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Health Update : जीवनभर छूटे न इन 3H का साथ

Health Update : आजकल की भागदौड़ वाली जिंदगी में हर कोई अगर कुछ ढूंढ रहा है तो वह है खुशी या हैप्पीनेस. इसे पाने के लिए सब कुछ करने तैयार है लेकिन इस को वह हासिल करने में नाकाम हो रहा है. इसे अचीव करने के लिए यहां कुछ उपाय सुझाए गए हैं.

3H यानि: हैल्थ (Health) + हारमनी (Harmony) + हैप्पीनेस (Happiness)

आजकल की भागमभाग वाली जिंदगी में हम तनाव से भरे हुए हैं और कहीं न कहीं इस तनाव का असर हमारे स्वास्थ्य, आपसी तालमेल और खुशियों पर पड़ता है, इसलिए एक अच्छी और खुशहाल लाइफ के लिए इन 3H का साथ होना बेहद जरूरी है. तो फिर क्यों न हम कोशिश करें “जीवनभर छूटे न इन 3H का साथ” ताकि हम रहें स्वस्थ और तनावमुक्त और अपने सारे लक्ष्यों और संकल्पों को पूरा कर सकें.

क्योंकि जीवन का कोई भी लक्ष्य या संकल्प हो, बिना इन 3H के पूरा नहीं किया जा सकता.

इस को समझे कुछ इस तरह:

हैल्थ (Health)

बिना अच्छी हैल्थ या स्वास्थ्य के हम अपना कोई भी संकल्प, लक्ष्य या काम अच्छे से या कुशलतापूर्वक नहीं कर सकते है क्योंकि यह तो हम सभी जानते हैं कि एक स्वस्थ शरीर ही किसी भी काम को अच्छे से और तय समय सीमा में कर सकता है.

हार्मोनी या तालमेल (Harmony)

जब हमारी हैल्थ या स्वास्थ्य अच्छा होगा तभी हम एकदूसरे के संग एक अच्छी हार्मोनी या तालमेल बना पाएंगे (जैसे: परिवार और दोस्तों संग, औफिस में). यदि आपस में अच्छा तालमेल या हार्मोनी नहीं होगी तो तनाव होता है और यह हमें कई बार बीमार भी बना देता है तब हम अवसाद से घिर सकते हैं.

हैप्पीनेस (Happiness)

जब हम अवसाद से घिर जाते हैं तब हम कभी भी खुश नहीं रह सकते और तब दुनिया की सारी धनदौलत चाहकर भी हैप्पीनेस को नहीं खरीद सकती. इसलिए लक्ष्य कोई भी हो उसे पूरा करने के लिए इन 3H का साथ होना जरूरी है.

हेल्थ (Health )

आजकल की हमारी भागमभाग और तनाव से भरी व्यस्त दिनचर्या और डिजिटल दुनिया के अधिक समय तक इस्तेमाल हम को कम उम्र में ही बीमार बना रही है,रही है. जिस से कार्य करने की क्षमता प्रभावित हो रही है. कहा जाता है “हेल्थ इस वेल्थ” मतलब हमारा स्वास्थ्य ही धन है क्योंकि यदि हमारा स्वास्थ्य ठीक नहीं तो कहीं न कहीं हम जीवन के सभी आकर्षण को खो देते हैं और और अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाते हैं.

लेकिन यदि हम चाहें तो हमारी व्यस्त दिनचर्या में थोड़ा सा बदलाव ला कर अपनी सेहत का खयाल रख सकते हैं. साथ ही अपनी कार्य करने की क्षमता को भी बड़ा सकते हैं और अपने संकल्प को पूरा कर सकते हैं.

स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखने के लिए हमें नियमित शारीरिक व्यायाम, योग, ध्यान, संतुलित भोजन, अच्छे विचार, नियमित चिकित्सकीय जांच, पर्याप्त मात्रा में सोना और आराम करना और हमेशा खुश रहने, धैर्य रखने की आदत आदि की आवश्यकता होती है.

अच्छा स्वस्थ्य पाने के लिए काम आएंगे ये तरीके

लें भरपूर नींद

अच्छे स्वास्थ्य के लिए वयस्कों को कम से कम 7-8 घंटे की नींद होना आवश्यक है. यह हमारे स्वास्थ्य पर अनुकूल असर डालती है और दिनभर ऊर्जा से से भरपूर रखती है. यह हमें कई गंभीर बीमारियों जैसे: मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग, उक्त रक्तचाप से दूर रखती है.

करे नियमित व्यायाम

अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें रोज सुबह आधे या एक घंटा शारीरिक व्यायाम की आवश्यकता होती है. नियमित व्यायाम में हम तेज चलना, दौड़ लगाना, साइकिलिंग करना आदि शामिल कर सकते हैं. यदि इस की आदत डाल लें तो जल्दी ही आप अपने नए साल के संकल्प को पूरा कर पाएंगे.

फायदे

•हमारी मांसपेशियों को स्वस्थ रखता है
• शरीर में खून के बहाव को भी बेहतर बनाता है
• ब्लडप्रैशर को नियंत्रित करने में मदद करता है
• तनाव व डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों से दूर रखता है
• हमारा मेटाबौलिज्म बढ़ता है जिस के कारण आराम करते समय भी कैलोरी बर्न होती है
• वजन तेजी से कम होता है
• बढ़ती उम्र की गति को धीमा कर के आप को अधिक समय तक जवान बनाए रखने में मदद करता है. दिमाग भी सक्रिय रूप से कार्य करता है.
• हमारा स्टैमिना बढ़ता है, जिस से हम अपना काम बेहतर और अच्छे तरीके से कर पाते हैं जिस से हमारी कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है.

रहें दूर अल्ट्रा प्रोसेसस्सड फूड से और करें संतुलित भोजन

कैलोरी से भरपूर अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड्स में फाइबर की मात्रा कम, चीनी की मात्रा जरूरत से ज्यादा होती है इसलिए ऐसी चीजों को खाने से पेट तो भर जाता है, लेकिन वजन भी तेजी से बढ़ने लगता है. इन का सेवन हम आमतौर भूख न लगने पर भी कर लेते हैं जो स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदायक है.

जैसे: फ्रेंचफ्राइज, पिज्जा, फ्रोजन फूड साथ ही आलू को न खा कर आप इस से तैयार चिप्स, चिल्ली पोटैटो या फिर फ्रेंचफ्राई आदि खाद्य पदार्थ का सेवन करते हैं. इन को बनाने की प्रक्रिया में रसायनों का प्रयोग होने से उस की असल गुणवत्ता खराब हो जाती है और यही फूड्स आप के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं.

इसलिए स्वस्थ रहने के लिए संतुलित आहार अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें भरपूर पोषण देता है. इस में सभी आवश्यक पोषक तत्व जैसे कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, प्रोटीन और विटामिन, मिनरल, पानी आदि शामिल होते हैं. इसलिए संतुलित आहार के लिए हमें हमारी दिनचर्या में जैसे ताजे फल या फलों का रस, सलाद, हरी सब्जियां, दूध, अंडे, दही, अंकुरित सलाद, नट्स, बीन्स, फाइबरयुक्त भोजन करना चाहिए.

मोबाइल पर बिताए कम से कम समय

आज चाहे बच्चे हो या बड़े अपना अधिकतर समय मोबाइल में व्यतीत करते हैं. हम सभी ने अपने आप को स्क्रीन के सामने कैद कर लिया है और इस का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हमारे स्वास्थ्य पर एक गहरा प्रभाव डाल रहा है.

क्योंकि हम ने आपस में मिलनाजुलना छोड़ दिया है और हमारे बच्चों ने खेलनाकूदना बंद सा ही कर दिया है. सारे गेम मोबाइल पर ही खेलते हैं, जिस से उन का शारीरिक विकास रुक गया है. उन की क्रिएटिविटी कम हो रही है, हमारे बच्चे कम उम्र में ही बीमारियों का शिकार हो रहे है.
दिनभर फोन पर बिजी रहने की आदत सेहत से जुड़ी कई प्रकार की समस्याएं भी
खड़ी कर सकती हैं जैसे: आंखों की समस्या, गले और पीठ में दर्द, उंगलियों में दर्द, नींद न आने की समस्या, डिप्रेशन आदि.

हारमनी (Harmony)

हारमनी या तालमेल का अर्थ, किसी भी संबंध के मध्य पारस्परिक समन्वय से है. तालमेल जितना अच्छा होगा जीवन भी उतना ही सुगम होगा. किसी भी क्षेत्र में चाहे घरपरिवार हो, पतिपत्नी, औफिस या समाज हो हर जगह तालमेल की जरूरत होती है. यदि आपस में तालमेल बैठाना आ गया तो आप का जीवन खुशियों से भर जाएगा लेकिन यह तालमेल की स्थिति तभी बन पाती है जब हम एकदूसरे को समय दे पाते हैं. यदि यह नहीं तो सभी जगह हमारी तूतू मैंमैं होती रहेगी और तनाव होगा इसलिए जरूरी है कि हम घरपरिवार, बच्चों, समाज और अपने कार्य क्षेत्र में तालमेल बनाए रखें.

रिश्ता कोई भी हो बेहतरी के लिए पर्याप्त समय मांगता है, लेकिन आजकल समय के अभाव के चलते रिश्तों को निभाने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं और रिश्तों को जबरन निभा रहे हैं. यह कहीं न कहीं रिश्तों की मिठास को कम कर रहा है जिस की वजह से आजकल संयुक्त परिवार टूटे रहे हैं. पतिपत्नी अलग हो रहे हैं. मातापिता बच्चों से दूर हो रहे है. सब कुछ होते भी अपने आप को अकेला महसूस कर रहे हैं और इस अकेलेपन का दर्द या इलाज ढूंढने के लिए डिजिटल दुनिया का सहारा ले रहे हैं.

अपना बहुत सारा समय इस पर बिता रहे हैं जिस के कारण अपनों से और परिवार से दूर होते जा रहे हैं. पुराने समय की बात करें तो हम किसी भी समस्या का हल आपस में बैठ कर सुलझाया करते थे. जिस के कारण हम एकदूसरे से जुड़े रहते थे लेकिन आजकल इस के अभाव में हम अकेले होते जा रहे हैं और धीरेधीरे अवसाद की और जा रहे हैं. इस मानसिक तनाव या स्थिति में नए संकल्प और अपने निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

हैप्पीनेस (Happiness)

आजकल की भागदौड़ वाली जिंदगी में हर कोई यदि कुछ चीज ढूंढ रहा है तो वह है खुशी या हैप्पीनेस. इसे पाने के लिए सब कुछ करने तैयार है लेकिन इस को वह हासिल करने में नाकाम हो रहा है. ऐसा कहा जाता है कि पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है लेकिन शायद खुशी नहीं. इसलिए हैप्पीनेस के लिए पहचाने अपनी खुशियों को.
हम सभी को अलगअलग तरीके से खुशी मिलती है. जैसे किसी को अच्छा खाने से खुशी मिलती है, तो किसी को अच्छे कपड़े पहनने से, तो किसी को घूमनेफिरने से, तो किसी को अपने घर के गार्डन में काम करने से, तो किसी तो मंदिर जा कर सेवा करने. किसी को पढ़नेलिखने से, तो किसी को परिवार के साथ समय बिताने से, तो किसी को संगीत सुनने से, तो किसी को पैसा कमाने से और अपना बैंकबैलेंस बढ़ने से आदि तो खुश रहने के लिए सब से जरूरी है कि आप अपनी खुशी को पहचाने. आखिर आप को किस काम को करने से खुशी मिल रही है उस को पहचानना आवश्यक है ताकि आप खुश रह सकें.

करें सेल्फकेयर

कई बार खुद की केयर करने से एवं दूसरों की केयर करने से भी आप ऊर्जावान और आनंदित हो सकते हैं जैसे परिवार संग क्वालिटी समय बिताना, प्रकृति से जुड़ना कुछ समय पेड़पौधों के साथ बिताना, अपनी पसंद का काम करना या कुछ ऐसा काम भी करना जिस से यदि दूसरों को भी खुशी मिलती हो हमेशा अपने बारे में ही न सोचें.

सकारात्मक रहें

खुश रहने के लिए संतुष्ट रहें और अपनी सोच को सकारात्मक रखें. दूसरों से ज्यादा उम्मीद न रखें. अक्सर हम दूसरे से कुछ ज्यादा ही उम्मीद रख लेते हैं और जब वह पूरी नहीं होती तो निराश और दुखी हो जाते हैं. वास्तव में कई बार हमारी यही निराशा खुशी के ऊपर हावी हो जाती है और हम चाहकर भी खुश नहीं रह पाते जैसे: उन को हमारे साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए था अच्छा खाना बनाना चाहिए था अच्छा गिफ्ट देना चाहिए था वगैरहवगैरह.

