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Social Story in Hindi: व्यंग्य- रामदुलारे गए अयोध्या

Social Story in Hindi: रामदुलारे के मन में बड़ी साध थी कि जिंदगी में एक बार ‘गंगा स्नान’ कर आता. कहते हैं कि गंगा स्नान से अगलेपिछले सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं. रामदुलारे भी अपने पापों को धोना चाहता था.

तभी उस ने सुना कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर की कारसेवा के लिए जो लोग जाएंगे, उन के टिकट की व्यवस्था एक ट्रस्ट करेगा. रामभक्त कारसेवा में जाने के लिए पहले से नाम लिखवा दें. रामदुलारे को यह खबर मोहन ने दी. उस ने बतलाया, ‘‘रामदुलारे, हो आ लखनऊ, बनारस…रेले में निकल जाएगा.

‘‘फोकट में तीर्थयात्रा का आनंद ले. वहां का खर्चा तो तू निकाल ही लेगा. बड़ा जमघट होगा. थोड़ी हाथ की सफाई दिखाएगा तो पौबारह हो जाएगी. अपना कल्लू तो पार्टी के साथ गया है. वहां महाराष्ट्र के 55 छोकरों की पार्टी है. सब के सब प्रशिक्षित हैं. वहां लखनऊ में दूसरी शाखा के छोकरे मिल कर काम करेंगे.’’

रामदुलारे बोला, ‘‘उन की बात छोड़, उन की पूरी सरकार है, मंत्री हैं, अध्यक्ष है, मंत्रिपरिषद है, प्रशिक्षक है, गुंडे- बदमाश हैं. फिर उन का संविधान है, कायदाकानून है, अनुशासन है. अपना मिजाज उन से नहीं मिलता. 100 कमाओ और 80 सरकार को दो. अपने को यह मगजमारी पसंद नहीं. मोहन, मैं वहां धर्म के नाम पर पाप कम करने जा रहा हूं, रामभक्तों की जेब काट कर पाप बढ़ाने नहीं जा रहा. मेहनतमजदूरी कर लूंगा. गंगाजी में पुराने पापों का बंडल छोड़ दूंगा. फिर कोई अच्छा सा व्यापार करूंगा.’’

मोहन अपनी बात कह कर चला गया. रामदुलारे इस समय ‘पुण्य’ कमाने के चक्कर में था. गांधीजी, गौतमबुद्ध, विवेकानंद की तसवीरें खरीद कर कमरे में टांग चुका था. अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, जैकी श्रौफ, जयश्री टी. की तसवीरों का अग्निदाह कर चुका था. 6 दिन हो गए थे, ठर्रे को हाथ भी नहीं लगाया, न रज्जोबाई के घुंघरू सुनने गया. बहुत दिन से ‘धंधे’ पर भी नहीं निकला था. पुलिस का दीवान आया तो उसे आखिरी ‘हफ्ता’ दे दिया और कह दिया, ‘‘अपन अब रिटायर हुआ दीवानजी, अपना हफ्ता बंद, अब आगे से अपन धंधे पर नहीं निकलेगा.’’

दीवान ने हाथ का डंडा हवा में हिलाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन बाद में धंधे पर मिला तो ‘फार्मूला फोर’ फिट कर दूंगा. तू समझता है न…अपना नाम यशवंत भाई हनुमंत भाई मोछड़ है. अपने से ज्यादा होशियारी नहीं दिखाने का.’’

आगापीछा सोच कर आखिर रामदुलारे पार्टी के दफ्तर में जा कर कारसेवकों के पहले जत्थे में ही नाम लिखा आया.

तीसरे दिन स्टेशन पर वह अपना थैला ले कर पहुंच गया. दूसरे कारसेवकों के साथ उसे एक तरफ खड़ा किया गया. फिर शहर के लोगों ने सब को मालाएं पहनाईं, बढि़या गुलाब और सूर्यमुखी की मालाएं. रामदुलारे के गले में माला डालने का यह दूसरा अवसर था. पहले कभी शादी के समय उस की पत्नी ने कनेर के फूलों की माला डाली थी उस के गले में, और फिर उसी के गले से जोंक की तरह चिपट गई.

उस समय रामदुलारे उड़ान पर था. गांव में ‘शहरी बाबू’ कहा जाता था. टैरीकौट की पैंट और नाइलौन की कमीज पहन कर हाथ में ट्रांजिस्टर ले कर घूमता था. कल्लू उस्ताद के स्कूल में प्रशिक्षित हो चुका था. धंधे में लग गया था. बांद्रा में एक झोंपड़पट्टी भी ले ली थी. एक पुरानी साइकिल भी खरीद ली थी. हाथ में घड़ी, जेब में पैन, होंठों पर सिगरेट, देव आनंद की तरह सजीसंवरी जुल्फें, बड़े ठाट थे उन दिनों रामदुलारे के. अपनी गाढ़ी कमाई में से 100-50 रुपए घर भी भेज देता था.

खैर, इस बार माला पहनने वालों को वह जानता था कि ये लोग लीडर हैं. चुनाव जीते हुए नेता हैं. उन्होंने माला पहनाई और हाथ जोड़े. बजरंग दल का एक नेता कह रहा था, ‘‘आप लोगों के खानेपीने का प्रबंध कर दिया है, बड़ौदा स्टेशन पर आप को खाने के पैकेट मिल जाएंगे. मानव बिंदु चैरीटेबल ट्रस्ट, मुंबई के अध्यक्ष गिरधरलाल ने सब कारसेवकों को हाथ-खर्चे के लिए 100-100 रुपए दिए हैं. आप को ये रुपए सूरत में मिल जाएंगे.

‘‘आप शाम को बड़ौदा पहुंचेंगे. वहां के दल वाले आप का स्वागत करेंगे और रात में चलने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस में आप को आरक्षित सीट दिलवा देंगे. आप तीसरे दिन लखनऊ पहुंच जाएंगे. फिर वहां की व्यवस्था गुजरात दल करेगा. अच्छा भाइयो, बोलो प्रेम से राजा रामचंद्र की जय.’’

सब ने जयघोष किया. प्लेटफौर्म जयघोष से गूंज उठा. पत्रकार खड़े संवाद लिख रहे थे. फोटोग्राफर फोटो खींच रहे थे. एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से पूछा, ‘‘काहे का लफड़ा है? हज करने जाता है क्या?’’

‘‘नहीं भाई, ये हिंदू लोग हैं…जैसे दूसरे गांव से गाय, भैंस, बकरा इधर मुंबई में कटने के वास्ते आता है न, ऐसे ही मरने के वास्ते इन को अयोध्या भेजते हैं अपने नेता लोग. ये सब वहां पुलिस और फौज की बंदूकों से अपने प्राण देंगे. इसी वास्ते इन की इतनी खातिर होती है.’’

तभी पास खड़े एक दूसरे सज्जन बीच में ही बोल पड़े, ‘‘काहे को गलत बात बोलता है, ये सब रामभक्त हैं. ‘भगवान’ की सेवा में जाते हैं. तुम वी.पी. सिंह का आदमी मालूम पड़ता है…’’ और अचानक उस ने उस व्यक्ति का गरीबान पकड़ लिया और जोरजोर से चीखने लगा, ‘‘वी.पी. सिंह का मानस है, मारो इस को.’’

एकाएक भीड़ के तेवर बदल गए. सब लोग उस आदमी पर टूट पड़े. प्लेटफौर्म पर होहल्ला मच गया. फिर अचानक भागमभाग मच गई. किसी ने रामपुरी चाकू उस आदमी की पसली में उतार दिया था. उस के पास ही खड़े, उस से बात करने वाले दूसरे आदमी की गरदन पर भी चाकू के 3 वार हो चुके थे. तभी पुलिस के जवान आ गए. प्लेटफौर्म पर सीटियां बजने लगीं. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे अन्य रामभक्तों के साथ सामने खड़ी रेल में घुस गया. स्वागतसत्कार करने वाले स्वयंसेवकों तथा भाषण देने वाले नेताओं का कहीं पता न था. प्लेटफौर्म पर ढेर सारी मालाएं टूटी पड़ी थीं.

तभी पीछे से 50-60 आदमियों ने नारे लगाए, ‘‘हम सब हिंदू एक हैं…जिंदाबाद, जिंदाबाद. बजरंग दल जिंदाबाद. जिंदाबाद, जिंदाबाद, भवानी दल जिंदाबाद…जिंदाबाद, जिंदाबाद, शिवसेना जिंदाबाद, हिंदू परिषद जिंदाबाद…लाठीगोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, बच्चाबच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का.’’

एक बार तो रामदुलारे के मन में आया कि रेल के डब्बे से उतर कर भाग जाए. फिर मन मजबूत किया. तभी कुछ बाहरी लोगों ने उन के डब्बे पर पथराव कर दिया. सटासट खिड़कियां बंद हो गईं. लोग दरवाजों से सट गए. तभी गाड़ी चल पड़ी.

रामदुलारे का दूसरे साथियों से परिचय हुआ. सभी भक्त और सेवक थे. रामदुलारे की बिरादरी का कोई भी नहीं था. अच्छे परिवारों के खातेपीते लोग थे. जब से गाड़ी चली थी, भजनकीर्तन प्रारंभ हो गया था. सभी भक्तिरस में डूबे हुए थे. हर स्टेशन पर मालाओं से स्वागत हो रहा था. भोजन के पैकेट मिल रहे थे. हाथखर्च भी ईमानदारी से मिल गया था. इतना स्वागत तो रामदुलारे की सात पुश्तों में किसी का नहीं हुआ था. धीरेधीरे वह ‘रामभक्त’ होता जा रहा था.

रतलाम स्टेशन पर उतर कर वह टहलने लगा. तभी सामने से पूरन और लल्लन साथ आते दिखाई दिए. पुराने साथी थे रामदुलारे के. वे सब बड़े जोश में मिले. कोटा, रतलाम डिवीजन का इलाका पूरन और लल्लन का था. अच्छे कलाकार थे. इन के दल में लल्लन तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार था. जब हिंदुस्तान में टीवी आया भी नहीं था तभी इस की तसवीरें दुनिया के टीवी पर आ गई थीं. जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, तब कामराज भारतीय राजनीति के क्षितिज पर सूर्य की तरह चमक रहे थे. वे इंदिरा गांधी के साथ थे. कुछ देर तक वे पत्रकारों से घिरे उन के प्रश्नों के जवाब देते रहे. फिर राष्ट्रपति भवन चले गए. इसी अवधि में लल्लन ने उन की जेब साफ कर दी. अच्छाखासा चमड़े का बटुआ था. लेकिन एकांत में जब लल्लन ने उसे खोला तो अपना माथा ठोक लिया. उस में कागज ही  कागज थे. कुछ अंगरेजी में टाइप किए हुए और कुछ हस्तलिखित. खोदा पहाड़, निकली चुहिया. लल्लन ने वह बटुआ चढ़ती यमुना को अर्पित कर दिया.

उधर, कामराज के बटुए को ले कर बड़ी हायतौबा मची. दिल्ली पुलिस कमिश्नर को बरखास्त कर दिया गया. पुलिस महानिदेशक को सरेआम फटकार खानी पड़ी. कामराज पसीनापसीना हो रहे थे. उस बटुए में बड़े महत्त्वपूर्ण गुप्त कागजात थे. विरोधी पार्टी के हाथों पड़ जाते तो लेने के देने पड़ जाते. संभावित मंत्रियों के विषय में कुछ पूर्व निर्धारित संकेत थे, सलाहमशवरा करने के कुछ मुद्दे थे.

गुप्तचर विभाग सक्रिय हो गया. सारा कार्यक्रम विदेशी पत्रकारों ने कैमरे में कैद किया था. हजारों फोटो उस समय के देखे गए. तभी अचानक रूस के एक फोटो- पत्रकार ने एक फोटो प्रस्तुत कर तहलका मचा दिया. जिस समय कामराज इंदिरा गांधी को बधाई दे रहे थे, उसी समय गले में कैमरा डाले एक आदमी कामराज की जेब में हाथ डाल रहा था.

गुप्तचर विभाग ने अपने ढंग से कार्यवाही कर के दूसरे ही दिन लल्लन को रात में सोते हुए धरदबोचा. फिर तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लल्लन चर्चा का विषय बन गया.

पूरन, लल्लन का पूरा गिरोह चल रहा था. पूछने पर रामदुलारे ने बात एकदम साफ कर दी कि इस समय तो वह कारसेवा में ही जा रहा है, धंधे पर नहीं है.

खैर, तीनों ने एक स्टाल से चाय पी. रामदुलारे ने पैसा देने की जिद की तो पूरन, लल्लन चुप हो गए, लेकिन यह क्या? रामदुलारे के कुरते की जेब कटी हुई थी. 125 रुपए साफ हो चुके थे. उस ने जेब से हाथ नहीं निकाला, कुछ देर सोचता रहा. फिर बोला, ‘‘शायद बटुआ अंदर ट्रेन में है, तुम्हीं दे दो पैसे.’’

लल्लन ने पैसे चुका दिए. कुछ देर बाद गाड़ी में सब सवार हो लिए और कारसेवकों ने एतराज किया कि कोई गैरआदमी अंदर नहीं आ सकता किंतु रामदुलारे के समझाने पर वे मान गए.

लगभग 1 घंटे बाद एक आदमी एक पेटी ले कर आया. उस पर विश्व हिंदू परिषद का नाम अंकित था. वह मंदिर निर्माण के लिए दान ले रहा था. जब वह दूसरे लोगों के पास से हो कर रामदुलारे के पास आया तो रामदुलारे ने अपने कुरते की जेब से नोटों का बंडल निकाला और 1,133 रुपए दान में लिखवा कर दे दिए. बाकी रकम उस ने पूरन, लल्लन के सामने ही गिनी. अब उस के पास 125 रुपए थे.

‘‘क्यों, तुम कुछ दान नहीं करोगे?’’ उस ने लल्लन उस्ताद से पूछा. लल्लन ने अपनी जेब में हाथ नहीं डाला और बोला, ‘‘अब तुम ने दिया तो हम ने दिया, तुम्हारा रुपया भी तो हमारा ही है.’’ दोनों ने एकदूसरे की बात समझी और चुप हो गए. झांसी स्टेशन पर पूरन, लल्लन उतर कर दूसरे डब्बे में चले गए.

रामदुलारे झांसी स्टेशन पर उतरा तो उस ने घोषणा सुनी, ‘‘सभी रामभक्त कारसेवकों को सूचित किया जाता है कि विश्व हिंदू परिषद की ओर से किसी भी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं लिया जा रहा है. कुछ धोखेबाज लोग इस तरह से पैसा एकत्र कर रहे हैं. यदि ऐसे किसी भी व्यक्ति को देखें तो पुलिस के सिपुर्द कर दें.’’

रामदुलारे समझ गया कि लल्लनपूरन के ही आदमी रहे होंगे. सोचा कि चलो ठीक है, उन की रकम उन तक पहुंच गई.

रामदुलारे शांति से डब्बे में जा कर बैठ गया. किसी रामभक्त ने उसे एक हनुमान चालीसा और तुलसी की माला दे दी. माला उस ने गले में डाल ली और हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा. धीरेधीरे उस के मन में भक्ति सवार हो रही थी.

गाड़ी चलने ही वाली थी कि 5-7 पुलिस के जवान गाड़ी में चढ़ आए. उन्होंने कारसेवकों से प्लेटफौर्म पर उतर जाने को कहा. सभी नीचे उतर आए. गाड़ी फिर रुक गई. कुछ गुप्तचर विभाग वाले कारसेवकों की तलाशी लेने लगे. जैसे ही रामदुलारे का नंबर आया कि एक अफसर बोला, ‘‘अरे, यह तो दसनंबरी रामदुलारे है. गिरफ्तार कर लो इसे. साला पाकेटमार, अयोध्या में धंधा करने जा रहा है.’’

अफसर के संकेत पर रामदुलारे को पकड़ लिया गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘कसम ले लो साहब, इस समय तो मैं सच्चे दिल से कारसेवा में जा रहा हूं. भगवान की कसम खाता हूं…’’ तभी एक डंडा उस के पृष्ठभाग पर पड़ा, ‘‘हर बार कसम खाता है, कसम खाने के अलावा और है क्या तेरे पास? नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने जा रही है.’’

रामदुलारे वहीं महारानी लक्ष्मीबाई की वीरभूमि में वीरतापूर्वक गिरफ्तार कर लिया गया. एक बात अच्छी रही, उस समय गिरफ्तार व्यक्तियों की पिटाई नहीं हो रही थी. इज्जत से बंद किया जा रहा था. एक पुराने से किलेनुमा विद्यालय में उन्हें नजरबंद कर दिया गया. खानापानी समय पर मिलता रहा. शायद जल्दी में या व्यस्तता के कारण रामदुलारे का अलग से ‘विशेष’ प्रबंध नहीं किया गया था.

वहीं बाबा सत्यनाम दास मिले. उन्होंने 3 दिन के लिए उपवास किया. कई सद्गृहस्थ भक्तों ने उपवास में साथ दिया. रामदुलारे भी उपवास पर उतर गया. जेल के कानून के तहत कोई भी कैदी 24 घंटे से ज्यादा भूखा रहता है तो वह दंडनीय अपराध है. उसे जोरजबरदस्ती से खिलाने का प्रबंध किया जाता है.

उपवास के दूसरे ही दिन पुलिस अधिकारी आ धमके. उपवास करने वालों की सूची बनी. कहासुनी हुई. तभी वह अफसर भी आ गया जिस ने रामदुलारे को गिरफ्तार किया था. वह रामदुलारे को देख कर ही आपा खो बैठा. रामदुलारे की समझ में नहीं आ रहा था कि उस ने कौन उस की भैंस चुरा ली है या उस के बच्चे का अपहरण कर लिया है.

खैर, रामदुलारे को सब से अलग कर दिया गया. कुछ देर बाद उसे कोतवाली ले जाया गया. वहां कुछ सिपाही माथे और हाथों पर पट्टी बांधे बैठे थे. शहर में दंगा हो गया था, वहीं इन लोगों की मरम्मत हुई थी. शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया था. रामदुलारे जेबकतरा है, यह जान कर वे चारों सिपाही उठ खड़े हुए और अंदर का सीखचों वाला कक्ष खोल कर उस में बंद रामदुलारे को बाहर खींच लाए. फिर अपनेअपने लट्ठों से चारों ने मिल कर रामदुलारे की धुनाई की. उन्होंने शहर के दंगाइयों का पूरा बदला रामदुलारे से लिया.

वैसे तो रामदुलारे वीर था. ऐसे अनेक प्रहार वह अनेक बार सह चुका था, पर अब देह थक रही थी. पुराने जख्म भी दर्द करते थे. उन्हीं पर नए जख्म ज्यादा पीड़ा देने लगे, किंतु भीष्मपितामह की तरह वह सारी पीड़ा अंदर ही अंदर पी गया. उफ तक नहीं की बंदे ने. उसे मारमार कर सिपाही थक गए. रामदुलारे की पोरपोर से दर्द उठ रहा था. हड्डीहड्डी हिल गई थी.

रामदुलारे जमीन पर लेट गया और आंखें मूंद लीं. मरणासन्न सा हो गया. रुकरुक कर हिचकी लेने लगा. किसी ने शायद भीतर थानेदार से कहा होगा. थानेदार अभी आया था शहर से हायतौबा करता. उस ने रामदुलारे का यह हाल देखा तो बौखला गया. सिपाहियों पर बुरी तरह गरजा. लाइनहाजिर होने का हुक्म दे दिया गया.

रामदुलारे को सरकारी अस्पताल में दाखिल करवा कर छोड़ देने का हुक्म हुआ. 4 जवान रामदुलारे को अस्पताल ले आए. वहां उसे भरती करवा कर पुलिस वाले चले गए. डाक्टरों से कहा कि शहर के दंगे में चोट खा गया है. तुरंत इलाज चालू हो गया.

3 दिन में रामदुलारे ठीक हो गया. दर्द तो खैर था, लेकिन अब चलफिर सकता था. बाएं हाथ पर प्लास्टर चढ़ गया था. माथे, पैर और पीठ पर पट्टियां बंधी थीं. फिर भी रामदुलारे के लिए यह बहुत परेशानी की बात नहीं थी.

उस दिन वह अपने बिस्तर से उतर कर बाहर टहलने लगा. फिर मुख्यद्वार से हो कर बाहर सड़क तक आ गया. फिर एक रिकशा में बैठ कर सीधा स्टेशन आ गया. उस के पास रिकशा वाले को देने के लिए पैसे नहीं थे. वहां स्टेशन पर कहासुनी होने लगी. रामदुलारे के गले में चांदी की तुलसी के दानों की कंठी थी. उस ने कंठी रिकशा वाले को दे दी. फिर सामने प्लेटफौर्म पर पहुंचा तो बड़ौदा जाने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस तैयार खड़ी मिली. यह संयोग की ही बात थी कि वह सकुशल दूसरे दिन सुबह 5 बजे बड़ौदा आ गया.

बड़ौदा स्टेशन पर उतरते ही एक आश्चर्य हुआ. लोगों में होहल्ला हुआ और धीरेधीरे भीड़ रामदुलारे के पास एकत्र हो गई. कुछ कार्यकर्ताओं ने उसे पहचान लिया.

‘‘अरे, रामदुलारे भाई हो न? कारसेवा में गए थे?’’ ‘‘ये तो कारसेवक हैं, बेचारे को कितनी तकलीफ सहनी पड़ी.’’

