Download App

Hindi Social Story: अंतस के दीप- पूजा और रागिनी की जिंदगी की दास्तान

Hindi Social Story: ‘‘अरे रागिनी, दो बज गए! घर नहीं चलना क्या? पाँच बजे वापस भी तो आना है स्पेशल ड्यूटी के लिए।’’

सहकर्मी नेहा की आवाज़ से रागिनी की तंद्रा टूटी।

दीवाली पर स्पेशल ड्यूटी का आदेश हाथ में लिए वह पिछली दीवाली की काली रात के अंधेरों में भटक रही थी — वही अंधेरा जो उसके भीतर भी गहराता चला गया था। नफरत का एक काला साया उसके मन पर इस तरह छा गया था कि त्योहार की सारी खुशी, सारा उत्साह निगल गया था।

रागिनी बुझे मन से नेहा के साथ चैंबर से बाहर निकल आई।

ऐसा नहीं था कि उसे रोशनी से नफरत थी।

एक वक्त था जब उसे दीपों का यह त्योहार बेहद पसंद था। घर की सबसे छोटी और लाड़ली रागिनी नवरात्र शुरू होते ही माँ के साथ दीवाली की तैयारियों में जुट जाती थी।

सारे घर की सफ़ाई, पुराने कबाड़ और कपड़ों की छँटाई, रद्दी निकालना, सजावट का नया सामान खरीदना — इन सब में उसे बड़ा आनंद आता था। तुलसीबाई और उसकी बेटी पूजा भी इसमें हाथ बँटातीं और सारा काम हँसी-खुशी निपट जाता।

सफ़ाई के दौरान जब पुराने खिलौने और कपड़े निकलते, तो रागिनी और पूजा उन्हें पहनकर, खेलकर बीते दिनों की यादों में खो जातीं।

माँ कभी खीझतीं, कभी मुसकरातीं — और इस तरह घर में उत्सव का माहौल बन जाता।

पूजा, तुलसीबाई की एकमात्र बेटी थी। पिता की जहरीली शराब से हुई असमय मृत्यु के बाद तुलसीबाई अपनी बस्ती के पुरुषों की बुरी नजरों से परेशान रहने लगीं। तब उन्होंने रागिनी की माँ शीला से कहा था—

“दीदी, अगर बुरा न मानें तो… मुझे अपने घर में रहने की इजाजत दे दीजिए। मैं आपके सारे काम कर दूँगी।”

शीला को भी एक भरोसेमंद सहायक की ज़रूरत थी, सो उन्होंने हामी भर दी।

तब से यह घर ही तुलसीबाई और पूजा की दुनिया बन गया।

रागिनी पूजा को अपनी गुड़िया की तरह चाहती थी — उसे सजाती, उसके बाल बनाती और उसी के साथ खेलती थी।

समय के साथ दोनों लड़कियाँ बड़ी हो गईं।

रागिनी ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक किया और प्रतियोगी परीक्षा पास कर विद्युत विभाग में अधिकारी बन गई। उसकी पहली पोस्टिंग जैसलमेर के पास छोटे से कस्बे फलौदी में हुई।

रागिनी के माता-पिता उसे इतनी दूर अकेले भेजने में हिचकिचा रहे थे।

तभी तुलसीबाई ने सुझाव दिया —

“दीदी, बुरा न मानें, तो छोटी पूजा को रागिनी बेबी के साथ भेज दीजिए। उसका मन भी लगा रहेगा, और आपका भी चैन रहेगा।”

शीला को यह विचार पसंद आया। वे चाहती भी थीं कि रागिनी अकेली न रहे।

जब रागिनी ने अपनी नौकरी जॉइन की, तो उसके साथ पूरा परिवार — मम्मी-पापा, तुलसीबाई और पूजा — फलौदी पहुँचा। चार दिन रेस्ट हाउस में रहने के बाद, दो कमरों का एक छोटा-सा फ्लैट किराए पर ले लिया गया। रागिनी और पूजा वहीं रहने लगीं।

रागिनी की फील्ड जॉब थी। अकसर उसे साइट्स पर दूर-दूर जाना पड़ता था और कई बार रात भी हो जाती थी। मगर उसके अधिकारी और सहकर्मी सभी सहयोगी थे, इसलिए उसे कोई परेशानी नहीं होती थी।

घर लौटने पर पूजा गरम खाना बनाकर उसका इंतज़ार करती। दोनों साथ खाना खातीं, दिनभर के किस्से सुनातीं और खूब हँसतीं।

ज़िंदगी सुचारु चल रही थी।

चार महीने बाद दीवाली आई।

रागिनी घर नहीं जा सकती थी, क्योंकि विद्युत विभाग में इंजीनियरों की दीवाली पर स्पेशल ड्यूटी लगाई जाती है — ताकि लोग रोशनी के इस पर्व को बिना अंधेरे के मना सकें।

पहले दो दिन सब कुछ ठीक रहा। तीसरे दिन, दीवाली के मुख्य पर्व पर, रागिनी फीडरों का निरीक्षण करने निकली।

अपनी गली के पास से गुजरते हुए उसे पूजा की याद आई।

“चलो, दीयों की बाती तो कर दूँ,” उसने सोचा, “वरना वो रातभर अंधेरे में बैठी रहेगी।”

घर पहुँचते ही पूजा खुशी से झूम उठी। दोनों ने मिलकर दीये जलाए, कुछ खाया और रागिनी फिर ड्यूटी पर निकल गई।

यही क्रम हर साल का बन गया — दीवाली की रात ड्यूटी और उसके अगले दिन की छुट्टियाँ मम्मी-पापा के पास जोधपुर में।

दो साल बाद तुलसीबाई का हार्ट अटैक से निधन हो गया।

पूजा अनाथ हो गई।

रागिनी के माता-पिता ने उसे विधिवत गोद ले लिया।

रागिनी के लिए तो वो पहले से ही छोटी बहन थी; अब इस रिश्ते पर समाज की मुहर भी लग गई।

एक साल बाद रागिनी की शादी विवेक से हुई, जो उसी विभाग में अधिकारी था।

शादी के बाद की यह उनकी पहली दीवाली थी, लेकिन दोनों की ड्यूटी अलग-अलग सबस्टेशनों पर लग गई थी। दीवाली के अगले दिन रागिनी जैसलमेर चली गई और पूजा जोधपुर।

पहली बार दोनों बहनें अलग-अलग बसों में सफ़र कर रही थीं।

रागिनी के परिवार की कोशिश थी कि उसका और विवेक का ट्रांसफर एक ही जगह हो जाए। लगभग एक साल की मेहनत के बाद उसका ट्रांसफर जैसलमेर हो गया।

रागिनी बहुत खुश थी — अब वह विवेक के साथ रह सकेगी और पूजा की शादी के बारे में भी सोचा जा सकेगा।

अब वे दोनों जैसलमेर में थे। पूजा भी उनके साथ आ गई थी। विवेक को सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था, एक सहायक भी था जो बाहर के काम देखता था, जबकि घर की सारी व्यवस्था पूजा संभालती थी।

रागिनी कोशिश करती कि काम के बाद देर तक घर से बाहर न रहे। शाम को विवेक के साथ घूमने निकल जाती, लेकिन चाहे कितनी भी देर हो जाए — रात का खाना तीनों साथ खाते थे। छुट्टियों में तीनों शहर घूमते — सोनार किला, पटवों की हवेली, गड़ीसर झील, सम के धोरें…

घर हँसी से गूंजता रहता।

फिर आई एक और दीवाली।

दोनों बहनों ने मिलकर सफ़ाई, सजावट और मिठाइयाँ बनाई थीं। पूजा ने सुंदर रंगोली भी रच दी थी।

शाम पाँच बजे रागिनी ड्यूटी पर निकल गई, विवेक अपने सबस्टेशन पर।

सब कुछ सामान्य था, तभी रागिनी ने सोचा — “आज विवेक को सरप्राइज़ दूँगी।”

उसने बाज़ार से सोने की चेन ली, जो धनतेरस पर बुक करवाई थी, और घर की ओर गाड़ी मोड़ ली।

घर के बाहर न एक भी दिया जल रहा था, न दरवाजा खुला था।

दिल धक् से रह गया।

उसने दरवाजा पीटना शुरू किया।

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला — पूजा सामने थी, आँसुओं में भीगी हुई।

उसी क्षण विवेक कमरे से हड़बड़ाते हुए बाहर आया — कपड़े ठीक करते हुए।

बस, इतना ही काफी था।

पत्थर सी हो गई रागिनी।

उसने पूजा का हाथ थामा और घर से निकल पड़ी।

रात गैस्टहाउस में दोनों बहनें फूट-फूट कर रोती रहीं।

सुबह होते ही जोधपुर के लिए रवाना हो गईं।

विवेक भी पीछे-पीछे आया — माफी माँगने, समझाने — मगर रागिनी का निर्णय अटल था।

माँ-पापा ने भी उसी का साथ दिया, और रिश्ता खत्म हो गया।

उस रात रागिनी को विशाल याद आया — कॉलेज का सहपाठी, जो उससे प्यार करता था।

पर धर्म के नाम पर दीवारें ऊँची थीं।

रागिनी ने विवेक से शादी कर ली थी, पर दिल के किसी कोने में विशाल अब भी जिंदा था।

अब पूजा की शादी हो चुकी थी, और रागिनी फलौदी में फिर से अपनी ड्यूटी पर थी — तन से भी अकेली, मन से भी।

आज फिर दीवाली थी।

वह अपनी ड्यूटी में व्यस्त थी, जब गाड़ी खुद-ब-खुद उसके पुराने घर की ओर मुड़ गई।

घर के बाहर दीयों की कतारें जल रही थीं।

दरवाजा खुला था।

वह अभी कुछ समझ ही रही थी कि किसी ने पीछे से आकर उसे बाँहों में भर लिया —

“दीवाली मुबारक हो, दीदी!”

“अरे पूजा! तुम यहाँ? आने की खबर तो दी होती, मैं गाड़ी भेज देती।”

“तब यह खुशी कहाँ देखने को मिलती, दीदी,” पूजा ने मुसकराते हुए कहा।

उसके साथ उसका पति भी था, जिसने झुककर रागिनी के पाँव छुए।

पीछे से माँ-पापा की आवाज आई —

“और भी लोग आए हैं, बेटी।”

रागिनी ने मुड़कर देखा —

माँ के पीछे खड़ा विशाल शरारत से मुसकरा रहा था।

माँ ने रागिनी का हाथ उसके हाथ में थमाते हुए कहा —

“हमें पूजा ने सब कुछ बता दिया है। अब तुम दोनों को दीवाली की ढेरों शुभकामनाएँ।”

रागिनी की पलकें शर्म से झुक गईं।

छज्जों पर टिमटिमाते दीपकों के साथ उसके मन में भी एक नई रोशनी जल उठी।

“चलो दीदी,” पूजा ने कहा, “खाना लगाते हैं, फिर पटाखे चलाएँगे — आपको ड्यूटी पर भी तो लौटना है!”

सब हँस पड़े।

रागिनी माँ के कंधे पर सिर रखे भीतर चली गई।

सबके पीछे चलते हुए पापा ने चुपचाप अपने आँसू पोंछ लिए। Hindi Social Story.

Hindi Family Story: नामर्द- तहजीब की नजरों में मुश्ताक नामर्द क्यों?

Hindi Family Story: तहजीब के अब्बा इशरार ने अपनी लड़की को दिए जाने वाले दहेज को गर्व से देखा. फिर अपने साढ़ू तथा नए बने समधी से पूछा, ‘‘अल्ताफ मियां, कुछ कमी हो तो बताओ?’’

‘‘भाई साहब, आप ने लड़की दी, मानो सबकुछ दे दिया,’’ तहजीब के मौसा व नए रिश्ते से बने ससुर अल्ताफ ने कहा, ‘‘बस, जरा विदाई की तैयारी जल्दी कर दें.’’

शीघ्र ही बरात दुलहन के साथ विदा हो गई. तहजीब का मौसेरा भाई मुश्ताक अपनी मौसेरी बहन के साथ शादी करने के पक्ष में नहीं था. उस का विचार था कि यह व्यवस्था उस समय के लिए कदाचित ठीक रही होगी जब लड़कियों की कमी रही होगी. परंतु आज की स्थिति में इतने निकट का संबंध उचित नहीं. किंतु उस की बात नक्कारखाने में तूती के समान दब कर रह गई थी. उस की मां अफसाना ने सपाट शब्दों में कहा था, ‘‘मैं ने खुद अपनी बहन से उस की लड़की को मांगा है. अगर वह इस घर में दुलहन बन कर नहीं आई तो मैं सिर पटकपटक कर अपनी जान दे दूंगी.’’

विवश हो कर मुश्ताक को चुप रह जाना पड़ा था. तहजीब जब अपनी ससुराल से वापस आई तो वह बहुत बुझीबुझी सी थी. वह मुसकराने का प्रयास करती भी तो मुसकराहट उस के होंठों पर नाच ही न पाती थी. वह खोखली हंसी हंस कर रह जाती थी. तहजीब पर ससुराल में जुल्म होने का प्रश्न न था. दोनों परिवार के लोग शिक्षित थे. अन्य भी कोई ऐसा स्पष्ट कारण नहीं था जिस में उस उदासी का कारण समझ में आता.

‘‘तुम तहजीब का दिल टटोलो,’’ एक दिन इशरार ने अपनी पत्नी रुखसाना से कहा, ‘‘उसे जरूर कोई न कोई तकलीफ है.’’

‘‘पराए घर जाने में शुरू में तकलीफ तो होती ही है, इस में पूछने की क्या बात है?’’ रुखसाना बोली, ‘‘धीरेधीरे आदत पड़ जाएगी.’’ ‘‘जी हां, जब आप पहली बार इस घर से गई थीं तब शायद ऐसा ही मुंह फूला हुआ था, खिली हुई कली के समान गई थीं. तहजीब बेचारी मुरझाए हुए फूल के समान वापस आई है,’’ इशरार ने शरारत के साथ कहा.

‘‘हटो जी, आप तो चुहलबाजी करते हैं,’’ रुखसाना के गालों पर सुर्खी दौड़ गई, ‘‘मैं तहजीब से बात करती हूं.’’

रुखसाना ने बेटी को कुरेदा तो वह उत्तर देने की अपेक्षा आंखों में आंसू भर लाई. ‘‘तुझे वहां क्या तकलीफ है? मैं आपा को आड़े हाथों लूंगी. उन्हीं के मांगने पर मैं ने तुझे उन की झोली में डाला है. मैं ने उन से पहले ही कह दिया था कि मेरी बिटिया नाजों से पली है. किसी ने उस के काम में नुक्ताचीनी निकाली तो ठीक नहीं होगा.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है, अम्मीजान, मुझ से किसी ने कुछ कहा नहीं है,’’ तहजीब ने धीमे से कहा.

‘‘फिर?’’

कुछ कहने की अपेक्षा तहजीब फिर आंसू बहाने लगी. नकविया तहजीब की सहेली थी. वह एक संपन्न घराने की थी. जिस समय तहजीब की शादी हुई थी उस समय वह लंदन में डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी. उसे शादी में बुलाया गया था परंतु यात्रा की किसी कठिनाई के कारण वह समय पर नहीं आ सकी थी. उस का आना कुछ दिन बाद हो पाया था. भेंट होने पर रुखसाना ने उस से कहा, ‘‘बेटी, तहजीब ससुराल से आने के बाद से बहुत उदास है. कुछ पूछने पर बस रोने लगती है. जरा उस के दिल को किसी तरह टटोलो.’’

‘‘आप फिक्र न करें, अम्मीजान, मैं सबकुछ मालूम कर लूंगी,’’ नकविया ने कहा और फिर वह तहजीब के कमरे में घुस गई.

‘‘अरे यार, तेरा चेहरा इतना उदासउदास सा क्यों है?’’ उस ने तहजीब से पूछा.

‘‘बस यों ही.’’

‘‘यह तो कोई बात न हुई. साफसाफ बता कि क्या बात है? कहीं दूल्हा भाई किसी दूसरी से तो फंसे हुए नहीं हैं.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. वे कहीं फंसने लायक ही नहीं हैं,’’ तहजीब बहुत धीमे से बोली, ‘‘वे तो पूरी तरह ठंडे हैं.’’

‘‘क्या?’’ नकविया ने चौंक कर कहा, ‘‘तू यह क्या कह रही है?’’

‘‘हां, यही तो रोना है, तेरे दूल्हा भाई पूरी तरह ठंडे हैं, वे नामर्द हैं.’’ नकविया सोच में डूब गई, ‘भला वह पुरुष नामर्द कैसे हो सकता है जो कालेज के दिनों में घंटों एक लड़की के इंतजार में खड़ा रहता था और कालेज आतेजाते उस लड़की के तांगे का पीछा किया करता था.’

‘‘नहीं, वह नामर्द नहीं हो सकता,’’ नकविया के मुख से अचानक निकल गया.

‘‘तू दावे के साथ कैसे कह सकती है? भुगता तो मैं ने उसे है. एकदो नहीं, पूरी 5 रातें.’’

‘‘अरे यार, मैं डाक्टर हूं. मैं जानती हूं कि ऐसे 99 प्रतिशत मामले मनोवैज्ञानिक होते हैं. लाखों में कोई एकाध आदमी ही कुदरती तौर पर नामर्द होता है.’’

‘‘तो शायद तेरे दूल्हा भाई उन एकाध में से ही हैं,’’ तहजीब मुसकराई.

‘‘अच्छा, क्या तू उन्हें मेरे पास भेज सकती है? मैं जरा उन का मुआयना करना चाहती हूं.’’

‘‘भिजवा दूंगी, जरा क्या, पूरा मुआयना कर लेना. तेरी डाक्टरी कुछ नहीं करने की.’’

‘‘तू जरा भेज तो सही,’’ नकविया ने इतना कहा और उठ खड़ी हुई. तहजीब की मां ने जब नकविया से तहजीब की उदासी का कारण जाना तो वह सनसनाती हुई अपनी बहन के घर जा पहुंची. उस ने उन को आड़े हाथों लिया, ‘‘आपा, तुम्हें अपने लड़के के बारे में सबकुछ पता होना चाहिए था. ऐसी कोई कमी थी तो उस की शादी करने की क्या जरूरत थी? मेरी लड़की की जिंदगी बरबाद कर दी तुम ने.’’

