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Waqf Board : अब वक्फ संपत्तियों पर गिद्ध नजर

Waqf Board : मुसलिम समाज के पास कितनी वक्फ संपत्ति है और उसे किस तरह उस से छीना जाए, मसजिदों पर पंडोंपुजारियों को कैसे बिठाया जाए, इस को ले कर लंबे समय से कवायद जारी है. इस के लिए एक्ट में संशोधन के बहाने भाजपा नेता जगदम्बिका पाल की अध्यक्षता में जौइंट पार्लियामैंट्री कमेटी का गठन किया गया, जिस में दिखाने के लिए कुछ मुसलिम नेता तो शामिल किए गए लेकिन उन के सुझावों या आपत्तियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

वक्फ संपत्तियों को ले कर मोदी सरकार की नीयत पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. जिस तरह देशभर में मसजिदों के नीचे मंदिर तलाशे जा रहे हैं और मसजिदों, मदरसों, कब्रिस्तानों, दरगाहों की जमीनों से मुसलिम समुदाय को खदेड़ने की कोशिशें की जा रही हैं, वह एक लोकतांत्रिक देश के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है. अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसी घटनाओं का संज्ञान ले कर समयसमय पर सरकार को फटकार न लगाए, कान न उमेठे और बुलडोजर की तालाबंदी न करे तो ध्रुवीकरण की बदौलत सत्ता की चाशनी चाटने वाली संघ और भाजपा की सरकारें (केंद्र और राज्य) देश में गृहयुद्ध की स्थितियां पैदा कर दें.

मुसलिम समाज के पास कितनी वक्फ संपत्ति है, उसे किस तरह उन से छीना जा सकता है, उसे किस तरह सरकार अपने हाथों में ले सकती है, मसजिदों की जगहें पंडेपुजारियों को कैसे सौंपी जाएं, इस को ले कर लंबे समय से कवायद जारी है.

इस के लिए बाकायदा भाजपा नेता जगदम्बिका पाल की अध्यक्षता में जौइंट पार्लियामैंट्री कमेटी (जेपीसी) का गठन किया गया, जिस में दिखाने के लिए मुसलिम नेता शामिल किए गए जबकि उन के सुझावों या आपत्तियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. उलटे, हंगामा करने और काम में बाधा बनने के आरोप लगा कर उन को कभी निष्कासित किया गया, कभी अध्यक्ष की मनमानी देख कर वे खुद वाकआउट कर गए.

मगर इस सारी उठापटक के बीच भी जगदम्बिका पाल ने दिल्ली चुनाव से पूर्व संशोधित बिल का मसौदा स्पीकर ओम बिरला के हाथों में सौंप ही दिया. कहा जा रहा है कि संशोधनों पर 16 सदस्यों ने पक्ष में वोट डाला तो 11 ने विरोध किया. विपक्षी सांसदों के विरोध के बावजूद समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल और सदस्य संजय जायसवाल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को रिपोर्ट सौंप दी. जिस में भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के 14 प्रस्ताव पारित कर दिए गए जबकि विपक्ष की तरफ से रखे सभी 44 प्रस्ताव खारिज कर दिए गए हैं. इस में वक्फ बोर्ड से प्रस्तावित 2 गैरमुसलिम सदस्यों को हटाने के सुझाव प्रमुख थे, जिन्हें नामित करने को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है. विपक्ष ने इस प्रक्रिया को वक्फ बोर्डों को नष्ट करने का प्रयास करार दिया है.

संशोधित एक्ट को जल्दी से जल्दी टेबल पर लाने की जरूरत भाजपा को इसलिए थी क्योंकि 5 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव होने थे. भाजपा यह सोच कर वक्फ संशोधन विधेयक पर रिपोर्ट को शीघ्र स्वीकार करने पर जोर दे रही थी कि एक बार फिर ध्रुवीकरण के जरिए चुनाव में बाजी मार ली जाए. 3 फरवरी को यह रिपोर्ट संसद में रखना तय भी हो गया था पर फिलहाल किन्हीं कारणों से इस को टालना पड़ गया. अब इसे 13 फरवरी को संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है.

भारत में लगभग 30 वक्फ बोर्ड हैं. ये 30 वक्फ बोर्ड 9 लाख एकड़ से अधिक भूमि पर फैली संपत्तियों का प्रबंधन करते हैं. इस का अनुमानित मूल्य 1.2 लाख करोड़ रुपए है. भारतीय रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद देश में सब से ज्यादा जमीन वक्फ बोर्ड के पास है. विधेयक 2024 पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की अगस्त में पहली बैठक हुई थी जिस में कई विपक्षी सदस्यों ने दावा किया था कि विधेयक के प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के कानूनों का उल्लंघन करते हैं. विपक्षी सदस्यों ने विधेयक में उल्लिखित विभिन्न धाराओं पर सवाल उठाए थे, जिन में विशेष रूप से जिला कलैक्टरों को विवादित संपत्ति के स्वामित्व पर निर्णय लेने का अधिकार देने के प्रस्ताव के साथसाथ गैरमुसलिमों को वक्फ बोर्ड के सदस्य के रूप में शामिल करने के प्रस्ताव पर सवाल उठाया गया था.

कमेटी पर आरोप

कांग्रेस सांसद और जेपीसी सदस्य सैयद नसीर हुसैन ने कमेटी पर गंभीर आरोप लगाए थे. नसीर हुसैन ने कहा कि, ‘मैं ने रिपोर्ट में जिन बातों पर असहमति जताई थी, उन्हें बिना अनुमति एडिट कर दिया गया. आखिर हमें चुप कराने की कोशिश क्यों हो रही है? यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक है.’

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी कहते हैं कि, ‘वक्फ एक्ट में संशोधन वक्फ संपत्तियों को छीनने के इरादे से किया जा रहा है. यह संविधान में दिए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रहार है. आरएसएस की शुरू से ही वक्फ संपत्तियों को छीनने की मंशा रही है.’

औल इंडिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली का कहना है कि, ‘हमारे पूर्वजों ने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दान कर दिया इसे इसलामी कानून के तहत वक्फ कहा गया. जहां तक वक्फ कानून का सवाल है, यह जरूरी है कि संपत्तियों का उपयोग सिर्फ उन धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए जिन के लिए इन्हें हमारे पूर्वजों ने दान किया था.

‘यह कानून है कि एक बार जब कोई संपत्ति वक्फ बन जाती है तो उसे न तो बेचा जा सकता है और न ही ट्रांसफर किया जा सकता है. जहां तक संपत्तियों के प्रबंधन का सवाल है, हमारे पास पहले से ही वक्फ अधिनियम 1995 है और फिर 2013 में कुछ संशोधन किए गए थे और वर्तमान में हमें नहीं लगता कि इस वक्फ अधिनियम में किसी भी प्रकार के संशोधन की जरूरत है.

‘यदि सरकार को लगता है कि संशोधन की कोई जरूरत है तो पहले हितधारकों से सलाहमशविरा करना चाहिए और उन की राय लेनी चाहिए. सभी को यह ध्यान रखना चाहिए कि वक्फ संपत्तियों का लगभग 60 से 70 फीसदी हिस्सा मसजिदों, दरगाहों और कब्रिस्तानों के रूप में है.’

इतिहासकार और मुसलिम विद्वान एस इरफान हबीब कहते हैं कि ‘सवाल सरकार की नीयत पर है कि कहीं वह वक्फ की जमीनों को हड़पना तो नहीं चाहती. अगर कोई कानून आ रहा है तो अच्छे के लिए आना चाहिए.’

कश्मीर के धार्मिक प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक का भी कहना है कि ‘वक्फ का मुद्दा बहुत गंभीर मामला है, खासकर जम्मूकश्मीर के लोगों के लिए क्योंकि यह एक मुसलिम बहुल राज्य है. कई लोगों को इस बारे में चिंताएं हैं और हम इन चिंताओं के बिंदुवार समाधान के लिए एक विस्तृत ज्ञापन तैयार कर बातचीत करना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि सरकार वक्फ मामलों में हस्तक्षेप करने से बचे. ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिस से जम्मूकश्मीर में माहौल खराब हो.’

बिल में अहम बदलाव

1. जेपीसी ने सलाह दी है कि संशोधित वक्फ एक्ट के क्लौज 3(9) में एक नया क्लौज और जोड़ा जाए कि अगर कोई प्रौपर्टी वक्फ संशोधन एक्ट के लागू होने से पहले वक्फ संपत्ति घोषित है तो वह वक्फ बाय यूजर वक्फ संपत्ति ही रहेगी सिवा ऐसी संपत्तियां, जिन पर या तो पहले से ही विवाद है या फिर सरकारी संपत्तियां हैं. वक्फ पर बनी जेपीसी को एएसआई, डीडीए, एल एंड डीओ जैसी सरकारी संस्थाओं ने बताया था कि उन की कई संपत्तियों पर वक्फ का दावा है, जिस से उन्हें समस्याएं आ रही हैं.

2. संशोधित वक्फ एक्ट में जहां कलैक्टर के पास किसी भी सरकारी संपत्ति को गलत तरीके से वक्फ घोषित करने की जांच करने का अधिकार था तो जेपीसी ने सलाह दी है कि एक्ट के सैक्शन 3सी (1),(2),(3) और (4) में संशोधन करने के लिए जांच का अधिकार कलैक्टर रैंक से ऊपर के किसी अधिकारी को दिया जाए, जिसे राज्य सरकार नामित करे.

3. जहां वक्फ संशोधन एक्ट में वक्फ संपत्तियों को एक्ट के लागू होने के बाद 6 महीने में पोर्टल पर दर्ज करवाने की समय सीमा लागू की गई थी तो जेपीसी ने सलाह दी है कि इस 6 महीने की समय सीमा में छूट मिलनी चाहिए और संशोधित सलाह के मुताबिक एक्ट में प्रावधान करना चाहिए कि मुतवल्ली के आवेदन पर वक्फ ट्रिब्यूनल इस 6 महीने की समय सीमा की मियाद को वाजिब कारण होने पर अपने अनुसार बढ़ा सकता है.

4. जहां केंद्र सरकार के वक्फ संशोधन बिल में सैक्शन 5 के सब सैक्शन 2 में नियम बनाया गया था कि राज्य सरकार की ओर से औकाफ की सूची नोटिफाई करने के 15 दिनों के भीतर इस सूची को पोर्टल पर अपलोड करना होगा, इस पर जेपीसी ने सलाह दी है कि सैक्शन 5 के सब सैक्शन 2(ए) जोड़ा जाए और इस समय सीमा को बढ़ा कर 15 दिन की जगह 90 दिन किया जाए.

5. केंद्र सरकार ने वक्फ संशोधन एक्ट में कानून रखा था कि संशोधित एक्ट के लागू होने के बाद और औकाफ संपत्तियों की सूची नोटिफिकेशन द्वारा जारी होने के 2 साल के भीतर ही कोई व्यक्ति इसे ट्रिब्यूनल में चैलेंज कर सकता था, लेकिन जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि क्लौज 7(ए) (आईवी) में संशोधन कर के इस समय सीमा को बढ़ाने का अधिकार ट्रिब्यूनल को दिया जाए. यानी कोई व्यक्ति अगर 2 साल के बाद भी ट्रिब्यूनल जाता है चैलेंज करने और ट्रिब्यूनल को अगर संतुष्ट करता है कि वह 2 साल तक इस वजह से नहीं आया तो ट्रिब्यूनल उसे स्वीकार कर सकता है.

6. केंद्र सरकार की ओर से संशोधित वक्फ एक्ट में नियम रखा गया था कि सैंट्रल वक्फ काउंसिल में कुल 8 से 11 सदस्य होंगे और इस का प्रमुख अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री एक्स औफिशियो होगा. साथ ही, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय या फिर विभाग का एक जौइंट सेक्रेटरी या फिर एडिशनल सेक्रेटरी लैवल का अधिकारी भी एक्स औफिशियो सदस्य होगा, लेकिन जेपीसी ने इस वक्फ संशोधित एक्ट के क्लौज 9 में संशोधन की सलाह दी है कि सैंट्रल वक्फ काउंसिल में एक्स औफिशियो सदस्यों के अलावा 2 गैरमुसलिम सदस्य होने चाहिए.

उदाहरण: सरकार के संशोधित बिल में अगर सैंट्रल वक्फ काउंसिल में अध्यक्ष यानी अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय या विभाग का अधिकारी गैरमुसलिम होंगे तो 2 गैरमुसलिमों की नियमतया गिनती पूरी हो जाएगी, लेकिन जेपीसी ने सलाह दी है कि एक्स औफिशियो के अलावा 2 गैरमुसलिम होने चाहिए, यानी अगर अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय या विभाग का अधिकारी गैरमुसलिम है तो भी 2 और गैरमुसलिम सदस्य हो सकते हैं.

7. जेपीसी ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि वक्फ एक्ट से ख्वाजा चिश्ती को बाहर रखा गया था. ऐसे में दाऊदी बोहरा समाज भी अलग तरह से अल दाई अल मुतलक सिस्टम से चलता है. ऐसे में मूल एक्ट में संशोधन किया जाए कि यह कानून किसी भी ऐसे ट्रस्ट पर लागू नहीं होगा जिसे किसी मुसलिम व्यक्ति द्वारा वक्फ जैसे उद्देश्यों के लिए बनाया गया हो चाहे वह ट्रस्ट इस कानून के लागू होने से पहले या बाद में बनाया गया हो या पहले से ही किसी अन्य कानून के तहत नियंत्रित हो. उस पर इस कानून का कोई असर नहीं पड़ेगा भले ही किसी अदालत ने कोई फैसला दिया हो.

8. केंद्र सरकार के संशोधित एक्ट में प्रावधान था कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्ड में कुल 2 ही गैरमुसलिम सदस्य हो सकते हैं तो यहां भी जेपीसी ने सलाह दी कि संशोधित एक्ट में बदलाव किया जाए कि राज्य या यूटी का जौइंट सेक्रेटरी या उस के ऊपर का अधिकारी एक्स औफिशियो सदस्य होगा और उस के अलावा राज्य के वक्फ बोर्ड में 2 गैरमुसलिम सदस्य हो सकते हैं.

9. वक्फ एक्ट के क्लौज 16 (ए) में प्रावधान था कि किसी व्यक्ति को वक्फ बोर्ड से हटाया जा सकता है, अगर वह मुसलिम न हो और 21 साल से कम उम्र का हो. जेपीसी ने सुझाव दिया है कि यह क्लौज संशोधित एक्ट के नियमों के खिलाफ है. ऐसे में मुसलिम न होने पर बोर्ड से हटाने वाले नियम को हटाया जाए और सिर्फ 21 साल की उम्र की ही सीमा रखी जाए.

10. केंद्र सरकार ने प्रावधान रखा था कि वक्फ संशोधन एक्ट के लागू होने के 6 महीने के भीतर ही कोई व्यक्ति वक्फ की ओर से किसी ऐसी संपत्ति पर वक्फ से जुड़े अधिकार लागू करने के लिए लिए कानूनी कार्यवाही कर सकता है. अगर वह संपत्ति वक्फ के रूप में दर्ज नहीं है. जेपीसी ने अपने सुझाव में इस समयसीमा को कोर्ट पर छोड़ने का सुझाव दिया है और संशोधित सुझाव दिया है कि यदि कोई व्यक्ति कोर्ट में यह साबित कर सके कि वह उचित कारणों से 6 महीने की समयसीमा के भीतर आवेदन दाखिल नहीं कर सका तो न्यायालय इस समयसीमा के बाद भी उस का आवेदन स्वीकार कर सकता है.

11. जहां पुराने वक्फ एक्ट में प्रावधान था कि वक्फ संपत्ति की देखभाल को ले कर वक्फ बोर्ड का आदेश आखिरी होगा और कोई व्यक्ति 60 दिन में ट्रिब्यूनल जा कर अपील कर सकता है, लेकिन ट्रिब्यूनल सुनवाई के दौरान बोर्ड के आदेश पर रोक नहीं लगा सकता है. नए वक्फ संशोधन एक्ट में बोर्ड का आदेश से आखिरी शब्द हटाया गया और 60 दिन तक अपील की समयसीमा ही रखी थी, साथ ही, आदेश पर रोक का नियम भी हटा दिया गया था. जेपीसी ने सुझाव दिया है कि अपील की समयसीमा 60 से 90 दिन की जाए.

12. जहां पुराने एक्ट में प्रावधान था कि वक्फ की संपत्ति, जिसे कम से कम 5 हजार रुपए सालाना किराए या अन्य कदम से आ रहे हैं, वहां का मुतवल्ली कम से कम 5 प्रतिशत रकम वक्फ को कार्य के लिए वापस दान देगा. केंद्र सरकार ने इसे संशोधित एक्ट में 7 प्रतिशत किया था, जिसे जेपीसी ने फिर से 5 प्रतिशत करने का सुझाव दिया है.

13. जहां पुराने वक्फ कानून के तहत वक्फ ट्रिब्यूनल के 3 सदस्य होंगे, जिन में एक जिला जज या उस से ऊपर का अधिकारी, एक एडीएम या उस से ऊपर का अधिकारी और तीसरा मुसलिम कानून का जानकार. केंद्र सरकार ने संशोधित कानून में मुसलिम कानून के जानकार को हटा कर सिर्फ 2 सदस्यी ट्रिब्यूनल को रखा था, लेकिन जेपीसी ने देशभर में 19 हजार से ज्यादा मामले वक्फ ट्रिब्यूनल में लंबित होने के कारण सलाह दी है कि वक्फ संशोधित एक्ट में पहले के जैसे 3 सदस्य ट्रिब्यूनल में रहें जिन में तीसरा सदस्य इसलामिक कानून का जानकार हो.

14. जहां पुराने वक्फ कानून में ट्रिब्यूनल की ओर से किसी केस पर फैसला देने की समयसीमा नहीं निर्धारित थी तो नए वक्फ संशोधन एक्ट में केंद्र सरकार ने प्रावधान किया था कि 6 महीने में वक्फ ट्रिब्यूनल को केस पर फैसला देना है और अगर नहीं दिया तो समय 6 महीने और बढ़ाया जा सकता है, लेकिन ट्रिब्यूनल को पक्षों को लिखित में देना होगा कि क्यों 6 महीने में वह फैसला नहीं दे पाया. यानी, संशोधित कानून में सरकार ने कुल 12 महीने की अधिकतम सीमा रखी थी, जिस में ट्रिब्यूनल को फैसला देना ही था, लेकिन जेपीसी ने अपने सुझाव में इस समयसीमा को हटाने की सिफारिश की है.

