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सुसाइड : अवसाद और बीमारी है आत्महत्या का बड़ा कारण

सुसाइड-आखिर क्यों जीना नहीं चाहती नई पीढ़ी

सुसाइड- फांसी का फंदा बन जाते हैं सामाजिक बंधन

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सियासी नीतियां हैं जिम्मेदार

भारत में बढ़ती आत्महत्या-दर के लिए सियासी नीतियां खासतौर पर जिम्मेदार हैं. ‘बांटों और राज करो’ की घृणित नीति को हर सियासी पार्टी चलाती है, जिसके चलते भारतीय मानुष असमानता के भयानक चक्रव्यूह में फंसा हुआ है. यही असमानता आत्महत्या के ग्राफ को भी लगातार बढ़ा रही है. गरीब को गरीब रखने की नीति, अमीर को और अमीर बनाने की नीति, धर्म के नाम पर लोगों को बांटे रखने की नीति, इन्सान को इन्सान न समझ कर महज वोटबैंक बनाने की नीति, अमीर और गरीब के लिए अलग-अलग शिक्षा नीति, अलग-अलग स्वास्थ्य नीति जैसी अनेकानेक सियासी नीतियां हम भारतीयों के लिए ब्लैकहोल साबित हो रही हैं .

किसान कर्ज की मार से मर रहा है. हिन्दी मीडियम से निकला विद्यार्थी किसी भी प्रतियोगिता में खुद को सफल नहीं पाता है. उच्च डिग्रियां लेकर भी युवाओं को नौकरियां नहीं मिलतीं. खुद का रोजगार शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी और अनुभव नहीं है. आजादी के सात दशकों में भी इस देश की किसी भी सरकार ने अमीर-गरीब के बीच की खाई को भरने, सबको समान शिक्षा और रोजगार की गारंटी देने की तरफ कदम नहीं उठाया. किसानों-मजदूरों के लिए कोई अच्छी योजना किसी सरकार में नहीं बनी है. न उनकी फसलों का मूल्य उन्हें मिलता है, न बर्बाद हुई फसल पर मुआवजा मिलता है और न ही कर्ज की मार से राहत मिलती है. चुनाव नजदीक आते हैं तो राजनीतिक पार्टियां उनके सामने योजनाओं के झुनझुने बजाने लगती हैं, और चुनाव खत्म होते ही झुनझुने कूड़े में फेंक दिये जाते हैं. तब गरीब के सामने मौत को गले लगाने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचता.

अवसाद और बीमारी है आत्महत्या का बड़ा कारण

आत्महत्या की बड़ी वजह है निराशा और अवसाद. यह निराशा और अवसाद चाहे धार्मिक बन्धनों से उपजा हो, सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाओं से उपजा हो अथवा राष्ट्रीय नीतियों में खामियों की वजह से पैदा हुआ हो, एक बात तो साफ है कि अवसादग्रस्त आदमी ही आत्महत्या की ओर प्रेरित होता है. दरअसल अवसादग्रस्त व्यक्ति एक तरह का मानसिक रोगी होता है, जिसका इलाज जरूरी है, लेकिन तमाम तरह के दबावों के चलते इच्छाओं का पीछा करने वाले लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि कब वे अवसादग्रस्त हो गये और न ही उनके परिवार को इसकी भनक लगती है.

अक्टूबर, 2016 का वाकया है. दिल्ली में प्रेम कुमार सुबह की सैर पर निकले और अलग-अलग मेट्रो स्टेशनों पर गये . एक जगह सुरक्षाकर्मियों ने उनके व्यवहार को भांपा और उन्हें अपनी सुरक्षा में ले लिया . अपराध के नजरिए से जब कुछ संदिग्ध नहीं लगा, तो उन्हें छोड़ भी दिया गया. एक घंटे बाद प्रेम कुमार ने एक मेट्रो ट्रेन के सामने कूदकर अपनी जान दे दी . पुलिस पूछताछ में परिवारीजनों से पता चला कि वे काफी समय से चुप-चुप रह रहे थे. दरअसल प्रेम कुमार अवसादग्रस्त थे, मगर पैसे के अभाव में उनका इलाज नहीं हो पा रहा था.

देशवासियों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार पर है. सुविधा सम्पन्न सरकारी अस्पताल, क्वालिफाइड डौक्टर, गरीबों को मुफ्त इलाज की व्यवस्था करना सरकार का काम है, लेकिन भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय और तमाम सरकारी अस्पताल भ्रष्टाचार के अड्डे बन चुके हैं. गरीब आदमी के लिए वहां न डौक्टर, न दवाएं, न इंजेक्शन, न ठीक इलाज. ऐसे में दवा-इलाज के अभाव में गरीब आदमी बीमारी के दर्द को ढोने से मौत को गले लगाना ज्यादा बेहतर समझता है. महाराष्ट्र के सतारा में सुलक्षणा के पेट में ट्यूमर के कारण बहुत दर्द रहता था . इलाज में बहुत पैसा खर्च हो रहा था. एक दिन उसने अपने पोते से चूहा मारने की दवा मंगवाई और दूसरे दिन उसे खाकर खुदकुशी कर ली. उत्तर प्रदेश में सीताराम को अक्सर सिर में असहनीय दर्द होता था. वह दर्द कितना असहनीय रहा होगा कि सीताराम ने फांसी लगाकर आत्महत्या करना ज्यादा बेहतर समझा.

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं न होने के कारण लोग दर्द सहने से बेहतर समझते हैं मौत को गले लगा लेना. बीमारी की वजह से आत्महत्या का दूसरा बड़ा कारण है गरीबी. गम्भीर बीमारी होने पर गरीब आदमी के पास इतने पैसे ही नहीं होते कि वह अस्पताल में जाकर अपना इलाज करवा सके, लिहाजा वह आत्महत्या का रास्ता इख्तियार कर लेता है. तीसरा कारण है महिलाओं के प्रति उपेक्षा का भाव. ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली आत्महत्याओं में ज्यादा संख्या महिलाओं की है. भारतीय समाज में बहुओं के प्रति ससुरालपक्ष का व्यवहार अधिकतर अच्छा नहीं होता है, फिर वह चाहे ग्रामीण परिवेश से हो अथवा शहरी बहू. बहुओं के इलाज पर पैसा खर्च करना कोई नहीं चाहता. ऐसे में बीमारी की अवस्था में वह गहरे शारीरिक और मानसिक दर्द  से जूझती रहती हैं और जब यह असहनीय हो जाता है तो वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती हैं. कई बार तो महिला सम्बन्धी रोगों के लिए महिलाएं घरेलू नुस्खे अपनाती रहती हैं और जब बीमारी जानलेवा हो जाती है और दर्द असहनीय हो जाता है तो वह मौत को गले लगाकर इससे छुटकारा पा लेती हैं. वहीं पारिवारिक तानेबाने के कमजोर होने के कारण लोगों में निकटता का अभाव होता जा रहा है. मां-बाप अपने बच्चों से, तो बच्चे अपने मां-बाप से लगातार दूर हो रहे हैं . ऐसी हालत में वह एक-दूसरे की परेशानियों-बीमारियों आदि को समझ ही नहीं पाते हैं. ज्यादातर मानसिक रोग इसी कारण उपजते हैं और काउंसलिंग के अभाव में बढ़ते चले जाते हैं. व्यक्ति अवसाद में था या मानसिक रोगी था, यह तब पता चलता है जब वह आत्महत्या जैसा भयावह कदम उठा लेता है.
राष्ट्रीय क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में वर्ष 2001 से 2015 के दौरान 3.85 लाख आत्महत्याओं का कारण बीमारियां थीं. इनमें से ज्यादातर की जान बचायी जा सकती थी अगर सरकारी अस्पताल में समय से उन्हें स्वास्थ्य सेवाएं मिल जातीं.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के वर्षवार प्रतिवेदनों का अध्ययन करने से पता चलता है कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच भारत में कुल 18.41 लाख लोगों ने आत्महत्या की. इनमें से 3.85 लाख लोगों (लगभग 21 प्रतिशत) ने विभिन्न बीमारियों के कारण आत्महत्या की. इसका मतलब है कि भारत में हर एक घंटे 4 लोग बीमारी से तंग आकार आत्महत्या कर लेते हैं . हर पांच में से एक आत्महत्या बीमारी के कारण होती है. इसलिए इस मसले को स्वास्थ्य मंत्रालय को ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ के नजरिए से देखना चाहिए.
गौरतलब है कि जो आंकड़ा एनसीआरबी ने दिया है उसमें से 1.18 लाख लोगों ने मानसिक रोगों के प्रभाव में और 2.37 लाख लोगों ने लम्बी बीमारियों से परेशान होकर आत्महत्या की है. इनमें अवसाद, बायपोलर डिसआर्डर, डिमेंशिया और स्कीजोफ्रीनियां के रोगियों की संख्या सबसे ज्यादा है. ये ऐसे रोग हैं, जिनमें व्यक्ति अपने आप को और अपने व्यवहार को ही नियंत्रित नहीं कर पाता है.
भारत में इन 15 सालों में बीमारी के कारण सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र (63,013), आंध्रप्रदेश (48,376), तमिलनाडु (50,178), कर्नाटक (48,053) और केरल (37,465) में हुईं . इस कारण देश में हुई कुल आत्महत्याओं में से 2,47,085 यानि 64 फीसदी मामले इन पांच राज्यों में दर्ज हुए . हमें इस पहलू पर भी नजर डालनी होगी कि देश में पक्षाघात (9,036), कैंसर (11,099) और एचआईवी (9,415) के कारण भी बहुत आत्महत्याएं हुई हैं. इसमें से ज्यादातर मरीज गरीब थे, जिन्हें वक्त पर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलीं.