‘‘छोटी, तू कहना क्या चाहती है?’’ मुश्ताक की मां अफसाना ने कुछ न समझते हुए कहा.

‘‘अरे, जब लड़का हिजड़ा है तो शादी क्यों रचा डाली? कम से कम दूसरे की लड़की का तो खयाल किया होता,’’ रुखसाना हाथ नचा कर बोली.

‘‘छोटी, जरा मुंह संभाल कर बात कर. मेरी ससुराल में ऐसे मर्द पैदा हुए हैं जिन्होंने 3-3 औरतों को एकसाथ खुश रखा है. यहां शेर पैदा होते हैं, गीदड़ नहीं.’’ बातों की लड़ाई हाथापाई में बदल गई. अल्ताफ ने बड़ी मुश्किल से दोनों को अलग किया.

रुखसाना बड़बड़ाती हुई चली गई. इस प्रकरण को ले कर दोनों परिवारों के मध्य बहुत कटुता उत्पन्न हो गई. एक दिन अल्ताफ और इशरार भी परस्पर भिड़ गए, ‘‘मैं तुम्हें अदालत में खींचूंगा. तुम पर दावा करूंगा. दहेज के साथसाथ और सारे खर्चे न वसूले तो नाम पलट कर रख देना,’’ इशरार ने गुस्से से कहा तो अल्ताफ भी पीछे न रहा. दोनों में हाथापाई की नौबत आ गई. कुछ लोग बीच में पड़ गए और उन्हें अलगअलग किया. दोनों तब वकीलों के पास दौड़े. तहजीब मुश्ताक के पास यह संदेश भेजने में सफल हो पाई कि उसे उस की सहेली नकविया याद कर रही है. एक दिन मुश्ताक नकविया के घर जा पहुंचा.

‘‘आइए, आइए,’’ नकविया ने मुश्ताक का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘मेरे कालेज जाने से पहले और लौट कर आने से पहले तो मुस्तैदी से रास्ते में साइकिल लिए तांगे का पीछा करने को तैयार खड़े मिलते थे, और अब बुलाने के इतने दिन बाद आए हो.’’

नकविया ने मुसकरा कर यह बात कही तो मुश्ताक झेंप गया. फिर दोनों इधरउधर की बातें करते रहे. ‘‘तहजीब के साथ क्या किस्सा हो गया? मैं उस की सहेली होने के साथसाथ तुम्हारे लिए भी अनजान नहीं हूं. मुझे सबकुछ साफसाफ बताओ जिस से 2 घरों के बीच खिंची तलवारों को म्यानों में पहुंचाया जा सके?’’

‘‘मैं बचपन से तहजीब को अपनी बहन मानता रहा हूं. वह भी मुझे ‘भाईजान’ कहती रही है. उस के साथ जिस्मानी ताल्लुक रखना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल काम है. तुम ही बताओ, इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ नकविया मुश्ताक को कोई उत्तर नहीं दे सकी. तब उस ने बात का पहलू बदल लिया, वह दूसरी बातें करने लगी. जब मुश्ताक जाने लगा तो उस ने वादा किया कि वह रोज कुछ देर के लिए आएगा जब तक कि वह इंगलैंड नहीं चली जाती.

फिर नकविया तथा मुश्ताक दोनों एकदूसरे के निकट आते चले गए. एक दिन नकविया ने तहजीब को बताया, ‘‘सुन, तेरा पति तो पूरा मर्द है. उस में कोई कमी नहीं है. उस के दिल में तेरे लिए जो भावना है, उसे मिटाना बड़ा मुश्किल काम है,’’ फिर नकविया ने सबकुछ बता दिया. तहजीब बहुत देर तक कुछ सोचती रही. फिर बोली, ‘‘उन का सोचना ठीक लगता है. सचमुच, इतने नजदीकी रिश्तों में शादी नहीं होनी चाहिए. अब कुछ करना ही होगा.’’ फिर तहजीब और मुश्ताक परस्पर मिले और उन के बीच एक आम सहमति हो गई. कुछ दिन बाद मुश्ताक ने तहजीब को तलाक के साथ मेहर का पैसा तथा सारा दहेज भी वापस भेज दिया.

‘‘मैं दावा करूंगा. क्या समझता है अल्ताफ अपनेआप को. जब लड़का हिजड़ा था तो क्यों शादी का नाटक रचा,’’ तहजीब के अब्बा गुस्से से बोले.

‘‘नहीं अब्बा, नहीं. अब हमें कुछ नहीं करना है. मुश्ताक में कोई कमी नहीं थी. दरअसल, मैं ही उस से पिंड छुड़ाना चाहती थी,’’ तहजीब ने बात समाप्त करने के उद्देश्य से इलजाम अपने ऊपर ले लिया.

‘‘लेकिन क्यों?’’ उस की मां ने हस्तक्षेप करते हुए पूछा.

‘‘मुझे वे पसंद नहीं थे.’’

‘‘अरे बेहया,’’ मां चिल्लाईं, ‘‘तू ने झूठ बोल कर पुरानी रिश्तेदारी को भी खत्म कर दिया,’’ उन्होंने तहजीब के सिर के बालों को पकड़ कर झंझोड़ डाला. फिर उस के सिर को जोर से दीवार पर दे मारा. कुछ दिनों बाद नकविया लंदन वापस चली गई. लगभग 5 माह बाद नकविया फिर भारत आई. वह अपने साथ 1 व्यक्ति को भी लाई थी. उस को ले कर वह तहजीब के घर गई. तहजीब के मांबाप से उस व्यक्ति का परिचय कराते हुए नकविया ने कहा, ‘‘ये मेरे साथ लंदन में डाक्टरी पढ़ते हैं. लखनऊ में इन का घर है. आप चाहें तो लखनऊ जा कर और जानकारी ले सकते हैं. तहजीब के लिए मैं बात कर रही हूं.’’ लड़का समझ में आ जाने पर अन्य बातें भी देखभाल ली गईं, फिर शादी भी पक्की हो गई.

‘‘बेटी, तुम शादी कहां करोगी, हिंदुस्तान में या इंगलैंड में?’’ एक दिन तहजीब की मां ने नकविया से पूछा.

‘‘अम्मीजान, मैं अपने ही देश में शादी करूंगी. बस, जरा मेरी पढ़ाई पूरी हो जाए.’’

‘‘कोई लड़का देख रखा है क्या?’’

‘‘हां, लड़का तो देख लिया है. यहीं है, अपने शहर का.’’

‘‘कौन है?’’

‘‘आप का पहले वाला दामाद मुश्ताक,’’ नकविया ने मुसकरा कर कहा.

‘‘हाय, वह… वह नामर्द. तुम्हें उस से शादी करने की क्या सूझी?’’

‘‘अम्मीजान, वह नामर्द नहीं है,’’ नकविया ने तब उन्हें सारा किस्सा कह सुनाया. ‘‘हम ही गलती पर थे. हमें इतनी नजदीकी रिश्तेदारी में बच्चों की शादी नहीं करनी चाहिए. सच है, जहां भाईबहन की भावना हो वहां औरतमर्द का संबंध क्यों बनाया जाए,’’ तहजीब की मां ने अपनी गलती मानते हुए कहा. Hindi Family Story.

Gen Z Special: जेन जी भी हैं अकेलेपन का शिकार

Gen Z Special: कहा जा रहा है कि डिजिटल युग में युवाओं के पास अपना समय बिताने के लिए बहुत कुछ है, मगर सच्चाई यह है कि इसके बावजूद वे अकेले पड़ गए हैं। वर्चुअल दोस्तों ने उन्हें असल दोस्त बनाने से बहुत दूर कर दिया है।

आज के तकनीकी युग में जेन जी के सामने अकेलेपन की एक बड़ी समस्या है, जो शहरों और महानगरों में बड़ी तेजी से बढ़ रही है। अस्पतालों के मनोरोग विभागों में बढ़ते युवा मरीज इस बात का सबूत हैं कि भारतीय समाज में अकेलापन मानसिक अस्थिरता और अवसाद का बड़ा कारण बन रहा है।

हम बूढ़े लोगों के अकेलेपन के लिए काफी चर्चा और चिंता करते हैं, मगर आज की युवा पीढ़ी — जिसे जेन जी कहकर बुलाया जा रहा है — जिस अकेलेपन से जूझ रही है, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता।

आमतौर पर लोग इन युवाओं से जुड़ी इस समस्या को मज़ाक में उड़ा देते हैं — “अरे भाई, तुम्हें क्या ग़म है? खाओ-पियो, मौज करो, तुम्हें कौन रोकने-टोकने वाला है? अपनी मरज़ी के मालिक हो।” — ऐसी बातों से हम युवाओं के अकेलेपन की गंभीरता को दरकिनार कर देते हैं।

युवाओं में अकेलेपन के कई कारण होते हैं, जिन्हें हम सामाजिक, मानसिक, पारिवारिक और तकनीकी दृष्टिकोण से समझ सकते हैं।

आज के प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में पढ़ाई, करियर और नौकरी की दौड़ में युवा अपने रिश्तों और दोस्ती के लिए समय नहीं निकाल पाते। उनका अधिकांश समय किताबों, कंप्यूटर, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर बीतता है। इस वजह से उनके ऐसे दोस्त नहीं बन पाते जिनसे वे खुलकर अपनी निजी समस्याएँ, भावनाएँ और विचार साझा कर सकें।

इससे पहले वाली पीढ़ी (45 से 65 वर्ष आयु वर्ग) के पास आज भी ऐसे दोस्त हैं जिनसे वे खुलकर बात कर लेते हैं और जिनके पास दोस्त की बात सुनने, समझने और सलाह देने के लिए समय भी होता है। वे एक-दूसरे से मिलते हैं, पारिवारिक कार्यक्रमों में बुलाते हैं, फोन पर घंटों बात करते हैं। मगर जेन जी पीढ़ी इस तरह की दोस्ती विकसित नहीं कर पा रही है।

नौकरी और पढ़ाई के लिए अधिकांश युवा आज अपने गाँव, शहर या देश छोड़कर नई जगहों पर रहने को मजबूर हैं। इस कारण बचपन के दोस्त छूट जाते हैं और नई जगह पर जान-पहचान वाले नहीं होते। अब अनजान लोगों से तो अपनी निजी बातें या समस्याएँ साझा नहीं की जा सकतीं। ऐसे में कॉलेज या ऑफिस से लौटकर युवा घर के एकांत में खुद को डुबो लेता है। उसका सारा समय कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर गुजरता है, जिसका हासिल कुछ नहीं होता।

किसे बताएं दिल की बात

शहरों में बढ़ता फ्लैट कल्चर और खत्म होती ‘महल्लेदारी’ ने भी आज के युवाओं को बहुत अकेला कर दिया है।

20 से 25 साल के बीच की आयु बहुत भावुक मानी जाती है। इस समय युवा हर तरह के सपने देखते हैं — करियर के, पैसा कमाने के, अच्छे जीवनसाथी के, नए प्यार और सेक्स के। वे देखते तो बहुत कुछ हैं, मगर किसी से इन पर चर्चा नहीं कर पाते।

पहले युवा लड़कियाँ मोहल्ले की भाभियों या दीदियों से अपनी राज़ की बातें, प्रेम की बातें साझा कर लेती थीं। लड़के भी दोस्तों से दिल की बात कह लिया करते थे। मगर अब फ्लैटों में रहने वाले युवाओं को तो यह तक नहीं पता होता कि उनके सामने वाले फ्लैट में कौन रहता है।

बड़े शहरों में पड़ोसी और समाज से जुड़ाव बहुत कम हो गया है। अब अधिकतर जेन जी युवा अकेले या छोटे परिवारों में रहते हैं, जहाँ भावनात्मक सहारा कम मिलता है।

यदि माता-पिता दोनों वर्किंग हैं तो शाम को घर लौटने के बाद उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे अपने जवान होते बच्चों के साथ कुछ देर बैठ सकें और दिनभर की बातें कर सकें। कई बार वे ऑफिस की टेंशन लेकर घर लौटते हैं और अपना फ्रस्ट्रेशन माता-पिता, भाई या बहन पर निकालने लगते हैं।

ऐसे परिवारों में रहने वाले युवा मशीनी जिंदगी जीते नजर आते हैं। कई बार करियर, शादी या लाइफस्टाइल से जुड़ी अपेक्षाएँ युवाओं को अपने माता-पिता से भी अलग-थलग कर देती हैं।

आज माता-पिता और बच्चों के बीच पीढ़ीगत अंतर के कारण बातचीत और भावनात्मक जुड़ाव कम होता जा रहा है।

सोशल मीडिया आज के युवाओं के लिए बहुत बड़ा छलावा है। उनके ऑनलाइन तो बहुत सारे दोस्त होते हैं, मगर असल जीवन में कोई उनका नहीं होता। डिजिटल कनेक्शन ज़्यादा, असली रिश्ते कम — यही अकेलेपन की जड़ है।

युवा वास्तविक समाज से कटकर वर्चुअल दुनिया में जीने लगते हैं और धीरे-धीरे मनोरोगी बन जाते हैं।

आज के युवा अकेलेपन का सामना इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि वे खुद को स्वतंत्र रखना चाहते हैं। माँ-बाप की रोक-टोक उन्हें पसंद नहीं है। वे खुद को माता-पिता से अधिक स्मार्ट और इंटेलिजेंट समझते हैं।

इसलिए वे ज़्यादातर समय अपने कमरे में बंद होकर बिताते हैं। अत्यधिक आत्मनिर्भरता उन पर हावी हो जाती है और धीरे-धीरे उनमें अकेले रहने की आदत विकसित हो जाती है, जो आगे चलकर खतरनाक साबित होती है।

देर से शादी या रिलेशनशिप में अस्थिरता भी अकेलेपन का एक बड़ा कारण है। “परफेक्ट लाइफ” का दबाव, समाज और सोशल मीडिया पर आदर्श जीवन दिखाने की होड़ के कारण अनेक युवा खुद को असफल मानने लगते हैं और अलग-थलग महसूस करते हैं।

कुल मिलाकर युवाओं में बढ़ता अकेलापन केवल “साथी की कमी” नहीं है, बल्कि सामाजिक संरचना, तकनीकी बदलाव और मानसिक दबाव का मिश्रण है।

अकेले रहने वाले युवाओं की समस्याएँ

अकेले रहने वाले युवाओं को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

सबसे पहली समस्या खाने-पीने से जुड़ी होती है। अगर उन्हें खाना बनाना नहीं आता या रोज़ खाना बनाने की इच्छा नहीं होती, तो हर दिन बाहर का खाना अनेक स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा करता है, जिनका मस्तिष्क पर भी प्रभाव पड़ता है।

पेइंग गेस्ट की तरह किसी दूसरे के घर पर रहने में कई तरह की पाबंदियाँ होती हैं — जैसे “नॉनवेज मत खाओ”, “दोस्तों को कमरे पर मत बुलाओ”, “देर रात तक बाहर मत रहो” आदि।

जो युवा कमरा या घर किराए पर लेकर रहते हैं, यदि बीमार पड़ जाएँ, तो कोई उनकी देखभाल करने वाला या अस्पताल ले जाने वाला नहीं होता। कोई आर्थिक समस्या आने पर अकेले युवा को उधार देने वाला भी नहीं मिलता। घर से पैसे मंगवाना उन्हें अपराधबोध जैसा लगता है।

अकेले रहने वाला युवा लड़का हो तो पड़ोस की आंटियाँ अपनी बेटियों को उस ओर देखने से भी रोकती हैं, मानो वहाँ कोई अछूत रहता हो।

अगर कोई युवा लड़की अकेले कमरा लेकर रहती है तो मोहल्ले के कुछ लड़के बुरी नज़र रखने लगते हैं, हर कोई उससे फ्रेंडली होने लगता है। देर रात घर लौटे तो पड़ोस की महिलाओं में खुसुर-फुसुर शुरू हो जाती है।

कहने का अर्थ यह है कि घर से दूर रहने वाले युवाओं को न सिर्फ आर्थिक और व्यावहारिक कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, बल्कि उन्हें मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

अकेलेपन से कैसे बचें

अकेलापन हमेशा कमजोरी नहीं होता; यह समय खुद को समझने और अपने भीतर की ताकत पहचानने का भी हो सकता है। अगर इसे सही ढंग से संभाला जाए तो यह आत्मविकास का अवसर बन सकता है।

20 से 25 वर्ष की उम्र भावुकता और प्रेम की होती है। बहुत से युवा अपने एकांत को रचनात्मकता में बदल लेते हैं। बड़े-बड़े कवि और लेखक अपनी सबसे सुंदर रचनाएँ इसी उम्र में करते हैं। कमरे के एकांत में भावनाएँ जब कागज़ पर उतरती हैं, तो इतिहास बनती हैं।

इसलिए अकेलेपन का रोना न रोएँ, बल्कि संगीत, पेंटिंग, लेखन या फोटोग्राफी जैसी रचनात्मक गतिविधियाँ अपनाएँ। नई भाषा, नया कोर्स या कोई स्किल सीखें।

जब आपको कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है, तो खेलकूद जैसी शारीरिक गतिविधियों में भाग लें, शरीर को स्वस्थ रखें। किसी क्लब, ग्रुप या ऑनलाइन कम्युनिटी से जुड़ें, जहाँ समान रुचियों वाले लोग मिलते हों।

परिवार या दोस्तों से फ़ोन या वीडियो कॉल पर बात करें। पुराने दोस्तों से दोबारा संपर्क करें, उनसे पूछें कि वे कैसे हैं — यह आप दोनों को अच्छा महसूस कराएगा।

अजनबी शहर में अकेले रहते हों तो किसी एनजीओ से जुड़ें और समाजसेवा में योगदान दें। वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम जाएँ, वहाँ का अकेलापन बाँटें — मन हल्का होगा।

अकेले हों तो आत्मविश्लेषण करें, लक्ष्य तय करें और उन्हें पाने की योजना बनाएं। किताबें पढ़ें, डायरी लिखें, अपनी भावनाओं को व्यक्त करें। शहर के ऐतिहासिक स्थलों को देखें और उनका इतिहास जानें। इससे ज्ञान भी बढ़ेगा।

हाँ, सोशल मीडिया पर कम समय बिताएँ। और अगर अकेलापन फिर भी परेशान करे, तो काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लेने में देर न करें। Gen Z Special.

