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Bed Making : अब आप भी बना सकते हैं अपना शानदार बेड

Bed Making : अब इतनी आसान तकनीक आ गई है जिस से लकड़ी का बेड कोई भी आसानी से बना सकता है. मजेदार बात यह कि इस का असेम्बल प्रोसेस इतना आसान है कि इस में कारपेंटर की जरूरत भी नहीं.

जब भी हम बेडरूम में एक शानदार बेड की बात करते हैं तो हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि लकड़ी कहां से आएगी ? कैसे लकड़ी की पहचान करें ? प्लाई से बने बेड टिकाऊ होंगे या नहीं ? इस को बनाने के लिए कारपेंटर कैसा होगा ? सही कारीगर नहीं हुऐ तो क्या होगा ? पैसे तो ज्यादा न ले ले ? हमारे बेडरूम से मैचिंग फर्नीचर कैसा होगा ? तमाम तरह के सवालों से परेशान हो कर लोग नए बेड या फर्नीचर का सपना ही त्याग देते हैं.

टैक्नलौजी ने इस परेशानी का हल निकाल दिया है. मजेदार बात यह है कि आप अपना बेड बिना किसी कारपेंटर की मदद के खुद ही फिट कर सकते हैं. इस के लिऐ न तो किसी कारपेंटर की मदद लेने की जरूरत है और न ही स्क्रू और कील जैसे जरूरती चीजों की. अपने बेड को बना कर उस पर लेटने का सुख कुछ अलग ही अनुभव देता है. यह आप की सोच, जरूरत और स्टाइल के तो होते ही हैं मजबूत किफायती और टिकाऊ भी होते हैं.

बिल्ट-इन या कस्टमाइज्ड फर्नीचर

अपने से फिट किये जाने वाले फर्नीचर को ‘बिल्ट-इन’ या ‘कस्टमाइज्ड फर्नीचर’ कहा जाता है. कमरे की जगह का अधिकतम प्रयोग करने के साथ ही साथ यह अपने बेहतरीन डिजाइन की वजह से पंसद किए जा रहे हैं. यह फर्नीचर कमरे की दीवारों और फर्श के साथ मैच करते हुए हो सकते हैं. अब फर्नीचर केवल वुडेन कलर तक सीमित नहीं रह गए है. यह पानी और दूसरी चीजों से जल्दी खराब नहीं होते हैं. जरूरत के हिसाब से इन को मजबूत बनाने के लिए स्टील की रौड या छड़ का उपयोग भी किया जाता है.

बेड, सोफा, अलमारी, किताबों की अलमारी, किचन कैबिनेट, बाथरूम वैनिटी और छोटीछोटी सजावट और जरूरत के सेल्फ, टेबिल और भी बहुत सारे प्रोडक्ट्स इस में शामिल हैं. इस की खास बात यह होती है कि यह कमरे की प्रत्येक इंच जगह का उपयोग करता है. बिल्ट-इन फर्नीचर घर को सुव्यवस्थित और आकर्षक लुक प्रदान करता है. यह आमतौर पर दीवारों या फर्श से जुड़ा होता है, जिस से यह मजबूत और स्थिर होता है. इस के जरिए कमरे के कोनों का बेहतरीन उपयोग हो सकता है.

इस को फिट कैसे करें

‘बिल्ट-इन फर्नीचर’ को दो तरह से फिट किया जा सकता है. अगर कस्टमर खुद इस को फिट करना चाहते हैं तो उन को सब से पहले एक टूल किट लेनी होती है. इस की कीमत फर्नीचर में जुड़ी नहीं होती है. एक बार खरीदने के बाद इस को संभाल कर रखें तो बारबार इस को खरीदना नहीं पड़ता है. जिस में स्क्रू ड्राइवर के साथ कई तरह स्क्रू ओपनर होते हैं. जिन को स्क्रू ड्राइवर में फिट कर के जरूरत के हिसाब ने नट बोल्ट को लगाने का काम किया जा सकता है. टूल किट में एक हथौड़ी, प्लास भी होते हैं. इस एक टूल किट के जरीए ही पूरा फर्नीचर फिट कर दिया जाता है.

अगर आप खुद इस फर्नीचर को फिट नहीं कर सकते तो आप के पास कारपेंटर भी भेजा जा सकता है. वह अपनी फीस अलग से लेता है. जैसे एक बेड 13 हजार का है तो 4 हजार अलग से देने होंगे कारपेंटर को. अपने से फर्नीचर को फिट करना बेहद सरल होता है. फर्नीचर के साथ ही साथ एक बुकलेट दी जाती है. जिस में ग्राफिक बना कर स्टेप बाई स्टेप यह समझाया जाता है कि कब क्या करना है. किस टूल का प्रयोग किस स्क्रू या नटबोल्ट को लगाने में करना है यह चित्रों के जरीये समझाया जाता है. फर्नीचर के साथ एक भी नट बोल्ट एक्सट्रा नहीं होता है. अगर एक भी स्टेप गलत हो जाता है तो आगे सही से फिटिंग नहीं होती है. गाइड लाइन के साथ फर्नीचर को फिट करना बेहद सरल होता है. स्क्रू और नटबोल्ट इतने अच्छी किस्म के बने होते हैं और इन को लौक करने का सिस्टम बहुत अच्छा होता है जिस से फर्नीचर हिलता डुलता नीं है. इस को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का एक ही तरीका होता है कि इन को खोल कर ही ले जाया जाए.

कौन सी कंपनी बना रही फर्नीचर

फर्नीचर की कीमत उस के साइज, लकड़ी, डिजाइन से तय होती है. आइकिया दुनिया की सब से मशहूर कंपनी है जो लकड़ी और उस जैसे प्रोडक्ट्स से फर्नीचर की बेहतरीन डिजाइन के फर्नीचर तैयार करने का काम करती है. आइकिया स्वीडन की कंपनी है. 1943 में इस की स्थापना इंगवार काम्पराड ने की थी. उन का सपना था कि कम कीमत में अच्छा फर्नीचर घर घर पहुंच सके. आइकिया 2008 से दुनिया की सब से बड़ी फर्नीचर के रूप में स्थापित हो गई है. कंपनी का मुख्यालय नीदरलैंड के डेल्फ्ट में है. इस की फैक्ट्री चीन के अलगअलग शहरों में है. आइकिया ने 2018 में भारत के हैदराबाद में अपना पहला स्टोर खोला था. इस के बाद कंपनी ने नवी मुंबई और बेंगलुरु में भी स्टोर खोले हैं. भारत में आइकिया का लक्ष्य 40 शहरों में स्टोर खोलना है.

भारत के मुकाबले स्वीडन एक बहुत छोटा देश है. इस के बावजूद वहां की फर्नीचर कपंनी आइकिया भारत के फर्नीचर बाजार में अपना एकाधिकार जमाने में सफल रही है. भारत में कंपनियां अब उस के तर्ज पर बिजनेस को आगे ला रही है. स्वीडन उत्तरी यूरोप के नोर्डिक क्षेत्र का हिस्सा है. स्वीडन आकार में बड़ा और जनसंख्या में छोटा है. यहां की जनसंख्या 1 करोड़ 5 लाख के करीब है. जो विश्व की जनसंख्या का 0.13 प्रतिशत हिस्सा है. यहां 20 से 64 आयुवर्ग में 84 फीसदी पुरुष 82 फीसदी महिलाऍन रोजगार करती हैं.

स्वीडन इतना लंबा है कि जब दक्षिणी छोर पर बर्फ खिल रही होती है, तब भी इस का उत्तरी भाग बर्फ से ढका रहता है. इस का दो तिहाई से ज्यादा भूभाग जंगल से ढका है और लगभग 1,00,000 झीलें हैं. यह यूरोप का पांचवा सब से बड़ा देश और आकार में लगभग कैलिफोर्निया के बराबर है. स्टोकहोम, गोटेबोर्ग और माल्मो यहां के प्रमुख शहर हैं. स्वीडन से निर्यात होने वाली वस्तुओं में लकड़ी के उत्पाद के साथ ही साथ वाहन और मशीनें, फार्मास्यूटिकल्स रसायन, इलेक्ट्रौनिक्स, खनिज, ऊर्जा, खाद्य पदार्थ, जूते और कपड़े प्रमुख हैं.

आइकिया मजबूत फ्रेम और स्लैट्स ठोस लकड़ी के फर्नीचर तैयार करती है. यह ओक, अखरोट, शीशम और सागौन जैसी लकड़ी का प्रयोग भी करते हैं. इस के साथ ही इंजीनियरिंग वुड का प्रयोग प्लाई बनाने में होता है. आइकिया जैसी कंई और कंपनिया भी है जो अलगअलग तरह से इस तरह के फर्नीचर बना रही है. इन में एमडी ट्रेड लाइन सब से प्रमुख कंपनी है. यह स्टोन और फर्नीचर के क्षेत्र में काम कर रही एक भरोसेमंद कंपनी है. भारत सहित पूरी दुनिया में यह अपने फर्नीचर पंहुचा रही है. कंपनी प्रेसीडैंट मुरलीधर आनंदीलाल का कहना है ‘कुशल शिल्पकला और गुणवत्ता ही हमारी ताकत है. हमारे प्रोडक्ट्स वैसे ही हो जैसे आप चाहते हैं.’

इंजीनियर्ड वुड कितना मजबूत

आज का सस्ता और टिकाऊ फर्नीचर इंजीनियर्ड वुड से तैयार होता है. इस को कम्पोजिट वुड भी कहा जाता है. यह लकड़ी के रेशों, कणों को एक साथ चिपका कर बनाई जाती है. इस के ऊपर पौलीलेयर लगाई जाती है. इस को चिकना और चमकदार बनाने के लिए रेजिन का प्रयोग किया जाता है. जिस से यह लकड़ी जल्दी खराब नहीं होती है.

इंजीनियर्ड वुड कई प्रकार का होता है. प्लाईवुड में लकड़ी की पतली परतों को एक साथ चिपका कर बनाया जाता है. ओरिएंटेड स्ट्रैंड बोर्ड (ओएसबी) लकड़ी के बड़े स्ट्रैंड्स को एक साथ चिपका कर बनाया जाता है. पार्टिकल बोड लकड़ी के छोटे कणों को एक साथ चिपका कर बनाया जाता है. मीडियम डेंसिटी फाइबरबोर्ड (एमडीएफ) लकड़ी के रेशों को एक साथ चिपका कर बनाया जाता है. लेमिनेटेड वेनियर लंबर (एलवीएल) लकड़ी के पतली छाल को एक साथ चिपका कर बनाया जाता है. क्रोस लैमिनेटेड टिम्बर (सीएलटी) लकड़ी के स्लैब को एकदूसरे के लंबाई में रख कर चिपका कर बनाया जाता है.

इंजीनियर्ड वुड लकड़ी से अधिक अधिक मजबूत और टिकाऊ होती है. इस में एक तरह के कैमिकल का प्रयोग करते हैं जिस से इस को दीमक से नुकसान नहीं होता. पानी से सड़ने का खतरा नहीं होता है. नमी के कारण सिकुड़ती या फूलती नहीं है. यह प्राकृतिक लकड़ी की तुलना में कम खर्चीली होती है. इस लिए इस से बने फर्नीचर सस्ते होते हैं. इस में अलगअलग तरह के डिजाइन बनाना आसान होता है. आग लगने पर यह जलती नहीं है. बहुत खराब हालत में भी केवल सुलगती है. जिस से आग लगने से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है.

इंजीनियर्ड वुड पर इंपोर्ट ड्यूटी 15 से 25 फीसदी होती है. यह कीमत और किस तरह का प्रोडक्ट्स प्रयोग किया गया है इस पर निर्भर करता है. इस के अलावा फर्नीचर की कीमत के हिसाब से ही जीएसटी लगाया जाता है. भारत में लड़की के फर्नीचर पर आमतौर पर 18 फीसदी जीएसटी लगता है. लग्जरी फर्नीचर, लोहे और लकड़ी के फर्नीचर पर 28 फीसदी जीएसटी लगता है. लकड़ी और प्लास्टिक के फर्नीचर पर 18 फीसदी जीएसटी है. कीमत के हिसाब में यह 10 हजार तक 12 फीसदी, 10 से 25 हजार तक 18 फीसदी और 25 हजार से अधिक पर 28 फीसदी जीएसटी लगता है.

भारत में ‘बिल्ट-इन’ या ‘कस्टमाइज्ड फर्नीचर’ की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है. सरकार अगर इस कारोबार को सहायता दे तो आइकिया जैसी विदेशी कंपनियों के मुकाबले देशी कंपनिया भी आगे बढ़ सकती है. जिस से यहां भी रोजगार मिल सकेगा और फर्नीचर बाजार सस्ता भी हो सकेगा. बेरोजगार लोगों को काम मिल सकेगा. अभी भारत में लकड़ी का काम कराना बेहद मुश्किल, खर्चीला और समय लेने वाला है. एक कारपेंटर दिन का 800 रूपये से 1500 रुपए की मजदूरी लेता है. उस के पास काम करने वाले पुराने किस्म के औजार ही हैं. बिजली से चलने वाले नए किस्म के औजार और नटबोल्ट न होने से उस के द्वारा तैयार किए गए सामान बहुत खूबसूरत नहीं होते हैं.

सावधानी से करें फर्नीचर की देखभाल

इंजीनियर्ड वुड प्राकृतिक लकड़ी से अलग होती है. यह अपने रखरखाव में केयर मांगती है. इस का पालन करेंगे तो यह फर्नीचर काफी समय तक चलेगा.
• जब यह फर्नीचर आता है तभी उस में लिखा होता है कि कितना वजन सहन करने की क्षमता इस में होती है. वजन से अधिक क्षमता न डालें.
• फर्नीचर गंदा हो तो इस को साफ करने का कैमिकल आता है उस से साफ करें.
• फर्नीचर को कमरे को फिर से व्यवस्थित करते समय सावधानी बरतें ताकि खरोंच या गड्ढों से बचा जा सके.
• समयसमय पर इस के स्क्रू और बोल्ट, की जांच करते रहें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे कसे हुए और सुरक्षित हैं.
• फर्नीचर को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते समय या मरम्मत के दौरान खरोंच, डेंट से बचाने के लिए कवर या कंबल का उपयोग करे.
फर्नीचर को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए नियमित सफाई, पोलिशिंग और नमी से बचाव की आवश्यकता होती है.  Bed Making

Gig Work : डिलीवरी बौय से डेटा एंट्री तक, एक पीढ़ी की बर्बादी

Gig Work : भारत में आज आम घरों के युवा गिग वर्क पर निर्भर हो गए हैं. जहां न फाइनेंसियल स्टेबिलिटी है न सामाजिक सुरक्षा. सरकारों ने भी इन युवाओं से अपना पल्ला झाड़ा हुआ है.

भारत में किराने की दुकानें परंपरागत रूप से हर गलीमहल्ले की पहचान रही हैं. पहले तकरीबन हर महल्ले में छोटीबड़ी किराना दुकानें आसानी से मिल जाती थीं और लोग अपने रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इन्हीं पर निर्भर रहते थे. लेकिन बदलते समय के साथ अब इन में से कई दुकानें बंद हो चुकी हैं या बंद होने की कगार पर हैं.

देश की अर्थव्यवस्था में किराने की दुकानों का अहम योगदान रहा है, क्योंकि ये न केवल रोजमर्रा की चीजें उपलब्ध कराती थीं बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी बड़ा स्रोत थीं. किराना दुकानों का नेटवर्क इतना मजबूत था कि देश के हर कोने में बनने वाले उत्पाद लोगों तक आसानी से पहुंच जाते थे. गलीमहल्ले में मौजूद ये दुकानें ग्राहकों को भरोसे, सुविधा और व्यक्तिगत संबंधों का अनुभव कराती थीं, जो औनलाइन डिलीवरी सेवाएं पूरी तरह नहीं दे पातीं.

किराने की दुकान का दूसरा फायदा यह भी था कि लोग अपने पास के दुकान से उधारी भी समान घर ले आते थे, जिस से लोग भूखे नहीं सोते थे. दुकानदार को भी यह विश्वास रहता था कि जो व्यक्ति उन की दुकान से उधारी ले कर गया है, वह अपनी तनख्वाह मिलते ही पहले मेरी उधारी चुकता कर देगा और ऐसा ही हुआ करता था.

आज जब ई-काउमर्स तेजी से बढ़ रही है, तो पारंपरिक किराना दुकानों का अस्तित्व संकट में है. अगर इन दुकानों को आधुनिक तकनीक और नई कारोबारी रणनीतियों से जोड़ा जाए तो ये फिर से अर्थव्यवस्था में मजबूत भूमिका निभा सकती हैं और उपभोक्ताओं को सस्ता, भरोसेमंद और सुविधाजनक विकल्प दे सकती हैं. लेकिन आज जमाना जैसे ही डिजिटल हुआ लोग 20 से 25 रुपए के कैश बैक औफर के लिए समान औनलाइन मंगवाने लगें. मगर इस कैशबैक ने देश की लाखों छोटे किराने की दुकानों पर ताला लगवा दिया. यह वे दुकानें थीं जहां पहले दुकान दादा ने शुरू की और फिर उस दुकान को बाप और चाचा ने आगे बढ़ाया. लेकिन अब इस औनलाइन कैशबैक और होम डिलीवरी ने दुकान बंद करवा दी और बेटों को उन्हीं समानों की डिलीवरी में लगवा दिया जो कभी बाप और दादा बेचा करते थे.
अब देश में लाखों युवा जोमेटो, स्विगी, उबर, ओला और जेप्टो से जैसे प्लेटफार्म के लिए काम कर रहे हैं. इसे ‘गिग वर्क’ कहा जाता है. गिग वर्क का मतलब ऐसे जाऊब से है जो अस्थाई, फ्लेक्सिबल जौब होते हैं. इस के साथ ही इन नौकरियों में सुरक्षा बिल्कुल भी नहीं होती है. ये नौकरियां बाहर से लचीलापन और सुरक्षा का वादा करती हैं, लेकिन हकीकत कुछ और है. यह नौकरियां युवाओं को ऐसी स्थिति में डाल देती है जहां स्थायित्व, भविष्य की योजना, प्रमोशन और स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं होती है. ऐसे में यह सवाल जरुर उठता है कि क्या यह रोजगार डिजिटल तकनीकी गुलामी का नया रूप है?

गिग इकोनमी का विस्तार और उस की परिभाषा

गिग इकोनमी एक ऐसी अर्थव्यवस्था को कहा जाता है जहां लघु अवधि और अस्थायी काम होते हैं. यह तकनीकी यानी मौजूदा समय में ज्यादातर डिजिटल प्लेटफौर्म्स के माध्यम से संचालित किए जाते हैं. भारत में फिलहाल ओला, उबर, स्विगी, ब्लिंकिट, जेप्टो जैसे सैकड़ों प्लेटफौर्म हैं. ये लाखों युवाओं को रोजगार देते हैं. इस के साथ ही इन कम्पनियों के साथ जुड़ना भी आसान होता है. इन कामों को करने के लिए कोई इंटरव्यू नहीं होते हैं, बस ऐप डाउनलोड कर के अपना काम शुरू करना होता है. लेकिन इस आसनी से मिलने वाले काम के लिए भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है.

ऐसे जौब्स को मार्केट में बढ़ावा देने के लिए कम्पनियां इन वर्कर्स को ‘पार्टनर’ कहती है. मगर इन पार्टनर्स के पास न कोई मैडिकल सुविधा होती है, न ही कोई प्रोविडैंट फंड और न ही पेंशन. इन लोगों की न अपनी कोई यूनियन होती है और न ही कोई न्याय का कोई मंच. इस के साथ ही कम्पनियां किसी भी वक्त ऐप से इन का अकाउंट ब्लौक कर देती है और अगले दिन से इन की आमदनी बंद हो जाती है. कंपनियां इन के साथ सिर्फ एकतरफा रिश्ता रखती है और इस रिश्ते में पूरा नियंत्रण कंपनियों के पास ही होता है.