फिर तो रामदुलारे लोगों की भीड़ का केंद्रबिंदु बन गया. रामदुलारे कुछ कहता इस से पहले ही लोगों ने उस की रामकहानी बना डाली. ‘गोलियां लगी हैं बेचारे को’, ‘सरयू नदी में फेंक दिया था अयोध्या में’, ‘यही चढ़ा था बाबरी मसजिद पर’, ‘बड़ी बेरहमी से पीटा है बेचारे को.’

देखते ही देखते रामदुलारे हीरो हो गया. आननफानन में ही एक जीप में रामदुलारे की सवारी तैयार हो गई. मालाओं से लद गया रामदुलारे. जुबली गार्डन में बजरंग दल वाले उपवास पर बैठे थे. वहीं ले गए रामदुलारे को. धीरेधीरे आसपास के लोग एकत्र होने लगे.

एक नेता बोला, ‘‘रामभक्त रामदुलारे भाई हमारे हिंदू भाइयों के माथे का मुकुट हैं. हम ने जान लिया है कि इन का सबकुछ छीन लिया गया है. इन के शरीर पर 27 घाव हैं.’’

दूसरा आदमी आगे आया और बोला, ‘‘रतन भाई की ओर से रामभक्त रामदुलारे भाई को 1,100 रुपए की मदद दी जाती है.’’

तभी तीसरा आदमी आया और बोला, ‘‘सद्भावना ट्रस्ट की तरफ से इस भाई को 5 हजार रुपए की मदद की जा रही है.’’

फिर धीरेधीरे 27 हजार की रकम वहीं मंच पर आ गई. कुछ स्वयंसेवक झोली फैला कर 2-2, 5-5 रुपए इकट्ठे कर रहे थे.

धीरेधीरे खबर शहर के दूसरे इलाकों में फैल गई कि मसजिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने वाला भाई घायल हो कर आ गया है. उसे 8 गोलियां लगी थीं. पुलिस ने भी पीटा है. शायद कुछ और रुपए एकत्र होते, लेकिन तभी कर्फ्यू का अमल कराने सेना आ गई. अश्रु गैस के गोले छूटने लगे. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे ने सारी रकम झोली में समेटी और भाग कर एक गली में घुस कर गायब हो गया.

शहर में कर्फ्यू का अमल कड़ाई से होने लगा था.

इन्हें भी आजमाइए-

– केक में अंडे की महक न आए इस के लिए 1 चम्मच शहद केक के मिश्रण में मिला कर अच्छी तरह फेंटें.

– डोसा मिश्रण पीसते वक्त साथ में उबले चावल भी पीस लें, डोसे नरम बनेंगे.

– सूप या ग्रेवी में मिलाने के लिए क्रीम न हो तो मक्खन और दूध का मिश्रण बना कर मिला सकते हैं.

– उबले अंडों को 5 मिनट ठंडे पानी में रखें, छिलके आसानी से उतर जाएंगे.

– सांभर पाउडर और रसम पाउडर को डीप फ्रीजर में रखें, खुशबू बरकरार रहेगी.

– प्याज को पहले कम तेल में भून लें, फिर पीसें. कटा कच्चा प्याज जल्दी भुन जाता है जबकि कच्चा पिसा प्याज देर से भुनता है और तेल भी ज्यादा लगता है.

– हरी मिर्चें काटने के बाद उंगलियों में होने वाली जलन को कम करने के लिए ठंडे दूध में थोड़ी चीनी मिला कर उंगलियों को उस में थोड़ी देर रखे रहें.

– इडलियां नरम बनानी हों तो मिश्रण में खमीर उठने के बाद उसे फेंटें नहीं बल्कि बिना फेंटे ही सांचों में डाल दें.

– अंडे उबालते वक्त उस में एक चम्मच सिरका डाल दें. यदि अंडे उबलते समय क्रैक भी हो जाएंगे तो अंडे की जर्दी बाहर नहीं आएगी. Social Story in Hindi.

Hindi Romantic Story: आस्था और खतरा- कैसे हल हुई आदिल चाचा की परेशानी?

Hindi Romantic Story: आदिल खान परेशान थे. कई बार अब्बा के पास आकर अपना दुखड़ा रो चुके थे. परेशानी थी एक पीपल का पेड़, जो उनके घर के ठीक पीछे अपनी जड़ें गहरी कर उनकी पूरी छत पर अपनी टहनियां फैला चुका था. उनके घर के पीछे की जमीन नगर निगम की थी, जहां कोई निर्माणकार्य नहीं हो सकता था, मगर किसी ने पीपल के तने के चारों ओर चबूतरा बना कर भगवान की मूर्ति स्थापित कर दी थी. यह कई बरस पहले की बात है. तब आदिल चाचा जवान हुआ करते थे और पीपल का पेड़ भी तब बच्चा ही था. मगर बीते चालीस बरसों में आदिल खान की जवानी ढलती गई और पीपल का फैलाव बढ़ता गया. अब तो इसके चारों तरफ कुछ दबंग लोगों ने जमीन कब्जा करके खाने पीने के ढाबे बना लिए हैं. पहले ढाबे ऊपर से खुले हुए थे, मगर धीरे-धीरे उन पर छत भी पड़ गई. पहले टिन की और बाद में पक्की ईटों की.

आदिल चाचा ने तमाम शिकायतें नगर निगम के दफ्तर में दर्ज करवाईं कि भई फुटपाथ खत्म कर दिया इन लोगों ने, इन्हें हटाया जाए, पीपल का दरख्त काटा नहीं जा सकता तो कम से कम छंटवाया जाए ताकि हमारा घर सुरक्षित रहे, मगर आस्था का सवाल छाती तान कर खड़ा हो जाता. नगर निगम के अधिकारी आते, मौका-मुआयना करते मगर कार्रवाई कुछ न होती. वन विभाग को भी आदिल चाचा कई चिट्ठियां भेज चुके थे.

दरअसल बात आस्था की नहीं, पैसे की थी. दबंग ढाबा मालिक सबको पैसा खिला कर मामला दबवा देते थे. आस्था की आड़ में उनका अपना धंधा जो चल रहा था. तमाम लोग आते, पीपल पर जल चढ़ाते और फिर वहीं उनके ढाबे पर बैठ कर चाय-नाश्ता करते. ढाबे के बाहर तक पीपल की छांव में कुर्सियां बिछी रहती थी. पीपल कट जाता तो तेज़ धूप में ग्राहक थोड़ी ना बैठते. इसलिए पीपल बढ़ता जाता और साथ में आदिल चाचा की परेशानी भी.

अब तो पीपल की टहनियों ने आदिल चाचा के घर की छत का एक कोना भी तोड़ना शुरू कर दिया था. छत पर उसकी इतनी घनी छांव थी कि धूप का नामोनिशान न मिलता. इस वजह से बरसात के बाद छत पर सीलन और गंदगी का ढेर लग जाता. पीपल की गाद और पत्तियों ने पूरी छत को ढक लिया था. आखिर बुढ़ापे की मार झेल रहे और थोड़ी से पेंशन पर गुजारा कर रहे आदिल चाचा कहां से पैसा लाते कि मजदूर लगा कर आएदिन छत साफ करवा सकें. धीरे-धीरे सीलन पूरे घर में फैल गई थी. सीलन के चलते दीमक और चीटिंयों ने जगह-जगह अपनी बांबियां बना ली थीं. घर जर्जर होने लगा था. उस छत के नीचे अब आदिल चाचा का परिवार हर पल किसी अनहोनी के डर से सहमा रहता था.

मैं काफी दिन बाद अपने घर आया था. उस दिन आदिल चाचा मेरे पापा के पास बैठे अपना यही दुखड़ा रो रहे थे. अचानक मेरे मन में एक विचार कौंधा. मैंने आदिल चाचा को लिया और चिड़ियाघर के डायरेक्टर संजीव चतुर्वेदी से मिलने चल दिया. दरअसल वह मेरा पुराना क्लासमेट था. संजीव को मैंने सारी परेशानी बताई. यह भी कि अगर पेड़ की छंटाई न हुई तो इनके घर को भारी नुकसान हो सकता है. जान जाने का खतरा है. संजीव ने चाचा के कंधे पर प्यार से हाथ रखा और बोला, ‘परेशान न हों, आपकी परेशानी मैं हल करता हूं.’

उसने तुरंत अपने कुछ अधिकारियों को बुलाया. पूछा, ‘चिड़ियाघर के जितने हाथी हैं, महावतों से कहो कि सबको तैयार करके ले चले.’

मैं समझ नहीं पाया कि संजीव करना क्या चाहता है. आदिल चाचा भी असमंजस की हालत में थे. उन्हें भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. हमें घर जाने को कह कर संजीव हाथियों के जुलूस के साथ चल दिया. जुलूस में लकड़ी काटने वाले भी थे. आदिल चाचा के घर के पिछवाड़े यह जुलूस रुका. सड़क पर कोई दस हाथी एक के पीछे एक खड़े थे.

संजीव ने ढाबा मालिकों से बातचीत की. चंद मिनट बीते होंगे कि हमने पेड़ पर कुछ लकड़हारों को चढ़ कर टहनियां छांटते देखा. एक बड़े से ट्रक में लकड़ियां और पत्तियां जमा करके संजीव कोई चार घंटे में पेड़ छंटवा कर चला गया. घर पर रोशनी छा गई. धूप नजर आने लगी. मैंने संजीव को फोन मिलाया, पूछा, ‘यार, ये क्या जादू किया तुमने?’

संजीव हंस कर बोला, ‘भई, आस्था का मामला था न, मैंने बस इतना कहा कि गणेश जी के परिवार को खाने के लिए पत्तियां और बाड़े के लिए लकड़ियां चाहिएं, कौन मना करता इस बात पर…’ वह कह कर ठठाकर हंस पड़ा. बोला, ‘आगे जब भी पीपल छंटवाना हो, मुझे फोन कर देना.’ Hindi Romantic Story.

Family Story in Hindi: माली- क्या अरुंधती को मिला मां बनने का सुख?

Family Story in Hindi: अरुंधती कभी मां नहीं बन सकती थी और यह बात वह भलीभांति जानती भी थी. अपनी बंजर कोख उसे भीतर से कचोट रही थी और वह कुछ नहीं कर पा रही थी. लेकिन श्यामली के आने के बाद सब बदल गया, कैसे? ‘‘औ… औ… औ…’’ अरुंधती की आंख खुली तो किसी के ओकने की आवाज सुन कर एकाएक विचार मस्तिष्क में कौंधा, ‘क्या श्यामली को उलटियां हो रही हैं.’ तत्काल ही बिस्तर छोड़ वह बाहर की ओर लपकी. बाहर जा कर देखा तो श्यामली पौधों को पानी दे रही थी. ‘‘क्यों रे श्यामली, अभी तू उलटी कर रही थी?’’ श्यामली चौंक कर, ‘‘जी मैडमजी.’’ अरुंधती श्यामली के कुछ और पास आ कर मुसकराई और भौंहें उठा कर शरारती अंदाज में बोली, ‘‘क्या बात है श्यामली, कोई खुशखबरी है क्या?’’ श्यामली कुछ न बोली. दोनों हाथों से मुंह छिपा कर ऐसे खड़ी हो गई मानो शर्म के मारे अभी जमीन में गड़ जाएगी.

अरुंधती को बात सम झते देर न लगी, ‘‘श्यामली, यह तो बहुत ही खुशी की बात है. अब तू सुन, आज से तू कोई भारी काम नहीं करेगी और अपने खानपान पर पूरा ध्यान देगी. और सुन, रमिया कहां है, सो रहा है क्या? बुला उस को. मैं आज उस की खबर लेती हूं. अब सारे काम वही करेगा, तू सिर्फ आराम करेगी, सम झी?’’ अरुंधती के चेहरे पर खुशी, चिंता और उतावलेपन का मिलाजुला भाव था. श्यामली शरमा कर वहां से दौड़ गई. अरुंधती ने हाथ को ऐसे उठाया मानो कह रही हो ‘आराम से, थोड़ा हौलेहौले चल श्यामली, जरा संभल कर.’ शादी के 12 साल बीत चुके थे. अरुंधती की ममता तृषित थी. उस की बगिया में कोई फूल नहीं खिल सका. रहरह कर अतृप्त मातृत्व सूनी कोख में टीस मारता था. सभी कोशिशें कर लीं,

सभी अच्छे से अच्छे डाक्टर, बड़ेबड़े पंडितवैद्य, तांत्रिक और ओ झा से संपर्क किया लेकिन प्रकृति उस की गोद में संतान डालना भूल गई थी. अरुंधती को पौधों से बहुत ही प्यार था. वह पौधों की देखभाल ऐसे करती थी मानो वे उस के अपने बच्चे हों या फिर कह सकते हैं कि, जो ममता, जो वात्सल्य उस में उबलउबल कर बाहर छलकता था वही स्नेह वह इन पौधों पर छिड़क कर अपनी ममता की प्यास शांत करती थी. रमिया उस के यहां माली का काम करता था, बहुत छुटपन से वह अरुंधती के पास था. अरुंधती को उस से बहुत लगाव था. उस ने रमिया के रहने के लिए घर के पीछे एक छोटा सा क्वार्टर बनवा दिया था. रमिया अरुंधती का बहुत ध्यान रखता था और खासकर उस की बगिया का. उसे मालूम था कि इन पौधों में मैडमजी की जान बसती है. सो, वह उन की देखभाल में कोई कसर न छोड़ता था.

पिछले साल ही रमिया गांव से गौना करवा कर श्यामली को ले आया था. श्यामली थी तो सांवली पर उस के नैननक्श गजब के आकर्षक थे. वह बहुत ही कम बोलती थी, अधिकतर बातों का जवाब बस सिर हिला कर देती थी. काम में बहुत ही होशियार थी. सो, अरुंधती के घर के कामों में भी अब श्यामली हाथ बंटा देती थी. खाली समय में श्यामली अरुंधती से लिखना और पढ़ना भी सीखती थी. अरुंधती के स्नेह और अपनेपन की वजह से श्यामली जल्द ही उस से बहुत ही घुलमिल गई और धीरेधीरे दोनों बहुत करीब आ गईं, अपनी हर बात एकदूसरे से बांटने लगीं. तभी आज अचानक श्यामली की उलटियों की आवाज ने अरुंधती को चौंका दिया. श्यामली मां बनने वाली है, इस विचार से ही अरुंधती इतनी रोमांचित हो उठी कि उस के रोमरोम में सिहरन हो उठी मानो उस की स्वयं की कोख में से कोई नन्ही कोंपल प्रस्फुटित होने वाली है. ‘‘शेखर,’’ अरुंधती अपने पति से बोली. ‘‘हां अरु, कहो क्या बात है?’’ शेखर ने पूछा. ‘‘वो अपनी श्यामली है न, वो मां बनने वाली है.’’ ‘‘अरे वाह, यह तो बहुत ही खुशी की बात है,’’ शेखर अरुंधती की ओर देखते हुए बोला. ‘‘हां, बहुत ही खुशी की बात है. कितने वर्षों बाद हमारे आंगन में किलकारियां गूंजेंगी.

नन्हेमुन्हे बहुत ही कोमल रुई जैसे मुलायम प्यारेप्यारे छोटे से बच्चे को गोद में ले कर छाती से चिपकाने का अवसर आया है शेखर, है न? मैं ठीक कह रही हूं न?’’ अरुंधती शेखर से बोल रही थी और शेखर जैसे किसी सोच में पड़ा अरुंधती के इस उतावलेपन का आकलन कर रहा था. शेखर चिंतित था यह सोच कर कि अरुंधती की ममता उसे किस ओर ले जा रही है. इतना उतावलापन, इतना उस बच्चे के बारे में सोचना कहीं अरुंधती के लिए घातक सिद्ध न हो. पर अरुंधती तो बस बोले जा रही थी, ‘‘मैं ने तो श्यामली से कह दिया है कि वह कोई काम न करे, सिर्फ आराम करे और अच्छीअच्छी चीजें खाए. खूब जूस पिए. और हां, दूध बिना भूले दोनों समय पीना बहुत जरूरी है. आखिर पेट में एक नन्ही सी जान पल रही है.’’ वह बोलती जा रही थी और शेखर उस में वात्सल्य का बीज फूटते हुए साफसाफ देख रहा था. अरुंधती का अधिकतर समय अब श्यामली की तीमारदारी में ही निकलता था.

उस को समय से खाना खिलाना, जूस पिलाना, जबरदस्ती दूध पिलाना, समयसमय पर डाक्टर से चैकअप करवाना सब अरुंधती खुद करती थी. रमिया और श्यामली तो जैसे मैडमजी के युगोंयुगों के लिए आभारी हो गए थे. कौन किस के लिए इतना करता है, वह भी घर के एक मामूली से नौकर के लिए. उन्हें तो सम झ ही नहीं आता था कि वे मैडमजी के इन एहसानों का बदला कैसे चुकाएंगे. सौ जन्मों में भी इतने प्यार, विश्वास और अपनेपन का मूल्य नहीं चुकाया जा सकता. आखिर वह समय भी आ गया जिस की सब को प्रतीक्षा थी. श्यामली ने एक फूल से नन्हे पुत्र को जन्म दिया. सब से पहले अरुंधती ने उस को गोद में लिया. उस की आंखों से झर झर आंसू बह रहे थे. बच्चे को उस ने अपनी छाती से चिपका रखा था. उसे महसूस हो रहा था कि उस की छाती से दूध की सहस्त्रों धाराएं फूट पड़ी हैं. ‘

‘लाइए मैडम, बच्चे को उस की मां को दें ताकि वह बच्चे को स्तनपान करवा सके,’’ अचानक नर्स की आवाज से अरुंधती की तंद्रा भंग हुई. ‘‘हां, हां,’’ कह कर अरुंधती ने बच्चे को श्यामली की बगल में लिटा दिया और जैसे किसी स्वप्न से जागने के एहसास ने उस को हिला कर रख दिया. वह बहुत ही भारी मन से लड़खड़ाती हुई कमरे से बाहर निकल आई. शेखर बाहर ही खड़ा था. उसे जिस बात का अंदेशा था वही घटित हुआ. शेखर ने अरुंधती को कमर से पकड़ कर गाड़ी में बैठाया और घर ले आया. अरुंधती शून्य में थी, कुछ बोली नहीं. शेखर ने भी कोई बात नहीं छेड़ी क्योंकि वह भलीभांति जानता था कि इस समय अरुंधती के मन में क्या चल रहा है. 3 दिन गुजर गए. अरुंधती ने स्वयं को संभाल लिया था. वह रोज श्यामली से मिलने अस्पताल जाती. कुछ देर बच्चे के साथ खेलती, प्यार करती और घर आ जाती. कल श्यामली अस्पताल से घर आने वाली थी. अरुंधती ने स्वयं रमिया के यहां सारी व्यवस्थाएं करवाईं ताकि श्यामली और बच्चे को कोई परेशानी न हो. ‘‘उआं…उआं…’’ आवाज कानों में पड़ते ही अरुंधती की नींद खुली. ‘अरे, यह क्या, श्यामली घर आ गई?’ अरुंधती बिस्तर से लगभग भागती हुई उठी और तीर की गति से बाहर निकली. लपक कर रमिया के घर की तरफ दौड़ी. ‘

अरे यहां तो ताला पड़ा है. फिर श्यामली कहां… कहीं घर में तो नहीं वह…’ अपने दरवाजे की ओर लपकी लेकिन उसे फिर बाहर से ही बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी. वह बाहर निकल कर बेचैनी से इधरउधर नजरें दौड़ाने लगी. तभी उसे बगिया में कुछ हरकत सी महसूस हुई. वह तुरंत उस ओर दौड़ी, जा कर देखा तो वहां फूलों के बीच श्यामली का बच्चा लेटा हुआ था. ऐसा लग रहा था मानो अभीअभी एक नन्हा सा नयानया फूल खिला है. अरुंधती ने उस को देखते ही गोद में उठा लिया और बोली, ‘ये रमिया और श्यामली क्या पागल हो गए हैं जो इस नन्ही सी जान को यों जमीन पर लिटा दिया. वह पलट कर आवाज देने ही वाली थी कि बच्चे के हाथ में एक कागज का टुकड़ा देख कर रुक गई और उस कागज के पुर्जे को पढ़ने लगी.’ ‘‘मैडम जी, ‘‘यह आप की बगिया का फूल है, हम तो माली थे. हम ने बीज लगाया था. परंतु इस बीज को प्यार और ममता से सींचा ‘‘आप ने. अब इस फूल पर सिर्फ और सिर्फ आप का अधिकार है. ‘‘आप की, श्यामली.’’ अरुंधती कांप रही थी. उस की आंखें अविरल बह रही थीं. बच्चे को छाती से कस कर चिपटा कर मानो वह पूरे वेग से चिल्लाई, ‘‘शेखर, देखो, मैं बंजर नहीं हूं. यह देखो, फूल खिला है, मेरी बगिया का फूल, श्यामली का फूल.’’ Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: अपारदर्शी सच- तनुजा और मनीष के बीच कैसा खालीपन था?

Family Story in Hindi: रात के 11 बज चुके थे. तनुजा की आंखें नींद और इंतजार से बोझिल हो रही थीं. बच्चे सो चुके थे. मम्मीजी और मनीष लिविंगरूम में बैठे टीवी देख रहे थे. तनुजा का मन हो रहा था कि मनीष को आवाज दे कर बुला ले, लेकिन मम्मी की उपस्थिति के लिहाज के चलते उसे ठीक नहीं लगा. पानी पीने के लिए किचन में जाते हुए उस ने मनीष को देखा पर उन का ध्यान नहीं गया. पानी पी कर भी अतृप्त सी वह वापस कमरे में आ गई.