Gen Z Special: जेन ज़ी का फंडा – सेक्स, ड्रिंक और ड्रग्स

Gen Z Special: घर से दूर रह रहे युवाओं को उनके माता-पिता पढ़ाई के लिए बाहर भेजते हैं ताकि वे काबिल और सफल बनकर लौटें। मगर इनमें से कुछ ऐसे कार्यों में लिप्त हो जाते हैं जो उनके भविष्य को गर्त में ले जाने के लिए काफी होते हैं।

आज की युवा पीढ़ी कहती है — “हम अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं। समय बहुत बदल गया है। हमारे माता-पिता हमें हर वक्त रोकते-टोकते हैं। क्या हम हमेशा उनके अनुसार जीवन जिएंगे? अब हम बालिग हैं, यह हमारी जिंदगी है, इसे हम जैसे चाहें वैसे जिएं।”

आज यह समस्या लगभग हर युवा की है कि वे पारिवारिक बंदिशों से कैसे छुटकारा पाएं। इसी कारण कई बार वे परिवार से विद्रोह भी कर बैठते हैं।

कॉलेज की अंतिम वर्ष की छात्रा निशा कहती है —

“आज की जनरेशन पुरानी बातों में यकीन नहीं रखती। हमारे माता-पिता समझते ही नहीं कि शादी ही जीवन का आखिरी विकल्प नहीं है। यदि हम अपने पार्टनर से खुश नहीं हैं तो तलाक ले सकते हैं — समझौता क्यों करें? आजकल डेटिंग ऐप्स उपलब्ध हैं, डेट करना बहुत नॉर्मल बात है। हम किसी अनजान व्यक्ति के साथ पूरी जिंदगी नहीं गुजार सकते, इसलिए एक-दूसरे को समझने के लिए डेट करते हैं। विचार न मिलें तो अपनी राहें अलग कर लेते हैं।”

पुनीत कहता है —

“मैं इस बात से सहमत हूं कि वक्त के साथ बदलना जरूरी है। लेकिन क्या हमारे बढ़ते कदम सार्थक हैं या हमें गर्त में धकेल रहे हैं? जिसे हम मौज-मस्ती और अपनी आजादी कह रहे हैं, क्या वह हमारे भविष्य की सही दिशा तय करेगी? हमारे पेरेंट्स हमें बार-बार टोकते हैं — यह मत करो, ऐसे मत रहो — जो हमें नागवार गुजरता है। आखिर वे समझते क्यों नहीं कि वक्त बदल गया है? हम उनके बनाए बंधनों में नहीं रहना चाहते। यही तो जनरेशन गैप है।”

पीयर प्रेशर और बदलता माहौल

समय के साथ बदलना ज़रूरी है, लेकिन बड़ों के अनुभव का लाभ लेना भी समझदारी है। आजकल सेक्स, ड्रग और ड्रिंक लेना बहुत आम बात हो गई है। अगर हम दोस्तों की पार्टी का हिस्सा नहीं बनते तो वे हमें छोड़ देते हैं। सेक्स, ड्रिंक और ड्रग आज युवाओं की पढ़ाई और लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुके हैं।

मेरे दो दोस्त कुछ महीनों से डेट कर रहे थे, फिर लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। आपसी समझ से उन्होंने अपनी सीमाएँ लाँघ दीं। उनका कहना था — “समय बदल गया है, हम अपनी तरह से जीना चाहते हैं।” लेकिन यही मौज-मस्ती अंत में उन्हें अलग कर गई। दोनों का ब्रेकअप हुआ और वे गहरे डिप्रेशन में चले गए। एक ने नशे का सहारा लिया, दूसरा उसी प्यार में टूट गया।

कॉलेज लाइफ और भटकाव

स्कूल और कॉलेज के बाहर क्लास बंक कर मौज-मस्ती करना किसी को भी अच्छा लग सकता है, लेकिन यह भी सच है कि इससे हम अपने करियर और भविष्य से भटक जाते हैं। क्या सेक्स ही जीवन का अंतिम सत्य है?

आजकल नशा एक स्टेटस सिंबल बन चुका है। कॉलेजों में बढ़ता हुआ सेक्स, ड्रिंक और ड्रग का उन्माद हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपने भविष्य को किस दिशा में ले जा रहे हैं। आज लड़कियाँ भी इन मादक द्रव्यों का सेवन करती दिखाई देती हैं।

आज़ादी, खुलापन और आधुनिकता के नाम पर कई होनहार लड़के-लड़कियाँ ड्रग पैडलरों और यौन शोषण के जाल में फँस जाते हैं। देश के विभिन्न शहरों से ऐसी कई घटनाएँ सामने आ रही हैं।

शहरों की चकाचौंध और असली तस्वीर

छोटे शहरों और गाँवों से आई हुई लड़कियाँ जल्दी ही इन रंगीन चकाचौंध में खो जाती हैं। मुंबई के कॉलेजों के बाहर देखा गया कि छात्र-छात्राएँ क्लास छोड़कर जोड़ों में बैठे हैं, सिगरेट पी रहे हैं, और खुलेआम अनुचित व्यवहार कर रहे हैं।

यह दृश्य केवल मुंबई तक सीमित नहीं, बल्कि अब पूरे देश में फैल चुका है। नागपुर, पुणे, दिल्ली, जयपुर, लखनऊ — हर जगह युवा वर्ग आधुनिकता के नाम पर अपनी जड़ों से कटता जा रहा है।

शिक्षा से दूर, गलत आदतों की ओर

पुणे के एक कॉलेज की छात्रा प्रज्ञा बताती है —

“यहां तो एक-दो पीरियड अटेंड करने के बाद बच्चे बाहर चले जाते हैं। कुछ ही छात्र-छात्राएँ नियमित पढ़ाई करते हैं। बाकी घूमना-फिरना और पार्टी करना उनकी दिनचर्या है। पहले मैंने दूरी बनाए रखी, लेकिन कब तक अकेली रहती? आखिरकार मैं भी उनके साथ पार्टियों में जाने लगी।”

यहां जोड़े बनते हैं, लिव-इन में रहते हैं और पढ़ाई पूरी होने पर अलग हो जाते हैं। ऋतु (बदला हुआ नाम) बताती है —

“मकान मालिक शादीशुदा जोड़े को ही फ्लैट देता है, इसलिए हमने शादी का सर्टिफिकेट दिखाया। ऐसे कई केस पुणे कोर्ट में दाखिल हुए हैं। माता-पिता सोचते हैं कि बच्चे पढ़ रहे हैं, जबकि वे कुछ और ही कर रहे होते हैं।”

“स्पेशल पान” और ड्रग का जाल

मुंबई के एक कॉलेज के पास ‘सीताराम का पान’ बहुत प्रसिद्ध है। यह पान युवाओं में नशे की तरह लोकप्रिय है। दरअसल, वह दुकानदार अपने “स्पेशल पान” में ड्रग मिलाता था। धीरे-धीरे छात्रों को उसकी लत लग जाती और वे उसकी गिरफ्त में आ जाते।

एक पूर्व कर्मचारी ने बताया — “मैंने वहाँ काम छोड़ दिया क्योंकि वह बड़े माफियाओं से जुड़ा था। जो लोग कहते हैं कि वे सिर्फ पान खाते हैं, वे असल में ड्रग का शिकार होते हैं।”

नशे की बढ़ती आदतें

एक अन्य छात्र नीलेश कहता है —

“मुझे कॉलेज में रैगिंग के नाम पर ड्रग दी गई। मना करने पर सीनियर्स ने बहुत मारा और सेक्स के लिए मजबूर किया। पैसे न होने पर हमने चोरी की, लड़कियों को बहकाया। अब मैं इस नशे से निकलना चाहता हूं, लेकिन नहीं निकल पा रहा हूं।”

ऐसी घटनाएँ यह दिखाती हैं कि ड्रग केवल लत नहीं, बल्कि अपराध का जाल भी बन गया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी खतरनाक प्रयोग

कुछ युवाओं ने कंडोम में मौजूद सुगंधित रासायनिक तत्व (जैसे डैन्ड्राइट) का नशे के रूप में उपयोग करना शुरू किया है। रसायन विज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार, यह घटिया किस्म का नशा है जो शरीर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए घातक है।

इसी तरह कई युवा खाँसी की दवाई, गोंद, पेंट, सैनिटाइज़र, यहाँ तक कि नेल पॉलिश और आफ्टर शेव का भी सेवन कर रहे हैं। यह उन्हें क्षणिक सुकून देता है, पर अंततः जीवन को नष्ट कर देता है।

निष्कर्ष

आज की युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि आधुनिकता का अर्थ अंधानुकरण नहीं है। आज़ादी का मतलब ज़िम्मेदारी से रहना है। नशा, ड्रिंक और सेक्स को “लाइफस्टाइल” कहना आत्मविनाश की राह पर ले जाता है।

अपने माता-पिता और शिक्षकों के अनुभव को नकारना बुद्धिमानी नहीं। बदलाव ज़रूरी है, लेकिन संयम और विवेक के साथ ही यह सच्ची आज़ादी कहलाएगी। Gen Z Special.

Hindi Story: जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी

Hindi Story: वह औरत कौन थी? कार में धीरज के साथ कहां जा रही थी? धीरज के साथ उस का क्या रिश्ता था? धीरज के पास से तो उस का मोबाइल और पर्स मिल गया था, लेकिन उस औरत का कोई पहचानपत्र या मोबाइल घटनास्थल से बरामद नहीं हुआ. इस वजह से यह सब एक रहस्य बन गया था.

धीरज के मित्र, औफिस वाले, रिश्तेदार और पड़ोसी सब जानना चाहते थे कि आखिर वह औरत थी कौन? और उस का धीरज से क्या रिश्ता था? सब को धीरज की मौत का गम कम, उस राज को जानने की उत्सुकता ज्यादा थी.

जिंदगी में कभीकभी ऐसा घटित हो जाता है कि इंसान समझ ही नहीं पाता कि यह क्या हो गया? ऐसी ही एक घटना नहीं बल्कि दुर्घटना घटी शोभा के साथ. उस का पति धीरज एक औरत के साथ सड़क दुर्घटना में मारा गया था.

पुलिस ने अपनी खानापूर्ति कर दी. दोनों लाशों का पोस्टमौर्टम हो गया. उस औरत की लाश को लेने कोई नहीं आया, सो, उस का अंतिम संस्कार पुलिस द्वारा कर दिया गया.

वह औरत शादीशुदा थी क्योंकि उस की मांग में सिंदूर था. सवाल यह था कि वह गैरमर्द के साथ कार में क्यों थी? कार के कागजात के आधार पर पता चला कि वह कार धीरज के मित्र की थी. एक दिन पहले ही धीरज ने उस से यह कह कर ली थी कि वह एक जरूरी काम से चंडीगढ़ जा रहा है, लेकिन कार दुर्घटनाग्रस्त हुई दिल्लीआगरा यमुना ऐक्सप्रैसवे पर यानी धीरज ने अपने मित्र से झूठ बोला.

जब दुर्घटना की गुत्थी नहीं सुलझ सकी तो लोगों ने खुल कर कहना शुरू कर दिया कि उस औरत के साथ धीरज के अवैध रिश्ते रहे होंगे और वे दोनों मौजमस्ती के लिए निकले होंगे.

लोगों की इस बेहूदा सोच पर शोभा खासी नाराज थी लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. किसी का मुंह वह बंद तो नहीं कर सकती थी.

धीरज उसे बहुत प्यार करता था. शादी के 5 वर्षों में जब उन्हें संतान सुख नहीं मिला तब उन दोनों ने अपनाअपना मैडिकल चैकअप कराया. रिपोर्ट में पता चला कि वह मां नहीं बन सकती जबकि धीरज पिता बनने के काबिल था. यह जान कर वह बहुत रोई और धीरज से बोली, ‘तुम दूसरी शादी कर लो, मैं अपना जीवन काट लूंगी.’

‘शोभा, अगर कमी मुझ में होती तो क्या तुम मुझे छोड़ कर दूसरी शादी कर लेतीं,’ कहते हुए धीरज ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.

क्या उस से इतना प्यार करने वाला धीरज उस के साथ इस तरह बेवफाई कर सकता है? शोभा ने अपने मन को यह कह कर तसल्ली दी, हो सकता है उस औरत ने धीरज से लिफ्ट मांगी हो. लेकिन दिमाग में कुछ सवाल बिजली की तरह कौंध रहे थे कि धीरज ने अपने दोस्त से गाड़ी चंडीगढ़ जाने को कह कर ली तो फिर वह आगरा जाने वाले यमुना ऐक्सप्रैसवे पर क्यों गया? मित्र से उस ने झूठ क्यों बोला? आखिर वह जा कहां रहा था? और उसे भी कुछ बता कर नहीं गया जबकि वह उस को छोटी से छोटी बात भी बताता था. कुछ बात तो जरूर है तभी धीरज ने उस से अपने बाहर जाने की बात छिपाई थी.

शोभा को दुखी और परेशान देख कर उस के पिता ने कहा, ‘‘बेटी, जो होना था वह तो हो गया, तुम अब खुद को मजबूत करो और आर्थिक रूप से अपने पांवों पर खड़ी होने की कोशिश करो. धीरज की कोई सरकारी नौकरी तो थी नहीं कि जिस के आधार पर तुम्हें नौकरी या पैंशन मिलेगी. उस के कागजात देखो, शायद उस ने कोई इंश्योरैंस पौलिसी वगैरह कराई हो. उस के बैंक खातों को भी देखो. शायद तुम्हें कुछ आर्थिक मदद मिल सके.’’

‘‘नहीं पापा, मुझे सब पता है. उन्होंने कोई पौलिसी वगैरह नहीं कराई थी. न ही बैंक में कोई खास रकम है, क्योंकि उन की नौकरी मामूली थी और वेतन भी कम था. कुछ बचता ही कहां था जो वे जमा करते. वे अपने मांबाप की भी आर्थिक मदद करते थे.’’

‘‘फिर भी बेटा, एक बार देख लो, हर इंसान अपने आने वाले वक्त के लिए करता है और फिर धीरज जैसे समझदार इंसान ने भी कुछ न कुछ अवश्य किया होगा.’’

दुखी मन से शोभा ने धीरज की अलमारी खोली, शायद उस के कागजात के साथ ही उस के साथ हुए हादसे का भी कोई सूत्र मिल जाए. अलमारी में बैंक की एक चैकबुक मिली और भारतीय जीवन बीमा निगम की एक डायरी मिली. उस ने उसे जोश के साथ से खोला. पहले ही पृष्ठ पर लिखा था, ‘जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी.’ कुछ पृष्ठों पर औफिस से संबंधित कार्यों का लेखाजोखा था.

डायरी के बीच में एक मैडिकल स्टोर का परचा मिला, जिस में कुछ दवाइयां लिखी थीं. ये कौन सी दवाइयां थीं, खराब लिखावट की वजह से कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. जिस तारीख का परचा था, शोभा को खासा याद था कि उस ने उस दौरान कोई दवाई नहीं मंगाई थी. इस का मतलब धीरज ने अपने लिए दवा खरीदी थी. यह सोच कर वह भयभीत हो उठी कि कहीं धीरज किसी गंभीर बीमारी से पीडि़त तो नहीं था.

उस ने फौरन मैडिकल स्टोर जाने का फैसला लिया. वह मैडिकल स्टोर उस के घर से काफी दूर था, लेकिन वह वहां गई. मैडिकल स्टोर वाले ने परचे पर लिखी दवाएं तो बता दीं लेकिन दवाएं लेने कौन आया था, वह न बता सका. दवाइयां दांतों की बीमारी से संबंधित थीं.

उस दौरान धीरज को दांतों से संबंधित कोई समस्या नहीं थी. अगर थी भी तो वह अपने घर या औफिस के नजदीक के मैडिकल स्टोर से दवा लेता. इतनी दूर आने की क्या जरूरत थी? तो इस का मतलब साफ था कि धीरज ने किसी और के लिए दवाइयां खरीदी थीं. किस के लिए खरीदी थीं, यह जानने के लिए शोभा ने घर आ कर धीरज का सामान फिर से टटोला.

उस ने उस की डायरी दोबारा अच्छी तरह से चैक की. 15 अगस्त वाले पृष्ठ पर उस ने लिखा था, ‘आज आजादी का दिन मेरे लिए खास बन गया.’ आखिर 15 अगस्त को ऐसा क्या हुआ था जो उस के लिए खास बन गया था, इस बात का जिक्र नहीं था.

उस ने उस के मोबाइल पर भी एक चीज नोट की, उस ने अपने मोबाइल के वालपेपर पर तिरंगे के साथ अपनी हंसतीमुसकराती तसवीर लगा रखी थी. तभी उस का मोबाइल बज उठा. बच्चे की खिलखिलाहट की रिंगटोन थी. यह सत्य था कि उसे बच्चों से बहुत प्यार था, इसलिए उस ने बच्चे की खिलखिलाहट की रिंगटोन लगा रखी थी. लेकिन आज ध्यान से सुना तो बीच में कोई धीरे से बोल रहा था, ‘पापा, बोलो पापा.’

यह सुन कर उस का माथा ठनका. हो न हो, 15 अगस्त और बच्चे की खिलखिलाहट में कुछ न कुछ राज जरूर छिपा है.

वालपेपर को उस ने गौर से देखा. धीरज के पीछे एक अस्पताल था. अस्पताल का नाम साफ नजर आ रहा था. शायद उस ने सैल्फी ली थी यानी 15 अगस्त को धीरज उस अस्पताल के पास था. वह वहां क्यों गया था, यह जानने के लिए वह तुरंत उस अस्पताल के लिए चल पड़ी. वह भी काफी दूर था. वहां गई तो वास्तव में अस्पताल के बाहर तिरंगा लहरा रहा था. यह तो तय हो गया था कि धीरज ने सैल्फी यहीं ली थी. लेकिन वह यहां करने क्या आया था. अचानक उस के मस्तिष्क में बच्चे की खिलखिलाहट की रिंगटोन और ‘पापा, बोलो पापा’ की ध्वनि बिजली की तरह कौंध गई और वह फौरन अस्पताल के अंदर चली गई.

