गले में अटक गए. उस ने बस इतना कहा, ‘‘शायद, कुछ खास पल.’’
अनूमेहा ने एक पल के लिए उस की आंखों में देखा, जैसे वह उस के मन की बात पढ़ लेना चाहती हो. फिर, हलका सा हंसती हुई बोली, ‘‘तो उन पलों को और खास क्यों न बनाया जाए? चलो, बाहर बगीचे में थोड़ी देर टहलते हैं.’’
सैमिनार हौल के पीछे एक छोटा सा बगीचा था, जहां गुलमोहर के पेड़ों की छांव में हलकी ठंडी हवा बह रही थी. दोनों चुपचाप चल रहे थे, लेकिन उन की चुप्पी में एक अजीब सा संवाद था.
आखिरकार, अनूमेहा ने चुप्पी तोड़ी. ‘‘अभिमन्यु, तुम्हें याद है, पहले दिन जब हमारी बहस हुई थी काव्य और गद्य पर?’’ वह हंसती हुई बोली, ‘‘मुझे लगा था, तुम कितने जिद्दी हो.’’
अभिमन्यु हंस पड़ा, ‘‘और मुझे लगा था, तुम कितनी समझदार हो और थोड़ी सी नटखट भी.’’
अनूमेहा ने उस की ओर देखा, उस की आंखों में एक शरारत थी. ‘‘नटखट? अच्छा, तो अब तुम मुझे जज करने लगे?’’
‘‘नहीं, जज नहीं,’’ अभिमन्यु ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘बस, तुम्हें समझने की कोशिश कर रहा हूं.’’
अनूमेहा रुक गई. उस ने अभिमन्यु की ओर देखा, इस बार उस की मुसकान में एक गहराई थी, ‘‘और, कितना समझ पाए?’’

अभिमन्यु का दिल जोर से धड़का. यह वही पल था जिस का वह इंतजार कर रहा था. वह रुक गया, हिम्मत जुटा कर बोला, ‘‘यह समझ पाया कि तुम वो किताब हो जिसे मैं बारबार पढ़ना चाहता हूं, लेकिन डरता हूं कि कहीं उस का आखिरी पन्ना न आ जाए.’’

अनूमेहा की आंखें चमक उठीं. उस ने हलके से सिर झुकाया जैसे वह अभिमन्यु की बात को अपने दिल में उतार रही हो. फिर, धीरे से बोली, ‘‘और अगर मैं कहूं कि यह किताब अभी पूरी नहीं लिखी गई है?’’

अभिमन्यु ने एक कदम उस की ओर बढ़ाया. उस की आवाज में गर्मजोशी थी. ‘‘तो मैं कहूंगा, क्या मैं इसे लिखने में तुम्हारा साथ दे सकता हूं?’’

बगीचे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया. हवा में गुलमोहर के फूल हलके से लहराए. अनूमेहा ने अभिमन्यु की आंखों में देखा और उस की मुसकान ने सारी बात कह दी. ‘‘शायद, हम कोशिश कर सकते हैं.’’

रात के सितारे अब आसमान में चमक रहे थे. विदाई की बेला तो थी लेकिन अभिमन्यु और अनूमेहा के बीच एक नई शुरुआत हो चुकी थी. हौल के बाहर जब अनूमेहा अपनी गाड़ी की ओर बढ़ी, उस ने पलट कर अभिमन्यु को देखा और कहा, ‘‘कल कौफी? तुम्हारा पसंदीदा कैफे, 4 बजे.’’ अभिमन्यु ने मुसकराते हुए सिर हिलाया, ‘पक्का.’

जैसे ही अनूमेहा की गाड़ी दूर हुई, अभिमन्यु ने आसमान की ओर देखा. उस का दिल एक सवाल के जवाब से भरा था तो एक नई कहानी की शुरुआत से धड़क भी रहा था.

लेखक : संजय सिंह चौहान

Social Story In Hindi : आंसू छलक आए – क्या अरुण समझ पाए प्रेमशंकर की बातें?

Social Story In Hindi : ‘‘देखो विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें अपने पिता से रजामंदी लेनी पड़ेगी…’’ प्रेमशंकर ने समझाते हुए कहा, ‘‘शादी में उन की रजामंदी होना बहुत जरूरी है.’’

‘‘मगर अंकल, वे इस की इजाजत नहीं देंगे,’’ विनोद ने इनकार करते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं देंगे इजाजत?’’ प्रेमशंकर ने सवाल पूछा, ‘‘क्या तुम उन्हें समझाओगे नहीं?’’

‘‘मैं अपने पिता की आदतों को अच्छी तरह से जानता हूं. वे कभी नहीं समझेंगे और हमारी इस शादी के लिए इजाजत भी नहीं देंगे…’’ एक बार फिर इनकार करते हुए विनोद बोला, ‘‘आप उन्हें समझा दें, तो अच्छा रहेगा.’’

‘‘मेरे समझाने से क्या वे मान जाएंगे?’’ प्रेमशंकर ने पूछा.

‘‘हां अंकल, वे मान जाएंगे,’’ यह कह कर विनोद ने गेंद उन के पाले में फेंक दी.

विनोद प्रेमशंकर के मकान में किराएदार था. उसे अभी बैंक में लगे 2 साल हुए थे. इन 2 सालों में विनोद ने किराए के मामले में उन्हें कभी दिक्कत नहीं पहुंचाई थी. एक तरह से उन के घरेलू संबंध हो गए थे.

विनोद के बैंक में ही कल्पना काम करती थी. उसे भी बैंक में लगे तकरीबन 2 साल हुए थे. उम्र में वे दोनों बराबर के थे. दोनों कुंआरे थे. दोनोें में कब प्यार पनपा, पता ही नहीं चला.

वे एकदूसरे के कमरे में घंटों बैठे रहते थे. दोनों ही तकरीबन 2 हजार किलोमीटर दूर से इस शहर में नौकरी करने आए थे.

कभीकभी कल्पना की मां जरूर उस के पास रहने आ जाती थीं. तब कल्पना मां से कोई बहाना कर के विनोद के कमरे में आती थी. प्रेमशंकर यह सब जानते थे.

जब कल्पना घंटों विनोद के कमरे में बैठी रहती, तब प्रेमशंकर को लगा कि उन दोनों में प्यार की खिचड़ी पक रही है.

एक दिन मौका देख कर उन्होंने विनोद से खुल कर बात की. नतीजा यही निकला कि विनोद के पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे, क्योंकि वह ऊंची जाति का था, जबकि कल्पना निचली जाति की थी.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘ठीक है विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो तुम्हें अपने मातापिता को भरोसे में लेना होगा.’’

मगर विनोद इनकार करते हुए बोला, ‘‘अंकल, वे इस शादी के लिए कभी इजाजत नहीं देंगे.’’

तब प्रेमशंकर ने कहा था, ‘‘आखिर वे भी तो इनसान हैं, कोई जानवर नहीं. तुम उन्हें बुलाओ. अगर वे नहीं आएंगे, तो मैं चलूंगा तुम्हारे साथ उन को समझाने…’’

इस तरह प्रेमशंकर बिचौलिया बनने को राजी हो गए.

विनोद के बुलाने पर पिता अरुण आ गए. साथ में उन की पत्नी मनोरमा भी थीं. प्रेमशंकर ने उन्हें अपने घर में इज्जत से बिठाया.

अरुण बोले, ‘‘बताइए प्रेमशंकर साहब, हमें किसलिए बुलाया है?’’

‘‘अरुण साहब, आप को खास वजह से ही यहां बुलाया है.’’

‘‘खास वजह… मैं समझा नहीं…’’ अरुण बोले, ‘‘जो कुछ कहना है, साफसाफ कहें.’’

‘‘ठीक है, पर इस के लिए आप को दिल थोड़ा मजबूत करना होगा.’’

‘‘मजबूत से मतलब?’’ अरुण ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मतलब यह कि आप ने विनोद की शादी के बारे में क्या सोचा है?’’

‘‘उस के लिए मैं ने एक लड़की देख ली है प्रेमशंकरजी. अब विनोद की हां चाहिए और उस की हां के लिए मैं यहां आया हूं,’’ यह कह कर अरुण ने प्रेमशंकर को अजीब सी निगाह से देखा.

‘‘अगर मैं कहूं कि विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है, तो…’’

‘‘क्या कहा, विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है?’’

‘‘जी हां अरुण साहब, अब आप का क्या विचार है?’’

‘‘कौन है वह लड़की?’’ अरुण ने पूछा.

‘‘उस के साथ बैंक में ही काम करती है. उस का नाम कल्पना है. आप इस पर क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘मतलब, विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है?’’

‘‘हां,’’ इतना कह कर प्रेमशंकर ने अरुण के दिल में हलचल पैदा कर दी.

‘‘वह किस जाति की है? क्या समाज है उस का?’’ अरुण जरा गुस्से से बोले.

‘‘वह निचली जाति की है,’’ प्रेमशंकर ने बिना किसी लागलपेट के कहा.

‘‘क्या कहा, वह एक दलित घर से है? मैं यह शादी कभी नहीं होने दूंगा…’’ अरुण ने गुस्से में साफ मना कर दिया, फिर आगे बोले, ‘‘अरे प्रेमशंकरजी, शादीब्याह अपनी ही बिरादरी में होते हैं.’’

‘‘हांहां, होते हैं अरुणजी, मगर आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं, वह जमाना गुजर गया. यह 21वीं सदी है.’’

‘‘हां, मैं भी जानता हूं. मुझे समझाने की कोशिश न करें.’’

‘‘जब आप इतना जानते हैं, तब इस शादी के लिए मना क्यों कर रहे हैं?’’

‘‘मैं अपने बेटे की गैरबिरादरी में शादी करा कर बिरादरी पर दाग नहीं लगाना चाहता. मैं यह शादी हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

प्रेमशंकर मुसकराते हुए बोले, ‘‘तो आप विनोद की शादी अपनी ही बिरादरी में करना चाहते हैं?’’

‘‘हां, क्या आप को शक है?’’

‘‘आप विनोद से तो पूछ लीजिए.’’

‘‘पूछना क्या है? वह मेरा बेटा है. मेरा कहना वह टाल नहीं सकता.’’

‘‘अपने बेटे पर इतना भरोसा है, तो पूछ लीजिए उस से कि वह आप की पसंद की लड़की से शादी करेगा या अपनी पसंद की लड़की से,’’ कह कर प्रेमशंकर ने भीतर की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘विनोद, यहां आ जाओ.’’

भीतर बैठे विनोद और कल्पना इसी इंतजार में थे. वे दोनों बाहर आ गए. अरुण कल्पना को देखते रह गए.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘पूछ लो अपने बेटे से… यह वह कल्पना है, जिस से यह शादी करना चाहता है.’’