बिस्तर पर बैठ कर उस ने एक नजर कमरे पर डाली. उस ने और मनीष ने एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल रख कर इस कमरे को सजाया था.

हलके नीले रंग की दीवारों में से एक पर खूबसूरत पहाड़ी, नदी से गिरते झरने और पेड़ों की पृष्ठभूमि से सजी पूरी दीवार के आकार का वालपेपर. खिड़कियों पर दीवारों से तालमेल बिठाते नैट के परदे, फर्श से छत तक की अलमारियां, तरहतरह के सौंदर्य प्रसाधनों से भरी अंडाकार कांच की ड्रैसिंगटेबल, बिस्तर पर साटन की रौयल ब्लू चादर और टेबल पर सजा महकते रजनीगंधा के फूलों का गुलदस्ता. उसे लगा, सभी मनीष का इंतजार कर रहे हैं.

तनुजा की आंख खुली, तब दिन चढ़ आया था. उस का इंतजार अभी भी बदन में कसमसा रहा था. मनीष दोनों हाथ बांधे बगल में खर्राटे ले कर सो रहे थे. उस का मन हुआ, उन दोनों बांहों को खुद ही खोल कर उन में समा जाए और कसमसाते इंतजार को मंजिल तक पहुंचा दे. लेकिन घड़ी ने इस की इजाजत नहीं दी. फुरफुराते एहसासों को जूड़े में लपेटते वह बाथरूम चली गई.

बेटे ऋषि व बेटी अनु की तैयारी करते, सब का नाश्ताटिफिन तैयार करते, भागतेदौड़ते खुद की औफिस की तैयारी करते हुए भी रहरह कर एहसास कसमसाते रहे. उस ने आंखें बंद कर जज्बातों को जज्ब करने की कोशिश की, तभी सासुमां किचन में आ गईं. वह सकपका गई. उस ने झटके से आंखें खोल लीं और खुद को व्यस्त दिखाने के लिए पास पड़ा चाकू उठा लिया पर सब्जी तो कट चुकी थी, फिर उस ने करछुल उठा लिया और उसे खाली कड़ाही में चलाने लगी. सासुमां ने चश्मे की ओट से उसे ध्यान से देखा.

कड़ाही उस के हाथ से छूट गई और फर्श पर चक्कर काटती खाली कड़ाही जैसे उस के जलते एहसास उस के जेहन में घूमने लगे और वह चाह कर भी उन्हें थाम नहीं पाई.

एक कोमल स्पर्श उस के कंधों पर हुआ. 2 अनुभवी आंखों में उस के लिए संवेदना थी. वह शर्मिंदा हुई उन आंखों से, खुद को नियंत्रित न कर पाने से, अपने यों बिखर जाने से. उस ने होंठ दबा कर अपनी रुलाई रोकी और तेजी से अपने कमरे में चली गई.

बहुत कोशिश करने के बावजूद उस की रुलाई नहीं रुकी, बाथरूम में शायद जी भर रो सके. जातेजाते उस की नजर घड़ी पर पड़ी. समय उस के हाथ में न था रोने का. तैयार होतेहोते तनुजा ने सोते हुए मनीष को देखा. उस की बेचैनी से बेखबर मनीष गहरी नींद में थे.

तैयार हो कर उस ने खुद को शीशे में निहारा और खुद पर ही मुग्ध हो गई. कौन कह सकता है कि वह कालेज में पढ़ने वाले बच्चों की मां है? कसी हुई देह, गोल चेहरे पर छोटी मगर तीखी नाक, लंबी पतली गरदन, सुडौल कमर के गिर्द लिपटी साड़ी से झांकते बल. इक्कादुक्का झांकते सफेद बालों को फैशनेबल अंदाज में हाईलाइट करवा कर करीने से छिपा लिया है उस ने. सब से बढ़ कर है जीवन के इस पड़ाव का आनंद लेती, जीवन के हिलोरों को महसूस करते मन की अंगड़ाइयों को जाहिर करती उस की खूबसूरत आंखें. अब बच्चे बड़े हो कर अपने जीवन की दिशा तय कर चुके हैं और मनीष अपने कैरियर की बुलंदियों पर हैं. वह खुद भी एक मुकाम हासिल कर चुकी है. भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति है जो उस के चेहरे, आंखों, चालढाल से छलकती है.

मनीष उठ चुके थे. रात के अधूरे इंतजार के आक्रोश को परे धकेल एक मीठी सी मुसकान के साथ उस ने गुडमौर्निंग कहा. मनीष ने एक मोहक नजर उस पर डाली और उठ कर उसे बांहों में भर लिया. रीढ़ में फुरफुरी सी दौड़ गई. कसमसाती इच्छाएं मजबूत बांहों का सहारा पा कर कुलबुलाने लगीं. मनीष की आंखों में झांकते हुए तपते होंठों को उस के होंठों के पास ले जाते शरारत से उस ने पूछा, ‘‘इरादा क्या है?’’ मनीष जैसे चौंक गए, पकड़ ढीली हुई, उस के माथे पर चुंबन अंकित करते, घड़ी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘इरादा तो नेक ही है, तुम्हारे औफिस का टाइम हो गया है, तुम निकल जाना.’’ और वे बाथरूम की तरफ बढ़ गए.

जलते होंठों की तपन को ठंडा करने के लिए आंसू छलक पड़े तनुजा के. कुछ देर वह ऐसे ही खड़ी रही उपेक्षित, अवांछित. फिर मन की खिन्नता को परे धकेल, चेहरे पर पाउडर की एक और परत चढ़ा, लिपस्टिक की रगड़ से होंठों को धिक्कार कर वह कमरे से बाहर निकल गई.

करीब सालभर पहले तक सब सामान्य था. मनीष और तनुजा जिंदगी के उस मुकाम पर थे जहां हर तरह से इतमीनान था. अपनी जिंदगी में एकदूसरे की अहमियत समझतेमहसूस करते एकदूसरे के प्यार में खोए रहते.

इस निश्चितता में प्यार का उछाह भी अपने चरम पर था. लगता, जैसे दूसरा हनीमून मना रहे हों जिस में अब उत्सुकता की जगह एकदूसरे को संपूर्ण जान लेने की तसल्ली थी. मनीष अपने दम भर उसे प्यार करते और वह पूरी शिद्दत से उन का साथ देती. फिर अचानक यों ही मनीष जल्दी थकने लगे तो उसी ने पूरा चैकअप करवाने पर जोर दिया.

सबकुछ सामान्य था पर कुछ तो असामान्य था जो पकड़ में नहीं आया था. वह उन का और ध्यान रखने लगी. खाना, फल, दूध, मेवे के साथ ही उन की मेहनत तक का. उस की इच्छाएं उफान पर थीं पर मनीष के मूड के अनुसार वह अपने पर काबू रखती. उस की इच्छा देखते मनीष भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते लेकिन वह अतृप्त ही रह जाती.

हालांकि उस ने कभी शब्दों में शिकायत दर्ज नहीं की, लेकिन उस की झुंझलाहट, मुंह फेर कर सो जाना, तकिए में मुंह दबा कर ली गई सिसकियां मनीष को आहत और शर्मिंदा करती गईं. धीरेधीरे वे उन अंतरंग पलों को टालने लगे. तनुजा कमरे में आती तो मनीष कभी तबीयत खराब होने का बहाना बनाते, कभी बिजी होने की बात कर लैपटौप ले कर बैठ जाते.

कुछकुछ समझते हुए भी उसे शक हुआ कि कहीं मनीष का किसी और से कोई चक्कर तो नहीं है? ऐसा कैसे हो सकता है जो व्यक्ति शाम होते ही उस के आसपास मंडराने लगता था वह अचानक उस से दूर कैसे होने लगा? लेकिन उस ने यह भी महसूस किया कि मनीष अब भी उस से प्यार करते हैं. उस की छोटीछोटी खुशियां जैसे सप्ताहांत में सिनेमा, शौपिंग, आउटिंग सबकुछ वैसा ही तो था. किसी और से चक्कर होता तो उसे और बच्चों को इतना समय वे कैसे देते? औफिस से सीधे घर आते हैं, कहीं टूर पर जाते नहीं.

शक का कीड़ा जब कुलबुलाता है तब मन जितना उस के न होने की दलीलें देता है उतना उस के होने की तलाश करता. कभी नजर बचा कर डायरी में लिखे नंबर, तो कभी मोबाइल के मैसेज भी तनुजा ने खंगाल डाले पर शक करने जैसा कुछ नहीं मिला.

उस ने कईकई बार खुद को आईने में निहारा, अंगों की कसावट को जांचा, बातोंबातों में अपनी सहेलियों से खुद के बारे में पड़ताल की और पार्टियों, सोशल गैदरिंग में दूसरे पुरुषों की नजर से भी खुद को परखा. कहीं कोई बदलाव, कोई कमी नजर नहीं आई. आज भी जब पूरी तरह से तैयार होती है तो देखने वालों की नजर एक बार उस की ओर उठती जरूरी है.

हर ऐसे मौकों पर कसौटी पर खरा उतरने का दर्प उसे कुछ और उत्तेजित कर गया. उस की आकांक्षाएं कसमसाने लगीं. वह मनीष से अंतरंगता को बेचैन होने लगी और मनीष उन पलों को टालने के लिए कभी काम में, कभी बच्चों और टीवी में व्यस्त होने लगे.

अधूरेपन की बेचैनी दिनोंदिन घनी होती जा रही थी. उस दिन एक कलीग को अपनी ओर देखता पा कर तनुजा के अंदर कुछ कुलबुलाने लगा, फुरफुरी सी उठने लगी. एक विचार उस के दिलोदिमाग में दौड़ कर उसे कंपकंपा गया. छी, यह क्या सोचने लगी हूं मैं? मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती. मेरे मन में यह विचार आया भी कैसे? मनीष और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं, प्यार का मतलब सिर्फ यही तो नहीं है. कितना धिक्कारा था तनुजा ने खुद को लेकिन वह विचार बारबार कौंध जाता, काम करते हाथ ठिठक जाते, मन में उठती हिलोरें पूरे शरीर को उत्तेजित करती रहीं.

अतृप्त इच्छाएं, हर निगाह में खुद के प्रति आकर्षण और उस आकर्षण को किस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, वह यह सोचने लगी. संस्कारों के अंकुश और नैसर्गिक प्यास की कशमकश में उलझी वह खोईखोई सी रहने लगी.

उस दिन दोपहर तक बादल घिर आए थे. खाना खा कर वह गुदगुदे कंबल में मनीष के साथ एकदूसरे की बांहों में लिपटे हुए कोई रोमांटिक फिल्म देखना चाहती थी. उस ने मनीष को इशारा भी किया जिसे अनदेखा कर मनीष ने बच्चों के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया. वे नासमझ बन तनुजा से नजरें चुराते रहे, उस के घुटते दिल को नजरअंदाज करते रहे. वह चिढ़ गई. उस ने जाने से मना कर दिया, खुद को कमरे में बंद कर लिया और सारा दिन अकेले कमरे में रोती रही.

तनुजा ने पत्रपत्रिकाएं, इंटरनैट सब खंगाल डाले. पुरुषों से जुड़ी सैक्स समस्याओं की तमाम जानकारियां पढ़ डालीं. परेशानी कहां है, यह तो समझ आ गया लेकिन समाधान? समाधान निकालने के लिए मनीष से बात करना जरूरी था. बिना उन के सहयोग के कोई समाधान संभव ही नहीं था. बात करना इतना आसान तो नहीं था.

शब्दों को तोलमोल कर बात करना, एक कड़वे सच को प्रकट करना इस तरह कि वह कड़वा न लगे, एक ऐसी सचाई के बारे में बात करना जिसे मनीष पहले से जानते हैं कि तनुजा इसे नहीं जानती और अब उन्हें बताना कि वह भी इसे जानती है, यह सब बताते हुए भी कोई आक्षेप, कोई इलजाम न लगे, दिल तोड़ने वाली बात पर दिल न टूटे, अतिरिक्त प्यारदेखभाल के रैपर में लिपटी शर्मिंदगी को यों सामने रखना कि वह शर्मिंदा न करे, बेहद कठिन काम था.

दिन निकलते गए. कसमसाहटें बढ़ती गईं. अतृप्त प्यास बुझाने के लिए वह रोज नए मौकेरास्ते तलाशती रही. समाज, परिवार और बच्चे उस पर अंकुश लगाते रहे. तनुजा खुद ही सोचती कि क्या इस एक कमी को इस कदर खुद पर हावी होने देना चाहिए? तो कभी खुद ही इस जरूरी जरूरत के बारे में सोचती जिस के पूरा न होने पर बेचैन होना गलत भी तो नहीं. अगर मनीष अतृप्त रहते तो क्या ऐसा संयम रख पाते? नहीं, मनीष उसे कभी धोखा नहीं देते या शायद उसे कभी पता ही नहीं चलने देते.

निशा उस की अच्छी सहेली थी. उस से तनुजा की कशमकश छिपी न रह सकी. तनुजा को दिल का बोझ हलका करने को एक साथी तो मिला जिस से सहानुभूति के रूप में फौरीतौर पर राहत मिल जाती थी. निशा उसे समझाती तो थी पर क्या वह समझना चाहती है, वह खुद भी नहीं समझ पाती थी. उस ने कई बार इशारे में उसे विकल्प तलाशने को कहा तो कई बार इस के खतरे से आगाह भी किया. कई बार तनुजा की जरूरत की अहमितयत बताई तो कई बार समाज, संस्कार के महत्त्व को भी समझाया. तनुजा की बेचैनी ने उस के मन में भी हलचल मचाई और उस ने खुद ही खोजबीन कर के कुछ रास्ते सुझाए.

धड़कते दिल और डगमगाते कदमों से तनुजा ने उस होटल की लौबी में प्रवेश किया था. साड़ी के पल्लू को कस कर लपेटे वह खुद को छिपाना चाह रही थी पर कितनी कामयाब थी, नहीं जानती. रिसैप्शन पर बड़ी मुश्किल से रूम नंबर बता पाई थी. कितनी मुश्किल से अपने दिल को समझा कर वह खुद को यहां तक ले कर आई थी. खुद को लाख मनाने और समझाने पर भी एक व्यक्ति के रूप में खुद को देख पाना एक स्त्री के लिए कितना कठिन होता है, यह जान रही थी.

अपनी इच्छाओं को एक दायरे से बाहर जा कर पूरा करना कितना मुश्किल होता है, लिफ्ट से कमरे तक जाते यही विचार उस के दिमाग को मथ रहे थे. कमरे की घंटी बजा कर दरवाजा खुलने तक 30 सैकंड में 30 बार उस ने भाग जाना चाहा. दिल बुरी तरह धड़क रहा था. दरवाजा खुला, उस ने एक बार आसपास देखा और कमरे के अंदर हो गई. एक अनजबी आवाज में अपना नाम सुनना भी बड़ा अजीब था. फुरफुराते एहसास उस की रीढ़ को झुनझुना रहे थे. बावजूद इस के, सामने देख पाना मुश्किल था. वह कमरे में रखे एक सोफे पर बैठ गई, उसे अपने दिमाग में मनीष का चेहरा दिखाई देने लगा.

क्या वह ठीक कर रही? इस में गलत क्या है? आखिर मैं भी एक इंसान हूं. अपनी इच्छाएं, अपनी जरूरतें पूरी करने का हक है मुझे. मनीष को पता चला तो?

कैसे पता चलेगा, शहर के इस दूसरे कोने में घरऔफिस से दसियों किलोमीटर दूर कुछ हुआ है, इस की भनक तक इतनी दूर नहीं लगेगी. इस के बाद क्या वह खुद से नजरें मिला पाएगी? यह सब सोच कर उस की रीढ़ की वह सनसनाहट ठंडी पड़ गई, उठ कर भाग जाने का मन हुआ. वह इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती. मनीष, मम्मी, बच्चे, जानपहचान वाले, रिश्तेदार सब की नजरों में वह नहीं गिर सकती.

वेटर 2 कौफी रख गया. कौफी की भाप के उस पार 2 आंखें उसे देख रही थीं. उन आंखों की कामुकता में उस के एहसास फिर फुरफुराने लगे. उस ने अपने चेहरे से हो कर गरदन, वक्ष पर घूमती उन निगाहों को महसूस किया. उस के हाथ पर एक स्पर्श उस के सर्वांग को थरथरा गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. वह स्पर्श ऊपर और ऊपर चढ़ते बाहों से हो कर गरदन के खुले भाग पर मचलने लगा. उस की अतृप्त कामनाएं सिर उठाने लगीं. अब वह सिर्फ एक स्त्री थी हर दायरे से परे, खुद की कैद से दूर, अपनी जरूरतों को समझने वाली, उन्हें पूरा करने की हिम्मत रखने वाली.

सहीगलत की परिभाषाओं से परे अपनी आदिम इच्छाओं को पूरा करने को तत्पर वह दुनिया के अंतिम कोने तक जा सकने को तैयार, उस में डूब जाने को बेचैन. तभी वह स्पर्श हट गया, अतृप्त खालीपन के झटके से उस ने आंखें खोल दीं. आवाज आई, ‘कौफी पीजिए.’

कामुकता से मुसकराती 2 आंखें देख उसे एक तीव्र वितृष्णा हुई खुद से, खुद के कमजोर होने से और उन 2 आंखों से. होटल के उस कमरे में अकेले उस अपरिचित के साथ यह क्या करने जा रही थी वह? वह झटके से उठी और कमरे से बाहर निकल गई. लगभग दौड़ते हुए वह होटल से बाहर आई और सामने से आती टैक्सी को हाथ दे कर उस में बैठ गई. तनुजा बुरी तरह हांफ रही थी. वह उस रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

दोनों ओर स्थितियां चरम पर थीं. दोनों ही अंदर से टूटने लगे थे. ऐसे ही जिए जाने की कल्पना भयावह थी. उस रात तनुजा की सिसकियां सुन मनीष ने उसे सीने से लगा लिया. उस का गला रुंध गया, आंसू बह निकले. ‘‘मैं तुम्हारा दोषी हूं तनु, मेरे कारण…’’

तनु ने उस के होंठों पर अपनी हथेली रख दी, ‘‘ऐसा मत कहो, लेकिन मैं करूं क्या? बहुत कोशिश करती हूं लेकिन बरदाश्त नहीं कर पाती.’’

‘‘मैं तुम्हारी बेचैनी समझता हूं, तनु,’’ मनीष ने करवट ले कर तनुजा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया, ‘‘तुम चाहो तो किसी और के साथ…’’ बाकी के शब्द एक बड़ी हिचकी में घुल गए.

वह बात जो अब तक विचारों में तनुजा को उकसाती थी और जिसे हकीकत में करने की हिम्मत वह जुटा नहीं पाई थी, वह मनीष के मुंह से निकल कर वितृष्णा पैदा कर गई.

तनुजा का मन घिना गया. उस ने खुद ऐसा कैसे सोचा, इस बात से ही नफरत हुई. मनीष उस से इतना प्यार करते हैं, उस की खुशी के लिए इतनी बड़ी बात सोच सकते हैं, कह सकते हैं लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी? क्या ऐसा करना ठीक होगा? नहीं, कतई नहीं. उस ने दृढ़ता से खुद से कहा.

जो सच अब तक संकोच और शर्मिंदगी का आवरण ओढ़े अपारदर्शी बन कर उन के बीच खड़ा था, आज वह आवरण फेंक उन के बीच था और दोनों उस के आरपार एकदूसरे की आंखों में देख रहे थे. अब समाधान उन के सामने था. वे उस के बारे में बात कर सकते थे. उन्होंने देर तक एकदूसरे से बातें कीं और अरसे बाद एकदूसरे की बांहों में सो गए एक नई सुबह में उठने के लिए. Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: धूप छांव सी जिंदगी- क्या पूरा हुआ सपना का ख्वाब?

Family Story in Hindi: गांव की कच्ची सड़क पर अकेली चलतीचलती सपना के पैर अचानक रुक गए. उस ने पीछे गांव की ओर जाती टेढ़ीमेढ़ी, ऊबड़खाबड़ सड़क की ओर पलट कर एक नजर भर देखा और मन में एक दृढ़ निश्चय के साथ आगे शहर को जोड़ने वाली उस पक्की सड़क की ओर अपने कदम बढ़ा दिए.

गांव की वह पगडंडीनुमा ऊबड़खाबड़ सड़क आगे जा कर शहर की ओर जाने वाली उस पक्की चौड़ी सड़क में विलीन हो जाती थी. गांव की उस कच्ची सड़क की सीमा पर शहर की ओर जाने वाली पक्की सड़क के ठीक किनारे ईंटसीमेंट से बनी एक छोटी सी पुलिया थी, जो कि  जर्जर अवस्था में थी और जिस का एकमात्र उपयोग बस के लिए प्रतीक्षारत यात्रियों के बैठने के रूप में होता था और जहां शहर की ओर जाने वाली तमाम बसें कुछ मिनट के लिए आ कर रुका करती थीं.

सपना जब उस पुल तक पहुंची, तो सूर्योदय हो चुका था. तकरीबन 1 घंटे से वह उस पुल पर बैठी बस की प्रतीक्षा कर रही थी. सुबह का हलकामीठा लालिमायुक्त प्रकाश अब आहिस्ताआहिस्ता तेज प्रखर रूप धारण कर चुका था. सामने सड़क के दूसरी ओर घने पेड़ों के झुरमुट के बीच से हो कर सूरज की झिलमिलाती तेज किरणें उस के चेहरे के साथ अठखेलियां कर रही थीं, किंतु वह किसी गहरे सोचविचार में डूबी हुई थी.  उस के कानों में रहरह कर उस के बाबू का वह स्वर गूंज उठता था, ’’मुझे तो अब इस लड़की का भी भरोसा नहीं.’’

