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Romantic Story : प्यार असफल है तुम नहीं

Romantic Story : रक्षित अपने असफल प्यार के कारण डिप्रैशन का शिकार हो गया, पर कैसे उस के दोस्त काव्य ने उसे गहरे भंवर से निकाला? एक हार्ट केयर हौस्पिटल के शुभारंभ का आमंत्रण कार्ड कोरियर से आया था. मानसी ने पढ़ कर उसे काव्य के हाथ में दे दिया. काव्य ने उसे पढना शुरू किया और अतीत में खोता चला गया… उस ने रक्षित का दरवाजा खटखटाया. वह उस का बचपन का दोस्त था. बाद में दोनों कालेज अलगअलग होने के कारण बहुत ही मुश्किल से मिलते थे. काव्य इंजीनियरिंग कर रहा था और रक्षित डाक्टरी की पढ़ाई.

आज काव्य अपने मामा के यहां शादी में अहमदाबाद आया हुआ था, तो सोचा कि अपने खास दोस्त रक्षित से मिल लूं, क्योंकि शादी का फंक्शन शाम को होना था. अभी दोपहर के 3-4 घंटे दोस्त के साथ गुजार लूं. जीभर कर मस्ती करेंगे और ढेर सारी बातें करेंगे. वह रक्षित को सरप्राइज देना चाहता था. उस के पास रक्षित का पता था क्योंकि अभी उस ने पिछले महीने ही इसी पते पर रक्षित के बर्थडे पर गिफ्ट भेजा था. दरवाजा दो मिनट बाद खुला, उसे आश्चर्य हुआ पर उस से ज्यादा आश्चर्य रक्षित को देख कर हुआ. रक्षित की दाढ़ी बेतरतीब व बढ़ी हुई थी. आंखें धंसी हुई थीं जैसे काफी दिनों से सोया न हो. कपड़े जैसे 2-3 दिन से बदले न हों. मतलब, वह नहाया भी नहीं था. उस के शरीर से हलकीहलकी बदबू आ रही थी, फिर भी काव्य दोस्त से मिलने की खुशी में उस से लिपट गया. पर सामने से कोई खास उत्साह नहीं आया.

क्या बात है भाई, तबीयत तो ठीक है न,’ उसे आश्चर्य हुआ रक्षित के व्यवहार से, क्योंकि रक्षित हमेशा काव्य को देखते ही चिपक जाता था. ‘अरे काव्य, तुम यहां, चलो अंदर आओ,’ उस ने जैसे अनमने भाव से कहा. स्टूडैंट रूम की हालत वैसे ही हमेशा खराब ही होती है पर रक्षित के रूम की हालत देख कर लगता था जैसे एक साल से कमरा बंद हो. सफाई हुए महीनों हो गए हों. पूरे कमरे में जगहजगह जाले थे. किताबों पर मिट्टी जमा थी. किताबें अस्तव्यस्त यहांवहां बिखरी हुई थीं. काव्य ने पुराना कपड़ा ले कर कुरसी साफ की और बैठा. उस से पहले ही रक्षित पलंग पर बैठ चुका था जैसे थक गया हो. काव्य अब आश्चर्य से ज्यादा दुखी व स्तब्ध था. उसे चिंता हुई कि दोस्त को क्या हो गया है? ‘‘तबीयत ठीक है न? यह क्या हालत बना रखी है खुद की व कमरे की? 2-3 बार पूछने पर उस ने जवाब नहीं दिया, तो काव्य ने कंधों को पकड़ कर झिंझड़ कर पूछा तो रक्षित की आंखों से आंसू बहने लगे. कुछ कहने की जगह वह काव्य से चिपक गया, तकलीफ में जैसे बच्चा अपनी मां से चिपकता है.

वह फफकफफक कर रोने लगा. काव्य को कुछ भी समझ न आया. कुछ देर तक रोने के बाद वह इतना ही बोला, ‘भाई, मैं उस के बिना जी नहीं सकता,’ उस ने सुबकते हुए कहा. ‘किस के बिना जी नहीं सकता? तू किस की बात कर रहा है?’ दोनों हाथ पकड़ कर काव्य ने प्यार से पूछा. ‘आम्या की बात कर रहा हूं.’ ‘ओह तो प्यार का मामला है. मतलब गंभीर. यह उम्र ही ऐसी है. जब काव्य कालेज जा रहा था तब उस के गंभीर पापा ने उसे एकांत में पहली बार अपने पास बिठा कर इस बारे में विस्तार से बात की. अपने पापा को इस विषय पर बात करते हुए देख कर काव्य को घोर आश्चर्य हुआ था. पर जब पापा ने पूरी बात समझई व बताई, तब उसे अपने पापा पर नाज हुआ कि उन्होंने उसे कुएं में गिरने से पहले ही बचा लिया. ‘ओह,’ काव्य ने अफसोसजनक स्वर में कहा. ‘रक्षित, तू एक काम कर. पहले नहाधो और शेविंग कर के फ्रैश हो जा. तब तक मैं पूरे कमरे की सफाई करता हूं. फिर मैं तेरी पूरी बात सुनता हूं और समझता हूं,’ काव्य ने अपने दोस्त को अपनेपन से कहा. काव्य सफाईपसंद व अनुशासित विद्यार्थी की तरह था. रो लेने के कारण उस का मन हलका हो गया था.

‘अरे काव्य, सफाई मैं खुद ही कर दूंगा. तू तो मेहमान है.’ काव्य को ऐसा बोलते हुए रक्षित हड़बड़ा गया. ‘अरे भाई, पहले मैं तेरा दोस्त हूं. प्लीज, दोस्त की बात मान ले.’ अब दोस्त इतना प्यार और अपनेपन से कहे तो कौन दोस्त की बात न माने. काव्य ने समझ कर उसे अटैच्ड बाथरूम में भेज दिया, क्योंकि ऐसे माहौल में न तो वह ढंग से बता सकता है और न वह सुन सकता है. पहले वह फ्रैश हो जाए तो ढंग से कहेगा. काव्य ने किताब और किताबों की शैल्फ से शुरुआत की और आधे घंटे में एक महीने का कचरा साफ कर लिया. काव्य होस्टल में सब से साफ और व्यवस्थित कमरा रखने के लिए प्रसिद्ध था. आधे घंटे बाद जब रक्षित बाथरुम से निकला तो दोनों ही आश्चर्य में थे. रक्षित एकदम साफ और व्यवस्थित कक्ष देख कर और काव्य, रक्षित को क्लीन शेव्ड व वैलड्रैस्ड देख कर. ‘वाऊ, तुम ने इतनी देर में कमरे को होस्टल के कमरे की जगह होटल का कमरा बना दिया भाई. तेरी सफाई की आदत होस्टल में जाने के बाद भी नहीं बदली,’ रक्षित सफाई से बहुत प्रभावित हो कर बोला. ‘और तेरी क्लीन शेव्ड चेहरे में चांद जैसे दिखने की,’ चेहरे पर हाथ फेरते हुए काव्य बोला. अब रक्षित काफी रिलैक्स था.

‘भैया चाय…’ दरवाजे पर चाय वाला चाय के साथ था. ‘अरे वाह, क्या कमरा साफ किया है आप ने,’ कमरे की चारों तरफ नजर घुमाते हुए छोटू बोला तो रक्षित झेंप गया. वह रोज सुबहसुबह चाय ले कर आता है, इसलिए उसे कमरे की हालत पता थी. ‘अरे, यह मेरे दोस्त का कमाल है,’ काव्य के कार्य की तारीफ करते हुए रक्षित मुसकराते हुए बोला, ‘अरे, तुम्हें चाय लाने को किस ने बोला?’ ‘मैं ने बोला. दीवार पर चाय वाले का फोन नंबर था.’ ‘थैंक्यू काव्य. चाय पीने की बहुत इच्छा थी,’ रक्षित ने चाय का एक गिलास काव्य को देते हुए कहा. दोनों चुपचाप गरमागरम चाय पी रहे थे. चाय खत्म होने के बाद काव्य बोला, ‘अब बता, क्या बात है, कौन है आम्या और पूरा माजरा क्या है?’ आम्या की बात सुन कर रक्षित फिर से मायूस हो गया, फिर से उस के चेहरे पर मायूसी आ गई. हाथ कुरसी के हत्थे से भिंच गए. ‘मैं आम्या से लगभग एक साल पहले मिला था. वह मेरी क्लासमेट लावण्या की मित्र थी. लावण्या की बर्थडे पार्टी में हम पहली बार मिले थे. हमारी मुलाकात जल्दी ही प्रेम में बदल गई. वह एमबीए कर रही थी और बहुत ही खूबसूरत थी. मैं सोच भी नहीं सकता कि कालेज में मेरी इतनी सारी लड़कियों से दोस्ती थी पर क्यों मुझे आम्या ही पसंद आई. मुझे उस से प्यार हो गया. शायद वह समय का खेल था. हम लगभग रोज ही मिलते थे. मेरी फाइनल एमबीबीएस की परीक्षा के दौरान भी मुझ में उस की दीवानगी छाई हुई थी. वह भी मेरे प्यार में डूबी हुई थी. ‘मैं अभी तक प्यारमोहब्बत को फिल्मों व कहानियों में गढ़ी गई फंतासी समझता था.

जिसे काल्पनिकता दे कर लेखक बढ़ाचढ़ा कर पेश करते हैं. पर अब मेरी हालत भी वैसे ही हो गई, रांझ व मजनूं जैसी. मैं ने तो अपना पूरा जीवन उस के साथ बिताने का मन ही मन फैसला कर लिया था और आम्या की ओर से भी यही समझता था. मुझ में भी कुछ कमी नहीं थी, मुझ में एक परफैक्ट शादी के लिए पसंद करने के लिए सारे गुण थे.’ ‘तो फिर क्या हुआ दोस्त?’ काव्य ने उत्सुकता से पूछा. ‘मेरी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी हो गई थी और मैं हृदयरोग विशेषज्ञ बनने के लिए आगे की तैयारी के लिए पढ़ाई कर रहा था. एक दिन उस ने मुझ से कहा, ‘सुनो, पापा तुम से मिलना चाहते हैं.’ वह खुश और उत्साहित थी. ‘क्यों?’ मुझे जिज्ञासा हुई. ‘हम दोनों की शादी के सिलसिले में,’ उस ने जैसे रहस्य खोलते हुए कहा. ‘शादी? वह भी इतनी जल्दी’ मैं ने हैरानगी से कहा. ‘मैं आम्या को चाहता था पर अभी शादी के लिए विचार भी नहीं किया था. ‘हां, मेरे दादाजी की जिद है कि मेरी व मेरी छोटी बहन की शादी जल्दी से करें,’ आम्या ने शादी की जल्दबाजी का कारण बताया और जैसी शांति से बता रही थी उस से तो ऐसा लगा कि उसे भी जल्द शादी होने में आपत्ति नहीं है.

