दिव्या विजय

अनन्या ने अपने कपड़ों की ओर देखा. सिर से पांव तक ढकी हुई थी वह. इन का चयन उस ने जानबूझ कर किया था ताकि वह अपनी ओर से किसी को आमंत्रित देती न लगे. फिर उसे अपनी इस सोच पर क्रोध आया कि दुनिया की कौन सी लड़की इस बात के लिए किसी को आमंत्रण देती होगी.

अनन्या ने कार का शीशा कुछ नीचे कर लिया. इतना भर कि कांच में एक पतली लकीर दिखने लगी. उस पतली लकीर से आती हवा नश्तर की तरह उस का चेहरा चीरने लगी. वह ठंड से कांप उठी.

‘‘मैडम, खिड़की बंद कर दीजिए,’’ टैक्सी ड्राइवर की आवाज आई.

‘‘क्यों?’’ अनन्या अपनी आवाज जबरन कड़क कर बोली.

‘‘मैडम, ठंडी हवा आ रही है.’’

ड्राइवर की बात ठीक थी. लेकिन उस ने यह सोच कर अनसुना कर दिया कि अचानक चिल्लाने की जरूरत पड़ गई तो आवाज बाहर जा सकेगी. वह पतली लकीर डूबते को तिनके का सहारा साबित होगा.

थोड़ी देर बाद अनन्या की नजर बैक व्यू मिरर पर गई. ड्राइवर उसे ही देख रहा था. अनन्या ने अपना स्टोल गरदन में कस कर लपेट लिया. उसे क्यों देख रहा है? उस की आंखें उसे अजीब लगीं. बहुत अजीब. लाल डोरों से अटी हुईं. क्या उस ने शराब पी रखी है? उस ने गहरी सांस ली. भीतर की हवा नशीली थी, लेकिन उस के अपने परफ्यूम में सनी हुई. शराब की गंध का ओरछोर वह नहीं पा सकी थी.

वह सोच में डूबी थी कि ड्राइवर की आवाज फिर आई, ‘‘मैडम, खिड़की बंद कर लीजिए प्लीज.’’

ड्राइवर ने स्वैटर के नाम पर पतली सी स्वैटशर्ट पहन रखी थी. उस की आवाज में कंपकंपी भर गई थी. खाली सड़क पर 80 की स्पीड से भागती गाड़ी और जनवरी महीने की कड़ाके की ठंड. वह खिड़की बंद करने लगी कि उस की नजर एक बार फिर ड्राइवर पर गई. वह मुसकरा रहा था. हो सकता है यह उस के प्रोफैशन का हिस्सा हो, लेकिन उसे मुसकराते देख अनन्या उखड़ गई. आवाज में तेजी ला कर बोली, ‘‘खिड़की बंद नहीं होगी. मेरा दम घुटता है बंद गाड़ी में.’’

इस के बाद ड्राइवर कुछ नहीं बोला. उस की मुसकराहट भी बुझ गई. अब वह चुपचाप गाड़ी चला रहा था.

‘‘और कितनी दूर है?’’ अनन्या ने पूछा.

ड्राइवर ने सुना नहीं या सुन कर भी चुप रह गया, ये 2 बातें थीं और दोनों का अलगअलग अर्थ था. अनन्या का दिमाग अब अधिक सक्रिय हो चला था. मान लो उस ने सुन ही लिया तो जवाब क्यों नहीं दिया? हो सकता है उस के खिड़की खोलने से गुस्से में हो या वह बताना ही न चाहता हो. न बताने के भी बहुत कारण हो सकते थे जैसे वह वहां जा ही न रहा हो जहां उसे जाना है. यह खयाल उसे परेशान करने के लिए काफी था. उसे मालूम करना होगा कि वह सही रास्ते पर है या नहीं.

अनन्या सड़क को देखते हुए कोई पहचान खोज ही रही थी कि उसे झट से याद आया. फिर अपने ऊपर क्रोध भी आया कि यह विचार उस के मन में पहले क्यों नहीं आया. उस ने मोबाइल निकाला और गूगल मैप में अपना डैस्टिनेशन डाल दिया. उफ, अभी आधे घंटे का रास्ता और बचा है.

तभी उस की नजर सामने मैप पर भागती गाड़ी पर पड़ी. यह क्या? जो रास्ता मैप दिखा रहा है यह उस से क्यों उतर रहा है. मैप में तो 10 मिनट सीधे चलने के बाद बाएं मुड़ना है.

‘‘ऐ सुनो, यह किस रास्ते से ले जा रहे हो?’’

‘‘मैडम, दूसरे रास्ते पर काम चल रहा है,’’ कहते हुए उस ने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी.

अनन्या ने मोबाइल की ओर देखा. मैप खुद को रीएडजस्ट कर रहा था, ‘‘गो स्ट्रेट फौर फाइव हंड्रेड मीटर देन टर्न राइट,’’ आवाज गूंजी तो अनन्या हड़बड़ा गई कि ड्राइवर ने सुना तो उसे मालूम हो जाएगा कि वह रास्ते से अनजान है और डरी हुई है. उस ने झट आवाज कम कर दी.

‘‘गूगल मैप चला रखा है मैडम आप ने?’’ ड्राइवर आवाज सुन चुका था.

अनन्या मोबाइल की आवाज कम कर चुपचाप बाहर देखती रही.

