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Hindi Satire Story : चुनावी उत्सव – इस मौके का जमकर मजा उठा रहे हैं नेताजी

Hindi Satire Story : ‘वक्तेरुखसत तसल्लियां दे कर, और भी तुम ने बेकरार किया.’

यहां शायर उन नेताओं के मन का दर्द कह रहा है, जो चुनावों में पार्टी के प्रचार के लिए किसी दूसरे राज्य में गए थे. वहां मीडिया ने उन्हें रंगरलियां मनाते हुए ऐक्सपोज कर दिया. अब अपने राज्य में उन के खिलाफ विपक्ष वालों ने खूब प्रचार किया है कि इस तरह के रंगीनमिजाज विधायकों की सदस्यता खारिज की जाए. उन के सुप्रीमो ने अब उन्हें तसल्ली दी है कि यह गर्दगुबार जल्दी ही छंट जाएगा, क्योंकि होहल्ला करने वाले विपक्ष के नेताओं का मुंह हीरेजवाहिरात से भर दिया गया है.

ये नेता वहां खूब रंगरलियां मनाते रहे, खरीदारी भी कमाल की हुई. सारा इंतजाम बढि़या था. घूमाघूमी भी बहुत अच्छी रही. शराब भी विलायती थी और मुरगा भी ताजा व जायकेदार मिलता रहा. दोस्तों की रंगीन महफिलें भी खूब जमीं.

इन नेताओं के अपने राज्य की तरफ चलने से 2 दिन पहले अखबार वालों ने पता नहीं कैसे यह राज उजागर कर दिया कि कुछ विधायक चुनावी प्रचार के दौरान रंगरलियों में डूबे रहे.

शायर कहता है कि हे देशवासियो, चुनाव प्रचार तो अपनेआप में एक नैशनल फैस्टिवल है. चुनावी परचा भरने से कई दिन पहले ही भावी उम्मीदवार के घर हलवाई बैठा दिया जाता है. लजीज, लुभावने और तर व्यंजनों की मनभावन खुशबू चारों तरफ फैल जाती है. दूरदूर से बधाइयों व समर्थनप्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है.

असली भांगड़ा तो उस दिन होता है, जब उम्मीदवार को पार्टी का टिकट मिल जाता है. साकी इतनी जोर से जाम छलकाता है कि हर तरफ मय ही मय बरसती है और सारी फिजां पर मदहोशी का नशा छा जाता है. गाजेबाजे के साथ हमारा होनहार उम्मीदवार पूरी तरह सजधज कर अपना नामांकन परचा भरने जाता है.

सजी हुई सैकड़ों कारें, आदमकद बैनर, कारोंबसों पर चस्पां पोस्टर और लोकलुभावन नारे हवा में उछलते हैं. पूरे शहर का ट्रैफिक गड़बड़ा जाता है. पुलिस वाले खुद आगे बढ़ कर बैरिकेड लगाते हैं, ताकि बड़े लोगों की कारों के काफिले रुकने न पाएं.

आम आदमी को आनेजाने में कोई परेशानी न हो, इस बात की किसे चिंता है. पुलिस वाले तो बस पार्टी उम्मीदवार के गुस्से से ही डरते हैं. कल को अगर वह जीत गया, तो वही उन का माईबाप होगा.

ताकत दिखाने का यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहता है. परचा भरतेभरते आधा प्रचार तो यों ही हो जाता है.

चुनाव में विरोधी को मात देने के लिए एक और तरीका अपनाया जाता है. जगहजगह स्टेज शो कराए जाते हैं. फिल्मी सितारे, बड़े खिलाड़ी, गायक व कलाकार भीड़ जुटाने में एड़ीचोटी का जोर लगाते हैं. सब को वक्त पर पैसा जो मिल जाता है. कूल्हे मटकाती मौडलें स्टेज पर कैबरे दिखाती हैं. इस दौरान उम्मीदवार के घर के बाहर लंगर चलता रहता है.

आखिरी हफ्ते में तो यह चुनावी फैस्टिवल पूरे रंग में होता है. आसपास के राज्यों से दबदबे वाले नेता बुलाए जाते हैं. वोटरों के दुखते कानों में इतना चुनावी कचरा फेंका जाता है कि वे बेचारे भी सोचते हैं कि कब चुनाव का दिन आए और वे वोट फेंक कर शांति से सो सकें.

प्रशासन की नाक में भी दम रहता है. सरकारी मुलाजिमों की नींद हराम हो जाती है. उन की जान तब आफत में पड़ जाती है, जब वे रातदिन एक कर के वोटिंग मशीनों को संभालते हैं, चुनाव कराते हैं, पहरा देते हैं.

शायर सही कहता है, ‘… और भी तुम ने बेकरार किया,’ यानी सुप्रीमो ने चलतेचलते कहा था, ‘अगले 6 महीने बाद दूसरे राज्यों में भी चुनावी बिगुल बजने वाला है. तुम्हारी ऐसी धमाकेदार सेवा फिर की जाएगी. ये मीडिया वाले तो सिरफिरे हैं, जो चुनावी फर्ज व शानोशौकत को रंगरलियों जैसे घटिया नाम से पुकारते हैं. हम ने तुम्हारे राज्य के मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष को फोन कर दिया है. तुम आराम से जाओ, वहां तुम्हारा बाल बांका तक नहीं होगा.

‘हां, फिर तैयार रहना लल्ला. इस बार तुम्हें बंगाल के काले जादू व असम की ब्लैक ब्यूटी का स्वाद चखाएंगे.’

‘वक्तेरुखसत तसल्लियां दे कर…’ वाह, क्या रुतबा है चुनावी प्रचार से लौटने वाले जत्थे का. शायर की बेकरारी काबिलेगौर है. नेताओं को अपने सुप्रीमो पर पूरा भरोसा है कि ऐसे नायाब चुनावी फैस्टिवल कभी नहीं थमेंगे. इलैक्शन कमिश्नर लाख सयाना बने, मगर हमारे रहनुमा कोई न कोई चोर दरवाजा तलाश ही लेते हैं.

शायर कहता है कि धन्य हैं हमारे भविष्य निर्माता, जो चुनावों को एक रंगारंग फैस्टिवल की तरह मनाते हैं, लंगर चलाते हैं, कंबलसाडि़यां बांट कर गरीबगुरबों की लाज ढकते हैं, बाजेगाजे, ठुमके, दवादारू का कामयाब आयोजन करते हैं और देश की एकता की अनूठी मिसाल कायम करते हैं. आखिर में जीत उन्हीं की होती है, जो गरीब जनता की जितनी ज्यादा सेवा करते हैं. जनता एक बार फिर चुनावों का बेसब्री से इंतजार करने लगती है. Hindi Satire Story :

Mastiii 4 Movie Review : “मस्ती से ज्यादा छिछोरापन और फूहड़ता को तरजीह”

Mastiii 4 Movie Review : फिल्म ‘मस्ती-4’ मिलाप मिलन जावेरी की ‘मस्ती’ सीरीज की चौथी फिल्म है. दर्शक इस फिल्म की स्टारकास्ट देख कर ही अंदाजा लगा सकते हैं कि इस फिल्म के ऐक्टर्स कितने वाहियात और अश्लील हावभावों वाले हैं.

फिल्म का निर्माण बालाजी मोशन पिक्चर्स, मारुति इंटरनैशनल और श्री अधिकारी ब्रदर्स ने मिल कर किया है. बालाजी पिक्चर्स की एकता कपूर तो गंदे, द्विअर्थी डायलौग्स वाली फिल्में बनाने में सबसे आगे रहती है. इस फिल्म में बाकी 2 निर्माताओं के साथ मिल कर उस ने कचरा ही परोसा है. मस्ती के नाम पर गंदगी फैलाना ही उस का काम रह गया है. दर्शकों को फिल्म देखने जाने पर अफसोस होता है.

‘मस्ती’ सीरीज की पहली फिल्म 2004 में आई थी, जिसे दर्शकों ने पसंद किया था. उस के बाद इस सीरीज की 2 फिल्में और बनाई गईं. ‘ग्रैंड मस्ती’ और ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’, ‘मस्ती-4’ इसी फ्रैंचाइजी का चौथा हिस्सा है लेकिन यह मस्ती नहीं, कौमेडी के नाम पर मुसीबत है. कहने को तो यह एडल्ट कौमेडी है, मगर एकदम घटिया है. निर्देशक ने महिलाओं को बेवकूफ दिखाने में कसर नहीं छोड़ी है.

एडल्ट कहानी दिखाने के चक्कर में मेकर्स असली कहानी भूल गए हैं. कहानी 3 दोस्त मीत (विवेक ओबरॉय), अमर (रितेश देशमुख) और प्रेम (आफताब शिवदासानी) की है, जो अपनी अपनी पत्नियों से खुश नहीं हैं. तीनों की सैक्सलाइफ से मस्ती नदारद है, इसलिए वे मस्ती की तलाश बाहर करते हैं. उन का दोस्त कामराज (अरशद वारसी) उन से कहता है कि उस की बीवी उसे लव वीजा देती है जिस में वह किसी भी लड़की के साथ समय बिता सकता है. तीनों अपनी अपनी पत्नियों से लव वीजा मांगते हैं, जो उन्हें मिल जाता है.

जब वे वापस लौटते हैं तो उनकी पत्नियां लव वीजा मांगती हैं और वे छुट्टियों पर निकल जाती हैं. अब ये तीनों सैक्स की मस्ती तलाशने निकलते हैं लेकिन इस लव वीजा के चक्कर में उन्हें ऐसे ऐसे झटके लगते हैं कि ये सारी मस्ती भूल जाते हैं.

फिल्म की यह कहानी बहुत ही छिछोरी है. मस्ती के मुकाबले चार गुना फूहड़ और द्विअर्थी संवाद परोसने की कोशिश की गई है.

फिल्म का निर्देशन कमजोर है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. इस तरह की वाहियात फिल्मों से बच कर ही रहना चाहिए परंतु मेकर्स ने अंत में ‘मस्ती-5’ बनाने की घोषणा कर दी है. Mastiii 4 Movie Review :

Gustaakh Ishq Movie Review : “खतों वाली मोहब्बत की यादें ताजा कराती मूवी”

Gustaakh Ishq Movie Review : इश्क का फंडा सदियों से चला आ रहा है. आज भी लोग ‘लैला मजनूं’, ‘हीर रांझा’, ‘अनारकली’, ‘मधुमति’ आदि फिल्मों की चर्चा करते हैं. इश्क का जादू आज भी बरकरार है. 70-80 के दशक में इश्क के सब्जेक्ट पर ‘शोले’, ‘कभीकभी’, ‘सिलसिला’, ‘मैं ने प्यार किया’ जैसी फिल्में बनीं जो इश्क के सार को विभिन्न दृष्टिकोणों से दर्शाती है.

1960 में आई ‘मुगलेआजम’ को भला कौन भूला होगा. आज भी लोग शहजादा सलीम और अनारकली के इश्क की चर्चा करते हैं. इश्क शीर्षक वाली फिल्में ‘इश्क,’ ‘इश्क विश्क’ ने इश्क के सार को बेहतरीन तरीके से प्रेजेंट किया.

‘इश्क’ सब्जेक्ट पर बनी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ तो 25 साल से अधिक सिनेमाघरों में चली. अजय देवगन और काजोल को ले कर भी ‘इश्क’ शीर्षक से फिल्म बनी. लब्बोलुआब यह है कि इश्क सदियों से होता आया है और आगे भी होता रहेगा, भले ही उस के जाहिर करने में बदलाव होते रहें.

90 के दशक में इश्क पर बनने वाली फिल्मों जैसी एक और फिल्म ‘गुस्ताख इश्क’ रिलीज हुई है. यह फिल्म पुरानी दिल्ली की गलियों और पुराने जमाने के रोमांस पर आधारित है. इस फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइन मनीष मल्होत्रा ने बनाई है. इसे देखते वक्त आप पुरानी दिल्ली और पंजाब में खो जाएंगे. धीमी गति के इस इश्क में वह गरमाहट नहीं है. अगर आप धैर्यपूर्वक इसे देखेंगे तो तभी इस गुस्ताख इश्क का मजा ले पाएंगे.

