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Satire Story In Hindi : ‘स’ से सावधान रहें महिलाएं

Hindi Family Story : वसंत आ गया – सौरभ ने पति का फर्ज कैसे निभाया ?

Hindi Family Story : बड़े अरमानों से रंजू ने अपने भैया सौरभ के लिए संगीता का चुनाव किया था. शादी के बाद संगीता की बीमारी की खबर से सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. लेकिन सौरभ ने पति का पूरा फर्ज निभाते हुए संगीता के जीवन को नई दिशा दे डाली.

ट्रिन ट्रिन… फोन की घंटी बजती जा रही थी मगर इस से बेखबर आलोक टीवी पर विश्व कप फुटबॉल मैच संबंधी समाचार सुनने में व्यस्त थे. तब मैं बच्चों का नाश्ता पैक करती हुई उन पर झुंझला पड़ी, ‘‘अरे बाबा, जरा फोन से अटेंड कीजिए, मैं फ्री नहीं हूं. ये समाचार तो दिन में न जाने कितनी बार दोहराए जाएंगे.’’

आलोक चौंकते हुए उठे और अपनी स्टाइल में फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो…आलोक एट दिस एंड.’’

स्कूल जाते नेहा और अतुल को छोड़ने मैं बाहर की ओर चल पड़ी. दोनों को रिक्शे में बिठा कर लौटी तो देखा, आलोक किसी से बात करने में जुटे थे. मुझे देखते ही बोले, ‘‘रंजू, तुम्हारा फोन है. कोई मिस्टर अनुराग हैं जो सिर्फ तुम से बात करने को बेताब हैं,’’ कह कर उन्होंने रिसीवर मुझे थमा दिया और खुद अपने छूटते समाचारों की ओर दौड़ पड़े.

मुझे कुछ याद ही नहीं आ रहा था कि कौन अनुराग है जिसे मैं जानती हूं, पर बात तो करनी ही थी सो बोल पड़ी, ‘‘हैलो, मैं रंजू बोल रही हूं…क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन साहब बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं अनुराग, पहचाना मुझे? जरा दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा. इतनी जल्दी भुला दिया मुझे?’’ फोन करने वाला जब अपना परिचय न दे कर मजाक करने लगा और पहेलियां बुझाने लगा तो मुझे बहुत गुस्सा आया कि पता नहीं कौन है जो इस तरह की बातें कर रहा है, पर आवाज कुछ जानी-पहचानी सी लग रही थी. इसलिए अपनी वाणी पर अंकुश लगाती हुई मैं बोली, ‘‘माफ कीजिएगा, अब भी मैं आप को पहचान नहीं पाई.’’
‘‘मेरी प्यारी बहना, अपने सौरभ भाई की आवाज भी तुम पहचान नहीं पाओगी, ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं था.’’

‘‘सौरभ भाई, आप…वाह…, तो मुझे उल्लू बनाने के लिए अपना नाम अनुराग बता रहे थे,’’ खुशी से मैं इतनी जोर से चीखी कि आलोक घबरा कर मेरे पास दौड़े चले आए.

‘‘क्या हुआ? इतनी जोर से क्यों चीखीं? कहीं छिपकली दिख गई क्या?’’

मैं इनकार में सिर हिलाती हुई हंस पड़ी, क्योंकि छिपकली देख कर भी मैं डर के मारे हमेशा चीख पड़ती हूं. फिर रिसीवर में माउथपीस पर हाथ रख कर बोली, ‘‘जरा रुकिए, अभी आ कर बताती हूं,’’ तो आलोक लौट गए.

‘‘हां, अब बताइए भाई, इतने दिनों बाद बहन की याद आई? कब आए आप सिंगापुर से? बाकी लोग कैसे हैं?’’ मैं ने सवालों की झड़ी लगा दी.
‘‘फिलहाल किसी के बारे में मुझे कोई खबर नहीं है, क्योंकि सब से ज्यादा मुझे सिर्फ तुम्हारी याद आई, इसलिए भारत आने के बाद सबसे पहले मैंने तुम्हें फोन किया. तुम से मिलने मैं कल ही तुम्हारे घर आ रहा हूं. पूरे 2 दिन तुम्हें बोर होना पड़ेगा. इसलिए कमर कस कर तैयार हो जाओ. बाकी बातें अब तुम्हारे घर पर ही होंगी, बाय,’’ इतना कह कर भाई ने फोन काट दिया.

सौरभ भाई कल सच में हमारे घर आने वाले हैं, सोच कर मैं खुशी से झूम उठी. 10 साल हो गए थे उन्हें देखे. आखिरी बार उन्हें अपनी शादी के वक्त देखा था.

अपने माता-पिता की मैं अकेली संतान थी, पर दोनों चचेरे भाई सौरभ और सौभिक मुझ पर इतना प्यार लुटाते थे कि मुझे कभी एहसास ही न हुआ कि मेरा अपना कोई सगा भाई या बहन नहीं है. काका-काकी की तो मैं वैसे भी लाड़ली थी. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि हम भुवनेश्वर में रहते थे और काका का परिवार पुरी में. हमारा लगभग हर सप्ताह ही एक-दूसरे से मिलना-जुलना हो जाता था. इसलिए 60-65 किलोमीटर की दूरी हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती थी. मेरी सौभिक भाई से उतनी नहीं पटती थी, जितनी सौरभ भाई से. मेरे प्यारे और चहेते भैया तो सौरभ भाई ही थे. उनके अलावा समुद्र का आकर्षण ही था जो प्रत्येक सप्ताह मुझे पुरी खींच लाता था.

उन दिनों मैं दर्शनशास्त्र में एम.ए. कर रही थी इसलिए सौरभ भाई की जीवनदर्शन की गहरी बातें मुझे अच्छी लगती थीं. एक दिन वह कहने लगे, ‘रंजू, अपने भाई की एक बात गांठ बांध लो, गलती स्वीकार करने में ही समझदारी होती है. जीवन कोई कोर्ट नहीं है जहां कभी-कभी गलत बात को भी तर्क द्वारा सही साबित कर दिया जाता है.’

मैं उनका मुंह ताकती रह गई तो वह आगे बोले, ‘तुम शायद ठीक से मेरी बात समझ नहीं पाईं. ठीक है, इस बात को मैं तुम्हें फिल्मी भाषा में समझाता हूं. थोड़ी देर पहले तुम ‘आनंद’ फिल्म का जिक्र कर रही थीं. मैं ने भी देख रखी है यह फिल्म. इस के एक सीन में जब अमिताभ रमेश देव से पूछता है कि तुम ने क्यों उस धनी सेठ को कोई बीमारी न होते हुए भी झूठमूठ की महंगी गोलियां दे कर एक मोटी रकम झटक ली. तो इस पर रमेश देव कहता है कि अगर ऐसे धनी लोगों को बेवकूफ बना कर मैं पैसे नहीं लूंगा तो गरीब लोगों का मुफ्त इलाज कैसे करूंगा?

‘एक नजर में रमेश देव का यह तर्क सही भी लगता है, परंतु सच्चाई की कसौटी पर परखा जाए तो क्या वह गलत नहीं था? अगर किसी गरीब की वह मदद करना चाहता था तो अपनी ओर से जितनी हो सके करनी चाहिए थी. इस के लिए किसी अमीर को लूटना न तो न्यायसंगत है और न ही तर्कसंगत, इसलिए ज्ञानी पुरुष गलत बात को सही साबित करने के लिए तर्क नहीं दिया करते बल्कि उस भूल को सुधारने का प्रयास करते हैं.’

एक दिन कालिज से घर लौटी तो मां एक खुशखबरी के साथ मेरा इंतजार कर रही थीं. मुझे देखते ही बोलीं, ‘सुना तू ने, तेरे काका का फोन आया था कि कल तेरे सौरभ भाई के लिए लड़की देखने कानपुर चलना है. सौरभ ने कहा है कि उसे हम सब से ज्यादा तुझ पर भरोसा है कि तू ही उस के लिए सही लड़की तलाश सकती है.’

मुझे अपने-आप पर नाज हो आया कि मेरे भाई को मुझ पर कितना यकीन है. दूसरे दिन सौरभ भाई और सौभिक भाई के अलावा हम सब कानपुर पहुंचे तो मैं बहुत खुश थी. हम सभी को लड़की पसंद आ गई. हां, उस की उम्र जरूर मेरी मां और काकी के विचार से कुछ ज्यादा थी, पर आजकल 27 साल में शादी करना कोई खास बात नहीं होती. फिर उसे देख कर कोई 22-23 से ज्यादा की नहीं समझ सकता था.

बैठक में सब को चाय-नाश्ता देने और थोड़ी देर वहां बैठने के बाद जब भाभी अंदर जाने लगीं तो काकी ने मुझ से कहा, ‘रंजू, तुम अंदर जा कर संगीता के साथ बातें करो. यहां बड़ों के बीच बैठी बोर हो जाओगी. फिर हमें तो कुछ उस से पूछना है नहीं.’

मैं भी भाभी के साथ बात करना चाहती थी, इसलिए अंदर चली गई. तभी उन के  घर में भाभी के बचपन से काम करने वाली आया कमली ने उन्हें एक टेबलेट खाने को दी. मेरे कुछ पूछने से पहले की कमली बोली, ‘शायद घबराहट के मारे बेबी के सिर में कुछ दर्द सा होने लगा है. आप तो समझ ही सकती हैं क्योंकि आप भी लड़की हैं.’

इस पर मैं बोली, ‘मैं समझ सकती हूं, पर चिंता करने की कोई बात नहीं है. हम सब को भाभी पहले ही पसंद आ चुकी हैं.’
भाभी ने तब तल्ख स्वर में कहा था, ‘पसंद तो सभी करते हैं पर शादी कोई नहीं.’

‘पर हम तो आज सगाई भी कर के जाने वाले हैं.’ मुझे लगा कि पहले कोई रिश्ता नहीं हो पाया होगा इसलिए भाभी ऐसे बोल रही हैं. फिर सगाई करके ही लौटे थे. इस के 10 दिन बाद सौरभ भाई के पास एक गुमनाम फोन आया कि जिस लड़की से आप शादी करने जा रहे हैं वह एक गिरे हुए चरित्र की लड़की है. अपने स्वभाव के मुताबिक सुनी-सुनाई बात पर यकीन न करते हुए भाई ने फोन करने वाले से सख्त लहजे में कहा था, ‘आप को इस विषय में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है. उस के चरित्र के विषय में मुझे सब पता है.’

करीब एक महीने बाद ही धूमधाम से हम सब संगीता भाभी को दुलहन बना कर घर ले आए. उन के साथ दहेज में कमली भी आई थी. हमारे घर वालों ने सोचा ससुराल में भाभी को ज्यादा परेशानी न हो इस वजह से उन के मायके वालों ने उसे साथ भेजा है.

सौरभ भाई खूबसूरत दुलहन पा कर बहुत खुश थे. दुल्हन पसंद करने के एवज में मैं ने उन से लाकेट समेत सोने की खूबसूरत एक चैन और कानों की बालियां मांगी थीं जो शादी के दिन ही उन्होंने मुझे दे दी थीं. अगले दिन जब मैं फूलों का गजरा देने भाभी के कमरे की ओर जा रही थी तो मैं ने सौभिक भाई को छिप कर भाभी के कमरे में झांकते हुए देखा. मैंने उत्सुकतावश घूम कर दूसरी ओर की खिड़की से कमरे के अंदर देखा तो दंग रह गई. भाभी सिर्फ साया और ब्लाउज पहने घुटने मोड़ कर पलंग पर बैठी थीं. साया भी घुटने तक चढ़ा हुआ था जिस में गोरी पिंडलियां छिले हुए केले के तने जैसी उजली और सुंदर लग रही थीं. उन के गीले केशों से टपकते हुए पानी से पीछे ब्लाउज भी गीला हो रहा था. उस पर गहरे गले का ब्लाउज पुष्ट उभारों को ढकने के लिए अपर्याप्त लग रहा था. इस दशा में वह साक्षात कामदेव की रति लग रही थीं.

सहसा ही मैं स्वप्नलोक की दुनिया से यथार्थ के धरातल पर लौट आई. फिर सधे कदमों से जा कर पीछे से सौभिक भाई की पीठ थपथपा दी और अनजान सी बनती हुई बोली, ‘भाई, तुम यहां खड़े क्या कर रहे हो? बाहर काका तुम्हें तलाश रहे हैं.’

सौभिक भाई बुरी तरह झेंप गए, बोले, ‘वो…वो…मैं. सौरभ भाई को ढूंढ़ रहा था.’

वह मुझ से नजरें चुराते हुए बिजली की गति से वहां से चले गए. मैं गजरे की थाली लिए भाभी के कमरे में अंदर पहुंची. ‘यह क्या भाभी? इस तरह क्यों बैठी हो? जल्दी से साड़ी बांध कर तैयार हो जाओ, तुम्हें देखने आसपास के लोग आते ही होंगे.’

‘मुझे नहीं पता साड़ी कैसे बांधी जाती है. कमली मेरे लिए दूध लेने गई है, वही आ कर मुझे साड़ी पहनाएगी,’ भाभी का स्वर एकदम सपाट था.
‘अच्छा, लगता है, तुम सिर्फ सलवार-सूट ही पहनती हो. आओ, मैं तुम्हें बताती हूं कि साड़ी कैसे बांधी जाती है. मैं तो कभी-कभी घर पर शौकिया साड़ी बांध लेती हूं.’

बातें करते हुए मैं ने उन की साड़ी बांधी. फिर केशों को अच्छी तरह पोंछ कर हेयर ड्रायर से सुखा कर पोनी बना दी. फिर हेयर पिन से मोगरे का गजरा लगाया और चेहरे का भी पूरा मेकअप कर डाला. सबसे अंत में मांग भरने के बाद जब मैं ने उन के माथे पर मांग-टीका सजाया तो कुछ पलों तक मैं खुद उस अपूर्व सुंदरी को निहारती रह गई.

इतनी देर तक मैं उन से अकेले ही बात करती रही. उन का चेहरा एकदम निर्विकार था. पूरे श्रृंगार के बावजूद कुछ कमी सी लग रही थी. शायद वह कमी थी भाभी के मुखड़े पर नजर न आने वाली स्वाभाविक लज्जा, क्योंकि यही तो वह आभूषण है जो एक भारतीय दुलहन की सुंदरता में चार चांद लगा देता है. ऐसा क्यों था, मैं तब समझ नहीं पाई थी, परंतु अगली रात को रिसेप्शन पार्टी के वक्त इस का राज खुल गया.
वह रात शायद सौरभ भाई के जीवन की सबसे दुख भरी रात थी.

उस दिन मौका मिलने पर जब-तब मैं सौरभ भाई को भाभी का नाम लेकर छेड़ती थी. रात को रिसेप्शन पार्टी पूरे शबाब पर थी. दूल्हा-दुल्हन को मंडप में बिठाया गया था. लोग तोहफे और बुके ले कर जब दुलहन के पास पहुंचते तो इतनी सुंदर दुल्हन देख पलक झपकाना भूल जाते. हम सब खुश थे, पर हमारी खुशी पर जल्दी ही तुषारापात हो गया.

वह पूर्णिमा की रात थी. हर पूर्णिमा को ज्वार-भाटे के साथ समुद्र का शोर इतना बढ़ जाता कि काका के घर तक साफ सुनाई पड़ता. उस वक्त ऐसा ही लगा था जैसे अचानक ही शांत समुद्र में इस कदर ज्वार-भाटा आ गया हो जो हमारे घर के अमन-चैन को तबाह और बर्बाद कर डालने पर उतारू हो. मेरे मन में भी शायद समुद्र से कम ज्वार-भाटे न थे.

अचानक ही दुल्हन बनी भाभी अपने शरीर की हर एक वस्तु को नोंच-नोंच कर फेंकने लगीं, फिर पूरे अहाते में चीखती हुई इधर से उधर दौड़ने लगीं. बड़ी मुश्किल से उन्हें काबू में किया गया. कमली ने दौड़ कर कोई दवा भाभी को खिलाई तो वह धीरे-धीरे कुरसी पर बेहोश सी पड़ गईं. तब भाभी को उठा कर कमरे में लिटा दिया गया. फिर तो सभी लोगों ने कमली को कटघरे में ला खड़ा किया. उस का चेहरा सफेद पड़ चुका था. उस ने डरते और रोते हुए बताया, ‘पिछले 4 सालों से संगीता बेबी को अचानक दौरे पड़ने शुरू हो गए. रोज दवा लेने से वह कुछ ठीक रहती हैं, परन्तु अगर किसी कारणवश 10-11 दिन तक दवा नहीं लें तो दौरा पड़ जाता है. यह सब जान कर कौन शादी के लिए तैयार होता? इसलिए इस बारे में कुछ न बता कर यह शादी कर दी गई.

‘मैं ने उन्हें बचपन से पाला है, इसलिए मुझे साथ भेज दिया गया ताकि उन्हें समय से दवा खिला सकूं. सब ने सोचा कि नियति ने चाहा तो किसी को पता नहीं चलेगा, पर शायद नियति को यह मंजूर नहीं था,’ कह कर कमली फूट-फूट कर रोने लगी. काकी तो यह सुन कर बेहोश हो गईं. मां ने उन्हें संभाला. घर के सभी लोग एकदम आक्रोश से भर उठे. इतने बड़े धोखे को कोई कैसे पचा सकता था. तुरंत उन के मायके वालों को फोन कर दिया कि आ कर अपनी बेटी को ले जाएं. सहसा ही मैं अपराध-बोध से भर उठी थी. जिस भाई ने मुझ पर भरोसा कर के मेरी स्वीकृति मात्र से लड़की देखे बिना शादी कर ली उसी भाई का जीवन मेरी वजह से बर्बादी के कगार पर पहुंच गया था. इस की टीस रह-रह कर मेरे मन-मस्तिष्क को विषैले दंश से घायल करती रही और मैं अंदर ही अंदर लहूलुहान होती रही.

2 दिन बाद भाभी के माता-पिता आए. हमारे सारे रिश्तेदारों ने उन्हें जितना मुंह उतनी बातें कहीं. जी भर कर उन्हें लताड़ा, फटकारा और वे सिर झुकाए सब-कुछ चुपचाप सुनते रहे. 2 घंटे बाद जब सभी के मन के गुबार निकल गए तो भाभी के पिता सब के सामने हाथ जोड़ कर बोले, ‘आप लोगों का गुस्सा जायज है. हम यह स्वीकार करते हैं कि हम ने आप से धोखा किया. हम अपनी बेटी को ले कर अभी चले जाएंगे.

‘परंतु जाने से पहले मैं आप लोगों से यह कहना चाहता हूं कि हमारी बेटी कोई जन्म से ऐसी मानसिक रोगी नहीं थी. उसे इस हाल में पहुंचाने वाला आप का यह बेदर्द समाज है. 7 साल पहले एक जमींदार घराने के अच्छे पद पर कार्यरत लड़के के साथ हम ने संगीता का रिश्ता तय किया था. सगाई होने तक तो वे यही कहते रहे कि आप अपनी मरजी से अपनी बेटी को जो भी देना चाहें दे सकते हैं, हमारी ओर से कोई मांग नहीं है. फिर शादी के 2 दिन पहले इतनी ज्यादा मांग कर बैठे जो किसी भी सूरत में हम पूरी नहीं कर सकते थे.

‘अंतत: हम ने इस रिश्ते को यहीं खत्म कर देना बेहतर समझा, परंतु वे इसे अपना अपमान समझ बैठे और बदला लेने पर उतारू हो गए. चूंकि वे स्थानीय लोग थे इसलिए हमारे घर जो भी रिश्ता ले कर आता उस से संगीता के चरित्र के बारे में उल्टी-सीधी बातें करके रिश्ता तोड़ने लगे. इस के अलावा वे हमारे जान-पहचान वालों के बीच भी संगीता की बदनामी करने लगे.

‘इन सब बातों से संगीता का आत्मविश्वास खोने लगा और वह एकदम गुमसुम हो गई. फिर धीरे-धीरे मनोरोगी हो गई. इलाज के बाद भी खास फर्क नहीं पड़ा. जब आप लोग किसी की बातों में नहीं आए तो किसी तरह आप के घर रिश्ता करने में हम कामयाब हो गए.

‘मन से हम इस साध को भी मिटा न सके  कि बेटी का घर बसता हुआ देखें. हम यह भूल ही गए कि धोखा दे कर न आज तक किसी का भला हुआ है और न होगा. हो सके तो हमें माफ कर दीजिए. आप लोगों का जो अपमान हुआ और दिल को जो ठेस पहुंची उस की भरपाई तो मैं नहीं कर पाऊंगा, पर आप लोगों का जितना खर्चा हुआ है वह मैं घर पहुंचते ही ड्राफ्ट द्वारा भेज दूंगा. बस, अब हमें इजाजत दीजिए.’
फिर वह कमली से बोले, ‘जाओ कमली, संगीता को ले आओ.’

यह सुनकर एकदम सन्नाटा छा गया. तभी जाती हुई कमली को रोकते हुए सौरभ भाई बोले, ‘ठहरो, कमली, संगीता कहीं नहीं जाएगी. यह सही है कि इन लोगों ने हमें धोखा दिया और हम सब को ठेस पहुंचाई. इस के लिए इन्हें सजा भी मिलनी चाहिए, और सजा यह होगी कि आज के बाद इन से हमारा कोई संबंध नहीं होगा. परंतु इस में संगीता की कोई गलती नहीं है, क्योंकि उस की मानसिक दशा तो ऐसी है ही नहीं कि वह इन बातों को समझ सके.

‘परंतु मैं ने तो अपने पूरे होशो-हवास में मन-प्राण से उसे पत्नी स्वीकारा है. अग्नि को साक्षी मान कर हर दुख-सुख में साथ निभाने का प्रण किया है. कहते हैं जन्म, शादी और मृत्यु सब पहले से तय होते हैं. अगर ऐसा है तो यही सही, संगीता जैसी भी है अब मेरे साथ ही रहेगी. मैं अपने सभी परिजनों से हाथ जोड़ कर विनती करता हूं कि मुझे मेरे जीवन-पथ से विचलित न करें क्योंकि मेरा निर्णय अटल है.’

सौरभ भाई के स्वभाव से हम सब वाकिफ थे. वह जो कहते उसे पूरा करने में कोई कसर न छोड़ते, इसलिए एकाएक ही मानो सभी को सांप सूंघ गया. संगीता भाभी के मातापिता सौरभ भाई को लाखों आशीष देते चले गए. बाकी वहां मौजूद सभी नाते-रिश्तेदारों में से किसी-किसी ने सौरभ भाई को सनकी, बेवकूफ और पागल आदि विशेषणों से विभूषित किया और धीरे-धीरे चलते बने. आजकल किसी के पास इतना वक्त ही कहां होता है कि किसी की व्यक्तिगत बातों और समस्याओं में अपना कीमती वक्त गंवाए.