“सपना… अरे ओ सपना, कहां मर गई छोरी… घंटेभर से आवाज लगा रही हूं तुझे. देख, तेरे बाबू के आने का टैम (टाइम) हो गया है. बित्तर (भीतर) बैठीबैठी ना जाने क्या कर रही है छोरी?‘’

सपना अपने कमरे में गुमसुम बैठी हुई है. मां के शब्द मानो उस के कानों से टकरा कर वापस चले जाते हों. मां की बातों का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था. वह अपने कमरे में बैठी खिड़की के बाहर देखे जा रही है, बिलकुल खामोश वह किसी गहरी चिंता में मग्न गुमसुम सी बैठी हुई है.    पिता भी डांटडपट कर सुबह दुकान के लिए जा चुके थे. मां भी कहसुन कर, रोपीट कर रसोई के काम में जुट गई थी. सारे दिन अकेली घर का सारा काम संभालतेसंभालते अब उस का गुस्सा भी सातवें आसमान पर जा पहुंचा था.

सपना की मां ने कमरे के पास आ कर फिर आवाज लगाई, ‘’अरे ओ छोरी, घणा बेर (बहुत देर) से आवाज लगा रही हूं, सुनती क्यों नहीं? घर के लुगाइयों वाली चाल नहीं सीखेगी, ससुराल जा कर नाक कटाएगी के. इस के कारण आदमी की गालियां सुनो, लेकिन छोरी है कि जिद पकड़े बैठी है.‘’

‘’अरे, जाण दे उसन (जाने दो उसे),’’ तभी सपना के बाबू का क्रोधपूर्ण शब्द सपना के कानों में गूंजा, ‘’दो दिन में इस की अक्ल ठिकाने आ जाएगी, भूख लगेगी तो खुद ही कमरे के बाहर आ जाएगी, तुम क्यों बेकार में अपना खून जला रही है?”

“अरे, देखना तुम यह भी वही सब करेगी, जो इस की  बड़ी बहन ने किया था. मुझे तो इस का भी भरोसा नहीं,’’ पिता की आवाज सुन सपना अपने पलंग से उतर आई और दरवाजे से कान सटा कर मांबापू की बातें सुनने की कोशिश करती है.

उस का बापू उस की मां से कहता है, ‘’सुनीता का पता चल गया है, वह शहर में है. उसी लड़के के साथ… दोनों ने शादी कर ली है. आज ही कन्हैया बाबू का लड़का शहर से आया है. उसी ने उन दोनों को वहां पर देखा. अब यह भी कोई गलत कदम उठाए, उस से पहले इस की शादी करा देना ही उचित होगा.

“सच कहता हूं कि मुझे अब इस का भी भरोसा नहीं. आगे पढ़ने  की जिद किए बैठी है. कहां से लाऊंगा मैं इतना पैसा? शहर जा कर पढ़ना चाहती है, शहर की पढ़ाई में जानती भी है… कितना खर्चा आता है.”

“जितना जल्दी हो सके, इस के हाथ पीले करा दें तो ही जा कर अपने मन को शांति मिलेगी, नहीं तो हर वक्त यही डर बना रहेगा कि जो कांड इस की बड़ी बहन ने किया वही सबकुछ यह भी न कर ले…’’

‘’तुम ठीक ही कहते हो सपना के बापू… जवान छोरी के मांबापू के कलेजे में तो डर हमेशा बना रहता है….‘’ सपना की मां ने भी उस के पिता का ही समर्थन किया.

अपने पिता के द्वारा कही गई ये बातें सपना के सीने में तीर की भांति लगती हैं, उस की नजर में उस वक्त अपने  ही मांबापू किसी दुश्मन से कम नहीं लग रहे थे. बहुत देर तक उदास बैठी वह जाने क्याक्या मन ही मन सोचती रही, और फिर अचानक उस ने अपने मन में एक दृढ़ निश्चय किया. उस ने तय किया कि अब वह अकेली ही शहर के लिए निकल जाएगी और  लौट कर वापस कभी नहीं आएगी. जिस घर में उस के मांबापू को ही उस पर भरोसा नहीं है, वह उस घर में कभी वापस नहीं आएगी. कम से कम वह तब तक वापस नहीं आएगी, जब तक वह योग्य नहीं बन जाती. और फिर अगले दिन ही सुबहसुबह वह अपने घर को छोड़ कर निकल पड़ती है. अपने गांव से तकरीबन 3 किलोमीटर की दूरी पैदल चलती हुई वह शहर की ओर जाने वाली इस पक्की सड़क तक आ पहुंचती है.

सड़क के किनारे बने उस छोटे से पुल पर बैठी हुई सपना अपनी ही धुन में खोई हुई थी. उस के चेहरे पर हलकी सी उदासी उभर आई थी, चिंता की कई परतें उस के मानसपटल पर उभर आती और फिर मिट जाती.

दिल्ली, दिल्ली की आवाज ने उसे जैसे  नींद से जगा दिया. वह एकदम से उठी और सामने खड़ी बस में जा बैठी. बस की ज्यादातर सीटें खाली थीं. वह खिड़की के किनारे वाली एक सीट पर जा बैठती है, बस चल पड़ती है.

‘’हैलो, हां, मैं पहुंच रही हूं, तुम मुझे लेने आ जाओगे ना,‘’ सपना ने अपने मोबाइल से किसी को फोन किया.

“हां, मैं आ जाऊंगा, तुम दिल्ली पहुंचने के एक घंटे पहले मुझे फोन कर देना. मैं वक्त पर पहुंच जाऊंगा,‘’ फोन की दूसरी तरफ से किसी ने जवाब दिया.

‘’और मेरे रहने का इंतजाम…’’

‘’वह भी हो जाएगा… तुम चिंता मत करो.‘’

सपना जब दिल्ली पहुंची, तो जितेंद्र उस के इंतजार में उसे खड़ा मिला. उस ने उसे देखते ही दूर से हाथ हिलाया और पास आ कर उस का सामान उठा कर  बाइक पर रख लिया और उस के साथ गर्ल्स होस्टल की ओर चल दिया.

‘’तो, आखिर तुम ने हिम्मत दिखा ही दी…’’ बाइक चलातेचलाते जितेंद्र ने सपना की ओर पीछे पलट कर देखा.

सपना चुप रही. उस ने खामोशी से बस पलकें उठा कर उस की ओर देख भर लिया.

‘’घर छोड़ने का निर्णय लेते वक्त तुम्हें डर नहीं लगा?

‘निर्णय लेना पड़ा… वरना बापू मेरी शादी करा देता,’’ तेज हवा के कारण दुपट्टे का एक सिरा सपना के चेहरे से आ चिपका था, जिसे चेहरे से हटाते हुए सपना ने जवाब दिया.

‘’मानना पड़ेगा तुम्हे… तुम्हें अपने बापू का भी डर नहीं लगा?”

“डर…? डर किस बात का…? मैं कोई गलत काम थोड़े ही करने जा रही हूं… कुछ बनने का उद्देश्य ले कर निकली हूं,” और बेफिक्री में सपना ने अपने कंधे को झटका दिया.

‘’तुम अपनी बताओ. तुम्हारा इस बार का रिजल्ट क्या आया?‘’ सपना ने अचानक ही विषय को बदलते हुए पूछ लिया.

‘’मैं इस बार भी असफल रहा…’’ जितेंद्र लापरवाही के साथ हंस पड़ा.

‘’इस बार भी, ऐसा कैसे?‘’ सपना ने आश्चर्यपूर्वक पूछा.

‘’तुम तो पिछले कई वर्षों से आईएएस की तैयारी कर रहे हो न….” और सपना की विस्मय से आंखें फैल गईं.

‘’अरे, मैं तो आईएएस की तैयारी बड़े जीजान से, कड़ी मेहनत के साथ हर साल करता हूं, परंतु हर बार ये यूपीएससी वाले क्वेश्चन ही कठिन सेट कर देते हैं…  दरअसल, मैं असफल नहीं होता, बल्कि यूपीएससी के क्वेश्चन ही कठिन पूछे जाते हैं,‘’ और दोनों हंस पड़ते हैं.

‘’ऐसे ही हंसती रहा करो… उदास अच्छी नहीं लगती,” जितेंद्र ने गर्ल्स होस्टल के गेट के बाहर बाइक खड़ी करते हुए कहा.

‘’सपना, ये रहा तुम्हारा कमरा. फिलहाल तो मैं ने किसी तरह जुगाड़ कर के 15 दिन के पैसे एडवांस में दे दिए हैं. आगे तुम्हें खुद ही इंतजाम करना होगा…’’ और फिर थोड़ा रुक कर जितेंद्र कहता है, ’’मैं तुम्हारे लिए पार्ट टाइम जौब खोजने में तुम्हारी मदद करूंगा.‘’

‘’थैंक यू जितेंद्र, तुम ने मेरी बहुत मदद की है सच में. मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलूंगी,’’ सपना ने कृतज्ञता भरे स्वर में कहा.

‘’कैसी बात कर रही हो? मैं तो खुद शर्मिंदा हूं कि मैं तुम्हारे लिए बस इतना ही कर पाया और दोस्ती के  बीच में यह अहसान जैसे शब्द कहां से आ गए?’’ जितेंद्र ने अधिकारपूर्वक डांट लगाई, तो सपना ने गंभीर होते हुए नजरें जमीन पर गड़ा दी.

‘’और फिर हम दोनों एक ही गांव से हैं. तो इस अनजान शहर में हम ही एकदूसरे के काम आएंगे ना…’’ जितेंद्र ने उसे समझाते हुए कहा.

सपना ने कोई जवाब नहीं दिया, बस चुपचाप खामोशी से जितेंद्र की ओर देखती रही.

जितेंद्र जब सपना को होस्टल के कमरे में छोड़ कर चलने को हुआ, तो सपना से बोला, ’’मैं चलता हूं अभी. कोचिंग की क्लास का समय हो रहा है. वैसे भी  तुम्हारे लिए यह शहर नया तो है नहीं. तुम पहले भी यहां आ चुकी हो. तुम्हारे लिए तो सबकुछ देखासमझा हुआ है. मेरे खयाल से तुम्हें कुछ खास परेशानी नहीं होनी चाहिए. और कुछ जरूरत पड़े तो मुझे फोन करना. वैसे, मेरा नंबर तो तुम्हारे पास है ही.’’

सपना ने सहमति में बस सिर हिला दिया.

जितेंद्र जब चला गया, तो वह सोच में पड़ गई. जितेंद्र ने अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर उस की मदद की है… अब वह और उस से मदद नहीं लेगी… क्या वह बिना उस की सहायता के कभी कुछ नहीं कर सकती? कम से कम वह अपने लिए इतनी कोशिश तो अवश्य करेगी कि पैसे के लिए अब और उस की मदद न लेनी पड़े, दिल्ली तो वह आ गई है, और अब उसे बस आगे का रास्ता तलाशना है. क्यों न वह अपने लिए कोई पार्ट टाइम जौब ही ढूंढ़ ले? लौट कर घर वापस जाने का तो अब वह सोच भी नहीं सकती. अकेली बैठेबैठे उसे और भी चिंता होने लगी.

होस्टल के उस कमरे में उस के अतिरिक्त और 2 लड़कियां रह रही थीं- प्रीति और नीलू. वैसे तो दोनों अकसर गायब ही रहती थीं. रात के ढाईढाई, तीनतीन बजे तक जाने कहांकहां  भटकती रहती और कभीकभी जब वे लौटती तो उन के साथ कोई न कोई लड़का जरूर होता. दोनों ही ड्रिंक लेती, सिगरेट पीती.

सपना को यहां रहते हुए 10 दिन का समय बीत चुका था. अभी तक अपने लिए वह कोई काम नहीं खोज पाई थी. उसे अब अपने भविष्य को ले कर चिंता सताने लगी थी. गांव से जिस उद्देश्य को ले कर वह निकली थी, उस के लिए हौसले के साथसाथ पैसों की भी जरूरत थी. हौसला तो उस के पास था, पर जरूरत थी तो उस के अपने  खर्चों के लिए पैसों का जुगाड़ करना, जो कि बहुत मुश्किल होता जा रहा था. इस बीच उस के मन में कई दफा नीलू और प्रीति से मदद लेने के विचार भी उत्पन्न हुए, लेकिन कोई ठोस आलंबन न पा कर सूखी पंखुड़ियों के समान झड़ गए. उसे हर बार लगता  कि जिंदगी में जिन ऊंचाइयों को छूने का ख्वाब ले कर वह घर से निकली है, उस का रास्ता इतना समतल और सपाट तो नहीं हो सकता…

सामने चेयर पर बैठी नीलू एक के बाद एक सिगरेट सुलगाती जा रही थी. वह कुछ परेशान सी दिख रही थी. सपना बिस्तर पर बैठी हुई किसी किताब में नजरें जमाए हुई थी. किंतु बीचबीच में वह एकाध बार नजरें उठा कर नीलू को देख भर लेती, परंतु कुछ पूछने का साहस नहीं जुटा पाती. प्रीति अभी तक लौट कर नहीं आई थी.

सपना ने घड़ी देखी, रात के 12 बज रहे थे. सपना कुछ पूछना चाहती है, किंतु फिर भी चुप रह जाती है, क्योंकि वह जानती है कि इस वक्त उस से कुछ भी पूछना निरर्थक है. उस से कुछ भी  पूछने का मतलब है किसी न किसी विवाद की शुरुआत. तो बेहतर है कि चुप ही रह जाए.

कुछ देर तक पन्ने पलटने के बाद वह किताब को अपने पास की टेबल पर रख देती है और बिस्तर पर आंखें मूंद कर चुपचाप लेट जाती है.

‘’हेल विद हिम…‘’ सपना के कानों में जब नीलू की झुंझलाहट भरी यह तेज आवाज पड़ी, तो वह अचानक बिस्तर से उठ बैठी. सामने देखा तो नीलू और प्रीति में किसी बात पर जोरदार बहस चल रही थी.

प्रीति कब कमरे में आई, उसे पता ही नहीं लगा. शायद उस वक्त वह काफी गहरी नींद में थी.

‘’नाराज मत हो यार. मैं तो बस इतना पूछ रही थी कि रोहित के साथ तेरा अफेयर कैसा चल रहा है? देख, वह  लड़का अपने बहुत काम का है. ले चल छोड़, नहीं पूछती अब,‘’ और फिर दोनों लड़कियां खुद ही खामोश हो जाती हैं. दोनों के बीच बहुत देर तक चुप्पी छाई रहती है.

सपना ने  देखा कि टेबल पर दोनों के ड्रिंक का गिलास पड़ा हुआ है और बोतल आधी खाली पड़ी हुई है.

‘अभी इन दोनों के बीच बोलने का कोई फायदा नहीं है… ये दोनों ऐसे ही लड़तीझगड़ती हैं, चीखतीचिल्लाती हैं, खुद ब खुद शांत हो जाएंगी…’ सपना ने सोचा और अपने कानों को दोनों हथेलियों से ढक कर पुनः सोने की चेष्टा करने लगी.

‘’जस्ट शटअप प्रीति, डोंट बी सिली यार.‘’

‘’बस इतनी सी तो बात है.‘’

‘’बस, इतनी सी बात लगती है तुझे.‘’

‘’हां. और नहीं तो क्या?‘’

सपना बिस्तर पर लेटेलेटे ही आंखें खोल कर उन दोनों लड़कियों की ओर देखती है, ‘’जाने कौन सी बात पर ये दोनों रात के तीसरी पहर पंचायत किए बैठी हैं…’’ सपना ने यह बात बेहद धीमी आवाज में अपनेआप से कही थी, क्योंकि उस के द्वारा कहे गए ये शब्द उस के दोनों होंठों के बीच ही कहीं दब कर रह गए थे.

अगले दिन दोपहर को जब सपना लंच कर के कमरे में लौटी तो देखा कि दोनों ही लड़कियां प्रीति और नीलू बेसुध सोई पड़ी थीं, और कुछ समय बाद एकदम से उठी और तैयार हो कर कहीं बाहर जाने के लिए निकल पड़ी.

सपना के मन में आया कि क्यों ना आज जितेंद्र से अपने लिए कहीं काम खोजने की वह बात करे. आज तो उस की छुट्टी भी होगी. उस के पास जो भी पैसे थे, अब एकएक कर खर्च हो गए थे. उस के लिए अभी कोई भी छोटामोटा काम चलेगा.

उस ने जितेंद्र के नंबर पर फोन किया. नंबर बिजी आ रहा था. सपना चेयर पर बैठी कुछ सोचती रही और फिर पास के टेबल से 2 दिन पुराने अखबार को उठा कर उस के पेज पलटने लगती है. उस की नजर अखबार में छपे एक कौलम पर ठहर गई, ‘’वृद्धाश्रम के लिए एक महिला अटेंडेंट की जरूरत है… इच्छुक इस पते पर संपर्क करें.‘’ नीचे फोन नंबर और पता दिया हुआ था.

सपना ने मोबाइल में सर्च किया दिया हुआ पता उस गर्ल्स होस्टल से 40 मिनट की दूरी पर था. उस ने नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया.

अचानक कमरे के दरवाजे के खटखटाने की आवाज सुन वह दरवाजे की ओर बढ़ी. सपना ने जैसे ही दरवाजा खोला, एक छरहरे  बदन का सांवला सा लड़का कमरे के अंदर दाखिल हो गया. लड़के ने अंदर आने से पहले सपना की इजाजत लेनी जरूरी नहीं समझी. बड़े ही बेबाकी के साथ सामने की कुरसी खींच कर वह  बैठ जाता है.

सपना उस युवक से कुछ पूछती, उस से पहले ही वह युवक स्वयं ही अपना परिचय देने लगा, ‘’मैं, तेजप्रताप, प्रीति का दोस्त. और आप…?” सपना अचकचा कर उस युवक का चेहरा देखने लग जाती है.

युवक ने सपना के जवाब का कोई इंतजार नहीं किया. वह खुद ही बोल पड़ता है, ‘’आप नई आई हैं.” और सिगरेट सुलगाते हुए पुनः वह युवक सवाल करता है, ‘’कब तक आएगी? कुछ बता कर गई है प्रीति?”

“नहीं, मुझे कुछ नहीं पता.”

“खैर, कोई नहीं. मैं यहीं उस का इंतजार कर लूंगा, जब तक कि वह आ नहीं जाती.”

वह युवक खुद ही सवाल करता और खुद ही उस का उत्तर भी देता जाता…  उस के लिए सपना की उपस्थिति, अनुपस्थिति, सहमति, असहमति मानो जैसे इन सब का कोई मतलब ही ना हो.

अचानक कमरे में दाखिल हुए इस घुसपैठिए की उपस्थिति अब सपना के लिए बेहद असहज हो रही थी, ’’आप प्रीति को फोन कर के पूछ क्यों नहीं लेते कि वह कब तक आएगी?” सपना ने नाराजगी प्रकट की.

उस युवक ने सपना के सवाल का कोई जवाब नहीं दिया और वहीं बैठेबैठे सिगरेट का धुआं हवा में उड़ेलता रहा… उस ने अब अपनी दृष्टि सपना के चेहरे पर टिका दी थी.

सपना के लिए यह सब बहुत ही असहज हो रहा था. वह उठ कर उस कमरे से बाहर जाने के लिए उठ खड़ी होती है कि तभी प्रीति कमरे में दाखिल होती है.

प्रीति ने सपना को कमरे से बाहर जाते देखा तो उस के कंधे पर अपना हाथ रख उसे रोकते हुए कहा, ‘’तुम बाहर कहां जा रही हो? ‘’

‘’तेज, मीट दिस प्रिटी गर्ल सपना.”

‘’सपना, मीट माय फ्रेंड तेजप्रताप.‘’

‘’वैरी प्लीज्ड टु मीट यू,‘’ सपना ने तेजप्रताप के बढ़े हुए हाथ से हाथ मिलाया और अनिच्छापूर्वक मुसकराने की कोशिश में होंठ फैला दिए…

‘’सपना, यह यहां के एक बहुत बड़े बिजनैसमैन के इकलौते बेटे हैं. इन की करोड़ों की प्रोपर्टी है. ये तुम्हारे बहुत काम आ सकते हैं.‘’

‘’माफ कीजिएगा, मुझे एक जरूरी फोन करना है,” सपना दरवाजे की ओर बढ़ जाती है.

‘’अरे, आप क्यों जा रही हैं, बैठिए ना प्लीज,‘’ तेजप्रताप ने सपना के कंधे को अपने हाथों से दबाते हुए कहा, तो सपना ने बड़ी ही बेरुखी के साथ अपने कंधे पर रखे गए हाथ को झटक दिया.

सपना कमरे से बाहर निकल आती है. सपना के कमरे से बाहर जाते ही वह युवक प्रीति को अपनी  बांहों में भर लेता है, और बड़ी बेसब्री के साथ उस के माथे, गालों और होंठों पर चुंबन की बौछार लगा देता है.

लेकिन प्रीति ने उसे मना करने के बजाय उस के गले में अपनी बांहें डाल दीं और उसे उतने ही प्यार से प्यार के लिए उकसाने लगती है.

सपना के बाहर जाते ही उस युवक ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और प्रेमोन्मत्त हो कर दोनों एकदूसरे को आगोश में भर लेते हैं…

सपना होस्टल के बाहर लगे गार्डन की बेंच पर आ कर बैठ जाती है, तभी उसे जितेंद्र का फोन आता है.