कहानी 1998 में दरियागंज से शुरू होती है. नवाबुद्दीन रहमान उर्फ पप्पन (विजय वर्मा) अपनी मां (नताशा रस्तोगी) और छोटे भाई जुम्मन (रोहन वर्मा) के साथ बड़ी मुश्किल से जीवन यापन कर रहा है. वह कर्ज में डूबे अपने मरहूम पिता की आखिरी निशानी प्रिंटिंग प्रेस को बचाना चाहता है. एक सड़क छाप लेखक फारूख (लिलिपुट) से शायर अजीज (नसीरुद्दीन शाह) का नाम सुनकर पप्पन उन की किताब छापने के लिए हां कह देता है.

वह अजीज से मिलने पंजाब के मलेरकोटला जाता है. वहां उसकी मुलाकात अजीज की बेटी मन्नत उर्फ मिन्नी (फातिमा सना शेख) से होती है. वह पप्पन से कहती है कि अब्बा अब नहीं लिखते पर वह हार नहीं मानता. उसका दिल मन्नत पर आ जाता है. वह अजीज की शायरी की मारफत मन्नत को हासिल करना चाहता है. मगर अजीज चाहता है कि उस की सारी शायरियां उस के साथ कब्र में दफन हो जाएं.

पप्पन का शायर अजीज से करीबी रिश्ता बन जाता है. अजीज अब काफी बूढ़ा हो चला है. लोग उसे ‘बब्बा’ कहते हैं. पप्पन धीरे धीरे अजीज के परिवार से घुलने मिलने लगता है. तभी अचानक अजीज एक दिन दिल्ली से गायब हो जाता है. पप्पन को अजीज के बारे में पता चलता है जो उसके अब्बू के दोस्त हुआ करते थे. उसे उन की जिंदगी की सच्चाइयों के बारे में भी पता चलता है. वह आखिरी कोशिश की उम्मीद में ‘बब्बा’ के पास आता है.

उधर, मन्नत उलझन में रहने लगती है. अनजाने में उसकी शादी एक अमीर आदमी से हो जाती है जो प्यार से ज्यादा स्टेटस को अहमियत देता है. वह अपनी गुजर चुकी मां की डायरी को ठीक करने के लिए मदद के लिए अजीज के पास जाती है. उस डायरी में जिंदगीभर की यादें व कहानियां हैं. धीरे धीरे उन दोनों की बातचीत, कविता और करीबी में बदल जाती है. दोनों, जिन का साथ होना तय नहीं है फिर भी, एक दूसरे की इमोशनल दुनिया को नया आकार देते हैं.

‘गुस्ताख इश्क’ जैसी फिल्में आजकल बहुत कम बनती हैं, इसलिए इस में ताजगी है. हीरो हीरोइन का नज़रें झुकाना, हल्की बातचीत करना स्लो लव स्टोरी को दर्शाता है. फातिमा सना ने इमोशनल एक्सप्रेशन दिए हैं. निर्देशक ने कहानी को गलत तरीके से घुमाने की कोशिश नहीं की है. उसने 1990 के माहौल और किरदारों को स्थापित करने में ज्यादा समय लगाया है, इसीलिए मध्यांतर से पहले का हिस्सा काफी स्लो है.

सिनेमेटोग्राफर ने 90 के दशक को खूबसूरती से दिखाया है. क्लाइमैक्स खूबसूरत है. यह फिल्म दर्शकों को उस दौर की याद दिलाती है जब मोहब्बत खतों में लिखी जाती थी, फोटो अलबमों में दिखते थे. यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो पुराने दौर के रोमांस, शायरी और मखनाओं से भरी कहानियों को पसंद करते हैं. Gustaakh Ishq Movie Review :

India’s Growth Rate 2025 : हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ या सनातनी रेट ऑफ ग्रोथ ?

India’s Growth Rate 2025 : 8.2 विकास दर का यह मतलब नहीं है कि देश धड़ाधड़ तरक्की कर रहा है, सभी लोग खुश हैं, अधिकतर को रोजगार मिल गया है या पैसों की बरसात होने लगी है. जिस धीमी विकास दर को 50 साल पहले व्यंग्य के तौर पर हिंदू रेट ग्रोथ कहा गया था वह अब सनातनी रेट ग्रोथ होती जा रही है.

बात महत्त्वपूर्ण लेकिन बहुत छोटी व सूचनात्मक थी कि मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 फीसदी रही, पर सिर्फ इतने से बात पुराने जमाने की ब्लैक एंड व्हाइट डॉक्यूमेंट्री फिल्मों सरीखी लग कर रह जाती. सो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस में वह शानदार-जानदार तड़का लगाया कि जीडीपी तो बहुत दूर की बात है, अर्थशास्त्र की तरफ पीठ कर सोने वाले भी यह सुन कर चौकन्ने हो गए कि इस बात का भी हिंदू शब्द से कोई संबंध है और हो न हो तो यह बदमाशी अर्बन नक्सलियों, वामपंथियों, नास्तिकों और अभक्त बुद्धिजीवियों की है.

नरेंद्र मोदी एक बड़े आयोजन में बोल रहे थे जो उन आयोजनों में से एक था जिन में सत्तारूढ़ नेताओं को एक तथाकथित गैर राजनीतिक मंच और एलीट क्लास भीड़ मुहैया करा कर राजनीति करने की आजादी दी जाती है जिस में वे अपनी भड़ास निकालते हैं. दो-तीन पैराग्राफ में सस्पेंस पैदा करने के बाद उन्होंने कहा, ‘भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है लेकिन क्या आज कोई इसे हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ कहता है?’

हिंदू शब्द सुनते ही वहां मौजूद अधिकतर श्रोताओं के कान स्वत: ही खड़े हो गए कि यह हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ है क्या बला. इस उत्सुकता को दूर करते हुए नरेंद्र मोदी, आदत के मुताबिक, सीधे कांग्रेसी शासनकाल में दाखिल होते हुए बोले, हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ उस समय कहा गया जब भारत 2-3 प्रतिशत की ग्रोथ रेट के लिए तरस गया था. किसी देश की अर्थव्यवस्था को उस में रहने वाले लोगों की आस्था और पहचान से जोड़ना गुलामी की मानसिकता का प्रतिबिंब था.

एक पूरे समाज और पूरी परंपरा को गरीबी का पर्याय बना दिया गया. यह साबित करने का प्रयास किया गया कि भारत की धीमी विकास दर का कारण हमारी हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति है. आज जो बुद्धिजीवी हर बात में सांप्रदायिकता ढूंढ़ते हैं उन्हें हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ में यह नहीं दिखा.

कैसे हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति ही न केवल धीमी विकास दर बल्कि पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों की गुलामी की भी वजहें थीं और आज भी दरिद्रता की वजहें हैं, इसे समझने के लिए जरूरी है कि पहले थोड़ा उस दौर में झांका जाए जब भारत 2-3 फीसदी ग्रोथ रेट के लिए तरसता था लेकिन कम हैरत की बात नहीं कि इस के बाद भी आम लोगों के दिलो-दिमाग में कोई असंतुष्टि, डर या संदेह नहीं था, बल्कि मन में सरकार के प्रति एक भरोसा था.

कहने का मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस सरकार दूध की धुली थी बल्कि यह है कि जनता आज की तरह छाछ फूंक-फूंक कर नहीं पीती थी. इस जीडीपी पुराण का तो उत्तरकांड ही सारी हकीकत बयां कर देता है कि तब देश में इतना भी अनाज नहीं था कि 80 करोड़ तो क्या, 8 लोगों को भी मुफ्त बांटा जा सके.

आज अर्थव्यवस्था अगर बेहतर नजर आती है तो उस की भी वजहें हैं जिन्हें सिलसिलेवार देखें तो समझ आता है कि 8.2 फीसदी जीडीपी की नींव तो आजादी के बाद ही रखी जानी शुरू हो गई थी. अंगरेज जब गए थे, यानी 1950 तक जीडीपी आधे और एक फीसदी के बीच कहीं थी जिस के होने न होने के कोई माने नहीं थे.

लेकिन 1950 के बाद जो विकास दर देश की रही वह देखने-सुनने में भले ही 4 फीसदी आज कम लगे लेकिन आबादी के साथ-साथ एक रिकॉर्ड इस लिहाज से थी कि सालों की गुलामी के बाद देश अपने पाँवों पर खड़ा हुआ था और लड़खड़ा कर चलने के बजाय सधे कदमों से चला था क्योंकि यह उछाल 7 फीसदी के लगभग थी. अंगरेज देश में हुकूमत करने और लूटपाट करने आए थे, कोई माइक्रो या मैक्रो इकोनॉमिक्स गढ़ने नहीं आए थे. फिर कहां की बचत और कहां का निवेश, सब सपने सी बातें थीं.

इसलिए धीमी थी विकास दर

देश आर्थिक तौर पर पटरी पर आ ही रहा था कि 1965 का पूर्वोत्तर का अकाल एक अभिशाप साबित हुआ. इस पर भी नीम चढ़े करेले जैसे वाकए थे 1962, 65 और 71 के युद्ध जिन्होंने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी थी, प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करवा कर अपनी कूटनीति और नाम के परचम तो फहरा दिए थे लेकिन एवज में बांग्लादेश से आए कोई सवा करोड़ शरणार्थियों का भार भी भारत को उठाना पड़ा था जिन पर सरकार को 2,500 करोड़ रुपए खर्चने पड़े थे. आज यह राशि लगभग ढाई लाख करोड़ रुपए होती है. इस भारी-भरकम खर्च के चलते देश की विकास दर फिर लुढ़क कर 2 फीसदी के लगभग आ गई थी.

उसी वक्त दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर राजकृष्णा ने गिरती जीडीपी को नया नाम हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ दिया था. यह नामकरण बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं हुआ था. इस के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को याद रह गया तो इस की वजह थी कांग्रेस शासनकाल को कोसने की रस्म निभाना जिस की लत उन्हें इस कदर लग चुकी है कि ऐसा कोई हफ्ता नहीं जाता जब वे कांग्रेस के साथ-साथ नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के प्रति अपनी कुंठा और पूर्वाग्रह बतौर भड़ास निकालने के मौके न ढूंढते हों. उन की यह लत संसद में भी दिखती रहती है और चुनावी मीटिंगों में तो शिद्दत से नजर आती ही है.

सियासी तौर पर यह उन का हक माना जा सकता है लेकिन सियासी तौर पर ही यह उन की जिम्मेदारी भी बनती है कि वे यह भी गिनाए कि 1980 के दशक में अर्थव्यवस्था काफी सुधरी थी और 90 के दशक में तो इसने अपने सुनहरे दौर को छुआ था. नरसिम्हा राव सरकार की नई और प्रयोगवादी लेकिन जोखिम भरी उदार आर्थिक नीतियों ने जीडीपी में जो कर लगाए थे उन्हीं की बदौलत है कि देश चमक-दमक रहा है और वर्तमान प्रधानमंत्री बड़े गर्व से 8.2 गिना पा रहे हैं.

खुद के पांव चरण

ध्यान से देखें और समझें तो भारत की प्रगति के प्रतिबिंब की इबारत आजकल या पिछले 10-11 साल नहीं, बल्कि आजादी के बाद से ही लिखी जानी शुरू हो गई थी. हालात के हिसाब से उस में स्वाभाविक रूप से उतार-चढ़ाव आए.

मसलन, 1996-97 में भी विकास दर 8 के ऊपर तक पहुंच गई थी. बदलाव कोविड 19 के बाद भी आए थे और भूलने की बात नहीं कि जीडीपी तब अप्रैल से जून 2020 की पहली तिमाही में 24 फीसदी तक गिर गई थी लेकिन इस के लिए किसी ने मोदी सरकार को जरूरत से ज्यादा दोष नहीं दिया था क्योंकि भयावह आर्थिक हालात हर कोई देख रहा था.