मैटरनिटी होम के रिसैप्शन पर जा कर उस ने 15 अगस्त को जन्मे बच्चों की जानकारी चाही. पहले तो उसे मना कर दिया गया, लेकिन काफी रिक्वैस्ट करने पर बताया गया कि उस दिन 7 बच्चे हुए थे जिन में 4 लड़के और 3 लड़कियां थीं. उन बच्चों के पिता के नाम में धीरज का नाम नहीं था. सातों मांओं के नाम उस ने नोट कर लिए. अस्पताल के नियम के मुताबिक उसे उन के पते और मोबाइल नंबर नहीं दिए गए.

घर आ कर उस ने धीरज के मोबाइल में उन नामों के आधार पर नंबर ढूंढ़े, लेकिन कोई नंबर नहीं मिला. एक नंबर जरूर ‘एस’ नाम से सेव था. उस ने उस नंबर पर फोन लगाया तो उधर से एक नारीस्वर गूंजा, ‘‘कौन?’’

‘‘जी, मैं बोल रही हूं.’’

‘‘कौन? तू सीमा बोल रही है क्या?’’

यह सुन कर वह थोड़ा घबराई, ‘‘आप मेरी बात तो सुनिए.’’

‘‘अरे सीमा, क्या बात सुनूं तेरी? तू उस दिन शाम तक आने को कह कर गई थी और आज चौथा दिन है. तेरे बच्चे का रोरो कर बुरा हाल है. जल्दबाजी में तू अपना मोबाइल और पर्स भी यहीं भूल गई. तेरे फोन भी आ रहे हैं. समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूं कि तू है कहां?’’

‘‘जी, वह बात यह है कि…’’

‘‘तू इतना घबरा कर क्यों बोल रही है? कोई परेशानी है तो मुझे बता, क्या पति से झगड़ा हो गया है?’’

‘‘जी, मैं सीमा नहीं, उस की बहन शोभा बोल रही हूं.’’

‘‘शोभा? लेकिन सीमा ने कभी आप का जिक्र ही नहीं किया. आप बोल कहां से रही हैं?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं आप को फोन पर कुछ नहीं बता पाऊंगी. आप से मिल कर सबकुछ विस्तार से बता दूंगी. शीघ्र ही मैं आप से मिलना चाहती हूं. प्लीज, आप अपना पता बता दीजिए,’’ निवेदन करते हुए उस ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं अभी आप को अपना पता एसएमएस करती हूं.’’

चंद मिनटों में ही उस का पता मोबाइल स्क्रीन पर आ गया और शोभा शीघ्र ही वहां के लिए रवाना हो गई.

जैसे ही शोभा ने दरवाजे की घंटी बजाई, एक अधेड़ उम्र की महिला ने दरवाजा खोला, ‘‘आप शोभाजी हैं न,’’ कहते हुए वे उसे बहुत सम्मान के साथ अंदर ले गईं.

पानी का गिलास पकड़ाते हुए बोलीं, ‘‘सीमा ने कभी आप का जिक्र तक नहीं किया था. वह मेरे यहां किराए पर अपने पति के साथ रहती थी. अभी 15 अगस्त को उस के बेटा  भी हुआ है. उस की ससुराल और मायके से कोई नहीं आया था. सारा काम मैं ने और उस के पति ने ही संभाला था. वह मुझे मां समान मानती है. अभी

4 दिनों पहले ही सुबह 6 बजे अपने बेटे को मेरे पास छोड़ कर जाते हुए बोली थी, ‘‘आंटी, एक बहुत जरूरी काम से हम दोनों जा रहे हैं, शाम तक वापस आ जाएंगे, प्लीज, तब तक आप आर्यन को संभाल लेना.’’

अपने पर्स से धीरज का फोटो निकाल कर उन्हें दिखाते हुए शोभा बोली, ‘‘आंटी, क्या यही सीमा के पति हैं?’’

‘‘हां, यही इस के पति हैं, लेकिन आप क्यों पूछ रही हैं? आप को तो सबकुछ पता होना चाहिए, क्योंकि आप तो सीमा की बहन हैं,’’ उन्होंने शंका जाहिर की.

‘‘आंटी, बात दरअसल यह है कि सीमा ने परिवार की मरजी के खिलाफ प्रेमविवाह किया था, इसलिए हमारा उस से संपर्क नहीं था. लेकिन अभी 4 दिनों पहले ही सीमा और उस के पति की एक कार ऐक्सिडैंट में मौत हो गई है. आखिरी समय में उस ने पुलिस को हमारा पता और आप का मोबाइल नंबर बताया था. उसी के आधार पर मैं यहां आई हूं,’’ कहते हुए उस ने अखबार की कटिंग जिस में दुर्घटना के समाचार के साथसाथ सीमा और धीरज की तसवीर थी, दिखा दी, और फिर सुबक पड़ी.

वे बुजुर्ग महिला भी रो पड़ीं और सिसकते हुए बोलीं, ‘‘अब आर्यन तो अनाथ हो गया.’’

‘‘नहीं आंटी, आर्यन क्यों अनाथ हो गया. उस की मौसी तो जिंदा है. मैं पालूंगी उसे. आखिर मौसी भी तो मां ही होती है.’’

‘‘हां शोभा, तुम ठीक कह रही हो. अब तुम ही संभालो नन्हें आर्यन को,’’ कहते हुए वे अंदर से एक 7-8 माह के बच्चे को ले आईं जो हूबहू धीरज की फोटोकौपी था.

शोभा ने बच्चे को अपनी छाती से ऐसे चिपका लिया जैसे कोई उसे छीन न ले. वह जल्दी से जल्दी वहां से निकलना चाह रही थी.

आंटी ने कहा, ‘‘आप सीमा का कमरा खोल कर देख लो. बच्चे का जरूरी सामान तो अभी ले जाओ, बाकी सामान जब जी चाहे ले जाना. उस के बाद ही मैं कमरा किसी और को किराए पर दूंगी.’’

उस ने सीमा का कमरा खोला. कमरे में खास सामान नहीं था. बस, जरूरी सामान था. बच्चे का सामान और सीमा का पर्स व मोबाइल ले कर वह आंटी को फिर आने को कह कर घर चल पड़ी.

सारे रास्ते सोचती रही कि धीरज ने उस के साथ कितना बड़ा धोखा किया. दूसरी शादी रचा ली और बच्चा तक पैदा कर लिया. जब खुद उस ने दूसरी शादी के लिए कहा था तब कितनी वफादारी दिखा रहा था. ऐसे दोहरे व्यक्तित्व वाले इंसान के प्रति उस का मन घृणा से भर गया.

घर आ कर उस ने सब से पहले सीमा का पर्स चैक किया. पर्स में थोड़ेबहुत रुपए, दांतों के डाक्टर का परचा और थोड़ाबहुत कौस्मैटिक का सामान था. पैनकार्ड और आधारकार्ड से पता चला कि सीमा धीरज के ही शहर की थी. इस का मतलब धीरज शादी के पहले से ही सीमा को जानता था और उस का प्रेमप्रसंग काफी पुराना था.

फिर उस ने सीमा का मोबाइल चैक किया. वालपेपर पर सीमा, धीरज और बच्चे का फोटो लगा था.

व्हाट्सऐप पर काफी मैसेज थे जो डिलीट नहीं किए गए थे.

‘‘सीमा, इतने सालों बाद तुम मुझे मैट्रो में मिली. मुझे अच्छा लगा. लेकिन यह जान कर दुख हुआ कि तुम्हारा पति से तलाक हो चुका है.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारे घर नहीं आऊंगा क्योंकि अब मैं शादीशुदा हूं और अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं. वैसे भी तुम अकेली रहती हो, मुझे देख कर तुम्हारी मकानमालकिन आंटी क्या सोचेंगी?’’

‘‘तुम ने आंटी को अपना परिचय मेरे पति के रूप में दिया, यह मुझे अच्छा नहीं लगा.’’

‘‘हमारे बीच जो कुछ क्षणिक आवेश में हुआ, उस के लिए मैं तुम से माफी चाहता हूं और अब मैं तुम से कभी नहीं मिलूंगा.’’

‘‘क्या? मैं पिता बनने वाला हूं.’’

‘‘सीमा, प्लीज जिद छोड़ दो, मैं शोभा को तलाक नहीं दे सकता. मैं

उसे सचाई बता दूंगा. वह स्वीकार कर लेगी. उस का दिल बहुत बड़ा है. हम सब साथ रहेंगे. हमारे बच्चे को 2-2 मांओं का प्यार मिलेगा.’’

‘‘सीमा, मुझे अपने बच्चे से मिलने दो. उस के बिना मैं मर जाऊंगा.’’

इस के अलावा औरों के भी मैसेज थे. तभी अचानक सीमा के मोबाइल की घंटी बजी. उस ने तुरंत रिसीव किया, ‘‘कौन?’’

‘‘कौन की बच्ची? इतने दिनों से फोन लगा रही हूं. हर बार तेरी खड़ूस आंटी उठाती है और कहती है कि तू अभी तक वापस नहीं आई. क्या बात है? मथुरा में शादी कर के वहीं से हनीमून मनाने भी निकल गई.’’

शोभा चुप रही. बस, ‘‘हूं’’ कहा.

‘‘अच्छा, व्यस्त है हनीमून में. वैसे सीमा, यह ठीक ही रहा वरना धीरज तो तुझे अपने घर में अपनी बीवी की नौकरानी बना कर रख देता. तेरा बच्चा भी तेरा अपना नहीं रहता. बच्चे से न मिलने देने की धमकी सुन कर आ गया न लाइन पर. मेरा यह आइडिया कामयाब रहा. अब मंदिर में तू ने शादी तो कर ली है लेकिन ऐसी शादी कोई नहीं मानेगा, इसलिए बच्चे को ढाल बना कर जल्दी से जल्दी धीरज को अपनी बीवी से तलाक के लिए राजी कर.’’

‘‘हांहां,’’ शोभा ने अटकते स्वर में कहा.

‘‘हांहां मत कर, पार्टी की तैयारी शुरू कर. मैं अगले हफ्ते ही दिल्ली आ रही हूं औफिस के काम से.’’

‘‘ठीक है,’’ कहते हुए शोभा ने फोन काट दिया.

धीरज के प्रति उस के मन में जो गलत भाव आ गए थे, वे एक पल में धुल गए. सच में धीरज ने एक पति होने के नाते उसे पूरा मानसम्मान और प्रेम दिया. वह धीरज पर गौरवान्वित हो उठी. धीरज की निशानी नन्हें आर्यन को पा कर उस का तनमन महक उठा. उस ने उसे कस कर सीने से लगा लिया और बरसों से सहेजा ममता का खजाना उस पर लुटा दिया.

उस के अनुभवी पिता ने सत्य ही कहा था कि धीरज जैसे समझदार इंसान ने भविष्य के लिए कुछ न कुछ जरूर किया होगा. वास्तव में उस ने अपनी जिंदगी की एक महत्त्वपूर्ण पौलिसी करा ही दी थी जो शोभा का सुरक्षित भविष्य बन गई थी. बीमा कंपनी की टैग लाइन ‘जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी’ को सार्थक कर दिया था धीरज ने. वह जिंदगी में शोभा के साथ था और जिंदगी के बाद भी उस के साथ है नन्हें आर्यन के रूप में. Hindi Story.

Social Story: हम बिकाऊ नहीं- रामनाथ फाइल देखकर क्यों चौक गया?

Social Story:  ‘‘सर,आज उस औनलाइन कंपनी में आप की मीटिंग है. उस के बाद दोपहर का खाना कंपनी के स्टाफ के साथ. हमारे गहनों को उन की वैबसाइट में डालने के सिलसिले में आज आप सौदा पक्का कर रहे हैं और दस्तखत भी करेंगे. यही आज का आप का प्रोग्राम है,’’ रामनाथ के निजी सचिव दया ने उन की डायरी को देख कर कहा और फिर संबंधित फाइल उन्हें दे दी.

रामनाथ ने उस फाइल को देख कर पूछा, ‘‘उस औनलाइन कंपनी की तरफ से कौन आ रहा है?’’ यह सवाल पूछते ही उन के मन में एक अजीब सा एहसास हुआ.

‘‘सर, पहले दिन से ही उस कंपनी की तरफ से हम से बातचीत करती आ रही वह लड़की प्रिया ही आएगी सौदा पक्का करने.’’

यह सुनते ही रामनाथ के मन में खुशी फैल गई. न जाने क्यों जब से प्रिया को पहली बार देखा या तब से रामनाथ का मन उस के प्रति आकर्षित हो गया था.

जब रामनाथ ने यह तय किया था कि वे एक अंतर्राष्ट्रीय औनलाइन कंपनी के साथ मिल कर अपने गहनों के व्यापार को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे तो 1 महीना पहले जब दया ने कहा था कि उस कंपनी की ओर से एक लड़की आई है तो रामनाथ ने उसे हलके में लिया था.

रामनाथ उस शहर के ही नहीं, बल्कि देश के सब से बड़े व्यवसायियों में से एक थे. उन की वार्षिक आय करोड़ों में थी. उन के कई सारे कारोबार हैं जैसे सैटेलाइट टीवी, दैनिक और मासिक पत्रिकाएं, सोने, हीरे और प्लैटिनम के गहने तैयार कर अपने ही शोरूम में बेचना, 3-4 फाइवस्टार होटल, रियल ऐस्टेट. खासकर उन के गहने ग्राहकों के बीच बहुत लोकप्रिय थे. यह देख कर रामनाथ ने अपने कारोबार को और आगे बढ़ाने के लिए औनलाइन व्यापार में दाखिल होने का निर्णय लिया. उसी सिलसिले में उस अंतर्राष्ट्रीय कंपनी की ओर से प्रिया को पहली बार देखा था.

रामनाथ की आयु लगभग 50 साल थी. लंबा कद, सांवला रंग. उसी उम्र के अन्य लोगों की तरह तोंद नहीं. संक्षिप्त में कहें तो कोई भी उन्हें न तो सुंदर और न ही बदसूरत कह सकता था. अपने माथे पर कुमकुम का टीका लगाते थे और यह कुमकुम ही उन की अलग पहचान बन गई.

रामनाथ ने दया से कहा, ‘‘अंदर भेजो उस लड़की को,’’ और फिर फाइल में मग्न हो गए.

तभी सुरीली आवाज आई, ‘‘मे आई कम इन सर?’’

सुन कर फाइल से नजरें हटा कर आवाज की दिशा की ओर देखा. वहां सामने 22-23 उम्र की एक लड़की मुसकराती नजर आई. उसे देख कर रामनाथ की भौंहें खिल उठीं, फिर तुरंत खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘कम इन’’ और फिर फाइल बंद कर दी.

लड़की लंबे कद की थी. आज के जमाने की युवतियों की तरह एक चुस्त जीन्स और स्लीवलैस ढीला टौप पहने थी. वातानुकूलित कमरे में बड़े ही अंदाज के साथ अंदर आई. हाथ में एक लैपटौप था. बाल कटे थे, कलाई पर महंगी घड़ी और कीमती फ्रेमवाले चश्मे के अलावा और कोई गहना नहीं था. उसे देख रामनाथ ने एक पल को सोचा कि इस लड़की को सुंदर बनाने के लिए किसी अन्य चीज की जरूरत ही नहीं है.

‘‘मैं हूं प्रिया. मैं अपनी अंतर्राष्ट्रीय कंपनी की ओर से आप से सौदा पक्का करने आई

हूं. मैं अपने बारे में कुछ कहना चाहती हूं. आईआईएम, अहमदाबाद से एमबीए खत्म करने के बाद कैंपस इंटरव्यू में इस कंपनी ने मुझे चुना. पिछले 6 महीनों से यहीं काम कर रही हूं. यह है मेरा बिजनैस कार्ड,’’ कह प्रिया ने रामनाथ से हाथ मिलाया.

उस का हाथ बहुत ही कोमल था. उस की आवाज में रामनाथ को एक संगीत सा लगा. जब लड़की अपनी कुरसी पर बैठी तो ऐसा लगा कि पूरा कमरा ही नूर से भर गया हो.

प्रिया ने अपनी कंपनी के बारे में बहुत कुछ कहा. अकसर इस तरह के सौदे को रामनाथ बस 1-2 मिनट बात कर के अपने किसी चुनिंदा अधिकारी को उस सौदे की जिम्मेदारी सौंप देते थे. मगर न जाने क्यों इस बार उन्होंने ऐसा नहीं किया. 20 मिनट की बातचीत के बाद प्रिया अपनी कुरसी से उठ कर बोली, ‘‘सर आप से मिल कर बेहद खुशी हुई. इस सौदे को आगे ले चलने के लिए आप अपनी कंपनी की ओर से अपने किसी भरोसेमंद अधिकारी को मुझ से मिलवाइएगा.’’

यह सुन कर रामनाथ ने कहा, ‘‘नहीं, इस मामले को मैं खुद संभालना चाहता हूं. लीजिए यह मेरा कार्ड, रात 9 बजे के बाद फोन कीजिएगा. आमतौर पर मैं उस समय अपने दफ्तर का काम बंद कर देता हूं. तब हम आराम से बात कर सकते हैं.’’

यह सुन कर प्रिया को ताज्जुब हुआ और उस के चेहरे में यह आश्चर्य साफ नजर आया और उस ने आधुनिक अदा में अपने कंधों को उठा कर नीचे कर के इसे प्रकट भी किया.

उस पहली मुलाकात के बाद 2 बार दोनों मिले. 3-4 बार फोन पर भी बात हुई. रामनाथ को पता नहीं था, मगर उन का मन अपनेआप उस लड़की की ओर चला गया. उन की निरंतर गर्लफ्रैंड कोई नहीं. काम हो जाने के बाद उसी वक्त पैसा दे कर मामले को रफादफा करने की आदत है उन में. किसी को रखनेबनाने की दिलचस्पी नहीं है उन में. उन के मुताबिक ऐसा करना बेवकूफी है और कोई भी औरत उन के लायक नहीं है. औरतों के लिए इतना ही आदर है उन के मन में. औरतों को आम की तरह चूसना और उस के बाद फेंकना रामनाथ यही करते आए आज तक. उन का मानना है कि पैसा फेंक कर किसी को भी खरीद सकते हैं. बस अंतर इतना ही कि कौन कितना मांग रही है.

ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि  उन्होंने प्रिया को भी उसी नजरिए से देखा हो. प्रिया की कोमलता और सुंदरता उन के मन को विचलित कर रही थी. ऊपर से उस लड़की के चालचलन और अकलमंदी ने रामनाथ के मन को पागल ही बना दिया. उन्होंने उस लड़की को किसी न किसी प्रकार हासिल करने की मन ही मन ठान ली.