पंडों की सरकार, जनता है बेहाल

अपने गब्बर सिंह टैक्स को सही साबित करने के लिए सरकार ने हाल ही में एक सर्वे करा कर कहा है कि जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) के कारण एक औसत घर को 8,400 सालाना की बचत हुई है. सरकार का कहना है कि पहले फैक्ट्री के गेट पर ऐक्साइज टैक्स लगता था, फिर रास्ते में औक्ट्रौय लगता था और आखिर में कई बार वैट यानी सेल्स टैक्स लगता था. जीएसटी में सब टैक्स हट गए हैं और सिर्फ एक टैक्स रह गया है.

सरकार यह नहीं बताती कि जीएसटी आखिरी दाम पर लगता है जिस में बिचौलियों का मुनाफा शामिल है, जिस का मतलब है कि मुनाफे पर भी टैक्स अब उपभोक्ता दे रहा है. यही नहीं, सरकार यह भी नहीं बता रही कि पहले टैक्स देना आसान था और उस के लिए कंप्यूटर ऐक्सपर्ट को दफ्तरों या दुकानों में बैठना जरूरी नहीं था.

सरकार की आंकड़ेबाजी तो पूर्व सीएजी विनोद राय की तरह की है, जिन्होंने 2014 से पहले कोल, टैलीकौम व कौमनवैल्थ स्कैमों में लाखों करोड़ों का घपला दिखा दिया था. अब भारतीय जनता पार्टी के सांसद बने विनोद राय ने आज तक नहीं बताया कि नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली उस महान राशि में से कितना पिछले 5 साल में वसूल कर पाए हैं? आंकड़ेबाजी और बकबक करने में माहिर सरकार को यह चिंता नहीं कि आम घरवालियों को जीएसटी की वजह से किस तरह हर दुकान पर कंप्यूटरों का सामना करना पड़ रहा है और टैक्सों के साथसाथ कंप्यूटरों का खर्च भी सामान के खर्च में जोड़ा जा रहा है.

वैसे भी भारत की अर्थव्यवस्था कच्चे पर टिकी है ताकि फैक्ट्री से पूरा सामान टैक्स दे कर निकला भी है तो उस के बाद होने वाले खर्च व बिचौलियों को मिलने वाले मुनाफे पर सेल्स टैक्स बन जाता था. कुछ जमा हुआ, कुछ नहीं पर जनता के हाथ में सस्ता माल आता था और राज्य सरकारें नुकसान में न थीं.

अब जीएसटी से राज्य सरकारों को भी नुकसान हो रहा है और केंद्र सरकार को भी. पंडों की सरकार ने टैक्स यज्ञ में आहूतियां डालने की लंबी सूचियां भक्तों को दे दीं कि इस टैक्स यज्ञ से केंद्र व लक्ष्मी प्रसन्न हो कर सब पर वर्षा कर देंगे पर आसमान से केवल काला धुआं टपक  रहा है. टैक्स यज्ञ का धुआं सारे देश में भर गया है और जनता त्राहित्राहि कर रही है.

नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली उस दशरथ की तरह हैं जिन्होंने एक बूढ़े को केवल आवाज सुन कर तीर से मार डाला. उन की आंखों पर धर्म और दंभ का चश्मा चढ़ा हुआ था.

जीएसटी किसी भी तरह से उपयोगी साबित नहीं हुआ. हर व्यापारी और उस के ग्राहक को चोर समझना हर मनुष्य को पापी समझने के बराबर है. मोदी व जेटली शुभ होगा, शुभ हो रहा है का मंत्र पढ़ रहे हैं पर असल में जनता की मेहनत तो यज्ञ में स्वाहा हो रही है. यह कहना कि घरवालियों को लाभ हो रहा है वैसा ही है जैसे यज्ञ कराने वाले कहने लगते हैं कि अच्छे दिन आ गए, बस देखने वाली आंखें चाहिए.

हैलमैट

सबल सिंह ने घर से मोटरसाइकिल बाहर निकाली और अपनी पत्नी को आवाज दी, ‘‘जल्दी चलो.’’उन्हें पड़ोसी को देखने अस्पताल जाना था. वे पड़ोसी जिन से उन के संबंधबहुत अच्छे नहीं थे. कई बार बच्चों को ले कर, कूड़ाकरकट फेंकने को ले कर उन का आपस में झगड़ा हो चुका था.

सबल सिंह अपने नियम से चलते थे. कचरा अपने घर के सामने फेंकते थे. पड़ोसी रामफल का कहना था, ‘या तो कचरा जलाइए या कचरा गाड़ी आती है नगरपालिका की, उस में डालिए.’

‘मैं कचरा गाड़ी का रास्ता देखता रहूं. कभी भी आ जाते हैं. फिर एक मिनट के लिए भी नहीं रुकते,’ सबल सिंह ने कहा था.

‘तो कचरा पेटी में डालिए,’ रामफल ने कहा था.

‘कचरा पेटी घर से एक किलोमीटर दूर है. क्या वहां तक कचरा ले कर जाऊं? यह क्या बात हुई…’

‘तो जला दीजिए.’

‘आप को क्या तकलीफ है? आप मुझ से जलते हैं.’

‘मैं क्यों जलूंगा?’

‘पिछली बार बच्चों के झगड़ने पर

मैं ने आप के बच्चे को डांट दिया था इसलिए…’

‘बच्चे हैं… साथ खेलेंगे तो लड़ेंगे भी और फिर साथ खेलेंगे. आप ने मेरे बच्चे को डांटा, मैं ने तो कुछ नहीं कहा. लेकिन आप के बच्चे को मैं ने डांटा तो आप लड़ने आ गए थे.’

‘मेरे बच्चे को डांटने का हक किसी को नहीं है. उस के मातापिता हैं अभी.’

‘फिर आप ने मेरे बच्चे को क्यों डांटा? उस के मातापिता भी जिंदा हैं.’

‘उसी बात का तो आप बदला लेते रहते हैं. कभी कचरे की आड़ में तो कभी नाली सफाई के नाम पर.’

‘मैं ऐसा आदमी नहीं हूं. सही को सही, गलत को गलत कहता हूं. यह मेरा स्वभाव है.’

‘आप अपना स्वभाव बदलिए. सहीगलत कहने वाले आप कौन होते हैं?’

फिर रामफल कुछ कहते, सबल सिंह उस का जवाब देते. बात से बात निकलती और बहस बढ़ती जाती. बेमतलब का तनाव बढ़ता. मन में खटास आती. रामफल अस्पताल में थे. महल्ले के सभी लोग देखने जा चुके थे.

सबल सिंह की पत्नी ने कहा, ‘‘दूरदूर के लोग मिल कर आ गए हैं. हमारे तो पड़ोसी हैं. हम कोई दुश्मन तो हैं नहीं. पड़ोसियों में थोड़ीबहुत बहस तो होती रहती है. इनसानियत और पड़ोसी धर्म के नाते हमें उन्हें देखने चलना चाहिए.’’

सबल सिंह को बात ठीक लगी. उन्होंने कहा, ‘‘आज शाम को ही चलते हैं.’’ और सबल सिंह ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की. पत्नी बाहर आईं तो उन्होंने कहा, ‘‘आप हैलमैट तो लगा लीजिए.’’

‘‘अभी पुलिस की चैकिंग नहीं चल रही है. तुम बैठो.’’