‘‘मैडम, इस गूगल से ज्यादा रास्ते हमें याद रहते हैं. अपना शहर है. गूगल तो फिर भी बहुत बार गलत जगह पहुंचा देता है, लेकिन मजाल है जो हम से कभी गलती हो जाए.’’

ड्राइवर बोलता जा रहा था, लेकिन अनन्या को इस बात में बिलकुल

दिलचस्पी नहीं थी. वह जल्द से जल्द होटल पहुंच जाना चाहती थी.  वह कभी बाहर, कभी गूगल मैप पर तो कभी कनखियों से ड्राइवर पर नजर रखे थी.

ड्राइवर ने म्यूजिक की आवाज बढ़ा दी, ‘वक्त है कम और लंबा है सफर, तू रफ्तार बढ़ा दे, मंजिल पर हमें पहुंचा दे…’ पुराने जमाने का गीत बज रहा था.

द्विअर्थी बोल गाड़ी का सन्नाटा तोड़ रहे थे. गाने के अश्लील बोलों ने अनन्या को खिजा दिया. बरसों पहले उस ने यह फिल्म टीवी पर देखी थी. अनिल कपूर और जूही चावला बेतुके गाने पर भद्दे तरीके से थिरक रहे थे. पापा ने अचानक आ कर टीवी बंद कर दिया. वह गुस्से में थे. आज वही गुस्सा उस के चेहरे पर परछाईं बन कर तैर रहा था.

‘‘म्यूजिक बंद करो,’’ उस के क्रोध को शायद ड्राइवर भांप गया था. इसलिए बिना कुछ कहे गाना बंद कर दिया.

अनन्या ने खिड़की से झांका. मुख्य सड़क को गाड़ी छोड़ चुकी थी. दूसरी कारें जो वहां उसे सुरक्षा देती लग रही थीं, वे भी इस सुनसान सड़क पर मौजूद नहीं थीं. लैंप पोस्ट थे पर या तो उन के बल्ब फ्यूज थे या फिर इस इलाके में बिजली नहीं थी. दूरदूर तक अंधेरा पसरा था. वहां मौजूद घर भी अंधेरे में सिमटे थे. नाइट बल्ब की क्षीण रोशनी की आशा भी किसी मकान से नहीं झांक रही थी.

अनन्या ने सोचा अपनी लोकेशन घर वालों और दोस्तों को भेज दे. लेकिन वे लोग तो दूसरे शहर में हैं. कोई मुसीबत आन पड़ी तो वे लोग भला क्या कर सकेंगे? फिर सोचा कि भेज देती हूं. कम से कम उन्हें मालूम तो होगा कि मैं कहां हूं. फिर उस ने मोबाइल उठाया, लेकिन मोबाइल में नैटवर्क नहीं था. इस नैटवर्क को भी अभी जाना था या यहां नैटवर्क रहता ही नहीं, सोचते हुए अनन्या की घबराहट और बढ़ गई.

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अब उसे सचमुच हवा की जरूरत महसूस हुई. उस ने खिड़की का कांच नीचे खिसकाना चाहा पर शायद ड्राइवर लौक लगा चुका था. कई बार बटन दबाने पर भी कांच नीचे नहीं हुआ. उस ने लौक क्यों किया होगा? उस ने ड्राइवर को देखा. ड्राइवर का एक हाथ गियर पर था और एक स्टीयरिंग संभाले था. उस के बाएं हाथ में स्टील का कड़ा था जो स्वैटशर्ट की आस्तीन से झांक रहा था. वह कोई धुन गुनगुना रहा था.

क्या ड्राइवर को कहना चाहिए कि लौक खोल दे. नहीं, अब वह ड्राइवर से कुछ नहीं कहेगी. जरूरत पड़ने पर सीधे कांच तोड़ देगी. पर किस चीज से?

उस ने कार में इधरउधर नजर घुमाई. कोई चीज दिखाई नहीं दी. सीट की जेब में हाथ डाला. उस में भी कुछ नहीं था. दूसरी सीट की जेब में हाथ डाला तो वहां कुछ था. एक छोटा बौक्स. क्या हो सकता है? क्या टूल बौक्स? सोचते हुए उस ने बौक्स बाहर निकाला. चमड़े का छोटा सा बौक्स.

उस ने ठहर कर ड्राइवर को देखने की कोशिश की. वह उसे देख तो नहीं रहा? नहीं, उस की नजरें सामने थीं. उसे जल्दी इसे खोल कर देख लेना चाहिए. क्या पता कुछ काम का मिल जाए. अत: उस ने मोबाइल की स्क्रीन की रोशनी में धीरे से बौक्स खोला तो देख कर झटका खा गई. उस की नसें झनझना उठीं. अंदर कंडोम के पैकेट थे. यह कितनी असंगत बात थी. पैसेंजर सीट के आगे कंडोम. अपना निजी सामान तो ड्राइवर आगे रखता है. कहीं किसी और सवारी का तो नहीं? हो भी सकता है और नहीं भी. वह फिर होने न होने के दोराहे पर खड़ी थी.

उस का मन हुआ अभी टैक्सी से उतर जाए, लेकिन बाहर का सन्नाटा देख कर वह सिहर उठी. कार की हैडलाइट की रोशनी छोड़ कर अब भी वहां अंधेरा था. दूर कहीं कुत्ते भूंक रहे थे.

