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Social Issue: धार्मिक कन्फ्यूजन में है जेनजी

Social Issue: पहली वह पीढ़ी है जिसे कई वजहों के चलते धार्मिक माहौल पिछली पीढ़ियों के मुकाबले कम मिला है और उसी अनुपात में साइंस और टैक्नोलौजी का माहौल ज्यादा मिला है लेकिन जहर जहर होता है, उस की मात्रा कम हो या ज्यादा, असर तो करती ही है. यही इस जेनरेशन के साथ हो रहा है कि वह गले में रखे इस यानी धार्मिक जहर को न निगल पा रही है न उगल.

जेनजी पीढ़ी को इस बाबत कोसना बहुत आसान और आम है कि वह धरमकरम को नहीं मानती, पौराणिक मान्यताओं को सहज मान्यता नहीं देती, तीजत्योहार, व्रतझांकियों वगैरह से दूरी बना कर चलती है. यह हालांकि अच्छी बात है कि वह नास्तिक या अनास्थावादी नहीं है लेकिन ईश्वर के अस्तित्व को ले कर फुजूल सवाल खड़े करती है जबकि वह है, इस में किसी को शक नहीं होना चाहिए. भगवान जाने क्या होगा इस जेनरेशन का. आजकल ये और इस तरह के आरोप जेनजी पर लगाने वाले लोगों की कमी नहीं. दरअसल, यह पीढ़ी धर्म और उस से जुड़े अंधविश्वासों व रीतिरिवाजों को मानने या स्वीकारने से पहले उन्हें तर्क के तराजू पर तोलती है जो इस दौर का सब से ‘गंभीर अपराध’ है.

जेनजी पहली वह पीढ़ी है जिसे कई वजहों के चलते धार्मिक माहौल पिछली पीढ़ियों के मुकाबले कम मिला है और उसी अनुपात में साइंस और टैक्नोलौजी का माहौल ज्यादा मिला है लेकिन जहर जहर होता है, उस की मात्रा कम हो या ज्यादा हो, असर तो करती ही है. यही इस जेनरेशन के साथ हो रहा है कि वह गले में रखे इस यानी धार्मिक जहर को न निगल पा रही है और न ही उगल पा रही.

धर्म कुछ तो है, लेकिन है क्यों और उस का न होना जिंदगी पर क्या कोई असर डालता, यह सब से बड़ा कन्फ्यूजन जेनजी का है. दूसरा बड़ा कन्फ्यूजन यह है कि भगवान कहीं हो न हो, ऐसा हो या वैसा हो, उस के कोई खास माने नहीं लेकिन उस के नाम पर मचाया जाते रहने वाला हल्ला क्या साबित करता है और यह हल्ला मचाते रहने वाले मुट्ठीभर लोग किस चालाकी से दुनिया को हांक रहे हैं. ये धर्म के ठेकेदार कैसेकैसे हमारे सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन तक में दखल दे कर जो खलल पैदा करते हैं, इस पर दुनिया खामोश क्यों रहती है.

धर्म बनाम आध्यात्म का कुचक्र

जेनजी कितनी धार्मिक है और कितनी धार्मिक नहीं है, इस पर दुनियाभर में आएदिन सर्वे होते रहते हैं जो यह बताते हैं कि यह जेनरेशन धर्म से परहेज तो कर रही है लेकिन उस के आध्यात्म नाम के कुचक्र से मुक्त नहीं हो पा रही है. इस जेनरेशन का प्रिय नारा है- वी आर स्प्रीचुअल बट नौट रिलीजियस.

इसी साल यूगाव-मिंट सर्वे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 53 फीसदी ही जेनजी युवा मानते हैं कि धर्म महत्त्वपूर्ण है लेकिन निर्णायक नहीं. इस में बतौर निष्कर्ष कहा गया है कि जेनजी मैंटल हैल्थ और जिंदगी की चुनौतियों से निबटने के लिए बजाय धर्म के आध्यात्मिकता को इस्तेमाल कर रही है. लेकिन साथ ही, वह पारंपरिक रीतिरिवाजों से दूरी बना रही है. मसलन, मंदिर जाने और पूजापाठ करने को यह जेनरेशन जिम्मेदारी या मजबूरी नहीं मानती बल्कि अकसर उस शांति के लिए जाती है जिस के सिर्फ धर्म से ही मिलने का बखान धर्मगुरु और पिछली पीढ़ी करती रहती है. यानी, यह कोई श्रद्धा नहीं बल्कि ‘एक बार ट्राई कर के देखने में क्या हर्ज है’ वाली मानसिकता या भ्रम है.

इस बारे में जब भोपाल के कुछ युवाओं से बात की गई तो उन्होंने इस से आंशिक सहमति जताई. 19 वर्षीय अदिति कहती है, ‘मंदिरों में शांति कम अशांति और लूटपाट ज्यादा है. मैं कुछ दिनों पहले ही मम्मीपापा के साथ उज्जैन के महाकाल मंदिर यह सोच कर चली गई थी कि वहां शायद थोड़ा सुकून मिलेगा लेकिन हुआ उलटा. वहां के भीड़भड़क्के और धक्कामुक्की से मन कसैला हो गया और इस से बचने के लिए मैं बिना पेरैंट्स को बताए बाहर आ कर छोटे से होटल पर चाय पीने बैठ गई. तब मुझे महसूस हुआ कि मंदिर से ज्यादा शांति तो इस होटल में है.

‘हां, लेकिन शाम को क्षिप्रा नदी किनारे हम लोग गए तो अच्छा लगा.’ अदिति आगे बताती है, ‘कलकल कर बहता पानी मन मोह रहा था जबकि भीड़ और बेवजह के धार्मिक नारे व शोर नहीं थे. वहां कहीं दानपेटियां भी नहीं थीं और गद्दी लगा कर बैठे पंडे भी नहीं थे जो जबरन माथे पर तिलकत्रिशूल लगा कर पैसे वसूलते हैं. तब, मुझे लगा कि शांति की तलाश में बजाय मंदिरों के समुद्र किनारे, पहाड़ों पर या जंगलों में जाना चाहिए.

20 वर्षीय युवराज की मानें तो मैं ने कई छोटे मंदिरों सहित कुछ बड़े मंदिर भी देखे हैं मसलन शिर्डी और तिरुपति के वहां हम जैसे युवाओं के लिए कुछ खास नहीं है. वहां जा कर हमें यह सबक नहीं मिलता कि आगे की जिंदगी की कैरियर की लड़ाई हमें कैसे लड़ना है. इन दोनों मंदिरों में ऐसा कोई कौर्नर तक मुझे नहीं मिला जहां मैं शांति से बैठ कर इन मसलों पर कुछ सोच सकूं और न ही वहां कोई यह सब बताने वाला होता है. चूंकि पापा की जिद थी, इसलिए जाना पड़ा. मेरी समझ में यह भी नहीं आया कि कालोनी के छोटे और इन बड़े मंदिरों में फर्क क्या. भगवान अगर है तो उसे दोनों जगह बराबरी से होना चाहिए और जहां नहीं है वहां जाने से फायदा क्या.

पेरैंट्स बनाते हैं प्रैशर

जाहिर है पेरैंट्स का दबाव जेनजी को धर्मस्थलों पर ले जा रहा है जिस का घोषितअघोषित मकसद उन का कैरियर या भविष्य बनाना या किसी मनोवैज्ञानिक या मैंटर से काउंसलिंग करवाना नहीं बल्कि उस के खलबलाते दिमाग में धर्म की अफीम इंजैक्ट करना है जिस से वह अनास्थावादी न हो जाए बल्कि उन की ही तरह रूढ़ि और भाग्यवादी ही रहे. सीधे तौर पर कहा जाए तो पेरैंट्स, जो धर्मगुरुओं और धर्मस्थलों पर जिंदगीभर लुटतेपिटते रहे हैं, की मंशा, जो मूलतया डर है, धार्मिक दुकानदारों, पंडोंपुरोहितों के लिए एक नया ग्राहक तैयार कर देना होती है क्योंकि आर्थिक रूप से वे उन भक्तों पर ही तो निर्भर होते हैं.

बचपन से ही अभिभावक बच्चों को धर्म के अंधे कुएं में धकेल देते हैं जबकि होना यह चाहिए कि वयस्क होने पर ही धर्म को चुनने न चुनने की आजादी या सहूलियत मिले वरना धार्मिक कन्फ्यूजन युवाओं को गुमराह ही करते रहेंगे जिस का बड़ा नुकसान उन्हें कुंठा की शक्ल में उठाना पड़ेगा. श्राद्ध के दिनों में पूर्वज किस तरीके से धरती पर दिया खाना ऊपर आसमान में खा लेते हैं, यह हर बच्चा सोचता है लेकिन पेरैंट्स के पास उन की इस और ऐसी सैकड़ों जिज्ञासाओं का कोई समाधान नहीं होता. वजह, ये अंधभक्त खुद ही पीढ़ियों से भेड़चाल चल रहे हैं.

यही हाल स्कूलों का है. प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को धर्म के किस्सेकहानी पढ़ाए जा रहे हैं. एनसीईरटी की 7वीं जमात में महाभारत की कहानियां पढ़ाया जाना बच्चे को वैज्ञानिक नहीं बल्कि अतार्तिक बनाने वाली बात है. सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के स्कूली बच्चों को धार्मिक पर्यावरण यानी शिक्षा के नाम पर रामायण और महाभारत की कहानियां रटाई जा रही हैं जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 28 का उल्लंघन है जो यह कहता है कि सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा या उपासनाओं का प्रावधान नहीं किया जा सकता.

भाजपाशासित राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, असम के स्कूलों के भी यही हाल हैं. लेकिन केरल जैसा कम्युनिस्ट राज्य भी स्कूली बच्चों को धर्म परोसने की बीमारी से मुक्त नहीं हैं जहां अरबी भाषा को सिलेबस में शामिल कर अप्रत्यक्ष रूप से इसलामिक तालीम दी जा रही है. प्रसंगवश यह दिलचस्प बात है कि मदरसे तो धार्मिक शिक्षा के अड्डे हैं ही लेकिन हिंदीभाषी राज्यों के सरकारी स्कूलों को ही हिंदू मदरसे बनाने की साजिश जोरों पर हैं. ऐसे में यह उम्मीद करना बेकार की बात है कि धर्म के इन अर्धधार्मिक अड्डों की जेनजी पीढ़ी कोई वैज्ञानिक, इंजीनियर या फिर डाक्टर बन कर निकलेगी वहां से तो कांवडिए और जमाती ही निकलेंगे.

और, जो बच्चे जैसेतैसे और अपने दम पर स्नातक स्तर तक पहुंच भी जाएंगे, उन्हें घेरने के लिए कालेज लैवल पर भी जाल बिछाया जा रहा है. इसे एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है. बीती 18 सितंबर को देशभर के कोई 900 गणितज्ञों व रिसर्च स्कौलर्स ने यूजीसी से स्नातक गणित का ड्राफ्ट वापस लेने को कहा था. इन लोगों ने आगाह किया है कि इस ड्राफ्ट में गणित संबंधी तो कमियां और खामियां हैं ही लेकिन प्रस्तावित सिलेबस में काल गणना यानी पंचांग (जिस में शादीविवाह, मुंडन और गृहप्रवेश जैसे विभिन्न तरह के मुहूर्त निकाले जाते हैं), भारतीय बीज गणित, पुराणों का महत्त्व, नारद पुराण में पाई जाने वाली अंकगणित और ज्यामिति से जुड़ी विधाओं को शामिल किया गया है, इन्हें हटाया जाना चाहिए.

यूजीसी इस पर क्या फैसला लेता है, यह देखना दिलचस्प होगा और अगर भगवा सरकार के दबाव में पोंगापंथ वाला पाठ्यक्रम वापस नहीं लेता है तो सहज समझा जा सकता है कि कालेजों से इंजीनियर नहीं बल्कि पंडेपुजारी निकलेंगे. दक्षिणपंथियों के शिकंजे में छटपटा रहे देश में ऐसी पढ़ाई हैरत की नहीं बल्कि चिंता की बात है जिन के नेतृत्व की सरकार के रक्षामंत्री फ्रांस जा कर राफेल के पहियों के नीचे नारियल रखते हैं और उस पर नीबू मिर्चीटांगने का टोटका करते हैं.

आध्यात्मिकता हल नहीं

एमटीवी यूथ स्टडी के मुताबिक 62 फीसदी जेनजी मानते हैं कि आध्यामिकता उन्हें जिंदगी में स्पष्टता और आत्मविश्वास देती है. जबकि, धार्मिक रीतिरिवाज पुराने और बंदिशें थोपने वाले होते हैं. प्यू रिसर्च के एक सर्वे की मानें तो जेनजी पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं या स्थलों, जिन्हें धार्मिक अड्डे कहना ज्यादा बेहतर होगा, को जजमैंटल और पौलिटिकल मानती है. इस सर्वे के मुताबिक 40 फीसदी जेनजी युवा धार्मिक रूप से नन्स यानी असम्बद्ध हैं खासतौर से युवतियां जिन की तादाद 35 फीसदी युवकों के मुकाबले 45 फीसदी है.

यह हाल अकेले भारत का नहीं बल्कि पूरी दुनिया का है. प्यू रिसर्च की ही फरवरी 2025 में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 65 फीसदी जेनजी खुद को आध्यात्मिक मानती है.

चर्चों की दैनिक प्रार्थनाओं में जेनजी की भागीदारी कम हो रही है लेकिन आध्यात्मिक प्रथाओं मसलन प्रकृति से उन का जुडाव बढ़ रहा है. यानी, अमेरिकी जेनजी युवा भी मानते हैं कि उन की जिज्ञासाओं का समाधान चर्चों से नहीं मिलना और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए वही रास्ता उपयुक्त है जो युवराज और अदिति जैसे युवा बताते हैं.

पूरी दुनिया के युवा परंपरागत और संस्थागत धर्म छोड़ कर आध्यात्म की तरफ झुक रहे हैं तो यह तात्कालिक तौर पर ही राहत देने वाली बात लगती है क्योंकि आध्यात्म पर भी छद्म धर्मगुरुओं का ही कब्जा है. खुद को आध्यात्मिक गुरु कहने वाले ये लोग धर्मगुरुओं जितने चालाक और धूर्त भले ही न हों लेकिन हैं तो दुकानदार ही. भारत में जग्गी वासुदेव और श्रीश्री रविशंकर और एक हद तक रामदेव ऐसे ही दुकानदार हैं जो युवाओं को धर्म से इतर रास्तों मसलन ध्यान, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद और पर्यावरण वगैरह पर चल कर शांति की बात करते हैं. इस खेप के काफी पहले यह काम महर्षि महेश योगी परमहंस योगानंद जैसे गुरु किया करते रहते थे.

आध्यात्मिकता जेनजी के धार्मिक असमंजस का पूरा हल नहीं है क्योंकि इस में बजाय सीधे धार्मिक पाखंड, पोंगापंथ के बदले- मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा, दुनिया क्या है, आत्मा परमात्मा क्या है और मृत्यु के बाद क्या होता है- जैसे सवालजवाब हैं जो एक उम्र के बाद आदमी को धर्म की तरफ मुड़ने को मजबूर कर देते हैं कि इन सवालों के जवाब या इन जिज्ञासाओं का समाधान गीता, कुरान और बाइबिल आदि में है.

अब यह जेनजी युवाओं की खुद की जिम्मेदारी है कि वे इस चक्कर में ही न पड़ें और सीधे तौर पर मान लें कि शरीर एक मशीन है जो धर्म से नहीं बल्कि विज्ञान से संचालित होती है. यह दुनिया किसी अल्लाह, गौड या भगवान की नहीं बल्कि खुद आदमी की बनाई हुई है. सृष्टि के इस विकास क्रम को तार्किक तरीके से सरिता के सितंबर (प्रथम) 2025 अंक में ‘सृष्टि की शुरुआत – धर्म ने बहकाया साइंस ने बताया’ शीर्षक से समझाया भी गया है. Social Issue

Religion and Caste: धर्म और जाति के नाम दोस्ती को ठुकराती लड़कियां

Religion and Caste: भारतीय समाज में कास्ट को ले कर अलगाव हमेशा से रहा है. अमीरीगरीबी भी जाति पर बेस्ड रही है. ऊंची जाति का मतलब जमीनजायदाद वाला और नीची जाति का मतलब दीनहीन व गरीब. ऐसी जातिगत व्यवस्था में लड़कियों को हमेशा छिपाने की वस्तु बनाए रखा गया. घर की लड़कियों का दूसरी जाति से किसी भी प्रकार का संपर्क वर्जित था. लड़कियों को बचपन से ही धार्मिक नियमों में बांध दिया जाता. व्रत, त्योहार, पूजा, परंपराएं और संस्कार आदि सब लड़कियों के लिए ही थे.

पिछले कुछ दशकों में लड़कियों को इतनी आजादी मिली है कि वे स्कूल, कालेज और नौकरियों तक पहुंच रही हैं. लड़कियां समाज से बाहर निकल कर आधुनिक दुनिया का हिस्सा बन रही हैं और पुरुषों की बनाई घेराबंदियों को लांघ रही हैं लेकिन धर्म और जाति के एलिमैंट्स आज भी उन से चिपके हुए हैं. प्राइमरी स्कूल तक लड़कियों में जातिधर्म को ले कर ज्यादा जुड़ाव नहीं देखा जाता. सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली ज्यादातर लड़कियां एक ही सामाजिक और आर्थिक परिवेश से आती हैं.

ये लड़कियां प्राइमरी शिक्षा तक दोस्ती को धर्म और जाति से ऊपर रखती हैं. एकसाथ स्कूल आने, साथ खेलने, गपें करने और एकदूजे की परवा करने की आदतें लड़कियों के स्वाभाविक गुणों में शामिल होती हैं लेकिन यही लड़कियां जैसेजैसे बड़ी होती हैं, बड़ी क्लासों में पहुंचती हैं तो इन की दोस्ती पर धर्म और जाति हावी होने लगती है. यही लड़कियां कालेज और नौकरियों तक पहुंचतेपहुंचते विशुद्ध धार्मिक या जातिवादी हो जाती हैं. आखिर क्या वजह है कि आज की मौडर्न लड़कियां भी जातिवाद और धार्मिक मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पा रही हैं?

पुष्पा तिवारी जब 6ठी कक्षा में थी तब निगार कुरैशी उस की सब से अच्छी दोस्तों में से एक थी. 10वीं कक्षा तक दोनों की दोस्ती बनी रही लेकिन 11वीं के दौरान निगार और पुष्पा की दोस्ती के बीच दोनों का धर्म बाधा बनने लगा. पुष्पा माथे पर हलका चंदन लगाने लगी तो निगार भी अपने सिर को काले कपड़े से ढक कर स्कूल आने लगी. पुष्पा के घर में दिनरात न्यूज़ पर जो खबरें दिखाई जातीं. उस से पुष्पा की विचारधारा भी बदलने लगी थी. उस की विचारधारा जब कुलांचे मारती तो वह कक्षा में पहुंच कर निगार पर अपनी भड़ास निकाल लेती. एक दिन लंच के दौरान पुष्पा ने निगार के साथ स्कूल के पार्क में जाने से इनकार कर दिया और बोली, ‘देश की आजादी के वक़्त धर्म के नाम पर बंटवारा हुआ था तब सारे मुसलमान पाकिस्तान क्यों नहीं गए?’ पुष्पा के इस सवाल पर निगार कुछ नहीं बोली और वो फिर कभी स्कूल नहीं आई.

लड़कियों में इस तरह का अलगाव सिर्फ धर्म को ले कर ही पैदा नहीं होता बल्कि जाति को ले कर भी उन में श्रेष्टता या हीनता का भाव पैदा होने लगता है. सरकारी स्कूलों में ज्यादातर लड़कियां ओबीसी और दलित समाज से आती हैं. यहां शुरुआती कक्षाओं में ओबीसी लड़कियों की दलित लड़कियों से खासी दोस्ती हो जाती है मगर जैसेजैसे उम्र और कक्षा बढ़ती है वैसेवैसे दोस्ती पर जाति का फैक्टर हावी होने लगता है.

ओबीसी लड़कियां दलित लड़कियों से दूरी बना लेती हैं. गांवकसबों के सरकारी स्कूलों में अपर कास्ट की लड़कियां भी पहुंचती हैं और ये अपर कास्ट लड़कियां जब बड़ी कक्षाओं तक पहुंचती हैं तब ओबीसी और दलित लड़कियों से अपनी दोस्ती खत्म कर लेती हैं. जो लड़कियां प्राइमरी स्कूल में दूसरी लड़कियों को अपने जैसा समझती हैं वही लड़कियां हायर एजुकेशन तक पहुंचतेपहुंचते घोर धार्मिक या घोर जातिवादी हो जाती हैं और धर्म व जाति के चलते अच्छे दोस्त खो देती हैं.