15. जहां पुराने वक्फ एक्ट में नियम था कि अगर वक्फ की कोई जमीन भूमि अधिग्रहण नियम के तहत ली जाएगी तो कलैक्टर को वक्फ बोर्ड को सूचना देनी होगी और बोर्ड के पास कलैक्टर के सामने पेश हो कर अपना पक्ष रखने के लिए 3 महीने का अधिकतम समय होगा, लेकिन नए कानून में केंद्र ने यह समयसीमा घटा कर 1 महीने कर दी थी, जिसे जेपीसी ने बढ़ा कर 3 महीने करने की सिफारिश की है.

16. पुराने वक्फ कानून के तहत वक्फ की संपत्ति लिमिटेशन एक्ट 1963 के तहत नहीं आती थी, यानी वक्फ बोर्ड जब चाहे तब अपनी किसी भी संपत्ति को हासिल करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता था और उसे यह अधिकार पुराने वक्फ कानून की धारा 107,108,108ए के तहत मिला था, जिसे केंद्र सरकार ने संशोधित वक्फ एक्ट से हटा दिया था. जेपीसी ने सलाह दी है कि संशोधित वक्फ एक्ट में सैक्शन 40 (ए) जोड़ा जाए और नियम बनाया जाए कि जिस दिन से वक्फ संशोधन एक्ट 2025 लागू होगा उस दिन से इस पर लिमिटेशन एक्ट भी लागू होगा.

उदाहरण: एएसआई, रेलवे समेत कई संपत्तियों पर वक्फ का दावा है, जो कई वर्षों से वक्फ के पास नहीं हैं. तमिलनाडु के जिस गांव पर वक्फ ने दावा किया था वो भी इस का उदाहरण है, लेकिन क्योंकि वक्फ संपत्ति पर लिमिटेशन एक्ट 1963 नहीं लागू था तो वह वक्फ जब चाहे तब कब्जा वापस लेने की मांग और कानूनी दावपेंच शुरू कर सकता था, 100 साल, हजारों साल बाद भी. लेकिन लिमिटेशन एक्ट 1963 लागू होने के बाद वक्फ दूसरे के कब्जे में अपनी कथित संपत्ति पर दावा सिर्फ कब्जे के 30 साल के अंतराल में ही कर सकता है.

आगे का अंश बौक्‍स के बाद 

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वक्फ क्या है

वक्फ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘कारावास और निषेध’ या किसी चीज को रोकना या स्थिर रखना. इसलामी कानून के अनुसार, एक बार जब कोई संपत्ति वक्फ के रूप में दान कर दी जाती है तो उसे बेचा, हस्तांतरित या उपहार के रूप में नहीं दिया जा सकता है. वक्फ का अर्थ है किसी व्यक्ति द्वारा किसी चल या अचल संपत्ति को मुसलिम कानून द्वारा पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए स्थायी रूप से समर्पित करना.

संबंधित व्यक्ति की मौत के बाद वक्फ की गई संपत्ति का इस्तेमाल उस का परिवार नहीं कर सकता. उस संपत्ति को वक्फ का संचालन करने वाली संस्था सामाजिक काम में इस्तेमाल करेगी. वक्फ की संपत्ति का कोई मालिक नहीं होता. वक्फ की संपत्ति का मालिक खुदा को माना जाता है.

वक्फ पर विवाद क्यों

वक्फ अधिनियम के सैक्शन 40 पर बहस छिड़ी है. बोर्ड का मानना है कि कोई संपत्ति वक्फ की संपत्ति है तो वह खुद से जांच कर सकता है और वक्फ होने का दावा पेश कर सकता है. अगर उस संपत्ति में कोई रह रहा है तो वह अपनी आपत्ति को वक्फ ट्रिब्यूनल के पास दर्ज करा सकता है. ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. मगर यह प्रक्रिया काफी जटिल हो जाती है.

दरअसल, अगर कोई संपत्ति एक बार वक्फ घोषित हो जाती है तो हमेशा ही वक्फ रहती है. इस वजह से कई विवाद भी सामने आए हैं. सरकार का कहना है कि ऐसे विवादों से बचने की खातिर संशोधन विधेयक ले कर आई है. इस से मुसलिम महिलाओं को भी बोर्ड में प्रतिनिधित्व मिलेगा.
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आगे पढ़ें…

क्या है वक्फ एक्ट 1954

वक्फ एक्ट मुसलिम समुदाय की संपत्तियों और धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन और नियमन के लिए बनाया गया कानून है. इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य वक्फ संपत्तियों का उचित संरक्षण और प्रबंधन सुनिश्चित करना है ताकि धार्मिक और चैरिटेबल उद्देश्यों के लिए इन संपत्तियों का उपयोग हो सके. देश में सब से पहली बार 1954 में वक्फ एक्ट बना. इसी के तहत वक्फ बोर्ड का जन्म हुआ.

इस कानून का मकसद वक्फ से जुड़े कामकाज को आसान बनाना था. एक्ट में वक्फ की संपत्ति पर दावे और रखरखाव तक के प्रावधान हैं. 1955 में पहला संशोधन किया गया. 1995 में एक नया वक्फ बोर्ड अधिनियम बना. इस के तहत हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में वक्फ बोर्ड बनाने की अनुमति दी गई. बाद में साल 2013 में इस में संशोधन किया गया था.

सरकार और विपक्ष का तर्क

सरकार का तर्क है कि 1995 में वक्फ अधिनियम से जुड़ा मौजूदा विधेयक है. इस में वक्फ बोर्ड को अधिक अधिकार मिले. 2013 में संशोधन कर के बोर्ड को असीमित स्वायत्तता प्रदान की गई. सरकार का कहना है कि वक्फ बोर्डों पर माफियाओं का कब्जा है. सरकार का कहना है कि संशोधन से संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं किया गया है. इस से मुसलिम महिलाओं और बच्चों का कल्याण होगा.

इसलामिक देशों में वक्फ संपत्ति

सभी इसलामिक देशों में वक्फ संपत्तियां नहीं हैं. तुर्की, लीबिया, मिस्र, सूडान, लेबनान, सीरिया, जौर्डन, ट्यूनीशिया और इराक जैसे इसलामिक देशों में वक्फ नहीं है. हालांकि भारत में न केवल वक्फ बोर्ड सब से बड़ा शहरी भूस्वामी है, बल्कि उस के पास कानूनी रूप से उन की सुरक्षा करने वाला एक अधिनियम भी है.

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लूट सको तो लूट लो

हिंदू धर्म के इतिहास की नींव ही जमीनों की लड़ाई पर पड़ी है. वर्तमान में देशभर की छोटीबड़ी अदालतों में कोई 68 फीसदी मुकदमे जमीनी विवाद के चल रहे हैं. महाभारत की लड़ाई जिस में लाखों बेगुनाह मारे गए और खरबों की बरबादी हुई, सिर्फ जमीन के लिए हुई थी. कौरव कहते थे एक बीता भी नहीं देंगे.

कहानी के मुताबिक, पांडव तो इस के लिए तैयार थे लेकिन शांतिदूत बन कर कृष्ण ने धर्म और कर्म के नाम पर जो संहार करवाया वह सनातनियों की रगों में रक्त संस्कार बन कर दौड़ रहा है. एक पुरानी कहावत है, ‘झगड़े की जड़ तीन, जर जोरू और जमीन’. इन में से जोरू को अब ले कर झगड़े कम होते हैं क्योंकि वह अब हजारपांच सौ रुपए में किसी भी बदनाम इलाके में, टैम्परेरी ही सही, मिल जाती है. वैसे भी, कोई गले में ढोल लटका कर कानूनी, सामाजिक और पारिवारिक झंझंट मोल नहीं लेना चाहता.

कीमती होने के चलते जमीनें सब को प्रिय होती हैं और दूसरों की तो कुछ ज्यादा ही भाती हैं. अपनों की जमीन दबाने और कब्जाने का तो मजा ही कुछ और है. भाईभाई लड़ रहे हैं, पड़ोसीपड़ोसी लड़ रहे हैं, चाचाभतीजा एकदूसरे का सिर फोड़ रहे हैं और अब तो पतिपत्नी और भाईबहन भी लड़ने लगे हैं. यह सब महज इसलिए कि हिंदू धर्म सिखाता है कि जैसे भी हो, हड़प लो, छीन लो और सामने वाला कमजोर हो तो लाठी के दम पर कब्जा लो. यानी, वीर भोग्या वसुंधरा की तर्ज पर चलो.

मुसलमान अब हिंदू राज के चलते बेहद कमजोर हो चले हैं, इसलिए वक्फ कानून लाया जा रहा है जिस से उन की जमीनजायदाद कानूनी तौर पर हथियाई जा सकें. सरकार की मंशा वक्फ की आड़ में हिंदुओं का दिल खुश करने की है कि देखो, हम भी इन की कमर आर्थिक तौर पर तोड़ रहे हैं, तुम लोग उन का आर्थिक बहिष्कार करते रहो. अब्दुल से पंचर मत जुड़वाओ, सलीम से सब्जी मत खरीदो तो यह कौम खुदबखुद खत्म हो जाएगी और दलित-आदिवासियों जैसी असहाय हो जाएगी. फिर तुम सहूलियत और इत्मीनान से इन्हें खदेड़ कर जमीनें अपने कब्जे में लेते रहना और वक्त आने पर हम वक्फ की जमीनों को अपने हिसाब से इस्तेमाल करते रहेंगे.

दलितोंपिछड़ों और आदिवासियों की अधिकतर जमीनें दबंगों ने कब्जा रखी हैं. ये लोग अपनी ही जमीनों पर दिहाड़ी पर मजदूरी करते हैं. एवज में पेट भरने के लिए मेहनताना मिल जाता है. यही हाल अब मुसलमानों का हो तो हैरानी नहीं होनी चाहिए, फिर वे तो विधर्मी हैं, उन्हें कोई हक नहीं कि वे जमीनों के मालिक बनें. जमीनें हिंदुओं की हैं जो मुसलमानों के पास मुगल हुकूमत के दौरान आई हों या उन्होंने खरीदी हों इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. देश सवर्ण हिंदुओं का है. दौर उन्हीं का है. हुकुमत उन्हीं की है. इसलिए संविधान का छद्म लिहाज करते उन्हें भूमिधारी बनाना सरकार का फर्ज है, इसलिए वह वक्फ कानून ला रही है.

वक्फ की जमीनें राष्ट्रहित में नहीं बल्कि धर्म की रक्षा के लिए छीनी जाएंगी. वैसे भी राष्ट्र और धर्म में फर्क कर पाना अब मुश्किल काम नहीं रह गया है. धर्म ही राष्ट्र है जिस में मुसलमान भी दलित-आदिवासियों की तरह गुलाम बन कर रहें, यही उन के लिए बेहतर है. मुगलों की कथित लूट का बदला मोदी सरकार ले रही है. इस से लोकतंत्र हो न हो, धर्मतंत्र जरूर मजबूत हो रहा है जिस के लिए सरकार को चुना गया है. ……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………….

New Webseries : ‘उप्पस ! अब क्या ?’ – सैक्स न करने वाली लड़की हुई गर्भवती..

New Webseries : ‘उप्पस ! अब क्या ?’

रेटिंगः दो स्टार

2002 में अमेरिका व स्पेन में एक शो ‘जेन द वर्जिन’ (स्पेनिश शीर्षक- जुआना ला विर्जेन) प्रसारित हुआ था, इसे 2002 का वेनेजुएला टेलीनोवेला भी कहा जाता है, जिसे पेरला फरियास ने लिखा और आरसीटीवी ने इस का निर्माण किया था. इसे आरसीटीवी इंटरनेशनल द्वारा दुनियाभर में वितरित किया गया था. इसी पर भारत में 2005 से 2007 तक एक टीवी सीरियल ‘एक लड़की अनजानी’ सी बनी थी. फिर वेनेजुएला टेलीनोवेला का अमरीका में रीमेक कर 2014 से 2019 के बीच ‘जेन एंड वर्जिन’ के नाम से प्रसारित हुआ था.

इसी का हिंदी रीमेक वेब सीरीज ‘उप्स! अब क्या’ ले कर निर्देशक प्रेम मिस्त्री और देबात्मा मंडल आए हैं, जो कि 20 फरवरी से ‘जियो स्टार’ पर स्ट्रीम हो रही है. मूल वेनेजुएला शो और इस का अमेरिकी रीमेक उन संस्कृतियों पर आधारित थे, जिन में गर्भपात और गर्भनिरोधक विवादास्पद मामले थे.

कहानी

इस सीरीज की कहानी रूही जानी (श्वेता बसु प्रसाद) से शुरू होती है. 27 साल की रूही जानी एक पांच सितारा होटल में ड्यूटी मैनेजर है और अपनी नानी सुभद्रा (अपरा मेहता) से किए वादे के कारण अभी भी कुंवारी है, अभी तक सैक्स नही किया है. जबकि वह पिछले तीन साल से पुलिस अफसर ओमकार के साथ प्रेम संबंध में है. रूही का प्रेमी ओमकार (अभय महाजन) रूही के प्रति गहराई से प्रतिबद्ध है और आधिकारिक तौर पर शादी होने तक इंतजार करने के लिए सहमत है.
सुभद्रा ने रुही से यह आश्वासन इसलिए लिया था, क्योंकि उन की बेटी और रूही की मां, पाखी (सोनाली कुलकर्णी) किशोरावस्था में गर्भवती हुई थी और उस के प्रेमी ने गर्भपात न कराने पर पाखी से हमेशा के लिए संबंध खत्म कर दिए थे और यह तथ्य एक रूढ़िवादी समाज में सामाजिक शर्मिंदगी का कारण बना था. लेकिन अब रूही, पाखी और सुभद्रा तीनों एक घनिष्ठ परिवार की तरह रहते हैं, और हर शाम एक साथ अपने पसंदीदा टेलीविजन धारावाहिक देखते हैं.

लेकिन कभी सैक्स न करने वाली रूही डाक्टर रोशनी की गलती के चलते गर्भवती हो जाती है. डाक्टर रोशनी अपने सौतेले भाई और रूही के बौस होटल के मालिक समर (आशिम गुलाटी) के शुक्राणु को गलती से रूही के गर्भाशय में इंजैक्ट कर देती है. समर प्रताप उस का सात साल पुराना पूर्व क्रश भी है. उस के बाद रूही (श्वेता बसु प्रसाद) जबरन मातृत्व के साथसाथ अपने परिवार, प्रेमी और उस जोड़े की प्रतिक्रियाओं से निबटती है जिन के लिए उस का कोई इरादा नहीं था.

इस के बाद रूही की व्यक्तिगत नैतिकता, आधुनिक प्रेम, धैर्यवान प्रेमी, परंपरा और पसंद की जटिल परस्पर क्रिया के बीच एक रस्साकशी शुरू हो जाती है. सच जानने के बाद रूही गर्भपात कराना चाहती है, पर फिर वह उस बच्चे को समर व उस की पत्नी अलीशा को दे देने के लिए जन्म देने का फैसला करती है. अलीशा के इस बच्चे की मां बनना स्वीकार करने के पीछे उस की धन पिपासा की कुत्सित चाल है.

समर और उस की पत्नी अलीशा (एमी ऐला) को अपने बच्चे के लिए उपयुक्त मातापिता के रूप में आंकने की रूही की कोशिश कहानी में हास्य और मार्मिकता दोनों जोड़ती है, जबकि उस के लंबे समय से खोए हुए पिता से जुड़ा एक समानांतर उपकथा पीढ़ीगत विमर्श में एक और परत जोड़ता है. कहानी में ड्रग्स तस्कर से ले कर प्लास्टिक सर्जरी भी है.

समीक्षा

कहानी में भावनात्मक उतारचढ़ाव, नाटकीयता और कौमेडी का मिश्रण होते हुए भी बोर करती है. सैक्स न करने और नानी की सलाह पर अमल करने के बावजूद रूही के गलत ढंग से गर्भवती हो जाने पर उस की मानसिक हालत व उस की मन की व्यथा को ठीक से चित्रित नही किया गया. सब कुछ मजाक बना दिया गया.

इस के अलावा कथावाचक यानी कि सूत्रधार द्वारा की गई अतिव्याख्या सीरीज के आकर्षण पर कुठाराघाट करती है. चुटकुले महज हवा में ही रह जाते हैं. लेकिन यह सीरीज अपने विचित्र, अराजक माहौल पर कायम रहते हुए सामाजिक मानदंडों और पाखंडों पर प्रहार भी करती है. फिल्म में रूही के प्रेमी ओमकार को रूही के सामने जितना लाचार और उस की हर सही या गलत बात को मानते हुए दिखाया गया है, वह बहुत अजीब सा लगता है. प्रत्येक एपिसोड के 40 मिनट में भी कई दृश्य जबरन ठूंसे गए हैं.

गति अत्यंत धीमी है, जो पतली कथा को खींचती है. लेखक और निर्देशक कहानी को खींचते व फैलाते चले गए, पर उसे कैसे समेटा जाए, यह समझ में नही आया, तो आठवें एपिसोड में बेतरतीब तरीके से लपेट दिया. छठवें एपिसोड में तो कुछ सीन एकता कपूर के लगभग पंद्रह साल पुराने पौपुलर सीरियल ‘‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ से चुराए गए हैं. पर निर्देशक ने इस बात की ओर सफलतापूर्वक इशारा किया है कि परिवार और जीवन में आने वाले अप्रत्याशित मोड़ों की कल्पना कोई नहीं कर सकता. कई दृश्य ऐसे हैं जिन्हें देख कर लगता है कि आखिर यह हो क्या रहा है?

अभिनय

भ्रमित नानी की इच्छा के चलते कौमार्य को भंग होने से बचाने वाली जटिल लड़की रूही के किरदार में श्वेता बसु प्रसाद ने जान डाल दी है, मगर उन्हें पटकथा से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. सुभद्रा के किरदार में अपरा मेहता के हिस्से कुछ खास दृश्य नही आए. पाखी के किरदार में सोनाली कुलकर्णी का अभिनय शानदार है. वराज के किरदार में जावेद जाफरी निराश करते हैं, वैसे लेखकों ने उन के किरदार को सही ढंग से लिखा भी नहीं है. ओमकार ने अपने किरदार को बहुत संजीदा ढंग से निभाया है. पटकथा का सहयोग न मिलने पर भी उन की मेहनत नजर आती है. समर के किरदार में आशिम गुलाटी निराश करते हैं.