भाभी के आने के बाद मैं बहुत मौज-मस्ती करने की योजना मन ही मन बना चुकी थी, पर अब तो सब मन की मन ही में रही. तीसरे दिन अपने मम्मी-पापा के साथ ही मैं ने लौटने का मन बना लिया. दुखी मन से मैं भुवनेश्वर लौट आई. आने से पहले चुपके से एक रुमाल में सोने की चेन और कानों की बालियां कमली को दे आई कि मेरे जाने के बाद सौरभ भाई को दे देना. जब उनकी जिंदगी में बहार आई ही नहीं तो मैं कैसे उस तोहफे को कबूल कर सकती थी.

सौरभ भाई के साथ हुए हादसे को काकी झेल नहीं पाईं और एक साल के अंदर ही उन का देहांत हो गया. काकी के गम को हम अभी भुला भी नहीं पाए थे कि एक दिन नाग के डसने से कमली का सहारा भी टूट गया. बिना किसी औरत के सहारे के सौरभ भाई के लिए संगीता भाभी को संभालना मुश्किल होने लगा था, इसलिए सौरभ भाई ने कोशिश कर के अपना तबादला भुवनेश्वर करवा लिया ताकि मैं और मम्मी उन की देखभाल कर सकें.

मकान भी उन्होंने हमारे घर के करीब ही लिया था. वहां आ कर मेरी मदद से घर व्यवस्थित करने के बाद सबसे पहले वह संगीता भाभी को अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले गए. मैं भी साथ थी.

डॉक्टर ने पहले एकांत में सौरभ भाई से संगीता भाभी की पूरी केस हिस्ट्री सुनी फिर जांच करने के बाद कहा कि उन्हें डिप्रेसिव साइकोसिस हो गया है. ज्यादा अवसाद की वजह से ऐसा हो जाता है. इस में रोेगी जब तक क्रोनिक अवस्था में रहता है तो किसी को जल्दी पता नहीं चल पाता कि अमुक आदमी को कोई बीमारी भी है, परंतु 10 से ज्यादा दिन तक वह दवा न ले तो फिर उस बीमारी की परिणति एक्यूट अवस्था में हो जाती है जिस में रोगी को कुछ होश नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है. अपने बाल और कपड़े आदि नोचने-फाड़ने जैसी हरकतें करने लगता है.
डाक्टर ने आगे बताया कि एक बार अगर यह बीमारी किसी को हो जाए तो उसे एकदम जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता, परंतु जीवनपर्यंत रोजाना इस मर्ज की दवा की एक गोली लेने से सामान्य जीवन जिया जा सकता है. दवा के साथ ही साथ साइकोथेरेपी से मरीज में आश्चर्यजनक सुधार हो सकता है और यह सिर्फ उस के परिवार वाले ही कर सकते हैं. मरीज के साथ प्यार भरा व्यवहार रखने के साथ-साथ बातों और अन्य तरीकों से घर वाले उस का खोया आत्मविश्वास फिर से लौटा सकते हैं.

डॉक्टर के कहे अनुसार हम ने भाभी का इलाज शुरू कर दिया. मां तो अपने घर के काम में ही व्यस्त रहती थीं, इसलिए भाई की अनुपस्थिति में भाभी के साथ रहने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए मैं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. भाई और मैं बातों-बातों में निरंतर उन्हें यकीन दिलाने की कोशिश करते कि वह बहुत अच्छी हैं, सुंदर हैं और हरेक काम अच्छी तरह कर सकती हैं.

शुरू में वह नानुकर करती थीं, फिर धीरे-धीरे मेरे साथ खुल गईं. हम तीनों मिल कर कभी लूडो खेलते, कभी बाहर घूमने चले जाते. लगातार प्रयास से 6 महीने के अंदर संगीता भाभी में इतना परिवर्तन आ गया कि वह हंसने-मुस्कुराने लगीं. लोगों से बातें करने लगीं और नजदीक के बाजार तक अकेली जा कर सब्जी वगैरह खरीद कर लाने लगीं. दूसरे लोग उन्हें देख कर किसी भी तरह से असामान्य नहीं कह सकते थे. यों कहें कि वह काफी हद तक सामान्य हो चुकी थीं.

हमें आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि इस बीच न तो काका और न ही सौभिक भाई कभी हालचाल पूछने आए, पर सब कुछ ठीक चल रहा था, इसलिए हम ने खास ध्यान नहीं दिया. इसके 5 महीने बाद ही मेरी शादी हो गई और मैं अपनी ससुराल दिल्ली चली गई. ससुराल आ कर धीरे-धीरे मेरे दिमाग से सौरभ भाई की यादें पीछे छूटने लगीं क्योंकि आलोक के अपने माता-पिता के इकलौते बेटे होने के कारण वृद्ध सास-ससुर की पूरी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी. उन्हें छोड़ कर मेरा शहर से बाहर जाना मुश्किल था.

मेरे ससुराल जाने के 2 महीने बाद ही पापा ने एक दिन फोन किया कि अच्छी नौकरी मिलने के कारण सौरभ भाई संगीता भाभी के साथ सिंगापुर चले गए हैं. फिर तो सौरभ भाई मेरे जेहन में एक भूली हुई कहानी बन कर रह गए थे. अचानक किसी के हाथ की थपथपाहट मैं ने अपने गाल पर महसूस की तो सहसा चौंक पड़ी और सामने आलोक को देख कर मुसकरा पड़ी. ‘‘कहां खोई हो, डार्लिंग, कल तुम्हारे प्यारे सौरभ भाई पधार रहे हैं. उन के स्वागत की तैयारी नहीं करनी है?’’ आलोक बोले. वह सौरभ भाई के प्रति मेरे लगाव को अच्छी तरह जानते थे.
‘‘अच्छा, तो आप को पता था कि फोन सौरभ भाई का था.’’

‘‘हां, भई, पता तो है, आखिर वह हमारे साले साहब जो ठहरे. फिर मैं ने ही तो उन से पहले बात की थी.’’

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठ कर मैं ने नहा-धो कर सौरभ भाई के मनपसंद दम-आलू और सूजी का हलवा बना कर रख दिया. पूरी का आटा भी गूंध कर रख दिया ताकि उन के आने के बाद जल्दी से गरम-गरम पूरियां तल दूं. आलोक उठ कर तैयार हो गए थे और बच्चे भी तैयार होने लगे थे. रविवार होने की वजह से उन्हें स्कूल तो जाना नहीं था. कोई गाड़ी घर के बाहर से गुजरती तो मैं खिड़की से झांक कर देखने लगती. आलोक मेरी अकुलाहट देख कर मंद-मंद मुसकरा रहे थे.

आखिर जब तंग आ कर मैं ने देखना छोड़ दिया तो अचानक पौने 9 बजे दरवाजे की घंटी बज उठी. मैं ने दौड़ कर दरवाजा खोला तो सामने सदाबहार मुसकान लिए सौरभ भाई अटैची के साथ खड़े थे. वह तो वैसे ही थे, बस बदन पहले की अपेक्षा कुछ भर गया था और मूंछें भी रख ली थीं. उन से पहली बार मिलने के कारण बच्चे नमस्ते करने के बाद कुछ सकुचाए से खड़े रहे. सौरभ भाई ने घुटनों के बल बैठते हुए अपनी बाहें पसार कर जब उन्हें करीब बुलाया तो दोनों बच्चे उन के गले लग गए.

मैं भाई को प्रणाम करने के बाद दरवाजा बंद करने ही वाली थी कि वह बोले, ‘‘अरे, क्या अपनी भाभी और भतीजे को अंदर नहीं आने दोगी?’’
मैं हक्की-बक्की सी उन का मुँह ताकने लगी क्योंकि उन्होंने भाभी और भतीजे के बारे में फोन पर कुछ कहा ही नहीं था. तभी भाभी ने अपने 7 वर्षीय बेटे के साथ कमरे में प्रवेश किया.

कुछ पलों तक तो मैं कमर से भी नीचे तक चोटी वाली सुंदर भाभी को देख ठगी सी खड़ी रह गई, फिर खुशी के अतिरेक में उन के गले लग गई.
सभी का एक-दूसरे से मिलने-मिलाने का दौर खत्म होने और थोड़ी देर बातें करने के बाद भाभी नहाने चली गईं. फिर नाश्ते के बाद बच्चे खेलने में व्यस्त हो गए और आलोक तथा सौरभ भाई अपने कामकाज के बारे में एक-दूसरे को बताने लगे.

थोड़ी देर उन के साथ बैठने के बाद जब मैं दोपहर के भोजन की तैयारी करने रसोई में गई तो मेरे मना करने के बावजूद संगीता भाभी काम में हाथ बंटाने आ गईं. सधे हाथों से सब्जी काटती हुई वह सिंगापुर में बिताए दिनों के बारे में बताती जा रही थीं. उन्होंने साफ शब्दों में स्वीकारा कि अगर सौरभ भाई जैसा पति और मेरी जैसी ननद उन्हें नहीं मिलती तो शायद वह कभी ठीक नहीं हो पातीं. भाभी को इस रूप में देख कर मेरा अपराधबोध स्वत: ही दूर हो गया.

दोपहर के भोजन के बाद भाभी ने कुछ देर लेटना चाहा. आलोक अपने ऑफिस के कुछ पेंडिंग काम निबटाने चले गए. बच्चे टीवी पर स्पाइडरमैन कार्टून फिल्म देखने में खो गए तो मुझे सौरभ भाई से एकांत में बातें करने का मौका मिल गया. बहुतेरे सवाल मेरे मानस-पटल पर उमड़-घुमड़ रहे थे जिनका जवाब सिर्फ सौरभ भाई ही दे सकते थे. आराम से सोफे  पर पीठ टिका कर बैठती हुई मैं बोली, ‘‘अब मुझे सब कुछ जल्दी बताइए कि मेरी शादी के बाद क्या हुआ. मैं सब कुछ जानने को बेताब हूं,’’ मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं पा रही थी.

भैया ने लंबी सांस छोड़ते हुए कहना शुरू किया, ‘‘रंजू, तुम्हारी शादी के बाद कुछ भी ऐसा खास नहीं हुआ जो बताया जा सके. जो कुछ भी हुआ था तुम्हारी शादी से पहले हुआ था, परंतु आज तक मैं तुम्हें यह नहीं बता पाया कि पुरी से भुवनेश्वर तबादला मैं ने सिर्फ संगीता के लिए नहीं करवाया था, बल्कि इस की और भी वजह थी.’’

मैं आश्चर्य से उन का मुंह देखने लगी कि अब और किस रहस्य से पर्दा उठने वाला है. मैं ने पूछा, ‘‘और क्या वजह थी?’’ ‘‘मां के बाद कमली किसी तरह सब संभाले हुए थी, परंतु उस के गुजरने के बाद तो मेरे लिए जैसे मुसीबतों के कई द्वार एक-साथ खुल गए. एक दिन संगीता ने मुझे बताया कि सौभिक ने आज जबरन मेरा चुंबन लिया. जब संगीता ने उस से कहा कि वह मुझ से कह देंगी तो माफी मांगते हुए सौभिक ने कहा कि यह बात भैया को नहीं बताना. फिर कभी वह ऐसा नहीं करेगा.

‘‘यह सुन कर मैं सन्न रह गया. मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि मेरा अपना भाई भी कभी ऐसी हरकत कर सकता है. बाबा को मैं इस बात की भनक भी नहीं लगने देना चाहता था, इसलिए 2-4 दिन की छुट्टियां ले कर दौड़-धूप कर मैं ने होस्टल में सौभिक के रहने का इंतजाम कर दिया. बाबा के पूछने पर मैंने कह दिया कि हमारे घर का माहौल सौभिक की पढ़ाई के लिए उपयुक्त नहीं है.

‘‘वह कुछ पूछे बिना ही हास्टल चला गया क्योंकि उस के मन में चोर था. रंजू, आगे क्या बताऊं, बात यहीं तक रहती तो गनीमत थी, पर वक्त भी शायद कभी-कभी ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करता है कि अपना साया भी साथ छोड़ देता नजर आता है.

‘‘मेरी तो कहते हुए जुबान लड़खड़ा रही है पर लोगों को ऐसे काम करते लाज नहीं आती. कामांध मनुष्य रिश्तों की गरिमा तक को ताक पर रख देता है. उस के सामने जायज-नाजायज में कोई फर्क नहीं होता.

‘‘एक दिन आफिस से लौटा तो अपने कमरे में घुसते ही क्या देखता हूं कि संगीता घोर निद्रा में पलंग पर सोई पड़ी है क्योंकि तब उस की दवाओं में नींद की गोलियां भी हुआ करती थीं. उस के कपड़े अस्त-व्यस्त थे. सलवार के एक पैर का पायंचा घुटने तक सिमट आया था और उस के अनावृत पैर को काका की उंगलियां जिस बेशरमी से सहला रही थीं वह नजारा देखना मेरे लिए असह्य था. मेरे कानों में सीटियां सी बजने लगीं और दिल बेकाबू होने लगा.

‘‘किसी तरह दिल को संयत कर मैं यह सोच कर वापस दरवाजे की ओर मुड़ गया और बाबा को आवाज देता हुआ अंदर आया जिस से हम दोनों ही शर्मिंदा होने से बच जाएं. जब मैं दोबारा अंदर गया तो बाबा संगीता को चादर ओढ़ा रहे थे, मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘अभीअभी सोई है.’ फिर वह कमरे से बाहर निकल गए. इन हालात में तुम ही कहो, मैं कैसे वहां रह सकता था? इसीलिए भुवनेश्वर तबादला करा लिया.’’ ‘‘यकीन नहीं होता कि काका ने ऐसा किया. काकी के न रहने से शायद परिस्थितियों ने उन का विवेक ही हर लिया था जो पुत्रवधू को उन्होंने गलत नजरों से देखा,’’ कह कर शायद मैं खुद को ही झूठी दिलासा देने लगी.

भाई आगे बोले, ‘‘रिश्तों का पतन मैं अपनी आंखों से देख चुका था. जब रक्षक ही भक्षक बनने पर उतारू हो जाए तो वहां रहने का सवाल ही पैदा नहीं होता. इत्तिफाकन जल्दी ही मुझे सिंगापुर में एक अच्छी नौकरी मिल गई तो मैं संगीता को ले कर हमेशा के लिए उस घर और घर के लोगों को अलविदा कह आया ताकि दुनिया के सामने रिश्तों का झूठा परदा पड़ा रहे.

‘‘जब मुझे यकीन हो गया कि दवा लेते हुए संगीता स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकती है तो डॉक्टर की सलाह ले कर हम ने अपना परिवार आगे बढ़ाने का विचार किया. जब मुझे स्वदेश की याद सताने लगी तो इंटरनेट के जरिए मैं ने नौकरी की तलाश जारी कर दी. इत्तेफाक से मुझे मनचाही नौकरी दिल्ली में मिल गई तो मैं चला आया और सब से पहले तुम से मिला. अब और किसी से मिलने की चाह भी नहीं है,’’ कह कर सौरभ भाई चुप हो गए.

वह 2 दिन रह कर लाजपत नगर स्थित अपने नए मकान में चले गए. मैं बहुत खुश थी कि अब फिर से सौरभ भाई से मिलना होता रहेगा. मेरे दिल से मानो एक बोझ उतर गया था क्योंकि हो न हो मेरी ही वजह से पतझड़ में तब्दील हो गए मेरे प्रिय और आदरणीय भाई के जीवन में भी आखिर वसंत आ ही गया.

जाते-जाते भाभी ने मेरे हाथ में छोटा सा एक पैकेट थमा दिया. बाद में उसे मैं ने खोला तो उस में उन की शादी के वक्त मुझे दी गई चैन और कानों की बालियों के साथ एक जोड़ी जड़ाऊ कंगन थे, जिन्हें प्यार से मैं ने चूम लिया. Hindi Family Story :

Social Satire In Hindi : ढीला ढक्कन – ढक्कन का यह कैसा पचड़ा ?

Social Satire In Hindi : श्रेया की रसोई में ढक्कन ऐसे हैं कि जैसे वे बंद हो ही नहीं सकते. पति बेचारा हर बार डिब्बा उठाते वक्त कामना करता है, काश आज तो ढक्कन लगा हो.

‘‘ओ  फ्फो श्रेया, कुछ काम तो तसल्ली से कर लिया कर, पता नहीं क्यों हर समय जल्दबाजी में रहती हो?’’

श्रेया ने आवाज सुन वहीं से जानना चाहा, ‘‘अब क्या हुआ, शेखर, क्या कर दिया मैं ने?’’

‘‘देखो, यहां आ कर, पता नहीं डिब्बों और बोतलों के ढक्कन ठीक से बंद करने की आदत तुम्हें कब पड़ेगी. अपना काम निकाल कर यों ही ढक्कन ढीला छोड़ देती हो. जैसे ही मैं ने बोतल उठाई, ढक्कन हाथ में रह गया और बोतल नीचे जा गिरी. फर्श पर सारा तेलतेल हो गया,’’ शेखर ने बड़बड़ाते हुए कहा. श्रेया हाबड़-ताबड़ में आई.

‘‘देखो, खुद ही देखो,’’ शेखर बोला.

‘‘शेखर, जब तुम मेरी आदत से वाकिफ हो तो तुम खुद ही ध्यान से उठाया करो.’’

‘‘खूब कहा तुम ने, यह भी मेरी ही गलती है. तुम ने तो वह कहावत चरितार्थ कर दी, ‘मेरी बिल्ली मुझू को म्याऊं.’ इतना सुन श्रेया ने जैसे ही कदम बढ़ाया, उस का पैर तेल पर जा पड़ा और वह धड़ाम से जा गिरी.

‘‘लो, खुद ही फंस गईं, इस को कहते हैं, जल्दबाजी का काम शैतान का. हर समय जल्दी में, हर समय जल्दी में, अब भुगतो.’’

श्रेया से कुछ कहते नहीं बन रहा था. खड़े होने की कोशिश कर बस इतना ही कह पाई, ‘‘सुबह के समय पचास काम होते हैं, शेखर. मैं ‘अकेली जान’ क्या करूं?’’

‘‘तो, ढक्कन न लगाने से ‘‘दो जान’ हो जाती हैं क्या. घर में 2 ही तो बंदे हैं, पता नहीं कौन से पचास काम हैं?’’ शेखर ने श्रेया का हाथ पकड़ कर उठाते हुए कहा.

‘‘तुम भी न, यह तो देखो, मुझे चोट लगी है.’’

शेखर श्रेया को बैड पर लिटाते हुए बोला, ‘‘तभी तो 80 किलो वजन यों ही नहीं उठाया.’’ यह कहने के साथ शेखर हंस दिया और फिर बोला, ‘‘जिस दिन तुम्हारे ढक्कन बंद होने लगेंगे और काम में ठीक से ध्यान देने लगोगी, वजन भी कम होने लगेगा.’’

‘‘जब देखो मेरे वजन को रोते रहेंगे. अरे, अपने आप को तो देखो, कमर 30 से 36 हो गई है. मैं ने आज तक कुछ कहा आप को?’’

‘‘अरे बाबा, मैं तो सिर्फ बता रहा हूं,’’ शेखर श्रेया को ‘वौलनी जैल’ लगाते हुए बोला, ‘‘अब तुम आराम करो, मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाता हूं.’’

सुनो, ऐसी चाय बना कर लाना जिस को पीने से दर्द गायब हो जाए और तनमन  झूम जाए,’’ श्रेया प्यार से बोली.

‘‘अच्छा जी, लेकिन एक बात है, हमारे यहां भैंस का दूध आता है, नागिन का नहीं,’’ शेखर ने भी हंसते हुए कहा.

‘‘तुम भी न, मेरी हंसी उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.’’

‘‘इसी का नाम जिंदगी है, डार्लिंग,’’ कह शेखर हंसते हुए चाय बनाने चला गया.

चाय बनाते-बनाते फोन आ गया. शेखर ने फटाफट एक बर्तन में पानी, दूध, चाय-पत्ती, अदरक सब एक-साथ डाल कर गैस फुल औन कर दी. जैसे ही चीनी का डिब्बा उठाया, ढक्कन हाथ में रह गया और डब्बा नीचे जा गिरा. फर्श पर चीनी-चीनी हो गई.

शेखर गुस्से से नीचे बैठ चीनी समेटने लगा. इस बीच फोन कट चुका था.

चाय रानी उबल-उबल कर जल गई. कुछ जलने की महक से शेखर को चाय का ध्यान आया, देखा, चाय जल चुकी थी.

‘‘ओफ्फो, कैसी मुसीबत है?’’ शेखर झूल्ला गया और श्रेया के पास जा कर बोला, ‘‘ऐसा है चाय तो जल गई, अब तुम चाय खुद ही बना लो. मुझे तुम्हारे ढीले ढक्कनों ने बहुत परेशान कर रखा है. देखो किचन में जा कर जरा. तुम से कुछ  कहना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है. जो मर्जी आए, करो,’’ यह कह कर तकिए से सिर ढांप कर वहीं बैड पर वह लेट गया.

श्रेया शेखर का यह रूप देख सोचने पर मजबूर  हो गई. श्रेया उठी, घर के सारे डब्बे और बोतलों के ढक्कन चेक किए, सोचने लगी, शेखर गलत नहीं कहते. मुझू में ही त्रुटि है. श्रेया अपना दर्द भूल गई और चाय बना कर शेखर को उठा कर बोली, ‘‘शेखर, मैं सारे ढक्कन चेक कर आई हूं. अब तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. उठो, चलो चाय पीते हैं. आज तुम्हारी छुट्टी है, लंच बाहर किसी रैस्टोरैंट में कर लेंगे, चलो मूवी देखने चलते हैं.’’

शेखर ने अपना मूड ठीक किया और कहा, ‘‘मठरी और अचार ले आओ, चाय के साथ खाने में अच्छा लगेगा.’’ श्रेया अचार और मठरी लेने चली गई. देर होती देख शेखर ने आवाज दी, ‘‘अरे क्या हुआ, चाय ठंडी हो रही है.’’ लेकिन श्रेया नहीं आई.

शेखर उठा, जा कर देखता क्या है, अचार फर्श पर गिरा पड़ा है और श्रेया समेटने में लगी हुई है. शेखर पूछ बैठा, ‘‘अब क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, वही ढीला ढक्कन.’’ Social Satire In Hindi :

Mystery Story In Hindi : फांस – कौन था प्रीति का कातिल ?

Mystery Story In Hindi : सरिता, बीस साल पहले, दिसंबर (द्वितीय) 2005 – पार्टी में सभी को प्रीति का इंतजार था लेकिन वह नहीं आई. अचानक उस के खून होने की खबर ने पार्टी का सारा माहौल बदल डाला. खूनी पार्टी में मौजूद कोई मेहमान था या घर का कोई सदस्य, यह गुत्थी सुलझाना जरा मुश्किल काम था.

बहुत बड़ी पार्टी थी. अभिजात्य वर्ग के हर क्षेत्र से जुड़े लोग सपरिवार मौजूद थे. बीच-बीच में कोई पूछ लेता था, ‘‘भई, महफिल तो सजा ली लेकिन शमा जलाई ही नहीं. कहां है वह जिस के लिए पार्टी आयोजित की है?’’