लड़कियों को यह बात समझनी होगी कि हायर एजुकेशन तक पहुंचना उन के लिए एक जंग जीतने के बराबर है. धर्म और जाति की मानसिकता को तोड़ कर ही वो हायर एजुकेशन तक पहुंच पाती हैं. ऐसे में लड़कियों के लिए धर्म और जाति को दरकिनार कर अच्छे दोस्तों का साथ बनाए रखना बेहद जरूरी है.

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफौर्मेशन सिस्टम फौर एजुकेशन और औल इंडिया सर्वे औन हायर एजुकेशन के 2021-22 से 2023-24 तक के आंकड़ों के अनुसार लड़कियों की प्राइमरी कक्षा में नामांकन दर 100 फीसदी से अधिक है जो राइट टू एजुकेशन एक्ट (2009) की सफलता को दर्शाता है लेकिन इन 100 लड़कियों में से लगभग 80 ही माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 9-10) तक पहुंच पाती हैं और उच्चतर शिक्षा (कालेज स्तर) तक पहुंचने वाली लड़कियों का अनुपात मात्र 28 फीसदी रह जाता है. प्राइमरी से जौब तक मात्र 10 से 12 फीसदी लड़कियां ही पहुंच पाती हैं.

ये आंकड़े पिछले दशकों के मुकाबले काफी बेहतर हुए हैं, फिर भी यह लड़कियों के प्रति समाज की मानसिकता को दर्शाने के लिए काफ़ी है. लड़कियों के मामले में समाज अभी भी ज्यादा नहीं बदला है. आज भी धर्म और जाति के नाम पर लड़कियों की औनर किलिंग की जाती है. धर्म और जाति कभी भी लड़कियों के पक्ष में नहीं रहे. यह वो बेड़िया हैं जिन के जरिए सदियों तक औरतों को गुलाम बनाए रखा गया. आज की लड़कियां अगर स्कूल, कालेज और नौकरियों तक पहुंच रही हैं और हर क्षेत्र में मर्दों को चुनौती दे रही हैं तो यह तभी संभव हो पा रहा है जब धर्म और जाति की बेड़ियों को संविधान ने कमजोर किया है.

औरतों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता, आजादी और नौकरी संविधान की बदौलत है. यह बात हर उस लड़की को समझनी चाहिए जो शिक्षित हो कर भी धर्म और जाति की मानसिकता से उबर नहीं पाई है.

औरतों की आजादी के रास्ते में एजुकेशन पहली सीढ़ी है. शिक्षा के जरिए ही लड़कियां गुलामी के बंधनों से मुक्त हो सकती हैं. ऐसे में लड़कियों को अपनी धार्मिक और जाति के झूठे संस्कारों को छोड़ना होगा लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है. लड़कियां शिक्षा की ओर जितनी सीढ़ियां चढ़ती हैं, परिवार और सामाजिक परिवेश लड़कियों से उतना ही भयभीत होता है. सो, उन की उम्र और कक्षा के साथ ही धर्म संस्कारों की बेड़ियां कसता जाता है. इन अदृश्य बेड़ियों को लड़कियां देख ही नहीं पातीं और फंसती चली जाती हैं.

शिक्षा व्यवस्था भी लड़कियों को साक्षर और डिग्रीधारी बनाए रखने के अलावा कुछ नहीं करता. लड़कियां समझदार हो गईं तो इस का सब से बड़ा नुकसान धर्म की दुकानदारी करने वाले लोगों को होगा, इसलिए धर्म के ठेकेदार समझदार लड़कियों को पसंद नहीं करते. शिक्षा व्यवस्था को चलाने वाले लोग कैसे धार्मिक व्यवस्था को ही मजबूत करते हैं, इस कहानी से आप को यह बात समझ आ जाएगी-

क्लास में आते ही नए टीचर ने बच्चों को अपना लंबाचौड़ा परिचय दिया. बातों ही बातों में उस ने जान लिया कि लड़कियों के इस क्लास में सब से तेज और सब से आगे कौन सी लड़की है? टीचर ने खामोश सी बैठी उस लड़की से पूछा, “बेटा, आप का नाम क्या है?” लड़की खड़ी हुई और बोली, “जी सर, मेरा नाम है जूही.” टीचर ने आगे पूछा, “पूरा नाम बताओ, बेटा.” जैसे उस लड़की ने नाम मे कुछ छिपा रखा हो. लड़की ने कहा, “जी सर, मेरा पूरा नाम जूही ही है.” टीचर ने सवाल बदल दिया और पूछा, “पापा का नाम बताओ?” लड़की ने जवाब दिया, “जी सर, मेरे पापा का नाम है शमशेर.” टीचर ने फिर पूछा, “अपने पापा का पूरा नाम बताओ?” लड़की ने जवाब दिया, “मेरे पापा का पूरा नाम शमशेर ही है, सरजी.”

अब टीचर ने कुछ सोच कर बोला, “अच्छा, अपनी मां का पूरा नाम बताओ.” लड़की ने जवाब दिया, “सरजी, मेरी मां का पूरा नाम है निशा.” टीचर के पसीने छूट चुके थे क्योंकि अब तक वो उस लड़की की फैमिली के पूरे बायोडाटा में जो एक चीज ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था वो उसे नहीं मिला था. टीचर ने आखिरी पैंतरा आजमाया और बोला, “अच्छा, तुम कितने भाईबहन हो?” टीचर ने सोचा कि जो चीज वो ढूंढ़ रहा है, शायद इस के भाईबहनों के नाम में वो क्लू मिल जाए. लड़की ने टीचर के इस सवाल का भी बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, बोली, “सर जी, मैं अकेली हूं. मेरा कोई भाईबहन नहीं है.”

अब टीचर ने सीधा और निर्णायक सवाल पूछा, “बेटे, तुम्हारा धर्म क्या है?” लड़की ने इस सीधे से सवाल का भी सीधा सा जवाब दिया, बोली, “सर, मैं एक विद्यार्थी हूं और ज्ञान प्राप्त करना ही मेरा धर्म है और मुझे पता है कि अब आप मेरे पेरैंट्स का धर्म पूछोगे तो मैं आप को बता दूं कि मेरे पापा का धर्म है मुझे पढ़ाना और मेरी मम्मी की जरूरतों को पूरा करना और मेरी मम्मी का धर्म है मेरी देखभाल करना और मेरे पापा की जरूरतों को पूरा करना.”

लड़की का जवाब सुन कर टीचर के होश उड़ गए. उस ने टेबल पर रखे पानी के गिलास की ओर देखा, लेकिन, उसे उठा कर पीना भूल गया, तभी लड़की की आवाज एक बार फिर उस के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजी, “सर, मैं विज्ञान की छात्रा हूं और एक साइंटिस्ट बनना चाहती हूं. जब अपनी पढ़ाई पूरी कर लुंगी और अपने मांबाप के सपनों को पूरा कर लूंगी तब कभी फुरसत में सभी धर्मों के अध्ययन में जुटूंगी और जो भी धर्म विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरेगा उसे अपना लूंगी लेकिन अगर धर्मग्रंथों के उन पन्नों में एक भी बात विज्ञान के विरुद्ध हुई तो मैं उस पूरी पवित्र किताब को अपवित्र समझूंगी और उसे कूड़े के ढेर में फेंक दूंगी क्योंकि साइंस कहता है, एक गिलास दूध में अगर एक बूंद भी जहर मिली हो तो पूरा का पूरा दूध ही बेकार हो जाता है.”

लड़की की बात खत्म होते ही पूरा क्लास साथी लड़कियों की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. टीचर के पसीने छूट चुके थे, तालियों की गूंज उस के कानों में गोलियों की गड़गड़ाहट की तरह सुनाई दे रही थी. टीचर ने आंखों पर लगे धर्म के मोटे चश्मे को उतार कर कुछ देर के लिए टेबल पर रख दिया और पानी का गिलास उठा कर एक ही सांस में गटक लिया. थोड़ी हिम्मत जुटा कर लड़की से बिना नजर मिलाए ही बोला, “बेटा, आई प्राउड औफ़ यू.”

गर्ल स्टूडैंट की सोच व बोल ने वातावरण को खूबसूरत बना दिया था. Religion and Caste

Emotional Story : सूनी मांग का दर्द

Emotional Story : कि तने बरसों बाद आज किसी ने उस के नाम की टेर मांगी थी. उस के हाथ आटे से सने हुए थे इसलिए वहीं से उस ने नौकरानी को आवाज दी, ‘‘चम्पा, देख कौन आया है.’’

थोड़ी ही देर में चंपा उस के पास आ कर बोली, ‘‘बाईजी, कोई तरुण आए हैं.’’

‘‘तरुण….’’ वह हतप्रभ रह गई. शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. उस ने फिर पूछा, ‘‘तरुण कि अरुण…’’

‘‘कुछ ऐसा ही नाम बताया बाईजी.’’

वह ‘उफ’ कर रह गई. लंबी आह भर कर उस ने सोचा, बड़ा अंतर है तरुण व अरुण में. एक वह जो उस के रोमरोम में समाया हुआ है और दूसरा वह जो बिलकुल अनजान है….फिर सोचा, अरुण ही होगा. तरुण नाम का कोई व्यक्ति तो उसे जानता ही नहीं. यह खयाल आते ही उस का रोमरोम पुलकित हो उठा. तुरंत हाथ धो कर वह दौड़ती हुई बाहर पहुंची, देखा तो अरुण नहीं था.

‘‘आप अर्पणा हैं न?’’ आने वाले पुरुष के शब्द उस के कानों में पडे़.

‘‘जी…’’

‘‘मैं अरुण का दोस्त हूं तरुण.’’

मन में तो उस के आया, कह दे कि तुम ने ऐसा नाम क्यों रखा, जिस से अरुण का भ्रम हो लेकिन प्रत्यक्ष में होंठों पर मुसकराहट बिखेरते हुए बोली, ‘‘आइए, अंदर बैठिए…चाय तो लेंगे,’’ और बिना उस के जवाब की प्रतीक्षा किए अंदर चली गई.

चाय की केतली गैस पर रखी तो यादों का उफान फिर उफन गया. कैसा होगा अरुण….उसे याद करता भी है…जरूर करता होगा, तभी तो उस ने अपने दोस्त को भेजा है. कोई खबर तो लाया ही होगा…तभी चाय उफन गई. उस ने जल्दी गैस बंद की और चाय ले कर बैठक में आ गई.

‘‘आप ने व्यर्थ कष्ट किया. मैं तो चाय पी कर आया था.’’

‘‘कष्ट कैसा, आप पहली बार तो मेरे घर आए हैं.’’

तरुण चुपचाप चाय की चुस्कियां भरने लगा. उस की खामोशी अपर्णा को अंदर से बेचैन कर रही थी कि कुछ बताए भी…कैसा है अरुण? कहां है? कैसे आना हुआ?

यही हाल तरुण का था, बोलने को बहुत कुछ था लेकिन बात कहां से शुरू की जाए, तरुण कुछ सोच नहीं पा रहा था. आखिर अपर्णा ने ही खामेशी तोड़ी, ‘‘अरुण कैसे हैं? ’’

‘‘उस का एक्सीडेंट हो गया है….’’

‘‘क्या?’’ अपर्णा की चीख ही निकल गई.

‘‘अभी 2 हफ्ते पहले वह फैक्टरी से घर जा रहा था कि अचानक उस की कार के सामने एक बच्चा आ गया. बच्चे को बचाने के लिए उस ने जैसे ही कार दाईं ओर मोड़ी कि उधर से आते ट्रक से एक्सीडेंट हो गया.’’

‘‘ज्यादा चोट तो नहीं आई?’’

‘‘बड़ा भयंकर एक्सीडेंट था. उसे देख कर रोंगटे खडे़ हो गए थे. ट्रक से टकरा कर कार नीचे खड्डे में जा गिरी थी. पेट में गहरा घाव है. सिर किसी तरह बच गया पर अभी भी बेहोशी छाई रहती है.’’

‘‘मुझे खबर नहीं दी?’’

‘‘खबर कौन देता? अरुण के डैडी को आप के नाम से चिढ़ है. अरुण पर उन्होंने कितनी बंदिशें नहीं लगाईं, कितनी डांट उसे नहीं पिलाई, फिर भी वह आप को नहीं भुला सका. रातरात भर आप की याद में तड़पता रहा. आप को तो पता ही होगा कि ठाकुर साहब अरुण की शादी टीकमगढ़ के राजघराने में करना चाहते थे. बात भी तय हो गई थी लेकिन अरुण ने साफ मना कर दिया. ठाकुर साहब का पारा चढ़ गया. उन्होंने छड़ी उठा ली और उसे भयंकर ढंग से पीटा लेकिन उस ने ‘उफ’ तक न की.

‘‘यह देख कर भी ठाकुर साहब अपनी जिद पर अटल रहे. लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि बेटे की शादी उस की मरजी से कर दें लेकिन वे सहमत नहीं हुए और एक दिन उन्होंने यहां तक कह दिया कि अरुण ने उन की मरजी के बगैर शादी की तो वे अपने आप को गोली मार लेंगे.

‘‘अरुण इस बात से डर गया. वह आप को खत भी न लिख सका क्योंकि वह जानता था कि डैडी अपने वचन के पक्के हैं. यदि ऐसा हो गया तो वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. दिन ब दिन उस की हालत पतली होती गई. वह आप के गम में आंसू बहाता रहा. उस दिन अस्पताल में अचेतावस्था में उस के होंठों पर जब मैं ने आप का नाम सुना तो मुझे लगा कि आप ही उसे मौत के मुंह से बचा सकती हैं. मेरे दोस्त को बचा लीजिए,’’ इतना कहते ही उस का गला रुंध गया. आंखें छलछला आईं.

इस दुखद वृत्तांत ने अपर्णा का अंतस बेध दिया. वह गहरीगहरी सांसें भरने लगी. मन में धुंधली यादें ताजा हो आईं, अतीत कचोट गया. किन कठिन परिस्थितियों में उसे घर छोड़ना पड़ा, रिश्तेदारों से नाता तोड़ना पड़ा और परिचितों, सहेलियों से मुख मोड़ना पड़ा. कहांकहां नहीं भटकी वह, लेकिन अरुण की याद भुला न सकी. प्रेम का दीपक उस के अंदर सदैव जलता रहा और आज वह उस से अलग होना चाहता है, नहीं वह ऐसा कभी भी नहीं होने देगी. यदि उसे अपने जीवन की कुरबानी भी देनी पडे़ तो वह देगी. बेशक, उस की शादी अरुण से नहीं हो सकी, लेकिन उस के नाम के साथ उस का नाम जुड़ा तो है. यह सोचते ही उस की आंखें छलछला आईं.

तभी खामोशी को तोड़ता हुआ तरुण बोला, ‘‘अच्छा अपर्णाजी, चलता हूं. आज ही शाम को छतरपुर जाना है, आप तैयार रहिएगा.’’

वह चुप ही रही…‘हां’, ‘न’ उस के मुख से कुछ नहीं निकल सका और तरुण हवा के तेज झोंके सा बाहर निकल गया. अतीत की परछाइयों ने फिर उसे समेट लिया. एकएक लम्हा उसे कुरेदता गया.

कालिज के दिनों में उस का साथ अरुण से हुआ था. अरुण उस की कक्षा का मेधावी छात्र था. दोनों की सीट पासपास थीं इसलिए उन में अकसर किसी विषय पर बहस हो जाया करती थी. अरुण के तर्क इतने सटीक होते थे कि वह परास्त हो जाती. हार की पीड़ा उस के अंदर छटपटाती रहती. वह पूरी कोशिश कर मंजे तर्क उस के सामने रखती, लेकिन वह उतनी ही कुशलता से उस के तर्क काट देता. तर्कवितर्क का यह सिलसिला प्रेम में परिणीत हो गया. दोनों घंटों बातों में मशगूल रहते और अपने प्रेम के इंद्रधनुषी पुल बनाते. कालिज के कैंपस से ले कर चौकचौराहों तक यह प्रेमजोड़ी चर्चित हो गई.

अपर्णा के पिता हरिशंकर उपाध्याय धार्मिक विचारों के थे, वे अध्यापक थे. उन के एक ही संतान थी अपर्णा और उसे वह उच्च से उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे, लेकिन बेटी के जमाने के साथ बदलते रंगों ने उन्हें तोड़ कर रख दिया. उन्होंने अपर्णा को समझाते हुए कहा, ‘बेटी अपनी सीमा में रहो, जैसे इस परिवार की लड़कियां रही हैं. तुम्हारा इस तरह ठाकुर के लड़के के साथ घूमना मुझे बिलकुल पसंद नहीं.’

‘पिताजी, मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’ अपर्णा ने जवाब दिया.

‘चुप नादान, तेरा रिश्ता उस से कैसे हो सकता है? वह क्षत्रिय है, हम ब्राह्मण हैं.’

‘लेकिन पिताजी, वह मुझ से शादी करने को तैयार है.’

‘उस के मानने से क्या होगा? जब तक कि उस के परिवार वाले न मानें. वह बहुत बडे़ आदमी हैं बेटी, उन्हें यह रिश्ता कभी मंजूर नहीं होगा.’

‘तब हम कोर्ट में शादी कर लेंगे.’

‘चुप बेशर्म,’ वह गुस्से से आगबबूला हो गए, ‘जा, चली जा मेरी आंखों के सामने से, वरना…. ’

यही हाल अरुण का था. जब उस के डैडी सूर्यभान सिंह को इस बात का पता चला तो वे क्रोध से पागल हो गए. यह उन के लिए बरदाश्त से बाहर था कि उन का लड़का एक मामूली पंडित की लड़की से प्यार करे. उन्होंने पहले अरुण को बहुत समझाया लेकिन जब उन की बात का उस पर कुछ असर नहीं हुआ तो उन्होंने दूसरा गंभीर उपाय सोचा.

वह सीधे हरिशंकर उपाध्याय के पास पहुंचे जो उस समय बरामदे में बैठे स्कूल का कुछ काम कर रहे थे. ठाकुर साहब को देखते ही वह हाथ जोड़ कर खडे़ हो गए.

‘हां, तो पंडित हरिशंकर, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’ अपनी जोरदार आवाज में ठाकुर साहब ने कहा.

‘बहुत ख्वाब देखने लगे हो तुम.’

‘जी ठाकुर साहब, मैं समझा नहीं.’

‘अच्छा, तो तुम्हें यह भी बताना पडे़गा. जिस बात को पूरा कसबा जानता है उस से तू कैसे अनजान है. देखो पंडित, अपनी लड़की को समझाओ कि वह मेरे बेटे से मिलना छोड़ दे वरना मैं तुम बापबेटी का वह हाल करूंगा जिस की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते हो.’

‘ठाकुर साहब, यह क्या कह रहे हैं आप….मैं आज ही उस की खबर लेता हूं. माफ करें….माफ करें.’

ठाकुर साहब के कडे़ प्रतिबंध के बाद भी अरुण अपर्णा से छुटपुट मुलाकात करने में सफल हो जाता जिस की भनक किसी न किसी तरह ठाकुर सूर्यभान को लग ही जाती और वे गुस्से से भिनभिना उठते. उन्होंने दूसरा उपाय सोचा, क्यों न हरिशंकर का तबादला छतरपुर से कहीं और करा दिया जाए. और यह कार्य वहां के विधायक से कह कर करवा दिया. इधर पंडित हरिशंकर घबरा गए थे. तबादले का जैसे ही उन्हें आदेश मिला फौरन छतरपुर छोड़ दतिया आ गए. अपर्णा को भी पिताजी के साथ आना पड़ा. वह दिन अपर्णा के जीवन का सब से बोझिल दिन था, जब बिना अरुण से मिले उसे दतिया आना पड़ा. जुदाई के सौसौ तीर उस के दिल में चुभ गए थे. अरुण का घर से निकलना बंद था. वह जातेजाते एक बार मिल लेना चाहती थी. लेकिन उस की हर कोशिश नाकाम हुई. एक यही दुख उसे लगातार पूरी यात्रा सालता रहा.

पिताजी के साथ अपर्णा चली तो आई लेकिन अरुण को भुला न सकी. दतिया आए अब 1 साल हो गया था. उस दौरान अरुण की उसे कोई खबर नहीं मिली. पढ़ाई भी उस की बंद हो गई. पिताजी को उस की शादी करने की जल्दी थी. मास्टर हरिशंकर ने एक अच्छा घर देख कर अपर्णा की सगाई बिना उस से पूछे ही कर दी. यह पता चलते ही उस ने शादी करने से इनकार कर दिया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ अरुण से. यह सुन कर पिताजी उस पर बरस पडे़, ‘‘तेरी ही वजह से मुझे छतरपुर छोड़ कर दतिया आना पड़ा है फिर भी तू अरुण के नाम की माला जप रही है. कितना सताएगी मुझे. भला इसी में है कि तू घर छोड़ कर कहीं निकल जा.’’