बिताए कुछ समय अपने के साथ

आजकल की भागदौड़ वाली दिनचर्या के बाद जब भी फ्री समय मिलता है हम अपना मोबाइल ले कर बैठ जाते हैं. अपना बहुत सारा समय इस आभासी दुनिया में बिता देते हैं जिस के कारण हम पूरी दुनिया से और लोगों के साथ तो जुड़े (कनैक्ट) रहते हैं. यदि हम चाहें तो अपने इस अकेलेपन को दूर करने के लिए अपना कुछ समय परिवार, बच्चों और अपने दोस्तों के साथ मिलनेजुलने, हंसीमजाक, गपशप करने, घूमनेफिरने, खानेपीने में गुजार सकते हैं और कुछ खुशियों के पल अपनी यादों में शामिल कर सकते हैं और खुश रह सकते हैं.

इसलिए आवश्यक है कि एक खुशहाल, स्वस्थ और तनाव मुक्त लाइफ के लिए “छूटे न साथ इन 3H का.” यदि आप इन 3H को पकड़ कर रखेंगे तभी आप अपने लक्ष्यों को बिना किसी रूकावट के पूरा कर पाएंगे.

Rich and Poor : गैरबराबरी की साजिश

Rich and Poor : फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थौमस पिकेटी का गैरबराबरी के मामले में बहुत नाम है और वे लगातार अमीरगरीब देशों में बढ़ती गैरबराबरी का सवाल उठा रहे हैं. लगभग सभी अमीरगरीब देशों में पिछले 50 सालों में 1-2 फीसदी अमीर लोगों के पास जो धन है वह 60-70 फीसदी गरीब के कुल धन से भी ज्यादा है. 50-60 सालों में, जब से कम्युनिज्म का खात्मा हुआ है, हर देश में करों को पूंजी निर्माण के नाम पर घटाया गया है पर उस से रिच और सुपर रिच नहीं बल्कि सुपरडुपर रिच पैदा हो गए हैं.

अगर सुपर रिच और सुपरडुपर रिच अपनी पूंजी का इस्तेमाल आम जनता की भलाई में लगा रहे होते तो कोई बात नहीं थी. टोकन मामलों को छोड़ कर ये सुपरडुपर रिच अपनी संपत्ति को सरकारों को खरीदने, छोटी कंपनियों को दरवाजे बंद करने को मजबूर करने और ऐयाशी करने में लगा रहे हैं.

अमेरिका के एलन मस्क, जो 400 अरब डौलर के मालिक हैं, ने खुल्लमखुल्ला खब्ती, चातुर्य, कट्टरपंथी, स्वतंत्रताओं के विरोधी डोनाल्ड ट्रंप के लिए चुनाव में जम कर पैसा खर्च किया और उन के जीतने के बाद अब उन के मंत्रिमंडल में जा बैठे हैं. फेसबुक के मालिक जुकरबर्ग भी ऐसे ही हैं.

भारत में सुपरडुपर रिच गौतम अडानी और मुकेश अंबानी एक के बाद एक कंपनियां खरीद रहे हैं या छोटी कंपनियों को बंद करा रहे हैं, सरकारी मोटे ठेके हथिया रहे हैं जिन में खर्च का आकलन पहले किया ही नहीं जा सकता.

आज अमीरों के घर 500 करोड़ रुपए में बिक रहे हैं जबकि गरीबों को 100 फुट की कच्चीपक्की झोंपडि़यों और 6-6 मंजिले कमजोर व 2 छोटेछोटे कमरों वाले मकानों में रहना पड़ रहा है जिन में बहुत जगह सीवर भी नहीं है. भारत के गांवों को तो छोडि़ए, शहरों की सब से महंगी बस्तियों के एक किलोमीटर इलाके में झोंपडि़यों जैसे रिहाइश वाले मकान दिख जाएंगे.

देश में आज एयरकंडीशंड मौल बन रहे हैं लेकिन असली खरीदारी पटरियों से होती है जहां सामान सस्ता नहीं होता, बस, दुकान का किराया सस्ता बना देता है. लोगों के पास मोबाइल पहुंच गए हैं पर डाक खत्म हो गई है. लोग अपने चहते के लिखे शब्दों को संभाल कर रखने को तरसने लगे हैं. देश में 84 करोड़ भूखे लोगों को सरकार 5 किलो अनाज दे रही है और बात करती है खुद की तीसरी दुनिया की सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की.

गैरबराबरी ऐसे ही नहीं आई है. यह तंत्र थोपा जाता है, यह साजिश है जिस में सरकार, अमीर, रुतबे वाले और राजनीतिक दल शामिल हैं. थौमस पिकेटी चिल्लाता रहे, उस की सुनने वाला कोई नहीं.

College Ragging Cases : रैगिंग पर गर्व

College Ragging Cases : केरल के कालेज औफ नर्सिंग में जिस क्रूर ढंग से सीनियर लड़कों ने नए लड़कों से रैगिंग की, वह यह बताता है कि परपीड़न, सैडिज्म किस तरह हम भारतीयों के रगरग में भरा हुआ है. अपने को शांतिप्रिय विश्वगुरु मानने वाले, लाखों देवीदेवताओं में अगाध श्रद्धा रखने वालों के बच्चे खुलेआम सैडिस्टिक बिहेवियर का प्रदर्शन करते हैं और उस समय इकट्ठा हुई उन्हीं की उम्र के दूसरे लड़कों की भीड़ खुशी से तालियां बजाती है, हंसती है, ठहाके लगाती है.

रैगिंग बुलिंग के मामले सारी दुनिया में होते रहते हैं पर सारी दुनिया के लोग अपने को विश्वगुरु नहीं मानते. यह तमगा तो हम ने ही खुद को दे रखा है. हम ही विश्वशांति का ढोल पीटते हैं जबकि अपनी कायरता, कमजोरी और बंटवारे को धर्म की कांटेदार चादरों से ढकते रहते हैं.

केरल से हाल ही में कई मामले आए. श्रीनारायण इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस, श्रीनारायण कालेज, सीएसआई इंस्टिट्यूट औफ लीगल स्टडीज और गवर्नमैंट कालेज औफ नर्सिंग आदि सभी में आए नए छात्रों के साथ सीनियर छात्रों द्वारा बेहद क्रूर व वीभत्स रैगिंग की गई.

किन्नौर में तो एक मांबाप ने शिकायत की कि उन के 9वीं कक्षा के बेटे ने 12वीं कक्षा के छात्र द्वारा की गई उस की रैगिंग से अपमानित होने पर आत्महत्या कर डाली. गनीमत यह है कि रैगिंग में लड़के अभी तक लड़कों की ही रैगिंग करते हैं पर भयंकर बात यह है कि इस रैगिंग में आमतौर पर प्राइवेट पार्ट्स को छेड़ा जाता है. जो समाज दिनरात नैतिकता का गुणगान करता है, जहां सैक्स इश्यू है वहां लड़के माथे पर तिलक लगाए कमजोर छात्रों के प्राइवेट पार्ट्स को सब के सामने दिखाने और उन से छेड़छाड़ करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते.

यह सम झ नहीं आता कि जिस समाज को पाप धोने के लिए गंगा में डुबकी लगाने के लिए लगी रहती है या जो जमीन पर लोटलोट कर मीलों मंदिरों तक पहुंचने को पाप धोना कहता है वह इस तरह के पापों को सहज क्यों लेता है. दरअसल, यह हमारे दोगलेपन की निशानी है. यह हमारे अंदर बैठे जानवर से भी ज्यादा क्रूर जीव के होने की भी निशानी है.

असल में रैगिंग दुनियाभर में गरीबों के बच्चों की ज्यादा होती है. हमारे यहां जब भी ऊंची जातियों के स्कूलकालेजों में पिछड़ी या निचली जातियों के इक्केदुक्के छात्र आ जाते हैं तो उन्हें बुरी तरह प्रताडि़त किया जाता है. वैसे, छात्रों ने आम जीवन में अपने परिवारों के आसपास की पिछड़ी व निचली जातियों के लोगों के साथ अकसर होता क्रूर व्यवहार देखा होता है.

ड्रग्स ने इस समस्या को और गहरा किया है क्योंकि बहुत बार रैगिंग करने वाले शराब और ड्रग में आधे मदहोश होते हैं और उन्हें, सही का तो मालूम ही नहीं, गलत क्याक्या करना है, इस की पूरी ट्रेनिंग मिली होती है.

हमारे नेता, पुलिस, अदालतें उपदेश दे कर बच निकलते हैं. धर्मगुरु पिछले जन्मों के पापों का फल कह कर बच निकलते हैं. जो पीडि़त हुए वे अगले साल नए छात्रों को उस से ज्यादा पीड़ा देने की ठान लेते हैं. रैगिंग एक बार का मामला नहीं है. यह हर संस्थान का ट्रेडमार्क ट्रैंड जैसा है.

USA : ट्रंप का मोदी को झटका

USA : अमेरिकी प्रैसिडैंट डोनाल्ड ट्रंप ने ‘दोस्त’ नरेंद्र मोदी के ‘विश्वगुरु’ कहलवाने और विश्व की चौथीपांचवीं अर्थव्यवस्था होने का गुमान करने वाली उन की सरकार की पोल एक झटके में खोल दी जब 104 भारतीयों को चैनों में जकड़ व अपने मिलिटरी एरोप्लेन में ठूंस कर अमेरिका से भारत भेजा. प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और उन के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने यहां देश की संसद में जो पोपला बयान दिया कि, ‘ऐसा तो पहले भी होता रहा है,’ एक तरह से भारत सरकार की रीढ़ की हड्डी के न होने या बेहद ही कमजोर होने का सुबूत है.

ऐसा अगर पहले भी होता रहा था तो भारतीय जनता पार्टी ने आज तक क्यों नहीं कभी आपत्ति उठाई. अमेरिका ने जो आज किया है वह न केवल अमानवीय है बल्कि भारत, जो उस को दोस्त मानता है, का खुल्लमखुल्ला अपमान भी है. भारतीय नागरिक विदेश के लिए भारत से वैध तरीके से निकले थे. अमेरिका में वे अवैध ढंग से घुसे थे तो भी उन्होंने अमेरिकी लोगों के साथ कोई अपराध नहीं किया था. उन्हें गिरफ्तार करने पर ही वहां मौजूद भारतीय दूतावास को खड़े हो जाना चाहिए था.

बजाय इस के कि भारत अपनी महान शक्ति दिखाता, भारत सरकार के विदेश मंत्री मिमियाते दिखे कि वे उन एजेंटों के खिलाफ ऐक्शन लेंगे जिन्होंने इन युवाओं को धोखा दिया. उन की यह हिम्मत नहीं हुई कि वे अमेरिकी इमिग्रेशन अफसरों को भारतीयों को चैनों से जकड़ने पर फटकार लगा सकें कि यह भारतीय नागरिकों का नहीं, भारत का अपमान है.

नरेंद्र मोदी ने कोई ऐसा बयान नहीं दिया कि वे विरोध में डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात को टाल देंगे. मुलाकात के दौरान कोई ऐसा फैसला नहीं लिया गया कि आगे ऐसा नहीं होगा. उन्होंने इस कांड का जिम्मा उन लोगों के कर्मों पर डाल दिया जो बिना कानूनी कागजों के अमेरिका में घुसे थे.

भारतीय मूल के कई लोग डोनाल्ड ट्रंप के तलवे चाटते हुए उन के सहयोगी बने हुए हैं. वे उन भारतीय पुलिसवालों से कम नहीं हैं जिन्होंने ब्रिटिश ब्रिगेडियर रेजिनाल्ड डायर ने हुक्म के चलते जालियांवाला बाग में जमा भारतवासियों की भीड़ पर 13 अप्रैल, 1919 को गोलियां चलाई थीं.

काश पटेल अमेरिका की सैंट्रल इंटैलिजैंस एजेंसी (सीआईए) के मुखिया हैं जो भारतीय मूल के हैं. विवेक रामास्वामी एक राज्य के गवर्नर का चुनाव लड़ रहे हैं. सीताराम कृष्णन आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस यूनिट के अध्यक्ष हैं. बौबी जिंदल स्वास्थ्य व मानव सेवाओं के मुखिया हैं. अपने को हिंदू कहने वाली तुलसी गबार्ड नैशनल इंटैलिजैंस की मुखिया हैं. उपराष्ट्रपति जे डी वेंस की पत्नी उषा वेंस भारतीय मूल की हैं. ये सब जनरल डायर की पुलिसफोर्स की तरह के हैं जिन्होंने निहत्थे, शांति से घुसे युवाओं को चैनों में जकड़ने की अनुमति दी या ऐसा किए जाने पर कोई विरोध नहीं किया.