‘‘क्यों विनोद, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’’ विनोद के पापा अरुण बोले.

‘‘जो कुछ सुन रहे हैं, सच सुन रहे हैं पापा,’’ विनोद ने कहा.

‘‘तुम इस कल्पना से शादी नहीं कर सकते,’’ अरुण ने कहा.

‘‘पापा, मैं शादी करूंगा, तो इस से ही,’’ विनोद बोला.

‘‘मैं तुम्हारी शादी इस लड़की से हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

‘‘मैं शादी करूंगा, तो सिर्फ कल्पना से ही.’’

‘‘ऐसा क्या है, जो तुम इस की रट लगाए हुए हो?’’

‘‘कल्पना मेरा प्यार है.’’

‘‘प्यार… 2-4 मुलाकातों को तुम प्यार समझ बैठे हो?’’ चिल्ला कर अरुण बोले, ‘‘कान खोल कर सुन लो विनोद, तुम्हारी शादी वहीं होगी, जहां हम चाहेंगे.’’

‘‘पापा सच कर रहे हैं विनोद…’’ मां मनोरमा बीच में ही बात काटते हुए बोलीं, ‘‘यह लड़की हमारी जातबिरादरी की भी नहीं है. इस से शादी कर के हम समाज में अपनी नाक नहीं कटा सकते हैं, इसलिए इस के साथ शादी करने का इरादा छोड़ दे.’’

‘‘मां, मेरे इरादों को कोई बदल नहीं सकता है. शादी करूंगा तो कल्पना से ही, किसी दूसरी लड़की से नहीं.’’

अपना फैसला सुना कर विनोद कल्पना को ले कर घर से बाहर चला गया.

पलभर के सन्नाटे के बाद प्रेमशंकर बोले, ‘‘अब क्या सोचा है अरुण साहब? अब भी आप इस शादी से इनकार करते हैं?’’

‘‘यह सब आप लोगों की रची हुई साजिश है. आप ने ही मेरे बेटे को बरगलाया है, इसलिए आप उस का ही पक्ष ले रहे हैं,’’ कह कर अरुण ने अपनी बात पूरी की.

‘‘अरुण साहब सोचो, विनोद कोई दूध पीता बच्चा नहीं है…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘आप उसे डराधमका कर अपने वश में कर लेंगे, यह भी मुमकिन नहीं है. वह नौकरी करता है, अपने पैरों पर खड़ा है. वह अपना भलाबुरा समझता है.

‘‘वह मेरे यहां किराएदार बन कर जरूर रह रहा है, मगर मैं उस को पूरी तरह समझ चुका हूं कि वह समझदार है. वैसे, वह आप की भावनाओं को भी समझता है. मगर वह शादी करेगा, तो कल्पना से ही. इस के पहले मैं भी यह सब बातें उसे समझा चुका हूं, इसलिए आप उसे समझदार समझें.’’

‘‘क्या खाक समझदार है भाई साहब…’’ मनोरमा झल्ला कर बोलीं, ‘‘वह उस लड़की को अपने साथ ले गया है. कहीं वह गलत कदम न उठा ले. सुनो जी, उस की शादी वहीं करो, जहां हम चाहते हैं.’’

‘‘भाभीजी, विनोद ऐसावैसा लड़का नहीं है, जो गलत कदम उठा ले…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘अरुण साहब, अगर आप उस पर दबाव डाल कर शादी कर भी देंगे, तब वह बहू के साथ वैसा बरताव नहीं करेगा, जो आप चाहेंगे. दिनरात उन में कलह मचेगी और आपस में मनमुटाव होगा.

‘‘अगर आप उन की मरजी से शादी नहीं करोगे, तब वे कोर्ट में ही शादी कर सकते हैं, क्योंकि कोर्ट उन्हीं का पक्ष लेगा. इसलिए आप सोचिए मत. मेरा कहना मानिए, इन की शादी आप आगे रह कर करें और पिता की जिम्मेदारी से छुटकारा पा जाएं.’’

‘‘मगर इस शादी से समाज में हमारी कितनी किरकिरी होगी, यह आप ने सोचा है?’’ एक बार फिर अरुण अपनी बात रखते हुए बोले.

‘‘समाज तो दोनों हाथों में लड्डू रखता है. थोड़े दिनों तक समाज ताना दे कर चुप हो जाएगा. इस बात पर जितना विचार कर के गहराई में उतरेंगे, उतनी ही तकलीफ उठाएंगे.

‘‘आप अपनी हठ छोड़ दें. इस के बावजूद भी आप अपनी जिद पर अड़े हो, तो विनोद की शादी अपनी देखी लड़की से कर दो. मैं इस मामले में आप से कुछ नहीं बोलूंगा,’’ प्रेमशंकर के ये शब्द सुन कर अरुण के सारे गरम तेवर ठंडे पड़ गए.

वे थोड़ी देर बाद बोले, ‘‘ठीक है प्रेमशंकरजी, मैं अपनी हठ छोड़ता हूं. विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है, तो इस के लिए मैं तैयार हूं.’’

‘‘ओह, शुक्रिया अरुण साहब,’’ कह कर प्रेमशंकर की आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए. Social Story In Hindi

Family Story : कामवाली, वाइफ और हसबैंड – श्रीमती को खुश करने के चक्कर में…

Family Story : हालांकि घर के लगभग सारे काम मेरे विवाह के अगले हफ्ते बाद से मेरे करकमलों द्वारा संपन्न होने शुरू हो गए थे. विवाह के बाद तब मैं ने श्रीमती को प्रसन्न करने के लिए ये काम इसलिए शुरू किए थे, ताकि उसे पता चल जाए कि मैं भी घर के काम करने का हुनर रखता हूं. पर, मुझे क्या पता था कि तब मेरे ये काम उस का मन रखने के लिए किए गए थे, वे एक दिन मेरे ही काम बन जाएंगे.

आज मेरी दशा या दिशा यह है कि मैं घर के सारे काम कर के ही औफिस जाता हूं और औफिस से समय से आधा घंटा पहले निकल कर सीधा घर पहुंचते ही घर के कामों में लीन हो जाता हूं.
मुझे औफिस जाने में देर हो जाए तो हो जाए, मेरे महीनों के औफिस के काम पेंडिंग पड़े रहें तो पड़े रहें, पर मेरी श्रीमती को घर के किसी काम की पेंडेंसी कतई पसंद नहीं. उस की नेचर है कि घर का जो काम जिस समय होना चाहिए उसी समय हो.

विवाह से पूर्व सुखी वैवाहिक जीवन के आंखें खोले सपने लेते कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी मेरे ये हाथ घर के काम करने में इतने दक्ष हो जाएंगे कि सोएसोए भी घर के कामों में व्यस्त रहा करेंगे.

विवाह से पूर्व यह भी सपने में नहीं सोचा था कि मेरे हाथ अपने ही हाथों की बनी चाय मुझे पिला, अपने ही हाथों की गरमागरम चपातियां मुझे खिला मयूर हो नाचा करेंगे.

सच कहूं तो अब अपने हाथों के जायके से मुझे इतना प्यार हो गया है कि दूसरों की बीवियों के हाथों की आधी रोटी खा कर मेरा पेट भारी हो जाता है. पेट में ऐसी अपच हो जाती है कि कई दिनों तक पेट साफ करने की दवाई खानी पड़ती है.

असल में विवाह के बाद मैं घर में काम करने वाली नहीं रखना चाहता था. सच्ची को जो श्रीमती को मुझ पर शक हो गया तो…? शादी से पहले मर्दों पर कोई शक करे तो करता रहे, पर विवाह के बाद सफल वैवाहिक जीवन के लिए किसी भी मर्द को अपने चरित्र पर शक की कतई सूई नहीं घूमने देनी चाहिए.

पर, जल्दी ही श्रीमती के कोमल मन को जब अड़ोसपड़ोस के घरों में काम करने वाली आतीजाती दिखती तो उस में हीनता जन्म लेने लगी. आदर्श पति होने के नाते मैं नहीं चाहता था कि मेरी श्रीमती के मन में और तो सब जन्म लें तो लें, पर हीनता कतई जन्म ले. सो, उस की हीनता का इलाज करने के लिए मैं ने कामवाली रख ली.

विवाह के बाद आदर्श से आदर्श पति की बीमारी का इलाज तो कहीं भी, किसी भी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में संभव नहीं, पर श्रीमती हर हाल में स्वस्थ रहनी चाहिए. आज भी उसे स्वस्थ रखने के लिए मैं धंवंतरि तक के पास जा सकता हूं. श्रीमती स्वस्थ तो बीमार पति भी फुली मस्त.
हर ब्राइटी के पति सफल पति होने के लिए बहुतकुछ बेकार का भी दिल पर पत्थर रख लेते हैं, सो मैं ने भी सफल दिवंगत पतियों के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए श्रीमती का मन रखने के लिए कामवाली रख ली. चंद ही दिनों में वह कामवाली श्रीमती को तो मुझ से भी प्रिय हो ही गई, पर मेरा कचराअधकचरा दिल भी कहीं न कहीं उस में बसने लगा. श्रीमती उस के आने से पहले ही उस के आने के इंतजार में पलकें बिछाए रहती तो मैं भी उस के आने से पहले ही उस के लिए चाय बना कर तैयार रखता. बेचारी पिछले घर की मालकिन के पास उस की पड़ोसन की गुप्त बातें बता कर आएगी तो पता नहीं कितनी थकी होगी? बहुत से घरों की मालकिनें इन दिनों घर में काम करने वालियों को घर के काम करने के लिए कम अपनी पड़ोसनों की खुफिया जानकारियों के लिए अधिक रखती हैं. घरों में काम करने वालियां पड़ोसनों की खबरें जितनी विश्वसनीयता से अपनी हर मालकिन को कमर मटकामटका कर सुनाती हैं, उतने विश्वसनीय खुफिया एजेंट भी नहीं होते. हो सकता है, मेरी श्रीमती इसलिए भी उस का बेसब्री से इंतजार करती हो. इस मामले में मैं डेड श्योर तो नहीं, पर बहुतकुछ श्योर जरूर हूं. और तब जिस दिन कामवाली न आती, तो श्रीमती का पारा बाहर माइनस 20 तापमान होने के बाद भी सातवें आसमान पर होता.