‘उस दिन सौदा पक्का कर दस्तखत करने के बाद उस लड़की को लंच पर ले

जाऊंगा तो उस लड़की की कमजोरी का पता चल जाएगा जिस से काम आसानी से हो जाएगा,’ सोच कर रामनाथ के चेहरे पर मुसकराहट फैल गई और फिर उस पल का बेसब्री से इंतजार

करने लगे.

उस दिन उन के अपने फाइवस्टार होटल के डाइनिंगहौल के मंद प्रकाश में प्रिया और भी सुंदर लगी. प्रिया ने एक ऐसा टौप पहना थी कि उस के प्रति रामनाथ का आकर्षण और बढ़ता गया. बहुत प्रयास कर के अपने जज्बातों को काबू में रखा.

‘‘हाउ कैन आई हैल्प यू सर,’’ विनम्र भाव से पूछा वेटर ने.

रामनाथ ने अपने लिए एक कौकटेल का और्डर दिया.

फिर वेटर ने प्रिया से पूछा, ‘‘ऐंड फौर द लेडी सर,’’

सुनते ही प्रिया ने बेझिझक कहा, ‘‘गौडफादर फौर मी.’’

इस नाम को सुनते ही रामनाथ चौंक गए. यह लड़की इतना सख्त कौकटेल पीएगी, वे सोच भी नहीं सकते थे कि इतनी छोटी उम्र की लड़की ऐसा कौकटेल पी सकती है जो आदमी पर भी भारी पड़ सकता है.

कौकटेल आने के बाद दोनों पीने लगे. रामनाथ सोच रहे थे कि बात

कैसे शुरू की जाए. तभी प्रिया खुद बोली, ‘‘जी रामनाथ… हम ने डील साइन करा दी. मेरा काम यहीं तक है. इस के आगे हमारी कंपनी की तरफ से कोई और आएगा,’’ कहते वह बड़ी अदा के साथ कौकटेल पीने लगी. उस के पीने का अंदाज देख कर यह स्पष्ट हुआ कि यह लड़की इसे अकसर पीती है.

एक राउंड के बाद रामनाथ ने प्रिया के हाथ पकड़ कर उस के चेहरे को गौर से देखा ताकि उस की भावना को समझ सकें. प्रिया ने धीरे से रामनाथ के हाथों को हटा कर उन की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘तो रामनाथ आप मेरे साथ सोना चाहते हैं?’’

प्रिया का यह सवाल सुन कर रामनाथ हैरान रह गए. उन की जिंदगी में प्रिया पहली लड़की है जो इस तरह सीधे मुद्दे पर आई. इतनी छोटी उम्र में इतनी हिम्मत… रामनाथ को सच में एक झटका सा लगा.

गौडफादर को सिप करते हुए प्रिया बोली, ‘‘मैं इतनी भी भोली नहीं हूं कि आप का इरादा न समझ सकूं… पहले दिन ही मुझे पता चल गया था कि आप के मन में क्या चल रहा है… आप जैसे बड़ेकारोबारी मुझ जैसी चुटकी लड़कियों के साथ व्यवसाय के मामले में बात नहीं करते और इस काम को अपने किसी अधिकारी को ही देते लेकिन आप ने ऐसानहीं किया. और तो और आप अपना पर्सनल कार्ड भी मुझे दे कर मुझ से बात करने लगे… और यह लंच मेरी जैसी एक मामूली लड़की के साथ… मैं बेवकूफ नहीं हूं. आप के मन में क्या चल रहा है यह आईने की तरह मुझे साफ दिख रहा है. इट इज ओब्वियस… आप को कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं.’’

रामनाथ सच में अवाक रह गए थे. उन्होंने अब तक कई लड़कियों को अपने जाल में फंसा लिया था, मगर किसी लड़की में इस तरह बात करनेझ्र की जुर्रत होगी यह उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था.

अपने कोमल हाथों से कांच के गिलास को इधरउधर घुमा कर प्रिया ही बोली, ‘‘मेरा इस तरह सीधे मुद्दे पर आना आप को चौंका गया पर गोलगोल बातें करना मेरी आदत ही नहीं… मेरे खयाल से आप का यह इरादा गलत नहीं है… आप ने अपने मन की इच्छा प्रकट की और अब अपनी राय बताने की मेरी बारी है.’’

‘‘सच कहूं तो मुझे कोई एतराज नहीं, मगर मेरी कुछ शर्तें हैं, जिन्हें आप को मानना पड़ेगा. जब बात जिस्म की होती है तो दोनों तरफ से एक लगाव का होना जरूरी है. मेरी खूबसूरती खासकर मेरा यौवन आप को मेरी ओर आकर्षित कर गया, मगर आप को अपने करीब आने की मंजूरी देने के लिए आप में ऐसा क्या है, जब मैं ने सोचा तो पता चल ही गया पैसा… बहुत ज्यादा पैसा जो मेरे पास नहीं है… वह पैसा जिसे पाने का जनून है मुझ में.’’

रामनाथ ने प्रिया की ओर देख कर कहा, ‘‘क्या तुम यह चाहती हो कि मैं तुम से शादी करूं?’’

रामनाथ की बात सुन कर प्रिया जोर से हंसने लगी. उस की हंसी से यह

साफ दिख रहा था कि उस के अंदर के गौडफादर ने अपना काम करना शुरू कर दिया है.

‘‘ओ कमऔन आप इतने बेवकूफ कैसे बन सकते हैं… शादी और आप से सच में आप मजाक ही कर रहे होंगे. आप किस जमाने में जी रहे हैं… शादी के बारे में तो मैं दूरदूर तक नहीं सोच सकती. अभीअभी मैं ने आप से कहा कि आप के पास मुझे आकर्षित करने वाली सिर्फ एक ही चीज है और वह है पैसा और आप मुझे अपने साथ रिश्ता जोड़ने की बात कर रहे हैं. हाउ द हेल कैन यू थिंक लाइक दिस?’’

‘‘आज की दुनिया में हम जैसी युवतियों का जीना ही मुश्किल है. हमारे आगे बहुत सारी चुनौतियां हैं, हमारी नौकरी में भी ढेर सारी दिक्कतें हैं. आप लोगों को इस के बारे में पता नहीं. अगर हम अमेरिका जाएं तो वहां भी जिंदगी आसान नहीं है. इन सभी कठिनाइयों को दूर करने का एक ही रास्ता है पैसा… बहुत सारा पैसा.’’

प्रिया क्या कहना चाहती है, रामनाथ को सच में पता नहीं चला.

‘‘मैं आप के इस प्रस्ताव को मानती हूं, मगर इस के बदले में आप अन्य औरतों को जिस तरह 3 या 4 लाख फेंकते हैं वे मेरे लिए पर्याप्त नहीं. आप के बारे में बहुत सारे अध्ययन करते समय मुझे पता चला कि आप के सभी कारोबारों में यह सोने और हीरे का व्यवसाय बहुत ही लाभदायक है. मैं आप के सामने 2 विकल्प रखती हूं. आप इस व्यवसाय को मेरे नाम कर दीजिए वरना आप के कारोबारों में जिन 3 बिजनैस को मैं चुनती हूं उन में मुझे 51% भागीदारी बनाइए और उस के बाद हमारा रिश्ता शुरू.

‘‘हां, यह मत समझना कि पैसे देने से आप मुझ पर किसी प्रकार का हुकम चला सकते हैं. हर महीने सिर्फ 10 दिन हम इस फाइवस्टार होटल में 1 घंटे के लिए मिल सकते हैं, बस. अगर आप को यह डील मंजूर है तो मुझे फोन कर दीजिएगा वरना अलविदा,’’ और फिर प्रिया अपना हैंडबैग ले कर वहां से चली गई.

रामनाथ का सारा नशा उतर गया. लौटती प्रिया को एकटक देखते रह गए. एक पल को पता ही नहीं चला कि वे भारत में हैं या किसी पश्चिमी देश में.

होटल से बाहर आई प्रिया को नशे की वजह से चक्कर आने लगा तो

अपनेआप को संभालने की कोशिश करने लगी तभी एक गाड़ी उस के पास आ कर रुकी. गाड़ी से एक हाथ बाहर आया और फिर प्रिया को

खींच कर गाड़ी में बैठा लिया. वह और कोई नहीं प्रिया का जिगरी दोस्त रोशन था. कुछ दूर चलने के बाद गाड़ी को किनारे खड़ा कर उस ने प्रिया के चेहरे पर पानी के छींटे मारे और फिर एक बोतल नीबू पानी पीने को दिया. नीबू पानी पीते ही प्रिया उलटी करने लगी. कुछ देर में होश में आ गई.

‘‘बहुत खूब प्रिया. जैसे हम ने योजना बनाई थी बिलकुल उसी तरह तुम ने बोल कर उस आदमी को अच्छा सबक सिखाया. अच्छा हुआ कि तुम ने उस के मंसूबे को सही वक्त पर पहचान लिया और उस कामुक व्यक्ति को अपनी औकात दिखा दी. उस जैसे आदमी यह सोचते हैं कि अपने पैसों, शान, शोहरत, रुतबे आदि से किसी भी लड़की को अपने बिस्तर तक ले जा सकते हैं.

‘‘उन के मन में औरत के लिए इज्जत नहीं. उन के लिए औरत एक खिलौना है, जिस के साथ मन चाहे समय तक खेले और फिर चंद रुपए दे कर फेंक दिया. यह लोग इंसान के रूप में समाज में भेडि़यों की तरह औरत को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं. वह अब हैरान हो कर बैठा होगा और समझ गया होगा कि औरत बिकाऊ नहीं है. उस की संकीर्ण सोच पर पड़ा पर्दा हट गया होगा.’’

प्रिया के थके चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट फैल गई जो औरत की जीत की मुसकराहट थी. Social Story.

Hindi Romantic Story: मौसमी बुखार- पति का प्यार माधवी के लिए क्या?

Hindi Romantic Story: ‘‘उठो भई, अलार्म बज गया है,’’ कह कर पत्नी के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना राकेश ने फिर करवट बदल ली. चिडि़यों की चहचहाहट और कमरे में आती तेज रोशनी से राकेश चौंक कर जाग पड़ा, ‘‘यह क्या तुम अभी तक सो रही हो? मधु…मधु सुना नहीं था क्या? मैं ने तुम्हें जगाया भी था. देखो, क्या वक्त हो गया है? बाप रे, 8…’’

जल्दी से राकेश बिस्तर से उठा तो माधवी के हाथ से अचानक उस का हाथ छू गया, वह चौंक पड़ा. माधवी का हाथ तप रहा था. माधवी बेखबर सो रही थी. राकेश ने एक चिंता भरी नजर उस पर डाली और सोचने लगा, ‘यदि मौसमी बुखार ही हो तो अच्छा है, 2-3 दिन में लोटपोट कर मधु खड़ी हो जाएगी. अगर कोई और बीमारी हुई तो जाने कितने दिन की परेशानी हो जाए,’ सोचतेसोचते राकेश बच्चों को जगाने पहुंचा.

चाय बना कर माधवी को जगाते हुए राकेश बोला, ‘‘उठो, मधु, चाय पी लो.’’

माधवी ने आंखें खोलीं, ‘‘क्या समय हो गया? अरे, 9. आप ने मुझे जगाया नहीं. आज बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे?’’

राकेश मुसकरा कर बोला, ‘‘बच्चे तो स्कूल गए, तुम क्या सोचती हो, मैं कुछ कर ही नहीं सकता. मैं ने उन्हें स्कूल भेज दिया है.’’

‘‘टिफिन?’’

‘‘चिंता न करो. टिफिन दे कर ही भेजा है.’’

माधवी को खुशी भी हुई और अचंभा भी कि राकेश इतने लायक कब से बन गए? वह सोई रह गई और इतने काम हो गए.

राकेश पुन: बोला, ‘‘मधु और बिस्कुट लो, तुम्हें बुखार लगता है. यह रहा थर्मामीटर. बुखार नाप लेना. अब दफ्तर जा रहा हूं.’’

‘‘नाश्ता?’’

‘‘कर लिया है.’’

‘‘टिफिन?’’

‘‘जरूरत नहीं, वहीं दफ्तर में खा लूंगा. यह दवाइयों का डब्बा है, जरूरत के मुताबिक गोली ले लेना,’’ एक सांस में कहता हुआ राकेश कमरे से बाहर हो गया.

पर दूसरे ही पल फिर अंदर आ कर बोला, ‘‘अरे, दूध तो गैस पर ही चढ़ा रह गया,’’ शीघ्र ही राकेश थर्मस में दूध भर कर माधवी के पास रखते हुए बोला, ‘‘थोड़ी देर बाद पी ले.’’

राकेश के जाते ही माधवी सोचने लगी, ‘इतनी चिंता, इतनी सेवा,’ फिर भी खुश होने के बजाय उस का मन भारी होता जा रहा था, ‘इतना भी नहीं हुआ कि माथे पर हाथ रख कर देख लेते. खुद बुखार नाप लेते तो लाट- साहबी पर धब्बा लग जाता? कितने मजे से सब संभाल लिया. वही पागल है जो सोचती रहती है कि उस के बिना सब को तकलीफ होगी. दिन भर जुटी रहती है सब के आराम के लिए. देखो, सब हो गया न? उस के न उठने पर भी सब काम हो गया? वह सवेरे 6 से 9 बजे तक चकरघिन्नी बन कर नाचती रहती है और सब उसे नचाते रहते हैं. आज तो सब को सबकुछ मिल गया न? लगता है सब जानबूझ कर उसे परेशान करते हैं.’

सोचतेसोचते माधवी का सिर दुखने लगा. चाय के साथ एक गोली सटक कर वह फिर लेट गई. झपकी आई ही थी कि बिन्नो की आवाज से नींद खुल गई, ‘‘बहूजी, आज दरवाजा कैसे खुला पड़ा है? अरे, लेटी हो. तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

माधवी की आंखें छलछला आईं, ‘‘बिन्नो, जरा देखना, स्नानघर में कपड़े पड़े होंगे. धो देना. गीले कपड़े मेरी छाती पर बोझ बढ़ाते हैं. सब यह जानते हैं पर कपड़े ऐसे ही फेंक गए होंगे.’’

बिन्नो ने स्नानघर से ही आवाज लगाई, ‘‘बहूजी, स्नानघर एकदम साफ है. यहां तो एक भी कपड़ा नहीं.’’

‘क्या एक भी कपड़ा नहीं?’ विस्मय से माधवी ने सोचा. उस की मनोस्थिति ऐसी हो रही थी कि राकेश और बच्चों के हर कार्य से उसे अपनेआप पर अत्याचार होता ही महसूस हो रहा था.

बिन्नो ने काम खत्म कर के उस का सिर और हाथपैर दबा दिए. माधवी कृतज्ञता से भर गई, ‘घर वालों से तो महरी ही अच्छी है. बेचारी कितनी सेवा करती है, अब की दीवाली पर इसे एक अच्छी सी साड़ी दूंगी.’

कुछ तो हाथपैर दबाए जाने से और कुछ दवा के असर से दर्द कम हो गया था. इसलिए माधवी दोपहर तक सोती ही रही.

अचानक ही आंखें खुलीं तो प्रिय सखी सुधा को देख माधवी आश्चर्यमिश्रित खुशी से भर गई, ‘‘तू आज अचानक कैसे?’’

सुधा ने हंस कर कहा, ‘‘मन ने कहा और मैं आ गई,’’ सुधा सुरीले स्वर में गुनगुनाने लगी, ‘‘दिल को दिल से राह होती है. तू बीमार पड़ी है, अकेली है, कितने सही समय पर मैं आई हूं.’’

माधवी कुछ बोले बिना एकटक सुधा को देखती रही. फिर उस की आंखें छलछला आईं. सुधा ने अचरज से पूछा, ‘‘अरे, क्या हुआ?’’

भीगे हुए करुण स्वर में अपने दिन भर के विचारबिंदु एकएक कर सुधा के सामने परोस दिए माधवी ने. स्वार्थी राकेश और बच्चों के किस्से, उस की सेवाटहल में की गई कोताही, जानबूझ कर उस से फायदा उठाने के लिए की गई लापरवाहियों के किस्से, उदाहरण सब सुनाते हुए अंत में न चाहते हुए भी माधवी के मुंह से वह निकल गया जो उसे सवेरे से परेशान किए था, ‘‘देखो न, मेरे बिना भी तो सब का काम होता है. मेरी इन लोगों को जरूरत ही क्या है? सवेरे 6 से 9 बजे तक चकरघिन्नी की तरह नाचती हूं. मुझ से तो राकेश ज्यादा कार्यकुशल है, सुबह फटाफट बच्चों को स्कूल भेज दिया.’’

सुधा मुंह दबा कर मुसकान रोक रही थी. उस पर नजर पड़ते ही  माधवी भभक उठी, ‘‘तुम हंस रही हो? हंसो, मैं ने बेवकूफी में जो इतने साल गंवाएं हैं, उन के लिए तुम्हारा हंसना ही ठीक है.’’

सुधा ठहाका लगा कर हंस पड़ी, ‘‘सच मधु, तुम बहुत भोली हो,’’ फिर गंभीर होते हुए समझाने लगी, ‘‘क्या मैं अपनेआप आ गई हूं? राकेश भैया ने ही मुझे फोन किया था कि आप की मित्र बहुत बीमार है, कृपया दोपहर में उन्हें देख आइएगा. जरूरत पड़े तो डाक्टर को दिखा दीजिए.’’

‘‘अब यही बचा है? मेरी बीमारी का ढिंढ़ोरा सारे शहर में पीटना था. खुद नहीं दिखा सकते थे डाक्टर को? डाक्टर की बात छोड़ो, माथा तक छू कर नहीं देखा. क्या पहले कभी मुझे छुआ नहीं?’’

सुधा हंस कर बोली, ‘‘खुद छुआ है भई, इस में क्या शक है? पर मधु इतना गुस्सा केवल इसीलिए कि माथा छू कर बुखार नहीं देखा? तुम्हें डाक्टर को दिखाने के लिए क्या वे बिना छुट्टी लिए घर बैठ जाते? तुम्हीं सोचो जो काम तुम 3 घंटे में करती हो, बेचारे ने इतनी जल्दी कैसे किया होगा?’’

