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Hindi Family Story : व्रत-भाग 3 – क्या अंधविश्वास में उलझी वर्षा को अनिल निकाल पाया ?

Hindi Family Story : शाम को दफ्तर से छुट्टी कर के वह एक्टिवा पर आ रहा था कि पीछे से एक ट्रक वाले ने उसे टक्कर मारी. उस की एक्टिवा ट्रक के भारी पहियों के नीचे आ कर चकनाचूर हो गई और वह उछल कर पटरी पर जा गिरा. पत्थर से सिर टकराया और खून के फौआरे छूट पड़े. वह गिरते ही बेहोश हो गया. लोगों की भीड़ लग गई. ट्रकचालक को पकड़ लिया गया.

पुलिस आई और चालक को पकड़ कर थाने ले गई. अनिल को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. किसी ने उस की जेब में से मोबाइल ढूंढ़ निकाला और पत्नी को फोन कर दिया. वर्षा ने अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवाचौथ का व्रत रखा था. उस से यह दुखद समाचार सहन न हो सका. एक तो वह दिनभर की भूखीप्यासी थी, ऊपर से यह वज्रपात. दुर्घटना का समाचार सुनते ही वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. उस की पड़ोसिनों को जब पता चला तो सभी दौड़ी आईं. बड़ी मुश्किल से उसे होश में लाया गया. जब उस की हालत कुछ सुधरी तो एक पड़ोसिन के साथ वह अस्पताल पहुंची. अनिल की हालत नाजुक थी. वह अभी तक अचेत पड़ा था. वर्षा दहाड़े मारमार कर रोने लगी. डाक्टरों ने अनिल को होश में लाने की कोशिश की. 3 घंटे बाद उस ने आंखें खोलीं. दर्द के मारे वह चिल्लाने लगा. पीठ और टांगों पर प्लास्टर बांध दिया गया और सिर में 3 टांके लगे.

वर्षा को जब यह पता चला कि अब उस का पति खतरे से बाहर है तो उस ने अनदेखी शक्ति का इस बात के लिए धन्यवाद किया कि उस ने उस के पति की जान बख्श दी. फिर करवाचौथ के व्रत की महानता का गुणगान करने लगी जिस के कारण उस के पति की आयु सचमुच लंबी हो गई थी. यह भगवान कैसा है जो पहले उस के पति को ट्रक से टक्कर लगवा कर अस्पताल भिजवाता है और अब धन्यवाद का पात्र बनता है. धन्यवाद तो डाक्टर व अस्पताल को देना चाहिए जिन्होंने उस के पति की जान बचा ली. वह घर पहुंची. चांद कभी का निकल चुका था. उस ने चांद को अर्ध्य दिया और मुंह में केवल सेब का एक टुकड़ा ही डाला और व्रत खोल लिया. रातभर उसे किसी करवट चैन न मिला. वह रातभर रोती रही और अपने पति की सेहत के लिए चिंतित रही. वह रात उस की सब से दुखद रात थी.

मुसीबत की रात समाप्त होने को नहीं आती. उस ने बड़ी मुश्किल से वह रात काटी और सुबह ही सुबह पति को देखने के लिए अस्पताल दौड़ पड़ी. अपने साथ वह चाय और ब्रैड भी ले गई. पति की बीमारी में उसे पूजापाठ करने का होश भी न रहा. जब अनिल ने उस से पूछा कि आज वह पूजा पर क्यों नहीं बैठी और चाय बना कर कैसे ले आई है तो उस ने कहा, ‘‘पूजापाठ तो बाद में भी हो जाएगा, पहले मुझे तुम्हारी सेहत की चिंता है.’’ अब अनिल ठीक होता जा रहा था. वह अभी हिलनेडुलने के योग्य तो नहीं हुआ था किंतु उसे 5 दिन के बाद अस्पताल से छुट्टी मिल गई और वर्षा अपने पति को घर ले आई. अनिल ने अपने मातापिता को इस दुर्घटना के बारे में कोई खबर न होने दी थी. उस का खयाल था कि इस से वे बेकार परेशान होंगे.

दूसरे दिन मंगलवार था. अनिल ने कहा, ‘‘वर्षा, तुम तो हनुमानजी का व्रत रखोगी ही, आज मैं भी व्रत रखूंगा. क्या पता बजरंगबली मुझे जल्दी अच्छा कर दें.’’

‘‘नहींनहीं, तुम कमजोर हो, तुम से व्रत नहीं रखा जाएगा.’’ ‘‘इतनी कमजोर होने पर तुम सारे व्रत रख लेती हो तो क्या मैं एक व्रत भी नहीं रख सकता? मैं आज अवश्य व्रत रखूंगा.’’

‘‘मेरी बात और है, तुम्हारे शरीर से इतना खून निकल चुका है कि उस की पूर्ति करने के लिए तुम्हें डट कर पौष्टिक भोजन करना चाहिए, न कि व्रत रखना चाहिए,’’ वर्षा ने तर्क दिया.

‘‘तुम मुझे धार्मिक कार्य करने से क्यों रोकती हो? क्या तुम नास्तिक हो? फिर बजरंगबली मुझे कमजोर क्यों होने देंगे? मैं खाना न खाऊं, तब भी वे अपने चमत्कार से मुझे हट्टाकट्टा बना देंगे,’’ अनिल ने मुसकरा कर कहा.

‘‘अब तो तुम मेरी बातें मुझे ही सुनाने लगे. मैं कह रही हूं कि अभी तुम्हारे शरीर में इतनी शक्ति नहीं है कि व्रत रख सको. जब हृष्टपुष्ट हो जाओगे तो रख लेना व्रत,’’ वर्षा ने तुनक कर कहा.

‘‘मैं कुछ नहीं जानता. मैं तो आज हनुमानजी का व्रत अवश्य रखूंगा.’’ वर्षा के अनुनयविनय के बाद भी अनिल ने कुछ नहीं खाया और व्रत रख लिया. यद्यपि वर्षा ने स्वयं व्रत रखा था, पति के व्रत रखने पर उसे गहरी चिंता हो रही थी. वह सोच रही थी कि अनिल के शरीर में खून की कमी है, खाली पेट रहने से और नुकसान होगा. यदि डाक्टर के दिए कैप्सूल और दवाएं खाली पेट दी जाएंगी तो लाभ की जगह हानि हो सकती है. वह करे तो क्या करे?

उस ने कहा, ‘‘अब तुम खाली पेट कैप्सूल कैसे खाओगे?’’

‘‘मैं दवा भी नहीं खाऊंगा. जैसा कड़ा व्रत तुम रखा करती हो, वैसा ही मैं भी रखूंगा. आखिर बजरंगबली इतना भी नहीं कर सकते हैं?’’ अनिल ने दृढ़ता से कहा.

‘‘देखो जी, तुम्हें कुछ हो गया तो?’’ कहानी का पार्ट 4 पढ़ें…

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Hindi Family Story : व्रत-भाग 2 – क्या अंधविश्वास में उलझी वर्षा को अनिल निकाल पाया ?

Hindi Family Story : एक दिन रात के 11 बजे होंगे, अनिल के मन में तरंग उठी. वह उठ कर वर्षा के पलंग के पास जा कर बैठ गया. उस का बैठना था कि वर्षा की आंख खुल गई और वह झट से उठ कर बैठ गई. अनिल ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की, किंतु उस ने उसे हाथ तक न लगाने दिया.

कहने लगी, ‘‘देखो जी, मैं ने सवा महीने के लिए आप से अलग रहने का व्रत लिया है, अभी 10 दिन बाकी हैं.’’ और फिर उस ने अनिल से अपने कमरे में जा कर सो जाने को कहा. उस के दिल को बहुत गहरी चोट लगी और वह चुपचाप अपने कमरे में आ गया. उसे वर्षा पर बहुत गुस्सा आ रहा था. वह अपनी भूल पर पश्चात्ताप कर रहा था कि मैं ने वर्षा जैसी धर्मांध से क्यों शादी की? मेरा प्यार करने को दिल चाहता है तो मैं कहांजाऊं? उस के दिल में तो यह अरमान ही रहा कि कभी उस की पत्नी उसे प्यार करने के लिए उत्साहित करे, कभी मुसकरा कर उस का स्वागत करे. वर्षा ने हमेशा ही उस का तिरस्कार किया है. उस ने कई तरीकों से उसे समझाने की चेष्टा की, किंतु वर्षा ने अपना नियम न छोड़ा.

एक दिन वर्षा ने साईं बाबा का व्रत रखा हुआ था. उस दिन अनिल की छुट्टी थी और वह घर पर ही था. उस दिन वर्षा न अन्न ग्रहण करती थी और न किसी खट्टी चीज को हाथ ही लगाती थी. कोई 3 बजे के करीब वर्षा का सिर चकराने लगा और दिल घबराने लगा. अनिल ने उसे फल लेने को कहा, किंतु उस का व्रत तो व्रत ही होता था. व्रत वाले दिन वह कोई भी चीज ग्रहण नहीं करती थी और उस के कथनानुसार, वह पक्का व्रत रखती थी.

वर्षा को शौचालय जाना था. जाते समय उसे जोर से चक्कर आया और वहीं गिर गई. अनिल ने किसी चीज के गिरने की आवाज सुनी तो दौड़ा. उस ने देखा कि वर्षा जमीन पर गिरी पड़ी है. उस के सिर पर चोट लग गई थी और सिर से खून बह रहा था. उस ने उसे अपनी बांहों में उठाया और पलंग पर लिटा दिया. उसे हिलायाडुलाया, किंतु उसे जरा भी होश न था. उस ने शीघ्रता से थोड़े से पानी में ग्लूकोस घोल कर चम्मच से उस के मुंह में डाला. 4-5 चम्मच ग्लूकोस उस के गले से नीचे उतरा तो वर्षा ने आंखें खोल दीं. जैसे ही उसे यह ज्ञात हुआ कि उस के मुंह में ग्लूकोस डाला गया है, वह रोने लगी और अनिल को कोसने लगी कि उस ने उस का व्रत खंडित कर दिया है और उसे पाप लगेगा.

‘‘पाप लगता है तो लगे, मैं तुम्हें भूखी नहीं मरने दूंगा,’’ अनिल ने कहा.

‘‘व्रत रख कर भूखी मर जाऊंगी तो मोक्ष प्राप्त होगा. जन्ममरण के बंधन से मुक्त हो जाऊंगी,’’ वर्षा ने श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा.

‘‘तुम्हें चक्कर क्यों आया, यह भी जानती हो? तुम्हारे पेट में कुछ नहीं था, इसीलिए चक्कर आया था.’’

‘‘मुझे ग्लूकोस पिला कर तुम ने मेरा व्रत तोड़ दिया है, अब संतोषी मां के 10 व्रत और रखने पड़ेंगे.’’

‘‘मैं पूछता हूं कि ये साईं बाबा पहले कहां थे? पहले तो हम ने इस देवता का कभी नाम भी नहीं सुना था. ये अचानक कहां से आ गए? और फिर इन के भक्तों का भी पता नहीं चलता. आंखें मूंद कर भेड़चाल चलने लग जाते हैं अंधविश्वासी कहीं के,’’ अनिल ने तर्क दे कर कहा. उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वर्षा कैसे भूखी रह लेती है. हफ्ते में 7 दिन होते हैं और इतने ही वह व्रत रख लेती है. मंगल को व्रत, शुक्रवार को व्रत. इस बीच सोमवती अमावस्या, पूर्णमासी, एकादशी, द्वादशी, करवाचौथ, महालक्ष्मी…सभी तो व्रत रख लेती है वह. व्रत…व्रत…व्रत…हर रोज व्रत. वह बहुत दुखी हो चुका था वर्षा के व्रतों से.

साल में 2 बार नवरात्रे आते. उन दिनों में अनिल की शामत आ जाती. घर में खेती कर दी जाती और सब्जीतरकारी में प्याज का इस्तेमाल बंद हो जाता, जिस से अनिल को तरकारी में जरा भी स्वाद नहीं आता था. वहीं, जरा सी ही कोई प्यार की बात की तो उसे कोप से डराया जाता. उसे खेती से दूरदूर रहने का आदेश दिया जाता. चाहे कितनी भी सर्दी हो, उन दिनों वर्षा अवश्य ही तड़के सुबह स्नान करती और अनिल को भी नहाने के लिए मजबूर कर देती. एक तो वर्षा का शरीर पहले ही कमजोर था, उस पर ठंडे पानी से स्नान. कई बार उसे जुकाम हुआ, सर्दी लग कर बुखार भी हुआ, किंतु उस ने नहाना न छोड़ा.

कई बार अनिल ने वर्षा से गंभीर हो कर व्रत रखने के लाभ पूछे. वह यही जवाब देती, ‘इस से पुण्य होता है, देवीदेवता खुश होते हैं.’ क्या पुण्य होता है, यह वह कभी न बता पाती. हां, लक्ष्मी के व्रत रखने से धन की प्राप्ति होती है, यह अवश्य बता दिया करती थी. किंतु दफ्तर के मासिक वेतन के अतिरिक्त अनिल को कभी और कहीं से धन की प्राप्ति नहीं हुई थी.

एक बार उस ने वर्षा से पूछा, ‘‘तुम पूर्णमासी का जो व्रत रखती हो और सत्यनारायण की कथा सुनती हो, इस में है क्या? इस में सत्यनारायण की कथा नाम की तो कोई चीज ही नहीं है. सिवा इस के कि अमुक ने सत्यनारायण का प्रसाद नहीं लिया तो उसे अमुक कष्ट हुआ. इस के अतिरिक्त इस कथा में कुछ भी नहीं लिखा है?’’

‘‘यही तो कथा है. अगर तुम भी पूर्णमासी का व्रत रख कर सत्यनारायण की कथा सुनो तो तुम्हारी तरक्की हो सकती है, धनदौलत में वृद्धि हो सकती है,’’ वर्षा ने समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे इस की जरूरत नहीं है. तरक्की बारी आने पर ही होती है. जब बारी आएगी तो हो जाएगी. इस से पहले कभी नहीं हो सकती चाहे तुम कितने ही व्रत रखो. और तुम देवीदेवताओं के जो व्रत रखती आ रही हो, उन का चमत्कार मैं ने तो आज तक नहीं देखा,’’ अनिल ने टिप्पणी की.