‘अभी इतनी जल्दी यह संभव नहीं है. मेरा सपना हृदयरोग विशेषज्ञ बनने का है और मैं अपना सारा ध्यान अभी पढ़ाई में ही लगाना चाहता हूं,’ मैं ने उसे अपने सपने के बारे में और अभी शादी नहीं कर सकता हूं, यह समझया. ‘उस के लिए 2-3 साल और रुक जाओ. फिर हम दोनों जिंदगीभर एकदूसरे के हो जांएगे,’ मैं ने उसे समझते हुए कहा. ‘नहीं रक्षित, यह संभव नहीं है. मेरे पिता इतने साल तक रुक नहीं सकते. मेरे पीछे मेरी बहन का भी भविष्य है,’ जैसे उस ने जल्दी शादी करने का फैसला ले लिया हो. ‘मैं ने उसे बहुत समझया. पर उस ने अपने पिता के पसंद किए हुए एनआरआई अमेरिकी से शादी कर ली और पिछले महीने अमेरिका चली गई और पीछे छोड़ गई अपनी यादें और मेरा अकेलापन. मैं सोच नहीं सकता कि आम्या मुझे छोड़ देगी. मैं दुखी हूं कि मेरा प्यार छिन गया. मैं ने उसे मरने की हद तक चाहा. काव्य, मेरा प्यार असफल हो गया. मझ में कुछ भी कमी नहीं थी. फिर भी क्यों मेरे साथ समय ने ऐसा खेल खेला.’ रक्षित फिर से रोने लगा और रोते हुए बोला, ‘बस, तभी से मुझे न भूख लगती है न प्यास. एक महीने से मैं ने एक अक्षर की भी पढ़ाई नहीं की है. मेरा अभी विशेषज्ञ प्रवेश परीक्षा का अगले महीने ही एग्जाम है. यों समझ कि मैं देवदास बन गया हूं.’ वह फिर से काव्य के कंधे पर सिर रख कर बच्चों जैसा रोने लगा. ‘देखो रक्षित, इस उम्र में प्यार करना गलत नहीं है. पर प्यार में टूट जाना गलत है.

तुम्हारा जिंदगी का मकसद हमेशा ही एक अच्छा डाक्टर बनना था न कि प्रेमी. देखो, तुम ने कितना इंतजार किया. बचपन में तुम्हारे दोस्त खेलते थे, तुम खेले नहीं. तुम्हारे दोस्त फिल्म देखने जाते, तो तुम फिल्म नहीं देखते थे. तुम्हारा भी मन करता था अपने दोस्तों के साथ गपशप करने का और यहां तक कि रक्षित, तुम अपनी बहन की शादी में भी बरातियों की तरह शाम को पहुंच पाए थे, क्योंकि तुम्हारी पीएमटी परीक्षा थी. वे सारी बातें अपने प्यार में भूल गए. ‘आम्या तो चली गई और फिर कभी वापस भी नहीं आएगी तुम्हारी जिंदगी में. और यदि आज तुम्हें आम्या ऐसी हालत में देखेगी तो तुम पर उसे प्यार नहीं आएगा, बल्कि नफरत करेगी और सोचेगी कि अच्छा हुआ कि मैं इस व्यक्ति से बच गई जो एक असफलता के कारण, जिंदगी से निराश, हताश और उदास हो गया और अपना जिंदगी का सपना ही भूल गया. क्या वह ऐसे व्यक्ति से शादी करती? ‘सोचो रक्षित, एक पल के लिए भी. एक दिल टूटने के कारण क्या तुम भविष्य में लाखों दिलों को टूटने दोगे, इलाज करने के लिए वंचित रखोगे. इस मैडिकल कालेज में आने, इस अनजाने शहर में आने, अपना घर छोड़ने का मकसद एक लड़की का प्यार पाना था या फिर बहुत सफल व प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ बनने का था? तुम्हें वह सपना पूरा करना है जो यहां आने से पहले तुम ने देखा था. ‘

रक्षित बता दो दुनिया को और अपनेआप को भी कि तुम्हारा प्यार असफल हुआ है, पर तुम नहीं और न ही तुम्हारा सपना असफल हुआ है. और यह बात तुम्हें खुद ही साबित करनी होगी,’ काव्य ने उसे समझया. ‘तुम सही कहते हो काव्य, मेरा लक्ष्य, मेरा सपना, सफल प्रेमी बनने का नहीं, एक अच्छा डाक्टर बनने का है. थैंक्यू तुम्हें दोस्त, यह सब मुझे सही समय पर याद दिलाने के लिए,’ काव्य के गले लग कर, दृढ़ता व विश्वास से रक्षित बोला. ‘‘कार्ड हाथ में ले कर कब से कहां खो गए हो?’’ मानसी ने अपने पति काव्य को झिंझड़ कर पूछा, ‘‘अरे, कब तक सोचते रहोगे. कुछ तैयारी भी करोगे? कल ही रक्षित भैया के हार्ट केयर हौस्पिटल के उद्घाटन में जोधपुर जाना है,’’ मानसी ने उस से कहा तो वह मुसकरा दिया.

Crime : शर्मसार करते नाबालिग, सख्त हो कानून

Crime : जुल्म की दुनिया में आएदिन नाबालिगों का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है, फिर चाहे बात लूटपाट, मर्डर या रेप केस की हो. हाल ही में झारखंड के खूंटी, जिला रनिया थाना क्षेत्र में 5 नाबालिग आदिवासी लड़कियों से 18 नाबालिग लड़कों ने सामूहिक रेप किया.

ये सभी लड़कियां अपने रिश्तेदार के घर शादी से पहले होने वाली रस्म ‘लोटा पानी’ कार्यक्रम में शामिल होने आई थीं, जो रात को अपने घर वापस जा रही थीं. तभी ये 18 लड़के इन का पीछा करते हुए आए और इन्हें अपनी हवस का शिकार बना लिया. किसी तरह एक लड़की वहां से बच निकली. उस ने गांव पहुंच कर वारदात की सूचना गांव वालों को दी. तब कुछ लोग लड़की के साथ आए और बाकी 4 लड़कियों को बचाया.

सभी पीड़िता लड़कियों का मैडिकल चैकअप कराया गया, जिस में रेप की पुष्टि हो गई. मामले की जानकारी लेने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकार की सचिव राजश्री अपर्णा कुजूर तोरपा पहुंचीं. सभी आरोपियों को विधिसम्मत बालसुधार गृह भेज दिया गया है.

हैरान कर देने की बात यह है कि हमारे देश में नाबालिगों द्वारा कितने भी जघन्य अपराध क्यों न हों, सजा के नाम पर 3 साल के लिए बाल सुधार गृह ही भेजा जाता है और अगर मामला ज्यादा गंभीर है, तो जुवैनाइल कोर्ट में उस नाबालिग को ‘बालिग’ मान कर मुकदमा चलाया जाता है और आईपीसी के तहत सजा सुनाई जाती है.

21 साल की उम्र के बाद नाबालिग को जेल में डाला जाता है, लेकिन किसी भी हालात में मौत की सजा या उम्रकैद की सजा नहीं सुनाई जा सकती, जिस का कई बार ये नाबालिग फायदा उठाते हैं और आपराधिक दुनिया में अपना दबदबा बढ़ाते जाते हैं.

रिकौर्ड्स के मुताबिक, 16 से 18 साल के नाबालिगों में आपराधिक सोच बीते 5 सालों में 43 फीसदी ज्यादा बढ़ी है, जिस के लिए जरूरी है कि कानून में संशोधन किया जाए और नाबालिगों की उम्र 18 साल से घटा कर 16 साल कर दी जाए.

वहीं, ऐसे लड़कों व इन के परिवारों का समाज से बौयकौट कर दिया जाए, क्योंकि ज्यादातर ऐसे लड़के बाल सुधार गृह से बाहर आते ही अपने ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं, लेकिन पीड़िता लड़की व उस के परिवार को सारी जिंदगी नफरत की नजरों से देखा जाता है. जिस वजह से ऐसे परिवारों का समाज बहिष्कार तक कर देता है. कई बार तो दुनिया के तानों से छुटकारा पाने के लिए पीड़िता खुदकुशी तक कर लेती है और वे मनचले लड़के बेखौफ किसी और को अपनी हवस का शिकार बनाने का रास्ता खोजते रहते हैं.

New webseries : दुपहिया सीरिज में गांववालों की गंभीर समस्‍या को हास्‍य अंदाज में परोसने की कोशिश

Dupahiya : रेटिंग – तीन स्टार

भारत गांवों का देश है. इस के बावजूद भारतीय सिनेमा से गांव व ग्रामीण संस्कृति का सफाया हो गया है. ‘लापता लेडीज’ जैसी कुछ फिल्मों में जब ग्रामीण परिवेश की कथा पिरोई जाती है, तो इन फिल्मों के गांव अंगरेजीदां सोच के अनुरूप गांव नजर आते हैं, जिन का देश के गांवों से दूर दूर तक कोई वास्ता नजर नहीं आता लेकिन सात मार्च से अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही वेब सीरीज ‘दुपहिया’ में सही मायनों में भारतीय ग्रामीण परिवेश, रहनसहन, ग्रामीण सोच स्पष्ट रूप से नजर आती है, जबकि इस वेब सीरीज की निर्देशक पश्चिम बंगाल में पलीबढ़ी और न्यूयार्क, अमरीका से फिल्म विधा की शिक्षा ग्रहण करने वाली सोनम नायर है.

वर्तमान समय में गांवों के अंदर मुख्य सड़कें ईंट की या जिसे खड़ंजा कहते हैं, उस की बन गई है, तो इस फिल्म में उसी तरह का गांव है. गांव का अपना बाजार भी है. पंचायत भी है. इस सीरीज में दहेज की प्रथा, शहर में नौकरी के नाम पर दहेज की रकम का बढ़ना, शरीर का सांवला रंग, आपसी भाईचारा, एकता, गांव की छवि के खिलाफ न जाना वगैरह बहुत कुछ पिरोया गया है. पर कहीं कोई भाषणबाजी नहीं है. हल्केफुल्के हास्य व व्यंग के साथ 35 से 40 मिनट की अवधि वाले 9 एपीसोड में पूरी कहनी समेटी गई है.

इस सीरीज का अंत जिस मोड़ पर किया गया है, उस से यह साफ संकेत मिलता है कि इस का दूसरा भाग भी आएगा. सोनम नायर ने वेब सीरीज ‘दुपहिया’ में जिस तरह से गांव के परिवेश, रहनसहन, किरदारों की सोच, उन के पहनावे आदि को पेश किया है, उसे देख कर लगता है कि सोनम नायर अभी कल ही बिहार के किसी गांव से लौटी हैं. इस सीरीज की सब से बड़ी खासियत यह है कि इस में बंदूक, गोली, कट्टा यानी कि हिंसा, मारपीट और सैक्स का घोर अभाव है. यह पूरी तरह से पारिवारिक मंनोरंजक व विचारोत्तेजक सीरीज है.

सीरीज की कहानी के केंद्र में बिहार का एक काल्पनिक धड़कपुर गांव है, जहां की वार्ड लीडर पुष्पलता यादव (रेणुका शहाणे) का गांव के जीवन की सबसे अच्छी बात क्या है? के सवाल पर दिया गया जवाब है, ‘‘शहरों में अपना दुख अपना दुख, अपनी खुशी अपनी खुशी, गांव में अपना दुख, सब का दुख, अपनी खुशी सब की खुशी.’’ यह ग्रामीण भारत की सही तस्वीर है, जिसे इस के लेखकद्वय चिराग गर्ग और अविनाश द्विवेदी ने बाखूबी अपने लेखन से रेखांकित किया है.

हां! लेखकों की इस सोच पर आप को हंसी आ सकती है कि बिहार में कोई गांव है, जो 25 वर्ष से ‘अपराध मुक्त’ है. जी हां! दुपहिया की कहानी के केंद्र में 25 वर्ष से ‘अपराध मुक्त’ बिहार का एक काल्पनिक धड़कपुर गांव है, जहां लोगों को साफ पानी भी पीने को नहीं मिल रहा है. यहां की पंचायत की नेता पुष्पलता यादव (रेणुका शहाणे) है, जिन्हें अब सरपंच (योगेंद्र टिक्कू) ने अगली बार सरपंच का उम्मीदवार बनाने के अलावा गांव को बोरवेल लगाने की राशि दने का वादा किया जाता है. पर अहम सवाल है कि सरपंच महोदय अपनी कुर्सी आसानी से छोड़ेंगें? उधर गांव के स्कूल के अस्थाई प्रिंसिपल बनवारी झा (गजराज राव) स्थाई प्रिंसिपल बनने के लिए प्रयासरत है. तो वहीं वह अपनी 27 वर्षीय बेटी रोशनी (शिवानी रघुवंशी) की शादी प्रसाद त्रिपाठी (आलोक कपूर) के बेटे कुबेर त्रिपाठी (अविनाश द्विवेदी) से तय करते हैं.