सच कहूं तो कामवाली घर के कामों में कहने को ही मेरा हाथ बंटाती है. उसे अभी मेरी तो नहीं, पर मेरी श्रीमती की कमजोरी का पता चल गया है. वैसे भी जितने समय पर वह आती है, उतने में तो मैं घर के लगभग नब्बे प्रतिशत काम तो कर चुका होता हूं. पर मुझे उस का आना फिर भी अच्छा नहीं, बहुत अच्छा लगता है. चलो, इस बहाने टीवी पर पसरे बाबा के आगे आठ पहर चौबीस घंटे उलटेसीधे योग की मुद्राएं करती श्रीमती के सूजे थोबड़े के सिवाय कोई दूसरी सूरत तो दिख जाती है, वरना देखते रहो औफिस जाते और औफिस से आते एक ही स्लिम फिट होता थुलथुला थोबड़ा. Family Story 

Social Story : आचार्य – क्या थी गुरू जी की सच्चाई

Social Story : शहरभर में दुख पसर गया था. तमाम धार्मिक सस्थाओं के प्रमुख, मंदिरों के पंडितपुजारी और पुरोहित, एनजीओज़ के प्रमुख, तमाम सरकारी महकमों के अफसर, लोगलुगाईं, श्रद्धालुगण और आचार्यजी के आश्रम से जुड़े अनुयायियों आदि का आश्रम में तांता लगा हुआ था…अंतिम दर्शन हेतु.

बड़े हौल में झक्क सफेद चादरें बिछाई गई थीं और किनारों पर कुरसियां लगाई गई थीं. वीआईपी लोगों के लिए सोफों की व्यवस्था की गई थी.

सारे इंतजामात करतेकरते मेरा थक कर बुरा हाल हो गया था और एक ही बात हज़ार बार हज़ार लोगों को बतातेबताते मुझे लगा कहीं मैं पागल न हो जाऊं. उधर मीडिया वाले मेरे मुंह में अपने हैंडमाइक घुसेड़े डाल रहे थे और बड़े अजीबोगरीब सवाल पूछे जा रहे थे.

‘डैथ के पहले क्या बोले? डैथ कैसे हुई? किसी तरह की कोई साजिश तो नहीं? डैथ के पहले किस ने क्या खिलायापिलाया? सोतेसोते कैसे चले गए कहीं ज़हरखुरानी तो नहीं हुई?’ एक तरफ आचार्यजी के अंतिम संस्कार की व्यवस्था तो दूसरी ओर इन के ये सवाल, मेरा सिर चकराने लगा था.

वे पूछते भी किस से? अब आश्रम का चार्ज मेरे पास आ गया था और मेरी पदवी गुरुजी से प्रोन्नत हो कर आचार्य की हो गई थी. रामराम करते चिता सजाई गई और आचार्यजी का सुपुत्र, जो कंप्यूटर इंजीनियर था, ने मुखाग्नि दी और आचार्यजी का पार्थिव शरीर अंनत में विलीन हो गया.

शोकसभा आयोजित करनी थी और लाखों सवाल खड़े हो गए मेरे सामने. आश्रम में बिछायत कितनी बड़ी लगेगी, कितने लोगों की व्यवस्था करनी है, वीआईपी सोफे कितने लगेंगे, फ्लौवर रीथ कितने लाने हैं, पंखुड़ियां कितने किलो, वक्ता कितने, कौन पहले और कौन बाद में, कितना समय प्रतिवक्ता देना है, डीएम-कमिश्नर-डीआईजी-एसएसपी-सीडीओ सब एकसाथ तो बैठते ही नहीं, भक्त कितने आएंगे और अंधभक्त कितने? किसे ज़रूर बोलना है और किसे किसी भी हालत में माइक नहीं देना है…

आश्रम का पूरा चार्ज अब मेरे पास था. चार्ज, मतलब, पैसे से ही होता है, बाकी के कामों के लिए दोचार गुरुजी टाइप लड़के रखे थे मासिक तनख्वाह पर. उन्हें महादेव, मारुति, गुरुदेव, मातारानी और शनिदेव का पूजन आता था, श्लोक व स्त्रोत्र भी आते थे उतने कि भक्त पूजन से प्रसन्न हो जाएं. ईश्वर तो बड़े दयालु हैं भक्तों के पूजन मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं.

इन्हीं गुरुजनों को मैं ने सारे कार्य बांट दिए व कौन सी चीज किस के यहां से आएगी, सुस्पष्ट कर दिया था. अब शहर के इतने बड़े आश्रम के आचार्य का निधन हुआ था, उन,की शोकसभा में आने वाली चीजों का भी कोई पैसे लेगा क्या, मुला बाज़ार के रेट की रसीदें वे मुझे ज़रूर देंगे. मुझे भगतान में दिखानी भी तो हैं, भूखे भजन न होइ गोपाला.

रसीद देंगे काहे नाही, कल से इन का पल्ला तो मुझ से ही पड़ना है.

कुछ भी कहिए, आचार्यजी ने मुझे आश्रम चलाने की बारीकियां और गुरों की शिक्षा ख़ूब अच्छे से प्रदान की थीं. आज वे मेरे साथ होते तो यही सब करते पर वे तो बैकुंठवासी हो कर मुझे देख रहे होंगे कि सारे इंतजामात मैं कायदे से कर रहा हूं अथवा नहीं. पैसे की फुजूलखर्ची वे भी बिना परची के उन्हें निहायत नापसंद थी. पैसा भले ही खर्च न हो पर खर्चे की परची बनना बहुत ज़रूरी होता है ताकि परची को दिन के वाउचर के साथ लगा कर आश्रम के खर्चे में दर्ज किया जा सके.

मैं ने सैकंड डिवीजन से बीकौम पास किया था जो मेरे बहुत काम आया. आश्रम चलाने के लिए सीए की नहीं, बीए की ज़रूरत होती है. आचार्यजी मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मुझे बताते थे… सही ही कहते थे. खरचे के 5 रजिस्टर थे, जिन्हें गुरुजी पांच पांडव कहते थे. पहला बिजलीपानी खर्चा, दूसरा पूजन सामग्री खर्चा, तीसरा बिछायत गद्दातकियाकुरसीमेज इत्यादि खर्चा, चौथा भंडारा मद का खर्चा और 5वां था मिसलेनियस यानी फुटकर खर्चा रजिस्टर.

मिसलेनियस मतलब जो खर्चा किसी मद में फिट न हो उसे इस रजिस्टर में दर्ज कर दिया जाता, मसलन कागज़, पेन, कौपी, फोटोकौपी, रिपेयरिंग, चायपानी, पैट्रोल, टैक्सी आदि का खर्चा. बिना परची के किसी ख़रचे का पेमैंट न होता था. आश्रम की रोज की कैशबुक भी लिखी जाती थी. आचार्यजी ने ही सिखाया था कि वक़्त पलटते देर नहीं लगती, इसलिए आश्रम का हिसाबकिताब, कच्चा ही सही पर, लिखा हुआ होना चाहिए.

इसी तरह आश्रम में पैसे की आवक भी लिखी जाती थी जिस में पहला रजिस्टर था दानपात्र का, दूसरा था दान का जो भक्तगण चैक अथवा नकद दे जाते थे. नकद का रजिस्टर नहीं बल्कि एक डायरी थी पर चैक द्वारा दान का पक्का रजिस्टर था जो कोई भी देख सकता था. डायरी की लिखापढ़ी आचार्य स्वयं अपने करकमलों द्वारा करते थे.

वे ऐसा क्यों करते थे, जानने के लिए मुझे कुछ वर्षों तक रुकना था. और मैं रुका.

समस्त कर्मकांड विधिविधान से संपन्न हुए और मुझे ज़रा फुरसत मिली. आचार्यजी के फूलों से सजे वृहत भित्तिचित्र को मैं ने मनोपूर्वक नमन किया और आंखों के सामने पिछले अनेक वर्ष रील की तरह चल निकले…जब मैं गुरुजी मतलब इन्हीं आचार्यजी से मिला तो आश्रम एक जाग्रत मंदिर मात्र था. गुरुजी ने मुझे बिन पगार के साथ लगा लिया व मेरी बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो कर मुझे अपने प्रिय शिष्यों के फोल्ड में ले लिया.आचार्यजी की तीव्र व तीक्ष बुद्धि के साए में मुझ मूर्ख बालक को सालों तक उन की सेवा करने का अवसर मिला. कभी चपरासी बना तो कभी माली, कभी हरकारा तो कभी बाबूगीरी करते हुए मेरा सफर उन के खातों का लेखाजोखा रखने तक आ गया.

तब जा कर मुझे समझ आया कि गुरुजी तो लखपति थे पर दुनिया के लिए थे दालरोटी, गमछा वाले मामूली एक मंदिर के पुजारी मात्र.

धीरेधीरे उन की हैसियत और खुद की औकात मुझे अच्छी तरह समझ आने लगी. गुरुजी पुरोहित नहीं पुजारी अवश्य थे. मैं मुंह बंद रखता औऱ सारा ध्यान गुरुजी के आदेशों का पालन करने व खातों को चाकचौबंद रखने में लगाता. यही मेरा गुण गुरुजी को बेहद पसंद था.

गुरुजी का परिवार भी था पर वह मंदिर व उस की देखरेख और लेनदेन से दूर रहता. सफाचट पंडितजी ने लंबी दाढ़ीमूंछें बढ़ा लीं और देखादेखी मैं ने भी. कुरता, लुंगी, गमछा ड्रैसकोड हो गया और अब वे कहलाने लगे आचार्य और मैं गुरुजी.

आचार्यजी के पास डरपोक लोगों का आनाजाना बढ़ गया और वे समस्या देख कोई न कोई उपाय बताने लगे थे- ये जाप करो वो पाठ करो, इस की नित्य पूजा उस की रोज़ आराधना, ये सुबहसवेरे यह संध्याकाल में…

डीआईजी से ले कर दारोगा और कमिश्नर से ले कर एसडीएम तक सारे अधिकारियों से आचार्यजी की पहचान हो गई थी. उसी के साथ समाज के विभिन्न अंगों के लोग भी आचार्यजी के यहां चढ़ावा ले कर आने लगे.

व्यवसाई, सराफा, बिसाती, बरतन व्यापारी, आढ़ती से ले कर लोहे और टाइल्स से ले कर टायर और कृषि यंत्रों, खादबीज व्यापारी से ले कर मैडिकल दवादारू और फल विक्रेता संघ से ले कर कृषि मंडी के पदाधिकारी, व्यापारियों के शिष्टमंडल मंदिर, जिस का नया नामकरण आश्रम हो चला था, में भक्तिभाव से पधारने लगे.

आश्रम में 2 खाते रखे जाते थे. पहला चैक वाला, दूसरा नकद वाला. चैक वाले खाते को संभालने लगा एक और विश्वासु जिसे संस्थान प्रबंधक की पदवी मिली और नकद रोकड़ा का प्रबंधन मैं यानी गुरु ही संभालता.

अब मेरा काम हलका हो चला था था. दिनभर का कैश कलैक्शन देने वाले खाते जोड़ कुल रकम आचार्यजी को रात को दे देना, बस.