शुरूशुरू में जब कोई युवा डिलीवरी या कैब ड्राइविंग का काम करता है, तो उसे यह लगता है कि यह नौकरी बहुत अच्छी नौकरी है और यह कमाई और लचीलेपन से भरपूर है. लेकिन इस दुनिया में कदम रखने के कुछ ही दिनों के बाद उसे यह अहसास होता है कि इस आजादी के पीछे एक अदृश्य गुलामी छुपी हुई है. हर डिलीवरी बौय को समान समय पर डिलीवरी करने का दवाब होता है, इस के साथ ही कैब ड्राइवर्स पर भी राइड समय पर पूरा करने का दवाब होता है. दवाब से जूझ रहे ड्राइवर्स और डिलीवरी बौय अपने कस्टमर्स से गुजारिश करते हैं कि कृपया वे उन्हें अच्छी रेटिंग्स दें ताकि उन की नौकरी जारी रह सकें.

कई बार सामान देर से मिलने पर कस्टमर्स नाराज हो जाते हैं और डिलीवरी बौय काफी कुछ कह देते हैं. सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो में यह देखा गया कि कस्टमर्स डिलीवरी बौय से मारपीट और गाली गलोज तक करते हैं. वहीं ड्राइवर्स को ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता है. कम पैसे में ऐसी राइड मिलती है कि जहां से जा कर वापस आना घाटे का सौदा उन के लिए साबित होता है. वहीं लोकेशन पर समय पर न पहुंचने पर पेसेंजेर्स के द्वारा कई बार बुरा भला कहा जाता है. ये लोग दवाब, ग्राहक की बदतमीजी, ट्रैफिक, मौसम की मार झेलते हुए अपना काम करते हैं.

अगर कभी दुर्घटना हो जाए तो कम्पनियां बीमा के नाम पर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं. इन गिग वर्कर्स को इंसान तक नहीं समझा जाता है तो सोशल सिक्योरिटी तो बहुत दूर की बात है. इस के साथ ही परिवार और समाज का नजरिया भी इन के प्रति दोयम दर्जे का होता है. बेरोजगारी के युग में युवाओं को लगता है कम से कम कुछ तो कर रहे हैं लेकिन समाज उन्हें सम्मान नहीं देता है.

डाटा एंट्री जौब भी बर्बाद कर रहा युवाओं को

देश में बेरोजगारी चरम पर होने की वजह से डेटा एंट्री की नौकरियां अकसर पढ़ेलिखे युवाओं के लिए एक राहत के विकल्प के रूप में नजर आती है. ये भी डिलीवरी बौय की नौकरी और कैब ड्राइवर्स की नौकरियों की तरह दिखने में आसान होती हैं. कंप्यूटर, इंटरनेट और थोड़ी टाइपिंग स्किल के साथ शुरू की जा सकती हैं. मगर इस का कड़वा सच यह है कि यह क्षेत्र सब से तेजी से औटोमेट हो रहा है, जिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इस वजह से बड़े शहरों में अब ऐसी जौब्स खत्म होने के कगार पर है. क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग तकनीकें डाटा को खुद प्रोसेस करती है, जिस से इंसानों की जरुरत घटती जा रही है. इस के साथ ही इन नौकरियों में फिक्स सैलरी नहीं होती है और काम के आधार पर पैसा मिलता है. इस वजह से अधिकतर युवा कुछ महीनों में ही मानसिक और शारीरिक थकावट का शिकार हो जाते हैं. ऐसा अनुमान है कि 1 से 2 वर्षों में यह नौकरियां गायब हो जाएंगी या इस की मांग बहुत ही घट जाएगी.

अधिकतर लोग जो गिग इकोनमी में काम करते हैं उन की उम्र 18 से 25 साल के बीच होती हैं. इन की स्पीड, उर्जा और काम करने की ललक शुरूआती दौर में कंपनियों को आकर्षित करती है. मगर जैसे ही ये 30 के आसपास आते हैं उन की स्पीड घटती है लेकिन जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं. इस के साथ ही कंपनी नए और सस्ते तेज वर्कर्स की तलाश करने लगती है, क्योंकि भारत एक युवा देश है इसलिए कंपनियों को काम के लिए युवाओं की कमी नहीं है. लेकिन आगे चल कर ये युवा भी बेकार हो जाते हैं.

ऐसे कंपनियों में प्रमोशन ज्यादा नहीं मिलता है, गिग इकोनमी में काम करने वाले अधिकतर लोग अपनी जिंदगी से हताश निराश होते हैं. और जिल्लत की जिंदगी जीते हैं. गिग इकोनमी में काम करने वाले अधिकतर युवाओं को लगता है कि वे सुपरवाइजर बनेंगे या किसी स्थिर स्थिति में पहुंचेंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि 90 फीसदी से अधिक लोगों को कोई प्रमोशन नहीं मिलता है. इस के साथ ही इन लोगों के पास कोई अपग्रेडेड स्किल्स पाने का समय भी नहीं होता और न ही पैसा होता है. ये लोग उम्र के मोड़ में नौकरी के लायक नहीं रह जाते, और इन के पास कोई विकल्प नहीं बचता.

बाजार में स्किल्स की मांग करता है, लेकिन गिग वर्क में स्किल्स का कोई महत्त्व नहीं है. कंपनियों में तेज काम करने वाले, नियम को मानने वाले और ज्यादा सवाल न करने वाले लोगों को नौकरी पर रखा जाता है. भारत में स्किल इंडिया जैसे कई सरकारी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, मगर ये गिग वर्कर की पहुंच से बाहर हैं यानी प्रभावशीलता असंगठित क्षेत्र तक नहीं पहुंच पा रही है. सुदूर देहात से आने वाले युवा जिन तकनीकों को सीखते हैं, वे अकसर बाजार की जरूरतों के अनुसार नहीं होती है. वे जोमेटो, स्विगी और उबर जैसे ऐप्स की दया पर निर्भर हो कर अपना काम करते हैं. क्योंकि ऐसे युवाओं पर परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं और ये कम पढ़े लिखे होते हैं. इन्हें किसी भी हाल में अपने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना होता है.

गिग वर्कर्स की बढ़ती संख्या

नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में गिग वर्कफोर्स 2029-30 तक बढ़ कर 2.35 करोड़ तक पहुंच सकती है, जबकि 2020-21 में यह संख्या मात्र 77 लाख थी. इस का मतलब है कि आने वाले समय में देश की एक बड़ी आबादी गिग वर्क पर निर्भर होगी. रिपोर्ट के अनुसार, तब तक गिग वर्कर्स गैर-कृषि कार्यबल का 6.7 प्रतिशत और कुल आजीविका साधनों का 4.1 प्रतिशत हिस्सा होंगे. यानी, लाखों लोग ऐसे कामों में लगे होंगे, जिन में न तो स्थिरता है और न ही सामाजिक सुरक्षा.

कानूनी सुधार की सख्त जरूरत

आज तक सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए कोई ठोस कानूनी ढांचा नहीं बनाया. श्रम संहिताएं सालों से कागजों पर अटकी हुई हैं. अगर इन्हें ईमानदारी से लागू किया जाए तो गिग वर्कर्स को स्पष्ट अधिकार, कल्याण बोर्ड और सामाजिक सुरक्षा मिल सकती है.

नीदरलैंड, यूके और कैलिफोर्निया जैसे देशों ने गिग वर्कर्स को कर्मचारियों का दर्जा दिया है, लेकिन भारत अब भी प्लेटफौर्म कंपनियों के दबाव में चुप बैठा है. सवाल यह है कि जब लाखों लोग इस सेक्टर में काम कर रहे हैं तो सरकार आखिर किस के लिए श्रम कानून बना रही है?

भारत में गिग वर्कर्स एक ही समय में कई प्लेटफौर्म्स पर काम करते हैं. ऐसे में पोर्टेबल बेनेफिट्स सिस्टम बेहद जरूरी है, जिस में स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और बेरोजगारी भत्ता एक जगह से मिल सके.

सरकार ने ई-श्रम पोर्टल शुरू तो किया, लेकिन उस का असर जमीनी स्तर पर न के बराबर है. लाखों गिग वर्कर्स को अब भी डिजिटल पहचान, कल्याण योजनाओं और रोजगार अवसरों से नहीं जोड़ा गया है. औपचारिकीकरण सिर्फ घोषणा पत्रों में है, जबकि असल में गिग वर्कर्स आज भी ‘न दिखने वाला वर्कफोर्स’ बने हुए हैं.

गिग वर्कर का अनुभव

अपनी पहचान न उजागर करने की शर्त पर एक गिग वर्कर ने बताया कि गिग वर्क में आने से पहले उन्होंने छोटेमोटे काम किए थे, जिन से बहुत स्थिर आय नहीं हो पाती थी. रोजगार की तलाश में उन्हें लगा कि गिग वर्क यानी डिलीवरी, कैब सर्विस या डेटा एंट्री जैसे काम अपेक्षाकृत आसान और तुरंत मिलने वाले विकल्प हैं. यही कारण था कि उन्होंने इस क्षेत्र में कदम रखा. यह उन का पहला रोजगार नहीं था, लेकिन पहले जो काम कर रहे थे वह टिकाऊ नहीं था, इसलिए उन्हें लगा कि यह नया विकल्प थोड़ा स्थायी और सम्मानजनक हो सकता है.

उन्होंने शुरुआत एक लोकप्रिय प्लेटफौर्म के साथ की, क्योंकि उस समय वही आसानी से काम दिला रहा था और ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहा था. कंपनी ने काम शुरू करने से पहले कुछ जरूरी डौक्यूमेंट्स मांगे और औपचारिकताएं पूरी करवाईं. किसी तरह की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं दी गई, बल्कि सीधे काम पर लगा दिया गया. शुरुआती दिनों में उन की कमाई बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन काम के घंटे लंबे होते थे. अकसर 10 से 12 घंटे तक काम करना पड़ता था.

कंपनी उन्हें “पार्टनर” कहती थी, लेकिन वास्तविकता में उन्हें कभी यह नहीं लगा कि वे सचमुच पार्टनर हैं. शुरुआती दिनों का अनुभव मिलाजुला रहा, कभी काम का बोझ ज़्यादा होता, तो कभी ग्राहकों का व्यवहार अच्छाबुरा दोनों तरह का मिलता. कई बार समय पर डिलीवरी या राइड पूरी करने का दबाव इतना बढ़ जाता कि मानसिक तनाव महसूस होता.

खराब रेटिंग मिलने पर कंपनी का रवैया सामान्य रहता था, लेकिन इस से मनोबल पर असर पड़ता था. ट्रैफिक, मौसम या दुर्घटना जैसी मुश्किलों में कंपनी ने कभीकभी मदद की, लेकिन नियमित या पर्याप्त नहीं. मैडिकल, बीमा या छुट्टी जैसी सुविधाएं उन्हें नहीं मिलीं. लंबे काम के घंटे और असुरक्षित हालातों के चलते उन्हें शारीरिक और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा. कमाई इतनी नहीं होती थी कि घर का खर्च आराम से चल सके, कई बार उन्हें उधार लेना पड़ता. बचत करना लगभग असंभव था.

उन्हें कभी प्रमोशन या स्किल अपग्रेड का मौका नहीं दिया गया और न ही यह अहसास हुआ कि इस काम से कोई लंबा कैरियर बन सकता है. अकाउंट ब्लॉक होने की समस्या उन के साथ नहीं हुई, लेकिन कंपनी ने काम कम होने पर कोई वैकल्पिक अवसर भी नहीं दिया. पेमेंट रोकने की स्थिति भी उन के साथ नहीं बनी.

ज्यादा शारीरिक थकान और मानसिक रूप से दबाव महसूस करने के कारण आखिरकार उन्होंने यह काम खुद ही छोड़ दिया. थोड़े दिनों के बाद जब कहीं दुबारा नया काम नहीं मिला तो उन्हें दूसरे गिग प्लेटफौर्म पर काम मिला.

उन्होंने आगे ये भी कहा कि “इस काम ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है, अलगअलग जगहों को पहचानना, लोगों से कैसे व्यवहार करना चाहिए और रोजमर्रा के कामकाज का असली स्वरूप. लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि गिग वर्क से स्थायी सुरक्षा, बचत या लंबा कैरियर नहीं बन सकता. हमें रोज कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन बदले में न तो कोई गारंटी मिलती है और न ही भविष्य की सुरक्षा. मेरी राय में सरकार और कंपनियों को गिग वर्कर्स के लिए कम से कम कुछ बुनियादी सुविधाएं ज़रूर देनी चाहिए, जैसे मैडिकल सुविधा, बीमा और न्यूनतम आय की गारंटी. इस से हमारी ज़िंदगी थोड़ी सुरक्षित और स्थिर हो सकेगी.”

वहीं फिलहाल वे नहीं कह सकते कि यह काम वे कब तक करेंगे. इस के साथ ही उन का ये कहना था कि आज के युवाओं को गिग वर्क में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वे यहां लंबी पारी नहीं खेल सकते और साथ ही इस से घर भी ठीक से नहीं चलाया सकता है. अगर कोई युवा कम पढ़ालिखा है तो उसे नए स्किल्स सिखने पर जोर देना चाहिए. ऐसे स्किल्स को सीखना चाहिए, जिस से उन का भविष्य सुरक्षित रहे और पैसा भी अच्छा कम सकें.

यह साफ है कि गिग वर्कर्स की मेहनत पर कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं और सरकार उन की पीठ थपथपाने के बजाय आंखे मूंद कर बैठी है. अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में गिग वर्कर्स देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बिना किसी सुरक्षा कवच के बनेंगे और इस से सीधे सीधे कोरपोरेट्स को फायदा पहुंचेगा.

औटोमेशन और एआई : भविष्य का सब से बड़ा खतरा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई अब केवल कल्पना नहीं हकीकत है. एआई अब धीरेधीरे आसान और दोहराव वाले कामों को अपने कब्जे में ले रहा है. जोमेटो और स्विगी जैसे प्लेटफौर्म अब ड्रोन से डिलीवरी की योजना पर काम कर रहे हैं. इस के साथ ही इन्होने कई जगहों पर इस का सफल परीक्षण भी कर लिया है. वहीं गूगल और टेस्ला जैसी कंपनियां सेल्फ ड्राइविंग टैक्सियों पर काम कर रही हैं. धीरेधीरे ये कंपनियां भारत में एआई के जरिए अपना पैर पसार रही हैं और कई गिग वर्कर की नौकरियों को खाने जा रही हैं. एआई जितना अडवांस होगा वह गिग इकोनमी में उतना ही मुनाफा कमाकर देगा. इ-कौमर्स कंपनियों के एआई एक वरदान साबित होगी, लेकिन उन के यहां काम करने वालों के लिए यह किसी श्राप से कम नहीं है. कस्टमर सपोर्ट, डेटा इंट्री वौइस प्रोसेसिंग जैसी नौकरियां में अब मशीनें इंसान की जगह ले रही है. इस में सब से पहले उन गिग वर्कर्स को नुकसान होगा जिन के पास कोई स्किल या बैकअप नहीं है और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा है.

सामाजिक प्रभाव : सम्मान और अस्थिरता

अकसर गिग इकोनमी में काम करने वाले युवा समाजिक स्तर पर संघर्ष करते नजर आते हैं. एक डिलीवरी बौय, कैब ड्राइवर की नौकरी का मतलब होता है कि आप की नौकरी अस्थायी, कम वेतन वाली है. इस वजह से लोग इन्हें सम्मानहिन नजर से देखते है. विवाह के प्रस्तावों में इन्हें नाकारा जाता है. वहीं परिवार उन की नौकरी को कामचलाऊ मानते हैं. इस के साथ ही समाज इन्हें स्थायी पेशों की तुलना में नीचा समझता है. समाजिक दबाव और उपेक्षा इन युवाओं के आत्मविश्वास को बुरी तरह प्रभावित करती है. वे खुद को कमतर आंकने लगते हैं और कई बार रिश्तों और पारिवारिक जीवन में खटास भी आ जाती है.

जब कोई युवा में गिग वर्क में आता है और काम करना शुरू करता है तब उसे लगता है कि वह स्वतंत्र है और अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. मगर कुछ ही वर्षों में वे मानसिक और शारीरिक रूप से थक जाता है. इस के साथ ही इस में फिक्स इनकम और पेशेवर विकास नहीं होने पर भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगता है. मोबाइल, सोशल मिडिया और लगातार तुलना की भावना मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है, इस से कई गिग वर्कर को बारबार पैनिक अटैक का भी सामना करना पड़ता है. इस के साथ कई ऐसे भी मामले देखे गए हैं जिस में युवाओं की मुलाकात लड़कियों से होती है, जो या तो संबंध में बदलती है या शोषण व धोखे में. यह अस्थिरता युवाओं को और अधिक असुरक्षित बना देती है.

कौर्पोरेट स्ट्रक्चर : नए बनाम पुराने

हर साल कई स्टार्टअप्स शुरू होते हैं, जो गिग वर्कर्स को नौकरियां देते हैं. इस के साथ ही कई पुराने प्लेटफौर्म्स खत्म भी हो जाते हैं. हाल ही में दिल्ली में ब्लुस्मार्ट कैब सर्विस बंद हो गई. इस कंपनी के बंद होने हजारों ड्राइवर्स की नौकरी चली गई. वहीं जेप्टो, ब्लिंकिट और स्विगी इन्सटामार्ट के बीच जल्दी और्डर पूरा करने और बेस्ट सर्विस देने की जंग छिड़ी हुई है और इस में गिग वर्कर खूब पिस रहे हैं. वर्कर्स को न स्थायित्व मिलता है और न कोई अधिकार. वे बस इस सिस्टम का एक पुर्जा बन जाते हैं जिसे कभी भी बदल दिया जाता है.

जब हर सेक्टर में एआई और औटोमेशन के साथ बदलाव आएगा, तो इस की चपेट में सब से पहले गिग वर्कर्स आएंगे. गिग वर्कर्स जो पैसे कमाते हैं वह दैनिक जीवन में खर्च हो जाते हैं, सेविंग्स की कोई गुंजाइश नहीं बचती है. इस के साथ ही जब इन की क्षमता घटेगी तो उन के पास कोई सामाजिक सहारा नहीं होगा. एक पूरी पीढ़ी गरीबी, अपमान और अकेलेपन में डूब जाएगी.

विकल्प और रास्ता

इस समस्या से निकलने के लिए गहराई से सोचने और योजनाबद्ध कार्य की आवश्यकता है.
• पहला, स्किल अपग्रेडेशन की दिशा में काम किया जाए. एआई, इलैक्ट्रिक वाहन तकनीक, कोडिंग, रिपेयरिंग जैसे आधुनिक कौशल सिखाए जाएं.
• दूसरा, सरकार को स्थायी रोजगार निर्माण पर ध्यान देना होगा. मैन्युफैक्चरिंग, शिक्षा, हैल्थ और स्थानीय उद्योगों में रोज़गार के अवसर बढ़ाने होंगे.
• तीसरा, गिग वर्कर्स के लिए यूनियन बनाई जाए जो उन के अधिकारों की रक्षा करे, उन की आवाज सरकार तक पहुंचाए.
• चौथा, नीति और सुरक्षा के स्तर पर बदलाव हो. बीमा, पीएफ, मेडिकल सुविधा, और छुट्टियां इन्हें भी मिलनी चाहिए.

गिग इकोनमी आज की हकीकत है, लेकिन इसे मानवतावादी और न्यायपूर्ण बनाना समय की मांग है. यदि हम ने इस चुपचाप पल रहे संकट को नहीं रोका, तो एक पूरी पीढ़ी तकनीकी चमक के पीछे अंधकार में गुम हो जाएगी.  Gig Work

Romantic Story In Hindi : सच्ची परख – सौंदर्य के झूठे सच में फंसी लड़की की कहानी

Romantic Story In Hindi : बिस्तर पर लेटी वह खिड़की से बाहर निहार रही थी. शांत, स्वच्छ, निर्मल आकाश देखना भी कितना सुखद लगता है. घर के बगीचे के विस्तार में फैली हरियाली और हवा के झोंकों से मचलते फूल वगैरा तो पहले भी यहां थे लेकिन तब उस की नजरों को ये नजारे चुभते थे. परंतु आज…?