‘‘हैलमैट पुलिस से बचने के लिए नहीं, बल्कि हमारी हिफाजत के लिए जरूरी है.’’

‘‘पढ़ीलिखी बीवियों का यही तो नुकसान है. उपदेश बहुत देती हैं. तुम बैठो न.’’

रमा मोटरसाइकिल के पीछे बैठ गईं. सबल सिंह ने मोटरसाइकिल की स्पीड बढ़ा दी तो रमा ने कहा, ‘‘धीरे चलिए. मोटरसाइकिल है, हवाईजहाज की तरह मत चलाइए.’’

‘‘मैं इसी तरह चलाता हूं. आप शांति से बैठी रहिए.’’

उन्हें दाएं मुड़ना था. गाड़ी थोड़ी धीमी की और दाईं तरफ घुमा दी, तभी पीछे से कोई जोर से चीखा. चीख के साथ मोटरसाइकिल के ब्रेक की आवाज आई. पीछे वाले की मोटरसाइकिल सबल सिंह की मोटरसाइकिल से टकरातेटकराते बची थी.

वह आदमी चीखा, ‘‘मुड़ते समय इंडीकेटर नहीं दे सकते?’’

सबल सिंह भी चीखे, ‘‘शहर में इतनी तेज गाड़ी क्यों चलाते हो कि कंट्रोल न हो सके?’’

‘‘गलती तुम्हारी थी, तुम्हें इंडीकेटर देना चाहिए,’’ वह आदमी बोला.

‘‘गलती तुम्हारी है, तुम्हें धीरे चलना चाहिए.’’

पीछे वाली मोटरसाइकिल पर 3 लोग बैठे हुए थे.

सबल सिंह ने कहा, ‘‘एक मोटरसाइकिल पर 3 सवारी करना गैरकानूनी है.’’

वह आदमी थोड़ा डर गया. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. वह बिना कुछ बोले आगे निकल गया.

पत्नी रमा ने कहा, ‘‘दूसरों की गलती तो आप तुरंत पकड़ लेते हैं और अपनी गलती का क्या? आप भी तो स्पीड में चल रहे थे.’’

सबल सिंह ने कहा, ‘‘ऐसा करना पड़ता है. सामने वाले की गलती को निकालना जरूरी है, नहीं तो वह चढ़ बैठता हमारे ऊपर.’’

सबल सिंह ने मोटरसाइकिल की स्पीड को फिर बढ़ा दिया. सामने चौक पर उन्होंने देखा कि पुलिस की गाड़ी चैकिंग कर रही थी.

उन्होंने मोटरसाइकिल धीमी की और वापस मोड़ दी.

‘‘क्या हुआ?’’ रमा ने पूछा.

‘‘सामने चैकिंग चल रही है. दूसरे रास्ते से चलना होगा.’’

‘‘आप के पास गाड़ी के कागजात तो हैं.’’

‘‘हां हैं, लेकिन तुम इन पुलिस वालों को नहीं जानतीं. न जाने किस बात का चालान काट दें. इन का तो काम ही है. गाड़ी अपनी, लाइसैंस भी है, फिर भी हमें ही चोरों की तरह छिप कर, रास्ता बदल कर निकलना पड़ता है. ऐसा है कानून हमारे देश का,’’ कहते हुए सबल सिंह ने बाइक मोड़ी और दूसरे रास्ते की ओर घुमा दी.

‘‘अगर इस रास्ते के किसी चौक पर पुलिस वाले चैकिंग करते मिल गए तब क्या करोगे? कोई तीसरा रास्ता भी?है?’’ पत्नी रमा ने पूछा.

सबल सिंह चुप रहे. उन्हें आगे गाड़ी रोकनी पड़ी. सुनसान रास्ता था. सामने कुछ लड़के खड़े थे, पूरा रास्ता रोके हुए. ‘‘पुलिस से बचोगे तो गुंडों में फंसोगे. जो कुछ पास में है सब निकाल कर रख दो, नहीं तो लाश मिलेगी दोनों की,’’ कहते हुए एक मजबूत कदकाठी के मवालीटाइप आदमी ने चाकू निकाल कर सबल सिंह पर तान दिया. बाकी मवालियों ने सबल सिंह की घड़ी, मोबाइल फोन, पर्स और चाकूधारी ने रमा का मंगलसूत्र और हाथ में पहनी सोने की अंगूठी उतार ली.

‘‘चलो, भागो यहां से. पुलिस में शिकायत की तो खैर नहीं तुम्हारी,’’ चाकूधारी मवाली ने कहा.

रमा गुस्से में चीख पड़ीं, ‘‘चालान से बचने के चक्कर में लाख रुपए का सामान चला गया.’’

‘‘शुक्र है जान बच गई और मोटरसाइकिल भी. चलो, निकलते हैं. अस्पताल से वापसी पर थाने में रिपोर्ट दर्ज करेंगे,’’ सबल सिंह ने कहा.

किसी तरह वे अस्पताल पहुंचे. सबल सिंह अब कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे. सो, उन्होंने मोटरसाइकिल अस्पताल के स्टैंड पर खड़ी कर दी.

अस्पताल में रामफल से मिले. हालचाल पूछने पर रामफल ने बताया कि उन्हें फर्स्ट स्टेज का कैंसर है.

‘‘फालतू के शौक से खर्चा भी हो और बीमारी भी. अब तो तंबाकू, सिगरेट बंद कर दो,’’ सबल सिंह ने यहां भी अपना ज्ञान बघारा. लेकिन पीडि़त रामफल ने इस का बुरा नहीं माना और कहा, ‘‘मैं तो शुरुआती स्टेज पर हूं.

2-4 लाख रुपए का खर्चा कर के बच भी जाऊंगा शायद. मैं ने तो तोबा कर ली. तुम भी बंद कर दो शराब पीना.’’

‘‘मैं कौन सी रोज पीता हूं?’’ सबल सिंह ने कहा.

‘‘जहर तो थोड़ा भी बहुत होता है,’’ रामफल ने कहा.

रामफल और सबल सिंह यहां भी बहस करने लगे. पत्नी रमा ने इशारा किया, तब शांत हुए. इस के बाद

वे पुलिस चौकी गए. रिपोर्ट लिखाई. हवलदार ने सब से पहला सवाल पूछा, ‘‘पत्नी के साथ उस सुनसान रास्ते से गए ही क्यों थे?’’

झूठासच्चा जवाब दे कर वे वापस लौटे. इस तरह दिनदहाड़े लुटने से उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था. इस गुस्से में मोटरसाइकिल की रफ्तार बढ़ती गई. पत्नी रमा उन्हें गाड़ी धीरे चलाने के लिए कहती रहीं, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया. वे बस यही सोच रहे थे कि अब पत्नी के लिए मंगलसूत्र, अंगूठी फिर से बनवानी पड़ेगी. अगर हैलमैट लगा लेते तो क्या चला जाता? थोड़े से बचने के चक्कर में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा.

हैलमैट रखा तो था घर पर. कम से कम परिवार के साथ चलते समय तो हिफाजत का ध्यान रखना चाहिए. पत्नी क्या सोच रही होगी. घर में लोग अलग डांटफटकार करेंगे. बच्चे भी डांटेंगे और मातापिता भी.

तभी सामने से एक मोटरसाइकिल पर 3 लड़के तेज रफ्तार में आ रहे थे. सबल सिंह ने तेजी से हौर्न बजाया. सामने वाला संभल तो गया लेकिन फिर भी बहुत संभालने पर भी हलके से दोनों मोटरसाइकिल टकराईं. थोड़ा सा बैलैंस बिगड़ा लेकिन लड़के ने मोटरसाइकिल संभाल ली और वे भाग निकले.

लेकिन सबल सिंह नहीं संभल पाए. उन की मोटरसाइकिल गिरी. काफी दूर तक घिसटी. पत्नी की चीख सुनी उन्होंने. वे गाड़ी के नीचे दबे पड़े थे. पत्नी उन से थोड़ी दूरी पर बेहोशी की हालत में पड़ी थी.

आतेजाते लोगों में से कुछ उन्हें शराबी, तेज स्पीड से चलने की कह कर निकल रहे थे. कुछ लोगों ने अपना मोबाइल फोन निकाल कर वीडियो बनानी शुरू कर दी. धीरेधीरे भीड़ इकट्ठी हो गई.

सबल सिंह को बहुत दर्द हो रहा था. वे सोच रहे थे, ये कैसे लोग हैं जो घायल लोगों की मदद करने के बजाय मोबाइल फोन से फोटो खींच रहे हैं. वीडियो बना रहे हैं. टक्कर मारने वाले तो भाग निकले. क्या मैं ने भी किसी घायल के साथ ऐसा बरताव किया था. हां, किया था.