आचार्यजी जमा करने वालों की लिस्ट पर नज़र फेरते हुए कहीं लाल, कहीं हरी सियाही के निशान लगाते और नोटों की गड्डियां जेब में रख कर मुसकरा देते. मूड में होते तो एकाध गड्डी मेरी ओर भी उछाल देते और ज़ोर से जयकारा लगाते. मैं भी गड्डी के रंग और मोटाई के हिसाब से प्रतिउत्तर देता.

नकद जमा वाली डायरी को आचार्यजी ने मुझ से एक दिन ले ही ली.

मुझे समझते देर न लगी कि मेरा विभाग कमाई का था और प्रबंधक का विभाग खर्चे वाला था जहां सारे पेमैंट चैक से होते. बिजली, पानी, पंडाल, खानापीना, फूलमाला, सजावट, पूजा के बरतन, सामग्री भंडारों का खर्चा आदि का भुगतान चैकों से ही होता था.

नकद दानदक्षिणा मिलती थी बेहद नपीतुली, इसलिए कागज़ों पर आश्रम सदा या तो घाटे में चलता या नो प्रौफिट नो लौस पर यानी लेनादेना बराबर.

आचार्यजी का नारा भी था- ‘तेरे पाप मेरा तर्पण, तेरा तुझ को अर्पण और सबकुछ है तेरा, क्या लागे मेरा.’ आचार्यजी की तिजोरी की चाबी कभी मेरे पास होती थी पर कुछ सालों से उन्हीं के जनेऊ में जा बंधी. मैं निश्चिंत हो गया था, क्या लागे मेरा.

एकाध साल से भक्तिनों की संख्या में इजाफा होता जा रहा था और उन का लेखाजोखा भी आचार्य स्वयं देखते थे. शहर, कसबों, गांवों की मांबहनों के भगिनी व महिला मंडल आश्रम से जुड़ते जा रहे थे. उन की सचिवों, अध्यक्षों का आनाजाना भी आचार्यजी के पास बढ़ता जा रहा था जिन से चर्चा एकांत में ही होती.

इन समितियों द्वारा चलाए जा रहे महिला सहायता समूहों स्त्री आधार व सशक्तीकरण केंद्रों हेतु आचार्यजी की धनकृपा चैकों के माध्यम से बांटी जा रही थी. इन महिला समूहों ने आचार्यजी की ख्याति गांवों, कसबों के घरघर में पहुंचा दी.

इसी के साथ शहर का ज्ञानीध्यानी, उपासक, पुरोहित समाज भी आचार्य का आशीर्वाद लिए रहता. सभी सरकारी भवनों, इमारतों, पुलिया और पुलों के निर्माण के भूमिपूजन

हेतु डीएम के कारकुन आचार्यजी से ही संपर्क साधते और आचार्यजी अपने भक्त पुरोहितों में से किसी एक कि ड्यूटी लगवा कर प्राप्त दक्षिणा का हिसाब मेरे माध्यम से कर लेते.

विभिन्न धार्मिक आयोजनों में प्राप्त ब्राह्मणदक्षिणा के डिस्पोजल हेतु एक ‘इच्छा पूरन पूजा सामग्री केंद्र’ आश्रम के बाहर खोल दिया गया जिस में नारियल, चावल, गेहूं, अनाज, अंगवस्त्र, धोती, सिंदूर, फलफूल आदि भक्तजनों के क्रय हेतु सुलभता से उपलब्ध होने लगा. आचार्यजी के दूर के एक बेरोजगार रिश्तेदार को उस केंद्र पर मासिक तनख्वाह पर तिलक, गोपी, चंदन आदि लगवा कर बैठा दिया गया जो ज़ाहिर था मुझे रिपोर्ट करता था.

लगभग हर सप्ताह आश्रम में कोई न कोई बड़ा धार्मिक आयोजन हो ही जाता जिस का खर्चा आचार्यजी भक्त या आयोजनकर्ता से दानस्वरूप नकद एडवांस में ले लेते.

आश्रम बहुत बड़ा ग्राहक होने से बिजली की झालर, सजावट व प्लास्टिक के फूल, बेलपत्ती वाले लोग आचार्यजी को डिस्काउंट देते. हर बड़े आयोजन में दोतीन लाख रुपया खरचा हो ही जाता था और यदि भंडारा हो, तो राशि पांच लाख के ऊपर चली जाती.

बहुत ही कम लोगों को मालूम था कि आचार्यजी ने लेनदेन का पांसा पलट दिया था.

आश्रम ने सैकड़ों मीटर लंबी बिजली की झालरें, प्लास्टिक के फूलों की लड़ियां, गुलदस्ते, फूलपत्तियों की बेलें आदि थोक के भाव से खरीद ली थीं और अब शहर के सजावट करने वाले व्यापारी यह सब माल आश्रम से ही दिहाड़ी पर किराए पर ले जाते थे वह भी नकद.

आश्रम का दानपात्र रोज खुलता जिस में बमुश्किल हज़ारपांच सौ की राशि निकलती जिसे पूरी ईमानदारी से संस्थापक विभाग खाते में दर्ज कर लेता.

सही माने में यही तो उस आश्रम की आमदनी थी.‘सारा संसार पाखंडियों और कंजूसों से भरा है. लोगबाग ईश्वर के नाम पर आश्रम को दोचार सिक्के या पांचदस के नोट दे कर हाथ जोड़ लेते हैं. हे ईश्वर, इन पापियों को सदबुद्धि दे.’

आचार्यजी का यह रोज रात का वाक्य सुन कर मेरे कान पक जाते और होंठ मुसकरा देते. दुनिया में असंख्य पापी हैं, तभी तो हम जैसे गिनेचुने लोग उन की पापमुक्ति के लिए आश्रम में दिनरात श्रम कर रहे हैं.

लोगबाग ज़ोरशोर से मुझे आश्रम का नया आचार्य बनाने हेतु घेराबंदी कर रहे हैं क्योंकि जिस के पास तिजोरी की चाबी, वही करे असली रखवाली.

आज मैं बड़ी शान से आचार्यजी द्वारा निर्मित बड़े से सोफे, जिसे हम लोग तख्तेताउस बोलते थे, पर अपनी तशरीफ़ रखता हूं. और अपने पास डायरी अवश्य रखता हूं, आचार्यजी वाली डायरी. Social Story

Family Story In Hindi : मेरी सास – जब बहू का सास से पाला पड़ा तो क्या हुआ

Family Story In Hindi : कहानियों व उपन्यासों का मुझे बहुत शौक था. सो, कुछ उन का असर था, कुछ गलीमहल्ले में सुनी चर्चाओं का. मैं ने अपने दिमाग में सास की एक तसवीर खींच रखी थी. अपने घर में अपनी मां की सास के दर्शन तो हुए नहीं थे क्योंकि मेरे इस दुनिया में आने से पहले ही वे गुजर चुकी थीं.

सास की जो खयाली प्रतिमा मैं ने गढ़ी थी वह कुछ इस प्रकार की थी. बूढ़ी या अधेड़, दुबली या मोटी, रोबदार. जिसे सिर्फ लड़ना, डांटना, ताने सुनाना व गलतियां ढूंढ़ना ही आता हो और जो अपनी सास के बुरे व्यवहार का बदला अपनी बहू से बुरा व्यवहार कर के लेने को कमर कसे बैठी हो. सास के इस हुलिए से, जो मेरे दिमाग की ही उपज थी, मैं इतनी आतंकित रहती कि अकसर सोचती कि अगर मेरी सास ही न हो तो बेहतर है. न होगा बांस न बजेगी बांसुरी.

बड़ी दीदी का तो क्या कहना, उन की ससुराल में सिर्फ ससुरजी थे, सास नहीं थीं. मैं ने सोचा, उन की तो जिंदगी बन गई. देखें, हम बाकी दोनों बहनों को कैसे घर मिलते हैं. लेकिन सब से ज्यादा चकित तो मैं तब हुई जब दीदी कुछ ही सालों में सास की कमी बुरी तरह महसूस करने लगीं. वे अकसर कहतीं, ‘‘सास का लाड़प्यार ससुर कैसे कर सकते हैं? घर में सुखदुख सभीकुछ लगा रहता है, जी की बात सास से ही कही जा सकती है.’’

मैं ने सोचा, ‘भई वाह, सास नहीं है, इसीलिए सास का बखान हो रहा है, सास होती तो लड़ाईझगड़े भी होते, तब यही मनातीं कि इस से अच्छा तो सास ही न होती.’

दूसरी दीदी की शादी तय हो गई थी. भरापूरा परिवार था उन का. घर में सासससुर, देवरननद सभी थे. मैं ने सोचा, यह गई काम से. देखें, ससुराल से लौट कर ये क्या भाषण देती हैं. दीदी पति के साथ दूसरे शहर में रहती थीं, यों भी उन का परिवार आधुनिक विचारधारा का हिमायती था. उन की सास दीदी से परदा भी नहीं कराती थीं. सब तरह की आजादी थी, यानी शादी से पहले से भी कहीं अधिक आजादी. सही है, सास जब खुद मौडर्न होगी तो बहू भी उसी के नक्शेकदमों पर चलेगी.

दीदी बेहद खुश थीं, पति व उन की मां के बखान करते अघाती न थीं. मैं ने सोचा, ‘मैडम को भारतीय रंग में रंगी सास व परिवार मिलता तो पता चलता. फिर, ये तो पति के साथ रहती हैं. सास के साथ रहतीं तब देखती तारीफों के

पुल कैसे बांधतीं. अभी तो बस आईं

और मेहमानदारी करा कर चल दीं.

चार दिन में वे तुम से और तुम उन से क्या कहोगी?’

बड़ी दीदी से सास की अनिवार्यता और मंझली दीदी से सास के बखान सुनसुन कर भी, मैं अपने मस्तिष्क में बनाई सास की तसवीर पूरी तरह मिटा न सकी.

अब मेरी मां स्वयं सास बनने जा रही थीं. भैया की शादी हुई, मेरी भाभी की मां नहीं थी. सो, न तो वे कामकाज सीख सकीं, न ही मां का प्यार पा सकीं. पर मां को क्या हो गया? बातबात पर हमें व भैया को डांट देती हैं. भाभी को हम से बढ़ कर प्यार करतीं?. मां कहतीं, ‘‘बहू हमारे घर अपना सबकुछ छोड़ कर आई है, घर में आए मेहमान से सभी अच्छा व्यवहार करते हैं.’’

मां का तर्क सुन कर लगता, काश, सभी सासें ऐसी हों तो सासबहू का झगड़ा ही न हो. कई बार सोचती, ‘मां जैसी सासें इस दुनिया में और भी होंगी. देखते हैं, मुझे कैसी सास मिलती है.’