तभी अचानक एक बाइक हौर्न देते हुए कार की बगल से गुजर गई. वह कुछ सोच

पाती उस से पहले ही बाइक पलट कर वापस आई. टैक्सी के पास आ कर धीमी हुई और फिर बाइक सवार फिकरा कस कर तेजी से आगे बढ़ गए. ड्राइवर ने एक क्षण उसे देखा और कांच चढ़ा दिया.

‘‘मैडम, अभी देखा न आप ने?’’ ड्राइवर ने सफाई देते हुए कहा.

अनन्या ने कुछ नहीं कहा पर अंदर से वह डर गई थी. अभी यहां उतरना किसी भी तरह सुरक्षित नहीं है. उस ने अपना पर्स टटोला. एक नेलकटर जिस में छोटा सा चाकू भी था उसे नजर आया. उस ने चाकू को बाहर निकाल कर नेलकटर अपनी हथेली में भींच लिया.

आमनासामना करने की नौबत आ गई तो इस चाकू की बदौलत कुछ मिनट तो मिलेंगे उसे संभलने को. कोई हथियार छोटा या बड़ा नहीं होता. असल बात है कि जरूरत के वक्त कितनी अक्लमंदी से उस का इस्तेमाल होता है. वह खुद को हिम्मत बंधा रही थी.

अचानक टैक्सी की रफ्तार कम हुई, तो अनन्या के मन में हजारों डर तैर गए कि क्या हुआ अगर इस के यारदोस्त अंधेरे से निकल

कर गाड़ी में आ बैठे या उसी को दबोच कर कहीं ले गए? कहीं बाइक सवार भी तो मिले हुए नहीं? अखबार में रोज छपने वाली खबरें उसे 1-1 कर याद आने लगीं. किसी में टैक्सी वाला सुनसान रास्ते पर ले गया तो किसी में चलती गाड़ी में ही…

उस का अकेले आना ही गलती थी. नहीं आना चाहिए था उसे अकेले. उस के पढ़लिख जाने से लोगों की सोच तो नहीं बदल सकती. लोग जिस सोच के गुलाम हैं उस का खमियाजा आज तक औरतों को ही भुगतना पड़ रहा है. उस ने अपने पर्स में रखा पैपर स्प्रे टटोला. पिछले साल और्डर किया था. तब से हमेशा साथ रखती है पर इस्तेमाल करने की नौबत अभी तक नहीं आई थी लेकिन आज जरा भी कुछ अजीब लगा तो वह इस के इस्तेमाल से हिचकेगी नहीं. सोचते हुए वह एक हाथ में पैपर स्प्रे दूसरे हाथ में नेलकटर थामे रही. उस ने तय किया अगली बार अकेले सफर करते हुए एक बड़ा चाकू साथ रखेगी. टैक्सी अब और धीरे चल रही थी.

‘‘क्या हुआ?’’ उस ने अपने डर पर काबू रख पूछा. उस की आवाज में न चाहते हुए भी अतिरिक्त सतर्कता थी.

‘‘कुछ नहीं मैडम. आगे मोड़ है. यह मोड़ ऐक्सीडैंट के लिए बहुत बदनाम है. एक बार मेरा भी ऐक्सीडैंट होतेहोते बचा था. तब से मैं यहां बहुत सावधान रहता हूं.’’

तभी ड्राइवर के फोन की घंटी घनघना उठी.

वह बोला, ‘‘म आउदै छु. 1 घंटा मां.’’

अनन्या अब कुछ और चौकन्नी हो उठी.

उधर से कुछ कहा गया, जिस के जवाब में ड्राइवर ने कहा, ‘‘म देख्छु. ठीक छ,’’ और फोन काट दिया.

कार में अचानक शांति छा गई थी.

‘‘नेपाल से हो?’’ अनन्या ने डर से नजात पाने को पूछ लिया.

‘‘नहीं, मैं नेपाल से नहीं हूं. मेरी पत्नी है वहां की. उसी के साथ थोड़ीबहुत नेपाली बोल लेता हूं. उसे अच्छा लगता है,’’ अंतिम वाक्य बोलते समय ड्राइवर की आवाज में कामना की परछाई उतर आई या फिर अनन्या को ऐसा महसूस हुआ.

‘‘उसे तेज बुखार है. बिटिया अलग भूख से रोए जा रही है. बस यही पूछ रही थी कि कितना समय लगेगा.

‘‘वैसे मेरा घर पास ही है, 2 गलियां छोड़ कर. आप कहें तो भाग कर ब्रैड का पैकेट पकड़ा आऊं. घर में कोई और है नहीं. बच्ची को छोड़ कर पत्नी कहीं जा नहीं सकती,’’ पूछते हुए वह झिझक रहा था.

‘नया पैतरा… कहीं इसीलिए तो यह इस रास्ते से नहीं आया… किसी बहाने गाड़ी रोको और…’ वह सोचने लगी. बोली कुछ नहीं. ड्राइवर ने भी दोबारा नहीं पूछा. वह गाड़ी चलाता रहा. लेकिन अब उस की गति बढ़ गई थी. वह चाहती थी कि कार की गति कम हो जाए पर वह अब उस से कोई संवाद नहीं करना चाहती थी. सीधे होटल पहुंचा दे सहीसलामत. उस ने मोबाइल में डायल स्क्रीन पर 100 टाइप किया. अब जरूरत होने पर सिर्फ डायल करना होगा.

तभी अचानक गाड़ी एक तेज झटके के साथ रुक गई. अनन्या का सिर किसी नुकीली

चीज से टकराया. दरवाजे के हैंडल से या पता नहीं किस चीज से… हाथ में कस कर थामी गई चीजें गाड़ी के किस कोने में गिरीं पता नहीं. उस ने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया पर दर्द था कि उस पर हावी हुए जा रहा था. उस ने किसी तरह नजरें उठा कर देखा, रास्ता पूरी तरह सुनसान था. ड्राइवर बैल्ट हटा रहा था. उसे चोट नहीं लगी थी.

अब कहीं… उसे पुलिस को फोन करना ही होगा. मोबाइल उठाने के लिए उस ने अपना हाथ बढ़ाया तो देखा उस के दोनों हाथ खून से सन गए हैं. खून उस के सिर से होते हुए हाथों पर बह आया था. अब क्या होगा इस बात का डर बहते हुए खून के साथ मिल गया था.

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तभी ड्राइवर की आवाज आई, ‘‘मैडम, गाड़ी की रफ्तार तेज थी और अचानक गाय सामने आ गई… आप को तो पता है यहां जानवर किस तरह खुले घूमते हैं. ब्रेक लगाने पड़े. आप को चोट तो नहीं आई?’’

वह शायद उस के जवाब की प्रतीक्षा कर रहा था पर दर्द, डर, गुस्से से उस का शरीर पस्त हो चला था. वह चाहते हुए भी कुछ नहीं बोल पाई.

ड्राइवर दरवाजा खोल पीछे आया. उस की हालत देख कर उस ने कुछ कहा तो अनन्या समझ नहीं पाई. वह पानी की बोतल लाया और उस के मुंह से लगा दी. कुछ पानी पीया गया, कुछ बाहर गिर कर उस के कपड़ों को भिगो गया. अब न उस के पास चाकू था, न पैपर स्प्रै, न मोबाइल, न ताकत. वह पूरी तरह से अशक्त पीछे की सीट पर पड़ी थी.

‘‘अरे, आप के सिर से तो खून बह रहा है…  ‘‘मैडम ऐसा करिए, आप थोड़ी देर लेट जाइए,’’ कहते हुए उस ने धीरे से उसे पीछे की सीट पर लिटा दिया.

क्या ऐसा करते हुए उस ने अनन्या की बांहों पर अतिरिक्त दबाव दिया था. सुन्न होते उस के दिमाग का कोई हिस्सा अतिरिक्त रूप से सतर्क हो उठा था. वह लेटना नहीं चाहती थी.

‘‘आप कहें तो आप को अस्पताल ले चलूं या आप के घर से किसी को बुला दूं? मोबाइल दीजिए अपना.’’

उसे इस आदमी के साथ कहीं नहीं जाना था. वह उसे धक्का देना चाहती थी, चिल्लाना चाहती थी पर न उस के हाथपांव काम कर रहे थे न आवाज. उस की चेतना खोने को थी कि उस ने देखा ड्राइवर उस के ऊपर झुक गया है. मोबाइल लेने को या शायद… आगे सब अंधकार में डूबा था.

उस की आंख खुली तो खुद को अस्पताल में बैड पर पाया. तारों के जंजाल से घिरी हुई थी. हाथ में ड्रिप लगी थी. उस ने सिर हिलाया तो उस में दर्द महसूस हुआ. उस ने बिस्तर के पास लगी घंटी बजाई.

नर्स भागते हुए आई. उसे होश में देख कर मुसकराते हुए पूछा, ‘‘हाऊ आर यू नाऊ यंग लेडी?’’

‘‘सिर में थोड़ा दर्द है,’’ अनन्या ने सिर को फिर हलका सा हिला कर देखा.

‘‘हां, वह अभी रहेगा. पेन किलर ड्रिप में डाल दी गई है. यू विल बी फाइन,’’ नर्स ने उस का गाल थपथपाया.

‘‘सिस्टर, कोई चिंता की बात तो नहीं है?’’ वह किसी तरह यही बोल पाई जबकि वह पूछना कुछ और चाहती थी.

‘‘नहींनहीं, चोट लगने के बाद आप बेहोश हो गई थीं, इसलिए सीटी स्कैन हुआ. सब नौर्मल है. डौंट वरी,’’ वह उस की पल्स रेट चैक कर रही थी, ‘‘बाकी बातें डाक्टर से पूछ लीजिएगा. ही विल बी अराइविंग सून. तब तक आप आराम करिए और हां, आप के घर भी इन्फौर्म कर दिया गया है,’’ उस का मोबाइल उसे पकड़ाते हुए नर्स ने कहा, ‘‘आप बात करना चाहें तो कर लीजिए. आप का बाकी सामान यहां रखा है,’’ मेज की तरफ इशारा करते हुए नर्स बोली.

अनन्या ने गरदन घुमा कर देखा. चाकू, पैपर स्प्रे, पर्स सब रखा था. कुछ भी मिसिंग नहीं था. कल रात की सारी घटना उसे याद आ गई.

‘‘कल टैक्सी वाला आप को यहां छोड़ गया था. जब तक आप के टैस्ट नहीं हो गए यहीं रहा,’’ नर्स ड्रिप की स्पीड एडजस्ट करते हुए कह रही थी.

अनन्या सुन कर चौंकी कि उस के घर पर तो उस की पत्नी और बच्ची भूखी थी.

‘‘रात की ड्यूटी पर मैं ही थी. बेचारा बहुत चिंतित था. खुद को जिम्मेदार मान रहा था,’’ नर्स जैसे उस की पैरवी कर रही थी.

अनन्या चुप थी. क्या कहती? वह शायद भला आदमी था. उस ने बिना वजह उस पर शक किया. माना दुनिया में अपराधी होते हैं पर सभी तो उस श्रेणी में नहीं आते. क्या कल वह एक निरपराध व्यक्ति को अपराधी सिद्ध करने पर तुली हुई थी? कहीं ड्राइवर भांप तो नहीं गया था कि वह उस के बारे में क्या सोच रही है. वह अचानक शर्मिंदगी के एहसास में डूब चली.

नर्स फिर आई और उसे 2 गोलियां खिला आराम करने की ताकीद कर चली गई.

पर अब अनन्या को आराम कहां. कल 1 घंटे में उस ने खुद को ही नहीं शायद ड्राइवर

को भी परेशान कर दिया था. बारबार खिड़की बंद करने का उस का अनुरोध अनन्या को याद आया. उस से गलती तो नहीं हो गई? क्या उसे फोन कर शुक्रिया कह देना चाहिए? लास्ट डायल में उस का नंबर होगा. उस ने फोन उठाया तो वह बंद था.

तभी नर्स भीतर आई तो अनन्या सहसा पूछ उठी, ‘‘सिस्टर, मेरे घर का नंबर कहां से लिया था आप ने? मेरे मोबाइल से?’’

‘‘नहीं, आप के वालेट में आप के हसबैंड का कार्ड था. वहीं से लिया,’’ कह क्षणभर रुकी. फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘आप का मोबाइल काम नहीं कर रहा था. शायद बैटरी डिस्चार्ज थी.’’

‘‘फोन आप ने किया था या ड्राइवर ने?’’

‘‘ड्राइवर ने ही किया था. फिर आप के पति की बात मुझ से करवाई थी.’’

‘‘ओह, अच्छा.’’

‘‘क्यों, कोई प्रौब्लम है?’’

‘‘नहीं, ऐसे ही पूछा.’’

क्या नर्स से इस बारे में पूछे या खुद देखे कि उस के शरीर पर कोई निशान तो नहीं? पर वह तो बेहोश थी. उस ने कुछ किया भी होगा तो जोरजबरदस्ती का निशान कहां से होगा?

इन्हीं सब चिंताओं में डूबी अनन्या नहीं देख पाई कब सामने उस की मां और सुहास आ कर खड़े हो गए. उसे तब मालूम हुआ जब मां ने उस का सिर सहलाया और सुहास ने प्यार से उस का हाथ थाम लिया. दोनों में से किसी ने नहीं कहा कि देर रात तक बाहर क्यों थी. किसी ने यह भी नहीं पूछा कि अनजान शहर में इतनी रात तक बाहर रहने का औचित्य क्या था. बस आए और प्यार से उसे बांहों में भर लिया.

‘‘अनन्या,’’ सुहास का कहा हुआ एक शब्द उसे सुकून दे गया. कितना प्यार करता है यह लड़का उसे. 4 साल की मुहब्बत के बाद कुछ महीने पहले दोनों ने शादी की है. वह तो शादी करना ही नहीं चाहती थी. उसे लगता था शादी उस के वर्क स्टाइल को सूट नहीं करती. सुहास ने उसे समझाया कि शादी स्कूल के टाइम टेबल जैसी नहीं होती कि हमें उसे फौलो करना ही पड़े. हम शादी के मुताबिक नहीं ढलेंगे, बल्कि शादी को अपने हिसाब से ढालना होगा. और हुआ भी यही. सुहास में कोई बदलाव नहीं आया. उन दोनों की प्राथमिकता उन का काम… एकदूसरे से प्रेम के अलावा कोई उम्मीद नहीं.

मां खिड़की के परदे हटाने गईं तो सुहास ने नजर बचा कर उसे चूम लिया. उस की इस

शरारत पर वह मुसकराए बिना न रह सकी.

‘‘मां, आप बैठिए. मैं पापा को देख कर आता हूं.’’

‘‘पापा भी आए हैं?’’ अनन्या ने महसूस किया कि उस का दर्द अचानक खत्म हो गया है.

‘‘हां, आए हैं. बाहर डाक्टर से बात कर रहे हैं. कल से बहुत चिंतित हैं.’’

‘‘वह तो भला हो टैक्सी ड्राइवर का जिस ने तुम्हें यहां पहुंचा कर हमें फोन कर दिया.’’

ड्राइवर का जिक्र आते ही अनन्या फिर सोच में डूब गई. वह अच्छा आदमी है, सब कह रहे हैं. लेकिन क्या इतना अच्छा आदमी है कि रात के सन्नाटे में किसी लड़की का फायदा न उठाए?

डाक्टर के हिसाब से सब ठीक था. वह सफर कर सकती थी. अनन्या भी अब घर जाना चाहती थी. शाम तक वे सब घर में थे. 3-4 दिनों के आराम के बाद अनन्या ने औफिस जाना शुरू कर दिया. लेकिन जो बात अनन्या के दिमागसे नहीं निकली थी वह यह थी कि उस रात उस के साथ कुछ हुआ या नहीं.

वह बारबार उस रात के वाकेआ को दिमाग में रिवाइंड कर देखती. कहां किस बात का क्या अर्थ निकल रहा है वह पोस्टमार्टम करती.

1-1 बात को कई प्रकार से परखती पर किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती. आईने में हर कोण से अपने शरीर को परख चुकी थी. कोई निशान उसे नहीं मिला था. अजीब मनोस्थिति में जी रही थी. अपने हर अंग को छू कर देख चुकी थी.

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वह अकसर ऐप पर जाती और उस ड्राइवर की रेटिंग देखती. पूरे 5 सितारे. उस की तसवीर बड़ी कर देखती. हंसता हुआ उस का चेहरा किसी बलात्कारी का चेहरा नहीं लगता था. वह दुनियाभर के बलात्कारियों को गूगल पर सर्च करने लगी. उन के चेहरों का मिलान आम लोगों से कर के देखती कि क्या वे कहीं से अलग हैं. उन की आदतों पर उस ने लगभग रिसर्च ही कर डाली थी. ड्राइवर का नंबर कई बार निकाल कर देखती, लेकिन कभी मिला नहीं पाई.

अनन्या ने अपनेआप से कई बार सवाल किया कि क्या यह बात उस के लिए इतने माने रखती है? अगर हां तो क्यों? क्या वह भी शरीर को पवित्रता का परिचायक मानती है? नहीं, वह ऐसा तो नहीं मानती. क्या उस रात वह बलात्कार से डर रही थी या बलात्कार के दौरान हो सकने वाली हिंसा से? यह प्रश्न उस ने जबजब खुद से पूछा उस का जवाब उसे हर बार नैनोसैकंड से भी कम में मिला. बलात्कार से ज्यादा वह हिंसा उसे डराती है. हां, वह अपमान भी जो जबरन उस की इच्छा के विरुद्ध किसी के द्वारा उस की देह से खेलने पर होता है. लेकिन यहां न हिंसा थी, न उस की जानकारी में अपमान हुआ था. फिर वह उस रात को अपनी चेतना से भुला क्यों नहीं पा रही? वह पागल तो नहीं हो गई है?

वह रात इस सीमा तक उस पर हावी हो गई थी कि उस ने रात को औफिस में रुकना बिलकुल बंद कर दिया. कभी इमरजैंसी होती तो पहले ही सुहास को बता देती कि आज रात लेने आना है. सुहास जो उस के आत्मनिर्भर होने पर बहुत प्रसन्न रहता था, इस अचानक आए बदलाव का कारण नहीं जान पाया. हंसते हुए 1-2 बार इस बात को लक्षित भी किया उस ने, ‘‘क्यों मेरी झांसी की रानी, हुआ क्या है तुम्हें? इन दिनों अकेले नहीं आती हो? औफिस में देर तक रुकना भी कम कर दिया है?’’

उत्तर में अनन्या पीले पड़े चेहरे को छिपा कर कह देती, ‘‘क्यों, मेरा घर पर रहना

खटकने लगा है?’’ और फिर दोनों हंस देते.

क्या वह सुहास को बता दे? लेकिन वह खुद कुछ नहीं जानती तो सुहास को क्या बताएगी? नहींनहीं, कुछ नहीं किया होगा ड्राइवर ने. ऐसा करना ही होता तो अस्पताल क्यों ले जाता वह उसे या अपने अपराध को ढकने के लिए तो नहीं ले गया वह उसे अस्पताल? किसी बेहोश स्त्री के साथ… नहींनहीं वह शायद बिना किसी बात के फोबिक हो रही है. अब वह इस बारे में नहीं सोचेगी.

उस ने काम में मन लगने की कोशिश की, लेकिन नियत तारीख पर पीरियड्स नहीं आए तो मन में फिर खलबली मच गई. वह और सुहास तो हमेशा प्रोटैक्शन इस्तेमाल करते हैं… प्रैगनैंसी नहीं हो सकती. प्रैगनैंसी किट ला कर टैस्ट किया तो टैस्ट नैगेटिव रहा. पीरियड्स तो हमेशा नियमित रहे हैं. फिर क्या कारण हो सकता है? कुछ दिन और इंतजार के बाद भी जब पीरियड्स नहीं आए तो उसे डाक्टर के पास चले जाना ही उचित लगा.

गर्भवती होने की आशंका डाक्टर पहले ही दूर कर चुकी थीं. सारे लक्षण सुनसमझ कर उन्होंने कहा कि कभीकभी स्टै्रस की वजह से पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं. चिंता वाली कोई बात नहीं है.

अनन्या दुविधा में थी कि जब यहां तक आ ही गई है तो डाक्टर से ही क्यों न पूछ ले. सारी बातें साफ हो जाएंगी.

‘‘डाक्टर, आप से कुछ पूछना है,’’ वह झिझकते हुए बोली.

‘‘हां, पूछिए न,’’ डाक्टर को लगा कि सैक्स से संबंधित कोई समस्या होगी. अकसर इस उम्र की लड़कियां यही सब पूछती हैं.