‘ऐसा मत कहिए पिताजी, अपर्णा गिड़गिड़ा पड़ी, समझने की कोशिश कीजिए.’

‘मुझे कुछ नहीं समझना. अगर तू यहां से नहीं जाएगी तो मैं ही चला जाता हूं, ले रह तू यहां….’

आखिर दिल के हाथों मजबूर हो कर अपर्णा ने वह घर त्याग दिया और अपनी सहेली नीता के पास भिंड चली आई. नीता की मदद से उसे भिंड में नौकरी मिल गई. खानेपीने का जरिया हो गया. किराए पर मकान ले लिया. इसी बीच उस के पास शादी के कई प्रस्ताव आए लेकिन उस ने सब को ठुकरा दिया.

वह दिन याद आते ही उस की आंखें डबडबा आईं, ‘‘समाज की यह कैसी रूढि़यां हैं कि आदमी अपना मनपसंद साथी भी नहीं ढूंढ़ सकता? वंश परिवार की परंपराएं उस पर थोप दी जाती हैं. वहां आदमी टूटेगा नहीं तो क्या जुडे़गा?’’

आज अरुण की दुर्घटना की खबर ने उसे बेचैन ही कर दिया. वह नदी के किनारे पड़ी मछली सी फड़फड़ा गई. शाम को जब तरुण आया तो वह जाने को पूरी तरह तैयार बैठी थी, इस समय तक उस ने अपनी मानसिक स्थिति संभाल ली थी.

छतरपुर पहुंचते ही अपर्णा सीधे अस्पताल पहुंची. एक वार्ड में अरुण बेड पर मूर्छित पड़ा था. खून की बोतल लगी थी. हाथपैरों में प्लास्टर बंधा था. दोस्त, परिजन, रिश्तेदार उसे घेर कर खडे़ थे. डाक्टर उपचार में लगा था. उसे समझते देर न लगी कि अभी जरूर कोई गंभीर दौर गुजरा है क्योंकि सभी के चेहरे उदास थे.

ठाकुर सूर्यभान सिंह सिर नीचे झुकाए खडे़ थे. यद्यपि वह एक नजर उस पर डाल चुके थे. आज उसे उन से डर नहीं लगा था. डाक्टर के चेहरे से मायूसी साफ झलक रही थी. सभी की निगाहें उन पर टिक गईं.

‘‘इंजेक्शन दे दिया है. 10 मिनट में होश आ जाना चाहिए,’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘लेकिन डाक्टर साहब, कुछ मिनट होश में रहता है फिर बेहोश हो जाता है,’’ ठाकुर साहब व्यग्रता से बोले.

‘‘देखिए, मैं तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूं. आप मरीज को खुश रखने की कोशिश कीजिए….कोई गहरा आघात पहुंचा है, जिस की याद आते ही उसे बेहोशी छा जाती है. वैसे ंिचंता की बात नहीं. इस रोग पर काबू पाया जा सकता है,’’ इतना कह कर डाक्टर नर्स के साथ चले गए.

मौत सा सन्नाटा छा गया. किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था. तभी तरुण अपर्णा की ओर देख कर बोला, ‘‘आप कोशिश कीजिए, शायद होश आए. एक हफ्ते से यह इसी तरह पड़ा है. होश में आने पर भी किसी से एक शब्द नहीं बोलता.’’

यह सुनते ही अपर्णा निडर हो कर अंदर गई और अरुण के पास पहुंच कर बोली, ‘‘अरुण, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगी, यहीं रहूंगी तुम्हारे पास.’’

‘‘लेकिन तुम ने तो….कोई दूसरा घर बसा लिया….शादी कर ली?’’

‘‘अरुण क्या कहते हो? किस ने कहा तुम से यह….मुझ पर विश्वास नहीं?’’

‘‘विश्वास तो था लेकिन….’’

‘‘कैसी बात करते हो? मैं तुम्हें कैसे समझाऊं? तुम्हारे नाम के अलावा कोई दूसरा नाम मेरे होंठों पर कभी नहीं आया. मेरी आंखों में आंखें डाल कर देखो, सच क्या है तुम्हें पता चल जाएगा,’’ इतना कह कर अपर्णा फूटफूट कर रो पड़ी.

अरुण कुछ क्षण उसे देखता रहा, फिर आह कर उठा. उसे लगा जैसे उस के अंदर हजारों शूल एकसाथ चुभ गए हों.

‘‘अपर्णा….’’ वह गहरी निश्वास भरता हुआ बोला, ‘‘धोखा…विश्वासघात हुआ मेरे साथ…क्या समझ बैठा मैं तुम्हें…सोच भी नहीं सकता, तुम्हारे पिताजी ने यह झूठ मुझ से क्यों बोला?’’

कुछ क्षण अंदर ही अंदर वह सुलगती रही, फिर सोचा इस से तो काम नहीं चलेगा, उसे अगर अरुण को पाना है तो डट कर आगे आना होगा,’’

इस विचार के आते ही वह दृढ़ता से बोली, ‘‘अब मैं यहां से कहीं नहीं जाऊंगी अरुण, तुम्हारे पास रहूंगी. देखती हूं कौन मुझे हटाता है.’’

तभी अरुण के सीने में भयंकर दर्द उठा और वह कराह उठा, उस के हाथपैर मछली से फड़फड़ा गए. लोग डाक्टर को बुलाने दौडे़…अरुण हांफता हुआ बोला, ‘‘बहुत देर हो गई अपर्णा, अब मैं नहीं बचूंगा….मुझे माफ…’’ और यहीं उस के शब्द अटक गए. आंखें खुली रह गईं… चेहरा एक तरफ लुढ़क गया. यह देख अपर्णा की चीख ही निकल गई.

उसे जब होश आया तो देखा ठाकुर साहब और 2-3 लोग उस के पास खडे़ थे. अरुण के शरीर को स्ट्रेचर पर रखा जा रहा था. वह तेजी से स्ट्रेचर की तरफ लपक कर बोली, ‘‘इन्हें मत ले जाओ. मैं भी इन के साथ जाऊंगी.’’

ठाकुर साहब अपर्णा को पकड़ते हुए बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो अपर्णा? पागल हो गई हो…’’

वह शेरनी सी दहाड़ उठी, ‘‘पागल तो आप हैं, इन्हें पागल बना कर मार दिया, अब मुझे पागल बना रहे हैं. मुझे आप की कृपा की जरूरत नहीं ठाकुर सूर्यभान सिंह. आप ने भले ही मुझे अपने घर की बहू नहीं बनने दिया, लेकिन विधवा बनने से आप मुझे नहीं रोक सकते.’’

वह और जोर से सिसक पड़ी, ‘‘काश, मौत कुछ क्षण ठहर जाती तो वह मांग में सिंदूर तो लगा लेती?’’ आज इस स्थिति में, कुछ पोंछने को भी उस के पास नहीं था. सबकुछ पहले से ही सूनासूना था…. Emotional Story

Short Hindi Stories : मिलन

Short Hindi Stories :  प्रांजल और हिमालय दोनों बचपन से ही दोस्त रहे. नौकरी व विवाह के बाद भी उन की निकटता बनी रही. प्रांजल की पत्नी भावना को हिमालय की पत्नी रचना का साथ भी अच्छा लगता. दोनों मित्रों की पत्नियां जबतब बतियाती रहतीं. प्रांजल की दोनों बेटियां मीता व गीता अपनी पढ़ाई लगभग पूरी कर चुकी थीं और बेटा उज्ज्वल अभी डाक्टरी के तीसरे वर्ष में पढ़ रहा था. मीता की शादी में हिमालय अपने बेटे सौरभ व बेटी ऋचा के साथ मुंबई यथासमय पहुंच गए थे. दोनों परिवार के बच्चे जब एकदूसरे के साथ रहे तो संबंध और भी पक्के हो गए.

एक दिन अचानक प्रांजल को हिमालय से अत्यंत दुखद समाचार मिला. उस की पत्नी रचना रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सीढि़यों से फिसल कर गिर जाने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गई है. प्रांजल और भावना के मुंबई पहुंचने से पहले ही रचना की मृत्यु हो गई. बचपन के मित्र के कष्ट को समझते हुए भी प्रांजल और भावना संवेदना के दो शब्द के अलावा कुछ भी समझा नहीं पाए. हिमालय दुखी व नितांत अकेले रह गए थे. उन की बेटी ऋचा ससुराल में थी और सौरभ की भी नौकरी दूसरे शहर में थी. लौटते हुए हिमालय से वे कह कर आए थे, ‘जब भी मन करे हमारे पास आ जाया करना…मन कुछ बदल जाएगा.’

प्रांजल के बेटे उज्ज्वल के विवाह पर हिमालय मित्र के आग्रह पर कुछ पहले आए थे. मीता और गीता के विवाह में वह पत्नी रचना के साथ आए थे…वे दिन आंखों के सामने बारबार आ जाते. प्रांजल और भावना उन के दुख को समझ रहे थे अत: उन्हें हर तरह से व्यस्त रखने का प्रयास करते ताकि मित्र अपनी पीड़ा को कुछ सीमा तक भुला सके. बाद में हिमालय का मन अपने अकेलेपन से बहुत उचाट होता तो वह प्रांजल के पास ही आ जाते. मुश्किल से 2 साल गुजरे होंगे कि प्रांजल भी गंभीर रूप से बीमार हो गए और केवल एक माह की बीमारी के बाद भावना अकेली रह गई.

बेटियां और उज्ज्वल भावना को बारीबारी से अपने साथ ले भी गए पर वह 3-4 महीने में घूमफिर कर दोबारा अपने घरौंदे में वापस आ गई…पति के साथ सुखदुख की यादों के बीच. उसे घर में हर तरफ प्रांजल ही दिखाई पड़ते…कभी ऐसा आभास होता कि प्रांजल किचन में उस के पीछे आ कर खड़े हैं और दूसरे ही क्षण उसे लगता…जैसे प्रांजल उसे समझा रहे हैं कि मैं तुम से दूर नहीं हूं भावना बल्कि तुम्हारे बिलकुल पास हूं…और भावना चौंक पड़ती. भावना का अपने बच्चों के पास मन नहीं लगा. जब हिमालय ने यह सुना तो हिम्मत कर के कुछ दिन का अवकाश ले कर भावना के पास आए. उन्हें देख कर भावना बिफर पड़ी…प्रांजल की यादें जो ताजा हो गईं…जब रचना नहीं रही…और हिमालय आते तो प्रांजल बारबार भावना से कहते, ‘मैं चाहता हूं जो चीजें नाश्ते व भोजन में हिमालय को पसंद हैं…वही बनें. जब तक वह हमारे साथ है हम उस की ही पसंद का खाना व नाश्ता करेंगे.’

भावना प्रांजल की बात इसलिए नहीं रखती कि हिमालय उस के पति के दोस्त हैं…बल्कि इस का दूसरा कारण भी था कि रचना की मृत्यु से हिमालय के प्रति उसे गहरी सहानुभूति हो गई थी. लेकिन अब? अब सबकुछ परिवर्तित रूप में था…अब भावना किचन में घुसती ही नहीं. हिमालय ही जो कुछ बना सकते थे, बना लेते पर खाते दोनों साथसाथ. भावना ने काफी समय तक बातें भी न के बराबर कीं. हिमालय कहते तो वह तटस्थ सी सुनती. जवाब नपेतुले शब्दों में देती. हिमालय स्वयं चोट खाए हुए थे इसलिए भावना की पीड़ा को समझते थे. वह उसे समझाने का प्रयास जरूर करते, ‘‘जीवन मृत्यु में किसी का दखल नहीं चलता. इनसान खुद परिस्थितियों के अनुसार जीवन व्यतीत करने को मजबूर है. घाव कुछ हलका होने पर इनसान स्वयं अपने आसपास छोटीमोटी खुशियां खोजने का प्रयास करे. हमें इस तथ्य को अपना कर ही चलना होगा, भावनाजी.’’

भावना की आंखों से बस, आंसू टपकते रहते…वह बोलती कुछ नहीं. हिमालय जाने लगे तो भावना से यह वादा जरूर लिया कि वह अपने खानेपीने का पूरा ध्यान रखेगी. मन ठीक नहीं है तो क्या तन को स्वस्थ रखना जरूरी है. समय के मरहम से भावना का घाव भरा तो हिमालय का जबतब आना उसे अच्छा लगने लगा…बातें भी करनी शुरू कर दीं. नाश्ताभोजन भी उन के पसंद का बनाने लगी. हिमालय को भी भावना के यहां आना अच्छा लगता. मीता, गीता व उज्ज्वल भावना से मिलने आए हुए थे. तभी हिमालय भी आ गए थे. बेटियां चाह रही थीं कि मां उन के साथ या भाई के साथ चलें लेकिन भावना तैयार नहीं हुईं. उन का कहना था कि उन्हें अपने इसी घर में अच्छा लगता है.

बच्चे मां को समझ रहे थे…जहां उन्हें अच्छा लगे वहीं रहें. हां, उन्हें इस बात का अंदाजा जरूर लग गया था कि हिमालय अंकल के यहां रहने से मां के मन को कुछ ठीक लगता है. अंकल बरसों से उन के पारिवारिक मित्र रहे हैं और काफी समय उन लोगों ने साथसाथ गुजारा भी है. मीता और उज्ज्वल सोच रहे थे कि हिमालय अंकल जितना भी मां के साथ रह लेते हैं, कम से कम उतने समय तो वे लोग मां की तरफ से निश्चिंत से रहते हैं.

वैसे बच्चे चाहते कि उन में से कोई एक मां के पास अवश्य रहे लेकिन जब यह संभव नहीं था तो वे हिमालय अंकल पर ही निर्भर होने लगे और साग्रह उन से कहते भी, ‘‘अंकल, हम मां पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालना चाहते पर आप से आग्रह करते हैं कि उन का हालचाल पूछते रहेंगे. हम लोग भी यथासंभव शीघ्र आने का प्रयास करते रहेंगे.’’

एक दिन हिमालय ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘भावना, मैं समझता हूं कि तुम्हारा कष्ट ऐसा है जिस का भागीदार कोई नहीं हो सकता. फिर भी हिम्मत कर के कह रहा हूं…यदि आप अपने जीवन में किसी हैसियत से मुझे शामिल करना चाहो तो मैं आप की शर्तों के साथ आप को स्वीकार करने को सहर्ष तैयार हूं. इस से न केवल एक को बल्कि दोनों को सहारा और बल मिलेगा.’’

थोड़ा विराम दे कर हिमालय ने पुन: कहा, ‘‘आप के हर निर्णय का मैं सम्मान करूंगा. आप इस बात से भी निश्चिंत रहिए कि हमारी दोस्ती के रिश्ते पर कोई आंच नहीं आएगी.’’

भावना ने पलक उठा कर हिमालय की तरफ देखा. वह मन से यही चाहती थी, हिमालय की बात अपनी जगह सही है. अब वह भी खुद को प्रांजल के अभाव में अकेली और बेसहारा अनुभव करती है. वह कोई गलत अथवा अनुचित कदम उठाना नहीं चाहती…उस के समक्ष उस का परिवार है, बच्चे हैं और सब से बड़ा समाज है. हिमालय की बात का कुछ जवाब दिए बिना वह किचन की तरफ बढ़ गई. हिमालय ने भी फिर कुछ कहा नहीं. हिमालय के बेटे सौरभ व बेटी ऋचा को यह पता था कि जब से मां मरी हैं पिताजी बहुत दुखी, उदास व नितांत अकेले हैं. यह बात दोनों बच्चे अच्छी तरह जानते थे कि पापा को प्रांजल अंकल और भावना आंटी के यहां जाना हमेशा ही अच्छा लगता रहा, और आज जब आंटी नितांत अकेली व दुखी हो गई हैं, तब भी.

सौरभ ने ही ऋचा से कहा, ‘‘क्यों न हम भावना आंटी के मन का अंदाजा लगाने की कोशिश करें. यदि उन के मन में पापा के लिए कोई जगह होगी तो हम उन से जरूर कुछ कहना चाहेंगे. आंटी का साथ पा कर पापा के दिन भी अच्छे से गुजर सकेंगे.’’

सौरभ और ऋचा ने भावना के पास जाने का निश्चय किया. हिमालय, भावना के यहां ही थे. अचानक सौरभ को फोन से पता चला कि भावना आंटी को सीरियस बीमारी है फिर तो दोनों बहनभाई तुरंत ही वहां के लिए निकल पड़े. मीता, गीता तथा उज्ज्वल का परिवार सब पहुंच चुके थे. दरअसल, कई दिनों से भावना का मन ठीक नहीं था. उलझन और अनिश्चय से भरा अंतर्मन समुद्र मंथन सा मथ रहा था…कभी हिमालय की बात और अपनत्वपूर्ण व्यवहार उसे अपनी तरफ खींचता तो कभी पति के साथ बिताए दिन यादों को झकझोर देते…तो कभी जीवन में आया अकेलापन भी अपना कोई साथी ढूंढ़ता…सब तरफ से घिरे मन को भावना ने अच्छी तरह से टटोला, परखा तो यही लगा कि पति के अभाव में वह कुछ सीमा तक अकेली और दुखी जरूर है पर उसे किसी और बात का अभाव नहीं है.

दूसरी बात, वह हर कदम अपने बच्चों और परिवार को साथ ले कर ही चलना चाहेगी…सोचती हुई भावना ने अपने मन में निश्चय किया कि हिमालय जैसे अब तक प्रांजल के दोस्त रहे बस, वही दोस्ती का रिश्ता अब भी बना रहेगा. अपने फैसले से संतुष्ट भावना ने तय किया कि कल सुबह वह हिमालय को उन की उस दिन कही बात के बारे में अपना फैसला जरूर सुना देगी. लेकिन मन में तनाव के चलते रात को भावना का रक्तचाप काफी बढ़ जाने से उसे जबरदस्त हार्ट अटैक पड़ गया. हिमालय ने फौरन उसे अस्पताल में भरती कराया. डाक्टरों ने 72 घंटे उसे आईसीयू में रखा था. एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद ही भावना घर आ सकी.

15 दिनों तक मां के साथ रहने के बाद आफिस व बच्चों के स्कूल के चलते मीता, गीता और उज्ज्वल वापस जाने की तैयारी में लग गए थे. हिमालय के दोनों बच्चे सौरभ व ऋचा तो 2 दिन बाद ही चले गए थे. उज्ज्वल ने मां को ले जाना चाहा लेकिन भावना अभी इस स्थिति में नहीं थी कि सफर कर सके. बच्चे जानते थे कि मां की सेवा में हिमालय अंकल का अहम स्थान रहा, वह अभी भी भावना को अकेली छोड़ कर जाने के लिए तैयार नहीं थे. हिमालय का भावना के प्रति आत्मीयभाव व सहृदयता से की गई सेवा ने सिर्फ भावना के ही नहीं बल्कि दोनों के बच्चों के अंतर्मन को गहराइयों से छू लिया था. और अपनी मां व पिता के प्रति एक सुखद फैसला लेने को प्रेरित किया. जाने से पहले मीता और उज्ज्वल ने सौरभ और ऋचा से फोन पर लंबी बातचीत की. इसी के साथ उन्होंने अपने सोचे फैसले के प्रति मन को पक्का भी कर लिया.

एक दिन भावना ने देखा कि अचानक उस के बच्चों के साथ हिमालय के भी दोनों बच्चे आए हैं. उस ने सब से बेहद अनुनय के साथ कहा, ‘‘तुम सब ने तथा हिमालय अंकल ने मेरी बहुत सेवा की. शायद उन के यहां होने से ही मुझे दूसरा जीवन मिला है. यदि उस दिन हिमालय अंकल यहां न होते तो…’’

मीता ने मां के होंठों पर हाथ रख कर आगे बोलने से रोक दिया. अचानक उसे याद आया जब 11 दिसंबर को उस की शादी में हिमालय अंकल सपरिवार आए थे तो पापा ने उन से मुसकरा कर कहा था, ‘जानते हो हिमालय, मैं ने मीता की शादी के लिए यह दिन चुन कर क्यों रखा? यह बड़ा शुभ दिन है…हमारी भावना का जन्मदिन जो है.’

‘तो यह बात तुम ने आज तक मुझ से छिपा कर क्यों रखी? और साथ में यह भी भूल गए कि 11 दिसंबर को मेरा भी जन्मदिन होता है.’ हिमालय अंकल के इतना कहने के बाद प्रांजल ने खुश हो कर उन को बांहों में भर लिया था. फिर तो हिमालय अंकल और मां को बधाई देने वालों का घर में तांता सा लग गया था.