इसी बीच, एक बार अपनी बचपन की सहेली रमा से मुलाकात हुई. मैं उस के मेजर पति से मिल कर बड़ी प्रभावित हुई, उस की सास भी काफी आधुनिक लगीं, पर बाद में जब रमा से बातें हुईं तो पता लगा उन का असली रंग क्या है.

रमा कहने लगी, ‘‘मैं तो उन्हें घर के सदस्या की तरह रखना चाहती हूं पर वे तो मेहमानों को भी मात कर देती हैं. शादी के इतने सालों बाद भी मुझे पराया समझती हैं. मेरे दुखसुख से उन्हें कोई मतलब नहीं. बस, समय पर सजधज कर खाने की मेज पर आ बैठती हैं. कभीकभी बड़ा गुस्सा आता है. ननद के आते ही सासजी की फरमाइशें शुरू हो जाती हैं, ‘ननद को कंगन बनवा कर दो, इतनी साडि़यां दो.’ अकेले रमेश कमाने वाले, घर का खर्च तो पूरा नहीं पड़ता, आखिर किस बूते पर करें.

‘‘रमेश परेशान हो जाते हैं तो उन का सारा गुस्सा मुझ पर उतरता है. घर का सुखचैन सब खत्म हो गया है. रमेश अपनी मां के अकेले बेटे हैं, इसलिए उन का और किसी के पास रहने का सवाल ही नहीं है. पोतेपोतियों से यों बचती हैं गोया उन के बेटे के बच्चे नहीं, किसी गैर के हैं. कहीं जाना हुआ तो सब से पहले तैयार, जिस से बच्चों को न संभालना पड़े.’’

रमा की बातें सुन कर मैं बुरी तरह सहम गई. ‘‘अरे, यह तो हूबहू वही तसवीर साक्षात रमा की सास के रूप में विद्यमान है. अब तो मैं ने पक्का निश्चय कर लिया कि नहीं, मेरी सास नहीं होनी चाहिए. लेकिन होनी, तो हो कर रहती है. मैं ने सुना तो दिल मसोस कर रह गई. अब मां से कैसे कहूं कि यहां शादी नहीं करूंगी. कारण पूछेंगी तो क्या कहूंगी कि मुझे सास नहीं चाहिए. वाह, यह भी कोई बात है.

मन ही मन उलझतीसुलझती आखिर एक दिन मैं डोली में बैठ विदा हो ही गई. नौकरीपेशा पिता ने हम भाईबहनों को अच्छी तरह पढ़ायालिखाया, पालापोसा, यही क्या कम है.

मेरी देवरानियांजेठानियां सभी अच्छे खातेपीते घरों की हैं, मैं ने कभी यह आशा नहीं की कि ससुराल में मेरा भव्य स्वागत होगा. ज्यादातर मैं डरीसिमटी सी बैठी रहती. कोई कुछ पूछता तो जवाब दे देती. अपनी तरफ से कम ही बोलती. रिश्तेदारों की बातचीत से पता चला कि सास पति की शादी कहीं ऊंचे घराने में करना चाहती थीं. लेकिन पति को पता नहीं मुझ में क्या दिखा, मुझ से ही शादी करने को अड़ गए. लेनदेन से सास खुश तो नजर नहीं आईं, पर तानेबाने कभी नहीं दिए, यह क्या कम है.

मैं ने मां की सीख गांठ बांध ली थी कि उलट कर जवाब कभी नहीं दूंगी. पति नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर में रहते थे. मैं उन्हीं के साथ रहती. बीचबीच में हम कभी आते. मेरी सास ने कभी भी किसी बात के लिए नहीं टोका. मुझ से बिछिया नहीं पहनी गई, मुझे उलटी मांग में सिंदूर भरना कभी अच्छा नहीं लगा, गले में चेन पहनना कभी बरदाश्त न हुआ, हाथों में कांच की चूडि़यां ज्यादा देर कभी न पहन पाईं. मतलब सुहाग की सभी बातों से किसी न किसी प्रकार का परहेज था. पर सासजी ने कभी जोर दे कर इस के लिए मजबूर नहीं किया.

दुबलीपतली, गोरीचिट्टी सी मेरी सास हमेशा काम में व्यस्त रहतीं. दूसरों को आदेश देने के बजाय वे सारे काम खुद निबटाना पसंद करती थीं. बेटियों से ज्यादा उन्हें अपनी बहुओं के आराम का खयाल था.

इस बीच, मैं 2 बेटियों की मां बन चुकी थी. समयसमय पर बच्चों को उन के पास छोड़ जाना पड़ता तो कभी उन के माथे पर बल नहीं पड़ा. मेरे सामने तो नहीं, पर मेरे पीछे उन्होंने हमेशा सब से मेरी तारीफ ही की. मेरी बेटियां तो मुझ से बढ़ कर उन्हें चाहने लगी थीं. मेरी असली सास के सामने मेरी खयाली सास की तसवीर एकदम धुंधली पड़ती जा रही थी.

इसी बीच, मेरे पति का अपने ही शहर में तबादला हो गया. मैं ने सोचा, ‘चलो, अब आजाद जिंदगी के मजे भी गए. कभीकभार मेहमान बन कर गए तो सास ने जी खोल कर खातिरदारी की. अब हमेशा के लिए उन के पास रहने जा रहे हैं. असली रंगढंग का तो अब पता चलेगा. पर उन्होंने खुद ही मुझे सुझाव दिया कि 3 कमरों वाले उस छोटे से घर में देवरननदों के साथ रहना हमारे लिए मुश्किल होगा. फिर अलग रहने से क्या, हैं तो हम सब साथ ही.

मेरी मां मुझ से मिलतीं तो उलाहना दिया करतीं. ‘‘तुझे तो सास से इतना प्यार मिला कि तू ने अपनी मां को भी भुला दिया.’’

शायद इस दुनिया में मुझ से ज्यादा खुश कोई नहीं. मेरे मस्तिष्क की पहली वाली तसवीर पता नहीं कहां गुम हो गई. अब सोचती हूं कि टीवी सीरियल व फिल्मों वगैरा में गढ़ी हुई सास की लड़ाकू व झगड़ालू औरत का किरदार बना कर, युवतियां अकारण ही भयभीत हो उठती हैं. जैसी अपनी मां, वैसी ही पति की मां, वे भला बहूबेटे का अहित क्यों चाहेंगी या उन का जीवन कलहमय क्यों बनाएंगी. शायद अधिकारों के साथसाथ कर्तव्यों की ओर भी ध्यान दिया जाए तो गलतफहमियां जन्म न लें. एकदूसरे को दुश्मन न समझ कर मित्र समझना ही उचित है. यों भी, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती.

मेरी सास मुझ से कितनी प्रसन्न हैं, इस के लिए मैं लिख कर अपने मुंह मियां मिट्ठू नहीं बनना चाहती, इस के लिए तो मेरी सास को ही एक लेख लिखना पड़ेगा. पर उन की बहू अपनी सास से कितनी खुश है, यह तो आप को पता चल ही गया है. Family Story In Hindi

Dhadak 2 : जातिवाद पर चोट मगर क्लाइमैक्स फीका

Dhadak 2 : ‘धड़क 2’ एक सामाजिक विकार पर बनी रोमांटिक फिल्म है. यह फिल्म श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी कपूर द्वारा अभिनीत 2018 में आई ‘धड़क’ की अगली कड़ी है. इस में सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी हैं.

‘धड़क 2’ में जातिगत भेदभाव और सामाजिक मुद्दों को काफी बोल्ड तरह से उठाया गया है, खासकर दलित संघर्ष और ऊंची जातियों के भ्रम और उच्चतर के अहंकार को. यह दिलचस्प है कि अंतरजातीय प्रेम कहानियों में ‘धड़क’ एक एपिसोडिक सीरीज की तरह उभर कर आई है, जिस में आधुनिक और विश्वगुरु भारत में छिपा दी गई बदबूदार सड़न दिखाई पड़ती है. जो हर गलीमहल्ले, स्कूल, कालेज, औफिस में साफ दिखाई देती है.

इस फिल्म की प्रेम कहानी में जातिवाद को खलनायक दिखाया गया है, जो हजारों सालों से पीछा ही नहीं छोड़ रहा. ‘प्यार कर लिया, लेकिन अपनी औकात भूल गया’ यह एक लाइन किरदार का दर्द बयां करती है. इस के कुछ डायलौग बढि़या हैं, जैसे ‘जाति के आधार पर अगर फैलोशिप देना गलत है तो खत्म कर दीजिए जातिवाद’, ‘मरने या लड़ने में से किसी एक को चुनना हो तो लड़ना चुनना.’ खासकर यह तब कहा जाता है जब नायक आत्महत्या करने का प्रयास करता है.

यह फिल्म दलित छात्र नीलेश (सिद्धांत चतुर्वेदी) के इर्दगिर्द है जो अपने परिवार को गरीबी और जातिवाद की दलदल से निकालना चाहता है. पढ़ाई के दौरान उसे ऊंची जाति की लड़की विधि (तृप्ति डिमरी) से प्यार हो जाता है. लेकिन इस प्यार में तमाम रुकावटें सामने आती हैं. लड़की के परिवार वाले यह सहन नहीं कर पाते और नीलेश को रास्ते से हटाने की कोशिश में रहते हैं.

इस फिल्म में कुछ दृश्य शानदार बन पड़े हैं, जैसे जब विधि नीलेश को अपनी बहन की शादी में बुलाती है तो नीलेश को अकेले में ले जा कर विधि के परिवार वाले बुरी तरह पीटते हैं, यहां तक कि उस पर पेशाब तक कर देते हैं. एक अन्य शानदार दृश्य जब विधि नीलेश की गंदी बस्ती में उसे ढूंढ़ने जाती है तो वहां नीलेश विधि को अपनी परिस्थिति से परिचित कराता है जो बेहद हार्डहिटिंग दिखाई देती है.

साल 2016 में दलित छात्र रोहित वेमुला ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के होस्टल में आत्महत्या की थी. इस आत्महत्या के बाद देशभर में छात्रों, खासकर दलित छात्रों, का आंदोलन शुरू हुआ था और इसे इंस्टिट्यूशनल मर्डर करार दिया.

इस फिल्म में शेखर (प्रियांक तिवारी) की भूमिका कहीं न कहीं रोहित वेमुला से प्रभावित दिखाई पड़ती है. रोहित की तरह शेखर भी दलित छात्र नेता होता है. वह अपनी सरकारी फैलोशिप रोक दिए जाने के चलते आत्महत्या कर लेता है.