‘‘डाक्टर, किसी ने हमारे साथ संबंध स्थापित किया हो यह कैसे मालूम हो सकता है?’’ सवाल पूछ कर वह खुद को बेवकूफ जैसा महसूस कर रही थी कि यह कैसा सवाल है. शायद वह अपनी बात ठीक से नहीं रख पाई है.

‘‘मेरा मतलब है कि कोई बेहोश हो और कोई उसी बेहोशी का फायदा उठा कर कुछ कर बैठा हो, यह कितने दिनों बाद तक मालूम हो सकता है?’’

‘‘आप का मतलब बिना कंसेंट के संबंध स्थापित करने से है. देखिए, यह बलात्कार के अंतर्गत आता है और रेप हुआ है या नहीं यह मालूम करने के बहुत से तरीके होते हैं. सब से पहले बल प्रयोग के निशान देखे जाते हैं. शरीर के प्रत्येक भाग की जांच की जाती है. इंटरनल इंजरी के लिए टैस्ट किए जाते हैं. फोरेंसिक जांच होनी हो तो पीडि़त के शरीर या कपड़ों से बलात्कार करने वाले के वीर्य का सैंपल लेने की कोशिश की जाती है. सैक्स के बाद योनि में कुछ कैमिकल बदलाव आते हैं उन की जांच की जाती है. ये सब जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है.’’

‘‘क्या आप के साथ कुछ हुआ है? कोई परेशानी है, तो आप मुझे बता सकती हैं.’’

‘‘डाक्टर, पिछले महीने मेरा ऐक्सीडैंट हुआ था, उस समय मैं टैक्सी में थी. ऐक्सीडैंट के बाद कुछ समय तक मैं अचेत रही थी. मन में एक डर बैठ गया है कि उस समय ड्राइवर ने मेरे साथ कुछ किया तो नहीं होगा?’’

‘‘ऐसा लगने की कोई खास वजह है या

यों ही?’’

‘‘उस की कुछ हरकतें, जो शक के दायरे में आती हैं और नहीं भी. मैं दुविधा में हूं.’’

‘‘देखिए, अब इतने समय बाद कुछ कहना असंभव है. चैकअप से भी कुछ मालूम नहीं हो सकेगा. आप को संदेह था तो उस समय ही कुछ करना चाहिए था. अब इन सब बातों का असर अपने जीवन पर मत होने दीजिए. इतने समय बाद इन बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाता,’’ डाक्टर उस की मनोस्थिति समझ रही थीं, ‘‘हां, मैं आप को एचआईवी टैस्ट करवाने की सलाह जरूर दूंगी. क्या आप ने किसी से यह बात शेयर की है? किसी दोस्त से, अपने पार्टनर से या मातापिता से?’’

‘‘नहीं, मैं नहीं कर पाई.’’

‘‘अकेले इन बातों से जूझने से बेहतर है आप किसी को अपनी दुविधा बताइए. जिस पर आप को यकीन है आप उस से यह शेयर करिए. मोरल सपोर्ट बहुत सी मुश्किलों का हल होती है. स्ट्रैस के लिए दवा लिख देती हूं. आप को आराम आएगा. फिर भी कोई परेशानी हो तो जब चाहें मुझे कौल कर सकती हैं. यह रहा मेरा नंबर,’’ डाक्टर ने अपना कार्ड देते हुए कहा.

डाक्टर से बात कर के आज उसे काफी राहत महसूस हो रही थी. उस ने तय किया घर जा कर वह सुहास को सब बता देगी. उस से ज्यादा यकीन उसे किसी पर नहीं. मां भी पता नहीं कैसे रिएक्ट करें.

घर पहुंची तो सुहास बाहर था. आमनेसामने कहतेकहते कहीं वह हिम्मत न खो बेठे,

इसलिए उस ने तय किया कि  सारी बातें उसे मेल कर दी जाएं. वह कोई भी ब्योरा नहीं छोड़ना चाहती थी. वह विस्तार से लिख कर अपनी बात कहेगी.

मेल लिखतेलिखते कई घंटे हो चले थे. कितनी बार कुछ लिखती और फिर मिटा देती. कभी भाषा अनुरूप नहीं लगती तो कभी भाव. लिखतेलिखते उस रात के डर को वह फिर महसूस कर रही थी. कितनी बार उस की आंखें भीग गईं. वह सुहास को किसी तरह का शौक नहीं देना चाहती थी न ही वह चाहती थी कि उसे गलत समझा जाए. बहुत सतर्कता से लिख रही थी.

अंत में जब मेल पूरा हुआ तो बिना दोबारा पढ़े झट उस ने सैंड का बटन दबा दिया. वह मेल भेजने या नहीं भेजने के बीच किसी तरह की उलझन का दखल नहीं चाहती थी. क्यों उसे पहले खयाल नहीं आया कि अपनी तकलीफ किसी से साझा कर लेनी चाहिए? अब मेल भेजने के बाद अपना डर, संशय सब उसे बचकाना प्रतीत हो रहा था, एक बेसिरपैर की बात. मेल भेज कर वह चैन की नींद सो गई पूरे महीने के बाद.