मीता ने कहा, ‘‘मां, जब से मेरी शादी हुई है मैं अपने विवाह की वर्षगांठ पर कभी आप के पास नहीं रही. इस बार मेरी दिली इच्छा है कि इस शुभ दिन का जश्न मैं और यश आप के साथ मनाएं. और मैं ने तो अपनी शादी की इस सालगिरह के लिए होटल भी बुक करा लिया है. कुछ खासखास मेहमानों के साथ हिमालय अंकल, सौरभ भैया तथा ऋचा भी रहेगी. मां, उस दिन आप का भी तो जन्मदिन होता है…हम दोनों यह दिन सुंदरता से एकसाथ मनाया करेंगे.’’

भावना को बेटी की बात सुन कर अच्छा लगा, इसी बहाने घर में कुछ दिन तो रौनक रहेगी. उसे याद था कि इस दिन हिमालय का भी जन्मदिन होता है, लेकिन उस ने मीता से इस का कोई जिक्र नहीं किया. निश्चित दिन से एक दिन पहले ही ज्यादातर लोग आ गए, इसीलिए अगले दिन सुबह से ही घर में चहलपहल का माहौल बना हुआ था. जहां मीता और यश को सब बधाई दे रहे थे वहीं भावना और हिमालय भी अपनेअपने जन्मदिन की बधाई स्वीकार कर रहे थे. संध्या समय घर के सभी लोग होटल पहुंच गए. होटल में आकर्षक सजावट की गई थी. एक तरफ शहनाई वादन की व्यवस्था की गई थी. विवाह की वर्षगांठ के मौके पर मीता और यश की जयमाल होने के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी. तभी मुसकराती मीता हिमालय के पास आ कर आग्रह पूर्वक बोली, ‘‘प्लीज अंकल, एक मिनट के लिए उधर मंच पर चलिए.’’

हिमालय भी बिना कुछ सोचेसमझे उस के साथ हो लिए. दूसरी तरफ ऋचा भावना को साथ ले कर मंच पर आई. मीता और ऋचा ने आमनेसामने खड़े भावना और हिमालय के हाथों में बड़ा सा फूलों का हार पकड़ाते हुए हंस कर कहा, ‘‘जानते हैं अंकल और आंटी, आप इस का क्या करेंगे?’’

‘‘हां, तुम को और यशजी को शादी की वर्षगांठ की खुशी में पहनाना है,’’ हिमालय ने मुसकरा कर कहा.

‘‘नहीं, आज मम्मी का जन्मदिन है. इस उपलक्ष्य में यह हार आप उन को पहनाएंगे,’’ मीता ने हंस कर कहा.

‘‘और आंटी, आज मेरे पापा का भी जन्मदिन है,’’ मीता के कहने के तुरंत बाद ऋचा ने कहा, ‘‘इस खुशी में आप को हार पापा को पहनाना है.’’

अपनेअपने हाथों में हार पकड़े हिमालय और भावना आश्चर्य से भर कर बच्चों की तरफ देखने लगे. अपने लिए बच्चों की इस खूबसूरत कोशिश पर दोनों का दिल भर आया और उन्होंने बच्चों का मन रखने के लिए एकदूसरे को जयमाला पहना कर रस्म अदा कर दी. मीता और ऋचा ने तालियां बजाते हुए सब के सामने कहा, ‘‘अब आप दोनों दोस्त से आगे एकदूसरे को स्वीकार कर के एक दूसरे के हो कर रहेंगे. हमारा यह प्रयास बस, आप लोगों को अपनी स्थायी पीड़ा और अकेलेपन से कुछ सीमा तक निजात दिलाने के लिए किया गया है.’’

बच्चों के साहस और प्रयास की सब ने मुक्त कंठ से सराहना की. तालियों की गड़गड़ाहट से होटल का हाल गूंज उठा. हिमालय ने अनुग्रहीत नजरों से बच्चों की तरफ देखा…जिन्होंने अत्यंत खूबसूरती से सब को साक्षी बना कर उन के मिलन को स्वीकार किया था. Short Hindi Stories

Hindi Story : कृष्णिमा

Hindi Story : ऐसा नहीं था कि सोमेश्वर अपने बेटे केदार तथा बहू केतकी के जीवन में वात्सल्य सुख की कामना नहीं करते थे पर अनाथालय से बच्चा गोद लेने का केदार का फैसला उन्हें किसी भी नजरिए से सही नजर नहीं आ रहा था.

‘‘आखिर इस में बुराई क्या है बाबूजी?’’ केदार ने विनीत भाव से बात को आगे बढ़ाया.

‘‘पूछते हो बुराई क्या है? अरे, तुम्हारा तो यह फैसला ही बेहूदा है. अस्पतालों के दरवाजे क्या बंद हो गए हैं जो तुम ने अनाथालय का रुख कर लिया? और मैं तो कहता हूं कि यदि इलाज करने से डाक्टर हार जाएं तब भी अनाथालय से बच्चा गोद लेना किसी भी नजरिए से जायज नहीं है. न जाने किसकिस के पापों के नतीजे पलते हैं वहां पर जिन की न जाति का पता न कुल का…’’

‘‘बाबूजी, यह आप कह रहे हैं. आप ने तो हमेशा मुझे दया का पाठ पढ़ाया, परोपकार की सीख दी और फिर बच्चे किसी के पाप में भागीदार भी तो नहीं होते…इस संसार में जन्म लेना किसी जीव के हाथों में है? आप ही तो कहते हैं कि जीवनमरण सब विधि के हाथों होता है, यह इनसान के वश की बात नहीं तो फिर वह मासूम किस दशा में पापी हुए? इस संसार में आना तो उन का दोष नहीं?’’

‘‘अब नीति की बातें तुम मुझे सिखाओगे?’’ सोमेश्वर ने माथे पर बल डाल कर प्रश्न किया, ‘‘माना वे बच्चे निष्पाप हैं पर उन के वंश और कुल के बारे में तुम क्या जानते हो? जवानी में जब बच्चे के खून का रंग सिर चढ़ कर बोलेगा तब क्या करोगे? रक्त में बसे गुणसूत्र क्या अपना असर नहीं दिखाएंगे? बच्चे का अनाथालय में पहुंचना ही उन के मांबाप की अनैतिक करतूतों का सुबूत है. ऐसी संतान से तुम किस भविष्य की कामना कर रहे हो?’’

‘‘बाबूजी, आप का भय व संदेह जायज है पर बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में केवल खून के गुण ही नहीं बल्कि पारिवारिक संस्कार ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं,’’ केदार बाबूजी को समझाने का भरसक प्रयास कर रहा था और बगल में खामोश बैठी केतकी निराशा के गर्त में डूबती जा रही थी.

केतकी को संतान होने के बारे में डाक्टरों को उम्मीद थी कि वह आधुनिक तकनीक से बच्चा प्राप्त कर सकती है और केदार काफी सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि लाखों रुपए क्या केवल इसलिए खर्च किए जाएं कि हम अपने जने बच्चे के मांबाप कहला सकें. यह तो केवल आत्मसंतुष्टि तक सोचने वाली बात होगी. इस से बेहतर है कि किसी अनाथ बच्चे को अपना कर यह पैसा उस के भविष्य पर लगा दें. इस से मांबाप बनने का गौरव भी प्राप्त होगा व रुपए का सार्थक प्रयोग भी होगा.

‘केतकी, बस जरूरत केवल बच्चे को पूरे मन से अपनाने की है. फर्क वास्तव में खून का नहीं बल्कि अपनी नजरों का होता है,’ केदार ने जिस दिन यह कह कर केतकी को अपने मन के भावों से परिचित कराया था वह बेहद खुश हुई थी और खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू बह निकले थे पर अगले ही क्षण मां और बाबूजी का खयाल आते ही वह चुप हो गई थी. केदार का अनाथालय से बच्चा गोद लेने का फैसला उसे बारबार आशंकित कर रहा था क्योंकि मांबाबूजी की सहमति की उसे उम्मीद नहीं थी और उन्हें नाराज कर के वह कोई कार्य करना नहीं चाहती थी. केतकी ने केदार से कहा था, ‘बाबूजी से पहले सलाह कर लो उस के बाद ही हम इस कार्य को करेंगे.’

लेकिन केदार नहीं माना और कहने लगा, ‘अभी तो अनाथालय की कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, अभी से बात क्यों छेड़ी जाए. उचित समय आने पर मांबाबूजी को बता देंगे.’

केदार और केतकी ने आखिर अनाथालय जा कर बच्चे के लिए आवेदनपत्र भर दिया था. लगभग 2 माह के बाद आज केदार ने शाम को आफिस से लौट कर केतकी को यह खुशखबरी दी कि अनाथालय से बच्चे के मिलने की पूर्ण सहमति प्राप्त हो चुकी है. अब कभी भी जा कर हम अपना बच्चा अपने साथ घर ला सकते हैं. भावविभोर केतकी की आंखें मारे खुशी के बारबार डबडबाती और वह आंचल से उन्हें पोंछ लेती. उसे लगा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद उस के ममत्व की धारा में एक नन्ही जान की नौका प्रवाहित हुई है जिसे तूफान के हर थपेडे़ से बचा कर पार लगाएगी. उस नन्ही जान को अपने स्नेह और वात्सल्य की छांव में सहेजेगी….संवारेगी.

केदार की धड़कनें भी तो यही कह रही हैं कि इस सुकोमल कोंपल को फूलनेफलने में वह तनिक भी कमी नहीं आने देगा. आने वाली सुखद घड़ी की कल्पना में खोए केतकी व केदार ने सुनहरे सपनों के अनेक तानेबाने बुन लिए थे. आज बाबूजी के हाथ से एक तार खिंचते ही सपनों का वह तानाबाना कितना उलझ गया. केतकी अनिश्चितता के भंवर में उलझी यही सोच रही थी कि मांजी को मुझ से कितना स्नेह है. क्या वह नहीं समझ सकतीं मेरे हृदय की पीड़ा? आज बाबूजी की बातों पर मां का इस तरह से चुप्पी साधे रहना केतकी के दिल को तीर की तरह बेध रहा था.

केदार लगातार बाबूजी से जिरह कर रहा था, ‘‘बाबूजी, क्या आप भूल गए, जब मैं बचपन में निमोनिया होने से बहुत बीमार पड़ा था और मेरी जान पर बन आई थी, डाक्टरों ने तुरंत खून चढ़ाने के लिए कहा था पर मेरा खून न आप के खून से मेल खा रहा था न मां से, ऐसे में मुझे बचाने के लिए आप को ब्लड बैंक से खून लेना पड़ा था. यह सब आप ने ही तो मुझे बताया था. यदि आप तब भी अपनी इस जातिवंश की जिद पर अड़ जाते तो मुझे खो देते न?

‘‘शायद मेरे प्रति आप के पुत्रवत प्रेम ने आप को तब तर्कवितर्क का मौका ही नहीं दिया होगा. तभी तो आप ने हर शर्त पर मुझे बचा लिया.’’

‘‘केदार, जिरह करना और बात है और हकीकत की कठोर धरा पर कदम जमा कर चलना और बात. ज्यादा दूर की बात नहीं, केवल 4 मकान पार की ही बात है जिसे तुम भी जानते हो. त्रिवेदी साहब का क्या हश्र हुआ? बेटा लिया था न गोद. पालापोसा, बड़ा किया और 20 साल बाद बेटे को अपने असली मांबाप पर प्यार उमड़ आया तो चला गया न. बेचारा, त्रिवेदी. वह तो कहीं का नहीं रहा.’’

केदार बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘बाबूजी, हम सब यही तो गलती करते हैं, गोद ही लेना है तो उन्हें क्यों न लिया जाए जिन के सिर पर मांबाप का साया नहीं है कुलवंश, जातबिरादरी के चक्कर में हम इतने संकुचित हो जाते हैं कि अपने सीमित दायरे में ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. संसार में ऐसे बहुत कम त्यागी हैं जो कुछ दे कर भूल जाएं. अकसर लोग कुछ देने पर कुछ प्रतिदान पा लेने की अपेक्षाएं भी मन में पाल लेते हैं फिर चाहे उपहार की बात हो या दान की और फिर बच्चा तो बहुत बड़ी बात होती है. कोई किसी को अपना जाया बच्चा देदे और भूल जाए, ऐसा संभव ही नहीं है.

‘‘माना अनाथालय में पल रहे बच्चों के कुल व जात का हमें पता नहीं पर सब से पहले तो हम इनसान हैं न बाबूजी. यह बात तो आप ही ने हमें बचपन में सिखाई थी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. अब आप जैसी सोच के लोग ही अपनी बात भुला बैठेंगे तब इस समाज का क्या होगा?

‘‘आज मैं अमेरिका की आकर्षक नौकरी और वहां की लकदक करती जिंदगी छोड़ कर यहां आप के पास रहना चाहता हूं और आप दोनों की सेवा करना चाहता हूं तो यह क्या केवल मेरे रक्त के गुण हैं? नहीं बाबूजी, यह तो आप की सीख और संस्कार हैं. मैं ने बचपन में आप को व मांजी को जो करते देखा है वही आत्मसात किया है. आप ने दादादादी की अंतिम क्षणों तक सेवा की है. आप के सेवाभाव स्वत: मेरे अंदर रचबस गए, इस में रक्त की कोई भूमिका नहीं है और ऐसे उदाहरणों की क्या कमी है जहां अटूट रक्त संबंधों में पनपी कड़वाहट आखिर में इतनी विषाक्त हो गई कि भाई भाई की जान के दुश्मन बन गए.’’

‘‘देखो, मुझे तुम्हारे तर्कों में कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ सोमेश्वर बोले, ‘‘मैं ने एक बार जो कह दिया सो कह दिया, बेवजह बहस से क्या लाभ? और हां, एक बात और कान खोल कर सुन लो, यदि तुम्हें अपनी अमेरिका की नौकरी पर लात मारने का अफसोस है तो आज भी तुम जा सकते हो. मैं ने तुम्हें न तब रोका था न अब रोक रहा हूं, समझे? पर अपने इस त्याग के एहसान को भुनाने की फिराक में हो तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो.’’

इतना कह कर सोमेश्वर अपनी धोती संभालते हुए तेज कदमों से अपने कमरे में चले गए. मांजी भी चुपचाप आदर्श भारतीय पत्नी की तरह मुंह पर ताला लगाए बाबूजी के पीछेपीछे कमरे में चली गईं.

थकेहारे केदार व केतकी अपने कमरे में बिस्तर पर निढाल पड़ गए.

‘‘अब क्या होगा?’’ केतकी ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘होगा क्या, जो तय है वही होगा. सुबह हमें अपने बच्चे को लेने जाना है, और मैं नहीं चाहता कि इस तरह दुखी और उदास मन से हम उसे लेने जाएं,’’ अपने निश्चय पर अटल केदार ने कहा.

‘‘पर मांबाबूजी की इच्छा के खिलाफ हम बच्चे को घर लाएंगे तो क्या उन की उपेक्षा बच्चे को प्रभावित नहीं करेगी? कल को जब वह बड़ा व समझदार होगा तब क्या घर का माहौल सामान्य रह पाएगा?’’

अपने मन में उठ रही इन आशंकाओं को केतकी ने केदार के सामने रखा तो वह बोला, ‘‘सुनो, हमें जो कल करना है फिलहाल तुम केवल उस के बारे में ही सोचो.’’

सुबह केतकी की आंख जल्दी खुल गई और चाय बनाने के बाद ट्रे में रख कर मांबाबूजी को देने के लिए बाहर लौन में गई, मगर दोनों ही वहां रोज की तरह बैठे नहीं मिले. खाली कुरसियां देख केतकी ने सोचा शायद कल रात की बहसबाजी के बाद मां और बाबूजी आज सैर पर न गए हों लेकिन उन का कमरा भी खाली था. हो सकता है आज लंबी सैर पर निकल गए हों तभी देर हो गई. मन में यह सोचते हुए केतकी नहाने चली गई. घंटे भर में दोनों तैयार हो गए पर अब तक मांबाबूजी का पता नहीं था. केदार और केतकी दोनों चिंतित थे कि आखिर वे बिना बताए गए तो कहां गए?

सहसा केतकी को मांजी की बात याद आई. पिछले ही महीने महल्ले में एक बच्चे के जन्मदिन के समय अपनी हमउम्र महिलाओं के बीच मांजी ने हंसी में ही सही पर कहा जरूर था कि जिस दिन हमारा इस सांसारिक जीवन से जी उचट जाएगा तो उसी दिन हम दोनों ही किसी छोटे शहर में चले जाएंगे और वहीं बुढ़ापा काट देंगे. सशंकित केतकी ने केदार को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘नहीं, नहीं, केतकी, बाबूजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वे मुझ पर क्रोधित हो सकते हैं पर इतने गैरजिम्मेदार कभी नहीं हो सकते कि बिना बताए कहीं चले जाएं. हो सकता है सैर पर कोई परिचित मिल गया हो तो बैठ गए होंगे कहीं. थोड़ी देर में आ जाएंगे. चलो, हम चलते हैं.’’

दोनों कार में बैठ कर नन्हे मेहमान को लेने चल दिए. रास्ते भर केतकी का मन बच्चा और मांबाबूजी के बीच में उलझा रहा. लेकिन केदार के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. उमंग और उत्साह से भरपूर केदार के होंठों पर सीटी की गुनगुनाहट ही बता रही थी कि उसे अपने निर्णय पर जरा भी दुविधा नहीं है. केतकी का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह बोला, ‘‘यार, क्या मुंह लटकाए बैठी हो? चलो, मुसकराओ, तुम हंसोगी तभी तो तुम्हें देख कर हमारा नन्हा मेहमान भी हंसना सीखेगा.’’

नन्ही जान को आंचल में छिपाए केतकी व केदार दोनों ही कार से उतरे. घर का मुख्य दरवाजा बंद था पर बाहर ताला न देख वे समझ गए कि मां और बाबूजी घर के अंदर हैं. केदार ने ही दरवाजे की घंटी बजाई तो इसी के साथ केतकी की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. नन्ही जान को सीने से चिपटाए वह केदार को ढाल बना कर उस के पीछे हो गई.

दरवाजा खुला तो सामने मांजी और बाबूजी खडे़ थे. पूरा घर रंगबिरंगी पताकों, गुब्बारों तथा फूलों से सजा हुआ था. यह सबकुछ देख कर केदार और केतकी दोनों विस्मित रह गए.

‘‘आओ बहू, अंदर आओ, रुक क्यों गईं?’’ कहते हुए मांजी ने बडे़ प्रेम से नन्हे मेहमान को तिलक लगाया. बाबूजी ने आगे बढ़ कर बच्चे को गोद में लिया.

‘‘अब तो दादादादी का बुढ़ापा इस नन्हे सांवलेसलौने बालकृष्ण की बाल लीलाओं को देखदेख कर सुकून से कटेगा, क्यों सौदामिनी?’’ कहते हुए बाबूजी ने बच्चे के माथे पर वात्सल्य चिह्न अंकित कर दिया.

बाबूजी के मुख से ‘बालकृष्ण’ शब्द सुनते ही केदार और केतकी ने एक दूसरे को प्रश्न भरी नजरों से देखा और अगले ही पल केतकी ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘लेकिन बाबूजी, यह बेटा नहीं बेटी है.’’

‘‘तो क्या हुआ? कृष्ण न सही कृष्णिमा ही सही. बच्चे तो प्रसाद की तरह हैं फिर प्रसाद चाहे लड्डू के रूप में मिले चाहे पेडे़ के, होगा तो मीठा ही न,’’ और इसी के साथ एक जोरदार ठहाका सोमेश्वर ने लगाया.

केदार अब भी आश्चर्यचकित सा बाबूजी के इस बदलाव के बारे में सोच रहा था कि तभी वह बोले, ‘‘क्यों बेटा, क्या सोच रहे हो? यही न कि कल राह का रोड़ा बने बाबूजी आज अचानक गाड़ी का पेट्रोल कैसे बन गए?’’

‘‘हां बाबूजी, सोच तो मैं यही रहा हूं,’’ केदार ने हंसते हुए कहा.

‘‘बेटा, सच कहूं तो आज मैं ने बहुत बड़ी जीत हासिल की है. मुझे तुझ पर गर्व है. यदि आज तुम अपने निश्चय से हिल जाते तो मैं टूट जाता. मैं तुम्हारे फैसले की दृढ़ता को परखना चाहता था और ठोकपीट कर उस की अटलता को निश्चित करना चाहता था क्योंकि ऐसे फैसले लेने वालों को सामाजिक जीवन में कई अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ती हैं.’’