देश की ताकत उस की नीतियों में होती है, ढोल पीटने में नहीं. हम दिल्ली में बैठ कर ढोल पीटते रहें, नेहरू-इंदिरा को गालियां देते रहें तो ताकतवर नहीं बन जाएंगे. ताकतवर तो तब होंगे जब एक भी भारतीय पर आंच आए तो हम ऐसी जुर्रत करने वाले देश को लाल आंख दिखा सकें.

RSS : भेद और भेदभाव

RSS : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने अगर कहा है कि सच्ची आजादी तब मिली है जब राम मंदिर बना, तो कुछ खास गलत नहीं कहा. दरअसल वे उस वर्णव्यवस्था में विश्वास करते हैं जिस में ब्राह्मणों के पुरुषों को असली सत्ता मिलती है और ब्राह्मण स्त्रियों समेत अन्य सभी वर्गों के पुरुष-स्त्री को आधीपूरी गुलामी. ज्ञात इतिहास के अनुसार, पौराणिक कहानियों में इस ‘स्वर्णकाल’ का वर्णन है वरना तो यहां जो निशान मिलते हैं वे बौद्धों, मुगलों या यूरोपियों द्वारा छोड़े गए हैं. पौराणिक काल के बाद अब राम मंदिर बनने को फिर से पौराणिक व्यवस्था को आजादी मिलना कहा जा सकता है.

भारतीय जनता पार्टी में अनेक जातियों के लोग हैं. कुछ औरतें भी हैं. पर सभी एक तरफ से राजा के दरबार में जीहुजूरी करते हैं. यह राम मंदिर की देन है और यही पुराणों में वर्णित है जिस में यम और दुर्वासा राजा राम तक से मिलने पर अपनी शर्तें रख सकते हैं. जिन्हें पुराणों का सही ज्ञान चाहिए वे लक्ष्मण को मिले दंड के बारे में वाल्मीकि रामायण में पढ़ लें.

राम मंदिर बनने के बाद से देश के कोनेकोने में मंदिरों की बाढ़ आ गई है. 1947 तक का बेचारा निरीह ब्राह्मण, जो चपरासगीरी भी करता था, आज रेशमी कपड़े पहन कर छोटेबड़े मंदिर का पुजारी बन गया है. यही तो आजादी है.

जब अमेरिका और यूरोप में रंगभेद की श्रेष्ठता लौट रही है तो भारत में क्यों न लौटे? डोनाल्ड ट्रंप समाज को अपने मागा गैंग और चर्च के पादरियों की सहायता से बदल रहे हैं. 2 बड़े लोकतंत्रों को आजादी 2024 में ही मिली है. एक में राम मंदिर बनने पर, दूसरे में डोनाल्ड ट्रंप की जीत पर.

Online Hindi Story : दूसरा कोना – ऋचा के प्रति लोगों ने कैसी राय बना ली

Online Hindi Story : ‘‘अजीब तरह का व्यवहार कर रही थी अजय की पत्नी. पूरे समय बस अपनी खूबसूरती, हंसीमजाक, ब्यूटीपार्लर उफ, कोई कह सकता है भला कि उस के पति की अभीअभी कीमोथेरैपी हुई है. उस के हावभाव, अदाओं से कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस के पति को इतनी गंभीर बीमारी है. मुझे तो दया आ रही है बेचारे अजय पर. ऐसे समय में उस का खयाल रखने के बजाय, उस की पत्नी ऋचा अपनी साजसज्जा में लगी रहती है,’’ घर का दरवाजा खोलने के साथ ही प्रिया ने अपने पति राकेश से कहा. ‘‘हां, थोड़ा अजीब तो मुझे भी लगा ऋचा का तरीका, पर चलो छोड़ो न, तुम क्यों अपना दिमाग खराब कर रही हो. हमें कौन सा रोजरोज उन के घर जाना है. औफिस का कलीग है, कैंसर की बीमारी का सुना तो एक बार तो देखने जाना बनता था,’’ राकेश ने प्रिया को बांहों में लेते हुए कहा.

‘‘अरे, छोड़ो क्या, मेरे तो दिमाग से ही नहीं निकल रही यह बात. कोई इतना लापरवाह कैसे हो सकता है. ऋचा पढ़ीलिखी, अच्छे परिवार की लड़की है, फिर भी ऐसी हरकतें. मुझे तो शर्म आ रही है कि ऐसी भी होती हैं औरतें. ‘‘ऋचा औफिस की पार्टीज में भी कितना बनसंवर कर आती थी. कितना मरता था अजय उस की खूबसूरती पर. एक से एक लेटैस्ट ड्रैसेज पहनती थी वह तब भी. पर अब हालत कैसी है, कम से कम यह तो सोचना चाहिए.’’ राकेश ने प्रिया की बातों में अब हां में सिर हिलाया और कहा कि बहुत नींद आ रही है, सुबह औफिस भी जाना है, चलो सो जाते हैं.

बिस्तर पर पहुंच कर भी प्रिया के मन में ऋचा की बातें, उस की हंसी फांस की तरह चुभ रही थी. आज की मुलाकात ने रिचा को प्रिया की आंखों के सामने लापरवाह औरत के रूप में खड़ा कर दिया था. यही सब सोचतेसोचते प्रिया की आंख कब लग गई, उसे पता ही नहीं चला. अगली सुबह औफिस जाते हुए राकेश को गुडबाय किस देने के बाद अंदर आई तो देखा राकेश अपना टिफिन भूल गए. प्रिया ने राकेश को कौल कर के रुकने को कहा. दौड़ते हुए वह राकेश का टिफिन नीचे पार्किंग में पकड़ा कर आई. ‘‘तुम एक चीज भी याद नहीं रख सकते. मैं न होती तो तुम्हारा क्या होता?’’ प्रिया ने मुसकराते हुए कहा.

राकेश ने भी उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘तुम न होती तो कोई और होती.’’ इस पर प्रिया ने उसे घूरने वाली नजरों से देखा. राकेश ने जल्दी से ‘आई लव यू’ कहा और बाय कहते हुए वहां से निकल गया.

सब काम निबटा कर प्रिया ने चाय बनाई और टीवी औन कर लिया. चैनल पलटतेपलटते ‘सतर्क रहो इंडिया’ पर आ कर उस का रिमोट रुका. प्रिया ने बिना पलकें झपकाए पूरा एपिसोड देख डाला. उसे फिर ऋचा का खयाल आ गया. अब वह तरहतरह की बातें सोचने लगी कि ऋचा का कहीं किसी से चक्कर तो नहीं चल रहा, कहीं वह अजय से छुटकारा तो नहीं पाना चाहती? दिनभर प्रिया के दिमागी घोड़े ऋचा के घर के चक्कर लगाते रहे. शाम को राकेश के आने पर प्रिया ने फिर से ऋचा की बात छेड़ी तो राकेश ने थोड़ा झुंझला कर कहा, ‘‘अरे यार, क्या ऋचाऋचा लगा रखा है? उन की जिंदगी है, तुम क्यों इतना सोच रही हो?’’

प्रिया चुप हो गई. वह राकेश को नाराज नहीं करना चाहती थी. बहुत प्यार जो करती थी वह उस से. मगर प्रिया के दिमाग से ऋचा का कीड़ा उतरा नहीं था. उस ने अपनी किट्टी की सहेलियों को भी उस के व्यवहार के बारे में बताया.

सहेलियों में से एक बोली, ‘‘जिस के पति के जीवन की डोर कब कट जाए, पता नहीं, वह पति के बारे में न सोच कर सिर्फ अपने बारे में बातें कर रही है, कैसी औरत है वह.’’ ‘‘जो बीमार पति से भी इधरउधर घूमने की फरमाइश करती है, कैसी अजीब है वह,’’ दूसरी सहेली ने कहा.

‘‘ऐसी औरतें ही तो औरतों के नाम पर धब्बा होती हैं,’’ तीसरी बोली. सब सहेलियों ने मिल कर ऋचा के उस व्यवहार का पूरा पोस्टमौर्टम कर दिया. धीरेधीरे प्रिया के दिमाग से ऋचा का कीड़ा निकल गया. हां, कभीकभार वह राकेश से अजय के बारे में जरूर पूछ लेती. राकेश का एक ही जवाब होता, ‘अजय अब शायद ही औफिस आ सके.’ प्रिया को अफसोस होता और मन ही मन सोचती कि बेचारे अजय का तो समय ही खराब निकला.

4 महीने बाद एक दिन राकेश ने औफिस से फोन पर प्रिया को बताया कि अजय की मृत्यु हो गई. प्रिया को बहुत दुख हुआ. राकेश ने प्रिया से कहा कि तुम शाम को तैयार रहना, अजय के घर जाना है. औफिस के सभी लोग जा रहे हैं. प्रिया और राकेश अजय के घर पहुंचे. घर में कुहराम मचा हुआ था. अभी उम्र ही क्या थी अजय की, अभी 42 साल का ही तो था. ऐसे माहौल में प्रिया का मन अंदर घुसते हुए घबरा रहा था. अंदर घुसते ही सब से पहले ऋचा पर उस की नजर पड़ी. ऋचा का रंग बिलकुल सफेद पड़ा हुआ था. जो ऋचा 4 महीने पहले उसे नवयुवती लग रही थी, आज वही मानो बुढ़ापे के मध्यम दौर में पहुंच गई हो. जिस तरह ऋचा रो रही थी, प्रिया का मन और आंखें दोनों भीग गए. वह ऋचा को संभालने उस के करीब पहुंच गई.

बाहर अजय की अंतिम यात्रा की तैयारियां चल रही थीं. राकेश भी बाहर औफिस के लोगों के साथ खड़ा था. सभी अजय की जिंदादिली और हिम्मत की तारीफ कर रहे थे.

राकेश के पास ही डा. प्रकाश खड़े थे. डा. प्रकाश राकेश के बौस के खास मित्र थे. औफिस की पार्टीज में अकसर उन से मिलना हो जाया करता था. डा. प्रकाश ने कहा, ‘‘अजय जितना हिम्मत वाला था, उस से भी बढ़ कर उस की पत्नी ऋचा है.’’ राकेश ने जब यह बात सुनी तो उस के मन में उत्सुकता जाग गई. उस ने

डा. प्रकाश से मानो आंखों से ही पूछ लिया कि आप क्या कह रहे हैं. ‘‘अजय का पूरा इलाज मेरी देखरेख में ही हुआ है,’’ डा. प्रकाश ने कहा, ‘‘राकेश, अजय की रिपोर्ट्स के मुताबिक उस के पास मुश्किल से एक से डेढ़ महीने का समय था. यह ऋचा ही थी जिस ने उसे 4 महीने जिंदा रखा.’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘जब इन लोगों को कैंसर की बीमारी का पता चला तो ऋचा डिप्रैशन में चली गई थी. अजय अपनी बीमारी से ज्यादा ऋचा को देख कर दुखी रहने लगा था. अजय की चिंता देख कर मैं ने पूछा तब उस ने सारी बात मुझे बताई. उस दिन अजय और मेरे बीच बहुत बातें हुईं. मैं ने उसे ऋचा से बात करने को कहा. ‘‘अगली बार जब वे दोनों मुझ से मिलने आए तो हालात बेहतर थे. तब ऋचा ने मुझे बताया कि उस के पति उसे मरते दम तक खूबसूरत रूप में ही देखना चाहते हैं. उस ने कहा था, ‘अजय चाहते हैं कि मैं हर वह काम करूं जो उन के ठीक रहने पर करती आई हूं. उन के साथ नौर्मल बातें करूं. हंसीमजाक, छेड़ना सब करूं. बस, उन की बीमारी का जिक्र न करूं. इन थोड़े बचे दिनों में वे एक पूरी जिंदगी जीना चाहते हैं मेरे साथ.

‘‘अजय ने मुझ से कहा, ‘तुम्हें दुखी देख कर मैं पहले ही मर जाऊंगा. मुझे मरने से पहले जीना है.’ मैं ने भी दिल पर पत्थर रख कर उन की बात मान ली. डाक्टर साहब, अब अजय काफी अच्छा महसूस कर रहे हैं.’ उस दिन यह कहतेकहते ऋचा की आंखों में आंसू आ गए थे, मगर पी लिए उस ने अपने आंसू भी अजय की खातिर. ‘‘ऋचा बहुत हिम्मती है. आज देखो, दिल पर से पत्थर हटा तो कैसा सैलाब उमड़ आया है उस की आंखों में.’’