Party Tips : मेलजोल के अवसर, बुफे पार्टी

Buffet Party : बूफे पार्टी में मेहमान भोजन और अच्छे समय का आनंद लेने के साथसाथ सोशल गैदरिंग के चलन को भी जीवित रखते हैं. यह अवसर न केवल खानपान के लिए होता है बल्कि यह लोगों के बीच बातचीत, हंसीमजाक और आपसी विचारों के आदानप्रदान का एक साधन भी है.

पति के औफिस में एक सहकर्मी की बेटी की शादी थी. औफिस से घर आ कर पति ने मुझे कार्ड दिखाया. मैं ने उन्हें कहा कि वे अकेले जा कर शादी अटैंड कर आएं. शादियों का सीजन था और बहुत सारे कार्ड घर में आए थे. अपनी व्यस्त दिनचर्या के साथ सब जगह जाना संभव भी नहीं हो पाता. हां, कोशिश जरूर रहती है कि थोड़ी देर के लिए जा कर सब से मेलमुलाकात व शगुन दे कर वापस आ जाऊं. हमारी यह बातचीत चल ही रही थी कि पति के मोबाइल पर घंटी बजी.

‘सोमेश का फोन है,’ उन्होंने बताया. वही सोमेशजी जिन की बेटी की शादी का कार्ड आज मिला था. फोन उठाने पर सोमेशजी ने मुझ से भी बात करने की इच्छा जाहिर की. दरअसल मेरे पति उन के सीनियर थे और स्वभाव से भी सज्जन, इसलिए स्टाफ के सभी लोग उन से बहुत ही अदब से पेश आते थे. पति ने मेरी तरफ फोन बढ़ाते हुए कहा, ‘लो, बात करो.’

मैं ने सोमेशजी को बिटिया की शादी की बधाई दी और उन्होंने मुझ से जरूर आने का आग्रह किया. उन के आग्रह में इतनी आत्मीयता थी कि मैं मना नहीं कर पाई. ‘हम दोनों जरूर आएंगे, भाईसाहब,’ कह कर मैं ने फोन रख दिया. तय तिथि को हम दोनों पतिपत्नी विवाह समारोह में शामिल होने के लिए निकल गए. बैंक्वेट हौल में पहुंच कर जैसे ही कार पार्क कर रहे थे तो सोमेशजी वहीं दिख गए. बहुत ही आदर के साथ वे हम दोनों को लौन में ले गए. वहां पर कुछ और मित्रों से मुलाकातें हुईं.

यकीनन इस तरह के आयोजन में जाने का मेरा मकसद यही रहता है कि अपने पुराने परिचितों से मुलाकात हो जाए और कुछ नए लोगों से भी परिचय हो जाए. समाज में इस तरह का मेलजोल बहुत जरूरी है खासकर आज के समय में जब एक मोबाइल में सारी दुनिया कैद हुई जा रही है. मानो, किसी को किसी की जरूरत ही नहीं है. एक घर में 4 लोग हैं लेकिन सब अपनेअपने मोबाइल में सिर दे कर बैठे रहते हैं. ऐसे में ये समारोह अवसादग्रस्त मन के लिए दवा का काम करते हैं.

लौन में चारों तरफ ढेर सारे स्टौल लगे हुए थे. हम से कुछ लेने का आग्रह करने के बाद सोमेशजी अपने काम में व्यस्त हो गए. मुझे प्यास लगी थी. पानी पीने के इरादे से उस तरफ बढ़ी. बरात अभी तक आई नहीं थी लेकिन हम ने देखा कि लोग खाने में मस्त थे. जबकि एक समय था जब बरातियों के सम्मान में घराती यानी लड़की की तरफ से आने वाले मेहमान सब से आखिर में खाना खाते थे. चलिए, आज बराबरी का जमाना है, कह कर इस बात को यहीं पर विराम दे देते हैं लेकिन शादी के आयोजन में, खासकर खाने के मैदान में ऐसे बहुत सारे शूरवीर उदाहरण बन कर मिल जाते हैं जो या तो हास्यास्पद लगते हैं या जिन्हें देख कर तरस आता है.

सामाजिक मेलजोल के अवसर

सामाजिक मेलजोल होने की वजह से बड़ी संख्या में निमंत्रणपत्र मिलते रहते हैं. तरहतरह के लोग, उन की तरहतरह की आदतें नजर से बच नहीं पातीं. कुछ उदाहरण इसे आसान बना देंगे. मेरे एक करीबी रिश्तेदार की शादी थी. शहर के एक प्रसिद्ध डाक्टर, जो शायद उन के अच्छे परिचित रहे हों, को मैं ने कोटपैंट पहने हुए आते हुए देखा. मैं भी कई बार उन के क्लीनिक में गई थी और परिचय भी था, इसलिए मेरे मन में विचार आया कि उन से बातचीत जरूर करूंगी. ऐसे मौके पर अकसर भोजन के समय परिचितों से मुलाकात हो जाती है.

मैं भी इसी अवसर की तलाश कर रही थी. तभी मैं ने देखा कि डाक्टर लड़की की मां यानी मेरी चाचीजी के पास गए और उन्हें मुसकराते हुए एक लिफाफा थमाया. चाचाजी के कुछ कहने पर उन्होंने सिर हिलाया. मैं ने अंदाजा लगा लिया कि ‘खाना खाए बिना मत जाना’ कहा होगा क्योंकि मेजबान को अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच भी इस बात का ध्यान रखना ही होता है कि कोई भी मेहमान बिना खाना खाए न जाने पाए.

मेरी नजर डाक्टर साहब पर ही थी. बहुत ही कुशल चिकित्सक होने के साथसाथ वे बड़े सज्जन इंसान भी थे. मैं ने उन्हें खाने के स्टौल की तरफ जाते देखा पर यह क्या, उन्होंने खाने की प्लेट नहीं उठाई बल्कि एक छोटी सी बाउल में कुछ स्वीट ले कर उसे खा कर तुरंत भागते हुए वहां से निकल गए.

खैर, ये तो डाक्टर थे. हम कह सकते हैं कि हैल्थ कौन्शस होंगे. मैं ने बहुत सारे ऐसे लोग देखे हैं जो विवाह के अवसर पर ‘लिफाफे के बदले खाना जरूरी ही है’ इस बात से इत्तफाक नहीं रखते. सब से पहला उदाहरण अपनी मां का देना चाहूंगी जिन की उम्र आज 80 साल है. हमारे बचपन में निकट रिश्तेदारी में बुलावा आने पर वे हमें जरूर ले जाती थीं लेकिन हर किसी निमंत्रण में हमें साथ नहीं ले जाती थीं.

मैं ने उन्हें आज तक कभी भी किसी शादी में खाना खाते हुए नहीं देखा. अपने घर की सादी रोटीसब्जी खा कर वे आज भी इस उम्र में एक स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रही हैं. न शुगर, न हाई ब्लडप्रैशर और न कोई दूसरी परेशानी. यह सब संतुलित आहार और नियमित दिनचर्या का नतीजा है. याद रखें कि जो भोजन जीभ को आनंद देता है वह पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है. शादी में जब भी लोग जाते हैं तो उन की कोशिश रहती है कि लिफाफे में धनराशि तो कम से कम दी जाए लेकिन भोजन भरपेट खा लिया जाए जबकि सचाई यह है कि इस तरह के अवसर मेलजोल का बहाना ले कर आते हैं.

एक जमाना था जब शादीब्याह के कार्यक्रम आपसी मेलजोल के अवसर होते थे. कई नए रिश्ते बन जाते थे. लोग अपने बच्चों के लिए जीवनसाथी भी इन्हीं मुलाकातों के दौरान पसंद कर लेते थे. आज के समय में ये आयोजन घर से बाहर बैंक्वेट हौल में होने लगे हैं. मेहमान भी घर से बाहर होटल में ही ठहरते हैं. कौन आयागया, पता ही नहीं चलता.

खानापीना और मौजमस्ती

बीते दिनों एक नारा बहुत प्रचलित हुआ था, ‘उतना ही लो थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में.’ लेकिन अधिकतर लोग इस बात का बिलकुल भी ध्यान नहीं रखते. अभी कुछ दिनों पहले मैं पढ़ रही थी कि भारतीय लोग पढ़ाई से ज्यादा खर्च शादी में करते हैं. यह बात सच है क्योंकि हमें अपना सामाजिक स्तर बनाए रखना होता है और अगर लड़की की शादी है तो बरातियों को खुश करना भी लड़की वालों की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी हो जाती है. एक पिता बच्चों की शादी में अपनी उम्रभर की कमाई लगा देता है.

शुभ अवसरों की बात अगर छोड़ दें तो आजकल किसी आदमी की मृत्यु होने पर भी बारहवेंतेरहवें दिन जो भोज लोगों को कराया जाता है वह किसी पार्टी से कम नहीं होता. बीच में कुछ बुद्धिजीवी लोगों ने इस का विरोध भी किया था लेकिन चूंकि व्यक्तिगत मामला है तो आप ज्यादा दखल नहीं दे सकते. शादी के अलावा आजकल जन्मदिन, एनिवर्सरी, सगाई जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिन में खानापीना और मौजमस्ती ही होती है.

साथ ही, इस तरह के आयोजनों में बहुत ज्यादा स्टौलों को रखने से कोई फायदा नहीं है. इस से अन्न की बरबादी तो होती ही है, साथ ही, इस में दिखावा भी साफ झलकता है. समर्थ व्यक्ति तो कहीं भी कुछ भी खा लेता है. इस पैसे का इस्तेमाल असमर्थ लोगों को भोजन करा कर किया जा सकता है. यह मेरा व्यक्तिगत विचार है. दरअसल ये सामाजिक आयोजन मात्र खानपान की व्यवस्था ही नहीं बल्कि सामाजिक मेलजोल के महत्त्वपूर्ण कारक होते हैं.

आज अकेलेपन की वजह से इंसान अवसाद में रहता है. एक परिवार के 4 सदस्य भी अपनेअपने गैजेट्स के साथ अलगअलग कमरों में बंद रहते हैं. न जाने आधुनिकता की ऐसी क्या बयार चली कि आज इंसान अकेला होता जा रहा है. दो खौफनाक साल, जो कोरोना के साथ बीते, वे भी इंसान को एकाकी बनाने के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. कोरोना ने इंसान की मनोदशा ही बदल दी थी.

दूर करता है तनाव

आज समाज में एक खोखलापन देखने को मिल रहा है. ऐसा भी नहीं कि इंसान को किसी की जरूरत ही न हो. कुछ समय सोशल मीडिया खा जाता है, थोड़ा हिचक और संकोच और थोड़ा पहल न करने की जिद और यहां पर यह बात दीगर है कि महिलाएं बेहतर सामाजिक संबंध पुरुषों की तुलना में आसानी से बना लेती हैं.

एक समय था जब उन के घर से बाहर निकलने में पाबंदी थी या वे खुद ही घर के कामों में उलझ रहती थीं लेकिन आज वे अपने व्यक्तित्व को संवारने की पूरी कोशिश कर रही हैं. वे नौकरी करें या न करें लेकिन किसी न किसी सामाजिक सेवा के बहाने या किटी पार्टी के बहाने घर से बाहर निकलती हैं और अपनी साथी महिलाओं से मेलजोल बढ़ाती हैं. शायद इसीलिए वे पुरुषों के मुकाबले में कम तनाव रहित रहती हैं.

शादीब्याह, बर्थडे पार्टीज, मैरिज एनिवर्सरी जैसे फंक्शन पारिवारिक फंक्शन हैं जो महिलाओं के साथसाथ पुरुषों व बच्चों को भी सामाजिक जीवन जीने की वजह देते हैं. अधिकतर पुरुष अपने कामकाज में इतने व्यस्त रहते हैं कि दोस्तों और नातेदारों के लिए उन के पास समय ही नहीं रहता और धीरेधीरे समाज से कट जाते हैं.

पुरुष ही क्या, कई महिलाएं भी अपनी व्यस्त जीवनशैली की वजह से समाज से कट जाती हैं. रीना का ही उदाहरण लें. एक समय था जब वह अपनी नौकरी और उस के अतिरिक्त पार्टटाइम जौब में इतना व्यस्त थी कि पैसा तो बेशुमार आ रहा था लेकिन सामाजिक जिंदगी खत्म होती जा रही थी. समय रहते ही उसे इस बात का आभास हुआ और उस ने पार्टटाइम जौब का लालच छोड़ कर सखियोंसहेलियों व दोस्तों को समय देना शुरू किया. कुछ सामाजिक संगठनों से भी वह जुड़ गई. इस तरह उस ने अपनेआप में एक बहुत बड़ा बदलाव महसूस किया जो दिनभर व्यस्त जिंदगी में कभी भी हासिल न हुआ.

लेकिन सभी लोग रीना की तरह नहीं होते. अपनी युवावस्था और जवानीभर आदमी नौकरी करता है और अपने परिवार के इर्दगिर्द ही घूमता रहता है. धीरेधीरे बच्चे पढ़लिख कर घर से दूर चले जाते हैं और रिटायरमैंट की बेला नजदीक आ जाती है. ऐसे में फिर इंसान को अकेलापन काटने को आता है. ऐसे वक्त में इंसान को समाज और पुराने दोस्त ही संभालते हैं.

सामाजिक मेलजोल का एक सुंदर उदाहरण देखें, दूसरे शहर में रहने वाली मेरी सहेली की बेटी के पीजी में कुछ काम चल रहा था, इसलिए कुछ दिनों के लिए वह मेरे पास रह कर पढ़ाई कर रही थी. वह स्थानीय शौर्ट फिल्मों में काम करने के अलावा मौडलिंग भी करने लगी थी. इसी दौरान हमें एक विवाह समारोह में जाना था लेकिन उसे रात को घर में अकेला कैसे छोड़ें, यह सोच कर उसे भी साथ चलने को कहा.

सहेली की बिटिया सौंदर्य के आधुनिक प्रतिमानों को पूरा करने वाली एक बहुत ही मृदुभाषी और खूबसूरत युवती है. समारोह में पहुंचे, एक फिल्म डायरैक्टर की निगाह उस पर पड़ी और वे बातचीत के लिए हमारे पास आए. बिटिया ने कुछ दिन सोचविचार कर सहमति देने की बात कही और आज उसे काफी काम मिल रहा है.

जरूरत पर आते हैं काम

इसी तरह शादीविवाह के दौरान कई भावी शादियों की बुनियाद भी खड़ी हो जाती है. ये आयोजन मेलमुलाकात के सुंदर माध्यम होते हैं. हम बहुत सारे लोगों से मिलते हैं लेकिन वे सब याद नहीं रहते लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो न जाने क्यों अपनी ओर आकर्षित करते हैं और उन से बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है. थोड़ी घनिष्ठता बढ़ने पर फोन नंबर का आदानप्रदान और घर पर आमंत्रित करने का प्रस्ताव. यह सब एक नई दोस्ती, नई पहचान को जन्म देता है और यकीनन, मन को बहुत सुकून देता है.

जहां सोशल साइट्स पर की गई दोस्ती में कई बार धोखे की संभावना होती है वहां इस तरह की समझ में किसी भी तरह की धोखाधड़ी की आशंका नहीं रहती क्योंकि अधिकतर लोग अपने ही शहर के होते हैं और दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष के जानपहचान वाले होते हैं.

मैं ने अपने जानने वाले कुछ ऐसे लोगों को देखा है जो कहीं भी, कभी भी अनजान लोगों से मिलने पर बातचीत का सिरा पकड़ कर मेलजोल बढ़ा लेते हैं. ऐसे लोग काफी खुशमिजाज और आजादखयाल होते हैं. सामाजिक मेलजोल बढ़ाने का एक सब से बड़ा फायदा यह है कि किसी भी तरह की परेशानी के वक्त पूरा समाज इंसान के साथ खड़ा रहता है.

Kaushal ji vs Kaushal : गलत लेखन ले डूबा अच्छा विषय

Kaushal ji vs Kaushal : रेटिंग – डेढ़ स्टार

हर इंसान अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपनी जड़ों से कटता जा रहा है, इस का असर उस के रिश्तों पर भी पड़ता है. यूं तो यह फिल्म दो पीढ़ियों के रिश्तों की बात करती है. पर सीमा देसाई के बचकानी लेखन व निर्देशन ने एक अच्छी कहानी का बंटाधार कर डाला. यदि लेखक व निर्देशक ने थोड़ी सी मेहनत की होती, रिश्तों को समझा होता तो यह फिल्म नई पीढ़ी को रिश्तों और परिवार को समझने का नजरिया दे सकती थी.

फिल्म की कहानी कन्नौज और नोएडा के बीच झूलती रहती है. 30 साल के अविवाहित युग (पावेल गुलाटी ) नोएडा की एड कंपनी में कौपी राइटर हैं. उस की कंपनी को एक मोाबइल कंपनी के लिए अच्छे विज्ञापन बनाने का ठेका मिला है. युग के पिता कौशल (आषुतोष राणा ) और मां (शीबा चड्ढा ) इत्र के लिए मशहूर शहर कन्नौज में रहते हैं. युग के पिता कौशल जी (आशुतोष राणा) एक जिम्मेदार अकाउंटेंट हैं, लेकिन उन का असली जनून कव्वाली गाना है. युग की मां (शीबा चड्ढा) एक साधारण गृहिणी होते हुए भी इत्र बनाने का सपना संजोए बैठी हैं. दोनों ने अपने सपनों को परिवार की जिम्मेदारियों के नीचे दबा दिया है. युग अपने पिता से पैसे मंगाता रहता है पर उसे कन्नौज जाना या मातापिता के फोन उठाने में समस्या है. युग की बहन रीत एक एनजीओ में काम करती है. इस बीच, छोटे से शहर कन्नौज में रहने वाले मातापिता अपने जीवन में खालीपन से निराश हो कर विचारों में अलग हो गए हैं.