‘‘समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं न. यदि 4 लोग तुम्हारे कार्य को सराहेंगे तो 8 टांग खींचने वाले भी मिलेंगे. तुम्हारे फैसले की तनिक भी कमजोरी भविष्य में तुम्हें पछतावे के दलदल में पटक सकती थी और तुम्हारे कदमों का डगमगाना केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि आने वाली नन्ही जान के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता था. बस, केवल इसीलिए मैं तुम्हें जांच रहा था.’’

‘‘देखा केतकी, मैं ने कहा था न तुम से कि बाबूजी ऐसे तो नहीं हैं. मेरा विश्वास गलत नहीं था,’’ केदार ने कहा.

‘‘बेटा, तुम लोगों की खुशी में ही तो हमारी खुशी है. वह तो मैं तुम्हारे बाबूजी के कहने पर चुप्पी साधे बैठी रही, इन्हें परीक्षा जो लेनी थी तुम्हारी. मैं समझ सकती हूं कि कल रात तुम लोगों ने किस तरह काटी होगी,’’ इतना कह कर सौदामिनी ने पास बैठी केतकी को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘वह तो ठीक है मांजी, पर यह तो बताइए कि सुबह आप लोग कहां चले गए थे. मैं तो डर रही थी कि कहीं आप हरिद्वार….’’

‘‘अरे, पगली, हम दोनों तो कृष्णिमा के स्वागत की तैयारी करने गए थे,’’ केतकी की बातों को बीच में काटते हुए सौदामिनी बोली, ‘‘और अब तो हमारे चारों धाम यहीं हैं कृष्णिमा के आसपास.’’

सचमुच कृष्णिमा की किलकारियों में चारों धाम सिमट आए थे, जिस की धुन में पूरा परिवार मगन हो गया था. Hindi Story

Education Loan के नीचे दबी जिंदगी

Education Loan: तेजी से बदलते सामाजिक आर्थिक परिदृश्य में बच्चों की परवरिश भावनात्मक से अधिक आर्थिक निर्णय बन गई है. भारत में उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत, शिक्षा लोन का बढ़ता बोझ और युवा बेरोजगारी ने मध्यवर्गीय परिवारों को संकट में डाल दिया है, जहां सपने पलते तो हैं, पर अकसर कर्ज में दब कर टूट भी जाते हैं.

आज के तेजी से बदलते समाज में, बच्चे पैदा करने और उन्हें पालने का फैसला सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक भी होता जा रहा है. खासकर भारत जैसे विकासशील देश में, जहां जनसंख्या बड़ी है और संसाधन सीमित, युवा बच्चे मातापिता के लिए एक बड़ा सवाल बन गए हैं. भारत में एक बच्चे को जन्म से 18 साल तक पालने की औसत लागत 30 लाख रुपए से 1.2 करोड़ तक हो सकती है, जो ग्रामीण या शहरी क्षेत्र पर निर्भर करता है.

साल 2025 में यह आंकड़ा और बढ़ गया है, जहां शहरी भारत में एक बच्चे को पालने की लागत लगभग रुपए 45 लाख हो गई है. एक रिपोर्ट के अनुसार, जन्म से शादी तक की कुल लागत रुपए 1 करोड़ तक पहुंच सकती है, जिस में शिक्षा, स्वास्थ्य और रहनसहन शामिल हैं. आज कल भविष्य में बड़ी स्पर्धा को देखते हुए लोग प्राइमरी स्तर से ही पढ़ाई पर ध्यान देने लगते हैं. महानगरों में तो प्राइमरी एजुकेशन पर ही एक साल में लाखों रुपए का खर्च आता है.

मध्यमवर्गीय शहरों में प्राइमरी एजुकेशन पर रुपए 5.5 लाख, मिडिल स्कूल पर रुपए 1.6-1.8 लाख प्रति वर्ष, और कुल स्कूली शिक्षा पर रुपए 25-50 लाख खर्च हो सकता है. उच्च शिक्षा के लिए रुपए 15-50 लाख अतिरिक्त लग सकते हैं, और अगर विदेशी शिक्षा हो तो यह आंकड़ा रुपए 5-6 करोड़ तक पहुंच जाता है.

भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा से ही जीवन की आधारशिला माना जाता है. मातापिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, जिस में कर्ज ले कर उन्हें उच्च शिक्षा दिलाना भी शामिल है. लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि “कर्ज ले कर बच्चे पढ़ाए, पर कमाई कोरी” जैसी स्थिति कई परिवारों की सच्चाई बन गई है. यह वाक्यांश उस दर्दनाक सत्य को उजागर करता है जहां मातापिता अपनी संपत्ति गिरवी रख कर या बैंक से लोन ले कर बच्चों को इंजीनियरिंग, मैडिसिन या एमबीए जैसी डिग्रियां दिलाते हैं, लेकिन स्नातक होने के बाद युवा बेरोजगारी या कम वेतन वाली नौकरियों में फंस जाते हैं. परिणामस्वरूप, लोन की किस्तें चुकाने का बोझ परिवार पर पड़ता है, और सपने टूट जाते हैं.

आज कल हर मातापिता अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं. इंजीनियरिंग में तो फिर भी अगर आईआईटी या एमएनआईटी में कठिन प्रतियोगिता के बाद भी प्रवेश नहीं मिला तो तमाम रास्ते निकल आते हैं. सरकारी सीटें भले ही अभ्यर्थी के अनुपात में कम हों, लेकिन प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज की फीस परिवार के बजट के अनुकूल होती है. ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं जब किसी छात्र का चयन आईआईटी में हो जाए और वह समय पर फीस न जमा कर सके, जैसा कि एक दलित छात्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दे कर अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए, आईआईटी धनबाद को निर्देश दिया कि वे छात्र को बीटेक कोर्स में प्रवेश दें और उसे उसी बैच में शामिल करें. लेकिन इस के उलट एमबीबीएस में सरकारी मैडिकल कालेजों में सीटें अभ्यर्थियों के अनुपात में बहुत कम होती है और प्राइवेट मैडिकल कॉलेजों की फीस एक करोड़ से ज्यादा होती है. जो आम भारतीय के बस की बात नहीं होती है. ऐसे में अभिभावक बच्चों को विदेश जार्जिया, रुस, बंग्लादेश, फिलिपिंस, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, अर्मेनिया, ईरान, मलेशिया, चीन, बारबेडास आदि कम बजट वाले देशों में एमबीबीएस की डिग्री लेने भेजते हैं.

हांलांकि इन देशों का बजट भी कोर्स पूरा होने तक 25 से 55 लाख तक पहुंच जाता है. ऐसे में लोगों को बैंकों से लोन लेना पड़ता है. यहां तक तो ठीक है लेकिन विदेशी एमबीबीएस की डिग्री के बाद भारत में एफएमजीई (फ़ोरेन मैडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन) परीक्षा पास करना अनिवार्य होता है. जिस को सब के लिए पास करना मुश्किल होता है. एफएमजीई परीक्षा का उत्तीर्ण प्रतिशत हर बार अलगअलग होता है, लेकिन आम तौर पर यह कम रहता है.

उदाहरण के लिए, जून 2025 के एफएमजीई के लिए उत्तीर्ण प्रतिशत केवल 18.61% था, जिस में 36,034 उम्मीदवारों में से केवल 6,707 ही सफल हुए. कुल मिला कर, यह परीक्षा अपनी कठोरता और मजबूत चिकित्सा ज्ञान की आवश्यकता के कारण कठिन मानी जाती है, और सफलता दर अकसर 16% से 24% के बीच रहती है. हर साल इस में असफल बच्चों की संख्या भी जुड़ जाती है. एक बच्चे को एमबीबीएस की डिग्री के बाद केवल 3-4 अवसर का समय ही बच पाता है. भारत में हर साल ऐसे हजारों मैडिकल ग्रेजुएट रह जाते हैं जो एफएमजीई परीक्षा पास करने का अवसर खो देते हैं. फिर वह बिना मैडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन के कम वेतन पर छोटे या गांव के अस्पतालों में काम करने को मजबूर होते हैं. ऐसे वह लाखों रुपए का लोन और उस का ब्याज अदा नहीं कर पाते हैं. जिस से मातापिता को उन के कर्ज का बोझ उठाना पड़ता है.

आज देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में शिक्षा लोन की मांग बढ़ रही है, लेकिन रोजगार की कमी इस निवेश को जोखिम भरा बना रही है. बैंक की ऊंची ब्याज दर और सरकार की अनदेखी से ये बड़ा जोखिम भी साबित हो रहा है.

शिक्षा लोन की वर्तमान स्थिति

भारत में उच्च शिक्षा की लागत लगातार बढ़ रही है, जिस के कारण शिक्षा लोन एक आवश्यकता बन गया है. आरबीआई की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष छात्र लोन का कुल कर्ज 90,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जिस में सालाना 15% की वृद्धि दर दर्ज की गई है. 2023-24 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 28,699 करोड़ रुपये के शिक्षा लोन वितरित किए. अप्रैल से सितंबर 2024 तक बकाया शिक्षा लोन लगभग अरबों भारतीय रुपये तक पहुंच गया.

सन 2025 में शिक्षा लोन के रुझान बताते हैं कि विदेश में पढ़ाई के लिए लोन की मांग बढ़ रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 के अंत तक भारतीय छात्र विदेशी शिक्षा पर लगभग 70 अरब डौलर खर्च करेंगे. बाजार का आकार 130 अरब डौलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिस में 12% की वार्षिक मुद्रास्फीति दर है. स्टेट बैंक औफ इंडिया जैसे बैंक विदेशी शिक्षा के लिए 9.15% से 11.65% की ब्याज दरों पर लोन प्रदान कर रहे हैं. हालांकि, ये लोन मुख्य रूप से मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों द्वारा लिए जाते हैं, जहां मातापिता गारंटर बनते हैं.

एक अध्ययन से पता चलता है कि शिक्षा लोन गरीब और एससी/एसटी समुदायों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं, लेकिन अनौपचारिक रूप से कुछ बैंक छात्रों से सुरक्षा मांगते हैं. ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब शिक्षा कर्ज के बोझ तले उम्मीदें दफ्न हो गई. लोगों की छत तक छिन गई और किराए के मकान में जिंदगी बसर करने के लिए विवश होना पड़ा. बिजनेस भी डूबते देखा है, लेकिन फिर मिडिल क्लास के लिए बच्चों की उच्च शिक्षा का सपना आज भी कर्ज ही है. इस में सरकार की भूमिका कहीं राहत भरी नहीं दिखाई देती है. सरकार धन कुबेरों, बड़े उद्योगपतियों और बड़े कर्जदार के लिए नियम बना कर राहत देती है यहां तक अरबों के कर्ज माफ भी हो जाते हैं. लेकिन शिक्षा कर्ज ले कर देश और समाज की सेवा करने का सपना देखने वालों के सपने आसानी से कुचल जाते हैं और किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है. क्या यही दुरुस्त व्यवस्था है?

मध्य प्रदेश के रीवा शहर के एक परिवार ने बच्ची को यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए लोन लिया था. रूस से जंग होने के बाद वहां से वापस आना पड़ा, अभी तक उस का और परिजनों का डाक्टर बनने का सपना पूरा नहीं हो सका है. कर्ज की किश्तों का बोझ अलग है.

युवा बेरोजगारी: सपनों का हत्यारा

शिक्षा लोन का उद्देश्य बेहतर रोजगार सुनिश्चित करना है, लेकिन भारत में युवा बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है. वैसे बेरोजगारी के अधिकृत आंकड़े अब कम ही उपलब्ध कराए जाते हैं. फिर भी एक आंकड़े के अनुसार जुलाई 2025 में बेरोजगारी दर 5.2% दर्ज की गई, जो जून से कम है. हालांकि, 15-24 वर्ष की आयु वर्ग में युवा बेरोजगारी दर 10.2% है, जो वैश्विक औसत 13.3% से कम है लेकिन अभी भी चिंताजनक है.

अप्रैल 2025 में 15-29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 13.8% थी, जिस में शहरी क्षेत्रों में 17.2% और ग्रामीण में 12.3%.पीएलएफएस (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे) के जून 2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि बेरोजगारी दर 5.6% तक बढ़ गई. मई 2025 में यह 5.6% थी, जो अप्रैल से बढ़ी. केरल जैसे राज्यों में युवा बेरोजगारी 25.7% तक है. तेजी से बढ़ती जनसंख्या, अपर्याप्त शिक्षा, कौशल की कमी, वित्तीय सीमाएं और प्रणालीगत मुद्दे इस के मुख्य कारण हैं. इस स्थिति में, डिग्रीधारी युवा या तो बेरोजगार रहते हैं या कम वेतन वाली नौकरियों में काम करते हैं, जिस से लोन चुकाना मुश्किल हो जाता है.

मातापिता पर पड़ने वाला प्रभाव

शिक्षा लोन का सब से बड़ा बोझ मातापिता पर पड़ता है, जो अकसर सह-आवेदक या गारंटर बनते हैं. यदि छात्र ईएमआई समय पर नहीं चुका पाता, तो मातापिता का क्रेडिट स्कोर प्रभावित होता है. बैंक आरबीआई से अनुरोध कर रहे हैं कि मातापिता के अन्य लोन डिफौल्ट होने पर शिक्षा लोन को एनपीए न माना जाए.

एक अध्ययन के अनुसार, लोन चुकाने का पैटर्न छात्रों या माता-पिता पर बोझ बन जाता है. हालांकि, लाभ भी हैं जैसे लोन पुस्तकालय शुल्क, प्रयोगशाला शुल्क, ट्यूशन, परीक्षा लागत, हौस्टल शुल्क आदि कवर करता है. मातापिता लोन के दौरान ब्याज भुगतान पर 1% की छूट पा सकते हैं यदि समय पर चुकाया जाए. फिर भी, कई परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं. सूदखोरों से उधार लेना आसान लगता है, लेकिन उच्च ब्याज दरें (बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार) स्थिति बिगाड़ देती हैं. मध्यम वर्ग का जाल यही है जहां कमाई बढ़ाने की बजाय खर्च बढ़ जाते हैं.

इस समस्या के कारण

शिक्षा की गुणवत्ता और कौशल की कमी, कई कालेज डिग्री तो देते हैं, लेकिन बाजार की मांग के अनुरूप कौशल नहीं. परिणामस्वरूप, स्नातक रोजगार योग्य नहीं होते. रोजगार बाजार की स्थिति, तेज आर्थिक विकास के बावजूद नौकरियां सीमित हैं. आईएलओ के अनुसार, युवा बेरोजगारी वैश्विक समस्या है, लेकिन भारत में जनसंख्या दबाव अधिक है. उच्च शिक्षा लागत, निजी कालेजों में फीस लाखों में है, जिस से लोन अनिवार्य हो जाता है. सामाजिक दबाव, मातापिता बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर बनाने के लिए कर्ज लेते हैं, बिना बाजार की वास्तविकता पर विचार किए.

समाधान के रास्ते

ऐसा नहीं है कि इस के समाधान के रास्ते भी हैं. इस के लिए कौशल-आधारित शिक्षा सरकार और संस्थान व्यावहारिक कौशल पर जोर दें, जैसे वोकेशनल ट्रेनिंग. सरकारी योजनाएं शिक्षा लोन पर सब्सिडी बढ़ाएं, जैसे मेरिटोरियस छात्रों के लिए कोलेटरल-फ्री लोन. रोजगार सृजन के लिए स्टार्टअप और एमएसएमई को प्रोत्साहन दे कर नौकरियां बढ़ाएं. वित्तीय साक्षरता के लिए मातापिता और छात्रों को लोन के जोखिमों के बारे में शिक्षित करें.

यदि मातापिता फीस वहन कर सकते हैं, तो लोन सोचसमझ कर लें. साथ ही विकल्प के तौर पर स्कौलरशिप और पार्ट-टाइम जौब्स को प्रोत्साहित करें. भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा से ही जीवन की आधारशिला माना जाता है. मातापिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, जिस में कर्ज ले कर उन्हें उच्च शिक्षा दिलाना भी शामिल है. लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि “कर्ज ले कर बच्चे पढ़ाए, पर कमाई कोरी” जैसी स्थिति कई परिवारों की सच्चाई बन गई है.

यह वाक्यांश उस दर्दनाक सत्य को उजागर करता है जहां मातापिता अपनी संपत्ति गिरवी रख कर या बैंक से लोन ले कर बच्चों को इंजीनियरिंग, मैडिसिन या एमबीए जैसी डिग्रियां दिलाते हैं, लेकिन स्नातक होने के बाद युवा बेरोजगारी या कम वेतन वाली नौकरियों में फंस जाते हैं. परिणामस्वरूप, लोन की किस्तें चुकाने का बोझ परिवार पर पड़ता है, और सपने टूट जाते हैं. बेशक “कर्ज ले कर बच्चे पढ़ाए, पर कमाई कोरी” की स्थिति भारतीय परिवारों के लिए एक चेतावनी है. शिक्षा निवेश है, लेकिन बिना योजना के यह बोझ बन सकती है.

2025 में, जब अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तो शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटना जरूरी है. मातापिता को सतर्क रहना चाहिए, और सरकार को नीतियां बनानी चाहिए ताकि शिक्षा सपनों को साकार करे, न कि कर्ज का जाल बने. युवा बेरोजगारी अभी भी एक चुनौती है.

मातापिता को सतर्क रहना चाहिए, और सरकार को नीतियां बनानी चाहिए ताकि शिक्षा सपनों को साकार करे, न कि कर्ज का जाल बने. शिक्षा और कमाई अलग नहीं हैं सही दिशा में प्रयास से दोनों संभव हैं. Education Loan

Banking Law: चैक बाउंस केसों में अब होगा सुधार ?

Banking Law: हमारे देश की सब से बड़ी विडंबना यह है कि पूरा सिस्टम कोर्ट पर निर्भर होता जा रहा है. हमारी न्याय व्यवस्था की सब से बड़ी खासियत यह है कि जब कोई उस के पास पहुंच जाता है तो उस की बात को सुनती है और जरूरत पड़ने पर कानून के अनुसार उस की व्याख्या भी करती है. इस का परिणाम यह हुआ कि जो काम दूसरी संस्थाओं को करना चाहिए उस के लिए भी लोग सुप्रीम कोर्ट तक आ जाते हैं. इस तरह का एक काम है चैक बांउस होने के बाद पैसों की वापसी का. यह काम बैंक या ज्यादा से ज्यादा जिलों में बनी अदालतों में हो जाना चाहिए. यह मसले भी सुप्रीम कोर्ट तक आने लगे हैं.

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट यानी परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अनुसार अगर कोई चैक बाउंस हो जाए तो प्राप्तकर्ता यानि वह व्यक्ति जिसे चैक दिया गया था, बैंक से चैक वापसी मेमो प्राप्त करने के बाद चैक जारीकर्ता यानी चैक काटने वाले व्यक्ति, को कानूनी नोटिस भेज सकता है. इस नोटिस में भुगतान के लिए 15 दिनों का समय दिया जाता है. यदि 15 दिनों के बाद भी भुगतान नहीं मिलता है, तो प्राप्तकर्ता को मजिस्ट्रेट के पास नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करानी होगी. यह एक दंडनीय अपराध है जिस के लिए जारीकर्ता को जुर्माना या जेल की सजा हो सकती है.

पूरे देश में इस तरह के मामले बढ़ गए. कई मामले सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचने लगे. सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2022 में अपने आदेश में एक पायलट प्रोग्राम बनाने को कहा था. जिस के तहत पांच राज्यों महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की सहायता से 25 विशेष अदालतें गठित करने का निर्देश दिया गया था. इन का काम चैक बाउंस से होने वाले विवादों को हल करने का था जिस से यह काम जल्दी हो जाए. मामले कोर्ट पर बोझ न बने जिस से दूसरे जरूरी मुकदमों को निपटाने का समय मिल सके.

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चैक बाउंस मामलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए उठाए गए कदमों पर 6 सप्ताह के भीतर आवश्यक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. यह रिपोर्ट नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 खाते में धनराशि की कमी आदि के कारण चैक का भुगतान नहीं होने से संबंधित है. अब सुप्रीम कोर्ट 5 राज्यों में पायलेट प्रोजेक्ट के परिणामों को देखते हुए इस को पूरे देश में लागू कर सकती है. इस से चैक बाउंस केसों को निपटाने में मदद मिलेगी. कोर्ट ने बैंकों से नए तरह से काम करने को कहा है.