‘‘कैसा चमत्कार देखना चाहते हो?’’

‘‘ऐसा चमत्कार कि असंभव संभव हो जाए, जैसे कि तुम्हारी लौटरी निकल आए, मुझे कहीं से बनाबनाया मकान मिल जाए, मेरी अचानक तरक्की हो जाए.’’?

‘‘ऐसे चमत्कार नहीं होते.’’

‘‘तो फिर व्रत रखरख कर अपने शरीर को कष्ट देने से क्या लाभ? जो मिलना होगा, वह अवश्य मिलेगा. जो नहीं मिलना, वह नहीं मिलेगा.’’

‘‘तुम फिर नास्तिकों वाली बातें करने लगे?’’

‘‘मेरा तो यही कहना है कि व्रतों में कुछ नहीं रखा है, श्राद्धों में कुछ नहीं धरा है. इंसान को अच्छे काम करने चाहिए, उन का फल हमेशा अच्छा होता है.’’

‘‘मैं भी इस से सहमत हूं.’’

‘‘तो फिर व्रत…’’ अभी अनिल की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वर्षा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘अच्छा, अब तुम मुझे व्रत रखने के लिए रोक मत देना. मेरी हर देवीदेवता में श्रद्धा है और उन पर पूरी आस्था है. मेरी आस्था तुड़वाने की कोशिश मत करना.’’ इतना कह कर वह गुस्से में उठ कर चली गई.

उस दिन करवाचौथ का व्रत था. हर ब्याहता स्त्री पति की लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती है. इस व्रत में तड़के 4 बजे खाना खाया जाता है. सारा दिन पानी तक ग्रहण करने की मनाही होती है. यह व्रत कड़ा व्रत माना जाता है. रात को जब चांद निकलता है, तब औरतें चांद को देख कर अर्ध्य देती हैं और फिर अन्नजल ग्रहण करती हैं. वर्षा ने सुबह उठ कर स्नान किया, फिर सरगी खाई. अनिल को भी उठाया. उस ने भी थोड़ाबहुत खाया और फिर दोनों सो गए. सुबह व्रत आरंभ हो चुका था. चूंकि अनिल ने सुबह कुछ खा लिया था, इसलिए खाने की इच्छा नहीं थी. वर्षा तो पूजा करने बैठ गई, अनिल ने स्वयं ही एक कप चाय बनाई और पी कर दफ्तर चला गया. कहानी का पार्ट 3 पढ़ें…

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Hindi Family Story : व्रत-भाग 1 – क्या अंधविश्वास में उलझी वर्षा को अनिल निकाल पाया ?

Hindi Family Story : साल में 2 बार नवरात्रे आते हैं. उन दिनों में अनिल की शामत आ जाती. घर में खेती कर दी जाती और सब्जीतरकारी में प्याज का इस्तेमाल बंद हो जाता. वहीं, जरा सी ही कोई प्यार की बात की तो उसे माता रानी के कोप से डराया जाता. अनिल के दिल में यह अरमान ही रहा कि कभी उस की पत्नी उसे प्यार करने के लिए उत्साहित करे.

उस ने हमेशा अनिल का तिरस्कार ही किया. अनिल कपड़े पहन कर दफ्तर जाने के लिए तैयार हो चुका था. दूसरे कमरे में उस की पत्नी वर्षा गीता का पाठ करने में मग्न थी. वह दिल ही दिल में खीझ रहा था कि उसे दफ्तर को देर हो रही है और वर्षा पाठ करने में लगी हुई है. सत्ता में नरेंद्र मोदी का फरमान लागू है, समय पर दफ्तर पहुंचने के कड़े आदेश हैं, किंतु वर्षा है कि उसे कुछ परवा ही नहीं. खाना बनने की प्रतीक्षा करूं तो देर हो जाएगी और अधिकारियों की झाड़ सुननी पड़ेगी, भूखा ही जाना होगा आज भी. उस ने एक्टिवा पर कपड़ा मारा और बाहर निकाल कर खड़ी कर दी.

वापस कमरे में आ कर बोला, ‘‘मैं आज भी भूखा ही दफ्तर चला जाऊं या कुछ खाने को मिलेगा?’’

वर्षा ने कोई उत्तर न दिया और पाठ करती रही. अनिल ने थोड़ी देर और प्रतीक्षा की, फिर बड़बड़ाता हुआ एक्टिवा उठा कर भूखा ही दफ्तर चला गया. अनिल के लिए यह नई बात नहीं थी. उस की पत्नी रोज ही सुबह नहाधो कर पूजा करने बैठ जाती और वह नाश्ते के लिए चिल्लाता रहता, किंतु उस पर कोई असर न होता. उस की शादी को 8 साल हो चुके थे, किंतु अभी तक उन के यहां कोई संतान नहीं हुई थी.

पहले वह अपने मातापिता के साथ रहता था. वर्षा सुबह उठ कर पूजापाठ में लग जाती और उस की मां उसे खाना बना कर दे दिया करती थी. कुछ समय बाद उसे सरकारी फ्लैट मिल गया और वह अपनी पत्नी को ले कर फ्लैट में चला आया था. यहां आ कर उसे नई समस्या का सामना करना पड़ रहा था. अनिल को अकसर रोज भूखे ही दफ्तर जाना पड़ता था क्योंकि वर्षा पूजापाठ में लगी रहती थी, खाना कौन बनाता? उस ने कई बार उस से कहा भी था, किंतु वह कब मानने वाली थी. वह तो अपना धर्मकर्म छोड़ने को बिलकुल तैयार न थी. अनिल का विचार था कि इंसान को भगवान की आराधना नहीं, अपनी रोजीरोटी की चिंता करनी चाहिए. कहानी का पार्ट 2 पढ़ें…

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Family Story In Hindi : सीमा – क्यों नवनीत से किनारा कर रही थी सीमा ?

Family Story In Hindi : ‘‘माया तुम पहले चढ़ो. नेहा आदिल को मुझे दो. अरे, संभाल कर…’’ ट्रेन के छूटने में केवल 5 मिनट शेष थे. सीमा ने अपनी सीट पर बैठ कर अभी पत्रिका खोली ही थी कि दरवाजे से आती आवाज ने सहसा उस की धड़कनें बढ़ा दीं. यह वही आवाज थी, जिसे सीमा कभी बेहद पसंद करती थी. इस आवाज में गंभीरता भी थी और दिल छूने की अदा भी. वक्त बदलता गया था पर सीमा इस आवाज के आकर्षण से कभी स्वयं को मुक्त नहीं कर सकी थी.

अकसर सोचती कि काश कहीं अचानक यह आवाज फिर से उसे पुकार कर वह सब कुछ कह दे, जिसे सुनने की चाह सदा से उस के दिल में रही.

आज वर्षों बाद वही आवाज सुनने को मिली थी. मगर सीमा को उस आवाज में पहले वाली कोमलता और सचाई नहीं वरन रूखापन महसूस हो रहा था. कभी कुली तो कभी अपने परिवार पर झल्लाती आवाज सुनते हुए सीमा बरबस सोचने लगी कि क्या जिंदगी की चोटों ने उस स्वर से कोमलता दूर कर दी या फिर हम दोनों के बीच आई दूरी का एहसास उसे भी हुआ था.

कई दफा 2 लोगों के बीच का रिश्ता अनकहा सा रह जाता है. फासले कभी सिमट नहीं पाते और दिल की कसक दिल में ही रह जाती है. कुछ ऐसा ही रिश्ता था उस आवाज के मालिक यानी नवनीत से सीमा का.

सीमा बहुत उत्सुक थी उसे एक नजर देखने को, 10 साल बीत चुके थे. वह सीट से उठी और दरवाजे की तरफ देखने लगी, जिधर से आवाज आ रही थी. सामने एक शख्स अपने बीवीबच्चों के साथ अपनी सीट की तरफ बढ़ता नजर आया.

सीमा गौर से उसे देखने लगी. केवल आंखें ही थीं जिन में 10 साल पहले वाले नवनीत की झलक नजर आ रही थी. अपनी उम्र से वह बहुत अधिक परिपक्व नजर आ रहा था. माथे पर दूर तक बाल गायब थे. आंखों में पहले वाली नादान शरारतों की जगह चालाकी और घमंड था. शरीर पर चरबी की मोटी परत, निकली हुई तोंद. लगा ही नहीं कि कालेज के दिनों का वही हैंडसम और स्मार्ट नवनीत सामने खड़ा है.

नवनीत ने भी शायद सीमा को पहचाना नहीं था. वह सीमा को देख तो रहा था, मगर पहचानी नजरों से नहीं, अपितु एक खूबसूरत लड़की को देख कर जैसे कुछ पुरुषों की नजरें कामुक हो उठती हैं वैसे और यह सीमा को कतई बरदाश्त नहीं था. वह चुपचाप आ कर सीट पर बैठ गई और पुरानी बातें सोचने लगी…

कालेज का वह समय जब दोनों एकसाथ पढ़ते थे. वैसे उन दिनों सीमा बहुत ही साधारण सी दिखती थी, पर नवनीत में ऐसी कई बातें थीं, जो उसे आकर्षित करतीं. कभी किसी लड़के से बात न करने वाली सीमा अकसर नवनीत से बातें करने के बहाने ढूंढ़ती.

पर अब वक्त बदल गया था. अच्छी सरकारी नौकरी और सुकून की जिंदगी ने सीमा के चेहरे पर आत्मविश्वास भरी रौनक ला दी थी. फिजिकली भी उस ने खुद को पूरी तरह मैंटेन कर रखा था. जो भी पहनती उस पर वह खूब जंचता.

सीमा चुपचाप पत्रिका के पन्ने पलटने लगी. ऐसा नहीं है कि इस गुजरे वक्त में सीमा ने कभी नवनीत के बारे में सोचा नहीं था. 1-2 दफा फेसबुक पर उस की तलाश की थी और उस की गुजर रही जिंदगी को फेसबुक पर देखा भी था. उस का नया फोन नंबर भी नोट कर लिया था पर कभी फ्रैंड रिक्वैस्ट नहीं भेजी और न ही फोन किया.

आज सीमा फ्री बैठी थी तो सोचा क्यों न उस से चैटिंग ही कर ली जाए. कम से कम पता तो चले कि वह शख्स नवनीत ही है या कोई और. उसे कुछ याद है भी या नहीं. अत: उस ने व्हाट्सऐप पर नवनीत को ‘‘हाय,’’ लिख कर भेज दिया. तुरंत जवाब आया, ‘‘कैसी हो? कहां हो तुम?’’

वह चौंकी. एक पल भी नहीं लगा था उसे सीमा को पहचानने में. प्रोफाइल पिक सीमा ने ऐसी लगाई थी जिसे ऐडिट कर कलरफुल बनाया गया था और फेस क्लीयर नहीं था. शायद मैसेज के साथ जाने वाले नाम ने तुरंत नवनीत को उस की याद दिला दी थी.

सीमा ने मैसेज का जवाब दिया, ‘‘पहचान लिया मुझे? याद हूं मैं ?’’

‘‘100 प्रतिशत याद हो और सब कुछ…’’

‘‘सब कुछ क्या?’’ सीमा चौंकी.

‘‘वही जो तुम ने और मैं ने सोचा था.’’

सीमा सोच में पड़ गई.

नवनीत ने फिर सवाल किया, ‘‘आजकल कहां हो और क्या कर रही हो?’’

‘‘दिल्ली में हूं. जौब कर रही हूं,’’ सीमा ने जवाब दिया.

‘‘गुड,’’ उस ने स्माइली भेजी.

‘‘तुम बताओ, घर में सब कैसे हैं? 2 बेटे हैं न तुम्हारे?’’ सीमा ने पूछा.

‘‘हां, पर तुम्हें कैसे पता?’’ नवनीत ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘बस पता रखने की इच्छा होनी चाहिए,’’ सीमा ने नवनीत के जज्बातों को टटोलते हुए जवाब दिया.

वह तुरंत पूछ बैठा, ‘‘तुम ने शादी की?’’

‘‘नहीं, अभी तक नहीं की. काम में ही व्यस्त रहती हूं.’’

‘‘मैं तो सोच रहा था कि पता नहीं कभी तुम से कौंटैक्ट होगा भी या नहीं, पर तुम आज भी मेरे लिए फ्री हो.’’

नवनीत की फीलिंग्स बाहर आने लगी थीं. पर सीमा को उस के बोलने का तरीका अच्छा नहीं लगा.

‘‘गलत सोच रहे हो. मैं किसी के लिए फ्री नहीं होती. बस तुम्हारी बात अलग है, इसलिए बात कर ली,’’ सीमा ने मैसेज किया.

‘‘मैं भी वही कह रहा था.’’

‘‘वही क्या?’’

‘‘यही कि तुम्हारे दिल में मैं ही हूं. सालों पहले जो बात थी वही आज भी है, नवनीत ने मैसेज भेजा.

जब सीमा ने काफी देर तक कोई मैसेज नहीं किया तो नवनीत ने फिर से मैसेज किया, ‘‘आज तुम से बातें कर के बहुत अच्छा लगा. हमेशा चैटिंग करती रहना.’’

‘‘ओके श्योर.’’

अजीब सी हलचल हुई थी सीमा के दिलोदिमाग में. अच्छा भी लगा और थोड़ा आश्चर्य भी हुआ. वह समझ नहीं पा रही थी कि कैसे रिऐक्ट करे. उस ने मैसेज किया, ‘‘वैसे तुम हो कहां फिलहाल?’’

‘‘फिलहाल मैं ट्रेन में हूं और बनारस जा रहा हूं.’’

‘‘विद फैमिली?’’

‘‘हां.’’