युग को न्यूयोर्क से भारत आई लड़की ( ईशा तलवार ) से प्यार हो जाता है, जो अपने विचारों में बहुत अधिक भारतीय है, और वह अपने जीवन में केवल एक ही चीज़ चाहती है, ‘एक कप अदरक वाली चाय और एक साथी जो बीच सफर छोड़ के न जाए.’ उसे एक ऐसा परिवार चाहिए जो प्यार और अपनापन महसूस कराए. कैरियर में कुछ खास न हो पाने के चलते युग पूरी तरह से भ्रमित है. जब वह होली के अवसर पर कन्नौज आता है, तो वह अपने मातापिता के बीच नियमित झगड़े को बर्दाश्त करने की बजाय उन्हें ‘ज्ञान’ देते हुए कहता है कि उस की पीढ़ी बेहतर है क्योंकि वह जानते हैं कि विषाक्त विवाह में रहने की बनिस्बत कैसे आगे बढ़ना है. हालांकि, युग इसे एक परिपक्व वयस्क की तरह संभाल नहीं पाता, जब उस के मातापिता तलाक लेने का फैसला लेते हैं. इस पर युग उन से कहता है, ‘‘मम्मीपापा 50 साल की सालगिरह मनाते हैं, तलाक नहीं लेते हैं.’’ युग अपनी होने वाली शादी को बचाने के लिए अपने मातापिता का तलाक रूकवाने के प्रयास में लग जाता है. अब कहानी क्या मोड़ लेती है,यह तो फिल्म देखने पर ही पता चलेगा.

फिल्म की कहानी आधार बहुत सही है. इस तरह के मुद्दों पर फिल्में बननी चाहिए लेकिन घटिया पटकथा लेखन पूरी फिल्म को ले डूबा. फिल्म की गति काफी धीमी है. जब आप परिवार की बात करते हैं, तो जरुरी था कि कन्नौज शहर के रहनसहन पर रोशनी डाली जाती. मगर फिल्मकार ने महज एक होली का प्रकरण व गीत से इतिश्री समझ ली, इसे तो देश के किसी भी कोने में फिल्माया जा सकता है. फिल्म में नायिका,हीरो से कहती है, ‘‘परफेक्ट तो कुछ नहीं होता. पता नहीं हम लोगों से परफेक्शन की उम्मीद क्यों लगाते है…’’ शायद लेखक व निर्देशक यह बात फिल्म के दर्शकों से कह रही हैं.

फिल्मकार दो अलगअलग पीढ़ियों के रिश्तों की पड़ताल करते हुए सपने पूरा करने के लिए युवा पीढ़ी के जड़ से दूर जाने के मूल मुद्दे को ही भूल गईं. जबकि युग के मातापिता नई पीढ़ी के बहकावे में आ कर जड़ से कटते ही तलाक का फैसला लेते हैं. फिल्मकार को भी याद होना चाहिए कि कोई भी इंसानी रिश्ता जहरीला नहीं होता, इंसान की बदली सोच ही उसे सही या गलत बनाती है. इसे समझने के लिए रिश्तों में जीना पड़ता है. लेखक व निर्देशक की इस बात के लिए तारीफ की जा सकती है कि उन्होने इंसानी भावनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में पेश किया है. फिल्म का लहजा हल्काफुल्का कौमेडी है, मगर उपदेशात्मक भाषणबाजी भी है. कव्वाली गायन के शौकीन पर पेशे से एकाउंटेंट साहिल कौशलजी के किरदार में आषुतोष राणा का अभिनय इस फिल्म की जान है. साहिल की पत्नी, इत्र बनाने की शौकीन व पराठे बनाने में माहिर संगीता कौशल के किरदार में शीबा चड्ढा अपनी छाप छोड़ जाती हैं. युग के किरदार में रूप में पावेल गुलाटी प्रभावित नही कर पाते. कियारा के किरदार में ईशा तलवार ठीकठाक हैं, मगर प्रेमी व प्रेमिका के बीच जो केमिस्ट्री होनी चाहिए, उस का पावेल गुलाटी और ईषा तलवार के बीच उस केमिस्ट्री का अभाव नजर आता है. ब्रिजेंद्र काला, दीक्षा जोशी ठीकठाक हैं.

Casteism : जातिवाद का मकड़जाल और उस का हल

Casteism : वरिष्ठ सांसद व लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की कांग्रेस में ‘हिस्सेदारी न्याय’ पार्टीलाइन व रणनीति का केंद्रबिंदु बन रहा है. सवाल यह कि खुद उन की पार्टी के सवर्ण नेता इस घोषणा को मानते हैं, यह सोचने वाली बात है.

लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के 5 स्तंभों- किसान न्याय, युवा न्याय, नारी न्याय, श्रमिक न्याय और हिस्सेदारी न्याय को अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल किया था. हर वर्ग में 5 गारंटियां थीं. इस तरह से कांग्रेस पार्टी ने कुल 25 गारंटियां दी थीं. बता दें कि वर्ष 1926 से ही देश के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस घोषणापत्र को ‘विश्वास और प्रतिबद्धता का दस्तावेज’ माना जाता है. कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का तब कहना था कि देश बदलाव चाहता है. मौजूदा मोदी सरकार की गारंटियों का वही हश्र होगा जो 2004 में भाजपा के ‘इंडिया शाइनिंग’ नारे का हुआ था. इस के लिए हमारे हर गांव और हर शहर के कार्यकर्ताओं को उठ खड़ा होना होगा. उन्हें घरघर पार्टी के घोषणापत्र को पहुंचाना होगा.

हिस्सेदारी न्याय में गिनती करो तो जातीय गणना का मुद्दा पहला था. दूसरा मुद्दा आरक्षण का हक था जिस के तहत कहा गया कि आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमारेखा हटा दी जाएगी. जनसंख्या हिस्सेदारी के अनुसार एससी और एसटी को बजट में हिस्सा दिया जाएगा. वन अधिकार के तहत जल, जंगल और जमीन का कानूनी हक दिया जाएगा. अपनी धरती अपना राज्य के तहत जहां एसटी सब से ज्यादा हैं वहां उन को हक दिया जाएगा. वे क्षेत्र एसटी घोषित होंगे.

साधारणतया देखें तो यह दिखता है कि हिस्सेदारी की इस गारंटी में ओबीसी का नाम नहीं है. जिस ओबीसी को ले कर राहुल गांधी भाजपा और मोदी से सवाल कर रहे थे वह पूरी तरह से गायब है. देश पर सब से अधिक समय तक कांग्रेस की हुकूमत रही है. उस ने कभी धर्म और जाति के मसले को हल करने की कोशिश नहीं की. ऐसे में जनता कांग्रेस की इन गारंटियों पर कितना भरोसा करेगी, यह अहम सवाल है.

जब जाति और उस के अधिकार की बात आती है तो सम झ आता है कि अंगेरजों के समय जो कांग्रेस थी उस की सोच सवर्णवादी थी. पंडित जवाहर लाल नेहरू के नाम में पंडित न होता तो कांग्रेस में वे होते ही नहीं. लोकमान्य तिलक से ले कर सरदार वल्लभभाई पटेल तक हिंदूवादी मानसिकता के थे. मुगल काल के दौरान देश में जाति व्यवस्था नहीं थी. अंगरेजों ने जनगणना के माध्यम से जाति व्यवस्था को मजबूत करने का काम किया. उन का सोचना था कि वे भारत में राज करने के लिए आए हैं, समाज सुधार करने नहीं. आर्य समाज जैसे संगठनों ने जाति सुधार की बात कही पर उस से धर्म-जाति व्यवस्था खत्म नहीं हुई, उलटे, देश में धर्म का प्रभाव बढ़ा जिस के फलस्वरूप देश आजादी के समय 2 अलगअलग देशों में बंट गया.

अंगरेजों ने किया जाति व्यवस्था को स्वीकार

समाज में आज जो जाति व्यवस्था देखने को मिल रही है वह मुगल काल के पतन और भारत में अंगरेजी हुकूमत की शुरुआत के समय आगे बढी. 1860 और 1920 के बीच अंगरेजों ने भारतीय जाति व्यवस्था को अपनी सरकार चलाने का हिस्सा बना लिया था. प्रशासनिक नौकरियां और वरिष्ठ नियुक्तियां केवल ईसाइयों और कुछ जातियों के लोगों को दी गईं. 1920 के दशक के दौरान सामाजिक अशांति के कारण इस नीति में बदलाव आया. 1948 में जाति के आधार पर नकारात्मक भेदभाव को कानून द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया और 1950 में इसे भारतीय संविधान में शामिल किया गया. भारत में 3,000 जातियां और 25,000 उपजातियां हैं.

जाति शब्द पुर्तगाली शब्द कास्टा से लिया गया है जिस का अर्थ है नस्ल, वंश और मूलरूप से शुद्ध हो. यह भारतीय शब्द नहीं है. अब यह अंगरेजी और भारतीय भाषाओं में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है. ऋग्वेद के समय (1500-1200 ईसा पूर्व) में 2 वर्ण- आर्य वर्ण और दास वर्ण थे. यह भेद मूलतया जनजातीय विभाजनों से पैदा हुआ. वैदिक जनजातियां खुद को आर्य मानती थीं और प्रतिद्वंद्वी जनजातियों को दास, दस्यु और पणि कहा जाता था. दास आर्य जनजातियों के लगातार सहयोगी थे. इन को आर्य समाज में शामिल कर लिया गया, जिस से वर्गभेद को जन्म मिला.

वर्ण से बनी जातियां

अथर्ववेद काल के अंत में नए वर्गभेद सामने आए. पहले दासों का नाम बदल कर शूद्र कर दिया गया. आर्यों का नाम बदल कर वैश्य कर दिया गया. ब्राह्मणों और क्षत्रियों के नए कुलीन वर्गों को नए वर्ण के रूप में देखा जाने लगा. शूद्र न केवल तत्कालीन दास थे बल्कि इस में वे आदिवासी जनजातियां भी शामिल थीं जो गंगा की बस्तियों में विस्तार के साथ आर्य समाज में शामिल हो गईं.

उत्तर वैदिक काल में प्रारंभिक उपनिषद में शूद्र को पूसन या पोषणकर्ता कहा गया. इस का अर्थ शूद्र मिट्टी को जोतने वाले थे. अधिकांश कारीगरों को भी शूद्रों के वर्ग में खड़ा कर दिया गया. ब्राह्मणों और क्षत्रियों को अनुष्ठानों में विशेष स्थान दिया गया है जो उन्हें वैश्यों और शूद्रों दोनों से अलग करता है. ब्राह्मणवादी ग्रंथ 4 तरह की वर्णव्यवस्था की बात करते हैं. बौद्ध ग्रंथों में ब्राह्मण और क्षत्रिय को वर्ण के बजाय जाति के रूप में वर्णित किया गया है. शूद्रों का उल्लेख चांडाल, बांस बुनकर, शिकारी, रथनिर्माता और सफाईकर्मी जैसे व्यावसायिक वर्गों के रूप में किया गया था.

महाभारत में वर्णव्यवस्था का जिक्र मिलता है. भृगु के माध्यम से यह बताया गया कि ब्राह्मणों का वर्ण सफेद, क्षत्रियों का लाल, वैश्यों का पीला और शूद्रों का काला था. इन वर्गों के कामों के आधार पर भी विभाजन किया गया. सुख और साहस के इच्छुक को क्षत्रिय वर्ण कहा गया. जो लोग पशुपालन में रुचि रखते थे और हल चला कर जीवनयापन करते थे उन्हें वैश्य वर्ण में रखा गया. जो लोग हिंसा, लोभ और अपवित्रता के शौकीन थे उन्हें शूद्र वर्ण कहा गया. ब्राह्मण वर्ग को सत्य, तपस्या और शुद्ध आचरण के प्रति समर्पित मनुष्य के रूप में दर्शाया गया.

मुसलिम इतिहासकारों हाशिमी और कुरैशी ने 1927 और 1962 में प्रकाशित पुस्तक में यह प्रमाणित किया कि भारत में जातिव्यवस्था इसलाम के आगमन से पहले स्थापित हो गई थी. उत्तरपश्चिम भारतीय उपमहाद्वीप में खानाबदोश जंगली जीवनशैली इस का प्रमुख कारण था. जब अरब मुसलिम सेनाओं ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया तो बड़े पैमाने पर निचली जातियों ने धर्मांतरण किया. इसलाम में जातिव्यवस्था नहीं थी. इस कारण से मुगल काल में जातिव्यवस्था को बढ़ावा नहीं मिला.

इतिहास के प्रोफैसर रिचर्ड ईटन का दावा है कि भारत में इसलामिक युग से पहले हिंदू जातिव्यवस्था थी.

मुगलों के दौर में नहीं थी जातिव्यवस्था

प्रोफैसर पीटर जैक्सन लिखते हैं कि मध्ययुगीन दिल्ली सल्तनत काल (1200 से 1500) के दौरान हिंदू राज्यों में जातिव्यवस्था के लिए हिंदू धर्म जिम्मेदार है. जैक्सन का कहना है कि जाति के सैद्धांतिक मौडल के विपरीत, जहां केवल क्षत्रिय ही योद्धा और सैनिक हो सकते हैं, ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि मध्ययुगीन युग के दौरान हिंदू योद्धाओं और सैनिकों में वैश्य और शूद्र जैसी अन्य जातियां भी शामिल थीं.

जैक्सन लिखते हैं, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि 12वीं शताब्दी के अंत में निचली जाति के हिंदुओं द्वारा व्यापक रूप से इसलाम में धर्म परिवर्तन किया गया था.

ब्रिटिश शासन के दौरान 1881 की जनगणना में लोगों की गिनती जाति के रूप में की गई. 1891 की जनगणना में 60 उपसमूह शामिल थे, जिन में से प्रत्येक को 6 और व्यावसायिक नस्ल की श्रेणियों में विभाजित किया गया था. बाद की जनगणनाओं में यह संख्या बढ़ गई. 1860 और 1920 के बीच अंगरेजों ने अपनी शासन प्रणाली में जातिव्यवस्था

को शामिल कर लिया, प्रशासनिक नौकरियां और वरिष्ठ नियुक्तियां केवल उच्च जातियों को दी गईं, जनजातियों में अपराधी किस्म के लोगों को रखा गया.

ब्रिटिश सरकार ने 1871 का आपराधिक जनजाति अधिनियम लागू किया. इस कानून ने घोषित किया कि कुछ जातियों के सभी लोग आपराधिक प्रवृत्ति के साथ पैदा हुए थे. इतिहास के प्रोफैसर रामनारायण रावत कहते हैं कि इस अधिनियम के तहत जन्म से अपराधी जातियों में अहीर, गुर्जर और जाट शामिल थे. बाद में इस में अधिकांश शूद्र और अछूत, जैसे चमार और साथ ही संन्यासी व पहाड़ी जनजातियां शामिल हो गईं.

1900 से 1930 के दशक के दौरान पश्चिम और दक्षिण भारत में आपराधिक जातियों की संख्या बढ़ी. सैकड़ों हिंदू समुदायों को आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत लाया गया. 1931 में अकेले मद्रास प्रैसिडैंसी में 237 आपराधिक जातियों और जनजातियों को इस अधिनियम के तहत शामिल किया गया. इस तरह से देश जाति में बंटा और धर्म उस के ऊपर हावी हो गया. हिंदू धर्म को बढ़ावा देने वालों में दक्षिणापंथी लोग तो थे ही, कांग्रेस में भी बड़े पैमाने पर इस विचारधारा के लोग हावी रहे, जिन से मतभेद के कारण जवाहर लाल नेहरू समाज में वह सुधार नहीं कर पाए जिस के बारे में वे सोचते थे.

कैसे न्याय दिला पाएंगे राहुल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी हिस्सेदारी न्याय कैसे दिला पाएंगे क्योकि जो जातीय व्यवस्था बनी है उस को अन्याय परोसने के लिए ही बनाया गया है. इस व्यवस्था का लाभ नेता, अफसर, पंडे और साहूकार सब मिल कर उठा रहे हैं.

संविधान कहता है कि लोकतंत्र में जाति और धर्म का कोई स्थान नहीं होता है. चुनाव में जाति और धर्म की बात नहीं करनी चाहिए. इस के बाद भी चुनावों पर जाति और धर्म दोनों हावी हैं.

अगर जातीय गणना की जाए तो ब्राह्मण 7 से 8 फीसदी ही होगा. इस के बाद भी वह 18 से 20 फीसदी तक का दावा करता है. यह दावा इसलिए है ताकि वह सत्ता की चाबी अपने पास रख सके, अपने हिसाब से देश और कानून को चला सके. जातीय जनगणना में 85 बनाम 15 का दावा किया जाता रहा है. 15 फीसदी अगड़ी जातियां और 85 फीसदी में बाकी सब जातियां हैं. 15 में ब्राह्मण अकेले कैसे 18 से 20 फीसदी हो सकता है, यह सोचने वाली बात है.

ब्राह्मण अपनी संख्या इसलिए ज्यादा बताता है जिस से उस की भागीदारी अधिक से अधिक रहे. वह पूजापाठी व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है. वह हर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहता है. वह खुद तो पढ़नालिखना चाहता है पर दूसरों को पढ़ने से मना करता है. दक्षिणापंथी मानसिकता धर्म को बढ़ावा देती है. इस के लिए मंदिर बनाए जा रहे हैं ताकि जिन के जरिए चंदा वसूल किया जा सके. रोजगार खत्म किए जा रहे हैं ताकि युवा मंदिरों पर आश्रित रहें.

राहुल गांधी ने जब ‘शक्ति’ से लड़ने की बात की तो पूरा दक्षिणापंथी समाज उन के ऊपर टूट पड़ा. ऐसे में समाज को हिस्सेदारी कैसे दी जा सकती है? हिस्सेदारी न्याय में गिनती करो यानी जातीय गणना, आरक्षण, हिस्सेदारी के अनुसार एससी और एसटी को बजट और वन अधिकार, अपनी धरती अपना राज्य जैसे मुद्दे शामिल किए गए हैं, जिन का विरोध दक्षिणापंथी लोग करते हैं. ऐसे में राहुल गांधी कैसे इस मकड़जाल से समाज को निकाल पाएंगे, यह सोचने वाली बात है.

Life Partner : कोहिनूर है जीवनसाथी, संभाल कर रखें

Life Partner : जीवनसाथी की मृत्यु के बाद उस से बिछुड़ना हो या तलाक के बाद अलग होना, दोनों ही स्थितियों में जीना मुश्किल हो जाता है, इसलिए समय रहते ही जीवनसाथीरूपी कोहिनूर की कद्र करें, ताकि उस के संग खुशहाल जीवन जी सकें.