डा. प्रकाश की बातें सुन कर राकेश का मन ग्लानि से भर गया. जिस ऋचा के लिए उस ने और प्रिया ने मन में गलत धारणा पाल ली थी, आज उसी ऋचा के लिए उस के मन में बहुत आदरभाव उमड़ आया था. राकेश को काफी शर्म भी महसूस हुई यह सोच कर कि कैसे हम लोग बिना विचार किए एक कोने में खड़े हो कर किसी के बारे में अच्छीबुरी राय बना लेते हैं. कभी दूसरे कोने में जा कर देखने या विचारने की कोशिश ही नहीं करते.

Hindi Story : हमारी नयनतारा – कैसे मिसाल बने वाणी और श्लोक

Hindi Story : वाणी और श्लोक की पहली मुलाकात कालेज में हुई थी। वाणी दिल्ली से ही थी, वहीं श्लोक मध्य प्रदेश से यहां पढ़ने आया था। उन दोनों को वाणी की दोस्त नेहा ने मिलवाया था। पहली बार मिलने पर भी ऐसा लग रहा था जैसे वे सालों से एकदूसरे को जानते हों। जल्द ही उन में दोस्ती हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई। सारा दिन दोनों एकदूसरे के साथ ही गुजारते, एकदूसरे की पढ़ाई में मदद करते। कालेज में सब उन की मिसाल देते थे।

देखते ही देखते कालेज के 3 साल कब बीत गए पता ही नहीं चला। बीसीए की डिग्री हासिल करने के बाद दोनों ने सोचा कि क्यों न अब एमसीए भी कर लें। इस के लिए दोनों ने मुंबई में एक ही कालेज में दाखिला लिया। वहां एकदूसरे का साथ होने से उन्हें बहुत मदद मिली। एमसीए के बाद दोनों को बहुत अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई पर अब परेशानी यह हुई की वाणी को जौब बंगलुरू ब्रांच में मिली जबकि श्लोक को मुंबई ब्रांच में। वाणी का मन न होते हुए भी श्लोक के जोर देने पर वह बंगलुरू जाने के लिए तैयार हो गई।

1 साल तो जैसेतैसे बीत गए पर दोनों का मन एकदूसरे के बिना न लगता।दिनभर में जब भी वक्त मिलता एकदूसरे को कौल, मैसेज या वीडियो कौल करते रहते। दोनों एक दिन यों ही वीडियो कौल पर बात कर रहे थे, तब श्लोक ने कहा,”वाणी, क्यों न अब शादी कर के एकसाथ रहें।”

वाणी ने कहा,”यह अचानक से तुम्हें क्या हुआ?”

“बस, अब तुम्हारे बिना और नहीं रहना चाहता।”

वाणी कुछ देर तो कुछ न कह पाई पर फिर उस ने भी जल्दी से हां भर दी,”पर श्लोक, क्या हमारे घर वाले मान जाएंगे? वैसे तो मां को पता है इस बारे में पर शादी के लिए परिवार में सब की रजामंदी जरूरी है।”

श्लोक ने कहा,”चलो, हिम्मत कर के बात करते हैं। वैसे, मुझे तो मना करने की कोई खास वजह नहीं दिख रही।”

उन दोनों ने अपनेअपने घर पर बात की और सब आसानी से उन की शादी के लिए मान गए जिस पर उन्हें काफी हैरानी भी हुई कि सब इतनी आसानी से मान कैसे गए। फिर धूमधाम से उन के मातापिता ने उन की शादी करवाई। करवाते भी क्यों नहीं, वे दोनों अपने मातापिता की इकलौती संतान जो थे। अब वाणी ने शादी के बाद मुंबई ब्रांच में ही ट्रांसफर करवा लिया।

शादी के बाद वे विदेश घूमने गए और आते ही उन्हें पता चला कि दोनों की अपने डिपार्टमैंट में प्रोमोशन हो गई है। इस प्रोमोशन की वजह से दोनों का काम बहुत बढ़ गया। सुबह जल्दी जाना और रात को देर से आना। देखते ही देखते उन के विवाह के 3 साल पूरे हो गए।

आज बहुत दिनों बाद उन्हें एक लौंग वीकेंड औफ मिला था। दोनों अपने घर की बालकनी पर बैठे कौफी पी रहे थे। तब अचानक वाणी ने श्लोक से कहा,”श्लोक, हमारी शादी को 3 साल हो गए हैं, क्यों न अब हम अपनी संतान के बारे में सोचें…”

“कह तो तुम ठीक ही रही हो वाणी, पर तुम्हें यह अचानक से क्या सूझा?”

“अचानक कहां, तुम्हारी और मेरी मम्मी तो मुझ से यह कितनी बार पूछ चुकी हैं।”

“वाणी, मैं भी हमेशा से चाहता था कि हमारी एक प्यारी बेटी हो पर मुझे लगा तुम इस के लिए अभी तैयार नहीं हो इसलिए तुम से कभी नहीं कहा पर अब तुम यह चाहती हो तो ठीक है। कल सुबह ही डाक्टर के पास चलते हैं।”

वाणी ने अचरज से श्लोक की तरफ देखते हुए पूछा,”डाक्टर क्यों?”

“क्योंकि मातापिता बनने से पहले हमें कुछ जरूरी टैस्ट करवा लेने चाहिए।इस से पता चल जाएगा कि हम कितने स्वस्थ हैं। बच्चे के लिए हमारा स्वस्थ होना बहुत जरूरी है।”

अगली सुबह वे दोनों अस्पताल के लिए रवाना हुए। वहां जा कर उन दोनों ने डाक्टर महिमा से मुलाकात की। वे बहुत ही सीनियर डाक्टर थीं।श्लोक की रिपोर्ट्स तो ठीक था पर वाणी की रिपोर्ट्स कुछ खराब आई थीं। डाक्टर ने वाणी से पूछा,”क्या तुम्हें पेट पर कभी कोई चोट लगी है या फिर तुम पेट के बल जोर से गिर गई हो?”

वाणी और श्लोक एकदूसरे को देखने लगे। फिर दोनों ने एकसाथ डाक्टर से पूछा,”आप यह सब क्यों पूछ रही हैं?”

डाक्टर ने कहा,”जो पूछ रही हूं पहले उस बारे में जवाब दीजिए।”

वाणी ने कहा,”हां, एक बार जब मैं 15 साल की थी तब मैं फिसल कर बहुत जोर से गिर गई थी। तब सिर और पेट में कुछ चोटें आई थीं। ठीक होने में मुझे 6 माह लग गए थे।”

डाक्टर ने वाणी की बात सुनने के बाद कहा,”बस, तब जोर से गिरने की वजह से जो आंतरिक चोटें आप को आई थीं उस वजह से अब आप का मां बन पाना मुश्किल है,” इतना सुनना था कि वाणी जोरजोर से रोने लगी। तब श्लोक ने उसे संभाला।श्लोक ने कहा,”यह तो काफी साल पहले की बात है। इस का अब से क्या संबंध?”

डाक्टर ने कहा,”कुछ चोटें ऐसी होती हैं जो हमारे आंतरिक अंगों को हानि पहुंचा देती हैं। वाणी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। अगर यह मां बन भी गई तो इसे और बच्चे की जान को खतरा रहेगा। गर्भपात के चांसेज भी बहुत ज्यादा रहेंगे।”

श्लोक ने डाक्टर से पूछा,”क्या अब कुछ भी नहीं हो सकता?”

डाक्टर ने कहा,”आप लोग सरोगेसी के बारे मैं सोच सकते हैं।”

श्लोक ने डाक्टर से कहा,”इस में तो काफी खर्चा होगा न?”

डाक्टर ने कहा,”वह तो है। मगर आप अपनी तसल्ली के लिए 1-2 डाक्टर से और सलाह ले सकते हैं।”

वाणी और श्लोक अस्पताल से बाहर निकलते हुए बेहद उदास थे, तभी श्लोक ने कहा,”वाणी, एक डाक्टर के कहने से क्या होता है, हम 2-3 डाक्टरों से बात कर के देखते हैं। शायद कोई हमारी मदद कर सके। वैसे भी वाणी, हम अभी सरोगेसी अफोर्ड नहीं कर सकते। यह तो तुम जानती ही हो और मुझे मांपापा से पैसा लेने पसंद नहीं है। पहले ही वे हमारे लिए बहुत कुछ कर चुके हैं। उन से मैं कोई और मदद नहीं लेना चाहता।”

वाणी ने कहा,”तुम ठीक ही कह रहे हो।”

अगले 2-3 दिन वे दोनों शहर के अलगअलग डाक्टर के चक्कर लगाते रहे पर सब ने वाणी की रिपोर्ट्स देखने पर वही बात कही जो डाक्टर भावना ने कही थी। दोनों उदास थे पर इस का ज्यादा असर वाणी पर दिख रहा था।

आज इस बात को पता चले 1 महीना हो चुका था। वाणी अब श्लोक से भी ज्यादा बात नहीं करती। औफिस से छुट्टी ले कर ज्यादा समय घर पर अकेली गुमसुम सी रहती। श्लोक वाणी की यह हालत देख नहीं पा रहा था। एक दिन बहुत हिम्मत जुटा कर उस ने वाणी से बात करने की सोची। वाणी चुपचाप बालकनी में खड़ी थी। तभी श्लोक वहां गया और वाणी से कहा,”मैं काफी दिनों से तुम से कुछ कहना चाह रहा हूं। वाणी, यह तो मैं भी चाहता हूं कि हमारी भी एक संतान हो पर इस के लिए मैं तुम्हें किसी भी खतरे में नहीं डाल सकता। बहुत प्यार करता हूं तुम से। यह कुदरत की मरजी है कि उन्होंने हमें हमारी संतान नहीं दी पर उन्होंने हमें दूसरा रास्ता तो दिखाया है, इस के लिए मैं उन का शुक्रगुजार हूं।”

वाणी ने पूछा,”कौन सा दूसरा रास्ता?”

“देखो वाणी, हमारी खुद की संतान नहीं हो सकती इस का यह मतलब नहीं है कि हमारी गोद खाली रहे। ऐसे कितने ही बच्चे हैं इस दुनिया में जिन के मातापिता नहीं हैं और कितने ही ऐसे लोग हैं जिन की संतान नहीं है।यदि ये सब अपनी संतान की तरह अनाथ बच्चों को अपना लें तो कोई भी इस दुनिया में बेऔलाद और कोई भी बिना संतान के नहीं रहेगा।”

“तुम्हारा मतलब है कि हम बच्चा गोद लें?”

“हां, वाणी मेरा यही मतलब है। हम जिस भी बच्चे को घर लाएंगे उस के लिए हम ही उस के मातापिता होंगे।इस से हमारी गोद भर जाएगी और उसे मातापिता और पूरे परिवार का प्यार मिलेगा।”

वाणी रोते हुए श्लोक की तरफ देखने लगी तो श्लोक को लगा कि वाणी को शायद उस की बात सही नहीं लगी।उस ने जैसे ही कुछ आगे कहना शुरू किया, तो वाणी ने कहा,”रुको, अब कुछ और कहने की जरूरत नहीं है। मैं ने तो कभी इस तरह देखा ही नहीं कि भले ही हमारी खुद की संतान न भी हो तब भी तो हम मातापिता बन सकते हैं। हम कल से ही ऐडौप्शन का प्रोसेस स्टार्ट कर देते हैं।”

श्लोक ने कहा,”कल से क्यों, अभी से क्यों नहीं?”

वाणी बोली,”क्या ऐसा हो सकता है?”

“हां, मेरा एक दोस्त सुमित एक एनजीओ के साथ काम करता है। वह इस में हमारी मदद कर सकता है।”

कागजी काररवाई होने के बाद वाणी और श्लोक 1 साल की एक छोटी सी बच्ची को घर ले आए। जिस दिन वे उसे लेने गए, दोनों के मातापिता ने मिल कर घर को सजाया। जैसे ही वे घर पहुंचे, उन का बहुत अच्छे से स्वागत किया गया। जब नामकरण की बारी आई तो सब ने पूछा कि क्या नाम रखें इस नन्ही परी का? इस पर वाणी और श्लोक ने कहा,”हमारी नैनों का तारा हमारी नयनतारा।”

लेखिका- अमृता परमार

Hindi Kahani : फैसला – क्या आदित्य की हो पाई अवंतिका ?

Hindi Kahani : ‘‘4 साल… और इन 4 सालों में कितना कुछ बदल गया है न,’’ अवंतिका बोली. ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं… तुम पहले भी 2 चम्मच चीनी ही कौफी में लिया करती थी और आज भी,’’ आदित्य ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा, और तुम कल भी मुझे और मेरी कौफी को इसी तरह देखते थे और आज भी,’’ अवंतिका ने आदित्य की ओर देखते हुए कहा. आदित्य एकटक दम साधे अवंतिका को देखे जा रहा था. दोनों आज पूरे 4 साल बाद एकदूसरे से मिल रहे थे. आदित्य का दिल आज भी अवंतिका के लिए उतना ही धड़कता था, जितना 4 साल पहले.