उलट इस के, यह कम ही लोगों को याद है कि कभी युद्धों और अकालों के चलते जो खाद्यान्न संकट पैदा हुआ था उस के चलते देश के अधिकांश लोगों को अमेरिका से आया मवेशियों वाला लाल गेहूं दो दशकों तक खाने को मजबूर होना पड़ा था.

प्राकृतिक आपदाओं, अकाल और लड़ाई वगैरह से जीडीपी का गिरना नजरअंदाज करने के काबिल होता है लेकिन शासक की जिद और नादानियों से जो जीडीपी गिरती है उसे न तो भूला जा सकता और न ही नजरअंदाज किया जा सकता. बहुत ज्यादा नहीं है, महज 9 साल पहले की नोटबंदी मोदी सरकार का एक ऐसा ही फैसला था जिस के जख्म अभी तक हर किसी को सालते रहते हैं. नवंबर 2016 में नोटबंदी के पहले देश की जीडीपी 7.9 फीसदी थी जो 2 महीने में ही 6.1 पर आ गई थी. यानी, 1.8 फीसदी की गिरावट हुई थी.

इस के तुरंत बाद सरकार के एक और जीएसटी के तुगलकी फैसले ने तो रही-सही कमर भी तोड़ दी थी. ऐसा कोई सेक्टर नहीं बचा था जिस पर इन फैसलों ने बुरा असर न डाला हो.

हालांकि इसके बाद भी अतीत की तरह संभलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा था लेकिन 60-80 के दशक की जीडीपी को हिंदू ग्रोथ रेट कह देना वाकई में अति उत्साह की बात थी जिस से खुद कांग्रेसी भी सहमत नहीं थे. इंदिरा गांधी की धीमी आर्थिक नीतियों से राजकृष्णा असहमति जताते रहते थे कि आर्थिक टीम ही यह मानती थी कि हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ एक आकर्षक ही सही लेकिन निरर्थक और भ्रामक शब्द है.

इस टीम में प्रमुखता से बी के नेहरू, डी. टी. लक्षदास्वामी और पी एन धर वगैरह प्रमुख थे लेकिन कोई कांग्रेसी नेता इस की खुलेआम आलोचना नहीं कर पाया था. मुमकिन है कांग्रेस को यह तब इस शब्द की तरह ही गैरजरूरी लगा हो लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जरूरी लग रहा है तो इस में भगवा गैंग का एजेंडा भी छिपा है.

प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का सीधा सा मतलब होता है देश में एक साल के कुल उत्पादन और सभी सेवाओं की कीमत. इस से पता चलता है कि देश कितनी कमाई कर रहा है. इस से यह भी पता चलता है कि देश कितनी तरक्की कर रहा है, यानी उस की ग्रोथ रेट क्या है.

अगर उत्पादन की रफ्तार धीमी होती है तो विकास दर की गति भी कम होती है. जीडीपी नापने के खासतौर से 3 तरीके होते हैं- कुल वार्षिक उत्पादन, कुल सालाना कमाई और कुल सालाना खर्च. इन सब को जोड़ कर जीडीपी निकाली जाती है.

अगर किसी देश में पूरे साल में बने सामान की कीमत 100 रुपए और सेवाओं की कीमत 50 रुपए है तो उस देश की जीडीपी 150 रुपए हुई.

विकास दर का मतलब विकास नहीं

ग्रोथ रेट बढ़ने का मतलब होता है देश में उत्पादन बढ़ा, लोगों की आमदनी बढ़ी और नौकरियां या रोजगार भी बढ़े. बिलाशक अर्थशास्त्र एक जटिल विषय शाब्दिक और तकनीकी तौर पर है. मोदी की 8.2 विकास दर की खुशी का मतलब यह नहीं है कि देश के सभी लोग खुश हैं, हर हाथ को रोजगार मिला हुआ है या रुपयों की झमाझम बारिश हो रही है. बल्कि, अर्थशास्त्र के लिहाज से इस का मतलब इतना भर है कि पिछले साल के मुकाबले जीडीपी में बढ़ोतरी 8.2 फीसदी रही, इस का देश की खुशहाली, रोजगार और सामाजिक जिंदगी वगैरह से कोई लेना-देना नहीं है.

पिछले साल भी करोड़ों लोग नाखुश और बेरोजगार थे, इस साल भी हैं और अब तो इंतजार उस दिन का कर रहे हैं जब प्रधानमंत्री बजाय विकास दर गिनाने के रोजगार की दर गिनाते यह कहेंगे कि यह महज एक फीसदी बची है. कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों जिन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और वेल बीइंग रिसर्च द्वारा तैयार वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत की स्थिति लगभग ज्यों की त्यों है. इस साल, यानी, 2025 की रिपोर्ट में भारत को 147 देशों में 118 वां स्थान मिला है.

अब अगर यह जश्न मनाने की बात है तो इस जश्न और इस रैंकिंग पर तरस ही खाया जा सकता है. इसे तो हिंदू रेट ग्रोथ के बजाय विश्वगुरु होने के दावे के मद्देनजर सनातनी रेट ग्रोथ कहा जाना चाहिए क्योंकि देश में सिर्फ पंडे-पुजारी ही हैप्पी हैं, बाकी तो बस जैसे-तैसे गुजर कर पा रहे हैं या कमा-खा पा रहे हैं, कुछ भी कह लें, एक ही बात है.

बड़े गर्व से मोदी सरकार गाहे-बगाहे यह दावा किया करती है कि हम दुनिया की 5 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं लेकिन कोई यह नहीं बताता कि प्रति व्यक्ति आमदनी में देश बाकी 4 देशों के मुकाबले कहां खड़ा है. आंकड़े इन 4 राजा भोजों के मुकाबले भारत को गंगू तेली साबित करते हैं.

अमेरिका में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 2 करोड़ 83 लाख 68 हजार रुपए है. चीन में यह 43 लाख 56 हजार, जापान में 1 करोड़ 9 लाख, जरमनी में 1 करोड़ 88 लाख रुपए है जबकि भारत में महज 2 लाख 14 हजार रुपए है. पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होना हिंदू ग्रोथ रेट जैसा ही आकर्षक लेकिन निरर्थक और भ्रामक ही है क्योंकि नॉमिनल पर कैपिटा इनकम, जीडीपी में भारत की रैंकिंग 136 है.

बात बहुत सीधी है कि बड़ी अर्थव्यवस्था होने का मतलब यह नहीं है कि हम एक संपन्न अर्थव्यवस्था हैं, उलट इस के, हम एक दरिद्र अर्थव्यवस्था हैं जिसे आंकड़ों और भाषणों से ढकने की नाकाम कोशिश हमें और गरीब बनाती जा रही है. एक भारतीय औसतन सालाना 2 लाख 14 हजार रुपए कमाता है, यानी प्रतिदिन की आमदनी महज 586 रुपए है. हमारे सबसे नजदीक चीन है. एक चीनी एक दिन में 11,940 रुपए कमाता है. इस लिहाज से बड़ी आबादी की दलील दम तोड़ती नजर आती है.

विकास पर भारी धरम-करम

यह ठीक है कि आंकड़े बहुत ज्यादा विश्वसनीय और प्रामाणिक नहीं होते लेकिन एक मोटा अंदाजा इन से लगता है. अर्थशास्त्र के अलावा भारत की दयनीय अर्थव्यवस्था का सीधा संबंध यहां के लोगों की धार्मिकता से भी है जो देश के पिछड़ेपन की अहम वजह है. भारतीय जितना वक्त और पैसा धरम-करम में जाया करते हैं उस की मिसाल भी ढूंढ़े नहीं मिलती. एक आंकड़े के मुताबिक भारत की धार्मिक अर्थव्यवस्था लगभग 4 लाख करोड़ रुपए सालाना है. इस में दान-दक्षिणा, मंदिर-मूर्ति निर्माण, धार्मिक जलसे-भंडारे, प्रसाद, प्रवचन कीर्तन, तीर्थयात्राएं, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र और वास्तु वगैरह जैसे फिजूल मद शामिल हैं.

नैशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च सहित कई दूसरे आर्थिक व सामाजिक अध्ययन बताते हैं कि एक औसत भारतीय अपनी आमदनी का 10 फीसदी हिस्सा तक उक्त धार्मिक कार्यों में खर्च करता है. यह जान कर हैरानी ही होती है और चिंता भी की भारी-भरकम पैसे के साथ-साथ एक भारतीय साल में एक हजार घंटे भी इन धार्मिक कार्यों में जाया करता है जिस की कीमत का उसे भी अंदाजा नहीं. ये एक हजार घंटे 41 से भी ज्यादा कार्यदिवस के बराबर होते हैं.

दुनियाभर के नामी अर्थशास्त्री, जिन में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट बैरो, जर्मनी के मैक्स वेबर और भारत के अमर्त्य सेन सहित कौशिक बसु के नाम शामिल हैं, मानते हैं कि जिन देशों में धरम-करम पर ज्यादा पैसा और वक्त बर्बाद किया जाता है उन देशों की उत्पादकता और विकास दर कम होती है. भारत में मौजूदा मोदी-राज में इस की हकीकतें किसी से छिपी नहीं कि तबीयत से इन कृत्यों पर पैसा फूंका जा रहा है जिसका मकसद ब्राह्मणों की यानी सनातनी ग्रोथ रेट बढ़ाना है. हिंदू राष्ट्र का यही मूल है.

पाखंडों में उलझी जनता

यथा राजा तथा प्रजा की तर्ज पर देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर हफ्ते किसी न किसी धार्मिक समारोह में शिरकत करते नजर आते हैं. कभी कहीं किसी मंदिर पर ध्वजा फहरा रहे होते हैं तो कभी किसी चमत्कारी बाबा के खरबों के आश्रम और साम्राज्य के मुख्य अतिथि बने होते हैं. और तो और, अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भी वे मंदिरों में जरूर जाते हैं.

आम भारतीय की जिंदगी इस से यानी अपने लोकतांत्रिक राजा की जिंदगी से जुदा नहीं जो सुबह-शाम मंदिरों की आरती में घंटे-घड़ियाल के साथ आरती गा रहा होता है, घर में यज्ञ, हवन और भागवत कथा कर रहा होता है और इन जैसे दूसरे पाखंडों से भी मोक्ष-मुक्ति मिलने में शक हो तो तीर्थयात्रा पर निकल पड़ता है.

ब्रांडेड मंदिरों में उमड़ती बेतहाशा भीड़ किसी सबूत की मोहताज नहीं. हिंदू ग्रोथ रेट से इस का कनेक्शन यह है कि बहुसंख्यक हिंदू ही पिछड़ेपन के ज्यादा जिम्मेदार हैं. उन की तथाकथित आस्था देश को आर्थिक गर्त में धकेल रही है. इसीलिए राजकृष्णा ने विकास दर को मुस्लिम ग्रोथ रेट या ईसाई ग्रोथ रेट उपमा नहीं दी थी वरना तो अल्पसंख्यक भी धरम-करम और पाखंडों में बहुसंख्यकों से उन्नीस न ठहरते.

तो फिर, विकास दर 8.2 कैसे है जबकि देश निठल्लेपन की इंतहा के दौर में है. इस सवाल का जवाब बहुत बारीकी से ढूंढ़ें तो यह मिलता है कि इस विकास में उन करोड़ों मेहनतकशों का योगदान कहीं ज्यादा है जिनकी दैनिक आमदनी 526 रुपए से भी कम है. यह तबका सुबह भूखा उठता है और दिनभर मजदूरी करता रहता है. इन 80 करोड़ लोगों, जिन में 95 फीसदी दलितपिछड़े आदिवासी हैं, को सरकार जो 5 किलो अनाज हर महीने देती है वह उन को 142 करोड़ में बनाए रखने की कवायद है वरना तो इन लोगों की हैसियत वही है जो 100 साल पहले यूरोप और अमेरिका में गिरमिटिया मजदूरों की हुआ करती थी.