साथी जो आप के जीवन का सब से महत्त्वपूर्ण हिस्सा था, दूर चला जाता है तो आप की दुनिया में रूखापन आ जाता है, समय रुक सा जाता है. हर जगह निराशा, अकेलापन और उदासी छा जाती है. ऐसे कठिन समय में खुद को संभालना और आगे बढ़ना एक बड़ी चुनौती हो सकती है. 60 वर्ष की उम्र के बीच में कोई अकेला रह जाए तो वह गम कभी भूलता नहीं है.

स्थिति तलाक की हो, विधवा होने की या फिर विधुर होने की हो, बच्चे मां के पास रह जाते हैं, तब पिता के लिए और दिक्कत. न तो कोई दूसरी लड़की मिलती है न ही कोई साथी. आज जो पतिपत्नी हैं वे एकदूसरे को संभाल कर रखें. दोनों एकदूसरे के लिए नायाब हैं. जिन के पास है वे यह समझें कि उन के पास कोहिनूर का हीरा है.

पता तो तब चलता है जब तलाक हो जाता है, साथी बिछुड़ जाता है, आप अकेले रह जाते हैं. बहुत कम लोग हैं जो बाद में जिंदगी अच्छी तरह बिता सकते हैं. लड़कियां फिर भी ज्यादा अच्छी तरह मैनेज कर लेती हैं क्योंकि उन के पास बच्चे होते हैं. उन के मांबाप सपोर्ट करते हैं. युवावस्था है तो फ्लर्टिंग करने वाला कोई न कोई मिल ही जाता है. लेकिन अकेले आदमी को कुछ नहीं मिलता, वह मारामारा फिरता है.

जितनी उम्र बढ़ेगी, समस्या उतनी ही बढ़ती जाएगी. किसी भी उम्र में आदमी के लिए खुद को और घर को संभालना मुश्किल होता है. इसलिए देर न करें और जो जैसा जीवनसाथी मिला है उस के साथ निभाना सीखें. उसे छोड़ने के बजाय आप खुद को ज्यादा बदलें, कुछ उसे बदलें. अगर संभव न हो तो जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार कर आगे बढ़ें.

जिन का साथी बिछुड़ गया है उन से जानें इस का दर्द

जीवनसाथी शब्द से ही स्पष्ट है जीवनभर का साथी, जिसे सिर्फ मृत्यु ही अलग कर सकती है तो उस से अलग होने में दर्द तो महसूस होगा ही न. एक असहनीय पीड़ा होती है. जीवनसाथी से हमारा शारीरिक व मानसिक हर तरह का रिश्ता होता है जो साथ रहतेरहते इतना गहरा होता जाता कि वह हमारी सोच, हमारी कोशिकाओं, हमारे दिलोदिमाग में घर बना लेता है. जीवनसाथी के बिना जीना असंभव लगता है. हमारे जीवन में जो खुशी होती है वह जीवनसाथी के सुखदुख से ही जुड़ी होती है.

उदाहरण के तौर पर अगर आप के पति को औफिस से आने में एक दिन देर हो जाए तो आप के दिमाग में गलत खयाल आने लगते हैं, जैसे अरे कहां हैं ये, अभी तक आए क्यों नहीं? यह सब एक सामान्य स्थिति है लेकिन हमें यह भी सहन नहीं होता है.

फिर ऐसे में जिन का साथी कोरोना में या किसी और वजह से चला गया है उन से जानें यह दर्द. उन की जिंदगी कैसे पूरी तरह रुक गई है. वे आगे मूव औन करना भी चाहें तो कोई साथी नहीं मिलता. अकेले महिलाओं के लिए घर और बाहर संभालना मुश्किल हो जाता है. महिलाओं के लिए अचानक अपने पैरों पर खड़े होना बड़ी समस्या है. वे पहले से वर्किंग हैं तब तो ठीक है लेकिन अगर वर्किंग नहीं हैं तो नए सिरे से सब शुरू करना आसान नहीं होता. सिंगल पेरैंट की राह में भी कई परेशानियां आती हैं.

वहीं, एक बार को महिलाएं घरबाहर संभालना जल्दी सीख जाती हैं लेकिन पुरुषों के लिए घर संभालना असंभव सा हो जाता है. बच्चों की कैसे परवरिश करें, यह भी मुश्किल. महिलाओं को तो फिर भी जीवनसाथी मिल जाता है क्योंकि वे खुद को मेंटेन रखती हैं लेकिन पुरुष को जल्दी से कोई साथी नहीं मिलता. वह अकेले रहरह कर थक जाता है. लड़कियों को उन के मांबाप, भाईबहन फिर भी सपोर्ट कर देते हैं लेकिन लड़कों को कोई भाईबहन ज्यादा दिन सपोर्ट नहीं करता, क्योंकि वे छोटीछोटी अपनी जरूरतों के लिए भी दूसरों पर डिपैंड हो जाते हैं.

वहीं, लड़कियां खुद को और बच्चों के साथसाथ जिस के घर रह रही होती हैं उस का घर भी संभाल लेती हैं. इसलिए भाईबहनों और मांबाप के लिए उन्हें रखना ज्यादा आसान होता है. हालांकि परेशानी महिला या पुरुष दोनों को ही होती है लेकिन फिर भी कह सकते हैं पुरुष के लिए खुद को संभालना ज्यादा कठिन होता है.

तलाक के बाद पसरता अकेलापन

मैं 46 वर्षीया महिला हूं, मेरी जिंदगी में काम के अलावा कुछ नहीं है. पति से करीब एक साल पहले तलाक हो चुका है. मेरा 19 साल का बेटा अपने जीवन में बहुत व्यस्त है. पूरा दिन औफिस में कट तो जाता है लेकिन लाइफ में बहुत अकेलापन महसूस करने लगी हूं. मैं एक रिलेशन में थी भी लेकिन फिर मुझे लगा कि यह सिर्फ टैम्परेरी है और न तो समाज और न ही मेरा बेटा शायद मुझे अपनाएगा और मेरी इसी सोच ने मुझे वह रिश्ता खत्म करने पर मजबूर कर दिया.

अब लाइफ में फिर वही खालीपन और अकेलापन वापस आ गया है. काम से घर लौटती हूं तो बात करने वाला कोई नहीं है. मैं बहुत उदास और निराश महसूस कर रही हूं. इस अकेलेपन से कैसे बाहर आया जाए, कैसे अपनी जिंदगी में खुशियां लाऊं. अगर अपनी पिछली जिंदगी को याद करती हूं तो बहुत पछताती हूं. मेरे पति से मेरी बनती नहीं थी. लेकिन सारी गलती उन की नहीं थी. काश, थोड़ा सा एडजस्ट करने की कोशिश मैं ने भी की होती तो आज यह हालत न होती.

वाकई तलाक लेना आसान है लेकिन उस के बाद जीना मुश्किल है. यह बात तभी समझ में आती है जब हम साथी से दूर हो कर अकेलापन झेलते हैं. इसलिए समय रहते इस बात को समझें कि आप के साथी में कुछ बुराइयां भी हैं तो उस के साथ डील करना सीख लें क्योंकि उसे छोड़ने के बाद भी परिस्थितियां कुछ बहुत ज्यादा अच्छी नहीं होंगी बल्कि बदतर हो सकती हैं.

पुरुषों को महिलाओं की ज्यादा कद्र करनी चाहिए

अकसर देखा जाता है कि पुरुष महिलाओं को टेकेन फौर ग्रांटेड लेते हैं. उन्हें उन का हर काम समय पर किया हुआ मिल जाता है तो उन्हें उस काम की भी वैल्यू नहीं होती है. पुरुषों को लगता है कि मैं कमाने वाला हूं तो मेरी वैल्यू ज्यादा है. वे महिलाओं को ज्यादा तवज्जुह नहीं देते. लेकिन अगर महिलाएं वर्किंग हैं तो भी उन्हें लगता है घर का ज्यादातर काम महिलाएं ही करें.

अपने मांबाप के साथ एडजस्ट करने में भी वे अपने साथी को घर के ऐसे जंगल में छोड़ देते हैं जहां वे उन की मां के साथ एडजस्ट करने में अपनी पूरी जवानी लगा देती हैं. लेकिन उन्हें जब एहसास होता है तो अधेड़ उम्र में भी वे पति को छोड़ कर जाने से संकोच नहीं करतीं. फिर सम?ा आती है उस महिला की वैल्यू जिस की बातों पर कभी कान ही न धरे थे.

इसलिए बीवी की इज्जत समय रहते ही करें. उसे अगर आप की मां या किसी और रिश्ते से कोई परेशानी है तो उसे समझें और दूर करें. अलग घर में रहें. उस ने शादी आप के साथ की है, आप की मां को पूरी जिंदगी खुश करने का ठेका उस का नहीं है. इस बात को भी सम?ों कि अगर पत्नी छोड़ गई तो वह जैसेतैसे अपना गुजारा कर लेगी लेकिन आप को आप के घरवाले भी नहीं पूछेंगे. तब उसी पत्नी की बातें याद करकर के रोया करेंगे. इसलिए अभी भी समय है संभल जाएं और अपनी पत्नी की कद्र करें.

एक के बिछुड़ते ही दूसरा बूढ़ा लगने लगता है

एक साथी के जाते ही दूसरा बूढ़ा होने लगता है, फिर उम्र चाहे कोई भी हो उस की सोच साथी के साथ ही रुक जाती है. उस के सपने, उम्मीदें, उमंग, खुशी सबकुछ जीवनसाथी के साथ ही चला जाता है. महिलाओं को तो लगता है अब किस के लिए सजना, अब कौन है जो तारीफ करेगा. उन के चेहरे का नूर चला जाता है. उस पर साथी से बिछुड़ने के गम की परछाइयां ही नजर आती हैं. तनाव इतना हो जाता है कि कई हैल्थ इश्यूज हो जाते हैं. बीपी, शुगर जैसी कई बीमारियां अपनी चपेट में ले लेती हैं और उस पर घरबाहर संभालना व बच्चों की जिम्मेदारी समय से पहले बूढ़ा कर देती हैं. पूरा दिन भागदौड़ करने के बाद रात को बिस्तर पर मिलता अकेलापन न जीने देता है न मरने.

उम्र के हर पड़ाव पर जीवनसाथी चाहिए

कर्नाटक के मैसूर में रहने वाले 73 साल के बुजुर्ग ने शादी के लिए विज्ञापन दिया है. वे सरकारी टीचर की नौकरी से रिटायर हो चुके हैं और घर में अकेले रहते हैं. अकेलेपन से उन्हें अब डर लगता है. उन्हें अब एक जीवनसाथी की तलाश है.

ऐसे विज्ञापन अब आम हो चुके हैं. कई संस्थाएं भी हैं जो बुजुर्ग लोगों के विवाह कराने का काम भी कर रही हैं क्योंकि अब विवाह उम्र का मुहताज नहीं है. पहले जहां संयुक्त परिवार होते थे वहां किसी का साथी बिछुड़ भी जाता था तो भी घर में कई लोग होते थे उस अकेले की देखभाल करने के लिए, उसे संभालने के लिए. लेकिन अब एकल परिवार के दौर में साथी के जाने के बाद अकेले ही सब संभालना मुश्किल हो जाता है. नातेरिश्तेदार कुछ दिनों तक ही साथ निभाते हैं. इसलिए पूरी जिंदगी आगे कैसे कटे, यह सोच कर ही घबराहट होती है.

जीवनसाथी को दोस्त बनाएं

दोस्त से लड़ाई हो जाए तो तलाक नहीं होता. न ही वह आप को जज करता है. वह आप की अच्छाईबुराई समेत आप को स्वीकार करता है. पतिपत्नी के बीच ऐसा रिश्ता अकसर नहीं होता. पत्नी के लिए पति देवता है जिस में कोई कमजोरी या कमी वह देखना ही नहीं चाहती. पति के लिए पत्नी जिम्मेदारी होती है, ऐसी स्त्री जिस की वह इज्जत करता है पर हर बात उस से खुल कर साझा नहीं कर सकता क्योंकि वे 2 अलगअलग व्यक्तित्व हैं.

लेकिन अगर आप भी अपने लाइफपार्टनर को दोस्त बना लें और खुद उन के दोस्त बन जाएं तो लाइफ पूरी तरह चेंज हो जाती है. दोस्त बनाएंगे तो बराबरी का हक दे पाएंगे. रिश्ता कोई भी हो उस में बराबरी और सम्मान का होना बहुत जरूरी है. ऐसे में अगर जीवनसाथी दोस्त होगा तो पतिपत्नी वाली तकरार को सुलझाना आसान होगा. वहां बातचीत का रास्ता खुला होगा. एकदूसरे से जो परेशानियां हैं उन पर बात की जा सकेगी, उन्हें हल करने का प्रयास किया जा सकेगा.

ईगो, अकड़ सब छोड़ साथी के साथ एडजस्टमैंट करना सीखें

रचना कहती हैं, ‘‘पति से थोड़ी कहासुनी होने के बाद मैं मायके आ गई थी. कुछ ही दिनों के बाद वे मुझे मायके लेने आए थे, लेकिन तब कुछ झूठे रिश्तेदारों और कुछ मायके के लोगों की बातों में आ कर मैं साथ नहीं गई. उलटा, उन को दहेज के झूठे केस में धोखे से फंसा दिया पर अब 6 साल हो चुके हैं और मैं घर पर बैठी हूं. केस झूठे थे, कोर्ट में साबित नहीं हो सके और पति बरी हो गए. उन की दोबारा शादी हो गई. आज सोचती हूं, पति लेने आए तब ही उन के साथ चली जाती तो आज मेरे भी एकदो बच्चे होते और मैं भी अपनी सहेलियों की तरह खुश होती अपने पति संग.’’

इसलिए इस बात को समझें कि साथ कोई नहीं देगा, सलाह सब देंगे. आखिर में आप की ही जिंदगी तबाह होगी. अगर कहासुनी हो जाती है तो रिश्तों को खत्म करने से अच्छा है दोचार दिन रूठ जाएं, बस.

वास्तव में जीवन में ऐसे बहुत से पड़ाव आते हैं जहां हमें अहम निर्णय लेने पड़ते हैं. यदि हम अपना हित ध्यान में न रख कर रिश्तेदारों और दोस्तों के बहकावे में कुछ गलत निर्णय ले लेते हैं तो जीवनभर हमें उस का खमियाजा भुगतना पड़ता है. इसलिए ईगो, अकड़ सब छोड़ साथी को उस की कमियों के साथ दिल से स्वीकार करें. हर स्थिति में निभाना सीखें तब तो जिंदगी चलती रहेगी लेकिन अगर साथ छूटा तो जिंदगी और भी बदतर हो जाएगी. तब दूसरा साथी खोजेंगी तो पहले तो मिलेगा ही नहीं और अगर कई साल धक्के खाने के बाद मिल भी गया तो जितना पहले साथी के साथ एडजस्ट करने में कतरा रहे थे उस से कई गुना ज्यादा एडजस्ट करना पड़ेगा और अगर साथी न मिला तो पूरी जिंदगी अकेले काटना भी एक अभिशाप बन जाएगा.

Online Hindi Story : दैहिक भूख – शिल्पी ने संध्या को क्यों मारा

Online Hindi Story : आज मनोज बहुत खुश था और पहुंच गया यादों में. 4 साल पहले वह नौकरी की तलाश में मुंबई आया था. पढ़लिख कर गांव में रहने का कोई फायदा नहीं था. वहां तो कोई छोटीमोटी नौकरी मिलती या अपनी छोटी सी दुकान खोल कर बैठना पड़ता. इस के अलावा वहां और कुछ था भी नहीं, जिस पर अपनी गुजरबसर की जा सके. यही सोच कर मनोज ने मुंबई जाने वाली ट्रेन पकड़ ली थी. पहले कुछ दिन तो मनोज को एक लौज में रहना पड़ा, फिर धीरेधीरे उसे उस के गांव के लोग मिल गए, जो 3-4 के समूह में साथसाथ रहते थे. मनोज भी उन्हीं के साथ चाल में रहने लगा था.

चाल का मतलब है आधे कच्चेपक्के घरों की वे बस्तियां, जहां संकरी गलियों में छोटेछोटे कमरे होते हैं. पानी के लिए एक सरकारी नल का इंतजाम होता है, जहां बच्चेऔरतें और मर्द सुबह से ही अपनेअपने बरतन ले कर लाइन लगा देते हैं, ताकि वे पूरे दिन के लिए पीने व नहानेधोने का पानी भर सकें. अब मनोज बड़ी मेहनत से नौकरी कर के पैसा कमा रहा था और एकएक पैसा जोड़ रहा था, ताकि रहने के लिए अपना छोटा सा घर खरीद सके. आज मनोज इसीलिए खुश था, क्योंकि उस ने एक छोटा सा 8 बाई 8 फुट का कमरा खरीद लिया था. इधर उस के मातापिता भी काफी समय से जोर दे रहे थे कि शादी कर लो. रहने का ठिकाना हो गया था, सो अब मनोज ने भी इस के लिए हामी भर दी थी.

मां ने गांव में अपने ही रिश्ते में एक लड़की पसंद कर रखी थी, जिस का नाम शिल्पा था. शिल्पा भी राह देख रही थी कि कब मनोज आए और उसे ब्याह कर मुंबई ले जाए. मनोज गांव गया और फिर चट मंगनी पट ब्याह. वह एक महीने में शिल्पा को ले कर मुंबई आ गया. शिल्पा मुंबई के तौरतरीके सीख रही थी. वह भी रोज सुबह पानी की लाइन में लग जाती और वहां की मराठी औरतों के साथ बातें कर के थोड़ीथोड़ी मराठी भी सीखने लगी थी. जब शाम को मनोज दफ्तर से काम कर के खोली में लौटता और शिल्पा को अपनी बांहों में भर कर प्यार भरी बातें करता, तो वह कहती, ‘‘धीरे बोलिए, सब के कमरे आसपास हैं. खिड़की भी तो सड़क पर खुलती है. कोई सुन लेगा तो…’’

मनोज कहता, ‘‘सुन ले तो सुन ले, हम अपनी बीवी से बात कर रहे हैं, कोई चोरी थोड़े ही कर रहे हैं.’’ आसपास की जवान लड़कियां भी कभीकभार शिल्पा को छेड़ कर कहतीं, ‘भाभी, कल भैया से क्या बातें हो रही थीं? हम ने सुना था सबकुछ…’ शिल्पा जवाब में कहती, ‘‘कोई और काम नहीं है तुम्हारे पास, हमारी बातें सुनने के अलावा?’’