वे मदद की गुहार लगा रहे थे. भीड़ इस बात पर टीकाटिप्पणी कर रही थी कि गलती किस की है. इन की या उन लड़कों की. समय खराब होता है तो कुछ भी हो सकता है. पुलिस को खबर की जाए या एंबुलैंस को. पता नहीं, औरत जिंदा भी है या मर गई. पुलिस के झंझट में कौन पड़े? इन्हें भी देख कर चलना चाहिए.

वीडियो अपलोड कर के ह्वाट्सऐप, फेसबुक पर भेज दिए गए थे. सबल सिंह को अपने से ज्यादा लोगों की भीड़ कमजोर नजर आ रही थी.

तभी भीड़ को चीरते हुए एक आदमी आया. उस ने भीड़ को डांटते हुए कहा, ‘‘शर्म नहीं आती आप लोगों को. घायलों की मदद करने की जगह तमाशा बना रखा है.’’

फिर उस आदमी ने अपने साथियों को पुकारा. सब ने मिल कर सबल सिंह को मोटरसाइकिल से निकाला. उन की बेहोश पत्नी को अपनी गाड़ी में लिटाया और अस्पताल चलने के लिए कहा.

सबल सिंह के हाथपैर में मामूली चोट लगी थी. पत्नी को होश आ चुका था. उन की कमर में चोट लगी थी.

डाक्टर ने कहा, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है. सब ठीक है. अच्छा है,

सिर में चोट नहीं लगी, वरना बचना मुश्किल था.’’

सबल सिंह सोच रहे थे कि काश, उन्होंने हैलमैट लगाया होता तो ये सारे झंझट ही नहीं होते.

नेता तो नेता, जनता महा बेवकूफ

2019 का आम चुनाव एक फूहड़ और घटिया कौमेडी शो के तौर पर याद किया जाएगा जिसमें तुक की कोई बात नहीं हो रही है. यह सारा चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच सिमट कर रह गया है, जो हर्ज की बात नहीं  है. लेकिन ये दोनों ही नेता नितांत अप्रभावी और अपरिपक्व साबित हो रहे हैं. भाजपा की तरफ से नितिन गडकरी और कांग्रेस की तरफ से गुलाम नबी आजाद जैसे कुछ गिने चुने नेता ही हैं जिन्हें सही मायनों में बुद्धिजीवी और परिपक्व कहा जा सकता है नहीं तो तमाम नेता अपनी फूहड़ता दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं.

पुरानी कहावत है कि यथा राजा तथा प्रजा जो अब यथा नेता तथा जनता में तब्दील हो रही है . चुनाव प्रचा में गौर से देखें तो मुद्दे की कोई बात नहीं हो रही है. कहीं अली-बजरंग बली रंग जमा रहे हैं तो कहीं डिग्रियों और शैक्षणिक योग्यताओं पर चुटकियां ली जा रहीं हैं. ऐसे कई बेहूदे विवाद और बातें 2019 के चुनाव की शान हैं जिनका देश के भविष्य से कोई वास्ता नहीं है. फिर भी लोग इसी छिछोरे प्रचार का न केवल लुत्फ उठा रहे हैं बल्कि सोशल मीडिया पर उसमें अपना योगदान भी दे रहे हैं. राहुल गांधी पप्पू तो नरेंद्र मोदी गप्पू के विशेषण से नवाजे जा चुके हैं .

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नरेंद्र मोदी इस चुनाव के सबसे बड़े बाहुबली हैं जिन्हें खुद को बुद्धिमान और रहस्यमय जताने का बड़ा शौक है. वे साल 2014 से ही राहुल गांधी को आदर्श पैमाना मानकर बात करते रहे हैं उनकी नजर में नेहरू गांधी परिवार जिसने सबसे ज्यादा राज किया सर्वाधिक चोर, भ्रष्ट और बेईमान है. यह देश को लूटने का ही काम करता रहा है. 2014 में तो लोगों ने मान लिया था तब हालांकि भाजपा के जीतने की वजहें कुछ और थीं लेकिन अब लोग सोचने लगे हैं कि कब तक एक ही बात तरह तरह से दोहराए जाएंगे. तुमने क्या किया यह भी बता दो तो मोदी जी की बोलती बंद होने लगती है क्योंकि उन्हें मालूम है कि इस सवाल ने ज़ोर पकड़ा तो अजय अग्रवाल जैसे तृतीय श्रेणी के नेताओं की यह भविष्यवाणी सच भी हो सकती है कि भाजपा इस बार 40 पर सिमट कर रह जाएगी.

नरेंद्र मोदी वक्त और माहौल की नब्ज समझते पुलवामा और बालाकोट एयर स्ट्राइक को चुनावी मुद्दा बनाने की असफल कोशिश करते राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीट रहे हैं यही उनकी पांच साल की एकलौती उपलब्धि है. लेकिन यह कारगर साबित होती नजर नहीं आती तो वे वापस राहुल गांधी की तरफ लौट आते हैं और नामदार कामदार करने और कहने लगते हैं. यह फार्मूला थोड़ा बहुत चल जाता है क्योंकि इसमें निंदा की झलक उनके भक्तों को मिलती है फिर वे तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाकर इसे तरह तरह से सोशल मीडिया पर प्रचारित प्रसारित करने का काम तरह तरह से करते हैं. अपने इन लगभग एक करोड़ भक्तों को चुनावी सत्यनारायन कथा से जोड़े रखने वे खुद को चौकीदार भी घोषित कर देते हैं. देखते ही देखते लाखों लोग चौकीदार बन जाते हैं. इसके लिए उन्हें रात में पहरा नहीं देना पड़ता और न ही नीली खाकी वर्दी पहनना पड़ती .

इधर लगभग 2 करोड़ अभक्त तंज कसने लगते हैं कि पहले चायबाला फिर फकीर और फिर जाने क्या क्या और अब चौकीदार……. आखिर आप चाहते क्या हैं. और जो जागरूक लोग इस कौमेडी में दिलचस्पी नहीं रखते वे विकास, फैक्टरियां, कारखाने, पुल सड़क और रोजगार बगैरह ढूंढते रह जाते हैं. ये 85 फीसदी तटस्थ वोटर ही सही अर्थों में अपना और देश का भविष्य तय करेंगे अंधभक्तों का तो काम ही चुनावी यज्ञ में आहुती डालना है. उनके लिए चुनाव एक कर्मकांड है जिसके यजमान नरेंद्र मोदी हैं.

असल माहौल ये अंधभक्त ही खराब कर रहे हैं जिन्होने मान लिया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश हिन्दू राष्ट्र बनने की तरफ बढ़ रहा है, विश्वगुरु बनने जा रहा है और जल्द ही मुसलमान और दलित एक बार फिर दबा दिये जाएंगे यानि वर्ण व्यवस्था चाहिए तो मोदी मोदी भजते रहो. भाजपा और नरेंद्र मोदी अगर डूबे तो उसकी बड़ी वजह यही भक्त होंगे जिनके बारे में अभिनेत्री नन्दिता दास ने एक सटीक ट्वीट यह किया है कि राजनीति में भक्ति या किसी व्यक्ति विशेष की भक्ति का रास्ता गिरावट और तानाशाही की तरफ ले जाता है.

नरेंद्र मोदी पहली बार बौखलाए हुये दिख रहे हैं उनके भाषणों में न अटल बिहारी बाजपेयी जैसी धार है और न ही लालकृष्ण आडवाणी जैसी गंभीर आक्रामकता हिन्दुत्व या संस्कृति को लेकर है, ये दोनों नेता भी इन्दिरा और राजीव गांधी पर हमले करते थे. लेकिन उनमें वजन तर्क और तथ्य होते थे और हास्य या व्यंग भी स्तर का होता था मसलन अटल जी का यह वक्तव्य आज भी लोग भूले नहीं है कि बेटा कार बना रहा है और मां बेकार बना रही है.

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जो प्रचार इस चुनाव में हो रहा है उसमें मथुरा में कोई धर्मेंद्र धमकी दे रहा है कि अगर वसंती को वोट नहीं दिया तो किसी की भी टंकी पर चढ़ जाऊंगा. साक्षी महाराज तो वोटों के लिए उस जनता को श्राप तक दे रहे हैं जिसे चुनावी समय में भगवान मान लिया जाता है. ऐसे कई उदाहरणों से यह चुनाव भरा पड़ा है जिसे देख लगता है कि चुनाव एक दिलचस्प ड्रामा बन कर रह गए हैं और जनता को सांसद नहीं बल्कि विदूषक चुनना है .