‘‘यही तो बात है, मेरी उन्हें अब जरूरत ही नहीं. इतने कार्यकुशल…’’

‘‘खाक कार्यकुशल,’’ सुधा गुस्से से बोल पड़ी, ‘‘तुम्हारे आराम के लिए खुद कितनी परेशानी उठाई उन्होंने? इस में तुम्हें उन का प्यार नहीं दिखता? अच्छा हुआ, मैं आ गई. डाक्टर से ज्यादा तुम्हें मेरी जरूरत थी. ऐसा करो, आंखों से गुस्से की पट्टी उतार कर देखो चुपचाप. आंखें खुली, जबान बंद. सब पता लग जाएगा कि सचाई क्या है और उन लोगों को तुम्हारी कितनी जरूरत है? तुम्हारी चिंता कम करने के लिए ही वे सब तुम्हारी देखभाल कर रहे हैं.’’

माधवी को सुधा की बातें कुछ समझ आईं, कुछ नहीं पर उस ने तय किया कि जबान बंद और आंखें खुली रख कर देखने की कोशिश करेगी. शाम को एकएक कर सब घर लौटे. पहले बच्चे, फिर राकेश. उस ने आते ही पूछा, ‘‘क्या हाल है? बिन्नो आई थी? दवा ली?’’

‘‘हां, एक गोली ली थी,’’ माधवी ने धीरे से कहा.

ठीक है, आराम करो. और कोई तो नहीं आया था?’’

‘‘नहीं तो. किसी को आना था क्या?’’

‘‘नहीं भई, यों ही पूछ लिया.’’

‘‘हां, याद आया, सुधा आई थी,’’ माधवी बोली. सुनते ही राकेश के चेहरे पर इतमीनान झलक उठा. वह उत्साह से बोला, ‘‘चलो बच्चो, दू पी लो. फिर हम सब खिचड़ी बनाएंगे.’’

गुडि़या सोचते हुए बोली, ‘‘पिताजी, हमें खिचड़ी बनानी तो आती नहीं है.’’

‘‘अच्छा, तो क्या बनाना आता है?’’

गुडि़या चुप हो गई क्योंकि उसे तो कुछ भी बनाना नहीं आता था. उसे देख कर सब हंसने लगे.

राकेश उत्साहपूर्वक बोला, ‘‘चलो, हम सब मिल कर बनाएंगे. तुम्हारी मां आराम करेंगी.’’

रसोई से आवाजें आ रही थीं. माधवी सुन रही थी, ‘‘पिताजी, चावलदाल बीनने होंगे?’’

‘‘नहीं बेटा, धो कर काम चल जाएगा.’’

‘‘पर पिताजी मां तो शायद बीनती भी हैं.’’

‘‘शायद न? तुम्हें पक्का तो नहीं मालूम?’’

माधवी का मन हुआ कि चिल्ला कर बता दे, ‘चावल, दाल बीने जाएंगे,’ पर फिर सोचा, ‘हटाओ, कौन उस से पूछने आ रहा है जो वह बताने जाए?’

खिचड़ी बन कर आई. राकेश ने पहली प्लेट उसी को पेश की. पहला चम्मच मुंह में डालते ही कंकड़ दांतों के नीचे बज गया. सब एकदूसरे का मुंह ताकने लगे. दोचार कौर के बाद राकेश ने खिसियाते हुए कहा, ‘‘कंकड़ हैं खिचड़ी में.’’

पप्पू बोला, ‘‘पिताजी, कहा था न कि चावल, दाल बीनने पड़ेंगे.’’

‘‘चुप, पिताजी क्या रोज बनाते हैं? जैसा मालूम था बेचारों को वैसा बना दिया,’’ गुडि़या पप्पू को घूरते हुए बोली.

‘‘बेटा, डबलरोटी खा लो,’’ राकेश ने धीरे से कहा.

‘‘पिताजी, सवेरे से बस डबलरोटी ही तो खा रहे हैं. नाश्ते में, टिफिन में, दूध के साथ, अब फिर?’’ पप्पू गुस्से से बोला. गुडि़या बिगड़ कर बोली, ‘‘तू एकदम बुद्धू है क्या? मां इतनी बीमार हैं, एक दिन डबलरोटी खा कर तू दुबला हो जाएगा? पिताजी ने भी सवेरे से क्या खाया है? कितने परेशान हैं?’’

गुडि़या की इस बात से कमरे में  सन्नाटा छा गया. सब अपनीअपनी प्लेटों के सामने चुप बैठे थे.

पप्पू अपनी प्लेट छोड़ कर उठा और मां की बगल में लेटता हुआ बोला, ‘‘मां, आप कब ठीक होंगी? जल्दी ठीक हो जाइए, कुछ सही नहीं चल रहा है.’’

गुडि़या मां का सिर दबाते हुए बोली, ‘‘अभी चाहें तो और आराम कर लीजिए, हम लोग काम चला लेंगे.’’

राकेश ने माधवी का माथा छू कर कहा, ‘‘अब लगता है, बुखार कम है.’’

माधवी आनंद की लहरों में डूबती उतराती उनींदे स्वर में बोली, ‘‘तुम सब जा कर होटल से खाना खा आओ.’’

‘‘और तुम?’’ राकेश के प्रश्न के जवाब में असीम तृप्ति से उस का हाथ अपने माथे पर दबा कर माधवी ने कहा, ‘‘मैं अब सोऊंगी.’’ Hindi Romantic Story.

Family Story: विराम- क्या मोहिनी अपने पति को भूल पाई?

Family Story: आज महेश सुबह बिना नहाएधोए ही उपन्यास पढ़ने बैठ गया. यकायक उस की नजर एक शब्द पर आ कर रुक गई और चेहरे का उजास उदासी में बदल गया. ‘उस का’ नाम उपन्यास की एक पंक्ति में लिखा हुआ था. उदास मन से वह सोचने लगा कि आज मोहिनी को उस से बिछड़े हुए एक अरसा हो गया और आज उस का नाम इस तरह से क्यों उस के मन में दस्तक दे रहा है? यह मात्र संयोग है या और कुछ? वैसे तो एक जैसे हजारों नाम होते हैं मगर महेश ने लंबे समय से उस का नाम कहीं पढ़ासुना नहीं था, तो इस प्रकार की बेचैनी स्वाभाविक थी. अचानक ही उस का बेचैन मन उस से मिलने की हूंक भरने लगा. मगर यह इतना आसान कहां था? उस ने दिल की इस अभिलाषा को पूरा करने का काम दिमाग को सौंप दिया. उस को अपने रणनीति विशेषज्ञ दिमाग पर पूरा भरोसा था.

महेश की एक कजिन थी विशाखा. विशाखा मोहिनी की पड़ोसिन थी. वह मोहिनी की खास सहेली थी मगर महेश कभी उस से मोहिनी के विषय में बात करने का साहस नहीं जुटा पाया. पर एक दिन बातोंबातों में ही उस ने विशाखा से मोहिनी के पति का नाम वगैरह जान लिया. फिर महेश ने मोहिनी के पति शाम को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. श्याम ने उस की रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली. उस की हसरतों को एक खुशनुमा ठहराव मिला. यहां से महेश और श्याम फेसबुकफ्रैंड बन गए. अब मिशन शुरू हो चुका था.

महेश श्याम की फेसबुक पोस्ट्स पर कमैंट्स या लाइक्स जरूर देता. अब लाइक और कमैंट की वजह से महेश और श्याम में जानपहचान भी हो चुकी थी. वैचारिक रूप से भी काफी करीब आ चुके थे दोनों.

एक दिन महेश ने श्याम से उस का पर्सनल नंबर मांगा, ‘‘मेरे सभी फेसबुक फ्रैंड्स का नंबर मेरे पास है. आप भी दे दें. कभी न कभी मुलाकात भी होगी.’’

इस पर श्याम ने कहा, ‘‘कभी हमारे शहर आना हो तो जरूर मिलिएगा. मुझे खुशी होगी.’’ महेश तो इसी मौके की तलाश में था. अगले हफ्ते सैकेंड सैटरडे था. महेश को वह दिन उपयुक्त लगा और उस दिन महेश उस के शहर पहुंच गया. उस ने मोहिनी के पति को कौल किया कि मैं अपनी कंपनी के किसी काम से आया हुआ था. सोचा आप से भी मिलता चलूं. आप कृपया अपना पता बता दें.’’ ‘‘आप वहीं रुकिए, मैं अभी पहुंचता हूं,’’ कह कर श्याम ने फोन रख दिया.

‘‘बस चंद मिनट का फासला है मेरे और मोहिनी के बीच,’’ महेश सोच रहा था. इसी मौके का तो बेसब्री से इंतजार कर रहा था वह. एक सपना सच होने जा रहा था. ‘‘उसे करीब से देखूंगा तो कैसा महसूस होगा, वह अब कैसी दिखती होगी, उस ने क्या पहना होगा…?’’ ढेर सारी अटकलों में घिरा उस का बावरा मन व्याकुल हुआ जा रहा था.

तभी श्याम उसे लेने आ गए. दोनों ने एकदूसरे के हालचाल पूछे. फिर वे महेश को ले कर अपने साथ अपने घर पहुंचे और पानी लाने के लिए अपनी पत्नी को आवाज दी.

अपने दिल की धड़कनों पर काबू करते हुए महेश ने दरवाजे की ओर आंखें गड़ा दी

थीं कि अब मोहिनी ही पानी ले कर आएगी. लेकिन पल भर में ही उम्मीदों पर पानी फिर गया. पानी नौकरानी ले कर आई. इतने में

श्याम बोले, ‘‘मैं ने आप की फेसबुक प्रोफाइल देखी है. आप तो राजनीति पर अच्छाखासा लिख लेते हैं.’’ ‘‘आप भी तो कहां कम हैं जनाब,’’ महेश ने हंसते हुए जवाब दिया.

फिर सिलसिला चल पड़ा चर्चाओं का… लोकल पौलिटिक्स, गांव और शहर की समस्या, आतंकवाद और न जाने क्याक्या. बातों ही बातों में महेश का स्वर एकदम से रुक गया. आंखें पथरा गईं. चेहरे पर सन्नाटा छा गया. सोफे और कुरसी की हलचल थम सी गई. श्याम महेश की भावभंगिमा परख तो पा रहे थे, मगर समझ नहीं पा रहे थे.

यह क्या? अपने हाथों में चाय की ट्रे पकड़े हुए वह महेश के सामने खड़ी थी. उस की आंखों में अनुराग की अकल्पनीय असीमता थी. उस का चेहरा चंचलता की स्वाभाविक आभा से अलौकित हो रहा था और उस के होंठों पर मधुरिमा मुसकान थी. महेश की रगों में उसे छूने की अतिउत्सुकता जाग उठी. उस का मन कर रहा था कि इसी पल उसे आलिंगनबद्ध कर ले. किंतु यह संभव नहीं था. वह ज्योंज्यों महेश के करीब आ रही थी त्योंत्यों महेश की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. ‘‘कैसे हो?’’ उस ने महेश को चाय का प्याला थमाते हुए पूछा.

‘‘मैं ठीक हूं और आप कैसी हो?’’ महेश ने पूछा. उस का जी और महेश का आप नाटकीयता का प्रकर्ष था.

मोहिनी ने कहा, ‘‘मैं भी ठीक हूं.’’ मोहिनी के पति आश्चर्य से दोनों का चेहरा देख रहे थे. उन के मन में उठते हुए भावों को मोहिनी पढ़ चुकी थी. इसलिए उस ने कहा, ‘‘अरे हां, मैं आप को बताना भूल गई, मैं इन को जानती हूं… मेरी जो सहेली है विशाखा, जिस से मैं ने आप को अपनी शादी में मिलवाया था, ये उस के कजिन हैं. इन से एकदो बार विशाखा के घर पर ही मुलाकात हुई थी. तभी से जानती हूं.’’

प्रेम अपने वास्तविक धरातल पर आ ही जाता है. महेश को यकीन नहीं हो रहा था और

शायद मोहिनी को भी. 2 प्रेमी आमनेसामने खड़े थे और महेश चाह कर भी उसे छू नहीं सकता था. दोनों के बीच अब समाज की दीवार थी. महेश श्याम से बात कर रहा था और कोशिश कर रहा था कि सब सही रहे. फिर भी महेश की आंखें उसी की चंदन सी काया को निहार रही थीं. ‘‘ढेर सारी बातें और किस्से हो गए. अब चलूंगा, आज्ञा दीजिए,’’ कह कर महेश जाने के लिए उठने लगा.

‘‘अरे, कहां जा रहे हो? खाना तैयार है. आप पता नहीं फिर कब आओगे,’’ श्याम ने कहा. एक अजब सी कशमकश थी मन में. महेश आत्मीय निवेदन ठुकराने का दुस्साहस नहीं कर सका और बैठ गया. महेश को जब भोजन परोसा जा रहा था तब वह रसोई से आतीजाती मोहिनी को बड़े ध्यान से देख रहा था और सोच रहा था, ‘‘कितनी खूबसूरत लग रही है… वैसे ही तेज कदमों से चलना, हाल बदले थे पर चाल वैसी ही थी… उस के हाथ का बना खाना बहुत स्वादिष्ठ था.’’

भोजन किया और निकलने लगा. फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘आप अपना नंबर दे दो. विशाखा को दे दूंगा. आप को बहुत मिस करती है.’’ मोहिनी ने पति की तरफ देखा और स्वीकृति मिलने पर नंबर दे दिया. इसी के साथ महेश की यह अंतिम इच्छा भी पूरी हो गई.

पूरी रात मोहिनी सोचती रही कि महेश उस का नंबर ले कर गया है तो कौल भी जरूर करेगा. महेश से कैसे मिले और कैसे उस को समझाए कि अब हालात बदल गए हैं? महेश उस को अगले दिन से ही फोन करने लगा. मोहिनी 4-7 दिन तक तो उस की कौल को अवौइड करती रही, पर बाद में महेश से बात करने का निश्चय किया.

महेश, ‘‘क्या इतनी पराई हो गई हो कि मिलने भी नहीं आ सकतीं?’’ मोहिनी, ‘‘अब मेरा नाम किसी और के नाम के साथ जुड़ चुका है.’’

महेश, ‘‘ये दूरियां जिंदगी भर की होंगी, ये सोचा न था.’’ मोहिनी, ‘‘तुम ही तो चाहते थे ऐसा. याद करो तुम ने ही कहा था कि यह मेरी गलतफहमी है. प्यार नहीं है तुम्हें मुझ से. और हो भी नहीं सकता. साथ ही यह भी कहा था कि मुझ से प्यार कर के कुछ नहीं पाओगी. क्यों अपनी जिंदगी खराब कर रही हो. अच्छा लड़का देखो और शादी कर के जाओ यहां से. मेरा क्या है.’’

महेश, ‘‘सब याद है मुझे,’’ कई बार जिंदगी में कुछ ऐसे फैसले करने पड़ते हैं कि आप चाह कर भी उन को बदल नहीं सकते. मेरे पास कुछ नहीं था उस समय तुम्हें देने के लिए, खोखला हो चुका था मैं.’’ मोहिनी, ‘‘ऐसा क्यों हुआ अब सोचने से कोई फायदा नहीं.’’

महेश, ‘‘तुम तो जानती हो मेरे मातापिता अपनी पसंद की लड़की से ही मेरा विवाह कराना चाहते थे. मां की जिद थी कि उन की सहेली की लड़की से ही मेरा विवाह हो.’’ मोहिनी, ‘‘तुम ने उन्हें मेरे बारे में नहीं बताया.’’

महेश, ‘‘बताना चाहता था, पर उन को अपनी जिद के आगे मेरी खुशी नहीं दिखाई दे रही थी. मुझे उन्हें समझाने के लिए कुछ वक्त चाहिए था. मैं उन का दिल नहीं दुखाना चाहता था.’’ मोहिनी, ‘‘और मेरे दिल का क्या होगा? मेरे बारे में एक बार भी नहीं सोचा.’’

महेश, ‘‘सोचा था, बहुत सोचा था, लेकिन जिंदगी के भंवर में बुरी तरह फंस चुका था. जब तक वे मानते तब तक तुम्हारा विवाह हो चुका था. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. अब तो इस भंवर से बाहर आ कर मेरे साथ चल पड़ो. तुम भी अपने पति से प्यार नहीं करती हो, यह मैं जान गया हूं.’’ मोहिनी, ‘‘वे बहुत अच्छे हैं. अब मैं उन का साथ नहीं छोड़ सकती.’’

महेश, ‘‘क्यों बेनामी के रिश्ते को जी रही हो, घुटघुट के जीना मंजूर है तुम्हें?’’ मोहिनी, ‘‘समाज ने नाम दिया है इस रिश्ते को. तो बेनामी कैसे हुआ? मैं उन के साथ बहुत खुश हूं.’’

महेश, ‘‘प्लीज छोड़ दो सब कुछ और भाग चलो मेरे साथ. हम अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे. चले जाएंगे यहां से बहुत दूर. मैं तुम्हें इतना प्यार करूंगा जितना किसी ने आज तक न किया हो.’’ मोहिनी, ‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती. अब मेरे साथ मेरी ही नहीं, किसी और की भी जिंदगी जुड़ी है.’’

महेश, ‘‘इस का मतलब तुम मेरा प्यार भूल गई हो या फिर वह सब झूठ था.’’ मोहिनी, ‘‘प्यार एक एहसास होता है उन ओस की बूंदों की तरह जो धरती में समा जाती हैं और फिर किसी को नजर नहीं आतीं. हमारा प्यार भी ओस की बूंदों की तरह था, जो हमेशा मेरे दिल की जमीन पर समाहित रहेगा. इस एहसास को किसी रिश्ते का नाम देना जरूरी तो नहीं. तुम्हारे साथ कुछ पलों के लिए जिस राह पर चली थी. वह बहुत ही खुशगवार थी. उन राहों में लिखी कहानी शायद मैं कभी नहीं मिटा पाऊंगी. लेकिन अब और उन राहों पर नहीं चल पाऊंगी. मैं तुम से बहुत प्यार करती थी और शायद आज भी करती हूं और करती रहूंगी पर…’’

महेश, ‘‘पर क्या?’’ मोहिनी, ‘‘अब हम एक नहीं हो सकते. तुम्हारा प्यार हमेशा याद बन कर मेरे दिल में रहेगा. अब तुम कोई दूसरा हमसफर ढूंढ़ लो. मैं 4 कदम चली तो थी मंजिल पाने के लिए पर कुदरत ने मेरी राह ही बदल दी.’’