‘‘ओके ऐंजौय,’’ कह सीमा ने फोन बंद कर दिया. यह तो पक्का हो गया था कि वह नवनीत ही था. वह सोचने लगी कि जिंदगी भी कैसेकैसे रुख बदलती है. फिर बहुत देर तक वह पुरानी बातें याद करती रही.

घर आ कर सीमा काम में व्यस्त हो गई. सफर और नवनीत की बातें भूल सी गई. मगर अगले दिन सुबहसुबह नवनीत का गुड मौर्निंग मैसेज आ गया. सीमा जवाब दे कर औफिस चली गई.

शाम को औफिस से घर आ कर टीवी देख रही थी, तो फिर नवनीत का मैसेज आया, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘‘टीवी देख रही हूं और आप?’’ सीमा ने सवाल किया.

‘‘आप का इंतजार कर रहा हूं.’’

मैसेज पढ़ कर सीमा मुसकरा दी और सोचने लगी कि इसे क्या हो गया है. फिर मुसकराते हुए उस ने मैसेज किया, ‘‘मगर कहां?’’

‘‘वहीं जहां तुम हो.’’

‘‘यह तुम ही हो या कोई और? अपना फोटो भेजो ताकि मुझे यकीन हो.’’

‘‘मैं कल भेजूंगा. तब तक तुम अपना फोटो भेजो, प्लीज.’’

सीमा ने एक फोटो भेज दिया.

तुरंत कमैंट आया, ‘‘मस्त लग रही हो.’’

‘‘मस्त नहीं, स्मार्ट लग रही हूं,’’ सीमा ने नवनीत के शब्दों को सुधारा.

नवनीत चुप रहा. इस के बाद 2 दिनों तक उस का मैसेज नहीं आया. तीसरे

दिन फिर से गुड मौर्निंग मैसेज देख कर सीमा ने पूछा, ‘‘और बताओ कैसे हो?’’

‘‘वैसा ही जैसा तुम ने छोड़ा था.’’

‘‘मुझे नहीं लगता… तुम्हारी जिंदगी में तो काफी बदलाव आए हैं. तुम पति परमेश्वर बने और पापा भी, सीमा ने कहा.’’

इस पर नवनीत ने बड़े ही बेपरवाह लहजे में कहा, ‘‘अरे यार, वह सब छोड़ो. तुम बताओ क्या बनाओगी मुझे?’’

‘‘दोस्त बनाऊंगी और क्या?’’ सीमा ने टका सा जवाब दिया.

‘‘वह तो हम हैं ही,’’ कह कर उस ने ‘दिल’ का निशान भेजा.

‘‘अच्छा, अब कुछ काम है. चलती हूं. बाय,’’ कह कर सीमा व्हाट्सऐप बंद करने ही लगी कि फिर नवनीत का मैसेज आया, ‘‘अरे सुनो? मैं कुछ दिनों में दिल्ली आऊंगा.’’

‘‘ओके, आओ तो बताना.’’

‘‘क्या खिलाओगी? कहांकहां घुमाओगी?’’

‘‘जो तुम्हें पसंद हो.’’

‘‘पसंद तो तुम हो.’’

उस के बोलने की टोन से एक बार फिर सीमा चकित रह गई. फिर बोली, ‘‘क्या सचमुच? मगर पहले कभी तो तुम ने कहा नहीं.’’

‘‘क्योंकि तुम औलरैडी समझ गई थीं.’’

‘‘हां वह तो 100% सच है. मैं समझ गई थी.’’

‘‘मगर तुम ने क्यों नहीं कहा?’’ नवनीत ने उलटा सवाल दागा, तो सीमा ने उसी टोन में जवाब दिया, ‘‘क्योंकि तुम भी समझ गए थे.’’

‘‘अब तुम कैसे रहती हो?’’

‘‘कैसे मतलब?’’ सीमा ने पूछा.

‘‘मतलब ठंड में,’’ नवनीत का जवाब था.

‘‘क्यों वहां ठंड नहीं पड़ती क्या?’’ नवनीत का यह सवाल सीमा को अजीब लगा था.

नवनीत ने फिर लिखा, ‘‘मेरे पास तो ठंड दूर करने का उपाय है. पर तुम्हारी ठंड कैसे दूर होती होगी?’’

‘‘कैसी बातें करने लगे हो?’’ सीमा ने झिड़का.

मगर नवनीत का टोन नहीं बदला. उसी अंदाज में बोला, ‘‘ये बातें पहले कर लेते तो आज का दिन कुछ और होता.’’

‘‘वह तो ठीक है, पर अब यह मत भूलो कि तुम्हारी एक बीवी भी है.’’

‘‘वह अपनी जगह है, तुम अपनी जगह. तुम जब चाहो मैं तुम्हारे पास आ सकता हूं,’’ नवनीत ने सीधा जवाब दिया.

सीमा को नवनीत का शादीशुदा होने के बावजूद इस तरह खुला निमंत्रण देना पसंद नहीं आया था. पहले नवनीत से इस तरह की बातें कभी नहीं हुई थीं, मगर उस के लिए मन में फीलिंग्स थीं जरूर. अब बात तो हो गई थी, मगर फीलिंग्स खत्म हो चुकी थीं. उस के मन में नवनीत के लिए एक अजीब सी उदासीनता आ गई थी.

2 घंटे भी नहीं बीते थे कि नवनीत ने फिर मैसेज किया, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘अरे क्या हो गया है तुम्हें? ठीक हूं,’’ सीमा ने लिखा.

‘‘रातें कैसे बिताती हो? नवनीत ने अगला सवाल दागा.’’

सीमा के लिए यह अजीब सवाल था. सीमा ने उस से इस तरह की बातचीत की अपेक्षा नहीं की थी. अत: सीधा सा जवाब दिया, ‘‘सो कर.’’

‘‘नींद आती है?’’

यह सवाल सीमा को और भी बेचैन कर गया. पर लिखा, ‘‘हां पूरी नींद आती है.’’

‘‘और जब…’’

नवनीत ने कुछ ऐसा अश्लील सा सवाल किया था कि वह बिफर पड़ी, ‘‘आई डौंट लाइक दिस टाइप औफ गौसिप.’’

मैं सोच रहा था कि अपने दोस्त से बातें हो रही हैं. मगर सौरी, तुम तो दार्शनिक निकलीं.

नवनीत ने सीमा का मजाक उड़ाया तो सीमा ने कड़े शब्दों में जवाब दिया, ‘‘मैं ने चैटिंग करने से मना नहीं किया, मगर एक सीमा में रह कर ही बातें की जा सकती हैं.’’

‘‘दोस्ती में कोई सीमा नहीं होती.’’

‘‘पर मैं कभी ऐसी दोस्ती के लिए रजामंदी नहीं दूंगी, जिस में कोई सीमा न हो,’’ सीमा ने फिर से दृढ़ स्वर में कहा.

‘‘यह मत भूलो कि तुम भी मुझे पसंद किया करती थीं सीमा.’’

‘‘पसंद करना अलग बात है, पर उसे अपनी जिंदगी की गलती बना लेना अलग. शायद मैं यह कतई नहीं चाहूंगी कि ऐसा कुछ भी हो. इस तरह की बातें करनी हैं तो प्लीज अब कभी मैसेज मत करना मुझे,’’ मैसेज भेज सीमा ने फोन बंद कर दिया.

अब सीमा का मन काफी हलका हो गया था. नवनीत से सदा के लिए दूरी बना कर उसे तनिक भी अफसोस नहीं हो रहा था. नवनीत, जिसे कभी उस ने मन ही मन चाहा था और पाने की ख्वाहिश भी की थी, अब वह बदल चुका या फिर उस की असली सूरत सीमा को रास नहीं आई. Family Story In Hindi :

Family Crime Story In Hindi : अपनी शर्तों पर – जब खूनी खेल में बदली नव्या-परख की कहानी

Family Crime Story In Hindi : नव्या लाइब्रेरी में बैठी नोट्स लिख रही थी तभी कब परख उस के पास आ कर बैठ गया उसे पता ही नहीं चला. ‘‘मुझ से इतनी बेरुखी क्यों नव्या, मैं सह नहीं पाऊंगा. वैसे कान खोल कर सुन लो, तुम मेरी नहीं हो सकीं तो और किसी की नहीं होने दूंगा. कितने दिनों से मैं तुम से मिलने का प्रयत्न कर रहा हूं पर तुम कन्नी काट कर निकल जाती हो,’’ वह बोला.

‘‘मेरा पीछा छोड़ दो परख, हमारी राहें और लक्ष्य अलग हैं,’’ नव्या ने उत्तर दिया. दोनों को बातें करता देख कर लाइब्रेरियन ने उन्हें बाहर जाने का इशारा करते हुए द्वार पर लगी चुप रहने का इशारा करने वाली तसवीर दिखाई.

‘‘देखो नव्या, मैं आज तुम्हें अंतिम चेतावनी देता हूं. तुम मुझे दूसरों की तरह समझने की भूल मत करना, नहीं तो बहुत पछताओगी. उपभोग करो और फेंक दो की नीति मेरे साथ नहीं चलेगी. पिछले 2 वर्षों में मैं ने तुम्हारे लिए क्या नहीं किया? पानी की तरह पैसा बहाया मैं ने और इस चक्कर में मेरी पढ़ाई चौपट हो गई सो अलग,’’ परख ने धमकी ही दे डाली.

‘‘क्यों किया यह सब? मैं ने तो कभी नहीं कहा था कि अपनी पढ़ाई पर ध्यान मत दो. घूमनेफिरने का शौक तुम्हें भी कम नहीं है. मैं तो बस मित्रता के नाते तुम्हारा साथ दे रही थी.’’ ‘‘किस मित्रता की बात कर रही हो तुम? एक युवक और युवती के बीच मित्रता नहीं केवल प्यार होता है,’’ परख की आंखों से चिनगारियां निकल रही थीं. लाइब्रेरी से बाहर निकल कर दोनों कुछ देर वादविवाद करते हुए साथ चले. फिर नव्या ने परख से आगे निकलने का प्रयत्न करते हुए तेजी से कदम बढ़ाए. वह सचमुच डर गई थी. तभी परख ने जेब से छोटा सा चाकू निकाला और दीवानों की तरह नव्या पर वार करने लगा. नव्या बदहवास सी चीख रही थी. चीखपुकार सुन कर वहां भीड़ जमा हो गई. कुछ विद्यार्थियों ने कठिनाई से परख को नियंत्रित किया. फिर वे आननफानन नव्या को अस्पताल ले गए. कालेज में यह समाचार आग की तरह फैल गया. सब अपने ढंग से इस घटना की विवेचना कर रहे थे.

नव्या मित्रोंसंबंधियों से घिरी इस सदमे से निकलने का प्रयत्न कर रही थी. हालांकि उस के जख्म अधिक गहरे नहीं थे, पर उसे अस्पताल में भरती कर लिया गया था. नव्या की फ्रैंड निधि ने उस के स्थानीय अभिभावक मौसी और मौसा को फोन कर के सारी घटना की जानकारी दे दी, तो नव्या की मौसी नीला और उस के पति अरुण तुरंत आ पहुंचे. नव्या नीला के गले लग कर फूटफूट कर रोई व आंसुओं के बीच बारबार यह कहती रही, ‘‘मौसी, मुझे यहां से ले चलो. यह खूंख्वार लोगों की बस्ती है. परख मुझे जान से मार डालेगा.’’ नीला नव्या को सांत्वना दे कर धीरज बंधाती रही. पर नव्या हिचकियां ले कर रो रही थी. उसे सपने में भी आशा नहीं थी कि परख उस से ऐसा व्यवहार करेगा. अगले दिन ही नीला उसे अपने घर ले गई. सूचना मिलते ही नव्या के मातापिता आ पहुंचे. सारा घटनाक्रम सुन कर वे स्तब्ध रह गए.

‘‘नव्या, हम ने तो बड़े विश्वास से तुम को यहां पढ़ने के लिए भेजा था. पर तुम्हारे तो यहां पहुंचते ही पंख निकल आए. और नीला, तुम ने ही कहा था न कि छात्रावास में, वह भी देश की राजधानी में रह कर इस की प्रतिभा निखर आएगी पर हुआ इस का उलटा ही. पूरे परिवार की कितनी बदनामी हुई है यह सब जान कर. अब कौन इस से विवाह करेगा?’’ नव्या के पिता गिरिजा बाबू का दर्द उन की आंखों में छलक आया.

‘‘अब तो हम नव्या को अपने साथ ले जाएंगे. कोई और रास्ता तो बचा ही नहीं है,’’ नव्या की मां लीला ने अपना मत प्रकट किया.

‘‘दीदी, जीजाजी, सच कहूं तो जैसे ही मुझे परख से संबंध के बारे में पता चला मैं ने नव्या को घर बुला कर समझाया था. इस ने वादा भी किया था कि यह अपनी पढ़ाई पर ध्यान देगी. पर इसी बीच यह घटना घट गई,’’ नीला ने स्पष्ट किया. ‘‘मैं ने तो उस दिन भी कहा था कि सारी सूचना आप लोगों को दे दें पर नव्या अपनी सहेली निधि को साथ ले कर आई और अपनी मौसी को समझा ही लिया कि वह आप दोनों को सूचित न करे,’’ तभी अरुण ने पूरे प्रकरण पर अपनी चुप्पी तोड़ी.

‘‘मैं ने भी कहां सोचा था कि बात इतनी बढ़ जाएगी. मैं ने तो नव्या को कई बार चेताया भी था कि इस तरह किसी के साथ अकेले घूमनाफिरना ठीक नहीं है पर नव्या ने अनसुना कर दिया,’’ निधि ने अपना बचाव किया. ‘‘ठीक है, मैं ही बुरी हूं और सब तो दूध के धुले हैं,’’ नव्या निधि की बात सुन कर चिहुंक उठी. ‘‘आप लोग व्यर्थ ही चिंतित हो जाओगी इसीलिए आप लोगों को सूचित नहीं किया था. मुझे लगा कि हम इस स्थिति को संभाल लेंगे. निधि ने भी नव्या की ओर से आश्वस्त किया था. पर कौन जानता था कि ऐसा हादसा हो जाएगा,’’ नीला समझाते हुए रोंआसी हो उठी.

अभी यह विचारविमर्श चल ही रहा था कि अरुण ने परख के मातापिता के आने की सूचना दी. ‘‘अब क्या लेने आए हैं? हमारी बेटी की तो जान पर बन आई. इन का यहां आने का साहस कैसे हुआ?’’ लीला बहुत क्रोध में थीं. अरुण और नीला ने उन्हें शांत करने का प्रयत्न किया. ‘‘हम तो उस अप्रिय घटना के प्रति अपना खेद प्रकट करने आए हैं. परख भी बहुत शर्मिंदा है. आप लोगों से माफी मांगनी चाहता है,’’ परख के पिता धीरज आते ही बोले.

‘‘क्या कहने आप के बेटे की शर्मिंदगी के. यहां तो जीवन का संकट उत्पन्न हो गया. बदनामी हुई सो अलग.’’ ‘‘मैं यही विनती ले कर आया हूं कि यदि हम मिलबैठ कर समझौता कर लें तो कोर्टकचहरी तक जाने की नौबत नहीं आएगी,’’ धीरज ने किसी प्रकार अपनी बात पूरी की.

‘‘चाहते क्या हैं आप?’’ अरुण ने प्रश्न किया.

‘‘यही कि नव्या परख के पक्ष में अपना बयान बदल दे. हम तो इलाज का पूरा खर्च उठाने को तैयार हैं,’’ धीरज ने एकएक शब्द पर जोर दे कर कहा.

‘‘ऐसा हो ही नहीं सकता. यह हमारी बेटी के सम्मान का प्रश्न है,’’ गिरिजा बाबू बहुत क्रोध में थे.

‘‘आप की बेटी हमारी भी बेटी जैसी है. मानता हूं इस में हमारा स्वार्थ है पर यह बात उछलेगी तो दोनों परिवारों की बदनामी होगी, बल्कि मेरे पास तो एक और सुझाव भी है. गलत मत समझिए. मैं तो मात्र सुझाव दे रहा हूं. मानना न मानना आप के हाथ में है,’’ परख के पिता शांत और संयत स्वर में बोले.

‘‘क्या सुझाव है आप का?’’

‘‘हम दोनों का विवाह तय कर देते हैं. सब के मुंह अपनेआप बंद हो जाएंगे.’’ ‘‘यह दबाव डालने का नया तरीका है क्या? बेटा हमला करता है और उस का पिता विवाह का प्रस्ताव ले कर आ जाता है. कान खोल कर सुन लीजिए, जान दे दूंगी पर इस दबाव में नहीं आऊंगी,’’ घायल अवस्था में भी नव्या उठ कर चली आई और पूरी शक्ति से चीख कर फूटफूट कर रोने लगी. नव्या को इस तरह बिलखता देख कर सभी स्तब्ध रह गए. किसी को कुछ नहीं सूझा तो बगलें झांकने लगे और परख के पिता हड़बड़ा कर उठ खड़े हुए.

‘‘आप लोग बच्ची को संभालिए हम फिर मिलेंगे,’’ परख के पिता अपनी पत्नी के साथ तेजी से बाहर निकल गए. ‘‘देखा आप ने? अभी भी ये लोग मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे. मेरा दोष क्या है? यही न कि लड़की होते हुए भी मैं ने घर से दूर आ कर पढ़ने का साहस किया. पर ये होते कौन हैं मेरे लिए ऐसी बातें कहने वाले?’’ नव्या का प्रलाप जारी था. गिरिजा बाबू अभी भी क्रोध में थे. जो कुछ हुआ उस के लिए वे नव्या को ही दोषी मान रहे थे और कोई कड़वी सी बात कहनी चाहते थे पर नव्या की दशा देख कर चुप रह गए. परख और उस के मातापिता अगले दिन फिर आ धमके. परख भी उन के साथ था. उस के लिए उन्होंने जमानत का प्रबंध कर लिया था.

‘‘ये लोग तो बड़े बेशर्म हैं. फिर चले आए,’’ गिरिजा बाबू उन्हें देखते ही भड़क उठे.

‘‘जीजाजी, यह समय क्रोध में आने का नहीं है. बातचीत करने में कोई हानि नहीं है.हमें तो केवल यह देखना है कि इस मुसीबत से बाहर कैसे निकला जाए,’’ नीला ने उन्हें शांत करना चाहा. ‘‘इतना निरीह तो मैं ने स्वयं को कभी अनुभव नहीं किया. सब नव्या के कारण. सोचा था परिवार का नाम ऊंचा करेगी पर इस ने तो हमें कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रखा,’’ गिरिजा बाबू परेशान हो उठे. ‘‘ऐसा नहीं कहते. वह बेचारी तो स्वयं संकट में है. चलिए बैठक में चलिए. वे लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं. इस मसले को बातचीत से ही सुलझाने का यत्न करिए,’’ नीला और लीला समवेत स्वर में बोलीं.

अरुण गिरिजा बाबू को ले कर बैठक में आ बैठे. परख ने दोनों का अभिवादन किया.

‘‘यही है परख,’’ अरुण ने गिरिजा बाबू से परिचय कराया.

‘‘ओह तो यही है सारी मुसीबत की जड़,’’ गिरिजा बाबू का स्वर बहुत तीखा था. ‘‘देखिए, ऐसी बातें आप को शोभा नहीं देतीं. इस तरह तो आप कड़वाहट को और बढ़ा रहे हैं. हम तो संयम से काम ले रहे हैं पर आप उसे हमारी कमजोरी समझने की भूल कदापि मत करिए,’’ धीरज ने भी उतने ही तीखे स्वर में उत्तर दिया. ‘‘अच्छा, नहीं तो क्या करेंगे आप? हमें भी चाकू से मारेंगे? सच तो यह है कि आप की जगह यहां नहीं जेल में है.’’

‘‘कोई चाकूवाकू नहीं मारा. छोटा सा पैंसिल छीलने का ब्लेड था जिस से जरा सी खरोंच लगी है. आप लोगों ने बात का बतंगड़ बना दिया,’’ परख बड़े ठसके से बोला मानो उस ने नव्या पर कोई बड़ा उपकार किया हो.

‘‘देखा तुम ने अरुण? कितना बेशर्म है यह व्यक्ति. इसे अपनी करनी पर तनिक भी पश्चाताप नहीं है. ऊपर से हमें ही रोब दिखा रहा है,’’ गिरिजा बाबू आगबबूला हो उठे.

‘‘लो भला, मैं क्यों पश्चाताप करूं? मैं कहता हूं बुलाइए न अपनी बेटी को. अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा,’’ परख बोला.

‘‘लो आ गई मैं. कहो क्या कहना है? मुझे कितनी चोट लगी है इस का हिसाबकिताब हो चुका है. उस के लिए तुम्हारे प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है. बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी. अब जब कोर्टकचहरी के चक्कर लगाओगे तो सारी चतुराई धरी की धरी रह जाएगी.’’ ‘‘मैं ने तो कभी अपनी चतुराई का दावा नहीं किया. चतुर तो तुम हो. मुझे कितनी होशियारी से 2 साल मूर्ख बनाती रहीं. बड़े होटलों, रिजोर्ट में खानापीना, सिनेमा देखना और कपड़े धुलवाने से ले कर प्रोजैक्ट बनवाने तक का काम बड़ी होशियारी से करवाया.’’

‘‘तो क्या हुआ? तुम तो मेरे सच्चे मित्र होने का दावा करते थे. अब बिल चुकाने का रोना रोने लगे. भारतीय संस्कृति में ऐसा ही होता है. बिल सदा युवक ही चुकाते हैं, युवतियां नहीं.’’ ‘‘तुम्हारे मुंह से भारतीय संस्कृति की दुहाई सुन कर हंसी आती है. हमारी संस्कृति में तो लड़कियों को युवकों के साथ सैरसपाटा करनेकी अनुमति ही नहीं है. पर तुम तो भारतीय संस्कृति का उपयोग अपनी सुविधा के लिएकरने में विश्वास करती हो. युवक भी अपनापैसा उन्हीं पर खर्च करते हैं जिन से उन की मित्रता हो, हर ऐरेगैरे पर नहीं. वैसे भी तुम्हारे जैसी लड़की क्या जाने प्रेम, मित्रता जैसे शब्दों के अर्थ. तुम तो न जाने मेरे जैसे कितने युवकों को मूर्ख बना रही थीं. पर मैं उन लोगों में से नहीं हूं कि इस अपमान को चुप रह कर सह लूं,’’ परख भी क्रोध से बोला.

‘‘इसीलिए मुझे जान से मारने का इरादा था तुम्हारा? तो ठीक है अब ये सब बातें तुम अदालत में कहना,’’ नव्या ने धमकी दी.

‘‘देख लिया न आप ने? यह है आज की पीढ़ी. इन्हें हम ने यहां पढ़ने के लिए भेजा था. ये दोनों यहां मस्ती कर रहे थे. बड़ों के सामने भी कितनी बेशर्मी से बातें कर रहे हैं,’’ अब परख की मां रीता ने अपना मत प्रकट किया. ‘‘आप को बुरा लगा हो तो क्षमा कीजिए आंटी. पर मैं भी इक्कीसवीं सदी की लड़की हूं. अपने साथ हुए अत्याचार का बदला लेना मुझे भी आता है.’’ ‘‘अत्याचार तो मुझ पर हुआ है, मुझे कौन न्याय दिलाएगा? 2 वर्षों तक अपना पैसा और समय मैं ने इस लड़की पर लुटाया. अब यह कहती है कि हमारी राहें अलग हैं. इस के चक्कर में मेरी तो पढ़ाई भी चौपट हो गई,’’ परख के मन का दर्द उस के शब्दों में छलक आया.

‘‘अब समझ में आया कि एक युवक और युवती के बीच सच्ची मित्रता हो ही नहीं सकती. मैं जिसे अपना सच्चा मित्र समझती थी वह तो कुछ और ही समझ बैठा था,’’ नव्या अपनी ही बात पर अड़ी थी. ‘‘जब बड़े विचारविमर्श कर रहे हों तो छोटों का बीच में बोलना शोभा नहीं देता. अब केवल हम बोलेंगे और तुम दोनों केवल सुनोगे. दोष तुम दोनों का ही है. तुम्हारा इसलिए परख कि तुम अपनी पढ़ाईलिखाई छोड़ कर प्रेम की पींगें बढ़ाने लगे और नव्या तुम्हें नईनई आजादी क्या मिली तुम तो सैरसपाटे में उलझ गईं. या तो तुम परख के इरादे को भांप नहीं पाईं या फिर जान कर भी अनजान बनने का नाटक करती रहीं. तुम तो सारी बातें अपनी मौसी से भी तब तक छिपाती रहीं जब तक तुम्हारी मौसी ने बलात सब कुछ उगलवा नहीं लिया,’’ अरुण के स्वर की कड़वाहट स्पष्ट थी.

‘‘इन सब बातों का अब कोई अर्थ नहीं है. परख की ओर से मैं आप को नव्या बेटी की सुरक्षा का विश्वास दिलाता हूं और चाहता हूं कि आप इस अध्याय को यहीं समाप्त कर दें,’’ धीरज ने आग्रह किया. ‘‘परख ने जो किया वह क्षमा के योग्य नहीं है. अत: इस बात को समाप्त करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. हम अपनी बेटी के सम्मान की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं,’’ गिरिजा बाबू क्रोधित स्वर में बोले. धीरज गिरिजा बाबू और अरुण को कक्ष के एक कोने में ले गए. वहां कुछ देर के वादप्रतिवाद के बाद वे सहमत हो गए कि इस बात को समाप्त करने में ही दोनों परिवारों की भलाई है. नव्या ने सुना तो भड़क उठी, ‘‘कोई और परिवार होता तो परख को जीवन भर चक्की पिसवाता पर हमारे परिवार में मेरी औकात ही क्या है, लड़की हूं न,’’ नव्या ने रोने का उपक्रम किया.

‘‘अब रहने भी दो मुंह मत खुलवाओ. कोई दूसरा परिवार तुम से कैसा व्यवहार करता इस बारे में हम कुछ न कहें इसी में सब की भलाई है,’’ नीला ने अपनी नाराजगी दिखाई.

‘‘ठीक है, यदि सभी अपनी जिद पर अड़े हैं तो मेरी भी सुन लें. मैं कहीं नहीं जा रही. यहीं रह कर पढ़ाई करूंगी,’’ नव्या बड़ी शान से बोली. ‘‘अवश्य, तुम यहां रह कर पढ़ोगी अवश्य, पर अकेले नहीं. अपनी मां के साथ रहोगी उन की छत्रछाया में. अपनी मां के नियंत्रण में रहोगी हमारी शर्तों पर,’’ गिरिजा बाबू तीखे स्वर में बोलते हुए बाहर निकल गए, जिस से थोड़ी सी ताजा हवा में सांस ले सकें. बगीचे में पड़ी बैंच पर बैठ कर व दोनों हाथों में मुंह छिपा कर देर तक सिसकते रहे.

4 महीने के बाद उन्होंने सुना कि परख और नव्या फिर दोस्तों के बीच मिल रहे हैं. उन के दोस्तों ने उन के बीच सुलह करा दी. 6 महीने बाद दोनों ने फिर अपने मातापिता को बुलाया और इस बार दोनों ने शर्माते हुए कहा, ‘‘हम शादी करना चाहते हैं.’’ गिरिजा बाबू और अरुण दोनों एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे और यह समझ में नहीं आ रहा था उन्हें कि क्या कहें, क्या न कहें. Family Crime Story In Hindi :

Hindi Family Story : नव वर्ष का प्रकाश – जब बेटा लगा पराया

Hindi Family Story : निधि और मनीष ने बड़ी उम्मीदों से बेटे का नाम प्रकाश रखा था. लेकिन वही प्रकाश जब पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो उनके जीवन में अंधेरा कर उन से दूर चला गया और जब बरसों बाद नव वर्ष पर मिलने आया तो ऐसे जैसे कभी अपना था ही नहीं…

निधि की नजरें बार बार कैलेंडर पर चली जातीं. शाम हो चुकी थी और कुछ देर बाद ही नव वर्ष का आगमन होने वाला था. सोचा कि चलो पिछला वर्ष तो किसी तरह रोते पीटते कट ही गया. उस के मन में आने वाले नव वर्ष के लिए बेचैनी होने लगी.

प्रकाश ने फोन पर इतना ही कहा था कि वह दीया को ले कर पहुंच रहा है. अंधेरा घिर आया था लेकिन निधि ने अभी तक घर की बत्तियां नहीं जलाई थीं. जला कर वह करती भी क्या. जिस के जीवन से ही प्रकाश चला गया हो उस के घर के कमरों में प्रकाश हो न हो, क्या फर्क पड़ता है.

प्रकाश, जिसे पिछले 31 सालों से उन्होंने अपने खून पसीने से सींचा था, जिस के पल पल का ख्याल रखा था, जिस की पसंद नापसंद बड़ी माने रखती थी, उसी ने आज उन्हें बंजर, बेसहारा बना दिया था.

ममता भरे स्नेहिल आंचल की छांव में जो प्रकाश खेला था आज एकाएक अपने तक ही सीमित हो गया था. उस ने अपने माता पिता को बुढ़ापे में यों निकाल फेंका था मानो पैर में चुभा कांटा निकाल कर फेंक दिया हो. बेचारे माता पिता अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचा भी नहीं पाए थे. सोचा था प्रकाश पढ़ लिख जाएगा तो कमा लेगा, हमारे बुढ़ापे की लाठी बनेगा. यह एहसास निधि के लिए जानलेवा था. सारे दिन वह व्यथित रहती. उस पर पति का कठोर जीवन उसे और भी सालता. पति को जीतोड़ मेहनत करते देख उसे बहुत दुख होता. अपने जिगर के टुकड़े से उसे ऐसी उम्मीद न थी.

निधि को वह दिन याद आया जब प्रकाश का नामकरण किया गया था. सब उसे राज…राजकुमार नाम से पुकारने लगे थे किंतु उस ने प्रकाश नाम रखा. शायद यह सोच कर कि प्रकाश नाम से उसे सदैव जीवन में प्रकाश मिलता रहेगा और दूसरों को भी वह अपने प्रकाश से प्रकाशित करेगा.

परंतु आज जब जीवन इतना गुजर गया तो अनुभव हुआ कि प्रकाश का अपना कोई वजूद ही नहीं है, उस का ऐसा कोई अस्तित्व नहीं है कि जैसा दीपक के साथ या बल्ब, ट्यूबलाइट के साथ जुड़ा होता है. प्रकाश के साथ जुड़ी चीजें भले ही उस के प्रकाश के साथ जुड़ी हों लेकिन उन से प्रकाश का कोई लेनदेन या सरोकार नहीं होता. बिना किसी आग्रह के वह वहीं चला जाता है जहां बल्ब, ट्यूब- लाइट या दीपक जल रहा होता है.

वह खुद भी इस बात को सोचने की जरूरत भी नहीं समझता कि उस के चले जाने के बाद किसी का जीवन प्रकाशहीन हो कर अंधेरे में डूब जाएगा.

बड़ी नौकरी मिलते ही प्रकाश का रुख बदल गया था. घर, कार, पैसा उस के पास होते ही उस ने अपने तेवर बदल लिए थे. जब तक उस को जरूरत थी माता पिता को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करता रहा.

अपनी इच्छा से उस ने शादी भी बाहर ही कर ली. शादी के एक साल तक अपने शहर भी नहीं आया था. आज  आएगा, वह भी केवल 4 घंटे के लिए, क्योंकि बहू के गले में खानदान का पुश्तैनी हार जो डलवाना चाहता है. इस के लिए उसे घर फोन कर के सूचना देने की पूरी याद रही. फोन पर उस ने मां से पूछा, ‘मां, कैसी हो?’

‘अच्छी हूं,’ कहते ही कितना दिल भर आया था. क्या कहती कि तेरे बिना घर सूना लग रहा है. तू भूल गया है लेकिन हम नहीं भूले. तेरी शादी के अरमान ऐसे ही धरे के धरे रह गए. परंतु कहा कुछ भी नहीं था.

‘पिताजी कैसे हैं?’ प्रकाश ने पूछा.

‘ठीक हैं, मजे में हैं?’ सोचा, क्यों बताऊं कैसे जी रहे हैं. बेटा हो कर जब तुझे दायित्व का बोध नहीं रहा, केवल अपना अधिकार याद है. पुश्तैनी हार…बहू के नाम पर रखे गहने तो याद हैं किंतु कर्तव्य नहीं.

वह सोच में पड़ी थी, बेटे ने यह भी नहीं सोचा कि मां पिताजी कैसे थोड़ी सी रकम से गुजारा कर रहे होंगे. सारा जीवन तो कमा कमा कर उसे पढ़ाते रहे. होनहार निकले…कितने कितने घंटे पढ़ाती रही और तुझे पढ़ाने के लिए खुद पढ़पढ़ कर समझती रही. उस का ऐसा परिणाम?

‘हम दोनों आप से आशीर्वाद लेने आ रहे हैं.’

निधि के मन की तटस्थता बनी रही थी. प्रकाश की बातें सुनती रही. वह कह रहा था, ‘शाम को आएंगे. रात में भोजन साथ करेंगे.’ निधि ने किसी प्रकार का कोई आश्वासन नहीं दिया था. और फोन पर वार्तालाप बंद हो गया था.

निधि ने पति मनीष को प्रकाश और बहू दीया के आने की तथा बहू की मुंह दिखाई की रस्म में पुश्तैनी हार व अन्य गहने, जो उस के लिए कभी बनवाए थे, देने की मंशा जाहिर की साथ ही वह सारी बातें बता दीं जो प्रकाश ने उस से फोन पर कही थीं.

मनीष ने गहरी नजरों से निधि की ओर देखा. वह आश्वस्त हो गए कि निधि के चेहरे पर ममता का भाव तो है साथ ही पति के प्रति पूर्ण निष्ठा भी.

‘तुम क्या चाहती हो?’

पति के दिल को पढ़ते हुए निधि ने उत्तर दिया था, ‘जैसा आप कहें.’

थोड़ी देर चुप्पी छाई रही. दोनों के मन में एक जैसी भावनाएं चल रही थीं. मनीष वहीं से उठ कर आराम करने चले गए थे.

घर के खर्चे के लिए उन्होंने एक सेठ के यहां 2,500 रुपए की नौकरी कर ली थी. सुबह 6 बजे घर से निकलते और शाम 7 बजे घर आते. बसों में आने जाने के कारण थकान बहुत ज्यादा हो जाती. अत: थोड़ी देर आराम करने के लिए भीतर के कमरे में चले गए.

बाहर घने बादलों के कारण कुछ ज्यादा ही अंधकार हो गया था. थोड़ी देर में टिप टिप बूंदाबांदी होने लगी. निधि उसी तरह बरामदे में बैठी रही. प्रकाश और दीया अभी तक नहीं आए थे. मन अनेक खट्टी मीठी घटनाओं को याद करता और भूलता रहा.

तभी एक टैक्सी गेट के पास आ कर रुकी. निधि उसी तरह बैठी खिड़की से देखती रही. वे दोनों उस के बहु बेटा ही थे, किंतु अंधकार के कारण कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी प्रकाश का स्वर सुनाई दिया, ‘‘लगता है, घर में रोशनी नहीं है.’’

आवाज सुन निधि की ममता उमड़ आई. मन में सोचा, ‘हां, ठीक कहा, घर में बेटा न हो तो प्रकाश कैसे होगा. तू आ गया है तो उजाला हो जाएगा.’ किंतु प्रकाश ने मां के भावों को नहीं समझा.

निधि ने उठ कर बत्ती जलाई. आवाज सुन कर मनीष भी उठ बैठे. मुख्य द्वार खोला. प्रकाश और दीया ने दोनों को प्रणाम किया. उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘‘सदा सुखी रहो.’’

मां और पिताजी ने बहू के आगमन की कोई तैयारी नहीं की थी, यह देख प्रकाश मन ही मन अपने को अपमानित महसूस करने लगा. न तो मां ने उठ कर कोई खातिरदारी का उपक्रम किया और न ही पिताजी ने.

कुछ देर तक निस्तब्धता छाई रही. मां और पिताजी के ठंडे स्वभाव को देख कर प्रकाश का तनमन क्रोधित हो उठा. वह सोचने लगा कि पुश्तैनी हार ले कर अब उसे चलना चाहिए. उस ने मां से कहा था, ‘‘अपनी बहू की मुंह दिखाई की रस्म पूरी करो, मां. हमारी ट्रेन का समय हो रहा है.’’

मुंह दिखाई की रस्म की बात सुन कर मनीष ने कहा, ‘‘हां…हां…क्यों नहीं.’’ और जा कर अपने पर्स से 11 रुपए ला कर निधि को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘निधि, बहू की मुंह दिखाई की रस्म पूरी करो.’’

निधि ने पति की आज्ञानुसार वैसा ही किया. सगन देते हुए निधि ने कहा, ‘‘बहू, मुंह दिखाई की रस्म के बाद हम बहू से रसोई करवाते हैं. तुम जा कर रसोई में हलवा पूरी बना दो. सारा सामान वहीं रखा हुआ है.’’

मां के मुंह से रस्म अदायगी की बात सुन कर प्रकाश ने अपने गुस्से को काबू में रखते हुए कहा, ‘‘वाह मां, क्या खूब. आप ने बहू को कुछ दिया तो नहीं पर काम करवा रही हैं…काम अगली बार करवाइएगा.’’

प्रकाश की बात सुन कर पिता ने कहा, ‘‘बेटा, अगली बार जब आएगी काम करेगी, घर के प्रति कर्तव्य निभाएगी तो फल भी पाएगी…यह सब तुम्हारा ही तो है…’’

‘‘दीया अभी खाना नहीं बनाएगी,’’ उस ने धीरे से कहा.

दीया चुपचाप सोफे पर बैठी थी. उस ने कलाई घड़ी पर नजर डाली. साढ़े 8 बज रहे थे. उस ने उठते हुए कहा, ‘‘प्रकाश, ट्रेन का समय हो रहा है.’’

‘‘हां, हां, हमें चलना चाहिए. खाना हम ट्रेन में खा लेंगे,’’ प्रकाश ने रूखे स्वर में कहा.

‘‘जैसा तुम दोनों चाहो,’’ मनीष ने मुस्कुराते हुए कहा.

दोनों ने प्रणाम किया. माता पिता ने उन्हें गले लगा कर प्यार किया और विदा कर दिया.

दोनों के चले जाने के बाद निधि रसोई में आ कर सब्जी काटने लगी. मनीष भी रसोई में आ गए.

‘‘आप को 11 रुपए देने की क्या जरूरत थी?’’ निधि ने कहा.

‘‘अपने उस पढ़े लिखे बेटे को समझाने के लिए कि हम ने सदा अपने बेटे के प्रति कर्तव्य निभाया है लेकिन तुम ने क्या सीखा? मुंह दिखाई के लिए बहू को लाया था…वह भी एक साल बाद.’’

‘‘इसलिए कह रही हूं कि सवा रुपया देना चाहिए था,’’ निधि की बात सुन मनीष ठहाका मार कर हंसने लगे.

बहुत देर तक हंसते रहे. हमारा ही बेटा हमारे ही कान काटने पर तुला है. वह भूल गया है कि वह हमारा बेटा है,  बाप नहीं. वह दोनों पहली बार भावुक नहीं हुए थे.

पति पत्नी ने मिल कर खाना खाया. एक साथ एक ही थाली में खाया. मनीष खूब मजेदार बातें निधि को सुनाते रहे और वह मनीष को.

आज एक लंबे अरसे के बाद पति पत्नी अत्यंत प्रफुल्लित एवं संतुष्ट थे मानो खोया हुआ खजाना मिल गया हो. आज मन में समझदारी का प्रकाश हुआ हो. इसी तरह 4 घंटे बीत गए. मनीष ने निधि को कहा, ‘‘नव वर्ष की बहुत बहुत बधाई हो.’’

‘‘आप को भी आज प्रकाश के आने पर मन में समझदारी का प्रकाश हुआ है. नव वर्ष सब को शुभ हो,’’ कहते हुए वे दोनों घर की छत पर आ गए और वहां से गली में आने जाने वालों को नव वर्ष की मुबारकबाद देने लगे. Hindi Family Story :

Social Media Addiction : एक लाइक को तरसते डिजिटल भिखारी

Social Media Addiction : सोशल मीडिया पर लोग लाइक व शेयर की भीख मांग रहे हैं. एलीट सेक्शन के पास दिखाने के लिए क्रिएटिविटी है तो यह भीख ढक-छिप जा रही है मगर गरीब बिना क्रिएटिविटी के इस दलदल में अपने मूल मुद्दों से भटक रहा है. जानिए क्यों रची जा रही यह साजिश.

सोशल मीडिया धीरेधीरे लोगों से सैन्स औफ क्वेश्चनिंग की प्रवृत्ति खत्म करती जा रही है. खासकर गरीब अपनी समस्याओं के समाधान सोशल मीडिया में खोजने लगे हैं और अपनी सफलता व असफलता के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर होने लगे हैं.

एक समय था जब गरीब से गरीब अपनी परिस्थिति के लिए जिम्मेदार देश के लचर सिस्टम को मानता था. वह इतना तो सोचता ही था कि चूंकि सिस्टम को चलाने वाले ईमानदार नहीं हैं इसलिए देश और उन की यह हालत है. इस से होता-जाता भले कुछ न था मगर सरकारों में बैठे नेताओं को इन के सामने झठमूठ का ही सही झकना जरूर पड़ता था.

जल्दी अमीर बनने की जुगत

आज के टैक जायंट्स के बनाए एप्लीकेशन और उन से जल्द अमीर बन जाने की उम्मीद उन्हें ऐसी दुनिया में धकेल रही है जहां सिवा माथा पीटने के और कुछ नहीं है. गरीब से गरीब आज इन्फ्लुएंसर बनने की होड़ में फंस चुका है. अधिकतर को यह लगने लगा है कि सोशल मीडिया बहुत जल्दी और आसान जरिया है अमीर और सफल बनने का. इस के लिए सब से निचले पायदान वाला व्यक्ति भी हर संभव कोशिश/हरकतें कर रहा है जिस से उस के जीवन में सुधार आ सके.

खुद प्रधानमंत्री मोदी ने रील्स बनाने को अपनी सरकार की उपलब्धि घोषित कर दिया है. उन्होंने बिहार के समस्तीपुर में चुनावी रैली के दौरान कहा, ‘एनडीए सरकार के कार्यकाल में इंटरनेट आम जनता को सुलभ हो पाया. आज एक डाटा जीबी की कीमत एक कप चाय से भी कम है, इसलिए युवा इंटरनेट पर क्रिएटिविटी दिखा कर कमाई कर पा रहे हैं.’

इस का मतलब सीधा है कि सरकार ने जनता को उस के हाल पर छोड़ दिया है. बेरोजगार देशवासी रोजी-रोटी के लिए क्या करते हैं, कैसे करते हैं, सब उन्हीं पर है. यही कारण भी है कि देश में गरीब से गरीब तबके में सैन्स औफ क्वेश्चनिंग खत्म होती जा रही है और वे रील्स बना कर समय भरोसे बैठे हैं.

सोशल मीडिया पर ऐसी कई रील देखने को मिलती हैं जिन में टूटे छप्पर, दीवारों की झड़ती पपड़ियां और झग्गीझंपड़ी में बैठा अपाहिज व्यक्ति सोशल मीडिया पर हाथ जोड़े फॉलोअर्स और लाइक्स की भीख मांग रहा है. यह भीख ठीक उसी तरह की है जैसे सड़कों पर भिखारी पैसों की भीख मांगते हैं. हां, मगर इस का डिजिटलाइजेशन हो गया है.

ऐसा एक विकलांग राजू नाम का फेसबुक पर पेज है. इस के सोशल मीडिया पर 47 लाख के लगभग फॉलोअर्स हैं और 26 लाख लाइक्स हैं. इस ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है, ‘‘प्लीज भाई, अपने विकलांग भाई को फुल सपोर्ट कीजिए, शेयर कीजिए.’’

इस ने 6 नवंबर को एक रील पोस्ट की है जिस में यह एक बच्ची के साथ है. इस ने लगभग फटे कपड़े पहने हैं. पैरों से विकलांग है. जमीन पर बच्ची के लिए खाना पड़ा हुआ है जिसे वह खा रही है. यह इस वीडियो में कह रहा है, ‘‘आप को इस वीडियो को देखने में शर्म आ रही है. क्यों आप देखोगे. बच्ची जमीन से उठा कर खाना खा रही है. आप लोग छोटे कपड़े पहने डांस करती लड़की को भर-भर कर देखते हो, लेकिन ऐसी वीडियो कोई नहीं शेयर करेगा जिस में बच्ची जमीन से खाना उठा कर खा रही है. देखते हैं कौन-कौन शेयर करता है.’’ इस रील को 500 लोगों ने लाइक किया है.

समस्या यह नहीं है कि वह लड़की जमीन पर पड़ा हुआ खाना खा रही है, समस्या यह भी नहीं कि यह आदमी गरीब है, बल्कि समस्या यह है कि यह उस जोड़-गणित में फंस गया है जहां इन जैसों की समस्या का कोई समाधान नहीं.

यह अपनी एक और वीडियो में कह रहा है कि, ‘‘रुको भैया, एक वीडियो कम देखना मगर इस गरीब मां-बच्ची का वीडियो है लेकिन इसे शेयर कर देना.’’ हैरानी यह कि यह भी जान चुका है कि कितने समय की रील सोशल मीडिया पर चलती है. इस की अगली रील में उस ने एक बच्ची को अपने कंधे पर उठाया हुआ है और एक डंडे के सहारे लंगड़ा कर चल रहा है. इस में भी वह लाइक व शेयर करने की भीख मांग रहा है. इस रील को 6 हजार लोगों ने लाइक भी किया है.

इस पर मनीष गुप्ता नाम का यूजर कमैंट करता है, ‘‘करते रहो मेरे भाई, भगवान भोलेनाथ सब सही करेंगे.’’ लेकिन वह यह नहीं समझ रहा कि भोलेनाथ को अगर सही करना होता तो ऐसा खराब करता ही क्यों?

चाहे जितने लाइक मिले हों. भगवान भरोसे बैठे रहता तो वह रील पर लाइक शेयर की भीख न मांग रहा होता. सोशल मीडिया में राज जैसे लोग भरे पड़े हैं जो अपनी समस्या का समाधान सोशल मीडिया में खोजने लगे हैं.

ऐसा ही एक संतोष पांडे है. इस की वीडियो में पीछे ईंटों का बना मकान दिखाई देता है. उसी पैटर्न (राजू विक्लांग जैसे पैटर्न) में यह वीडियो बना रहा है. इस के भी 27 लाख फॉलोअर्स हैं. इस की वीडियो में यह व्यक्ति ज्यादातर अपनी पत्नी और बच्ची के साथ नजर आता है. अकसर वीडियो में बच्ची बोलती दिखाई देती है. लड़की को इतना ट्रैंड कर लिया है कि वह कैमरे में देख कर लाइक और फॉलो के लिए प्रार्थना कर रही है. इस में बोलने की शुरुआत विकलांग आदमी ही करता है. वह शुरू होते ही हाथ जोड़ कर भीख मांगते हुए रुकने की अपील करता है, फिर कहता है कि विकलांग की वीडियो देखते हुए जा भाई.

इस की कुछ वीडियोज 2 करोड़ तक वायरल हुई हैं लेकिन पैटर्न देखने से लगता है कि अधिकतर कुछ हजार में ही देखी जा रही हैं. संतोष सैकड़ों में रील बना चुका है. यानी, पूरा काम उस का इसी रील से चल रहा है. दिलचस्प यह कि विकलांग कैटेगरी में बनने वाली रील में पूरा परिवार ही रील बना रहा होता है.

देहात में गरीबी का कंटेंट

ठीक ऐसे ही संगीता गोस्वामी नाम की एक और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है. इस के 51 लाख फॉलोअर्स हैं. यह 12 लोगों को फॉलो करती है. इस की सब से रीसेंट वीडियो 6 नवंबर को पोस्ट हुई जिस में यह किसी खेत से भागते हुए कैमरे की तरफ गिरते-पड़ते आती है, रोते-बिलखते हुए यह कहती है, ‘‘भैया, एक मिनट मेरी बात सुनो. गरीब का भी सपोर्ट कर दो. मैं खेती करती हूं, मजदूरी करती हूं. आप लोगों से पैसा नहीं मांगती. बस, एक शेयर कर दो. इस गरीब की मदद हो जाएगी. आप से निवेदन है कि इसे मिलियन तक पहुंचा दो.’’

पहले एक घंटे में इस रील को 800 लोगों ने लाइक किया. कईयों ने कमेंट भी किए. मगर समस्या यह कि कमेंट करने वाले भी इन्हें यह नहीं बता पा रहे कि ऐसा करने से होना-जाना कुछ नहीं है. यह ठीक वैसा ही है जैसा राह चलते भीख मांगना है. अगर किसी ने लाइक कर दिया तो कर दिया वरना न इन वीडियो के कंटेंट में कुछ अलग है न कुछ खास. ऊपर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने अपने नियम ऐसे सख्त बना दिए हैं कि रिपीटेड कंटेंट को वह काउंट नहीं करता. यानी, कोई इनकम नहीं.

फेसबुक पर रोहित प्रजापति नाम का एक और व्यक्ति है जिस के फॉलोअर्स करीब 54 लाख हैं. रोहित के दोनों हाथों के पंजे नहीं हैं. देखने से लगता है, शादी हो चुकी है क्योंकि उस की अधिकतर रील में उस की पत्नी दिखाई देती है. इस ने भी 5 नवंबर को एक रील पोस्ट की है, जिस में इस की पत्नी नकली हाथ ले कर उस के पास आती है और रोहित झठमूठ रो रहा होता है. बैकग्राउंड में गाना चल रहा है, ‘तुम को जुगनी बन के चमकना दिन हो चाहे रात हो…’ इस गाने के बीच में महिला दोनों थम्ब दिखा कर कहती है, ‘‘प्लीज भैया, मेरे पति के लिए वीडियो को लाइक और शेयर कर दो.’’

यह तो फिर भी ठीक है. रील्स वायरल करने के लिए देहात में लोग कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं. मध्य प्रदेश के झबुआ जिले में एक खतरनाक घटना घटी. वहां 18 साल के युवक ने मुंह में सुतली बम फोड़ दिया. इस घटना में उस के जबड़े के चीथड़े उड़ गए. रील्स के वायरल होने की कीमत पर उस ने अपने जबड़े के चीथड़े उड़ा दिए.

जिम्मेदारी से मांगती सरकार

सवाल यह है कि सरकार ऐसे युवाओं और लोगों की फौज तैयार करना चाहती है जो बेगारी में जी रही हो और सरकार से सवाल करने के बजाय रील में अपना माथा फोड़ रही हो. यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि लोग अब इस सिस्टम से अपनी उम्मीद खो बैठे हैं और जिस से उम्मीद लगाए बैठे हैं वह उसे अपने इशारे पर नचा रहा है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में बेशक कुछ लोग बेहद तेजी से अमीर हुए, कुछ आगे बढ़े, मगर साजिश के तहत एक पूरा तंत्र इस बात का प्रोपेगेंडा करने में लग गया है कि ‘आप सोशल मीडिया पर लगे रहिए, जल्दी अमीर हो जाएंगे.’

इस साजिश का अंजाम यह है कि आज कोई भी सरकार से अपनी समस्याओं पर सवाल नहीं कर रहा है. सभी लग गए हैं मोबाइल से वीडियो शूट करने में. वे अपना जबड़ा फाड़ रहे हैं, वे गिर-पड़ रहे हैं, रोधो रहे हैं, मगर सरकार से कुछ नहीं पूछ रहे. इन लोगों में सैन्स औफ क्वेश्चन खत्म होती जा रही है. ये इंडिविजुअली सोच रहे हैं मगर कलैक्टिव कुछ नहीं सोच पा रहे. यही कारण भी है कि कोई भी नेता इस स्थिति पर कुछ नहीं कह रहा, सभी को पता है कि वे कहेंगे तो आगे उन्हीं का नुकसान है. आज सरकारों की अब न कोई जवाबदेही रह गई है न जिम्मेदारी. Social Media Addiction :

Cyber Crime : डिजिटल देह व्यापार – ऑनलाइन ठगी की मार

Cyber Crime : सोशल मीडिया पर लोगों को सेक्स ट्रैप में फंसाया जा रहा है. ऐसा करने वाले रील्स, पोस्ट, चैट या डेटिंग एप्स हर तरह के टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं. डिजिटल ठगी का यह नया मॉडल तेजी से पांव पसार रहा है.

डिजिटल युग ने आज के युवाओं को तेज रफ्तार और नई संभावनाओं का रास्ता दिया है. सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स और डेटिंग प्लेटफॉर्म ने न सिर्फ दोस्ती और मनोरंजन को आसान बनाया है बल्कि आय के नए तरीके भी खोले हैं. इसी माहौल में देह व्यापार ने भी अपना चेहरा बदला है. अब यह गली-कूचों से निकल कर मोबाइल स्क्रीन और वीडियो कॉल तक पहुंच चुका है.

लड़कियों की नई राह : स्वेच्छा और सुविधा

अब देह व्यापार की पुरानी तस्वीरें पीछे छूट चुकी हैं. पहले जहां लड़कियों को मजबूरी या लालच दे कर इस धंधे में लाया जाता था वहीं अब कई लड़कियां खुद सोशल मीडिया के जरिए सेवा देने का औफर डालती हैं. इंस्टाग्राम, टेलीग्राम, डेटिंग ऐप्स, यहां तक कि निजी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर वे अपने प्रोफाइल बनाती हैं. आकर्षक तस्वीरें, वीडियो और ऑफर पैकेज डाल कर वे ग्राहक जुटाती हैं और घर बैठे पैसे कमाती हैं.

यह पूरी प्रक्रिया उन्हें 2 बड़े फायदे देती है— पहला, ग्राहक के साथ सीधा संपर्क, बिना किसी दलाल के; दूसरा, घर बैठे सुरक्षित माहौल. इस के लिए वे गुप्त नाम, फर्जी नंबर और डिजिटल वॉलेट का इस्तेमाल करती हैं.

ठगी का संगठित मॉडल

जहां कई लड़कियां इसे ‘अतिरिक्त आय’ या ‘फ्रीलांस काम’ के तौर पर देखती हैं वहीं एक बड़ा हिस्सा इसे ठगी का हथियार बना चुका है. ‘वीडियो कौल’ या ‘फोन सैक्स’ के नाम पर पहले एडवांस पेमेंट लिया जाता है, फिर ग्राहक को ब्लॉक कर दिया जाता है. कई बार मुफ्त में छोटा ‘ट्रेलर’ दे कर भरोसा जमाया जाता है. वीडियो कॉल पर आना, थोड़ी अश्लील हरकत करना और फिर रकम मांग लेना. इस के बाद खेल खत्म. ग्राहक का पैसा गायब और नंबर ब्लॉक. कई मामलों में ग्राहक की स्क्रीन रिकॉर्डिंग कर के बाद में ब्लैकमेल भी किया जाता है.