इन नेताओं ने खुद को बेवकूफ और जनता को महा बेवकूफ साबित कर दिया है जो आज मजा तो ले रही है पर लोकतन्त्र और चुनावों की अहमियत नहीं समझ पा रही, तो सच है कि भगवान अगर कहीं हो तो वही देश का मालिक है.

(Edited by- Saloni)

मुद्दों की बात, जातिधर्म का साथ

समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां का ‘खाकी रंग की अंडरवियर’ वाला बयान चर्चा में है. जया प्रदा को लेकर की गई यह टिप्पणी निदनीय है. असल में नेता ऐसे बयानों से चुनाव के असल मुद्दों को गायब कर देना चाहते है. मीडिया और जनता असल मुद्दों को भूल कर ऐसे बयानों पर ही चर्चा करने लगती है. यह नेताओं की चतुर चाल है जिससे चुनाव में असल मुद्दों को दरकिनार रखा जा सके. सोशल मीडिया के चलन से ऐसे मुद्दे ज्यादा तेजी से उठ जाते है पर असल मुद्दे दमतोड़ देते है. यही वजह है कि मुद्दों पर बात तो बहुत होती है पर वोट ऐसे मुद्दों पर पड़ जाते हैं जो मुद्दे होते ही नहीं है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर मलिहाबाद में चुनावी चर्चा गरम है. चैराहे पर चाय की दुकानों पर अपनी अपनी तरह से चुनाव का विश्लेषण चल रहा होता है. जब चुनावी मुद्दों की बात होती है तो आम के फलों में लगने वाले कीट और कीटनाशक दवाओं से लेकर फलमंडी, बागवानों की खराब हालत, खाद, बिजली, पुलिस, तहसील जैसे स्थानीय मुद्दों से लेकर बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी जैसे राष्ट्रीय मुद्दें बहस में उठते है. जैसे ही बात वोट देने की आती है वापस सारा गणित जाति और धर्म पर आकर रूक जाता है. जब चुनावी मुद्दों की बात होती है जनता बेहद संवेदनशील मुद्दों को भी सामने रख देती है. सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि देश की जनता में अब चुनावी मुद्दों को लेकर जागरूकता आई है. इसके बाद भी असल वोटिंग जाति और धर्म के मुद्दे पर ही होती है.

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प्रदेश भर में चुनावी चर्चा हर तरफ हो रही है. मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक मुद्दों से भरे पड़े हैं. जनता बेहद रोचक ढंग से अपने मुद्दों को बाहर लेकर चर्चा कर रही है इसके बाद भी वोट देते समय वह वापस सबकुछ भूल कर जाति और धर्म पर चली जा रही है. ‘गांव देश’ के शिवसरन सिंह गहरवार कहते हैं, ‘जनता को अपने मुद्दों का पता तो है. वह हर मुद्दे को समझती भी है. इसका बड़ा कारण मीडिया है. मीडिया में जिस तरह से मुद्दो की चर्चा हो रही है उससे जनता में जागरूकता आई है. इसके बाद भी सच्चाई यही है कि वोट डालते समय उन मुद्दों पर जाति और धर्म हावी हो जाता है’.

चुनाव सुधारों को लेकर काम कर रहे सोशल एक्टिविस्ट प्रताप चन्द्रा कहते हैं, ‘असल में नेताओं ने पूरी चुनावी व्यवस्था को इस तरह से तैयार कर लिया है जिसमें लोकतंत्र दिखता भले हो पर असल में होता नहीं है. यही वजह है कि जागरुकता के बाद भी जनता नेताओं के बनाये जाल में फंस कर वोट देने को मजबूर हो जाती है. चुनावी मुद्दे हवा में रहते हैं. जमीन पर जाति, धर्म, बाहुबल पर ही वोट पड़ रहे होते है. जब तक इस दिशा में सुधार नहीं होगा मुद्दों पर केवल बात होगी वोट नहीं. राजनीतिक दल तक अपने घोषणापत्र में कुछ भी लिखे पर अपने भाषणों में वह जाति धर्म पर ही बात करते है.’

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प्रताप चन्द्रा कहते हैं, ’इस चुनाव में नेताओं के एक दूसरे पर पर्सनल कमेंट मुद्दा बन गये हैं. ओछी बातें चर्चा में है असल मुद्दे गायब हैं. ओछी बातें खबरिया चैनलों, सोशल मीडिया और काफी हद तक समाचार पत्रों में जगह पाती है. ऐसे में यही बातें जनता के मन में बस जाती है. मुद्दों की बातें प्रभावी ढंग से चुनाव प्रचार में नहीं रखी जाती है. यही वजह है कि चुनावी मुद्दे चर्चा में होने के बाद भी इन पर वोट नहीं पड़ते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रवाद के बहाने धर्म को मुद्दा बनाया गया तो दूसरी तरफ जाति की बात होने लगी. नोटबंदी, जीएसटी, विकास, कालाधन, राजनीति में धन और बाहुबल चर्चा में रहने के बाद भी मुददा नहीं बन पा रहे.’

(EDITED BY : SHUBHAM SRIVASTAVA)

पापा ने बताई एक्टिंग की सबसे बड़ी कमी : वरुण धवन

इन दिनों वरुण धवन, करण जौहर की फिल्म ‘‘कलंक’ को लेकर चर्चा में हैं. जिसे वह बेहद मुश्किल फिल्म मानते हैं. इसमे उन्होंने जफर नामक लोहार का किरदार निभाया है. इस किरदार के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी. मगर अब तक उन्हे जो सफलता मिली है, उसकी वजह उनके पिता द्वारा बतायी गयी उनकी कमी है, जिसे उन्होंने दूर कर लिया है.

डेविड धवन ने वरूण को उनकी कमी उस वक्त बतायी थी,जब हर कोई वरूण के अभिनय की तारीफ कर रहा था. जी हां! वरूण धवन के करियर की पहली फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर’ सफल होने के बाद हर तरफ उनके अभिनय की तारीफ हो रही थी. मगर उस वक्त वरूण धवन के पिता डेविड धवन ने वरूण से उनके अभिनय की कमी की तरफ इशारा किया था और वरूण ने उसे गंभीरता से लेते हुए अपनी उस कमी को दूर किया था.

पहली फिल्म के बाद बताई थी कमी…

एक खास एक्सक्लूसिव मुलाकात के दौरान खुद वरूण धवन ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका को बताया -‘‘मेरे डैड महज बेहतरीन फिल्म निर्देशक ही नहीं, बल्कि वह मेरे आलोचक भी हैं. मेरे करियर की पहली फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर’’ देखने के बाद जब सभी मेरी तारीफ कर रहे थे, तब मेरे डैड ने मुझसे कहा था, -‘तेरी आवाज खास नहीं है. माना कि तू अभी उम्र में छोटा है. पर तुझे अपनी आवाज पर काम करना पड़ेगा. अपनी आवाज में थोड़ी सी स्थिरता लेकर आओ. कामेडी में भी स्थिरता होती है.’’

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आवाज सुधारने के लिए ली ट्रेनिंग…

वरूण धवन आगे कहते हैं-‘‘डैड की सलाह मानकर मैने अपनी आवाज को ठीक करने के लिए काफी क्लासेस की. फिल्म‘बदलापुर’ के वक्त मैंने युवा और चालीस साल के इंसान की आवाज निकालने की ट्रेनिंग हासिल की थी. इसका फायदा मुझे बाद में कई फिल्मों में मिला. यहां तक कि नई फिल्म ‘कलंक’ में भी मिला.’’

बता दें कि वरुण धवन के पिता और मशहूर डायरेक्टर डेविड धवन ने ‘आग का गोला’, ‘स्वर्ग’,  ‘आंखे’,  ‘अंदाज’, ‘कुली नंबर वन’,‘लोफर’, ‘साजन चले ससुराल’, ‘जोड़ी नंबर वन’ सहित 40 से अधिक सफल फिल्में दी हैं. वहीं वरूण धवन ने करण जोहर की फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर’ ’से अपने अभिनय करियर की शुरूआत की थी. उसके बाद से वह लगातार सफल फिल्में देते आ रहे हैं. वरुण ने ‘मै तेरा हीरो’,‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’, ‘अक्टूबर’, ‘जुड़वा’,‘सुई धागा’ जैसी कई पौपुलर फिल्मों में काम किया है.