फिल्म की शुरुआत रोमांचक अंदाज में होती है. मध्यांतर तक फिल्म सधे अंदाज में चलती है. मध्यांतर के बाद पटकथा खिंचीखिंची दिखाई पड़ती है. फिल्म का क्लाइमैक्स दमदार नहीं बन पाया है. क्लाइमैक्स पूरी फिल्म की मेहनत पर पानी फेरने का काम करता है. ‘धड़क 2’ का पहली धड़क की तरह का ट्रैजिक एंड नहीं है बल्कि इस की हैप्पी एंडिंग है. यह असंभव सा है कि ब्राह्मण परिवार एक दलित को अपना ले खासतौर पर तब जब वह अभी कमा भी नहीं रहा हो.

हालांकि फिल्म का नायक अंत में कुछ हकीकत से रूबरू जरूर करा देता है कि, ‘‘सर, गांव में पैदा हुआ था वहां न सड़कें हमारी थीं न जमीन हमारी थी, न पानी हमारा था, यहां तक कि जिंदगी हमारी नहीं थी. जब मरने की नौबत आई तो जिंदा रहने के लिए शहर आ गए. सोचा, सब बदल जाएगा. मगर यहां सड़कें चौड़ी हैं, इमारतें ऊंची हैं पर सोच छोटी है, हम भूल गए थे कि हम अपने हालात तो बदल सकते हैं मगर जात नहीं.’’

आजादी के 75 सालों बाद भी देश में दलितों के हालात खासे बदले नहीं हैं. गांवों ही नहीं शहरों और दिल्लीमुंबई में भी आज भी दलितों को घोड़ी पर बैठ कर बरात ले जाते नहीं देखा जाता. दलितों की औरतों पर अत्याचार किया जाना आम बात है, यहां तक कि थानों में शिकायत दर्ज कराने के दौरान भी उन्हें उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है.

बराबरी के सिद्धांत की बातें तो खूब होती हैं, मगर उन पर अमल नहीं होता. ऊंचेऊंचे पदों पर ब्राह्मणों का ही कब्जा है. नेताओं को आज भी दलितों के घर खाना खाने का राजनीतिक नाटक करना पड़ता है. क्योंकि हिंदू धर्मग्रंथों में तो दलितों को पशुतुल्य बताया गया है, उन्हें पशु, गंवार तक कहा गया है.

फिल्म की विशेषता यही है कि इसे बनाया गया है. यह विषय ऐसा है जिसे ऊंची जातियां छिपा कर रखना चाहती हैं. इस बारे में तो न लिखने दिया जाता है और न समाचार तक छपने दिए जाते हैं. इस वर्ग के अधिकांश सांसदों और विधायकों को पैसे या बल से मुंह बंद रखने को कहा जा चुका है. कुछएक विधायक सांसद इस वर्ग के हैं पर ‘धड़क 2’ जैसा मामला संसद तक में ही नहीं उठाते कि कहीं उन की पार्टी उन से नाराज न हो जाए. वे लोग अपनी पार्टी तक को संभाल नहीं पाते क्योंकि जब उन की पार्टी बनती है तो उस में ऊंची जाति के लोग घुस कर सेंध लगा देते हैं.

‘धड़क 2’ जैसी फिल्में बड़ी आबादी को यह एहसास दिलाने का काम कर सकती हैं कि मेहनत करो तो कुछ भी पा सकते हो पर अफसोस यह है कि वह वर्ग भी जो इस जातिवाद का शिकार है फिल्म देखने नहीं जा रहा. अगर वह थिएटरों को भर देता तो ढेरों फिल्में इस विषय पर बनने लगतीं?.

सिद्धांत चतुर्वेदी ने अच्छी ऐक्टिंग की है. वैसे वह खासा गोरा है पर फिल्म के हिसाब से उस का रंग काला किया गया है. तृप्ति डिमरी ने भी बढि़या अभिनय किया है. फिल्म का संगीत पक्ष कमजोर है. सौरभ सचदेवा फिल्म का सब से बड़ा सरप्राइज है, उस का काम अंतरजातीय प्रेम संबंधों वाले कपल को ढूंढ़ कर उन की हत्या करना है. उस ने एक सीरियल किलर की भूमिका निभाई है. आज आयरनी यह है कि फिल्म इंडस्ट्री में स्क्रीन पर तो हीरो दलित दिखने लगे हैं मगर दलित हीरो बन जाए, ऐसा दूर की कौड़ी जान पड़ती है.

फिल्म की निर्देशक शाजिया इकबाल ने इस फिल्म से निर्देशन की शुरुआत की है और उस का निर्देशन अच्छा है. वह खुद को आंबेडकराइट कहती है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

प्रेम कहानी को बयां करने वाली इस फिल्म में निर्देशक ने पहले तो जातिसूचक शब्दों, जैसे ‘चमार’ और ‘भंगी’ का इस्तेमाल किया था परंतु सैंसर बोर्ड ने इन शब्दों को हटवा दिया था जबकि ये शब्द खुलेआम बोले जाते हैं. यह सैंसर की हठधर्मी है. Dhadak 2

Hindi Satire : ऐंकर या माइकवाले पहलवान

Hindi Satire : भई आजकल के ऐंकर, तोबा, चेहरे पर ऐसी गंभीरता, जैसे पूरे देश का भविष्य उन के माथे की सिलवटों पर टिका हो. सवाल पूछते हैं तो इस अंदाज में, मानो पहले ही तय कर चुके हों कि सामने वाला गुनाहगार है- जवाब नहीं सुनना, बस गवाही चाहिए और वह भी लाइव टैलीविजन पर.एक समय था जब टीवी ऐंकर अपने संयमित स्वर और अपनी तटस्थता के लिए जाना जाता था. और आज? आज का ऐंकर ऐसा प्राणी है जो गला बैठने तक बोलता है लेकिन मुद्दे पर नहीं. उस की आवाज में बिजली होती है तो विचारों में अकसर शौर्ट सर्किट. टीवी स्टूडियो अब बहस का मंच नहीं, डब्लूडब्लूई का रिंग व ध्वनि का अखाड़ा बन चुका है जहां हर पैनलिस्ट माइक लिए युद्धभूमि में है और ऐंकर उन का रैफरी नहीं बल्कि खुद मुख्य योद्धा है. अब ऐंकर माइक नहीं, दहाड़रूपी तेज ढोलक ले कर बैठता है ताकि उस के शोर में वह जिस की बात नहीं सुनना चाहता, न सुने. मुद्दा क्या है, किसे सुनना है, कौन तथ्य पर बोल रहा है, आदि सब गौण हो चुके हैं. ऐंकर का मकसद अब तथ्य पेश करना या सूचना देना नहीं बल्कि सनसनी फैलाना हो गया है.

आज के ऐंकर को देख लगता है कि उस के पास मेकअप की छह परतें हैं जिन में मुद्दा भटक जाए और पक्षपात निखर आए. स्क्रिप्ट की केवल 2 लाइनें होती हैं. चेहरे पर पौलिश ऐसी कि जिसे देख आईना भी शरमा जाए. वह किसी को भी बीच में रोक देने के सब से बड़े हथियार से लैस होता है. विपक्ष बोलने लगे तो प्लीजप्लीज मुझे बीच में स्पष्ट करना होगा और जब पसंदीदा प्रवक्ता बोले, तो सर, आप तो पूरा कीजिए, बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है.

पहले ऐंकर तटस्थ होता था, अब तटस्थता का तख्तापलट हो गया है. अब दर्शक पहले ही जान लेते हैं कि कौन पक्ष में बोलेगा, कौन विपक्ष को डांटेगा. कई बार लगता है जैसे ऐंकर को प्रोग्राम से पहले ब्रीफिंग मिली है कि आज फलांने को घेरना है, ढिकाने को गरियाना है, बाकियों को हेरना है. डिबेट अब डांटबाजी की लाइव टैलीकास्ट लगती है.

आवाज में बेसब्री और पेट में टीआरपी की भूख. दर्शक जाए भाड़ में, टीआरपी आए, बस. वह टीआरपी ही खातापीता व ओढ़ताबिछाता है. वह टीआरपीरूपी वैन का ड्राइवर बन गया है. आज के ऐंकर को यह नहीं देखना कि दर्शक क्या जानना चाहता है. उसे बस, उस की क्लिप वायरल हो व हैडलाइन में उस का नाम चमकने से मतलब.

ऐंकर यानी आज का शोर समन्वयक वह प्राणी जो पहले सवाल पूछता है, फिर खुद ही जवाब दे देता है. ऐसा शख्स जिस ने कि तेज चिल्लाने की किसी प्रतियोगिता में मैडल जीता हो. पुराने जमाने में जहां एक ऐंकर होता था और 5 विशेषज्ञ, अब 5 प्रवक्ता होते हैं और एक चीखने वाला, किसी रेसलिंग शो का अनौपचारिक रेफरी जैसा लगता. जिसे सब से कम बोलना चाहिए, वह सब से ज्यादा बोलता है, वह भी इतनी तेज आवाज में कि रेडियो की तरंगें भी पसीनापसीना हो जाएं.

ऐंकर सवाल नहीं पूछता, बस, उकसाता है कि कौन पहले फटेगा या पैनलिस्ट के किसी जवाब की पूंछ पकड़ कर नया सवाल पैदा कर लेता है. जब बहस में गर्मागर्मी न हो रही हो तो ऐंकर बड़ी ही सफाई से खुद एक पक्ष ले कर आग में घी डालता है या किसी ऐसे शख्स को औनलाइन जुड़वा लेता है. मुद्दे को वह समझने की जगह माइक से पीटता है, यही आज का सूत्र वाक्य है. साउंडप्रूफ स्टूडियो में अब शब्दों की हत्या लाइव होती आप देखते हैं.

कभीकभी लगता है कि न्यूज स्टूडियो अब औडियो टौर्चर सैंटर बन गए हैं. ऐंकर का लहजा देख कर लगता है मानो स्क्रीन के पीछे लाठी हो. विचारों से वौल्यूम की लड़ाई में तबदील हो गई बहस में थोड़ी और गर्मागर्मी हो तो अब निकली तब निकली. ऐंकर कभी खबर पढ़ते थे, अब खबर घसीटते हैं. हर बार पिछली डिबेट की चिल्लाहट भूल कर दर्शक सोचता है कि अब बहस होगी, लेकिन उसे सिर्फ चिल्लाहट और कटुता मिलती है.