यह मुफ्त का अनाज ही विकास दर की पोल खोलता हुआ है कि यह शोबाजी है और जो 40 करोड़ इन से ऊपर हैं उन्हें पंडे-पुजारियों ने अपने मोक्ष-मुक्ति, पाप-पुण्य स्वर्ग-नरक वगैरह के जाल में फंसा रखा है. यह वर्ग जितना कमाता है उस का 15-20 फीसदी दान-दक्षिणा और पूजा-पाठ में आहूत कर देता है. डर उन्हें यह दिखाया जाता है कि तुम लोग भगवान की कृपा से इज्जत से खा-पी रहे हो और इस से नीचे नहीं जाना चाहते तो परलोक सुधारने के लिए हमारी ग्रोथ बढ़ाते रहो.

अगर पूरा देश चीनियों की तरह मेहनत कर रहा होता तो बिलाशक आज अमेरिका भी हमारे आगे पानी भर रहा होता लेकिन चीन से सबक लेने की बात इने-गिने उदारवादी बुद्धिजीवी ही करते हैं, एवज में उन्हें सुनना यह पड़ता है कि ये लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति अर्थात हिंदू धर्म को बदनाम कर रहे हैं. यही मोदी ने 6 नवंबर के कार्यक्रम में कहा.

चीन से सबक लेने वाली इकलौती बात यह नहीं है कि वह नास्तिक बाहुल्य देश है बल्कि उस से भी अहम यह है कि वहां के मेहनती लोग धरम-करम में औसतन 50 घंटे भी सालाना नहीं लगाते और न ही पैसा फूंकते, इसलिए उन की आमदनी हम से 20 गुना से भी ज्यादा है. भारत, चीन और पाकिस्तान लगभग एक-साथ आजाद हुए थे.

पाकिस्तान तो इस्लामिक कट्टरपंथ की बलि 60 के दशक में ही चढ़ गया था. भारत बचा रहा क्योंकि नेहरू सरकार ने बजाय मंदिरों के उद्योगों पर फोकस किया. इसलिए, देश तरक्की करता रहा भले ही वह धीमी रही हो लेकिन ठोस थी.

चीन और भारत की अर्थव्यवस्था

90 के दशक तक लगभग बराबर थी. इस के बाद भारत पिछड़ता गया क्योंकि मंदिर आंदोलन लोगों के दिलो-दिमाग में जुनून की हद तक जड़ें जमा चुका था. उसी दौर में जो हिंदू-मुस्लिम होना शुरू हुआ वह आज तक जारी है. लोग मेहनती कम, भाग्यवादी ज्यादा होते गए लेकिन निचले तबके के बलबूते पर तरक्की होती रही. अब नई चिंता यह है कि इन लोगों को भी धर्म की खाई में खींचने की साजिश बड़े पैमाने पर रची जा रही है. अगर वक्त रहते इस से न बचा गया तो फिर भगवान भी कहीं हो तो बचा नहीं पाएगा न देश को और न ही विकास दर को जो दिनों-दिन सनातनी होती जा रही है. India’s Growth Rate 2025 :

Silver Price Hike : चांदी के दाम छूते आसमान

Silver Price Hike : चांदी की तेजी ने निवेश बाजार में हलचल मचा दी है. उम्मीद है कि अगले साल के अंत तक इस की कीमत ढाई से 3 लाख रुपए प्रति किलो हो सकती है. वहीं, इस के निवेश में खतरे कम नहीं हैं.

कहावत है कि ‘गुड़ गुड़ ही रह गया, चेला शक्कर हो गया’. आजकल यह कहावत सोने और चांदी पर खरी उतर रही है. पहले बाजार में सोने और चांदी के बीच फासला ग्राम और किलो का रहता था, जैसे जितने मूल्य में 10 ग्राम सोना मिलता था उतने में एक किलोग्राम चांदी मिलती थी. आज चांदी का बाजार भाव इस अनुपात से बढ़ गया है.

22 दिसंबर, 2025 को एक किलोग्राम चांदी की कीमत 2,13,412 रुपए थी, जबकि 10 ग्राम सोने की कीमत 1,37,365 रुपए थी. सोने और चांदी की कीमतों के बीच जो अनुपात पहले था वह अब नहीं है. इस मामले में चांदी सोना से आगे निकल गई है. भारत में कारोबार में चांदी के सिक्के चलते थे जो देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा थे. इस का श्रेय ईस्ट इंडिया कंपनी को जाता है जिस ने भारत में चांदी के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया.

भारत में चांदी का प्रयोग कैसे बढ़ा?

भारत में चांदी के कारोबार में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अहम भूमिका निभाई थी. अंगरेज कारोबारी भारत से कॉटन, सिल्क के वस्त्र और मसाले का कारोबार करते थे. इस के लिए उन्हें चीन से चांदी लानी पड़ती थी. चीन केवल चांदी के बदले ही व्यापार करता था. अंगरेज ‘त्रिकोणीय व्यापार’ करते थे. वे भारत से कपड़े चीन को बेचते थे वहां से चांदी, अफीम और चाय को ले जा कर अमेरिका में बेचते थे. चीन से मिली चांदी भारत को दे कर कपड़े और मसाले लेते थे. ब्रिटेन भारत, चीन और अमेरिका में अपना सामान बेचता था.

16वीं सदी में भारत दुनिया के कुल उत्पादन का एक-चौथाई माल अपने देश में तैयार करता था. उस दौर में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था बेहद खराब थी. वहां की अर्थव्यवस्था खेतीबाड़ी पर निर्भर करती थी. दुनिया के कुल उत्पादन का केवल 3 फीसदी माल ही ब्रिटेन में तैयार होता था. भारत में मुगल बादशाह अकबर का शासन था. ब्रिटेन में महारानी एलिजाबेथ प्रथम की हुकूमत थी. यूरोप की प्रमुख शक्तियां पुर्तगाल और स्पेन व्यापार में ब्रिटेन से काफी आगे थीं. ब्रिटेन के कारोबारी राल्फ फिच को हिंद महासागर, मेसोपोटामिया, फारस की खाड़ी और दक्षिणपूर्व एशिया की व्यापारिक यात्राएं करते हुए भारत के बारे में पता चला.

ब्रिटेन के राल्फ फिच की जानकारी के आधार पर सर जेम्स लैंकस्टर सहित ब्रिटेन के 200 से अधिक कारोबारियों ने भारत के साथ कारोबार करने के लिए महारानी एलिजाबेथ प्रथम से इजाजत मांगी. 31 दिसंबर, 1600 को ईस्ट इंडिया कंपनी नाम से एक कंपनी बनाई गई. इस को भारत के साथ कारोबार करना था. अगस्त 1608 में कैप्टन विलियम हॉकिंस ने भारत के सूरत बंदरगाह पर अपने जहाज ‘हेक्टर’ का लंगर डाल कर ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आने का ऐलान किया. तब तक बादशाह अकबर की मृत्यु हो चुकी थी. उस दौर में संपत्ति के मामले में केवल चीन का मिंग राजवंश ही बादशाह अकबर की बराबरी कर सकता था.

कहा जाता है अकबर अपने पीछे 5,000 हाथी, 12,000 घोड़े, 1,000 चीते, 10 करोड़ रुपए, बड़ी अशर्फियों में 100 तोले से ले कर 500 तोले तक की हजार अशर्फियां, 272 मन कच्चा सोना, 370 मन चांदी, एक मन जवाहरात जिस की कीमत 3 करोड़ रुपए थी, छोड़ गया था. अकबर के पुत्र जहांगीर नया बादशाह बन चुका था. कैप्टन विलियम हॉकिंस ने एक साल के भीतर मुगल राजधानी आगरा पहुंच गया था. जहांगीर से वह कारोबार करने की संधि नहीं कर सका. 1615 में सर थॉमस रो जहांगीर से मिलने आगरा पहुंचे. 3 साल के लगातार प्रयास के बाद जहांगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

इस के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से सूत, नील, पोटैशियम नाइट्रेट और चाय मसाले खरीदती थी. कंपनी जो भी वस्तु खरीदती उस का मूल्य चांदी दे कर अदा करती थी. भारत के साथ ब्रिटेन चीन से भी कारोबार करने लगा था. ईस्ट इंडिया कंपनी चीन से रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन खरीदती थी. सामान का भुगतान चांदी में करना पड़ता था क्योंकि उन के पास कोई भी ऐसी वस्तु नहीं थी जिस की चीन को जरूरत हो. इस बीच ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में पोस्ते की खेती और बिहार में अफीम को तैयार करने का काम शुरू किया. इस अफीम को तस्करी के जरिए चीन पहुंचाया गया.

चीन में अफीम का बहुत कम उपयोग किया जाता था क्योंकि वहां का सम्राट इसे नियंत्रित रखता था. ईस्ट इंडिया कंपनी ने चीनी एजेंटों के माध्यम से लोगों के बीच अफीम को बढ़ावा दिया. इस के लिए उस ने अफीम बेचने का हक़ भी प्राप्त कर लिए. कंपनी ने अफीम के व्यापार से रेशम और चीनी के बर्तन भी खरीदे और मुनाफा भी कमाया. इस को ले कर चीन और ब्रिटेन के बीच लड़ाई शुरू हुई. ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से रेशम, सूती वस्त्र, इस्पात, पोटेशियम नाइट्रेट का निर्यात कर अच्छी कमाई करती थी.

18वीं शताब्दी तक ब्रिटेन के व्यापारी चांदी के सिक्के दे कर भारत से कपास और चावल भी खरीदने लगे थे. अहमदाबाद अपने रेशम और रेशम पर किए जाने वाले सोने-चांदी के काम के लिए दुनियाभर में मशहूर था. 18वीं सदी में इंगलैंड में इन कपड़ों की इतनी अधिक मांग थी कि सरकार को इन पर रोक लगाने के लिए भारी कर लगाना पड़ा.

भारत से कर वसूलने से कंपनी को जो चांदी मिलती थी, उस का इस्तेमाल वह चीन के साथ व्यापार के लिए करती थी, जिस से चीन से चाय का आयात संभव हो पाता था. टैक्स और बिजनेस के माध्यम से वह चांदी और धन एकत्र करने लगी. ब्रिटेन का निर्यात जो 1815 में 25 लाख पाउंड था वह 1822 में बढ़ कर 48 लाख पाउंड हो गया. ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में भारत का पहला एक रुपए का चांदी का सिक्का जारी किया था, जिसे 1917 तक ढाला जाता रहा. यह आम लेनदेन का हिस्सा था.

चांदी का प्रभाव

चांदी के सिक्कों के चलन में होने के कारण ही लोगों के बीच चांदी का प्रभाव था. 1917 में चांदी के सिक्कों का चलन भले ही बंद हो गया था पर इन की कीमत बनी हुई थी. चांदी का प्रयोग औरतों के पहने जाने वाले गहनों में भी होता था. समय के साथ-साथ चांदी की कीमतों में तेजी आने लगी. हाल के समय में चांदी की कीमतों में तेजी की वजह इस के औद्योगिक प्रयोग के बढ़ने के चलते है. सोलर पैनल, इलैक्ट्रिक व्हीकल, इलैक्ट्रौनिक्स और ग्रीन एनर्जी से जुड़े सैक्टरों में चांदी का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है. विश्व स्तर पर एनर्जी ट्रांजीशन और क्लीन एनर्जी पर जोर के कारण चांदी की खपत तेजी से बढ़ गई है.

बाजार में चांदी की मांग बढ़ने के कारण इस की खरीदारी और निवेश दोनों बढ़ गए हैं. चांदी का प्रयोग ज्वैलरी और इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स में होने के कारण लोग इस में निवेश करने लगे हैं. चांदी में तेजी का बाजार पर बड़ा असर हो रहा है. चांदी में निवेशकों को भारी मुनाफा हो रहा है. इस से साधारण उपभोक्ताओं के लिए चांदी महंगी हो गई है, जिस से आर्टिफिशियल ज्वैलरी की मांग बढ़ रही है. डौलर में उतारचढ़ाव का प्रभाव भी चांदी पर पड़ रहा है. अमेरिकी कंपनियों द्वारा चांदी का स्टौक जमा करने से भी कीमतें बढ़ रही हैं ताकि उत्पादन प्रभावित न हो.