घंटी की आवाज से उस की नींद टूटी. सुहास होगा. वह भागते हुए गई और दरवाजा खोल सुहास के सामने खड़ी हो गई. सुहास ने उसे अपनी छाती से लगा लिया. सुहास ने अपना सारा प्रेम उस आलिंगन में भर दिया. वह देर तक उसे भींचे खड़ा रहा. जब छोड़ा तब अनन्या का चेहरा हथेलियों में भर कर सहलाता रहा. अनन्या अपना विश्वास जीतता देख खुश थी. वह जानती थी सुहास ऐसी ही प्रतिक्रिया देगा.

‘‘पहले क्यों नहीं बताया?’’ सुहास की आवाज में चिंता थी.

‘‘बस नहीं बता पाई,’’ अनन्या उस के सीने में अपना चेहरा छिपाते हुए बोली.

‘‘पर तुम्हें बताना चाहिए था.’’

‘‘जानती हूं’

‘‘तुम अकेले ये सब…’’ सुहास की मजबूत आवाज अभी भी बिखरी हुई लग रही थी, ‘‘पहले बताती तो कुछ ऐक्शन लिया जा सकता था. कन्फर्म किया जा सकता था कि कुछ हुआ या नहीं,’’ वह शायद कहते हुए झिझक रहा था.

‘‘क्या तुम्हें फर्क पड़ता है सुहास?’’

तुम किसी बात की वजह से परेशान हो तो जाहिर तौर पर मुझे भी फर्क पड़ेगा.’’

‘‘अब तुम्हें बता देने के बाद मैं ठीक हूं.’’

‘‘क्या तुम चाहती हो उस से बात की जाए… टैक्सी ड्राइवर से?’’

‘‘नहीं, बात कर के क्या हासिल, तुम साथ हो तो मुझे अब उस से कोई मतलब नहीं,’’ अनन्या की आवाज में निश्चिंतता थी.

‘‘आ जाओ,’’ कहते हुए सुहास ने उसे फिर गले से लगा लिया कि ओह, उस की अनन्या… किस मानसिक स्थिति से गुजर रही होगी… अकेले. क्या वह उस का इतना सा भी विश्वास अर्जित नहीं कर पाया कि आते ही उसे कह देती.

सुहास के लिए यह रात लंबी थी. अनन्या के सो जाने के बाद भी वह करवटें

बदलता रहा. चाह कर भी उसे नींद नहीं आ रही थी. वैसा कुछ हुआ होगा या नहीं? अनन्या का डर ही होगा? कुछ होता तो ड्राइवर यों ही छोड़ कर चला आता? नहीं, जरूरी भी नहीं. छोड़ आता तो पुलिस केस बन जाता. सुहास की स्थिति वही हो चली थी जो पिछले 1 महीने से अनन्या की थी.

अनन्या के मेल के हिसाब से जब हादसा हुआ तब लगभग 12 बज रहे थे. ड्राइवर ने जब उसे फोन किया था तब रात के 3 बज रहे थे जबकि वह अनन्या से हादसे के समय ही मोबाइल मांग रहा था. इतनी देर का अंतराल क्यों रहा होगा? हो सकता है उस समय नैटवर्क न रहा हो या अनन्या का मोबाइल उस समय औफ हो गया हो, इसलिए उसे नंबर न मिला हो.

यह भी हो सकता है कि वह उस की हालत देख कर घबरा गया हो, इसलिए सीधे अस्पताल ले गया हो. लेकिन इतनी देर… रास्ता तो इतनी देर का नहीं. गूगल मैप उस के आगे खुला था और वह ऐक्सीडैंट वाली जगह से अस्पताल तक पहुंचने का वक्त माप रहा था. संशय और पीड़ा से उस की आंखें आहत थीं. वह किसी शून्य में खोया था. उस ने एक गहरी सांस छोड़ी. इतनी भारी आवाज जैसे किसी ने पत्थर बांध कर किसी को समंदर में फेंक दिया हो.

अनन्या की नींद उचट गई. सुहास को जागा देख उस से लिपट गई. सुहास ने भी उस का हाथ थाम लिया.

तभी अचानक सुहास को कुछ याद आया. यह बात उस की सोच में चुभ तो बहुत देर से रही थी पर वह उसे अनदेखा कर रहा था. लेकिन अब और नहीं हो सकेगा. बोला, ‘‘अनन्या, एक बात बताओ. तुम ने लिखा था कि तुम्हें सीट की जेब से कंडोम का बौक्स मिला था. वह तुम ने वापस वहीं रख दिया था या सीट पर रखा था?’’

अनन्या सोच में पड़ गई. कुछ देर सोच कर उस ने कहा, ‘‘नहीं, वापस तो नहीं रखा था. वह देख कर मैं लगभग सदमें की स्थिति में थी. वापस रखने का खयाल ही नहीं आया.’’

अब चुप रहने की बारी सुहास की थी.

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘जब उस ने तुम्हारा सामान अस्पताल में जमा करवाया तो कंडोम वाला बौक्स क्यों छोड़ दिया? उसे मालूम था कि वह तुम्हारा नहीं है. मतलब वह उसी का था. हो सकता है उस ने जानबूझ कर वह वहां रखा हो.’’

हो भी सकता है और नहीं भी. कुछ होने की संभावना अब भी उतनी ही थी जितनी न होने की. जिस संदेह को अनन्या मन से निकाल देना चाहती थी वह और गहरा गया था.

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