महेश, ‘‘तुम चाहो तो फिर से राह बदल सकती हो.’’

मोहिनी, ‘‘प्यार का एहसास ही काफी है मेरे लिए. प्यार को प्यार ही रहने दो. कभीकभी जीवन में कुछ रिश्तों को नाम देना जरूरी नहीं होता. क्या हम दोनों के लिए इतना ही काफी नहीं कि हम दोनों ने एकदूसरे से प्यार किया.’’

‘‘सब कह दिया है तुम ने. बस एक आखिरी सवाल का जवाब भी दे दो,’’ महेश ने कहा. ‘‘हां, पूछो,’’ मोहिनी बोली.

‘‘आज तक, कभी एक मिनट या एक सैकंड के लिए भी तुम मुझे भूल पाईं,’’ महेश ने पूछा. ‘‘नहीं,’’ अपनी हिचकियों को रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए मोहिनी बोली.

महेश, ‘‘एक वादा चाहता हूं तुम से.’’ मोहिनी, ‘‘क्या?’’

महेश, ‘‘वादा करो जिंदगी में जब कभी तुम्हें मेरी जरूरत महसूस होगी, तुम मुझे फौरन याद करोगी. मैं दुनिया के किसी भी कोने में होऊंगा, तो भी जरूर आऊंगा. चलो खुश रहना. कोशिश करूंगा कि दोबारा कभी तुम्हें परेशान न करूं. लेकिन दोस्त बन कर तो तुम से मिलने आ ही सकता हूं?’’ मोहिनी, ‘‘नहीं अब हम कभी नहीं मिलेंगे. दोस्ती को प्यार में बदल सकते हैं पर प्यार दोस्ती में नहीं. मेरे जीवन की आखिरी सांस तक मैं तुम्हें नहीं भूलूंगी.’’

मोहिनी, इतने पर ही नहीं रुकी, ‘‘सवाल तो बहुत से थे, मन में. बस आज उन सवालों पर विराम लगाती हूं. मेरे लिए इतना ही काफी है कि तुम मुझे प्यार करते हो.’’ महेश, ‘‘यह कैसा प्यार है. चाह कर भी मैं तुम्हें छू नहीं सकता. तुम्हें देख नहीं सकता. तुम से बात नहीं कर सकता.’’

मोहिनी, ‘‘यह फैसला तुम्हारा था. अब तुम्हें अपने फैसले का सम्मान करना चाहिए. बहुत देर हो गई. बस यही चाहूंगी कि तुम सदा खुश रहो और कामयाबी की ओर बढ़ते रहो, बाय.’’ महेश, ‘‘बाय.’’

महेश को दूर से आते एक गीत के बोल सुनाई दे रहे थे, ‘क्यों जिंदगी की राह में मजबूर हो गए इतने हुए करीब कि हम दूर हो गए…’ Family Story.

Family Story: सोच- आखिर कैसे अपनी जेठानी की दीवानी हो गई सलोनी?

Family Story: ‘‘तो कितने दिनों के लिए जा रही हो?’’ प्लेट से एक और समोसा उठाते हुए दीपाली ने पूछा.

‘‘यही कोई 8-10 दिनों के लिए,’’ सलोनी ने उकताए से स्वर में कहा.

औफिस के टी ब्रेक के दौरान दोनों सहेलियां कैंटीन में बैठी बतिया रही थीं.

सलोनी की कुछ महीने पहले ही दीपेन से नईनई शादी हुई थी. दोनों साथ काम करते थे. कब प्यार हुआ पता नहीं चला और फिर चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर अब दोनों शादी कर के एक ही औफिस में काम कर रहे थे, बस डिपार्टमैंट अलग था. सारा दिन एक ही जगह काम करने के बावजूद उन्हें एकदूसरे से मिलनेजुलने की फुरसत नहीं होती थी. आईटी क्षेत्र की नौकरी ही कुछ ऐसी होती है.

‘‘अच्छा एक बात बताओ कि तुम रह कैसे लेती हो उस जगह? तुम ने बताया था कि किसी देहात में है तुम्हारी ससुराल,’’ दीपाली आज पूरे मूड में थी सलोनी को चिढ़ाने के. वह जानती थी ससुराल के नाम से कैसे चिढ़ जाती है सलोनी.

‘‘जाना तो पड़ेगा ही… इकलौती ननद की शादी है. अब कुछ दिन झेल लूंगी,’’ कह सलोनी ने कंधे उचकाए.

‘‘और तुम्हारी जेठानी, क्या बुलाती हो तुम उसे? हां भारतीय नारी अबला बेचारी,’’ और दोनों फक्क से हंस पड़ीं.

‘‘यार मत पूछो… क्या बताऊं? उन्हें देख कर मुझे किसी पुरानी हिंदी फिल्म की हीरोइन याद आ जाती है… एकदम गंवार है गंवार. हाथ भरभर चूडि़यां, मांग सिंदूर से पुती और सिर पर हर वक्त पल्लू टिकाए घूमती है. कौन रहता है आज के जमाने में इस तरह. सच कहूं तो ऐसी पिछड़ी औरतों की वजह से ही मर्द हम औरतों को कमतर समझते हैं… पता नहीं कुछ पढ़ीलिखी है भी या नहीं.’’

‘‘खैर, मुझे क्या? काट लूंगी कुछ दिन किसी तरह. चल, टाइम हो गया है… बौस घूररहा है,’’ और फिर दोनों अपनीअपनी सीट पर लौट गईं.

सलोनी शहर में पलीबढ़ी आधुनिक लड़की थी. दीपेन से शादी के बाद जब उसे पहली बार अपनी ससुराल जाना पड़ा तो उसे वहां की कोई चीज पसंद नहीं आई. उसे पहले कभी किसी गांव में रहने का अवसर नहीं मिला था. 2 दिन में ही उस का जी ऊब गया. उस ठेठ परिवेश में 3-4 दिन रहने के लिए दीपेन ने उसे बड़ी मुश्किल से राजी किया था. शहर में जींसटौप पहन कर आजाद तितली की तरह घूमने वाली सलोनी को साड़ी पहन घूंघट निकाल छुईमुई बन कर बैठना कैसे रास आता… ससुराल वाले पारंपरिक विचारों के लोग थे. उसे ससुर, जेठ के सामने सिर पर पल्लू लेने की हिदायत मिली. सलोनी की सास पुरातनपंथी थीं, मगर जेठानी अवनि बहुत सुलझी हुई थी. छोटी ननद गौरी नई भाभी के आगेपीछे घूमती रहती थी. सलोनी गांव की औरतों की सरलता देख हैरान होती. वह खुद दिल की बुरी नहीं थी, मगर न जाने क्यों पारंपरिक औरतों के बारे में उस के विचार कुछ अलग थे. सिर्फ घरगृहस्थी तक सीमित रहने वाली ये औरतें उस की नजरों में एकदम गंवार थीं.

शहर में अपनी नई अलग गृहस्थी बसा कर सलोनी खुश थी. यहां सासननद का कोई झंझट नहीं था. जो जी में आता वह करती. कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. दीपेन और सलोनी के दोस्त वक्तबेवक्त धमक जाते. घर पर आए दिन पार्टी होती. दिन मौजमस्ती में गुजर रहे थे.

कुछ दिन पहले ही दीपेन की छोटी बहन गौरी की शादी तय हुई थी. शादी का अवसर था. घर में मेहमानों की भीड़ जुटी थी.

गरमी का मौसम उस पर बिजली का कोई ठिकाना नहीं होता था. हाथपंखे से हवा करतेकरते सलोनी का दम निकला जा रहा था. एअरकंडीशन के वातावरण में रहने वाली सलोनी को सिर पर पल्लू रखना भारी लग रहा था. गांव के इन पुराने रीतिरिवाजों से उसे कोफ्त होने लगी.

एकांत मिलते ही सलोनी का गुस्सा फूट पड़ा, ‘‘कहां ले आए तुम मुझे दीपेन? मुझ से नहीं रहा जाता ऐसी बीहड़ जगह में… ऊपर से सिर पर हर वक्त यह पल्लू रखो. इस से तो अच्छा होता मैं यहां आती ही नहीं.’’

‘‘धीरे बोलो सलोनी… यार कुछ दिन ऐडजस्ट कर लो प्लीज. गौरी की शादी के दूसरे ही दिन हम चले जाएंगे,’’ दीपेन ने उसे आश्वस्त करने की कोशिश की.

सलोनी ने बुरा सा मुंह बनाया. बस किसी तरह शादी निबट जाए तो उस की जान छूटे. घर रिश्तेदारों से भरा था. इतने लोगों की जिम्मेदारी घर की बहुओं पर थी. सलोनी को रसोई के कामों का कोई तजरबा नहीं था. घर के काम करना उसे हमेशा हेय लगता था. अपने मायके में भी उस ने कभी मां का हाथ नहीं बंटाया था. ऐसे में ससुराल में जब उसे कोई काम सौंपा जाता तो उस के पसीने छूट जाते. जेठानी अवनि उम्र में कुछ ही साल बड़ी थी, मगर पूरे घर की जिम्मेदारी उस ने हंसीखुशी उठा रखी थी. घर के सब लोग हर काम के लिए अवनि पर निर्भर थे, हर वक्त सब की जबान पर अवनि का नाम होता. सलोनी भी उस घर की बहू थी, मगर उस का वजूद अवनि के सामने जैसे था ही नहीं और सलोनी भी यह बात जल्दी समझ गई थी.

घर के लोगों में अवनि के प्रति प्यारदुलार देख कर सलोनी के मन में जलन की भावना आने लगी कि आखिर वह भी तो उस घर की बहू है… तो फिर सब अवनि को इतना क्यों मानते.

‘‘भाभी, मेरी शर्ट का बटन टूट गया है, जरा टांक दो,’’ बाथरूम से नहा कर निकले दीपेन ने अवनि को आवाज दी.

सलोनी रसोई के पास बैठी मटर छील रही थी. वह तुरंत दीपेन के पास आई. बोली, ‘‘यह क्या, इतनी छोटी सी बात के लिए तुम अवनि भाभी को बुला रहे हो… मुझ से भी तो कह सकते थे?’’ और फिर उस ने दीपेन को गुस्से से घूरा.

‘‘मुझे लगा तुम्हें ये सब नहीं आता होगा,’’ सलोनी को गुस्से में देख दीपेन सकपका गया.

‘‘तुम क्या मुझे बिलकुल अनाड़ी समझते हो?’’ कह उस के हाथ से शर्ट ले कर सलोनी ने बटन टांक दिया.

धीरेधीरे सलोनी को समझ आने लगा कि कैसे अवनि सब की चहेती बनी हुई है. सुबह सब से पहले उठ कर नहाधो कर चौके में जा कर चायनाश्ता बना कर सब को खिलाना. बूढ़े ससुरजी को शुगर की समस्या है. अवनि उन की दवा और खानपान का पूरा ध्यान रखती. सासूमां भी अवनि से खुश रहतीं. उस पर पति और

2 छोटे बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी निभाते हुए भी मजाल की बड़ों के सामने पल्लू सिर से खिसक जाए. सुबह से शाम तक एक पैर पर नाचती अवनि सब की जरूरतों का खयाल बड़े प्यार से रखती.

घर आए रिश्तेदार भी अवनि को ही तरजीह देते. सलोनी जैसे एक मेहमान की तरह थी उस घर में. अवनि का हर वक्त मुसकराते रहना सलोनी को दिखावा लगता. वह मन ही मन कुढ़ने लगी थी अवनि से.

घर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए अब सलोनी हर काम में घुस जाती थी, चाहे वह काम करना उसे आता हो या नहीं और इस चक्कर में गड़बड़ कर बैठती, जिस से उस का मूड और बिगड़ जाता.

‘ठीक है मुझे क्या? यह चूल्हाचौका इन गंवार औरतों को ही शोभा देता है. कभी कालेज की शक्ल भी नहीं देखी होगी शायद… दो पैसे कमा कर दिखाएं तब पता चले,’ सलोनी मन ही मन खुद को तसल्ली देती. उसे अपनी काबिलीयत पर गुमान था.

सलोनी के हाथ से अचार का बरतन गिर कर टूट गया. रसोई की तरफ आती अवनि फिसल कर गिर पड़ी और उस के पैर में मोच आ गई. घर वाले दौड़े चले आए. अवनि को चारपाई पर लिटा दिया गया. सब उस की तीमारदारी में जुट गए. उसे आराम करने की सलाह दी गई. उस के बैठ जाने से सारे काम बेतरतीब होने लगे.

बड़ी बूआ ने सलोनी को रसोई के काम में लगा दिया. सलोनी इस मामले में कोरा घड़ा थी. खाने में कोई न कोई कमी रह जाती. सब नुक्स निकाल कर खाते.

अवनि सलोनी की स्थिति समझती थी. वह पूरी कोशिश रती उसे हर काम सिखाने की पर अभ्यास न होने से जिन कामों में अवनि माहिर थी उन्हें करने में सलोनी घंटों लगा देती.

मझली बूआ ने मीठे में फिरनी खाने की फरमाइश की तो सलोनी को फिरनी पकाने का हुक्म मिला. उस के पास इतना धैर्य कहां था कि खड़ेखड़े कलछी घुमाती, तेज आंच में पकती फिरनी पूरी तरह जल गई.

‘‘अरे, कुछ आता भी है क्या तुम्हें? पहले कभी घर का काम नहीं किया क्या?’’ सारे रिश्तेदारों के सामने मझली बूआ ने सलोनी को आड़े हाथों लिया.

मारे शर्म के सलोनी का मुंह लाल हो गया. उसे सच में नहीं आता था तो इस में उस का क्या दोष था.

‘‘बूआजी, सलोनी ने ये सब कभी किया ही नहीं है पहले. वैसे भी यह नौकरी करती है… समय ही कहां मिलता है ये सब सीखने का इसे… आप के लिए फिरनी मैं फिर कभी बना दूंगी,’’ अवनि ने सलोनी का रोंआसा चेहरा देखा तो उस का मन पसीज गया. ननद गौरी की शादी धूमधाम से निबट गई. रिश्तेदार भी 1-1 कर चले गए. अब सिर्फ घर के लोग रह गए थे.

अवनि के मधुर व्यवहार के कारण सलोनी उस से घुलमिल गई थी. अवनि उस के हर काम में मदद करती.

2 दिन बाद उन्हें लौटना था. दीपेन ने ट्रेन के टिकट बुक करा दिए. एक दिन दोपहर में सलोनी पुराना अलबम देख रही थी. एक फोटो में अवनि सिर पर काली टोपी लगाए काला चोगा पहने थी. फोटो शायद कालेज के दीक्षांत समारोह का था. उस फोटो को देख कर सलोनी ने दीपेन से पूछा, ‘‘ये अवनि भाभी हैं न?’’

‘‘हां, यह फोटो उन के कालेज का है. भैया के लिए जब उन का रिश्ता आया था तो यही फोटो भेजा था उन के घर वालों ने.’’

‘‘कितनी पढ़ीलिखी हैं अवनि भाभी?’’ सलोनी हैरान थी.

‘‘अवनि भाभी डबल एमए हैं. वे तो नौकरी भी करती थीं. उन्होंने पीएचडी भी की हुई है. शादी के कुछ समय बाद मां बहुत बीमार पड़ गई थीं. बेचारी भाभी ने कोई कसर नहीं रखी उन की तीमारदारी में. अपनी नौकरी तक छोड़ दी. अगर आज मां ठीक हैं तो सिर्फ भाभी की वजह से. तुम जानती नहीं सलोनी, भाभी ने इस घर के लिए बहुत कुछ किया है. वे चाहतीं तो आराम से अपनी नौकरी कर सकती थीं. मगर उन्होंने हमेशा अपने परिवार को प्राथमिकता दी.’’

सलोनी जिस अवनि भाभी को निपट अनपढ़ समझती रही वह इतनी काबिल होगी, इस का तो उसे अनुमान भी नहीं था. पूरे घर की धुरी बन कर परिवार संभाले हुए अवनि भाभी ने अपनी शिक्षा का घमंड दिखा कर कभी घरगृहस्थी के कामों को छोटा नहीं समझा था.

सलोनी को अपनी सोच पर ग्लानि होने लगी. उस ने आधुनिक कपड़ों और रहनसहन को ही शिक्षा का पैमाना माना था.

‘‘अरे भई, कहां हो तुम लोग, बिट्टू के स्कूल के प्रोग्राम में चलना नहीं है क्या?’’ कहते हुए अवनि भाभी सलोनी के कमरे में आईं.

‘‘हां, भाभी बस अभी 2 मिनट में तैयार होते हैं,’’ सलोनी और दीपेन हड़बड़ाते हुए बोले.

बिट्टू को अपनी क्लास के बैस्ट स्टूडैंट का अवार्ड मिला. हर विषय में वह अव्वल रहा था. उसे प्राइज देने के बाद प्रिंसिपल ने जब मांबाप को स्टेज पर दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया तो सकुचाते हुए बड़े भैया बोले, ‘‘अवनि, तुम जाओ. मुझे समझ नहीं आता कि क्या बोलना है.’’

बड़े आत्मविश्वास के साथ माइक पकड़े अवनि भाभी ने अंगरेजी में अभिभावक की जिम्मेदारियों पर जब शानदार स्पीच दी, तो हौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

घर लौटने के बाद दीपेन से सलोनी ने कहा, ‘‘सुनो, कुछ दिन और रुक जाते हैं यहां.’’

‘‘लेकिन तुम्हारा तो मन नहीं लग रहा था… इसीलिए तो इतनी जल्दी वापस जा रहे हैं,’’ दीपेन हैरान होकर बोला.

‘‘नहीं, अब मुझे यहां अच्छा लग रहा है… मुझे अवनि भाभी से बहुत कुछ सीखना है,’’ सलोनी उस के कंधे पर सिर टिकाते हुए बोली.

‘‘वाह तो यह बात है. फिर तो ठीक है. कुछ सीख जाओगी तो कम से कम जला खाना तो नहीं खाना पड़ेगा,’’ दीपेन ने उसे छेड़ा और फिर दोनों हंस पड़े. Family Story.