चांदी ने सोने से भी बेहतर रिटर्न दिया है. इस से निवेशकों को भारी मुनाफा हुआ है. जानकारों के अनुसार, 2026 के अंत तक चांदी 2 लाख 40 हजार से 3 लाख रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकती है. इस की तेजी के बाद गिरावट का खतरा भी बना रहता है. सो, जोखिम को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है. चांदी में निवेश करने वालों को संभल कर काम करना चाहिए. कई बार जो बाजार जितनी तेजी से ऊपर जाता है वह उसी तरह से नीचे भी गिरता है. चांदी के मामले में सुरक्षा है क्योंकि देर-सबेर चांदी में नुकसान नहीं है.

चांदी का बढ़ता औद्योगिक इस्तेमाल और इस की खनन का धीमा होना भी कारण है कि चांदी के दाम बढ़ते जा रहे हैं. सोलर पैनलों और आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चिप्स के सर्किट में बेहद पतले तारों को जोड़ने का यानी वैंड करने का काम चांदी से ही किया जाता है क्योंकि इस में से करेंट बहुत ही तेजी से जाता है. चीन के पास पिछले 10-20 सालों में निर्यात कर के जो पैसा जमा हुआ है वह उसे अब विदेशों में डॉलर कोडों या यूरोपीए मुद्राओं में न रखकर कीमती मेटल के रूप में रखना चाह रहा है.

चीन किसी भी दाम में चांदी को उपयोगों के लिए और सोने को सुरक्षा के लिए रख रहा है. चीनी सरकार ही नहीं, चीनी कंपनियों ने चांदी खरीदनी और स्टॉक करना शुरू कर दिया है. भारत ने अंग्रेजों के समय व्यापार के दौरान जो सोना-चांदी कमाया था वह अब हाथ से निकलने वाला है. यहां गोल्ड लोन के बाद सिल्वर लोन शुरू हो जाएगा क्योंकि चांदी के दाम के 3 लाख रुपए हो जाने का अनुमान है. लोग अपने कर्ज उतारने के लिए घर की औरतों की चांदी अवश्य छीन कर बेचेंगे. इस तरह, बढ़ते दाम कुछ के लिए सुरक्षा हैं तो कुछ के लिए आफत भी.
चांदी की बढ़ती कीमतें कारोबारियों के लिए खतरा एक तरफ चांदी की कीमतें बढ़ने से बाजार में रौनक है तो दूसरी तरफ चांदी का कारोबार करने वाले कारोबारी परेशान हैं.

औल इंडिया स्वर्णकार समाज एंव ज्वैलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मुकुल वर्मा और संरक्षक लोकेश अग्रवाल ने कहा कि ‘व्यापरियों का पुलिस उत्पीड़न हो रहा है. यह बंद होना चाहिए.’ जानकारी के अनुसार, चांदी के दाम बढ़ने से चांदी कारोबारी अपराधी और पुलिस दोनों के निशाने पर आ गए हैं. पुलिस चांदी काराबारियों के खिलाफ धारा 317 चोरी की संपत्ति और धारा 318-319 जैसे धोखाधड़ी की धाराओं का उपयोग कर उन को परेशान कर रही है. दूसरी तरफ, अपराधी और धोखाधड़ी करने वाले अपराधी चांदी की लूट करने का प्रयास कर रहे हैं. ऐेसे में पुलिस को ध्यान देना चाहिए ताकि चांदी कारोबारी खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें. Silver Price Hike :

Durlabh Prasad Ki Dusri Shaadi Movie Review : “रोमांटिक कॉमेडी फिल्म”

Durlabh Prasad Ki Dusri Shaadi Movie Review : यह एक रोमांटिक कौमेडी फिल्म है. इस में एक अधेड़ युवक की दूसरी शादी एक खूबसूरत युवती से कराते दिखाया गया है. चूंकि यह जोड़ी बेमेल है इसलिए दिलचस्पी जगाए रखती है. यह बेमेल जोड़ी है कौमेडियन संजय मिश्रा और 1997 में आई रोमांटिक ड्रामा फिल्म ‘परदेस’ से डैब्यू करने वाली खूबसूरत युवती महिमा चौधरी की. वह ‘मिस दार्जिलिंग’ भी रह चुकी है. ‘दाग’, ‘धडक़न’, ‘दिल क्या करे’ और ‘दोबारा’ जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुकी इस अभिनेत्री को फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया.

संजय मिश्रा तो कौमेडी का हरफनमौला है. जिस फिल्म में भी वह अभिनय करता है, कौमेडी से उस में जान डाल देता है. महिमा चौधरी ने काफी अरसे बाद परदे पर कमबैक किया है. उस ने ‘दुर्लम प्रसाद की दूसरी शादी’ में एक विधुर से शादी करने की भूमिका निभाई है. यह एक पारिवारिक फिल्म है, जिस में कोई शोरशराबा नहीं है, भारीभरकम ड्रामा नहीं है, मगर आम लोगों की जिंदगी की छोटीछोटी उलझनों को दिखाया गया है, जिसे देखते हुए दर्शक आसपास के किरदारों को, पड़ोसियों को, रिश्तेदारों को पहचान सकते हैं. फिल्म बिना भाषण दिए समाज के बनाए नियमों पर सवाल उठाने की बाट करती है, रिश्तों को नए नजरिए से देखने की बात करती है.

निर्देशक ने महिलाओं को उन के बाहरी रहनसहन के आधार पर जज किए जाने वाले मुद्दों को छुआ है. अगर कोई महिला अकेली रहती है तो इस का मतलब यह नहीं कि उस का चरित्र खराब है. अगर वह अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जीती है तो समाज को उस पर ताने मारने का हक नहीं मिल जाता. इस मुद्दे को निर्देशक ने प्रभावशाली ढंग से उठाया है.

बनारस की पृष्ठभूमि में बुनी गई कहानी मुरली प्रसाद (व्योम यादव) के इर्दगिर्द घूमती है. मुरली प्रसाद सैलून चलाने वाले अपने विधुर मित्र दुर्लभ (संजय मिश्रा) और अविवाहित मामा (श्रीकांत वर्मा) के साथ रहता है. वह महक (पलक लालवानी) से प्यार करता है. मगर महक के परिवार वाले बेटी की शादी ऐसे घर में करने से इनकार कर देते हैं जहां कोई महिला न हो. अब मुरली अपने पिता की शादी कराने का फैसला करता है मगर उसे अपने पिता का व समाज का विरोध सहन करना पड़ता है.

दुलहन की खोज में वह ज्योतिषियों की शरण में जाता है. कभी देसी टिंडर जैसे प्लेटफौर्म पर जाता है, कभी परचे छपवाता है तो कभी वरवधू मेले में जाता है. इस प्रयास में उस का सामना एक दबंग महिला से भी होता है. ये हलकेफुलके पल हास्य की रचना तो करते हैं मगर रोमांचक नहीं बन पाते.

इसी दौरान दुर्लभ की मुलाकात अपनी पूर्व प्रेमिका बबीता (महिमा चौधरी) से होती है. बरसों पहले दुर्लभ के पिता के विरोध के कारण दोनों की शादी नहीं हुई थी. बबीता के आते ही दुर्लभ की दूसरी शादी का प्लान बनाया जाता है ताकि मुरली की शादी का रास्ता साफ हो सके. हालांकि उन दोनों की शादी की राह उतनी आसान भी नहीं. फिर भी किसी तरह उन की शादी की रुकावटें दूर होती हैं और दोनों एकदूसरे के हो जाते हैं. मुरली की शादी का रास्ता भी साफ हो जाता है.

यह फिल्म सिर्फ शादी की बात नहीं करती, यह अकेलेपन, उम्र, समाज और दूसरी जिंदगी की कहानी है. नायक की जिंदगी में खालीपन है, उम्र निकल चुकी है, आंखों में निराशा है, मुसकान में दर्द है, बिना बोले सब बयां कर देता है. फिल्म दूसरी शादी को मजाक नहीं बनाती, न कोई तमाशा दिखाती है. फिल्म बताती है कि असफलता के बाद क्या इंसान को दोबारा खुश होने का हक नहीं?

पटकथा स्लो है लेकिन बोर नहीं करती. हर सीन किसी न किसी सच्चाई से जुड़ा है. गाने कम हैं मगर बैकग्राउंड म्यूजिक सपोर्ट करता है. संजय मिश्रा और महिमा चौधरी के अभिनय की तारीफ हुई है. फिल्म पुनर्विवाह के लिए सकरात्मक संदेश देती है.

फिल्म का पहला भाग थोड़ा सुस्त है. कहानी मुख्य मुद्दे पर पहुंचने में समय लगाती है. बनारसी माहौल में कुछ दिलचस्प किरदार पिरोए गए जो मनोरंजक दृश्य रचते हैं. क्लाइमैक्स को और दमदार बनाया जा सकता था. सिनेमेटोग्राफी एक बार फिर बनारस की खूबसूरती को दिखाती है. नए कलाकारों में व्योम यादव प्रभावशाली है. पलक लालवानी का किरदार भी अच्छा है. यह एक साफसुथरी पारिवारिक फिल्म है. इसे परिवार के साथ देखा जा सकता है. Durlabh Prasad Ki Dusri Shaadi Movie Review :

Saali Mohabbat Movie Review : “फिल्म में लॉजिक ढूंढना बड़ी बेवकूफी”

Saali Mohabbat Movie Review : बौलीवुड की लगभग हर फिल्म में प्यार, लव, रोमांस, मोहब्बत, धोखा होता ही है. बिना मोहब्बत के बौलीवुड चल ही नहीं सकता. मोहब्बत पर कुछ यादगार फिल्में बनी हैं जिन में ‘वीरजादा’, ‘जब वी मेट’, ‘ए दिल है मुश्किल’, ‘कल हो न हो’, ‘जब तक है जान’ और ‘आशिकी.’

यह साली मोहब्बत चीज ही ऐसी है कि जब आप किसी से प्यार करते हैं तो किसी भी हद को आसानी से पार कर लेते हैं. मगर जब आप का यह प्यार आप को धोखा दे तो इसे नफरत में बदलते देर नहीं लगती. वर्ष 2010 में बनी फिल्म ‘लव, सैक्स और धोखा’ भी इसी तरह की फिल्म थी. इस फिल्म में लव की परिणति पहले तो सैक्स में होती है, फिर धोखे में फिल्म में. लव, सैक्स और धोखा पर 3 अलगअलग कहानियां थीं. इस फिल्म को एक महिला कलाकार, जो कई फिल्मों में परदे पर नजर आ चुकी है, टिस्का चोपड़ा ने बनाया है. इस से पहले उस ने शौर्ट फिल्म ‘रुबरू’ बनाई थी.

फिल्म की शुरुआत में ही दर्शकों से एक सवाल पूछा जाता है कि क्या महिलाओं की सुंदरता ही उन की सब से बड़ी खूबी होती है. इसी सवाल से फिल्म की कहानी आगे सेट की गई कि एक आम सी साधारण लड़की को सिर्फ सुंदरता के बल पर न आंका जाए. ‘साली मोहब्बत’ भी एक साधारण लड़की की कहानी है. फिल्म को क्राइम और थ्रिलर पसंद करने वालों को ध्यान में रख कर बनाया गया है. मगर इस फिल्म में लौजिक ढूंढ़ना बेवकूफी होगी.

इतिहास गवाह है कि अति सुंदर महिलाओं ने राजाओं को आपस में लड़वाया, उन्हें ले कर बड़ेबड़े युद्ध हुए. सुंदर औरत की वजह से अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को इस्तीफा देना पड़ा. आजकल रूस, यूक्रेन युद्ध में खूबसूरत लड़कियों को जासूसी के काम में लगाया जा रहा है. इस साली मोहब्बत के पीछे दुनिया पागल है.