‘’हैलो, तुम ने फोन किया था मुझे…‘’

‘’हां, किया था.‘’

‘’सौरी, तुम्हारा फोन उठा नहीं सका.”

‘’हां, कहो, क्या बात है? कहीं कोई किसी तरह की परेशानी तो नहीं है?‘’

‘’नहीं, लेकिन क्या कल तुम मेरे साथ एक जगह चल सकोगे?‘’

‘’कहां चलना है…’’

‘’मैं ने अपने लिए एक नौकरी तलाश की है. वहीं चलना है. मैं तुम्हें वहां का एड्रेस व्हाट्सप्प पर भेज रही हूं.‘’

‘’अरे, यह तो कोई वृद्धाश्रम है.‘’

‘’मालूम है.’’

‘’क्या तुम कर पाओगी यह सब?‘’

‘’क्यों नहीं, किसी बुजुर्ग की सेवा ही तो करनी है. तुम चिंता मत करो. मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. मुझे तुम्हारी बस इतनी मदद चाहिए कि तुम मुझे वहां तक पहुंचा दो और वहां से होस्टल छोड़ जाने का काम कर दो. इतना कर सको, तो बहुत मेहरबानी.”

‘’कैसी बातें करती हो? इस में मेहरबानी जैसी कोई बात नहीं. मैं तुम्हारे लिए इतना तो कर ही सकता हूं. ओके. तो कल मिलते हैं ना?’’

‘’ठीक है तब, कल मैं समय पर आ जाऊंगा.‘’

‘’ओके.‘’

जितेंद्र से फोन पर बातें करने के बाद जब सपना कमरे की ओर जाती है, तो कमरे का दरवाजा अंदर से बंद पाती है. उस ने दरवाजा बाहर से खटखटाया, तो करीब 5-10 मिनट बाद तेजप्रताप अपनी कमीज के बटन ठीक करते हुए दरवाजा खोलता है. उसे ऐसी अवस्था में देख कर सपना अपने पैर दरवाजे से पीछे की ओर खींच लेती है.

तेजप्रताप के वहां से चले जाने के बाद वह कमरे में दाखिल होती है. बिस्तर पर चादर ओढ़ प्रीति अर्धनग्न अवस्था में नशे की हालत में पड़ी हुई थी. उसे ऐसी अवस्था में देख सपना का मन उस के प्रति घृणा से भर जाता है.

वह मन ही मन  सोचती है कि इस समाज में कितनी ही ऐसी लड़कियां हैं, जो अपनी इज्जत, अपनी प्रतिष्ठा, अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ती हैं. उन्हें इतनी स्वतंत्रता नहीं मिलती कि वह अपने जीवन में किसी लक्ष्य को हासिल कर सकें, तो वहीं दूसरी ओर ऐसी भी लड़कियां हैं, जो अपने परिवार द्वारा दिए गए स्वतंत्रता का दुरुपयोग करती हैं. अपनी इज्जत का सरेआम व्यापार करती हैं. पता नहीं, इन के मांबाप पर इन के ऐसे कृत्यों का क्या प्रभाव पड़ता होगा?

सपना एक बेहद घृणापूर्ण दृष्टि उस की ओर डालती है, और अपना चेहरा दूसरी ओर दीवार की तरफ कर बिस्तर पर लेट जाती है, आंखें मूंद कर वह सोने का प्रयत्न करती है.

वह वृद्धाश्रम शहर की भीड़भाड़ वाले इलाके में तन्हा, बेबस, लाचार और अपने ही बच्चों के द्वारा ठुकराए गए मांबाप के लिए बना था, जो कि अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित सभी तरह की औलादों के मांबाप का एकमात्र आश्रय स्थल था. ये बुजुर्ग अपने जीवन के तमाम अनुभवों से गुजर कर जीवन के अंतिम पड़ाव में अब जीवन की कठोरतम और क्रूरतम सचाई से रूबरू हो रहे थे. यहां पर वे, ‘’जीवन का एकमात्र सत्य दुख है,’’ इस कथन से साक्षात्कार हो रहे थे…

सपना को वहां काम करते हुए अब एक महीने से भी अधिक समय बीत चुका था. सपना उस आश्रम की साफसफाई से ले कर वृद्ध महिलाओं को नहलानेधुलाने का सारा काम बड़े ही लगन से करती. धीरेधीरे वह यहां रहने वाले प्रायः सभी बुज़ुर्गों की चहेती बन गई थी. सभी उस से बेहद प्यार करते. उन बुजुर्गों में तो कुछ ऐसे भी थे, जो कि सिर्फ सपना के हाथों से ही खाना पसंद करते.

सपना को इस काम से मिलने वाले पैसे इतने अधिक तो नहीं थे, परंतु इतना कम भी नहीं था कि उस का गुजारा ना हो सके. वह जितनी मेहनत से वहां के काम करती, उतनी ही लगन से अपनी पढ़ाई भी कर रही थी. आश्रम में भी वह थोड़ाबहुत समय अपने पढ़ने के लिए निकाल लेती. उसी आश्रम में एक और वृद्ध महिला थी, जो कि अकसर खामोश रहती. सपना ने कई बार उन से बातें करने की कोशिश की, लेकिन वह ज्यादा किसी से बात नहीं करती थी.

काम के बीच जब भी थोड़ा समय मिलता, सपना उन के पास वाले कोने में बैठ कर पढ़ने  लगती, क्योंकि वही एक ऐसा कोना था, जो उसे पढ़ने के लिए उपयुक्त लगता.

एक दिन सपना वहां बैठी कुछ पढ़ रही थी, कुछ याद करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बीच में कहीं अटक जाती, तभी उस के कानों में कुछ शब्द किसी के सुनाई पड़े, ‘’ए डिस्ट्रिब्युशन   इज सेड़ टु बी स्क्यूड… ‘’ सपना ने पलट कर देखा, तो वह वृद्ध महिला उसी की ओर देख रही थी.

“आप यह सब जानती हैं?” सपना ने आश्चर्यपूर्वक पूछा.

‘’हां, मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी मे हेड औफ द डिपार्टमेंट रही हूं, कितनों को मैं ने पीएचडी कराया है?” उस वृद्ध महिला की आंखें यह कहते हुए छलछला आई थीं. उन की आंखों में आंसू भर आए थे.

उन्होंने आगे अपनी कहानी सपना को बताई, ‘’मेरा बेटा और बहू लंदन में जा कर बस गए. बेटी की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हो गई. पति की मृत्यु के बाद बच्चों ने भी मेरा हाल नहीं पूछा.  अब किसी तरह जीवन का अंतिम समय इस वृद्धाश्रम में काट रही हूं. जीवन की कितनी सांसें बची हुई हैं, किसे पता?”

सपना को पता चला कि वह वृद्ध महिला, जिन का नाम शकुंतला है, नहीं, अब वह उस के लिए डाक्टर शकुंतला मैम थीं. वे कैंसर से पीड़ित हैं, लास्ट स्टेज में हैं.

सपना मन ही मन सोचती है, ये जिंदगी भी अजीब खेल खेलती है. सपना का मन उस वृद्ध महिला के प्रति अपार श्रद्धा और करुणा से भर आया था. बहुत दिल लगा कर वह उन की सेवा करती. वह उस के लिए शकुंतला मैम बन चुकी थीं, जो उस की पढ़ाई में भी मदद करती. पढ़ते वक्त उसे जहां कहीं भी कठिनाई होती, उस की शकुंतला मैम  उस की मदद कर देती. अकसर उसे होस्टल लौटने में देरी हो जाती, क्योंकि काम के बाद वह शकुंतला मैम से पढ़ाई में भी थोड़ी मदद ले लेती. होस्टल से बिलकुल सुबह वह निकल आती.

इधर नीलू होस्टल छोड़ कर जा चुकी थी और प्रीति किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो चुकी थी. उसे अकसर ही बुखार रहता. सपना ने नोटिस किया कि प्रीति अकसर थकीथकी सी रहती है और कभीकभी उसे खांसी भी आती.

एक दिन सुबहसुबह जब वह आश्रम के लिए निकल रही थी, तो उस ने देखा कि वह बारबार खांसे जा रही थी. उस के पूछने पर उस ने कहा कि वह किसी डाक्टर से अपना इलाज करा रही है. दवा भी ले रही है. उसी दिन दोपहर में उसे मालूम हुआ कि प्रीति को अस्पताल में एडमिट किया गया है.

सपना ने सोचा, वृद्धाश्रम से शाम को लौटते वक्त वह प्रीति से मिलने अस्पताल जाएगी, लेकिन उस दिन उस की शकुंतला मैम की तबीयत भी काफी खराब थी और वह उन्हें ऐसी हालत में बिलकुल भी अकेली नहीं छोड़ सकती थी.

वह पूरे समय शकुंतला मैम की सेवा करती रही. जरा देर के लिए भी यदि उस की आंखें लगती, वह  फौरन उठ कर बैठ जाती. कभी उन के पैर दबाती, तो कभी उन के माथे को बड़े प्यार से सहलाती. डाक्टर ने भी कह रखा था कि अब उन का अंतिम समय चल रहा है.

सपना का मन उस दिन बहुत दुखी था. उस की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे. अचानक उस ने अपनी हथेलियों पर प्यार भरे स्पर्श को महसूस किया. उस ने भीगी पलकों से उस ओर देखा, तो शकुंतला मैम उसे बड़े प्यार से देख रही थीं. उन्होंने उसे अपने तकिए के नीचे से चाबी निकाल कर थमाई और कहा कि सामने वह उन की अलमीरा है. उस में एक छोटा सा बौक्स है. कपड़े में लपेट कर रखा हुआ है. वह उसे ला कर दे.

सपना ने सवाल भरी नजरों से उन की ओर देखा. तब वे धीमे से मुसकराते हुए बेहद प्यार से उस के चेहरे को छू कर बोलीं, “तुम लाओ तो सही, एक बेहद जरूरी काम रह गया है.”

सपना उठी और वह बौक्स ला कर उन के पास रख दिया. उन्होंने कहा, “इसे खोलो.”

सपना ने बौक्स खोल कर उन के आगे बढ़ाया, तो वो तकिए के सहारे बैठ गईं और कांपते हुए हाथों से 10 लाख रुपए का एक चेक साइन कर सपना की हथेली पर रखते हुए बोलीं, “तुम ने मेरी सगी औलाद से भी बढ़ कर सेवा की है, यह मेरे पूरे जीवन की जमापूंजी है, इसे तुम मेरा प्यार और आशीर्वाद समझ कर रख लेना. खूब मन लगा कर पढ़ना. मेरा आशीर्वाद, मेरा प्यार हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा…” और उन्होनें अपनी आंखें मूंद लीं.

सपना ने महसूस किया कि उस की शकुंतला मैम की हथेली अचानक काफी ठंडी हो गई है. उस ने गीली पलकों से उन के चेहरे की ओर देखा. उन का चेहरा बिलकुल शांत तकिए पर पड़ा हुआ था.

सपना की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा और उस का सिर उन के प्रति अपार श्रद्धा में झुक गया. Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: दर्द आसना- आजर और जोया बचपन में क्यों लड़ते थे?

Family Story in Hindi:

लेखक: अशरफ खान

‘तुम गई नहीं..?’’

‘‘कहां?’’

‘‘आजर भाई को देखने…’’

‘‘मैं क्यों जाऊं?’’‘‘घर के सब लोग जा चुके हैं लेकिन तुम हो कि अभी तक नहीं गई. आखिर वह तुम्हारे मंगेतर हैं.’’

‘‘मंगेतर…मंगेतर थे. लेकिन अब नहीं. एक अपाहिज मेरा मंगेतर नहीं हो सकता. मुझे उस की बैसाखी नहीं बनना.’’

वह आईने के सामने खड़ी बाल संवार रही थी और अपनी बहन के सवालों के जवाब लापरवाही से दे रही थी. जब बाल सेट हो गए तो उस ने आईने में खुद को नीचे से ऊपर तक देखा और पर्स नचाती हुई दरवाजे से बाहर निकल गई.

आजर के यहां का दस्तूर था कि रिश्ते आपस में ही हुआ करते थे. और शायद इसी रिवायत को जिंदा रखने के लिए मांबाप ने बचपन में उस का रिश्ता उस के चाचा की बेटी से तय कर दिया था.

आजर कम बोलने वाला सुलझा हुआ लड़का था. जबकि जोया को मां के बेजा लाड़प्यार ने जिद्दी और खुदसर बना दिया था. शायद यही वजह थी कि दोनों साथसाथ खेलतेखेलते झगड़ने लगते थे. जो खिलौना आजर के हाथ में होता, जोया उसे लेने की जिद करती और जब तक आजर उसे दे नहीं देता, वह चुप न होती.

उस दिन तो हद हो गई. आजर पुरानी कौपी का उधड़ा हुआ कवर लिए था. कवर पर कोई तसवीर बनी थी, शायद उसे पसंद थी. जोया की नजर पड़ गई, वह चिल्लाने लगी, ‘‘वह मेरा है…उसे मैं लूंगी.’’

आजर भी बच्चा था. बजाए उसे देने के दोनों हाथ पीछे करके छिपा लिए. वह चीखती रही, चिल्लाती रही यहां तक कि बड़े लोग आ गए.

‘‘तौबा है दफ्ती के टुकड़े के लिए जिद कर रही थी. अभी ये आजर के हाथ में न होता तो रद्दी होता. क्या लड़की है, कयामत बरपा कर दी.’’ बड़ी अम्मी बड़बड़ाईं और अपने बेटे आजर को ले कर चली गईं.

यूं ही लड़तेझगड़ते दोनों बड़े हो गए. बचपन पीछे छूट गया. दोनों उम्र के उस मुकाम पर थे, जहां जागती आंखें ख्वाब देखने लगती हैं. और जब आजर ने जोया की आंखों में देखा तो हया की लाली उतर आई.

नजर अपने आप झुकती चली गई. शायद उसे मंगेतर का मतलब समझ आ गया था. अब वह आजर की इज्जत करती, उस की बातों में शरीक होती, उस के नाम पर हंसती. घर वालों को इत्मीनान हो गया कि चलो सब कुछ ठीक हो गया है.

बड़ी अम्मी इन दिनों मायके गई हुई थीं और जब लौटीं तो उन के साथ एक दुबलीपतली सी लड़की थी. जिस की मां बचपन में गुजर चुकी थी. बाप ने दूसरी शादी कर ली थी. अब उस के भी 4 बच्चे थे. बेचारी कोल्हू के बैल की तरह लगी रहती. बिस्तर पर जाती तो बिस्तर बिछाने का होश न रहता. पता नहीं कब सुबह हो जाती.

दादा से पोती की हालत देखी न जाती. दादा बड़ी अम्मी के रिश्ते के चचा थे, जब बड़ी अम्मी उन से मिलने गईं तो पोती का दुखड़ा ले कर बैठ गए.

‘‘अल्ला न करे किसी की मां मरे.’’ बड़ी अम्मी ने ठंडी सांस ली.

‘‘आप उसे हमारे साथ भेज दीजिए.’’ बड़ी अम्मी ने कुछ सोच कर कहा.

अंधा क्या चाहे दो आंखें, वह खुशीखुशी राजी हो गए. लेकिन बहू का खयाल आते ही उन की सारी खुशी काफूर हो गई. वह ले जाने देगी या नहीं. और जब नजर उठी तो वह दरवाजे में खड़ी थी. उस ने सारी बातें सुन ली थीं.

बड़ी अम्मी कब हारने वाली थीं. उन्होंने अपने तरकश से एक तीर छोड़ा, जो सही निशाने पर बैठा. उन्होंने हर महीने कुछ रकम भेजने का वादा किया और उसे अपने साथ ले आईं.

सना ने आते ही पूरा घर संभाल लिया था. इतना काम उस के लिए कुछ नहीं था. वह घर का काम आंखें बंद कर के कर लेती. उसे सौतेली मां के जुल्म व सितम से निजात मिल गई थी. अर्थात वह यहां आ कर खुश थी.

अगर कभी घर में गैस खत्म हो जाती तो लकडि़यों के चूल्हे पर सेंकी हुई सुर्खसुर्ख रोटियां और धीमीधीमी आंच पर दम की हुई हांडी की खुशबू फैलती तो भूख अपने आप लग जाती.

चाची की तरफ मातम बरपा होता. अरे गैस खत्म हो गई…अब क्या करें…भाभी सिलेंडर वाला आया क्या? फिर बाजार से पार्सल आते तब जा कर खाना नसीब होता.

और अगर कभी मिरची पाउडर खत्म हो जाता, सना साबुत मिर्च निकालती. सिलबट्टे पर पीस कर खाना तैयार कर देती. सालन देख कर अम्मी को पता चलता कि मिरची खत्म हो गई है.

और चाची की तरफ ऐसा होता तो जोया कहती, ‘‘न बाबा न मेरे हाथ में जलन होने लगती है. हया तुम पीस लो.’’ हया भी साफ मना कर देती.

सना तुम कौन हो…कहां से आई हो…सादगी की मूरत…वफा का पैकर…जिंदगी का आइडियल, सना तुम्हारी सना (तारीफ) किन लफ्जों में करूं. आजर का दिल बिछबिछ जाता. फिर उसे जोया का खयाल आता.

वह तो उस का मंगेतर है. कल को उस से उस की शादी हो जाएगी, फिर ये कशिश क्यों. मैं सना की तरफ क्यों खिंचा जा रहा हूं. अकसर तनहाई में वह उस के बारे में सोचता रहता.

आजर एक दिन लौंग ड्राइव से लौट रहा था. उस का एक्सीडेंट हो गया. अस्पताल पहुंचने पर डाक्टर ने कहा, ‘‘अब ये अपने पैरों पर नहीं चल सकेंगे.’’

सारा घर जमा था. सब का रोरो कर बुरा हाल था.

जब से आजर का एक्सीडेंट हुआ था, जोया ने अपने कालेज के दोस्तों से मिलना शुरू कर दिया था. आज भी वह तैयार हो कर किसी से मिलने गई थी. हया के लाख समझाने पर भी उस पर कोई असर न हुआ था.

आजर अस्पताल के बैड पर दोनों पैरों से माजूर लेटा हुआ था. हर आहट पर देखता, शायद वह आ जाए, जिस से दिल का रिश्ता जुड़ा है. वफा के सिलसिले हैं, जीने के राब्ते हैं, जो उस का मुस्तकबिल है, लेकिन दूर तक उस का कहीं पता न था.

एक आहट पर उस के खयालात बिखर गए. अम्मी आ रही थीं. उन के पीछे सना थी. अम्मी ने इशारा किया तो वह सामने स्टूल पर बैठ गई.

अम्मी रात का खाना ले कर आई थीं. आजर खाना खा रहा था और कनखियों से उसे देख रहा था. फुल आस्तीन की जंपर, चूड़ीदार पजामा, सर पर पल्लू डाले वह खामोश बैठी थी. काश! इस की जगह जोया होती, उस ने सोचा.

फिर जल्दी से नजरें झुका लीं. कहीं उस के चेहरे से अम्मी उस का दर्द न पढ़ लें. वह मुंह में निवाला रख कर चबाने लगा. जब खाने से फारिग हो गया तो अम्मी बरतन समेटने लगीं.

‘‘अम्मी, आप रहने दीजिए मैं कर लूंगी.’’ उस की महीनमहीन सी आवाज आई.

उस ने बरतन समेट कर थैले में रखे और खड़ी हो गई. जब वह बरतन उठा रही थी तो खुशबू का झोंका उस के पास से आया और आजर को महका गया. अम्मी उसे अपना खयाल रखने की हिदायत दे कर चली गईं.

आज आजर को डिस्चार्ज मिल गया था. बैसाखियों के सहारे जब वह अंदर आया तो अम्मी का कलेजा मुंह को आने लगा. लेकिन होनी को कौन टाल सकता है. सना आजर का पहले से ज्यादा खयाल रखती. बहरहाल दिन गुजरते रहे.

एक दिन देवरानीजेठानी दरम्यानी बरामदे में बैठी हुई थीं. देवरानी शायद बात का सिरा ढूंढ रही थी.

‘‘भाभी, हम आप से कुछ कहना चाहते हैं.’’ उन्होंने उन की आंखों में देखा.

‘‘जोया ने इस रिश्ते के लिए मना कर दिया है. वह आजर से रिश्ता नहीं करना चाहती, क्योंकि आजर तो…’’ उन्होंने जुमला अधूरा छोड़ दिया. वह जबान से कुछ न बोलीं और उठ कर चली आईं.

आजर ने नोटिस किया था, अम्मी बहुत बुझीबुझी सी रहती हैं. आखिर वह पूछ बैठा, ‘‘अम्मी क्या बात है, आप बहुत उदास रहती हैं.’’

‘‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही, जरा तबीयत ठीक नहीं है.’’

‘‘मैं जानता हूं आप क्यों परेशान हैं, जोया ने इस रिश्ते से मना कर दिया है.’’

अम्मी ने चौंक कर बेटे की तरफ देखा.

‘‘हां अम्मी, मुझे मालूम है. वह मुझे देखने तक नहीं आई. अगर रिश्ता नहीं करना था, तो न सही. लेकिन इंसानियत के नाते तो आ सकती थी, जिस का इंसानियत से दूरदूर तक वास्ता न हो, मुझे खुद उस से कोई रिश्ता नहीं रखना.’’

‘‘मेरे बच्चे…’’ अम्मी की आंखों से बेअख्तियार आंसू निकल पडे़. उन्होंने उसे गले से लगा लिया.

‘‘अम्मी मेरी शादी होगी…उसी वक्त पर होगी..’’ अम्मी ने उसे परे करते हुए उस की आंखों में देखा. जिस का अर्थ था अब तुझ से कौन शादी करेगा.

