Emotional Story : इंसुलिन ही अब उन की जिंदगी की डोर थी. वैसे भी अब तो सावित्री के साथ जीने की लालसा ने इस कष्ट को सामान्य कर दिया था. उन की इस सिसकारी पर सावित्री ने कहा, ‘‘इतने सालों से इंजेक्शन ले रहे हो, पर सिसकारी भरना नहीं भूले. कोई छोटे बच्चे तो हो नहीं, जो इंजेक्शन लगते ही सिस्स...सिस्स... करने लगते हो.’’

‘‘सावित्री, तुम्हें मैं बड़ा लगता हूं?’’  रघुबीर ने हमेशा की तरह सावित्री से॒कहा.

अब उन के लिए तो सावित्री ही सर्वस्व थीं. एक मित्र, साथी और प्रेमी. हां प्रेमी भी. इसीलिए तो...जबजब सावित्री चश्मा चढ़ी अपनी आंखों को फैला कर इंजेक्शन भरने लगतीं, रघुबीर एकटक उन के चेहरे को ताकते रहते और जब वह इंजेक्शन लगातीं, रघुबीर सिसकारी जरूर भरते. सावित्री को पता था रघुबीर ऐसा जानबूझ कर करते हैं. फिर भी वह यह जरूर कहतीं, ‘‘सच में इंजेक्शन से बहुत दर्द होता है?’’

इस के बाद रघुबीर के ‘न’ के साथ शुरू हुआ संवाद सावित्री की जिंदगी की डोर था.

दसदस साल बीत गए थे रघुबीर और सावित्री को इस वृद्धाश्रम में आए. यहां पहला कदम रखने का दुख अब हृदय के किसी कोने में दब कर रह गया था. जब ये आए थे, तब दोनों के पैर साथ चलते थे और अब हृदय की धड़कन भी साथ चलने लगी थी. जैसे एक की थम जाएगी तो दूसरे की भी.

‘‘मैं भी बैठ जाऊं?’’ सावित्री ने पार्क में लगे झूले पर बैठे रघुबीर से पूछा. पर रघुबीर का ध्यान तो कहीं और था. वह सामने रखे गमले में लगे कैक्टस को एकटक ताक रहे थे.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

25% की बचत

डिजिटल

USD99 USD49 /Year
सब्सक्राइब करें
फायदे ▼
  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
Best Value - 26% की बचत

24 प्रिंट मैगजीन + फ्री डिजिटल

USD200 USD149 /Year
सब्सक्राइब करें
फायदे ▼
  • 24 प्रिंट मैगजीन + डिजिटल एक्सेस + ऐप
  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...