इस तरह 4 साल बीत गए और शिल्पा के 2 बच्चे भी हो गए. बड़ी बेटी संध्या और छोटा बेटा वीर. मनोज अपने परिवार में बहुत सुखी था. वह अब एक फ्लैट खरीदना चाहता था, ताकि जब उस के बच्चे बड़े हों तो थोड़े अच्छे माहौल में पलबढ़ सकें. इस के लिए वह एकएक पाई जोड़ रहा था. शिल्पा और मनोज सोने से पहले रोज नए फ्लैट के बारे में ही बात करते थे. मनोज कहता, ‘‘एक वन बैडरूम का फ्लैट हो जाए बस.’’ शिल्पा कहती, ‘‘हां, तुम नया घर लेने की तैयारी करो. हम उसे सजा देंगे और बाहर नेम प्लेट पर मेरा भी नाम लिखना. घर के दरवाजे पर हम लिख देंगे ‘आशियाना’.’’

मनोज हर छुट्टी के दिन ब्रोकर से मिल कर फ्लैट देख कर आता. कोई बहुत अंदर गली में होता, जहां से मेन रोड पर आने में ही आधा घंटा लग जाए, तो कोई बच्चों के स्कूल से बहुत दूर होता. कोई बहुत पुरानी बिल्डिंग होती, जिस में लीकेज की समस्या होती, तो कोई बहुत अंधेरी सी बिल्डिंग होती और कीमत पूछते ही मकान मालिक भी बड़ा सा मुंह खोल देते. कीमत बड़ी और फ्लैट का साइज छोटा. लोग 30 लाख रुपए तक मांगते. कहां से लाता मनोज इतने पैसे? सो, 20 लाख रुपए में अच्छी सी लोकेशन देख कर उस ने एक वन बैडरूम फ्लैट खरीद लिया, जिस के आसपास सारी सुविधाएं थीं और रेलवे स्टेशन भी नजदीक था. फ्लैट में रहने से शिल्पा और बच्चे भी मुंबई के रंग में रंगने लगे थे. मनोज की बेटी संध्या 13वें साल में थी. उस का शरीर अब गोलाई लेने लगा था और वह अब थोड़ा सजधज कर भी रहने लगी थी. ऊपर से टैलीविजन और मीडिया. आजकल के बच्चे वक्त से पहले ही सबकुछ समझने लग जाते हैं. फिर घर में जगह व एकांत की कमी. अब घर छोटा पड़ने लगा था.

मनोज अब बच्चों से नजरें बचा कर मौका ढूंढ़ता कि कब शिल्पा के करीब आए और उसे अपने आगोश में ले. वक्त तेजी से बीत रहा था. संध्या अब कालेज जाने लगी थी और रोजाना नए कपड़े, जूते, बैग वगैरह की मांग भी करने लगी थी. उस की ये सब जरूरतें पूरी करना मनोज के लिए मुश्किल होता जा रहा था. एक दिन संध्या बोली, ‘‘पापा, मेरी सारी सहेलियां नई फिल्म देखने जा रही हैं, मुझे भी जाना है. मां से कहिए न कि मुझे कुछ रुपए देंगी.’’

मनोज ने कहा, ‘‘देखो संध्या बेटी, तुम्हारी बात बिलकुल सही है. तुम्हें भी घूमनेफिरने की आजादी होनी चाहिए. लेकिन बेटी, हम इतने पैसे वाले नहीं हैं. अभी तुम्हारी पढ़ाईलिखाई के तमाम खर्च हैं और बाद में तुम्हारी शादी के. फिर तुम्हारा छोटा भाई भी तो है. उस के बारे में भी तो सोचना है. आज तो मैं तुम्हें पैसे दे रहा हूं, लेकिन रोजरोज जिद मत करना.’’

संध्या खुशीखुशी पैसे ले कर कालेज चली गई. शिल्पा मनोज से बोली, ‘‘कैसी बातें करते हैं आप. आज पैसे दिए तो क्या वह रोज नहीं मांगेगी? लड़की को इतनी छूट देना ठीक नहीं है.’’ मनोज बोला, ‘‘बच्चों के लिए करना पड़ता है शिल्पा. ये भी तो बाहर की दुनिया देखते हैं, तो इन का भी मन मचलता है. और अगर हम न दें, तो इन का हम पर से भरोसा उठ जाएगा.’’ अब संध्या तकरीबन हर रोज मनोज से पैसे मांगने लगी थी. कभीकभी मनोज मना कर देता, तो उस दिन संध्या मुंह फुला कर कालेज जाती. कालेज के बाद या कभीकभी कालेज से छुट्टी कर के लड़केलड़कियां हाथ में हाथ डाले मुंबई के बीच पर घूमते नजर आते. कई बार थोड़े अमीर परिवार के लड़के लड़कियों को अच्छे रैस्टोरैंट में ले जाते, तो कभी फिल्म दिखा कर भी लाते.

मनोज तो संध्या की जरूरत पूरी करने में नाकाम था, सो अब संध्या भी उन लड़कों के साथ घूमने लगी थी. किसी लड़की को बांहों में बांहें डाल कर घुमानाफिराना इस उम्र के लड़कों के लिए बड़े गर्व की बात होती है और लड़कियां सोचती हैं कि यह प्यार है और वह लड़का उन की खूबसूरती का दीवाना है. संध्या की दूसरी सहेलियां भी ऐसे ही लड़कों के साथ घूमती थीं. एक दिन सभी लड़के लड़कियां गोराई बीच चले गए. बोरीवली से छोटी नाव, जिसे ‘फेरी’ कहते हैं, चलती है, जो एक छोटी सी क्रीक को पार करा देती है और गोराई बीच आ जाता है. यह मछुआरों का गांव है. मछुआरे बहुत ही कम कीमत पर, यों समझिए 2 सौ, 3 सौ रुपयों में कमरे किराए पर दे देते हैं, ताकि लोग बीच से आ कर कपड़े बदल लें और आराम भी कर लें. सो, सारा ग्रुप पूरा दिन सैरसपाटा कर के आता और अलग अलग कमरों में बंद हो जाता. यह सारा खर्चा लड़के ही करते थे.

अब यह सब संध्या व उस की सहेलियों व लड़कों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. कभीकभी वे लड़के अपने दूसरे दोस्तों को भी वहां ले जाते और संध्या व उस की सहेलियां उन लड़कों से भी हिलमिल गईं. यही तो खास बात है इस उम्र की कि कुछ बुरा तो नजर आता ही नहीं. सब अच्छा ही अच्छा लगता है और अगर मातापिता कुछ कहें, तो उन की बातें दकियानूसी लगती हैं. लड़केलड़कियां एकदूसरे की सारी जरूरतें पूरी करते, दैहिक भूख व मौजमस्ती. कुछ महीनों तक ऐसा ही चलता रहा, लेकिन एक दिन वहां पर पुलिस की रेड पड़ गई, जिस में संध्या भी पकड़ी गई. फिर क्या था… सभी लड़केलड़कियों को पुलिस स्टेशन ले जाया गया और फोन कर के उन के मातापिता को भी वहां बुलाया गया.

मनोज के पास भी पुलिस स्टेशन से फोन आया. वह तो फोन सुनते ही हक्काबक्का रह गया. जल्दी से वह दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी ले कर पुलिस स्टेशन पहुंचा. वहां संध्या को देखा और सारी बात मालूम होते ही उस की आंखों में खून उतर आया. खैर, पुलिस के हाथपैर जोड़ कर वह संध्या को वहां से ले कर घर आया. जब संध्या की मां ने सारी बात सुनी, तो उस ने संध्या को जोरदार तमाचा जड़ कर कहा, ‘‘शर्म नहीं आई तुझे उन लड़कों के साथ गुलछर्रे उड़ाते हुए?’’ संध्या कहां चुप रहने वाली थी. वह कहने लगी, ‘‘19 साल की हूं मैं और बालिग भी हूं. अगर आप और पापा सब कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? कितनी बार देखा है मैं ने आप और पापा को…’’

इतना सुनते ही शिल्पा ने संध्या के गाल पर दूसरा तमाचा जड़ दिया और गुस्से में बोली, ‘‘अरे, हम तो पतिपत्नी हैं, पर तुम इस पढ़नेलिखने की उम्र में बिन ब्याहे ही…’’ संध्या ने सारी हदें पार कर दीं और बोली, ‘‘तो क्या हुआ जो शादी नहीं हुई तो. तुम लोगों को देख कर बदन में उमंग नहीं जागती? कैसे शांत करूं मैं उसे बिन ब्याहे? अगर वे लड़के मुझे घुमातेफिराते हैं, मेरी जरूरतों का खयाल रखते हैं, तो बुराई भी क्या है इस दैहिक संबंध में? पापा और आप भी तो शादी कर के यही कर रहे हो. सिर्फ एकदूसरे की जरूरतों को पूरा करना. तो क्या इस पर शादी की मुहर लगाना जरूरी है?

‘‘आप लोग तो मेरी जरूरतें पूरी कर नहीं पाते. सिर्फ मैं ही नहीं, आजकल तो अकसर सभी लड़कियां करती हैं यह सब. ‘‘मां, अब तुम लोग पुराने जमाने के हो गए हो. आजकल सब चलता है. कुदरत ने देह दी है, तो उस को इस्तेमाल करने में क्या बुराई है?’’ संध्या की ये बेशर्मी भरी बातें सुनी नहीं जा रही थीं. मनोज तो अपने कानों पर हाथ रख मुंह नीचे किए बैठा था और संध्या लगातार बोले जा रही थी. उस ने तो मौजमस्ती की चाह और अपनी दैहिक भूख को शांत करने के लिए सारी हदें पार कर ली थीं. नएनए लड़कों से दैहिक संबंध बनाने में उसे कोई बुराई नजर न आई. इस का कोई दुख या गिला भी न था उसे. शिल्पा कोने में दीवार पर सिर टिका कर आंसू बहाए जा रही थी. अब मनोज जुट गया था 2 कमरों का घर ढूंढ़ने में.

Hindi Kahani : भागी हुई लड़की – छबीली अपनी मां से क्या बोली

Hindi Kahani : सुबह का समय था. राजू सोया पड़ा था कि तभी किसी ने उसे झकझोर कर उठाया. सामने उस की मामी खड़ी थीं. मामी ने हांफते हुए कहा, ‘‘तुम्हें पता है कि रात को छबीली घूरे के साले के साथ भाग गई.’’ राजू ने आंखें मिचमिचा कर देखा कि कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा है. उस ने मामी से पूछा, ‘‘आप को किस ने बताया?’’

मामी बोलीं, ‘‘कौन बताएगा… पूरे गांव को पता चल गया है.’’ राजू को हैरानी हो रही थी. जब रात को वह अपनी मौसी के देवर के छत वाले कमरे में था, तो छबीली घूरे के साले कलुआ के साथ इधर से उधर भाग रही थी. तब उस ने सोचा था कि कोई काम होगा, क्योंकि गांव में रामलीला चल रही थी. उस में छबीली के पिता रावण का रोल करते थे और भाई मेघनाद का. सारा घर रामलीला देख रहा था. इतने में छबीली कलुआ के साथ नौ दो ग्यारह हो गई. लेकिन राजू की समझ में एक बात नहीं आ रही थी कि छबीली ने कलुआ में ऐसा क्या देखा, जो उस कालेकलूटे के साथ भाग गई. छबीली गोरीचिट्टी, भरे बदन की थी. उसे देख कर कोई भी लड़का दिल दे बैठे. गोरे मुखड़े पर काली आंखें, गालों पर काला तिल, लंबी नाक उस पर गोल नथुनी. सुनहरे से बाल, जो कमर को छूते थे. फिर छबीली कलुआ के साथ क्यों भागी?

राजू फटाफट बिस्तर से उठा. छबीली और कलुआ के घर गली में थोड़ी दूरी पर थे, जो जहां हिंदुस्तानपाकिस्तान के बौर्डर जैसे हालात थे. कलुआ की बहन काली और छबीली की मां रामजनी के बीच शब्दों के गोले दागे जा रहे थे. काली कह रही थी, ‘‘अपनी बेटी को संभालो, तब मेरे भाई से कुछ कहना. जब लड़की दावत बांटती फिरे, तो लड़के खाएंगे ही. बड़ी आई कलुआ को बदनाम करने वाली.’’

इधर रामजनी का कहना था, ‘‘मेरी लड़की सीधीसादी है. उसे तो कलुआ ने बहका दिया होगा, वरना इतनी संस्कारी लड़की भाग क्यों जाती?’’ राजू को रामजनी की बात में दम लगा, क्योंकि छबीली को देख कर नहीं लगता था कि वह ऐसा कुछ कर डालेगी. राजू तो पहले से ही गुस्सा था, ऊपर से छबीली रिश्ते में उस की मौसी लगती थी. राजू को कलुआ पर ज्यादा गुस्सा था, इस वजह से वह छबीली के घर वालों के गुट में जा मिला. राजू ने छबीली के पिता को बताया कि रात को उस ने छबीली मौसी को कलुआ के साथ छत पर इधरउधर भागते हुए देखा था. छबीली का बाप मलूका पहले तो राजू पर गुस्सा हुआ, फिर बोला, ‘‘तू रात में नहीं बता सकता था? अगर रात में बता देता, तो इतनी नौबत ही न आती.’’

राजू बोला, ‘‘मुझे क्या पता था कि छबीली मौसी यह धमाका कर जाएंगी.’’ राजू को पता था कि कलुआ उस को उलटा पीट डालता, लेकिन मलूका की नजरों में इज्जत पाने के लिए उस ने ऐसा कहा था और ऐसा हुआ भी. मलूका नरम पड़ कर राजू से बोला, ‘‘अच्छा, जो हुआ उसे छोड़. अब यह बता कि कलुआ छबीली को ले कर कहां गया होगा?’’

राजू ने तुक्का लगाते हुए कहा, ‘‘मैं ने सुना था कि वह किसी दोस्त के यहां जाने की बात कर रहा था.’’ लेकिन एक बात फिर भी आ लटकी कि कलुआ कौन से दोस्त के यहां गया होगा और दोस्त रहता कहां होगा? अब राजू इस बात पर अपना तुक्का नहीं लगा सकता था. इस वजह से वह चुप रहा. सब लोग गाड़ी में बैठ कर कलुआ के गांव पहुंचे. वहां से कलुआ के एक दोस्त को पकड़ा, उसे दारू पिलाई, डरायाधमकाया, तब जा कर उस ने दोस्तों की डायरैक्टरी बता दी और घुमाने लगा दोस्तों के ठिकाने पर. एक जगह जा कर कलुआ का पता चला. एक दोस्त के कमरे में कलुआ छिपा बैठा था. छबीली उस की गोद में सिर रखे लेटी थी. दोनों अपनेअपने घर के लोगों की हालत पर सोच के घोड़े दौड़ा रहे थे. छबीली कह रही थी, ‘‘मेरी अम्मां तो मुझे सामने पा कर दो हिस्से कर डालेंगी.’’ वहीं उस की बात सुन कर कलुआ बोला, ‘‘मेरा जीजा मुझे देखे तो मेरा मुंह काले से लाल कर डालेगा.’’

तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई. दोनों बिजली के करंट लगे आदमी की तरह उठ खड़े हुए. बाहर से आवाज आई, ‘‘दरवाजा खोलो.’’ आवाज मलूका की थी, जिसे दोनों प्यार के पंछी अच्छे से समझ गए थे.

मलूका फिर बोला, ‘‘दरवाजा खोल दो, नहीं तो तोड़ डालूंगा.’’ यह सुन कर दोनों प्रेमियों के दिल कांप उठे और फिर तभी छबीली की आंखों में गुस्से की आग जल उठी. उस ने कलुआ के दोस्त का रखा देशी कट्टा निकाल लिया और कलुआ को अपने पीछे कर दरवाजा खोल दिया. लोग कमरे में घुसने ही वाले थे कि छबीली कट्टा तान कर बोली, ‘‘सब के सब भाग जाओ, नहीं तो जान से हाथ धो बैठोगे.’’

लोगों ने यह बात सुन कर अपने कदम पीछे खींच लिए, तभी छबीली का भाई गोबर आगे बढ़ा. उस ने सोचा कि इज्जत जाने से अच्छा है जान चली जाए. वह छबीली के सामने आ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘चला गोली…’’ छबीली पर आज इश्क का भूत सवार था. उस ने कट्टे का निशाना गोबर के सीने पर लगाया और ट्रिगर दबा दिया. जैसे ही ट्रिगर दबा, लोगों ने आंखें बंद कर लीं. लेकिन यह क्या… कट्टे से गोली चली ही नहीं. होती जो चलती. मलूका ने आगे बढ़ कर छबीली के बाल पकड़ लिए और कमरे से घसीटते हुए बाहर ले आया. कलुआ की हालत पतली हुई. गोबर ने गुस्से में आ कर कलुआ के लातें बजा दीं. लोगों ने गोबर को समझाया कि यह मर गया, तो केस हो जाएगा. लड़की मिल गई, चलो अपने घर.

सभी लोग छबीली को ले घर आ गए. छबीली को देख उस की मां रामजनी उसे चप्पल से पीटने लगीं. महल्ले की औरतों ने जैसेतैसे छबीली को छुड़ाया. सब के शांत हो जाने के बाद तय हुआ कि छबीली की शादी तुरंत कर दी जाए. सारे रिश्तेदारों को खबर कर दी गई. लेकिन मुसीबत कहां थमने वाली थी. कोई भी अच्छा लड़का उस से शादी करने को तैयार नहीं होता था. लेकिन तभी एक रिश्तेदार ने खबर दी कि उन के महल्ले में एक लड़का है, जो छबीली से शादी कर सकता है. लेकिन लड़का मोटा था, साथ ही छबीली से ज्यादा उम्र का था. पर शादी तो करनी ही थी, दामन पर लगा दाग जो छुड़ाना था. बात पक्की हो गई. बड़ी मुश्किल से छबीली की शादी की रस्में पूरी हुईं. वह चुपचाप मंडप में बैठी रही. उसे शादी में मजा नहीं आ रहा था. उस की आंखें तो सिर्फ कलुआ की सूरत देखना चाहती थीं. शादी निबट चुकी थी. छबीली विदा होने को हुई, मां रामजनी का दिल भर आया. दोनों मांबेटी लिपट कर खूब रोईं.