क्या कम हो सकेंगे कोर्ट के चक्कर

इस का पहला लाभ यह होगा कि बारबार कोर्ट जाने की झंझट खत्म हो जाएगा. पहले चैक बाउंस होने पर शिकायत दर्ज करवाने के लिए पीड़ित को कई बार अदालत में पेश होना पड़ता था. तारीख पर तारीख मिलती थी, दस्तावेजों की जांच होती थी और वकीलों की फीस अलग से देनी पड़ती थी. पूरी प्रक्रिया महीनों या सालों तक खिंच जाती थी. अब केवल बैंक से प्राप्त मूल दस्तावेज और रिटर्न रिपोर्ट के आधार पर ही मामला दर्ज किया जा सकेगा. इससे न्याय प्रक्रिया तेज होगी और पीड़ित को कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे.

अब डिजिटल दस्तावेजों को भी मान्यता मिल गई है. शिकायतकर्ता अब औनलाइन दस्तावेज अपलोड कर के भी केस दर्ज कर सकता है. यह सुविधा खासकर उन लोगों के लिए उपयोगी है जो दूर दराज के इलाकों में रहते हैं या जिन के पास बारबार कोर्ट आने का साधन नहीं है. डिजिटल प्रक्रिया से समय और पैसा दोनों की बचत होगी. साथ ही पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और सरल बनेगी.

व्यापारियों के लिए चैक का उपयोग बहुत आम है. लेकिन जब चैक बाउंस होता है तो उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ साथ कानूनी परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है. लंबे समय तक कोर्ट के चक्कर लगाने से उन का व्यापार प्रभावित होता है. अब व्यापारी आसानी से डिजिटल तरीके से शिकायत दर्ज करा सकते हैं. अब चैक बाउंस का मामला दर्ज करने के लिए स्पष्ट और वैध बैंक दस्तावेज जरूरी होंगे. इससे फर्जी या झूठे मामलों की संभावना कम होगी. साथ ही आरोपी पक्ष पर भी समय पर भुगतान करने का दबाव रहेगा.

आरोपियों के लिए भी चेतावनी है. अब वे यह सोचकर भुगतान टाल नहीं पाएंगे कि केस अदालत में सालों तक चलेगा. डिजिटल प्रमाणों के आधार पर तुरंत केस दर्ज होगा और त्वरित सुनवाई भी होगी. इस से आरोपी पर समयबद्ध भुगतान का दबाव बनेगा और वित्तीय लेन देन में अनुशासन बढ़ेगा.

शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया

सब से पहले बैंक से चैक की रिटर्न रिपोर्ट प्राप्त करें. सभी जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करें. औनलाइन पोर्टल या न्यायिक वेबसाइट पर जा कर डिजिटल तरीके से शिकायत दर्ज करें. दस्तावेज अपलोड करें और केस दर्ज हो जाएगा. इस प्रक्रिया में आप को बारबार कोर्ट जाने की जरूरत नहीं होगी. डिजिटल माध्यम से केस दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध होगी. छोटे व्यापारियों को बड़ा सहारा मिलेगा. आरोपी पर समय पर भुगतान करने का दबाव रहेगा. अदालतों पर केसों का बोझ कम होगा. आम लोगों को त्वरित और आसान न्याय मिलेगा. Banking Law

Dark Cinema: सिनेमाई अंधेरे की चमक – डार्क फिल्मों का बढ़ता असर

Dark Cinema: आदर्शवादी फिल्मों का दौर बहुत समय पहले खत्म हो गया, जिन में हीरोहीरोइन एकदूसरे की मोहब्बत में जान तक दे देते थे. उस तरह की फिल्म में प्रेम में जकड़ा प्रेमी अपनी प्रेमिका को पाने के लिए सारी दुनिया से टकरा जाता था. वह सरहदें तोड़ कर अपने प्रेम को वापस ले आता था. उन फिल्मों में विलेन हीरो के हाथों पिटता था और कभीकभी अंत में मारा जाता था. उस दौर में ऐसी फिल्में भी आईं जिन में देशप्रेम जबरदस्त तरीके से मौजूद था, जिन में जवान (हीरो) देश की खातिर जान की बाजी लगा देता और तिरंगे में लिपट कर अपने गांव वापस लौटता था. तब गांव वालों की छाती गर्व से चौड़ी हो जाती थी. आदर्शवादी फिल्मी कलमकारों ने परिवार की एकजुटता और प्रेम को भी खूब गढ़ा. फिल्म में हीरो या हीरोइन के मातापिता, बड़ा भाई या बहन उन के लिए आदर्श थे. उन का कहा पत्थर की लकीर होती थी. सच्चाई, प्रेम, आदर्श, कठोर श्रम, दुख के भावों से ओतप्रोत आदर्श फिल्मों का दौर अब शायद ही कभी लौट कर आए.

अब जमाना डार्क फिल्मों का है. ऐसी फिल्में जिन में कुछ भी खालिस नहीं है. कुछ भी आदर्श नहीं है. कुछ भी खरा नहीं है. सचझूठ, अच्छाबुरा, खराखोटा, हीरोविलेन सब गड्डमड्ड है. जिन में गलत काम करने वाला भी हीरो बन जाता है. जिन में जेल में बंद क़ैदी के प्रति सहानुभूति पैदा कराई जा रही है. जिन में कालेधंधे में सिर से नख तक डूबा व्यक्ति फिल्म का हीरो है. जनता के बीच गोली चलाने वाला वीर है. कुल जमा यह कि आज की ‘डार्क फिल्में’ वे हैं जिन की कहानियां सामान्य मनोरंजन, हीरोहीरोइन के प्रेम या हीरोविलेन की सीधी लड़ाई से हट कर, गहरे और असहज विषयों को छूती हैं, जैसे हिंसा, अपराध, मानसिक अंधकार, सामाजिक सड़न, नैतिक द्वंद्व, झूठ और इंसानी कमजोरी आदि.

डार्क हिंदी फिल्में वो मानी जाती हैं जिन में माहौल उदास, रहस्यमय, हिंसक या मनोवैज्ञानिक तौर पर भारी हो. इन में अपराध, धोखा, मानसिक तनाव, अस्तित्व का संकट और समाज का काला पहलू दिखाया जाता है. ये फिल्में पसंद भी खूब की जा रही हैं क्योंकि समाज का स्वरूप ही अब कुछ वैसा सा है. फिल्में समाज का आईना होती हैं. आज का समाज पहले से ज्यादा तनावपूर्ण और जटिल है, इसलिए फिल्में भी वैसी ही हैं.

जिन दिनों आदर्शवादी, कलात्मक फिल्में बना करती थीं, समाज का रंगरूप भी कुछ वैसा ही था. आज जिन के पास दो नंबर का पैसा नहीं है, उन की कोई पूछ नहीं है. लिहाजा, फिल्मों में भी इस बात को कुछ गलत नहीं समझा जाता है. जैसेजैसे समाज में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, हिंसा, असमानता, रिश्तों का टूटना और अकेलापन बढ़ा है, तो दर्शक भी अब ‘मीठे झूठ’ यानी हैप्पी एंडिंग के बजाय कड़वा सच स्क्रीन पर देखना चाहते हैं.

पहले लोग ज्यादा मनोरंजन, गाने और रोमांस देखने के लिए थिएटर का रुख करते थे. अब वे ‘रियलिस्टिक कंटैंट’ चाहते हैं, जहां इंसानी मनोविज्ञान, अंधेरा पक्ष और ग्रे शेड्स दिखाई दें. ओटीटी प्लेटफौर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स, प्राइम, हौटस्टार ने भी डार्क कंटैंट को लोकप्रिय बना दिया है. क्राइम, थ्रिलर और मिस्ट्री वाले जौनर आज के लोगों को ज्यादा खींचते हैं क्योंकि लोग अपने आसपास ऐसी ही चीजें होती देख रहे हैं. जब वे उन चीजों को स्क्रीन पर देखते हैं तो खुद को उस से कनैक्ट कर पाते हैं. डार्क फिल्में सस्पैंस और रोमांच से भरपूर होती हैं.

हिंदी फिल्मों पर ग्लोबल सिनेमा का असर भी बहुत पड़ा है. हौलीवुड और कोरियन सिनेमा जैसे जोकर, पैरासाइट, स्क्विड गेम का असर हिंदी फिल्मों में दिखता है. वहां की डार्क और रियलिस्टिक स्टोरीज को देख कर भारतीय मेकर्स भी उसी तरह के प्रयोग करने लगे हैं. वहीं कलात्मक और आदर्श फिल्मों के जमाने में जहां एकएक सेट तैयार करने में लाखों रुपए खर्च हो जाते थे, फिल्म पूरी करने में लंबा वक्त लगता था, रातोंदिन शूटिंग होती थी और तब कहीं जा कर करोड़ों की फिल्म रंगीन परदे पर उतरती थी. कई निर्देशक-प्रोड्यूसर तो इस चक्कर में कंगाल हो गए और अपना सबकुछ लुटा बैठे. वहीं आज की डार्क फिल्में छोटे बजट में, कम समय में बन कर अच्छा बिजनैस कर लेती हैं. न कोई बड़ा सेट लगाना, न कोई बड़ा तामझाम. कुछ फिल्में तो ऐसी हैं जो एक कमरे के अंदर ही पूरी शूट हो गईं. अनेक फिल्में ऐसी हैं जिन में एक भी गीत नहीं है. इन फिल्मों को ‘फैस्टिवल सिनेमा’ और ‘क्रिटिक्स’ दोनों का अच्छा सपोर्ट भी मिलता है. कहा जा सकता है कि डार्क फिल्में आज के दौर की हकीकत और दर्शकों की मानसिकता दोनों का नतीजा हैं, इसलिए सफल हैं.

कुछ बेहतरीन डार्क फिल्मों की बात करें तो 1998 में आई राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘सत्या’ ने खूब धमाल मचाया था. मुंबई अंडरवर्ल्ड पर बनी इस फिल्म का हीरो क्रिमिनल होते हुए भी सब का चहेता बन गया. भीखू महात्रे को भी लोगों ने खूब पसंद किया जबकि वह एक हार्डकोर क्रिमिनल था, दूसरी तरफ उस का परिवार भी था, वह अपनी पत्नी को खूब प्यार करता था, पार्टियों में जम कर डांस करता था. वहीं फिल्म का हीरो ‘सत्य’ एक हत्यारा होते हुए भी प्रेम के रस में डूबा हुआ ऐसा प्रेमी था जो अपनी प्रेयसी को सबकुछ सचसच बता देना चाहता था. दरअसल, उस फिल्म में अच्छाईबुराई का कोई साफ फर्क नहीं था. अंत में भीखू महात्रे भी अपने ही गैंग के हाथों मारा जाता है और सत्या भी पुलिस के हाथों मारा जाता है. मगर ये क्रिमिनल्स दर्शकों के दिलों में हीरो के तौर पर चस्पां हो जाते हैं.

इसी तरह 1999 में आई ई. निअवास की फिल्म ‘शूल’ एक डार्क फिल्म है, जिस में राजनीति और अपराध का काला खेल देखने को मिलता है. विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ 2003 में आई थी. शेक्सपियर के नौवेल ‘मेकबेथ’ पर आधारित यह फिल्म अपराध और लालच की अंधेरी दुनिया को उजागर करती है. ब्लौकबस्टर फिल्म ‘ओमकारा’ 2006 में आई जिस को विशाल भारद्वाज ने डायरैक्ट किया. इस की कहानी ‘ओथेलो’ पर आधारित, जलन और धोखे से जन्मी बरबादी की कहानी है.

2007 में अनुराग कश्यप की ‘ब्लैक फ्राइडे’ आई, जो 1993 मुंबई बम धमाकों पर आधारित, बेहद यथार्थवादी और कठोर फिल्म थी. इस ने भी बौक्स औफिस पर तहलका मचाया. अनुराग कश्यप ने ही 2009 में एक और डार्क फिल्म दी ‘देव डी’ जो देवदास का नया वर्जन थी, जिस का हीरो नशे में डूबा मगर एक आत्मविश्वासी व्यक्ति था.

‘गैंग्स औफ वासेपुर’ जैसी धमाकेदार फिल्म को कौन भूल सकता है. इस फिल्म को भी अनुराग कश्यप ने डायरैक्ट किया. 2012 में आई यह फिल्म झारखंड के कोयला माफिया और गैंगवार पर दो भाग में बनी मल्टीस्टारर डार्क सागा थी, जिस में जम कर खूनखराबा, गालीगलौच, बदला और सत्ता की राजनीति को दर्शाया गया. नकारात्मक रोल में भी इस फिल्म के कलाकारों- मनोज बाजपेई, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पियूष मिश्रा, ऋचा चड्ढा, हुमा कुरैशी, पंकज त्रिपाठी, राजकुमार राव आदि ने दर्शकों के दिल पर गहरी छाप छोड़ी.

2018 में श्रीराम राघवन की फिल्म ‘अंधाधुन’ ब्लैक कौमेडी और थ्रिलर का डार्क मिश्रण थी, तो 2015 में मेघना गुलजार ने बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड पर फिल्म ‘तलवार’ बनाई जिस में सच और झूठ की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं. जातिवाद और सामाजिक अंधकार को उजागर करने वाली डार्क फिल्म ‘आर्टिकल 15’ 2019 में आई. इस फिल्म को अनुभव सिन्हा ने बनाया. जातिवाद और सामाजिक अंधकार को उजागर करने वाली यह एक डार्क फिल्म थी. हौरर व सुपरनैचुरल डार्क सिनेमा की बात करें तो 2018 में आई परिणीति चोपड़ा अभिनीत फिल्म ‘परी’ पारंपरिक हौरर से हट कर डार्क और विचलित करने वाली फिल्म थी.

वहीं 2018 में ही फिल्म ‘तुम्बाड’ रिलीज हुई जो लालच, भय और लोककथा का डार्क फैंटेसी रूप था. घरेलू हिंसा और बदले की ब्लैक कौमेडी 2022 में फिल्म ‘डार्लिंग्स’ में प्रदर्शित हुई. और इसी वर्ष आई फिल्म ‘मोनिका, ओ माय डार्लिंग’ जो क्राइम और ब्लैक ह्यूमर से भरी हुई थी.

डार्क फिल्मों की ख़ास बात यह है कि इन में कहानी का टोन थोड़ा भारी, गंभीर और निराशाजनक होता है. इस की विषयवस्तु में अपराध, भ्रष्टाचार, मानसिक बीमारियां, हिंसा, सैक्स, नशा आदि का मिश्रण होता है, जो समाज के कुरूप चेहरे को सामने लाता था. इन फिल्मों के पात्र न तो पूरी तरह हीरो हैं, और न पूरी तरह विलेन, बल्कि ये पात्र इंसानी कमजोरियों से भरे हुए हैं जैसा कि हमारे समाज में लोग हैं. डार्क फिल्मों का अंत कई बार अधूरा, कड़वा या नकारात्मक होता है, यानी इन में हैपी एंडिंग नहीं होती और इसीलिए दर्शक भारी मन के साथ थियेटर से बाहर आता है और देर तक उन दृश्यों के बारे में सोचता रहता है, जो उस की अपनी जिंदगी से काफी मेल खाते हैं. Dark Cinema

India China Relations: चीन से संबंध दुश्मनी और दोस्ती क्या दोनों चलेंगी

India China Relations : अमेरिका और भारत की खींचतान अब नहीं बल्कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से ही शुरू हो गई थी. वही ट्रंप जो कभी प्रधानमंत्री मोदी के जिगरी दोस्त कहे जाते थे. बेशक यह दो देशों की नहीं बल्कि उन के शीर्ष नेताओं की अकड़ है जिसे दोनों देशों की जनता भुगत रही है. मगर इस का त्वरित अंजाम भारत का चीन के करीब आने का दांव समझ से परे है. यह वही चीन है जिसे हमारा प्रतियोगी माना जाता है. आखिर चीन के करीब जा कर भारत क्या हासिल कर पाएगा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डाला है. ट्रंप के टैरिफरूपी बम ने वैश्विक व्यापार को तो अस्थिर किया ही है, कई देशों के सामने एकदूसरे के नजदीक आने की मजबूरी भी पैदा की है, जो पहले कई मसलों पर एकदूसरे के विरोधी रहे हैं. अमेरिकी टैरिफ नीति के चलते भारत अपने प्रतिद्वंद्वी चीन के आगे दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए मजबूर दिख रहा है. मोदी सरकार को लग रहा है कि यदि वे चीन के साथ सहयोग बढ़ाएंगे तो शायद वे अमेरिकी दबाव को संतुलित कर लेंगे लेकिन शायद वे भूल गए कि चीन के साथ हमारा भू-राजनीतिक तनाव, सुरक्षा चुनौतियां और एशिया में रणनीतिक वर्चस्व की होड़ लंबे समय से जारी है.

दोनों देशों में एकदूसरे के प्रति घोर अविश्वास भी है और चीन की हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान से नजदीकियां भी हमारे लिए नुकसानदायक साबित होती रही हैं. ऐसे में भारत ट्रंप के टैरिफ से डर कर चीन से गलबहियां करने लगे तो यह कोई अच्छी सम?ा की निशानी नहीं है. इस ‘दोस्ती’ से जहां अमेरिका के साथ हमारी बात पूरी तरह बिगड़ जाएगी वहीं व्यापार के मामले में चीन को फायदा होगा जबकि भारत को नुकसान ही होगा. भारत और चीन के रिश्तों में मजबूती और विश्वास पैदा होना बिलकुल अविश्वसनीय बात है. सवाल यह भी है कि क्या चीन ने पूर्वी लद्दाख में 5 साल से कब्जाए क्षेत्र को खाली कर दिया है? जवाब है नहीं. तो फिर, बीजिंग के साथ नई दिल्ली का व्यवहार सामान्य और मजबूत कैसे हो सकता है?

किसी भी स्थिति में पाकिस्तान का सदाबहार साथी चीन भारत के लिए कभी भी इतना उदार नहीं होगा कि वह अमेरिका से होने वाले भारतीय निर्यात के नुकसान की भरपाई कर सके. केवल यूरोपीय संघ ही ऐसा कर सकता है, लेकिन उस में भी अच्छाखासा वक्त लगेगा और मोदी ब्रुसेल्स के साथ आर्थिक संबंधों को उस स्तर पर ले जाने के करीब भी नहीं हैं.

अमेरिका है भारत का बड़ा ट्रेड पार्टनर

गौरतलब है कि पिछले 4 सालों से अमेरिका भारत का सब से बड़ा ट्रेड पार्टनर रहा है. 2024-25 में भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 131.84 अरब डौलर का था. मगर अब अमेरिका में प्रवेश करने वाले भारतीय सामान पर 50 फीसद का टैरिफ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका है. मोदी सरकार ने इस बाबत पहले से कोई तैयारी नहीं की थी जबकि राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप के अनिश्चित व्यवहार को देखते हुए कई देशों ने अपने निर्यात में विविधता लानी शुरू कर दी थी और उन्होंने नए बाजार देख लिए थे. मोदी को ऐसी कोई युक्ति नहीं सू?ा क्योंकि वे तो ट्रंप के साथ कभी खत्म न होने वाली दोस्ती के सपने में खोए हुए थे.

अब अगर अमेरिका के साथ इतना बड़ा व्यापार बाधित होता है तो भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना लाजिमी है. ऐसे में भारत के सामने 2 विकल्प हैं, पहला कि वह अमेरिका के साथ संबंध सुधारे और दूसरा, वह नए बाजार की तलाश करे. फिलहाल मोदी सरकार ने दूसरे विकल्प को चुना है. उस ने अमेरिका से संबंध सुधारने के बजाय चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है.

ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ‘‘अमेरिका दुनिया की सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है और चीन दूसरे पायदान पर है. भारत भी एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है. ऐसे में अमेरिका और चीन दोनों से भारत को अच्छे संबंध रखने चाहिए. भारत अगर डिप्लोमैसी के बदले अमेरिका के सामने ?ाकने से इनकार करना चुनता है तो उसे अपना सब से बड़ा ट्रेड पार्टनर और दुनिया का सब से बड़ा कंज्यूमर मार्केट खोना पड़ सकता है.

‘‘चीन के साथ भाईचारा बढ़ाना या देश में आर्थिक सुधार जैसे कदम अच्छे हैं लेकिन इस से अमेरिका की जगह की भरपाई नहीं हो पाएगी.’’ अमेरिका की अर्थव्यवस्था 35 से 40 ट्रिलियन डौलर है, चीन की 19 से 20 और भारत की 4 ट्रिलियन डौलर के आसपास. ट्रंप की नाराजगी

ट्रंप की नाराजगी दरअसल निजी है और उन का निशाना मोदी हैं लेकिन इस का असर भारत देश पर पड़ा है. ट्रंप इस बात से नाराज हैं कि मोदी सितंबर 2024 में अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान उन से मिलने नहीं गए. इस साल फरवरी में ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने पर पहले तो मोदी को इनविटेशन ही नहीं मिला, बाद में मोदी ने दोस्ती निभाने की कोशिश की और वे व्हाइट हाउस भी गए, लेकिन इस का कोई फायदा नहीं हुआ. इस के बाद पाकिस्तान के साथ हुई सैन्य ?ाड़प के बाद जब मोदी ने संघर्ष विराम कराने में अमेरिकी राष्ट्रपति की भूमिका होने की बात नहीं मानी तो ट्रंप का अहं आहत हो गया.