शेफाली ने एक ठंडी सांस ली, परिस्थितियां इंसान में किस हद तक बदलाव ला देती हैं. अगर ऐसा न होता तो आज तक वह यों घुटती न रहती. बेकार ही उस ने अपने जीवन के 2 वर्ष मृगमरीचिका में भटकते हुए गंवा दिए, निरर्थक बातों के पीछे अपने को छलती रही. काश, उसे पहले एहसास हो जाता तो…

‘‘लीजिए मैडम, आप का जूस,’’ सुदेश की आवाज ने उसे सोच के दायरे से बाहर ला पटका.

‘‘क्यों बेकार आप इतनी मेहनत करते हैं, जूस की क्या जरूरत थी?’’ शेफाली ने संकोच से कहा.

‘‘देखिए जनाब, आप की सेहत के लिए यह बहुत जरूरी है. आप तो बस आराम से आदेश देती रहिए, यह बंदा आप को तरहतरह के पकवान बना कर खिलाता रहेगा. फिर कौन सी बहुत मेहनत करनी पड़ती है, यहां तो सबकुछ डब्बाबंद तैयार मिलता है, विदेश का कम से कम यह लाभ तो है ही,’’ सुदेश ने गिलास थमाते हुए कहा.

‘‘लेकिन आप काम करें, यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘शेफाली, थोड़े दिनों की बात है. जहां पेट के टांके कटे, वहीं तुम थोड़ाबहुत चलने लगोगी. अभी तो डाक्टर ने तुम्हें पूरी तरह आराम करने को कहा है. अच्छा, देखो, मैं बाजार से सामान ले कर आता हूं, तब तक तुम थोड़ा सो लो. फिर सोचने मत लग जाना. मैं देख रहा हूं, जब से तुम्हारा औपरेशन हुआ है, तुम हमेशा सोच में डूबी रहने लगी हो. सब ठीक से तो हो गया है, फिर काहे की चिंता. खैर, अब आराम करो.’’

सुदेश ने ठीक ही कहा था. जब से उस के पेट के ट्यूमर का औपरेशन हुआ था तब से वह सोचने लगी थी. असल में तो वह इन 2 वर्षों में सुदेश के प्रति किए गए व्यवहार की ग्लानि थी जो उसे निरंतर मथती रहती थी.

सुदेश के साधारण रूपरंग और प्रभावहीन व्यक्तित्व के कारण शेफाली हमेशा उसे अपमानित करने की कोशिश करती. अपने अथाह रूप और आकर्षण के सामने वह सुदेश को हीन समझती. अपने मातापिता को भी माफ नहीं कर पाई थी. अकसर वह मां को चिट्ठी में लिखती कि उस ने उन्हें वर चुनने का अधिकार दे कर बहुत भारी भूल की थी. ऐसे कुरूप पति को पाने से तो अच्छा था वह स्वयं किसी को ढूंढ़ कर विवाह कर लेती. ऐसा लिखते वक्त उस ने यह कभी नहीं सोचा था कि भारत में बैठे उस के मातापिता पर क्या बीत रही होगी.

शेफाली अपनी मां से तब कितना लड़ी थी, जब उसे पता चला था कि सुदेश ने कनाडा में ही बसने का निश्चय कर लिया है. सुदेश ने वहीं अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और अच्छी नौकरी मिलने के कारण वह अब भारत नहीं आना चाहता था. शेफाली ने स्वयं एमबीबीएस पास कर लिया था और ‘इंटर्नशिप’ कर रही थी. वह चाहती थी कि भारत में ही रह कर अपना क्लीनिक खोले. नए देश में, नए परिवेश में जाने के नाम से ही वह परेशान हो गई थी. बेटी को नाखुश देख मातापिता को लगा कि इस से तो अच्छा है कि सगाई को तोड़ दिया जाए, पर उस ने उन्हें यह कह कर रोक दिया था कि इस से सामाजिक मानमर्यादा का हनन होगा और उस के भाईबहनों के विवाह में अड़चन आ सकती है. सुदेश से पत्रव्यवहार व फोन द्वारा उस की बातचीत होती रहती थी, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि ऐसी हालत में रिश्ता तोड़ कर उस का दिल दुखाया जाए. इसी कशमकश में वह विवाह कर के कनाडा आ गई थी.

अचानक टिं्रन…ट्रिंन…की आवाज से शेफाली का ध्यान भंग हुआ, फोन भारत से आया था. मां की आवाज सुन कर वह पुलकित हो उठी

‘‘कैसी हो बेटी, आराम कर रही हो न? देखो, ज्यादा चलनाफिरना नहीं.’’

उन की हिदायतें सुन वह मुसकरा उठी, ‘‘मैं ठीक हूं मां, सारा दिन आराम करती हूं. घर का सारा काम सुदेश ने संभाला हुआ है.’’

‘‘सुदेश ठीक है न बेटी, उस की इज्जत करना, वह अच्छा लड़का है, बूढ़ी आंखें धोखा नहीं खातीं, रूपरंग से क्या होता है,’’ मां ने थोड़ा झिझकते हुए कहा.

‘‘मां, तुम फिक्र मत करो. देर से ही सही, लेकिन मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है,’’ तभी फोन कट गया.

दूर बैठी मां भी शायद जान गई थीं कि वह सुदेश को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती. फिर से एक बार शेफाली के मानसपटल पर बीते दिन घूमने लगे.

मौंट्रीयल के इस खूबसूरत फ्लैट में जब उस ने कदम रखा था तो ढेर सारे फूलों और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उस का स्वागत किया गया था. उन के आने की खुशी में सुदेश के मित्रों ने पूरे फ्लैट को सजा रखा था. ऐसी आवभगत की उसे आशा नहीं थी, इसलिए खुशी हुई थी, लेकिन वह उसे दबा गई थी. आखिर किस काम की थी वह खुशी.

सुदेश एकएक कर अपने साथियों से उसे मिलवाता रहा. उस की खूबसूरती की प्रशंसा में लोगों ने पुल बांध दिए.

‘यार, तुम तो इतनी सुंदर परी को भारत से उड़ा लाए,’ सुदेश के मित्र की बात सुन उसे वह मुहावरा याद आ गया था, ‘हूर के साथ लंगूर’. सुदेश जब भी उस का हाथ पकड़ता, वह झटके से उसे खींच लेती. ऐसा नहीं था कि सुदेश उस के व्यवहार से अनभिज्ञ था, लेकिन उस ने सोचा था कि अपने प्यार से वह शेफाली का मन जीत लेगा.

विवाह के कुछ दिन बाद उस ने कहा था, ‘अभी छुट्टियां बाकी हैं. चलो, तुम्हें पूरे कनाडा की सैर करा दें.’

तब शेफाली ने यह कह कर इनकार कर दिया था कि उस की तबीयत ठीक नहीं है. उस की हरसंभव यही कोशिश रहती कि वह सुदेश से दूरदूर रहे. अपने सौंदर्य के अभिमान में वह यह भूल गई थी कि वह उस का पति है. उस का प्यार, उस का अपनापन और छोटीछोटी बातों का खयाल रखना शेफाली को तब दिखता ही कहां था.

सुदेश के सहयोगियों ने क्लब में पार्टी रखी थी, पर उस ने साथ जाने से इनकार कर दिया था.

‘देखो शेफाली, यह पार्टी उन्होंने हमारे लिए रखी है.’

पति की इस बात पर वह आगबबूला हो उठी थी, ‘मुझ से पूछ कर रखी है क्या? मैं पूछती हूं, तुम्हें मेरे साथ चलते झिझक नहीं होती. कहां तुम कहां मैं?’

तब सुदेश अवाक् रह गया था.

दरवाजा खुलने से एक बार फिर उस की तंद्रा भंग हो गई, ‘‘अरे, इतना सामान लाने की क्या जरूरत थी?’’ शेफाली ने सुदेश को पैकटों से लदे देख पूछा.

‘‘अरे जनाब, ज्यादा कहां है, बस, कुछ फल हैं और डब्बाबंद खाना. जब तक तुम ठीक नहीं हो जातीं, इन्हीं से काम चलाना है,’’ सुदेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा, खाना यहीं लगाऊं या बालकनी में बैठना चाहोगी?’’

‘‘नहींनहीं, यहीं ठीक है और देखो, ज्यादा पचड़े में मत पड़ना, वैसे भी ज्यादा भूख नहीं है.’’

‘‘क्यों, भूख क्यों नहीं है? तुम्हें ताकत  चाहिए और इस के लिए खाना बहुत जरूरी है,’’ सुदेश ने अपने हाथों से उसे खाना खिलाते हुए कहा.

शेफाली की आंखें नम हो आईं. ऐसे व्यक्ति से, जिस के अंदर प्यार का सागर लबालब भरा हुआ है, वह आज तक घृणा करती आई, सिर्फ इसलिए कि वह कुरूप है. लेकिन बाहरी सौंदर्य के झूठे सच में वह उस के गुणों को नजरअंदाज करती रही. अंदर से उस का मन कितना निर्मल, कितना स्वच्छ है. वह कितनी मूर्ख थी, तभी तो वैवाहिक जीवन के 2 सुनहरे वर्ष यों ही गंवा दिए. उस का हर पल यही प्रयत्न रहता कि किसी तरह सुदेश को अपमानित करे इसलिए उस की हर बात काटती.

लेकिन अपनी बीमारी के बाद उस ने जाना कि सच्चा प्रेम क्या होता है. शेफाली की इतनी बेरुखी के बाद भी सुदेश कितनी लगन से उस की सेवा कर रहा था.

‘‘अरे भई, खाना ठंडा हो जाएगा. जब देखो तब सोचती ही रहती हो. आखिर बात क्या है, मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’’

‘‘यह क्या कह रहे हो?’’ शेफाली ने सफाई से आंखें पोंछते हुए कहा, ‘‘मुझे शर्मिंदा मत करो. अरे हां, मां का फोन आया था,’’ उस ने बात पलटते हुए कहा.

रसोई व्यवस्थित कर सुदेश बोला, ‘‘मैं थोड़ी देर दफ्तर हो कर आता हूं, तब तक तुम सो भी लेना. चाय के समय तक आ जाऊंगा. अरे हां, दफ्तर के साथी तुम्हारा हालचाल पूछने आना चाहते हैं, अगर तुम कहो तो?’’ सुदेश ने झिझकते हुए पूछा तो शेफाली ने मुसकरा कर हामी भर दी.

शेफाली जानती थी सुदेश ने क्यों पूछा था. वह उस के साथ न तो कहीं जाती थी, न ही उस के मित्रों का आना उसे पसंद था, क्योंकि तब उसे सुदेश के साथ बैठना पड़ता था, हंसना पड़ता था और वह यह चाहती नहीं थी. कितनी बार वह सुदेश को जता चुकी थी कि उस की पसंदनापसंद की उसे परवा नहीं है, खासकर उन दोस्तों की, जो हमेशा उस के सामने सुदेश की तारीफों के पुल बांधते रहते हैं, ‘भाभीजी, यह तो बहुत ही हंसमुख और जिंदादिल इंसान है. अपने काम और व्यवहार के कारण सब काप्यारा है, अपना यार.’

शेफाली उस की बदसूरती के सामने जब इन बातों को तोलती तो हमेशा उसे सुदेश का पलड़ा हलका लगता. सुदेश जब भी उसे छूता, उसे लगता, कोई कीड़ा उस के शरीर पर रेंग रहा है और वह दूसरे कमरे में जा कर सो जाती.दरवाजे की घंटी बजी तो वह चौंक उठी. सच ही था, वह ज्यादा ही सोचने लगी थी. सोचा, शायद पोस्टमैन होगा. वह आहिस्ता से उठी और पत्र निकाल लाई. मां ने खत में वही सब बातें लिखी थीं और सुदेश का सम्मान करने की हिदायत दी थी. उस का मन हुआ कि वह अभी मां को जवाब दे दे, पर पेन और कागज दूसरे कमरे में रखे थे और वह थोड़ा चल कर थक गई थी. लेटने ही लगी थी कि सुदेश आ गया.

‘‘सुनो, जरा पेन और पैड दोगे, मां को चिट्ठी लिखनी है,’’ शेफाली ने कहा.

‘‘बाद में, अभी लेटो, तुम्हें उठने की जरूरत ही क्या थी,’’ सुदेश ने बनावटी गुस्से से कहा, ‘‘दवा भी नहीं ली. ठहरो, मैं पानी ले कर आता हूं.’’

‘‘सुनो,’’ शेफाली ने उस की बांह पकड़ ली. सुदेश ने कुछ हैरानी से देखा. शेफाली को समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे अपने किए की माफी मांगे.

व्यक्ति की पहचान उस के गुणों से होती है, उस के व्यवहार से होती है, वही उस के व्यक्तित्व की छाप बनती है. सुदेश की सच्ची परख तो उसे अब हुई थी. आज तक तो वह अपनी खूबसूरती के दंभ में एक ऐसे राजकुमार की तलाश में कल्पनालोक में विचर रही थी जो किस्सेकहानियों में ही होते हैं, पर यथार्थ तो इस से बहुत परे होता है. जहां मनुष्य के गुणों को समाज की नजरें आंकती हैं, उस की आंतरिक सुंदरता ज्यादा माने रखती है. अगर खूबसूरती ही मापदंड होता तो समाज के मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लग जाता.

‘‘शेफाली, तुम कुछ कहना चाहती थीं?’’ सुदेश ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘हां…बस, कुछ खास नहीं,’’ वह चौंकते हुए बोली.

‘‘मैं जानता हूं, मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं. अगर तुम चाहो तो मुझे छोड़ कर जा सकती हो,’’ सुदेश के स्वर में दर्द था.

‘‘बसबस, और कुछ न कहो, मैं पहले ही बहुत शर्मिंदा हूं. हो सके तो मुझे माफ कर दो. मैं ने तुम्हारा बहुत अपमान किया है. फिर भी तुम ने कभी मुझ से कटुता से बात नहीं की. मेरी हर कड़वाहट को सहते रहे और अब भी मेरी इतनी सेवा कर रहे हो, शर्म आती है मुझे अपनेआप पर,’’ शेफाली उस से लिपट कर रो पड़ी.

‘‘कैसी बातें कर रही हो, कौन नहीं जानता कि तुम्हारी खूबसूरती के सामने मैं कितना कुरूप लगता हूं.’’

‘‘खबरदार, जो तुम ने अपनेआप को कुरूप कहा. तुम्हारे जैसा सुंदर मैं ने जिंदगी में नहीं देखा. मेरी आंखों को तुम्हारी सच्ची परख हो गई है.’’

दोनों अपनी दुनिया में खोए थे कि तभी दरवाजे पर थपथपाहट हुई और घंटी भी बजी.

‘‘सुदेश, दरवाजा खोलो,’’ बाहर से शोर सुनाई दिया.

‘‘लगता है, मित्रमंडली आ गई है,’’ सुदेश बोला.

दरवाजा खुलते ही फूलों की महक से सारा कमरा भर गया. सुदेश के मित्र शेफाली को फूलों का एकएक गुच्छा थमाने लगे.

‘‘भाभीजी, आप के ठीक होने के बाद हम एक शानदार पार्टी लेंगे. क्यों, देंगी न?’’ एक मित्र ने पूछा.

‘‘जरूर,’’ शेफाली ने हंसते हुए कहा. उसे लग रहा था कि इन फूलों की तरह उस का जीवन भी महक से भर गया है. हर तरफ खुशबू बिखर गई है. गुच्छों के बीच से उस ने देखा, सुदेश के चेहरे पर एक अनोखी मुसकराहट छाई हुई है. शेफाली ने जब सारी शर्महया छोड़ आगे बढ़ कर उस का चेहरा चूमा तो ‘हे…हे’ का शोर मच गया और सुदेश ने उसे आलिंगनबद्ध कर लिया.  Romantic Story In Hindi

Social Story : जन्मकुंडली का चक्कर – ग्रहों के फेर में फंसी लड़की की दास्तां

Social Story : उस दिन सुबह ही मेरे घनिष्ठ मित्र प्रशांत का फोन आया और दोपहर को डाकिया उस के द्वारा भेजा गया वैवाहिक निमंत्रणपत्र दे गया. प्रशांत की बड़ी बेटी पल्लवी की शादी तय हो गई थी. इस समाचार से मुझे बेहद प्रसन्नता हुई और मैं ने प्रशांत को आश्वस्त कर दिया कि 15 दिन बाद होने वाली पल्लवी की शादी में हम पतिपत्नी अवश्य शरीक होेंगे.

बचपन से ही प्रशांत मेरा जिगरी दोस्त रहा है. हम ने साथसाथ पढ़ाई पूरी की और लगभग एक ही समय हम दोनों अलगअलग बैंकों में नौकरी में लग गए. हम अलगअलग जगहों पर कार्य करते रहे लेकिन विशेष त्योहारों के मौके पर हमारी मुलाकातें होती रहतीं.

हमारे 2-3 दूसरे मित्र भी थे जिन के साथ छुट्टियों में रोज हमारी बैठकें जमतीं. हम विभिन्न विषयों पर बातें करते और फिर अंत में पारिवारिक समस्याओं पर विचारविमर्श करने लगते. बढ़ती उम्र के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों की शादी जैसे विषयों पर हमारी बातचीत ज्यादा होती रहती.

प्रशांत की दोनों बेटियां एम.ए. तक की शिक्षा पूरी कर नौकरी करने लगी थीं जबकि मेरे दोनों बेटे अभी पढ़ रहे थे. हमारे कई सहकर्मी अपनी बेटियों की शादी कर के निश्ंिचत हो गए थे. प्रशांत की बेटियों की उम्र बढ़ती जा रही थी और उस के रिटायर होेने का समय नजदीक आ रहा था. उस की बड़ी बेटी पल्लवी की जन्मकुंडली कुछ ऐसी थी कि जिस के कारण उस के लायक सुयोग्य वर नहीं मिल पा रहा था.

हमारे खानदान में जन्मकुंडली को कभी महत्त्व नहीं दिया गया, इसलिए मुझे इस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. एक बार कुछ खास दोस्तों की बैठक में प्रशांत ने बताया था कि पल्लवी मांगलिक है और उस का गण राक्षस है. मेरी जिज्ञासा पर वह बोला, ‘‘कुंडली के 1, 4, 7, 8 और 12वें स्थान पर मंगल ग्रह रहने पर व्यक्ति मंगली या मांगलिक कहलाता है और कुंडली के आधार पर लोग देव, मनुष्य या राक्षस गण वाले हो जाते हैं. कुछ अन्य बातों के साथ वरवधू के न्यूनतम 18 गुण या अंक मिलने चाहिए. जो व्यक्ति मांगलिक नहीं है, उस की शादी यदि मांगलिक से हो जाए तो उसे कष्ट होगा.’’

किसी को मांगलिक बनाने का आधार मुझे विचित्र लगा और लोगों को 3 श्रेणियों में बांटना तो वैसे ही हुआ जैसे हिंदू समाज को 4 प्रमुख जातियों में विभाजित करना. फिर जो मांगलिक नहीं है, उसे अमांगलिक क्यों नहीं कहा जाता? यहां मंगल ही अमंगलकारी हो जाता है और कुंडली के अनुसार दुश्चरित्र व्यक्ति देवता और सुसंस्कारित, मृदुभाषी कन्या राक्षस हो सकती है. मुझे यह सब बड़ा अटपटा सा लग रहा था.

प्रशांत की बेटी पल्लवी ने एम.एससी. करने के बाद बी.एड. किया और एक बड़े स्कूल में शिक्षिका बन गई. उस का रंगरूप अच्छा है. सीधी, सरल स्वभाव की है और गृहकार्य में भी उस की रुचि रहती है. ऐसी सुयोग्य कन्या का पिता समाज के अंधविश्वासों की वजह से पिछले 2-3 वर्ष से परेशान रह रहा था. जन्मकुंडली उस के गले का फंदा बन गई थी. मुझे लगा, जिस तरह जातिप्रथा को बहुत से लोग नकारने लगे हैं, उसी प्रकार इस अकल्याणकारी जन्मकुंडली को भी निरर्थक और अनावश्यक बना देना चाहिए.