मां रामजनी ने कसम दी और बोलीं, ‘‘बेटी, अब जैसा भी है, मंजूर करो. पुरानी बातें गलती समझ कर भुला डालो. शायद तुम्हारी शादी अच्छी जगह करते, लेकिन तुम्हें जमाने का हाल तो पता ही है. हम मजबूर हैं. हमें माफ करना. अब किसी को शिकायत का मौका न देना.’’

छबीली बोली, ‘‘मां, तुम्हें कभी दुख न दूंगी. अब ससुराल से केवल मर के ही वापस आऊंगी. तुम मेरी चिंता मत करना. भूल जाओ और मेरा कहासुना भी माफ करना.’’ मन के सारे दाग धुल चुके थे. राजू की आंखें भी नम थीं. सोचता था कि प्यार इनसान को कितना सुधार देता है और बिगाड़ भी सकता है. छबीली के बाप मलूका की आंखें भी बेटी को विदा होते देख नम थीं. छबीली अपनी ससुराल चली गई. कलुआ फिर कभी उस गांव में नहीं आया. छबीली भी शायद उसे भूलती जा रही थी. आज वह एक बच्चे की मां थी. आज सबकुछ शांत सा है, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

लेकिन इतिहास की कई परतें, कई कहानियां लिए मौजूद हैं, लेकिन उन्हें कुरेदे कौन. सब अपने में मसरूफ हैं. परंतु राजू के दिमाग में यह अभी भी वैसा ही है, जैसा तब था.

Hindi Story : काबुल से कैलिफोर्निया – अनीता कौन सी फिल्म देखकर आईं थी

Hindi Story : हम दिल्ली में रहते थे. मेरे पति केंद्रीय संस्थान में वरीय अधिकारी थे. हमारे 2 बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी. मेरी बेटी अनीता छोटी है. उन दिनों अफगानिस्तान के पठान दिल्ली में अकसर आते थे. दिल्ली की कालोनियों और गलियों में घूमघूम कर ड्राईफूट्स, बादाम, अखरोट, अंजीर बेचा करते थे. साथ में अकसर शुद्ध प्राकृतिक हींग भी रखते थे. कभी महीने में एक बार तो कभी 2 महीने में एक बार आते थे. मैं एक पठान से ड्राईफूट्स और हींग लिया करती थी. अकसर खरीदते समय मेरे बेटी अनीता भी साथ होती. करीब 4 साल की थी वह उस समय. वह पठान कुछ ड्राईफू्रट्स मेरी बेटी के हाथ में जरूर रख देता था. वह पिछले 5 सालों से लगातार आ रहा था. अनीता को बहुत प्यार करता था. बीचबीच में वह काबुल भी जाया करता.

अनीता ने हाल ही में हम लोगों के साथ हिंदी फिल्म ‘काबुलीवाला’ देखी थी, इसलिए वह उस पठान को काबुलीवाले अंकल ही बोला करती थी. जब दूर से ही उस की आवाज सुनती, दौड़ कर ‘काबुलीवाला आया’ बोल कर दरवाजे पर जा कर खड़ी हो जाती और मुझे जोरजोर से आवाज दे कर बुलाती.

हालांकि उस ने अपना नाम अजहर बताया था, पर हम सब उसे काबुलीवाला या पठानभाई ही कहते थे. वह बोला करता कि काबुल में हिंदी फिल्में और हिंदी गाने काफी लोकप्रिय हैं. कुछ हिंदी फिल्मों के नाम भी बताए थे. ‘कुर्बानी’, ‘धर्मात्मा’, ‘धर्मवीर’, ‘शोले’ आदि जो फिल्में उस ने देखी थीं. उसे दिल्ली शहर भी बहुत पसंद था. 80 के दशक की शुरुआत तक तो काबुलीवाला आया करता था. उस के बाद उस का आना अचानक बंद हो गया.

फिर अचानक एक दिन 1984 के मध्य में हमारे घर पर वह आया. उस के साथ उस की 10 साल की बेटी जाहिरा भी थी. जाहिरा बहुत ही सुंदर लड़की थी. वह साथ में कुछ ड्राईफ्रूट्स भी लाया था. उस ने अनीता के बारे में पूछा, तो मैं ने उसे आवाज दे कर बुलाया. अनीता और जाहिरा दोनों लगभग हमउम्र ही थीं. अनीता ने आ कर कहा, ‘काबुलीवाले अंकल, इतने दिन आप कहां रह गए थे? आप काफी दिनों के बाद आ रहे हैं?’

मैं ने भी अनीता की बात दोहराई. पहले उस ने ड्राईफ्रूट्स अनीता को दिए. फिर कुछ ड्राईफ्रूट्स के पैकेट मुझे दिए. मैं ने कहा, ‘आजकल क्या रेट चल रहा है, मुझे पता नहीं, तुम बताओ कितने रुपए दे दूं, पठानभाई?’ तब वह बोला, ‘मुझे आप पुराने रेट से ही दे दो. आजकल तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है हम लोगों पर. हम आप के वतन में रिफ्यूजी बन कर आए हैं.’

मेरे, ऐसा क्या हो गया, पूछने पर उस ने कहा, ‘हमारे वतन में तो काफी दिनों से जंग चल रही है. जब से रूसी आए हैं, अमन छिन गया है. रोज गोलाबारूद, बम से न जाने कितनी जानें जा रही हैं. मुजाहिदीनों और रूसियों के बीच पिस कर रह गए हम लोग. हजारों लोग वतन छोड़ कर पाकिस्तान, ईरान, हिंदुस्तान भाग कर रिफ्यूजी कैंप में बसर कर रहे हैं. मैं तो आप के मुल्क से वाकिफ हूं, इसीलिए दिल्ली आ गया अपनी बीवी और बच्ची के साथ.’

इतना कहतेकहते वह बच्ची का हाथ पकड़ कर रोने लगा. मैं ने अनीता को कुछ स्नैक्स और मिठाई लाने को कहा और पूछा, ‘पठानभाई, बोलो क्या पिओगे ठंडा या गरम? तुम्हारी बेटी पहली बार आई है.’ इतना बोल कर मैं ने जाहिरा का हाथ पकड़ कर अपने पास खींचते हुए कहा, ‘बेटा, दिल्ली की लस्सी मशहूर है, पिओगी?’

उस ने कहा ‘हां, पिऊंगी. अब्बू भी बोलते हैं यहां की लस्सी बहुत उम्दा होती है.’

मैं पठान की ओर देख कर बोली, ‘अरे, यह तो हिंदी बोल लेती है.’

पठान बोला, ‘हम लोगों ने हिंदी सिनेमा देख कर हिंदी बोलना सीख लिया है.’

अनीता मिठाई, स्नैक्स और लस्सी ले कर आई. पठान और जाहिरा ने निसंकोच खाया भी. मैं ने उस से जब पूछा कि क्या अब वह दिल्ली में ही रहेगा तो उस ने कहा, ‘मेरा बड़ा भाई अमेरिका में है. वह मुझे, मेरी पत्नी और जाहिरा को स्पौंसर कर अमेरिका बुला रहा है.’

मैं ने जब कहा कि क्या इंडिया उसे अच्छा नहीं लगता कि इतनी दूर जा रहा है तो वह बोला, ‘आप का वतन तो बहुत प्यारा है. पर सुना था कि यहां सिर्फ 1 साल का ही वीजा मिलता है. फिर हर साल वीजा 1 साल और आगे बढ़ाना होगा. अमेरिका जा कर वहां मैं रिफ्यूजी होते हुए ग्रीनकार्ड की अर्जी दूंगा और जल्द ही ग्रीनकार्ड मिल भी जाएगा. हमारे वतन के बहुत लोग वहां पहले से ही गए हैं. हम लोग दिल्ली में अंगरेजी बोलना सीख रहे हैं.’ मैं ने जाहिरा के हाथ में 500 रुपए अलग से दे कर कहा कि इस से तुम एक इंडियन ड्रैस ले लेना. उस के बाद वह फिर 1985 के आरंभ में हमलोगों से मिलने आया. इस बार उस की पत्नी और बेटी भी साथ थी. उस ने बताया कि वे एक सप्ताह में अमेरिका जा रहे हैं. यह इंडिया में हमारी आखिरी मुलाकात थी. इस के बाद वर्षों बीत गए, लगभग 20 वर्ष. इस बीच दुनिया काफी बदल गई. कितनी जंगें हुईं-इराक, अफगानिस्तान, कारगिल न जाने कितने खूनखराबे, आतंकी घटनाएं हुईं. मैं कैलिफोर्निया की सिलिकौन वैली के एक शहर फ्रेमौंट में आई हूं. मेरे बच्चे यहीं सैटल्ड हैं. यहां अकसर आनाजाना लगा रहता है.

एक दिन मैं वालमार्ट गई थी शौपिंग के लिए. वहां पेमैंट लेन में मेरे आगे एक लड़की थी, उस के साथ एक बुजुर्ग महिला भी थी. लड़की तो रंगरूप, पहनावे से अमेरिकन लग रही थी. पर उस के साथ वाली महिला अपने सिर और गले में स्कार्फ बांधे थी, जैसा कि अकसर मुसलिम महिलाएं यहां बांधा करती हैं. लड़की का चेहरा जानापहचाना लगा, पर मैं ने संकोचवश उस से कुछ नहीं पूछा था. वह मेरे आगे लाइन में खड़ी थी. उस ने मुझे देखा था. अपने देश में होती तो जरूर पूछ लेती. इस के एक सप्ताह बाद मेरी बेटी ने पार्टटाइम ड्राइवर और डोमैस्टिक हैल्प के लिए विज्ञापन दिया था अपने मोबाइल नंबर के साथ. मेरी बेटी को एक लड़की ने फोन कर कहा कि वह काम के सिलसिले में मिलना चाहती है. बेटी उस समय औफिस में थी. बेटी ने उसे बताया कि मम्मी घर पर हैं, जा कर काम समझ कर बात कर ले. थोड़ी देर में घर की कौलबैल बजी. मैं ने दरवाजा खोला तो देखा कि वही लड़की सामने थी. कुछ पल के लिए दोनों एकदूसरे को देखते रहे थे.

फिर मैं ने पूछा, ‘‘कहीं तुम जाहिरा तो नहीं?’’

वह बोली, ‘‘और आप दिल्लीवाली आंटी?’’

मैं ने उसे अंदर आने को कहा और पूछा, ‘‘क्या कल तुम वालमार्ट में थी?’’ जाहिरा ने कहा, ‘‘हां, मैं और मम्मी दोनों थे. आप ने देखा था क्या?’’

मेरे हां कहते ही वह बोली, ‘‘अगर देखा तो आप ने बात क्यों नहीं की?’’

मैं ने कहा कि तुम तो बिलकुल अमेरिकन दिख रही थी और वैसे भी अमेरिका में बेवजह और बिना जानेपहचाने टोकना मुझे ठीक नहीं लगा था.

इस पर वह बोली, ‘‘यहां तो सभी एकदूसरे के नाम से ही पुकारते हैं, पर मैं तो उसी पुराने रिश्ते से आप को आंटी ही पुकारूंगी. आप को कोई एतराज तो नहीं है?’’

मैं ने कहा, ‘‘नहीं.’’

जाहिरा बोली, ‘‘मैं तो आप की बेटी के कहने पर यहां काम के लिए आई हूं.’’

वैसे तो मैं मुसलिम लड़की रखने में डरती थी, फिर भी उस के प्रति ऐसी भावना मेरे मन में नहीं आई. मैं बोली, ‘‘काम तुम्हें बाद में बताऊंगी, पहले तुम यह बताओ कि काबुल से कैलिफोर्निया तक कैसे आई और यहां तुम्हारे मम्मीपापा सब कैसे हैं? तुमअभी तक हिंदी अच्छी तरह बोल लेती हो.’’

वह बोली, ‘‘थैंक्स टू बौलीवुड, और हिंदी टीवी सीरियल्स हिंदी सिखाने के लिए. यहां घर में हमलोग फारसी में बात करते हैं और बाहर दूसरे लोगों से अंगरेजी में.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है कि तुम 3 भाषाएं जानती हो.’’

फिर उस ने बोलना शुरू किया, ‘‘मेरे बड़े चाचा काबुल में अमेरिकी एंबैसी में काम करते थे. वे बहुत पहले ही अमेरिका आ गए  थे. उन्होंने हम लोगों को स्पौंसर कर यहां का वीजा दिलाया. बाद में हम ने रिफ्यूजी होने के आधार पर ग्रीनकार्ड के लिए अप्लाई किया जो 6 महीने में ही मिल गया. फिर लगभग 5 साल के अंदर ही यहां की नागरिकता भी मिल गई.’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘और कितने लोग अफगानिस्तान से यहां आ कर शरण लिए हुए हैं?’’ उस ने बताया, ‘‘अफगान युद्ध के पहले बहुत ही कम अफगानी लोग अमेरिका में थे. लेकिन रूसी और मुजाहिदीनों के बीच लड़ाई के चलते बड़ी बरबादी हुई और लोग देश छोड़ कर भागने लगे थे. फिलहाल 1 लाख से थोड़े ही कम अफगानी लोग अमेरिका में हैं. इन में ज्यादातर लोग कैलिफोर्निया में हैं. उस में भी फ्रेमौंट शहर में सब से ज्यादा अफगानी शरणार्थी बसे हैं. इस के बाद दूसरे नंबर पर उत्तर वर्जीनिया है. अमेरिकी सरकार ने उन की काफी सहायता की है. सस्ते रैंट पर घर दिलवाए हैं?’’ फिर मैं ने पूछा, ‘‘उस का परिवार यहां क्या कर रहा है?’’ वह बोली, ‘‘मेरे चाचा तो अब बहुत बीमार रहते हैं. इस के अलावा उन की दिमागी हालत भी ठीक नहीं है जिस के चलते उन्हें हर वक्त किसी की देखरेख की जरूरत होती है. यह काम उस के पिता करते हैं और इस के लिए सरकार लगभग 2 हजार डौलर देती है. मम्मी एक स्टोर्स में पार्टटाइम काम करती हैं. मेरे पति एक कार शोरूम में काम करते हैं. मैं ने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली है. आगे की पढ़ाई औनलाइन घर से ही कर रही हूं. फुलटाइम जौब तो कहीं नहीं मिली है, पार्टटाइम जो भी काम मिलता है, कर लेती हूं. अमेरिका में किसी भी काम को हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं और यहां आप के पास भी काम के लिए ही आई हूं.’’

मैं ने एक दीर्घ सांस लेते हुए कहा, ‘‘मुझे अच्छा नहीं लग रहा तुम से घर के काम कराना.’’

‘‘आप के बच्चे इतने दिनों से अमेरिका में हैं और आप भी काफी दिनों से अमेरिका आतीजाती रही हैं, फिर आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं. यहां कर्म ही धर्म है और हर काम करने वाले की समाज में उतनी ही प्रतिष्ठा है.

आप बेझिझक कहें, मैं भी निसंकोच खुशीखुशी अपना काम निभाऊंगी.’’

फिर उसे काम बताया कि दोपहर 4 घंटे सोमवार से शुक्रवार तुम्हें टाइम देना होगा. ढाई बजे बच्चों को स्कूल से पिक कर घर लाना है, उन्हें लंच करा कर थोड़ा आराम करने देना. इस बीच किचन के कुछ काम जैसे सब्जियां काटना, साफ बरतनों को डिशवाशर से निकाल उन की जगह पर लगाना, फिर बच्चों को अलगअलग क्लासेज में ले जाना. शाम को जब बच्चों को ले कर आना तो उन के रूम और कपड़े आदि ठीक करना. किसी दिन ज्यादा काम भी हो सकता है और कभी शनिवार या रविवार को भी काम पड़ सकता है.

जाहिरा बोली, ‘‘बस, अब आप निश्चिंत हो जाएं, सभी काम आप के मन लायक करूंगी.’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या वह इंडियन डिशेज पकाना जानती है?’’ तो उस ने कहा, ‘‘सभी तो नहीं, पर कुछकुछ बना लेती हूं. हां, मेरी मां सबकुछ बना लेती हैं. पर आंटी, आप क्या मेरा बनाया खाएंगी? मुझे याद है कि जब हम दिल्ली में थे, ईद की सेवइयां देने अब्बू के साथ आई थी आप के घर. अब्बू ने आप को कच्ची सेवइयां दी थीं. मैं ने उन से वजह पूछी, तो उन्होंने बताया कि हमारे घर का पका खाना आप नहीं खाती हैं.’’

‘‘उस समय की बात और थी. अब तो अमेरिका में थोड़ा ऐडजस्ट नहीं करूंगी तो रहना मुश्किल हो जाएगा. ठीक है, कभी घर में पार्टी देनी होगी तो कुछ खास पकवान बिरयानी आदि घर पर ही बनवाना चाहती हूं. इसीलिए ऐसे मौकों के लिए पार्टटाइम इंडियन कुक खोज रही हूं. वैसे ज्यादा कुछ तो होटल से ही मंगवा लेते हैं. पर सुना है तुम लोग लाजवाब बिरयानी बनाते हो.’’

‘‘डोंट वरी, आंटी, ऐसी जरूरत हो तो एक दिन पहले बता देना, अम्मी आ कर बना देंगी. पर आप तो बिलकुल नहीं बदली हैं, वही साड़ी, सिंदूर और बिंदिया. आप को पता है, हमलोग भी अपनी पार्टी में लहंगेसाड़ी पहन कर इंडियन फिल्मी गानों पर डांस करते हैं. मुझे तो सुर्ख लाल रंग की सितारों वाली साड़ी बहुत अच्छी लगती है.’’

मैं ने कहा, ‘‘उसे 20 डौलर प्रति घंटे के रेट से पे करूंगी’’ इस बात पर वह जोर से हंसने लगी और बोली, ‘‘आप अगर 10 डौलर्स भी देंगी तो हम खुशी से कुबूल करेंगे.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘कल से ही काम पर आ जाए.’’