फिल्म की कहानी एक घरेलू टाइप की महिला स्मिता (राधिका आप्टे) की है, जो अपने पति व बच्चों के साथ रहती है. वह अपने पुश्तैनी घर में रहती है क्योंकि पिता का देहांत हो चुका है. शरत सक्सेना उस का पड़ोसी है और हितैषी है. स्मिता का पति पकंज तिवारी (अंशुमन पुष्कर) घरजमाई बन कर रह रहा है. उस की नजर स्मिता के पिता के घर पर है. उस ने गजेंदर भैयाजी (अनुराग कश्यप) से काफी कर्जा ले रखा है, जिसे वह स्मिता का घर बेच कर चुकाना चाहता है.

एक दिन स्मिता की ममेरी बहन शालू (सौर सेनी मैत्रा) वहां नौकरी करने आती है और शालू के साथ रहने लगती है. शालू अपने जीजा से सैक्स संबंध बना लेती है. स्मिता को शालू और अपने पति की असलियत पता चल जाती है. वह खामोशी से सब सहती रहती है. अचानक एक दिन स्मिता के पति और शालू का एकसाथ मर्डर हो जाता है. मामले की जांच इंस्पैक्टर रतन पंडित, जिस से शालू की नजदीकियां थीं, (दिवेंदु शर्मा) करता है. अब स्मिता की जान को भी खतरा है.

रतन की जांच से सच की एक ऐसी कड़ी सामने आती है जो न सिर्फ कहानी को नया मोड़ देती है बल्कि उन सभी बातों को भी चुनौती देती है जिन पर यकीन किया था. प्यार, नफरत, लालच और धोखे को ले कर गढ़ी गई कहानी में पात्रों के बीच पूर्वानुमान होता है, मगर यही कहानी अलग मोड़ लेती है.

फिल्म की घिसीपिटी कहानी को नए तरीके से पेश किया गया है. निर्देशिका ने शादीशुदा महिला के संघर्ष को सरल तरीके से दिखाया है. कई जगह कहानी प्रिडिक्टिबल लगती है और कहींकहीं तो बोरिंग भी लगती है. म्यूजिक फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी है. राधिका आप्टे की ऐक्टिंग बढ़िया है. अनुराग कश्यप को छोड़ कर बाकी सभी कलाकारों की मेहनत साफ दिखती है. फिल्म में कोई शोरशराबा नहीं है. सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है.

मोहब्बत की चाह रखने वाले युवाओं को यह फिल्म पसंद आ सकती है या फिर प्यार में धोखा खाए युवकयुवतियां इसे देख सकते हैं. Saali Mohabbat Movie Review 

Raat Akeli Hai Movie Review : द बंसल मर्डर्स – “समाज की घिनौनी पॉलिटिक्स से उठता नकाब”

Raat Akeli Hai Movie Review : यह एक मर्डर मिस्ट्री है और 2020 में आई ‘रात अकेली है’ की सीक्वल है. पिछली फिल्म में एक छोटे शहर के पुलिसकर्मी की कहानी को दिखाया गया था जिसे परिवार के एक बुजुर्ग सदस्य की मौत की जांच के लिए बुलाया गया था.

पिछली फिल्म में पुलिसकर्मी की भूमिका निभाने वाला पुलिस इंस्पेक्टर जटिल यादव (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) एक प्रभावशाली परिवार में हुए मर्डरों की गुत्थी सुलझाते नजर आया था. इस फिल्म में वह जघन्य मर्डर केस ‘द बंसल मर्डर्स’ की न सिर्फ गुत्थी सुलझाता है, समाज की घिनौनी पौलिटिक्स से नकाब उठाता भी है.

कहानी उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर के एक प्रतिष्ठित बंसल परिवार से शुरू होती है. एक ही रात में परिवार के 6 सदस्यों की रहस्यमय मौत हो जाती है. यह परिवार बड़ी बेटी मीरा (चित्रांगदा सिंह) के बेटे की बरसी के लिए फार्महाउस में इकट्ठा हुआ है. मामला हाई प्रोफाइल है. पुलिस प्रशासन सतर्क है. इंस्पैक्टर जटिल यादव (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) मामले की जांच करता है. जैसेजैसे परतें खुलती हैं, कहानी अंधविश्वास, काले जादू और आध्यात्मिक प्रभावों की ओर बढ़ती है. गुरु मां और उन्हें मानने वाले लोगों का नाम सामने आते ही मामला और उलझ जाता है. अवैध निर्माण व गरीबों के नाम पर होने वाली राजनीति भी जांच का हिस्सा बनती है.

फिल्म में यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या जनता का काम और दबाव केस की दिशा बदल सकता है. इस तरह की सामूहिक हत्याओं/आत्महत्याओं के पीछे धार्मिक अंधविश्वास और कोई न कोई गुरु मां या गुरु महात्मा होता है जो परिवार के मुखिया को बहलाफुसला कर अपने वश में कर लेता है और उसे भगवान से मिलवाने का वादा कर उस के पूरे परिवार को खत्म कर देने का खेल धर्म के नाम पर रचता है. 2018 में दिल्ली के बुराड़ी गांव में एक ही परिवार के 11 लोगों की आत्महत्या से यही पता चला था कि पूरा परिवार घोर अंधविश्वासी था और भगवान से मिलने के लिए ही उन्होंने आत्महत्याएं की थीं. इस के पीछे भी एक तथाकथित गुरुजी का हाथ था जिस ने परिवार के मुखिया को धर्मकर्म में उलझा कर पूरे परिवार को आत्महत्या करने पर मजबूर किया.

यह फिल्म कुछकुछ इसी तरह की बातों से प्रेरित है. फिल्मकार समाज में घटी घटनाओं को आधार बना कर ही तो अपनी फिल्में बनाते हैं. खैर, इंस्पैक्टर जटिल यादव जैसेजैसे अपनी जांच आगे बढ़ाता है, शक की सूई नशेड़ी बेटे, चालाक रिश्तेदार, रहस्यमयी गुरु मां, परिवार की बची हुई महिला नीरा बंसल (चित्रांगदा सिंह) पर घूमती है. पुलिस प्रशासन केस को जल्दी निबटाना चाहता है लेकिन इंस्पैक्टर यादव को मामले में कुछ गहरा नजर आने लगता है. जैसेजैसे जांच आगे बढ़ती है, अमीरीगरीबी की खाई, सत्ता का दुरुपयोग और दबा हुआ सच सामने आने लगता है. खूनी कौन है, इसे क्लाइमैक्स तक रहस्य बनाए रखा गया है और दर्शक दम साधे क्लाइमैक्स का इंतजार करते रहते हैं.

फिल्म की यह कहानी टर्न और ट्विस्ट्स से भरी पड़ी है. कहानी धीरेधीरे आगे बढ़ती है. धीरेधीरे बढऩे वाली कहानी उन दर्शकों को भाएगी जिन्हें पुलिस की जांच और इंटैंस क्राइम पसंद है. फिल्म असल जिंदगी पर आधारित नहीं है, मगर सीधेतौर पर 2018 के बुराड़ी मौतों का जिक्र करती है. हालांकि कुछ रेफरैंस ऐसे हैं जो फिल्म के असली होने का आभास देते हैं मगर कहानी काल्पनिक ही है.

रात का सन्नाटा माहौल को गमगीन और रहस्यमयी बनाने का काम करता है. इन्वैस्टिगेशन के दौरान कुछ सीन लंबे है. गुरु मां के किरदार को और गहराई दी जाती तो अच्छा था. जटिल यादव की भूमिका में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक बार फिर बढ़िया एक्टिंग की है. राधिका आप्टे छोटी सी भूमिका में असर छोड़ती है. चित्रांगदा सिंह का अभिनय भी अच्छा है. फोरैंसिक अफसर की भूमिका में रेवती ने शानदार परफौर्मेंस दी है. बैकग्राउंड म्यूजिक सस्पैंस को मजबूत करता है संपादन कसा हुआ है. फिल्म का माहौल डार्क और सस्पैंस से भरपूर है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Raat Akeli Hai Movie Review :

Remembering Macaulay : “ऊंची जाति वालों के मसीहा थे मैकाले”

Remembering Macaulay : 1835 में थौमस मैकाले के मिनट औन एजुकेशन के लागू होने के बाद ही 19वीं में भारत में वैचारिक क्रांति की शुरुआत हुई. सती उन्मूलन, विधवा विवाह, बाल विवाह पर रोक और कई सामाजिक सुधार करने वाले नेता मैकाले की शिक्षा से ही उभरे और समाज में बड़े परिवर्तन कर पाए.

मैकाले की नीति ने ही 19वीं में भारत की शिक्षा व्यवस्था को आकार देना शुरू किया जिस में सरकारी स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटीज में अंग्रेजी भाषा, पश्चिमी विज्ञान, कानून और साहित्य पर जोर दिया गया. जिस से पहली और दूसरी पीढ़ी के वे तमाम लोग निकल कर सामने आए जिन्हें आज हम 19वीं और 20वीं सदी के महान लोगों में गिनते हैं. आज आरएसएस और बीजेपी जिन बड़े नेताओं को अपने आदर्श के रूप में रखती है उन में से ज्यादातर मैकाले की शिक्षा की पैदाइश ही हैं.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कालेज से अंग्रेजी में औनर्स किया और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से एमए और कानून की डिग्री ली थी.

एम.एस. गोलवलकर ने नागपुर के हिसलौप कालेज से स्नातक और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एमएससी तथा कानून की पढ़ाई की थी. बीएचयू के नाम में भले ही हिंदू शब्द जुड़ा था, लेकिन उस का पाठ्यक्रम मैकाले की शिक्षा पर ही आधारित था.

के.बी. हेडगेवार ने कलकत्ता के नेशनल मेडिकल कालेज से मेडिसिन में डिग्री ली. यह कालेज भी मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा था.

लाला लाजपत राय ने रेवाड़ी के गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल और लाहौर के गवर्नमेंट कालेज से पढ़ाई की, जो सीधे ब्रिटिश सरकारी शिक्षा प्रणाली के तहत थे जिसे मैकाले ने बनाया था.

अरविंदो घोष ने इंग्लैंड में सैंट पौल स्कूल और कैमब्रिज के किंग्स कालेज से पढ़ाई की, जो पूरी तरह ब्रिटिश शिक्षा थी.

बाल गंगाधर तिलक ने पूना के डेक्कन कालेज से गणित और संस्कृत में स्नातक किया हालांकि तिलक की शुरुआती शिक्षा घर पर हुई, लेकिन कालेज स्तर पर उन्होंने मैकाले की शिक्षा को ही ग्रहण किया.

विनायक दामोदर सावरकर ने पूना के फर्ग्यूसन कालेज से स्नातक किया और लंदन में कानून की पढ़ाई की. फर्ग्यूसन कालेज डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी का था, लेकिन पाठ्यक्रम ब्रिटिश था.

बंकिम चंद्र चटर्जी ने हुगली कालेजिएट स्कूल और प्रेसिडेंसी कालेज से पढ़ाई की जो मैकाले की नीति पर चलने वाली संस्थाएं थीं. वे कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पहले स्नातकों में से एक थे.

गोपाल कृष्ण गोखले ने बौम्बे के एलफिंस्टन कालेज से स्नातक किया और लंदन में कानून की पढ़ाई की. यह ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली का हिस्सा था.

ये सभी नेता ब्रिटिश काल में शिक्षित हुए. इन तमाम लोगों की पढ़ाई उस मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के कारण हुई जो अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी ज्ञान पर आधारित थी. मैकाले की शिक्षा से निकले इन में से कई नेताओं ने बाद में मैकाले के एजुकेशन सिस्टम की आलोचना की.

सवाल यह है की मैकाले के एजुकेशन सिस्टम के लागू होने से पहले भारत का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग क्या कर रहा था? अगर मैकाले से पहले भारतीय शिक्षा व्यवस्था इतनी ही उन्नत थी तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था से निकले लोग नजर क्यों नहीं आते? तमाम भारतीय इतिहासकार, वैज्ञानिक, समाज सुधारक और नेता मैकाले की शिक्षा लागू होने के बाद ही क्यों पैदा हुए? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था लागू होने के बाद इस देश में छः सौ से ज्यादा रियासतें थीं सभी रियासतों ने अपनी औलादों को मैकाले की दी हुई ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में ही क्यों शिक्षित किया? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षित होने वाली पहली पीढ़ी भारत की ऊंची जाती के लोग थे.
अगर मैकाले की शिक्षा व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तब ऊंची जाति के लोगों ने इस का बहिष्कार क्यों नहीं किया?