ट्रंप ने 2 दर्जन से ज्यादा बार यह कहा कि भारत व पाक युद्ध उन के कारण रुका, मगर मोदी ने एक बार भी यह बात स्वीकार नहीं की. जबकि, पाकिस्तान ने मोदी द्वारा ‘प्रदान’ किए गए अवसर का फायदा उठाया और अमेरिका के साथ अपने पुराने सैन्य संबंधों को फिर से जीवित करते हुए औपरेशन सिंदूर रुकवाने के लिए ट्रंप का हार्दिक धन्यवाद किया. यही नहीं, मोदी और भारत को चिढ़ाने के लिए पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया.

12 अगस्त को अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने कहा, ‘‘हम ने महसूस किया कि भारत और पाकिस्तान का संघर्ष काफी भयानक रूप ले सकता था. यह चिंता का विषय था और उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति और विदेश मंत्री ने तत्काल कार्रवाई की. हम ने फोनकौल की प्रकृति, हमलों को रोकने के लिए किए गए हमारे काम और फिर सभी पक्षों को एकसाथ लाने के बारे में बताया, ताकि हम एक स्थायी परिणाम प्राप्त कर सकें. यह एक बहुत ही गर्व का क्षण है और इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि हमारे विदेश मंत्री रुबियो और उपराष्ट्रपति वेंस इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं. इस देश के शीर्ष नेता उस संभावित तबाही को रोकने में शामिल थे.’’

उधर, मोदी ने वेंस के फोनकौल की बात तो स्वीकार की मगर इस बात से इनकार किया कि उन्होंने किसी दबाव में आ कर औपरेशन सिंदूर को खत्म किया. मोदी ने इस सच से कन्नी इसलिए भी काटी कि कहीं उन की सरकार पर बट्टा न लगे, उन की 56 इंच की छाती और लाल आंखों पर विपक्ष सवाल न उठाए. हकीकत यही है कि उन्होंने दबाव में आ कर औपरेशन सिंदूर को रोका और यह सच दुनिया से छिप भी न सका.

युद्ध रुकवाने का क्रैडिट किसे

गौरतलब है कि तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्वीकार करना तकनीकी रूप से 1972 के इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला सम?ाते का उल्लंघन है, जो भारत और पाकिस्तान को अपने मतभेदों को द्विपक्षीय रूप से सुल?ाने के लिए प्रतिबद्ध करता है. इस सम?ाते का उल्लंघन भारत और पाकिस्तान दोनों ने किया परंतु पाकिस्तान ने जहां ट्रंप की भूमिका को स्वीकार कर अमेरिका के साथ संबंध कुछ ठीक कर लिए, वहीं मोदी ने इस बात से इनकार कर संबंध बिगाड़ लिए.

भारत के लिए और भी असुविधाजनक बात यह रही कि बू्रस ने यह भी खुलासा कर दिया कि हाल ही में इसलामाबाद में ‘अमेरिका व पाकिस्तान आतंकवादरोधी बातचीत’ हुई. उन्होंने कहा कि इस मौके पर ‘अमेरिका और पाकिस्तान ने आतंकवादी खतरों से निबटने के लिए सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की.’ दूसरे शब्दों में, अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने वाला देश मानने के बजाय उसे आतंकवाद से लड़ने में एक सहयोग देने वाला बताया. साफ है, पाकिस्तान के बारे में मोदी की बातें वाशिंगटन ने पूरी तरह अनसुनी कर दीं.

चीन से नजदीकियों के मायने

अब चीन के साथ भारत की जो गलबहियां चल रही हैं उस ने आग में घी डालने का ही काम किया है. इस में दोराय नहीं कि मोदी सरकार के इस रवैए का खमियाजा भारतीय किसान और व्यापारियों को बहुत बुरा भुगतना पड़ेगा. इस के अलावा इंडो-पैसिफिक रणनीति पर भी इस का बुरा असर होगा क्योंकि अमेरिका भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने वाला सा?ोदार मानता रहा है. भारत अगर चीन के करीब जाएगा तो अमेरिका की इस रणनीति को ?ाटका लगेगा और वह उस का बदला भारत से जरूर लेगा. बड़ी बात यह है कि अमेरिका और चीन के बीच ‘ठंडी जंग’ जैसी स्थिति बन रही है. ऐसे में भारत का ?ाकाव चीन की तरफ होने पर अमेरिका को यह अपने खिलाफ एक कदम लगेगा.

भारत व चीन की नजदीकी ‘क्वाड’ की मजबूती को भी कमजोर करेगी. अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत मिल कर क्वाड के जरिए चीन को चुनौती देते हैं. भारत का चीन की तरफ ?ाकाव इस मंच की एकजुटता को कमजोर कर देगा. भारत और अमेरिका के बीच हाल के वर्षों में कई रक्षा सम?ाते, हथियारों की खरीद और टैक्नोलौजी सा?ोदारी भी तेज हुई थी, मगर अब चीन से दोस्ती होने पर अमेरिका इन सम?ातों को धीमा कर सकता है.

इस के अतिरिक्त अमेरिका भारत में भारी निवेश करता है और टैक्नोलौजी क्षेत्र में वह हमारा बड़ा सहयोगी है. अगर भारत चीन की तरफ ज्यादा ?ाकेगा तो अमेरिका निवेश व व्यापार नीतियों में सख्ती ला सकता है. इन तमाम संकटों की तरफ से मोदी सरकार आंखें मूंदे हुए है.

अमेरिका से मनमुटाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के तियानजिन में 31 अगस्त से एक सितंबर तक आयोजित एससीओ यानी शंघाई कोऔपरेशन और्गनाइजेशन समिट में शामिल हुए. प्रधानमंत्री मोदी 7 साल बाद चीन गए. मोदी का यह दौरा ऐसे माहौल में हुआ जब पूर्वी लद्दाख में अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति बहाल नहीं हो पाई है. चीन ने 2020 के बाद कई बार अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों का मंदारिन में नामकरण किया है. चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत कहता है. फिर 2022 में जब भारत में जी-20 समिट हुआ तो उस में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए. इन सब मुद्दों को मोदी नजरअंदाज कर रहे हैं. इसलिए मोदी की चीन यात्रा को अमेरिका के साथ भारत के खराब होते संबंधों से जोड़ कर ही देखा जा रहा है.

हालांकि, इस समय भारत को रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की बहुत जरूरत है. यानी, बढ़े टैरिफ के बावजूद अमेरिका के साथ सा?ोदारी और चीन के साथ सीमित सहयोग, ताकि किसी एक देश को पूरी तरह न नाराज किया जाए. सच तो यह है कि इन तीनों देशों के रिश्तों की नींव रणनीतिक हितों और आर्थिक जरूरतों पर टिकी है, न कि भावनात्मक या गहरी वैचारिक निकटता पर.

मतलबपरस्ती के संबंध

अमेरिका और चीन दोनों के साथ ही भारत के संबंधों में गरमजोशी नहीं है. जो है वह खालिस मतलबपरस्ती है. ऐसा तब है जब अमेरिका और चीन दोनों ही भारत के शीर्ष के कारोबारी सा?ोदार हैं. ऐसे में भारत को अपनी कूटनीति में यह संतुलन बनाए रखना चाहिए ताकि आर्थिक फायदे भी मिलते रहें और सुरक्षा के मोरचे पर भी कोई बड़ा खतरा न खड़ा हो.

अमेरिका को नाराज कर के चीन से दोस्ती दिखाना भारत को भारी आर्थिक मुसीबत में डालने वाला कदम है. चीन के लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है, जबकि भारत ऐसी वस्तुएं बहुत कम बनाता है जो चीन के बाजारों में खप सकें. इस असंतुलन का सीधा फायदा चीन को होगा. इस कारण भारत हमेशा कमजोर स्थिति में रहेगा. यह अंधी दोस्ती भविष्य में भारतीय व्यापारियों और उद्योगों के लिए खतरा बन जाएगी. माल न खपने पर मांग कम होगी, बड़ी संख्या में उद्योगधंधे बंद हो जाएंगे और लोग अपनी नौकरियां खो देंगे.

चीन के साथ अविश्वास से भरा इतिहास

थोड़ा ही पीछे जाएं तो हम देखेंगे कि भारत व चीन संबंधों का इतिहास संघर्षों और अविश्वास से भरा रहा है. 1962 का युद्ध, सीमा विवाद और गलवान जैसी घटनाएं हमारे सामने हैं. चीन राजनीतिक और सैन्य दबाव बनाने में माहिर है. 1947 में भारत की आजादी और 1949 में चीन की साम्यवादी क्रांति के बाद दोनों देशों ने ‘हिंदी चीनी भाईभाई’ का नारा अवश्य दिया था पर सीमा विवाद और तिब्बत का मुद्दा दोनों के रिश्तों में तनाव का कारण बन गया. भारत व चीन संबंधों में सब से बड़ा मोड़ 1962 का युद्ध रहा. यह युद्ध सीमा विवाद, अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश को ले कर हुआ और भारत को हार का सामना करना पड़ा. इस के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार पड़ गई.

भारत व चीन सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अकसर तनाव देखने को मिलता है. 2017 का डोकलाम विवाद और 2020 की गलवान घाटी की ?ाड़प हमारे समक्ष बड़े उदाहरण हैं और अब पाकिस्तान से चीन की दोस्ती भारत को लगातार परेशान कर रही है. हालिया भारत व पाक युद्ध में पाकिस्तान को चीन की मदद मिली. चीन ने भारत से लड़ने के लिए पाकिस्तान को अपने हथियार दिए.

चीन का ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और पाकिस्तान से उस की निकटता किसी से छिपी नहीं है. चीन लगातार सीमा पर सड़कें, हवाई पट्टियां और सैन्य ठिकाने बना रहा है, जिस से भारत की सुरक्षा संकट में है. चीन का पाकिस्तान-चीन आर्थिक कौरिडोर (सीपीईसी), जो पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरता है, भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है. पाकिस्तान को चीन की सैन्य और परमाणु तकनीक मदद भारत के लिए दोहरा खतरा है.

गौरतलब है कि चीन ‘स्ंिट्रग औफ पर्ल्स’ रणनीति के तहत श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव और बंगलादेश में बंदरगाह बना रहा है. इस से हिंद महासागर में भारत की पारंपरिक बढ़त को चुनौती मिलती है. चीन संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा रहता है, जैसे कश्मीर के मुद्दे पर. चीन का उद्देश्य भारत को एशिया में संतुलित शक्ति बनने से रोकना है.

कहना गलत न होगा कि सीमा सुरक्षा, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, समुद्र्री घेराबंदी और कूटनीतिक दबाव के अंतर्गत भारत के लिए चीन एक बहुआयामी चुनौती है. ऐसे में सिर्फ टैरिफ के डर से अमेरिका से दूरी और चीन से निकटता बनाना भारत के दीर्घकालिक हित में नहीं है. जो दोस्ती भरोसे की नींव पर नहीं बल्कि आर्थिक मजबूरी के कारण बनाई जा रही है उस दोस्ती का दूर तक निभना मुश्किल है. ऐसे में भारत को संतुलित रणनीति अपनानी चाहिए. अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों को बनाए रखना और चीन पर निर्भरता कम करना ही ज्यादा उचित होगा.

भारत का किस के साथ फायदा

गौरतलब है कि चीन भारत को इलैक्ट्रौनिक्स, मशीनरी, दवाओं के कच्चे पदार्थ आदि निर्यात करता है, जबकि भारत चीन को लौहअयस्क, कपास और केवल कच्चा माल भेजता है. वहीं, टैक्नोलौजी, रक्षा, निवेश, आईटी सैक्टर को ले कर भारत व अमेरिका के संबंध मजबूत हैं. अमेरिका आईटी, रक्षा, ऊर्जा और उच्च तकनीक में सब से बड़ा सहयोगी बन सकता है. क्वाड यानी भारत, अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया सहयोग के जरिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन को बैलेंस कर के रखा जा सकता है.

अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते से भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और कूटनीतिक ताकत भी बढ़ती है. जबकि, चीन पाकिस्तान का सब से बड़ा सहयोगी है, वह पाकिस्तान के हित में भारत पर किसी भी प्रकार का दबाव बना सकता है. सो, भारत की चिंताएं और बढ़ सकती हैं. चीन से व्यापार घाटा बहुत बड़ा है. भारत की इंडस्ट्री चीनी सामान पर और ज्यादा निर्भर हो सकती है. इस के इतर मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री व तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में हम चीन से काफी पीछे हैं. इस के कई कारण हैं. सब से बड़ा कारण चीनी नागरिकों की सोच है.

चीनी युवा कुशल, कर्मठ और राष्ट्रवादी

भारत और चीन दोनों देशों के युवा आबादी का बड़ा हिस्सा हैं और भविष्य की दिशा तय करते हैं. लेकिन ये युवा कई मामलों में काफी अलग हैं. यह फर्क मुख्य रूप से समाज, शिक्षा, राजनीति, रोजगार, संस्कृति, सोच और धर्म के क्षेत्र में है.

भारत में शिक्षा का स्तर असमान है. आईआईटी और आईआईएम जैसे टौप संस्थान तो विश्वस्तरीय हैं लेकिन ग्रामीण व सामान्य सरकारी शिक्षा का ढांचा बहुत कमजोर है. युवाओं में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव बहुत है. वहीं चीन की शिक्षा प्रणाली बेहद अनुशासित और कठोर है. वहां ‘गोओकाओ एग्जाम’ बहुत कठिन माना जाता है. चीन के युवा तकनीक और विज्ञान शिक्षा में आगे हैं.

रोजगार और कैरियर के क्षेत्र में भारतीय युवा नौकरी की कमी से जू?ा रहे हैं क्योंकि सरकार नौकरी देने में सक्षम नहीं है. लिहाजा, युवाओं का सारा ध्यान जानबू?ा कर धर्म की ओर मोड़ा जा रहा है. वे कांवड़ यात्राओं को प्रोत्साहित करते हैं. कांवडि़यों पर पुष्पवर्षा करते हैं, उन के चरण पखारते हैं, मानो वे कोई अंतरिक्षयान उड़ाने जा रहे हों. धार्मिक पर्यटन को महिमामंडित किया जाता है जबकि हर साल सैकड़ों घटनाओं में धार्मिक यात्री अपनी जान से हाथ धो रहे हैं. युवाओं के पास करने को कामधंधा नहीं है तो वे कर्ज ले कर नए स्टार्टअप खोल रहे हैं और सालदोसाल में सारी पूंजी गंवा कर बड़े कर्जे में डूब रहे हैं. कौशल की कमी के कारण अवसाद बढ़ रहा है, आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं. दूसरी ओर चीन में राज्य नियंत्रित औद्योगिक ढांचा बहुत मजबूत है.

मैन्युफैक्चरिंग और टैक्नोलौजी कंपनियां ज्यादा हैं. वहां स्किल की कमी नहीं है. बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के साथ किसी न किसी स्किल में माहिर बना दिया जाता है. इस के अलावा उन की सेहत पर पूरा ध्यान दिया जाता है. वे ऊर्जावान हैं. आशावादी हैं. कोई भी समस्या हो उस का समाधान ढूंढ़ते हैं, हमारे युवाओं की तरह भगवान को दोष नहीं देते, न ही व्रत, पूजा, आरती कर भगवान को खुश करने की कोशिश करते हैं. न ही काम बनाने के लिए भगवान को रिश्वत की पेशकश करते हैं. भारतीय युवा समाज, परिवार और परंपराओं से बंधे हुए हैं. शादी, बच्चे, धर्म और जाति का असर हम पर इतना गहरा है कि हम इस से इतर कुछ सोच ही नहीं पाते जबकि चीन में परंपराओं की तुलना में आधुनिकता, स्किल डैवलपमैंट और ‘राज्यनिष्ठा’ ज्यादा है. युवाओं पर ‘कंपनी और देश के प्रति वफादारी’ का दबाव ज्यादा है. चीनी युवा काफी प्रैक्टिकल और अनुशासित हैं. वे सामूहिक सफलता को व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं से ऊपर रखते हैं.

भारतीय युवा परंपराओं और धर्म से जुड़े हैं. उन का अधिकांश समय, रुपया और ऊर्जा धार्मिक कर्मकांडों, ?ाड़पों और दिखावों में बीतता है, जबकि चीनी युवा अधिक अनुशासित, कर्मठ, टैक्नोलौजी उन्मुख और राष्ट्रवादी हैं. उधर, अमेरिका चीन के बढ़ते वर्चस्व से हमेशा खार खाता है, खासकर, कोरोना महामारी के बाद तो वह चीन से खासा नाराज है और उस को औकात में रखना चाहता है. अतीत के वर्षों में शंघाई और अन्य बंदरगाहों में अमेरिका की कोलोनियल चौकियां भी रही हैं.

अमेरिका सदियों से चीनी गतिविधियों पर गहरी नजर जमाए हुए है. कोलोनियल चौकियों में अमेरिकी व्यापारियों और सैनिकों को वहां विशेषाधिकार प्राप्त थे और ये क्षेत्र चीनी संप्रभुता से बाहर हो कर विदेशी शक्तियों के नियंत्रण में चलते थे. इसे इतिहास में ‘चीन में अमेरिकी कोलोनियल चौकियां’ भी कहा जाता है. 1844 की वांग्हिया संधि के बाद अमेरिका को चीन में व्यापार करने का अधिकार मिल गया था तब अमेरिका के व्यापारियों और मिशनरियों ने चीन के कई बंदरगाहों- कैंटन, शंघाई, टियानजिन आदि में अपनी कोलोनियल चौकियां स्थापित कर ली थीं. उन में वहां अमेरिकी व्यापारी, मिशनरी और सैनिक मौजूद रहते थे और यह इलाका चीनी कानून से बाहर था और वहां विदेशी पुलिस व प्रशासन चलता था. यानी, अमेरिकी नागरिक चीन में चीनी कानून के बजाय अमेरिकी कानून के अधीन रहते थे. अमेरिकी कौंसुलेट ही उन के लिए न्याय और प्रशासन का केंद्र था.

वर्ष 1900 के बौक्सर विद्रोह के समय अमेरिका ने अन्य औपनिवेशिक शक्तियों के साथ मिल कर चीन में सैनिक भेजे. बाद में भी अमेरिकी मैरीन शंघाई और अन्य बंदरगाहों में लंबे समय तक तैनात रहे. इस तरह अमेरिका काफी लंबे समय से चीन की निगरानी कर रहा है. वह चीन की ताकत को समझता है और उसे संतुलित रखने के लिए भारत को इस्तेमाल करता है. अब जबकि भारत खुद चीन की तरफ ?ाक रहा है तो अमेरिका का उत्तेजित और गुस्सा होना सम?ा जा सकता है.

अमेरिका को भारत से बड़ा निर्यात

अमेरिका में भारतीय उत्पादों की खपत अच्छी है. अमेरिका भारतीय आईटी कंपनियों, जैसे इनफोसिस, टीसीएस, विप्रो आदि का सब से बड़ा ग्राहक है. भारतीय कपड़े, रैडीमेड गारमैंट्स और होम टैक्सटाइल की मांग अमेरिका में काफी ज्यादा है. हीरे और अन्य रत्न अमेरिका में भारत से सब से अधिक आयात किए जाने वाले उत्पादों में शामिल हैं. अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं का बड़ा हिस्सा भारत से जाता है. भारत अमेरिका को औटोमोबाइल पार्ट्स, स्टील उत्पाद और अन्य इंजीनियरिंग गुड्स भी निर्यात करता है. भारतीय मसाले, चाय, कौफी और रेडी टू ईट फूड्स अमेरिकी उपभोक्ताओं में लोकप्रिय हैं. ये सब काम चौपट हो जाएंगे यदि अमेरिका से भारत ने अपने रिश्ते नहीं सुधारे. दो महामानवों का अहं लाखोंकरोड़ों परिवारों की रोजीरोटी छीन लेगा.