‘‘अम्मी, मैं सना से शादी करूंगा. सना मेरी शरीकेहयात बनेगी…मैं ने सना से बात कर ली है.’’ यह सुन कर अम्मी ने फिर उसे गले से लगा लिया.

शादी की तैयारियां होने लगीं. और जो वक्त जोया के साथ शादी के लिए तय था, उसी वक्त पर आजर और सना का निकाह हो गया. आजर को याद आया, एक बार जोया ने बातोंबातों में कहा था, शादी के बाद वह हनीमून के लिए स्विटजरलैंड जाएगी. आजर ने ख्वाहिश जाहिर की तो अम्मी ने उसे जाने की इजाजत दे दी.

आज वह हनीमून से लौट रहा था. सना अंदर दाखिल हुई तो कितनी निखरीनिखरी, कितनी खुश लग रही थी. फिर उस ने दरवाजे की ओर मुसकरा कर देखा, ‘‘आइए न…’’

इतने पर आजर अंदर दाखिल हुआ.

उसे देख कर अम्मी की आंखें हैरत से फैलती चली गईं. वह अपने पैरों पर चल कर आ रहा था.

‘‘बेटे, ये सब क्या है?’’ उन्होंने बढ़ कर उसे थाम लिया.

‘‘बताता हूं…पहले आप बैठिए तो सही.’’ उस ने दोनों बांहें पकड़ कर उन्हें बिठा दिया.

‘‘आप वालिदैन अपने बच्चों के फैसले तो कर देते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं कि बड़े हो कर उन की सोच कैसी होगी. उन के खयालात कैसे होंगे. उन का नजरिया कैसा होगा.

‘‘और मुझे सच्चे दर्द आशना की तलाश थी. जिस के अंदर कुरबानी का जज्बा हो, एकदूसरे के लिए तड़प हो. …और ये सारी खूबियां मुझे सना में नजर आईं, इसलिए मैं ने डाक्टर से मिल कर एक प्लान बनाया.

‘‘वह एक्सीडेंट झूठा था. मेरे पैर सहीसलामत थे. ये मेरा सिर्फ नाटक था, नतीजा आप के सामने है. जोया ने खुद इस रिश्ते से इनकार कर दिया. सना ने मुझ अपाहिज को कबूल किया. मैं सना का हूं, सना मेरी है.’’

जोया ने सारी बातें सुन ली थीं. उस का जी चाह रहा था सब कुछ तोड़फोड़ डाले. Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: मेरे घर के सामने- कैसे उड़ा हमारे दिन का चैन?

Family Story in Hindi: मेरे घर के सामने एक कम्युनिटी हाल है, या अगर यों कहें कि कम्युनिटी हाल के सामने मेरा घर है तो भी घर की भौगोलिक स्थिति में कोई अंतर नहीं आएगा. कम्युनिटी हाल के सामने मेरा घर होना ही मेरी सब से बड़ी मुसीबत है. इस कम्युनिटी हाल में आएदिन ब्याहशादी, अन्य समारोह और पार्टियां आयोजित होती रहती हैं.

पर एक मुसीबत और भी है, वह यह कि मेरे घर के आंगन में एक आम का पेड़ भी है. बस, यों ही समझिए कि करेला और नीम चढ़ा जैसी स्थिति है. शुभकार्य हो और उस में आम के पत्तों का तोरण न बांधा जाए ऐसा हो ही नहीं सकता. कम्युनिटी हाल के सामने घर के आंगन में प्रवेशद्वार पर ही आम का पेड़ हो, इस का दर्द सिर्फ वही भुक्तभोगी जान सकता है जिस का घर कम्युनिटी हाल के सामने हो.

जैसे ही मेजबान कम्युनिटी हाल किराए पर ले कर अपना मंगलकार्य शुरू करता है, उस के कुछ देर बाद ही प्रभात वेला में मेरे दरवाजे की घंटी बजती है. संपन्न घर के कोई सज्जन या सजनी विनम्रता से पूछते हैं, ‘‘आप को कष्ट दिया. कुछ आम के पत्ते मिल सकेंगे क्या? बेटी की शादी है, मंडप में तोरण बांधना है. और सब सामान तो ले आए, पर देखिए, कैसे भुलक्कड़ हैं हम कि आम के पत्ते तो मंगाना ही भूल गए.’’

शायद उन्हें आम का पेड़ देख कर ही आम के पत्तों का तोरण बांधने की सूझती है. इनकार कैसे करना चाहिए, यह कला मुझे आज तक नहीं आई. हर बार यही होता है कि जरूरत से ज्यादा पत्ते तोड़ लिए जाते हैं. इन में से कुछ पत्ते मेरे साफसुथरे आंगन में इधरउधर बिखर कर बेमौसमी पतझड़ का आनंद देते हैं और कुछ पत्ते मेरे घर से कम्युनिटी हाल तक ले जाने में सड़क पर लावारिस से गिरते जाते हैं. जिन के घर विवाह हो रहा है, उन को इस की कोई चिंता नहीं होती. पर मुझे तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई मेरा रोमरोम मुझ से खींच कर ले जा रहा है. पर अपना यह दर्द मैं किस से कहूं? कैसे कहूं?

और यह तो इस दर्द की शुरुआत है. उस के बाद बड़ी देर तक ‘‘हैलो, माइक टेस्टिंग, हैलो’’ की मधुर ध्वनि के बाद फिल्मी गीतों के रिकार्ड पूरे जोर से बजने शुरू हो जाते हैं. उस पर तुर्रा यह कि माइक्रोफोन के भोंपू का मुंह हमेशा मेरे घर की ओर ही रहता है. ऐसा लगता है जैसे कि यह बहरों की बस्ती है. अगर धीमी आवाज में रिकार्ड बजता रहे तो हमें कैसे मालूम पड़ेगा कि सामने कम्युनिटी हाल में आज विवाह समारोह है? इस के बाद हमें दिन भर घर के अंदर भी एकदूसरे से चीख- चिल्ला कर बातचीत करनी पड़ती है, तभी एकदूसरे को सुनाई पड़ेगा.

इन रिकार्डों ने मेरे बच्चों की पढ़ाई का रिकार्ड बिगाड़ कर रख दिया है. धूमधाम और दिखावे के लिए ये लोग खूब खर्च करते हैं. पर एक बचत वे अवश्य करते हैं. पता चला कि इन सब के बिजली वाले इतने चतुर हैं कि इन की बचत के लिए बिजली का कनेक्शन गली के खंभे से ही लेते हैं ताकि कम्युनिटी हाल के मीटर के अनुसार बिजली का खर्च उन्हें नाममात्र ही अदा करना पड़े.

फिर आती है नगरनिगम की पानी की गाड़ी, जो ठीक मेरे घर के सामने आ कर खड़ी हो जाती है. इस गाड़ी से पानी अंदर पंडाल में पहुंचाने के प्रयत्न में जो पानी बहता है, वह ढलान के कारण मेरे आंगन में इकट्ठा हो जाता है. बस, सावनभादों सा सुहावना कीचड़भरा वातावरण बन जाता है. और फिर इस कीचड़ से सने पैरों के घर में आने के कारण घर का हर सदस्य मेरे कोप का भाजन बनता है. अकसर गृहयुद्ध छिड़ने की नौबत आ जाती है.

सामने शामियाने में जब भट्ठियां सुलगाई जाती हैं तब उन का धुआं हवा के बहाव के कारण बिन बुलाए मेहमान की तरह सीधा मेरे ही घर का रुख करता है. हवा भी मुझ से ऐसे समय न जाने किस जनम का बैर निकालती है. वनस्पति घी की मिठाई की खुशबू और तरहतरह के मसालों की महक से घर के सारे सदस्यों के नथने फड़क उठते हैं. परिणामस्वरूप सब की पाचन प्रणाली में खलबली मच जाती है.

आएदिन इस कम्युनिटी हाल में होने वाले ऐसे भव्य भोजों की खुशबू के कारण अब मेरे परिवार को मेरे हाथों की बनाई रूखीसूखी गले नहीं उतरती. रोज यही उलाहना सुनने को मिलता है, ‘‘क्या तुम ऐसा खाना नहीं बना सकतीं जैसा कम्युनिटी हाल में बनता है? कब तक ऐसा घासफूस जैसा खाना खिलाती रहोगी?’’ अब मुझे समझ नहीं आ रहा है कि सामने कम्युनिटी हाल में होने वाले समारोहों को बंद करा दूं या यह घर ही बदल लूं?

इस तरह सारा दिन तेज स्वर में बज रहे फूहड़ फिल्मी रिकार्डों से कान पकने लगते हैं और पकवानों की खुशबू से नाक फड़कती है. जैसेतैसे दिन गुजर जाता है. शाम को बरात आने का (यदि लड़की की शादी हो तो) या बरात विदा होने का (यदि लड़के की शादी हो तो) समय होता है, दिन भर में दिमाग की नसें तड़तड़ाने और कानों की फजीहत करने में जो कसर रह गई थी, उसे ये बैंडबाजे वाले पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ऐन दरवाजे पर डटे हुए बैंडमास्टर अपनी सारी ताकत लगा कर बैंड बजा रहे हैं.

कुछ ही देर में कुछ नई उम्र की फसलें लहलहा कर डिस्को और भंगड़ा का मिलाजुला नृत्य करने लगती हैं. फिर तो ऐसा लगने लगता है जैसे बैंड वालों और नृत्य करने वालों के बीच कोई प्रतियोगिता चल रही है. नोट पर नोट न्योछावर होते हैं. यह क्रम बड़ी देर तक चलता है. मैं यही सोचती हूं कि कितना अच्छा होता अगर ये कान कहीं गिरवी रखे जा सकते. मैं अपने डाक्टर को कैसे बताऊं कि मेरे रक्तचाप बढ़ने का कारण मेरा मोटापा नहीं, बल्कि मेरे घर के सामने कम्युनिटी हाल का होना है. पर मैं जानती हूं कि इस तथ्य पर कोई विश्वास नहीं करेगा.

बड़ी मुश्किल से बरात आगे रेंगती है. गाढ़े मेकअप में सजीसंवरी कुंआरियों और सुहागनों की फैशन परेड और उन के चमकीले और भड़कीले गहनों व कपड़ों की नुमाइश देख कर मेरी पत्नी के हृदय पर सांप तो क्या अजगर लोटने लगता है. हाय, कित्ती सुंदरसुंदर साडि़यां हैं सब के पास, नए से नए फैशन की. अब की बार पति से ऐसी साड़ी की फरमाइश जरूर करूंगी, चाहे जो भी हो जाए. और देखो तो सही सब की सब गहनों से कैसी लदी हुई हैं.

मेरी दूरबीन जैसी आंखें एकएक के गहनों और कपड़ों की बारीकियां परखने लगती हैं. उस कांजीवरम साड़ी पर मोतियों का सेट कितना अच्छा लग रहा है. उस राजस्थानी घाघरा चोली पर यह सतलड़ी सोने का हार कितना फब रहा है. और झीनीझीनी शिफान की साड़ी पर हीरों का सेट पहने वह महिला तो बिलकुल रजवाड़ों के परिवार की सी लग रही है. पर कौन जाने ये हीरे असली हैं या नकली.

इन बरातनियों के गहनों और कपड़ों में उलझी हुई मैं बड़ी देर तक अपने होश खोए रहती हूं. मेरे घर के सामने कम्युनिटी हाल होने का यह सब से हृदयविदारक पहलू है. जैसेजैसे बरात आगे बढ़ती है, देसीविदेशी परफ्यूम की झीनीझीनी लपटें आआ कर मेरी खिड़की से टकराने लगती हैं और इस खुशबू में रचबस कर मैं एकदूसरे ही लोक में पहुंच जाती हूं.

बरात आ जाने के बाद तो कम्युनिटी हाल में चहलपहल, दौड़भाग तथा चीखपुकार और बढ़ जाती है. उपहारों के पैकेट थामे, सजेसंवरे दंपती एक के बाद एक चले आते हैं. उन के स्कूटर, मोटर आदि मेरे घर के सामने ही खड़े किए जाते हैं. घर में आनेजाने के लिए मार्ग बंद हो जाता है. और मेरा घर किसी टापू सा लगने लगता है.

कुछ जोड़े ऐसे भी हैं जिन्हें मैं ने इस कम्युनिटी हाल में होने वाले हर समारोह में शामिल होते देखा है. वे इन समारोहों में आमंत्रित रहते हैं या नहीं, पर उन के हाथों में एक लिफाफा अवश्य रहता है. वे इस लिफाफे को वरवधू को थमाते हैं या नहीं, यह तो वे ही जानें. मैं तो बस, इतना जानती हूं कि वे हमेशा तृप्त हो कर डकार लेते हुए रूमाल से मुंह पोंछते बाहर निकलते हैं.

लिफाफे में 11 रुपए रख कर, सूट पहन कर, सजसंवर कर किसी भी विवाह समारोह में जा कर छक कर भोजन कर के आना तो किसी होटल में जा कर भोजन करने से काफी सस्ता पड़ता है. कन्या पक्ष वाला यह समझता है कि बरातियों में से कोई है और वर पक्ष समझता है कि यह कन्या पक्ष का आमंत्रित है. ऐसे में उन्हें कोई यह पूछने नहीं आता कि ‘‘श्रीमान आप यहां कैसे पधारे?’’

मेरे घर की ऊपरी मंजिल से इस कम्युनिटी हाल का पिछला दरवाजा बहुत अच्छी तरह दिखाई देता है. वहां का आलम कुछ निराला ही रहता है. जैसे मिठाई देखते ही उस पर मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं, वैसे ही कहीं शादीब्याह के समारोह होते देख मांगने वाले, परोसा लेने वाले पहले से ही इकट्ठे हो जाते हैं. इन के साथ ही गाय, सूअर, कुत्ते आदि भी अपनी क्षुधा शांति के लिए पिछले दरवाजे पर ऐसे इकट्ठे होते हैं मानो उन सब का सम्मेलन हो रहा हो.

हर पंगत के उठने के बाद जब पत्तलदोनों का ढेर पिछवाड़े फेंका जाता है, उस के बाद वहां इनसान और जानवर के बीच जूठी पत्तलों के लिए हाथापाई और छीनाझपटी का जो दृश्य सामने आता है उसे देख कर इनसानियत और न्याय पर से विश्वास उठ जाता है.

यह दृश्य देखे बगैर कोई विश्वास नहीं कर सकता कि लोग जूठन पर भी कितनी बुरी तरह टूट सकते हैं. उस के लिए मरने और मारने पर उतारू हो जाते हैं. गाय की पूंछ मरोड़ कर या उसे सींगों से धकिया कर और कुत्तों को लतिया कर उन के मुंहमारी हुई जूठी पत्तलों में से खाना बटोर कर अपनी टोकरी में रखने में इनसान को कोई हिचक नहीं, कोई शर्म नहीं. घर ले जा कर शायद वह इसी जूठन को अपने परिवारजनों के साथ बैठ कर चटखारे ले कर खाएगा.

गृहस्वामी या ब्याहघर का प्रमुख केवल 2 ही जगह मिल सकता है, या तो प्रमुख द्वार पर, जहां वह सजधज कर हर आमंत्रित का स्वागत करता है या पिछवाड़े के दरवाजे पर जहां वह हाथों में मोटा डंडा लिए जूठन पर मंडराते जानवरों और इनसानों को एकसाथ धकेलता है. साथ ही जूते, हलवाई व उस के साथ आए कारीगरों पर निगाह रखता है.

जैसेजैसे विवाह समारोह यौवन पर आता है कुछ बराती सुरा की बोतलें खोलने के लिए लालायित हो जाते हैं. बरातों में जाना और पीना तो आजकल एक तरह से विवाह का आवश्यक अंग माना जाने लगा है. कुछ ब्याहघरों में, जहां सुरापान की अनुमति नहीं मिलती है, उन के बराती अंदर कम्युनिटी हाल में बोतलें ले कर मेरे ही घर की ओट ले कर नीम अंधेरे में बैठ कर यह शुभकार्य संपन्न करते हैं.

मैं जानती हूं कि जैसेजैसे यह सुरा अपना रंग दिखाएगी, वैसेवैसे उन की वाणी मुखर होती जाएगी. उन की वाणी मुखर हो उस के पहले ही मुझे अपनी खिड़कियां और दरवाजे सब बंद कर के अंदर दुबक जाना पड़ता है.

वह जमाना गया, जब बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हुआ करता था. परंतु मेरे घर की तरह ही जिस का घर कम्युनिटी हाल के सामने हो, वह बेगानी शादी में अब्दुल्ला कैसे बन सकता है? वैसे विवाह संपन्न होने के बाद जब घरबाहर के सब लोग विदा हो जाते हैं, तो वे कभी सफाई करवाने का कष्ट नहीं करते. उस से जो सड़ांध उठती है, उस से अब्दुल्ला तो क्या हर अड़ोसीपड़ोसी दीवाना हो जाता है.

दूसरे दिन ब्याह निबटा कर जब सारा कारवां गुजर जाता है, तब मैं भी ऐसी ही शांति की सांस लेती हूं जैसे कि मैं अपनी ही बेटी का ब्याह कर के निवृत्त हुई हूं. Family Story in Hindi.

Hindi Family Story: घर की नींव- क्या मां की तड़प को समझ पाया मधुकर?

Hindi Family Story: ट्रेन एक हलके से धक्के के साथ चल पड़ी. सैकड़ों विशालकाय लोहे की कैंचियों ने ऋषिकेश तक की दूरी को काटना शुरू कर दिया.

‘बाहर बारिश हो रही है, इधर कई दिनों से उमस हो रही थी. बादल पूरे आसमान में छाए हुए थे, कई दिनों से आसमान को घेरे पड़े थे, उमड़घुमड़ रहे थे, अब जा कर बरसे हैं तो वातावरण हलका हो जाएगा,’ मधुकर ने नीचे की बर्थ पर चादर बिछाते हुए सोचा, ‘उस का अपना मन भी तो ऐसे ही बोझिल है, जाने कब हलका होगा,’ उस ने जूते उतारे और पैर समेट कर आराम से बैठ गया. बाहर देखने की कोशिश में अपना चेहरा खिड़की के शीशे से सटा दिया. बाहर खिड़की के कांच पर एकएक बूंद गिरती है, फिर ये एकदूसरे के साथ मिल कर धार बना लेती हैं, अनवरत धार, जो बहती ही चली जाती है. बूंदों में उसे एक चेहरा नजर आने लगा. झुर्रियों भरा, ढेर सारा वात्सल्य समेटे वह चेहरा जिस ने उसे प्यार दिया, जन्म दिया, अपने उदर में आश्रय दिया, आंचल की छांव दी.

उस चेहरे की याद आते ही मधुकर की छाती में जैसे गोला सा अटकने लग जाता है. उस की मां पिछले साल से ऋषिकेश के एक आश्रम में रह रही हैं. अपने कामधंधे में इस बीच वह इतना व्यस्त रहा कि पिछले 4 महीनों से मां के खर्च के लिए रुपए भी नहीं भेज सका. वह लगातार टूर पर था. उस ने सोचा कि नमिता ने भेज दिए होंगे और नमिता ने सोचा कि उस ने भेज दिए होंगे. कल जब पता चला कि 4 महीनों से किराया नहीं गया तो फिर उस की बेचैनी का अंत न रहा और उस ने तुरंत ऋषिकेश जाने का निश्चय कर लिया. जाने मां किस हाल में होंगी, उन्होंने कोई पत्र भी नहीं लिखा, असल में वह स्वाभिमानी तो शुरू से ही रही हैं, उस के लिए यही स्वाभाविक था. उन्हें कितनी भी तकलीफ क्यों न हो, दयनीय बनना तो उन की फितरत में नहीं है.

‘सर्वे भवंतु सुखिन: बड़ेबड़े अक्षरों में लिखा हुआ, आश्रम का मटमैला गेट उस की नजरों में तैर रहा है. वह कब वहां पहुंचेगा, सोच कर उस ने बेचैनी से पहलू बदला.

मधुकर 10 वर्ष का था, तभी हृदयगति रुक जाने से पिता की असामयिक मृत्यु हो गई थी. दबीढकी, सकुचीसहमी, व्यक्तित्वहीन सी मां ने इस विकट परिस्थिति में कैसे रंग बदला देख कर वह दंग रह गया. उन्होंने उसे मांबाप दोनों बन कर पाला. उन के जीवन का सूत्र वही था, ‘उस की पढ़ाई, उस का स्वास्थ्य, उस की खुशी,’ मां की सारी दुनिया यहीं तक सिमट आई थी. जब मधुकर की नौकरी लगी, तो मां के चेहरे पर एक गहरी परितृप्ति की आभा दिखाई पड़ी, जैसे वह इसी दिन के लिए तो जी रही थीं.

मधुकर ने पहली तनख्वाह ला कर मां को दी और कहा कि मां, अब तक तुम बहुत मेहनत कर चुकीं, अब बस करो, आशा के विपरीत बिना किसी नानुकर के मां मान गई, जैसे वह इसी का इंतजार का रही हों.

मधुकर को पहली बार संतोष का एहसास और अपने कर्तव्य को पूरा कर सकने की कृतार्थता जैसी अनुभूति हुई, पर तभी जाने कहां से, मां को उस की शादी कर देने की धुन सवार हो गई.

बड़ी खोजबीन के बाद नमिता को उस के लिए मां ने पसंद किया. कई बड़े घरों से रिश्ते आए, लाखों रुपए दहेज का प्रस्ताव भी मां ने ठुकरा दिया यह कह कर कि गरीब घर की लड़की अधिक संवेदनशील होगी, वह तेरा घर सुखमय बनाए रखेगी, एक अच्छी पत्नी और सुघड़ बहू साबित होगी.