पर ऐंकर बड़ा ही चतुरचालाक होता है जब उस के तर्करूपी तरकश के बाण चुक जाते हैं. ‘एक मिनट रुकना होगा,’ कह कर बड़ी खबर या ब्रेकिंग चला देते हैं जब वह कहता है, इस बीच एक और बड़ी खबर आ रही है. एक बड़ी खबर! बहुत बड़ी खबर! बड़ी खबर. वह रेलवे प्लेटफौर्म पर एक ट्रेन के लगने के पहले उद्घोषक जैसे ही लगातार दोहराता रहता है पर खोलता नहीं कि वह बड़ी खबर है क्या. जब दर्शक गुस्से से खौलने लगते हैं तब वह कितने विज्ञापन इस बीच ‘सध गए’ के आधार पर तोलने लगता है. उस के बाद भी दोतीन मिनट बड़ी खबर! बड़ी खबर! कर ही खबर जाहिर करता है कि ‘चांदनी चौक में सांड ने स्कूटर वाले को उठा कर पटक दिया. स्कूटर सवार की स्पौट पर ही मौत.’

अब देश को दिशा नहीं, दहाड़ देने वाले ऐंकरों का समय चल रहा है. सत्ता की क्रीम से चमकते चेहरे पर माथे की शिकन से लगता है जैसे देश की पूरी व्यवस्था का बोझ यही उठाए हैं. यह अलग बात है कि कई बार उठाए सवाल एकतरफा लगते हैं. आंखें ऐसी कि जवाब नहीं सुनतीं, बस घूरती हैं. जैसे सवाल में नहीं, गवाही में बैठी हों. भौंहे ऐसे तनी होती हैं जैसे कि हर जवाब देने वाला अपराधी हो. होंठों पर मुसकान नहीं, कटाक्ष की तलवार टंगी रहती है जो हर असहमत प्रवक्ता को मौका देखते ही लहूलुहान करती है. गले में कौलर माइक नहीं, जैसे सायरन हो, एक बार बोला तो पूरा पैनल कांप उठे. ऐंकर की निगाहें स्क्रीन पर नहीं, सत्ता की गोदी पर टिकी होती हैं.

अब ऐंकर प्रैस का नहीं, प्रैशर का आदमी लगता है पर छाती ठोंक कर कहता है, ‘मैं निष्पक्ष हूं’ जिस की हवा पैनल का गठन देख कर निकल जाती है. हाथ हवा में ऐसे घूमते हैं जैसे बहस नहीं, जादूटोना कर रहे हों और मुद्दा वहीं अदृश्य हो जाता है. अंदाज ऐसा, मानो लोकतंत्र की लगाम वही थामे है, जबकि रिमोट कहीं और से चलता. कमर सीधी पर लेकिन प्रबंधकीय दबाव में झुकी हुई है. पैर जमीन पर होते हैं, लेकिन ऐंकर आसमान में अपनी टीआरपी के बुलबुले में उड़ रहा होता है.

होंठ जैसे बुलेट ट्रेन हों, किसी को भी बहस के प्लेटफौर्म में ठोस निष्कर्ष की पटरी पर उतरने का मौका नहीं देते. सब को रौंदते हुए निकल जाते हैं पर शेर को सवा सेर भी मिलता ही है. कभीकभी कोईकोई पैनलिस्ट ऐंकर के सवाल पूछने पर उस से उलटा, ‘अच्छा, पहले आप मेरे इस प्रश्न का जवाब दीजिए’ कह कर सवालजवाब करने लगता है तब वह बगलें झांकता है पर पैंतरेबाजी में माहिर होने से पैनलिस्ट को फिर उलझा देता है. मुद्दे को सुलझाना उस का उद्देश्य भी नहीं. ‘अब हमारे पास समय नहीं’ कह कर डिबेट के प्रश्नों से नया प्रश्न खड़ा कर डिबेट को समाप्त कर देता है. Hindi Satire

Section 306 IPC : उलझनभरी आत्महत्या के लिए उकसाने वाली धारा 306

Section 306 IPC : आत्महत्या करना या करने के लिए उकसाना दोनों ही अपराध की श्रेणी में आते हैं. आत्महत्या करने वाला तो चला जाता है पर जातेजाते उकसाने वाले पर गाज गिरा जाता है. इस का मुकदमा धारा 306 के तहत चलता है. आखिर क्यों विवादों में अकसर घिरती है यह धारा. पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट.

लड़की ने बोला, ‘तू मर जा.’ मैं क्या करता. ब्लैकमेल करने लगी थी वह. बताओ, मैं क्या करता. उस ने घर पहुंच कर आग लगा ली.

15 जून को 24 वर्षीय अजय कुशवाह ने ग्वालियर के अस्पताल में दम तोड़ने के पहले यानी मृत्युपूर्व कथन में अपनी ट्रेजेडिक लव स्टोरी पुलिस वालों को बताई. उस में नया इतना भर है कि अजय ने अपनी मरजी से नहीं बल्कि प्रेमिका किरण मदने के कहने यानी उकसाने पर आत्महत्या की थी. उस के बयान की बिना पर पुलिस ने किरण के खिलाफ बीएनएस अर्थात भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 व 3 (5) के तहत मामला दर्ज कर लिया है. लवली के भाई सागर मदने व पिता दशरथ मदने को भी इन्हीं धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया.

इन तीनों पर मुकदमा चलेगा जिस का फैसला कड़ा आएगा और कैसा आएगा, यह कह पाना मुश्किल है. अजय के बयान के मुताबिक तो तीनों मुजरिम ही लगते हैं. थोड़े से में इस प्रेमप्रसंग को समझें तो आगे की बात अर्थात 306 की उलझनें स्पष्ट होती जाएंगी लेकिन उस के भी पहले यह समझ लें कि आत्महत्या के लिए उकसाने वाली उक्त धारा कानूनों के बदलाव के नाम पर नाम बदलने से पहले आईपीसी की धारा 306 के नाम से प्रचलित थी.

अब से कोई 9 साल पहले अजय और किरण की मुलाकात ग्वालियर में ही एक विवाह समारोह में हुई थी. लव एट फर्स्ट साइट की कहावत के मुताबिक दोनों में दोस्ती हो गई, जो जल्द ही प्यार में बदल गई. किरण ने पहले प्रपोज किया तो ‘हम दिल दे चुके सनम’ फिल्म की तर्ज पर अजय ने तुरंत स्वीकार कर लिया. फिर वही हुआ जिस की उम्मीद ऐसे लाखों प्रेमप्रसंगों से की जाती है कि शादी के वादे की बिना पर 7 साल एकसाथ हंसीखुशी और मौजमस्ती में गुजारने के बाद दोनों में अनबन और खटपट होने लगी.

किरण ने अजय से कन्नी काटना शुरू कर दिया तो उस का हर लिहाज से आदी हो उठा अजय बौखलाने लगा. वह परेशानी और तनाव में रहने लगा. शादी की कसमें, वादे, इरादे दम तोड़ने लगे. अजय को समझ आ गया कि किरण जानबूझ कर उस की अनदेखी करने लगी है और दूसरे लड़कों से हंसनेबोलने लगी है. सो, उस के कलेजे पर सांप लोटने लगे.

किरण को हाथ और जिंदगी दोनों से निकलते देख अजय ने उसे शादी का प्रौमिस याद दिलाया तो किरण ने सीधे तो मना नहीं किया लेकिन शादी करने के एवज में 3 लाख रुपए की मांग कर दी जो वह बेहतर जानती थी कि अजय की हैसियत और बूते के बाहर की बात है.

अजय ने ईमानदारी से इतनी बड़ी रकम देने में असमर्थता जता दी. लेकिन किरण ने उस की जिंदगी से जाने के बजाय उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया. वह अजय को यह धौंस देने लगी कि अगर पैसे नहीं दिए तो वह उसे झुठे मामले में फंसा देगी. जाहिर है, इस धमकी से अजय और परेशान हो उठा. कुछ सोच या कर पाता, इस के कुछ दिनों पहले ही दशरथ मैदाने कुछ गुंडों को ले कर उस के घर जा धमके और शादी के बदले 5 लाख रुपए मांगे. अजय के पिता सुरेश कुशवाह के मुताबिक तभी से अजय डिप्रैशन में रहने लगा था.

आरपार का फैसला करने के लिए

13 जून को वह किरण के घर गया और उस से कहा कि अगर हमारा प्यार कुछ नहीं है तो बता दो. इस पर किरण ने तल्खी से कहा कि, ‘तू मर जा’. इस के बाद जो हुआ वह ऊपर बताया जा चुका है. अजय ने इसी दिन आधी रात को अपने शरीर पर पैट्रोल डाल कर खुद को आग के हवाले कर दिया जिस में वह 75 फीसदी झुलस गया. जब वह जल रहा था तब किरण उस का वीडियो बना रही थी, ऐसा अजय के पिता का आरोप है.

रास्ता चलते कुछ लोगों ने उसे बचाने की कोशिश की. इसी भीड़ में से किसी ने जलते हुए अजय का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया जो देखते ही देखते वायरल हो गया. पुलिस आई, अजय को इलाज के लिए अस्पताल में भरती कराया गया लेकिन 15 जून को उस ने दम तोड़ दिया. अजय जब अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झुल रहा था उसी बीच किरण माधोगंज थाने जा कर उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखा आई थी कि अजय उसे परेशान करता था.

इस तरह एक और प्रेम कहानी का दुखद अंत हुआ लेकिन इस के बाद की कहानी ग्वालियर सैशन कोर्ट में शुरू होगी. मुमकिन है यह भी हाईकोर्ट होते सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जहां आखिरी तौर पर जज साहबान तय करेंगे कि क्या वाकई किरण और उस के परिजनों ने अजय को आत्महत्या के लिए उकसाया था. 306 की तरह 108 भी गैरजमानती है जिस में दोषी को 10 साल तक की सजा का प्रावधान है जबकि इस की धारा 3 (5) के मुताबिक यह उन मामलों पर लागू होती है जहां अपराध एक से अधिक व्यक्तियों ने किया होता है और उन का मकसद एक होता है. यानी, सामान्य इरादे से किए गए अपराध से संबंधित है.

कैसे हो अपराध साबित

108 यानी 306 के तहत सजा मिलना आसान नहीं है क्योंकि तकनीकी तौर पर अपराध उतनी आसानी से साबित होता नहीं जितनी आसानी से पुलिस एफआईआर में दर्ज कर लेती है. गौरतलब है कि चर्चित अतुल सुभाष की मौत के मामले में भी इन्हीं यानी 108 व 3 (5) के तहत मामला दर्ज हुआ है क्योंकि अपराधी एक से ज्यादा हैं.

किरण और उस के पिता व भाई पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित हो पाएगा, इस की संभावनाएं क्यों कम हैं इस के लिए सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों पर नजर डालें तो साफ होता है कि किसी को ‘जा मर जा’ कह देना उकसाने की श्रेणी में कब नहीं आता और कब आता है, इस की वजहें भी अदालत ने अपने फैसलों में स्पष्ट की हैं.