पहले तो ऋतिका यह कह कर टालती रही कि प्रीति अभी आ जाएगी लेकिन जब यह सवाल सभी की जबान पर आ गया तो रतन को कहना पड़ा, ‘‘लंबे सफर के बाद प्रीति काफी थकी हुई थी, इसलिए सो रही है.’’

मेहमानों की बेचैनी को शांत कर दोनों मुड़े तो उन की नजर एक अजनबी सुदर्शन युवक पर पड़ी. रतन और ऋतिका दोनों अपने बच्चों के सभी दोस्तों को पहचानते थे और यह उन का हम उम्र भी नहीं था. इस से पहले कि वे उस अजनबी से कुछ पूछते, पुलिस कमिश्नर बत्रा ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, देव, तुम यहां किस के मेहमान हो?’’

‘‘किसी का नहीं, सर,’’ युवक कमिश्नर बत्रा को सैल्यूट मारते हुए बोला, ‘‘मेरी बहन नीना प्रिया की सहेली है, उसे लेने आया हूं.’’

‘‘नीना के भाई होने के नाते आप भी हमारे मेहमान हैं,’’ रतन जी ने नम्रता से कहा, ‘‘मेरा नाम रतन है और प्रिया मेरी बेटी है.’’

तभी प्रिया नीना और कुछ दूसरी लड़कियों के साथ आ गईं.

‘‘देव भैया, आप नीना को इतनी जल्दी ले कर नहीं जा सकते. अभी न तो इस ने खाना खाया है और न ही यह मम्मी से मिली है,’’ प्रिया ने कहा.

‘‘वह सब मैं नहीं जानता,’’ देव हंस कर बोला, ‘‘मुझे मम्मी ने कहा था कि 9 बजे जा कर नीना को ले आना. सो, मैं लेने आ गया हूं.’’

‘‘आप बैठिए,’’ ऋतिका बोली, ‘‘जब तक आप कुछ पिएंगे तब तक प्रीति भी आ जाएगी और खाना भी लग जाएगा.’’

‘‘प्लीज, इंस्पेक्टर, आज मेरी बेटी बहुत खुश है. उस की चहेती सहेली को जल्दी ले जा कर आप उसे दुखी मत कीजिए,’’ और पलट कर रतन पत्नी से बोले, ‘‘ऋतिका, तुम प्रीति को नीचे लाओ और खाना भी लगवाने को कहो. वरना मेहमान बिना खाए ही जाना शुरू

हो जाएंगे.’’

‘‘मैं मम्मी को लाने जाऊं?’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं ही ले कर आती हूं,’’ कह कर ऋतिका चली गई और कुछ देर बाद वह चीखती हुई नीचे आई और बोली, ‘‘प्रीति ने अपनी कनपटी पर गोली मार ली है. प्लीज नायक, मेरे साथ चलिए और कोई ऐंबुलेंस के लिए फोन करो.’’

लौन में अफरातफरी मच गई. देव ने बत्रा साहब से पूछ कर मेन गेट बंद करवा दिया और बत्रा साहब को साथ ले कर घटनास्थल की ओर चल दिया.

हंसी-मजाक की जगह अब प्रिया की हृदयविदारक चीखों ने ले ली थी. ऊपर एक कमरे में प्रीति ड्रेसिंग टेबल और पलंग के बीच में औंधेमुंह पड़ी हुई थी. उस की दाहिनी ओर की कनपटी से खून बह कर कालीन पर बिखरा पड़ा था. दाएं हाथ में साइलेंसर लगा रिवॉल्वर था. कमरे की हालत और सामान को देख कर नहीं लग रहा था कि हत्या चोरी की नीयत से की गईर् है.

लाश का मुआयना कर डा. नायक बोले, ‘‘मौत हुए कम से कम एक घंटा हो चुका है.’’

‘‘सर, यह आत्महत्या का नहीं, हत्या का मामला है,’’ देव बोला, ‘‘गोली कम से कम 2 फुट की दूरी से मारी गई है.’’

‘‘आप, यह कैसे कह सकते हैं? ऋतिका ने पूछा.’’

‘‘जख्म देख कर. अगर मृतका ने खुद को गोली मारी होती तो नली को कनपटी से न सटाती तो अपने हाथ को 2 फुट दूर नहीं ले जा सकती थी. साफ जाहिर है, जब वह तैयार हो कर शीशे में खुद को पीछे मुड़ कर देख रही थी तो किसी ने उसे गोली मार दी.’’

इतना बताने के बाद देव ने पूछा, ‘‘यह रिवॉल्वर किस का है?’’

‘‘प्रीति का,’’ ऋतिका बोली, ‘‘उस के पास इस का लाइसेंस है.’’

‘‘वह क्या इसे अमेरिका साथ ले कर गई थी?’’ बत्रा साहब ने हैरानी से पूछा.

‘‘जी नहीं,’’ ऋतिका ने सुबकते हुए कहा, ‘‘आज आते ही उस ने अपना सूटकेस मांगा था. रिवॉल्वर उसी में था.’’

‘‘उन्होंने सूटकेस क्यों मांगा था. इस से कुछ फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मृतका ने स्वयं को गोली नहीं मारी है,’’ देव कड़े स्वर में बोला, ‘‘दरबान का कहना है कि 7 बजे से लोग सिर्फ अंदर आ रहे हैं. बाहर कोई नहीं गया, इसलिए हत्यारा यहीं मौजूद है. आप पुलिस बुलाइए.’’

पुलिस कमिश्नर बत्रा साहब अपने मोबाइल पर नंबर मिलाने लगे और बोले, ‘‘पुलिस के आने से पहले कोई घर से बाहर नहीं जाएगा.’’

‘‘भैया,’’ प्रिया देव के पास आ कर बोली, ‘‘मेहमानों को जाने दीजिए. उन में से तो किसी ने मम्मी को कभी देखा भी नहीं था क्योंकि मम्मी पहली बार आज सुबह इस शहर में आई थी.’’

देव चौंक पड़ा पर संभल कर बोला, ‘‘अमेरिका जाने से पहले तुम्हारी मम्मी कहां रहती थी?’’

‘‘पुणे में. वह वहां एएफएमसी (आर्मंड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज) में पढ़ाती थीं. किसी छात्र ने उन का नाम अमेरिका में एडवांस्ड स्टडीज के लिए प्रस्तावित किया था.’’

‘‘फिर तुम यहां कैसे आईं?’’

‘‘ऋतिका आंटी मम्मी की सहेली थीं. एक दिन अचानक हम से मिलने पुणे आईं, मुझे अच्छी लगीं और मैं उन के पास रहने के लिए मान गई.’’

‘‘पापा यानी रतन अंकल से पहले कभी मुलाकात नहीं हुई थी?’’

‘‘हां, वे अकसर पुणे आया करते थे. फिर मां ने उन्हें, अंशुल और रिया को फोन कर के बुलाया. हम सब लोग कुछ रोज खंडाला, लोनावला घूमे, फिर मम्मी के अमेरिका जाने से पहले सब लोग दोबारा मुझे लेने आए थे. पहले मम्मी का भी यहां आने का कार्यक्रम था लेकिन समय की कमी के कारण वे नहीं आ सकी थीं. इसीलिए मैं कह रही हूं भैया, कि आज जो भी मेहमान यहां हैं, मम्मी से पहले कभी नहीं मिले.’’

‘‘इस का मतलब तो यह हुआ कि घर वालों में से ही किसी ने कत्ल किया है.’’

‘‘यह क्या कह रहे हैं, भैया?’’ प्रिया सिहर कर बोली, ‘‘डॉक्टर ने हत्या का समय 8 बजे के आसपास बताया है और हम सब परिवार वाले तो 7 बजे से लौन में मौजूद थे तो मम्मी को मारता कौन?’’

‘‘खैर, फिक्र मत करो. किसी न किसी ने तो किसी को ऊपर जाते देखा ही होगा,’’ देव बोला.

‘‘मुश्किल है.’’ रिया जो अब तक चुप खड़ी थी, बोली, ‘‘हां, चिन्नामा मौजूद होती तो जरूर बता सकती थीं.’’

‘‘यह चिन्नामा कौन है?’’

‘‘वैसे तो वे दादी के जीवनकाल में उन की नौकरानी थीं लेकिन असल में वे मां की मैजिक आई हैं. उन का काम हम सब की और नौकरों की चुगली करना है.’’

‘‘मगर आज वह कहां है?’’ देव ने पूछा.

‘‘अपने कमरे में,’’ रिया हंसी, ‘‘वे शाम को 7 बजे से अपने कमरे में घुस जाती हैं.’’

रिया, प्रिया और नीता को बत्रा साहब के पास भेज कर देव लाश पर झाक कर घाव देखने लगा.

प्रीति की आयु 40 के आसपास होगी. अभी भी बला की खूबसूरत थी. जवानी में तो गजब ढाती होगी. ऐसी हसीन बीवी और प्यारी बच्ची को किसी ने छोड़ने की हिमाकत कैसे की होगी, देव ने सोचा.

‘‘देव, मेहमानों से तुम जल्दी से पूछताछ कर के उन्हें जाने दो,’’ बत्रा साहब बोले, ‘‘लेकिन उन से यह जरूर पता करना कि उन में से किसी ने घर के किसी सदस्य को संदेहजनक स्थिति में ऊपर जाते तो नहीं देखा था.’’

‘‘जी सर, आप को परिवार के लोगों पर शक है?’’

‘‘और हो भी किस पर सकता है देव? प्रीति के रिवॉल्वर तक तो घर वालों की ही पहुंच थी.’’

‘‘लेकिन घर वाले इतने बेवकूफ नहीं लगते सर कि इतने लोगों की मौजूदगी में कत्ल करने का जोखिम लें. उन्हें तो कई मौके मिल सकते थे.’’

‘‘डिप्रैशन में इंसान कुछ भी कर सकता है,’’ बत्रा साहब हंस कर बोले.

देव को लगा कि बत्रा साहब ठीक कह रहे हैं. डिप्रेशन में कोई कुछ भी कर सकता है. मगर डिप्रेशन में कौन है? नीना से इस परिवार के बारे में अकसर सुनता रहता था, सो, कुछ अटकल तो लगा ही सकता था. हो सकता है प्रीति ने प्रिया को साथ ले जाने की मंशा जाहिर की हो और प्रिया मां के साथ जाना न चाहती हो.

ऋतिका को भी प्रिया से बेहद लगाव है और उस के रहने से फायदा भी है क्योंकि अंशुल और रिया की ओर से वह निश्चिंत हो गई है, उस पर घर की देखभाल में भी वह हाथ बंटाती है. ऋतिका की सहेलियों के आने पर उन की खातिरदारी की जिम्मेदारी प्रिया की होती है. धूमधाम से गोद ली बेटी वह क्यों प्रीति को वापस करेगी?

रतन प्रिया को बहुत प्यार करता है. अभी कुछ देर पहले ऋतिका बोली भी थी कि रतन की जान प्रिया में बसती है. सो रतन भी बच्ची को न भेजने के लिए उस की मां को रास्ते से हटा सकता है.

रिया तो खैर छोटी है मगर किशोर अंशुल का जुर्म करना अस्वाभाविक नहीं था, वजह कुछ भी हो सकती है.

एक संभ्रांत महिला को अस्त-व्यस्त

हुई स्थिति को संभालते देख कर

देव ने रिया से पूछा कि वे महिला कौन हैं?

‘‘सुलभा मौसी. मम्मी की कजिन हैं.’’

‘‘यहीं रहती हैं?’’

‘‘नहीं, अपने घर गुलमोहर पार्क में,’’ रिया ने बताया.

देव तेज कदमों से चलता हुआ सुलभा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘आप को यह हत्या रहस्यमय नहीं लग रही?’’

‘‘इंस्पैक्टर, मुझे तो जब से प्रिया गोद ली गई है, यह रिश्तेदारी या दोस्ती जो भी है, रहस्यमय लग रही है.’’

‘‘वह क्यों?’’

‘‘लंबी बात है, इंस्पेक्टर पिछले बरामदे में एकांत मिलेगा, चलिए, वहीं चल कर बात करते हैं,’’ कह कर सुलभा ने सीढि़यों के नीचे का दरवाजा खोला. बरामदे में कुछ कुर्सियां पड़ी हुई थीं.

सुलभा ने देव को एक कुर्सी दे कर बैठने को कहा और उस के बिना कुछ पूछे ही शुरू हो गई.

‘‘मैं और ऋतिका चचेरी बहन ही नहीं बल्कि सहपाठी भी रह चुकी हैं. संयोग से हमारी शादी भी 2 दोस्तों से हुई है. रतन और तिलक दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं. कई बार देशविदेश हम एकसाथ घूमने भी गए हैं. कहने का मतलब है कि मैं शादी से पहले की भी ऋतिका की सब सहेलियों को जानती हूं और शादी के बाद की भी. यहां तक कि रतन की जानपहचान वालों को भी. मगर प्रिया के मांबाप के बारे में पहले कभी नहीं सुना था.’’

‘‘आप ने पूछा नहीं कि यह सहेली कब बनाई.’’

‘‘पूछा था तो टालने के स्वर में बोली कि वह उस की सास की डाक्टर है. सो, उन्होंने परिचय करवाया था जो दोस्ती में बदल गया.’’

‘‘आज की पार्टी के बारे में कुछ बताएंगी? यानी आप किस समय पार्टी में आईं?’’

‘‘ऋतिका ने अंशुल को भेज कर मुझे मेहमानों के आने से कुछ पहले बुला लिया था ताकि मैं पार्टी की व्यवस्था में उस की मदद कर सकूं.’’

‘‘और तब से आप बराबर उन के साथ रहीं?’’

‘‘लगातार तो नहीं कह सकती क्योंकि लौन बहुत बड़ा है और हम दोनों ही मेहमानों से मिलती हुई इधरउधर घूम रही थीं, लेकिन ऋतिका इस बीच ऊपर नहीं गई. हां, मेरे कहने पर उस ने मोबाइल पर ही प्रीति से बात की थी.’’

‘‘यह कितने बजे की बात होगी?’’

‘‘7.45 के आसपास की.’’

इस से पहले कि सुलभा कुछ और कहती, ऋतिका आ गई.

‘‘तो तू यहां गप्पें मार रही है.’’

‘‘जी नहीं, ये मेरे सवालों का जवाब दे रही हैं,’’ देव ने बात काटी, ‘‘आप मेरे सवालों का जवाब देंगी?’’

‘‘पूछिए, इंस्पेक्टर साहब?’’

‘‘आप प्रीति को कैसे और कब से जानती हैं?’’

‘‘मेरी सास का शिरडी जाते हुए ऐक्सिडैंट हो गया था और उन्हें कई महीने पुणे के अस्पताल में रहना पड़ा था. तब डा. प्रीति सप्रे ने उन का बहुत खयाल रखा था. इसलिए वे भी परिवार की एक सदस्य बन गईं.’’

‘‘फिर यह कैसे कहा जा रहा है कि प्रीति आज यहां पहली बार आई थीं?’’

‘‘प्रीति वैसे भी बहुत व्यस्त डाक्टर थी. फिर पति से अलगाव के बाद उस की अपनी दुनिया, व्यवसाय और बच्चों तक ही सिमट कर रह गई थी. बहुत बुलाने पर भी वह कभी यहां नहीं आई.’’

‘‘अपने बच्चे होने के बाद भी आप ने प्रिया को गोद क्यों ले लिया?’’

‘‘इंसानियत के नाते. प्रीति के प्रेमी ने उस से शादी तो कर ली लेकिन परिवार के विरोध के कारण उसे अपना न सका. जब तक बच्ची छोटी थी, पालना आसान था और फिर प्रीति को अमेरिका जाने का मौका भी मिल रहा था. उस की समस्या सुन कर मैं ने कहा कि वह प्रिया को हमें गोद दे दे. बच्ची को परिवार का माहौल और संरक्षण मिल जाएगा और प्रीति को विदेश जाने का मौका भी. थोड़ी हिचकिचाहट के बाद वह मान गई. वह तो हम सब को अमेरिका घूमने के लिए बुला रही थी लेकिन मैं ने कहा कि इस साल तो वही आ जाए, हम फिर आएंगे. मेरी ही जिद पर आई थी बेचारी,’’ ऋतिका का स्वर रुंध गया.

‘‘आप का क्या खयाल है? खून कौन कर सकता है?’’

‘‘कोई नहीं, हत्या का समय 8 बजे के आसपास बताया गया है और उस समय हम परिवार के लोग मेहमानों के साथ थे. अगर कोई चोर या नौकर गोली मारता तो वह ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी घड़ी व चूडि़यों के साथ बैग को भी ले जाता.’’

‘‘प्रिया के पिता कौन हैं, आप जानती हैं?’’

ऋतिका ने इस सवाल पर लापरवाही से कंधे झटके, तभी रतन वहां आ गए तो देव उन से पूछ बैठा, ‘‘प्रिया के पिता के बारे में आप कुछ जानते हैं?’’

‘‘वह तो अब मैं ही हूं.’’

‘‘मेरा मतलब उस के असली पिता से है. उन के बारे में कुछ जानते हैं.’’

‘‘सिर्फ इतना कि वह अपने परिवार की आज्ञा के खिलाफ भी प्रीति से शादी करना चाहता था लेकिन प्रीति उसे उस के परिवार से अलग करने के पक्ष में नहीं थी.’’

‘‘यह हत्या कौन कर सकता है?’’

‘‘यह तो आप को पता लगाना है, इंस्पेक्टर. मैं प्रीति से शाम की चाय यानी 5 बजे के करीब मिला था. थकी हुई होने के बावजूद वह बहुत खुश थी. उसे यहां आ कर बहुत अच्छा लग रहा था. मेरे यह कहने पर कि वह हमेशा के लिए यहां क्यों नहीं आ जाती, उस ने शोखी से कहा कि काम दिलवाओ. मैं ने कहा कि विख्यात ऑर्थोपेडिक सर्जन डा. नायक पार्टी में आ रहे हैं, उन से बात करेंगे. यह सुन कर उस ने ऋतिका से कहा कि फिर तो उसे फ्रेश होने के लिए कुछ देर और सोना चाहिए ताकि डा. नायक को प्रभावित कर सके. यह कह कर वह ऊपर सोने चली गई और हम सब लोग काम में लग गए,’’ इतना कह कर रतन उठ खड़े हुए और बोले, ‘‘प्लीज इंस्पेक्टर, अब बाकी सवाल कल पूछिएगा. बहुत रात हो गई है, मुझे बच्चों को सुलाने दीजिए,’’ रतन के स्वर में याचना थी.

‘‘चलिए, यही सही,’’ कह कर देव भी खड़ा हो गया.

अगली सुबह जब देव रतन के यहां पहुंचा तो वे कुछ बेचैनी के साथ बाग में टहल रहे थे. बरामदे में बैठी एक बूढ़़ी औरत ने घूर कर देव को देखा जैसे आंखों ही आंखों में उस की औकात तोल रही हो.

‘‘बच्चे अभी सो रहे हैं,’’ रतन ने पूछा, ‘‘उन्हें बुलाऊं क्या?’’

‘‘थोड़ा रुक जाइए,’’ देव ने चिन्नामा की ओर देखा, ‘‘ये कौन हैं?’’

‘‘यह लक्ष्मी जी हैं लेकिन सभी इन को चिन्नाम्मा यानी छोटी मां के नाम से जानते हैं.’’

‘‘मेरे दादाजी के अंगरक्षक की पत्नी हैं. एक बार दादाजी पर हुए हमले में उन्हें बचाते हुए इन के पति शहीद हो गए तब से ये हमारे साथ परिवार के सदस्य की तरह रहती हैं. मां की बीमारी के दौरान इन्होंने जिस तरह रातदिन उन की सेवा की उस से उन का सम्मान परिवार में और भी बढ़ गया.’’

‘‘कल आप नजर नहीं आईं, आप कहां थीं?’’ देव ने चिन्नाम्मा से पूछा.

‘‘अपने कमरे में,’’ चिन्नाम्मा अवहेलना के स्वर में बोली, ‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. सो, मैं कल कमरे से बाहर ही नहीं निकली.’’

‘‘लेकिन आज तो आप बिलकुल ठीक लग रही हैं, यानी इतनी बीमार तो नहीं कि घर में आए मेहमान या दावत की रौनक को देखने न आ सकें?’’ देव ने जिज्ञासा व्यक्त की. रतन मुस्कुराया, फिर देव को एक ओर ले जा कर धीरे से बोला कि चिन्नाम्मा को बुढ़ापे की तकलीफें तो रहती ही हैं और जब तब ये उस का फायदा भी उठाती हैं. यह सोच कर कि ऋतिका की पार्टी में कोई काम न बता दे, कल कमरे में रहना ही बेहतर समझा होगा. फिर भी आप कुछ पूछना चाहते हैं तो पूछ लीजिए, कह कर रतन चला गया.

‘‘तो रात को जो खून हुआ उस के बारे में आप को कुछ पता नहीं, चिन्नाम्मा?’’ देव ने पूछा.

‘‘न खून के बारे में, न जिस का खून हुआ उस के बारे में.’’

‘‘लेकिन आप तो इस परिवार में कई सालों से हैं, प्रीति के बारे में तो जानती ही होंगी.’’

‘‘वह मां जी की डाक्टर थी. यह बड़े लोगों का घर है, इंस्पेक्टर. यहां डाक्टर, नर्सों की बात नहीं की जाती लेकिन रतन भले ही ऊंच-नीच न समझे, मैं तो मां जी की बताई लकीर पर ही चलती हूं.’’

‘‘और बहूरानी, वे भी नए जमाने की हैं क्या?’’

‘‘खानदानी घर की लड़की है, जैसा पति नचाता है, नाच लेती है.’’

तभी रतन और ऋतिका भी वहां आ गए और बोले, ‘‘इंस्पैक्टर, प्रिया अभी काफी सामान्य लग रही है. आप ऊपर चल कर उस से पूछताछ कर लीजिए. यह बताइए कि पोस्टमार्टम के बाद बॉडी कब मिलेगी? यह पता करने का कमिश्नर साहब से कहूं या आप पता कर देंगे.’’

‘‘मैं फोन कर के संबंधित अधिकारी से कह देता हूं कि 12 बजे से पहले बॉडी आप को मिल जाए. बॉडी घर लाएंगे या वहीं से अंतिम संस्कार के लिए ले जाएंगे?’’

‘‘इस बारे में तो सोचा ही नहीं.’’

‘‘सोचना क्या है, बेटा?’’ चिन्नाम्मा ने बात काटी, ‘‘जिस घर में उस ने प्राण त्यागे हैं उसी घर से उस की अर्थी उठनी चाहिए. सुहागिन थी, सुहागिन के रूप में विदा करो. क्यों, ठीक है न, बिटिया?’’