नमिता को देख कर मधुकर को भी अच्छा लगा. वह उसे विनम्र, सुभाषिणी और संस्कारवान लगी थी. पहली ही मुलाकात में उस ने कहा था, ‘नमिता, मेरी मां का खयाल रखना, मेरे लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी होम कर दी है.’

उस समय तो नमिता ने मुसकरा कर सिर हिला दिया था, पर अब उसे लगता है कि तभी गलती हो गई थी. उसी समय नमिता के मन ने मां को अपना प्रतिद्वंद्वी मान लिया था.

समय बीतने के साथसाथ यह प्रतिद्वंद्विता और गहरी होती गई थी. बच्चे होने के साथ तो यह संघर्ष बढ़ता ही चला गया. बच्चों के पालनपोषण को ले कर मां कोई भी सुझाव देतीं तो वह उन के मुंह पर ही उन की हंसी उड़ाती. संवेदनशील मां आहत हो कर धीरेधीरे अपने में ही सिमटती चली गई.

मधुकर ने जब भी विरोध करना चाहा, तो मां ने दृढ़ता से कह दिया, ‘देख मधु, मेरी जिंदगी आखिर और कितनी बची है. मेरे लिए तू अपनी गृहस्थी में दरार मत डाल.’

हां, दादी के हाथों पले बच्चे बड़े होने के बाद, दादी के ही ज्यादा नजदीक थे. मां तो उन के लिए एक थानेदार जैसी थीं, जो केवल निर्देश दिया करती थीं, ‘यह करो’ और ‘वह न करो.’ दादी ही उन की असली मां बन गई थीं. दोस्तों से झगड़ कर आने के बाद बच्चे दादी की गोद में ही सिर छिपा कर रोते.

यह सब नमिता को उग्र से उग्रतर बनाते चले जा रहे थे. सारी समस्याओं की जड़ में उसे मां ही नजर आतीं.
ऋषिकेश के छोटे से स्टेशन पर उतर कर उस का मन हुआ कि एक कप चाय पी ले, आश्रम में पता नहीं चाय मिलेगी भी या नहीं, तो तुरंत खयाल आया कि मां तो बारबार चाय पीती थीं. जब वह पढ़ता था तो मां रात में उस के साथ जागी रहती थीं, घंटे, डेढ़ घंटे में बिना कहे चाय बनातीं. अदरक डली हुई कड़क चाय का प्याला उसे स्फूर्ति दे जाता था, उसी समय मां को भी बारबार चाय पीने की आदत पड़ गई थी.

जीवन में ऐसे ढेरों क्षण आते हैं जो चुपचाप गुजर जाते हैं, पर उन में से कुछ स्मृतियों की दहलीज पर अंगद की तरह पैर जमा कर खड़े रह जाते हैं. हमारी चेतना के पटल पर वे फ्रीज हैं तो हैं. मां के साथ बिताए कितने सारे क्षण, जिन में वह केवल याचक है, उस की स्मृति की दहलीज पर कतार बांधे खड़े हैं.

विचारों में डूबताउतराता मधुकर आश्रम के जंग खाए, विशालकाय गेट के सामने आ खड़ा हुआ. सड़क पतली, वीरान और खामोश थी. चारों तरफ दरख्तों के झुंड में धूपछांव का खेल चल रहा था. नीला आसमान था, साफ हवा के झोंके थे, मधुकर पुलकित हो कर यह दृश्य देखता रहा. जाने क्या जादू था यहां कि उस की सारी चिंताएं, सारे तनाव जाने कहां खो गए.

गेट खोल कर मधुकर अंदर आया तो मां एक खुरपी से मोगरा के फूलों की क्यारी ठीक कर रही थीं. मधुकर को देख उन के मुंह से निकला, ‘‘बेटा, तू आ गया,’’ और अपनी डबडबाई आंखों को छिपाने के लिए वह इधरउधर देखने लगीं. आंखें तो उस की भी भर आईं, उस ने मां को यहां क्यों आने दिया. सैकड़ों बार स्वयं से पूछा गया यह सवाल आज भी उस की अंतरात्मा को कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया.

मां अत्यंत बेचैन हो उठीं कि उसे क्या खिलाएंपिलाएं. ‘‘मां, तुम मेरे खानेपीने की चिंता मत करो, आज तो हम मांबेटे सिर्फ बातें करेंगे,’’ लाड़ जताता हुआ मधुकर बोला.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, पर पहले तुम नहा कर तो आओ.’’

‘‘तो मां, तुम नहीं सुधरोगी,’’ कहता हुआ मधुकर हंस पड़ा.

मां को हमेशा से अच्छा लगता था कि घर के सब लोग सुबहसुबह नहाधो कर तैयार हो जाएं और मधुकर इस बात पर खूब टालमटोल करता था.

‘‘अरे, आश्रम के पास ही गंगा का घाट है, नहा कर तो देखो, कितना अच्छा लगता है,’’ मां ने फिर से अपनी बात पर जोर दिया.

‘‘जाता हूं, मां जाता हूं,’’ कहता हुआ मधुकर उठ खड़ा हुआ.

गंगाजल का शीतल, पावन स्पर्श उस की शिराओं में अज्ञात टौनिक का संचार कर गया. वह बड़ी देर तक तैरता रहा. नहा कर आया तो मां ने उस की पसंद के आलू के मोटेमोटे परांठे, घर का निकाला हुआ मक्खन का बड़ा सा डला और दहीचीनी परोसा.

बहुत दिनों बाद डायबिटीज और कोलैस्ट्राल को भूल मधुकर ने भरपेट खाना खाया और लेट गया.
मां उस के बारबार मना करने के बावजूद उस के सिर में तेल लगाने बैठ गईं, साथ ही, ‘नमिता कैसी है? चिंकी और मिंकू कैसे हैं? मिंकू अब दूध पी लेता है न, रात में बिस्तर गीला करने की आदत छूटी या नहीं’ इत्यादि सवाल करते समय मां के स्वर का गीलापन साफसाफ पकड़ में आ रहा था.

मधुकर खुद को फिर से कठघरे में खड़ा पा रहा था, साथ ही, लरजता हुआ यह ममतामय स्पर्श, उस का मन हो रहा था कि मां की गोद में सिर छिपा कर फूटफूट कर रो पड़े. नमिता तो पराई जाति थी, पर उसे क्या हो गया था. अपना घर बचाने के लिए उस ने कैसी कीमत चुकाई? क्या उस का घर इतना कीमती है कि उस की बूढ़ी मां का वात्सल्य भी उस के आगे छोटा पड़ जाए.

शाम को मधुकर सो कर उठा तो मां भोजन की तैयारी में जुट गई थीं. उस ने कहा, ‘‘मां, तुम अपना काम निबटाओ, तब तक मैं घूम कर आता हूं.’’

शाम का समय, गंगा का किनारा, शीतल जल, साफ पानी के अंदर गोल चमकीले पत्थर, तनमन का मैल धोने आए कितने ही श्रद्धालु वहां आसपास घूम रहे थे. संध्याकालीन आरती के साथ घंटेघड़ियालों एवं शंखों की ध्वनि वातावरण में सम्मोहन घोल रहे थे. गंगा की लहरों पर इमारती लकड़ी का एक बड़ा सा कुंदा बहता जा रहा था, उस की जिंदगी भी तो ऐसे ही समय की लहरों से धकेली जा रही है. सुबह, दोपहर, शाम और वह बहता रहा, बहता रहा. परिस्थितियों के हाथों खेलता रहा. नमिता ने मां की शिकायतें कीं, उस ने सुन लिया, मां और फिर बेटा दोनों उस कर्कशा, झगड़ालू पत्नी के हाथों प्रताड़ित होते रहे. उस ने जब भी प्रतिवाद करना चाहा, नमिता ने घर छोड़ कर चले जाने की धमकी दे डाली.

बेटेबहू में बढ़ते तनाव को देखते हुए परेशान मां ने उन के बीच से हट जाने का फैसला लिया और बेटे को समझा दिया कि अब उस के पूजापाठ में मन लगाने के दिन हैं. अपनी एक परिचिता का दिया हुआ ऋषिकेश के आश्रम का पता भी दिया.

मधुकर को मां का यह प्रस्ताव बहुत ही अरुचिकर और हृदयविदारक लगा, पर मां को आश्रम भेजने में नमिता की तत्परता और बेटे का घर बना रहे इस के लिए मां का त्याग, दोनों के आगे वह कुछ न कर पाया.

‘काश, वह कुछ कर पाता. यह इतना बड़ा ब्रह्मांड, आकाश, तारे, नक्षत्र, सूर्य, चंद्रमा सब अपनी धुरी पर अपना दायित्व निभाते रहते हैं. कमाल का समायोजन है. हम मानव ही इतने असंतुलित क्यों हैं,’ सोचते हुए मधुकर के अंदर एक बेचैनी पलने लगी थी, अंदर ही अंदर वह खौल रहा था, उबलते पानी की तरह. कई बार सोचता है, ‘वह कुछ बोलता क्यों नहीं? क्यों अपनी आत्मा पर बोझ ले कर जिंदा है? मां के प्यार का क्या प्रतिदान वह दे रहा है?’ वह सोच रहा था कि अचानक ‘छपाक’ की आवाज और किसी औरत की चीख सुनाई दी, ‘अरे, कोई बचाओ, मेरा बच्चा डूब रहा है. बचाओ, अरे कोई तो बचाओ…’

बेचैन मां की हृदयविदारक चीख सुनाई पड़ते ही मधुकर अपनी तंद्रा से बाहर आता है, उछल कर खड़ा हो जाता है, तब तक बेटे को बचाने के लिए मां भी उस के पीछे नदी में डुबकी लगा चुकी है, न मां का पता है, न बच्चे का… 3-4 मल्लाह पानी में संघर्ष करते दिखाई पड़ते हैं. थोड़ी ही देर में बच्चा ढूंढ़ लिया जाता है, पर मां नहीं मिलती. लगता है, उस ने जलसमाधि ले ली.

हलचल मची हुई है, लोग बातें कर रहे हैं, ‘‘बेचारा बच्चा अनाथ हो गया. मां को तैरना नहीं आता था तो कूदी क्यों, बेचारी, डूब गई.’’

मधुकर को जरा भी आश्चर्य नहीं है. अगर वह डूब रहा होता तो उस की मां भी यही करती. और वह खुद कायर की तरह नमिता के हाथों खेलता रहा, केवल इसलिए कि घर की शांति न भंग हो, घर बचा रहे. अरे, ये बुजुर्ग ही तो घर की नींव होते हैं, बिना नींव के क्या कभी घर टिका है.

एक पल में उस का मन निर्द्वंद्व हो गया. उस ने निश्चय कर लिया कि अब चाहे जो हो, अपने घर की नींव को वह पुख्ता और मजबूत बनाएगा. फिर तो उस का घर आंधीतूफान, सबकुछ झेल लेगा, सबकुछ. इस का उसे पक्का यकीन है. और वह सधे कदमों से आश्रम की ओर चल पड़ा. Hindi Family Story.

Family Story in Hindi: सखी- रीता को मां ने क्या सलाह दी?

Family Story in Hindi: रीता और मीना का आज आखिरी पेपर था. दोपहर घर पहुंचीं तो उन की खुशी देखते ही बनती थी. 2 महीनों से पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई में व्यस्त थीं. 12वीं कक्षा की पढ़ाई छात्रों के लिए बेहद अहम होती है. इसी कक्षा के नंबरों पर आगे की पढ़ाई निर्भर करती है. अगर नंबर थोडे़ भी कम हुए तो किसी भी अच्छे कालेज में दाखिला नहीं मिल सकता. इसीलिए 2 महीनों से रीता और मीना ने पढ़ाई के लिए दिनरात एक कर दिए थे. आज एक बड़ा बोझ उन के सिर से उतर गया था. आज दोनों का पिक्चर देखने जाने का प्रोग्राम था. रीता और मीना ऐडल्ट मूवी देखने गईं, जिस की उन की सहेलियों में बहुत चर्चा थी. वे दोनों भी खुद को वयस्क मानने लगी थीं. शरीर में होते हारमोनल बदलाव को वे महसूस करने लगी थीं.

पिक्चरहौल में जा कर देखा तो आधे से अधिक दर्शक 12वीं कक्षा के छात्र थे. पिक्चर शुरू होते ही हौल में सन्नाटा छा गया. सब का ध्यान स्क्रीन पर था. हीरो और हीरोइन का रोमांस करना, एकदूसरे को चूमना जवान दिलों की धड़कनों को बढ़ाने के लिए काफी था. पहली बार सब ऐसे दृश्य देख रहे थे. सब की धड़कनें बेकाबू होती जा रही थीं. सभी अलग ही दुनिया में विचरण कर रहे थे. मूवी खत्म हुई तो बाहर आने वाले सब छात्रों के चेहरे देखने लायक थे. कुछ के चेहरे रोमांच से लाल थे तो कुछ मुंह नीचा किए जा रहे थे मानों उन से कोई अपराध हो गया हो. रीता और मीना भी कुछ इसी भाव से भरी हुई थीं. आज रात में दोनों एकसाथ ही रहने वाली थीं. दोनों सीधे घर आईं और मूवी के डायलौग दोहराने लगीं. दोनों का हंसहंस कर बुरा हाल था.

रात को खाने की मेज पर रीता के मम्मीपापा भी खाना खाने के लिए साथ बैठे. दोनों ही डाक्टर थे और एक ही अस्पताल में काम करते थे. रीता की मां स्त्रीरोग विशेषज्ञा थीं.

वे बोलीं, ‘‘आज दोनों के चेहरों पर खुशी नजर आ रही है. अब डेढ़ महीना मजे में बिताओ. जब रिजल्ट आएगा तो फिर चिंता शुरू होगी कि दाखिला कहां मिले.’’

‘‘आज तुम दोनों कौन सी मूवी देख कर आईं?’’ रीता के पिता उमेश ने पूछा.

दोनों ने एकदूसरे की ओर देखा और फिर तुरंत किसी दूसरी मूवी का नाम ले दिया. उन का झूठ वे नहीं पकड़ पाए. रीता के मम्मीपापा दोनों ही अपनेअपने काम में इतना व्यस्त रहते थे कि अपनी बेटी की हरकतों की ओर उन का ध्यान नहीं जाता था. इसलिए रीता और मीना की छिपी मुसकराहट को वे नहीं देख पाए. रात को मीना की मां का फोन आया. मीना की मां शहर के एक बहुत बड़े बुटीक की मालकिन थीं और बहुत व्यस्त रहती थीं. मीना को अच्छी से अच्छी चीजें देना ही उन का काम था. मीना भी अपनी कक्षा की वैल ड्रैस्ड गर्ल के रूप में जानी जाती थी. मीना के साथ बैठ कर उन्होंने कभी बात नहीं की.

रात को जब रीता और मीना सोने लगीं तो उन की बातों का केंद्र वही मूवी थी. रीता गुनगुना उठी, ‘‘बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए…’’

सुन कर मीना ने चुटकी ली, ‘‘तो फिर एक हसीन सनम ढूंढ़ा जाए.’’

‘‘हां जरूर पर सपनों में ही. अगर सच में ढूंढ़ लिया तो मम्मीडैडी घर से निकाल देंगे.’’

‘‘उन्हें कौन बताएगा. उन्हें तो अपने काम से ही फुरसत नहीं मिलती है. हम थोड़ीबहुत शैतानी कर ही सकते हैं.’’

‘‘अगर शैतानी भारी पड़ गई तो?’’

‘‘पहले से ही गलत सोचना शुरू कर दिया तो फिर हम कुछ नहीं कर पाएंगे.’’

‘‘अगर तुझे डर नहीं लगता है तो तू ही शुरू कर ले. मैं दूर बैठी ही मजा लूंगी.’’

‘‘ऐसा नहीं होगा, डूबेंगे तो एकसाथ समझी?’’

‘‘हां, समझ गई मेरी सखी,’’ फिर आगे बोली, ‘‘अरे, सखी सुनते ही मुझे ध्यान आ रहा है कि पेपर शुरू होने से पहले एक डाक्टर स्कूल में आई थीं. उन्होंने सखी नाम की ओरल कौंट्रासैप्टिव पिल के बार में बताया था. तब तो पढ़ाई का भूत सवार था, इसलिए उस ओर ध्यान नहीं दिया. अब वह पैंफ्लेट ला कर पढ़ते हैं. मैं ने अपनी हिंदी की किताब में रखा था,’’ कह कर रीता झट से उसे निकाल लाई.

‘‘ज्यादा उड़ने की कोशिश मत कर. वे सब तो शादी के बाद की बातें हैं… अभी वैसा सोचा तो बहुत मार पड़ेगी.’’

‘‘तू तो बस डरती ही रहती है. जिंदगी का मजा क्या बुढ़ापे में उठाएगी?’’ कह वह सखी का विज्ञापन पढ़ने लगी. उस में लिखा था- जब तक चाहें बच्चा न पाएं और 2 बच्चों में अंतर रखने का सरल उपाय.

‘‘हमें तो बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए… इस आशिकी में सखी ही काम आएगी समझी मेरी सखी?’’ वह गुनगुनाते हुए बोली.

‘‘बस कर… बस कर… तेरी मम्मी को पता चल गया तो गजब हो जाएगा… तू ने आरुषि वाली खबर तो पेपर में जरूर पढ़ी होगी कि मांबाप ने ही आशिकमिजाज बेटी की हत्या कर दी.’’

‘‘अपना उपदेश अपने पास रख. मुझे तो एक अदद सनम चाहिए.’’

दोनों बातें करतीकरती नींद के आगोश में चली गईं. दूसरे दिन जब सुबह उठीं तो भी उन के दिमाग में वही मूवी घूम रही थी. दोनों की आपस में छेड़छाड़ जारी थी.

रीता बोली, ‘‘तुझे कैसा सनम चाहिए?’’

‘‘पहले तू बता?’’

‘‘अक्षय कुमार जैसा.’’

‘‘मुझे तो संजीव कुमार जैसा चाहिए.’’

‘‘तुझे सनम चाहिए या पापा?’’

‘‘सनम ऐसा हो जिस के साथ मैं सुरक्षित महसूस करूं. एक से दूसरे फूल पर उड़ने वाला नहीं चाहिए.’’

‘‘तू तो बहुत दूरदर्शिता की बातें करती है?’’

‘‘मैं तो हमेशा से ही होशियार हूं… तू ने मुझे समझ क्या रखा है? और सुन तुझे भी कोई गलत काम नहीं करने दूंगी.’’

‘‘अच्छा मेरी सखी,’’ और फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं.

दोनों ही हंसी की आवाज सुन कर रीता के पिता डा. उमेश अंदर आए और बोले, ‘‘1 दिन और छुट्टी मना लो. कल सुबह से तुम्हारी ड्राइविंग क्लास शुरू हो जाएगी. मैं ने एक ड्राइवर को फिक्स कर दिया है. वह रोज सुबह 7 बजे आ कर तम्हें ड्राइविंग सिखाने ले जाया करेगा.’’

‘‘सच डैडी, आप मुझे कार चलाने देंगे? आप कितने अच्छे हैं… थैंक्यू डैडी.’’

‘‘और तुम्हारी मां ने दोपहर में तुम्हारा नाम कुकिंग क्लास के लिए भी लिखवा दिया है. दोपहर में 1 घंटा तुम वहां जाओगी. शाम को 1 घंटा जिम में कसरत करोगी.’’

‘‘वाह, आप ने तो पूरे दिन का प्रोग्राम बना दिया. अब बोर होने के लिए समय ही नहीं होगा.’’

मीना दोपहर को अपने घर चली गई. दूसरे दिन जब ड्राइवर आया और रीता ड्राइविंग सीखने निकली तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. 1 हफ्ता बीततेबीतते वह कार चलाना सीख गई. अब उस का ध्यान ड्राइवर की ओर गया. वह बहुत ही स्मार्ट लड़का था. देखने में अक्षय कुमार से कम नहीं था. अतिरिक्त पैसा कमाने के लिए वह पार्टटाइम में ड्राइविंग सिखाता था. अब अचानक ही उस का हाथ उस के हाथ को छूने लगा और तिरछी नजरों से एकदूसरे को देखना शुरू हो गया. रीता अब उठतेबैठते उस ड्राइवर मनु के बारे में ही सोचती. उस ने मीना को भी फोन पर बताया कि एक अदद आशिक मिल गया है. अब बस आशिकी करने की देर है.

मीना बोली, ‘‘पागल मत बन. एक ड्राइवर को आशिक बनाएगी?’’

‘‘क्यों नहीं? एक ड्राइवर आशिक क्यों नहीं बन सकता? मैं पूरे जीवन की बात नहीं कर रही हूं. मैं तो पार्टटाइम आशिक की बात कर रही हूं.’’

‘‘तू पागल हो गई है. हद में रह तेरी मम्मी को पता चला तो मार डालेगी तुझे… एक और आरुषि मर्डर केस बन जाएगा.’’

‘‘मैं इतनी भोली नहीं हूं. मेरे कारनामे की खबर मम्मी को पता नहीं लगेगी.’’

दूसरे दिन जब तक मीना उस के घर पहुंची तब तक रीता मनमानी कर चुकी थी. उस ने अपनी मम्मी के पर्स से ही सखी पिल निकाल कर खा ली थी. पिल खाने के बाद उस के हौसले बुलंद थे. आशिक के सामने जब रीता ने स्वयं समर्पण कर दिया तो फिर उसे क्यों एतराज होने लगा था और फिर कार की पिछली सीट पर ही सब घटित हो गया. मीना जब रीता के पास पहुंची तो उसे देखते ही वह सब कुछ समझ गई.