शकील “प्रेम” : मैकाले के लिए खास

थौमस मैकाले की शिक्षा नीति के बारे में तमाम तरह के भ्रम पैदा किए जाते हैं जबकि ऐतिहासिक नजरिए से समझे तो मैकाले ने शिक्षा व्यवस्था में क्रांति ला कर भारत के लोगों को सभ्य और शिक्षित बनाया. मैकाले शिक्षा नीति के तहत ब्रिटिश काऊंसिल ने एक लाख रूपए का शुरुआती बजट तय किया था जिसे कैसे खर्च करना है इस के बारे में मैकाले कहते हैँ “एक लाख रुपए पूरी तरह से गवर्नर-जनरल इन काउंसिल के अधिकार में होने चाहिए, ताकि भारत में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन का उपयोग जिस भी तरीके से उचित समझा जाए, किया जा सके.
गवर्नर-जनरल को यह पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अरबी और संस्कृत के अध्ययन को प्रोत्साहित करना वैसे ही बंद कर दे जैसे गवर्नर जनरल को मैसूर में बाघ मारने के इनाम को कम करने या कैथेड्रल में होने वाले भजनकीर्तन पर सरकारी खर्च रोकने का अधिकार है.”

अब सवाल यह है की मैकाले को अरबी और संस्कृत से समस्या क्या थी? इस का जवाब भी मैकाले ने शिक्षा समिति के सामने रखा था. मैकाले कहते हैँ “सभी लोग इस बात पर सहमत हैं कि भारत के आम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं में न तो साहित्यिक और न ही वैज्ञानिक ज्ञान उपलब्ध है. ये भाषाएं इतनी गरीब और असभ्य हैं कि जब तक इन्हें किसी दूसरी भाषा से समृद्ध नहीं किया जाता, तब तक इन में किसी मूल्यवान पुस्तक का अनुवाद करना आसान नहीं होगा. जिन लोगों के पास उच्च शिक्षा प्राप्त करने के साधन हैं उन की बौद्धिक उन्नति किसी ऐसी भाषा के माध्यम से ही हो सकती है जो उन की मातृभाषा न हो.

इस के बाद वह प्रश्न उठाता है कि वह भाषा कौनसी होनी चाहिए?

मैकाले कहते हैँ “समिति का एक हिस्सा अंग्रेजी भाषा का समर्थन करता है, जबकि दूसरा हिस्सा अरबी और संस्कृत के पक्ष में हैं असली प्रश्न यह है कि कौनसी भाषा जानना सब से अधिक उपयोगी है. संस्कृत में लिखी गई सभी पुस्तकों से प्राप्त ऐतिहासिक ज्ञान, इंग्लैंड के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली साधारण पुस्तकों से भी कम मूल्यवान है. भौतिक और नैतिक दर्शन के हर क्षेत्र में भारत की भाषाओं की अपेक्षा अंग्रेजी ज्यादा समृद्ध है.

तर्क के दृष्टिकोण से देखें तो मैकाले ने कड़वा सच कहा था. मदरसे या गुरुकुल में प्राथमिक शिक्षा के नाम पर जो कुछ पढ़ाया जाता था उसे एजुकेशन नहीं कहा जा सकता था. आज भी मदरसों और गुरुकुलों की शिक्षा पदवती में कोई ज्यादा बदलाव नहीं है. यह शिक्षण संस्थाएं बाद में हैं पहले यह धार्मिक संस्थाएं होती हैं जिन का उद्देश्य महज मुल्लाओं और पोंगापंडितों को तैयार करना होता है.

सवाल यह है की अगर मैकाले अंग्रेजी की वकालत नहीं कर के पर्शियन की वकालत करता तो क्या आज नरेंद्र मोदी खुश होते. 1835 में हिंदी कहां लिखी जा रही थी, यह भाजपा बताएगी क्या? संस्कृत में कौनकौन से ग्रंथ 1835 के आसपास लिखे गए और छपे और करोड़ों ने पढ़े? मैकाले की शिक्षा नीति लागू होने से पहले इतिहास, भूगोल, भौतिकी, एस्ट्रोनौमी, मेडिसिन और तकनीक पर भारतीय भाषाओं में कितना काम हुआ?

क्या भाजपा के बुद्धिजीवी नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए उन संस्कृत ग्रंथों का नाम लेंगे जो 6 से 12 साल तक के बच्चों को 1835 में पढ़ाए जा सकते थे. उस समय तक तो बाल रामायणें और बाल महाभारतें संस्कृत में नहीं लिखी गईं थीं. मैकाले संस्कृत और फारसी की बात कर रहा था, उस भाषा की नहीं जो अलग-अलग जगह बोली जा रही थी लिखी नहीं. Remembering Macaulay :

Bihar Politics 2025 : अब की बार पावरलेस नीतीश कुमार

Bihar Politics 2025 : नीतीश कुमार बिहार में 10वीं बार मुख्यमंत्री तो बन गए हैं मगर वे पहले जैसे मजबूत नहीं दिखाई देते. इस बार बिहार की डोर भाजपा के हाथ में दिखाई पड़ती है जिस की पूरी कोशिश धीरे-धीरे जेडीयू को रिप्लेस कर देने की है. इस के शुरुआती संकेत दिखाई भी देने लगे हैं.

बिहार में चुनाव हो गए और नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री बन गए. इस बार नीतीश कुमार बदले-बदले नजर आ रहे हैं. बिहार के 2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में खास बात यह थी कि भाजपा के विधायकों की संख्या जदयू के विधायकों से अधिक थी. इस के बाद भी भाजपा ने नीतीश कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री कबूल कर लिया. 2025 के चुनाव नतीजों से पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का पद नहीं देगी. भाजपा के नेता और गृहमंत्री अमित शाह ने कहा भी था कि ‘मुख्यमंत्री का नाम चुनाव नतीजों के बाद तय कर लिया जाएगा.’ अमित शाह के बयान का यह मतलब था कि नीतीश कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के लिए भाजपा तैयार नहीं है.

बिहार में नीतीश कुमार का क्रेज था. नीतीश कुमार का नाम चल रहा था. ऐसे में भाजपा ने ‘सीएम फेस’ के मुद्दे पर अपने पैर वापस खींचे. विपक्ष लगातार इस मुद्दे को हवा दे रहा था कि भाजपा नीतीश कुमार को साइड कर रही है. नीतीश कुमार का साथ भाजपा के लिए जरूरी और मजबूरी दोनों है. केंद्र सरकार को चलाने में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू का सहयोग जरूरी है. ऐसे में बिहार में भाजपा को अपनी ज्यादा सीटों के बाद भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाना मजबूरी था, क्योंकि केंद्र के लिए नीतीश कुमार जरूरी हैं.

इस ऊहापोह के बीच भाजपा का एक सपना फंसा हुआ है. वह पूरे भारत को जीत कर चक्रवर्ती सम्राट बनना चाहती है. बिहार को जीत तो लिया पर राज तो नीतीश का ही चल रहा है. यह भाजपा को सहन नहीं हो रहा है. इस के लिए उस ने बीच का रास्ता यह निकाला कि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठ तो जाएं पर वे पावरलेस रहें. वे केवल रबर स्टैंप हों. इस योजना के तहत बिहार में भाजपा ने शतरंज की गोटियां बिछा दी हैं.

बिहार में मुख्यमंत्री का पद भले ही नीतीश कुमार के पास हो पर उन के साथ 2 उपमुख्यमंत्री बना दिए गए हैं. इन में पहले सम्राट चौधरी हैं और दूसरे उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा हैं. सम्राट चौधरी को गृह विभाग मिलने से उन की पावर अधिक हो गई है. सम्राट चौधरी को नीतीश कुमार के विकल्प के रूप में तैयार किया जा रहा है.

26 सदस्यों की टीम में नीतीश कुमार के अलावा 9 नए चेहरे हैं. इन में भाजपा के 14, जदयू के 8, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 2, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के एकएक सदस्य शामिल हैं. नीतीश कुमार की इस कैबिनेट में एक मुस्लिम मंत्री और 3 महिलाएं मंत्री हैं. पिछली नीतीश सरकार के मंत्री रहे एक दर्जन से अधिक नेताओं को इस बार मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली. इन में भाजपा के 15 और जदयू के 6 सदस्य हैं. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के बेटे नीतीश मिश्रा भी इनमें शामिल हैं.

नीतीश कैबिनेट में जातीय समीकरणों का पूरा ध्यान रखा गया है. सब से अधिक 8 मंत्री सामान्य वर्ग से हैं, 6-6 पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों से और 5 अनुसूचित जाति से मंत्री हैं. भाजपा की ओर से पूर्व उपमुख्यमंत्री रेणु देवी के साथ नीरज कुमार सिंह, नीतीश मिश्रा, जनक राम, हरि सहनी, केदार प्रसाद गुप्ता, संजय सरावगी, जीवेश कुमार, राजू कुमार सिंह, मोतीलाल प्रसाद, कृष्ण कुमार मंटू, संतोष सिंह और कृष्ण नंदन पासवान के नाम शामिल हैं. इस मंत्रिमंडल में सबसे खास बात यह है कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएम से उनके बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाया गया है. वे न तो विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य. उन को 6 माह के भीतर किसी भी सदन का सदस्य चुना जाना होगा.

गृह विभाग क्यों होता है खास?

नीतीश कुमार की हालत महाभारत के धृतराष्ट्र वाली है. वहां सिंहासन पर भले ही धृतराष्ट्र बैठे रहे हों पर राज-काज दुर्योधन के अनुसार चलता रहा. नीतीश कुमार जब से बिहार के मुख्यमंत्री हैं, गृह विभाग उनके ही पास रहा है. अब वे 10वीं बार मुख्यमंत्री बने तो गृह विभाग और उपमुख्यमंत्री पद भाजपा नेता सम्राट चौधरी को देना पड़ा. किसी भी देश और प्रदेश में गृह विभाग सबसे अहम होता है. केंद्र की मोदी सरकार में 2014 में गृह विभाग राजनाथ सिंह के पास था. 2019 में जब अमित शाह को मोदी मंत्रिमंडल में जगह दी गई तो उन को गृह विभाग देने के लिए राजनाथ सिंह को रक्षा विभाग की तरफ खिसका दिया गया. इस की वजह यह थी कि अमित शाह पीएम नरेंद्र मोदी के बेहद खास माने जाते हैं.

प्रदेशों में ज्यादातर ताकतवर मुख्यमंत्री गृह विभाग अपने पास रखते हैं. उत्तर प्रदेश में गृह विभाग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास है जिस के बल पर उन का ‘बुलडोजर’ चलता है. गृह विभाग के अंदर ही पुलिस आती है जिस से सरकार का रसूख चलता है. बिहार सरकार के गृह विभाग में प्रशासन के रखरखाव के साथ-साथ अग्निशमन, कारागार प्रशासन, कानून एवं व्यवस्था, अपराध की रोकथाम एवं नियंत्रण, अपराधियों के अभियोजन के काम आते हैं.

20 साल में जब भी नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री थे तब इस विभाग के कामकाज की फाइल सीधे नीतीश कुमार के पास आती थी, क्योंकि वे गृह विभाग के भी मंत्री थे. अब गृह विभाग की फाइल सम्राट चौधरी के पास जाएगी. जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर इस में कोई हस्तक्षेप करना चाहेंगे तभी फाइल उन के पास जा सकती है. यह हालत आपसी विवाद को जन्म देगी क्योंकि कोई भी मंत्री यह नहीं चाहता कि कोई दूसरा उस के कामकाज में हस्तक्षेप करे. सम्राट चौधरी भाजपा के नेता हैं.