‘‘जैसा आप कहें, चिन्नाम्मा. आग कौन देगा, यह भी बता दीजिए?’’ ऋतिका ने असहाय भाव से पूछा.

‘‘अब जो अर्थी उठवा रहा है वही आग भी दे देगा,’’ चिन्नाम्मा ने तटस्थ भाव से कहा.

कुछ देर के बाद ही प्रीति का पार्थिव शरीर आ गया. चिन्नाम्मा उसे ऋतिका के साथ अंदर ले गई. कुछ देर के बाद उस का दुल्हन की तरह श्रृंगार कर के अंतिम यात्रा पर भेजने के लिए तैयार कर दिया गया. देव को लगा जैसे चिन्नाम्मा के अब तक निर्वाक चेहरे पर अचानक संतुष्टि के भाव उभर आए हों. यही भाव अंतिम संस्कार करने के बाद रतन के चेहरे पर भी थे.

उस रात देव देर तक नीना से बात करता रहा. नीना देव की इस बात से तो सहमत थी कि मामले में जितनी गहराई नजर आ रही है, उस से कहीं ज्यादा गहराई है जो प्रीति के अतीत से जुड़ी है लेकिन वह इस बात पर अड़ी हुई थी कि प्रिया को अपनी मां के अतीत के बारे में कुछ मालूम नहीं है.

‘‘अपने असली बाप का नाम भी नहीं?’’

‘‘वही फर्जी नाम जो प्रीति आंटी ने उस के

जन्म के सर्टिफिकेट पर लिखवाया था. प्रीति आंटी का कहना था कि उस का बाप बहुत ही भला और शरीफ आदमी था, आंटी उस की शराफत का फायदा उठा कर उसे उस के समृद्ध परिवार से अलग करना नहीं चाहती थीं. भैया, पुणे में प्रीति आंटी की कोई सहेली न सही, कोई नौकरानी वगैरह तो होगी जो शायद कुछ जानती हो.’’

‘‘तू ठीक कहती है, नीना. नौकरानी से ही सच उगलवाना होगा,’’ कह कर देव उठ खड़ा हुआ.

अगले रोज वह रतन के घर गया तो बच्चे कालेज और रतन अपने औफिस जा चुके थे. चिन्नाम्मा बरामदे में बैठी थी. देव उस के पास जा कर बैठ गया. चिन्नाम्मा ने उस की ओर प्रश्नसूचक नजरों से देखा.

‘‘कैसे आना हुआ. सब ठीक है न?’’

‘‘ठीक तो नहीं है, चिन्नाम्मा. कातिल के बारे में कुछ पता ही नहीं चल रहा.’’

‘‘तो फाइल बंद कर दो. जब हत्यारे का पता नहीं चलता तो पुलिस यही करती है.’’

‘‘मैं तो नहीं करने वाला. यहां कुछ पता नहीं चला तो पुणे जा कर डेरा डाल दूंगा और तब तक वापस नहीं आऊंगा जब तक डा. प्रीति सप्रे की पुरानी जिंदगी की बंद किताब न खोल लूं.’’

‘‘उस से हत्यारे का पता चल जाएगा?’’

‘‘चलना तो चाहिए क्योंकि हत्या की जड़ यानी वजह तो प्रीति के अतीत में ही छिपी है,’’ देव उठ खड़ा हुआ, ‘‘मैं रतनजी को अपने पुणे जाने के बारे में

ही बताने आया था. खैर, आप उन्हें बता देना.’’

‘‘आप का पुणे जाना जरूरी है?’’

‘‘हां, क्योंकि यहां तो कुछ पता नहीं चल रहा.’’

‘‘पुणे जा कर आप को हत्यारे का पता नहीं चल सकता. प्रीति का अतीत जानने पर मामला और भी उलझा जाएगा और इस परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी. आप पुणे मत जाइए.’’

‘‘तो फिर यहीं हत्यारे को पकड़वाने में कुछ मदद कीजिए.’’

‘‘वादा कीजिए कि मैं जो सुबूत दूंगी आप उस की बुनियाद पर मुझे गिरफ्तार कर लेंगे और ज्यादा छानबीन नहीं करेंगे.’’

‘‘मैं ऐसा कोई वादा नहीं कर सकता क्योंकि मुझे तो हत्यारे को सुबूत के साथ पकड़ कर कानून के हवाले करना है.’’

‘‘चोरी के सुबूत मिल जाएंगे जो कत्ल की वजह है, मैं ने जो डौलर चुराए हैं उन्हें जब्त कर के मुझे गिरफ्तार कर लो. कह देना शक की बुनियाद पर तुम ने मेरे कमरे की तलाशी ली और पैसे बरामद किए, बात खत्म.’’

‘‘मैं यहां असली अपराधी पकड़ने आया हूं, किसी दूसरे का अपराध छिपाने में आप की मदद करने नहीं.’’

‘‘हत्या मैं ने की है और मेरे पास उस का सुबूत भी है. वह साड़ी जिसे पहन कर मैं ने गोली चलाई थी. उस पर प्रीति के खून के छींटों के निशान हैं.’’

‘‘यह चोरी वाली बात तो मैं मानने से रहा. चिन्नाम्मा सच बताइए, आप ने हत्या क्यों की?’’

‘‘यह मैं आप को नहीं बता सकती.’’

‘‘तो मैं भी आप को नहीं पकड़ सकता. पुणे जाए बगैर यह गुत्थी नहीं सुलझेगी.’’

‘‘सुलझा सकती है. मैं तुम्हें असली वजह बताने को तैयार हूं पर शर्त यह है कि तुम उसे अपने तक ही सीमित रखोगे. यह खून मैं ने किसी की खुशी के लिए किया है या लालच के लिए, इस से तुम्हारे कानून को क्या फर्क पड़ता है?’’

‘‘यह तो पूरी कहानी सुनने के बाद ही कह सकता हूं.’’

इस के बाद चिन्नाम्मा उठी और देव को ले कर अपने कमरे में चली गई. उस के कमरे में सभी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. देव सोफे पर बैठ गया तो चिन्नाम्मा बताने लगी.

‘‘पहले तो तुम्हें यह बता दूं कि मैं नौकरानी नहीं हूं. मेरे पति सूबेदार थे और मैं भी पढ़ीलिखी हूं. मांजी ने तो मुझे जो मानसम्मान दिया था वह शायद मेरा एहसान समझा कर था लेकिन ऋतिका ने मुझे पहले रोज से ही मां की तरह समझा और मैं ने उसे बेटी की तरह. कई सालों तक तो मैं ने उस से यह कटु सत्य छिपा कर रखा था लेकिन जब व्यापार के बहाने रतन का पुणे जाना बढ़ने लगा और वह बेहद उदास रहने लगा तो मैं ने ऋतिका को रतन, प्रीति और प्रिया के बारे में बताना ही बेहतर समझा.

‘‘यह भी बता दिया कि इस सारे मामले में दोषी मांजी ही थीं, जो रातदिन प्रीति की तारीफ करती थीं, समयअसमय रतन को उसे लाने के लिए भेज देती थीं और अकसर कहा करती थीं कि सोचती हूं तुझे हमेशा के लिए साथ कैसे ले जाऊं? लेकिन जब बच्चों ने शादी करनी चाही तो बिदक गईं कि वे तो प्रीति को बेटी मानती हैं. रतन ने तरकीब सोची कि अगर प्रीति उस के बच्चे की मां बनने वाली हो तो मां को मानना पड़ेगा लेकिन तब मामला और भी बिगड़ गया. मांजी ने प्रीति को बदचलन करार दे कर रतन को उस से मिलने पर भी रोक लगा दी और ऋतिका से रतन की शादी तय कर दी.

‘‘रतन तो घर छोड़ कर चला गया लेकिन प्रीति ने उसे समझा-बुझा कर वापस भेज दिया. कुछ साल तक तो सब ठीक चला लेकिन युवा होती बेटी के भविष्य को ले कर रतन बहुत चिंतित रहता था और उस की हालत देख कर ऋतिका. मुझा से दोनों की वह हालत नहीं देखी गई. मैं ने ऋतिका को सब बताया और सलाह दी कि रतन को खुश देखने का एक ही तरीका है कि वह किसी तरह प्रिया को गोद ले ले.

‘‘ऋतिका ने बहुत सोचने के बाद तरकीब निकाली. उस का भाई अमेरिका में डाक्टर था. उस की सहायता से उस ने प्रीति के अमेरिका जाने की व्यवस्था कर दी और प्रिया को गोद ले लिया. फैसला तो यही था कि प्रीति वापस भारत नहीं आएगी, प्रिया को ही उस से मिलने भेजा जाएगा लेकिन रतन और प्रीति के आभार प्रकट करने से ऋतिका का दिमाग खराब हो गया और उस ने मेरे मना करने के बाद भी प्रीति को यहां बुला लिया.

‘‘मुझे बहुत बुरा लगा और मैं ने अपनी नाराजगी कमरे से न निकल कर दर्शायी. पहले तो ऋतिका ने कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन शाम को वह मेरे कमरे में आ यह बता कर बहुत रोई कि कैसे रतन हमेशा के लिए प्रीति को इसी शहर में रखने की व्यवस्था कर रहा है. मैं ने उसे दिलासा दिया कि वह मुझा पर भरोसा रखे. मेरे जीतेजी उस का अहित कभी नहीं होगा. उस ने जिस उत्साह से मेहमान बुलाए हैं उसी उल्लास से उन का स्वागत करे.

‘‘मैं कुछ देर के बाद प्रीति के कमरे में उसे समझाने के इरादे से गई. वह मुझा से बड़ी गरमजोशी से मिली और पूछने लगी कि वह कैसी लग रही है? मैं ने कहा ठीक लग रही है तो बोली कि उसे ठीक नहीं, बहुत अच्छी लगना है ताकि डा. नायक उसे फौरन नौकरी दे दें.

‘‘मैं ने मौका लपक कर उसे समझाना चाहा कि उस के आने से ऋतिका का कितना अहित होगा तो वह बोली कि जब ऋतिका को असलियत मालूम हो ही चुकी है तो उसे रतन को उस के साथ बांटने में एतराज नहीं होना चाहिए. वह अकेले रहतेरहते बहुत परेशान हो चुकी है और अब एक भरापूरा घर चाहती है.

‘‘मुझे गुस्सा आ गया. मैं ने कहा कि मैं ऐसा कुछ नहीं होने दूंगी. प्रीति ने अवहेलना से पूछा कि मैं क्या करूंगी? मैं ने कहा कुछ भी, तभी मेरी नजर ड्रैसिंग टेबल पर रखे रिवौल्वर व कारतूस पर पड़ी और मैं ने कहा कि मैं उसे गोली मार दूंगी.

प्रीति बगैर जवाब दिए हंस कर खुद को आईने में निहारने लगी. उस ने सोचा होगा कि मुझे तो रिवौल्वर पकड़ना भी नहीं आता होगा. मुझे रिवौल्वर में कारतूस भरते देख कर भी उस ने कुछ नहीं कहा. बस, व्यंग्य से हंसती रही और उस के दूसरी ओर मुड़ते ही मैं ने गोली चला दी और हमेशा के लिए फांस निकाल कर अपने कमरे में लौट आई.

‘‘मेरा खयाल था कि सुबूत के अभाव में पुलिस केस रफादफा कर देगी पर जब मुझे पता चला कि तुम तफतीश कर रहे हो तो मैं डर गई क्योंकि तुम्हारी काबिलीयत के बारे में मैं पहले से जानती थी. तुम ने जब कहा कि तुम पुणे जा रहे हो तो मुझे लगा कि जिस सच्चाई को छिपाने के लिए रतन, प्रीति और ऋतिका ने इतने साल असहनीय पीड़ा सही है वह अब एक चटखारे ले कर सुनाने वाली खबर बन कर फैल जाएगी. बस, मैं ने अपना गुनाह कुबूल करने का फैसला कर लिया.’’

चिन्नाम्मा ने अलमारी की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘इंस्पेक्टर, उस में तुम्हें डौलर और खून के धब्बों वाली साड़ी मिल जाएगी. मुझे चाहे जितनी कड़ी सजा दिलवानी चाहो, दिलवा देना लेकिन इस परिवार की इज्जत बचा लेना.’’

देव चुपचाप सजल नेत्रों से अलमारी की ओर बढ़ गया. Mystery Story In Hindi :

Social Story In Hindi : रामजी का कुत्ता – क्या लड़ाई वाकई कुत्तों की थी ?

Social Story In Hindi : यहां बात इंसानों के बीच लड़ाई की नहीं, कुत्तों के बीच की लड़ाई की थी, लेकिन उन कुत्तों के मालिक तो इंसान थे न. और इंसान कुत्ते की तरह वफादार नहीं होता.

‘‘वह क्या है कि जब युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी संग जीवित ही हिमालय के रास्ते दुनिया से प्रस्थान कर गए तो उन्हें छोड़ बाकी सभी हिमालय की भयानक ठंड से एक-एक कर गल कर मृत्यु को प्राप्त हो गए. एकमात्र धर्मराज युधिष्ठिर ही थे जो हिमालय की चोटी पर स्थित एक विशेष दरवाजे पर पहुंचने में कामयाब हुए थे,’’ रामजी सिंह ने कथा कहते हुए थोड़ी देर सांस ली, फिर अपने कुत्ते शेरू को सहलाया. वह पुलक भरते अगराने और अपनी पूंछ उन की देह से रगड़ने लगा. उस की अगराहट काबिल-ए-तारीफ थी.

रामजी खुद भले मांस-मछली न खाएं मगर शेरू के लिए उस का इंतजाम जरूर करते थे. दरअसल उन के हिमालय वाले बाबा ने जब से उन्हें गुरु मंत्र दिया था, वे शाकाहारी हो गए थे.

उन के चुप होते ही अर्जुन सिंह अधीर होने लगे. उन्हें मिथकों, पुराण कथाओं में अत्यंत रुचि थी और रामजी सिंह ठहरे बनारस के निवासी. उन्हें पुराण कथा न पता होता तो किसे पता होता. ‘‘अब आगे की कथा सुनाइए महाराज,’’ अर्जुन सिंह शेरू को दूर से ही निहारते हुए बोले, ‘‘जब युधिष्ठिर विशेष दरवाजे पर पहुंचे तो अंदर बड़ा सत्कार हुआ होगा?’’

‘‘अरे नहीं महाराज, देवदूत तो उन की अगवानी में खड़ा था लेकिन युधिष्ठिर के साथ तो वह कुत्ता राजधानी हस्तिनापुर से ही साथ चला आ रहा था. देवदूत ने कुत्ते को अंदर नहीं आने दिया. युधिष्ठिर अड़ गए कि वह भी उन के साथ अंदर जाएगा. पत्नी और भाइयों तक ने आखिरकार उन का साथ छोड़ दिया लेकिन इस कुत्ते ने अंत तक उन का साथ दिया है, सो वे उसे ऐसे कैसे छोड़ दें?

‘‘उन की जिद देख कर देवदूत घबरा गया. तभी वह कुत्ता एक देवता में बदल गया. वे बोले कि, ‘हे धीरपुरुष युधिष्ठिर, तुम ने अंत तक धर्म का साथ नहीं छोड़ा, इसलिए तुम महान हो. मैं कुत्ता नहीं, धर्म ही हूं. चलो, मैं तुम्हें स्वर्ग में साथ लिए चलता हूं, तो सम झ गए न अर्जुन बाबू, मेरा शेरू भी मेरे लिए धर्म के समान ही है. इसलिए मैं इस का हमेशा खास खयाल रखता हूं.’’

अर्जुन सिंह गदगद हो गए. वैसे भी, वे रामजी के गजब के फैन हैं, प्रशंसक हैं. आदमी हो तो रामजी जैसा, फिर उन का शेरू तो वाकई में शेर है ही. मजाल कि उस के रहते कालोनी में कोई कुत्ता घुस जाए. अनजान आदमी, भिखारी, कूड़ा बटोरने वाले, ठेले-खोमचे से ले कर फेरी करने वाले उधर का रुख बड़ी ही सावधानी से किया करते थे. शेरू अपनी ऊंची, तीखी आवाज में आसमान-पाताल एक कर दिया करता था. शायद यही कारण रहा हो कि इधर चोरी-चकारी की घटनाएं नहीं घटती थीं. इधर का कुत्ता पुराण सुन-सुन कर सभी आतंकित भी थे. जो कहीं धर लिया उस ने तो मोटी सूइयां भोंकवाते फिरो.

अर्जुन सिंह उन के मातहत हेल्पर ठहरे, सो, शेरू उन्हें पहचानता था और कभी-कभार उन के प्रति भी अपना प्यार प्रदर्शित करता था, जिसे थोड़े भय के साथ वे उसे स्वीकार करते थे. क्या करें, मजबूरी थी. उस्ताद की हां में हां मिलाना उन के कर्तव्यों में शामिल था. ‘नौकरी में नौ काम, दसवां काम हां जी’ उन के पिताश्री ने सफल नौकरी का यह अचूक फार्मूला बहुत पहले ही उन्हें बता दिया था. इसलिए वे हमेशा अपने उस्ताद के हामी रहे. फिर भी, वे यह भी जानते थे कि कुत्ते से दूरी बनाना ही ज्यादा अच्छा, रहीम के शब्दों में, ‘चाटे-काटे श्वान के, दोनों ही स्थितियों में दुर्गति है. सो, इस से बचने में ही भलाई है.’

अर्जुन सिंह सजग श्रोता ही नहीं, कुशल वक्ता भी थे. बस, उस्ताद के सामने थोड़ा बच कर बोलते थे और इस श्वान-पुराण से बचने के लिए वे कबीर की सूक्ति ‘कबीरा कूता राम का मुतिया मेरा नाऊं’ रामजी सिंह को सुनाते. फिर उस का अर्थ बताते कि कबीर तो खुद को राम का कुत्ता ही मानते हैं, जिस का नाम मोती है और यह कुत्ता जंजीर से बंधा हुआ वहीं जाता है जहां राम उसे ले जाते हैं. तात्पर्य यह कि कुत्ता ईश्वर को भी प्रिय है. इस का अर्थ यह है कि ईश्वर हमें जैसे रखे, वैसे ही हमें रहना चाहिए. जो कुछ भी खाने को दे, वही खा लेना चाहिए.

‘‘हम अपने शेरा को कुछ भी खाने को नहीं दे देते, अर्जुन बाबू,’’ राम जी तैश में कहते, ‘‘इस की हर दूसरे दिन की खुराकी में भरपूर मीट-मछली इस को खिलाता हूं. आध किलो दूध तो खास इस के लिए आता है, जो इसे रोटी के साथ मिला कर खाने को देता हूं और इस के रहने का इंतजाम देख लीजिए. एक कोने में इस के लिए कंबल पड़ा है. हां, कभी-कभार मल-मूत्र त्याग कर देता है तो मुश्किल होती है. फिर भी, बिना घिनाए उसे धो देता हूं. आखिर, इस में भी तो जीव है. तो, उस से घिन क्या करना. वैसे भी, यह शरीर तो मलमूत्र से ही भरा पड़ा है. है कि नहीं, अर्जुन भाय?’’

अर्जुन भाय को उन से असहमत होने का कोई कारण नहीं था. मगर उन्हें मालूम था कि चाहे जो हो, अपना बचाव खुद करना ही चाहिए.

अब इत्तफाक की बात रामजी सिंह का बगल वाला क्वार्टर खाली हुआ था, जो रामजी यादव को मिला था. उस से बड़ा इत्तफाक यह कि रामजी यादव के पास भी टाइगर नामक कद्दावर कुत्ता था. ये दोनों कुत्ते पहले अपनी-अपनी जंजीरों से जकड़े मौखिक ही वाकयुद्ध करते थे. उन के वाकयुद्ध से पूरी कालोनी परेशान थी. दूसरे, सुबह-सुबह ही ये दोनों कहीं भी, कभी भी मल-मूत्र विसर्जन कर आते थे. मूत्र तो मूत्र है, पानी है. चलो, कोई बात नहीं. मगर मल से मुश्किल तो आती ही है.

कंपनी का स्वीपर कहता, ‘हम स्वीपर हैं, डोम नहीं, जो मल-मूत्र उठाते फिरें.’ सो यह सफाई भी प्रकृति के हवा-पानी के भरोसे होती थी. मगर किसी को यह कहने का साहस नहीं था कि वे लोग श्वान शौचालय की व्यवस्था क्यों नहीं करते या इस श्वान वाकयुद्ध को बंद क्यों नहीं कराते. रामजी सिंह वर्कर्स यूनियन के धाकड़ नेता थे तो रामजी यादव भी प्रतिद्वंद्वी यूनियन मजदूर संघ के पुराने नेता थे.

कुत्तों का यह वाकयुद्ध बंद तब होता जब उन में से कोई एक घर के अंदर या पिछवाड़े कहीं दुबक न जाए.

समय का कालचक्र चलना ही है, सो चलता ही रहता है. अब दोनों कुत्ते भी सम झ गए थे कि शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के साथ, सामने वाले को  झेलने में ही भलाई है. सो, यह भूंकना-भौंकना काफी कम हो गया था. अलबत्ता, कभी-कभार जीभ की खुजली मिटाने के लिए भौंक युद्ध चल ही जाता था. आमतौर पर देखा तो यही गया कि अपने मालिक के सामने आते ही वह बिलकुल बाघ-शेर बन कर गुर्राते थे. जैसे कि रामजी सिंह के रहते शेरू ‘शेर’ होता था तो रामजी यादव के साथ बाहर होते ही टाइगर ‘बाघ’ हो जाता था. वरना, वे आमतौर पर कुत्ते ही बने रहते थे.

रामजी यादव बक्सर के थे और बनारस के रामजी सिंह. भले ही प्रतिद्वंद्वी यूनियन के हों, दोनों में पहले काफी याराना था. आमतौर पर मैनेजमैंट से लड़ाई के दौरान दोनों को एक होना ही होता था. अब मैनेजमेंट तो मैनेजमेंट ठहरा, सारे मजदूरों-कार्मिकों की मांगों को मानने का मतलब था कि कारखाने का बंटाधार हो जाना. सो, यह अलिखित सम झौता था कि सभी की मांगों के बजाय नेता श्री की मांग मान ली जाए और यही कारण था कि जो सुविधाएं डायरेक्टर स्तर पर मिलतीं वे उन्हें भी मिल जाती थीं.

जैसे, उन के क्वार्टरों के आगे पक्का चबूतरा बना देना, दिवाली में उन के क्वार्टरों की पुताई करवा देना आदि. बिजली-पानी के मिस्त्रियों को विशेष हिदायत थी कि भले ही प्रबंधन स्तर के लोगों का काम अधूरा ही क्यों न रह जाए, नेताओं के घरों के मेंटेनेंस वर्क पहले पूरे किए जाएं. अघोषित रूप से उन्हें ओवरटाइम भी अच्छा मिल जाता था. तर्क तो उन का जोरदार था ही कि महंगाई बहुत बढ़ गई है और आदमी तो खैर दाल-रोटी खा भी ले मगर बेचारे कुत्ते मछली-मांस के बिना कैसे रह सकते हैं?