आदित्य और अवंतिका कालेज के दोस्त थे. दोनों ने एकसाथ अपनी पढ़ाई शुरू की और एकसाथ खत्म. आदित्य को अवंतिका पहली ही नजर में पसंद आ गई थी, लेकिन प्यार के चक्कर में कहीं प्यारा सा दोस्त और उस की दोस्ती खो न बैठे इसलिए कभी आई लव यू कह नहीं पाया. सोचा था, ‘कालेज पूरा करने के बाद एक अच्छी सी नौकरी मिलते ही अवंतिका को न सिर्फ अपने दिल की बात बताऊंगा, बल्कि उस के घर वालों से उस का हाथ भी मांग लूंगा.’ वक्त कभी किसी के लिए नहीं ठहरता. मेरे पास पूरे 2 साल थे अच्छे से सैटल होने के लिए, लेकिन 2 साल शायद अवंतिका के लिए काफी थे.

उस शाम मुझे अवंतिका के घर से फोन आया कि कल अवंतिका की सगाई है. ये शब्द उस समय एक धमाके की तरह थे, जिस ने कुछ समय के लिए मुझे सन्न कर दिया. मैं ने उसी दिन नौकरी के सिलसिले में बाहर जाने का बहाना बनाया और अपना शहर छोड़ दिया. मैं ने अवंतिका को बधाई देने तक के लिए भी फोन नहीं किया. मैं उस समय शायद अपने दिल का हाल बताने के काबिल नहीं था और अब उस का हाल जानने के लिए तो बिलकुल भी नहीं.

वक्त बदला, शहर बदला और हालात भी. हजार बार मन में अवंतिका का खयाल आया, लेकिन अब शायद उस के मन में कभी मेरा खयाल न आता हो और आएगा भी क्यों, आखिर उस की नई जिंदगी की शुरुआत हो गई है, जिस में उस का कोई भी दोष नहीं था. मैं ने भी इसे एक अनहोनी मान लिया था या फिर जिस चीज को मैं बदल नहीं सकता उस के लिए खुद को बदल लिया था, लेकिन कहीं न कहीं अधूरापन, एक याद हमेशा मेरे साथ रहती थी.

वक्त की एक सब से बड़ी खूबी कभीकभी वक्त की सब से बड़ी कमी लगती है. शायद, यही मेरी अधूरी प्रेम कहानी का अंत था. मेरी नौकरी और मेरे नए घर को पूरे 3 साल हो गए थे. रोज की ही तरह मैं अपने औफिस का कुछ काम कर रहा था. आज जल्दी काम हो गया तो अपना फेसबुक अकाउंट जो आज की जेनरेशन में बड़ा मशहूर है, को लौगइन किया. आज पता नहीं क्यों अवंतिका की बहुत याद आ

रही थी. कलैंडर पर नजर पड़ने पर याद आया कि आज तो अवंतिका का जन्मदिन है. मैं ने उस के पुराने मोबाइल नंबर को इस आशा से मिलाया कि अगर उस ने फोन उठा लिया तो उस को जन्मदिन की बधाई दे दूंगा. बहुत हिम्मत कर के मैं ने उस का नंबर मिलाया, लेकिन मोबाइल स्विचऔफ था.

पता नहीं क्यों, दिल ने कहा कि मैं उस को फेसबुक पर ढूंढं़ू, क्या पता खाली समय में वह भी फेसबुक लौगइन करती हो. अवंतिका नाम टाइप करते ही कई अवंतिकाओं की प्रोफाइल मेरी आंखों के सामने आ गई. कोई अवंतिका शर्मा, मल्होत्रा, खन्ना कितनी ही अवंतिका सामने आ गईं, लेकिन मेरी अवंतिका अभी तक नहीं मिली. आशा तो कोई थी नहीं, लेकिन एक अजीब सी निराशा हो रही थी. अचानक मेरी नजर एक प्रोफाइल पर पड़ी. अवंतिका वर्मा… मुझे आश्चर्य हुआ कि शादी के बाद भी उस का सरनेम नहीं बदला और लोकेशन भी मुंबई की है. लगता है मुंबई के ही किसी शख्स से उस की शादी हुई होगी.

उस ने अपना फोटो नहीं डाला था और सबकुछ लौक कर रखा था. मैं फिर भी उस की प्रोफाइल को बारबार देख रहा था. मुझे विश्वास था यह मेरी ही अवंतिका है, लेकिन मुझे खुद पर विश्वास नहीं था. मैं ने उस को फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दी. एक पुराने दोस्त के नाते वह मेरी रिक्वैस्ट जरूर स्वीकारेगी. उस रात मुझे नींद नहीं आई. मैं मन ही मन यह सोच रहा था कि कितनी बदल गई होगी न वह, शादी के बाद सबकुछ बदल जाता है. अगर वह मुझे भूल गई होगी तो? अरे, ऐसे कैसे कोई कालेज के दोस्तों को भूलता है, भला? इसी असमंजस में पूरी रात बीत गई.

सुबह होते ही सब से पहले मैं ने फेसबुक अकाउंट चैक किया. आज पता चला कि लोग प्यार को बेवकूफ क्यों कहते हैं? उस दिन मुझे निराशा ही हाथ लगी. 2 दिन तक यही सिलसिला चलता रहा और 2 दिन बाद आखिर वह दिन आ ही गया जिस का मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था. अवंतिका ने मेरी रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली, लेकिन सबकुछ अच्छा होते हुए भी मुझे अचानक आश्चर्य हुआ, क्योंकि यह अवंतिका वर्मा तो सिंगल थी. उस का रिलेशनशिप स्टेटस सिंगल आ रहा था.

कहीं मैं ने किसी दूसरी अवंतिका को तो रिक्वैस्ट नहीं भेज दी. अचानक एक मैसेज मेरे फेसबुक अकाउंट पर आया. ‘‘कहां थे, इतने दिन तक.’’ यह मैसेज अवंतिका ने भेजा था. वह इस समय औनलाइन थी. मेरा दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था. मन कर रहा था कि उस से सारे सवालों के जवाब पूछ लूं. किसी तरह अपनेआप पर काबू पाते हुए मैं ने जवाब दिया, ‘‘बस, काम के सिलसिले में शहर छोड़ना पड़ा.’’ तभी अवंतिका ने जवाब देते हुए कहा, ‘‘ऐसा भी क्या काम था कि एक बार भी फोन तक करने की जरूरत नहीं समझी.’’

‘‘वह सब छोड़ो, यह बताओ कि शादी के बाद उसी शहर में हो या कहीं और शिफ्ट हो गई हो? और हां, फेसबुक पर अपना फोटो क्यों नहीं डाला? बहुत मोटी हो गई हो क्या,’’ उसे लिख कर भेजा. ‘‘शादी… यह तुम्हें किस ने कहा,’’ अवंतिका ने लिख कर भेजा.

‘‘मतलब…’’ मैं ने एकदम पूछा. ‘‘तुम्हारी तो सगाई हुई थी न.’’ मैं ने लिखा.

‘‘हम्म…’’ अवंतिका ने बस इतना ही लिख कर भेजा. ‘‘तुम अपना नंबर दो मैं तुम्हें फोन करता हूं.’’

अवंतिका ने तुरंत अपना नंबर लिख दिया. मैं ने बिना एक पल गवांए अवंतिका को फोन कर दिया. उस ने तुरंत फोन रिसीव कर कहा, ‘‘हैलो…’’

आज मैं पूरे 4 साल बाद उस की आवाज सुन रहा था. एक पल के लिए लगा कि यह कोई खुली आंखों का ख्वाब तो नहीं. अगर यह ख्वाब है तो बहुत ही खूबसूरत है जिस ख्वाब से मैं कभी बाहर न निकलूं. मुझे खुद पर और उस पल पर विश्वास ही नही हो रहा था. उस की हैलो की दूसरी आवाज ने मुझे अपने विचारों से बाहर निकाला. मैं ने कहा, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं, लेकिन तुम बताओ कहां गायब हो गए थे. वह तो शुक्र है आजकल की टैक्नोलौजी का वरना मुझे तो लगा था कि अब तुम से कभी बात ही नहीं हो पाएगी.’’ ‘‘अरे, ऐसे कैसे बात नहीं हो पाएगी,’’ मैं ने कहा, ‘‘लेकिन तुम यह बताओ कि तुम ने शादी क्यों नहीं की अभी तक?’’

‘‘अभी तक? क्यों, तुम्हारी शादी हो गई क्या,’’ अवंतिका ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘नहीं हुई,’’ मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्या कर रही हो आजकल.’’

उस ने हंसते हुए बताया, ‘‘जौब कर रही हूं. दिल्ली में एक सौफ्टवेयर कंपनी है पिछले 3 साल से वहीं जौब कर रही हूं.’’ ‘‘क्या?’’ मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था. उस पल पर, न अपने कानों पर, न ही अवंतिका पर. कौन कहता है अतीत अपनेआप को नहीं दोहराता? मेरा अतीत मेरे सामने एक बार फिर आ गया था.

3 साल से हम दोनों एक ही शहर में थे और आज इस तरह… ‘‘तुम्हें पता है कि मैं कौन से शहर में हूं,’’ मैं ने उस से पूछा.

‘‘नहीं,’’ उस ने कहा. ‘‘मैं भी दिल्ली में ही हूं.’’

‘‘पता है मुझे,’’ अवंतिका बोली. ‘‘क्या,’’ मैं ने उस से कहा.

‘‘मुझे तुम से मिलना है, जल्दी बोलो कब मिलेंगे.’’ ‘‘ठीक है… जब तुम फ्री हो तो कौल कर देना.’’

‘‘तुम से मिलने के लिए मुझे वक्त निकालने की जरूरत है क्या?’’ ‘‘ठीक है तो कल मिलते हैं.’’

‘‘हां, बिलकुल,’’ मैं ने तपाक से कहा. आज मुझे अवंतिका से मिलना था. पूरे 4 साल बाद मैं जैसा इस समय महसूस कर रहा हूं, उसे बताने के लिए शब्दों की कमी पड़ रही थी. मेरा दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था, जैसे मानों पेट में तितलियां उड़ रहीं थीं.

जिंदगी भी बड़ी अजीब होती है, जो पल सब से खूबसूरत होते हैं, उन्हीं पर विश्वास करना मुश्किल होता है. जब आप को जिंदगी दूसरा मौका देती है, तो आप चाहते हैं कि हर एक कदम संभलसंभल कर रखें. यही है जिंदगी, शायद ऐसी ही होती है जिंदगी. मैं एक रेस्तरां के अंदर बैठा अवंतिका का इंतजार कर रहा था और सोच रहा था कि किस सवाल से बातों की शुरुआत करूं. मेरी निगाहें मेन गेट पर थीं. दिल की धड़कन बहुत तेजी से आवाज कर रही थी, लेकिन उसे सिर्फ मैं ही सुन सकता था.

आखिरकार, वह समय आ ही गया. जब अवंतिका मेरे सामने थी. वह बिलकुल भी नहीं बदली थी. उस में 4 साल पहले और अब में कोई फर्क नहीं आया था, मुझे ऐसा लग रहा था कि कल की एक लंबी रात के बाद जैसे आज एक नई सुबह में हम मिले हों. उस के वही पहले की तरह खुले बाल, वही मुसकराहट ओढ़े हुए उस का चेहरा… सबकुछ वही. मैं ने अवंतिका से पूछा, ‘‘अच्छा, तुम्हारी मम्मी ने तो मुझे बताया था कि तुम्हारी सगाई है. मुझे तो लगा था अब तक तुम्हारी एक प्यारी सी फैमिली बन गई होगी.’’

‘‘हम्म… सोचा तो मैं ने भी यही था, लेकिन जो सोचा होता है अगर हमेशा वही हो तो जिंदगी का मतलब ही नहीं रह जाता. मेरा एक जगह रिश्ता तय हुआ तो था, लेकिन जिस दिन सगाई थी, जिस के लिए मेरी मम्मी ने तुम्हें इन्वाइट किया था, उसी दिन लड़के वालों ने दहेज में कार और कैश मांग लिया, उन्हें बहू से ज्यादा दहेज प्यारा था. मैं ने उसी समय उस लड़के से शादी करने से मना कर दिया. उस दिन काफी दुख हुआ था मुझे, सोचा तुम मिलोगे तो तुम्हें अपनी दिल की व्यथा सुनाऊंगी लेकिन तुम भी ऐसे गायब हुए जैसे कभी थे ही नहीं,’’ अवंतिका ने कहा. उस वक्त मुझे अपने ऊपर इतना गुस्सा आ रहा था कि काश, मैं उस दिन अवंतिका के घर चला जाता… कितनी जरूरत रही होगी न उस वक्त उस को मेरी. जिस वक्त मैं यह सोच रहा था कि उस के साथ उस का हमसफर होगा उस वक्त उस के साथ तनहाई थी… मैं कितना गलत और स्वार्थी था.