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वेजिटेबल नमकीन पैन केक बनाने का सबसे आसान विधि

वेजिटेबल नमकीन बहुत टेस्टी रेसिपी है इसे आप जरूर ट्राई. यह सबको काफी पसंद आएगी.  ये ज्यादा औइल से नहीं बनती है साथ ही इसमें सब्जियां भी मिलाये जाते हैं तो सेहत के लिए काफी लाभदायक हैं. तो आज शाम के स्नेक्स में भी बना सकती हैं.

सामग्री

– आलू (1)

– गाजर ( 1)

– घिसी हुई पत्ता गोभी (1 कप)

– प्याज (1)

– हरी मिर्च ( 2)

– नींबू (1/2)

– हरा धनिया

– बेसन ( 2 चम्मच)

– सूजी (2 चम्मच)

– मक्की का आटा ( 2 चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

– हल्दी (आवश्यकतानुसार)

– रिफाइंड ( 4 चम्मच)

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बनाने की विधि

– सबसे पहले आप सभी सब्जियों को धो लें फिर इन्हें छील कर आलू, गोभी और गाजर को कद्दूकस कर लें.

– ध्यान दीजिये कि यह ना ज्यादा बारीक हो और ना ज्यादा मोटा हो, उसके बाद आप इसमें हरी मिर्च और बारीक कटी प्याज़ मिला लें.

– हरा धनिया और कढ़ी पत्तों को भी बारीक काट लें.

– नींबू का रस निकाल कर इसमें डाल लें.

– अब आपको इसमें बेसन को मिलाना है उसके बाद सूजी और मक्की के आटे को भी मिला दें.

– अब आप इसमें नमक और हल्दी भी मिला दीजिये.

– अब आप इसमें इस हिसाब से पानी डालिए कि ये ज्यादा पतला ना हो बल्कि थिक हो  इसके बाद आप इस मिश्रण को थोड़ी देर के लिए रख दीजिये.

– इसमें मक्की का आटा इसे कुरकुरा करने के लिए और सूजी इसे सौफ्ट बनाने के लिए डाली जाती है.

– अब आप पैन या तवा जिस पर भी इसे बनाना चाहें या जो भी आप के पास हो उसे गैस जलाकर कर उस पर रखे दीजिये.

– उस पर थोड़ा सा रिफाइंड डालिए और जो मिश्रण बनाया है उसे उस पर डाल दीजिये.

– इसके बाद आपको इसे माध्यम आंच पर रख देना है और लगभग 1 मिनट के बाद आप इसे चैक करेंगे.

– इसे सीधे पलटे से हल्का हल्का हिला देंगे, पलटेंगे नहीं.

– इसके बाद इसे माध्यम आंच पर रखा रहने दें.

– बीच बीच में इसे देखते रहें, जब यह अच्छे से सिक जाये तो इसे पलटे की सहायता से पलट दीजिये

– एक तरफ से सिक गया है हल्का सुनहरा हो गया है अब दूसरी तरफ भी औयल लगा दें और उसी तरह से सिकने दें.

– बस कुछ समय में  तैयार होने वाला है आपका वेजिटेबल नमकीन पैन केक.

झटपट बनाएं पनीर इडली

गरीबी बनी एजेंडा

राहुल गांधी का नया चुनावी शिगूफा कि यदि वे जीते तो देश के सब से गरीब 20 फीसदी लोगों को 72,000 रुपए साल यानी 6,000 रुपए प्रति माह हर घर को दिए जाएंगे, कहने को तो नारा ही है पर कम से कम यह राम मंदिर से तो ज्यादा अच्छा है. भारतीय जनता पार्टी का राम मंदिर का नारा देश की जनता को, कट्टर हिंदू जनता को भी क्या देता? सिर्फ यही साबित करता न कि मुसलमानों की देश में कोई जगह नहीं है. इस से हिंदू को क्या मिलेगा?

लोगों को अपने घर चलाने के लिए धर्म का झुनझुना नहीं चाहिए चाहे यह सही हो कि पिछले 5,000 सालों में अरबों लोगों को सिर्फ और सिर्फ धर्म की खातिर मौत की नींद सुलाया गया हो. लोगों को तो अपने पेट भरने के लिए पैसे चाहिए.

यह कहना कि सरकार इस तरह का पैसा जमा नहीं कर सकती, अभी तक साबित नहीं हुआ है. 6,000 रुपए महीने की सहायता देना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है. अगर सरकार अपने सरकारी मुलाजिमों पर लाखों करोड़ रुपए खर्च कर सकती है, उस के मुकाबले यह रकम तो कुछ भी नहीं है. यह कहना कि इस तरह का वादा हवाहवाई है तो गलत है, पर सवाल दूसरा है.

सवाल है कि देश की 20 फीसदी जनता को इतनी कम आमदनी पर जीना ही क्यों पड़ रहा है? इस में जितने नेता जिम्मेदार उस से ज्यादा वह जाति प्रथा जिम्मेदार है जिस की वजह से देश की एक बड़ी आबादी को पैदा होते ही समझा दिया जाता है कि उस का तो जन्म ही नाली में कीड़े की तरह से रहने के लिए हुआ है. उन लोगों के पास न घर है, न खेती की जमीन, न हुनर, न पढ़ाई, न सामाजिक रुतबा. वे तो सिर्फ ऊंची जातियों के लिए इतने में काम करने को मजबूर हैं कि जिंदा रह सकें.

देश का ढांचा ही ऐसा है कि इन गरीबों की न आवाज है, न इन के नेता हैं जो इन की बात सुना सकें. उन को समझाने वाला कोई नहीं. गनीमत बस यही है कि 1947 के बाद बने संविधान में इन्हें जानवर नहीं माना गया.

भरोसा खुद पर करें ईश्वर पर नहीं

1947 से पहले तो ये जानवर से भी बदतर थे. अमेरिका के गोरे मालिक अपने नीग्रो काले गुलामों की ज्यादा देखभाल करते थे, क्योंकि वे उन के लिए काम करते थे और बीमार हो जाएं या मर जाएं तो मालिक को नुकसान होता था. हमारे ये गरीब तो किसी के नहीं हैं, खेतों के बीच बनी पगडंडी हैं जिस की कोई सफाई नहीं करता. हर कोई इस्तेमाल कर के भूल जाता है.

इन को 72,000 रुपए सालाना दिया जा सकता है. कैसे दिया जाएगा, पैसा कहां से आएगा यह पूछा जाएगा, पर कम से कम इन की बात तो होगी. ऊंची जातियों के लिए यह झकझोरने वाली बात है कि 25 करोड़ लोग ऐसे हैं जो आज इस से भी कम में जी रहे हैं. क्यों, यह सवाल तो उठा है. असली राष्ट्रवाद यही है, मंदिर की रक्षा नहीं.

औरत और नौकरियां

शहरी हों या गांवों की औरतों की नौकरियां कम होती जा रही हैं. सरकारी आंकड़ें, जिन्हें मोदी सरकार चुनावी दिनों में रोक रही थी, बताते हैं कि पिछले 15 सालों में औरतों की काम में भागीदारी आधी रह गई है. गांवों में पिछले 6 सालों में 2 से 8 करोड़ औरतों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है.

यह तब है जब घरों में बच्चे कम हैं और औरतों को अब बच्चे पालने में मुसीबत कम होती है. घरों में अब सास या मां भी काफी तंदुरुस्त रहती हैं कि वह पोतेनाती को पालने में हाथ बंटा सके, पर फिर भी औरतें काम पर नहीं जा पा रहीं.

इस की एक वजह तो यह है कि पिछले सालों में नौकरियों में एकदम कमी आई है. सरकार की नीतियां ही ऐसी हैं कि न कारखाना लगाना आसान है, न दुकान. खेती में फसल अच्छी हो तो दाम नहीं मिलता और जब दाम बढ़ते हैं तो उपज कम होती है, इसलिए नई नौकरियां ही नहीं निकल रहीं. घर का मर्द खाली हो तो औरतों की हिम्मत नहीं होती कि वे नौकरी पर निकलें.

औरतों के हाथ कुछ नहीं

अगर देश का काम चल रहा है तो इसलिए कि सरकारी नौकरियों में लोग भरपूर कमा रहे हैं. वहां वेतन भी है, रिश्वत भी. वहां पैसा जम कर बंटता है और खैरात में कुछ बेकार बैठे लोगों के हाथों में आ जाता है. भगवा गमछेधारी आजकल पैदल नहीं चलते, शानदार मोटरबाइक पर चलते हैं, पर हैं बेरोजगार. उन की कमाई का एक बड़ा हिस्सा जबरन चंदे से आता है पर इसे नौकरी तो नहीं कह सकते. देशभर में जो झगड़े बढ़ रहे हैं उस के पीछे बेरोजगारी है क्योंकि निकम्मे लोग हर तरह के काम करने लगते हैं और चूंकि आजकल पुलिस कुछ कहती नहीं तो मुसलिमों, दलितों, गरीबों, किसानों को पीटपाट कर कमाई की जाती है. घरों की औरतें भी इस कमाई पर काम चला लेती हैं.