ठेकेदार भी कोई कम नहीं होते. वे यूनियन नेताओं की महिमा जानते हैं. सो, वे गाहे-बगाहे मीट-मछली से ले कर बोतल-सोतल तक की सप्लाई कर दिया करते थे, क्योंकि यह कोई छिपी बात नहीं कि ठेकेदारी लेने या हथियाने में उन नेता जी की भी प्रमुख भूमिका रहती थी.

वैसे तो सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था, दोनों घरों में काफी पहले से ही काफी याराना व आना-जाना भी था मगर जब से ये दोनों बगलगीर हुए, मुश्किल आन पड़ी थी. नहीं-नहीं, कोई पार्टी, दल अथवा विचारधारा वगैरह की वजह से ईर्ष्या द्वेष या प्रतिस्पर्धा नहीं थी. बात दरअसल, इसी स्वर्गारोहण कर चुके कुत्ते की थी.

अब शेरा और टाइगर भी तो बगलगीर थे. पहले तो अपनी-अपनी जंजीरों से बंधे भूंकते और एक-दूसरे को ललकारते थे. शेरा का यहां एकछत्र राज था, जिसे टाइगर लगातार चुनौती दे रहा था और वे दोनों अपने प्रतिद्वंद्वी को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे. संयोगवश वह मौका मिल ही गया था जब दोनों ही अपने-अपने बाड़े में जंजीर से मुक्त हो घूम रहे थे. तभी एक कुतिया कहीं से आ गई और उधर से निकलने लगी तो शेरा ने अपनी आदत के वशीभूत ऊंची आवाज में भौंकना शुरू कर दिया. वह क्वार्टर के बाड़े के एक कमजोर हिस्से को तोड़ बाहर फलांग गया, जो अब तक उस के लिए चीन की दीवार बना हुआ था.

अब एक कुत्ता चिल्लाए तो दूसरा कुत्ता चुप कैसे रहे? सो, टाइगर भी अपनी पूरी ताकत से भौंक लगाने लगा और अपने बाड़े के कमजोर हिस्से की ओर बढ़ चला. एक हलके धक्के से वह टूटा तो वह भी बाहर निकल आया.

वह कुतिया तो तब तक खतरा भांप अपनी पूरी ताकत से दौड़ लगाती कहीं और खिसक चुकी थी. मगर अब सामने शेरा और टाइगर थे. दोनों ने पहले गरमागरम भौंक में अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया. मगर मामला इतनी जल्दी निपट कैसे जाए, दोनों ही एक-दूसरे पर टूट पड़े.

संयोगवश बच्चे स्कूलों में थे. रामजी सिंह और रामजी यादव दोनों ही सुबह की पालियों में कारखाने में थे. उन की पत्नियां घरेलू कामों में मसरूफ थीं. सो, इस मल्ल-युद्ध को छुड़ाने वाला कोई नहीं था. लेकिन मोहल्ले में तमाशबीनों की कमी भी नहीं थी. टाइगर और शेरा के इस खूनी खेल को वे पूरे आनंद के साथ देखने में मशगूल थे. बल्कि कुछ तो ललकारने में भी लगे थे. मोहल्ले में ऐसी घटनाएं कम ही घटती थीं. मगर जब घटती थीं तो सभी के खून में गर्मी आती थी.

लिहाजा, इस निशुल्क तमाशे को कोई क्यों न देखे. यहां शेरा मजबूत है कि टाइगर, इस का फैसला हो ही जाने वाला था. जिस का कुत्ता जीते, वही मजबूत है. बाकी तो जबानी जमा-खर्च है. दोनों पड़ोसी अपने-अपने कुत्ते की जो प्रशंसा नहीं करते अघाते, उस का फैसला हो ही जाए तो रार कटे.

लगभग आधे घंटे की इस खूनी लड़ाई में दोनों ही कुत्ते लहूलुहान हो चुके थे. मगर पीछे हटने को कोई तैयार न था. अचानक रामजी सिंह की पत्नी घर का कूड़ा फेंकने बाहर आईं तो इस लड़ाई को देख उन का कलेजा मुँह को आ गया.

उन्होंने पहले रामजी यादव की पत्नी को हांक लगाई. फिर घर के कोने में पड़ी लाठी निकाल उन दोनों कुत्तों को अलग करने में लग गईं. शेरा अपनी मालकिन को देख और शेर हो गया और दूने जोश में टाइगर पर पिल पड़ा लेकिन टाइगर भी कम नहीं था. अचानक उस की गिरफ्त में शेरा की गर्दन आ गई थी, जिसे पकड़ कर वह उसे भंभोड़ने लगा था. शेरा की मालकिन ने आव देखा न ताव, टाइगर पर तान कर लाठी चलाई तो शेरा की जान में जान आई और वह अपने घर की ओर भागा.

टाइगर अपने दुश्मन को यों हाथ से निकलते देख गुस्से में आ गया और शेरा की मालकिन पर ही  झपट्टा मार बैठा. वह तो गनीमत थी कि तब तक पड़ोसी नजदीक आ चुके थे, जिन्होंने ढेले-पत्थर फेंकने शुरू कर दिए. वे भी गिरते-पड़ते अपने घर की ओर भागी. मगर इस चक्कर में उन की साड़ी फट चुकी थी. पिछले ही सावन में उन्होंने यह साड़ी पूरे हजार रुपए में खरीदी थी, जो उन्हें बहुत ही प्रिय थी और वह भागने के क्रम में फट-चिट चुकी थी.

तब तक टाइगर की मालकिन भी बाहर आ चुकी थीं और उन्होंने मैदान में आ कर टाइगर को हांक लगा घर के अंदर किया. हालांकि, अब टाइगर भी घर जाने के ही मूड में था. वह भी इस द्वंद्वयुद्ध में अनेक घाव खा चुका था और लहूलुहान था, तथापि विजेता की मुद्रा में था.

जैसा कि ऐसे समय में जो स्थिति भारतीय जनता के बीच बनती है, वही हुआ. मोहल्ले के लोग दो गुटों में बंट चुके थे. कोई टाइगर को तो कोई शेरा को भला-बुरा कहता. मगर एक बात तो तय है कि हम विजेता के प्रति प्रशंसित और पराजित के प्रति सहानुभूति रखते हैं. सो, भरे कलश की भांति यही भाव छलक-छलक कर बाहर आ रहा था. रामजी सिंह अपने कुत्ते शेरा के संबंध में बड़का-बड़का बोल बोलता था. कुछ शिकायत करो तो हंस कर टाल जाता और मन ही मन पुलकता था. आखिरकार, आज पता चल ही गया कि उस का यह कुत्ता शेर नहीं, सियार है. देखे नहीं, कैसे अपने पिछवाड़े पूंछ दबाए भाग रहा था.

शाम को जब रामजी सिंह आए तो अपने कुत्ते की दुर्दशा देख उन का कलेजा मुँह को आ गया. उन का बस चलता तो अभी के अभी रामजी यादव के घर में घुस कर उस कुत्ते की जान ले लेते. मगर रामजी यादव भी तो ड्यूटी से वापस लौट चुके थे. ऐसे में ऐसा कर पाना जोखिम मोल लेना होता. समय-समय की बात है. बच्चू टाइगर भाग कर जाएगा कहां? अभी तो बस शेरू को मरहम-पट्टी की जरूरत है. पहली बार उन्हें अफसोस हुआ कि कारखानेदार ने कालोनी में इंसानों का अस्पताल बनाया, मगर मवेशी अस्पताल की जरूरत नहीं सम झी. वे इस मामले को अपनी यूनियन के माध्यम से ऊपर तक पहुंचाएंगे.

मगर यह तो बाद की बात ठहरी. फिलहाल तो उन्हें मवेशी अस्पताल जाना होगा, जो कसबे से दूर शहर में है और इसलिए शेरा को रिक्शे में बिठा एक वेटनरी डॉक्टर के पास ले गए जिन्होंने उस की मरहम-पट्टी की, दवाएं दीं. इस चक्कर में उन के 3 हजार रुपए खर्च हो गए. चलो, इस खर्च की तो कोई बात नहीं. पैसा हाथ का मैल है, जिस की भरपाई वे ओवरटाइम से पूरी कर लेंगे. मगर इस टाइगर का तो इंतजाम करना ही होगा. कमबख्त ने उन के शेरू से तो नोंचाखसोटी की ही, उन की पत्नी पर भी  झपट्टा मारा, जिस से उस की साड़ी तार-तार हो गई थी. इस का बदला तो लेना ही है.

सब से दुखद बात तो यह कि इस घटना के बाद अब शेरा वाकई टाइगर से डरने लगा था. पहले की तरह भौंकता नहीं था, बल्कि कभी-कभार भौंक भर लेता था और यदि कहीं उस ने टाइगर को देख लिया तो उस की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी. अपनी पूंछ पिछवाड़े में सटा लेता था और यह रामजी सिंह को गवारा नहीं था. मजाल कि मोहल्ले में कोई उन की बात काट दे. राजनीति में वे अच्छी दखल रखते थे. सूबे के बड़े नेताओं के साथ उन की जान-पहचान थी और सभी राजनीतिक दलों की पोलपट्टी का इतिहास उन की जबान पर था. इसी कारण प्रबंधक भी उन की बातों के कायल थे. निंदकों का तो यहां तक कहना था कि वे सारी रिपोर्ट वहां तक बिना नागा पहुंचाते हैं. पहले तो वे औफिस में बेधड़क जा वहां घंटों बैठते थे.

मोबाइल के आने से यह और आसान हुआ था. बल्कि रील व मीम वगैरह भी वायरल होने के पहले प्रबंधक श्री के पास उन के सौजन्य से पहुंच जाते थे. मैनेजमेंट के इस सूत्र ‘इन्फौर्मेशन इज मनी एंड मनी इज पावर’ का वे पूरी तरह पालन करते थे. कारखाने में वे औरों पर, अब तो इस के लिए और भी, अपने सहकर्मियों पर अपनी बतकुच्चन से भारी पड़ते थे. सभी का बायोडाटा उन की जबान पर होता था. कारखाने में कमजोर वही होता है जो अपने घर में भी कमजोर है. रामजी सिंह यादव दूसरे मामलों में लाख भारी-भरकम हों, अपनी पत्नी से हर मामले में हलके थे. यही कमजोरी उन के मजाक का सबब भी थी.

रामजी सिंह इस बात को जानते थे. मगर बात यहां कुत्ते की थी और दुनिया देख चुकी थी कि उन का कुत्ता कितना कमजोर है, क्योंकि टाइगर अब कभी-कभार अपने बाड़े के बाहर भी घूम लेता था. ऐसे में रामजी सिंह जैसे ही उसे अकेले देखते, उसे लाठी ले दौड़ा लेते. टाइगर जानता था कि कुत्ते से लड़ना तो फिर भी ठीक है, मगर आदमी से लड़ना जानवरों को हमेशा महंगा पड़ा है.

आदमी ने जब हिंसक जीवों को अपने इशारे पर नचा लिया, हाथी जैसे भारी-भरकम जीव की सवारी कर ली तो उस की क्या औकात है. सो, वह उन्हें देखते ही घर में दुबक जाता. जो बाहर होता तो बाहर ही भाग छूटता. चाहे कुत्ता ही क्यों न हो, आखिर जान सब को प्यारी होती है. मोहल्ले वाले देखते कि रामजी सिंह लाठी लिए उस के पीछे भागे जा रहे हैं और टाइगर जो है, अपनी जान बचाने के लिए मोहल्लों में इधर-उधर भागता फिर रहा है. इस बात पर दोनों घरों में नोंक झोंक भी हुई. मगर बात दब कर मोहल्ले में कानफुसकियों तक ही सिमट कर रह गई.

चूहे-बिल्ली के इस खेल का आखिरकार अंत होना ही था, सो हुआ. महीना बीतते टाइगर जो गायब हुआ, सो गायब ही हो गया. टाइगर फिर रामजी यादव के दरवाजे नहीं लौटा. उन्होंने कई जगह खोज की. लोगों से पूछताछ के अलावा आसपास के जंगलों में खोज की. मगर उसे नहीं मिलना था, नहीं मिला. मगर अब रामजी सिंह का शेरा अपनी पुरानी लय में आने लगा था. अब वह भौंकता नहीं था, बल्कि पुराने तेवर के साथ भौंकता था. इसे सुन कर रामजी यादव का परिवार कुढ़ता और रामजी सिंह को परोक्ष रूप से कोसता था कि उन्होंने उस के धर्म के प्रतीक प्रिय कुत्ते को भगा दिया. मगर सामने बोलने की कूवत न थी. कोई सबूत वगैरह भी तो नहीं था. वैसे भी, जाने वाला तो चला गया, अब उस के लिए महल्ले में लड़ाई रखने से क्या फायदा.

फिर भी शेरा की भौंक उन्हें शूल की तरह चुभती तो थी ही. अब शेरा खुलेआम सड़क पर निर्द्वंद्व हो घूमता और हर आने-जाने वाले को खदेड़ देने के पुराने खेल में फिर शामिल था. मजाल कि उस के रहते कोई दूसरा कुत्ता उस इलाके में चला आए. रामजी सिंह उस के साथ खेलते-दुलराते और भांति-भांति के वेज-नॉनवेज भोज्य पदार्थ का भोग लगाते, जिस से रामजी यादव की कुढ़न स्वाभाविक थी.

और, ऐसे ही एक दिन पता चला कि शेरा भी गायब है. रामजी सिंह की आंखों से तो नींद ही उड़ गई. कितना अच्छा, कितना प्यारा कुत्ता था, उन की एक आवाज पर दौड़ा चला आता और अगरातेदुलराते उन के शरीर पर ही लहालोट हो जाता था. वे उसे स्पैशल साबुन से नहलाते थे और उस के बालों के जुएं तथा कानों में टंग चुके कीड़ों तक को अपने हाथों से चुन कर निकालते थे. कहां मिलेगा ऐसा कुत्ता. अब उसे खोजने की बारी रामजी सिंह की थी. पागल-विक्षिप्तों की तरह ‘शेराशेरा’ की आवाज देते पूरे कस्बे में ही नहीं, निकटवर्ती जंगलों में भी वे घूम आए. मगर वह उन्हें नहीं मिला.

लोग उन्हें देखते और मन ही मन हंसते थे, हालांकि, प्रत्यक्षतः तो यही कहते कि उन के साथ बुरा हुआ. कितना दमदार, तेज-तर्रार ही नहीं, लहीम-शहीम कुत्ता था. सारे अवांछित और असामाजिक तत्त्व मोहल्ले से दूर ही रहते थे और तब वे अपनी आशंकाओं की पोटली खोल देते कि किन बुरे लोगों ने उन के शेरा को गायब किया हो सकता है. उन की आशंकाओं में उसे जहर देने या मरवा डालने की भी आशंका होती. मगर कोई सुराग, कोई सबूत उन के पास तो था नहीं, जो खुद खुलेआम मैदान में आ उतरते.

उन के प्रबंधक श्री ने उन के विलाप को सुन कर एक दिन कह दिया कि वे थाने में कुत्ते के खो जाने की एफआईआर दर्ज क्यों नहीं करा देते. विगत वर्ष ही फलां शहर के एक व्यापारी ने अपनी बेटी के प्यारे कुत्ते की गुमशुदगी की एफआईआर दर्ज कराई थी तो पुलिस ने उन के कुत्ते को ढूंढ निकाला था. इसी प्रकार एक प्रदेश के मंत्री ने अपनी भैंस के गुम होने की रपट दर्ज कराई तो पुलिस ने वह काम तत्परता से पूर्ण किया था. रामजी सिंह अपने बारे में जानते थे कि वे न करोड़पति हैं, न सत्तासीन हैं. सो, शिकायत दर्ज कराने पर भी कोई उन की नहीं सुनने वाला. सो, एक कुत्ते के खो जाने की रपट लिखाना उन्हें गवारा नहीं था.

फिर भी डियर ही नहीं, डियरेस्ट था वह कुत्ता. मन में एक हूक रह-रह कर उठती ही थी. दुखी आदमी को देख तरस तो आता ही है. यदि आप ने कहीं शेरा को देखा हो तो उस का पता उन्हें जरूर बता देना.

एक इंसान का भला हो जाएगा. Social Story In Hindi :

Emotional Life Story : उस दिन बहुत कुछ टूटा था – नीना से क्यों रूठ जाती थी खुशियां ?

Emotional Life Story : आशुतोष के आने से नीना की आंखों में सपने तैरने लगे थे. खुशियां फिर दिल पर दस्तक देने लगी थीं लेकिन अचानक एक बार फिर सबकुछ बिखर कर रह गया.

हमेशा की तरह आज का कार्यक्रम भी बहुत अच्छा रहा था. सभी मेंबर्स ने बहुत बढ़िया गाने गाए. 2 गेस्ट सिंगर भी थे आज. उन्होंने भी बहुत बढ़िया गाया. फिर आपस में गप्पे मारते हुए विभिन्न विषयों पर बातचीत के साथ ही अगले महीने के कार्यक्रम की रूपरेखा भी बन गई.

साढ़े 10 बजे तक आभा और कीर्ति डिनर कर के चली गईं. उस के कुछ ही समय बाद मनोज जी भी नूतन और वर्मा जी के साथ चले गए. जब सभी लोग डिनर कर चुके थे तब नीना ने बिल चेक कर के मैनेजर को पैसे दिए. म्यूजिक सिस्टम वाले का हिसाब किया और अंत में 11 बजे के लगभग वह भी राजेश के साथ होटल के रूफटॉप से नीचे आ गई.

पहले उस का बेटा उसे लेने आता था लेकिन जब से शादी कर के वह हैदराबाद में सैटल हो गया है, तब से राजेश या ग्रुप का कोई अन्य मेंबर उसे रात में घर तक पहुंचा देता है. बेटा तो उस के पीछे पड़ा है कि हैदराबाद आ जाओ लेकिन अभी उस की 5 साल की नौकरी बाकी है. और फिर, वह यह ग्रुप कैसे छोड़ दे. संगीत तो उस की सांसों में बसता है. वह शास्त्रीय संगीत गायिका तो नहीं है लेकिन गाना उस का शौक तो है. इसी शौक के चलते चौबीस लोगों का यह ग्रुप परिवार सा बन गया है.

राजेश ने उसे घर तक ड्रॉप किया और जब तक वह दरवाजा खोल कर अंदर नहीं चली गई तब तक वहीं खड़ा रहा. नीना ने अंदर जा कर दरवाजा लाक कर लिया और गुनगुनाने लगी. पर्स टेबल पर रख वह रूम में आई और हाथ-मुंह धो कर कपड़े बदले. होंठों पर अभी भी गाने मचल रहे थे.

आज तो एक से बढ़ कर एक रूमानी और मस्ती-भरे गाने गाए थे सभी ने. किचन में जा कर वह अपने लिए एक कप कॉफी बना लाई. कल रविवार था, इसलिए वह निश्चिंत थी. कप ले कर वह पलंग पर बैठ गई. अब तक बाकी लोग भी घर पहुंच गए होंगे. व्हाट्सऐप पर गाने सुहाने समूह पर आज के कार्यक्रम पर किस ने क्या प्रतिक्रिया दी है, देखने के लिए उस ने मोबाइल उठाया. व्हाट्सऐप खोलते ही सब से पहले किसी अनजान नंबर से ‘‘हैलो कैसी हो?’’ का मैसेज दिखा. नंबर कुछ जाना-पहचाना सा लगा. नीना ने चैट खोली.

‘‘हैलो कैसी हो? आफ्टर अ लॉन्ग टाइम… आशुतोष हियर. कल 10 बजे ब्रेकफास्ट पर मिलते हैं, तुम्हारे घर पर. अरे हां, मुख्य बात तो भूल ही गया, तुम ने दोनों गाने बहुत बढ़िया गाए. तुम्हारी आवाज और भी स्वीट हो गई है. यू संग वेरी मेलोडियसली.

‘‘मिलते हैं कल सुबह 10 बजे. गुड नाइट.’’

नीना के दिल की धड़कन बढ़ गई. हाथ में पकड़ा कप थरथरा गया. 5 बरस बाद, पूरे 5 बरस बाद, आज अचानक यों जीवन में फिर दस्तक देना.

लेकिन क्यों?

बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला था उस ने. कितने जतन से खुद को वापस सहज, सामान्य बना पाई थी. खुद के प्रति कितना कठोर हो कर उस ने आशुतोष को अपने दिल-दिमाग से निकाला था. सालों तक हर बार म्यूजिक इवेंट से पहले और बाद में घर आ कर वह रात-भर रोती रहती थी. कितनी बार मन करता था कि गाना-वाना सब छोड़ दे लेकिन बच्चों ने नहीं छोड़ने दिया, ‘नहीं मां, गाना ही तो तुम्हारा पैशन है, इसे कभी मत छोड़ना.’

उस ने जैसे-तैसे खुद को राग-रागिनी में डुबो कर उस दर्द से बाहर निकाला. बेटा-बेटी दोनों कच्ची उम्र के ही थे जब पति नितिन की असामयिक मृत्यु से वह टूट गई थी. बच्चों की खातिर उस ने खुद को संभाला और नौकरी व बच्चों के सहारे जीवन आगे बढ़ने लगा.

जब बच्चे कालेज में चले गए तब तक वह भी स्थिर हो चुकी थी. उसे शुरू से ही गाने का शौक रहा था. एक परिचित की बेटी के विवाह में संगीत के आयोजन में उस ने भी दो-तीन गाने गाए. वहीं आशुतोष से उस की पहचान हुई थी. आशुतोष ने भी 2 गाने गाए और दोनों ही एक-दूसरे के गानों के कायल हो गए. आशुतोष फौज में कर्नल थे जो तब रिटायरमेंट ले चुके थे. उन की पत्नी गुजर चुकी थी और 2 बेटे इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे. वे शहर के बहुत से सिंगिंग ग्रुप से जुड़े हुए थे और शौकिया गाते थे.

नीना के गाने से वे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उसे भी गाने के लिए आमंत्रित किया. नीना तो बस घर या स्कूल के वार्षिकोत्सव में ही या परिचितों के खास आयोजनों में ही गाती थी. मगर घर में बच्चों से बात करने पर उन्होंने उसे बहुत प्रोत्साहित किया गाने के लिए. तब एक शाम वह भी आशुतोष के साथ एक ग्रुप में गाना गाने गई. उसे बहुत अजीब और डर लग रहा था, पता नहीं कैसा समूह होगा, कौन लोग होंगे, कैसी जगह होगी.

वह बेटे-बेटी दोनों को साथ ले कर गई. मन अंदर से बहुत घबरा रहा था लेकिन शहर के एक अच्छे होटल के हॉल में संगीत संध्या थी. हर आयु के सदस्य थे. एक बुजुर्ग पति-पत्नी थे, कुछ मध्य वय के तो कुछ युवा. सब भिन्नभिन्न परिवेश के थे जो गाने की रुचि होने के कारण माह में एक बार इकट्ठा होते, गाने गाते, संगीत का आनंद लेते, साथ में डिनर करते और फिर विदा ले कर अपने-अपने घर चले जाते.