अगर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच अहं और टकराव रिश्तों को खत्म करते हैं तो इस का नुकसान सिर्फ कूटनीतिक स्तर पर नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर भी होगा जब कंपनियों की कमाई घटेगी, नौकरियां जाएंगी और उद्योग ठप हो जाएंगे. इतिहास भी यही बताता है कि जबजब भारत और अमेरिका ने मिल कर काम किया, तबतब भारत को निवेश, तकनीक और निर्यात बाजार के रूप में भारी फायदा हुआ है. दूरी बढ़ने पर सब से पहले आम जनता प्रभावित होती है.

ये बातें प्रधानमंत्री मोदी की सम?ा में आती हैं तो ठीक है वरना भारत की आम जनता को बड़ी आर्थिक आपदा का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा. अमेरिका को टैरिफ से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत से अमेरिका में कुल 3 प्रतिशत मूल्य का सामान जाता है. अमेरिकियों को परेशानी यूरोप, कनाडा, मैक्सिको पर टैरिफ से है, भारत से नहीं. चीन और रूस मिल कर भी अमेरिकी बाजार की कमी पूरी नहीं कर सकते. India China Relations 

Film Story: एक और एजेंडापरस्त फिल्म – “द बंगाल फाइल्स”?

Film Story : 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ. देश के 2 टुकड़े हुए. हिंदुस्तान और पाकिस्तान बना. इस विभाजन में हजारों लोग मारे गए. कइयों का कत्ल किया गया, लोग घरबार छोड़ कर शरणार्थियों की तरह रहने लगे. ट्रेनों में भरभर कर लोगों की लाशें एक जगह से दूसरी जगह भेजी गईं. पाकिस्तान के मोहम्मद अली जिन्ना और भारत के महात्मा गांधी की गलतियों के कारण इतिहास को दुर्दिन देखने पड़े थे. इतिहास की यह सब से दुखद घटना थी. ठीक इसी तरह विभाजन से एक साल पहले 1946 में कलकत्ता में मुसलिमों द्वारा बंगाल के नोआखाली जिले के कई शहरों में हिंदुओं का नरसंहार किया गया. उस में 5,000 लोगों के मरने की बात कही गई. यह घटना भी भारतपाक विभाजन की घटना की तरह सदियों तक याद की जाती रहेगी. वैसे, आज भी बंगाल के जिले नोआखाली की हालत अत्यंत दयनीय है. युवाओं को इस तरह की घटनाओं की जानकारी होनी चाहिए.

दंगों की मूल ऊर्जा कहां से आती है. आप हिंसा का इतिहास उठा कर देखिए कि कभी कोई नेता या गुंडा नहीं मरता. ‘द बंगाल फाइल्स’ विवेक अग्निहोत्री की आधुनिक भारतीय इतिहास पर आधारित ‘द फाइल्स ट्रिलौजी’ की तीसरी और अंतिम किस्त है जो ‘द ताशकंद फाइल्स’ (2019) और ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) के बाद की है. 204 मिनट की यह सब से लंबी भारतीय फिल्मों में से एक है. यह सांप्रदायिक दंगों पर है.

‘द बंगाल फाइल्स’ 16 अगस्त, 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई में जुड़ी दुखद घटनाओं को बर्बर तरह से दर्शाती है. 1946 में बंगाली हिंदुओं की यह हिंसा जल्द ही बंगाल प्रैसिडैंसी के आसपास के इलाकों में फैल गई. जिस में नोआखाली दंगों की घटनाएं शामिल थीं. 1946 में उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में तनावपूर्ण माहौल था. अंगरेजों ने अपने उपनिवेश को आजादी देने का वादा किया था लेकिन सत्ता हस्तांतरण कैसे की जाए, इस पर कोई ठोस फैसला नहीं हो पाया था. मुसलिम लीग एक अलग मुसलिम राज्य पाकिस्तान की मांग कर रही थी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस पर सहमत नहीं थी. इसी तनाव के कारण जगहजगह छिटपुट दंगे हो रहे थे. फलस्वरूप, ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ शुरू हुआ. बंगाली हिंदुओं को निशाना बनाया गया. अनुमान है कि इन दंगों में 5,000 हिंदू मारे गए और हजारों का धर्मपरिवर्तन कराया गया, कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया. संपत्ति को लूटा गया. महात्मा गांधी ने अहिंसा का संदेश फैलाने और दंगाइयों से दंगा रोकने के लिए अशांत क्षेत्रों का दौरा किया, लेकिन असफल रहे. दंगे के बाद कई लोग बेघर हुए.

नोआखाली की दुखद घटनाओं को दर्शाने वाली घटनाओं को सिनेमाई कथा के माध्यम से दिखाया गया है जो न तो डौक्यूमैंट्री बन पाई है न ही फीचर फिल्म. यह कहानी वास्तविक घटनाओं को एजेंडे के रूप में बताती है. इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ कहानी एक आपराधिक अन्वेषक की भी है जो एक गुमशुदा व्यक्ति के मामले पर काम करते हुए भ्रष्टाचार के एक नैटवर्क का परदाफाश करता है. फिल्म की कहानी सच्ची घटनाओं पर आधारित बताई गई है जिसे कलकत्ता किलिंग्स के नाम से भी जाना जाता है.कहानी 2 समानांतर टाइमलाइन में आगे बढ़ती है. इतिहास के इन पन्नों को दर्शाने के साथ विवेक अग्निहोत्री ने यह बताने की कोशिश की है कि विभाजन के 78 साल बाद भी बंगाल के हालात कमोबेश वैसे ही हैं. उन की यह फिल्म पिछली 2 फिल्मों ‘द ताशकंद फाइल्स’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ से बहुत कमजोर नजर आती है.

शुरुआत लौर्ड माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना की बहस से होती है जब अंगरेज मुसलमानों के लिए एक अलग देश बनाने की बात करते हैं. महात्मा गांधी इस का विरोध करते हैं. कहानी वर्तमान में आती है. बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक दलित लड़की के गायब होने का आरोप स्थानीय विधायक सरदार हुसैन (शाश्वत चटर्जी) पर लगता है, जो बंगलादेशी प्रवासियों को अवैध रूप से पश्चिम बंगाल में आने में मदद करता है, जिस का मुर्शिदाबाद में वोटबैंक बनाने पर भी प्रभाव पड़ता है. दिल्ली से सीबीआई अधिकारी शिवा पंडित (दर्शन कुमार) को मामले की जांच के लिए भेजा जाता है. मामले में करीब 100 साल की बूढ़ी मां भारती (पल्लवी जोशी) को शामिल बताया जाता है. कश्मीरी पंडित शिवा का भी अतीत है. वहां पहुंचने पर उसे पता चलता है कि बंगाल में 2 संविधान चलते हैं. आजादी से पहले और बाद के हालात कमोबेश एकसमान हैं. वह एक ऐसी फाइल पर जा पहुंचता है जिस में 1946 की उस त्रासदी के असली तथ्य दर्ज हैं जो अब तक जनता से छिपाए गए थे.

‘बंगाल फाइल्स’ भाजपा की राजनीति को सूट करती फिल्म है. यह इतिहास के उन पहलुओं में ?ांकने की नाकाम कोशिश है जहां से सिर्फ नफरत और तनाव पैदा होते हैं. पल्लवी जोशी व नमाशी चक्रवर्ती का अभिनय ठीकठाक है. विवेक अग्निहोत्री अपनी धुन का डायरैक्टर है. फिल्म में दिब्येंदु ने कैमियो रोल किया है. अनुपम खेर ने महात्मा गांधी का किरदार निभाया है. फिल्म सामाजिक मुद्दे के नाम पर सिर्फ हिंसा दिखाती है. इस फिल्म को देखने वाला हिंसा वाली मानसिकता ले कर ही बाहर आएगा. यह पैटर्न विवेक अग्निहोत्री का पहले भी रहा है. फिल्म का तकनीकी पक्ष भी कमजोर है. संवाद उबाऊ हैं.

संगीत विषय के अनुरूप है. ‘किचुदिन मोनेमोने…’ गाना दर्दनाक है. हताश, शराबी और कटी जबान वाले किरदार में मिथुन ने छाप छोड़ी है. सिनेमैटोग्राफी अच्छी है.

परम सुंदरी??

अकसर डेटिंग करने वाले युवकयुवतियां अपने मोबाइल पर जब देखो लेफ्टराइट स्वाइप करते रहते हैं. ऐसे प्यार का इजहार भला थोड़े होता है. प्यार लेफ्टराइट से कहीं आगे की चीज है. प्यार को दिल ही महसूस कर सकता है, आंखें भी प्यार की भाषा सम?ाती हैं. भारत में 10 डेटिंग ऐप्स पर युवा सब से ज्यादा ऐक्टिव हैं. डेटिंग ऐप द्वारा आप को पार्टनर तो मिल सकता है मगर इस में धोखे भी बहुत हैं, बहुत सोचसम?ा कर डेटिंग ऐप को इस्तेमाल करना चाहिए. एंड्रौयड ऐप पर लोगों की शौर्ट प्रोफाइल होती है. अगर आप को किसी की प्रोफाइल पसंद है तो राइट स्वाइप कर सकते हैं वरना आप लेफ्ट स्वाइप करें. इस फिल्म में भी नायक और नायिका डेटिंग ऐप की सहायता से आपस में मिलते हैं. फिर तो दोनों की बल्लेबल्ले हो जाती है, प्यार परवान चढ़ता जाता है. आखिरकार, दोनों एकदूसरे के हो जाते हैं. फिल्म में डेटिंग ऐप के महत्त्व को बताया गया है.

‘परम सुंदरी’ में मशहूर ऐक्ट्रैस श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी कपूर ने अपनी सुंदरता से दर्शकों को मोहित किया है. शीर्षक के मुताबिक उस का रंगरूप खिल कर निखरा है. यह एक रोमांटिक फिल्म है. इस फिल्म को हिंदी के साथसाथ दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी रिलीज किया गया है. इस तरह की फिल्म में कहानी न के बराबर होती है.

जिस तरह दक्षिण भारत के, खासकर कोकण, इलाके में फिल्माई गई 12 साल पहले आई ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ दर्शकों को अच्छी लगी, फिल्म के बैकग्राउंड में बहते ?ारने उन के मन को भाए ठीक उसी प्रकार ‘परम सुंदरी’ के खूबसूरत चित्रण को खूब सराहा गया है. केरल की खूबसूरती को दिलकश तरीके से दिखाया गया है. फिल्म में हलकाफुलका मनोरंजन है जो दर्शकों को मुसकराने पर मजबूर करता है. इस फिल्म की तुलना ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ से की जा रही है, लेकिन यह चेन्नई ऐक्सप्रैस जैसी बिलकुल नहीं है. उस फिल्म में काफी एलिमैंट थे परंतु यहां फिल्ममेकर्स ने ज्यादा मेहनत नहीं की है. इस फिल्म की कहानी 3 लोगों ने लिखी है. तीनों मिल कर भी इसे बेहतर बनाने वाली फिल्म नहीं बना पाए हैं. इस की कहानी प्रिडिक्टिबल हो गई है.

इस फिल्म की कहानी है परम (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की, जो हमेशा से ही बिजनैस में नाकाम रहा है. पिता (संजय कपूर) उसे एक और पैसा कमाने का मौका देता है वरना सब खत्म. परम एक सोलमेट ऐप में निवेश करता है. ऐप से उसे पता चलता है कि उस की सोलमेट सुंदरी (जाह्नवी कपूर) केरल में है. परम दिल्ली से केरल पहुंचता है और पहली नजर में ही सुंदरी पर दिल हार बैठता है. लेकिन सुंदरी सोशल मीडिया से दूर रहने वाली आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी लड़की है. दोनों एकदूसरे के करीब आते हैं. उन दोनों के प्यार में कई बाधाएं आती हैं परंतु वे सारी बाधाओं को पार कर एकदूसरे का हाथ थाम लेते हैं.

फिल्म का फर्स्ट हाफ धीमा है, मध्यांतर के बाद फिल्म कुछ रफ्तार पकड़ती है. क्लाइमैक्स मजेदार है. फिल्म का तकनीकी पक्ष भी अच्छा है. कहानी में कोई नयापन तो नहीं है परंतु जाह्नवी कपूर जैसा चेहरा देख कर ताजगी महसूस होती है. सिद्धार्थ मल्होत्रा से उस की कैमिस्ट्री जमी है. सचिन जिगर का ‘परदेसिया…’ गाया गया गाना खूबसूरती से गूंजता है. इस की कोरियोग्राफी भी बढि़या है. फिल्म में किरदारों के कौस्ट्यूम्स का खास ध्यान रखा गया है. संथाना कृष्णन रविचंद्रन की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है जो केरल प्रदेश को एक लैंडस्कैप के रूप में दिखाती है.

सिद्धार्थ मल्होत्रा हैंडसम लगा है. मलयाली सुंदरी की भूमिका में जाह्नवी कपूर ने बैस्ट परफौर्मेंस दी है. मनजोत दर्शकों को हंसा पाने में सफल है. संजय कपूर औसत है.

तेहरान??

तेहरान ईरान की राजधानी और सब से बड़ा शहर है, जौन अब्राहम की यह फिल्म तेहरान शहर के बारे में नहीं है, न ही इस में तेहरान शहर को एक्सप्लोर किया गया है. इजराइल ने ईरान से दुश्मनी मोल ली है, उस ने तेहरान शहर पर जम कर बम बरसाए हैं. एक तरह से इतने सुंदर शहर को उस ने नेस्तनाबूद कर दिया है. अमेरिका भी ईरान को तबाह करना चाहता है. वह ईरान के अन्य शहरों के साथसाथ तेहरान पर खुद बम न बरसा कर इजराइल से बमबारी करा रहा है.

‘तेहरान’ फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है. जौन अब्राहम ने देशभक्ति के साथसाथ कई ऐक्शन फिल्में भी बनाई हैं, ‘मद्रास कैफे’, ‘धूम’, ‘न्यूयौर्क’  ‘रेस-2’, ‘शूट आउट एड वडाला’ इस के अलावा उस ने ‘परमाणु : द स्टोरी औफ पोखरण’ और ‘सत्यमेव जयते’ जैसी तारीफ के काबिल फिल्में भी बनाईं. ईरान और इजराइल सालों से आपस में लड़ रहे हैं और इस का खमियाजा दोनों ने भुगता है. लेकिन 13 साल पहले दिल्ली में इजराइली दूतावास के बाहर हुए बम धमाके से भारत भी इस की चपेट में आ गया था. यह फिल्म उसी घटना का परदाफाश करती है. कैसे दिल्ली पुलिस का एक अफसर साजिश का पता लगातेलगाते ईरान के शहर तेहरान पहुंच जाता है, यह फिल्म यही तहकीकात करती है.

नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इजराइली दूतावास के बाहर हुए बम धमाके का पता लगाने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस के अफसर राजीव कुमार (जौन अब्राहम) को सौंपी जाती है जिस में उस की मदद एसआई दिव्या राणा (मानुषी छिल्लर) और शैलजा (नीरू बाजवा) करती हैं. तेहरान में इंटरनैशनल लैवल पर बड़े दांवपेंच का खेल खेला जा रहा है. इस बम धमाके में कई मासूम लोग घायल हो गए थे और एक छोटी सी बच्ची की जान चली गई थी. मामला तब और गंभीर हो जाता है जब पता चलता है कि मारी गई फल बेचने वाली बच्ची राजीव के लिए सिर्फ एक केस फाइल ही नहीं, एक निजी जुड़ाव भी थी. तहकीकात करते हुए राजीव कुमार अपनी टीम के साथ जांच मिशन पर जाता है. तब पता चलता है कि कार बम ब्लास्ट के तार इजराइल और भारत के साथसाथ ईरान की कूटनीति से भी जुड़े हैं. भारत और इजराइल के बीच गैस डील होने वाली है और राजीव कुमार अगर इजराइल के षड्यंत्र का परदाफाश करेगा तो डील कैंसिल हो जाएगी.

दूसरी ओर, भारत के कूटनीतिज्ञ चाहते हैं कि राजीव और उस के साथी मिशन अधूरा छोड़ कर वापस लौट आएं. राजीव के न मानने पर अपना देश राजीव को त्याग देता है. इस मिशन में राजीव को दिव्या को खोना पड़ जाता है.  मगर घर में पत्नी व बेटी उस का इंतजार कर रहे हैं. आखिरकार, वह अपना मिशन पूरा कर वापस लौटता है. भारत में उसे सम्मानित किया जाता है. आजादी के मौके पर देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों का आना एक परंपरा सी रही है. फिल्म थ्रिलर अंदाज में चलती है. पूरी फिल्म में टैंशन बना रहता है. मूड के मुताबिक कहानी उल?ा हुई है. ईरानी और इजरायली भाषा राजनीतिक गतिरोध पैदा करते हैं. तेहरान की गलियों, हलचलभरे बाजारों और रहस्यमयी अंधेरी जगहों को खूबसूरती से फिल्माया गया है. ऐक्शन और चैजिंग सीन बढि़या हैं.

राजीव कुमार की भूमिका में जौन अब्राहम जंचता है. दिव्या की भूमिका में मानुषी छिल्लर भी जंची है. नीरू बाजवा याद रह जाती है. आतंकी के किरदार में हादी खानजानपोर क्रूर लगा है. कहानी बिना शोरशराबा किए अपनी बात कह देती है. निर्देशन अच्छा है. पार्श्व संगीत ठीकठाक है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

जोरा??

‘जोरा’ एक क्राइम बेस्ड फिल्म है. ‘गुप्त’, ‘मोहरा’, ‘विश्वात्मा’, ‘त्रिदेव’ जैसी सस्पैंस थ्रिलर बना कर अपनी साख बनाने वाले राजीव राय ने जिस किरदार जोरा के इर्दगिर्द कहानी बुनी है वह फिल्म की शुरूआत में तो सस्पैंस पैदा करती है मगर अंत आतेआते चरमोत्कर्ष जगाने में सफल नहीं हो पाती. नाम बड़े दर्शन छोटे जैसी दिखाई पड़ती है. राजीव राय 2 दशकों पुराने सिनेमाई जादू की उम्मीद ले कर परदे पर लौटे हैं, मगर अफसोस उस ने साबित कर दिया है कि समय के साथ खुद को न बदलना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. ‘जोरा’ दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है. पुरानी और बेढंगी कहानी को आउटडेटेड अंदाज में पेश किया गया है. पिछले 21 वर्षों में फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, दुनिया में तकनीकी स्तर पर काफी बदलाव हुए हैं. ‘जोरा’ को देख कर लगता है कि निर्देशक समय के साथ पीछे रह गया है, वह अपना पुराना जादू जगा पाने में असफल रहा है.

कहानी 2003 में जयपुर से शुरू होती है. ईमानदार इंस्पैक्टर विराट सिंह (विकास गोस्वामी) नकली स्टैंपपेपर छापने वाले एक गिरोह को पकड़ता है लेकिन जोरा नाम की महिला उसे मार देती है. जोरा ने टोपी और मास्क पहन कर अपनी पहचान छिपा रखी है. विराट का बेटा इंस्पैक्टर रंजीत अपने सामने पिता की हत्या होते देखता है. सबइंस्पैक्टर रंजीत (रविंदर कुहरा) एक अवैध ड्रग रैकेट का भंडाफोड़ करने के लिए कानून को अपने हाथ में लेता है. यह बात उस के वरिष्ठ अधिकारी इकबाल (करणवीर) को पसंद नहीं आती. दोनों के बीच मतभेद हो जाता है. रंजीत को जब पता चलता है कि उस के पिता की हत्या जोरा ने की है तो वह उस तक पहुंचना चाहता है और पुलिस अफसर बन अपने पिता की मौत का सच सामने लाने की कसम खाता है. वह अपराधियों का सफाया एनकाउंटर के जरिए करता है. उस का ऐसा करना उस के सीनियर अफसर इकबाल (करणवीर) को खटकता है.

अब यह जोरा कौन है? सारा सस्पैंस इसी पर टिका हुआ है. जोरा की तलाश शुरू हो जाती है. जांच के दौरान उसे कुछ सुराग मिलते हैं जो उसे उसी रहस्यमयी जोरा की ओर ले जाते हैं. दूसरी ओर जोरा उसे तलाशने वालों को मौत के घाट उतार देती है. आखिरकार, रंजीत जोरा की सच्चाई की पहचान उजागर करता है, तो दर्शक चौंक जाते हैं. पूरा सिस्टम, परिवार और खुद रंजीत भी हिल कर रह जाता है.

फिल्म की यह कहानी अंत तक सस्पैंस को बनाए रखने में असफल हुई है. कई जगह कहानी गड़बड़ हुई है. फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू कमजोर है. ऐक्शन सीन भी घिसेपिटे हैं. म्यूजिक भी कमजोर है. पलक मुच्छल का गाया टाइटल सौंग कुछ राहत देता है. निर्देशन और संपादन खराब है. सभी कलाकारों ने निराश किया है.

 

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