प्रशांत फिर कहने लगा, ‘‘हमारे समाज मेें पढ़ेलिखे लोग भी इतने रूढि़वादी हैं कि बायोडाटा और फोटो बाद में देखते हैं, पहले कुंडली का मिलान करते हैं. कभी मंगली लड़का मिलता है तो दोनों के 18 से कम गुण मिलते हैं. जहां 25-30 गुण मिलते हैं वहां गण नहीं मिलते या लड़का मंगली नहीं होता. मैं अब तक 100 से ज्यादा जगह संपर्क कर चुका हूं किंतु कहीं कोई बात नहीं बनी.’’

मैं, अमित और विवेक, तीनों उस के हितैषी थे और हमेशा उस के भले की सोचते थे. उस दिन अमित ने उसे सुझाव दिया कि किसी साइबर कैफे में पल्लवी की जन्मतिथि थोड़ा आगेपीछे कर के एक अच्छी सी कुंडली बनवा लेने से शायद उस का रिश्ता जल्दी तय हो जाए.

प्रशांत तुरंत बोल उठा, ‘‘मैं ने अभी तक कोई गलत काम नहीं किया है. किसी के साथ ऐसी धोखाधड़ी मैं नहीं कर सकता.’’

‘‘मैं किसी को धोखा देने की बात नहीं कर रहा,’’ अमित ने उसे समझाना चाहा, ‘‘किसी का अंधविश्वास दूर करने के लिए अगर एक झूठ का सहारा लेना पड़े तो इस में बुराई क्या है. क्या कोई पंडित या ज्योतिषी इस बात की गारंटी दे सकता है कि वर और कन्या की कुंडलियां अच्छी मिलने पर उन का दांपत्य जीवन सफल और सदा सुखमय रहेगा?

‘‘हमारे पंडितजी, जो दूसरों की कुंडली बनाते और भविष्य बतलाते हैं, स्वयं 45 वर्ष की आयु में विधुर हो गए. एक दूसरे नामी पंडित का भतीजा शादी के महज  5 साल बाद ही एक दुर्घटना का शिकार हो गया. उस के बाद उन्होंने जन्मकुंडली और भविष्यवाणियों से तौबा ही कर ली,’’ वह फिर बोला, ‘‘मेरे मातापिता 80-85 वर्ष की उम्र में भी बिलकुल स्वस्थ हैं जबकि कुंडलियों के अनुसार उन के सिर्फ 8 ही गुण मिलते हैं.’’

प्रशांत सब सुनता रहा किंतु वह पल्लवी की कुंडली में कुछ हेरफेर करने के अमित के सुझाव से सहमत नहीं था.

कुछ महीने बाद हम फिर मिले. इस बार प्रशांत कुछ ज्यादा ही उदास नजर आ रहा था. कुछ लोग अपनी परेशानियों के बारे में अपने निकट संबंधियों या दोस्तों को भी कुछ बताना नहीं चाहते. आज के जमाने में लोग इतने आत्मकेंद्रित हो गए हैं कि बस, थोड़ी सी हमदर्दी दिखा कर चल देंगे. उन से निबटना तो खुद ही होगा. हमारे छेड़ने पर वह कहने लगा कि पंडितों के चक्कर में उसे काफी शारीरिक कष्ट तथा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और कोई लाभ नहीं हुआ.

2 वर्ष पहले किसी ने कालसर्प दोष बता कर उसे महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध स्थान पर सोने के सर्प की पूजा और पिंडदान करने का सुझाव दिया था. उतनी दूर सपरिवार जानेआने, होटल में 3 दिन ठहरने और सोने के सर्प सहित दानदक्षिणा में उस के लगभग 20 हजार रुपए खर्च हो गए. उस के कुछ महीने बाद एक दूसरे पंडित ने महामृत्युंजय जाप और पूजाहवन की सलाह दी थी. इस में फिर 10 हजार से ज्यादा खर्च हुए. उन पंडितों के अनुसार पल्लवी का रिश्ता पिछले साल ही तय होना निश्चित था. अब एकडेढ़ साल बाद भी कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी.

मैं ने उसे समझाने के इरादे से कहा, ‘‘तुम जन्मकुंडली और ऐसे पंडितों को कुछ समय के लिए भूल जाओ. यजमान का भला हो, न हो, इन की कमाई अच्छी होनी चाहिए. जो कहते हैं कि अलगअलग राशि वाले लोगों पर ग्रहों के असर पड़ते हैं, इस का कोई वैज्ञानिक आधार है क्या?

‘‘भिन्न राशि वाले एकसाथ धूप में बैठें तो क्या सब को सूर्य की किरणों से विटामिन ‘डी’ नहीं मिलेगा. मेरे दोस्त, तुम अपनी जाति के दायरे से बाहर निकल कर ऐसी जगह बात चलाओ जहां जन्मकुंडली को महत्त्व नहीं दिया जाता.’’

मेरी बातों का समर्थन करते हुए अमित बोला, ‘‘कुंडली मिला कर जितनी शादियां होती हैं उन में बहुएं जलाने या मारने, असमय विधुर या विधवा होने, आत्महत्या करने, तलाकशुदा या विकलांग अथवा असाध्य रोगों से ग्रसित होने के कितने प्रतिशत मामले होते हैं. ऐसा कोई सर्वे किया जाए तो एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आ जाएगा. इस पर कितने लोग ध्यान देते हैं? मुझे तो लगता है, इस कुंडली ने लोगों की मानसिकता को संकीर्ण एवं सशंकित कर दिया है. सब बकवास है.’’

उस दिन मुझे लगा कि प्रशांत की सोच में कुछ बदलाव आ गया था. उस ने निश्चय कर लिया था कि अब वह ऐसे पंडितों और ज्योतिषियों के चक्कर में नहीं पड़ेगा.

खैर, अंत भला तो सब भला. हम तो उस की बेटियों की जल्दी शादी तय होने की कामना ही करते रहे और अब एक खुशखबरी तो आ ही गई.

हम पतिपत्नी ठीक शादी के दिन ही रांची पहुंच सके. प्रशांत इतना व्यस्त था कि 2 दिन तक उस से कुछ खास बातें नहीं हो पाईं. उस ने दबाव डाल कर हमें 2 दिन और रोक लिया था. तीसरे दिन जब ज्यादातर मेहमान विदा हो चुके थे, हम इत्मीनान से बैठ कर गपशप करने लगे. उस वक्त प्रशांत का साला भी वहां मौजूद था. वही हमें बताने लगा कि किस तरह अचानक रिश्ता तय हुआ. उस ने कहा, ‘‘आज के जमाने में कामकाजी लड़कियां स्वयं जल्दी विवाह करना नहीं चाहतीं. उन में आत्मसम्मान, स्वाभिमान की भावना होती है और वे आर्थिक रूप से अपना एक ठोस आधार बनाना चाहती हैं, जिस से उन्हें अपनी हर छोटीमोटी जरूरत के लिए अपने पति के आगे हाथ न फैलाना पड़े. पल्लवी को अभी 2 ही साल तो हुए थे नौकरी करते हुए लेकिन मेरे जीजाजी को ऐसी जल्दी पड़ी थी कि उन्होंने दूसरी जाति के एक विधुर से उस का संबंध तय कर दिया.

वैसे मेरे लिए यह बिलकुल नई खबर थी. किंतु मुझे इस में कुछ भी अटपटा नहीं लगा. पल्लवी का पति 30-32 वर्ष का नवयुवक था और देखनेसुनने में ठीक लग रहा था. हम लोगोें का मित्र विवेक, प्रशांत की बिरादरी से ही था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर प्रशांत ने ऐसा निर्णय क्यों लिया. उस ने उस से पूछा, ‘‘पल्लवी जैसी कन्या के लिए अपने समाज में ही अच्छे कुंआरे लड़के मिल सकते थे. तुम थोड़ा और इंतजार कर सकते थे. आखिर क्या मजबूरी थी कि उस की शादी तुम ने एक ऐसे विधुर से कर दी जिस की पत्नी की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत हो गई थी.’’

‘‘यह सिर्फ मेरा निर्णय नहीं था. पल्लवी की इस में पूरी सहमति थी. जब हम अलगअलग जातियों के लोग आपस में इतने अच्छे दोस्त बन सकते हैं, साथ खापी और रह सकते हैं, तो फिर अंतर्जातीय विवाह क्यों नहीं कर सकते?’’

प्रशांत कहने लगा, ‘‘एक विधुर जो नौजवान है, रेलवे में इंजीनियर है और जिसे कार्यस्थल भोपाल में अच्छा सा फ्लैट मिला हुआ है, उस में क्या बुराई है? फिर यहां जन्मकुंडली मिलाने का कोई चक्कर नहीं था.’’

‘‘और उस की पहली पत्नी की मौत?’’ विवेक शायद प्रशांत के उत्तर से संतुष्ट नहीं था.

प्रशांत ने कहा, ‘‘अखबारों में प्राय: रोज ही दहेज के लोभी ससुराल वालों द्वारा बहुओं को प्रताडि़त करने अथवा मार डालने की खबरें छपती रहती हैं. हमें भी डर होता था किंतु एक विधुर से बेटी का ब्याह कर के मैं चिंतामुक्त हो गया हूं. मुझे पूरा यकीन है, पल्लवी वहां सुखी रहेगी. आखिर, ससुराल वाले कितनी बहुओं की जान लेंगे? वैसे उन की बहू की मौत महज एक हादसा थी.’’

‘‘तुम्हारा निर्णय गलत नहीं रहा,’’ विवेक मुसकरा कर बोला.  Social Story

Kahani In Hindi : डियर पापा- क्यों पिता से नफरत करती थी श्रेया?

Kahani In Hindi : शामके 7 बज चुके थे. सुजौय किसी भी वक्त औफिस से घर आते ही होंगे. मैं ने जल्दी से चूल्हे पर चाय चढ़ाई और दरवाजे की घंटी बजने का इंतजार करने लगी.

ज्यों ही घंटी की आवाज घर में गूंजी मेरे दोनों नन्हे शैतान श्यामली और श्रेयस उछलतेकूदते अपने कमरे से बाहर आ गए और दरवाजे की कुंडी खोलते ही पापापापा चिल्लाते हुए सुजौय की टांगों से लिपट गए.

सुजौय ने मुसकरा कर अपना ब्रीफकेस मुझे थमा दिया और दोनों बच्चों को बांहों में भर कर भीतर आ गए. तीनों के कहकहे सुन कर दिल को सुकून सा मिल रहा था. सुजौय को चाय दे कर मैं भी वहीं उन तीनों के पास बैठ गई. दोनों बच्चे बड़े प्यार से अपने पापा को दिन भर की शरारतें और किस्से सुना रहे थे. सुजौय भी बड़े गर्व से चाय पीते हुए उन दोनों की बातें सुन रहे थे. अपने पापा का पूरा ध्यान खुद पर पा कर बच्चों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था.

‘‘पापा, मैं और श्रेयस एक बहुत सुंदर ड्राइंग बना रहे हैं. उसे पूरा कर के आप को दिखाते हैं,’’ कह कर श्यामली ने अपने भाई का हाथ पकड़ा और दोनों भाग कर अपने कमरे में चले गए.

‘‘क्या सोच रही हो मैडम?’’

‘‘कुछ नहीं. आप हाथमुंह धो कर फ्रैश हो जाएं. तब तक मैं खाना गरम कर लेती हूं,’’ सुजौय के टोकने पर मैं ने मुसकरा कर जवाब दिया और फिर उठ कर रसोई की तरफ चल दी.

खाने की मेज पर भी दोनों बच्चे चहकते हुए अपने पापा को न जाने कौनकौन से किस्से सुना रहे थे. खाने के बाद कुछ देर तक सुजौय और मेरे साथ खेल कर बच्चे थक कर सो गए. सारा काम निबटा कपड़े बदलने के बाद जब मैं कमरे में पहुंची तो सुजौय पहले से ही पलंग पर लेटे हुए एकटक छत को निहार रहे थे. बत्ती बुझा कर मैं भी पलंग पर जा कर लेट गई और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी.

थोड़ी देर बाद सुजौय ने धीमे स्वर में पूछा, ‘‘श्रेया, नींद नहीं आ रही है क्या?’’

‘‘नहीं,’’ मैं ने गहरी सांस भर कर छोड़ते हुए जवाब दिया.

‘‘कोई टैंशन है?’’

‘‘नहीं?’’

‘‘श्यामली बता रही थी आज उस की नानी का फोन आया था.’’

‘‘क्या कहा मां ने? कैसी हैं वे?’’

‘‘ठीक हैं. हम सब का कुशलक्षेम पूछ रही थीं.’’

‘‘और साकेत कैसा है? उस की परीक्षा कैसी हुई?’’

‘‘वह भी ठीक है. अच्छी हुई.’’

‘‘सिर्फ इतनी ही बात हुई?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो फिर इतनी खोई हुई, उदास सी क्यों हो?’’

मेरे कोई जवाब न देने पर सुजौय ने मुझे आगोश में भर लिया और फिर मेरा सिर सहलाने लगे. अचानक हुई प्रेम और अपनेपन की अनुभूति से मेरी आंखों से आंसू बह निकले. मैं कस कर सुजौय से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगी. सुजौय ने मुझे जी भर कर रोने दिया.

कुछ देर बाद जब आंसू थमे तो मैं ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘कल पापा की बरसी है. मां ने हमें घर बुलाया है.’’

‘‘और तुम हमेशा की तरह वहां जाना नहीं चाहतीं,’’ सुजौय ने कहा.

‘‘आप को सब पता तो है. मैं वहां क्यों नहीं जाना चाहती हूं. मां भी सब जानती हैं. फिर भी हर साल मुझ से घर आने की जिद करती हैं,’’ मैं ने भर्राई आवाज में कहा.

‘‘श्रेया, तुम जानती हो न मां बस पूरे परिवार को एकसाथ खुश देखना चाहती हैं, इसलिए हर बार तुम्हारा जवाब जानते हुए भी तुम्हें पापा की बरसी पर घर आने के लिए कहती हैं.’’

‘‘मैं जानती हूं. मैं मां को दुख नहीं पहुंचाना चाहती हूं. उन्हें दुखी देख कर मुझे भी बहुत दुख होता है. अब आप ही बताएं कि मैं क्या करूं?’’ मैं ने निराश स्वर में पूछा.

‘‘अपने पापा को माफ कर दो.’’

इस से पहले कि मैं विरोध कर पाती सुजौय फिर बोल पड़े, ‘‘देखो श्रेया मैं तुम्हारी हर तकलीफ समझता हूं और तुम्हारे हर फैसले का सम्मान भी करता हूं पर इस तरह दिल में गुस्सा और दर्द दबा कर रखने में किसी का भला नहीं है. तुम अनजाने में ही अपने साथ अपनी मां को भी तकलीफ दे रही हो. अपने अंदर से सारा गुस्सा, सारा गुबार निकाल दो और अपने पापा को माफ कर दो.’’

मुझे समझा कर कुछ देर बाद सुजौय तो सो गए पर मेरी आंखों में नींद का नामोनिशान तक न था. बीते कल की यादें खुली किताब के पन्नों की तरह मेरी आंखों के सामने खुलती चली जा रही थीं…

छोटा सा परिवार था हमारा- पापा, मम्मी, मैं और साकेत. पापा का अच्छाखासा कारोबार था. घर में किसी सुखसुविधा की कोई कमी नहीं थी. बाहर से देखने पर सब कुछ ठीक ही लगता था. पर मेरी मां की आंखों में हमेशा एक उदासी, एक डर नजर आता था. शुरू में मैं मां के आंसुओं की वजह नहीं समझ पाती थी, पर जैसेजैसे बड़ी होती गई वजह भी समझ आती गई.

वजह थे मेरे पापा जो अकसर छोटीछोटी बातों पर या फिर बिना किसी बात के मां पर हाथ उठाते थे. मुझे कभी पापा का बरताव समझ नहीं आया. जब प्यार जताते थे तो इतना कि जिस की कोई सीमा नहीं होती थी और जब गुस्सा करते थे तो वह भी इतना कि जिस की कोई हद नहीं होती थी.

पहले पापा के गुस्से का शिकार सिर्फ मां होती थीं, पर वक्त बीतने के साथ उन के गुस्से की चपेट में आने वाले लोगों का दायरा भी बढ़ता गया. पापा ने मुझ पर भी हाथ उठाना शुरू कर दिया था.

जब पापा ने पहली बार मुझ पर हाथ उठाया था तब मैं ने 2 दिनों तक बुखार के कारण आंखें नहीं खोली थीं. जब पापा मुझे मारते थे तो मां मुझे बचाने के लिए बीच में आ जाती थीं. न जाने कितनी बार मां ने हम दोनों के हिस्से की मार अकेले खाई होगी. छोटी उम्र में इतनी मार खा कर मेरे शरीर पर से कई दिनों तक मार के निशान नहीं जाते थे.

स्कूल जाने पर ऐसा महसूस होता था मानो जैसे मेरे सहपाठी मेरी ओर इशारे कर के मेरा मजाक उड़ा रहे हैं. टीचर निशानों के बारे में पूछती थीं तो झूठ बोलना पड़ता था. न जाने कितनी बार साइकिल से गिरने का बहाना बनाया होगा. अब तो गिनती भी याद नहीं है.

शुरूशुरू में मैं मार खाते वक्त बहुत रोती थी, पर वक्त के साथ मेरा रोना भी कम होता गया और कुछ वक्त बाद तो एहसास होना ही बिलकुल बंद सा हो गया था. मां अब बहुत बीमार रहने लगी थीं. मेरी परी, सुंदर मां निढाल सी रहती थीं.

डाक्टरों को भले ही मां की बीमारी की वजह पता न चल पाई हो पर मैं जानती थी. मेरी मां को एक ही बीमारी थी- मेरे पापा. मैं 8 वर्ष की थी जब साकेत का जन्म हुआ था. कितनी प्यारी मुसकान थी मेरे छोटे भाई की. दुनिया की भलाईबुराई, झूठ, फरेब, संघर्षों और तकलीफों से अनजान मासूम हंसी थी उस की. पापा ने साकेत के जन्म का जश्न मनाने में पूरे शहर को दावत दे डाली थी. मुझे लगा कि अब शायद पापा बदल जाएंगे, हम पर हाथ उठाना और गालीगलौच करना छोड़ देंगे. मगर मैं गलत थी. इनसान की फितरत बदलना नामुमकिन है.

पापा के वहशीपन से मेरा भाई भी नहीं बच पाया. मुझे उस के चेहरे पर भोलेपन की जगह खौफ नजर आता था. जब पापा हमें मार चुके होते थे तब मैं ध्यान से उन का चेहरा देखती थी. हमें गालियां देने, मारने कोसने के बाद पापा के चेहरे पर संतोष के भाव होते थे, ग्लानि नहीं. ऐसा लगता था कि हमें रोते, गिड़गिड़ाते, दर्द से कराहते देखने में पापा को खुशी मिलती थी. खुद पर गरूर होता था. कभी मुझे लगता था कि कहीं पापा किसी मानसिक रोग के शिकार तो नहीं वरना यह उन्हें हम से कैसा प्यार था जो हमारी जान का दुश्मन बना हुआ था.

मैं कई बार मां से पूछती थी कि क्या हम पापा से कहीं दूर नहीं जा सकते हैं. इस पर मां रोते हुए इसे हमारी मजबूरी बता देती थीं.

पापा के परिवार वालों ने उन्हें कभी हमें प्रताडि़त करने से नहीं रोका, बल्कि वे तो पापा को सही बता कर उन का साथ देते थे. पापा कभी अपने परिवार वालों की मानसिकता को समझ ही नहीं पाए. उन के लिए पापा बैंक का वह अकाउंट थे जिस से वे जब चाहें जितने चाहें रुपए निकाल सकते हैं पर अकाउंट कभी खाली नहीं होगा. पापा के भाई और उन के परिवार को मुफ्तखोरी की आदत लग गई थी. पापा को खुश करने के लिए वे लोग हम पर झूठे इलजाम लगाने से भी बाज नहीं आते थे.