वास्तव में रोशनी गांव की जिंदगी से हट कर शहर में जिंदगी बिताना चाहती है. इसलिए जब लड़का अपने परिवार के साथ उसे देखने उन के घर आता है तो रोशनी बड़े भाई दुर्लभ की बजाय शहर में रह रहे छोटे भाई कुबेर संग विवाह करने की बात करती है. अब इस में लड़के के परिवार को भी कोई दिक्कत नहीं होती अगर लड़की के परिवार वाले उसे 3 लाख की रौयल एनफील्ड और पेट्रोल खर्च के लिए 2 लाख और देने का वादा करते. रोशनी अपने पिता पर दबाव डालती है कि वह शहर में रहने के लिए दहेज की मांग पूरी करे. पिता हार मान लेते हैं और आखिरकार शादी तय हो जाती है.

बेचारे बनवारी झा किसी तरह अपनी सारी जमा पूंजी से रौयल एनफील्ड मोटर साइकल खरीद कर लाते हैं. रोशनी का भाई भूगोल झा (स्पर्ष श्रीवास्तव) को फिल्मों में हीरो बनने का भूत सवार है. जिस दिन मोटर साइकल गांव पहुंचती है, उसी दिन मोटर बाइक चोरी हो जाती है. मतलब 25 साल में पहली बार धड़कपुर में चोरी हो जाती है और गांव का 25 साल पुराना अपराध मुक्त रिकौर्ड टूट जाता है. अब बनवारी झा के सामने इनफीलड मोटर बाइक की भरपाई करने से ले कर गांव की अपनी छवि को बचाते हुए बेटी शिवानी की शादी को टलने नहीं देना है.

गांव की छवि को बचाए रखने के लिए बनवारी झा का परिवार इस बात को छिपाते हुए अपनी तरफ से खोजना शुरू करता है. उन का शक अमावस (भुवन अरोड़ा) पर जाता है, जो कि 7 वर्ष पहले रोशनी का प्रेमी था, पर उसे चोरी करने की ‘क्लेप्टोमोनिया’ नामक बीमारी है. बनवारी ने एक चोरी के मामले में पंचायत के आदेश से अमावस को गांव से तड़ीपार करा दिया था. इसी के साथ रोशनी व अमावस का प्रेम संबंध खत्म हो जाता है पर रोशनी को यकीन है कि अमावस उस से झूठ नहीं बोलेगा. लेकिन अमावस ने चोरी नहीं की है.

दूसरी तरफ पुष्पलता यादव की बेटी व रोशनी की 23 वर्षीय सहेली निर्मल यादव (कोमल कुशवाहा) सांवली है, उसे लगता है कि उस के सांवले रंग के कारण लड़के उसे पसंद नहीं करते. जबकि वह स्वयं पर्सनालिटी डेवलपमेंट व अंगरेजी की शिक्षा देने की क्लास चलाती हैं. निर्मल प्लास्टिक सर्जरी करा कर अपना चेहरा सुंदर करवाना चाहती है, इस में उसे प्रेम करने वाला और भूगोल का दोस्त पिंटू मदद करता है.

राजनीति में पुष्पलता यादव के खिलाफ सरपंच के साथ मिल कर कमलेश (मैक लारा) अपनी चाल चलता है. उधर पुलिस इंस्पेक्टर मिथिलेश पर दबाव है कि वह गांव की तरफ से कोई एफआईआर दर्ज करवाए. ऐसे में जब गांव में पहली चोरी होती है तब क्या गांव वासी घबरा जाते हैं? क्या वह एकदूसरे पर शक करने लगते हैं? क्या वह पीड़ित को नुकसान की भरपाई करने में मदद करते हैं? और अंत में चोर का पता चलता है या नहीं. रोशनी की शादी कुबेर से होती है या नहीं. यह कई सवाल हैं? यही सब दुपहिया सीरीज का हिस्सा है.

यह वेब सीरीज गांव की जिंदगी की एक झलक दिखाने के साथ ही गांव मे रहने वालों की सोच पर भी बात करती है. 9 एपीसोड की इस सीरीज का पहला एपीसोड खत्म होने पर पता चलता है कि रोशनी की शादी में 8 दिन बाकी हैं. यानी कि यह सीरीज धड़कपुर गांव में 8 दिन की यात्रा है. लेखक चिराग गर्ग और अविनाश द्विवेदी ने गांव के पूरे परिवेश, गांव के रहनसहन, गांव वालों का सुखदुख में शामिल होना सहित हर बारीक व मार्मिक बिंदुओं को छुआ है.

बिहार में ‘लौंडा नाच’ काफी प्रचलित है, जिसे कभी अभिनेता पंकज त्रिपाठी भी करते रहे हैं, इसे भी अविनाश द्विवेदी व चिराग गर्ग ने इस सीरीज का प्रमुख आकर्षण बना दिया है. लौंडा नाच करते हुए अभिनेता स्पर्श श्रीवास्तव और भुवन अरोड़ा ने कमाल की प्रतिभा दिखाई है. पूरी सीरीज हंसाते व मनोरंजन करते हास्य व व्यंग के लहजे में कई गंभीर मसले भी उठाती है.

मसलन, शहर की ओर पलायन करने का लालच, शहर के प्रति मोहभंग होना, अखंडता,एक बड़े परिवार के रूप में रहने वाले गांव का सामुदायिक जीवन, एकदूसरे के सुखदुख का हिस्सा बनना, दहेज कुप्रथा, शरीरिक रंगत, एकदूसरे की रक्षा करना है. वहीं त्वचा के रंग से जुड़ा आत्मसम्मान जैसा सार्थक विषय उठाया गया है.

सीरीज ग्रामीण राजनीति के कुचक्र पर भी बात करने से पीछ नहीं रहती. कहानी व पटकथा इतनी अच्छी तरह से लिखी गई है कि इस का हर दृश्य एक सामाजिक टिप्पणी के रूप में कार्य करता है. मसलन, सांवले रंग की लड़की निर्मल प्लास्टिक सर्जरी कराने वाली लड़की से औपरेशन करने से पहले डाक्टर कहती है ‘‘इस दुनिया में हर रोज कुछ और हो जाती हूं मैं, बड़ा जोर लगता है खुद को खुद बनाए रखने में.” उस के बाद निर्मल अपना निर्णय बदल देती है.

इस सीरीज की सब से बड़ी समस्या इस की लंबाई है. 35 से 40 मिनट के 9 एपीसोड, अंतिम एपीसोड तक किरदारों का परिचय चलता रहता है. सबप्लोट और सहायक किरदारों की भरमार है, कुछ सिर्फ़ समय बिताने या विचित्रता को बढ़ाने के लिए हैं. जैसे रिश्तेदार जश्न मनाने के लिए जल्दी आ जाते हैं. असली पत्रकार बनने की चाहत रखने वाला इच्छुक रिपोर्टर को आज पत्रकारिता की स्थिति पर लेक्चर दिया जाता है, जिस से कुछ कटाक्ष प्रसारित होते हैं. संपादक कहता है, “आप खबर लिखो. कन्फर्म करना लोगों का काम है, हमारा काम है छापना है.’’ लेकिन लेखकों का कमाल है कि हर किरदार चमकता है. लेकिन कुछ दृष्य कमजोर हैं. तंबाकू पीटने जैसे कुछ दृष्य बेवजह के लगते हैं.

सीरीज की सब से बड़ी खूबी यह है कि हर गांव की खासियत के अनुरूप इस में दिखाया गया है कि हर मुसीबत में पूरा का पूरा गांव कैसे एक साथ आता है और मिल कर समस्या का समाधान खोजता है. पंचायत का निर्णय सभी मानते हैं. सभी के लिए पहले गांव की छवि को बरकरार रखना है.

शहरी संस्कृति में जीने व स्कर्ट जैसे कपड़े पहनने, लोग क्या कहेंगे यह न सुनने की लालसा के साथ ही अपने भावी पति द्वारा नजरअंदाज किए जाने और अपने पूर्व प्रेमी से पूर्ण समर्थन पाने की दुविधा के बीच फंसी रोशनी के किरदार को जीवंतता प्रदान करने में शिवानी रघुवंशी का प्रयास सराहनीय है.

शिवानी ने रोशनी के मन की दुविधाओं व अंतर्द्वंद को सकार करने में सफल रही हैं. बेटी की जिदंगी की खुशी के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाले पिता बनवारी झा के किरदार में गजराज राव का अभिनय सराहनीय है. शहर जा कर हीरो बनने की इच्छा, सदा रील्स बनाते रहने वाले रोशनी के भाई भूगोल के किरदार में स्पर्श श्रीवास्तव छा जाते हैं. भूगोल के वफ़ादार दोस्त टीपू के किरदार में समर्थ माहोर अपनी चुटीली और मज़ेदार संवाद अदायगी से को प्रभावित करने में सफल रहे हैं.

पुष्पलता के किरदार में रेणुका शहाणे के अभिनय पर तो कभी कोई उंगली उठा ही नहीं सकता. पुष्पलता की बेटी और पहले एपीसोड से ही मुख्य संदिग्ध बन जाने वाली निर्मल यादव के किरदार में कोमल कुशवाहा अपनी छाप छोड़ जाती हैं. सांवलेपन से छुटकारा पाने के लालच में गलत रास्तें पर चलने के लिए मजबूर होने की मनोदशा को बखूबी पकड़ा है और लोगों के दिलों तक यह बात पहुंचाने में सफल रही हैं. रोशनी के पूर्व प्रेमी और क्लेप्टोमेनिया से जूझ रहे अमावस की मन की पीड़ा को उजागर करते हुए भुवन अरोड़ा याद रह जाते हैं. पुलिस इंस्पेक्टर मिथिलेश के किरदार में एक बार फिर यशपाल शर्मा ने साबित कर दिया कि वह हर किरदार को निभाने की क्षमता रखते हैं. देहज के लालची दूल्हे कुबेर के किरदार को अविनाश द्विवेदी अपने अभिनय से जीवंतता प्रदान करने में सफल रहे हैं.

House : कैसी हो नेमप्लेट की डिजाइन

House : इंटीरियर डिजाइन में नेमप्लेट को ले कर भी तमाम प्रयोग हो रहे हैं. नेमप्लेट छोटी चीज भले हो, इस का प्रभाव बड़ा होता है. ऐसे में इस को सावधानी से तैयार करवाना चाहिए.

मकान हो या फ्लैट, उस पर लगने वाली नेमप्लेट की डिजाइन अब बेहद आकर्षक और कलात्मक होने लगी है. मैटीरियल्स, स्टाइल्स और आकारों का बहुत खूबसूरती से प्रयोग किया जा रहा है. ट्रेडिशनल लोहे और लकड़ी की डिजाइन से ले कर हाथ से पेंट की गईं या बैकलिट डिजाइन तक से नेमप्लेट बनाई जाने लगी हैं. अब इन में घर का नाम, जाति, घर के मालिक और रहने वालों के नाम के साथ ही साथ घर का नंबर और जगह का नाम तक लिखा जा रहा है.

घर के मालिक की कोशिश होती है कि नेमप्लेट की डिजाइन ऐसी हो जो देखने वालों पर गहरा प्रभाव छोड सके. ऐसे में इस का चुनाव बेहद सावधानी से करें. नेमप्लेट केवल नाम और पते के लिए होती है. इस की डिजाइन ऐसी हो कि जिस पर लिखे शब्द आसानी से पढ़े व समझे जा सकें. उस को समझने के लिए पढ़ने वाले को डिडिक्शनरी न देखनी पड़े या गूगल सर्च न करना पड़े. साथ ही, घर के मालिक की प्राइवेसी भी बनी रहे.