जबकि लड़कियों की पढ़ाई अब लड़कों के बराबर सी होने लगी है, 2011-12 से 2017-18 तक गिनती बढ़ी है पर उतनी नहीं जितनी ज्यादा लड़कियां पढ़ कर आ गई हैं. आज हर घर में 2-3 बच्चे ही हैं और लड़कियां भी बराबर का काम कर सकती हैं पर न तो उन्हें घर से बाहर काम मिलता है और न ही अपने बदन के बचाव का भरोसा है.

लड़कियों का काम देश की माली हालत में बढ़ोतरी के लिए बहुत जरूरी है. जो देश लड़कियों को बराबर का काम का मौका नहीं देगा, वह पिछड़ जाएगा. वहां औरतें फिर धर्म के नाम पर समय और पैसा बरबाद करेंगी या फिर ह्वाट्सएप जैसे फालतू कामों पर बेकार करेंगी. सब का साथ सब का विकास में औरतों का विकास कहां है, ढूंढ़ना होगा.

5 टिप्स: घर पर ऐसे रखें कलर्ड बालों का ख्याल

आजकल लोग फैशनेबल दिखने के लिए कई तरह की चीजें अपनाते हैं, जिनमें सबसे पहले नाम बालों का आता है. लोग बालों की रिबांडिंग, स्मूदनिंग और ब्लीचिंग या कलर करवाते है, लेकिन वह कलर या ब्लीचिंग ज्यादा दिनों तक नही चलता और वह बालों को खराब करना शुरू कर देता है. जिसकी वजह से आपके बालों के साथ-साथ लुक भी खराब हो जाता है. और इसीलिए आज हम आपको ब्लीच या कलर किए हुए बालों की केयर कैसे करें यह बताएंगे.

1. नो-हीट स्टाइलिंग तकनीक का करें इस्तेमाल

जैसा कि कोई है जो लोग अपने बालों को लगभग रोजाना स्ट्रेट करते हैं, उनके बाल जल्दी डैमेज हो जाते हैं. इसलिए कोशिश करें हर रोज स्ट्रेटनिंग मशीन का इस्तेमाल करने की बजाय ड्राई प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करें, जिससे आपके बालों को कोई नुकसान न पहुंचे.

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2. बालों को कम वौश करें.

ड्रायर का इस्तेमाल करें लेकिन कम करें, जैसे कि आप अगर रोजाना नहाते हैं तो बालों को रोजाना नही धोएं. क्योंकि जितना आप बालों को कम धोएंगी उतना ही आप ड्रायर का कम इस्तेमाल करेंगी. साथ ही बालों पर नरिशमेंट के लिए औयल जरूर लगाएं.

3. हेयर ट्रीटमेंट का करें इस्तेमाल

हेयर ट्रीटमेंट से आपके बालों को केयर मिलता हैं, जो डैमेज बालों को नरिशमेंट के साथ-साथ एक शाइन भी देता है. इससे आपके बाल बिना ब्लीचिंग के भी सुंदर दिखते हैं. जैसे आर्गन औयल भी बालों को नरिशमेंट देने का काम करता है.

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4. हेयर की शाइन लाएं वापस

बालों को ब्लीच करने से शाइन उड़ जाती है, इसलिए बालों की शाइन वापस लाने के लिए रोजाना सुबह अपने बालों एक अच्छा हेयर स्प्रे लगाएं, जो बालों की शाइनिंग वापस ला सके.

  1. 5. अपने हेयर को करें टोन

जब तक आपके बाल नेचुरली कूल एंड टोंड न हों, तब तक बालों को टोन करें. बालों की टोनिंग चाहें तो आप अपने स्टाइलिस्ट से करा सकती हैं, वरना घर पर भी आप अपने बालों की टोनिंग कर सकती हैं. लेकिन सावधान रहें अगर आपके पास बालों की टोनिंग करने के लिए सही शैम्पू नही है तो घर पर बालों की टोनिंग करने से बचें.

घर है या जेल

नईनवेली पत्नी उर्मि को पा कर मोहन बहुत खुश था. हो भी क्यों न, आखिर हूर की परी जो मिली थी उसे. सच में गजब का नूर था उर्मि में. अगर उसे बेशकीमती पोशाक और लकदक गहने पहना दिए जाते तो वह किसी रानीमहारानी से कम न लगती. लेकिन बेचारी गरीब मांबाप की बेटी जो ठहरी, तो कहां से उसे यह सब मिलता भला, पर सपने उस के भी बहुत ऊंचेऊंचे थे.

अब सपने तो कोई भी देख सकता है न. तो बेचारी वह भी ऊंचेऊंचे सपना देखती थी कि उस का राजकुमार भी सफेद छोड़े पर चढ़ कर उसे ब्याहने आएगा और उसे दुनियाभर की खुशियों से नहला देगा.

लेकिन जब उर्मि ने अपने दूल्हे के रूप में मोहन को देखा तो उस का मन बुझाबुझा सा हो गया क्योंकि मोहन उस के सपनों के राजकुमार से कहीं भी मैच नहीं बैठ रहा था. खैर, चल पड़ी वह अपने पति मोहन के साथ जहां वह उसे ले गया.

‘‘जब शादी हो ही गई है तो अब अपनी जिम्मेदारी भी संभालना सीखो…’’ पिता का यह हुक्म मान कर मोहन उर्मि को ले कर शहर आ गया और काम की तलाश करने लगा.

लेकिन मोहन को कहीं भी कोई ढंग का काम नहीं मिल पा रहा था. दिहाड़ी पर मजदूरी कर के वह किसी तरह कुछ पैसे कमा लेता, मगर उतने से क्या होगा और दोस्त के घर भी वह कितने दिन ठहरता भला?

आखिर मोहन को काम न मिलता देख उस दोस्त ने सलाह दी कि क्यों न वह बड़ी सब्जी मंडी से सब्जियां ला कर बेचे. इस से उस की अच्छी कमाई हो जाएगी और रोज काम न मिलने की फिक्र भी नहीं रहेगी.

किसी तरह जोड़ेजुटाए पैसों से मोहन बड़ी सब्जी मंडी जा कर सब्जियां खरीद लाया और उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचने लगा.

अब मोहन का रोज का यही काम था. अंधेरे मुंह सुबहसवेरे उठ कर वह बड़ी सब्जी मंडी चला जाता और वहां से थोक भाव में खूब सारी फलसब्जियां खरीद कर उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचता.

अब मोहन की कमाई इतनी होने लगी थी कि पतिपत्नी के लिए अच्छे से दालरोटी जुट जाती थी. बेचारा मोहन, जब फलसब्जियां बेच कर थकाहारा घर आता तो उस के माथे पर पसीने का मुकुट और सीने में धड़कनों का जंगल होता, लेकिन फिर भी वह अपनी खूबसूरत पत्नी का मुखड़ा देख कर अपनी सारी थकान भूल जाता.

लेकिन उस की उर्मि जाने उस से क्या चाहती थी. वह कभी खुश ही नहीं रहती थी.

नहीं, वैसे तो वह खुश रहती थी, पर मोहन को देखते ही ठुनकने लगती थी कि उसे क्याक्या कमी है.

बेचारा मोहन हर तरह से कोशिश करता कि उर्मि को खुश रखे, पर उस की मांगें रोजाना बढ़ती ही जाती थीं.

मोहन मेहनत के चार पैसे इसलिए ज्यादा कमाना चाहता था ताकि उर्मि को ज्यादा से ज्यादा खुश रख सके, मगर उर्मि को इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी. वह तो अपने ही पड़ोस के एक बांके नौजवान धीरुआ के साथ नैनमटक्का कर रही थी.

तेलफुलेल, चूड़ी, बिंदी वगैरह बेचने वाला धीरुआ पर उस का दिल आ गया था. जब भी वह उसे देखती, उसे कुछकुछ होने लगता.

सोचती, काश, धीरुआ उस का पति होता तो कितना मजा आता. पता नहीं, क्यों उस के मांबाप ने उस से 10 सालसे भी ज्यादा बड़े मोहन के साथ उसे ब्याह दिया?