‘‘यहां नौकरी कब मिली,’’ मैं ने अवंतिका से पूछा. ‘‘3 साल पहले,’’ उस ने बताया.

3 साल… 3 साल से हम दोनों एक ही शहर में थे. कभी हम दोनों गलती से भी नहीं टकराए,’’ मैं ने मन में सोचा. आज मैं इस सुनहरे मौके को गवांना नहीं चाहता था. आज मैं वह गलती नहीं करना चाहता था, जो मैं ने 4 साल पहले की थी.

मैं ने अवंतिका का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘अवंतिका मुझे माफ कर दो, पहले मुझ में इतनी हिम्मत नहीं थी कि तुम से अपने दिल की बात कह सकूं, लेकिन आज मैं इस मौके को खोना नहीं चाहता. मैं तुम्हारे साथ जिंदगी बिताना चाहता हूं, बोलो न, दोगी मेरा साथ,’’ अवंतिका मुझे एकटक देखे जा रही थी. उस ने धीरे से पास आ कर कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन एक शर्त पर, तुम हफ्ते में एक बार डिनर बनाओगे तो,’’ इतना कह कर वह जोर से हंस दी.

मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था, लेकिन आखिर पूरे 4 साल बाद मैं अपने खोए प्यार से जो मिला था.

Best Hindi Story : आख़िरी पन्ना – अरुण ने क्यों माया को चुप करा दिया ?

Best Hindi Story : रविवार का दिन था. अरुण बहुत दिनों से पुरानी यादें ताजा करने को उत्सुक था. उस ने प्रतिभा को अपने साथ चलने के लिए मना लिया.

प्रतिभा ने विरोध नहीं किया.  वे सुबहसवेरे ही अलीगढ़ के लिए घर से निकल पड़े. तीनों बहुत खुश थे. दोपहर तक वे गतंव्य तक पहुंच गए.

सब से पहले  अरुण उन्हें ले कर उस रैस्तरां  पहुंचा जहां वह अपने दोस्तों के साथ अधिकांश वक्त बिताया करता था. वह बोला, “प्रियांक, यहां मैं दोस्तों के साथ रोज आया करता था.”

“आज आप हमारे साथ आए हैं. मैं और मम्मी भी आप के बेस्ट फ्रैंड हैं, पापा.”

उस की बात सुन कर अरुण ने प्रतिभा की तरफ देखा. उस ने नजरें झुका लीं. कौफी का मजा लेते हुए अरुण का अतीत उस की आंखों के  सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा. उसे याद आ रहा था कि 9वीं क्लास से  वह अलीगढ़ शहर में पलाबढ़ा था. अरुण के पापा बेंगलुरु से ट्रांसफर हो कर यहां आए थे. एमएससी करने के बाद अरुण कंपीटिशन की तैयारी के लिए दिल्ली चला आया और कुछ महीने बाद  नौकरी के सिलसिले में वह नागपुर चला गया था.

अरुण का परिवार खुले विचारों का नहीं था. उस के पापा का देहांत  एक ऐक्सिडैंट में तब हो गया जब वह  बीए में पढ़ता था. उस की मम्मी  माया ने उस की अच्छी परवरिश की थी. नौकरी मिल जाने के बाद 27 साल की उम्र में वह अपनी बिरादरी की लड़की से ही अरुण की शादी कराना चाहती थी.

एक बार अरुण अपनी बूआ की लड़की शिप्रा की शादी में हाथरस गया था. वहीं पर उस की प्रतिभा से पहली बार मुलाकात हुई थी. वह शिप्रा की फ्रैंड थी. शादी के दिन सजीधजी गुलाबी  लहंगे में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. अरुण का ध्यान शादी से ज्यादा उसी पर था. प्रतिभा भी इस बात को महसूस कर रही थी. रात को फेरों के समय अरुण उसी की बगल में जा कर बैठ गया था. युवाओं में चुहलबाज़ी चल रही थी. प्रतिभा भी इस बातचीत में शामिल थी और उस की हर बात का अपने तीखे अंदाज में जवाब दे रही थी.

‘आप को देख कर  लगता है मैं भी आज इसी मंडप में आप के साथ सात फेरे ले लूं.’

‘रोका किस ने है? हिम्मत है तो ले कर देख लीजिए. सामने से आप की मम्मी आ रही है.’

मम्मी पर नजर पड़ते ही अरुण शांत हो कर बैठ गया. उस की इस हरकत पर प्रतिभा जोर से हंसी और बोली, ‘लगता है अपनी मम्मी से बहुत डरते हैं.’

‘डरते तो हम किसी से नहीं हैं, बस, उन का अदब जरूर करते हैं. इसीलिए इस समय शांत बैठे हैं. वरना…’

‘मुझे अपने घर ले जाने से पहले सोच लीजिए. मैं कोई आम लड़की नहीं हूं. बहुत सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी, फैशनेबल  लड़की हूं. घूमनेफिरने में यकीन रखती हूं. उठा पाएंगे मेरे इतने नखरे?’

‘हम भी किसी से कम नहीं हैं. जिस चीज पर दिल आ जाए उसे ले कर ही रहते हैं,’ दबी जबान में वह बोला.

‘अपनी बात को पूरा करने के लिए अपनी मम्मी से जरूर पूछ लीजिए.’

‘वे मेरी हर इच्छा का मान करती हैं. आज तक उन्होंने  मेरी कोई बात नहीं टाली है.’

‘मुझे नहीं लगता उन्हें मुझ जैसी स्टाइलिश बहू चाहिए.’

‘देख लेना 6 महीने के अंदर मैं आप को अपनी दुलहन बना कर यहां से ले जाऊंगा.’

‘बाद में अपनी बात से मुकर तो नहीं जाएंगे?’

‘मर्द की जबान है, एक बार कह दिया, तो कह दिया,’  अरुण बिंदास बोला.

प्रतिभा के साथ उसे समय का पता ही नहीं चला. विदाई के समय सब भावुक हो गए थे. प्रतिभा की आंखों में भी आंसू थे और अरुण के भी.

शाम को अरुण को वापस आना था. रास्ते में उस ने बात छेड़ी, ‘मम्मी, आप को प्रतिभा कैसी लगी?’

‘उस के बारे में सोचना छोड़ दे. उस के साथ तेरा मेल नहीं हो सकता.’

‘यह आप कैसे कह सकती हैं?’

‘मुझे भी एक नजर में वह अच्छी लगी थी, मैं ने तेरी बूआ से पूछा. उन्होंने बताया कि तेरे और उस के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर है.

वह बहुत खुले विचारों की आधुनिक लड़की है. उस के मम्मीपापा उस की हर इच्छा पूरी करते हैं. हमारे बस का उस के नखरे उठाना नहीं है.’

‘मम्मी मायके और ससुराल में अंतर होता है. साथ रहेगी, तो घर की परिस्थिति भी समझने लगेगी.’

‘ लगता है तुम्हें वह बहुत पसंद आ गई है.’

‘हां मम्मी, मैं उसी से शादी करना चाहता हूं. अब इस बारे में कुछ मत कहिएगा. वह हमारी बिरादरी की है और मुझे पसंद भी है. वह हम दोनों  की शर्तें पूरी कर रही है. आप को इस रिश्ते पर एतराज नहीं होना चाहिए.’

माया उस की कोई बात नहीं टालती थी. देखने में परिवार  और प्रतिभा उन के मनमाफिक थी लेकिन उस के नखरे सहना उन के बस के बाहर था. अरुण अच्छाखासा कमाता था. पिताजी की 2 दुकानें भी थीं और उन का अपना खुद का घर था.  कुछ खेतीबाड़ी की जमीन थी.  उस से भी उन्हें आय हो जाती थी. घर में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं था. बेटे की इच्छा का मान करते हुए माया ने इस रिश्ते को मंजूरी दे दी. यह सुन कर अरुण मम्मी से लिपट पड़ा, बोला, ‘आप बहुत अच्छी हो. मेरी खातिर आप हर समझौता कर लेती हो.’

‘तेरे अलावा मेरा है ही कौन बेटा इस दुनिया में?’

बूआ के माध्यम से माया ने यह रिश्ता प्रतिभा के घर भिजवा दिया था. प्रतिभा को कोई एतराज नहीं था. जल्दी ही उन दोनों की सगाई हो गई और 2 महीने बाद शादी. माया ने अपने इकलौते बेटे की शादी धूमधाम से की थी. अरुण के सभी दोस्तों ने खूब डांस किया था. अपनी ओर से माया ने इस शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. प्रतिभा का मायका भी संपन्न था. उन्होंने  शादी में दिल खोल कर खर्च किया था. शादी के 6 महीने कब बीत गए, पता ही नहीं चला. उन का अधिकांश समय घूमनेफिरने में ही बीत गया था. बच्चों को खुश देख कर माया खुश थी.  इस दौरान प्रतिभा प्रैग्नैंट हो गई. यह सुन कर माया बहुत खुश थी, बोली, ‘प्रतिभा  बहुत घूमनाफिरना हो गया. अब तुम्हें अपना ही नहीं, अपने अंदर पलने वाली नन्ही जान का भी खयाल रखना है.’

‘मम्मी जी, ऐसा कुछ नहीं होता. मेरी फ्रैंड  बच्चा पैदा होने तक भी घूमतीफिरती रहती है. आप बेकार चिंता कर रही हैं.’

‘अपनी ओर से हमें सावधानी बरतनी चाहिए, बेटा. सब का शरीर एकजैसा नहीं होता.’ माया बोली तो यह बात प्रतिभा को अखर गई. उसे लगा कि वे उस पर प्रतिबंध लगा रही हैं. आज तक कभी किसी ने उस के किसी काम पर रोकटोक नहीं की थी. उस ने अपनी बात अरुण तक पहुंचा दी.

‘प्रैग्नैंट होने का यह मतलब नहीं है कि मैं एक जगह पर बैठी रहूं. आप मम्मी जी को समझा दीजिएगा, मुझे अपनी और बच्चे दोनों की फिक्र है. उन्हें ज्यादा टैंशन लेने की जरूरत नहीं है.’

‘कैसी बात करती हो, प्रतिभा. वे अनुभवी हैं. अपने अनुभव से कुछ बता रही हैं तो तुम्हें उसे मानना चाहिए.’

‘फिर वही बात. मैं ने कहा था, मैं भी अपने स्वास्थ्य को ले कर सचेत हूं. मुझे ज्यादा समझाने की कोशिश न करें,’ प्रतिभा तुनक कर बोली.

इस हालत में माया को उस का इधरउधर घूमना और तंग कपड़े पहनना अखरता लेकिन प्रतिभा को इस की कोई परवा न थी. घर में इन्हीं बातों को ले कर तनातनी होने लगी थी. अरुण बोला, ‘मम्मी ने हम दोनों की इच्छा का मान रखा है. क्या कुछ महीने के लिए हम उन की बात  नहीं मान सकते?’

‘अभी तो यह शुरुआत है. कल बच्चा हो जाएगा तो और भी कई प्रतिबंध लगा देंगी. मुझे ऐसी जिंदगी पसंद नहीं है. मैं जैसी हूं उस में कोई बदलाव नहीं चाहती और न ही किसी पर कोई प्रतिबंध लगाती हूं. अगर उन्हें मेरा यहां रहना पसंद नहीं, तो मैं मायके चली जाती हूं.’

‘तुम कहां रहना चाहती हो, यह तुम्हारा निर्णय है, प्रतिभा.  वे घर की बुजुर्ग हैं और हमारे भले  के लिए ही कुछ कहती हैं.’

‘इसी उम्र के मेरे मम्मीपापा भी हैं लेकिन वे मुझ पर कोई रोकटोक नहीं लगाते. उन्हें भी मेरे प्रैग्नैंट होने की खबर से बहुत खुशी हुई लेकिन उन्होंने अपनी मरजी मुझ पर नहीं थोपी. मुझे अपने जीवन में  रोकटोक पसंद नहीं है.’

‘मैं मम्मी के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकता.’

‘ठीक है, तुम रहो अपनी मम्मी के साथ. मैं अपनी मम्मीपापा के पास चली जाती हूं,’ प्रतिभा गुस्से से बोली और जाने की तैयारी करने लगी. माया ने उसे  रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह नहीं मानी.