पुलिस और वसूली का समीकरण

पुलिस को भी इस नए कारोबार की भनक है, लेकिन वर्चुअल प्लेटफॉर्म्स पर सब-कुछ गुमनाम होने के कारण कार्रवाई मुश्किल हो जाती है. कई मामलों में तब तक कोई बड़ी छापेमारी नहीं होती जब तक ‘अपना हिस्सा’ या ‘सुरक्षा शुल्क’ का खेल बीच में न हो. यह भी सच्चाई है कि जितना डिजिटल धंधा बढ़ रहा है, उतना ही ‘अनौपचारिक वसूली तंत्र’ भी विकसित हो रहा है.

‘घर बैठे कमाई’ का नया मॉडल

इन लड़कियों के लिए यह मॉडल आसान है. न जगह बदलने की जरूरत, न दलालों का नेटवर्क, न बड़े खर्चे. सब-कुछ मोबाइल पर. विज्ञापन, सौदे, भुगतान और ग्राहक गुप्त पहचान, डिजिटल वॉलेट और वीपीएन जैसे साधन उन्हें और भी सुरक्षित महसूस कराते हैं.

देह व्यापार से साइबर ठगी तक

इस कारोबार का सब से दिलचस्प पहलू यह है कि बहुत बार असल ‘सेवा’ देने की नौबत ही नहीं आती. केवल ‘वादा’ कर के एडवांस पेमैंट वसूलना, वीडियो बनाना और ब्लैकमेल करना ही असली कमाई बन जाता है. यानी, देह व्यापार अब केवल यौनसेवा का नहीं, बल्कि ‘साइबर ठगी’ और ‘वित्तीय जाल’ का भी रूप ले चुका है.

ग्राहक क्यों फंसते हैं?

ग्राहक अकसर गोपनीयता के कारण शिकायत नहीं करते. उन्हें डर होता है कि परिवार या समाज में बदनामी होगी. इसी चुप्पी के कारण ठग और ‘औनलाइन वर्कर्स’ और ज्यादा ताकतवर होते जाते हैं.

सोशल मीडिया कंपनियों की भूमिका

फर्जी अकाउंट, नकली फोटो और नकली ट्रांजैक्शन के इस खेल को रोकने में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी बढ़ गई है. तेज कार्रवाई, वेरिफिकेशन और सुरक्षा टूल्स इस काले-धंधे को रोकने में मदद कर सकते हैं.

डिजिटल कमाई और साइबर सुरक्षा का संतुलन

आज यह सवाल भी उठता है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ‘घरबैठे कमाई’ के नाम पर लड़कियां ठगी के जाल में खुद को और दूसरों को फंसा रही हैं? यह धंधा जहां उन्हें तत्काल नकद देता है, वहीं पुलिस, कानून और साइबर सेल के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन चुका है.

देह व्यापार का डिजिटल चेहरा पुराने धंधे से अलग है. यहां लड़कियां खुद तय करती हैं कि कैसे और कब काम करना है, किस ग्राहक से लेना है और कितना चार्ज करना है. लेकिन साथ ही, यह भी सच है कि इस नए मॉडल ने ठगी और ब्लैकमेल के लिए अनगिनत मौके बना दिए हैं. समाज को अब यह सम झना होगा कि यह ‘नैतिक पतन’ का रोना नहीं बल्कि एक ‘साइबर इकोनौमी’ है, जिस में ग्राहक और प्रदाता दोनों गुमनाम रहना चाहते हैं. पुलिस, साइबर सेल और सोशल मीडिया कंपनियों को मिल कर ऐसे नियम बनाने होंगे जिस से यह धंधा महज ‘साइबर क्राइम’ में तब्दील न हो और पीड़ित लोग सुरक्षित तरीके से अपनी शिकायत दर्ज करा सकें. Cyber Crime :

Future Health Problems : भविष्य स्मार्ट, शरीर बीमार

Future Health Problems : आज इंसान डिजिटल युग में जी रहा है, उस की आंखें असली दुनिया से दूर जा रही हैं. हर हाथ में स्मार्टफोन है लेकिन मन में बढ़ती थकान और तनाव. बच्चे खेल के मैदान छोड़ कर मोबाइल की स्क्रीन में कैद हैं.

हमारी नींद, नजर और मानसिक शांति सब स्क्रीन-लाइट में खो रहे हैं. अब वक्त है यह सोचने का कि तकनीक हमें चला रही है या हम तकनीक को?

आज का युग स्मार्ट हो चुका है, स्मार्टफोन, स्मार्ट-वॉच, स्मार्ट टीवी, स्मार्ट घर, स्मार्ट क्लासरूम, स्मार्ट थिएटर. पर इसी स्मार्टनैस के पीछे धीरे-धीरे हमारी सेहत स्लो होती जा रही है.

हमारी सुबह की शुरुआत मोबाइल की घंटी से होती है और रात का अंत मोबाइल स्क्रीन के साथ. इस बीच आधा टाइम रील्स खा जाता है. बच्चे खेल के मैदानों से ज्यादा गेमिंग स्क्रीन पर, युवा दफ्तर से ज्यादा चैट ग्रुप्स पर और बुजुर्ग रिश्तों से ज्यादा रील्स पर बंध गए हैं. सवाल यह नहीं कि गैजेट्स गलत हैं बल्कि यह है कि हम उन का उपयोग कर रहे हैं या वे हमें उपयोग कर रहे हैं?

तकनीक की दुनिया : हर हाथ में एक स्क्रीन

आज औसतन हर व्यक्ति के पास 2 से अधिक डिजिटल उपकरण हैं जैसे स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप, स्मार्ट-वॉच, गेमिंग कंसोल, स्मार्ट टीवी. यह तकनीक बढ़िया है. हमारे एक क्लिक पर चीजें औन-औफ होने लगती हैं. सब हमें सहूलियत और सुविधा देते हैं जिस से जिंदगी आसान हुई है.

सुविधा के नाम पर ये सब अब जीवन का हिस्सा बन चुके हैं, पढ़ाई, नौकरी, मनोरंजन, खरीदारी और यहां तक कि नींद और भोजन तक. लेकिन इन उपकरणों की कीमत हमारी सेहत और मानसिक संतुलन चुका रहा है.

विज्ञान क्या कहता है : शोध से सच्चाई

स्प्रिंगर ओपन जर्नल की रिपोर्ट कहती है, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स हमारी आंखों, गर्दन, कमर की समस्या और थकान का कारण बन रहे हैं. दिनभर स्क्रीन के सामने रहने से आंखों में जलन, धुंधलापन, सिर दर्द, गर्दन दर्द व पीठ दर्द आम हो गया है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, बच्चों के लिए एक घंटे से अधिक दैनिक स्क्रीन टाइम हानिकारक है.

नींद और मानसिक संतुलन

देररात तक मोबाइल देखने से नीली रोशनी मस्तिष्क में नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोनिन को प्रभावित करती है.

परिणाम: नींद की कमी, थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान में कमी.

पबमेड, 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गैजेट्स उपयोग से डिजिटल बर्न-आउट और एंग्जाइटी बढ़ रही है.

बच्चों पर प्रभाव

बांग्लादेश और भारत में किए गए अध्ययनों ने बताया कि जो बच्चे 3 घंटे से अधिक स्क्रीन पर रहते हैं उन में मोटापा, नींद की गड़बड़ी, ध्यान की कमी और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं. लगातार गेमिंग और सोशल मीडिया ने डिजिटल लत को जन्म दिया है.

रेडिएशन और जैविक प्रभाव

कुछ अध्ययन (पबमेड 2025) के अनुसार, मोबाइल से निकलने वाली रेडियो तरंगें ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और डीएनए में हलके बदलाव पैदा कर सकती हैं. हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ ने यह स्पष्ट किया है कि मोबाइल रेडिएशन और ब्रेन कैंसर के बीच कोई ठोस संबंध सिद्ध नहीं हुआ है.

आयु के अनुसार प्रभाव और समाधान

बच्चे और किशोर (5-17 वर्ष) में समस्याएं : ध्यान की कमी, नींद की खराबी, मोटापा, आंखों की थकान. इस से बचने के लिए नीचे दिए उपायों को आजमाया जा सकता है.

स्क्रीन टाइम को सीमित रखें.

सोने से पहले मोबाइल न देखें.

माता-पिता बच्चों के साथ खेलें और आउटडोर गतिविधि बढ़ाएं.

सप्ताह में एक दिन ‘नो स्क्रीन डे’ मनाएं.

युवा और वयस्क (18-50 वर्ष)

इस उम्र के लोगों में आंखों की थकान, गरदन-पीठ दर्द, नींद की कमी, तनाव जैसी समस्याएं दिखने लगी हैं. इस से बचने के लिए ये उपाय करें-

हर 30-40 मिनट में उठ कर स्ट्रैच करें.

‘20-20-20 नियम’ अपनाएं — हर 20 मिनट में 20 फुट दूर किसी चीज को 20 सेकंड देखें.

मोबाइल पर स्क्रीन टाइम ट्रैकर लगाएं.

सोने से एक घंटा पहले मोबाइल दूर रखें.

डिजिटल डिटॉक्स रूटीन बनाएं. किताब, संगीत, स्पोर्ट्स जैसी फिजिकल और ब्रेन एक्सरसाइज से खुद को स्ट्रांग करें.

बुजुर्ग (50 वर्ष से अधिक)

आंखों में सूखापन, नींद की गड़बड़ी, शारीरिक अकड़न, अकेलापन जैसी समस्याएं.

द न्यूयॉर्क पोस्ट 2025 के अध्ययन में पाया गया कि जो बुजुर्ग संयम से डिजिटल तकनीक का उपयोग करते हैं उन में मस्तिष्क के बूढ़े होने की गति 42 फीसदी तक कम होती है.

सीमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग करें.

डिजिटल संचार के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल भी बनाए रखें.

आंखों की सुरक्षा के लिए ब्लू-लाइट फिल्टर वाला चश्मा लगाएं.

गैजेट्स ने हमारे जीवन को सरल, तेज और सुविधाजनक बनाया है परंतु यदि इन का उपयोग संयम, जागरूकता और अनुशासन से न किया जाए तो यही तकनीक हमारी मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य को निगल सकती है. Future Health Problems 

Social Story In Hindi : अंधविश्वास की बेड़ियां – क्या सास को हुआ बहू के दर्द का एहसास ?

Social Story In Hindi :

लेखक – शालिनी जॉली

‘‘अरे,पता नहीं कौन सी घड़ी थी जब मैं इस मनहूस को अपने बेटे की दुलहन बना कर लाई थी. मुझे क्या पता था कि यह कमबख्त बंजर जमीन है. अरे, एक से बढ़ कर एक लड़की का रिश्ता आ रहा था. भला बताओ, 5 साल हो गए इंतजार करते हुए, बच्चा न पैदा कर सकी… बांझ कहीं की…’’ मेरी सास लगातार बड़बड़ाए जा रही थीं. उन के जहरीले शब्द पिघले शीशे की तरह मेरे कानों में पड़ रहे थे.

यह कोई पहला मौका नहीं था. उन्होंने तो शादी के दूसरे साल से ही ऐसे तानों से मेरी नाक में दम कर दिया था. सावन उन के इकलौते बेटे और मेरे पति थे. मेरे ससुर बहुत पहले गुजर गए थे. घर में पति और सास के अलावा कोई न था. मेरी सास को पोते की बहुत ख्वाहिश थी. वे चाहती थीं कि जैसे भी हो मैं उन्हें एक पोता दे दूं.

मैं 2 बार लेडी डाक्टर से अपना चैकअप करवा चुकी थी. मैं हर तरह से सेहतमंद थी. समझाबुझा कर मैं सावन को भी डाक्टर के पास ले गई थी. उन की रिपोर्ट भी बिलकुल ठीक थी.

डाक्टर ने हम दोनों को समझाया भी था, ‘‘आजकल ऐसे केस आम हैं. आप लोग बिलकुल न घबराएं. कुदरत जल्द ही आप पर मेहरबान होगी.’’

डाक्टर की ये बातें हम दोनों तो समझ चुके थे, लेकिन मेरी सास को कौन समझाता. आए दिन उन की गाज मुझ पर ही गिरती थी. उन की नजरों में मैं ही मुजरिम थी और अब तो वे यह खुलेआम कहने लगी थीं कि वे जल्द ही सावन से मेरा तलाक करवा कर उस के लिए दूसरी बीवी लाएंगी, ताकि उन के खानदान का वंश बढ़े.

उन की इन बातों से मेरा कलेजा छलनी हो जाता. ऐसे में सावन मुझे तसल्ली देते, ‘‘क्यों बेकार में परेशान होती हो? मां की तो बड़बड़ाने की आदत है.’’

‘‘आप को क्या पता, आप तो सारा दिन अपने काम पर होते हैं. वे कैसेकैसे ताने देती हैं… अब तो उन्होंने सब से यह कहना शुरू कर दिया है कि वे हमारा तलाक करवा कर आप के लिए दूसरी बीवी लाएंगी.’’

‘‘तुम चिंता न करो. मैं न तो तुम्हें तलाक दूंगा और न ही दूसरी शादी करूंगा, क्योंकि मैं जानता हूं कि तुम में कोई कमी नहीं है. बस कुदरत हम पर मेहरबान नहीं है.’’

एक दिन हमारे गांव में एक बाबा आया. उस के बारे में मशहूर था कि वह बेऔलाद औरतों को एक भभूत देता, जिसे दूध में मिला कर पीने पर उन्हें औलाद हो जाती है.

मुझे ऐसी बातों पर बिलकुल यकीन नहीं था, लेकिन मेरी सास ऐसी बातों पर आंखकान बंद कर के यकीन करती थीं. उन की जिद पर मुझे उन के साथ उस बाबा (जो मेरी निगाह में ढोंगी था) के आश्रम जाना पड़ा.