उधर धीरुआ भी जब उर्मि को देखता तो देखता रह जाता. उस के गठीले बदन के उभार को देख कर उस के मुंह से लार टपकने लगती. उसे लगता, कैसे वह उसे अपने ताकतवर हाथों में समेट ले और फिर कभी छोड़े ही न. और वैसे भी वह अभी तक कुंआरा था.

जब भी उर्मि उस की दुकान पर आती, धीरुआ उसे ही निहारते रहता. यह बात उर्मि भी समझ रही थी इसलिए तो बहाना बना कर वह उस की दुकान पर अकसर जाती रहती थी.

धीरुआ अपने मोबाइल फोन में उर्मि को बढि़याबढि़या प्यार वाले गाने सुनाता और वीडियो भी दिखाता. प्यार वाले गाने सुन कर वह ऐसे मंत्रमुग्ध हो जाती कि पूछो मत. वह खुद को उस गाने की हीरोइन ही समझने लगती और धीरुआ को हीरो.

एक दिन उर्मि ने ठुनकते हुए मोहन से मोबाइल फोन की मांग कर दी. हैसियत तो नहीं थी बेचारे की, लेकिन फिर भी एक सस्ता सा मोबाइल, जिस से सिर्फ बात हो सकती थी, उर्मि के लिए खरीद लाया.

मोबाइल फोन देख कर उर्मि बहुत खुश तो नहीं हुई, पर लगा चलो बात तो होगी न इस से. अब उस का जब भी मन करता, धीरुआ को फोन लगा देती और खूब बातें करती. पर अपने पति मोहन से कभी सीधे मुंह बात नहीं करती थी.

न जाने क्यों उर्मि बातबात पर मोहन पर चढ़ जाती और बेचारा मोहन भी उस के गुस्से को शरबत समझ कर चुपचाप हंसतेहंसते पी जाता.

सोचता, उम्र कम है इसलिए समझ भी थोड़ी कम है. मगर उसे तो मोहन जरा भी भाता ही नहीं था. उस का दिल तो अपने आशिक धीरुआ के दिल से जा कर अटक गया था.

किसी तरह हिचकोले खाते हुए मोहन और उर्मि की गृहस्थी चल रही थी. लेकिन कहते हैं न, वक्त कब करवट ले, कह नहीं सकते. अचानक एक दिन लोगों में हड़कंप देख कर मोहन चौंक गया. देखा तो सब अपनेअपने सामान समेट कर भागने लगे हैं.

‘‘अरे, क्या हुआ भाई?’’ मोहन ने पास में अपनी सब्जियां समेट रहे सब्जी वाले से पूछा.

‘‘अरे, क्या हुआ क्या, तुम भी अपना सामान जल्दी से उठा कर भागो. तुम देख नहीं रहे कब्जा हटाने के लिए नगर प्रशासन का दस्ता आया हुआ है,’’ उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘नगर प्रशासन का दस्ता… पर वह क्यों भाई?’’ मोहन ने उस सब्जी वाले से हैरानी से पूछा.

‘‘क्योंकि यहां सब्जियां बेचना गैरकानूनी है,’’ झुंझलाते हुए उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘गैरकानूनी… पर यहां शहर के बीचोंबीच कुछ लोगों ने जो मौल और होटल बना रखे हैं, वे भी आधे से ज्यादा सरकारी जमीन पर हैं तो उन्हें ये प्रशासन वाले क्यों कुछ नहीं कहते? क्या इन लोगों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती? हम गरीब ही मिले हैं इन्हें सताने को?’’ मोहन ने गुस्से से कहा.

‘‘अरे भाई, वे अमीर लोग हैं. पैसा और पहुंच बहुत है उन की. फिर उन के खिलाफ क्यों कोई कार्यवाही होने लगी? चल, मैं तो चला, तू भी निकल ले जल्दी से,’’ कह कर वह सब्जी वाला चलता बना.

मोहन भी खुद में भुनभुनाते हुए अपनी सब्जियां समेटने लगा, लेकिन तभी किसी की कड़क आवाज से वह कांप उठा और उस के हाथ थरथर कांपने लगे.

‘‘क्यों बे, अब तुझे क्या अलग से न्योता देता… हां, बोल?’’ कह कर उस में से एक ने उस की टोकरी में ऐसी लात मारी कि वह लुढ़कती हुई दूर चली गई. सारे टमाटर सड़क पर छितरा गए.

तभी एक दूसरा अफसर उस की तरफ बढ़ा ही था कि मोहन हाथ जोड़ कर विनती करते हुए कहने लगा, ‘‘साहब, मैं अभी उठाए लेता हूं सारी सब्जियां, दया माईबाप दया…’’

लेकिन मोहन की बातों को अनसुना कर एक बड़े अफसर ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘इन का तो यह रोज का नाटक है. जब तक इन्हें सबक नहीं सिखाओगे, समझेंगे नहीं,’’ कह कर उस ने उस की बचीखुची सब्जियां भी फेंक दीं.

बेचारा मोहन उन सब के सामने गिड़गिड़ाता रह गया. वह अपने आंसू पोंछते हुए जो भी सब्जियां बची थीं, ले कर घर चला गया, पर वहां भी उर्मि की जहरीली बातों ने उसे मार डाला.

‘‘तो क्या करूं… बोल न? क्या गरीब होना मेरी गलती है या वहां जा कर सब्जियां बेच कर मैं ने कोई गुनाह कर दिया, बोलो?’’ मोहन रोंआसी आवाज में बोला.

‘‘वह सब मुझे नहीं पता… तुम चोरी करो, डकैती करो, जेब काटो चाहे जो भी करो मुझे तो बस पैसे चाहिए घर चलाने के लिए,’’ जख्म पर महरम लगाने के बदले उर्मि अपनी बातों से उसे और जख्म देने लगी.

अब क्या करता बेचारा, पैसे तो थे नहीं जो फिर से कोई धंधा शुरू करता. कहीं सचमुच में उर्मि उसे छोड़ कर भाग न जाए, इस वजह से मोहन ने गलत रास्ता अख्तियार कर लिया.

अब सब्जियां बेचने के बजाय लोगों की जेबें काटने लगा और छोटीमोटी चोरियां भी करने लगा.

शुरूशुरू में तो मोहन को बहुत बुरा लगता था ये सब काम करने में, लेकिन फिर धीरेधीरे उसे भी यह सब करने में मजा आने लगा.

घर में सामानपैसा आते रहने से उर्मि भी अब खुश रहने लगी थी. उस के ठाठ देख आसपड़ोस की औरतें जल मरतीं और उर्मि उन्हें देख और इतराती. लेकिन उन के पास यह सुख भी ज्यादा दिनों तक टिका न रह सका.

एक दिन मोहन चोरी करते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ गया और उसे जेल भेज दिया.

मोहन के जेल जाने से उर्मि को कोई खास फर्क नहीं पड़ा, बल्कि उस की तो और मौज हो गई. अब वह खुल कर धीरुआ के साथ आंखें चार करने लगी.

धीरुआ उसे जबतब अपने घर ले जाता और दोनों खूब मस्ती करते. अपनी मोटरसाइकिल पर वह उर्मि को खूब घूमाताफिराता, सिनेमा दिखाता. जब लोग कुछ कहते तो उर्मि उन्हें दोटूक जवाब दे कर चुप कर देती.

इधर बिना गुनाह साबित हुए ही मोहन महीनों तक जेल में पड़ा सड़ता रहा, क्योंकि कोई उस की जमानत कराने नहीं आया इसलिए. जब जान लिया उर्मि ने कि अब मोहन नहीं आने वाला, तो एक दिन वह धीरुआ के साथ भाग गई.

बिना गुनाह साबित हुए ही महीनों जेल में गुजारने की बात जब एक कैदी दोस्त ने सुनी तो उसे मोहन पर दया आ गई. छूटते ही उस कैदी दोस्त ने मोहन की जमानत तो करवा दी, लेकिन महीनों जेल में पड़े रहने से वह बहुत कमजोर हो गया. जब पत्नी के बारे में जाना तो उस का दिल और टूट गया. लगा जिस के लिए उस ने इतना सबकुछ सहा, वही उस का साथ छोड़ गई.

अब मोहन बीमार और बेसहारा हो गया था. न तो अब वह कोई काम करने लायक रहा और न ही चोरीजेबकतरी के ही लायक रह गया. कोई कुछ दे जाता तो खा लेता, वरना भूखे पेट ही सो जाता. उसे लग रहा था कि उस के लिए तो जेल भी वैसी ही थी जैसा घर.

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