प्रैग्नैंसी में वे  उसे कोई  तनाव नहीं देना चाहते थे. अरुण उसे वहां छोड़ कर आ गया.  उस की हालत देखते हुए उस के मम्मीपापा ने उसे यहीं रहने की सलाह दी.  अरुण को महसूस होने लगा था कि मम्मी ठीक  कहती थी. बाहरी सुंदरता चार दिन की होती है लेकिन इंसान का स्वभाव कभी नहीं बदलता. इस की प्रत्यक्ष मिसाल प्रतिभा थी.

अरुण महीने में एकदो बार उस से मिलने चला जाता. मायके में रह कर वह खुश थी. वह जितने रुपयों की मांग करती, अरुण उसे  भेज देता. निश्चित समय पर प्रतिभा ने प्रियांक को जन्म दिया था. सब खुश थे. माया पोते को देखने हाथरस चली आई थी. नामकरण की औपचारिकता के बाद अरुण बोला, ‘प्रतिभा, अब सबकुछ ठीक से निभ गया. तुम्हें अब अपने घर चलना चाहिए.’

अपने मम्मीपापा के कहने पर प्रतिभा तैयार हो गई. माया उसे अपने साथ घर ले आई थी. माया का समय अपने पोते के साथ बहुत अच्छा कट रहा था. वह उस का बहुत खयाल रखती.

प्रतिभा की जिंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आई. उस से कुछ कहना बेकार था. माया ने अपने होंठ सिल लिए थे.  जितना उस से बन पड़ता वह  प्रियांक की खिदमत में लगी रहती. यह देख कर एक दिन अरुण  नाराजगी जताते हुए  बोला, ‘प्रतिभा, अब तुम भी मम्मी बन गई हो और दूसरे के दर्द को अच्छे से महसूस कर सकती हो. तुम्हें प्रियांक को समय देना चाहिए. दिनभर मम्मी उस की खिदमत में लगी रहती है.’

‘तुम्हें लगता है मैं अपने बच्चों के लिए कुछ नहीं करती. यह सब कहने के लिए मम्मी ने कहा तुम्हें.’

‘वे क्या कहेंगी? मुझे भी बहुतकुछ दिखाई देता है. अपनी जिम्मेदारियों को समझा करो.’

‘फिर वही बात. मैं ने तुम्हें पहले भी कहा था और अब भी कह रही हूं, मुझे अपनी जिंदगी में किसी का दखल पसंद नहीं है. तुम से  परिवार नहीं संभाला जाता, तो तुम रहो यहीं. मैं वापस अपने मायके जा रही हूं.’

इस बार अरुण ने सोच लिया था कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो कल प्रतिभा उन के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द बन सकती है. सो, उस ने उसे जाने से नहीं रोका. वह बोला, ‘तुम्हारी जो इच्छा हो वह करो, लेकिन तुम्हारी मनमरजी इस घर में नहीं चल सकती.’

प्रतिभा का मुंह गुस्से से लाल हो गया. दूसरे दिन ही वह प्रियांक को ले कर मायके चली गई. इस बार झगड़े की शुरुआत अरुण ने की थी. उस ने  सोच लिया था, वह उसे सबक सिखा कर रहेगी.

अरुण उस से मिलने गया तो किसी ने भी उस से ठीक से बात नहीं की. वह समझ गया कि  मम्मीपापा प्रतिभा को सही मानते हैं और उसे गलत.

वे बेटी को कभी कुछ न कहते. इंडिया में उन का सहारा वही थी. उन का बड़ा बेटा अमेरिका मे बस गया था और अब उन की सुध न लेता. वे किसी कीमत पर बेटी को नहीं खोना चाहते थे. उन का रवैया देख कर अरुण ने वहां जाना छोड़ दिया. माया को पोते की याद सालती रहती लेकिन वह मजबूर थी. एक ओर बेटा था, दूसरी तरफ पोता. दोनों के बीच में प्रतिभा थी जो किसी भी हालत में इस घर से तालमेल बिठाने को तैयार न थी. अरुण का रुख देख कर उस ने 4 महीने बाद  कोर्ट से नोटिस भिजवा दिया था. यह देख कर अरुण को बहुत गुस्सा आया.

‘मम्मी, आप ने उन की हिम्मत देख ली. अब हमें कोर्ट में घसीट रहे हैं.’

‘मैं क्या कहूं, बेटा? सबकुछ जान कर रिश्ता जोड़ा था. अब बहुतकुछ  भुगतना ही पड़ेगा. वह क्या चाहती है?’

‘उसे उस के और बेटे के लिए हर महीने खर्चे के लिए 50 हजार रुपए चाहिए. इतना हम कहां से देंगे?’

‘जैसे भी कर के घर की इज्जत बचा लो. बेटे का भविष्य देखना है, तो यह सब तुम्हें करना ही होगा,’ माया बोली.

अरुण ने उस की मांग स्वीकार कर ली और उसे हर महीने रुपए भेजने लगा. बेटे की खातिर अरुण कभीकभी वहां चला जाता. वह बिलकुल पापा जैसे ही दिखता था. लेकिन प्रतिभा का अहं अभी भी संतुष्ट न हुआ था. वह मांबेटे को अच्छा सबक सिखाना चाहती थी जो बारबार उस की जिंदगी में दखल दे कर उसे नर्क बनाना चाहते थे. कोर्ट से उन के लिए एक के बाद एक नोटिस आने लग गए थे.

एक बार अरुण वहां पहुंच कर बोला, ‘यह क्या है, प्रतिभा? तुम ने जो मांगा,  मैं ने तुम्हें दिया. अब क्या रह गया है?’

‘तुम्हारा जो कुछ है वह प्रियांक का भी है. उसे भी बहुतकुछ चाहिए. तुम्हारे नाम पर 2 दुकानें हैं. एक दुकान मेरे नाम कर दीजिए. उस की सारी आमदनी मुझे मिलनी चाहिए.’

‘यह तुम्हारा आखिरी फैसला है.’

‘तुम अच्छे ढंग से जानते हो, महिलाओं के हक में कितने अधिकार हैं. मैं ने अगर उन का प्रयोग कर लिया  तो तुम सब कहीं के न रहोगे.’

‘हम ने ऐसा कुछ नहीं किया है जो तुम्हें इन का इस्तेमाल करने की जरूरत पड़े.’

‘कोर्ट सुबूत मांगता है और सारे सुबूत मेरे पास हैं.’

अरुण ने उस के मुंह लगना ठीक न समझा. उसने एक दुकान उस के नाम कर दी कि शायद अब इस बला से पीछा छूट जाएगा. प्रतिभा को इतने से भी संतोष न था. वह इस चुप्पी को उन की कमजोरी समझती जा रही थी और दिनप्रतिदिन उन पर हावी होने की कोशिश करने लगी थी. लड़ाईझगड़े में 5 साल गुजर गए थे. प्रियांक बड़ा हो रहा था. कभीकभी मम्मी से पापा के बारे में पूछता तो वह कोई न कोई बहाना बना देती. बेटे की खातिर अरुण उस से संपर्क बनाए हुए था. वह उसे ऐसी जिंदगी नहीं देना चाहता था जिस के लिए उसे जिंदगीभर पछताना पड़े.
साल बीत रहे थे और प्रतिभा की मांग बढ़ती जा रही थी. उस के मम्मीपापा सबकुछ जान कर भी मुंह सिले हुए थे. वे अपनी बेटी के स्वभाव से भलीभांति परिचित थे. कुछ कहने पर वह क्याकुछ कर लेगी, कहना मुश्किल था.

प्रियांक 5 साल का हो गया था और अब स्कूल जाने लगा था. कोर्ट की परमिशन से वह उस से मिलने चला जाता. वे दोनों साथसाथ खूब मस्ती करते. वह चाहता,  पापा भी उस के साथ रहें लेकिन छोटा बच्चा इस बारे में कुछ कर नहीं सकता था. कुछ कहने पर प्रतिभा उसे चुप करा देती.

कुछ महीने पहले एक दिन स्कूल में गेट से बाहर आते हुए प्रियांक एक गाड़ी की चपेट में आ गया. उसे बहुत चोट लगी थी. उस की हालत देख कर प्रतिभा के हाथपैर फूल गए. उसे तुरंत हौस्पिटल में भरती कराया गया. उस का ब्लड ग्रुप ओ नैगेटिव और इस समय वह अस्पताल में उपलब्ध भी नहीं था. उस के दोनों पैर की हड्डियां टूट गई थीं और खून भी बहुत बह गया था.

डाक्टर बोले, ‘जल्दी कीजिए, बच्चे की हालत बहुत नाज़ुक है.’

प्रतिभा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे? उस ने तुरंत अरुण को फोन किया. बेटे के ऐक्सिडैंट की खबर सुन कर वह तुरंत वहां पहुंच गया. डाक्टर ने उसे सारी बात बताई. वह बोला, ‘आप को जितना चाहिए,  मेरा खून ले लीजिए.  मेरा भी वही ब्लड ग्रुप है.’

प्रियांक की स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई थी. उसे होश आने में पूरे 12 घंटे लगे. लेकिन वह अभी खतरे से बाहर न था. अरुण रातभर हौस्पिटल में ही रहा. माया भी पोते से मिलने चली आई. उन का रोरो कर बुरा हाल था. एक हफ्ते बाद प्रियांक को हौस्पिटल से छुट्टी मिली. उस के पैरों पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था.  अरुण वहां से वापस जाना चाहता था. प्रियांक ने उसे रोक लिया.

‘पापा, प्लीज मत जाओ.’

इस हालत मे बेटे की भावनाओं की कद्र करते हुए वह रुक गया. मजबूरी में ही सही, उसे प्रतिभा के साथ उस के घर जाना पड़ा. इतने दिनों अरुण की भागदौड़ देख कर प्रतिभा समझ गई कि उसे बेटे से कितना प्यार है.

अरुण वहां रुकने में डर रहा था. अब जब उन के बीच इतनी दूरियां बढ़ गईं तब वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. वह सोच रहा था, भावनाओं में बह कर  किसी क्षण वह कमजोर पड़ गया तो उस के इतने साल की मेहनत पर पानी फिर जाएगा. वह प्रतिभा के सामने अपने आत्मसम्मान  को घटा कर कोई समझौता नहीं चाहता था.

वह हर समय प्रियांक के साथ साए की तरह रहता. उसे देख कर पहली बार प्रतिभा को परिवार की अहमियत समझ में आई कि बच्चे के लिए मम्मीपापा दोनों जरूरी हैं. प्रियांक की हालत अब काफी सुधर  गई थी. यह देख कर अरुण बोला, ‘प्रियांक अब ठीक है. खतरे की कोई बात नहीं है. मुझे चलना चाहिए. तुम इस का खयाल रखना. वैसे भी, तुम ने हमारे बेटे को बहुत अच्छे से रखा है.’

‘क्या तुम कुछ दिन और नहीं रुक सकते?’ प्रतिभा बोली तो अरुण ने उसे ध्यान से देखा. इस समय उस के चेहरे पर अहं की कड़वाहट नहीं, एक पत्नी की मनुहार साफ दिखाई दे रही थी.

‘औफिस से छुट्टी लिए 2 हफ्ते हो गए हैं. मम्मी घर पर अकेली हैं. उन की भी तबीयत  ठीक नहीं रहती. मुझे चलना चाहिए.’

‘प्रियांक पूछेगा तो क्या कहूंगी? वह तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता.’

‘छोड़ना तो मैं भी अपनी पत्नी और बेटे को नहीं चाहता था. पर तुम ने परिस्थितियां ऐसी बनाईं कि मैं मजबूर हो गया.’

‘तुम चाहो तो हम अब भी साथ रह सकते हैं. इतना सबकुछ होने के बाद क्या तुम मुझे माफ कर दोगे?’

‘प्रतिभा, बेटे की खातिर मैं सबकुछ करने को तैयार हूं बशर्ते कि तुम मेरे परिवार को अपना लो. वहां  मेरे और मम्मी  के अलावा कोई नहीं है. वह घर कल भी  तुम्हारा था और आज भी तुम्हारा है. फैसला तुम्हें करना है, तुम प्रियांक को कैसी जिंदगी देना चाहती हो,’ अरुण बोला और प्रियांक के उठने से पहले वहां से बाहर निकल गया.

वह उस का रोना  नहीं देख सकता था. प्रतिभा बहुत देर तक सोचती रही. उस की बात अपनी जगह सही थी. केवल अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए वह किस हद तक गिर गई थी. आज उसे इस बात का बड़ा पछतावा हो रहा था. उस ने वापस ससुराल जाने का मन बना लिया.