उस श्याम नीना के गाने को खूब सराहना मिली. उसे लगा वह एक बड़े से परिवार का हिस्सा बन गई है. सालों बाद उस के जीवन की कोई शाम इतनी सुरीली बीती थी. फिर तो वह हर महीने के आखिरी शनिवार का बेसब्री से इंतजार करने लगी थी. पहले वह सोलो गाती थी, फिर आशुतोष के कहने पर उस ने उन के साथ एक डुएट गाया जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया. अब तो हर बार आशुतोष के साथ वह एक डुएट गाने लगी.

गाना चुनना, फिर आशुतोष के साथ गाने की प्रैक्टिस करना, कभी किसी दूसरे समूह में भी गाना. आशुतोष के साथ नजदीकियां एक मर्यादा के भीतर बढ़ने लगी थीं. बरसों बाद पुरुष का सानिध्य पा कर वह अनजाने ही भीतर से आश्वस्त व खुश रहने लगी थी. गाने के अलावा भी घर पर लंच या डिनर, घर का कोई काम या छोटी-मोटी शॉपिंग में आशुतोष का साथ रहने लगा. बच्चे भी उस से काफी घुलमिल गए थे.

दो-तीन साल बाद उन्हें लगने लगा कि उन का अपना एक समूह होना चाहिए जहां वे अपनी इच्छा से गाने गा सकें. आशुतोष के दोनों बेटे तब तक विदेश में बस चुके थे और वे पारिवारिक जिम्मेदारियों से पूर्णतया मुक्त थे. तभी 8 सदस्यों के साथ उन्होंने अपने स्वयं के संगीत समूह ‘गाने सुहाने’ की स्थापना की. बैनर पर आशुतोष के साथ अपना भी नाम देख कर नीना के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे खुशी के मारे.

बहुत जल्दी ही समूह में 22-25 स्थायी सदस्य हो गए. मिल कर किसी न किसी सदस्य के घर रिहर्सल करना, गानों का चयन करना, कार्यक्रम के लिए होटल का हौल बुक करना. एक बड़ा सा परिवार बन गया था जिस ने नितिन के जाने के बाद जीवन में बने बड़े से रिक्त स्थान को अनायास ही भर दिया था और मन के रिक्त स्थान में कब आशुतोष ने अपनी जगह बना ली, वह तो नीना के मन को भी पता न चला.

बस, इतना सम झ पाती थी वह कि उसे इंतजार रहता था उस का, कपड़ों के रंग थोड़े ब्राइट होने लगे थे, होंठों पर हल्की लिपस्टिक लग जाती. जिस दिन आशुतोष से मुलाकात न होती थी वह दिन खाली सा लगता. बिन कहे ही दोनों सम झने लगे थे एक-दूसरे के मन की बात.

बेटों के बहुत बुलाने पर भी आशुतोष का विदेश जा कर उन के पास न रहना. देर-रात उसे ऑनलाइन देख तुरंत टोक देना, ‘अब तक जाग रही हो? जल्दी से सो जाओ, सुबह स्कूल जाना है न’ और मैसेज पढ़ते ही नीना का  झटपट सो जाना.

कॉफी कब की ठंडी हो चुकी थी. नीना ने एक घूंट में कॉफी पी कर कप साइड स्टूल पर रख दिया. लाइट बंद कर वह पलंग पर लेट गई. नींद तो आंखों से कोसों दूर थी. बस, मन में बीती स्मृतियों का मेला लग गया था. हवा के  झोंकों की तरह स्मृतियां आ कर उसे छूती जा रही थीं.

स्मृतियां आशुतोष के साथ रोमांटिक डुएट गाने की, स्मृतियां उस के साथ बाजार में घूमते हुए पानी-पूरी खाने की, नए-पुराने फिल्मी गानों की धुन व लिरिक्स पर घंटे बातें करने की. नीना करवटें बदलती रही. सब-कुछ ठीक चल रहा था. जीवन एक बार फिर पवन के वसंती  झोंके सामान खुशनुमा होने लगा था. आंखों में आंसुओं की नमी के स्थान पर भविष्य के सुनहरे सपने तैरने लगे थे. अक्सर रात में आशुतोष की पसंद का खाना बनता और रविवार को ब्रेकफास्ट में उस की पसंद का वह ध्यान रखती.

फिर अचानक न जाने क्या हुआ, आशुतोष कुछ उखड़ा सा रहने लगा. अकसर उस पर  झल्ला जाता. मिलना-जुलना कम कर दिया, यहां तक की डुएट भी किसी और के साथ गाता. उस के साथ रिहर्सल करना भी बंद कर दिया. एकदम ही दूरी बना ली उस ने. नीना का मन आहत होता था. कितनी बार आशुतोष से पूछा, आखिर उस की गलती तो बता दे मगर वह कभी जवाब न देता.

कार्यक्रम वाले दिन भी पूरा समय दूसरों से बातें करता रहता, उस की ओर देखता भी न था. और फिर, 5 बरस पहले जाने किस बात पर राजेश से उल झ पड़ा और बात को इतना आगे बढ़ा दिया कि समूह छोड़ कर ही चला गया. मामूली बात पर इतना हंगामा कर दिया.

25 लोगों से भरे हौल में उस दिन होटल के वेटर व दूसरे कर्मचारी भी आ गए थे. राजेश के बाद नीना पर भी चिल्लाते हुए उस ने समूह छोड़ दिया था. संगीत के जिस छोटे से समूह की स्थापना मधुर गीतों का आनंद लेने के लिए हुई थी उस का अंत आशुतोष ने इतने कर्कश रूप में कर दिया. आशुतोष की पहचान से जिन लोगों ने समूह जॉइन किया था वे भी उस के साथ ही चले गए.

उस दिन सिर्फ समूह ही नहीं, बहुत-कुछ टूट गया था. वे सपने जो नीना के दिल से हो कर अब आंखों से  झांकने को मचलने लगे थे, वे सपने जो नितिन के जाने से मुर झा गए थे, बरसों बाद आशुतोष का साथ पा कर फिर अंकुराने लगे थे. टूट गई थी वह डोर जो किसी को अपने साथ बांध लेने को आतुर होने लगी थी. टूट गया था वह घरौंदा जो किसी के साथ की कल्पना में द्वार खोल प्रतीक्षारत था.

खिड़की में पूरब की तरफ हल्का सा उजास दिखाई देने लगा था. पेड़ों पर चिड़ियाँ चहचहाने लगी थीं. सारी रात जगते ही कट गई. नीना ने हाथ-मुंह धो कर अपने लिए चाय बनाई. एक मन कर रहा था, जब वह 5 बरस तक भुलाए बैठा था, न फोन उठाता था न मैसेज के जवाब देता था तो वह भी क्यों मिले उस से. चली जाए ताला लगा कर. दूसरा मन कहता, नहीं, वह क्यों अपना घर छोड़े, जैसे सामान्य परिचित आते हैं, मिलते हैं वैसे ही मिलेगी वह उस से.

खुद को भरसक संयत करने का प्रयत्न किया उस ने. देर तक शावर के नीचे नहा कर मन शांत किया. पौने 10 बजे तक आलू-परांठे, ढोकले, पुदीना डाला हुआ वेज रायता, जो आशुतोष को बेहद पसंद था, तैयार कर लिया उस ने. समय के पाबंद फौजी ने ठीक 10 बजे बेल बजाई. धड़कते दिल से नीना ने दरवाजा खोला.

पांच बरस बाद मुस्कुराता आशुतोष सामने खड़ा था. उसी चिरपरिचित मुसकान के साथ मानो कुछ हुआ ही न हो. कनपटियों पर सफेदी बढ़ गई थी, उम्र की परिपक्वता की लकीरें आंखों के किनारों पर  झलक रही थीं. नीना कुछ भी न कह सकी. बस, उस के सामने वाले सोफे पर बैठ गई.

आशुतोष ने एक बड़ा सा लिफाफा उसे देते हुए कहा, ‘‘कुछ कहने से पहले इसे पढ़ लो, नीना.’’

‘‘यह क्या है?’’ कहते हुए नीना ने लिफाफे से कागज निकाले.

‘‘मेरा तुम से दूर होने का कारण है,’’ आशुतोष ने कहा.

‘‘आशुतोष, तुम्हें…’’ नीना ने भरे गले से कहा.

‘‘हां, जिसे मैं हाइपर एसिडिटी और एसिड रिफ्लैक्स सम झ कर टाल रहा था, असल में वह डक्ट का कैंसर था. जब पता चला तब काफी बढ़ चुका था,’’ आशुतोष फीकी हंसी हंसते हुए बोला.

‘‘और तुम ने मु झे बताया भी नहीं?’’ नीना की आवाज में दर्द उभर आया.

‘‘मैं तुम्हें दुख नहीं देना चाहता था. नितिन के जाने से तुम यों भी टूटी हुई थीं. इस बात को तुम सह नहीं पातीं, इसलिए  झगड़ा कर के चला गया ताकि तुम मु झे बुरा सम झ कर भुला दो,’’ आशुतोष ने कहा, ‘‘क्योंकि यहां पर सभी डॉक्टरों ने कह दिया था कि मेरे पास ज्यादा समय नहीं है. सो, इस के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं रह गया था.’’

‘‘ओह आशुतोष, तुम इतना दर्द अकेले सहते रहे इतने साल और मु झे खबर तक नहीं की. इतना पराया कर दिया मुझे,’’ नीना की आंखों से आंसू बहने लगे, ‘‘तुम थे कहां अब तक?’’

‘‘मैं बड़े बेटे के पास अमेरिका चला गया था. वहां इलाज शुरू किया. संभावना कम थी लेकिन मैं, बस, तुम्हारे लिए एक बार ठीक होना चाहता था. मैं तुम्हारे लिए जीना, वापस आना चाहता था और देश के दुश्मनों की तरह मैं ने इस दुश्मन को भी आखिर हरा ही दिया. कल सुबह इसी होटल में ठहरा वापस आ कर. शाम को तुम्हारा गाना सुना बाहर लौबी में बैठ कर. जाने क्यों दिल ने कहा, तुम मु झे भूली नहीं हो अब तक.’’ आशुतोष की आंखों में

5 बरस पहले वाला प्यार लहरा रहा था.

‘‘मैं बता नहीं सकती कि मैं कितनी खुश हूं तुम्हें वापस पा कर. कितनी अकेली हो गई थी मैं,’’ नीना ने उस के हाथ थाम कर कहा.

‘‘मगर एक परेशानी है,’’ अचानक आशुतोष बोला.

‘‘अब क्या हुआ?’’ नीना आशंकित हो गई.

‘‘मैं ने घर बेच दिया था, अब मैं बेघर हूं. क्या तुम्हारे घर में रहने की जगह मिलेगी?’’ आशुतोष ने उस की आंखों में  झांकते हुए पूछा.

‘‘मेरे दिल और घर के दरवाजे हमेशा तुम्हारे लिए खुले हैं. जगह ही जगह है,’’ नीना उस के कंधे पर सिर रखते हुए बोली.

उस दिन जो बहुत-कुछ टूट गया था, आज अचानक से इस तरह जुड़ गया था कि कहीं टूटन का कोई निशान भी बाकी नहीं रहा था. आलू-परांठे, सूजी का हलवा और पुदीने के रायते का नाश्ता करने के बाद दोनों दोपहर में फिर एक रूमानी डुएट गा रहे थे जो उन्हें ‘गाने सुहाने समूह’ के आने वाले इवेंट में गाना था. फिर शाम को बच्चों और सभी समूह वालों को आमंत्रण भी तो देना था कि वे अगले हफ्ते शादी कर रहे हैं. Emotional Life Story :

Psychological Trauma : बदबू – रेप के बाद मानसिक संताप झेलती युवती

Psychological Trauma : रगड़-रगड़ कर उस के शरीर की चमड़ी उधड़ गई थी लेकिन बदबू थी कि जा ही नहीं रही थी. कैसे छुटकारा मिलेगा उसे इस बदबू से? बस, अब तो एक ही रास्ता उसे सूझ रहा था.

आनंद आने वाला था. ऐसा नहीं था कि वे दोनों पहली बार मिल रहे थे. फिर भी पता नहीं क्यों निद्रा बेचैन थी. हालांकि आनंद ने ही उसे बुलाया था लेकिन वह अभी तक आया नहीं था. वह बेचारी पार्क में बैठी कब से उस का इंतजार कर रही थी.

आनंद आया हाथों को पीछे बांधे. शायद, कुछ छुपाने की कोशिश. उस की मूरत देख उस की आंखों में चमक उठी. अधर पर हल्की मुस्कान तैरने लगी. इंतजार करवाने का जो मासूम गुस्सा था वह आनंद के आने की खुशी में पिघल गया. वह आया, उस के नजदीक बैठा. फूली हुई नाक से उसे एहसास हो गया था कि थोड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी. हर बार की तरह इस बार भी वह सामने की ओर देखने लगी थी मानो गुस्सा दिखाने का एक छोटा सा प्रयास ताकि अगली बार इंतजार न करना पड़े पर वैसा करना मुश्किल था. आंखें यहां-वहां हो रही थीं शायद आनंद का अगला कदम देखने की कोशिश थी यह. पर वह भी उस की तरह ही सामने की ओर देखने लगा. पता नहीं दोनों उस खाली आसमान में क्या ढूंढ़ रहे थे.

‘‘सौरी,’’ आनंद ने कहा.

‘‘अब तुम्हें पता है मैं माफ तो करूंगी ही. क्या करूं ज्यादा देर तक एक ही मूड में रह नहीं सकती न,’’ निद्रा ने उस की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘रिश्ता आया था, इसलिए थोड़ा रुकना पड़ा.’’ निद्रा पलभर के लिए सहम सी गई. कुछ नहीं कहा. बस, आनंद को देख रही थी. कुछ पल देखा और एकाएक उस ने अपनी गर्दन सामने की ओर मोड़ दी. अक्सर ऐसा ही होता है जिन बातों को बयां करने में हमें थोड़ी कठिनाई होती है तब अकसर हम सामने वालों से नजरें चुराते हैं ताकि थोड़ी हिम्मत कर पाएं, जो कहना चाहते हैं वह कह पाएं या हमारी बात सुन कर सामने वाले के चेहरे पर जो भाव पैदा हो जाएंगे या वह हमारे बारे में क्या सोचेगा, यही बातें आंखें चुराने को मजबूर कर देती हैं यही बातें मन को हल्का कर देने में विलंब कर देती हैं.

‘‘आनंद मुझे लगता है कि जल्दबाजी करने से अच्छा है कि हम एक-साथ रहें. इस से एकदूसरे को और जान जाएंगे,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘और क्या जानना है, निद्रा? मेरी शादी हो जाएगी, तुम समझ नहीं रही हो. और वैसे भी, इतने दिन तो हो गए हमारे रिलेशनशिप को,’’ आनंद ने कहा.

‘‘मैं एक-साथ रहने की बात कर रही हूं,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘लिवइन?’’ आनंद ने कहा.

‘‘हूं. मतलब, ऐसे तो सब ठीक ही लगता है पर जब साथ रहेंगे तो और बेहतर समझ पाएंगे और सही डिसीजन ले पाएंगे,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘पर अचानक यह सब? हम ने जब फोन पर बात की थी तो तुम ने ‘हां’ कहा था. अब यह,’’ आनंद ने कहा. निद्रा ने इस का कोई जवाब नहीं दिया. शायद उस की आंखें भी जवाब तलाश रही थीं.

‘‘तुम अखबार नहीं पढ़तीं न, लिवइन भी पॉसिबल नहीं है. हर तरफ से. वेट करते रहे तो वेट ही करते रहेंगे,’’ आनंद ने कहा.

‘‘फिर क्या करें? सीधा शादी? अरे, अभी तुम्हें आसान लग रहा है पर बाद में. मैं, बस, इतना कहना चाहती हूं कि मुझे लगता है हमें थोड़ा और वेट करना चाहिए,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘तुम समझ नहीं रही हो, मेरी शादी हो जाएगी. मुश्किल से मैं ने मम्मी को बताया. वे कुछ तो कर के पापा को रोके हुए हैं. पर यह ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता,’’ आनंद ने कहा.

निद्रा ने कुछ नहीं कहा. दुविधा में पड़ गई थी. क्या कहे क्या करे?

‘‘क्या हुआ निद्रा, कुछ हुआ है क्या?’’ आनंद ने कहा.

‘‘रानी आई है. सब-कुछ छोड़-छाड़ कर.’’

‘‘लेकिन तुम ने तो कहा था अविनाश और वह रिलेशनशिप में थे, फिर?’’

‘‘कह रही थी शादी के बाद सब बदल जाता है. कुछ भी पहले जैसा नहीं रहता. अविनाश काफी असुरक्षित सा हो गया था. हमेशा डाउट, क्यों कैसे कहां कब. फिर यह आए-दिन होता रहा और. गहरी चोट आई है उसे,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘ओह,’’ आनंद ने कहा.

‘‘कह रही थी तुम से न मिला करूं,’’ निद्रा ने कहा तो आनंद ने कुछ पल उस की आंखों में देखा. शायद वह कोशिश कर रहा था… समझने की कि यह रानी कह रही है या.

‘‘अच्छा हुआ वह निकल आई वहां से. वैरी गुड डिसिजन. सिंपल ही तो है, नहीं वर्कआउट होता तो निकल जाओ, टॉक्सिसिटी क्यों बढ़ाएं लेकिन कुछ लोगों के गलत करने से हर कोई गलत साबित नहीं होता. सब की अपनी-अपनी सोच होती है. सेल्फ कंट्रोल भी कुछ होता है. रानी के साथ जो हुआ उस बेसिस पर तुम कैसे अपना डिसीजन ले सकती हो? दूसरों का छोड़ो, तुम क्या चाहती हो?’’ आनंद ने कहा.

‘‘आनंद, मैं तुम्हें जानती हूं. मैं जानती हूं तुम नहीं हो वैसे. मैं तुम्हारे साथ सुरक्षित महसूस करती हूं लेकिन रानी ने भी तो शादी ही की थी. अगर एकदूसरे को ठीक से समझ होता तो ऐसी स्थिति न आती.’’

‘‘और कितना समझते? नहीं होतीं वर्कआउट शादियां. अब रानी के साथ वैसा हुआ, इस का मतलब यह नहीं कि मैं भी तुम्हारे साथ वही सब करूंगा. मैं मानता हूं तुम्हारा डर सही है पर सब को जनरलाइज करना भी सही नहीं है न,’’ आनंद ने कहा.

निद्रा की आंखें भर आई थीं. आनंद ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. अकसर किसी अपने की आगोश में अंदर का सारा दर्द क्षणभर में मिट जाता है.

‘‘चलो, चलो बस हो गया. यह देखो, मैं क्या लाया,’’ उस ने नीचे जमीन की ओर बेंच के पाए के पास जो गुलदस्ता रखा हुआ था उसे उठाया और कहा, ‘‘हैप्पी एनिवर्सरी’’ 2 साल हुए थे उन के इस खूबसूरत से सफर को. यह ट्रेन आज जरा सी लड़खड़ाई पर फिसली नहीं. उसी पटरी पर मौजूद रही क्योंकि विश्वास की बुनियादी ढांचे पर ये पटरियां उभरी हुई थीं. दोनों एक-दूसरे की आगोश में इस तरह खो गए मानो उस कल्पना की दुनिया में अपना ऐसा घर बसा रहे हों जहां सिर्फ प्रेम हो. कोई रोक-टोक, सवाल कुछ नहीं. बस, एक-दूसरे की प्रति गहरा विश्वास हो. उन्होंने एक-दूसरे के इस तरह भींच लिया था जैसे उस घर की दीवारों को और मजबूती दिलाने की कोशिश कर रहे हों. धड़कनें और सांसों की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थीं. कुछ और नहीं, न कहीं जाना न आना. बस, यहीं रहना चाहते थे वे दोनों. उसी वक्त में. उसी क्षण में. एकदूसरे को इस तरह कसा हुआ था जैसे अलग होने का डर भीतर कहीं पनप रहा हो. आस-पास कोई नहीं था. बस, वे दोनों.

प्रेम एक पौधे की तरह होता है जो धीरे-धीरे आकाश की ओर बढ़ता जाता है और एक विशालकाय वृक्ष का रूप धारण कर निस्वार्थ भाव से उस की गोद में पलने वालों को अपने-पन की छाया में जिलाता रहता है लेकिन प्रेम सच में हो तो. क्योंकि हाल ही में प्रेम की व्याख्या बहुत बदल गई है वगैरह-वगैरह.

कुछ देर बाद उन्होंने आंखें खोलीं. धक्का लगा. कुछ समय पहले तो यह मैदान खाली था. पर अब, उन दोनों के इर्दगिर्द और चार आ गए. चार कथित मर्द. संस्कृति बचाने वाले. उन्होंने निद्रा और आनंद को अलग कर दिया. मारपीट कर. लातों से, घूसों से. निद्रा ताकत लगा रही थी आनंद के पास जाने की, उस को बचाने की पर उस को 2 गुंडों ने जकड़ रखा था. जिसे बचपन से ही कोमल बने रहने का अभिशाप मिला हो वह क्या ही इन भेड़ियों का सामना कर पाती. आनंद चिल्ला रहा था पर आसमान में हवा इस कदर गुमसुम थी कि उस की आवाज उस हवा में गूंजने के बजाय गायब हो रही थी. कोई नहीं था आसपास. कोई नहीं. बहुत मारा आनंद को. खून बहने लगा था मुंह से. फिर भी रुके नहीं. अब बची निद्रा. आनंद को बेसुध अवस्था में छोड़ वे 2 भेड़िए अब निद्रा की ओर बढ़ते चले आ रहे थे. शिकार नजर आई थी न. मादा.

मादा सदियों से शिकार ही बनती आई है. सदियों से उस ने अपनी इस तस्वीर को बदलने की बहुत कोशिश की पर उस के शरीर पर लगे मांस के पुर्जे, जो सृष्टि को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं, को मैला होने से बचाने में वह कई बार हारती आई है. उन भेड़ियों की नजर में निद्रा शरीफ लड़की नहीं थी, उन को लगा वह यों कर के तैयार हो जाएगी. मना नहीं करेगी.

शरीफ लड़की. कौन होती है? चौखट के भीतर रहने वाली. बाहर घूमती है तो वेश्या, इशारे-भर से टांगें फैलाती है, शायद यही सोचा होगा भेड़ियों ने. एक ने उस की कुर्ती को हाथ लगाना चाहा.

निद्रा ने जोर से धक्का दिया पर भेड़िये इतने में रुकने वाले थोड़ी थे. उन्होंने उस के कंधों को दबोचना चाहा. फिर वही. अब वे जबरदस्ती पर उतर आए. पता नहीं निद्रा में कहां से इतनी ताकत आई थी, उस ने जोर से लात मारी. वह झटपटा कर फिर उठा. गुस्सा आया उसे. था तो मर्द ही. औरत कैसे उस पर हावी हो सकती थी. उस के मैं को ठेस पहुंची.