अब उस ने रीता को डांटना शुरू किया. बोली, ‘‘यह तू ने क्या किया? अगर पिल ने काम नहीं किया और कुछ गड़बड़ हो गई तो? हमें वह ऐडल्ट मूवी देखनी ही नहीं चाहिए थी.’’

‘‘अच्छा अपना भाषण बंद कर. अब तू भी जल्दी से एक आशिक ढूंढ़ ले.’’

‘‘अपनी सलाह अपने पास रख. अब दोबारा तू ऐसा कुछ भी नहीं करेगी जिसे छिपाना पड़े.’’

‘‘अच्छा, ऐसी बात है तो मैं तुझे कुछ भी नहीं बताऊंगी. सतिसावित्री तू ही बन. मुझे तो जिंदगी के मजे लेने हैं.’’

मीना ने चुप रहने में ही भलाई समझी. चूंकि रीता के सिर पर आशिकी का भूत सवार था, इसलिए किसी भी सलाह का असर उस पर होने वाला नहीं था. रीता ने मजे लेले कर मीना को सब कुछ बताया. वह सोच रही थी कि उस ने दुनिया की सब से बड़ी नियामत पा ली है. पर उस की इन बातों ने मीना पर कोई असर नहीं किया. वह अपनी हद में रहना जानती थी. रीता की ड्राइविंग तो पूरी हो गई थी, पर उस का मनु ड्राइवर से मिलनाजुलना चलता रहा. धीरेधीरे नए अनुभव पुराने होने लगे. अब वह मनु से पीछा छुड़ाना चाहती थी. रिजल्ट निकलने का समय भी नजदीक आ रहा था. उधर उस ने महसूस किया कि शरीर में कुछ गड़बड़ हो रही है. इस महीने उसे नियत समय पर पीरियड भी नहीं आया. उस ने 1 हफ्ता और इंतजार किया. फिर तो उस की जान सूखनी शुरू हो गई.

उस ने मीना को घर बुलाया और अपनी परेशानी बताई.

मीना उस पर टूट पड़ी. बोली, ‘‘अब भुगत अपनी करनी का फल. बेवकूफ लड़की अब ले आशिकी का मजा. सखी ने भी धोखा दे दिया न? अब क्या करेगी? आंटी को पता चला तो उन्हें कितना दुख होगा.’’

‘‘लैक्चरबाजी बंद कर और मुझे बता अब मैं क्या करूं?’’

‘‘सखी पिल रोज नहीं खाई थी क्या?’’

‘‘छोड़ इन सब बातों को अब मुझे तू इस मुसीबत से निकाल.’’

‘‘अपनी मम्मी को सब कुछ सचसच बता दे. वे डाक्टर हैं. उन्हें ही पता होगा कि अब क्या करना है.’’

‘‘मम्मी को बता दे, वाह क्या अच्छी सलाह दे रही है. क्या और कोई डाक्टर नहीं है?’’

‘‘डाक्टर तो बहुत हैं पर कुछ गड़बड़ हो गई तो आंटी को पता तो चलेगा ही.’’

‘‘क्या गड़बड़ होगी? सुना है कि 10-15 मिनट में सब खत्म हो जाता है और किसी को भी पता नहीं लगता है. ’’

‘‘सुना है कई बार केस बिगड़ जाता है. तब लेने के देने पड़ जाते हैं. देख एक गलती तो कर चुकी है अब दूसरी बड़ी गलती मत कर. अपनी मम्मी को सब बता दे और वे ही तुझे इस बड़ी मुसीबत से निकाल सकती हैं.’’

‘‘मेरी इतनी हिम्मत नहीं है… मैं मम्मी को कुछ भी नहीं बता सकती हूं.’’

‘‘तो फिर लिख कर सब बता दे. तुझे डांट तो जरूर पड़ेगी पर तू सुरक्षित हाथों में रहेगी.’’

रीता अब कुछ भी करने को तैयार थी. उस ने सारी घटना कागज पर लिखी और मां के पर्स में डाल दी. मां ने जब पढ़ा तो उन के पांवों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उन की बेटी ने इतनी बड़ी गलती कैसे कर ली? उन का दिमाग ही जैसे थम सा गया. पति को बताएं या छिपाएं… वे जल्दी घर आ गईं और फिर खुद को कमरे में बंद कर लिया. 1-2 घंटे बीत जाने पर वे शांत हुईं और फिर रीता को बुलाया.

‘‘मौम मैं ने आप के पर्स में से ही सखी पिल्स निकाल कर खाई थीं.’’

‘‘उन पर ऐक्सपायरी डेट पढ़ी थी क्या?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘अब चुप रहो और अपनी नादानी की सजा भुगतो. मैं ने कितनी ही बेवकूफ लड़कियों के अबौर्शन किए हैं पर नहीं जानती थी कि एक दिन मेरी ही बेटी इस तरह मेरे सामने आएगी. तुम्हारे अधकचरे ज्ञान ने तुम्हें मार दिया. मुझे कभी इतनी फुरसत ही नहीं मिली कि तुम्हें सब कुछ समझाऊं. मेरे घर में मेरी बेटी इतनी बड़ी हो गई है, इस का मुझे भान तक नहीं हुआ. मैं तो अपने ही काम में व्यस्त रही. हम दोनों से ही चूक हो गई. अब दोनों को ही सजा मिलेगी. मैं भी सारी उम्र अपने को माफ नहीं कर पाऊंगी. चलो, आज शाम को ही काम कर दिया जाए. आज तेरे डैडी भी घर में नहीं हैं. उन को भी खबर नहीं होनी चाहिए. तेरे पल भर के मजे ने तुझे डुबो दिया.’’

‘‘मां, मुझे माफ कर दो.’’

फिर उसी शाम घर में बने क्लीनिक में एक मां ने अपनी बेटी की गलती का निशान साफ कर दिया. शारीरिक बोझ तो चला गया था, पर इस घटना के मानसिक घाव कभी जाने वाले नहीं थे. बिना उचित जानकारी के अच्छी औषधि भी जहर बन सकती है. वे तो विवाहित महिलाओं को ही समझाती थीं कि जब तक न चाहो संतान न पाओ या बच्चों की आयु में अंतर कैसे रखें. स्कूलकालेज की छात्राएं इस का दुरुपयोग करेंगी, ऐसा तो उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था. बंदर के हाथ में उस्तरे जैसा काम उन की बेटी के जीवन में इन पिल्स ने किया था. उन की बेटी जैसी उन्मुक्त और न जाने कितनी लड़कियों ने इन पिल्स का दुरुपयोग किया होगा. जीवन में ज्ञान के साथसाथ विवेक की भी जरूरत होती है. विवेक को केवल मातापिता ही सिखा सकते हैं. वे तो अच्छी मां साबित नहीं हुईं. उन्होंने काम की अधिकता के कारण कभी बेटी के पास बैठ कर उसे उचितअनुचित का ज्ञान नहीं दिया. आज बेटी की गलती में वे भी अपनेआप को बराबर का भागीदार मान रही थीं, इसीलिए वे रीता को डांट भी नहीं पाईं. बस मनमसोस कर रह गईं. Family Story in Hindi.

Modern Homes Essentials: आधुनिक घरों की जरूरत- हल्की और कॉम्पैक्ट रजाइयां

Modern Homes Essentials: ”अम्मा जाड़े शुरू हो गए, मगर अभी तक किसी धुनिये की आवाज सुनाई नहीं दी. पुरानी रजाइयां खुलवा कर रुई धुनवा लेते तो कुछ गर्माहट बढ़ती.”

सरला आँगन की गुनगुनी धूप में बैठी अपनी बूढ़ी सास से बोली.

”हां बहू, पहले तो सितम्बर-अक्टूबर में ही आवाज देने लगते थे, अब तो नवम्बर चढ़ जाता है और धुनिया नहीं आते. मेरी वाली रजाई तो बिलकुल पिचक गई है, पिछले साल भी नहीं धुन पाई. पता नहीं अबकी जाड़े में गर्मी देगी या नहीं. तुम तो मेरे लिए कम्बल भी निकाल देना.”

इतने में सुरभि अंदर वाले कमरे से बाहर आयी और बोली, ”क्या दादी, मार्केट में कितनी सुन्दर सुन्दर रजाइयां हैं, कितनी हल्की और गर्म, इस बार मैं आपके लिए सुन्दर सी जयपुरी रजाई ला दूंगा. अब छोड़ो ये धुनिये का चक्कर. अब नहीं आते धुनिये. सब लोग बनी बनाई रजाइयां खरीदते हैं. हल्की और गर्म भी होती हैं और उनको वाशिंग मशीन में डाल कर धोया भी जा सकता है.”

सुरभि की बात तो सही थी. आज रजाइयों में भी इतनी वैरायटी मार्केट में है, कि चुनना मुश्किल होता है कि यह वाली खरीद लें कि वह वाली. सभी आकर्षक रंगों की, हलकी-फुलकी और सस्ती भी. कांथा रजाई, सुझनी रजाई, जयपुरी रजाई, कश्मीरी रजाई, गुजराती रजाई, हिमाचली या कांगड़ा रजाई, फर की बनी रजाइयां, थर्मल रजाइयां कितनी तरह की रजाइयां उपलब्ध हैं. हजार-डेढ़ हजार से शुरू होकर पांच-छह हजार रुपये तक में इतनी अच्छी रजाइयां आ जाती हैं जो दस दस साल तक खराब नहीं होती हैं.

“रजाई” या quilt जैसी चीज़ का इतिहास मानव सभ्यता की सबसे पुरानी आवश्यकताओं यानी शरीर को गर्माहट और सुरक्षा देने से जुड़ा हुआ है. लगभग 30,000–40,000 वर्ष पहले जब मनुष्य ने जानवरों की खालें पहननी शुरू कीं, तो वही रजाई जैसी पहली “गर्मी देने वाली चादरें” मानी गई. सैकड़ों वर्षों बाद में जब सूई और धागे का आविष्कार हुआ, तब लोगों ने कपड़ों की परतें सिलकर और उसमें कपास की भराई करके रजाइयां बनायीं, जो सर्दी में उनके शरीर को गरम रखती थीं.

प्राचीन मिस्र (लगभग 3400 ई.पू.) की कब्रों में ऐसी चित्रकारी मिली है जिसमें सैनिकों के पास कपास से भरे वस्त्र हैं, यानी कपड़ों की परतों में भराई की तकनीक तब भी थी. चीन में रेशम का आविष्कार लगभग 3000 ई.पू. होने के बाद लोग रेशमी कपड़ों में रुई या ऊन भरने लगे. भारत में कपास की खेती बहुत प्राचीन है. सिंधु सभ्यता (2500 ई.पू.) में भी कपास के तंतु मिलते हैं. इससे रुई भरी चादरें या “गद्देदार कपड़े” बनाना संभव हुआ.

भारत में “रजाई” का उल्लेख सबसे पहले मध्यकालीन काल में मिलता है. मुगल दरबारों में चटख रंगों में सुन्दर कशीदाकारी वाली “रजाई” एक विलासी वस्तु थी. राजस्थान, लखनऊ, बनारस और जयपुर में हाथ से रुई भरकर बनाई गई रजाइयाँ प्रसिद्ध थीं. रजाई की रुई को “धुनाई” करके बहुत महीन और हल्का बनाया जाता था. यही परंपरा आज भी लखनऊ और जयपुर की “हैंडमेड रजाइयों” में मिलती है. राजघरानों और नवाबों के लिए रेशम के कवर वाली और सुनहरे धागों की कढ़ाई वाली रजाइयाँ बनती थीं.

ब्रिटिश लोगों के भारत में आगमन के बाद यूरोपीय शैली के कंबल और रजाई भारत में फैले. वहीं भारत की पारंपरिक “कांथा” (बंगाल), “सुझनी” (बिहार), “रजाई” (उत्तर भारत) कला को भी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली. “कांथा” में पुराने कपड़ों की परतों को हाथ से सिलकर रजाई जैसा बनाया जाता है. वहीँ आधुनिक रजाइयाँ मशीन से बनती हैं, जिनमें पॉलिएस्टर, माइक्रो फाइबर या डक डाउन (बतख के पंख) जैसी भराई होती है. लेकिन भारत में हैंडमेड कॉटन रजाई अभी भी सर्दियों की पहचान है. खासकर उत्तर भारत में. जयपुर की “संगानेरी रजाइयाँ” और लखनऊ की “मुर्गा रुई रजाई” अपने हल्केपन और गर्माहट के लिए प्रसिद्ध हैं. यानी रजाई आदिम काल की खालों से शुरू होकर मुगल काल की विलासिता, ब्रिटिश काल की कला और आज की मशीन-निर्मित दुनिया तक एक लंबा सफर तय कर चुकी है.

भारत की वस्त्र-संस्कृति यूं भी अपने शिल्प, रंगों और क्षेत्रीय विविधता के लिए विश्व विख्यात है. बंगाल की कांथा, बिहार की सुझनी और राजस्थान की जयपुरी रजाई तीनों भारत के अलग-अलग सांस्कृतिक परिदृश्यों की प्रतिनिधि हैं. इनमें न केवल सिलाई की तकनीकी निपुणता है, बल्कि लोककथाओं, परंपराओं और जीवन-दर्शन की झलक भी मिलती है.

कांथा रजाइयां बंगाल की ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भरता का प्रतीक हैं. एनजीओ और एसएचजी समूहों के माध्यम से आज कांथा रजाइयों का अंतरराष्ट्रीय निर्यात होता है. कांथा बंगाली गृहिणियों के लिए आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम भी है और घरेलू सृजन की आत्मीयता को भी दर्शाती है. पश्चिम बंगाल, ढाका और मुर्शीदाबाद में यह रजाइयां खूब बनाई जाती हैं जिसमें पुरानी साड़ियों या कपड़ों के टुकड़ों का प्रयोग होता है. इन रजाइयों पर आमतौर पर लोक-कथाएं, पशु-पक्षी, देवी-देवता या जीवन दृश्य उकेरे जाते हैं.

सुझनी रजाइयां बिहार की हस्तकला उद्योग में अभी सीमित स्तर पर बनती हैं. परंतु मधुबनी आर्ट की तरह इसे भी ”जीआई टैग” मिला हुआ है. मिथिला समाज में महिलाओं के सामाजिक-सांस्कृतिक बोध का दस्तावेज; यह “कपड़े पर कथा” कहलाती है. यह  स्त्री-जीवन पर आधारित रजाइयां हैं जिनमें स्त्रियों को विभिन्न प्रकार के घरेलू कार्यों को करते हुए दिखाया जाता है. दरभंगा, मधुबनी, मुज़फ्फरपुर में सुझनी रजाइयां खूब बनाई जाती हैं. इसकी खासियत यह है कि इन पर बारीक कढ़ाई और सांस्कृतिक सौहार्द को दर्शाया जाता है. दो सूती कपड़ों के बीच हल्की रुई भरी जाती और ऊपर की सतह पर सुई-धागे से सुजनी कढ़ाई होती है. डिजाइन में मिथिला चित्रकला जैसी आकृतियाँ – सूर्य, मछली, पेड़, पशु आदि बनाये जाते हैं. यह काम पूरी तरह महिलाओं द्वारा हस्तकला के रूप में किया जाता है. खास बात यह है कि सुझनी रजाई केवल गर्मी ही नहीं देती बल्कि यह बिहार की स्त्री-कला और सामाजिक संदेशों की अभिव्यक्ति भी है.

जयपुरी रजाई राजस्थान की अर्थव्यवस्था में प्रमुख “हैंडलूम-टेक्सटाइल” उत्पाद है. “सांगानेर” और “बगरू” प्रिंट्स से सजी यह रजाइयाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हैं. राजस्थानी आतिथ्य और वैभव का प्रतीक; शादी-ब्याह और पर्यटन उद्योग में यह बहुत ही लोकप्रिय हैं. जयपुरी रजाई अपने हल्केपन और रंगीन सौंदर्य के कारण विश्व प्रसिद्ध है. जयपुर, सवाई माधोपुर, टोंक, सीकर में यह खूब बनाई जाती हैं. इसमें अंदर भराव के लिए शुद्ध रुई का उपयोग होता है और बाहरी कपड़ा आमतौर पर सुतरी या मलमल का होता है जो बहुत ही मुलायम और शरीर को विलासिता का अहसास कराने वाला होता है. बाहरी कपड़े पर अक्सर ब्लॉक प्रिंटिंग की जाती है. “जयपुरी रजाई” इतनी हल्की होती है कि कहा जाता है कि “पूरा बदन ढक ले और वजन रुमाल जैसा लगे.”

काश्मीरी रजाई को श्रीनगर और बारामूला की महिलाएं बड़े पैमाने पर तैयार करती हैं. यह अत्यंत गर्म, ऊनी या रेशमी परत वाली रजाइयां हैं इनके भीतर शुद्ध ऊन या ऊनी रुई भरी होती है. बाहर का कपड़ा रेशम या मखमल का होता है जिस पर अक्सर कश्मीरी कढ़ाई जिसे सोज़नी या आरी वर्क कहते हैं, की जाती है. कुछ रजाइयाँ “नमदा” तकनीक (फेल्टिंग वूल) से भी बनती हैं. खास बात यह है कि कश्मीर की रजाइयाँ ठंड के मौसम में लकड़ी के अंगीठी (कांगड़ी) के साथ पारंपरिक जीवन का हिस्सा हैं.

गुजराती रजाई कच्छ, भुज और सौराष्ट्र में बड़े पैमाने पर तैयार की जाती हैं. इनकी विशेषता इन पर हुई रंगीन कढ़ाई, मिरर वर्क और पैचवर्क है. वहां की घरेलू महिलायें पुराने कपड़ों के टुकड़े जोड़-जोड़ कर सुन्दर पैचवर्क की रजाई बनाती हैं. इसमें काफी मेहनत लगती है. इस खोल के बीच में रुई या ऊन भरा जाता है और इसके ऊपर से गुजराती कढ़ाई और मिरर वर्क किया जाता है. गुजराती रजाइयों की खासियत यह है कि यह रजाइयां सिर्फ ओढ़ने के उपयोग में ही नहीं आतीं बल्कि यह लोकनृत्य और विवाह सजावट का भी हिस्सा होती हैं.

हिमाचली या कांगड़ा रजाई कांगड़ा, मंडी और कुल्लू में बनती हैं. यह स्थानीय ऊन से बनी, भारी और बेहद गर्म रजाइयां होती हैं. इनको पहाड़ी भेड़ों के ऊन से हाथ से कताई और धुनाई के बाद बनाया जाता है. इसके अंदर ऊन और बाहर सूती कपड़ा या रेशम का खोल होता है और यह सर्दियों के लिए बेहद उपयुक्त होती हैं.

आजकल फर की रजाइयों का खूब चलन है. इन रजाइयों की खरीद रेंज काफी बड़ी है. एक हजार रुपये से लेकर दस हजार रुपए तक में ये आ सकती हैं. उठाने में बेहद हल्की और गर्म इन रजाइयों के भीतर फर का प्रयोग किया जाता है. यह फर दो तरह के होते हैं – कृत्रिम फर जो नायलॉन, पॉलिएस्टर या ऐक्रेलिक से बने होते हैं और दूसरा प्राकृतिक फर जो खरगोश, ऊँट, बकरी (पश्मीना) या मिंक जैसे जानवरों के बालों से तैयार किया जाता है. यह बहुत गर्म होती हैं. प्राकृतिक फर की रजाइयाँ सर्द इलाकों जैसे हिमालय, कश्मीर, लद्दाख, शिमला आदि के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं. कृत्रिम फर की रजाइयाँ भी गर्म होती हैं लेकिन लंबे समय तक इनको इस्तेमाल करने से इनमें बदबू या घुटन सी महसूस होने लगती है. कृत्रिम फर की रजाइयां 1500 से 4000 रुपये तक में आसानी से मिल जाती हैं जबकि ऊन-मिश्रित फर की रजाई  4000 से 8000 रुपये तक आती है. पश्मीना या असली फर की रजाई की कीमत 10000 से 50000 रुपये तक हो सकती है. यह लग्जरी आइटम है. फर की रजाइयों को घर पर धोना ठीक नहीं है, इन्हें ड्राई क्लीनिंग कराना ही ठीक होता है. यदि बजट कम है तो पॉलिएस्टर-फर या माइक्रोफाइबर रजाइयाँ बेहतर विकल्प हैं. यह सस्ती और मशीन-वॉशेबल होती हैं. इन्हें छोटे से स्थान पर रखना भी आसान होता है.

आजकल जिस तरह एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है, लोगों के रहने के स्थान छोटे होते जा रहे हैं. फ़्लैट कल्चर बढ़ रहा है जिसमें एक, दो या तीन बैडरूम होते हैं. दीवार में अलमारियां बनी होती हैं. जिसमें आपको अपने कपड़े, जेवर और अन्य सामान रखने हैं. ऐसे में चादर, दरी, परदे, कम्बल, रजाइयां आदि चीजें अधिकतर बॉक्स-कम-पलंग या बॉक्स-कम-दीवान में ही रखने पड़ते हैं. अब घरों में इतनी जगह नहीं होती कि रजाई-गद्दे बड़े बड़े संदूकों में रख सकें. ऐसे में हल्की, पतली और गर्म रजाइयां लोगों की पहली पसंद बनती जा रही है जो जाड़ा ख़त्म होने के बाद फोल्ड करके आपकी अलमारी के ही निचले खाने में आसानी से समा जाती है. Modern Homes Essentials.

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