मम्मी के परिवार वाले भी कम न थे. वे लोग शुरू से जानते थे कि पापा हमारे साथ क्या करते हैं पर उन्होंने कभी मां का साथ नहीं दिया. वजह मैं जानती थी. मेरे मामा के शौकीन मिजाज के कारण डूबते कारोबार में पापा ही रुपया लगाते थे. पापा की ही तरह उन का पैसा भी हमारा दुश्मन बन गया था.

अब मैं ने किसी से कुछ भी कहनासुनना छोड़ दिया था. पापा के लिए मेरे दिल में गुस्सा और नफरत लावा की तरह बढ़ते जा रहे थे जो अकसर फूट कर बाहर आ जाते थे. मैं अब कामना करती थी कि हमें इस नर्क से मुक्ति मिल जाए.

कुछ सालों तक सब ऐसा ही चलने के बाद अब पापा को शायद उन के कर्मों की सजा मिलनी शुरू हो गई थी. उन के भाई ने उन का सारा कारोबार डुबो दिया. सभी ने पापा का साथ छोड़ दिया था. ऐसे में मां ने अपने सारे गहने और जमापूंजी पापा को दे दिए और दिनरात कोल्हू के बैल की तरह जुत कर काम किया.

इस बीच मारपीट बिलकुल बंद सी ही थी. धीरेधीरे पापा का काम चल निकला. यह मन बड़ा पाजी चोर होता है. बारबार टूटने पर भी उम्मीद नहीं छोड़ना चाहता है. मेरे मन में पापा के बदल जाने की उम्मीद थी जो पापा ने हमेशा की तरह बड़ी बेदर्दी से रौंद डाली थी.

पापा ने फिर से वही रुख अपना लिया था. उन्होंने शायद सांप और बिच्छू की कहानी सुनी ही नहीं थी, इसलिए फिर से अपने धोखेबाज भाई पर भरोसा कर बैठे. बिच्छू ने आदत अनुसार पापा को दोबारा डस लिया और इस बार पापा धोखा बरदाश्त नहीं कर पाए. जब मम्मी एक दिन मुझे और साकेत को स्कूल से ले कर घर लौटीं तो हम ने देखा कि पापा ने आत्महत्या कर ली है.

मम्मी बेहोश हो कर गिर गईं. भाई का रोतेरोते बुरा हाल था पर मेरी आंखों में एक आंसू नहीं आया. पापा हमें रास्ते पर ला कर छोड़ गए थे. जैसा कि मुझे विश्वास था, पापा के घर वालों ने हम से हर नाता तोड़ लिया और मम्मी के घर वाले तो और भी समझदार निकले. उन्हें यह डर सता गया कि कहीं हम उन से वे रुपए न मांग ले जो पापा ने समयसमय पर उन्हें दिए थे.

हर किसी ने हमें देख कर रास्ता बदलना शुरू कर दिया था. मम्मी गहरे अवसाद की गिरफ्त में आती चली गईं. बीमारी के कारण भाई की जान जातेजाते बची.

पाप हम से सब कुछ छीन कर चले गए पर हमारा जीने का हौसला नहीं छीन पाए. बड़ी मुश्किलों से हम ने खुद को संभाला. मां ने दिनरात मेहनत व संघर्ष कर के हमें पाला. हमें कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी. उन की इसी तपस्या का फल बन कर सुजौय मेरे जीवन में आए.

पेशे से अधिकारी सुजौय को मेरे लिए मां ने ही पसंद किया था. मैं शुरूशुरू में उन पर विश्वास करने से डरती थी कि कहीं मेरा पति मेरे पापा जैसा न हो. पहले सुजौय को जीवनसाथी के रूप में पा कर और फिर श्यामली और श्रेयस के मेरी गोद में आने से मेरे सारे दुखों व संघर्षों पर विराम लग गया.

मां भी अब पहले से अच्छी अवस्था में थीं. साकेत भी पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन कर रहा था. ऐसे में दिल में सिर्फ एक कसक थी. मैं अभी तक पापा को माफ नहीं कर पाई थी. मां हर साल पापा की बरसी मनाती थीं. वे हमें भी घर आने को कहती थीं. हमेशा मुझ से कहती थीं कि मैं सब कुछ भुला दूं पर यह मेरे लिए संभव नहीं था. जब मैं सुजौय को अपने बच्चों के साथ देखती हूं तो बहुत खुश होती हूं. लेकिन साथ ही दिल में एक टीस भी उठती है कि क्या मेरे पापा ऐसे नहीं हो सकते थे. सुजौय बहुत अच्छे पति हैं और उस से भी अच्छे पिता हैं. मैं जानती हूं साकेत भी एक दिन अच्छा पति और पिता साबित होगा.

यादों की दुनिया से बाहर निकल कर मैं ने सुजौय की ओर देखा जो गहरी नींद में सो रहे थे. वे ठीक ही तो कहते हैं बीती बातों को दिल में दबाए रख कर खुद को पीड़ा देने से क्या फायदा. मां ने पापा का अत्याचार हम से कहीं ज्यादा सहा. पर फिर भी उन्होंने पापा को माफ कर दिया. अगर माफ नहीं करतीं तो उन के जाने के बाद कभी एक मजबूत चट्टान बन कर हमें सहारा न दे पातीं. सिर्फ एक मां का दिल ही इतना बड़ा हो सकता है.

अब मैं भी तो एक मां हूं फिर मुझ से इतनी बड़ी चूक कैसे हुई. मैं ने यह कैसे नजरअंदाज कर दिया कि मेरे भीतर की घुटन से मेरी मां का दम भी तो घुटता होगा. मैं पापा को सजा देने के नाम पर अनजाने में ही मां को सजा देती आई हूं. कहीं मैं भी पापा की तरह ही तो नहीं बनती जा रही हूं.

फिर मैं ने आंखें बंद कर के गहरी सांस ली और मन में कहा कि डियर पापा, मैं नहीं जानती कि आप ने हमारे साथ वह सब क्यों किया. मैं यह भी नहीं जानती कि आज भी आप को अपने किए का कोई पछतावा है भी या नहीं. मुझे आप से कोई गिलाशिकवा भी नहीं करना. आज मैं पहली और आखिरी बार आप से यह कहना चाहती हूं कि मैं आप से प्यार करती थी, इसलिए आप की मार और गालियां खाने के बाद भी उम्मीद करती थी कि शायद आप बदल जाओगे. खैर, अब इन सब बातों का कोई फायदा नहीं है. मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि मैं आप को माफ करती हूं पर आप के लिए नहीं… अपने लिए और अपने परिवार के लिए. गुडबाय. बहुत सालों बाद मैं खुद को इतना हलका महसूस कर के चैन की नींद सोई.

अगली सुबह जब मैं नाश्ता बना रही थी तो सुजौय माथे पर बल डाले रसोई में आए, ‘‘यह क्या श्रेया… तुम ने मुझे जगाया क्यों नहीं… 8 बज चुके हैं. मुझे दफ्तर जाने में देर हो जाएगी… बच्चों को अभी तक स्कूल के लिए तैयार क्यों नहीं किया तुम ने?’’

‘‘आज बच्चे स्कूल नहीं जाएंगे. आप भी दफ्तर में फोन कर के बता दीजिए कि आज आप छुट्टी ले रहे हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि आज हम सब मम्मी के घर जा रहे हैं. आज पापा की बरसी है न… आप जल्दी से नहा कर तैयार हो जाएं तब तक मैं नाश्ता तैयार कर देती हूं.’’

‘‘श्रेया,’’ सुजौय ने भावुक हो कर मेरे कंधे पर हाथ रखा तो मेरे हाथ रुक गए.

‘‘तुम अपनी इच्छा से यह कररही हो न… देखो कोई जबरदस्ती नहीं है.’’

मैं ने डबडबाई आंखों से सुजौय की ओर देखा, ‘‘नहीं सुजौय, मां ठीक कहती हैं, आप भी

सही हो. अपने भीतर का यह अंधेरा मुझे खुद ही दूर करना होगा. मैं बीते कल की इन कड़वी यादों को भुला कर आप के और अपने परिवार के साथ नई, खूबसूरत यादें बनाना चाहती हूं. मैं पापा की बरसी में जाऊंगी.’’

सुजौय सहमति में सिर हिला कर मुसकरा दिए. उन की आंखों में अपने लिए गर्व और प्रेम की चमक देख कर मुझे विश्वास हो गया कि मैं ने बिलकुल सही निर्णय लिया है.

कुछ ही देर बाद मैं सुजौय और बच्चों के साथ मां के घर पहुंच गई. बच्चे तो नानी और मामा से मिलने की बात सुन कर ही खुशी से उछल रहे थे. मेरे घंटी बजाने के कुछ क्षणों बाद मां ने दरवाजा खोला. मुझे दरवाजे पर खड़ी पा कर मां चौंक गईं. उन्हें तो सपने में भी आज मेरे घर आने की उम्मीद न थी. उन के मुंह से मेरा नाम आश्चर्य से निकला, ‘‘श्रेया… बेटा तू…’’

‘‘मां मुझे तो यहां आना ही था. आज पापा की बरसी है न.’’

मेरे मुंह से यह सुनते ही मां की आंखें भर आईं और उन्होंने आगे बढ़ कर मुझे अपने गले से लगा लिया. आज बरसों बाद हम मांबेटी लिपट कर फूटफूट कर रो रही थीं और हमारे आंसुओं से सारी पुरानी यादों की कालिख धुलती जा रही थी. Kahani In Hindi

Family Story : गवाही – आखिर कौन था उस दंगे का गवाह

Family Story : चकवाड़ा गांव में कल दोपहर को हुआ दंगा आज सुबह अखबारों की सुर्खियां बन गया. 6 घर जल गए. 3 बच्चों, 4 औरतों व 2 मर्दों की मौत के अलावा कुल 12 लोग घायल हो गए. कुछ लोगों को हलकीफुलकी चोटें आईं. इत्तिफाक से पुलिस का गश्ती दल वहां पहुंच गया और दंगे पर काबू पा लिया गया. पुलिस ने 30 लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया.

गिरफ्तार हुए लोगों में नारायण भी एक था. उस ने जिंदगी में पहली बार जेल में रात काटी थी. जेल की उस बैरक में नारायण अकेला एक कोने में सहमा सा लेटा रहा. वह उन भेडि़यों के बीच चुपचाप आंखें बंद किए सोने का बहाना करता रहा. बाकी सभी जेल में मटरगश्ती कर रहे थे. सुबह होते ही सब के साथ नारायण को भी कचहरी लाया गया. भीड़ से अलग, उदासी की चादर ओढ़े वह एक कोने में बैठ गया.

पुरानी, मटमैली सफेद धोती, आधी फटी बांहों वाली बदरंग सी बंडी, दोनों पैरों में अलगअलग रंग के जूते, बस यही उस की पोशाक थी. कचहरी के बरामदे में फैली चिलचिलाती धूप सब को परेशान कर रही थी, पर नारायण धूप से ज्यादा अपने मन में छाए डर से परेशान था.

नारायण को इस बात का भी डर था कि अगर आज का सारा दिन कचहरी में ही लग गया तो दिनभर के कामधाम का क्या होगा. शायद आज घर वालों को भूखा ही सोना पड़ेगा. नारायण को मालूम था कि कचहरी में एक मजिस्ट्रेट होता?है, वकील होते हैं और तरहतरह के गवाह होते हैं. जेल से छूटने के लिए जमानत भी देनी पड़ती है.

‘पर आज कौन देगा उस की जमानत? कैसे बताएगा वह अपनी पहचान? कैसे वह अपनेआप को इस कचहरी के चक्कर से बचा पाएगा?’ ये सारे सवाल उस का डर बढ़ाए जा रहे थे. ‘‘नारायण हाजिर हो,’’ कचहरी के गलियारे में एक आवाज गूंजी.

लोगों की भीड़ से नारायण उठा और मजिस्ट्रेट के कमरे की तरफ बढ़ा. कमरे के दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उसे टोका, ‘‘हूं, तुम हो नारायण,’’ उस चपरासी की रूखी आवाज में हिकारत भी मिली

हुई थी. ‘‘हां हुजूर, मैं ही हूं नारायण.’’

‘‘यहीं खड़े रहो. अभी तुम्हारा नंबर आने वाला है.’’ थोड़ी देर खड़े रहने के बाद चपरासी की दूसरी आवाज पर वह मजिस्ट्रेट के कमरे में घुस गया. उस ने उन मवालियों की तरफ देखा तक नहीं, जो रातभर जेल में उस के साथ बंद थे.

कमरे में घुसते ही नारायण को एक जोरदार छींक आ गई. सभी उस की तरफ देखने लगे, जैसे उस का छींकना भी जुर्म हो गया हो. नारायण की नजर जब एक आदमी पर पड़ी तो वह चौंक पड़ा और सोचने लगा, ‘अरे, यह आदमी तो अपने गांव का गुंडा है. यही तो गांव में दंगेफसाद कराता है.’

‘‘हां, तो आप दे रहे हैं इस की जमानत?’’ मजिस्टे्रट ने उस आदमी से पूछा. सफेद कुरतापाजामा में वह पूरा नेता लग रहा था. मजिस्ट्रेट ने कागज देखा, फिर वकील से पूछा, ‘‘जगन नाम है न इस का? क्या करता है यह? ऐसा कोई कागज दिखाइए, जिस से इस की कोई पहचान हो सके. भई, अब तो सरकार ने सब को मतदाताकार्ड दे दिए हैं. कोई राशनकार्ड हो तो वह दिखा दो.’’

वकील ने कहा, ‘‘हुजूर, ये मगेंद्रजी इस की जमानत देने आए हैं. अपने मंत्रीजी की बहन के बेटे हें. मैं भी इस को पहचानता हूं. इस का दंगे में कोई हाथ नहीं. यह तो बड़े शरीफ इज्जतदार लोगों के बीच उठताबैठता है.’’ नारायण हैरानी से कभी वकील को तो कभी जगन को देख रहा था. वह सोचने लगा, ‘कितना मीठा बोल रहा है वकील. इस का बस चले तो मजिस्ट्रेट को धरती पर लेट कर प्रणाम कर ले.

‘…और यह जगन तो हमेशा नशे में धुत्त रहता है. बड़ीबड़ी गाडि़यां इसे गांव तक छोड़ने आती हैं. लोग इसे गांव के सरपंच और इस इलाके के मंत्री का खास आदमी बताते हैं तभी तो मंत्री का भांजा इस की जमानत देने आया है. ‘कल भी दंगा इसी ने कराया होगा. पर इस की तो ऊंची पहुंच है, यह पक्का मुजरिम तो जमानत पर छूट जाएगा, पर मेरा क्या होगा?’ सोचतेसोचते नारायण ने अपनेआप से सवाल किया.

नारायण के पास न कोई वकील है, न राशनकार्ड, न मतदाताकार्ड यानी उस के पास पहचान का कोई सुबूत नहीं है. राशनकार्ड बना तो था, जिस से कभीकभार उस की बीवी कैरोसिन लाती थी तो कभी मटमैली सी शक्कर भी मिल जाती थी. थोड़े दिन पहले उस की बीवी ने उसे बताया था कि दुकानदार ने राशनकार्ड रख लिया है.

‘दुकानदार ने, पर क्यों?’ नारायण ने झुंझला कर अपनी बीवी से पूछा था. वह बोली थी, ‘दुकानदार कह रहा था कि सरकार का हुक्म आया है कि राशन की चीजें उसे मिलेंगी, जो इनकाम टकस (इनकम टैक्स) नहीं देता है.

‘यह बात तेरे मर्द को कागज पर लिख कर देनी पड़ेगी. अपने मर्द से इस कागज पर दस्तखत करवा कर लाना. तब मिलेगा राशनकार्ड. यह परची दी है दुकानदार ने.’ नारायण चौथी जमात तक पढ़ा था, पर ये ‘इनकम टैक्स’ क्या होता है, उस की समझ में नहीं आया था. पड़ोसियों की देखादेखी उस ने भी कागज पर दस्तखत कर दिए थे.

नारायण की बीवी उस परची को ले कर राशन की दुकान पर 5-6 बार चक्कर लगा आई थी, पर राशनकार्ड नहीं मिला था. दुकान खुले तभी तो राशनकार्ड मिले.

किसी खास समय में ही खुलती थी राशन की दुकान. फिर अगर नारायण को राशनकार्ड मिल भी जाता तो क्या होता. कौन उसे जेब में रख कर घूमता है. नारायण को याद आया कि मतदाताकार्ड भी बना था. पूरे एक दिन का काम खोटा हो गया था. गांव के सरपंच, प्रधान व पंच जैसे लोग आए थे और सब को जीप में बैठा कर ले गए थे.

पंचायतघर के अहाते में फोटो खिंचवाने वालों की लाइन लग गई थी. मतदाताकार्ड पर फोटो तो नारायण का ही था, पर खुद नारायण भी उसे पहचान नहीं पाया. अजीब सी डरावनी शक्ल हो गई थी उस की. प्रधानी के चुनाव हो गए, तो फिर पंच आए और सब के मतदाताकार्ड छीन कर ले गए. पूछने पर वे बोले, ‘आप लोग क्या करेंगे कार्ड का. कहीं गुम हो जाएगा तो बेवजह पुलिस में एफआईआर दर्ज करानी पड़ेगी. हमें दे दो, संभाल कर रखेंगे. चुनाव आएंगे तो फिर से दे दिए जाएंगे.’

गांव के अनपढ़ लोगों को तो जैसे उल्लू बनाएं, बन जाते हैं बेचारे. कार्ड बटोरने के बाद पंचसरपंच भी कन्नी काटने लगे. नारायण अपने खयालों में खोया हुआ था कि तभी जगन की मोटी भद्दी सी आवाज आई, ‘‘अच्छा हुजूर, बड़ी मेहरबानी हुई.’’

फिर सब एकएक कर कमरे से बाहर निकल गए थे. कमरे में नारायण, मजिस्टे्रट व चपरासी वगैरह रह गए थे. ‘‘आगे चलो,’’ चपरासी ने नारायण को आगे की ओर धकेला. धक्का इतना जोरदार था कि अगर वह मजबूती से खड़ा न होता तो सीधा मजिस्ट्रेट के सामने जा कर गिरता.

मजिस्ट्रेट ने नारायण को ऊपर से नीचे तक देखा. इस के बाद उस ने नारायण की फाइल देखते हुए पूछा, ‘‘नाम क्या है तुम्हारा?’’ ‘‘जी हुजूर, ना… ना… नारायण.’’

वह ‘हुजूर’ तो आसानी से कह गया, पर ‘नारायण’ शब्द उस की जबान पर ठीक से नहीं आ सका. आवाज हलक में ही अटक गई. मजिस्ट्रेट ने अपनी नजरें ऊपर उठाईं और नारायण की आंखों में झांका. नारायण ने आंखें झुका लीं. इधर मजिस्ट्रेट ने अपने तजरबे के तराजू में नारायण को तौल लिया था.

मजिस्टे्रट बोला, ‘‘अब क्यों डर रहे हो? दंगा करते समय डर नहीं लगा था क्या? शराब पीना और दंगा करना, बस यही काम जानते हो तुम गंवार लोग. ‘‘अच्छा सचसच बताओ, फावड़े से किस को मारा था तुम ने?’’ मजिस्ट्रेट की आवाज में कड़कपन था.

नारायण से यह झूठ बरदाश्त नहीं हुआ, बल्कि उस की ताकत बन गया. इस बार उस की आवाज में बिलकुल भी घबराहट नहीं थी. नारायण बोला, ‘‘नहीं हुजूर, मैं कभी शराब नहीं पीता. मैं तो दिनभर दूसरों के खेत में मेहनतमजदूरी करता हूं. अगर नशा करूं तो मेरे बीवीबच्चे भूखे मर जाएं…’’

नारायण में आया यह बदलाव मजिस्ट्रेट को अच्छा नहीं लगा. वह नारायण की बात को बीच में ही काटते हुए बोला, ‘‘अपनी रामकहानी मत सुनाओ मुझे. मेरी बात का जवाब दो. ‘‘मैं ने तुम से पूछा था कि तुम ने फावड़े से किसे मारा था? पुलिस की रिपोर्ट में साफ लिखा है कि पुलिस ने जब तुम्हें पकड़ा तो तुम्हारे हाथ में फावड़ा था.’’