प्रियांक के पैर से प्लास्टर हटते ही वह बोली, ‘मम्मी, मैं अरुण के पास जाना चाहती हूं.’

वे बोलीं, ‘एक बार फिर से सोच ले, प्रतिभा. जो कदम उठाने जा रही हो उस के दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं.’

‘मम्मी, प्लीज आज मुझे मत रोकिए. अगर आप ने मुझे पहले समझाया होता तो  यह नौबत न आती.’

‘हम भी तुम्हारे स्वभाव से डरते थे, प्रतिभा. अगर तुम यहां से भी जाने का निश्चय कर लेती तो फिर कहां जाती? ऐसी हालत में कोई गलत कदम उठा लेती तो क्या होता. हम हर हाल में तुम्हें खुश देखना चाहते थे. इस के लिए  हम से जो बन पड़ा, हम ने वही किया. तुम्हारी खातिर हम ने भी अपने होंठ सिल लिए थे,’ मम्मी बोलीं.

उन्हें खुशी थी  आज प्रतिभा किसी के दबाव में नहीं, अपनी इच्छा से यह  घर छोड़ कर वापस अपने पति के पास जा रही थी. प्रियांक को पापा की जरूरत थी, जिसे प्रतिभा कभी भी पूरा नहीं कर सकती थी.

अचानक उसे आया देख कर माया चौंक गई. अरुण को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था. पापा को देखते ही प्रियांक अरुण से लिपट गया. उस की शारीरिक कमजोरी अब काफी हद तक ठीक हो गई थी’ थोड़ा चलने में दिक्कत हो रही थी. वह बोली, ‘मम्मीजी, अपने गरूर में मैं ने आप को कितना परेशान किया है, कह नहीं सकती.  क्या मुझे इस घर में जगह मिल सकती है?’

‘प्रतिभा, यह घर  तुम्हारा है. मुझे खुशी है कि आज तुम किसी के दबाव में नहीं, अपनी इच्छा से लौट कर आई हो.  घर की अहमियत क्या होती है, लगता है इस का एहसास तुम्हें हो गया है,’ माया बोली. प्रतिभा उन के गले लग कर रोने लगी. माया ने किसी तरीके से उन्हें चुप करा कर कमरे मे भेज दिया. वहां प्रियांक पापा के साथ खेल रहा था. कमरे में उन के कई  फोटो लगे हुए थे जिन्हें देख कर प्रतिभा भावुक हो गई.  उस ने बोलने के लिए जैसे ही मुंह खोलना चाहा, अरुण ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया.

‘अब कुछ मत कहो, प्रतिभा. एक बुरा समय था जो गुजर गया. हमें आने वाले कल का स्वागत करना चाहिए.’

‘सच में तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है. मेरा ही मन संकुचित था जो अपने से ऊपर कुछ न सोच सकी.’ इतना कहकर वह अरुण के गले लग गई. सबकुछ भुला कर वे एक नई जिंदगी जीने के लिए आगे बढ़ गए थे.

आज अरुण उन्हें उन सब जगहों पर ले कर जा रहा था जहां से उस की पुरानी यादें जुड़ी हुई थीं. प्रियांक की खुशी देखते ही बनती थी. वह मम्मीपापा का साथ पा कर अपने को धन्य समझ रहा था.

Love Story : अधूरी कहानी – एक हादसे से कैसे बदली राघव की जिंदगी ?

Love Story : बात उन दिनों की है, जब राघव 12वीं जमात पास कर के कालेज में पढ़ने गया था. माली हालत अच्छी न होने की वजह से उसे पापा के पास बेंगलुरु जाना पड़ा और इसी बीच वह वहीं काम भी करने लगा. समय मिलते ही राघव अपने सारे दोस्तों को मैसेज करता था. वह शायरी का तो शौकीन था ही, हर रोज नईनई शायरी दोस्तों को भेजता और बदले में वे तारीफ भेजते. वे ज्यादातर बातें मैसेज के जरीए ही करते थे. दोस्तों के अलावा राघव अपनी चचेरी भाभी सोनी को भी मैसेज करता था. वे खड़गपुर में राघव के भाई के साथ रहती थीं. राघव और सोनी दोनों जब भी बातें करते तो ऐसा नहीं लगता था कि कोई देवरभाभी बातें कर रहे हैं. ऐसा लगता था, मानो 2 जिगरी दोस्त बातें कर रहे हों.

एक दिन अचानक राघव के फोन पर एक नंबर से एक प्यारा सा मैसेज आया. वह पढ़ कर बहुत खुश हो गया. लेकिन अगले ही पल वह हैरान रह गया, क्योंकि जब उस नए नंबर पर उस ने फोन किया, तो फोन का जवाब नहीं मिल सका.

राघव ने उसी नंबर पर मैसेज किया, ‘कौन हो तुम?’

उधर से जवाब आया, ‘आप की अपनी दोस्त.’

राघव ने नाम पूछा, तो उस ने बताया नहीं. ‘फिर कभी…’ का मैसेज लिख दिया.

राघव ने सोचा, ‘शायद मेरा ही कोई दोस्त मुझे नए फोन नंबर से परेशान कर रहा है.’

रात को राघव ने उस नंबर पर फोन किया. एक लड़की ने फोन उठाया… और जैसे ही वह ‘हैलो’ बोली, राघव के रोंगटे खड़े हो गए.

राघव ने हकलाते हुए पूछा, ‘‘कौन हो तुम? मेरा नंबर तुम्हें किस ने दिया? तुम कहां से बोल रही हो?’’

उस लड़की ने बताया, ‘मेरा नाम पूजा है?’

इस के बाद उस ने राघव से कहा कि वह उसे पहले से जानती है. उस के बारे में बहुत सारी बातें भी बताईं. वह देखने में कैसा है, उस का कद कितना है वगैरह.

राघव ने पूछा, ‘‘मुझे कहां देखा आप ने?’’

उस लड़की ने कहा, ‘4 महीने पहले मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर देखा था, तभी से नंबर ढूंढ़ रही हूं.’

राघव चौंक गया, क्योंकि ठीक 4 महीने पहले वह अपनी मौसी को छोड़ने वहां गया था. वह खयालीपुलाव पकाते हुए सोचने लगा कि एक अनजान लड़की ने अनजान जगह पर उसे देखा और तब से उस का फोन नंबर ढूंढ़ रही है.

पहले तो वह अनजान था, पर अब राघव दोस्ती के नाते उस से बातें करने लगा. कुछ ही दिन हुए थे राघव और उस लड़की की दोस्ती को कि इसी बीच उस का एक मैसेज आया, जिस में लिखा था, ‘मुझे माफ कर देना. मैं नहीं चाहती कि हमारी दोस्ती की शुरुआत झूठ से हो. सच तो यह है कि मैं ने आप को कभी देखा ही नहीं. बस, सोनी भाभी के फोन पर आप का मैसेज पढ़ा, जो मुझे बहुत पसंद आया. इस के बाद भाभी से आप का नंबर ले कर मैसेज कर दिया.

‘मैं ने सोचा कि अगर आप को पहले ही सब बता देती, तो आप के बारे में इतना कुछ जानने का मौका न मिलता. इस झूठ के लिए मुझे माफ कर देना और मेरी दोस्ती को स्वीकार करना.’

यह मैसेज पढ़ कर राघव को थोड़ा गुस्सा तो आया, पर दोस्तों से इस बारे में जब उस ने बात की, तो वे भी उस की तारीफ के पुल बांधने लगे. उसे सलाह दी कि लड़की अच्छी है, तभी तो उस ने सब सचसच बता दिया. और तो और वह दोस्ती भी करना चाहती है. ऐसे सच्चे दोस्त कम ही मिलते हैं. उसे फोन कर और दोस्ती की नई शुरुआत कर. फिर क्या था, राघव का दिल बागबाग हो उठा.

अगली सुबह राघव ने मैसेज किया, ‘गुड मौर्निंग दोस्त.’

उधर से भी मैसेज आया, जिस में पूछा गया था, ‘मुझे माफ तो कर दिया न? फिर से सौरी ऐंड थैंक्यू… दोस्ती को आगे बढ़ाने के लिए.’

राघव ने भी फिल्मी अंदाज में लिख भेजा, ‘दोस्ती में नो थैंक्स, नो सौरी.’

उन दोनों की दोस्ती परवान चढ़ती गई. पहली बार घर जाते समय राघव उस से खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर मिला. ट्रेन वहां ज्यादा देर नहीं रुकी, इसलिए बातें भी न हो सकीं. सिर्फ ‘हायहैलो’ ही हो पाई.

उस समय छठ पूजा की तैयारियां चल रही थीं. राघव घर पर ही था. सोनी भाभी हर साल छठ पूजा के समय गांव आ जातीं. इस बार भी वे आईं, पर अकेली नहीं, पूजा भी साथ थी.

राघव इतना खुश था कि बयां नहीं कर सकता था. उस ने पूजा को अपनी मां और बहनों से मिलवाया. वह पूरा दिन उसी के साथ रहा.

सोनी भाभी कहां चूकने वाली थीं. वे भी ताने कसतीं, ‘‘क्यों देवरजी, क्या इसे यहीं छोड़ दूं हमेशा के लिए?’’

भाभी की ऐसी बातें सुन कर राघव के मन में लड्डू फूटने लगते. काश, ऐसा ही होता.

पूजा थी ही ऐसी. गोरा रंग, लंबी नाक, लंबा कद, पतली कमर, मानो कोई अप्सरा हो. राघव मन ही मन उसे चाहने लगा था. उस के फोन की बैटरी और पैसे खत्म हो जाते, पर बातें नहीं. हर साल छठ पूजा पर पूजा भी सोनी भाभी के साथ उस से मिलने चली आती, लेकिन राघव की कभी हिम्मत नहीं हुई कि वह भी कभी उस के घर जाए. राघव जब भी गांव आता, उस से स्टेशन पर ही मिल कर चला जाता. प्यार वह भी उस से करती थी, पर बोलती नहीं थी. राघव उस से प्यार का इजहार करवा कर ही रहा. अब दोस्ती भूल कर प्यारमुहब्बत की बातें होने लगीं. बात शादी तक पहुंच गई. राघव ने हिम्मत कर के पड़ोसियों के जरीए अपने प्यार और शादी की बात मां तक पहुंचा दी. मां ने इस रिश्ते को एक बार में ही खारिज कर दिया. इस की वजह यह थी कि लड़की उन की बिरादरी की नहीं थी. पढ़ीलिखी है. शहर की रहने वाली है. गांव के बारे में क्या जानती है  मां के खयाल से शायद पूजा घरपरिवार न संभाल सके. उन को ऐसी लड़की चाहिए थी, जो घर को संभाल सके. घर तो पूजा संभाल ही लेती, पर मां को कौन समझाए. पुराने खयालों वाली मां जो एक बार बोल देती हैं, वही राघव के लिए पत्थर की लकीर हो जाता था. समय का पहिया अपनी रफ्तार से चलता रहा. राघव के दोस्तों, पड़ोसियों सभी ने उसे सलाह दी कि वह पूजा को भगा ले जाए. मां कुछ दिन नाराज रहेंगी, पर समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.

राघव आगेपीछे की सोचने लगा, ‘जैसे हर मां के सपने होते हैं, वैसे ही मेरी मां के भी सपने होंगे. वे सोचती होंगी कि उन के बेटे की शादी होगी. बैंडबाजा बजेगा, वे खुशी के मारे नाचेंगी…’

राघव ने भी सोच लिया था कि पूरे परिवार के सामने उस की शादी होगी. वह अपनी मां के सपनों को नहीं तोड़ सकता. एक दिन राघव ने पूजा को अपने मन की बात बता दी. वह सुन कर रोने लगी. रोया तो वह भी था.

कुछ सोच कर पूजा ने कहा, ‘‘आप की शादी किसी से भी हो, पर आप हमेशा खुश रहना. मां का दिल कभी मत तोड़ना. आप वहीं शादी कीजिएगा, जहां आप की मां चाहती हैं. जब तक हम दोनों में से किसी एक की शादी नहीं होती, तब तक हम दोस्ती के नाते बातें तो कर ही सकते हैं.’’ फिर पूजा छठ पूजा पर गांव नहीं आई. राघव भी उदास रहने लगा. उन दोनों ने क्याक्या सपने देखे थे कि शादी होगी, शादी के बाद घर पर ही वह कोई काम करेगा, पूजा बच्चों को ट्यूशन पढ़ाएगी और वह दुकान चलाएगा. कहते हैं न कि आदमी जो सोचता है, वह हमेशा पूरा होता है, बल्कि सच में सोचा हुआ काम कभी पूरा नहीं होता. जो राघव ने सोचा था, वह सब तो अधूरा ही रह गया.

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