तरहतरह की डिजाइनें

घर के दरवाजे पर लगने वाली नेमप्लेट में सब से अधिक प्रयोग मैटल की प्लेट का होता है. इस में परिवार के नाम या घर के नंबर के साथ एक आयताकार मैटल की प्लेट होती है. मैटल की प्लेट को लकड़ी के आधार पर लगाया जाता है. इस को बेहतर बनाने के लिए लोहे, पीतल या स्टेनलेस स्टील की नेमप्लेट पर नाम उकेरे जाते हैं या पेंट से लिखे जाते हैं.

मैटल के बाद दूसरा नंबर ग्रेनाइट नेमप्लेट का आता है. यह नेमप्लेट डिजाइन और सुंदरता के हिसाब से मैटल से अधिक पंसद की जाती है. ग्रेनाइट की प्राकृतिक सुंदरता नेमप्लेट को सुंदर बनाती है. इस में सफेद या काले रंग का ग्रेनाइट सब से अधिक पंसद किया जाता. आज के ट्रैंड में कंटेम्पररी ग्लास नेमप्लेट भी बनने लगी हैं. इस में लेजर तकनीक का प्रयोग कर के कांच की सतह पर नाम को उकेरा जाता है. ग्लास नेमप्लेट को स्टेनलेस स्टील फ्रेम के साथ भी तैयार किया जा सकता है.

नेमप्लेट को तैयार करने में ट्रेडिशनल फौक आर्ट का भी प्रयोग किया जाने लगा है. मिट्टी और मिरर के मिश्रण का उपयोग कर के इसे सुंदर पैटर्न और डिजाइन में तैयार किया जाता है. यह डिजाइन लोकल हेरिटेज और ट्रेडिशनल क्राफ्ट के तालमेल से बनती है, जो दूसरों से अलग दिखती है. हाथ से पेंट की गई नेमप्लेट की डिजाइन एक और स्टाइल है जो बेहद अच्छी लगती है. नेमप्लेट को तैयार करने में वाइब्रैट रंगों का प्रयोग भी किया जा सकता है. हाथ से पेंट की गई नेमप्लेट एक आर्ट पीस होती है.

म्यूरल नेमप्लेट की डिजाइन भी इंटीरियर में काफी पंसद की जा रही है. इस डिजाइन में एक म्यूरल चित्र शामिल होता है. यह प्रकृति, लैंडस्केप और एब्स्ट्रेक्ट आर्ट को दिखाता है. यह घरमालिकों के टैस्ट और स्टाइल को भी प्रदर्शित करता है. यह डिजाइन एंट्रेंस को अधिक मनोरम बना सकती है. बुद्ध थीम की नेमप्लेट भी काफी पंसद की जा रही है. यह बुद्ध की डिविनिटी और शांति को दिखाती है. इस में डैकोरेटिव एलिमैंट्स जैसे बुद्ध की मूर्ति या नक्काशी, कमल के फूल और भी बहुतकुछ दिखाया जा सकता है.

रेजिन नेमप्लेट की डिजाइन सब से आधुनिक मानी जाती है. सुदंर आकार या पैटर्न वाले सांचों में डाल कर इस की डिजाइन को तैयार किया जाता है. यह इसे उन डिजाइनों में से एक बनाती है जिन्हें किसी के विजन के अनुसार कस्टमाइज किया जा सकता है. रेजिन के प्रयोग से नेमप्लेट को बेहद खूबसूरत बनाया जा सकता है. लाइट के साथ नेमप्लेट की डिजाइन भी अब तैयार होने लगी हैं. अंधेरे में यह बहुत अच्छी लगती है और इसे रात में भी पढ़ा जा सकता है. यह इस तरह से डिजाइन की जाती है कि पीछे लिखे को आसानी से पढ़ा जा सके. आजकल एम्बेडेड एलईडी लाइट्स, रिकेस्ड लाइटिंग या सोलर एनर्जी से चलने वाली नेमप्लेट भी तैयार होने लगी हैं.

लकड़ी की नेमप्लेट की डिजाइन नैचुरल लुक प्रदान करती हैं. ये सागौन और ओक जैसी सुदंर व टिकाऊ लकड़ी से तैयार की जाती हैं. इन डिजाइनों में नक्काशीदार लकड़ी की पट्टियां प्रयोग की जाती हैं. ऐक्रेलिक नेमप्लेट की डिजाइन में एक क्रिस्टल ऐक्रेलिक पैनल होता है जो आकर्षक लिखावट में एक नाम के साथ उभरा होता है. मार्बल की नेमप्लेट की डिजाइन भी शानदार लुक देती हैं. इस का चिकना लुक आकर्षण को बढ़ाता है. कांच की नेमप्लेट भी बहुत अच्छी लगती है. फ्रास्टेड कांच, नक्काशीदार डिजाइन या रंगीन लहजे वाले कांच की नेमप्लेट का प्रयोग कर सकते हैं.

घर, विला और फ्लैट के लिए हों अलगअलग डिजाइन

नेमप्लेट तो हर घर की जरूरत होती है. आज घर भी तरहतरह के होने लगे हैं. इन में सामान्य घर, विला और फ्लैट शामिल हैं. हर तरह के घर के लिए उस के हिसाब से मिलतीजुलती नेमप्लेट बनानी चाहिए. विला में नेमप्लेट बड़ी हो और पत्थर के प्रयोग से तैयार हो. उस में लाइट और पानी का प्रयोग हो सकता है. फ्लैटों के लिए नेमप्लेट की डिजाइन छोटी और क्रिएटिव एलिमैंट्स की हों.

नेमप्लेट का चुनाव करते समय कुछ ध्यान देने वाली बातें होती हैं. इन का साइज सही हो. वर्टिकल नेमप्लेट और हौरिजौन्टल कोई भी साइज चुनें जो अच्छा लगता हो. नेमप्लेट पर जो लिखा जाए वह दूर से पढ़ने में आए, इस तरह से लिखा जाए. कई बार मकान नंबर छोटा लिख दिया जाता है, इस का ध्यान रखें. जहां पर नेमप्लेट लगी हो वहां रात में भी रोशनी रहे जिस से पढ़ने वाले को दिखाई दे.

नेमप्लेट पर लिखते समय अपनी प्राइवेसी का ध्यान रखें. कुछ लोग जाति या धर्म का महिमामंडन करते हुए नेमप्लेट पर लिखते हैं. इस से बचना चाहिए. डिजाइन दिखाने के चक्कर में इस तरह से न लिखें जो पढ़ने में ही न आए. कई लोग नाम के अक्षरों में बदलाव करते हैं. स्पेलिंग का मनमाना प्रयोग करने से भी दिक्कत होती है.

नेमप्लेट साफसुथरी और सही तरह से लिखी होनी चाहिए. नाम और पते से अधिक इस पर लिखना ठीक नहीं होता. डिजाइन और एकदूसरे की देखादेखी में बनाई गई नेमप्लेट जगहंसाई का कारण भी बन जाती है. इस के लिखे में गलती एकदम भी नहीं होनी चाहिए. तभी इस का सही प्रभाव पढ़ने वाले पर पड़ता है.

Employment : भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही, लेकिन नौकरियां कहां हैं?

Employment : भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में जहां आर्थिक विकास की दर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, वहीं रोजगार की स्थिति अभी भी बदतर है. देश के आर्थिक आंकड़े भले ही सकारात्मक हों लेकिन इस का असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर नहीं दिखता. बढ़ती अर्थव्यवस्था के बावजूद रोजगार की कमी आज भी एक गंभीर और जटिल समस्या बनी हुई है. देश के अनएंप्लौयड वर्कफोर्स का चौंका देने वाला 83 फीसदी हिस्सा 15 से 29 वर्ष की आयु के बीच है.

दुनिया की सब से बड़ी युवा आबादी वाला भारत आर्थिक चौराहे पर खड़ा है. भारत रोजगार रिपोर्ट 2024 के आंकड़े परेशान करने वाली तसवीर पेश करते हैं. भारत हर साल लगभग 50 लाख ग्रेजुएट तैयार करता है. उन में से लगभग आधे खुद को बेरोजगार पाते हैं. इस का एक कारण है देश में एडवांस टैकक्नोलौजी और डिजिटलाइजेशन की वजह से काम के तरीके बदलना.

जैसेजैसे आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस और मशीन लर्निंग जैसे नए क्षेत्रों में वर्कफोर्स बढ़ा है, वैसेवैसे पुराने क्षेत्रों में नौकरियां घट रही हैं. युवा पीढ़ी में इन नए कौशलों की कमी ने रोजगार की समस्या को और बढ़ा दिया है.

बढ़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी के बीच संतुलन बैठाना चुनौतीपूर्ण काम है. इस के लिए सही दिशा में युवाओं के कौशल में निवेश, उद्योगों में निवेश और आजीवन सीखने की संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता है. अगर इस दिशा में सही प्रयास किए गए, तो न केवल विकास दर में वृद्धि होगी बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे, जिस से देश की आर्थिक स्थिति और मजबूत हो सकेगी.

Artifical Intelligence : एआई से कितनी आसान हुई लोगों की जिंदगियां

Artifical Intelligence : भारत में रोजमर्रा की जिंदगी के अलगअलग तरीकों से एआई और टैक्नोलौजी का इस्तेमाल तेजी से हो रहा है. स्मार्ट डिवाइसेज तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. कई कंपनियां एआई पावर्ड डिवाइसेज जैसे एयरकंडीशनर, वाशिंग मशीन व अन्य बहुतकुछ लौंच कर रही हैं.

हैल्थकेयर में एआई का इस्तेमाल पर्सनल ट्रीटमैंट के लिए किया जा रहा है. प्रैक्टो और पोर्टिया मैडिकल जैसे स्टार्टअप एआई संचालित टेलीमैडिसिन और होम हैल्थकेयर सेवाओं के क्षेत्र की शुरुआती कंपनियां हैं.

शिक्षा में भी एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है. बायजूज और वेदांतु जैसे एडटैक स्टार्टअप पर्सनलाइजड लर्निंग एक्सपीरियंस और रिमोट एजुकेशन जैसी सर्विस देने के लिए एआई का उपयोग कर रहे हैं.

इस के अलावा, फसल की पैदावार बढ़ाने, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने और खेती के तरीकों को बेहतर बनाने के लिए कृषि में भी एआई को अपनाया जा रहा है. क्रौपइन और आरएमएल एगटैक जैसे स्टार्टअप फसल निगरानी, मिट्टी की एनालिसिस और मौसम पूर्वानुमान के लिए एआई का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं.

एआई का प्रयोग औनलाइन शौपिंग में भी बढ़ रहा है. कस्टमर्स की पसंद और खरीदारी की आदतों को समझ कर वैबसाइट्स और ऐप्स बेहतर शौपिंग अनुभव दे रहे हैं. जैसे, मिंत्रा ऐप में खरीदारी करते समय आप घरबैठे उस आउटफिट का लुक अपनी बौडी पर चैक कर सकते हैं.

कुल मिला कर भारत में एआई और टैक्नोलौजी को अपनाने से रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव आ रहा है. स्मार्ट घरों और हैल्थ सर्विस से ले कर शिक्षा और कृषि तक सब जगह एआई का बोलबाला है.

Blinkit : लोगों की जेबों पर डाका डालतीं फास्ट डिलीवरी ऐप्स

Blinkit : भारत में एक अलग ही ट्रैंड देखने को मिल रहा है मिनटों में डिलीवरी का, जो एक गेमचेंजर माना जा रहा है. युवा दस मिनट की डिलीवरी के आदी हो रहे हैं. ये डिलीवरी ऐप्स उन की साइकोलौजी के साथ खेलती हैं, जिस से जरूरत न होने पर भी वे सामान खरीद रहे हैं. जानें क्या है उन की मार्केटिंग स्ट्रेटजी और कैसे लोग उन के जाल में फंसते जा रहे हैं.