Family Story In Hindi: अभिनय- नाटक रंग लाया जीजाजी का

Family Story In Hindi: रात 9.30 बजे विवेक ने मान्यता को फोन कर के कहा, “दीदी, मैं अब अर्चना के साथ नहीं रह सकता. मैं ने उस के साथ निभाने की बहुत कोशिश की, परंतु अब और बरदाश्त नहीं होता. मैं उसे 2-4 दिन में ही ‘तलाक’ देने की सोच रहा हूं…”

“परंतु विवेक, अभी 5 दिन बाद ही तो तुम दोनों की शादी की 8वीं सालगिरह है…”

“मुझे अब कुछ नहीं सुनना दीदी. और प्लीज, आप इस सब के बीच में पड़ कर अपना टाइम बरबाद मत करो. मैं ने बहुत सोचसमझ कर ही यह फैसला किया है,” कह कर विवेक ने फोन रख दिया.

मान्यता, विवेक से 4 साल बड़ी थी. उस की शादी 15 साल पहले अनुज के साथ हुई थी. अनुज का लखनऊ में एडवरटाइजिंग एजेंसी का कारोबार था. कंप्यूटर डिजाइनर की डिगरी होने के कारण मान्यता भी दिन में एक बार 2-3 घंटे अनुज के औफिस में जा कर उस का काम देखती थी. वह खुद भी काफी इनोवेटिव आइडिया देती थी, जिस से उन की एडवरटाइजिंग एजेंसी लखनऊ की सब से प्रतिष्ठित एडवरटाइजिंग एजेंसी कहलाती थी. उन की एजेंसी में एड देना यानी सफलता की गारंटी माना जाता था.

अनुज और मान्यता के 2 बेटे थे. अक्षज 8वीं जमात में और अक्षया 5वीं जमात में थे. उन का एक सुखी परिवार था. वे चारों लखनऊ की पौश कालोनी गोमती नगर में बड़े से बंगले में रहा करते थे.

विवेक की बात सुन कर मान्यता को रातभर नींद नहीं आई. हालांकि वह विवेक से महज 4 साल ही बड़ी थी, परंतु वह और उस के पति अनुज विवेक और उस की पत्नी अर्चना को अपने बच्चों की तरह ही प्यार करते थे.

मान्यता की बात सुन कर अनुज भी काफी दुखी हुए.
हालांकि विवेक और अर्चना ने प्रेम विवाह किया था, पर दोनों सजातीय थे और विवेक भी कानपुर में ही सरकारी कंपनी एचएएल में काम करता था, इसलिए दोनों परिवारों ने हंसीखुशी इस विवाह को मंजूरी दे दी थी.

अर्चना भी बहुत समझदार थी. उस ने पूरे घर को अपने प्यार से बांध रखा था. वह मान्यता और अनुज की बहुत इज्जत करती थी. बेटे पुष्कर के जन्म के 2 साल बाद से ही अर्चना ने भी एक निजी कान्वेंट स्कूल में बतौर शिक्षिका ज्वाइन कर लिया. पिताजी तो अर्चना को इतना पसंद करते थे कि उन्होंने मृत्यु से पूर्व अपनी वसीयत में अपना पुश्तैनी घर अर्चना के नाम ही कर दिया था. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था, तो पता नहीं किस की नजर लग गई.

मान्यता को तो अपनी मां के जरीए ही उन दोनों के बीच पिछले 6 महीने से जारी खटपट का पता चल रहा था, परंतु इसे पतिपत्नी के बीच सामान्य सी बात समझ कर मान्यता ने इस बात में ज्यादा दखल देना उचित नहीं समझा, पर बात इतनी बिगड़ जाएगी कि उन दोनों के तलाक की नौबत आ जाए, सोच कर मान्यता उलझन में थी.

पूरा मामला जानने के लिए मान्यता ने सुबह जब मां को फोन किया, तो मां ने भी विवेक की साइड लेते हुए मान्यता को अर्चना के बारे में बहुत बुराभला कहा.

मां कह रही थी कि बहूरानी के पर निकल आए हैं. स्कूल से घर आ कर सिर्फ मोबाइल फोन और टीवी में लगी रहती है. थोड़ाबहुत काम निबटाने के बाद बेटे पुष्कर की पढ़ाई कराने में ही पूरी रात निकाल देती है. उस ने अब हम लोगों की तरफ ध्यान देना भी कम कर दिया, इसलिए जब पिछले हफ्ते उस के भाईभाभी यहां आए थे, तो विवेक ने उन को कुछ रिस्पौंस नहीं दिया. उन के जाने के बाद से ही बात बिगड़तेबिगड़ते तलाक तक आ पहुंची है.

मान्यता ने अपनी मां से कहा कि वह इस मामले में नहीं पड़ेगी, और उस ने फोन रख दिया.

मान्यता ने सारी बात अनुज से विस्तार से कही, जिस पर कुछ सोच कर उस ने मोबाइल पर अर्चना और विवेक को फोन कर के कहा कि वह एक नया एडवरटाइजिंग प्रोजैक्ट 2 दिन बाद शुरू कर रहा है, जिस के लिए उस ने उन दोनों को आमंत्रित किया है.

अर्चना और विवेक ने संकोच के कारण अपने जीजाजी अनुज को औपचारिक रूप से हामी भर दी, पर मन ही मन निश्चित किया कि वह कुछ बहाना बना कर टाल देंगे.
परंतु 2 दिन बाद ही अनुज ने सुबहसुबह उन दोनों को लाने के लिए ड्राइवर के साथ अपनी इनोवा गाड़ी कानपुर भेज दी.

अब घर में गाड़ी आने के कारण विवेक ने मां से आग्रह किया कि वह चली जाएं, पर मां ने साफ मना कर दिया कि वह पुराने खयालों की है, बेटीदामाद के घर का पानी भी नहीं पी सकती, मजबूरन विवेक और अर्चना ने पुष्कर के साथ 2 दिन का सामान साथ ले कर लखनऊ जाने का फैसला किया. वो दोनों खाली गाड़ी लौटा कर अपने जीजाजी का अपमान करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे.

रास्ते में ही विवेक और अर्चना ने जरूरी कार्य के नाम पर अपनेअपने औफिस से 2 दिन की छुट्टी ले ली.

चूंकि उन दोनों ने पहले से कोई तैयारी नहीं की थी, इसलिए उन्होंने लखनऊ पहुंच कर घर जाने के पहले ही फल, मिठाइयां, पुष्प गुच्छ और उपहार रास्ते में ही ले लिए.

दीदी के घर पहुंचने के बाद उन्होंने देखा कि घर में पूजा हो रही थी. जीजाजी और दीदी को प्रणाम कर विवेक अपने भांजे और भांजी से खेलने में व्यस्त हो गया. अर्चना ने विवेक को इशारे से पहले उपहार और पुष्प गुच्छ दे कर अभिवादन करने को कहा.

अनुज ने विवेक और अर्चना का जिंदादिली से स्वागत किया. विवेक और अर्चना को लगा कि शायद दीदी ने जीजाजी को हमारे तलाक की बात नहीं बताई होगी. इसलिए वह दोनों उस घर में समझदार पतिपत्नी का अभिनय करने लगे.

लंच कर के जीजाजी ने विवेक और अर्चना का सामान एक बैडरूम में शिफ्ट कर दिया.

जब अनुज कुछ काम से औफिस चले गए, तो विवेक और अर्चना को लगा कि शायद अब मान्यता दीदी हम से हमारे तलाक के मुद्दे पर बात करेंगी.

परंतु यह क्या, वह तो अर्चना को साथ ले कर रसोईघर में कुछ काम करतेकरते बातें कर रही थी. उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि मान्यता दीदी अनुज जीजाजी की बुराई कर रही थीं.

वह बोली, “सालभर बाद उन का साला और सरहज आए हैं, तो क्या छुट्टी ले कर इतना वक्त नहीं दे सकते थे, पर नहीं, उन को घर की तो कोई चिंता ही नहीं है.”

अर्चना ने कहा, “नहीं दीदी, हो सकता है कि उन्हें कोई जरूरी काम हो. देखना, वह जल्दी ही घर आ जाएंगे.”

इस के बाद विवेक, अर्चना और मान्यता बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त हो गए.

रोज शाम को 7 बजे तक घर आ जाने वाले अनुज का जब रात 8 बजे तक भी कोई फोन न आया, तो मान्यता ने अनुज को फोन किया.

अनुज ने कहा कि वह बिजनैस मीटिंग में रहेगा, डिनर भी उन्हीं के साथ करेगा, आप लोग खाना खा लो.

मान्यता का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया, काहे की बिजनैस मीटिंग, दोस्तों के साथ पीने बैठ गए होंगे. कोई फिक्र ही नहीं हम सब की, अब तुम लोगों के साथ समय निकालना था कि दोस्तों के साथ जाना ज्यादा जरूरी था.

किसी तरह अर्चना ने मान्यता को समझाया कि हो सकता है कि कोई मीटिंग हो, फिर हम कोई बाहर के लोग तो हैं नहीं, कल साथ में डिनर कर लेंगे.

रात 11.30 बजे जब अनुज घर आए तो मान्यता और अर्चना बच्चों के साथ अपनेअपने बैडरूम में सोने चली गई थी. विवेक ड्राइंगरूम में जीजाजी की प्रतीक्षा कर रहा था.

दरवाजा खोलते ही विवेक को अनुज के मुंह और कपड़ों से शराब की बदबू आई. अनुज बड़बड़ा रहा था, ‘तुम्हारी बहन क्यों नहीं आई दरवाजा खोलने? मेरी कोई कद्र नहीं करती. मैं तलाक दे दूंगा उसे,’ कहतेकहते विवेक की मदद से गिरतेपड़ते अनुज अपने बैडरूम पहुंचा.

विवेक को अनुज जीजाजी का यह व्यवहार बहुत ही बुरा लगा.

अपने कमरे में आ कर विवेक ने देखा कि अर्चना अभी सोई नहीं थी. उस ने उसे इशारे से कहा कि जीजाजी ड्रिंक कर के आए हैं.

यह देख अर्चना बुरी तरह सहम गई. उस ने भय के मारे विवेक के हाथ मजबूती से पकड़ लिए थे. भले ही अर्चना और विवेक के संबंध खराब चल रहे थे, परंतु विवेक ने कभी इस तरह शराब पी कर अर्चना के बारे में कोई गालीगलौज नहीं की थी.

दूसरे दिन सुबह जब विवेक और अर्चना चाय पीने के लिए डाइनिंगरूम गए तो देखा कि अनुज जीजाजी और मान्यता दीदी में जोरजोर से बहस चल रही थी.

मान्यता दीदी अनुज जीजाजी को कल के व्यवहार पर बोली, तो वह भड़क उठे थे. अनुज जीजाजी गुस्से में बिना खाएपिए ही औफिस निकल गए.
★★★★
किसी तरह टेंशन के बीच उन लोगों ने दोपहर का लंच किया. मान्यता दीदी अभी भी दुखी होने के कारण बैडरूम में सो रही थी, इसलिए अर्चना ने ही उस के दोनों बच्चों अक्षज और अक्षया को शाम को स्नेक्स आदि कराया.

उस भरेपूरे घर का माहौल पूर्णतः बोझिल हो रहा था.
आज गुस्से में न तो मान्यता दीदी ने जीजाजी को फोन किया कि कब तक आ रहे हो, और न ही जीजाजी का कोई फोन आया.

रात 10.30 बजे तक जब जीजाजी नहीं आए, तो उन चारों ने बच्चों के साथ मिल कर डिनर किया.

जीजाजी के इस तरह समय पर न आने से मान्यता दीदी बहुत आहत हुई थी. वह रहरह कर बोल रही थी कि इस तरह सहन करने से अच्छा है कि मैं अनुज को तलाक दे कर वापस कानपुर चली आऊं.

उन की बात सुन कर विवेक और भी सहम गया था.

विवेक के सहमे हुए चेहरे को देख कर मान्यता फीकी सी हंसी दे कर बोली, “घबराने की जरूरत नहीं भाई, मैं वहां तुम पर बोझ नहीं रहूंगी.”

विवेक रोआंसा होते हुए बोला, “नहीं दीदी, आप तो मेरे साथ सारी जिंदगी रह सकती हो. बस ये भांजे और भांजी बिना जीजाजी के कैसे रहेंगे, सोच कर दुखी हो रहा था.”

अर्चना ने बीच में ही टोक कर कहा, “दीदी, हफ्तेपंद्रह दिन के लिए मायके जाना अलग बात होती है, और तलाक ले कर तो एक दिन भी नहीं गुजर सकता. लोगों की सवालियां निगाहें आप को बहुत परेशान करेंगी. मेरे हिसाब से एक बार हम सब मिल कर जीजाजी को समझाते हैं. ऐसी छोटीमोटी बातें तलाक तक नहीं पहुंचनी चाहिए.”

मान्यता दीदी ने पूछा, “अरे, तुम दोनों भी तो वैसे ही कम परेशान हो क्या? और मैं आ कर वहां क्या करूंगी? अच्छा, तुम दोनों की ऐसी क्या वजह थी कि तुम दोनों तलाक लेना चाहते हो?”

अर्चना ने कहा, “आप दोनों की बीच बढ़ी इतनी दूरियों को देख कर तो लगता है कि हमारे बीच ऐसी कोई बड़ी वजह ही नहीं थी, जिस के आधार पर हम तलाक लेने की बात कर रहे थे.
बस शायद ये मुझे टाइम नहीं दे पा रहे और न मैं इन्हें, इसलिए थोड़ा मनमुटाव बढ़ गया था. मैं विवेक और मां से अपने बरताव के लिए माफी मांगती हूं.”

विवेक ने भी कहा, “मुझे भी तुम्हारे भैयाभाभी को वक्त देना था. आज 2 दिन में ही मुझे समझ आ गया कि उन दोनों को कितना बुरा लगा होगा. अब आगे से मुझ से अनजाने में भी कोई ऐसी गलती नहीं होगी.”

विवेक ने आगे कहा, “हम ने सिर्फ 2 दिन की ही छुट्टी ली थी. कल हमें सुबह जल्दी ही कानपुर निकलना होगा. हम अपना सामान पैक कर लेते हैं.”

उन दोनों को जीजाजी की प्रतीक्षा करतेकरते रात 11.45 हो चुके थे. विवेक को डर था कि शायद आज भी अनुज जीजाजी इसी प्रकार कल की तरह शराब पी कर आएंगे और अर्चना व बच्चों के सामने बखेड़ा न खड़ा कर दे, इसलिए विवेक जल्दी ही उन सब को बैडरूम में जाने का आग्रह कर रहा था.

अभी वे लोग अपने बैडरूम पहुंचे ही थे कि तभी डोरबेल बजती है. किसी अनहोनी की आशंका से विवेक ने मान्यता दीदी और उन के बच्चों को भी उन के बैडरूम में सोने के लिए भेज दिया.

विवेक ने सोच रखा था कि यदि आज भी अनुज जीजाजी कल की तरह शराब पी कर आए और कोई तमाशा किया, तो वह उन्हें बोल देगा कि आप मान्यता दीदी को अकेला मत समझना. मैं कल ही उन को अपने साथ कानपुर ले जा रहा हूं.

विवेक धड़कते दिल से दरवाजा खोलता है. वह देखता है कि अनुज जीजाजी एक हाथ में केक बौक्स और एक हाथ में पुष्प गुच्छ ले कर मुसकराते हुए अंदर आते हैं, जैसे कि कोई बात ही न हुई हो.

अनुज जीजाजी ने विवेक को कहा कि वह अर्चना को ले कर आए, और स्वयं मान्यता को आवाज देने लगे.

विवेक जब तक अर्चना को ले कर ड्राइंगरूम में आता है, मान्यता भी वहां आ जाती है और केक ओपन कर के विवेक और अर्चना को केक काटने को बोलती है. तुम दोनों को शादी की सालगिरह की बहुत शुभाशीर्वाद.

अनुज भी मुसकराते हुए उन दोनों को पुष्प गुच्छ और साथ लाया उपहार दे कर कहते हैं, “मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि तुम दोनों ने तलाक लेने जैसा निकृष्ट विचार त्याग दिया है. हर पतिपत्नी के बीच शादी के कुछ सालों बाद छोटीमोटी खटपट तो होती रहती हैं. उन को भी दिनचर्या की बातों में ही भूल जाना चाहिए.

“और हां, मैं तुम्हारी बहन मान्यता को बहुत प्यार करता हूं और उसे कोई तलाक नहीं दे रहा हूं,” कह कर वे हंसने लगे.

मान्यता भी विवेक के ठगे से चेहरे को देख कर जोर से हंस पड़ी और बोली, “यदि मैं तुम दोनों को बातों से समझाने की कोशिश करती तो शायद तुम दोनों मेरे सामने हां करते, पर तुम दोनों के बीच मन का दुराव कभी दूर नहीं होता, इसलिए हम दोनों ने यह सब प्लानिंग कर के तुम दोनों को उस माहौल में विचार करने के लिए छोड़ दिया.

“मुझे खुशी है कि तुम और अर्चना दोनों ने समझदारी से काम लिया. अब वादा करो कि तुम दोनों के बीच यदि झगड़ा हो तो उसे आपसी समझदारी से दूर करोगे.

अर्चना और विवेक आत्मग्लानि से सिर झुका कर खड़े थे. उन की आंखों में पश्चाताप के आंसू थे.
तभी अनुज ने कहा कि विवेक तुम्हें समझाने के चक्कर में अब दोबारा उस देशी दारू की दुकान नहीं जाने वाला मैं.

जीजाजी की बात सुन कर सभी खिलखिला कर हंस दिए.

आखिर किसी की शादीशुदा जिंदगी पटरी पर लाने के लिए उन दोनों का अपनी शादीशुदा जिंदगी के पटरी से उतरने का “अभिनय” करना काम कर गया था.

दूसरे दिन उसी इनोवा से विवेक और अर्चना बेटे पुष्कर के साथ कानपुर की ओर जा रहे थे.

रास्ते भर गिरता पानी उन दोनों के दिलों में जमी गर्द धो रहा था. अर्चना विवेक के कंधे पर सिर रख कर बेफिक्री से सो रही थी. उस की आंखों की कोर से बहती अश्रुधारा बता रही थी कि अब उस के मन में कोई क्लेश शेष नहीं है. Family Story In Hindi.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें