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Hindi Social Story : नो गिल्ट ट्रिप प्लीज – कपिल क्यों आत्महत्या करना चाहता था ?

Hindi Social Story : नेहा औफिस से निकली तो कपिल बाइक पर उस का इंतज़ार कर रहा था. वह इठलाती हुई उस की कमर में हाथ डाल कर उस के पीछे बैठ गई फिर मुंह पर स्कार्फ बांध लिया. कपिल ने मुसकराते हुए बाइक स्टार्ट की. सड़क के ट्रैफिक से दूर बाइक पर जब कुछ खाली रोड पर निकली तो नेहा ने कपिल की गरदन पर किस कर दिया. कपिल ने सुनसान जगह देख कर बाइक एक किनारे लगा दी. नेहा हंसती हुई बाइक से उतरी और  कपिल ने जैसे ही हैलमेट उतार कर रखा, नेहा ने कपिल के गले में बांहें डाल दीं. कपिल ने भी उस की कमर में हाथ डाल उसे अपने से और सटा लिया. दोनों काफी देर तक एकदूसरे में खोए रहे.

उतरतीचढ़ती सांसों को काबू में करते हुए नेहा बोली,” सुनो, अभी मेरे घर चलना चाहोगे?”

”क्या?” कपिल हैरान हो गया.

”हां, घर पर कोई नहीं है, चलो न.”

”तुम्हारे मम्मीपापा कहां गए?”

”किसी की डैथ पर अफसोस करने गए हैं, रात तक आएंगे.”

”तो चलो, फिर हम देर क्यों कर रहे हैं? मैं तो अभी से सोच कर मरा जा रहा हूं कि क्या हम सचमुच अभी वही करने जा रहे हैं जो हम 15 दिनों से नहीं कर पाए. यार, रूड़की में जगह ही नहीं मिलती. पिछली बार मेरे घर पर कोई नहीं था, तब मौका मिला था.”

”चलो अब, बातें नहीं कुछ और करने का मूड है अभी.”

कपिल ने बड़े उत्साह से बाइक नेहा के घर की तरफ दौड़ा दी. रास्ते भर मुंह पर स्कार्फ बांधे नेहा कपिल की कमर में बाहें डाल उस से लिपटी रही. दोनों युवा प्रेमी अपनीअपनी धुन में खोए हुए थे.

दोनों का अफेयर 2 साल से चल रहा था. दोनों का औफिस एक ही बिल्डिंग में था. इसी बिल्डिंग में कभी कैफेटैरिया में, तो कभी लिफ्ट में मिलते रहने से दोनों की जानपहचान हुई थी. दोनों ने एकदूसरे को देखते ही पसंद कर लिया था.

नेहा की बोल्डनैस पर कपिल फिदा था तो कपिल के शांत व सौम्य स्वभाव पर नेहा मुग्ध हो गई थी. इन 2 सालों में दोनों पता नहीं कितनी बार शारीरिक रूप से भी पास आ गए थे. नेहा लाइफ को खुल कर जीना चाहती थी. कई बार तो कपिल उस के जीने के ढंग को देख कर हैरान रह जाता.

नेहा के घर में उसके पेरैंट्स थे. दोनों कामकाजी थे. छोटा भाई कालेज में पढ़ रहा था. कपिल अपने पेरैंट्स की इकलौती संतान था. उस की मम्मी हाउसवाइफ थी. कपिल के पिता रवि एक बिल्डर थे. आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी.

कपिल ने अपने घर में नेहा के बारे में बता दिया था. नेहा को बहू बनाने में कपिल के पेरैंट्स को कोई आपत्ति  नहीं थी. नेहा कपिल के घर भी आतीजाती रहती पर नेहा के घर में कपिल के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था.

हमेशा की तरह कपिल ने नेहा की बिल्डिंग से कुछ दूर एक शौपिंग कौंप्लैक्स की पार्किंग में बाइक खड़ी की. पहले नेहा अपने घर गई. थोड़ी देर बाद कपिल उस के घर पहुंचा. पहले भी घर पर किसी के न होने का  दोनों ने भरपूर फायदा उठाया था.

घर में अंदर जाते ही कपिल ने अपना बैग एक तरफ रख नेहा को बांहों में भर लिया. उस पर अपने प्यार की बरसात कर दी. नेहा ने उस बरसात में अपनेआप को पूरी तरह भीग जाने दिया. प्यार की यह बरसात नेहा के बैड पर कुछ देर बाद ही रुकी.

कपिल ने कहा,”यार, अब तुम्हारे बिना रहा नहीं जाता, चलो न, शादी कर लेते हैं. देर क्यों कर रही हो?”

नेहा ने अपने बोल्ड अंदाज में कहा,”शादी के लिए क्यों परेशान हो?, जो बाद में करना है अभी कर ही रहे हैं न.”

‘अरे ,ऐसे नहीं, अब चोरीचोरी नहीं, खुल कर अपने घर में तुम्हारे साथ रहना है.”

”पर मेरा मूड शादी का नहीं है, कपिल.”

”कब तक इंतजार करवाओगी?”

”पर मैं ने तो यह कभी नहीं कहा कि मैं तुम से शादी जल्दी ही करूंगी.”

”पर मैं तो तुम से ही करूंगा, मैं तुम्हारे बिना जी ही नहीं सकता, नेहा. मैं ने सिर्फ तुम से ही प्यार किया है.”

”ओह, कपिल,” कहते हुए नेहा ने फिर कपिल के गले में बांहें डाल दीं, कहा, ”चलो, अब तुम्हे फिर कौफी पिलाती हूं.”

दोनों ने कौफी भी काफी रोमांस करते हुए पी. कपिल थोड़ी देर बाद चला गया. हर समय टच में रहने के लिए व्हाट्सऐप था ही.

यह दोनों का रोज का नियम था कि कपिल ही नेहा को उस के घर छोड़ कर जाता. कपिल ने घर जा कर साफसाफ बताया कि वह नेहा के साथ था.

उस की मम्मी सुधा ने कहा,” बेटा, तुम दोनों शादी क्यों नहीं कर रहे हो? अब दोनों ही अच्छी नौकरी भी कर रहे हो, तो देर किस बात की है?”

”मम्मी, अभी नेहा शादी नहीं करना चाहती.”

”फिर कब तक करेगी ?उस के पेरैंट्स क्या कहते हैं?”

”कुछ नहीं,मम्मी. अभी तो उस ने अपने घर में हमारे बारे में बताया ही नहीं.”

”यह क्या बात हुई ?”

”छोड़ो मम्मी, जैसा नेहा को ठीक लगे. वह शायद और टाइम लेना चाहती है.”

”बेटा, एक बात और मेरे मन में है. क्या तुम उस से निभा लोगे? वह काफी बोल्ड लड़की है, तुम ठहरे सीधेसादे.”

”मम्मी, वह आज की लड़की है. आज की लड़कियां आप के टाइम से थोड़ी अलग होती हैं. नेहा बोल्ड है मगर गलत नहीं. आप चिंता न करो वह शायद कुछ और रुकना चाहती है.”

“पर मुझे लगता है अब तुम सीरियसली शादी के बारे में सोचो.”

”अच्छा ठीक है मम्मी, उस से बात करता हूं.”

2 दिन बाद ही नेहा ने कपिल से कहा,”यार, लौटरी लग गई, मेरा भाई दोस्तों के साथ पिकनिक पर जा रहा है और मेरे चाचा की तबीयत खराब हो गई है. मेरे मम्मीपापा उन्हें देखने दिल्ली जा रहे हैं. चलो, अब तुम भी अपने घर बोल दो कि तुम भी टूर पर जा रहे हो. दोनों औफिस से छुट्टी ले कर जम कर घर पर ऐश करेंगे.”

”सच?”

”लाइफ ऐंजौय करेंगे, यार. आ जाओ, खाना बाहर से और्डर करेंगे. बस सिर्फ ऐश ही ऐश.”

कपिल नेहा को दिलोजान से चाहता था. जैसा उस ने कहा था कपिल ने वैसा ही किया. वह अपने घर पर टूर पर जाने की बात बता कर नेहा के घर रात गुजारने के लिए अपने कपङे वगैरह ले कर आ गया. दोनों ने जीभर कर रोमांस किया. जब मन हुआ पास आए, एकदूसरे में खोए रहे.

कपिल ने कहा,”यार, तुम्हारे साथ ये पल ही मेरा जीवन हैं. अब तुम हमेशा के लिए मेरी लाइफ में जल्दी आ जाओ. अब मैं नहीं रुक सकता बोलो, कब मिला रही हो अपने पेरैंट्स से?”

नेहा ने प्यार से झिड़का,”तुम क्या यह शादीशादी करते रहते हो? शादी की क्या आफत आई है? और मैं तुम्हें कितनी बार बता चुकी हूं कि मेरा मूड शादी करने का नहीं है.”

अब कपिल गंभीर हुआ,”नेहा, यह क्या कहती रहती हो? मेरी मम्मी बारबार मुझे शादी करने के लिए कह रही हैं और हम रूक क्यों रहे हैं ?”

नेहा ने अब शांत पर गंभीर स्वर में कहा ,”देखो, मैं अभी काफी साल शादी के बंधन में नहीं बंधने वाली. अभी मैं सिर्फ 26 साल की हूं और लाइफ ऐंजौय कर रही हूं.”

”पर मैं 30 का हो रहा हूं. आज नहीं तो कल हमें शादी करनी ही है. एकदूसरे के इतने करीब हैं तो चोरीचोरी कब तक क्यों मिलें?”

”यह मैं ने कब कहा कि आज नहीं तो कल हम शादी कर ही रहे हैं?”

”मतलब ?”

”देखो, कपिल अब तक मैं ने तुम्हें अपने पेरैंट्स से इसलिए नहीं मिलवाया क्योंकि अरैंज्ड मैरिज तो हमारी होगी नहीं क्योंकि हम अलगअलग जाति के हैं. मेरे पेरैंट्स ठहरे पक्के पंडित और तुम हम से नीची जाति के. अभी इस उम्र में जाति को ले कर मुझे टैंशन चाहिए ही नहीं. हम प्यार, रोमांस सैक्स सब कुछ तो ऐंजौय कर रहे हैं, तुम शादी के पीछे क्यों पड़े हो? शादी तो अभी दूरदूर तक मैं नहीं करने वाली.”

”क्या तुम मुझे प्यार नहीं करतीं?”

”करती तो हूं.”

”फिर तुम्हारा मन नहीं करता कि हम दोनों एकसाथ रहने के लिए शादी कर लें?”

‘नहीं, यह मन तो नहीं करता मेरा.”

”अच्छा बताओ, कितने दिन रुकना चाहती हो, मैं तुम्हारा इंतजिर करूंगा.”

”मुझे नहीं पता.”

कपिल कुछ गंभीर सा बैठ गया तो नेहा ने शरारती अंदाज में मस्ती शुरू कर दी. कहा,”मैं तुम्हें फिर कहती हूं कि शादी की रट छोड़ो, लाइफ को ऐंजौय करो.”

”मतलब तुम मुझ से शादी नहीं करोगी?”

”नहीं.”

”मैं समझ ही नहीं पा रहा, नेहा यह सब क्या है? तुम 2 साल से मेरे साथ रिलैशनशिप में हो, पता नहीं कितनी बार हम ने सैक्स किया होगा और तुम कह रही हो कि मुझ से शादी नहीं करोगी?”

“सैक्स कर लिया तो कौन सा गुनाह कर लिया? हम एकदूसरे को पसंद करते थे और करीब आ गए. अच्छा लगा. इस में शादी कहां से आ गई?”

”तो शादी कब और किस से करने वाली हो ?”

”अभी तो कुछ भी नहीं पता. मैं यह सोच कर तुम से सैक्स थोड़े ही कर रही थी कि तुम से ही शादी करूंगी. कपिल, अब वह जमाना गया जब कोई लड़की किसी लङके को इसलिए अपने पास आने देती थी कि उसी से शादी करेगी. ऐसा कुछ नहीं है अब. कम से कम मैं ऐसा नहीं सोचती. अभी मैं लाइफ ऐंजौय करने के मूड में हूं. अभी गृहस्थी संभालने का मेरा कोई मूड नहीं. तुम भी अब यह शादी शादी की रट छोड़ दो और ऐंजौय करो.”

”नहीं… नेहा मैं इस रिश्ते को कोई नाम देना चाहता हूं.”

नेहा अब झुंझला गई,” तो कोई ऐसी लड़की ढूंढ़ लो जो तुम से अभी शादी कर ले.”

कपिल ने भावुक हो कर उस का हाथ पकड़ लिया,”ऐसा कभी न कहना नेहा. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता.”

”अरे, सब कहने की बातें हैं. रोज हजारों दिल जुड़ते हैं और हजारों टूटते हैं. सब चलता रहता है.”

कपिल की आंखों में सचमुच नमी आ गई. यह नमी गालों पर भी बह गई  तो नेहा हंस पड़ी,” यह क्या कपिल, इतना इमोशनल क्यों हो यार… रिलैक्स.”

”कभी मुझ से दूर मत होना, नेहा. आई रियली लव यू , कहतेकहते कपिल ने उसे बांहों में भर कर किस कर दिया. नेहा भी उस के पास सिमट आई. थोड़ी देर रोमांस चलता रहा.

काफी समय दोनों ने साथ बिता लिया था. अगले दिन कपिल घर जाने लगा तो नेहा ने कहा,”कपिल, बी प्रैक्टिकल.”

कपिल ने उसे घूरा तो वह हंस पड़ी और कहा ,”प्रैक्टिकल होने में ही समझदारी है. इमोशनल हो कर मुझे गिल्ट ट्रिप पर भेजने की कोशिश मत करो.”

कुछ दिन तो सामान्य से कटे , फिर कपिल ने महसूस किया कि नेहा उस से कटने लगी है. कभी फोन पर कह देती,”तुम जाओ, मेरी कुछ जरूरी मीटिंग्स हैं, देर लगेगी. कभी मिलती तो जल्दी में होती. बाइक पर कभी साथ भी होती तो चुप ही रहती. पहले की तरह बाइक पर शरारतों भरा रोमांस खत्म होने लगा. दूरदूर अजनबी सी बैठी रहती. कपिल के पूछने पर औफिस का स्ट्रैस कह देती.कपिल को साफ समझ आ रहा था कि वह उस से दूर हो रही है. फोन भी अकसर नहीं उठाती और कुछ भी बहाना कर देती.

एक दिन कपिल ने बाइक रास्ते में एक सुनसान जगह पर रोक दी और पूछा,”नेहा, मुझे साफसाफ बताओ कि तुम मुझ से दूर क्यों भाग रही हो ? मुझे तुम्हारा यह अजनबी जैसा व्यवहार बरदाश्त नहीं हो रहा है.”

नेहा ने भी अपने मन की बात उस दिन साफसाफ बता दी,” कपिल, तुम बहुत इमोशनल हो. हमारे अभी तक के संबंधों को शादी के रूप में देखने लगे हो. मेरा अभी दूरदूर तक शादी का इरादा नहीं है. अभी तो मुझे अपने कैरियर पर ध्यान देना है. मैं शादी के झमेले में अभी नहीं फंसना चाहती. तुम्हारी शादी की चाहत से मैं बोर होने लगी हूं और शायद तुम जैसे इमोशनल इंसान के साथ मेरी ज्यादा निभे भी न, तो समझो कि मैं तुम से ब्रैकअप कर रही हूं.”

कपिल का स्वर भर्रा गया,”ऐसा मत कहो, नेहा. मैं तुम्हारे बिना जीने की सोच भी नहीं सकता.”

”अरे ,यह सब डायलाग फिल्मों के लिए रहने दो. कोई किसी के बिना नहीं मरता. चलो, आज लास्ट टाइम घर छोड़ दो अब ऐंड औल द बैस्ट फौर योर फ्यूचर. एक अच्छी लड़की ढूंढ़ कर शादी कर लो. और हां, मुझे भी बुला लेना, मैं भी आउंगी. मुझे कोई गिल्ट नहीं है और मैं उन में से भी नहीं जो अपने प्रेमी को किसी और का होते न देख सकूं, ”कह कर नेहा जोर से हंसी.

कपिल ने उसे किसी रोबोट की तरह उस के घर तक छोड़ दिया.

“बाय, कपिल कह कर इठ लाती हुई नेहा अपने घर की तरफ चली गई. नेहा ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा. कपिल नेहा को तब तक देखता रहा जब तक वह उस की आंखों से ओझल न हो गई.

कपिल वापसी में रोता हुआ बाइक चलाता रहा. वह सचमुच नेहा से प्यार करता था. उस के बिना जीने की वह कल्पना ही नहीं कर पा रहा था.

लुटापिटा, हारा सा घर पहुंचा. उस की शक्ल देख कर उस की मम्मीपापा घबरा गए. वह खराब तबीयत का बहाना बता कर अपने कमरे में 2 दिन पड़ा रहा तो सब को चिंता हुई. न कुछ खापी रहा था और न ही कुछ बोल रहा था.

उस की मम्मी सुधा ने उस के एक दोस्त सुदीप को बुलाया. सुदीप उस के और नेहा के संबंधों के बारे में जानता था. सुदीप ने काफी समय कपिल के पास बैठ कर बिताया. कपिल कुछ बोल ही नहीं रहा था, पत्थर सा हो गया था. दीवानों सी हालत थी. बहुत देर बाद सुदीप के कुछ सवालों का जवाब उस ने रोते हुए दे कर बता दिया कि नेहा ने उसे छोड़ दिया है. सुदीप देर तक उसे समझाता रहा.

अगले दिन की सुबह घर में मातम ले कर आई. कपिल ने रात में हाथ की नस काट कर आत्महत्या कर ली थी. एक पेपर पर लिख गया था,”सौरी मम्मी, मुझे माफ कर देना. नेहा ने मुझे छोड़ दिया है. मैं उस के बिना नहीं जी पाउंगा. पापा, मुझे माफ कर देना.”

मातापिता बिलखते रहे. सुदीप पता चलने पर बदहवास सा भागा आया. जोरजोर से रोने लगा. बड़ी मुश्किल घङी थी. सुधा बारबार गश खाती और कहती कि क्या एक लड़की के प्यार में हमें भी भूल गया? हमारा अब कौन है? पडोसी, रिश्तेदार सब इकठ्ठा होते रहे. सब ने रमेश और सुधा को बहुत मुश्किल से संभाला. दोनों को कहां चैन आने वाला था. सुदीप को नेहा पर बहुत गुस्सा आ रहा था.

एक शाम वह नेहा के औफिस की बिल्डिंग के नीचे खड़े हो कर उस का इंतजार करने लगा. वह निकली तो उस ने अपना परिचय देते हुए उसे कपिल की आत्महत्या के बारे में बताया तो नेहा ने एक ठंडी सांस ले कर कहा ,”दुख जरूर हुआ मुझे पर गिल्ट फील करवाने की जरूरत नहीं है. वह कमजोर था , मेरी सचाई के साथ कही बात को सहन नहीं कर पाया तो मेरी गलती नहीं है. उस की आत्महत्या के लिए मैं खुद को दोषी बिलकुल नहीं समझूंगी. मुझे गिल्ट ट्रिप मत भेजो, ओके…” कहते हुए वह सधे कदमों से आगे बढ़ गई. सुदीप हैरानी से उसे देखता रह गया. Hindi Social Story :

Hindi Romantic Story : अंधेरे से उजाले की ओर – होश में आने के बाद जयंत ने क्या किया ?

Hindi Romantic Story :

Writer- Lalita S

कमरे में प्रवेश करते ही डा. कृपा अपना कोट उतार कर कुरसी पर धड़ाम से बैठ गईं. आज उन्होंने एक बहुत ही मुश्किल आपरेशन निबटाया था.

शाम को जब वे अस्पताल में अपने कक्ष में गईं, तो सिर्फ 2 मरीजों को इंतजार करते हुए पाया. आज उन्होंने कोई अपौइंटमैंट भी नहीं दिया था. इन 2 मरीजों से निबटने के बाद वे जल्द से जल्द घर लौटना चाहती थीं. उन्हें आराम किए हुए एक अरसा हो गया था. वे अपना बैग उठा कर निकलने ही वाली थीं कि अपने नाम की घोषणा सुनी, ‘‘डा. कृपा, कृपया आपरेशन थिएटर की ओर प्रस्थान करें.’’

माइक पर अपने नाम की घोषणा सुन कर उन्हें पता चल गया कि जरूर कोई इमरजैंसी केस आ गया होगा.

मरीज को अंदर पहुंचाया जा चुका था. बाहर मरीज की मां और पत्नी बैठी थीं.

मरीज के इतिहास को जानने के बाद डा. कृपा ने जैसे ही मरीज का नाम पढ़ा तो चौंक गईं. ‘जयंत शुक्ला,’ नाम तो यही लिखा था. फिर उन्होंने अपने मन को समझाया कि नहीं, यह वह जयंत नहीं हो सकता.

लेकिन मरीज को करीब से देखने पर उन्हें विश्वास हो गया कि यह वही जयंत है, उन का सहपाठी. उन्होंने नहीं चाहा था कि जिंदगी में कभी इस व्यक्ति से मुलाकात हो. पर इस वक्त वे एक डाक्टर थीं और सामने वाला एक मरीज. अस्पताल में जब मरीज को लाया गया था तो ड्यूटी पर मौजूद डाक्टरों ने मरीज की प्रारंभिक जांच कर ली थी. जब उन्हें पता चला कि मरीज को दिल का जबरदस्त दौरा पड़ा है तो उन्होंने दौरे का कारण जानने के लिए एंजियोग्राफी की थी, जिस से पता चला कि मरीज की मुख्य रक्तनलिका में बहुत ज्यादा अवरोध है. मरीज का आपरेशन तुरंत होना बहुत जरूरी था. जब मरीज की पत्नी व मां को इस बात की सूचना दी गई तो पहले तो वे बेहद घबरा गईं, फिर मरीज के सहकर्मियों की सलाह पर वे मान गईं. सभी चाहते थे कि उस का आपरेशन डा. कृपा ही करें. इत्तफाक से डा. कृपा अपने कक्ष में ही मौजूद थीं.

मरीज की बीवी से जरूरी कागजों पर हस्ताक्षर लिए गए. करीब 5 घंटे लगे आपरेशन में. आपरेशन सफल रहा. हाथ धो कर जब डा. कृपा आपरेशन थिएटर से बाहर निकलीं तो सभी उन के पास भागेभागे आए.

डा. कृपा ने सब को आश्वासन दिया कि आपरेशन सफल रहा और मरीज अब खतरे से बाहर है. अपने कमरे में पहुंच कर डा. कृपा ने कोट उतार कर एक ओर फेंक दिया और धड़ाम से कुरसी पर बैठ गईं.

आंखें बंद कर आरामकुरसी पर बैठते ही उन्हें अपनी आंखों के सामने अपना बीता कल नजर आने लगा. जिंदगी के पन्ने पलटते चले गए.

कृपा शक्लसूरत में अपने पिता पर गई थी

उन्हें अपना बचपन याद आने लगा… जयपुर में एक मध्यवर्गीय परिवार में वे पलीबढ़ी थीं. उन का एक बड़ा भाई था, जो मांबाप की आंखों का तारा था. कृपा की एक जुड़वां बहन थी, जिस का नाम रूपा था. नाम के अनुरूप रूपा गोरी और सुंदर थी, अपनी मां की तरह. कृपा शक्लसूरत में अपने पिता पर गई थी. कृपा का रंग अपने पिता की तरह काला था. दोनों बहनों की शक्लसूरत में मीनआसमान का फर्क था. बचपन में जब उन की मां दोनों का हाथ थामे कहीं भी जातीं, तो कृपा की तरफ उंगली दिखा कर सब यही पूछते कि यह कौन है?

उन की मां के मुंह से यह सुन कर कि दोनों उन की जुड़वां बेटियां हैं, लोग आश्चर्य में पड़ जाते. लोग जब हंसते हुए रूपा को गोद में उठा कर प्यार करते तो उस का बालमन बहुत दुखी होता. तब कृपा सब का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए रोती, मचलती.

तब उसे पता नहीं था कि मानवमन तो सुंदरता का पुजारी होता है. तब वह समझ नहीं पाती थी कि लोग क्यों उस के बजाय उस की बहन को ही प्यार करते हैं. एक बार तो उसे इस तरह मचलते देख कर किसी ने उस की मां से कह भी दिया था कि लीला, तुम्हारी इस बेटी में न तो रूप है न गुण.

धीरेधीरे कृपा को समझ में आने लगा अपने और रूपा के बीच का यह फर्क.

मां कृपा को समझातीं कि बेटी, समझदारी का मानदंड रंगरूप नहीं होता. माइकल जैकसन काले थे, पर पूरी दुनिया के चहेते थे. हमारी बेटी तो बहुत होशियार है. पढ़लिख कर उसे मांबाप का नाम रोशन करना है. बस, मां की इसी बात को कृपा ने गांठ बांध लिया. मन लगा कर पढ़ाई करती और कक्षा में हमेशा अव्वल आती.

कृपा जब थोड़ी और बड़ी हुई तो उस ने लड़कों और लड़कियों को एकदूसरे के प्रति आकर्षित होते देखा. उस ने बस, अपने मन में डाक्टर बनने का सपना संजो लिया था. वह जानती थी कि कोई उस की ओर आकर्षित नहीं होगा. यदि मनुष्य अपनी कमजोर रग को पहचान ले और उसे अनदेखा कर के उस क्षेत्र में आगे बढ़े जहां उसे महारत हासिल हो, तो उस की कमजोर रग कभी उस की दुखती रग नहीं बन सकती. इसीलिए जब जयंत ने उस की ओर हाथ बढ़ाया तो उस ने उसे ठुकरा दिया.

कृपा का ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य की ओर था. एक दिन उस ने जयंत को अपने दोस्तों से यह कहते हुए सुना कि मैं कृपा से इसलिए दोस्ती करना चाहता हूं, क्योंकि वह बहुत ईमानदार लड़की है, कितने गुण हैं उस में, हमेशा हर कक्षा में अव्वल आती है, फिर भी जमीन से जुड़ी है.

उस दिन के बाद कृपा का बरताव जयंत के प्रति नरम होता गया. 12वीं कक्षा की परीक्षा में अच्छे नंबर आना बेहद जरूरी था, क्योंकि उन्हीं के आधार पर मैडिकल में दाखिला मिल सकता था. सभी को कृपा से बहुत उम्मीदें थीं.

जयंत बेझिझक कृपा से पढ़ाई में मदद लेने लगा. वह एक मध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखता था. खाली समय में ट्यूशन पढ़ाता था ताकि मैडिकल में दाखिला मिलने पर उसे पैसों की दिक्कत न हो.

कृपा लाइब्रेरी में बैठ कर किसी एक विषय पर अलगअलग लेखकों द्वारा लिखित किताबें लेती और नोट्स तैयार करती थी.

पहली बार जब उस ने अपने नोट्स की एक प्रति जयंत को दी तो वह कृतार्थ हो गया. कहने लगा कि तुम ने मेरी जो मदद की है, उसे जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगा.

अब जब भी कृपा नोट्स तैयार करती तो उस की एक प्रति जयंत को जरूर देती.

एक दिन जयंत ने कृपा के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि हमारा साथ जीवन भर का हो जाए तो कैसा हो?

कृपा ने मीठी झिड़की दी कि अभी तुम पढ़ाई पर ध्यान दो, मजनू. ये सब तो बहुत बाद की बातें हैं.

कृपा ने झिड़क तो दिया पर मन ही मन वह सपने बुनने लगी थी. जयंत स्कूल से सीधे ट्यूशन पढ़ाने जाता था, इसलिए कृपा रोज जयंत से मिल कर थोड़ी देर बातें करती, फिर जयंत से चाबी ले कर नोट्स उस के कमरे में छोड़ आती. चाबी वहीं छोड़ आती, क्योंकि जयंत का रूममेट तब तक आ जाता था.

एक दिन लाइब्रेरी से बाहर आते समय कृपा ने हमेशा की तरह रुक कर जयंत से बातें कीं. जयंत अपने दोस्तों के साथ खड़ा था, पर जाते-जाते वह जयंत से चाबी लेना भूल गई. थोड़ी दूर जाने के बाद अचानक जब उसे याद आया तो वापस आने लगी. वह जयंत के पास पहुंचने ही वाली थी कि अपना नाम सुन कर अचानक रुक गई.

जयंत का दोस्त उस से कह रहा था कि तुम ने उस कुरूपा (कृपा) को अच्छा पटाया. तुम्हारा काम तो आसान हो गया, यार. इस साथी को जीवनसाथी बनाने का इरादा है क्या?

जयंत ने कहा कि दिमाग खराब नहीं हुआ है मेरा. उसे इसी गलतफहमी में रहने दो. बनेबनाए नोट्स मिलते रहें तो मुझे रोजरोज पढ़ाई करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. परीक्षा से कुछ दिन पहले दिनरात एक कर देता हूं. इस बार देखना, उसी के नोट्स पढ़ कर उस से भी अच्छे नंबर लाऊंगा.

जयंत के मुंह से ये सब बातें सुन कर कृपा कांप गई. उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. इतना बड़ा धोखा? वह उलटे पांव लौट गई. भाग कर घर पहुंची तो इतनी देर से दबी रुलाई फूट पड़ी. मां ने उसे चुप कराया. सिसकियों के बीच कृपा ने मां को किसी तरह पूरी बात बताई.

कुछ देर के लिए तो मां भी हैरान रह गईं, पर वे अनुभवी थीं. अत: उन्होंने कृपा को समझाया कि बेटे, अगर कोई यह सोचता है कि किसी सीधेसादे इनसान को धोखा दे कर अपना उल्लू सीधा किया जा सकता है, तो वह अपनेआप को धोखा देता है. नुकसान तुम्हारा नहीं, उस का हुआ है. व्यवहार बैलेंस शीट की तरह होता है, जिस में जमाघटा बराबर होगा ही. जयंत को अपने किए की सजा जरूर मिलेगी. तुम्हारी मेहनत तुम्हारे साथ है, इसलिए आज तुम चाबी लेना भूल गईं. पढ़ाई में तुम्हारी बराबरी इन में से कोई नहीं कर सकता. प्रकृति ने जिसे जो बनाया उसे मान कर उस पर खुश हो कर फिर से सब कुछ भूल कर पढ़ाई में जुट जाओ.

मां की बातों से कृपा को काफी राहत मिली, पर यह सब भुला पाना इतना आसान नहीं था.

हिम्मत जुटा कर दूसरे दिन हमेशा की तरह कृपा ने जयंत से चाबी ली, पर नोट्स रखने के लिए नहीं, बल्कि आज तक उस ने जो नोट्स दिए थे उन्हें निकालने के लिए. अपने सारे नोट्स ले कर चाबी यथास्थान रख कर कृपा घर की ओर चल पड़ी. 2-4 दिनों में छुट्टियां शुरू होने वाली थीं, उस के बाद इम्तिहान थे. चाबी लेते समय उस ने जयंत से कह दिया था कि अब छुट्टियां शुरू होने के बाद ही उस से मिलेगी, क्योंकि उसे 2-4 दिनों तक कुछ काम है. घर जाने पर उस ने मां से कह दिया कि वह छुट्टियों में मौसी के घर रह कर अपनी पढ़ाई करेगी.

जिस दिन छुट्टियां शुरू हुईं, उस दिन सुबह ही कृपा मौसी के घर की ओर प्रस्थान कर गई. जाने से पहले उस ने एक पत्र जयंत के नाम लिख कर मां को दे दिया.

छुट्टियां शुरू होने के बाद एक दिन जब जयंत ने नोट्स निकालने के लिए दराज खोली तो पाया कि वहां से नोट्स नदारद हैं. उस ने पूरे कमरे को छान मारा, पर नोट्स होते तो मिलते. तुरंत भागाभागा वह कृपा के घर पहुंचा. वहां मां ने उसे कृपा की लिखी चिट्ठी पकड़ा दी.

कृपा ने लिखा था, ‘जयंत, उस दिन मैं ने तुम्हारे दोस्त के साथ हुई तुम्हारी बातचीत को सुन लिया था. मेरे बारे में तुम्हारी राय जानने के बाद मुझे लगा कि मेरे नोट्स का तुम्हारी दराज में होना कोई माने नहीं रखता, इसलिए मैं ने नोट्स वापस ले लिए. मेरे परिवार वालों से मेरा पता मत पूछना, क्योंकि वे तुम्हें बताएंगे नहीं. मेरी तुम से इतनी विनती है कि जो कुछ भी तुम ने मेरे साथ किया है, उस का जिक्र किसी से न करना और न ही किसी के साथ ऐसी धोखाधड़ी करना वरना लोगों का दोस्ती पर से विश्वास उठ जाएगा. शुभ कामनाओं सहित, कृपा.’

पत्र पढ़ कर जयंत ने माथा पीट लिया. वह अपनेआप को कोसने लगा कि यह कैसी मूर्खता कर बैठा. इस तरह खुल्लमखुल्ला डींगें हांक कर उस ने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली थी. उस के पास किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, न ही इतना वक्त था कि नोट्स तैयार करता.

इम्तिहान से एक दिन पहले कृपा वापस अपने घर आई. दोस्तों से पता चला कि इस बार जयंत परीक्षा में नहीं बैठ रहा है.

उस के बाद कृपा की जिंदगी में जो कुछ भी घटा, सब कुछ सुखद था. पूरे राज्य में अव्वल श्रेणी में उत्तीर्ण हुई थी कृपा. दूरदर्शन, अखबार वालों का तांता लग गया था उस के घर में. सभी बड़े कालेजों ने उसे खुद न्योता दे कर बुलाया था.

मुंबई के एक बड़े कालेज में उस ने दाखिला ले लिया था. एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने आगे की पढ़ाई के लिए प्रवेश परीक्षाएं दीं. यहां भी वह अव्वल आई. उस ने हृदयरोग विशेषज्ञ बनने का फैसला लिया. एम.डी. की पढ़ाई करने के बाद उस ने 3 बड़े अस्पतालों में विजिटिंग डाक्टर के रूप में काम करना शुरू किया. समय के साथ उसे काफी प्रसिद्धि मिली.

इधर उस की जुड़वां बहन की पढ़ाई में खास दिलचस्पी नहीं थी. मातापिता ने उस की शादी कर दी. उस का भाई अपनी पत्नी के साथ दिल्ली में रहता था. भाई कभी मातापिता का हालचाल तक नहीं पूछता था. बहू ने दूरी बनाए रखी थी. जब अपना ही सिक्का खोटा था तो दूसरों से क्या उम्मीद की जा सकती थी.

बेटे के इस रवैए ने मांबाप को बहुत पीड़ा पहुंचाई थी. कृपा ने निश्चय कर लिया था कि मातापिता और लोगों की सेवा में अपना जीवन बिता देगी. कृपा ने मुंबई में अपना घर खरीद लिया और मातापिता को भी अपने पास ले गई.

चर्मरोग विशेषज्ञ डा. मनीष से कृपा की अच्छी निभती थी. दोनों डाक्टरी के अलावा दूसरे विषयों पर भी बातें किया करते थे, पर कृपा ने उन से दूरी बनाए रखी. एक दिन डा. मनीष ने डा. कृपा से शादी करने की इच्छा जाहिर की, पर दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है.

डा. कृपा ने दृढ़ता के साथ मना कर दिया. उस के बाद डा. मनीष की हिम्मत नहीं हुई दोबारा पूछने की. मां को जब पता चला तो मां ने कहा, ‘‘बेटे, सभी एक जैसे तो नहीं होते. क्यों न हम डा. मनीष को एक मौका दें.’’

डा. मनीष अपने किसी मरीज के बारे में डा. कृपा से सलाह करना चाहते थे. डा. कृपा का सेलफोन लगातार व्यस्त आ रहा था, तो उन्होंने डा. कृपा के घर फोन किया.

डा. कृपा घर पर भी नहीं थी. उस की मां ने डा. मनीष से बात की और उन्हें दूसरे दिन घर पर खाने पर बुला लिया. मां ने डा. मनीष से खुल कर बातें कीं. 4-5 साल पहले उन की शादी एक सुंदर लड़की से तय हुई थी, पर 2-3 बार मिलने के बाद ही उन्हें पता चल गया कि वे उस के साथ किसी भी तरह सामंजस्य नहीं बैठा सकते. तब उन्होंने इस शादी से इनकार कर दिया था.

मां की अनुभवी आंखों ने परख लिया था कि डा. मनीष ही डा. कृपा के लिए उपयुक्त वर हैं. अब तक डा. कृपा भी घर लौट चुकी थी. सब ने एकसाथ मिल कर खाना खाया. बाद में मां के बारबार आग्रह करने पर डा. मनीष से बातचीत के लिए तैयार हो गई डा. कृपा. उस ने डा. मनीष से साफसाफ कह दिया कि उस की कुछ शर्तें हैं, जैसे मातापिता की देखभाल की जिम्मेदारी उस की है, इसलिए वह उन के घर के पास ही घर ले कर रहेंगे. वह डा. मनीष के घर वालों की जिम्मेदारी भी लेने को तैयार थी, लेकिन इमरजैंसी के दौरान वक्तबेवक्त घर से जाना पड़ सकता है, तब उस के परिवार वालों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, वगैरह.

डा. मनीष ने उस की सारी शर्तें मान लीं और उन का विवाह हो गया. डा. मनीष जैसे सुलझे हुए व्यक्ति को पा कर कृपा को जिंदगी से कोई शिकायत नहीं रह गई थी. कुछ साल पहले डा. कृपा अपनेआप को कितनी कोसती थी. लेकिन अब उसे लगने लगा कि उस की जिंदगी में अब कोई अंधेरा नहीं है, बल्कि चारों तरफ उजाला ही उजाला है.

डा. कृपा धीरेधीरे वर्तमान में लौट आई. इस के बाद उस का सामना कई बार जयंत से हुआ. पहली बार होश आने पर जब जयंत ने डा. कृपा को देखा तो चौंकने की बारी उस की थी. कई बार उस ने डा. कृपा से बात करने की कोशिश की, पर डा. कृपा ने एक डाक्टर और मरीज की सीमारेखा से बाहर कोई भी बात करने से मना कर दिया.

डा. कृपा सोचने लगी, आज वह डा. मनीष के साथ कितनी खुश है. जिंदगी में कटु अनुभवों के आधार पर लोगों के बारे में आम राय बना लेना कितनी गलत बात है. कुदरत ने सुख और दुख सब के हिस्से में बराबर मात्रा में दिए हैं. जरूरत है तो दुख में संयम बरतने की और सही समय का इंतजार करने की. किसी की भी जिंदगी में अंधेरा अधिक देर तक नहीं रहता है, उजाला आता ही है. Hindi Romantic Story :

Social Interest : दिसंबर सेकंड इश्यू में “आपके अनुभव व पत्र”

Social Interest :

बढ़िया अंक

नवंबर (द्वितीय) अंक पढ़ा. इस अंक में प्रकाशित कहानी ‘जीवनज्योति’ मन को छू गई. इस के लेखक को साधुवाद. जहां तक लेख की बात है, सभी

लेख एक से बढ़ कर एक थे. स्थायी स्तंभ ‘इन्हें आजमाइए’, ‘पाठकों की समस्याएं’ भी काबिलेतारीफ थीं. इतना अच्छा अंक प्रस्तुत करने के लिए संपादन मंडल को बधाई. – हर ज्ञान सिंह सुथार हमसफर

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शानदार अंक

नवंबर (द्वितीय) अंक में अग्रलेख, ‘पलायन की त्रासदी’ बहुत सही लिखा गया है. बिहार में रोजगार की कमी है, इसलिए लोग पलायन कर रहे हैं और पलायन करने वाले ज्यादातर गरीब तबके के लोग ही होते हैं.

इस के अलावा लेख, ‘पति की मनमानी कब तक बर्दाश्त करें’ भी बहुत सटीक लिखा गया है. चाहे पत्नी पढ़ी-लिखी जॉब करने वाली हो या हाउसवाइफ, पति की मनमानी उसे सहनी पड़ती है. घर न टूटे, इसलिए पत्नियां पति की मनमानियां सहती जाती हैं.

कहानी ‘मकसद’ बहुत अच्छी लगी. सच में, दूसरे देशों में अगर अपने देश के लोग मिल जाएं तो मन खिल उठता है. – मिनी सिंह

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बच्चों के मुख से

हमारे पड़ोसी का 6 साल का बेटा ईशु बहुत चंचल व हाजिरजवाब है. एक बार हम लोग उस के जन्मदिन पार्टी में गए. वहां उस से कुछ बच्चों न पूछा, ‘‘तुम्हारा स्कूल आईसीएसई या सीबीएससी बोर्ड है?’’

उस ने तपाक से कहा, ‘‘मेरे स्कूल में ये दोनों नहीं, बल्कि ब्लैकबोर्ड है.’’

उस की बात सुनते ही हम सब लोगों का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया. – डी के श्रीवास्तव

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सर्दी में मैं अपने मायके गई. वहां मेरी भतीजी भी अपनी 4 साल की बेटी नूरी के साथ आई हुई थी.

एक रात हम सब रजाई में बैठे मूंगफली व गजक खा रहे थे. उस दिन ठंड भी बहुत थी. मेरी नातिन नूरी बाहर जाने के लिए मचल रही थी, ‘‘नानी मुझे बाहर घुमा कर लाओ.’’

मैं ने नूरी से कहा, ‘‘बाहर बहुत ठंड है बाहर

नहीं जाना, ठंड लग जाएगी.’’ इस पर वह बोली, ‘‘नानी आप ने शौल पहन रखी है न, फिर ठंड

कैसे लगेगी?’’

वह फिर बाहर जाने के लिए जिद करने लगी, ‘‘नानी बाहर चलो, नानी बाहर चलो.’’

इस बार मैं ने टालने की गरज से उस से कहा, ‘‘बेटा बाहर बहुत अंधेरा है मुझे तो डर लगता है.’’

इस पर वह तपाक से बड़ी ही दृढ़ता से बोली, ‘‘नानी मैं हूं न आप के साथ, फिर आप क्यों डर रहे हो?’’

उस का यह बालसुलभ जवाब सुन कर हम सब खूब हंसें. और फिर, मै उसे बाहर ले कर गई. – चंद्रा गुप्ता

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Editorial : सरित प्रवाह – एआई की दुनिया

Editorial : दुनियाभर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के गुब्बारे को इतना फुलाया गया कि ऐसा लगने लगा कि हर काम, जो पहले लगता था कि कैलकुलेटर करता था, वह एआई की देन माना जाने लगा है. एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का असली मतलब तब है जब कंप्यूटर अपने-आप पहले से न सिखाई बातों को केवल आधार मान कर मानव मस्तिष्क की तरह नया सोच सके.

अभी तक एआई को केवल इतना चतुर बनाया जा सका है कि वह पहले की एक-दो नहीं बल्कि लाखों साइटों के लाखों तथ्यों जो डौक्यूमैंट्स में पड़े हैं, जीपीएस की मदद ले कर, लोगों के निजी फोनों से निजी डेटा चुरा कर, पुरानी बात को नए शब्दों में कह सके.

कंपनियां इसी से बहुत ज्यादा प्रभावित हो गई हैं क्योंकि उन के बहुत से कर्मचारी केवल रट्टू तोते की तरह बात करने के ही आदी होते हैं और उन में भी सामने वाले की भावनाओं को सम झने की ताकत नहीं होती. इन कर्मचारियों के बदले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस मशीनें और फोन पर लिखित या आवाज में उत्तर देने वाले उन्हें भाने लगे हैं. वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर उसी तरह लाखों नहीं बल्कि खरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं जैसे इजिप्ट के फैरो ने वहां पिरामिड बना कर सोचा था कि वे फिर जिंदा हो कर आएंगे. तब भी कुछ चतुर लोगों ने राजाओं को बहकाया था, आज भी ब्राह्मणों की तरह सॉफ्टवेयर डेवलपर इन्वेस्टर्स को बहका रहे हैं कि उन पर खर्च करो, वे सारा संसार उन की मुट्ठी में ला देंगे.

जैसे मंदिरों और चर्चों को बनाने के बहाने आर्किटेक्चर की नई तकनीक निकलती है जो आम आदमी के काम आती है, वैसे ही कुछ लाभ तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लोगों को मिल रहे हैं लेकिन इस की लागत कहीं ज्यादा है. सभी कंपनियों का खर्च जोड़ लिया जाए तो 15 से 20 अरब डॉलर सालाना का नुकसान हो रहा है.

इस नुकसान को भरने के लिए कंपनियां बड़े-बड़े वादे कर के इन्वेस्टर्स को आकर्षित कर रही हैं और लोग क्रिप्टो करेंसी की तरह इन्वेस्ट करने के नाम पर लोगों को अपनी सेविंग इस धंधे में लगाने के लिए उकसा रहे हैं. म्यूचुअल फंड पैसा कहां लगाते हैं, यह इन्वेस्टर्स को नहीं मालूम और बहुत सा पैसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेवलपर्स पर लगाया जा रहा है.

ये टैक कंपनियां इस बात को ले कर किस दिन बंद हो जाएं कि एआई से कुछ खास नहीं निकल रहा, तो बड़ी बात नहीं. उस समय इस पर लगा पैसा डूब जाएगा जैसा हाउसिंग बबल में डूबा. पौराणिक इतिहास देखें तो हमें ग्रंथों में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि रामायण और महाभारत के युद्धों के बाद आम जनता खुश हुई, धनधान्य बढ़ा. अब राम-मंदिर बन गया है, ध्वज भी फहरा दिया गया है लेकिन गंगा-यमुना पहले की तरह वैसी ही गंदी हैं, ट्रेनों में वही मारामारी है, प्रदूषण वैसा ही बढ़ रहा है और आतंकवादी घटनाएं भी वैसे ही घट रही हैं.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सॉफ्टवेयर डेवलपर असल में पुरोहितों की तरह सपनों पर दुनिया बना रहे हों तो कोई बड़ी बात नहीं. अभी तो बड़े पंडाल दिख रहे हैं, लड़कियां नाचती दिख रही हैं, चींटियों की तरह लाखों लोग काम करते नजर आ रहे हैं लेकिन न इजराइल शांत है, न यूक्रेन और न ही अमेरिका या भारत में ही सुख, शांति, चैन है.

पौराणिक है परिवारवाद

एक समाचार-पत्र के सर्वे के अनुसार संसद और विधानसभाओं के लिए भारतीय जनता पार्टी के चुने गए 2,078 नेताओं में से 387 किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े हैं और नेतागीरी उन का पारिवारिक पेशा बना हुआ है. जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के नाम पर कांग्रेस को कोसने वाली भाजपा को अपने इस दोगलेपन पर शर्मिंदगी महसूस नहीं होती क्योंकि मूलतया जिन ग्रंथों को वह आदर्श मान कर देश पर थोपती है उन में परिवारवाद भरा है.

भाजपा की यह चतुराई है, जो दाग उस के भगवा दुपट्टों पर सैकड़ों की तादाद में हों, वैसे दाग दूसरों पर हों तो वह उसे धर्मभ्रष्ट कहने का दंभ तो रखती ही है, उस का तंत्र उन्हें कटघरे में खड़ा कर के उन्हें घर-निकाला भी दे सकता है. पौराणिक व्यवस्था यह है कि खेती हो, दुकानदारी हो, जागीरदारी हो या राजशाही, काम परिवार के हिसाब से बंटा होता है.

हमारी वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण का काम करता है, शूद्र का बेटा शूद्र का और राजा का बेटा राजा ही का काम करता है. हमारे 2 बड़े देवता- राम और कृष्ण- पारिवारिक सत्ता के  झगड़ों के कारण ही पूजे जाते हैं. उन्हीं काल्पनिक कहानियों को सत्य मान कर हम आज भी एक-दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं. वहीं, उन के नाम पर कुछ लोग सत्ता में बैठे हैं तो हजारों लोग उन्हीं के नाम पर हर साल करोड़ों-अरबों रुपए कमा रहे हैं.

आज राजा नहीं रहे लेकिन मंत्री, सांसद, विधायक, मुख्यमंत्री बनते तो हैं और यह काफी हद तक कुछ परिवारों में ही सीमित है, चाहे पार्टी कोई भी हो. अफसोस यह है कि जिन राजनीतिक पार्टियों ने शराफत में परिवारवाद नहीं अपनाया, वे आज गायब हो चुकी हैं.

नेतागीरी को पारिवारिक व्यवसाय बना लेना अब तकरीबन हर देश में हो रहा है. लगभग हर देश में मेहनत से नेता बने लोगों के बेटे-बेटी, भाई-बहन, पत्नी, भतीजे किसी न किसी तरह सत्ता के करीब रहते हैं, उन्हें अपने प्रतियोगियों की तरह पहली सीढ़ी से नहीं चढ़ना पड़ता, वोटरों को भी उन की पहचान होती है और वे इस घोड़े पर दांव लगाना पसंद करते हैं जिन के बारे में उन्हें कुछ अता-पता होता है.

परिवारवाद अच्छा हो, यह पक्का नहीं. महाभारत में सैकड़ों पारिवारिक कहानियां हैं लेकिन भगवद्गीता का उपदेश एक ही वंश के 2 परिवारों के चचेरे भाइयों के युद्ध के बीच में ही देना और उसे आदर्श मानना आश्चर्य की बात है. आज उसी पर भाजपा और हिंदू धर्मराज के दुकानदार जम कर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं.

घटती-बढ़ती आबादी

चीन की घटती आबादी दुनिया के दूसरे देशों के लिए कुतूहल बनी हुई है. जब टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 (टीएचआर) से ज्यादा होता है तो आबादी बढ़ती है. इस का अर्थ यह होता है कि पूरी जिंदगी में औसतन एक औरत के 2.1 बच्चे होंगे. जब टीएफआर 2.1 से कम हो तो आबादी घटनी शुरू हो जाती है. चीन में आजकल टीएफआर 1.0 चल रहा है. इस का अर्थ है कि आबादी तेजी से घट रही है.

चीन में लगातार तीसरे वर्ष मौतें ज्यादा हुईं जबकि बच्चे पैदा कम हुए. चीनी सरकार लगातार प्रचार कर रही है कि बच्चे ज्यादा पैदा करो, शादी जल्दी करो, पैसा ले लो. लेकिन चीनी युवतियों को अपना करियर, अपनी आजादी, अपनी मौज-मस्ती, अपनी तरह से जिंदगी बिताना ज्यादा पसंद आ रहा है.

माओ के जमाने में चीन ने एक बच्चा नीति जबरन थोपी थी. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है. 2016 में चीन की सरकार ने 2 बच्चों की नीति लागू की और 2021 में 3 बच्चों की. लेकिन आज चीनी युवा सरकार की सुनने से इनकार कर रहे हैं.

आज स्थिति बदल गई है. चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और कम आबादी व लगभग शून्य इमिग्रेशन के बावजूद वहां अभी वर्कर्स की कमी नहीं है. अगले वर्षों में वर्कफोर्स की कमी होगी, इस का भी अनुमान नहीं क्योंकि चीन में तेजी से ऑटोमेशन बढ़ रहा है. नतीजतन, वह कम लोगों से ज्यादा प्रोडक्शन कर सकता है.

चीनी कल्चर में न आराम बड़ी चीज है न पूजा-पाठ. वहां वर्क इज वर्शिप यानी काम ही ध्येय का सिद्धांत है. लोग काम इस तरह करते हैं जैसे खाते हैं, सोते हैं, नहाते हैं. काम करना वहां जीवन का एक अभिन्न अंग है. वहां हमारे यहां की तरह आराम बड़ी चीज है या ध्यान में लगे रहना तो बिलकुल नहीं है.

चीन जिस की आबादी 1950 में 50 करोड़ थी और 2021 के आसपास 140 करोड़ का आंकड़ा पार कर गई थी, वह 2070 तक 100 करोड़ और 2100 तक 50 करोड़ ही रह सकती है.

यह चीन की अद्भुत उपलब्धि है. हमारे यहां जहां कीड़े-मकोड़ों की तरह लोग पैदा होते रहेंगे जो तीर्थस्थलों में करोड़ों की भीड़ में दिखेंगे जबकि वहां के लोग कुशल कामगार होंगे, अनुशासित होंगे, नई चीजें बनाने में माहिर होंगे.

हमारे यहां ‘हम दो हमारे दो’ का नारा अब छोड़ दिया गया है. फिर भी मुस्लिमों समेत सभी वर्गों में आबादी बढ़नी कम हो गई है लेकिन फिर भी 2070 तक हम 175 करोड़ हो जाएंगे, जिन के लिए न काम होंगे न घर होंगे, न सड़कें होंगी.

हां, भारत ऐसा अकेला नहीं होगा. सभी धार्मिक देश, जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, फिलीपींस, सोमालिया, इथियोपिया, साउथ सूडान भी ऐसे ही होंगे. हम ‘गर्व’ करेंगे कि हम दुनिया के 10-20 सब से गंदे देशों में से हैं. चीन को लोग भारी जनसंख्या वाला साफ देश होने से पहचानेंगे. हम घंटियां बजाते रहेंगे जबकि चीन, जापान, कोरिया में ड्राइवरलेस गाड़ियों के हॉर्न भी नहीं सुनाई देंगे.

गाय की भक्ति कैसी?

भारतीय जनता पार्टी की मूर्खता का यह परिणाम सामने आया है कि उस की गौ-भक्ति उसी की सरकारों के लिए सिरदर्द बन रही है. गांवों में किसानों ने आवारा गायों को पकड़ कर स्कूलों, थानों, सरकारी कार्यालयों में बंद करना शुरू कर दिया है. उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिले में ऐसा होने लगा है, हालांकि इसे समाचार लायक न सम झ कर रिपोर्ट कम किया जा रहा है.

गाय को माता मान कर पूजना एक बात है, उस का दूध पीना भी एक बात है पर सूखी गाय को पालना दूसरी बात है. जिस देश में वृद्ध माता-पिता को पालते हुए युवाओं को गुस्सा आता हो वहां फालतू की गाय को भला कोई ग्वाला क्यों पालेगा? गौ-सदन, गौशालाएं, गौरक्षकों की टोलियां, गौ-सेवा के नाम लेना आसान है पर उन जानवरों, जिन का कोई उपयोग नहीं है, को खिलाते-पिलाते रहना बेहद मुश्किल है.

हर गांव-कस्बे में ऐसे खाली युवाओं की भरमार है जो गाय के नाम पर वसूली करने लगे हैं. वे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खड़े हो कर गायों को लाने व ले जाने वालों को परेशान करने लगे हैं. ऐसे में लोग अब गायों को पालना ही बंद कर देेंगे और जो गायें जिंदा हैं उन्हें कोई देखेगा भी नहीं.

गौरक्षक भी अपने ड्राइंग-रूमों में गायों को नहीं रखते, हालांकि कभी-कभी पाखंडियों की बनाई रजाइयों से ढकी गायों या बछड़ों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिख जाती हैं. यह छलावा है क्योंकि जब कुत्ते-बिल्ली को पालना एक आफत सी होती है तो गाय को सिर्फ भक्ति के लिए लोग पालें, यह असंभव है.

गाय की महिमा हिंदू धर्म में सिर्फ इसलिए है कि पौराणिक समय में गृहस्थ से दुधारू गाय दान में  झटक लेना पंडों के लिए सब से आसान था. आम गृहस्थ के पास यही एक ऐसी पूंजी हुआ करती थी जो खुद अपने पैरों पर चल कर पंडों के साथ उन के घरों तक जाती थी. हां, यह रहस्य है कि सैकड़ों गायों को दान में लेने के बाद भी गायों के मालिक सिर्फ पंडे और उन की संतानें ही क्यों नहीं हैं? शायद इसलिए कि वे इस का खोखलापन जानते हैं और गौ दान में मिली गाय के सूख जाने के बाद उस को तुरंत ग्वाले या कसाई को बेच देते रहे.

आज न उन्हें ग्वाला खरीद रहा है, न कसाई. Editorial :

Husband Wife Relationship : पत्नी से कभी न कहना, “तुमने किया ही क्या है?”

Husband Wife Relationship : सदियों से कहा जाता है कि पति और पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए हैं. यदि दोनों पहिए एक विचारधारा के हों तो जिंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है. वर्तमान में सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पर पत्नियों पर काफी सारे जोक्स प्रसारित किए जा रहे हैं. अधिकतर पति उन पर हंस रहे हैं. लेकिन क्या कभी आप ने अपनी पत्नी की दिनचर्या, उस के कामकाज के बारे में विचार-विमर्श किया है?

मैंने अपनी एक परिचित महिला रिश्तेदार से यूं ही पूछ लिया कि आप क्या करती हैं, कहीं जॉब करती हो या हाउसवाइफ हो? उन का उत्तर था, ‘मैं फुलटाइम वर्किंग वुमन हूं. सुबह-सवेरे मैं घर की अलार्म लॉक हूं. मैं घर की कुक, सर्वेंट, वेटर हूं. मैं बच्चों की टीचर हूं, घर में बूढ़े सास-ससुर की नर्स हूं. मैं घर की सिक्योरिटी हूं. मैं मेहमानों की रिसेप्शनिस्ट हूं. मैं शादी समारोह में सजधज कर जाने वाली मौडल हूं. मैं अपने पति की हीरोइन हूं. मेरा कोई हॉलिडे नहीं होता. मैं कोई वेतन, कोई महंगाई-भत्ता नहीं लेती हूं. इस के बावजूद मु झ से सभी लोग यही पूछते हैं कि सारा दिन तुम ने आखिर किया ही क्या है?’

यह व्यथा हाउसवाइफ के साथ-साथ कामकाजी महिलाओं की भी हो सकती है. कभी आप ने सोचा है कि कोई भी पति, चाहे वह बिजनेसमैन हो, नौकरी करता हो या कोई अन्य दूसरा काम करता हो, वह तो अपने तय समय से औफिस, दुकान या शोरूम जा कर अपना काम शुरू कर देता है लेकिन जरूरी नहीं है कि दुकानदार के पास दिनभर ही ग्राहक आएं.

प्राइवेट जॉब को अगर छोड़ भी दिया जाए तो सरकारी नौकरी में काम करने वाला कर्मचारी तो अपने काम करने के लिए जगप्रसिद्ध है ही लेकिन गृहिणी का काम तो अल-सुबह से ही शुरू हो जाता है.

पति की चाय, बच्चों को दूध-नाश्ता, सुबह का खाना, बर्तनों की सफाई, सब के कपड़े धोना, सुखाना और उन्हें प्रेस कर के रखना, घर की सफाई, बच्चों का होमवर्क और शाम होते-होते रात के खाने की तैयारी, फिर सब के सोने के पहले दूध, चाय, काढ़ा दे कर रात के खाने के जूठे बर्तन भी साफ करना शामिल होता है.

यह लिस्ट तकरीबन हर गृहिणी के लिए कॉमन है. इस के अलावा रविवार को जब सारा घर संडे की छुट्टी मनाता है तो वह बिना तनख्वाह वाली गृहिणी स्पेशल नाश्ता विद स्ट्रांग चाय की तैयारी में जुटी रहती है. उस के बाद उसे संडे का स्पेशल खाना भी बनाना है क्योंकि पति तो बेचारा 6 दिन काम कर के थका-मांदा आज सिर्फ आराम करेगा.

एक सर्वे के अनुसार भारतीय गृहिणी प्रतिदिन करीब 299  मिनट अपने परिवार के सदस्यों को अवैतनिक घरेलू सेवाएं देती है जबकि पुरुष ऐसे काम सिर्फ 97 मिनट्स करते हैं.

ठंड के मौसम में पति और बच्चों के गर्म कपड़े, रजाई, स्वेटर्स, कोट, जर्किन निकाल कर अलमारियों में रखना, ठंड के मौसम में आने वाले आंवला, हरी मटर व तमाम फलों को अगले मौसम तक प्रिजर्व करना, बरसात में पति व बच्चों के रेनकोट तैयार रखना ताकि बरसात से उन का बचाव हो सके. Husband Wife Relationship :

Readers’ Problems : “पत्नी की दूरी”, “गिरता आत्मविश्वास”, “डीमोटिवेशन”, “दोस्ती से परेशानी”

Readers’ Problems :

मेरी पत्नी मु से भावनात्मक रूप से दूरी बनाने लगी है

कुछ महीनों से मैं महसूस कर रहा हूं कि मेरी पत्नी मु से भावनात्मक रूप से दूर हो गई है. वह पहले की तरह बात नहीं करती, किसी भी विषय में रुचि नहीं दिखाती और अकसर अकेले रहना चाहती है. घर में माहौल भी ठंडा हो गया है. मु झे लगता है कि कहीं मेरी किसी गलती की वजह से ऐसा तो नहीं हुआ, लेकिन वह खुल कर कुछ बताती भी नहीं. मैं सम नहीं पा रहा कि हालात को कैसे सुधारा जाए?

रिश्तों में दूरी अकसर संवाद और भावनाओं के दब जाने से पैदा होती है. इसे खुल कर बातचीत करने से ही कम किया जा सकता है. बिना आरोप लगाए, शांति से उन की भावनाओं को जानने की कोशिश करें और उन्हें यह भरोसा दिलाएं कि आप उन की बात सुनने व सम झने के लिए तैयार हैं.

कई बार जिम्मेदारियों और तनाव के कारण भी महिलाएं चुप हो जाती हैं. जरूरी नहीं कि हर बार पति ही कारण हो. इसलिए इसे सिर्फ अपनी गलती मानने के बजाय स्थिति को व्यापक नजरिए से देखें. रिश्ता तब ही मजबूत होता है जब दोनों पार्टनर एकदूसरे को सुरक्षित महसूस कराते हैं. धैर्य के साथ धीरे-धीरे संवाद बढ़ाएं. अगर वे अकेले रहना चाहती हैं तो जबरदस्ती बात न करें. लेकिन पूरी तरह अनदेखा भी न करें. समय के साथ आप के बीच की दूरी कम होने लगेगी.

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मेरा आत्मविश्वास लगातार गिरता जा रहा है. क्या करूं?

मैं कुछ महीनों से महसूस कर रही हूं कि मेरा आत्मविश्वास बहुत कम हो गया है. छोटी-छोटी बातों पर भी मैं खुद को दोष देने लगती हूं और हमेशा लगता है कि मैं दूसरों से कम हूं. कालेज में सब दोस्त आगे बढ़ रहे हैं और मैं खुद को पीछे महसूस करती हूं. कई बार तो बाहर जाने, लोगों से मिलने का मन भी नहीं करता. मु झे सम झ नहीं आता कि खुद को वापस कैसे संभालूं और इस नकारात्मक सोच से कैसे निकलूं?

यह बिलकुल स्वाभाविक है कि जीवन के कुछ चरणों में हमें अपनी क्षमता कम लगने लगती है लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं होती. सब से पहले खुद पर अत्यधिक कठोर होना बंद करें और यह स्वीकार करें कि हर किसी की प्रगति का अपना समय होता है. अपनी छोटी-छोटी सफलताएं गिनना शुरू करें. यह आप को याद दिलाएगा कि आप पहले भी सफल रही हैं और आगे भी रह सकती हैं.

अपने दिन में कुछ ऐसा जरूर शामिल करें जो आप को अच्छा महसूस कराए, चाहे वह किताब पढ़ना हो, टहलना हो या किसी करीबी से बात करना. धीरे-धीरे आप पाएंगी कि आप का आत्मविश्वास वापस लौटने लगा है. सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि खुद पर भरोसा रखें और धैर्य बनाए रखें.

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अच्छी नौकरी न मिलने पर खुद को नाकाम मान लिया.

मु झे लगता है कि मैं अपने परिवार की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा. मेरे परिवार को हमेशा से उम्मीद रही है कि मैं एक बड़ा और स्थिर कैरियर बनाऊं, लेकिन कई इंटरव्यू और कोशिशों के बाद भी मैं अभी तक अच्छी नौकरी नहीं पा पाया हूं. इस से मैं खुद को नाकाम सम झने लगा हूं. हर बातचीत में मु झे लगता है कि परिवार वाले मेरे बारे में निराश हैं. भविष्य को ले कर बहुत चिंता रहती है. क्या करूं?

कैरियर की राह कभी सीधी नहीं होती और कई लोग सफलता पाने से पहले कई असफल प्रयासों से गुजरते हैं. इस का यह अर्थ बिलकुल नहीं कि आप सक्षम नहीं हैं. आप को यह सम झना होगा कि परिवार की चिंता प्यार से जन्म लेती है. कई बार उन के शब्द अनजाने में दबाव का रूप ले लेते हैं.

अपने परिवार से ईमानदारी से बात करें और उन्हें बताएं कि आप प्रयास कर रहे हैं और उन्हें आप के साथ खड़े रहना चाहिए, न कि आप को निराश महसूस कराना चाहिए. खुद को दोष देने के बजाय अपने कौशल सुधारने, नए विकल्प तलाशने और धैर्य बनाए रखने पर ध्यान दें. सही अवसर आने में समय लगता है. यदि आप निरंतर प्रयास करते रहे तो सफलता जरूर मिलेगी.

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मुझे नए दोस्त बनाने में मुश्किल होती है. क्या करूं?

मैं कॉलेज के पहले साल में हूं. सभी नए दोस्त बना रहे हैं जबकि मैं किसी से आसानी से घुल-मिल नहीं पाती. मुझे डर लगता है कि लोग मु झे पसंद नहीं करेंगे या मैं उन के सामने अजीब लगूंगी. इस वजह से मैं ज्यादातर चुप रहती हूं. मुझे कोई राह सुझाएं.

नए माहौल में दोस्त बनाने में समय लगना सामान्य है, खासकर जब आप स्वभाव से थोड़ी संकोची हों. आप को यह याद रखना चाहिए कि दोस्ती हमेशा धीरे-धीरे पनपती है. किसी से हल्की सी बातचीत शुरू करना भी एक बड़ा कदम होता है और अकसर सामने वाला भी बातचीत के लिए उतना ही उत्सुक होता है जितना आप.

खुद को यह भरोसा दिलाएं कि आप को पसंद किए जाने के लिए किसी नकली रूप की जरूरत नहीं है. आप जैसी हैं, वैसी ही अच्छी हैं. छोटे-छोटे प्रयास, जैसे किसी की बात पर मुस्कुराना या किसी विषय पर राय सा झा करना वगैरह आप को लोगों के करीब लाने लगेंगे. एक बार आप अपनी झिझक तोड़ लेंगी तो आप को एहसास होगा कि दोस्त बनाना उतना मुश्किल नहीं जितना अभी लगता है. – कंचन

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पता : कंचन, सरिता

ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55.

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08588843415

Readers’ Problems :

Section 13B Law : औरतों की आजादी का मील का पत्थर

Section 13B Law : वो जमाना बीत गया जब शादी जन्म जन्मांतर का बंधन हुआ करती थी. पुराने विवाह संस्था में बराबरी नहीं थी. औरतें झेलती थीं क्योंकि उन्हें मानसिक तौर पर झेलने और सहने के लिए तैयार किया जाता था. औरतों की मानसिक गुलामी में धर्म बहुत बड़ी भूमिका निभाता था. तमाम धार्मिक कहानियों में नारी को अबला, कमजोर और बेवकूफ ही दिखाया गया. विवाह ऐसी संस्था थी जिसमें औरतों के लिए इस से बाहर निकलने का कोई विकल्प ही नहीं था. पति की मौत के बाद भी वह पति की दासी ही मानी जाती थी और आजीवन विधवा बन कर जिंदगी गुजार देती थी. न तो तलाक की कोई व्यवस्था थी और न ही विधवा को दूसरी शादी की इजाजत थी.

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के बाद कानूनी रूप से औरतों को विवाह नामक संस्था में बराबरी का दर्जा हासिल हुआ. इस कानून में सब से बड़ी बात यह थी की अब औरत भी तलाक ले सकती थी लेकिन यह इतना भी आसान नहीं था. तलाक के लिए वाजिब कारण साबित करना पड़ता था. अगर पति तलाक न देना चाहे तो औरत को मजबूरन शादी में बंधे रहना पड़ता था. इंदिरा गांधी ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की इस खामी को दूर करने के लिए इस कानून में संशोधन करवाया जिस से तलाक का रास्ता पहले से आसान हो गया.

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान 1976 में संशोधन हुआ और इस अमेंडमेंट में 13बी को जोड़ा गया. अगर पति और पत्नी साथ न रहना चाहें तो 13बी के तहत अलग हो सकते हैं. लेकिन इस में भी एक समस्या थी. 13बी के तहत तलाक लेने में तकरीबन डेढ़ साल का समय लगता था. एक साल अलग रहने और उस के बाद 6 महीने का कूलिंग-ऑफ-पीरियड. जो शादी टूट चुकी हो उस में यह डेढ़ साल का वक़्त दोनों पक्ष के लिए बेहद भारी पड़ता था.

17 दिसंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला, अनूप जयराम भंभानी और रेणु भटनागर की फुल बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि धारा 13बी(1) के तहत आपसी सहमति से तलाक की पहली याचिका दाखिल करने से पहले एक साल अलग रहने का समय डायरेक्टरी है, न कि मैंडेटरी.

कुछ ऐसे मामलों में जहां साथ रहना ज्यादती या उत्पीड़न का कारण बन रही हो फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट इस एक साल की अवधि को माफ कर सकते हैं. इस में धारा 13बी(2) के तहत 6 महीने की कूलिंग-ऑफ पीरियड भी है. अगर कोर्ट दोनों अवधियां माफ करता है, तो तलाक की डिक्री तुरंत हो सकती है. बिना एक साल पूरा होने का इंतजार किए.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर दोनों पक्षों की सहमति है और सुलह की कोई गुंजाइश नहीं, तो ऐसी बेवजह की शादी को जबरन बनाए रखना अनुच्छेद 21 के तहत निजता और गरिमा का उल्लंघन होगा.

हाईकोर्ट का यह जजमेंट पहले के कुछ फैसलों को ओवर रूल करता है और आपसी रजामंदी वाले तलाक को और आसान बना देता है. लेकिन यह सभी मामलों में लागू नहीं होगा. कोर्ट को संतुष्ट होना पड़ेगा कि दोनों की रजामंदी के पीछे वाजिब कारण हैं.

महिलाओं के लिए कितना उपयोगी है?

यह धारा महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए बहुत उपयोगी है, खासकर उन मामलों में जहां विवाह असफल हो चुका है लेकिन कोई पक्ष दूसरे पर दोष नहीं लगाना चाहता.

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 के तहत तलाक के मामले में क्रूरता या व्यभिचार जैसे आधार साबित करने पड़ते हैं. जिस से मुकदमे लम्बे चलते हैं और इसमें दोनों पक्ष भावनात्मक रूप से बेहद परेशान होते हैं. वहीं धारा 13बी के तहत अगर दोनों पक्ष सहमत हों तो बिना एक दूसरे पर दोष साबित किए तलाक मिल जाता है.

कई मामलों में महिलाएं बोझ वाली शादी से बाहर निकलना चाहती हैं लेकिन सामाजिक कलंक या लंबे कोर्ट केस से डरती हैं. ऐसे में 13बी कानून औरतों की मुश्किलें आसान कर देता है जिस से औरत नई जिंदगी शुरू कर सकती है.

कोर्ट ने कहा है कि ऐसी शादी जो केवल नाम की रह गई हो, उसे खत्म करना बेहतर है. कुछ मामलों में जब दोनों पक्ष सहमत हों तो कोर्ट ने 6 महीने की अनिवार्य वेटिंग पीरियड भी माफ कर दी है.

13बी कानून वैसे तो जेंडर न्यूट्रल है लेकिन भारतीय समाज में महिलाएं ही शादी के नाम पर ज्यादा समझौता करती हैं इसलिए यह कानून औरतों को ख़राब रिश्ते से निकलने में ज्यादा मददगार साबित हुआ है. हालांकि जिन मामलों में घरेलू हिंसा या दहेज उत्पीड़न है तो वहां महिलाओं के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 या आईपीसी धारा 498ए जैसे कानून भी हैँ लेकिन इन कानूनों का गलत इस्तेमाल भी होता है जिस से तलाक के मामले खिंचते चले जाते हैँ.

2023 में शिल्पी जैन बनाम वरुण श्रीनिवासन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक लैंडमार्क जजमेंट दिया. यह केस हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13बी और संविधान के अनुच्छेद 142 से जुड़ा है.

शिल्पा शैलेश और वरुण श्रीनिवासन की शादी टूट चुकी थी. 2010 में वरुण ने क्रुएल्टी के आधार पर तलाक की याचिका दाखिल की थी. कोर्ट में दोनों पक्षों ने म्युचुअल कंसेंट डिवोर्स की इच्छा जताई और आपस में सेटलमेंट कर लिया. लेकिन धारा 13बी(2) के तहत 6 महीने की कूलिंग-ऑफ पीरियड यानी पहली मोशन के बाद दूसरी मोशन से पहले का इंतजार पूरी नहीं हुई थी. दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर पिटीशन दाखिल कर अनुच्छेद 142 के तहत तलाक की डिक्री की मांगी, साथ ही कूलिंग पीरियड को माफ करने की प्रार्थना की.

इस केस में पहले के कुछ जजमेंट्स में विरोधाभास था इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच को रेफर किया गया. सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142(1) के तहत कम्प्लीट जस्टिस करने के लिए शादी को भंग कर सकता है भले ही वैधानिक आधार पूरा न हो. सुप्रीम कोर्ट टूट चुकी शादी को तलाक का आधार मानकर डिवोर्स दे सकता है भले एक पक्ष सहमत न हो लेकिन ऐसा कोर्ट के विवेक पर निर्भय है हर केस में कोर्ट इसे लागू करे यह जरूरी नहीं.

अगर सुप्रीम कोर्ट इस बात को लेकर संतुष्ट हो कि दोनों पक्षों की सहमति वाजिब है. सुलह की कोई गुंजाइश नहीं. इंतजार सिर्फ दुख बढ़ाएगा तब धारा 13बी की 6 महीने की कूलिंग-ऑफ पीरियड को सुप्रीम कोर्ट माफ कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार कूलिंग पीरियड का मकसद जल्दबाजी के फैसलों को रोकना है, न कि मरी हुई शादी को जबरन बनाए रखना. सुप्रीम कोर्ट का यह जजमेंट उन जोड़ों के लिए बड़ी राहत है जिन की शादी पूरी तरह टूट चुकी है और वे तुरंत तलाक चाहते हैं.

कुल मिला कर, 1976 में सेक्शन 13बी कानून औरतों के लिए बेहद कारगर कदम साबित हुआ क्योंकि इस कानून ने औरतों को बोझ बन चुकी शादी से निकलने का आसान रास्ता दिया. यह कानून औरतों की आजादी को तो बढ़ावा देता ही है साथ ही उन्हें लंबी अदालती कार्यवाही से भी बचाता है हालांकि आज भी यह कानून पूरी तरह पति की सहमति पर निर्भर है. अगर पति सहमत न हो, तो महिलाओं को अभी भी पुराने फौल्ट ग्राउंड्स पर निर्भर रहना पड़ता है. फिर भी समय के साथ कोर्ट के फैसलों ने इसे और बेहतर बनाया है. Section 13B Law :

Social Polarization : हिंदुओं को संकीर्ण बनाने की साजिश

Social Polarization : भारत का आम हिंदू हमेशा से शांतिप्रिय और सहिष्णु रहा है. दूसरे धर्मों की इज्जत करने में हिंदू समाज से ज्यादा उदार कोई नहीं रहा. हिंदू मजारों पर भी जाता है. क्रिसमस भी सेलिब्रेट करता है. ईद भी मनाता है और सिखों के गुरुद्वारों में भी जाता है. लेकिन पिछले एक दशक से हिंदुओं के नाम पर बने कुछ संगठन हिंदुओं की इस छवि को धूमिल करने में लगे हैं.

पिछले कुछ सालों से क्रिसमस के दौरान भारत के कई राज्यों में ईसाइयों की प्रार्थना सभाओं, कैरोल गायन और उत्सवों में बाधा डालने, तोड़फोड़ और हमलों की घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं. इन घटनाओं को हिंदुत्व के नाम पर बने संगठन अंजाम दे रहे हैं. 2025 क्रिसमस के दौरान भी देश में ऐसी घटनाएं बड़ी तादात में घटी हैं.

25 दिसंबर 2025 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के एक चर्च में प्रार्थना में शामिल हुए. बिशप से मिले और देशवासियों को क्रिसमस की बधाई दी. ठीक इसी समय पूरे देश में हिंदुत्वदी संगठन के लोग चर्चो में तोड़फोड़ करने लगे थे.

छत्तीसगढ़ के रायपुर में मैग्नेटो मॉल में क्रिसमस की सजावट को तोड़ दिया गया. कांकेर में चर्च जलाए गए, ईसाई घरों को नुकसान पहुंचाया गया. क्रिसमस के विरोध में बंद का आह्वान किया गया और विरोध में पोस्टर लगाए गए.

मध्य प्रदेश के जबलपुर में दो प्रार्थना सभाओं पर हमला हुआ. चर्च में प्रार्थना कर रही एक अंधी महिला को पीटा गया. असम के नलबाड़ी में स्कूल में क्रिसमस की सजावट जलाई गई. उत्तर प्रदेश के स्कूलों में क्रिसमस की छुट्टी रद्द कर दी गई. राजस्थान के डूंगरपुर में चर्च में उपद्रव किया गया. केरला के पलक्कड़ इलाके में बच्चों के कैरोल ग्रुप पर हमला हुआ. उत्तराखंड के हरिद्वार में क्रिसमस कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया. दिल्ली, ओडिशा, गुजरात, हरियाणा में सांता कैप बांटने या बेचने वालों को धमकियां देने की खबरें आई. कई स्कूलों में क्रिसमस रद्द करने का दबाव बनाया गया.

ये घटनाएं पूरे साल चलने वाली हिंसा का हिस्सा हैं. नवम्बर 2025 तक पूरे देश में ईसाईयों के खिलाफ इस तरह के 700 से ज्यादा मामले दर्ज हुए.

इन हमलों के पीछे हिंदुत्ववादी ताकतें यह तर्क देती हैं की ईसाई मिशनरीज मास कंवर्जन कर रही हैं भोले भाले हिंदूओं का धर्म परिवर्तन कर रही हैं लेकिन आंकड़ों को देखें तो यह बातें सिर्फ प्रोपगेंडा ही साबित होती हैं.

प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार 98% लोग वही धर्म मानते हैं जो उन्हें बचपन में मिला होता है. हिंदू: 0.7% बाहर जाते हैं, लेकिन 0.8% अंदर आते हैं. ईसाई महज 0.4% हिंदू से कन्वर्ट होते हैं, लेकिन कुल ईसाई आबादी में नेट गेन सिर्फ 0.3% का है. वहीं मुस्लिम कन्वर्जन तो और भी कम 0.2 फीसदी है. 1951 से 2011 के बीच का जनगणना डेटा भी यह बताता है की ईसाई आबादी स्थिर (2.3%) बनी हुई है. इस में 60 सालों में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ है. यह डाटा मिशनरीज के द्वारा “मास कन्वर्जन” के दावों को खारिज करता है.

प्यू के अनुसार, फर्टिलिटी रेट सभी धर्मों में घट रहा है. हिंदू में 2.1, मुस्लिम में 2.6 और ईसाई में महज 2.0 है. हालांकि यह बात सच है की सब से ज्यादा हिंदू ही कन्वर्ट करते हैं. गुजरात में धर्म परिवर्तन के कुल आवेदन में 93 प्रतिशत के आसपास हिंदू आवेदक होते हैं लेकिन इस से हिंदू धर्म को कोई नेट लोस नहीं है.

यूपी के एंटी-कन्वर्जन लॉ के तहत 2020 से कुल 427 केस रजिस्टर हुए जिन में 833 गिरफ्तारियां हुईं लेकिन इन में ज्यादातर मामले कोर्ट में झूठे साबित हुए.

दीवाली हो, क्रिसमस हो या ईद सभी धार्मिक त्योहार आम आदमी को लूटने और धर्मभीरू बनाने के मकसद से बनाए गए हैं. फिर भी अगर एक सेकुलर देश में जनता के टैक्स के रुपयों से दिवाली और कुम्भ जैसे त्यौहार मनाए जा सकते हैं तो क्रिसमस पर ही हो-हल्ला क्यों? यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे ईसाई देशों में बसे हिंदू वहां अपने धर्म के त्योहारों को बिना किसी डर के सेलिब्रेट करते हैं. होली, गणेश उत्सव, दिवाली, रामनवमी, रथयात्रा और दुर्गा पूजा जैसे त्यौहार विदेशों में धूम धाम से मनाए जा रहे हैं और वहां कोई ईसाई संगठन हिंदुओं का विरोध नहीं करता. दुबई और दूसरे खाड़ी देशों में हिंदूओं के आलीशान मंदिर बन रहे हैं वहां भी कोई मुसलिम संगठन विरोध नहीं कर रहा फिर अपने देश के ईसाईयों के साथ यह तमाशा क्यों? Social Polarization :

Jharkhand Tourism : नेतरहाट – छोटानागपुर की रानी

Jharkhand Tourism : झारखंड राज्य के लातेहार जिले में स्थित एक सुंदर गांव है नेतरहाट, जहां सूर्योदय, झरनों की कलकल, जंगल की शांति और जनजातीय संस्कृति हरेक के दिल पर अमिट छाप छोड़ देती है. कैसा है नेतरहाट, जानिए आप भी.

अक्टूबर का महीना था, दीपावली की छुट्टियां थीं. शहर की भागदौड़ से मन थक चुका था. दोस्तों से बातचीत के दौरान अकसर नेतरहाट का नाम सुना था, झरखंड की वादियों में बसा एक हिल स्टेशन, जिसे ‘छोटानागपुर की रानी’ कहते हैं. नाम सुनते ही कल्पनाएं उमड़ने लगतीं और आखिरकार एक दिन हम ने वहां जाने का निश्चय कर लिया.

नेतरहाट, झरखंड के लातेहार जिले में स्थित एक खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र है. यह स्थान अपने प्राकृतिक सौंदर्य, हरे-भरे जंगलों, पहाड़ियों और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है. यह समुद्रतल से लगभग 1,128 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यह झरखंड के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है.

सफर की शुरुआत

रांची से नेतरहाट की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है. सुबह-सुबह हम कार से निकले. जैसे ही शहर पीछे छूटता गया, हवा ठंडी होने लगी और रास्ते के दोनों ओर घने जंगलों का सिलसिला शुरू हो गया. साल, चीड़ और बांस के पेड़ों के बीच से गुजरते हुए लग रहा था मानो हम प्रकृति की गोद में प्रवेश कर रहे हों.

रास्ते के हर मोड़ पर कुछ नया था. कहीं पहाड़ियों से झरता पानी, कहीं बच्चों के झंड हाथ हिला कर स्वागत करते हुए और कहीं सन्नाटे में गूंजती पक्षियों की आवाज. लगभग 5 घंटे के सफर के बाद हम नेतरहाट पहुंचे, लगा मानो समय धीमा हो गया है.

प्रभात विहार और सूर्योदय का जादू

नेतरहाट की पहचान है वहां का सूर्योदय. स्थानीय लोग कहते हैं कि जिस ने प्रभात विहार से सूर्योदय नहीं देखा, उस ने नेतरहाट देखा ही नहीं.

अगली सुबह हम व्यू पॉइंट पर पहुंचे. चारों तरफ सन्नाटा था. बस, घाटियों से आती ठंडी हवा और पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी. घास पर बिखरी ओस मोतियों सी चमक रही थी. अचानक क्षितिज से लाल-नारंगी सूरज झंकने लगा. पलभर में पूरा आकाश सुनहरी रोशनी से नहा गया. पहाड़ों की चोटियां मानो दीपक की लौ से चमक उठीं. लोग मंत्रमुग्ध खड़े उस दृश्य को निहारते रहे. सच कहूं तो वह पल शब्दों से परे था मानो प्रकृति ने खुद हमें अपने करीब बुला लिया हो.

झरनों का संगीत

नेतरहाट सिर्फ सूर्योदय और सूर्यास्त के लिए ही नहीं, अपने झरनों के लिए भी मशहूर है.

घाघरी जलप्रपात : जंगलों के बीच छिपा यह झरना बरसात में गर्जना करता हुआ बहता है. उस की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है.

नैना जलप्रपात : यहां की ठंडी फुहारें चेहरे पर पड़ते ही सारी थकान मिटा देती हैं. सुबह की पहली किरण जब पानी की धार पर पड़ती है तो इंद्रधनुष सा दृश्य सामने आ जाता है.

इन झरनों तक पहुंचने के लिए हमें छोटे-छोटे रास्तों से पैदल जाना पड़ा. रास्ते में हरियाली और मिट्टी की खुशबू सफर को और यादगार बना

देती है.

अन्य आकर्षण और संस्कृति

मैग्नोलिया पॉइंट से सूर्यास्त देखना जीवन का अनमोल अनुभव है. डूबते सूरज की सुनहरी छटा पूरे आकाश को रंग देती है. ऑरेंज वैली और स्ट्रॉबेरी फार्म सर्दियों में अपनी खुशबू व स्वाद से मन मोह लेते हैं.

पुराने ब्रिटिश कालीन विश्रामगृह अब भी यहां की कहानी कहते हैं. ऊंची छतें और चौड़े बरामदे औपनिवेशिक दौर का एहसास दिलाते हैं.

यहां की जनजातीय संस्कृति अद्भुत है. बांस और लकड़ी की कलाकृतियां, लोक-नृत्य और गीत यहां की आत्मा को दर्शाते हैं.

जंगल और वन्य-जीवन

नेतरहाट के जंगलों में हिरण, जंगली सूअर, लोमड़ी और कभी-कभी तेंदुए तक दिखाई दे जाते हैं. बर्ड वाचिंग के शौकीनों के लिए यह जगह किसी खजाने से कम नहीं. हॉर्नबिल, मोर और प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट इस यात्रा को और खास बना देती है.

रात को जब आसमान साफ होता है तो लाखों तारे चमकते हैं. शहर में ऐसा नजारा शायद ही कभी दिखता हो. खुले आकाश के नीचे तारों को निहारना जीवन का दुर्लभ अनुभव है.

ईकोटूरिज्म और स्थानीय स्वाद

आजकल यहां ईकोटूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है. स्थानीय परिवार अपने घरों को होमस्टे में बदल रहे हैं. हम भी एक ऐसे ही घर में ठहरे. मिट्टी की दीवारें, लकड़ी की खिड़कियां और आंगन में बनी चौकी-सबकुछ बेहद सादा लेकिन आत्मीय.

रात को हमें चावल, धान की रोटियां, जंगली साग और अरसा-ठेकुआ जैसे पारंपरिक व्यंजन परोसे गए. साथ में, स्थानीय हंडिया (चावल से बना पेय) का स्वाद लिया, जो वहां की संस्कृति का अहम हिस्सा है. यह अनुभव किसी होटल से कहीं अधिक जीवंत और अनोखा था.

यात्रा का समय और सुझव

नेतरहाट आने का सब से अच्छा समय अक्टूबर से मार्च है. गर्मी में भी यहां मौसम सुहाना रहता है लेकिन मानसून और सर्दी इसे और खूबसूरत बना देते हैं.

सुझव

सर्दी में गरम कपड़े जरूर रखें.

सूर्योदय और सूर्यास्त के लिए समय से पहले पहुंचें.

झरनों के पास सावधानी बरतें.

स्थानीय संस्कृति और लोगों का सम्मान करें.

खर्च और पहुंच

2 लोगों के लिए कुल खर्च लगभग 4,000 से 6,000 रुपए तक आता है.

हवाई मार्ग : निकटतम एयरपोर्ट, रांची (152 किलोमीटर).

रेल मार्ग : टोरी (64 किलोमीटर) और लोहरदगा (62 किलोमीटर).

सड़क मार्ग : रांची और लातेहार से बस व टैक्सी उपलब्ध हैं.

यात्रा का अंत

नेतरहाट की यह यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक ट्रिप नहीं थी, बल्कि दिल को छू लेने वाला अनुभव था. वहां का सूर्योदय, झरनों की कलकल, जंगल की शांति और जनजातीय संस्कृति ने दिल पर अमिट छाप छोड़ दी. जब-जब शहर का शोर थकाता है, नेतरहाट की यादें मन में ताजा हो जाती हैं. सचमुच, यह झरखंड की रानी सा है. Jharkhand Tourism :

Hindi Satire Story : जय श्री अदभुत चापलूस चालीसा यंत्र

Hindi Satire Story : भक्तों, हमारे देश में सरकारी नौकरी में आज इतने ज्यादा खतरे बढ़ गए हैं कि अपने को तीसमार खां कहने वाले भी कुरसी पर बैठने से पहले सौ बार भगवान का नाम लेते हैं. क्या पता कब जनता से कुछ लेते हुए क्राइम ब्रांच वालों के हत्थे चढ़ जाएं. क्या पता कब कैसे तबादला हो जाए.  क्या पता कब सस्पैंड हो जाएं.

सरकारी नौकरी में बुरे दिन आते देर नहीं लगती, इसीलिए हम ने सरकारी नौकरी में काम कर रहे अपने भाइयों और बहनों के लिए शास्त्रोक्त विधि से अपने ही देश में तैयार किया है जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र, ताकि हमारा हर भाई मजे से कुरसी पर बैठे और अपनी दोनों टांगें मेज पर रख कर मौज कर सके. साहब तो साहब, भगवान तक उसे पूछने की हिम्मत न कर सके कि यार, दिन में ही यह क्या रात वाली लूटमार शुरू कर रखी है.

दोस्तो, दुनिया में साहब को पटाने का ऐसा कोई यंत्र नहीं है, जैसा यह चापलूस चालीसा यंत्र है. इस यंत्र का हर शब्द जाग्रत मंत्र है. इस यंत्र के आगे एक ऐसा लैंस लगा है, जिस में एक खास कोण से देखने पर संपूर्ण चापलूस चालीसा मंत्र के हर शब्द को साफसाफ पढ़ा जा सकता है.

यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र शुद्ध चौबीस कैरेट गोल्ड प्लेटिड साहब मूरत पर लिखा गया है. यह यंत्र पसीने से खराब नहीं होता. इसे पहन कर मुलाजिम कुछ भी करे, उसे पसीना आता ही नहीं, बल्कि इस यंत्र को देख कर दूसरों को पसीने आने लगते हैं. इसे गले में जिसजिस ने डाला, आइए अब जानते हैं उन्हीं की जबानी इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र की रहस्यमयी कहानी :

मिस्टर राजेश : मैं ने जब से इस यंत्र को गले में डाला है, साहब मेरे वश में हो गए हैं. जब तक यह चमत्कारी यंत्र मेरे गले में नहीं था, तब तक साहब मेरी ओर देखते भी नहीं थे. साहब सामने आते थे, तो मेरे पसीने निकलने शुरू हो जाते थे. मैं उन के आगेपीछे दुम हिलाता हुआ थक जाता था, पर वे मुझ कुत्ते की ओर ध्यान तक न देते थे.

सच कहूं, जब से मैं ने यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र गले में डाला है, तब से मैं साहब की बीवी से भी ज्यादा उन के नजदीक हो गया हूं. अब मैं नहीं, बल्कि वे मेरे आगेपीछे दुम हिलाते हैं. वे मुझे अपनी बीवी से भी ज्यादा प्यार करते हैं. जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र.

मिस्टर देवेंद्र : जब मेरे एक दोस्त ने मुझे इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र के बारे में बताया, तो मुझे जैसे जीने की नई राह मिली. पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ था कि अपने देश में भी ऐसे आला दर्जे के चापलूस चालीसा यंत्र बन सकते हैं. सच कहूं, तो मेरे ऊपर रिश्वत लेते हुए हर समय सस्पैंड होने का खतरा मंडराता रहता था. अब पुरानी लत होने के चलते छोड़ी भी नहीं जा रही थी. दुविधा में था कि अब क्या करूं, क्या न करूं?

आखिरकार मेरी परेशानी को देख कर मेरे उस दोस्त ने मेरे गले में अपना श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र डाला, तो पहनते ही मेरी रिश्वत के बारे में नैगेटिव सोच एकदम बदल गई. मुझे ऐसा लगा कि रिश्वत लेना भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि यह तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है. देखते ही देखते मेरे मन से रिश्वत का डर जाता रहा और मैं ने यह अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र मंगवा कर अपने गले में डाल लिया.

सच कहूं, जब से मैं ने इस अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र को गले में डाला है, तब से मेरे रिश्वत लेने के हौसले में सौ गुना इजाफा हुआ है.

अब मुझे महकमे के किसी मुलाजिम से कतई डर नहीं लगता. अब दफ्तर में लोग मुझे देवू नहीं, बल्कि रिश्वत का देवेंद्र कहने लगे हैं. जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र.

भाइयो, इस देश में इन की ही तरह लाखों ऐसे मुलाजिम हैं, जो इस यंत्र को गले में डाल कर नौकरी में मजे कर रहे हैं. हमाम में नंगे नहा रहे हैं. भूख न होने के बाद भी बस खाए जा रहे हैं. अगर आप भी चाहते हैं कि दफ्तर में कदम फूंकफूंक कर रखने से छुटकारा मिले, तो आज ही हमारे इस चापलूस चालीसा यंत्र को मंगवाइए. कीमत केवल 5 हजार रुपए. डाक खर्च 2 सौ रुपए अलग.

और हां, अगर आप अभी और्डर करते हैं, तो अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र के साथ 24 कैरेट गोल्ड प्लेटिड चेन फ्री.

बंधुओ, हम अपने चापलूस चालीसा यंत्र का किसी अखबार में कोई इश्तिहार नहीं देते. नकली अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र से सावधान रहें. आप की सुविधा के लिए हम ने नकली यंत्र से बचने के लिए डब्बे पर आप के ही शहर के लोकप्रिय भ्रष्ट की तसवीर नाई है, जो आंखें बंद कर के भी बिलकुल साफ दिखती है.

कमाल का है यह जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र. Hindi Satire Story :

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