संदीप अपने बौस का सब से फेवरेट एंप्लौई है. एक दिन उस ने अपने बौस को घर पर डिनर के लिए इनवाइट किया, क्योंकि कुछ ही दिनों में बेस्ट एंप्लौई का इन्क्रीमैंट होने वाला था. संदीप ने बौस को पटाने के लिए यह डिनर और्गेनाइज किया था. तय डेट पर बौस डिनर करने पहुंचे. संदीप की पत्नी ने काफी पकवान बनाऐ थे. लेकिन हड़बड़ी में बौस का फेवरेट डेजर्ट जलेबी लाना भूल गए. जब बौस ने फरमाइश की तो दोनों एकदूसरे को घूरने लगे. तभी संदीप की पत्नी ने जेप्टो कैफे, जो मात्र 10 मिनट में खाने की डिलीवरी कर देता है, से जलेबी मंगवा ली. जैसा कि ऐप का दावा है 10 मिनट में डिलीवरी, मात्र 10-11 मिनट में ही जलेबी घर पहुंच गई और संदीप की लाज रह गई.

इसी तरह घर में किसी सामान की जरूरत पड़ती है तो हम झट से ऐप खोल कर और्डर कर देते हैं और कुछ ही मिनटों में फल, सब्जियां, घर का कोई सामान या दवाएं सबकुछ हमारे दरवाजे तक पहुंच भी जाती हैं. कुछ कंपनियां तो 8-10 मिनट के भीतर डिलीवरी का दावा करती हैं, जो सच में एक रिकौर्ड बन गया है. सामान खोजने और और्डर करने में ज्यादा समय लगता है, डिलीवरी तो बस चुटकियों में हो जाती है. सामान घर पहुंचने पर हमें यह अच्छा लगता है कि बिना कहीं जाए घर बैठेबैठे हमारी जरूरत पूरी हो गई और ऊपर से कुछ छूट भी मिल गई. आखिर कौन नहीं चाहता कि घर बैठेबैठे उसे उस की जरूरत का सामान मिलता रहे वह भी मिनटों में.

बीते कुछ सालों में इंडिया में क्विक डिलीवरी का क्रेज तेजी से बढ़ता जा रहा है. क्विक कौमर्स की मदद से डिलीवरी करने का क्रेज इसलिए तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि कंज्यूमर्स जितनी जल्दी हो सके, अपने लिए डिलीवरी चाहते हैं.

लेकिन क्या आप ने कभी अपने पड़ोस के किराना स्टोर वाले अंकल के बारे में सोचा है? क्या आप को नहीं लगता कि औनलाइन शौपिंग कैसे हमारी आदतों को खराब कर रही हैं? सच यह है कि अब गलीमहल्ले के किराना स्टोर का काम प्रभावित होने लगा है.

क्विक कौमर्स को सफल बनाने में बहुत बड़ा रोल जेनजी और मिलेनियल्स का है. युवा पीढ़ी के लोग इस का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं. इस का कारण यह है कि युवा पीढ़ी को किसी भी चीज के लिए बहुत ज्यादा इंतजार करना पसंद नहीं है. ऐसे में वह कई बार कुछ एक्स्ट्रा पैसे दे कर भी सामान को जल्दी मंगाने को प्रायोरिटी देते हैं. वहीं लोग इस तरह भी देख रहे हैं कि कोई सामान लेने के लिए मार्केट जाना पड़ेगा, जिस में वक्त लगेगा और अगर गाड़ी से जाते हैं तो उस का पैट्रोल का खर्चा भी होगा. ऐसे में 10 मिनट में सामान घर पहुंच जाए तो इस से अच्छा क्या होगा.

इन ऐप्स की स्ट्रेटजीज मानसिकता को प्रभावित करने, खरीदारी के निर्णय को तेजी से लेने और कस्टमर्स को लगातार जुड़ा रखने के लिए डिजाइन की जाती हैं. ये ऐप्स अलगअलग साइकोलौजिकल टैक्टिस का इस्तेमाल करती हैं, जो ग्राहकों को ऐप्स से मैंटली जोड़ने के साथसाथ उन्हें बिजी रखती हैं. कुछ दिनों में होने वाली डिलीवरी अब ट्रेडिशनल हो चुकी है. भारत में अब फास्ट डिलीवरी का क्रेज बढ़ रहा है.

ये कंपनियां लोगों को प्रोमो कोड्स, एक्स्ट्रा डिस्काउंट, फ्री डिलीवरी, फ्री कैश जैसे ट्रैप में फंसाती हैं. जिस से कस्टमर्स को लगता है की जो सामान वे खरीद रहे हैं वह मार्केट से सस्ता भी है और घर तक डिलीवरी भी हो रही है तो क्यों न मंगवाया जाए. कंपनियों के ये औफर कुछ दिन तक ही सीमित होते हैं. तब तक ये लोगों को अपनी आदत डलवा देते हैं. अब कस्टमर छोटी चीज की जरूरत होने पर भी उस ऐप का इस्तेमाल करेगा ताकि कोई औफर मिल सके.

कंपनियों के डिस्काउंट और प्रोमो कोड्स लोगों में फोमो पैदा करते हैं. कंपनियां अपने औफर्स लिमिटेड समय तक रखती हैं. ऐसे में लोग बारबार ऐप चेक करते रहते हैं ताकि वे औफर मिस न कर दें और औफर मिलते ही जरूरत न होने पर भी और्डर कर देते हैं.

ऐसा ही हुआ रेखा के साथ. रेखा 12वीं क्लास में पढ़ती है. एग्जाम ख़तम हो गए थे तो उस ने अपने घर में स्कूल के दोस्तों का गेटटुगेदर रखा. सभी लोग आए. कुछ देर बात करने के बाद सब ने कार्ड्स खेलने का डिसाइड किया. लेकिन रेखा के पास कार्ड्स नहीं थे. ‘तो क्या हुआ! अभी ब्लिंकिट से मंगवा लेते हैं.’ रेखा के एक दोस्त ने कहा. ब्लिंकिट से कार्डस और्डर किए तो ऐप में नोटिफिकेशन आया कि 199 रुपए तक की शौपिंग करने पर फ्री डिलीवरी होगी. रेखा ने कुछ चिप्स और और्डर कर लिए ताकि डिलीवरी फ्री हो जाए और स्नैकिंग भी हो जाएगी. सबकुछ कार्ट में ऐड करने के बाद एक नोटिफिकेशन फिर से आता है कि 499 रुपए तक की शौपिंग करने पर 10 फीसदी की छूट मिलेगी. डिस्काउंट के लालच में रेखा काफी देर तक 500 रुपए तक का सामान खरीदने में जुट गई. रेखा ने कार्ड्स के साथ सारा गैरजरूरत का सामान खरीद लिया. इन सब में उसे 40 मिनट लग गए.

खुद सोचिए, यह कैसी फास्ट डिलीवरी हुई? एक 50-60 रुपए के सामान की जरूरत होने पर बैठेबैठे 500 रुपए तो ठंडे हुए ही, साथ में, समय की बरबादी भी हुई. यही इन कंपनियों की टैक्टिस है जो कस्टमर्स को अपने जाल में फंसाती जा रही है.

मौजूदा वक्त में भारत में क्विक कौमर्स सेगमैंट में 4 बड़े खिलाड़ी हैं- ब्लिंकइट, जेप्टो, बिग बास्केट और स्विगी का इंस्टामार्ट. इन की ग्रोथ काफी तेज हो रही है. ब्लिंकइट, जेप्टो और स्विगी का इंस्टामार्ट एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं. इसी के चलते वे औफर से ले कर कैशबैक तक दे रहे हैं और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना चाह रहे हैं. बात अगर इन के मार्केट शेयर की करें तो अभी सब से ज्यादा करीब 40 फीसदी मार्केट शेयर ब्लिंकइट के पास है. वहीं इंस्टामार्ट के पास 25 फीसदी और जेप्टो के पास करीब 29 फीसदी मार्केट है. इन के अलावा बिग बास्केट के पास करीब 10 फीसदी मार्केट है.

ब्लिंकइट के पास सब से ज्यादा मार्केट शेयर है, जिस की एक बड़ी वजह यह भी है कि वह सिर्फ ग्रोसरी या सब्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि आईफोन, प्लेस्टेशन, फैन, प्यूरिफायर जैसे तमाम चीजों की डिलीवरी भी 10 मिनट में कर रहा है. लेकिन इस मामले में अब बाकी ऐप्स भी पीछे नहीं. कई मोबाइल फोन ब्रैंड्स ने जेप्टो, स्विगी समेत कई फास्ट डिलीवरी ऐप्स के साथ पार्टनरशिप की है. अब मात्र 10 मिनट में मोबाइल फोन भी आप के दरवाजे पहुंच जाएगा.

लोगों तक पहुंचने की होड़ में कंपनियां यहां तक ही सीमित नहीं रहीं बल्कि अब 15 मिनट में खाना भी और्डर कर सकते हैं. ब्लिंकिट, इंस्टामार्ट और जेप्टो की सफलता ने बाकी ईकौमर्स प्लेयर्स को क्विक कौमर्स स्पेस में एंट्री करने के लिए मजबूर किया है. फ्लिपकार्ट ने ‘मिनट्स’ लौंच किया, मिंत्रा ने ‘एमनाउ’ पेश किया, अमेजन ने ‘तेज’ की टेस्टिंग शुरू कर दी है. अब ये ऐप्स भी फास्ट डिलीवरी रेस में शामिल हो चुकी हैं.

बता दें कि कुछ समय पहले तक जेप्टो कुछ ही इलाकों में अपनी सर्विस देता था. कुछ महीने पहले उस ने लगभग हर इलाके में अपनी सर्विस देना शुरू कर दिया. लोगों तक अपनी रीच बढ़ाने के लिए जेप्टो ने आधे दामों पर सामान बेचना शुरू कर दिया. यही नहीं, अपने कस्टमर्स के लिए 125 रुपए तक की छूट भी दी. लोगों ने इस स्कीम का जम कर फायदा उठाया. इस तरह की स्कीम्स का लौलीपौप दे कर जेप्टो ने कई कस्टमर्स को अपनी ओर खींचा.

इन ऐप्स की मदद से लोगों को घरबैठे सुविधा मिल रही है. मिनटों में आप की जरूरत के हिसाब से आप के दरवाजे तक डिलीवरी हो रही है. धनिया से ले कर घर का हर सामान और यहां तक कि आईफोन भी मिल सकता है. इन सर्विसेज ने न सिर्फ लोगों के समय की बचत की है बल्कि उन के काम को आसान बनाया है. लेकिन ये लोगों के दिमाग के साथ अच्छी तरह खेलना जानते हैं. चंद फीसदी डिस्काउंट का झांसा दे कर ये अपने कस्टमर्स से हिडन फीस वसूलते हैं, जिसे पैकेजिंग फीस, सर्ज फीस, प्लेटफौर्म फीस आदि का नाम दिया जाता है. मैंबरशिप का लौलीपौप दिया जाता है कि इस से आप को फ्री डिलीवरी व अन्य फायदे होंगे. जबकि, असल में ऐसा कुछ नहीं होता.

यह जाल इतना बड़ा है कि कम्युनिकेशन गैप भी आज एक बड़ी समस्या बन चुका है. गलीमहल्ले के किराना स्टोर को किसी समय दोस्तों, पड़ोसियों के गपशप का केंद्र माना जाता था. रोजाना सिर्फ दूध या ब्रेड के लिए ही नहीं, बल्कि दोस्ताना चेहरों और पड़ोसियों की बातचीत के लिए भी लोग रुकते थे. मुश्किल समय में ये किराना वाले उधार भी कर देते थे. घर से बाहर निकल कर जब हम चार लोगों से बातचीत करते हैं तो मन का तनाव भी कम होता है. लेकिन इन प्लेटफौर्म्स के आने के बाद से लोग एंटीह्यूमन सा बन गए हैं.