गृह विभाग सम्राट चौधरी के पास होने का मतलब यह है कि बिहार में कानून व्यवस्था की कमान अब भाजपा के पास है. सम्राट चौधरी के बयान भी इसी दिशा में हैं कि अपराधी या तो जेल में रहें या फिर बिहार के बाहर चले जाएं. यह भी हो सकता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बुलडोजर अब सम्राट चौधरी के काम आने लगे. भाजपा उन को नीतीश कुमार के विकल्प के तौर पर उभरने का मौका दे रही है. ऐसे में नीतीश कुमार का हस्तक्षेप भाजपा को भी रास नहीं आएगा.

विवादों में सम्राट चौधरी

भाजपा में यह खासियत है कि वह दूसरे दलों के नेताओं न केवल अपने दल में मिला लेती है बल्कि उन को अहम जिम्मेदारी भी देती है. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से आए ब्रजेश पाठक को उपमुख्यमंत्री बनाया, उसी प्रकार राजद, जदयू से निकले सम्राट चौधरी को बिहार का उपमुख्यमंत्री बना दिया. अब उन को बिहार में भाजपा प्रमुख चेहरा बना रही है जिस से 2030 के विधानसभा चुनाव में वह अपने नेता के साथ चुनाव में जा सके. तभी भाजपा का विजयरथ आगे बढ़ सकेगा.

सम्राट चौधरी की खास बात यह है कि वे अभी 57 साल के हैं. उन के पास 10-15 साल का कैरियर बाकी है. इस के अलावा वे कोइरी (कुशवाहा) समुदाय से आते हैं. बिहार की राजनीति में भाजपा सवर्ण, एससी और अतिपिछड़ी जातियों को जोड़ कर चलती है. सम्राट चौधरी बिहार की राजनीति में लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) गठजोड़ को मजबूत करने वाले प्रमुख ओबीसी चेहरे के रूप जाने जाते हैं. यह भाजपा को मजबूत आधार देने का काम करेगा.

सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर, 1968 को मुंगेर जिले के लखनपुर गांव में हुआ था. उन का परिवार दशकों से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहा है. उन के पिता शकुनी चौधरी 7 बार विधायक और सांसद रह चुके हैं, जबकि मां पार्वती देवी 1995 में तारापुर से विधायक थीं. सम्राट चौधरी की पत्नी ममता कुमारी पेशे से अधिवक्ता हैं और उन के 2 बच्चे हैं.

सम्राट चौधरी ने 1990 में राष्ट्रीय जनता दल से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. 1999 में वे राबड़ी देवी सरकार में कृषि मंत्री बने. उस समय उनकी उम्र 25 साल से कम थी. इस बात को ले कर विवाद उठा तो उन को मंत्री पद से हटा दिया गया था. 2000 और 2010 में सम्राट चौधरी परबत्ता सीट से विधायक चुने गए. 2010 में विपक्ष के मुख्य सचेतक बने. 2014 में वे जनता दल यूनाइटेड में शामिल हुए और जीतन राम मांझी सरकार में शहरी विकास एवं आवास मंत्री भी रहे.

2017-18 में सम्राट चौधरी ने भाजपा का दामन थामा और तेजी से संगठन में आगे बढ़े. पहले वे बिहार भाजपा के उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष बने. 2020 में वे विधान परिषद सदस्य चुने गए. 2021-22 में उन को पंचायती राज मंत्री बनाया गया. जब नीतीश और भाजपा गठबंधन टूटा तो अगस्त 2022 से अगस्त 2023 तक वे बिहार विधान परिषद में विपक्ष के नेता बने थे.

मार्च 2023 से जुलाई 2024 तक उन्होंने बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पार्टी को नेतृत्व दिया. इसी दौरान उन्होंने पगड़ी पहनने की कसम खाई थी कि जब तक भाजपा सत्ता में नहीं लौटेगी, तब तक नहीं उतारेंगे. लोकसभा चुनाव से पहले जब नीतीश वापस भाजपा के साथ आए तो जनवरी 2024 में उन को भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद उपमुख्यमंत्री बनाया गया. 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पैतृक सीट तरापुर से चुनाव जीता.

सम्राट चौधरी विवादों से घिरे रहे हैं. 25 साल से कम उम्र में मंत्री बनने के विवाद के चलते उन को हटाना पड़ा था. उन की शिक्षा को ले कर भी विवाद है. सम्राट चौधरी ने अपनी शिक्षा गृहनगर में पूरी की थी. उच्च शिक्षा के तौर पर मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (डिलीट) की डिग्री का उल्लेख किया है. 2010 के चुनावी हलफनामे में सम्राट चौधरी ने खुद को 7वीं कक्षा तक पढ़ा बताया था. 2025 में प्रशांत किशोर ने उनकी डिग्री की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया था. इस तरह से उन की शिक्षा विवादों में रही है.

चुनाव में अनुचित प्रभाव (धारा 171 एफ), सरकारी आदेश की अवज्ञा (धारा 188), चोट पहुंचाने और दंगा से संबंधित आरोप भी सम्राट चौधरी पर दर्ज हैं. 2023 में उन का बयान विवादों में रहा कि भारत 1947 में नहीं, बल्कि 1977 में जेपी की संपूर्ण क्रांति से आजाद हुआ था. अब वे बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं लेकिन उन को सुपर सीएम माना जा रहा है. भाजपा उन को बिहार में सीएम फेस के रूप में उभारना चाहती है. भाजपा को इस बात का दर्द है कि बिहार में उस का अपना मुख्यमंत्री कभी नहीं रहा है. उसे नीतीश कुमार के पीछे चलना पड़ रहा है. आने वाले 5 सालों में नीतीश कुमार कमजोर होंगे. उन के साथ भाजपा वही करेगी जो अपने सहयोगी दलों के साथ करती है. शिवसेना, एनसीपी और अकाली दल जैसी कई पार्टियां इस का दंश  झेल रही हैं.

सहयोगियों को खत्म कर ही बढ़ेगा भाजपा का विजय रथ

भाजपा के मूल में लोकतंत्र की भावना नहीं है. भाजपा पौराणिक राज को वापस लाना चाहती है जिस में राजा कोई भी हो पर राज ब्राह्मणों का चलता रहा है. भाजपा अलग-अलग जातियों को कुर्सी पर बैठा सकती है पर सिंहासन पर आदेश आरएसएस का ही चलना चाहिए. यह व्यवस्था बनाने के लिए उसे सहयोगी दलों को खत्म करना पड़ेगा. नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू भले ही केंद्र में भाजपा के सहयोगी हों पर भाजपा उन को भी मौका मिलते ही खत्म करने में देर नहीं लगाएगी.

बिहार से पहले महाराष्ट्र इस का सबसे बड़ा उदाहरण है. भाजपा ने सबसे पहले शिवसेना को तोड़ा. इस के लिए उस ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बना दिया था. जब भाजपा का बहुमत आया तो एकनाथ शिंदे को वापस उपमुख्यमंत्री बना कर भाजपा ने अपने नेता देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बना दिया. एनसीपी में शरद पवार के भतीजे अजित पवार को भाजपा ने तोड़ कर अलग कर दिया. अब एकनाथ शिंदे और अजीत पवार दोनों ही भाजपा के पिछलग्गू बन कर रह गए हैं.

बिहार में जदयू ही नहीं, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का भी वही हाल है. चिराग पासवान में अपने बलबूते कुछ करने की ताकत नहीं है. ऐसे में उन की पार्टी भाजपा की पिछलग्गू ही बनी रहेगी. जिस लोक जनशक्ति पार्टी को एससी और ओबीसी की बेहतरी के लिए काम करना था उस के नेता चिराग पासवान नरेंद्र मोदी के हनुमान बन कर ही खुश हैं. बिहार के नेता जीतन राम मांझी जैसे नेता भी नाराज होने के बाद भी भाजपा के पीछे चलने को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश में लोक दल, अपना दल (अनुप्रिया पटेल), ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद भाजपा के सहयोगी हैं. पिछड़ी जाति के आरक्षण को ले कर अनुप्रिया पटेल उत्तर प्रदेश की योगी सरकार से नाराज हैं. लोकदल के नेता जयंत चौधरी केंद्र में मंत्री रह कर ही खुश हैं. वे भाजपा से अलग होने की सोच नहीं सकते. उन को लगता है कि भाजपा विरोध में उन का दल टूट जाएगा. ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद योगी सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने की हालत में नहीं हैं. बहुजन समाज पार्टी जब से भाजपा के दबाव में आई है उस का जनाधार खत्म होता जा रहा है.

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल भारतीय जनता पार्टी का सहयोगी दल था. अटल बिहारी वाजपेयी से ले कर नरेंद्र मोदी सरकार तक केंद्र सरकार में अकाली दल के नेताओं को मंत्री पद मिला हुआ था. कृषि कानूनों के विरोध में जब किसान आंदोलन हुआ तब से अकाली दल और भाजपा के बीच दूरियां बढ़नी शुरू हुईं.

भाजपा जब भी ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात करती है तो सहज भाव से सिख को अपना खालिस्तान याद आने लगता है. अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल हिंदू और सिखों के बीच एक कड़ी का काम करते थे जो दोनों को जोड़े हुए थे. शिरोमणि अकाली दल के कमजोर होने का प्रभाव पंजाब की राजनीति पर पड़ रहा है. भाजपा ने अकाली दल को खत्म कर दिया है.

नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू के साथ भी भाजपा ने इसी तरह से खेल किया है. दक्षिण भारत में एआईएडीएमके जयललिता के समय से भाजपा के साथ थी. नरेंद्र मोदी के दौर में भाजपा की बदलती विस्तारवादी नीति से परेशान हो कर वह भाजपा से दूर हो गई. इस तरह से भाजपा अपने सहयोगी दलों से तभी तक मतलब रखती है जब तक उसे काम होता है. जैसे काम निकल जाता है तो फिर भाजपा उन को पहचानती नहीं है. भाजपा अपने हिंदू राष्ट्र की पताका पूरे देश में फहराना चाहती है. इस के लिए जरूरी है कि उस की विचारधारा से सहमत न रहने वाले दलों को खत्म कर दिया जाए.

बिहार के बाद अगले साल 2026 में पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु की विधानसभाओं के चुनाव होने हैं जहां भाजपा अपना आधार बढ़ाना चाहती है. पश्चिम बंगाल में भाजपा टीएमसी के साथ टकरा रही है. वामपंथी दल और कांग्रेस वहां खत्म हो गए हैं. भाजपा वहां टीएमसी और ममता बनर्जी को सत्ता से उतारना चाहती है, जिस से भाजपा के पौराणिक राज का विस्तार हो सके.

इस की एक  झलक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अयोध्या में दिए गए भाषण में मिलती है. राम मंदिर में ध्वजारोहण करते पीएम मोदी के कहने का अर्थ यह था कि धर्म ध्वजा रामराज का प्रतीक है. यहां निषाद राज, शबरी, अहल्या, महर्षि अगस्त्य, तुलसीदास, जटायु और गिलहरी की मूर्तियां भी हैं. इस के बाद राम मंदिर है.

रामराज में जिस तरह से अलग-अलग समुदाय के लोग थे पर राजा केवल महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र के कहे अनुसार चलता था, उसी तरह से देश में अलग-अलग विचारधारा के लोग हो सकते हैं लेकिन उन को चलना भाजपा और संघ के अनुसार होगा. वे राज सत्ता चलाने के लिए नहीं हैं. वे केवल वानर सेना का हिस्सा भर हो सकते हैं. विजय पताका केवल भाजपा की ही फैल सकती है. उस के साथी केवल पीछे चल सकते हैं. इस के लिए सहयोगी दलों को समझना होगा. एनडीए में किसी दल की हैसियत नहीं है कि वह भाजपा से अलग सोच सके. पौराणिक ग्रंथों के चक्रवर्ती साम्राज्य की पटकथा में भाजपा विजयश्री की माला खुद ही पहनना चाहती है. Bihar Politics 2025 :

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