बाबा 30-35 साल का हट्टाकट्टा आदमी था. मेरी सास ने उस के पांव छुए और मुझे भी उस के पांव छूने को कहा. उस ने मेरे सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया. आशीर्वाद के बहाने उस ने मेरे सिर पर जिस तरह से हाथ फेरा, मुझे समझते देर न लगी कि ढोंगी होने के साथसाथ वह हवस का पुजारी भी है.

उस ने मेरी सास से आने का कारण पूछा. सास ने अपनी समस्या का जिक्र कुछ इस अंदाज में किया कि ढोंगी बाबा मुझे खा जाने वाली निगाहों से घूरने लगा. उस ने मेरी आंखें देखीं, फिर किसी नतीजे पर पहुंचते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी बहू पर एक चुड़ैल का साया है, जिस की वजह से इसे औलाद नहीं हो रही है. अगर वह चुड़ैल इस का पीछा छोड़ दे, तो कुछ ही दिनों में यह गर्भधारण कर लेगी. लेकिन इस के लिए आप को काली मां को खुश करना पड़ेगा.’’

‘‘काली मां कैसे खुश होंगी?’’ मेरी सास ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘तुम्हें काली मां की एक पूजा करनी होगी. इस पूजा के बाद हम तुम्हारी बहू को एक भभूत देंगे. इसे भभूत अमावास्या की रात में 12 बजे के बाद हमारे आश्रम में अकेले आ कर, अपने साथ लाए दूध में मिला कर हमारे सामने पीनी होगी, उस के बाद इस पर से चुड़ैल का साया हमेशाहमेशा के लिए दूर हो जाएगा.’’

‘‘बाबाजी, इस पूजा में कितना खर्चा आएगा?’’

‘‘ज्यादा नहीं 7-8 हजार रुपए.’’

मेरी सास ने मेरी तरफ ऐसे देखा मानो पूछ रही हों कि मैं इतनी रकम का इंतजाम कर सकती हूं? मैं ने नजरें फेर लीं और ढोंगी बाबा से पूछा, ‘‘बाबा, इस बात की क्या गारंटी है कि आप की भभूत से मुझे औलाद हो ही जाएगी?’’

ढोंगी बाबा के चेहरे पर फौरन नाखुशी के भाव आए. वह नाराजगी से बोला, ‘‘बच्ची, हम कोई दुकानदार नहीं हैं, जो अपने माल की गारंटी देता है. हम बहुत पहुंचे हुए बाबा हैं. तुम्हें अगर औलाद चाहिए, तो जैसा हम कह रहे हैं, वैसा करो वरना तुम यहां से जा सकती हो.’’

ढोंगी बाबा के रौद्र रूप धारण करने पर मेरी सास सहम गईं. फिर मुझे खा जाने वाली निगाहों से देखते हुए चापलूसी के लहजे में बाबा से बोलीं, ‘‘बाबाजी, यह नादान है. इसे आप की महिमा के बारे में कुछ पता नहीं है. आप यह बताइए कि पूजा कब करनी होगी?’’

‘‘जिस रोज अमावास्या होगी, उस रोज शाम के 7 बजे हम काली मां की पूजा करेंगे. लेकिन तुम्हें एक बात का वादा करना होगा.’’

‘‘वह क्या बाबाजी?’’

‘‘तुम्हें इस बात की खबर किसी को भी नहीं होने देनी है. यहां तक कि अपने बेटे को भी. अगर किसी को भी इस बात की भनक लग गई तो समझो…’’ उस ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.

मेरी सास ने ढोंगी बाबा को फौरन यकीन दिलाया कि वे किसी को इस बात का पता नहीं चलने देंगी. उस के बाद हम घर आ गईं.

3 दिन बाद अमावास्या थी. मेरी सास ने किसी तरह पैसों का इंतजाम किया और फिर पूजा के इंतजाम में लग गईं. इस पूजा में मुझे शामिल नहीं किया गया. मुझे बस रात को उस ढोंगी बाबा के पास एक लोटे में दूध ले कर जाना था.

मैं ढोंगी बाबा की मंसा अच्छी तरह जान चुकी थी, इसलिए आधी रात होने पर मैं ने अपने कपड़ों में एक चाकू छिपाया और ढोंगी के आश्रम में पहुंच गई.

ढोंगी बाबा मुझे नशे में झूमता दिखाई दिया. उस के मुंह से शराब की बू आ रही थी. तभी उस ने मुझे वहीं बनी एक कुटिया में जाने को कहा.

मैं ने कुटिया में जाने से फौरन मना कर दिया. इस पर उस की भवें तन गईं. वह धमकी देने वाले अंदाज में बोला, ‘‘तुझे औलाद चाहिए या नहीं?’’

‘‘अपनी इज्जत का सौदा कर के मिलने वाली औलाद से मैं बेऔलाद रहना ज्यादा पसंद करूंगी,’’ मैं दृढ़ स्वर में बोली.

‘‘तू तो बहुत पहुंची हुई है. लेकिन मैं भी किसी से कम नहीं हूं. घी जब सीधी उंगली से नहीं निकलता तब मैं उंगली टेढ़ी करना भी जानता हूं,’’ कहते ही वह मुझ पर झपट पड़ा. मैं जानती थी कि वह ऐसी नीच हरकत करेगा. अत: तुरंत चाकू निकाला और उस की गरदन पर लगा कर दहाड़ी, ‘‘मैं तुम जैसे ढोंगी बाबाओं की सचाई अच्छी तरह जानती हूं. तुम भोलीभाली जनता को अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से न केवल लूटते हो, बल्कि औरतों की इज्जत से भी खेलते हो. मैं यहां अपनी सास के कहने पर आई थी. मुझे कोई भभूत भुभूत नहीं चाहिए. मुझ पर किसी चुड़ैल का साया नहीं है. मैं ने तेरी भभूत दूध में मिला कर पी ली थी, तुझे यही बात मेरी सास से कहनी है बस. अगर तू ने ऐसा नहीं किया तो मैं तेरी जान ले लूंगी.’’

उस ने घबरा कर हां में सिर हिला दिया. तब मैं लोटे का दूध वहीं फेंक कर घर आ गई.

कुछ महीनों बाद जब मुझे उलटियां होनी शुरू हुईं, तो मेरी सास की खुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि वे उलटियां आने का कारण जानती थीं.

यह खबर जब मैं ने सावन को सुनाई तो वे भी बहुत खुश हुए. उस रात सावन को खुश देख कर मुझे अनोखी संतुष्टि हुई. मगर सास की अक्ल पर तरस आया, जो यह मान बैठी थीं कि मैं गर्भवती ढोंगी बाबा की भभूत की वजह से हुई हूं.

अब मेरी सास मुझे अपने साथ सुलाने लगीं. रात को जब भी मेरा पांव टेढ़ा हो जाता तो वे उसे फौरन सीधा करते हुए कहतीं कि मेरे पांव टेढ़ा करने पर जो औलाद होगी उस के अंग विकृत होंगे.

मुझे अपनी सास की अक्ल पर तरस आता, लेकिन मैं यह सोच कर चुप रहती कि उन्हें अंधविश्वास की बेडि़यों ने जकड़ा हुआ है.

एक दिन उन्होंने मुझे एक नारियल ला कर दिया और कहा कि अगर मैं इसे भगवान गणेश के सामने एक झटके से तोड़ दूंगी तो मेरे होने वाले बच्चे के गालों में गड्ढे पड़ेंगे, जिस से वह सुंदर दिखा करेगा. मैं जानती थी कि ये सब बेकार की बातें हैं, फिर भी मैं ने उन की बात मानी और नारियल एक झटके से तोड़ दिया, लेकिन इसी के साथ मेरा हाथ भी जख्मी हो गया और खून बहने लगा. लेकिन मेरी सास ने इस की जरा भी परवाह नहीं की और गणेश की पूजा में लीन हो गईं.

शाम को काम से लौटने के बाद जब सावन ने मेरे हाथ पर बंधी पट्टी देखी तो इस का कारण पूछा. तब मैं ने सारी बात बता दी.

तब वे बोले, ‘‘राधिका, तुम तो मेरी मां को अच्छी तरह से जानती हो.

वे जो ठान लेती हैं, उसे पूरा कर के ही दम लेती हैं. मैं जानता हूं कि आजकल उन की आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी बंधी हुई है, जिस की वजह से वे ऐसे काम भी रही हैं, जो उन्हें नहीं करने चाहिए. तुम मन मार कर उन की सारी बातें मानती रहो वरना कल को कुछ ऊंचनीच हो गई तो वे तुम्हारा जीना हराम कर देंगी.’’

सावन अपनी जगह सही थे, जैसेजैसे मेरा पेट बढ़ता गया वैसेवैसे मेरी सास के अंधविश्वासों में भी इजाफा होता गया. वे कभी कहतीं कि चौराहे पर मुझे पांव नहीं रखना है.  इसीलिए किसी चौराहे पर मेरा पांव न पड़े, इस के लिए मुझे लंबा रास्ता तय करना पड़ता था. इस से मैं काफी थकावट महसूस करती थी. लेकिन अंधविश्वास की बेडि़यों में जकड़ी मेरी सास को मेरी थकावट से कोई लेनादेना न था.

8वां महीना लगने पर तो मेरी सास ने मेरा घर से निकलना ही बंद कर दिया और सख्त हिदायत दी कि मुझे न तो अपने मायके जाना है और न ही जलती होली देखनी है. उन्हीं दिनों मेरे पिताजी की तबीयत अचानक खराब हो गई. वे बेहोशी की हालत में मुझ से मिलने की गुहार लगाए जा रहे थे. लेकिन अंधविश्वास में जकड़ी मेरी सास ने मुझे मायके नहीं जाने दिया. इस से पिता के मन में हमेशा के लिए यह बात बैठ गई कि उन की बेटी उन के बीमार होने पर देखने नहीं आई.

उन्हीं दिनों होली का त्योहार था. हर साल मैं होलिका दहन करती थी, लेकिन मेरी सास ने मुझे होलिका जलाना तो दूर उसे देखने के लिए भी मना कर दिया.

मेरे बच्चा पैदा होने से कुछ दिन पहले मेरी सास मेरे लिए उसी ढोंगी बाबा की भभूत ले कर आईं और उसे मुझे दूध में मिला कर पीने के लिए कहा. मैं ने कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं ऐसा करूंगी तो मुझे बेटा पैदा होगा.

अपनी सास की अक्ल पर मुझे एक बार फिर तरस आया. मैं ने उन का विरोध करते हुए कहा, ‘‘मांजी, मैं ने आप की सारी बातें मानी हैं, लेकिन आप की यह बात नहीं मानूंगी.’’

‘‘क्यों?’’ सास की भवें तन गईं.

‘‘क्योंकि अगर भभूत किसी ऐसीवैसी चीज की बनी हुई होगी, तो उस का मेरे होने वाले बच्चे की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है.’’

‘‘अरी, भूल गई तू कि इसी भभूत की वजह से तू गर्भवती हुई थी?’’

उन के लाख कहने पर भी मैं ने जब भभूत का सेवन करने से मना कर दिया तो न जाने क्या सोच कर वे चुप हो गईं.

कुछ दिनों बाद जब मेरी डिलीवरी होने वाली थी, तब मेरी सास मेरे पास आईं और बड़े प्यार से बोलीं, ‘‘बहू, देखना तुम लड़के को ही जन्म दोगी.’’

मैं ने वजह पूछी तो वे राज खोलती हुई बोलीं, ‘‘बहू, तुम ने तो बाबाजी की भभूत लेने से मना कर दिया था. लेकिन उन पहुंचे बाबाजी का कहा मैं भला कैसे टाल सकती थी, इसलिए मैं ने तुझे वह भभूत खाने में मिला कर देनी शुरू कर दी थी.’’

यह सुनते ही मेरी काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई. मैं कुछ कह पाती उस से पहले ही मुझे अपनी आंखों के सामने अंधेरा छाता दिखाई देने लगा. फिर मुझे किसी चीज की सुध नहीं रही और मैं बेहोश हो गई.

होश में आने पर मुझे पता चला कि मैं ने एक मरे बच्चे को जन्म दिया था. ढोंगी बाबा ने मुझ से बदला लेने के लिए उस भभूत में संखिया जहर मिला दिया था. संखिया जहर के बारे में मैं ने सुना था कि यह जहर धीरेधीरे असर करता है. 1-2 बार बड़ों को देने पर यह कोई नुकसान नहीं पहुंचाता. लेकिन छोटे बच्चों पर यह तुरंत अपना असर दिखाता है. इसी वजह से मैं ने मरा बच्चा पैदा किया था.

तभी ढोंगी बाबा के बारे में मुझे पता चला कि वह अपना डेरा उठा कर कहीं भाग गया है.

मैं ने सावन को हकीकत से वाकिफ कराया तो उस ने अपनी मां को आड़े हाथों लिया.

तब मेरी सास पश्चात्ताप में भर कर हम दोनों से बोलीं, ‘‘बेटी, मैं तुम्हारी गुनहगार हूं. पोते की चाह में मैं ने खुद को अंधविश्वास की बेडि़यों के हवाले कर दिया था. इन बेडि़यों की वजह से मैं ने जानेअनजाने में जो गुनाह किया है, उस की सजा तुम मुझे दे सकती हो… मैं उफ तक नहीं करूंगी.’’

मैं अपनी सास को क्या सजा देती. मैं ने उन्हें अंधविश्वास को तिलांजलि देने को कहा तो वे फौरन मान गईं. इस के बाद उन्होंने अपने मन से अंधविश्वास की जहरीली बेल को कभी फूलनेफलने नहीं दिया.

1 साल बाद मैं ने फिर गर्भधारण किया और 2 स्वस्थ जुड़वा बच्चों को जन्म दिया. मेरी सास मारे खुशी के पागल हो गईं. उन्होंने सारे गांव में सब से कहा कि वे अंधविश्वास के चक्कर में न पड़ें, क्योंकि अंधविश्वास बिना मूठ की तलवार है, जो चलाने वाले को ही घायल करती है. Social Story In Hindi :

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