ये कंपनियां अब डाटा माइनिंग भी करने लगी हैं. इस का मतलब यह होता है कि जब आप गूगल पर किसी आइटम के बारे में सर्च करते हैं, कौल या मैसेज में अपने किसी दोस्त से किसी प्रोडक्ट के बारे में डिस्कस करते हैं तो ये कंपनियां हमारी एक्टिविटीज पर नजर रखती हैं और फिर उन्हीं चीजों का विज्ञापन हमें दिखाती है. ये लोगों को उसे खरीदने के लिए उत्सुक करती हैं. और लोग उसे खरीद भी लेते हैं. यह सभी इन फास्ट डिलीवरी एप्स की मार्केटिंग स्ट्रेटजी है.

Social Media : इन्फ्लुएंसर हर्षा रिछारिया पर आध्यात्म प्रदर्शन पड़ा भारी

Social Media : हर्षा रिछारिया सोशल मीडिया पर अचानक तब वायरल हो गई जब वह कुंभ में वीडियोज बनाने लगी. कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने कुंभ को वह ग्राउंड बनाया जहां से वे अपनी रीच बढ़ा सकते थे. इसी में हर्षा का नाम भी जुड़ता है.

4 जनवरी, 2025 को महाकुंभ के लिए निरंजनी अखाड़े की पेशवाई निकली थी. उस वक्त 30 साल की मौडल हर्षा रिछारिया संतों के साथ रथ पर बैठी नजर आई थीं.

पेशवाई के दौरान हर्षा रिछारिया से पत्रकारों ने साध्वी बनने पर जब सवाल किया तो उन का जवाब था, ‘मैं ने सुकून की तलाश में यह जीवन चुना है. मैं ने वह सब छोड़ दिया जो मुझे आकर्षित करता था.’

इस के बाद हर्षा सुर्ख़ियों में आ गईं. वे ट्रोलर्स के भी निशाने पर हैं. मीडिया चैनलों ने उन्हें ‘सुंदर साध्वी’ का नाम दे दिया. हर्षा ने मीडिया के सामने सफाई दी कि वे साध्वी नहीं हैं, केवल शिक्षा ग्रहण कर रही हैं. भक्ति और ग्लैमर में कोई विरोधाभास नहीं है.

वे बोलीं, ‘मैं ने अपनी पुरानी तसवीरों के बारे में स्पष्ट किया है. अगर मैं चाहती तो उन्हें डिलीट कर सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया. यह मेरी यात्रा है. मैं युवाओं को बताना चाहती हूं कि किसी भी मार्ग से आप भगवान की ओर बढ़ सकते हैं.’

जब मीडिया ने उन्हें टारगेट करना शुरू कर दिया और संगम में शाही स्नान को ले कर उन पर विवाद हुआ तो मीडिया के सामने वे रोते हुए अपनी सफाई देती नजर आईं, बोलीं, ‘अब बहुत हो रहा है. मैं ने सोचा था कि 144 साल बाद यह पूर्ण महाकुंभ आया है. मैं बहुत सी उम्मीदें ले कर आई थी. शायद यह जिंदगी का पहला और आखिरी पूर्ण महाकुंभ है. मैं ने सोचा था कि पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में धर्म, संस्कृति और कुंभ के बारे में जानूंगी.

‘युवा होने के नाते मैं ने सोचा था कि ऐसे संतों से मिलूंगी जो आम लाइफ से बहुत दूर रहते हैं. हमारे यहां विदेशी आ रहे हैं, हम वाहवाही कर रहे हैं. लेकिन भारतीय बेटी के लिए तरहतरह की बातें की जा रही हैं. विवादों में घेरा जा रहा है. ऐसे में कष्ट तो होगा ही.’

आजकल मीडिया में छाई हर्षा मध्य प्रदेश के भोपाल की रहने वाली हैं लेकिन उत्तराखंड में रहती हैं. इन के इंस्टाग्राम पर 10 लाख से अधिक फौलोअर्स हैं. पिछले 2 वर्षों से हर्षा इंस्टा पर धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों से जुड़े कंटैंट साझा करने लगी हैं. वे अपने इंस्टा प्रोफाइल पर खुद को ‘कट्टर हिंदू सनातनी शेरनी’ के रूप में प्रस्तुत करती हैं और सनातन धर्म के प्रचारप्रसार में सक्रिय हैं.

दो साल पहले हर्षा ने एंकरिंग व अभिनय में हाथ अजमाया, मगर उन की दाल गल नहीं पाई. हताशा और असफलता के चलते कुछ समय से वे पीले वस्त्र, रुद्राक्ष माला और माथे पर तिलक धारण करती दिखी हैं. वे निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि महाराज की शिष्या हैं और मौडलिंग के कैरियर से आध्यात्मिकता की ओर रुख किया ठीक उसी तरह जैसे हाल में कभी खूबसूरत ऐक्ट्रैस रही ममता कुलकर्णी ने किन्नर अखाड़ा से जुड़ कर साध्वी बन गईं.

वैसे हर्षा ने बीबीए की पढ़ाई की और 19 साल की उम्र से मौडलिंग और एंकरिंग शुरू की. हर साल वे केदारनाथ दर्शन के लिए जाती हैं. यहां इन्होंने कई रील्स बनाई हैं. उन्हें पता है, धर्म को कैसे यूज करना है. सोशल मीडिया पर वायरल होने के तुरंत बाद नेटिजेंस ने वैस्टर्न कपड़ों में हर्षा की तसवीरें पोस्ट कर डालीं. उन्हें नकली साध्वी कहा और महाकुंभ में भारी मेकअप पर ट्रोल किया. दरअसल, वे बात तो संन्यासी बनने की कर रही थीं मगर आईब्रो व अपरलिप्स थ्रेडिंग कर, मेकअप कर, चमचमाती साड़ी पहनी ऐसी लग रही थीं जैसे कोई फिल्मी सितारा संगम घूमने आई हो.

सोशल मीडिया के एक यूजर ने कहा, ‘अगर वे 30 साल की उम्र में संन्यासिनी बन गई हैं तो कुंभ में इतना दिखावा और इतना अधिक मेकअप करने की जरूरत क्या है? क्या वे इंद्र के दरबार में जा रही हैं?’

इन सब बातों पर गौर करें तो सवाल यह उठता है कि क्या उन की साध्वी वेशभूषा दिखावा भर है ताकि धर्म के नाम पर उन के फौलोअर्स बढ़ें? क्या यह सोशल मीडिया लोकप्रियता बढ़ाने का साधन था? क्या वे केवल अपनी ब्रैंडिंग और छवि बनाने में लगी हुई थीं?

आजकल कई धार्मिक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर अचानक उग आए हैं. ये धर्म की बड़ीबड़ी बातें करते हैं. लोगों को आध्यात्मिक रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं लेकिन इस बहाने ये अपने फौलोअर्स व पैसे ही जुटा रहे होते हैं.

हर्षा के इंस्टाग्राम पर 20 लाख से अधिक फौलोअर्स हैं. वे अब तक 2 हजार से अधिक पोस्ट कर चुकी हैं. फौलोअर्स और पौपुलैरिटी के लिए इन्होंने जो एक स्पैशल इमेज बनाई है वह इन के निजी जीवन से मेल खाती है.

अपने प्रोफाइल में वे खुद को कट्टर सनातनी बताती हैं मगर धार्मिकता और आध्यात्मिकता को प्रचार का साधन बनाना, कट्टरता फैलाना या एकतरफा विचारधारा थोपना खतरनाक हो सकता है. इन के फौलोअर्स को भी यह समझना चाहिए कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चीज वास्तविक और प्रभावशाली नहीं होती है.

Emotional Story : ओढ़ी हुई दीवार – अखबार में क्या खबर छपी थी

Emotional Story : नजर बारबार उस फोटो फ्रेम से जा कर उलझ जाती है जिस के आधे हिस्से में कभी एक सुंदर सी तसवीर दिखाई देती थी, मगर अब वह जगह खाली पड़ी है. उस ने कई बार चाहा कि वह उस फोटो फ्रेम में कोई दूसरी तसवीर लगा कर वह रिक्तता दूर कर दे. मगर चाह कर भी वह कभी ऐसा नहीं कर सकी, क्योंकि वह जानती थी कि ऐसा करने से वह खालीपन दूर होने वाला नहीं. वह खालीपन उस नई तसवीर के पीछे से भी झांकेगा, कहकहे लगाएगा और कहेगा, ‘तुम कायर हो, तुम में इतनी हिम्मत नहीं कि इस खालीपन को दूर कर सको.’

आज भी स्टील का वह फोटो फ्रेम ममता की मेज पर उसी तरह पड़ा है. उस में एक तरफ ममता की फोटो लगी हुई है कुछ लजाते हुए, कुछ मुसकराते हुए, आंखें बिछाए जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रही हो. और आज भी वह वैसे ही प्रतीक्षा में आंखें बिछाए बैठी है, ठीक उस फोटो फ्रेम वाली तसवीर की तरह. अभी 3, साढ़े 3 साल ही तो बीते हैं, जब फोटो फ्रेम के उस खाली हिस्से में प्रभात की भी तसवीर दिखाई देती थी. आज तो यह नाम भी जैसे अंदर तक चीर जाता है. यही नाम तो है जो इतने सालों से उसे सालता रहता है. एकाएक कार के हौर्न से उस का ध्यान टूट गया. यह हौर्न बगल वाले कमरे की चंचल और शोख किम्मी के लिए था. इसी तरह होस्टल की हर लड़की का कोई न कोई चाहने वाला था.

कभीकभी ममता को भी लगता, काश, इन में से एक हौर्न उस के लिए भी होता. उसे इस होस्टल में रहते हुए पूरे 2 साल होने को आए थे. आज से 2 साल पहले जब वह इस नए शहर के एक स्कूल में अध्यापिका हो कर आई थी तो उस की अकेली रहने की समस्या इस होस्टल ने पूरी कर दी थी, जहां उस के समान कितनी ही लड़कियां, शायद लड़कियां नहीं, औरतें, रहा करती थीं. यहां किसी का भी भूतकाल पूछने की पद्धति नहीं थी. सभी वर्तमान में जीती थीं. वह भी किसी तरह अपने दिन गुजार रही थी. खैर, दिन तो किसी तरह गुजर जाते थे, मगर रातें, न जाने कहां से ढेर सारा सूनापन किसी भयानक स्वप्न की तरह आ घेरता. ऐसे क्षणों में उसे किसी ऐसे साथी की आवश्यकता महसूस होने लगती जो उस के दिनभर के सुखदुख को बांट सके. ऐसे नाजुक क्षणों में उसे महसूस होता कि नारी सचमुच पुरुष के बिना कितनी अधूरी है. उसे किसी साथी की आवश्यकता है क्योंकि यह उस के मन की, उस के शरीर की आवश्यकता है. सब आवश्यकताओं की पूर्ति तो वह कर सकती है, मगर यह आवश्यकता? और तब उसे प्रभात की आवश्यकता महसूस होने लगती.