अगले दिन से जाहिरा काम पर आने लगी. सभी काम पूरे मन लगा कर हंसतेहंसते करती और मैं भी संतुष्ट थी. हर शुक्रवार की शाम को उस को वीकली पेमैंट कर देती जैसा कि यहां का पार्टटाइम वर्क पेमैंट का नौर्मल तरीका है. एक दिन जाहिरा अपनी मां को ले कर आई. दुआसलाम के बाद उस की मां ने कहा, ‘‘बहनजी, अगले सप्ताह से मैं ही काम किया करूंगी. बेटी को फुलटाइम काम मिल गया है. अभी सीजन है. अमेरिका में मौल्स और स्टोर्स में फैस्टिवल सीजन में बिक्री बहुत बढ़ जाती है, इसलिए 3-4 महीने अक्तूबर से दिसंबर या जनवरी तक उन्हें एक्स्ट्रा स्टाफ चाहिए होता है. जाहिरा ने मुझे सारे काम और जगहें, जहां जाना होता है, बता दिया है. आप को कोई एतराज तो नहीं?’’ मैं ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे कोई एतराज नहीं है. मगर तुम भी तो कहीं काम करती हो?’’

‘‘हां, वह पार्टटाइम जौब है, सुबह 9 से 12 बजे तक का.’’

मैं ने उस का नाम पूछा तो उस ने कहा, ‘‘आबिदा.’’

अगले सप्ताह से आबिदा ही काम पर आती. मेरी बेटी अनीता तो उस के आने से ज्यादा ही खुश थी. कभीकभी किचन में एक्स्ट्रा हैल्प भी कर दिया करती थी. कुछ दिनों के बाद मेरे नाती का जन्मदिन था. जैसा कि अमेरिका में होता है, पार्टी छुट्टी के दिन इतवार को ही रखी गई थी. हालांकि घर पर उस का सही जन्मदिन 2 दिनों पहले ही मना लिया गया था. मैं ने आबिदा को इतवार को सपरिवार आने का निमंत्रण दिया. पार्टी तो शाम को थी पर मैं ने उसे जल्द ही आने को कहा क्योंकि किचन में उस की मदद की जरूरत थी. संडे को पार्टी में आबिदा और पठानभाई दोनों आए थे. मैं ने जाहिरा के नहीं आने का कारण पूछा तो उस ने कहा कि जाहिरा घर पर अपने बीमार चाचू की देखभाल कर रही है. आबिदा की बनाई बिरयानी और वेज कोरमे की सभी तारीफ कर रहे थे. उस दिन मेरा बेटा भी आया था. वह फ्रेमौंट के पास सैन होजे शहर में रहता है. उस का परिवार भी पठान परिवार से मिला.

अनीता पठानभाई से अलग से भी मिली और आदर के साथ दोनों हाथ जोड़ कर ‘नमस्ते काबुलीवाले अंकल’ भी कहा. फिर मैं ने नाती को बुला कर उसे नमस्कार करने को कहा. मेरा नाती झुक कर उस के पैर छूने जा रहा था तो उस ने नाती को बीच में ही रोक कर ढेर सारे आशीष दिए और गिफ्ट दे कर कहा, ‘‘यही तो खासीयत है हिंदुस्तान की तहजीब में, मेहमानों की इज्जत करना और बड़ों का आदर करना. आप का वतन और हिंदुस्तानी लोग बहुत अच्छे हैं, बहनजी.’’

जब आबिदा और पठानभाई जाने लगे तो हम सभी परिवार के लोग उन्हें दरवाजे तक विदा करने आए. उन्हें रिटर्न गिफ्ट दिए. जाहिरा के लिए अलग से 2 पैकेट दिए. एक में उस के लिए खाना था और दूसरे में जाहिरा के लिए लाल रंग की साड़ी. साड़ी देख कर दोनों बहुत खुश हुए और कहा, ‘‘आप ने जो इज्जत दी, उस के लिए शुक्रिया. आप की तहजीब को सलाम.’’ वे दोनों अपनी आंखों में खुशी के आंसू लिए भारतीय तरीके से हाथ जोड़ कर विदा हुए.

Best Hindi Story : जिंदगी एक बांसुरी है – अजय क्या काम करता था

Best Hindi Story : जोकी हाट का ब्लौक दफ्तर. एक गोरीचिट्टी, तेजतर्रार लड़की ने कुछ दिन पहले वहां जौइन किया था. उसे आमदनी, जाति, घर का प्रमाणपत्र बनाने का काम मिला था. वह अपनी ड्यूटी को मुस्तैदी से पूरा करने में लगी रहती थी. सुबह के 10 बजे से शाम के 4 बजे तक वह सब की अर्जियां लेने में लगी रहती थी.

आज उसे यहां 6 महीने होने को आए हैं. अब उस के चेहरे पर शिकन उभर आई है. होंठों से मुसकान गायब हो चुकी है. ऐसा क्या हो गया है?

अजय भी ठहरा जानामाना पत्रकार. खोजी पत्रकारिता उस का शगल है. अजय ने मामले की तह तक जाने का फैसला किया. पहले नाम और डेरे का पता लगाया.

नाम है सुमनलता मुंजाल और रहती है शिवपुरी कालोनी, अररिया में.

अजय ने फुरती से अपनी खटारा मोटरसाइकिल उठाई और चल पड़ा. पूछतेपूछते वहां पहुंचा. आज रविवार है, तो जरूर वह घर पर ही होगी.

डोर बैल बजाई. वह बाहर निकली. अजय अपना कार्ड दिखा कर बोला, ‘‘मैं एक छोटे से अखबार का प्रतिनिधि हूं मैडमजी. मैं आप से कुछ खास जानने आया हूं.’’

‘फुरसत नहीं है’ कह कर वह अंदर चली गई और अजय टका सा मुंह ले कर लौट आया.

अजय दूसरे उपाय सोचने में लग गया. 15 दिन की मशक्कत के बाद उसे सब पता चल गया. सुमनलता को किसी न किसी बहाने से उस के अफसर तंग करते थे.

अजय ने स्टोरी बना कर छपवा दी. फिर तो वह हंगामा हुआ कि क्या कहने. दोनों की बदली हो गई. अच्छी बात यह हुई कि सुमनलता के होंठों पर पुरानी मुसकान लौट आई.

एक दिन अजय कुछ काम से ब्लौक दफ्तर गया था. उस ने आवाज दे कर बुलाया. अजय चाहता तो अनसुना कर सकता था, पर फुरसत पा कर वह मिला. औपचारिक बातें हुईं. उस ने अजय को घर आने का न्योता दिया और उस का फोन नंबर लिया. बात आईगई हो गई.

3 दिन बाद रविवार था. शाम को अजय को फोन आया. अजनबी नंबर देख कर ‘हैलो’ कहा.

उधर से आवाज आई, ‘सर, मैं मिस मुंजाल बोल रही हूं. आप आए नहीं. मैं सुबह से आप का इंतजार कर रही हूं. अभी आइए प्लीज.’

मिस मुंजाल यानी ‘वह कुंआरी है’ सोच कर अजय तैयार हुआ और चल पड़ा. एक बुके व मिठाई ले ली. डोर बैल बजाते ही उस ने दरवाजा खोला.

साड़ी में वह बड़ी खूबसूरत लग रही थी. वह चहकते हुए बोली, ‘‘आइए, मैं आप का ही इंतजार कर रही थी.’’

अजय भीतर गया. वहां एक औरत बनीठनी बैठी थी. वह परिचय कराते हुए बोली, ‘‘ये मेरी मम्मी हैं. और मम्मी, ये महाशय पत्रकार हैं. मेरे बारे में इन्होंने ही छापा था.’’

अजय ने उन के पैर छू कर प्रणाम किया. वे उसे आशीर्वाद देते हुए बोलीं, ‘‘सदा आगे बढ़ो बेटा. आओ, बैठो.’’

तभी मिस मुंजाल बोलीं, ‘‘आप ने मुझे अभी तक अपना नाम तो बताया ही नहीं?’’

वह बोला, ‘‘मुझे अजय मोदी कहते हैं. आप सिर्फ मोदी भी कह सकती हैं.’’

‘‘मैं अभी आती हूं,’’ कह कर वह अंदर गई. पलभर में वह ट्रौली धकेलती हुई आई. उस पर केक सजा हुआ था. देख कर अजय को ताज्जुब हुआ.

उस ने खुलासा किया, ‘‘आज मेरा जन्मदिन है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘मेहमान कहां हैं?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप ही मेहमान हैं मिस्टर अजय मोदी.’’

‘‘ओह,’’ अजय ने इतना ही कहा.

मोमबत्ती बुझा कर उस ने केक काटा. पहला टुकड़ा अजय को खिलाया. अजय ने भी उसे और उस की मम्मी को केक खिलाया. फिर बुके व मिठाई के साथ बधाई दी और कहा, ‘‘मैं बस यही ले कर आया हूं. पहले पता होता, तो तैयारी के साथ आता.’’

उस ने इशारे से मना किया और बोली, ‘‘आज प्रोफैशनल नहीं पर्सनल मूमैंट को जीना है.’’

अजय चुप हो गया. रात के 8 बजे वह लौटा, तो वे दोनों अजनबी से एक गहरे दोस्त बन चुके थे.

2 महीने बाद अजय का प्रमोशन हो गया, तो सोचा कि उस के साथ ही सैलिबे्रट करे. फोन किया. उस ने बधाई दी. उस की आवाज में कंपन और उदासी थी.

अजय ने कहा, ‘‘आप आज शाम को तैयार रहना.’’

शाम में वह तैयार हो कर शिवपुरी पहुंचा. वह सजसंवर कर तैयार थी. दोनों मोटरसाइकिल पर बैठ कर चल पड़े.

अजय ने रास्ते में बताया कि वे दोनों पूर्णिया जा रहे हैं. वह कुछ नहीं बोली. होटल हर्ष में सीट बुक थी. खानेपीने का सामान उस की पसंद से और्डर किया. पनीर के पकौड़े, अदरक की चटनी कौफी…

अजय ने कहा, ‘‘मिस मुंजाल, आज हम लोग स्पैशल मूमैंट्स को जीएंगे.’’

वह गजब की मुसकान के साथ बोली, ‘‘जैसा आप कहें सर.’’

अजय ने प्यार से पूछा, ‘‘मिस मुंजाल, मुझे ‘सर’ कहना जरूरी है?’’

वह भी पलट कर बोली, ‘‘मुझे भी ‘मिस मुंजाल’ कहना जरूरी है?’’

अजय ने कहा, ‘‘ठीक है. आज से केवल अजय कहना या फिर मोदी.’’

वह बोली, ‘‘मुझे भी केवल सुमन या लता कहना.’’

फिर वह अपने बारे में बताने लगी कि वह हरियाणा के हिसार की है. नौकरी के सिलसिले में बिहार आ गई, पर अब मन नहीं लग रहा है. एलएलएम कर रही है. बहुत जल्द ही वह यहां से चली जाएगी. उसे वकील बनने की इच्छा है.

फिर अजय ने बताया, ‘‘मैं भी बहुत जल्द दिल्ली जौइन कर लूंगा. हैड औफिस बुलाया जा रहा है.’’

फिर उस ने मुझे एक छोटा सा गिफ्ट दिया. बहुत खूबसूरत ‘ब्रेसलेट’ था, जिस पर अंगरेजी का ‘ए’ व ‘एस’ खुदा था.

मैं ने भी एक सोने की पतली चेन दी. उस में एक लौकेट लगा था और एक तरफ ‘ए’ व दूसरी तरफ ‘एस’ खुदा था.

वह बहुत खुश हुई. ब्रेसलेट पहना कर उस ने अजय का हाथ चूम लिया और सहलाने लगी. वह भी थोड़ा जोश में आ गया. उस ने भी उसे चेन पहनाई और गरदन चूम ली. वह सिसकने लगी.

अजय ने वजह पूछी, तो बोली, ‘‘तुम पहले इनसान हो, जिस ने मेरी बिना किसी लालच के मदद की थी.’’

अजय ने कहा, ‘‘एलएलएम करने तक तुम यहीं रहो. कुछ गलत नहीं होगा. मैं हूं न.’’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया. रात होतेहोते अजय ने उसे उस के डेरे पर छोड़ दिया. विदा लेने से पहले वे दोनों गले मिले.

अजय दूसरे ही दिन गुपचुप तरीके से बीडीओ साहब से मिला. अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उस की ड्यूटी बदलवा दी.

इस बात को 10 साल गुजर गए. अजय अपने असिस्टैंट के साथ एक मशहूर मर्डर मिस्ट्री की सुनवाई कवर करने पटियाला हाउस कोर्ट गया था.  कोर्ट से बाहर निकल कर वह मुड़ा ही था कि कानों में आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मिस्टर मोदी, प्लीज रुकिए.’’

अजय ने देखा कि एक लड़की वकील की ड्रैस में हांफती हुई चली आ रही थी. पास आ कर उस ने पूछा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी प्लीज, आर यू मिस्टर अजय मोदी?’’

अजय ने कहा, ‘‘यस. ऐंड यू?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं रीना महिंद्रा. आप प्लीज मेरे साथ चलिए. मेरी सीनियर आप को बुला रही हैं.’’

अजय हैरान सा उस के साथ चल पड़ा. पार्किंग में एक लंबी नीली कार खड़ी थी. उस के अंदर एक औरत वकील की ड्रैस में बैठी थी.

अजय के वहां पहुंचते ही वह बाहर निकली और उस के गले लग गई.

अजय यह देख कर अचकचा गया. वह चहकते हुए बोली, ‘‘कहां खो गए मिस्टर मोदी? पहचाना नहीं क्या मुझे? मैं सुमनलता मुंजाल.’’

अजय बोला, ‘‘कैसी हैं आप?’’

वह बोली, ‘‘गाड़ी में बैठो. सब बताती हूं.’’

अजय ने अपने असिस्टैंट को जाने के लिए कहा और गाड़ी में बैठ गया. उस ने भी रीना को मैट्रो से जाने के लिए कहा और खुद ही गाड़ी ड्राइव करने लगी.

वह लक्ष्मी नगर के एक फ्लैट में ले आई. अजय को एक गिलास पानी ला कर दिया और खुद फ्रैश होने चली गई.

कुछ देर बाद टेबल पर नाश्ता था, जिसे उस ने खुद बनाया था. फिर वह अपनी जिंदगी की कहानी बताने लगी.

‘‘आप ने तो चुपचाप मेरी ड्यूटी बदलवा दी. कुछ दिन बाद ही मुझे पता चल गया. सभी ताने मारने लगे. मुझ से सभी आप का रिलेशन पूछने लगे, तो मैं ने ‘मंगेतर’ बता दिया.

‘‘काफी समय बीत जाने पर भी जब आप नहीं मिले और न ही फोन लगा, तो मैं परेशान हो गई. पता चला कि आप दिल्ली में हो और अखबार भी बंद हो गया है.

‘‘मैं समझ गई कि आप जद्दोजेहद कर रहे होंगे. इधर मेरी मां को लकवा मार गया. मेरी एलएलएम भी पूरी हो गई थी. उस नौकरी से मैं तंग आ ही चुकी थी.

‘‘मां के इलाज के बहाने मैं दिल्ली चली आई. एक महीने बाद मेरी मां चल बसीं. फिर मेरा संघर्ष भी शुरू हो गया. दिल्ली हाईकोर्ट जौइन कर लिया और धीरेधीरे मैं क्रिमिनल वकील के रूप में मशहूर हो गई.’’

अजय मुसकरा कर रह गया.

उस ने पूछा, ‘‘आप बताओ, कैसी कट रही है?’’

अजय ने बताया, ‘‘दिल्ली आने के कुछ महीनों बाद ही अखबार बंद हो गया. मैं ने हर छोटाबड़ा काम किया. ठेला तक चलाया. अखबार बेचा. फिर एक दिन एक रिपोर्टिंग कर एक अखबार को भेजी और उसी में मुझे काम मिल गया. आज तक उसी में हूं.’’

‘‘बीवीबच्चे कैसे हैं?’’

अजय ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम मुंजाल, जब अपना पेट ही नहीं भर रहा हो, तो फिर वह सब कैसे?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘तब तो ठीक है.’’

अजय बोला, ‘‘सच कहूं, तो तुम्हारी जैसी कोई मिली ही नहीं और न ही मिलेगी. जहां इतनी कट गई है, तो आगे भी कट ही जाएगी.’’

वह बोली, ‘‘अच्छी बात है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘तुम्हारे बालबच्चे कहां और कैसे हैं?’’

वह फीकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘एक भिखारी दूसरे भिखारी से पूछ रहा है, तुम ने कितना पैसा जमा किया है.’’

फिर वह चेन दिखाते हुए बोली, ‘‘याद है न… ये चेन आप ने ही पहनाई थी. मैं ने तब से ही इसे अपना ‘मंगलसूत्र’ मान लिया है. समझे…’’

‘‘और फिर मैं हरियाणवी हूं. पति के शहीद होने पर भी दूसरी शादी नहीं करते, यहां तो मेरा ‘खसम’ मोरचे पर गया था, शहीद थोड़े ही हुआ था.’’

अजय उस की प्यार वाली बात सुन कर फफकफफक कर रोने लगा. वह उस के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘कितना झंडू ‘खसम’ हो आप मेरे? मर्द हो कर रोते हो?’’

अजय ‘खसम’ शब्द पर मुसकराते हुए बोला, ‘‘आई एम सौरी माई लव. यू आर ग्रेट ऐंड आई लव यू वैरी मच.’’

वह भी मुसकराते हुए बोली, ‘‘अच्छा, इसलिए पलट कर मेरी खबर तक नहीं ली.’’

इस के बाद अजय को अपनी बांहों में कसते हुए वह बोली, ‘‘मैं इस ‘अनोखे मंगलसूत्र’ को दिखादिखा कर थक चुकी हूं, मोदी डियर. अब सब के सामने मुझे स्वीकार भी कर लो प्लीज.’’

वे दोनों अगले हफ्ते ही एक भव्य समारोह में एकदूसरे के हो गए. कहा भी गया है कि जिंदगी एक बांसुरी की तरह होती है. अंदर से खोखली, बाहर से छेदों से भरी और कड़ी भी, फिर भी बजाने वाले इसे बजा कर ‘मीठी धुन’ निकाल ही लेते हैं.

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