मजिस्ट्रेट की डांट से नारायण फिर घबरा गया. हाथ जोड़ कर वह मजिस्ट्रेट से बोला, ‘‘हुजूर, फावड़े से तो मैं खेत में निराईगुड़ाई कर के आया था. जब दंगा हो रहा था तब मैं खेत से सीधा घर लौट रहा था. मुझे पता नहीं था कि गांव में दंगा हो रहा है. जब फावड़ा मेरे हाथ में था, तभी पुलिस ने मुझे पकड़ लिया.’’ मजिस्ट्रेट का गुस्सा अभी कम

नहीं हुआ था. वह बोला, ‘‘बड़ी अच्छी कहानी बनाई है. अच्छा चलो, पहले अपना पहचानपत्र दो. तुम्हारा न तो कोई वकील है, न जमानत देने वाला और न तुम्हारी पहचान साबित करने वाला कोई गवाह है. ‘‘मुझे तो तुम्हारी बात पर बिलकुल भी यकीन नहीं है. मैं जानता हूं, तुम सब झूठ बोलने में माहिर हो. कोई सुबूत हो तो जल्दी पेश करो, नहीं तो जेल की हवा खानी पड़ेगी.’’

‘‘हुजूर, मेरे पास तो कोई पहचानपत्र नहीं है. गरीबी की क्या पहचान, हुजूर. मेरी पहचान का सुबूत तो यह मेरा शरीर और ये 2 हाथ हैं,’’ नारायण ने गिड़गिड़ाते हुए कहा और अपने दोनों हाथ की बंद मुट्ठियां मजिस्ट्रेट के सामने खोल दीं. उस की दोनों हथेलियां छालों से भरी हुई थीं. उस के हाथों के छाले उस की पहचान के पक्के सुबूत थे, जिन्हें किसी वकील की मदद के बिना सबकुछ कहना आता था.

ऐसी ठोस ‘गवाही’ उस मजिस्ट्रेट ने अपनी जिंदगी में पहली बार देखी थी. यह देख कर मजिस्ट्रेट की आंखें भर आईं. मजिस्ट्रेट ने अपनेआप को संभाला और फिर हुक्म दिया, ‘‘इसे बाइज्जत बरी किया जाता है.’’  Family Story 

Family Story In Hindi : वो पिताजी ही थे

Family Story In Hindi : रति के पति विशाल 2 दिनों से सिर में दर्द व थकावट की शिकायत कर रहे थे. उन्होंने कहा कि “शायद नींद पूरी नहीं हुई है.”

“आराम कीजिए आप, सारे दिन लैपटौप में आंखें गड़ाए काम भी तो करते हैं,” रति के कहने पर विशाल ने सिरदर्द की दवा ली और दूसरे कमरे में जा कर सो गए.

रति मन ही मन चिंतित थी कि इन्हें तो आराम करने को कह रही हूं पर कहीं इन्हें… उफ़, मैं भी न क्या फालतू की बात सोचने लगी हूं.

अगले दिन विशाल को बुखार भी चढ़ने लगा था. “विशाल, यह लो थर्मामीटर, अपने शरीर का तापमान देखो तो,” रति ने मास्क पहन कर उसे थर्मामीटर थमाया.

तापमान सौ डिग्री था. विशाल ने स्वयं ही पास के डाक्टर को फोन किया और अपनी स्थिति बताई.

“लग तो कोरोना के लक्षण ही रहे हैं. यों करिए, आप अस्पताल जा कर सीटी स्कैन करवा लीजिए, कुछ ब्लड टैस्ट भी व्हाट्सऐप पर बता देती हूं, आप जा कर करवा लीजिए और फिर रिपोर्ट मुझे दिखाएं.”

घर में मानो भूचाल सा आ गया था. विशाल के पृथकवास यानी आइसोलेशन के लिए उस की पत्नी ने अलग कमरा तैयार कर दिया था.

सभी टैस्ट हुए, रक्त की जांच भी करवा ली गई थी और आज रिपोर्ट भी आ गई. डाक्टर ने सारी रिपोर्ट्स देख कर कोरोना का संक्रमण होने की पुष्टि कर दी थी.

रति के हाथपैर फूल गए थे. विशाल की शारीरिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति ख़राब थी. एक कमरे में बंद हर पल यही विचार मन में आता कि ‘यदि मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा? उन की शिक्षा के लिए कैसे इंतजाम करेगी अकेली रति? कभी ऐसा सोचा ही नहीं था कि ऐसी महामारी यह सोचने पर विवश कर देगी. वैसे कुछ इंश्योरैंस पौलिसी तो ली हुई हैं मैं ने अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए. कुछ म्यूचुअल फंड्स और शेयर्स में भी इन्वैस्ट किया हुआ है. पर रति को तो फाइनैंस की कुछ जानकारी ही नहीं. कभी दोनों ने साथ बैठ कर यह सब चर्चा तो की ही नहीं.’

सोचतेसोचते उस का जी घबराने लगा था, कलेजा मानो हलक तक आ गया था. रहा न गया तो रति को फोन किया. फोन की घंटी लगातार बज रही थी, लेकिन रति ने फोन न उठाया तो वह कमरे के दरवाजे तक आ कर रति को आवाजें देने लगा था. बच्चों की औलाइन कक्षाएं चालू थीं, सो उस की आवाज़ किसी ने न सुनी.

हताश हो कर वह फिर अपने बिस्तर पर लेट गया. उस की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी थी. शरीर टूट रहा था और उस का धीरज भी छूट रहा था.

तभी उस के फोन की घंटी बजी. उस ने झट से फोन उठाया, देखा रति की कौल थी, “कहिए क्या चाहिए, आप ने फोन किया था, दरअसल रात में फोन साइलैंट मोड में कर देती हूं न, सुबह नौर्मल करने का ध्यान ही नहीं आया, इसलिए आप के कौल की घंटी नहीं सुनाई दी थी पहले. अब नौर्मल किया तो देखा कि आप की मिस्डकौल थी.”

“कुछ नहीं चाहिए रति, बस मन थोड़ा घबरा रहा है. तुम फ्री हो तो कुछ बातें तुम से करना चाहता हूं,” उस के पति ने घबराए स्वर में कहा.

“देखो, यदि मुझे कुछ हो जाए…”

“उफ़, ये कैसी बातें कर रहे हैं आप,” रति ने विशाल की बात काटी.

“क्या करूं, मजबूर पिता हूं मैं. कल को मैं न रहूं तो तुम्हें व बच्चों को कोई परेशानी न हो, इसलिए कुछ बातें तुम से साझा करना चाहता हूं. अख़बारों और टीवी चैनलों पर दिखाई जा रही खबरों के अनुसार कोरोना के बढ़ते संक्रमण के चलते अस्पतालों में मरीजों के लिए जगह नहीं, दवाइयों की मुश्किल, रेमडेसिविर इंजैक्शन की सप्लाई कम पड़ रही है, अस्पतालों में बैड उपलब्ध नहीं. इसलिए फिक्रमंद हूं.”

“पहले आप नकारात्मकता को स्वयं से दूर कीजिए, सब अच्छा ही होगा. हम ने आज तक किसी का बुरा नहीं किया,” रति ने उसे ढाढस बंधाई.

“तुम ठीक ही कहती हो पर क्या करूं मन में बहुत बुरे भाव आ रहे हैं, अस्पतालों में लाशों के ढेर, भयावह मंजर आंखों के सामने बारबार घूमघूम कर आता है तो तुम्हारी और बच्चों की फ़िक्र होती है. खैर छोड़ो, मैं तुम्हें जो जानकारी दे रहा हूं उसे ध्यान से सुनो.” विशाल ने रति को अपने इन्वैस्टमैंट और इंश्योरैंस पौलिसी के बारे में जानकारी दी और कहा कि सभी फाइलें पढ़ कर अपने पास संभाल कर रख लो.

“ऐसा करो, तुम फाइलें ले कर बैठो, मैं वीडियोकौल करता हूं और तुम्हें फाइलों के अंदर की सामग्री की जानकारी देते जाता हूं.”

रति फाइलें ले कर बैठ गई थी और विशाल उसे वीडियोकौल की मारफत जानकारी दे रहा था.

सारी जानकारी दे कर उस ने अंत में रति से कहा, “सुनो, यदि मुझे कुछ हो जाए तो तुम विधवा के लिबास में न रहना…”

“विशाल, ऐसा मत कहो, मुझे नहीं अच्छा लग रहा यह सब सुनना,” रति ने खीझ कर कहा.

“क्या करूं रति, बचपन में पिता का साया सिर से उठ गया था, अपनी मां को विधवा के लिबास में देखा. न जाने कितने ही धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों के समय मां सब से अलग बैठी रहती. स्वयं नौकरी कर मुझे पालापोसा, बड़े दुख के दिन देखे मां ने, इसीलिए डरता हूं.”

“अच्छा ठीक है, मैं आप के लिए नाश्ता ले कर आती हूं, बुरे विचार मन में मत लाओ वरना मैं रो पडूंगी.”

अगले ही पल दोनों वीडियोकौल पर आमनेसामने बैठ कर नाश्ता खा रहे थे. रति की आंखें आंसुओं से भरी थीं और विशाल के माथे पर चिंता की रेखाएं.

एकएक दिन कर 7 दिन बीत चुके थे. विशाल की दवाइयां चालू थीं. लेकिन स्वास्थ्य में ख़ास सुधार नहीं आ रहा था. रति की मानसिक स्थिति भी ख़राब होती जा रही थी. कभी अपने बच्चों की तरफ देखती तो कभी कमरे में कोरोना पीड़ित पति को बंद दरवाजे के अंदर.

लेकिन उसे स्वयं को तो हिम्मत रखनी ही होगी न, घर में और कोई है भी तो नहीं संभालने वाला.

आज फिर उस ने डाक्टर को विशाल की सारी स्थिति से वाकिफ करवाया, “डाक्टर, मेरे पति विशाल को सांस लेने में भी परेशानी होने लगी है, आप ही बताइए मैं क्या करूं,” बोलतेबोलते उस का गला भर आया था.

“आप उन्हें तुरंत अस्पताल में एडमिट कीजिए और हिम्मत रखिए,” डाक्टर ने अपने हाथ खड़े कर उन्हें अस्पताल का रास्ता दिखा दिया था.

ऐसे में कौन भला उसे अस्पताल ले कर जाए, एम्बुलैंस की सरकारी और प्राइवेट दोनों ही सुविधाएं खूब कोशिश करने पर भी उसे मिली नहीं. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. बिल्डिंग के बाहर एम्बुलैंस के साइरन तो खूब सुनाई देते हैं पर सब की सब तेज गति से अस्पतालों की तरफ रुख करती हुई दौड़ती चली जाती हैं.

वह घर से बाहर सड़क पर आ कर खड़ी हो गई. आतीजाती कारों, एम्बुलैंस, टैक्सी को हाथ दिखाती पर कोई न रुकता. कोई थमता भी तो कोरोना मरीज को ले जाने को तैयार न होता. अंत में एक औटोरिकशा वाले के सामने वह गिड़गिड़ाई, “कृपया कर मुझ पर तरस खाइए, मेरे छोटेछोटे बच्चे हैं, मैं आप को सैनिटाइज़र भी दे दूंगी, उस से आप रिकशा सैनिटाइज़ कर लेना, भाड़ा भी आप जो बोलें वह उचित, मुझ पर रहम करो.” रिकशावाला उस के पति को अस्पताल ले जाने को राजी हो गया. शायद उस के घर में भी भूख पसरी हुई थी, क्योंकि औटोरिकशा से आनेजाने वाले लोगों की संख्या भी तो कोरोना के चलते कम हो गई थी.

अस्पताल तक का सफ़र उसे मीलों लंबा लग रहा था. पति को अपनी गोद में पसारे औटो में बैठी उस की रुलाई फूट रही थी. कब अस्पताल का बोर्ड दिखे… वह मन ही मन सोच रही थी.

जैसे ही अस्पताल पहुंची, मुट्ठी में रखे भाड़े के रुपए, सैनिटाइज़र देते हुए उस ने उसे धन्यवाद भी दिया और अस्पताल के रिसैप्शन की तरफ बढ़ गई.

हाहाकार की आवाजों और कोरोना मरीजों के परिजनों के बीच से निकलते हुए वह काउंटर तक पहुंची. दिल की धडकनें मानो थम सी गई थीं, पूरे बदन में गरमी की लहर सी निरंतर दौड़ रही थी. हर तरफ रुदनक्रंदन के स्वर में सिर्फ यही सुनाई दे रहा था- ‘बैड चाहिए…’

उस ने भी जोर से पुकारा, “मेरे पति की हालत बहुत गंभीर है, एक बैड चाहिए.”

भला रिसैप्शन पर बैठे स्टाफ कहां से बैड उपलब्ध करवाते?

“सौरी सर, सौरी मैम,” कहतेकहते उन का गला भी भारी हो चुका था. रोंआसे चेहरों के बीच रति ऐसा एक चेहरा खोज रही थी जो इस भयावह समय में उस की मदद कर सके. लेकिन हर शख्स, हर चेहरा हालात के हाथों मजबूर नज़र आ रहा था.

आखिरकार, उस की रुलाई फूट पड़ी थी. वह अपने पति को बैंच पर बैठा कर स्वयं पास ही में बैठ गई और फूटफूट कर रोने लगी. कभीकभी रिसैप्शन की तरफ उम्मीदभरी नज़र से देखती कि उस के पति के लिए कहीं से बैड का इंतजाम हो जाए.

आसपास सभी तो कोरोना के मरीज एवं उन के परिजन थे, सामान्य मरीजों के लिए तो अस्पताल के दूसरे दरवाजे से दाखिल होने की व्यवस्था थी.

तभी अचानक से रिसैप्शन पर बैठे स्टाफ ने उस के पति का नाम पुकारा. वह दौड़ कर वहां गई. “आप के पति के लिए बैड की व्यवस्था हो गई है, आप कागजी कार्यवाही पूरी कीजिए और हम आप के पति को एडमिट कर देते हैं.”

मन में न जाने कितने सवाल एकसाथ उठ खड़े हुए थे- ‘यह कैसे संभव हो गया…किस ने की बैड की व्यवस्था? कितना खर्च आएगा आदि.’

लेकिन मस्तिष्क को कागजी कार्यवाही की तरफ खींच लाई रति और मन ही मन धन्यवाद करने लगी कि जिस ने भी यह व्यवस्था की वह सदा सुखी रहे.

पति को अस्पताल में एडमिट करते ही उसे अपने बच्चों का ख़याल आया. घर पर फोन किया और उन्हें सुखद संदेश दिया कि उन के पिता को बैड मिल गया है. फ़िक्र न करें, वह घर लौट रही है.

सारी रात मन में पति के स्वास्थ्य के बारे में सोचते हुए प्रकृति से विनती करती रही. बारबार मन में यह विचार भी आया कि बैड न मिलने की इतनी समस्या है, लोग जानपहचान निकाल कर अस्पताल में बैड की व्यवस्था कर रहे हैं. जिन के पास बहुत रुपएपैसे हैं वे भी किसी न किसी तरह परेशान हैं और व्यवस्था करने में लगे हुए हैं. लेकिन उस का तो कोई खैरख्वाह नहीं. न तो इतना रुपयापैसा और न ही कोई ऊंची पहुंच. मन ही मन अस्पताल के स्टाफ को धन्यवाद करते हुए कब उस की आंख लग गई, पता न चला.

तीन दिन कभी घर कभी अस्पताल के चक्कर लगाती वह बेहद थकान महसूस कर रही थी. स्वयं भी मन ही मन डर रही थी कि कहीं उसे भी संक्रमण न हो जाए. मास्क तो जैसे तीन दिन में उतारा ही नहीं, सिर्फ रात को सोते समय उतारती. हाथों में सैनिटाइज़र हर वक़्त रहता. आज घर लौट कर सांझ ढले ही निढाल हो पलंग पर लेट गई और आंख लग गई.

सुबह नियत समय पर नींद खुली, रसोई में आ कर चाय-दूध किया. अखबार उठाया तो मोटे अक्षरों में खबर की हैडलाइन देख कर उस की आंखें भर आईं.

‘युवक को बचाने के लिए बुजुर्ग का बैड लेने से इनकार, 3 दिनों बाद स्वयं की म्रुत्यु’ पूरी खबर पढ़ी.

धीरे से बुदबुदाई- ‘मैं ही तो हूं वह महिला, जिस ने अस्पताल में फूटफूट कर रोना शुरू किया था.’ उसे समझते देर न लगी कि यही वे महान पुरुष हैं जिन के त्याग से उस के पति को बैड मिला.

‘किन शब्दों में धन्यवाद करूं मैं आप का. भला एक पिता के सिवा इतना कौन किसी के लिए कर सकता है? मेरे पति को जीवन में सदैव पिता की कमी खली. पर आप भी तो पितासामान ही थे,’ वह मन ही मन बुदबुदाई.

अस्पताल में स्वास्थ्य में सुधार पाते उस के पति को उस ने पूरी घटना फोन पर बताई और कहा, “जरूरी नहीं कि रिश्ता खून का हो, कुछ रिश्ते अनजाने भी होते हैं. यों समझिए कि वो पिताजी ही थे.”  Family Story In Hindi

Street Dogs : कुत्तों की नसबंदी – क्या कष्ट हरेंगे इंसानों का

Street Dogs : सुप्रीम कोर्ट के कुत्तों के टीकाकरण और नसबंदी के आदेश के बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे कम से कम 70 प्रतिशत आवारा कुत्तों की नसबंदी व एंटी रेबीज टीकाकरण करें. यह एक बाध्यकारी प्रक्रिया होगी जिसे सभी को मानना ही होगा. इस के लिए राज्यों को अपनी प्रगति रिपोर्ट भी बनानी होगी और न करने कर जवाबदेही भी तय होगी.

इसे सही निर्णय कहा जाना चाहिए, क्योंकि बड़े शहरों से ले कर छोटे टाउन तक में कुत्तों का आतंक फैला हुआ है. कुत्तों के चलते लोग अपना रास्ता ही बदल लेते हैं. बात सिर्फ संख्या की नहीं है, इन से होने वाली बीमारी भी चिंता का विषय है. रेबीज जानलेवा है. 99.9 फीसदी मामले में मौत निश्चित है. यदि किसी को कुत्ते ने काट लिया तो इस की प्रति वैक्सीन डोज 350-500 रुपए तक की आती है. 5 डोज लगानी पड़ती हैं. कुत्ते के एक बाइट या पंजे के निशान तक से ही 2000 रुपए तक का खर्चा बैठ जाता है. जाहिर है इस का बड़ा भार सरकार को वहन करना पड़ता है और सरकार को सालाना 100 करोड़ रुपए इस बिन बुलाए दिक्कत पर खर्च करने पड़ते हैं.

अच्छी बात यह है कि केंद्र इस टारगेट को पूरा करने के लिए राज्यों को अनुदान देगी. जिस में नसबंदी और टीकाकरण के लिए प्रति कुत्ता 800 रुपए और प्रति बिल्ली 600 रुपए है. यही नहीं, फीडिंग जोन, रेबीज नियंत्रण इकाई बनाने और आश्रय स्थलों के उन्नयन के लिए अलग से फंड दिया जाएगा.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों की दिक्कतों पर खुद ही संज्ञान ले कर सरकार को यह राह दिखाई है. 11 अगस्त के अपने फैसले पर संशोधन कर 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जिन कुत्तों को पकड़ा गया है उन्हें नसबंदी और एंटी रेबीज टीकाकरण के बाद फिर उन की जगह पर छोड़ दिया जाए. अब केंद्र सरकार ने पूरे देश में इसे लागू करने का फैसला किया है.

Romantic Story In Hindi : नए रिश्तों की शुरुआत – क्या केतन पा सका किसी का प्यार

लेखिका – रीशा गुप्ता 

Romantic Story In Hindi : जेनिफर फ्रांस की थी लेकिन भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो यहीं की हो कर रह गई. रिश्तों की समझ थी उसे तभी तो केतन की दिल की भावनाएं अच्छी तरह से समझ गई थी.