उसे लगता जैसे अभी दरवाजे को लात से ठेलता हुआ प्रभात उस कमरे में आ जाएगा और बड़े प्यार से कहेगा, ‘अरे, मुन्मु, तू यहां बैठी है. चल, उठ, देख मैं ने तेरे लिए अपने दोस्त से कह कर लोनावला की चिक्की मंगाई है. चल, अब बहुत हो चुका रूठना, अच्छे बच्चे ज्यादा जिद नहीं किया करते.’ और इतने अवसाद के क्षणों में भी उस के मुंह में चिक्की का स्वाद उभर आता. वह तो ससुराल में भी सारी लाज छोड़ कर घर के सामने से गुजरते हुए चिक्की वाले को रोक लेती थी. कभीकभी उसे लगता जैसे प्रभात उसी के पलंग पर बाजू में लेटा है और उस का हाथ अपने हाथों में ले कर अपने नाखूनों से उस के पौलिश लगे बड़ेबड़े नाखून रगड़ रहा है. यह उस की हमेशा की आदत थी. कभीकभी तो वह नाखून पकड़ कर तोड़ने की कोशिश करने लगता और वह दर्द से चीख उठती. इस पर भी वह हाथ न छोड़ता और अधिक चीखने पर कहता, ‘तुम्हारे पिताजी ने ये हाथ अब मुझे सौंप दिए हैं. अब ये मेरी चीज हैं, मैं जो चाहूं करूं.’

इस पर वह झूठमूठ रूठते हुए हाथों से उस के सीने को पीटने लगती, अंत में सीने से चिपट जाती. अब ये बातें सोचतेसोचते उस की आंखें भर आतीं और उस की उंगलियों में एक कसक उठने लगती है. उस का गला रुंध जाता और मन करता कि वह किसी के सीने से लग कर बहुतबहुत रोए. मगर इस समय उसे सीने से लगाने के लिए केवल तकिया ही मिलता और सचमुच उस का तकिया आंसुओं से भीग जाता. से अभी तक याद है, यह तसवीर फोटो फ्रेम में प्रभात ने स्वयं ही लगाई थी. शादी के कुछ ही दिनों बाद दोनों ने अलगअलग तसवीरें खिंचवाई थीं. न जाने क्यों वह उस के साथ तसवीर उतरवाने को तैयार नहीं हुआ था. वह भी नईनवेली होने के कारण ज्यादा कुछ बोल नहीं पाई थी. यह तो खुद फोटोग्राफर ने ही कहा था कि साहब, तसवीर तो इकट्ठी ही अच्छी लगती है. मगर न जाने क्यों उस ने साफ इनकार कर दिया था. वह उस के इनकार का कारण नहीं समझ सकी थी, न ही उसे कुछ पूछने की हिम्मत ही हुई थी.

मगर यह फोटो फ्रेम वह स्वयं ही खरीद कर लाया था और अपने ही हाथों से वे दोनों तसवीरें लगा कर मेज पर रखते हुए बोला था, ‘लो, अब तो हो गए न दोनों साथसाथ. अरे, लोगों को यह दिखाने की क्या आवश्यकता है कि हम में कितना प्रेम है? प्रेम भी भला कोई बताने की चीज है?’ इस घटना से ममता को प्रभात रूखे स्वभाव का अरसिक व्यक्ति ही लगा था. पर उस ने सोचा था कि वह उस का वह रूखापन कुछ ही दिनों में अपने प्रेम द्वारा दूर कर देगी जो उस में संभवतया अकेलेपन के कारण आ गया हो. मगर ममता ने कभी यह नहीं सोचा था कि उस का यही रूखापन उस के लिए दुख का कारण भी बन सकता है. वह हर शाम उस का बेकरारी से इंतजार करते हुए अपने कमरे की खिड़की पर खड़ी रहती, जो सीधे सामने की सड़क पर खुलती थी. मगर प्रभात उस की ओर ध्यान दिए बिना ही मां को आवाज देता हुआ दवाई, फल आदि देने सीधे उन के कमरे में चला जाता. वहीं से वह रसोईघर में जा कर भाभी के पास बैठ कर चाय पीता और तब कहीं जा कर कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में आता.

ममता दिनभर सोचा करती थी कि आज वह उस से खूब बातें करेगी या फिर कहीं बाहर घूमने के लिए चलने की फरमाइश करेगी. मगर वह केवल दोचार बातें पूछ कर और कपड़े बदल कर दोस्तों की चौकड़ी में बैठने निकल जाता. एकदो बार उस ने हिम्मत कर के कहा भी, मगर वह हमेशा कोई न कोई बहाना बना कर टाल जाता. रात को भी वह देर से घर आता और खाना खा कर सो जाता. मगर जब कभी मौज में होता तो उसे रात दोदो बजे तक सोने ही न देता. कुल मिला कर वह उस के लिए एक उपेक्षित खिलौना बन कर रह गई थी, जिस से बच्चा कभी दिल बहला लिया करता है. अपने प्रति प्रभात की इस उपेक्षा का कारण ढूंढ़ने पर ममता इस परिणाम पर पहुंची कि यह सब उस के मांबाप और भाभी के कारण ही है, जिन के अत्यधिक लाड़प्यार में वह बचपन से डूबा रहा है और अभी तक उबर नहीं पाया है. उसे प्रभात को अपनी ओर आकृष्ट करने और उस का प्यार पाने का उपाय यही सूझा कि उसे उस के मांबाप से अलग कर दिया जाए.

दिमाग में इन विचारों के घर करते ही उस ने त्रियाचरित्र के सारे फार्मूले आजमाने शुरू कर दिए. कभी वह मां पर बिगड़ पड़ती तो कभी भाभी पर. और उस के इस तांडव ने घर में कलह मचा कर रख दी. मगर प्रभात पर इन सब बातों का विपरीत ही प्रभाव पड़ा. वह ममता से और अधिक दूर रहने लगा. आखिर हार कर उस ने स्त्रियों का आखिरी अस्त्र इस्तेमाल किया और तुनक कर अपने मायके जा बैठी. मायके से लौटने की उस ने यही शर्त रखी कि प्रभात को मांबाप से अलग घर ले कर रहना होगा, जिसे प्रभात ने कभी स्वीकार नहीं किया. इस से ममता को और ठेस लगी. फिर भी वह अपनी जिद पर अड़ी रही. उस की यही जिद उसे ले डूबी. यहां तक कि वकील के नोटिस का जवाब भी प्रभात ने नहीं दिया और मामला कोर्ट तक जा पहुंचा. वह अपने ही रचे गए चक्रव्यूह में खुद फंस गई. इधर इस मामले को ममता के भाइयों ने अपनी इज्जत का सवाल बना लिया और वे कचहरी की दीवारों से सिर मारने लगे. इस कांड ने उस के जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन ला दिया जिस की उसे कल्पना भी नहीं थी. जिंदगी इतनी जटिल है, यह उस ने पहली ही बार जाना. किसी तरह उस के भाइयों ने उसे अध्यापिका की यह नौकरी दिला दी थी. मगर वह अपने घर से बाहर नहीं जाना चाहती थी. उसे अपने इस निष्कासन का अर्थ तभी मालूम हुआ जब उस के बड़े भाई ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा था, ‘ममता, शादी के बाद बेटी के लिए पिता का घर पराया हो जाता है. तुम ने सुना ही होगा कि बेटी की डोली और अरथी में कोई फर्क नहीं होता.’

उस दिन के बाद उसे अपना वह घर, जिस में उस ने सारा बचपन बिताया था, पराया लगने लगा था. उसे अपने भाई के इन उपदेशों में अपने सिर का बोझ उतारने का भाव ही नजर आया था और इसीलिए उस ने यह नौकरी सहर्ष स्वीकार कर ली थी. परिवर्तन का दूसरा झटका उसे तब लगा था जब उसे आवेदनपत्र में अपना नाम लिखना पड़ा था. आखिर वह क्या लिखे : श्रीमती ममता अथवा कुमारी ममता? समाज के कानून बनाने वालों ने विवाहित अथवा अविवाहित और विधवा के लिए तो नियम बनाए थे, मगर इस बीच की स्थिति पर शायद किसी ने भी विचार नहीं किया था. पिछले 2 सालों से उस के कानों में कोर्ट में ऊंचे स्वर में पुकारा जाने वाला नाम ही गूंजता रहा था- ममता देवी विरुद्ध प्रभात कुमार. किसी ने भी उस के नाम के आगेपीछे कुछ नहीं लगाया. वहां तो सारा उपक्रम इन दोनों नामों को अलग करने के लिए ही किया जाता रहा. अखबार में छपने वाली तलाक की खबरें, जिन्हें पढ़ कर वह पहले कभी हंसा करती थी, अब खुद उसे एक बिगड़ती हुई जिंदगी का एहसास दिलाने लगीं. अब किसी भी दशा में वह उन पर हंस नहीं पाती थी. उसे अब महसूस होने लगा था कि अपनेआप को प्रगतिशील कहने वाली, नारी मुक्ति आंदोलन की बड़ीबड़ी बातें बघारने वाली नारियां भी किसी पुरुष की छाया पाने के लिए कितनी लालायित रहती हैं.

उस रोज बसस्टौप वाली घटना से तो उस का यह विश्वास और भी दृढ़ हो गया था. उस रोज वह सीताबड़ी मेन बसस्टौप पर शंकरनगर से आने वाली बस के लिए लाइन में खड़ी थी. बस आने में अभी देर थी और बसस्टौप पर भीड़ ज्यादा थी. वह लाइन में खड़ी बोरियत दूर करने के लिए अपने बैग में रखी पत्रिका के पन्ने पलटने लगी थी कि तभी एक मनचला युवक उसे धक्का देता हुआ आगे बढ़ गया. इस पर बिफरते हुए वह बोली थी, ‘आंखें नहीं हैं या तमीज नहीं है? बिना धक्का दिए चला ही नहीं जाता, शोहदा कहीं का.’ इस पर वह युवक भी उद्दंडता से बोल उठा था, ‘मेमसाहब, यह आप का घर नहीं है, बसस्टैंड है. यहां भीड़ होती ही है, और भीड़ में धक्के भी लगते ही हैं. यदि इतनी ही रईसी है तो टैक्सी में सफर किया कीजिए, बस आम जनता के लिए है, समझीं?’

उसे ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी. इस बात पर आसपास खड़े कुछ युवक हंस पड़े थे. उसे कुछ जवाब देते नहीं बना तो वह लाइन से निकल कर बसस्टैंड छोड़ कर सड़क पर आ गई. उस अपमान को वह बड़ी मुश्किल से पी सकी थी. उस रोज उसे प्रभात की याद हो आई थी जब उस ने एक युवक को उस के पर्स में हाथ डालने के शक में भरी भीड़ में पीट दिया था. उस दिन उसे लगा कि एक अकेली स्त्री किसी पुरुष के बिना उस बेल की तरह है जो बिना सहारे के जमीन पर पड़ी लोगों के पैरों तले कुचल दी जाती है. बेल को यदि पैरों तले रौंदे जाने से बचाना है तो उसे कोई न कोई सहारा चाहिए ही, चाहे उसे गुलाब के कांटेदार पौधे का सहारा ही क्यों न मिले. फिर भले ही उस का बदन छिलता रहे, मगर वह कुचले जाने से तो बची रहेगी. साथ ही, कभीकभी ही सही, गुलाब की खुशबू भी तो मिलेगी.

इन्हीं विचारों की ऊहापोह में उस ने निश्चित कर लिया कि वह प्रभात के बिना नहीं रह सकती. इस तरह तिरस्कृत जिंदगी जीने से तो बेहतर वही जिंदगी थी. कम से कम सिर पर रक्षा का छत्र तो था. भले ही थोड़ी उपेक्षा सहनी पड़े और अब तो शायद थोड़ा अपमान भी, मगर कभीकभी प्यार भी तो मिलेगा. जगहजगह अपमानित हो कर भटकने से तो यही बेहतर है कि थोड़ी उपेक्षा सह ली जाए और उस ने प्रभात के आगे आत्मसमर्पण करने का निर्णय ले लिया. वह उसे पत्र लिखेगी कि वह आ रही है, वह उसे स्टेशन पर लेने आ जाए.