एक इशाराभर था कि सारे के सारे टूट पड़े निद्रा पर. मानो बीच में एक मांस का टुकड़ा पड़ा हो और कई भूखे भेडि़ए उस को खाने के लिए फड़फड़ा रहे हों. फिर भी वह उन चारों पर भारी पड़ रही थी. सदियों से समाज ने जो यह इज्जत का ठप्पा उस के बदन पर लगाया था उस को बचाने के लिए. ठप्पा मिट गया तो सब-कुछ खत्म.

आनंद फड़फड़ा रहा था अपनी ही जगह पर. उस की आंखों के सामने यह सब हो रहा था और वह कुछ नहीं कर पा रहा था. हिलने-डुलने की भी ताकत नहीं बची था उस में. और तभी, थक-हार कर दिमाग चलाया एक भेड़िए ने. नजर गई उस की आनंद की ओर. चाकू निकाला और सीधा आनंद की गर्दन पर. फिर भी निद्रा कैसे तैयार हो जाती. उस भेड़िए ने आनंद की छाती पर सट से वार किया.

निद्रा ऐसे चिल्लाई कि गगन को चीर कर उस की आवाज उस ‘कृष्णा’ तक पहुंच गई होगी जिस ने कभी द्रौपदी की आबरू बचाई थी पर कोई नहीं आया और एक वार हुआ आनंद के शरीर पर. उस की तो आवाज भी नहीं निकल रही थी. बस, फड़फड़ा रहा था. यह देख निद्रा निढाल हो गई. हाथ-पैर छोड़ दिए. आंखें अभी भी आनंद की ओर पर पूरा शरीर पत्थर बन गया था. आनंद से प्रेम था न उसे. भेड़ियों ने इस तरह उस के कपड़े फाड़े जैसे मुरगी छील रहे हों. आनंद और फड़फड़ाने लगा. उस तरह जैसे मुर्गी की गर्दन मरोड़ी जाती है. वह फड़फड़ाती है आखिर तक लेकिन हलक से एक आवाज तक नहीं आती.

कभी जिन छातियों का दूध पी-पी कर ये भेड़िए इस दुनिया में संभल गए होंगे उन्हीं छातियों को देख उन के भीतर हवस पैदा होने लगी. वह कोमल शरीर अब भेड़ियों के हाथों में था. वक्ष को इस कदर मसलने लगे जैसे कीचड़ पैरों तले कुचल रहे हों. टांगों को कस के पकड़ा. फिर क्या, एक के बाद एक आता रहा, जाता रहा. शायद वे भूल गए थे कि वे आए तो थे संस्कृति बचाने, पर उन्होंने संस्कृति को अपने ही हाथों रौंद डाला था. अब तो टांगों के बीच में से खून बह रहा था. फिर भी कोई रुका नहीं. एक के बाद एक. एक के बाद एक. आनंद क्या कर सकता था. बीच में उस ने सोचा भी, ‘अपने हाथ से ही खुद की गर्दन काट डाले, कम से कम निद्रा तो बच जाएगी पर अगर मेरे मरने के बाद भी उन्होंने नहीं छोड़ा तो?’ उस की आंखों से बस आंसू बह रहे थे. वह भी पत्थर बन गया था. बस, आंसू बहाता पत्थर.

छोड़ दिया तीन भेड़ियों ने निचोड़ के. कुछ नहीं बचा पर एक अब भी बाकी था उस की बारी थी.

उस ने शायद बड़प्पन दिखाया होगा ‘पहले तुम बांट कर खाओ, फिर मैं.’ अब उस की बारी थी.

उस ने आनंद को फेंक दिया घास पर और वह अपना हिस्सा बटोरने आया. निद्रा का नंगा शरीर देखा. टांगों के बीच से खून बह रहा था तो डर गया बेचारा पर मौका कैसे छोड़े. उस ने उस पत्थर को पलट दिया. अपनी पैंट खोली, फिर पूरी ताकत से निचोड़ने लगा. थक गया. फिर एहसास हुआ कि मर जाएगी बेचारी. जिंदा छोड़ देते हैं. भाग गए.

‘बदबू सी आती है बदन से, कितना खरोंच-खरोंच कर घिसाया, यहां तक कि चमड़ी भी उधेड़ दी खुद की ही. बावजूद इस के, यह बदबू मिट ही नहीं रही है. कोई साबुन जो इस को मिटा कर नई शुरुआत की महक भर दे. है कोई साबुन जो जहां से मिटा दे इस घटना को, समाज से, लोगों के जेहन से, उस के दिल से, मेरे अपनों के दिल से, खुद मेरे बदन से भी. कोई क्षण हो जो मिटा दे उस बीते हुए को मोड़ दे, मेरी जिंदगी को फिर से उसी खूबसूरत पटरी पर ला दे जहां से कभी यह प्रेम नाम की ट्रेन गुजरा करती थी. सोचती हूं, आज जिंदा क्यों हूं, मुझे मार देते तो बेहतर होता. यह कहानी ही मिट जाती. फिर गलती से भी इस जहां में कभी कदम न रखती मैं.

‘पर होता कुछ इस से? मिट जाता वह सब?

‘नहीं. क्योंकि यह कहानी ही कुछ ऐसी है.

‘लिखने वाले से ज्यादा जिन पर लिखी जाती है उन को उम्र भर जलाती रहती है. कोई कितनी भी कोशिश करे, पन्ने फाड़ दे, जला दे, गाड़ दे, कभी मिट नहीं सकती यह कहानी. वह एक जिंदगी के साथ इर्द-गिर्द की कितनी ही जिंदगियों को ले कर दफन हो जाती है.’

मुकदमे चलते रहते हैं. केस आते हैं,

जाते हैं. या तो दफन हो जाते हैं या सालों-साल चलते रहते हैं. इस से होता क्या है? कुछ नहीं. पीड़ित बार-बार आपबीती बताती रहती है. न चाहते हुए भी उसे बार-बार घावों को ताजा करना पड़ता है. वही सवाल, वही जवाब.

अब वे अपराधी कैदी तो बन जाते हैं पर वह सोच जो उन के भीतर पनपती है उस का क्या? और लोग भी उन्हें ‘हैवान’ ‘राक्षस’ या सोसाइटी से अलग कह कर भूल जाते हैं. जबकि बात यह है कि वे राक्षस या दानव नहीं हैं. इंसान हैं. चलते-फिरते इंसान. उन के भीतर जो सोच पनप रही है, उस के बारे में सोचने की जरूरत है क्योंकि उन को अगर फांसी भी दे दी गई तो सिर्फ उन का शरीर मर जाएगा पर वह सोच उन के बाद भी किसी न किसी के भीतर पाई जाएगी.

निद्रा को घर लाया गया. अस्पताल में थी. सदमे में चली गई थी. मतलब, अब भी है. कुछ कहती नहीं. एक जगह पर बैठी है तो बैठी है. सोई है तो सोई है. कुछ महसूस नहीं होता उसे. कौन आया. क्या कहा. कुछ नहीं. पत्थर सी बन गई थी. कोई भाव नहीं. न खाने का ध्यान न पहनने का. अब तो बदन पर कपड़े भी चुभने लगे थे उसे. इसलिए कभी-कभी उतार फेंकती.

उस की मां अपना रोना-धोना छोड़ कर उसे संभाल रही थी मासूम बच्ची की तरह. और कोई था नहीं. मां उस के कमरे में ही रहने लगी थी क्योंकि निद्रा अचानक नींद से उठ जाती, चिल्लाने लगती, खुद को नोचने लगती. ऐसे में एक अकेली औरत का उस को संभालना मुश्किल तो था पर संभाल रही थी क्योंकि उस के पिताजी उस के कमरे में जा नहीं सकते थे. न भाई जा सकता था.

निद्रा के दिमाग पर जिन चेहरों ने गहरा आघात किया था वही चेहरे उसे हर एक मर्द में नजर आने लगे थे. जब भी कोई आदमी उस से मिलने आता तो उस का नियंत्रण टूट जाता और वह कुछ न कुछ फेंक कर मारने लगती. इसलिए डाक्टर ने कहा भी था कि घर के और बाहर के आदमियों को इस से दूर ही रखिए. दिमाग पर गहरा असर हो गया है. जब-जब यह किसी आदमी को देखेगी, वह बीता हुआ फिर एक बार दिमाग में ताजा हो जाएगा और वह अपना आपा खो देगी. बस, कुछ दिनों के लिए.

जब दिन बीतते जाएंगे तो चीजें बेहतर होती जाएंगी और कुछ कह नहीं सकती. डाक्टर ने यह बस यों ही कहा था ताकि उस के माता-पिता का हौसला बना रहे. एक औरत होने के नाते और रेप पीड़िताओं का इलाज करने के बाद उन को यह तो मालूम हुआ था कि ये कहानियां पीड़िताओं के बदन पर से इतनी आसानी से नहीं मिटतीं. वह अगर मिटाना भी चाहे तब भी कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता है जिस कारण यह घाव फिर से हरा हो जाता है और वह उस घाव की पीड़ा से कराहने लगती है.

दूसरी ओर आनंद अब पहले से बेहतर था लेकिन किसी से बात नहीं करता था. तबीयत ठीक थी. शरीर के तौर पर बस. दिमागी तौर पर नहीं. चल तो सकता था लेकिन चौखट लांघने की कोशिश नहीं कर पाया. लोगों के सवाल, उस का क्या? लोग सवाल पूछने से पहले सवाल की गहराई तक थोड़े जाते हैं, जबान पर जो आया बक दिया. लोगों के लिए वह भी रेपिस्ट बन गया था. निद्रा का रेपिस्ट. जिस से वह प्रेम करता था उसी का. ऐसे वक्त में खुद को संभाल पाना मुश्किल होता है पर अच्छी बात यह थी कि घर वालों का साथ था. बावजूद इस के, उस के भीतर एक गिल्ट पनप रहा था. निद्रा को बचा न पाने का गिल्ट.

उस की आंखों के सामने यह सब हुआ था न. वह जब भी खाली बैठा होता उस बीते हुए का अंधियारा उस के इर्द-गिर्द मंडराने लगता. वह कांप उठता, सिसकता. इस के अलावा कर भी क्या सकता था. उस बीते हुए को मिटा तो नहीं सकता था. एक सवाल अब भी उसे पछतावे की आग में जला रहा था- ‘क्यों? क्यों उस ने निद्रा को वहां बुलाया था. अगर उस दिन न बुलाता तो शायद यह होता ही न.’

यह ‘क्यों’ बड़ा परेशान करता है. जब भी हम कुछ करने की चाहत में कुछ कर बैठते हैं और वह चाहत गलत मोड़ लेती है तब यही सवाल हमें बारबार परेशान करने लगता है- ‘क्यों?’ क्यों मैं ने बुलाया? क्यों मैं वहां चला गया? क्यों मैं ने यह किया? क्यों मैं ने सोचा नहीं? क्यों मैं ने किया नहीं? या क्यों मैं ने किया? क्यों? वगैरह-वगैरह. यह ‘क्यों’ का पछतावा बड़ा ही लंबा होता है. खत्म ही नहीं होता. जीवन के हर पड़ाव पर अचानक मौजूद हो जाता है. फिर हम खाली हाथ, बस, उस सवाल को देखते रहते हैं क्योंकि हमारे पास इस ‘क्यों’ का कोई जवाब नहीं होता.

निद्रा अपने ही जिस्म से नफरत करने लगी थी. बू आती थी उसे. ऐसी बू जो किसी भी साबुन से मिट नहीं रही थी. एक बार सूंघती तो सारा पुराना एकदम से ताजा हो जाता. एकदम से आपा खो देती. उभरी हुई छातियों को इस कदर मसलने लगती मानो वह उन मांस के गोलों को तोड़ कर कहीं फेंकना चाहती हो. बदन को नाखूनों से खरोंचने लगती. खुद से ही घिन आ रही थी. सोच रही थी कि ये छातियां जो किसी को अमृत पिलाया करती होंगी, मेरे किस काम की. इन्हीं को देख कर ही तो उन हरामजादों ने

मेरे कपड़े फाड़े. मुझे नंगा किया. टांगें दबोचीं. बहुत दर्द होता है पर कोई मरहम भी नहीं मिल रहा जो आराम दे. ‘क्यों जिंदा हूं मैं? मर जाती तो बेहतर होता. यह बदबू मिट ही नहीं रही.’ पता नहीं वह क्या-क्या छिड़क रही थी अपने बदन पर. उस के नियंत्रण का बांध टूट गया था.

मां नहीं थी कमरे में. शायद कुछ लाने गई हो. निद्रा अकेली थी. वह जो कुछ कर रही थी उस को भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कर रही है. कहां से उस ने चुन्नी निकाली. कब लटकाई. कुरसी पैरों के नीचे से खिसक गई. फंदा फंस गया. उस की देह फड़फड़ाने लगी. एक पल में बीता हुआ आंखों के सामने तैरने लगा. बेंच पर बैठी निद्रा. इंतजार करती हुई. फिर आनंद, वह साथ रहने के वादे. दोनों खामोश से एक-दूसरे की आगोश में डूबे हुए. आनंद को देख ऐसा लगा जैसे निद्रा में फिर एक बार जीने की उम्मीद जगी हो. वह जीना चाहती थी.

बचने की कोशिश करने लगी पर वह फंदा और ज्यादा कसता जा रहा था. आंखें बाहर आने लगीं. जबान मुंह से बाहर लटकने लगी. फिर भी शरीर में जान अब भी थी. उसे जीना था. आनंद के लिए. उन वादों के लिए. सपनों के लिए पर कौन बचाएगा. कोई नहीं था उस कमरे में. हलक से आवाज नहीं निकल रही थी. अब गई, अब गई. मां ने देखा. वह जोर से चिल्लाई मदद की उम्मीद में. उस ने अपनी पूरी ताकत से निद्रा को उठाए रखा. निद्रा के शरीर ने जान छोड़ दी थी. उस का भाई और उस के पापा भागते हुए कमरे में आए.

निद्रा को नीचे उतार कर अस्पताल ले जाया गया. जान बाकी थी उस में. थोड़ी सी. एंबुलेंस से नीचे उतरने तक. नीचे उतारा गया पर अब वह निद्रा नहीं रही थी, खामोश खला में तकती हुई लाश बन गई थी. खला में एक शोर सा बरपा. परिवारजनों का. अब निद्रा बिना किसी अपेक्षा के खामोश इस जहां से उस जहां की हो गई थी. पता नहीं अदालत का नतीजा कब और क्या आएगा, पर उस से पहले ही निद्रा ने यह फैसला कर लिया था बदन से आ रही बदबू को मिटाने का. Psychological Trauma :

Struggle With Cancer : अपराजित – कैंसर से जूझते व्यक्ति की व्यथा की कहानी

Struggle With Cancer : मौत उस के सामने खड़ी थी लेकिन कितना कुछ करना था अभी अंशुमान को. शरीर का दर्द उसे हरा रहा था लेकिन वह हार कैसे मान सकता था. उस का हौसला ही तो उस के परिवार का हौसला था.

सूरज की हलकी किरणें खिड़की से छन कर कमरे में आ रही थीं. रोशनी में धूल के कण तैरते हुए दिख रहे थे. कमरे के एक कोने में एक बिस्तर पड़ा था, जिस पर एक दुबला-पतला व्यक्ति लेटा हुआ था, नाम था अंशुमान. कभी जिंदगी से भरपूर रहने वाला यह शख्स अब मौत से जंग लड़ रहा था.

अंशुमान को जब पहली बार डाक्टर ने बताया कि उसे कैंसर हो गया है तो वह हंस पड़ा था. उसे लगा कि यह कोई मजाक है लेकिन जब रिपोर्ट्स उस के सामने रखी गईं तो उस की हंसी कहीं खो गई.

‘क्या मेरी जिंदगी का सफर अब यहीं खत्म हो जाएगा?’ उस ने खुद से पूछा.

पत्नी सुरेखा उस के पास बैठी थी. उस की आंखों में आंसू थे, लेकिन उस ने उन्हें बहने नहीं दिया. वह जानती थी कि अब उसे मजबूत बनना है, अंशुमान के लिए.

घर में अब वही पुरानी रौनक नहीं थी. बेटे और बेटी, जो हमेशा घर में चहकते रहते थे, अब चुपचाप रहते.

डॉक्टरों ने बताया था कि बीमारी अंतिम चरण में पहुंच चुकी है लेकिन अंशुमान ने हार मानने से इनकार कर दिया. उस ने सोचा, ‘अगर मुझे कुछ समय ही जीना है तो क्यों न इसे खुशी से जिया जाए?’

लेकिन यह केवल बीमारी की लड़ाई नहीं थी. कैंसर के साथ-साथ उसे अपने ऑफिस और परिवार की आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ रहा था. उस की नौकरी अब खतरे में थी, क्योंकि इलाज के चलते वह महीनों से काम पर नहीं जा पा रहा था. बैंक बैलेंस तेजी से खत्म हो रहा था और घर के खर्चे बढ़ते जा रहे थे. उसे चिंता थी कि अगर वह चला गया तो सुरेखा और बच्चों का क्या होगा? उन की पढ़ाई, घर का किराया, रोजमर्रा की जरूरतें आदि सब कुछ अधर में लटक जाएगा.

एक दिन अंशुमान अस्पताल के गार्डन में टहल रहा था जब उस की मुलाकात एक कैंसर सर्वाइवर से हुई. वह अधेड़ उम्र का व्यक्ति था, जिस की आंखों में आत्मविश्वास झलक रहा था. उस ने अंशुमान से मुसकरा कर पूछा, ‘‘कैसा महसूस कर रहे हो, दोस्त?’’

अंशुमान ने उदास स्वर में कहा, ‘‘जिंदगी अब बस गिनती के दिनों की मेहमान है लेकिन मैं अपने परिवार के बारे में सोच-सोच कर बेचैन हूं. मेरे बाद उन का क्या होगा?’’

उस व्यक्ति ने गहरी सांस ली और कहा, ‘‘मैं भी कभी तुम्हारी ही तरह यहां बिस्तर पर पड़ा था. डाक्टरों ने मुझे बस कुछ महीने दिए थे लेकिन मैं ने अपने जज्बे से इस बीमारी को हराया. तुम भी कोशिश कर सकते हो, अगर चाहो तो.’’

अंशुमान ने उसे आश्चर्य से देखा, ‘‘कैसे?’’

उस व्यक्ति की आंखों में दर्द उभर आया. उस ने बताया कि वह भी कीमोथेरेपी के दर्द, बालों के झड़ने, हड्डियों में उठते असहनीय दर्द और हर रात मौत का इंतजार करने की पीड़ा को अच्छे से जानता था. ‘‘हर इंजेक्शन, हर रिपोर्ट, हर दिन बस एक नई तकलीफ लाता था,’’ उस ने कहा, ‘‘कई बार तो लगा कि इस से अच्छा है कि हार मान लूं लेकिन फिर मैं ने अपने परिवार की ओर देखा और खुद से कहा, ‘‘अगर मुझे जाना ही है तो क्यों न इस से लड़ कर जाऊं?’’

उस ने अपनी लड़ाई की दास्तान सुनाई कि कैसे उस ने दर्द सहा, लेकिन कभी उम्मीद नहीं छोड़ी. हर दिन, हर पल वह जिंदगी से लड़ता रहा. और एक दिन, उस ने यह जंग जीत ली. ‘‘मैं आज यहां खड़ा हूं क्योंकि मैं ने हिम्मत नहीं हारी. तुम भी लड़ सकते हो, दोस्त.’’

अंशुमान के मन में कुछ टूटने के बजाय जुड़ने लगा. उस ने तय किया, अब वह केवल इलाज नहीं करेगा, बल्कि तैयारी भी करेगा, अपने जाने के बाद की जिंदगी के लिए.

अंशुमान ने उस की बातें ध्यान से सुनीं और कुछ नया करने की ठानी. उस ने अपने विचारों को बदला, छोटी-छोटी खुशियों में जीने लगा, अपने परिवार के साथ हर पल को संजोने लगा. अब वह पहले से अधिक आत्मविश्वासी था. उस ने तय कर लिया कि वह अपने जीवन के हर क्षण को पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ जिएगा. वह अब हर दिन को उद्देश्य के साथ जीने लगा.

उस ने एक शाम सुरेखा से कहा, ‘‘तुम्हारे पास कंप्यूटर डिप्लोमा है न? क्यों न तुम फिर से नौकरी शुरू करो?’’

सुरेखा चौंकी, ‘‘इतने साल हो गए, मैं कैसे फिर से…’’

‘‘क्यों नहीं, तुम कर सकती हो. मैं तुम्हें देख रहा हूं न, तुम सब से मजबूत हो.’’

कुछ ही हफ्तों में सुरेखा ने पास के एक स्कूल में कंप्यूटर टीचर की नौकरी जौइन कर ली. बेटे को उस ने किताबों की एक दुकान पर काम दिलवाया, बेटी से बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने को कहा.

शुरुआत में सब को झटका लगा पर धीरेधीरे सब ने समझ, पापा सिर्फ बीमारी से नहीं लड़ रहे हैं, वे हमें जिंदा रखना सिखा रहे हैं. घर के कामों को भी उस ने नया रूप दिया. सब के हिस्से तय हो गए- बिल जमा करना, दवाइयों का रिकॉर्ड रखना, राशन की जिम्मेदारी. कभी वह खुद व्हीलचेयर पर बैठ कर आलू छीलता, कभी बच्चों को डिटर्जेंट और सिलेंडर कैसे मंगाना है, सिखाता. अपने गैरजरूरी सामान को उस ने दान करना शुरू कर दिया.

‘‘यह कोट अब मुझे फिर शायद न पहनना पड़े,’’ कहते हुए उस ने उसे पैक कर दिया. हर चीज जो कभी उस की थी, अब वह उन्हें याद की तरह दे रहा था. उस ने एक डायरी शुरू की, जिस में वह हर दिन कुछ लिखता- बच्चों के लिए सीखें, सुरेखा के लिए संदेश और खुद के लिए विचार.

‘‘बेटा, कोई काम छोटा नहीं होता. मेहनत से भागना मत. बेटी, जब कभी डर लगे, तो यह डायरी पढ़ लेना. तुम्हारे पापा ने भी मौत से मुसकरा कर बात की थी.’’

वह जानता था कि दर्द खत्म नहीं हुआ है, लेकिन उस के मन में अब डर नहीं था.

अब वह अपने परिवार को जिंदा रहने की कला सिखा रहा था.

कुछ दिनों तक अंशुमान को लगा कि वह अब ठीक हो रहा है. उस की मानसिक स्थिति पहले से बेहतर थी, दर्द में भी उसे अब उम्मीद की किरण नजर आने लगी थी. लेकिन फिर, अचानक एक रात, पुराना दर्द फिर लौट आया. शरीर पहले से भी ज्यादा कमजोर महसूस होने लगा. रिपोर्ट्स दोबारा कराई गईं. डॉक्टरों के चेहरे की गंभीरता देख कर सुरेखा घबरा गई. डाक्टर ने कहा, ‘‘अब कुछ नहीं हो सकता.’’