‘‘आराम से मां, ला यह बैग मुझे दे दे. पता नहीं क्या है इस में, सीने से चिपकाए रहती है हमेशा. कहीं नहीं जाने वाला तेरा यह बैग,’’ कहते हुए केतन ने अपनी मां के हाथ से वह बैग ले लिया.

एक हाथ में सामान और दूसरे हाथ में मां की उंगली थाम रखी थी केतन ने. मां से तेज नहीं चला जाता, इसलिए वह भी धीरेधीरे उन के कदम से कदम मिलाते हुए चल रहा था.

उस को ऐसे चलता देख मां अचानक केतन के बचपन में खो गई. जब केतन चलना सीख रहा था तो वह भी तो उस के कदम से कदम मिलाती थी. कभी उस पर झुंझलाई नहीं, हमेशा सब्र रखा. आज शायद उसी का नतीजा है जो केतन भी बिना झुंझलाए उस के कदम से कदम मिला रहा है. मां की आंखें एकदम से भर आईं.

ट्रेन स्टेशन पर पहले से खड़ी थी. अपने कोच के सामने केतन अपना नाम और सीट देखने लगा. इतने में उन का सामान ले कर कुली ट्रेन के डब्बे में चढ़ चुका था. केतन ने मां को कुछ देर वहीं खड़े रहने को कहा और वह कुली के साथ अपनी सीट पर सामान व्यवस्थित करवा कर फटाफट मां के पास पहुंचा. उस ने दोनों हाथ से मां को ट्रेन में पकड़ कर चढ़ाया और दोनों सीट पर आ कर बैठ गए.

औफिस के काम से उस को पचमढ़ी जाना था. 10 दिनों का ट्रिप था. मां को अकेला छोड़ कर जाने का मन नहीं था, फिर जगह भी अच्छी थी तो केतन ने सोचा कि मां को भी अच्छा लगेगा. हालांकि इस उम्र में उन से ज्यादा तो घूमा नहीं जाएगा पर हवापानी बदलने से तबीयत अच्छी हो जाएगी, सोच कर वह मां को भी अपने साथ ले आया. दोनों अपनी सीट पर बैठे ही थे, तभी ट्रेन ने सायरन दे दिया और धीरेधीरे ट्रेन ने स्टेशन छोड़ दिया.

‘‘मां, आराम से. पैर ऊपर रख कर बैठ जा. सफर लंबा है, लटकाने से पैर सूज जाएंगे,’’ कहते हुए केतन ने मां के पैरों को ऊपर उठाने में मदद की. ट्रेन तब तक अपनी गति पकड़ चुकी थी. उन के डब्बे में अभी ज्यादा भीड़ नहीं थी, बस, उन की बगल वाली सीट पर एक पतिपत्नी का जोड़ा बैठा था, शायद अगले स्टेशन से और सवारी चढ़ जाएं.
‘‘मां ठंड तो नहीं लग रही, खिड़की बंद करूं?’’ केतन ने पूछा.
‘‘नहीं बेटा, हवा आने दे, अच्छी लग रही है.’’
और उस ठंडी हवा में मां को झपकी लग गई. केतन खिड़की के सहारे सिर टिका कर बैठ गया.

पंचमढ़ी बहुत ही सुंदर, मध्य प्रदेश का दिल हो जैसे, 5 पहाडि़यों के बीच बसा है, इसलिए नाम पचमड़ी पड़ा. केतन अचानक पंचमढ़ी की पुरानी यादों में खो गया. इस से पहले वह अपनी पत्नी के साथ शादी के बाद आया था. किरण का तो मन ही नहीं था यहां आने का. उसे तो आउट औफ इंडिया जाना था पर केतन की जिद के आगे उस की नहीं चली.

प्रकृति ने जैसे अपनी छटा बिखेर रखी है यहां. केतन कितना खुश था यहां आ कर. कितनी देखने की जगहें थीं- पांडव केव, धूपगढ़ जोकि सतपुड़ा की सब से ऊंची चोटी पर है, यहां से अस्त होते सूरज का जो दृश्य होता है वह बहुत ही विहंगम होता है. सतपुड़ा के जंगल भी बहुत ही मनोरम थे. खयालों में ही केतन की आंखों के आगे वे खूबसूरत दृश्य एक के बाद एक आते गए.

याद है उसे जब जंगल सफारी पर जाने से पहले केतन ने किरण का मूड अच्छा करने को बोला था, ‘जानेमन, इतनी अच्छी जगह पर अपना मूड खराब मत करो, यहां तो बस हम रोमांस करेंगे.’ यह कह कर केतन ने किरण को अपनी बांहों में ले लिया लेकिन किरण उस की बांहों से अपने को छुड़ाती हुई गुस्से में बोली थी, ‘यहां पर रोमांस तुम्हें सूझ सकता है, मुझे नहीं. अरे, अगर पैसों की बात थी तो मुझे से एक बार बोलते, मैं पापा को बोल देती, वे टिकट करा देते. अरे, कम से कम ऐसी जगह तो नहीं आना पड़ता.’

यह सुनते ही केतन का अच्छाखासा मूड बिगड़ गया. उस के बाद यहां की खूबसूरती भी उस का खराब मूड ठीक न कर सकी.

वह अपने खयालों में ही था कि मां की आंख खुल गई. उस ने अपने बैग में से खाना निकाल कर प्लेट में लगा कर केतन को दिया, ‘‘ले बेटा, खाना खा ले.’’
केतन और मां खाना खाने लगे. दोनों ने खाना खत्म किया तो मां बोली, ‘‘अब तू भी सो जा बेटा, थक गया होगा. मैं भी लेट जाती हूं.’’

केतन ने मां को अच्छे से चादर उढ़ा कर लिटा दिया और खुद ऊपर की बर्थ पर चला गया. वह अपनी चादर बिछा कर लेट गया. ट्रेन अपनी गति से बढ़ती जा रही थी. केतन की आंखों से नींद अभी कोसों दूर थी. वह फिर पुरानी यादों में चला गया.

किरण शुरू से उस से रिश्ता जोड़ नहीं पाई. बातबात में अपने घर, अपने पापा के पैसों के ताने देती. सासुमां से कभी तमीज से न बोलती. काम में, घर में तो उस का कभी मन लगा ही नहीं. रोज केतन से बाहर जाने की जिद करती. केतन और उस की मां ने उस के साथ समझता करने की बहुत कोशिश की पर वह तो समझता करने को तैयार ही न थी. आखिर, सालभर में दोनों अलग हो गए.

केतन की मां ने कितनी विनती की, गिड़गिड़ाई लेकिन किरण ने किसी की एक न सुनी. आज इस बात को 4 साल हो गए. इस बीच उस की मां बोलबोल कर थक गई दूसरी शादी के लिए पर केतन दोबारा चोट खाने को तैयार न था.

सोचतेसोचते उस की आंख लग गई. अचानक आवाजों से उस की आंख खुल गई. सुबह हो चुकी थी. लगता है कोई स्टेशन आया था, चाय वाले आवाज लगा रहे थे. केतन बर्थ से नीचे उतर कर आया. मां पहले ही उठ चुकी थी.

‘‘अरे मां, उठ गई, चाय पियोगी न,’’ कहते हुए केतन ने खिड़की में से एक चाय वाले को आवाज लगाई और 2 चाय ले ली.
‘‘कितनी देर और है बेटा?’’
‘‘बस मां, अब अगला स्टेशन अपना ही है, कुछ खाओगी?’’
‘‘नहीं बेटा, अब तो होटल में चल कर फ्रैश हो कर ही कुछ खाएंगे.’’
अगले स्टेशन पर केतन अपनी मां के साथ ट्रेन से उतर गया. कैब पहले ही बुक करा दी थी जो उन को लेने स्टेशन आ गई. कैब में सामान रख कर दोनों बैठ गए.
‘‘बेटा, जगह तो बहुत ही सुंदर है, कितनी अच्छी और शांत है यह.’’
‘‘हां मां, बहुत अच्छी जगह है यह.’’
आखिरकार दोनों रिजौर्ट आ गए. ‘‘मां, यहां पर तुम को किसी चीज की कमी महसूस नहीं होगी. अकेले भी मन लग जाएगा, इसलिए मैं ने यह रिजौर्ट रहने के लिए चुना.’’

कहता हुआ केतन रिसैप्शन की ओर बढ़ गया. सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद उन को कमरे की चाबी मिल गई. केतन मां के साथ कमरे की ओर बढ़ गया. उन का सामान उन के रूम में लड़का ले कर आ रहा था.

बहुत बड़ा गार्डन, इंडोर गेम्स, स्विमिंग पूल, लाउंज हर तरह की सुविधा से युक्त था रिजौर्ट. रूम में आ व फ्रैश हो कर नाश्ता करने के बाद केतन बोला, ‘‘मां, मुझे जाना होगा, आप आराम कर लो. काम से फ्री हो कर घूमने चलेंगे. आप का मन हो तो बाहर रिजौर्ट में घूमने चली जाना, कोई डर की बात नहीं है.’’

केतन को काम में 3-4 घंटे लग गए. जब वापस आया तो देखा, मां लाउंज में बैठी थी. उस के पास एक लड़की बैठी थी. उस की उम्र 25-26 साल थी. वह विदेशी लग रही थी पर मां को तो इंग्लिश आती नहीं. वह उस के पास कैसे बैठी है, असमंजस में वह मां के पास आया. उस ने मां को प्रश्नसूचक नजरों से देखा.

मां उस के मन की बात समझ गई, ‘‘बेटा, इस का नाम जेनिफर है. यह फ्रांस की रहने वाली है. सालभर पहले भारत घूमने आई थी. भारतीय संस्कृति से इतनी प्रभावित हुई कि यहीं बसने का निश्चय कर लिया. अब एक एनजीओ में काम करती है.’’

केतन ने हैलो करना चाहा तो उस ने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया. केतन को ऐसी आशा न थी. उस ने सकपका कर नमस्ते में हाथ जोड़ लिए. फिर उस ने उन दोनों से विदा ली. मां से बातों में पता चला कि केतन के जाने के बाद वह थोड़ा घूमने बाहर आ गई. सोफे पर अकेली बैठी थी. प्यास लगने पर पानी लेने के लिए उठी तो एकदम से उठा नहीं गया. उस लड़की ने आ कर मां की मदद की. पानी ला कर दिया. शुरू में तो मां झिझकी लेकिन ताज्जुब हुआ जब वह हिंदी में बोली. पता नहीं क्यों बेटा, उस से मिल कर लगा जैसे पिछले जन्म का कोई रिश्ता हो.’’

मां को देख कर केतन को ऐसा लगा जैसे उस से मिल कर मां बहुत खुश थी. उस के बाद केतन मां को आसपास की जगह घुमाने ले गया. रात को कमरे में आ कर दोनों सो गए. सुबह केतन फिर काम से चला गया. उस दिन भी जेनिफर और मां की खूब बात हुई.

मां ने बताया, ‘‘जेनिफर गरीबों और जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती है. उस ने अपनी जमापूंजी का एक हिस्सा उन के कल्याण के लिए लगा दिया. यहां रिजौर्ट में भी सब उस के हंसमुख, मिलनसार और विनम्र स्वभाव से बहुत प्रभावित हैं. सच बेटा, उस बच्ची ने तो मेरा दिल जीत लिया. तुम्हारा धन्यवाद जो मैं यहां आई और उस से मुलाकात हुई.’’
अब मां ने झिझकते हुए केतन से पूछा, ‘‘बेटा, तू तो दिनभर चला जाता है, मैं जेनिफर के साथ आसपास घूम आऊं?’’
‘‘अरे मां, ऐसे कैसे एक अजनबी पर विश्वास कर लें?’’
‘‘बेटा, वह बहुत अच्छी है. इतने कम समय में एक अपनापन सा लगने लगा है.’’
‘‘नहीं मां, मेरा मन नहीं मानता. वैसे भी, कल मुझे कुछ खास काम नहीं. हम दोनों घूमने चलेंगे.’’

अगले दिन दोनों तैयार हो कर घूमने चल पड़े. वे एक मंदिर पहुंचे. वहां पर उन्हें जेनिफर दिखी. मां ने दूर से ही उस को आवाज लगाई. वह भी मां को देख कर बहुत खुश हुई. तीनों दर्शन के लिए अंदर चल दिए. केतन ने देखा, जेनिफर ने चुन्नी से सिर ढक लिया और दोनों हाथ जोड़ कर आंखें बंद कर लीं. मां काफी देर तक पूजा करती रही.

केतन बाहर आ गया. जेनिफर भी बाहर आ गई. दोनों काफी देर तक बात करते रहे. बातों में पता चला कि वह पचमढ़ी घूमने आई है. सालभर पहले भारत आई तो भारतीय संस्कृति से बहुत प्रभावित हुई. इसलिए यहीं बस गई. अब एक एनजीओ में काम करती है. फ्रांस में भी वह सामाजिक कामों से जुड़ी थी. उस के मांबाप भी उस के इस निर्णय से खुश हैं. दोनों काफी देर तक बात करते रहे. मां सही कह रही थी, बहुत ही अच्छी हिंदी पर पकड़ है उस की.

पूरे दिन जेनिफर उन दोनों के साथ ही थी. अगले दिन केतन सुबह से ही काम पर निकल गया. 7-8 दिन यों ही निकल गए.

एक दिन केतन और मां खाना खा रहे थे, तभी मां बोली, ‘‘बेटा, एक बात बोलूं?’’
‘‘बोल न, मां.’’
‘‘तू जेनिफर से शादी कर ले.’’
केतन खाना खातेखाते रुक गया. उस को मां से ऐसी बात की आशा न थी. ‘‘यह क्या कह रही हो, मां. जानते ही कितना हैं मां हम उस को. न अपना देश, न अपना धर्म, खानपान, रहनसहन सबकुछ तो बिलकुल अलग है. और वो, वो क्यों तैयार होगी? आप ने ऐसा सोच भी कैसे लिया?’’

‘‘बेटा, तेरी मां हूं, ऐसे ही धूप में बाल सफेद नहीं किए. मैं ने उस से सब बात कर ली है. तू तो चला जाता था, मैं और वह पूरे दिन साथ रहते थे. उस को तेरे बारे में सब बता दिया. उस के मन की भी ले ली. वह तैयार है. सच बताऊं, उस की बातों से लगा जैसे वह तुझ से प्रभावित है और किस धर्म की, किस जानपहचान की बात कर रहा है, किरण से तेरा रिश्ता तो देखभाल कर किया था पर क्या हश्र हुआ?’’

यह कह कर मां चुप हो गई. केतन को कुछ समझ नहीं आया. वह रातभर सो न पाया. काफी सोचने के बाद सुबह उस ने मां से कहा, ‘‘मां, एक दफा मैं खुद जेनिफर से बात करना चाहता हूं. उस के बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचूंगा. एक दफा चोट खा चुका, अब हिम्मत नहीं फिर से धोखा खाने की.’’

यह सब बोलते हुए केतन की आवाज भर्रा गई जिसे देख मां का कलेजा मुंह को आ गया. जब मां ने जेनिफर को केतन के मन की शंका बताई तो जेनिफर केतन के साथ जाने को तैयार हो गई. केतन जेनिफर के साथ पैदल ही निकल गया. वैसे भी, पचमड़ी जैसी सुंदर और शांत जगह और सुहाने मौसम में टहलने का अलग ही मजा है. टहलते हुए वे दोनों एक कैफे में आ गए. वहां केतन ने जेनिफर से पूछ कौफी और स्टार्टर्स का और्डर दे दिया. केतन ने पूछा कि अगर उसे कुछ नौनवेज मंगवाना हो तो बताए लेकिन जेनिफर ने बताया कि भारत में आ वह शुद्ध शाकाहारी बन गई.

केतन ने बातों में ज्यादा घुमायाफिराया नहीं, सीधे मुद्दे पर आता हुआ बोला, ‘‘जेनिफर, कल मां ने बताया कि उन्होंने तुम से हमारे बारे में बात की. प्लीज, मां की बात का बुरा मत मानना. बहुत भोली है मेरी मां. अपने बेटे यानी मुझ से बहुत प्यार करती है. बस, इसलिए…’’ केतन बोलते हुए थोड़ा रुक गया.

जेनिफर बोली, ‘‘अरे नहीं केतन, ऐसी कोई बात नहीं. सच कहूं जब मुझे मालूम चला तुम्हारी पहली शादी के टूटने का, तो सच में बहुत दुख हुआ. सच कहूं आश्चर्य भी हुआ क्योंकि जहां तक मैं ने सुना था, भारत में शादी सात जन्मों का साथ होता है पर जब मां ने किरण के व्यवहार के बारे में विस्तार से बताया तब लगा शायद तुम दोनों एकदूसरे के लिए बने ही नहीं थे.’’

केतन ध्यान से जेनिफर को सुन रहा था. जेनिफर एक गहरी सांस ले बोली, ‘‘समझती हूं केतन, सिर्फ रिश्ता नहीं टूटता, इंसान भी बहुत हद तक टूट जाता है और जो रिश्ता तोड़ना चाहता है, दर्द उसे नहीं होता; जो निभाना चाहता है, टूटता तो वह है.’’

केतन को आश्चर्य हुआ विदेशों में जहां रिश्ता टूटना कोई बड़ी बात नहीं, वहीं जेनिफर के ऐसे खयाल. तब तक कौफी का और्डर आ गया था, दोनों कौफी पीने लगे.

केतन बोला, ‘‘जेनिफर, बड़ी मुश्किल से वह सब भुला आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूं. सच कहूं, अब हिम्मत नहीं फिर से दोबारा वह सब सहन करने की. फिर मैं तो संभल जाऊं पर मां, वह तो टूट ही जाएगी.’’

जेनिफर कौफी खत्म करती हुए बोली, ‘‘जानती हूं, केतन. मां से बात हुई, वह भी तुम्हारे लिए बहुत दुखी हैं. यकीन मानो, मुझ पर विश्वास करो, मेरी तरफ से तुम्हें कोई शिकायत नहीं मिलेगी. भारत की संस्कृति से इसलिए भी प्रभावित हूं कि यहां शादी का मतलब सात जन्मों का साथ होता है. मैं ने अपने आसपास हमेशा देखा जहां लोग शादी को गंभीरता से लेते ही नहीं. सच कहूं, इसलिए शादी से विश्वास उठ गया था पर इस देश में अभी ऐसे हालात नहीं हैं. यहां शादी का मतलब सिर्फ 2 लोगों का जुड़ना नहीं, 2 परिवार जुड़ते हैं.’’

केतन टिश्यू से मुंह पोंछते हुए बोला, ‘‘पर जेनिफर, हमारा धर्म, भाषा, देश सब अलग हैं. यह भावनाओं में लिया निर्णय नहीं, पूरी जिंदगी का सवाल है.’’

जेनिफर बोली, ‘‘केतन, इस देश में आ मैं ने हमेशा के लिए यहीं बसने का निर्णय ले लिया था. फिर तुम जैसा जीवनसाथी मिल जाए तो यह तो जैसे ऊपर वाले ने मुझे एक मौका दिया अपने निर्णय को एक कदम आगे ले जाने का. मेरी तरफ से हां है और यह कोई भावनाओं में लिया निर्णय नहीं, बहुत सोचसमझ कर लिया निर्णय है. मैं तो अपने मातापिता से भी बात कर चुकी हूं. अब आगे तुम्हारी मरजी.’’

केतन ने कुछ सोचा, फिर उस ने जेनिफर के हाथ पर अपना हाथ रख कहा, ‘‘जेनिफर, मुझे अपनी जिंदगी में शामिल करोगी, हमेशा के लिए.’’

जेनिफर की आंखों में आंसू थे. बिल का भुगतान कर दोनों रिजौर्ट की तरफ बढ़ गए. इधर मां बेचैनी से टहल रही थी. उन दोनों को देख मां का दिल धड़कने लगा, क्या निर्णय होगा. जेनिफर और केतन ने बिना कुछ कहे एकसाथ मां के पैर छुए.

मां असमंजस में खड़ी थी तो केतन बोला, ‘‘मां, अपने बेटे और होने वाली बहू को आशीर्वाद नहीं दोगी.’’ मां ने अपने कंपकंपाते हाथों से दोनों को आशीर्वाद दिया.