सुबह की व्यस्तता ने उस के पत्र लिखने के निर्णय को शाम पर टाल दिया. दिनभर वह अनमने भाव से ढीलेढीले हाथों से ब्लैकबोर्ड पर चाक चलाती रही. शाम को थक कर चूर हो जब वह होस्टल की सीढि़यां चढ़ रही थी तभी मोबाइल पर आया मैसेज देखा. भाई ने भेजा था, लिखा था :

‘‘प्रिय बहन,

‘‘बधाई हो, हम लोग कोर्ट में केस जीत गए हैं. अब तुम सदासदा के लिए प्रभात से मुक्त हो गई हो. अब तुम्हें कभी उस का अपमान सहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. तुम्हारा तलाक मंजूर हो गया है.’’ मोबाइल उस के कांपते हाथों से फिसल कर नीचे गिर गया. उस का सिर चकराने लगा और वह पलंग पर औंधी गिर पड़ी. उस के धक्के से पास ही मेज पर रखा फोटो फ्रेम गिर पड़ा और उस का शीशा चूरचूर हो गया और फोटो फ्रेम में एक ओर लगी उस की तसवीर बाहर निकल आई. वह फफकफफक कर रो पड़ी. उस का जीवन भी तो अब उस खाली फोट फ्रेम के समान ही रह गया था- रिक्त, केवल एक शून्य. वह अपनी ही ओढ़ी हुई दीवार के नीच दब कर रह गई थी.

Love Story : आगाज – क्या ज्योति को उसका प्यार मिला

Love Story : ज्योति ने अपने जीवन में जितना अधिक प्रेम को पाना चाहा उतना ही वह तड़पती रही. प्रेम की डगर पर उठने वाले कदम चार होते थे लेकिन, हमेशा प्यार और पार पाने वाले केवल दो ही क्यों रह जाते थे? कहानी द्य प्रेमलता यादु ‘‘क्यातुम मेरे इस जीवनपथ की हमराही बनना चाहोगी? क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’ प्रकाश के ऐसा कहते ही ज्योति आवाक उसे देखती रही. वह समझ ही नहीं पाई क्या कहे? उस ने कभी सोचा नहीं था कि प्रकाश के मन में उस के लिए ऐसी कोई भावना होगी. उस के स्वयं के हृदय में प्रकाश के लिए इस प्रकार का खयाल कभी नहीं आया. कई वर्षों से दोनों एकदूजे को जानते हैं. दोनों ने संग में न जाने कितना ही वक्त बिताया है. जब भी उसे कांधे की जरूरत होती.

प्रकाश का कंधा सदैव मौजूद होता. ज्योति अपनी हर छोटी से छोटी खुशी और बड़े से बड़ा दुख इस अनजान शहर में प्रकाश से ही साझा करती. उन दोनों की दोस्ती गहरी थी. जबजब ज्योति किसी रिलेशनशिप में आती तो प्रकाश को बताती और जब ब्रेकअप होता तब भी वह प्रकाश से ही दुख जाहिर करती. उस का यह पहला ब्रेकअप नहीं था. लेकिन दिल तो इस बार भी टूटा था. हां, दर्द जरूर थोड़ा कम था. यह सब जानते हुए प्रकाश का आज इस तरह शादी के लिए प्रपोज करना उसे उलझन में डाल गया. वह अपनी कौफी खत्म किए बिना और प्रकाश से कुछ कहे बगैर औफिस कैंटीन से अपने चैंबर में लौट आई. प्रकाश ने भी उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की. ज्योति विचारों के गिरह में उलझने लगी थी. मरुस्थल के गरम रेत पर चलते हुए ज्योति के पैरों में फफोले आ चुके थे. मृगतृष्णा की तलाश में न जाने वह कब से अकेली भटक रही थी. जिस अमृतरूपी प्रेम का वह रसपान करना चाहती थी, वह प्रेम उसे हर बार एक विष के रूप में मिला. बचपन में मां को खोने के बाद लाड़प्यार को तरसती रही.

सौतेली मां का दुर्व्यवहार और दबाव इतना था कि पिता भी उसे दुलार करने से डरते. ज्योति का सारा बचपन मातापिता के स्नेह से वंचित रहा. फिर जब उसे जिंदगी को अपने ढंग से जीने का अवसर मिला, वह आंखों में रंगीन सपने लिए इस महानगरी मुंबई में आ पहुंची. यहां उसे लगने लगा उस की सच्चे प्यार और जीवनसाथी की तलाश जरूर पूरी होगी. लेकिन जब भी उसे ऐसा लगा कि उस ने अपना सच्चा प्यार पा लिया है, अगले ही पल वह प्रेम, वासना में तबदील हो गया. यों, आज जब प्रकाश उस के सामने एक सच्चे प्यार के रूप में खड़ा है वह क्यों उसे स्वीकार नहीं करना चाह रही? कारण शायद साफ था कि अब वह टूटना नहीं चाहती. मन में चल रही उलझनों को सुलझाने के लिए सिगरेट सुलगा वह धुआं उड़ाने लगी. धीरेधीरे पूरा पैकेट खत्म होने लगा लेकिन इस धुएं में गुत्थियां खुलने के बजाय उलझने लगीं तो वह धुआं उड़ाती हुई अतीत की गलियों में मुड़ गई. जब उस ने अपने छोटे शहर पटना से एमबीए कर असिस्टैंट मैनेजिंग डायरैक्टर के पद पर इस जगमगाती कौर्पोरेट दुनिया में अपना पहला कदम रखा था.

उस दिन से ही वह प्रकाश को जानती है. लेकिन प्रकाश से प्यार… नहीं. नहीं. प्रकाश उस के दिल के बहुत करीब जरूर है लेकिन वह उस से प्यार नहीं करती. प्रकाश उस का सब से अच्छा और सच्चा मित्र है. उस का पहला प्यार तो पीयूष है, जिसे वह दिल की गहराइयों से चाहती थी और वह भी तो उस का दीवाना था. पीयूष के प्यार में वह इस कदर पागल थी कि दुनिया की परवा करना छोड़ चुकी थी. पीयूष जैसे लड़के की ही तमन्ना उसे थी. जब उसे देखती तो उस की आंखों में डूब जाती. हमउम्र थे दोनों. उस की हर बात ज्योति को दीवाना कर देती. इस पागलपन में उस ने कब अपना सबकुछ उसे समर्पित कर दिया, उसे पता ही नहीं चला. जब होश आया तब तक सब लुट चुका था और पीयूष का असली चेहरा सामने था. पीयूष ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा था, ‘ज्योति, मैं तुम से प्यार तो करता हूं लेकिन मैं अपने मातापिता के विरुद्ध जा कर तुम्हारा साथ नहीं निभा सकता.’ यह सुनते ही ज्योति के जीवन में सैलाब आ गया था. पीयूष उस का पहला प्यार था जिसे वह अब खो चुकी थी. उस वक्त एक प्रकाश ही था जिस ने उसे इस हलाहल में डूबने से बचाया था. यह सब सोच ज्योति को घुटन महसूस होने लगी.

वह घबरा कर खुली हवा में सांस लेने टैरेस पर जा खड़ी हुई. रात गहरी और काली थी. इस से पहले उसे रात इतनी डरावनी कभी नहीं लगी. रोड पर इक्कादुक्का वाहनों की आवाजाही थी. दिन में कोलाहल से भरा यह शहर यामिनी की गोद में सो रहा था, लेकिन ज्योति के नयनों में निद्रा कहां? उस के मन में तो हलचल मची हुई थी. पीयूष से मिली बेवफाई के बाद उस ने निश्चय कर लिया कि अब वह कभी किसी से प्यार नहीं करेगी, किसी पर विश्वास नहीं करेगी. अपने इन्हीं विचारों के साथ जब वह आगे बढ़ चली तभी उस के दिल के किवाड़ पर आयुष नाम की दस्तक हुई और एक बार फिर उस ने अपने दिल का दरवाजा खुलेमन से खोल दिया. लेकिन इस बार वह पूर्णरूप से सतर्क थी. धीरेधीरे उसे लगने लगा आयुष का प्रेम जिस्मानी नहीं. लेकिन यह भी भ्रम मात्र था. असल में आयुष का लक्ष्य भी उस के शरीर को ही पाना था. वह मौके की तलाश में था. ज्योति जब उस की असलियत से रूबरू हुई तो दोनों के रास्ते जुदा हो गए और इस बार फिर दिल ज्योति का ही टूटा.

हलकीहलकी ठंड लगने लगी, परंतु ज्योति टैरेस पर ही खड़ी रही. उसे याद है किस तरह आयुष से ब्रेकअप के बाद अवसाद ने उसे अपनी गिरफ्त में इस प्रकार जकड़ा था कि वह सिगरेट और शराब में अपनेआप को डुबोने लगी. इस वजह से औफिस में उस का परफौर्मैंस ग्राफ गिरने लगा. उस वक्त भी प्रकाश ही था जिस ने उसे इस परिस्थिति से उभारा. तब उस के मन में प्रकाश के लिए सम्मान और बढ़ गया. साथ ही साथ, मन के एक कोने में प्रेम का बीज भी अंकुरित होने लगा जिसे वह दफना देना चाहती थी क्योंकि वह प्रकाश को खोना नहीं चाहती और न ही वह अपनेआप को उस के काबिल समझती है. यही कारण है कि उस ने अब तक प्रकाश से कुछ नहीं कहा. आयुष के बाद चिराग पतझड़ में वसंत की बहार बन कर आया, जो उस की सारी सचाई जानते हुए उसे अपनाना चाहता था. लेकिन, उस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि चिराग की यह शर्त थी कि उसे अपने अतीत के साथसाथ प्रकाश को भी हमेशा के लिए भुला उस के संग चलना होगा. ज्योति किसी शर्त के साथ रिश्ते में नहीं बंधना चाहती थी,

और फिर मोहब्बत में कैसी शर्त? वह प्रकाश को किसी भी हाल में खोने को तैयार नहीं थी. फिर आज जब प्रकाश सदा के लिए उस का हो जाना चाहता है तो वह क्यों शादी के लिए हां नहीं कह पाई? बेशक, प्रकाश देखने में साधारण था, लेकिन बोलने में ऐसी कशिश थी कि उस के आगे उस का रंगरूप माने नहीं रखता था. तभी उस के कंधे पर किसी ने हाथ रखा. वह घबरा कर मुड़ी, सामने प्रकाश खड़ा था. प्रकाश उस के हाथों से सिगरेट ले कर फेंकते हुए बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें इन सब से दूर रहने को कहा था न, और तुम…,’’ प्रकाश अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि ज्योति उस से लिपट फफकफफक कर रोने लगी. फिर खुद को प्रकाश से अलग कर उस की ओर पीठ करती हुई बोली, ‘‘तुम यहां से चले जाओ, प्रकाश. मैं तुम से शादी नहीं कर सकती. तुम्हारे मुझ पर पहले ही बहुत एहसान हैं.

पर बस… अब और नहीं. वैसे भी तुम जानते हो, मैं तुम्हारे लायक नहीं.’’ ज्योति की बातें सुन प्रकाश उसे अपनी ओर खींचते हुए बोला, ‘‘तुम ने ऐसा कैसे सोच लिया कि तुम मेरे लायक नहीं. तुम तो उन सब के साथ पाक दिल से चली थीं, नापाक तो उन के इरादे थे जिन्होंने तुम्हें मलिन किया. शादी के लिए जब लड़के का वर्जिन होना अनिवार्य नहीं, तो लड़की का होना जरूरी कैसे हो सकता है? शादी के लिए जरूरी होता है अपने जीवनसाथी के प्रति दिल से समर्पित होना, वफादार होना, जो तुम हो.’’ प्रकाश के ऐसा कहते ही ज्योति प्रकाश की बांहों में सिमट गई. काली अंधेरी रात बीत चुकी थी. ऊषा की पहली सुनहरी किरणें दोनों पर पड़ने लगीं जो नई सुबह का आगाज थीं.

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