सुरेखा टूट गई, लेकिन अंशुमान शांत रहा. अंशुमान को जब यह सच पता चला तो एक पल के लिए उस के मन में निराशा ने जगह बना ली. लेकिन फिर, उस ने खुद को संभाला. ‘‘मैं जानता हूं कि यह लड़ाई अब खत्म होने वाली है लेकिन कम से कम मैं ने उम्मीद तो नहीं हारी.’’

एक रात, जब सुरेखा उस के पास बैठी थी, अंशुमान ने थके हुए स्वर में कहा, ‘‘मैं खुश हूं कि मैं ने अपने तरीके से जीने की कोशिश की.’’

अंशुमान ने धीरे से सुरेखा का हाथ थामा और मुसकरा दिया. ‘‘बच्चों का ख्याल रखना और उन्हें बताना कि उन के पिता ने अंत तक जिंदगी को खुल कर जिया.’’

अगली सुबह, सुरेखा ने उसे शांत चेहरे के साथ पाया जैसे उस ने अपनी तकलीफों से मुक्ति पा ली हो लेकिन दर्दनाक मोड़ तब आया जब उस के हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा कागज मिला. यह अंशुमान की आखिरी चिट्ठी थी, जिसे उस ने रात में लिखी थी. उस में लिखा था :

‘जब तुम यह चिट्ठी पढ़ रही होगी तब शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगा. ये शब्द लिखते हुए मेरी उंगलियां कांप रही हैं, लेकिन मेरा दिल हल्का हो रहा है. मैं ने पूरी ताकत से इस जंग को लड़ा, हर दर्द को सहा, हर तकलीफ को अपनी मुसकान के पीछे छिपाया लेकिन शायद यह जंग मेरी जीत की नहीं थी. मुझे अफसोस नहीं है, क्योंकि मैं ने तुम्हारे साथ हर वह पल जिया जो किसी भी इंसान के लिए सब से कीमती होता है.

सुरेखा, शायद मैं कल की सुबह न देख पाऊं, लेकिन मैं तुम्हें और बच्चों को आखिरी बार बताना चाहता हूं कि मैं जितना हो सका, लड़ा. तुम मजबूत रहना, क्योंकि अब तुम्हें अकेले यह लड़ाई लड़नी होगी. मैं थक गया हूं लेकिन मैं हार कर नहीं जा रहा. मैं इस सोच के साथ जा रहा हूं कि मैं ने अपनी हर सांस, अपनी हर हिम्मत को आखिरी दम तक जिया. बच्चों को मेरी कहानी सुनाना, लेकिन रोना मत. उन्हें हंस कर बताना कि उन के पापा आखिरी सांस तक हारे नहीं थे. जब भी मेरी याद आए, आंसू मत बहाना, बल्कि मुस्कुरा कर कहना कि अंशुमान ने हार नहीं मानी, उस ने बस अपनी जंग अधूरी छोड़ दी.’’

सुरेखा ने कांपते हाथों से चिट्ठी को सीने से लगा लिया और फूट-फूट कर रो पड़ी. कैंसर ने अंशुमान का शरीर भले ही छीन लिया था लेकिन उस की हिम्मत, उस की लड़ाई और उस की कहानी हमेशा जीवित रहने वाली थी. फिर उस ने चिट्ठी को एक बार पढ़ा और पहली बार महसूस किया कि अंशुमान गया नहीं था, वह हमेशा उन के दिलों में रहेगा, एक अधूरी जंग की पूरी कहानी बन कर. Struggle With Cancer :

Friendship Issues : जेन जी का लंबा स्क्रीनटाइम डाल रहा दोस्ती में दरार

Friendship Issues : स्कूल के क्लास की आखिरी बैंच से ले कर होस्टल के कौरिडोर तक जहां कभी दोस्ती की गूंज सुनाई देती थी वहां अब सिर्फ नोटिफिकेशन की टनटनाहट बची है. जेन जी के आज के स्टूडैंट्स घंटों एकदूसरे की रीलें देखते हैं लेकिन आंखों में आंखें डाल कर बात करने का वक्त नहीं निकाल पाते. स्क्रीन के इस गहरे समंदर में उन की फ्रैंडशिप कब हलकी हो गई, शायद उन्हें खुद भी पता नहीं चला.

भारत का युवा आज इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है जहां दोस्ती का सब से ज़्यादा शोर औनलाइन है हालांकि सब से ज़्यादा खामोशी भी वहीं है. भारतीय युवा अपने दिन के कई घंटे मोबाइल, लैपटौप और टैबलेट की स्क्रीन पर बिताता है. सिर्फ सोशल मीडिया पर ही भारतीय युवा (18-25 साल का) लगभग 3 घंटे रोज दे रहा है, जो उन की कुल डिजिटल लाइफ़ का बड़ा हिस्सा है. अगर इसे महीने में बदलें तो 90 घंटे और साल के 1,095 घंटे. यह लगातार बढ़ता हुआ स्क्रीनटाइम उन की फ्रैंडशिप को भी बदल रहा है.

भारत में इंटरनैट की तेज़ी से बढ़ती पहुंच ने युवाओं को पहले से कहीं ज़्यादा कनैक्टेड तो बना दिया है लेकिन यह कनैक्शन गहराई से ज़्यादा ‘कन्टीन्यूज नोटिफिकेशन’ पर टिका हुआ है. 2024 में भारत में 462 मिलियन, यानी 46 करोड़ से कुछ अधिक ऐक्टिव सोशल मीडिया यूजर थे, जिन में बड़ी हिस्सेदारी 18–24 उम्र के युवाओं की है, यानी, वही जेन जी जो कालेज–ट्यूशन की उम्र में है.

रियल बनाम रील : दोस्ती का नया सेट

सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स जेन जी के लिए दोस्ती के एक्सपैरिमैंटल ग्राउंड बन गए हैं, जहां फौलोअर्स, लाइक और व्यूज ही रिश्ते की वैल्यू तय करते हैं. इस पीढ़ी का रोजमर्रा का जीवन इतना ‘रील’ और ‘स्टोरी’ सैंट्रिक हो चुका है कि दोस्त अब कम, कौन्टैक्ट्स ज़्यादा दिखते हैं-जिन्हें कभी भी ‘अनफौलो’ या ‘ब्लौक’ किया जा सकता है.

रील्स की तेज रफ़्तार ने बातचीत की रफ़्तार भी बदल दी है. देर तक चलने वाली एकदो गहरी बातचीत की जगह अब 50 छोटेछोटे चैट थ्रेड हैं, जो ज़्यादातर मीम, ट्रैंड या किसी वायरल मामले पर टिकी होती हैं.

स्क्रीनटाइम और अकेलापन : सब से कनैक्टेड, फिर भी सब से अकेला

भारत के कई बड़े शहरों में युवाओं के बीच लोनलीनैस एक बड़ा पब्लिक हैल्थ इश्यू बन चुका है. विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार औनलाइन रहने के बावजूद अच्छी फेसटूफेस बातचीत बेहद कम होती जा रही है.  मनोवैज्ञानिकों का अनुभव है कि सोशल मीडिया फोमो (फियर औफ मिसिंग आउट) और आपस में कंपैरिजन की आदत को बढ़ाता है. जेन जी अपने दोस्तों की क्यूरेटेड लाइफ़ देख कर खुद को कमतर महसूस करता है और इसी असुरक्षा के साथ और ज़्यादा औनलाइन भागता है, जहां गहरा सपोर्ट नहीं, सिर्फ रिऐक्शन मिलते हैं.

कुछ इंटरनैशनल रिसर्च बताती हैं कि दुनियाभर के लोगों का रोज का औसत स्क्रीनटाइम 6.5 घंटे के आसपास पहुंच चुका है, जबकि जेन जी इस औसत से काफी ऊपर है और अकसर 8–9 घंटे स्क्रीन पर बिताता है. भारतीय संदर्भ में भी, एक विश्लेषण बताता है कि अरबन जेन जी में 6–8 घंटे प्रतिदिन स्क्रीन के सामने बिताने वाले युवाओं की संख्या करोड़ों में है. जब दिन का इतना बड़ा हिस्सा डिजिटल दुनिया में खप जाता है, तो परिवार, लोकल दोस्तों, महल्ले, कालेज, कैंपस जैसी जगहों पर काम के रिश्तों के लिए समय ही नहीं बचता.

कालेजस्कूल भी ‘स्क्रीन मोड’ में

कोविड के बाद से भारत की शिक्षा व्यवस्था ने भी डिजिटल और ब्लेंडेड लर्निंग को मुख्यधारा बना लिया है. रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि भारत में औनलाइन एजुकेशन मार्केट तेज़ी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में इस के अरबों डौलर के उद्योग बनने का अनुमान है. विश्वविद्यालय यूजीसी–स्वीकृत औनलाइन डिग्री, डिस्टेंस एमबीए और डिज़िटल स्किल कोर्सेस को जोरों से बढ़ावा दे रहे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक, 2023 में ही भारत में 60 लाख से अधिक छात्रों ने औनलाइन यूजी और पीजी प्रोग्राम्स में नामांकन कराया, जिन में से लगभग आधे छोटे शहरों और कसबों से आए थे. स्कूल स्तर पर भी ब्लेंडेड लर्निंग यानी औफलाइन–औनलाइन के मिश्रण को भविष्य की मुख्य दिशा माना जा रहा है.  नतीजा यह कि जो समय पहले कैंपस, लाइब्रेरी, होस्टल, मैदान, चाय की दुकान और कैंटीन में दोस्तों के साथ बीतता था, उस का बड़ा हिस्सा अब स्क्रीन पर लैक्चर, असाइनमैंट, क्विज और रिकौर्डेड क्लासेस में चला जाता है. जिसे लेने न लेने की कोई बाध्यता कई जगह नहीं है.

शब्द छोटे, भाव और छोटे

जेन जी की डिजिटल भाषा सिर्फ स्माइली और जीआईएफ तक सीमित नहीं है. यह एक पूरी ‘शौर्टकट कल्चर’ बन चुकी है. ASAP, LOL, BRB, TBH, IDK जैसे सैकड़ों संक्षिप्त रूप रोज की चैटिंग का आधार हैं, जो सोचने और महसूस करने की भाषा को भी सीमित कर रहे हैं. जब वोकैबुलरी सीमित हो जाती है तो भाव व्यक्त करने की क्षमता भी सिकुड़ जाती है. गुस्सा, प्यार, नाराजगी, दुख सब या तो एक एमोजी में समां जाते हैं या दोतीन शब्दों के स्लैंग में. नतीजा, युवा अपने भाव नहीं प्रकट कर पा रहे हैं, न ही भाव प्रकट करने वाली कोई चीज वे देख या पढ़ रहे हैं.

रिसर्च यह भी दिखाती है कि जेन जी का बड़ा हिस्सा अपना आधा से ज़्यादा स्क्रीनटाइम यूजर जेनरेटेड कंटैंट जैसी रील्स पर बिताता है, जहां भाषा तेज, मज़ेदार और इंस्टैंट होती है, गहरी नहीं. इस आदत का असर औफलाइन बातचीत पर यह पड़ता है कि लंबे वाक्य असहज लगने लगते हैं, साइलैंस बरदाश्त नहीं होता और दोस्ती में धैर्य की जगह जल्दी से रिऐक्शन देने की प्रवृत्ति में वृद्धि ले लेता है. जहां पहले दोस्त अरसे तक बैठ कर बात करते थे, अब दो शब्द, एक स्टीकर उन की दोस्ती का पूर्णविराम हैं.

विचार करने की ताकत घटती

भारत में एक स्टडी दिखाती है कि 91 फीसदी जेन जी वाले सोशल मीडिया से न्यूज लेते हैं. यानी, ख़बरों, बहसों और मुद्दों पर उन की पहली नजर वही एल्गोरिदम तय करता है जो एंगेजमैंट बढ़ाने के लिए काम करता है. युवाओं की एक बड़ी दिक़्क़त यह है कि वे अकसर लंबे कंटैंट को पढ़ने, किताब या गहराई वाले लेखों से दूरी बना कर रखते हैं, वे अपनी राय सोशल मीडिया, शौर्ट पोस्ट्स, इन्फ्लुएंसर्स की ओपिनियन या मीम के जरिए जाहिर करते हैं.

जब दोस्त आपस में बात करते हैं तो उन के पास चर्चा के लिए ज़्यादातर वही तैयार राय होती है जो हालिया टाइमलाइन ने उन्हें दी है. ज्यादा व गहरी जानकारी लौंग फौर्मेंट की किताबों, लेखों को पढ़ने से बनती है जबकि वे अपनी चर्चा बहुत छोटे में निबटा देते हैं. ऐसे में बहस जल्दी पोलराइज्ड हो जाती है या तो एग्री, या फिर फुल्ली डिसएग्री.

इमोशन की जगह ट्रोलिंग

भारत में औनलाइन ट्रोलिंग अब छिपछिपा कर नहीं हो रही बल्कि यह कल्चर का हिस्सा बन चुकी है; ट्रोलर्स अब गंभीरता का विषय नहीं बल्कि मजाक का विषय बन गए हैं. सरकाज्म, मीम और गालीगलौज के मिलेजुले पैटर्न ने जेन जी की फ्रैंडशिप को भी प्रभावित किया है, जहां हलकाफुलका मज़ाक और ‘लेग पुलिंग’ की जगह अब ‘रोस्ट कल्चर’ और ‘सैवेज रिप्लाई’ ने ले ली है.

ऐसी औनलाइन भाषा में संवेदनशीलता के लिए बहुत कम जगह होती है. जो दोस्त अपनी किसी पर्सनल परेशानी, मैंटल हैल्थ या रिश्तों की दिक़्क़त पर बात करना चाहता है वह अकसर डरता है कि कहीं उस का दर्द मजाक या मीम न बन जाए, या उस के शब्दों के स्क्रीनशौट किसी ग्रुप में फौरवर्ड न कर दिए जाएं.  नतीजा यह कि युवा या तो खुद ट्रोल बन जाते हैं ताकि कमजोर न दिखें, या फिर चुप हो जाते हैं. दोनों ही स्थितियों में दोस्ती से भावनात्मक सुरक्षा गायब हो जाती है.

थ्योरी नहीं, टाइमलाइन

सोशल मीडिया के दौर में ‘क्या ट्रैंडिंग है’ यह तय करता है कि आज दोस्तों की बातचीत किस पर होगी. भारत में डिजिटल पापुलेशन 80 करोड़ से ऊपर है और करोड़ों जेन जी यूजर रोज़ाना अलगअलग प्लेटफौर्म पर ऐक्टिव हैं. इन की टाइमलाइन पर जो बहसें चल रही होती हैं वही उन के छोटेछोटे सर्कल में भी दोहराई जाती हैं.

समस्या तब गहरी हो जाती है जब सैद्धांतिक समझ चाहे वो राजनीति की हो, जैंडर की, समाज की या अर्थव्यवस्था की हो, लगभग न के बराबर रह जाती है, डिस्कशन सिर्फ वनलाइनर तक सीमित हो जाता है.

ये सब कारण कहीं न कहीं जेन जी की फ्रैंडशिप पर असर डाल रहे हैं. जेन जी आपस में मस्तीमजाक करते तो दिख जाते हैं जैसा उन्हें रील में भी दिखाई देता है मगर जहां इमोशन शेयर करने की बात आती है वहां वे अपनी बात को न तो रख पाते हैं न ही दूसरे के इमोशन को समझ पाते हैं. यह स्थिति उन की दोस्ती को गहरा करने से रोकती है. Friendship Issues :

Ekaki Movie : फिल्मों से पैसा कमाने का यूट्यूब मौडल कितना हिट ? “एकाकी” कहीं अकेली न पड़ जाए!

Ekaki Movie : इन्फ्लुएंसर आशीष चंचलानी ने ओटीटी पर अपनी वैब सीरीज ‘एकाकी’ को रिलीज न कर सीधे यूट्यूब पर फ्री में जारी कर दिया है. ऐसा पहले टीवीएफ भी कर चुका है मगर अंत में उसे बड़े ओटीटी प्लेटफौर्म की तरफ जाना पड़ा. अब ‘एकाकी’ का क्या होगा?

इन्फ्लुएंसर आशीष चंचलानी को कौन नहीं जानता. यूट्यूब वीडियो से नाम कमा कर वह अब मूवी व वैब सीरीज में भी दिखने लगा है. कभी मोटा दिखने के चलते ट्रोल हुआ आशीष अपने फिजिकल ट्रांसफौर्मेशन के लिए भी काफी चर्चा में रहा.

म्यूजिक वीडियो बनाने के बाद अब उस की एक सीरीज आई है ‘एकाकी’ नाम से. इस का ख़ास कहीं जिक्र नहीं हुआ. दरअसल, सोशल मीडिया क्रिएटर की जर्नी का पीक पौइंट अगर किसी को जाननासमझना हो तो भुवन बाम, आशीष चंचलानी या मुनव्वर फारूकी जैसे नाम उदाहरण के तौर पर लिए जा सकते हैं.

आशीष से पहले भुवन बाम और मुनव्वर भी अपनी सीरीज ले कर आ चुके हैं. आशीष भी उसी जुगत में है कि कैसे भी कर के वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना पाए. मगर यह रास्ता आसान नहीं. इस पर सिद्धार्थ अरोड़ा सहर ने अपनी टिप्पणी दी है.

सिद्धार्थ ने आशीष की नई सीरीज को ले कर फेसबुक पर कहा, “कोई लेखक, निर्देशक, गायक, गीतकार, संगीतकार या कोई कलाकार, अगर अपने हुनर से पैसा कमाना चाहे तो उसे किसी न किसी के नीचे रह कर, उस की मरजी और उस के मूड के अनुसार काम करना पड़ता है. लेखकों को लगता है कि ऐक्टर मजे में है, ऐक्टर सोचता है डायरैक्टर की मौज है और डायरैक्टर को लगता है कि प्रोड्यूसर की ऐश है.

“पर हक़ीकतन एकएक शख्स दूसरे पर निर्भर है. लेखक कुछ भी लिख दे, जाएगा तो वही जो डायरैक्टर को समझ आएगा, उसे समझ नहीं आया तो फिर कितनी ही सुंदर बात लिखी हो, व्यर्थ है. डायरैक्टर और प्रोड्यूसर्स भी स्टूडियो पर, ओटीटी प्लेटफौर्म पर डिपैंड हैं. वहीं मैं आशीष चंचलानी और इन के जैसे यूट्यूबर्स को देखता हूं तो इन में अपनी आज़ादी भी दिखती है.”

दरअसल सिद्धार्थ आशीष चंचलानी के किसी ओटीटी प्लेटफौर्म पर अपनी सीरीज को न रिलीज किए जाने की बात कर रहे हैं. आशीष ने अपनी सीरीज अपने यूट्यूब चैनल पर रिलीज की है, जिस का एक एपिसोड अभी, 28 नवंबर, तक रिलीज किया गया है और 7.9 मिलियन यानी तकरीबन 79 लाख लोगों ने इसे देख लिया है.

सिद्धार्थ आगे कहते हैं, “लंबे समय से निर्मित ‘एकाकी’ नाम से वैब सीरीज़ आखिरकार अब यूट्यूब पर स्ट्रीम हो गई है. पहले यह फ़िल्म थी, अब सीरीज़ में कन्वर्ट कर दिया गया है इसे. इस को देखने के लिए किसी सब्सक्रिप्शन का लफड़ा नहीं है. इस के प्रोड्यूसर, डायरैक्टर, राइटर और लीड ऐक्टर सबकुछ आशीष ही हैं. मुझे अंदाज़ा है कि 8 एपिसोड भी हों तो एक सीरीज़ बनाने में कितना खर्च आ सकता है. आशीष ने तो प्रोडक्शन वैल्यू में कोई कमी भी नहीं छोड़ी है. फिर भी उन्होंने किसी ओटीटी प्लेटफौर्म को अपनी सीरीज बेच कर चैन की नींद सोने के बजाय डायरैक्ट पब्लिक डोमैन पर फ्री में डालना बेहतर समझा.”

देखा जाए तो आशीष के समकक्ष बाकी इन्फ्लुएंसर ने किसी न किसी तरह से अपनी सीरीज को ओटीटी प्लेटफौर्म पर बेचा है, जैसे भुवन बाम की सीरीज ‘ताजा खबर’ के राइट्स हौटस्टार के पास हैं. वहीं मुन्नवर फारूकी की सीरीज ‘फर्स्ट कौपी’ एमएक्स प्लेयर पर है.

सिद्धार्थ आगे कहते हैं कि आशीष चंचलानी को प्रतिदिन अपनी सीरीज बनाने में मिनिमम खर्च भी ले कर चलें तो भी 10 लाख रुपए आता है. मतलब 50 दिन का मान कर चलें तो 5 करोड़ की लागत तो कम से कम है. व कहते हैं, “अब आप सोचिए, क्या यूट्यूब पर एक सीरीज़ से 5 करोड़ रुपए निकालना आसान है? अगर 3 डौलर आरपीएम भी मिल गया तो हरेक मिलियन व्यूज़ पर 3,000 डौलर्स के आसपास बनेंगे. अब तक 8 घंटे में 4 मिलियन से ज़्यादा व्यूज हो चुके हैं, यानी कम से कम 12,000 डौलर्स का रेवेन्यू बना होगा जो रुपए में 11 लाख के आसपास है.”

इस का मतलब आशीष को सिर्फ पैसे निकालने के लिए 5 लाख डौलर्स की ज़रूरत पड़ेगी, जिस के लिए इस पूरी सीरीज़ पर 180 मिलियन व्यूज़ जाने चाहिए.

सिद्धार्थ सोशल मीडिया और फिल्मों पर अपनी टिप्पणियां करते हैं. वे मोटामोटा हिसाब लगाते हैं कि आशीष का सीरीज को यूट्यूब पर रिलीज करना रिस्की मामला है मगर आशीष ने रिस्क लिया तो वे उस आजादी को भी भोग रहे हैं जो ओटीटी पर बेच कर बाकी क्रिएटर नहीं भोग पाते.

इस में कोई शक नहीं. मगर क्रिएटिव आजादी पैसों के नुकसान पहुंचाने के आधार पर जस्टिफाई नहीं हो पाती. बेशक आशीष ने यूट्यूब पर जाने का फैसला किया वो भी फ्री में दिखाने के, इस से व्यू ही मिल पाएंगे, जो उन के 3 करोड़ फौलोअर्स से खर्चा वसूली संभव नहीं, तब जब मुफ्त में कंटैंट यहांवहां पड़ा हो और फिल्म इंडस्ट्री के लोग लगभग मुफ्त में अपनी फ़िल्में दिखा रहे हों.

देखना यह है कि आशीष का यह मौडल कितना सफल होता है. Ekaki Movie :

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