सच, जिन खूबसूरत वादियों से केतन कभी कड़वी यादें ले कर निकला था, अब यहां से एक नया रिश्ता शुरू हो रहा है.

उस ने देखा, मां और जेनिफर एकदूसरे से बातें करने में व्यस्त हैं, दोनों बहुत ही खुश भी लग रहे हैं. काफी समय बाद मां को इतना खुश देख केतन के चेहरे पर भी मुसकान आ गई. Romantic Story In Hindi 

Social Story : रोशनी की आड़ में – धर्म की आड़ में व्यभिचार

Social Story : भगवान में आस्था, व्रत, पूजापाठ, किसी में कोई कमी नहीं छोड़ी थी रागिनी की चाची ने. लेकिन इस सब के बदले में उन्हें मिला जिंदगीभर का रोना. आखिर उन के साथ ऐसा क्या घटा था?

पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए अनुशा को जब रागिनी के गांव का पता मिला तो उसे लगा जैसे कोई खजाना हाथ लग गया है. अनुशा को अतीत में रागिनी के कहे शब्द याद आ गए, ‘मेरे पति को अपने गांव से बड़ा लगाव है. गांव से नाता बना रहे, इस के लिए वे साल में 1-2 बार गांव जरूर जाते हैं.’

यही सोच कर अनुशा खुश थी कि अब वह रागिनी को पत्र लिख सकती है और जब भी उस के पति गांव जाएंगे तो वहां भेजा उस का पत्र उन्हें जरूर मिल जाएगा. रागिनी को कितना आश्चर्य होगा जब वह इस चौंका देने वाली खबर के बारे में जानेगी.

अनुशा के दिमाग में रागिनी की चाची के साथ घटित हुआ वह हादसा तसवीर की भांति घूमने लगा जिसे रागिनी ने कालेज के दिनों में उसे बताया था.

मैं और रागिनी बीए कर रही थीं. दशहरे की छुट्टियां होने वाली थीं. इसलिए ज्यादातर अध्यापिकाएं घर चली गई थीं. उस दिन खाली पीरियड में हम दोनों कालेज कैंपस के लौन में बैठी थीं. मैं ने रागिनी से पूछा, ‘आज तो तुम भी व्रत पर होगी?’
रागिनी ने बड़े रूखेपन से कहा था, ‘नहीं, घर में बस, मुझे छोड़ कर सभी का व्रत है. मेरी तो धर्मकर्म से आस्था ही मर गई है.’
‘क्यों, ऐसा क्या हो गया है?’ मैं ने हंसते हुए पूछा तो रागिनी और भी गंभीर हो उठी और बोली, ‘अनुशा, मेरे यहां एक बड़ी दर्दनाक घटना घट चुकी है जिस की चर्चा भी अब घर में नहीं होती.’
मैं उत्सुकता से रागिनी को एकटक देखे जा रही थी. उस ने कहा, ‘मेरी चाची को तो तुम ने देखा है. वे अपनी मां और छोटी बहन के साथ विंध्याचल गई थीं. चाची की बहन सुशीला अविवाहित थी लेकिन पूजापाठ, धर्मकर्म में उस की बड़ी रुचि थी. वे तीनों कई दिनों तक विंध्याचल में एक पंडे के घर में रुकी रहीं. रोज गंगास्नान, पूजन, दर्शन और पंडे के यहां रात्रिनिवास. उन का यही क्रम चल रहा था.

‘एक दिन सुशीला खाना बना रही थी. उसे छोड़ कर चाची और उन की मां पूजा करने मंदिर चली गईं. कुछ देर बाद जब वे लौट कर आईं तो सुशीला को घर में न पा कर उन्होंने पंडे से पूछा तो उस ने बताया कि सुशीला भी खाना बनाने के बाद गंगास्नान को कह कर यहां से चली गई थी.
‘बहुत ढूंढ़ने के बाद भी जब सुशीला का कहीं पता न चला तो उन्होंने घर पर खबर भेजी. घर के पुरुष भी विंध्याचल आ गए. कई दिनों तक वे लोग सुशीला को इधरउधर ढूंढ़ते रहे. पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई लेकिन सुशीला का कहीं पता नहीं चला.

‘चाची की मां का रोरो कर बुरा हाल हो गया था. वे पागलों की तरह हर किसी से सुशीला के बारे में पूछती रहतीं. यह पीड़ा वे अधिक दिनों तक नहीं झेल सकीं और कुछ ही महीने बाद उन की मौत हो गई.

‘बेटी के गायब होने से चाची के पिता तो पहले ही टूट चुके थे, पत्नी के मरने के बाद तो एकदम बेसहारा ही हो गए. बीमारी की हालत में मेरे चाचाजी उन्हें गांव से यहां ले आए. कुछ दिन इलाज चला लेकिन अंत में वे भी चल बसे. उस के बाद तो सुशीला मामले का अंत सा हो गया.

‘अब उस घटना की एकमात्र गवाह मेरी चाची ही बची हैं जो सीने में सबकुछ दफन किए बैठी हैं. उन की हंसी जैसे किसी ने छीन ली हो. इसीलिए मु?ा पर हमेशा पाबंदियां लगाए रहती हैं. इतने समय जाना है, इतने समय तक आना है, तरहतरह की चेतावनियां मुझे देती रहती हैं.

‘मुझे चाची पर बड़ा गुस्सा आता था. उन की टोकाटाकी से परेशान हो कर मैं ने एक दिन चाची को बुरी तरह झिड़क दिया था. तभी चाची ने मुझे यह घटना रोरो कर बताई थी. अनुशा, उसी दिन से मेरा मन धर्मकर्म, पूजापाठ, व्रतउपवास से बुरी तरह उचट गया.

‘उक्त घटना ने मेरे मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. मेरी निसंतान चाची, जिस संतान की कामना से गई थीं उन की वह इच्छा आज तक पूरी नहीं हो सकी है. चाची की मां कुंआरी बेटी सुशीला को अच्छा घरवर पाने की जिस कामना के लिए विंध्याचल गई थीं वह पूरी होनी तो दूर, सुशीला बेचारी तो दुनिया से ही ओझल हो गई. अब तुम्हीं बताओ अनुशा, मैं क्या उत्तर दूं अपने मन को?’

रागिनी की बातें सुन कर वास्तव में मैं निरुत्तर और ठगी सी रह गई. रागिनी ने मुझे कसम दी थी कि इस घटना की चर्चा मैं कभी किसी दूसरे से न करूं क्योंकि उस के परिवार की इज्जत, मर्यादा का सवाल था.

बीए करने के बाद रागिनी की शादी हो गई. उस की ससुराल झांसी के एक गांव में है. शादी के बाद भी हमारा संपर्क बना रहा. उस ने अपने गांव का पता मेरी डायरी में यह कह कर लिख दिया था कि मेरे पति को गांव से बहुत लगाव है. वहां उन का आनाजाना लगा ही रहता है.

कुछ दिनों बाद मेरी भी शादी हो गई. मैं जब भी मायके जाती तो रागिनी का समाचार मिल जाता था. लेकिन बाद में रागिनी के पिता स्कूल से रिटायर होने के बाद अपने पुश्तैनी घर इटावा चले गए और उस के बाद हमारा संपर्क टूट गया.

मैं अपने छोटे बेटे का मुंडन कराने विंध्याचल गई थी. मुझे क्या पता था कि सुशीला की जीवनकथा में अभी एक और नया अध्याय जुड़ने वाला है जिस का सूत्रपात मेरे ही हाथों होगा. तभी से मेरे मन में अजीब सी खलबली मची हुई है. जी करता है किसी तरह रागिनी मिल जाए तो मन का बोझ हलका कर लूं. जाने उस की चाची अब इस दुनिया में हैं भी या नहीं.

अचानक पति की इस आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई, ‘‘मैं 5 मिनट से खड़ा तुम्हें देख रहा हूं और तुम इन पुरानी किताबों और डायरी में न जाने क्या तलाश रही हो. मेरा औफिस से आना तक तुम्हें पता नहीं चल सका. अनुशा, यही हाल रहा तो तुम एक दिन मुझे भी भूल जाओगी. अब उस घटना के पीछे क्यों पड़ी हो जिस का पटाक्षेप हो चुका है.’’

‘‘नहीं, सुधीर, रागिनी को सबकुछ बताए बगैर मुझे चैन नहीं मिलेगा, आज उस का पता मुझे मिल गया है. परिस्थितियों ने तुम्हें उस घटना का राजदार तो बना ही दिया है सुधीर, अच्छाखासा किरदार तुम ने भी तो निभाया है. रागिनी को सबकुछ जान कर कितना आश्चर्य होगा. कैसा लगेगा उसे जब दुखों की पीड़ा और खुशियों की हिलोरें उस के मन में एकसाथ तरंगित हो उठेंगी. हो सकता है, उस की चाची भी अभी जीवित हों और सबकुछ जानने के बाद और कुछ नहीं तो उन के मन को एक शांति तो मिलेगी ही.’’

सुधीर बोले, ‘‘मैडम, अब जरा आप इन झुंझवातों से बाहर निकलें और चल कर चायनाश्ते की व्यवस्था करें.’’
‘‘ठीक है, मैं नाश्ता बनाती हूं. आप दोनों बच्चों को बाहर से बुला लें.’’
‘‘मम्मी, मेरा होमवर्क अभी पूरा नहीं हुआ है. प्लीज, करा दो न,’’ बड़े भोलेपन से पिंकू ने अनुशा से कहा.
‘‘बेटे, आप लोग आज सारे काम खुदबखुद करो. तुम्हारी मम्मी अपनी पुरानी सहेली को पत्र लिखने जा रही हैं जो शायद सुबह तक ही पूरा हो पाएगा. क्यों अनुशा, सही कह रहा हूं न?’’ ‘‘बेशक, आप सच कह रहे हैं. रागिनी को पत्र लिखे बिना मेरा मन न तो किसी काम में लगेगा, न ही चित्त स्थिर हो सकेगा. संजीदगीभरे पत्र के लिए रात का शांतिपूर्ण माहौल ही अच्छा होता है.’’
अनुशा विचारों में खोई हुई पैन और पैड ले कर रागिनी को पत्र लिखने बैठ गई-
स्नेहमयी रागिनी, मधुर स्मृति, इतने लंबे अरसे बाद मेरा पत्र पा कर तुम अचंभित तो होगी ही, साथ ही रोमांचित भी. बात ही कुछ ऐसी है जो अकल्पनीय होते हुए भी सत्य है. अच्छा तो बगैर किसी भूमिका के मैं सीधे मुख्य बात पर आती हूं.

पिछले माह हम अपने छोटे बेटे पिंकू का मुंडन कराने अपने पूरे परिवार के साथ विंध्याचल गए थे. शायद मेरे ये वाक्य तुम्हारे दिमाग में एक पुरानी तसवीर खींच रहे होंगे. सच, मैं उसी से संबंधित घटना तुम्हें लिख रही हूं. उस दिन सोमवार था. हम वहां रुकना नहीं चाहते थे लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि हमें शीतला पंडे के यहां ठहरना पड़ा.

दूसरे दिन पिंकू का मुंडन हो गया. हम ने सोचा, थोड़ा घूमफिर कर आज ही निकल जाएंगे. हम एक टैक्सी तय कर उस में बैठ ही रहे थे कि शीतला पंडे का लड़का, जिस का नाम भानु था, मेरे पास आ कर बोला कि मांजी, हमें भी साथ ले चलिए, आप का बड़ा उपकार होगा और बीचबीच में वह सहमी निगाहों से अपने घर की तरफ भी देख लेता था.

मुझे उस पर बड़ी दया आई. मैं ने सुधीर से उसे भी साथ ले चलने के लिए कहा तो वे बोले कि देख रही हो, इस के घर के सभी लोग मना कर रहे हैं. तुम जानती तो हो नहीं. घर वाले सोच रहे होंगे कि बेटा धंधा छोड़ कर कहीं घूमने न चला जाए. खैर, मेरे कहने पर सुधीर शीतला पंडे से भानु को साथ ले जाने की बात कह आए और वह मान भी गया.

मेरे दोनों बच्चे बहुत खुश थे. वे विंध्याचल के पहाड़ और पत्थर देख कर उछल रहे थे. हम लोग मंदिर पहुंच गए और वहीं बैठ कर नाश्ता करने लगे. बातों के सिलसिले में मैं ने सुधीर से कहा कि ऐसे स्थानों पर पिकनिक मनाना कितना अच्छा लगता है. भौतिक और आध्यात्मिक दोनों का आनंद एकसाथ मिल जाता है.

‘भानु, तुम भी खाओ,’ कह कर मैं ने पहला कौर मुंह में उतारा ही था कि वह जोरजोर से रो पड़ा. अचानक उस का रोना देख हम परेशान हो गए. लेकिन रागिनी, भानु की कहानी तो हर पल रुलाने वाली थी.

भानु रोते हुए कहे जा रहा था कि मांजी, बाबूजी, मुझे इस नरक से निकाल लीजिए. शीतला मेरा बाप नहीं, मेरा काल है जो मुझे खा जाएगा. मैं मरना नहीं चाहता. मुझे अपने साथ ले चलिए, मांजी.

भानु की आंखों में समंदर उमड़ रहा था. उस ने धीमे स्वर में अपनी जो कहानी सुनाई वह तुम्हारे द्वारा बताई कहानी ही थी. भानु तुम्हारी चाची की छोटी बहन सुशीला का बेटा है.

मैं ने भानु को चुप कराया और आगे की बात जल्दी पूरी करने को कहा क्योंकि उस को टैक्सी ड्राइवर का खौफ भयभीत किए जा रहा था. मैं ने सुधीर के कान में यह समस्या बताई तो सुधीर जा कर ड्राइवर से बातें करते हुए उसे कुछ आगे ले गए.

भानु अब थोड़ा आश्वस्त हो कर आंसू पोंछता हुआ कहने लगा कि मेरी मां ने मरने से पहले मुझे अपनी कहानी सुनाई थी जो इस प्रकार है : ‘उस दिन जब मेरी अम्मा और दीदी मंदिर चली गईं तो शीतला मेरे पास आ कर बैठ गया और कहने लगा कि सुशीला, क्या बनाया है आज, जरा मुझे भी खिलाओ.

‘मैं थाली में खाना लगाने लगी तो शीतला बोला कि तू तो बड़ी भोली है. सुशीला, मैं तो ऐसे ही कह रहा था. अच्छा, खाना तो बना ही चुकी है. चल तुझे आज घुमा लाऊं.

‘अभी अम्मा और दीदी आ जाएं तो साथ ही चलेंगे सब लोग. मैं अपनी बात कह ही रही थी तभी शीतला ने मुझे पकड़ कर कुछ सुंघा दिया था. बस, मुझे सुस्ती छाने लगी.
‘जब मुझे होश आया तो मैं ने खुद को एक बड़े से पुराने मकान में कैद पाया. वहां शीतला के साथ कुछ लोग और थे जिन की आवाजें ही मुझे सुनाई पड़ रही थीं. मेरा कमरा अलग था जिस में शीतला के सिवा और कोई नहीं आता था.’
भानु अपनी मां की कही कहानी को विस्तार से सुना रहा था :
‘एक दिन मैं वहां से भागने का रास्ता तलाश रही थी कि शीतला भांप गया. फिर तो उस का रौद्र रूप देख कर मैं कांप गई. मुझे कई तरह से प्रताडि़त करने के बाद वह बोला कि आगे से ऐसी हरकत की तो ऐसी दुर्गति बनाऊंगा कि तुझे खुद से भी नफरत हो जाएगी.

‘अब मेरे सामने कोई रास्ता नहीं था. मैं ने इसे ही अपनी तकदीर मान लिया और होंठ सी कर चुप रह गई. एक दिन मेरे कहने पर शीतला ने मेरी मांग में सिंदूर भर कर मुझे पत्नी का चोला जरूर पहना दिया. सालभर के अंदर ही तेरा जन्म हुआ. शीतला ने बड़ा जश्न मनाया. खुश तो मैं भी थी कि मेरा भी कोई अपना आ गया. साथ ही मैं कल्पना करने लगी कि मेरा बेटा ही मुझे यहां से मुक्ति दिलाएगा. लेकिन क्या पता था कि यह राक्षस तुझ पर भी जुल्म ढाएगा. गलती मेरी ही है, कभीकभी गुस्से में मेरे मुंह से निकल जाता था कि मेरा बेटा, बड़ा हो कर तुझे बताएगा. बस, तभी से शीतला के मन में भय सा व्याप्त हो गया था.’

भानु ने आगे बताया कि मेरी मां जिस दिन अपनी दुखभरी कहानी बता कर रो रही थी, शीतला छिप कर सबकुछ सुन रहा था. वह गुस्से में तमतमाया, गड़ासा ले कर आया और मेरे सामने ही मेरी मां का सिर धड़ से अलग कर दिया. मुझे तरहतरह से समझाया और डरायाधमकाया. मैं भी बेबस, लाचार था. मां के चले जाने से मैं एकदम अकेला पड़ गया था लेकिन मेरे मन में बदले की जो आग लगी थी वह आज तक जल रही है, मांजी.

भानु की कहानी दिल दहला देने वाली थी लेकिन हम कर ही क्या सकते थे. खैर, उस समय उसे दिलासा दे कर हम वापस लौट आए थे.

यद्यपि भानु पर बड़ा तरस आ रहा था. वह आंखों में आंसू लिए मायूसी से हमें देख रहा था. भानु यानी तुम्हारी चाची की बहन सुशीला का बेटा, रागिनी. तुम्हारी बताई वह घटना मेरी आंखों के सामने नग्न सत्य बन कर खड़ी थी, जो मेरी आस्था पर चोट कर रही थी. साथ ही यह पूरे समाज के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर रही है जिस का जवाब हम सभी को मिल कर ढूंढ़ना है. खासकर हम औरतें अपनी मर्यादा पर यह प्रहार कब तक सहती रहेंगी, इस का भी जवाब हमें खुद तलाशना है. धर्म की आड़ में धर्म के ठेकेदार कब तक यह नंगा नाच करते रहेंगे?
ऐसे अनेक सवाल हैं रागिनी, जिन के जवाब हमें ही तलाशने हैं. खैर, अभी तो मैं अपनी मुख्य बात पर आती हूं. हां, तो दूसरे दिन हम अपने घर आ गए. सुधीर से मैं बारबार भानु को छुड़ा लाने की सिफारिश करती रही.

मेरे इस आग्रह पर उन्होंने यहां पुलिस स्टेशन में सूचना भी दर्ज कराई. यहां से विंध्याचल थाने पर संपर्क कर के जांचपड़ताल शुरू हो गई. यहां से पुलिस टीम विंध्याचल गई. दुर्भाग्य से वहां के दरोगा की सांठगांठ भी शीतला से थी जिस से शीतला को पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. लेकिन पुलिस उसे गिरफ्तार करने में सफल हो गई. भानु ने पुलिस के सामने कई रहस्य उजागर किए.

खैर, तुम्हें यह जान कर खुशी होगी कि शीतला को आजीवन कारावास की सजा हो गई है और उस की संपत्ति जब्त कर ली गई है. भानु 8वीं तक पढ़ा था, सो आजकल वह एक सरकारी दफ्तर में चपरासी है. उस ने अपना घरपरिवार बसा लिया है और अपना अतीत भूल कर वह एक नई जिंदगी जीने का प्रयास कर रहा है. उस का यह कहना कितना सच है कि धर्मस्थलों में एक शीतला नहीं, अनेक धूर्त शीतला अभी भी मौजूद हैं जो देवीदेवताओं की आड़ में भोली जनता और महिलाओं का शोषण कर रहे हैं.

मैं सोच सकती हूं कि मेरा पत्र पढ़ कर तुम्हें कैसा लग रहा होगा पर सबकुछ सत्य है. मिलने पर तुम्हें विस्तार से सारी बातें बताऊंगी. भानु अपनी मां द्वारा दिए नाम से ही अब जाना जाता है.
पत्र का उत्तर फौरन देना. मुझे बेसब्री से इंतजार रहेगा. प्रतीक्षा के साथ…
तुम्हारी अनुशा.

लेखिका : किरन पांडेय

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