मोहित सिंघल बनाम उत्तराखंड (2023) मामला इसी तरह का था, जिस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘जा मर जा’ जैसे बयान या कथित उत्पीड़न अपनेआप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनते जब तक कि मंशा और निकटता साबित न हों. इस मुकदमे की कहानी कुछ यों है, देहरादून के रहने वाले अशोक कुमार की पत्नी ने संदीप बंसल नाम के व्यक्ति से क्रमश: 40 हजार और 60 हजार रुपए उधार लिए. जब 60 हजार रुपए वापस हुए तो संदीप ने उस में से ब्याज के 15 हजार रुपए काट लिए. इस पर अशोक कुमार ने आत्महत्या कर ली.

अपने सुसाइड नोट में अशोक कुमार ने संदीप के बेटे मोहित बंसल व उस के साथियों पर अपमानजनक भाषा संभवतया ‘जा मर जा’ का इस्तेमाल किया और शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया.

अशोक कुमार की पत्नी की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 306 के तहत एफआईआर दर्ज की. देहरादून सैशन कोर्ट ने मोहित के खिलाफ 19 जनवरी, 2019 को समन जारी किया जिसे मोहित ने हाईकोर्ट में चैलेंज किया. हाईकोर्ट ने उस की याचिका को खारिज करते समन का आदेश रद्द नहीं किया और यह माना कि सच्चाई और साक्ष्यों की कमी की बिना पर समन रद्द नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट की नजर में प्रथम दृष्टया यह उकसाने का मामला बनता है.

मोहित ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जहां जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस पंकज मिठाल की बैंच ने 1 दिसंबर, 2023 को हाईकोर्ट का फैसला पलटते कहा कि-

– सुसाइड नोट में अपमानजनक भाषा और बैल्ट से मारपीट का जिक्र था लेकिन यह घटना आत्महत्या से 2 सप्ताह पहले की थी जिस से निकटता का अभाव था.

– कोई अन्य साक्ष्य, मसलन गवाह, मैसेज या चिकित्सीय साक्ष्य नहीं थे जो मोहित के कृत्य को आत्महत्या की वजह साबित करते हों. और ‘जा मर जा’ जैसे बयान बिना निरंतर उत्पीड़न और मंशा की धारा 306 के तहत अपराध नहीं बनते.

यहां निकटता से सुप्रीम कोर्ट का मतलब निश्चित रूप से यह ही माना जा सकता है कि समय अंतराल और तात्कालिक संबंध का न होना था. जस्टिस अभय ओका की टिप्पणी यह थी कि उकसावे और आत्महत्या के बीच तात्कालिक संबंध होना जरूरी है. यहां यह बात भी कम दिलचस्प नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने अशोक कुमार के सुसाइड नोट से इस बात पर भी गौर किया कि उस ने अपनी पत्नी की बुरी आदतों का भी शाब्दिक तौर पर जिक्र किया था. इस से कोर्ट ने अंदाजा लगाया कि इस से मृतक का अभिप्राय पत्नी की खर्चीली आदतों से या कर्ज लेने की लत या प्रवृत्ति के अलावा पैसों के लेनदेन को ले कर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार से भी हो सकता है.

जो भी रहा हो लेकिन इस से फायदा मोहित और उस के साथियों को मिला जिन्हें कोर्ट ने बरी कर दिया. बात बिलकुल हिंदी फिल्मों के कोर्टरूम दृश्यों जैसी थी जिन में दोनों वकीलों की धुआंधार बहस और दलीलें सुनने के बाद जज साहब कहते हैं कि कानून जज्बातों या भावनाओं से नहीं बल्कि सुबूतों से चलता है.

मोहित के मामले में सुबूत कमजोर थे और अजय कुशवाह के मामले में भी कमजोर ही दिख रहे हैं क्योंकि इस मामले में भी अजय के पास कोई मैसेज या दूसरा गवाह सामने नहीं आया जो यह कहे कि हां जज साहब, किरण ने मेरे सामने अजय से कहा था कि जा मर जा. यानी, अकेले अजय के कहने को अदालत सच नहीं मानेगी क्योंकि साबित वह भी नहीं कर पा रहा.

अजय और किरण के मामले में यह भी एक अहम फैक्टर होगा कि वे 7 साल रिलेशन में थे. जाहिर है, इस दौरान एकदूसरे को पतिपत्नी की तरह समझने लगे थे. इस लिहाज से भी जा मर जा जैसे ताने उकसाने की श्रेणी में आना शायद ही कोर्ट माने. किरण के पिता व भाई द्वारा हमले के सुबूत भी अजय के पिता के पास नहीं लगते. होते तो वे थाने में जरूर दिखाते. जबकि, उन्होंने इस की रिपोर्ट भी नहीं लिखाई थी.

बात जहां तक ‘जा मर जा’ की है तो भारतीय समाज और परिवारों में वह आम है जिस के पर्याय हैं भाड़ में जा, कुएं या नदी में डूब जा वगैरह. गुस्से में मांबाप ही संतान को यह बोल देते हैं लेकिन उन की मंशा यह नहीं रहती कि संतान फांसी लगा कर या जहर खा कर सच में ही मर जाए. उन की मंशा सबक सिखाने की या फिर भड़ास निकालने की होती है. सामान्य झगड़ों और विवादों में भी ‘जा मर जा’ बोला जाना बेहद आम है.

उकसावे की क्या हो परिभाषा

निपुण अनेजा बनाम उत्तर प्रदेश 2024 मामले में अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि अभियुक्त ने मृतक को अपमानजनक बयान जैसे जा मर जा या उस से मिलतेजुलते शब्द कहे थे. उसे कार्यस्थल पर प्रताडि़त भी किया गया जिस से उस ने आत्महत्या कर ली. यहां मृतक और अभियुक्त के बीच औपचारिक कार्यालयीन संबंध था जैसा कि तमाम दफ्तरों में होता है. मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उस ने 306 के तहत मामला रद्द कर दिया. कोर्ट ने उकसाने की 2 श्रेणियां बताईं. पहली, भावनात्मक और निजी संबंध व पारिवारिक या प्रेम संबंध जिन में अपमान या विवाद आत्महत्या करने को उकसा सकते हैं.

दूसरी श्रेणी औपचारिक संबंधों की जिस में कार्यस्थल पर उच्च स्तर के यानी पुख्ता सुबूत चाहिए कि अभियुक्त ने जानबूझ कर आत्महत्या के लिए उकसाया. अदालत के मुताबिक, आत्महत्या के लिए अभियुक्त का कार्य सीधा और अलार्मिंग होना चाहिए जिस से मृतक के पास कोई विकल्प न बचे. कार्यस्थल पर ऐसे बयान सामान्य तनाव का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन बिना मंशा के अपराध नहीं हैं. इस मामले में भी कोई दूसरे वांछित साक्ष्य नहीं थे, इसलिए अभियुक्त को बरी कर दिया गया.

एक और चर्चित मामला दिल्ली का है जिस में डा. जी के अरोड़ा एक निजी संगठन में ऊंचे पद पर थे. उन्होंने एक निचले कर्मचारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, जिस में नौकरी से निकाला जाना भी शामिल था, की, जिस से कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली. मृतक के परिवारजनों ने आरोप लगाया कि उस के खिलाफ जा मर जा जैसे कठोर शब्द इस्तेमाल किए गए और दबाव बनाया गया जिस से उस ने आत्महत्या कर ली.

इस मामले पर फैसला देते दिल्ली हाईकोर्ट ने अभियुक्तों को बरी करते कहा-

– जा मर जा जैसे बयान या अनुशासनात्मक कार्रवाई यदि नौकरी के सामान्य कर्तव्यों के अंतर्गत की गई हो तो धारा 306 के तहत वह अपराध नहीं बनती.

– प्रशासनिक निर्णय जो बिना दुर्भावना के लिए गए हों, उकसाने के दायरे में नहीं आते.

कितना आसान है उकसाना

कहना मुश्किल नहीं कि आत्महत्या के लिए उकसाना वहीं आसान होता है जहां वह अभियुक्त या अभियुक्तों के साथ रहता हो और आर्थिक व भावनात्मक रूप से पूरी तरह उन पर ही निर्भर हो या फिर मानसिक रूप से कमजोर हो. इस में भी पीडि़त को लगातार शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए और मंशा भी यह हो कि यह मरे तो पिंड छूटे.

लेकिन इस के लिए भी अदालत को सहायक साक्ष्यों की दरकार रहती है, मसलन सुसाइड नोट की स्पष्टता और विश्वसनीयता जो फौरेंसिक जांच में प्रमाणित हुई हो और मोबाइल आदि पर भेजे गए मैसेज. चूंकि अजय कुशवाह के परिजनों के पास ऐसे साक्ष्य होना मुमकिन नहीं दिख रहा है, इसलिए मुश्किल है कि किरण के खिलाफ 306 का आरोप साबित हो पाए वरना तो जिस निकटता का जिक्र जस्टिस अभय एस ओका ने एक फैसले में किया है वह इस में है पर उसे साबित करने के लिए कोई लिखित मैसेज अजय के घर वालों के पास नहीं है. फिर भी देखना दिलचस्प होगा कि नीचे से ऊपर तक की अदालतें क्या फैसले लेती हैं.

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 306 के 25 फीसदी के लगभग मामलों में ही दोषसिद्धि और सजा हो पाती है जिस से लगता है कि यह धारा अपना मूल मकसद खो कर सिकुड़ती जा रही है लेकिन अप्रासंगिक नहीं हुई है. यह कानून ब्रिटिश काल में साल 1860 में भारतीय दंड संहिता के एक हिस्से के रूप में बनाया गया था. 1 जनवरी, 1862 को इसे पूरे ब्रिटिश भारत में लागू किया गया था.

इस धारा को बनाने का बड़ा और अहम मकसद खासतौर से सती प्रथा को रोकना था जिस में विधवाओं को बलात पति की जलती चिता में जल कर मर जाने को मजबूर किया जाता था, हालांकि, यह व्यापक थी कि किसी भी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने पर दोषी और दोषियों को सजा दी जा सके.

इस धारा में उकसाने को इन 3 तरह से परिभाषित किया गया था- पहला था, आत्महत्या में मदद करना जैसे जहर दे देना; दूसरा था, आत्महत्या के लिए योजना बनाना यानी साजिश रचना और तीसरा इन सब से ज्यादा अहम था, जा मर जा जैसे शब्द कह कर आत्महत्या के लिए प्रेरित करना.

अब अच्छी बात यह है कि अदालतें, खासतौर से सुप्रीम कोर्ट, भावनाओं के बजाय साक्ष्यों पर जोर देती हैं जोकि इंसाफ के लिए कानून की जरूरत हैं. Section 306 IPC

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