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हर चीज निराली है इन ऊंचे मकानों में

क़िस्मत की लक़ीरों ने क्या क्या न सितम ढाया
शीशे का जिगर लेकर, पत्थर का सनम पाया
उसको गुरूर खुद पर होना तो लाजिमी है
सोने का महल उसने चांदी का बदन पाया
हर चीज़ निराली है इन ऊंचे मक़ानों में
काग़ज़ के फूल देखे, कांटों का चमन पाया
दुनिया-ए-अमीरा में मुफ़लिस की लाश देखो
दो गज़ ज़मी तो छोड़ो, दो गज़ न कफ़न पाया

शब्दार्थ :
दुनिया-ए-अमीरा  :  अमीरों की दुनिया
मुफ़लिस : ग़रीब

डिनर में बनाएं ये टेस्टी सब्जी

बेसन शिमला मिर्च बनाने की विधि

शिमला मिर्च की सब्जी तरह-तरह से तरीकों से बनाई जाती है. और ये सब्जी बहुत टेस्टी होती है. सबसे खास बात ये है कि शिमला मिर्च की सब्जी बनाने में भी बेहद आसान है. तो आपको झटपट बेसन शिमला मिर्च सब्जी की रेसिपी बताते हैं. आप इस लजिज रेसिपी की विधि जरूर ट्राई करें.

सामग्री :

रिफाइंड तेल ( 01 चम्मच)

हल्दी पाउडर ( 01 छोटा चम्मच)

जीरा पाउडर ( 1/2 छोटा चम्मच)

लाल मिर्च पाउडर ( 1/4 छोटा चम्मच)

काली मिर्च पाउडर ( 01 चुटकी)

नमक ( स्वादानुसार)

शिमला मिर्च( 250 ग्राम)

बेसन ( 02 बड़े चम्मच)

प्याज (1 नग)

दही ( 03 बड़े चम्मच)

वेजिटेबल नमकीन पैन केक बनाने का सबसे आसान विधि

बनाने की विधि :

सबसे पहले शिमला मिर्च को धोकर उसके डंठल निकाल दें.

इसके बाद उसे छोटे-छोटे कयूब्स मे काट लें.

प्याज को छीलकर लम्बाई में काट लें.

बेसन और दही को आपस में मिलाकर अच्छी तरह से फेंट लें.

बेसन को फेंटते समय इस बात का ध्यान रहे कि उसमें कोई गांठ न रहे.

अब गैस पर नॉन स्टिक पैन गर्म करें और बर्तन गर्म हो जाने पर उसमें रिफाइंड तेल डालें.

तेल गर्म होने पर उसमें शिमला मिर्च डालें और चलाते हुए भूनें.

जब शिमला मिर्च थोडा भुन जाए, पैन में प्याज डाल दें और इसके बाद पैन में नमक और हल्दी पाउडर उालें और चलाते हुए अच्छी तरह से भूनें.

इसके बाद दही और बेसन का घोल पैन में डालें कर चलाने के बाद ढ़क कर 3-4 मिनट तक पकाएं.

बीच-बीच में सब्जी को चलाते भी रहें, नहीं तो बेसन तली में चिपकने लगेगा.

जब बेसन गाढ़ा हो जाए, तो पैन में लाल मिर्च पाउडर, जीरा पाउडर और काली मिर्च पाउडर डालें और चलाते हुए 2 मिनट तक पकाएं और उसके बाद गैस बंद कर दें.

लीजिए आपकी बेसन शिमला मिर्च बनाने की रेसिपी पूरी हुई.

घर पर बनायें स्वादिष्ट ‘चिकन काठी रोल’

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पिंपल से छुटकारा पाने के लिए अपनाएं ये 4 घरेलू टिप्स

पिंपल्स से आपके चेहरे की खूबसूरती बेजान नजर आती हैं. ऐसे तो कई सारी क्रीम बाजार में उपलब्ध है, जो पिंपल्स मिटाने का दावा करते हैं. पर इनकी वजह से त्वचा पर अक्सर रिएक्शन हो जाता है. ऐसे में कोशिश करनी चाहिए कि हम जो भी क्रिम इस्तेमाल करें वह पूरी तरह सुरक्षित हो.

आज आपको कुछ ऐसे घरेलू नुस्खें बताने जा रहे हैं जो कुछ समय में आपके पिंपल्स को मिटाएंगे. और कुछ दिन तक इनको लगातार करते रहने से न केवल आपके पिंपल्स कम हो जाएंगे बल्कि उनके दाग भी हल्के होंगे. तो आइए जानते हैं.

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  1. हल्दी

एक चम्मच हल्दी पाउडर को दूध और गुलाबजल के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें और सीधे पिंपल पर लगाएं. इस उपाय को लगातार कुछ दिनों तक करने से पिंपल्स की समस्या खत्म हो जाती है.

2. टमाटर

एक छोटी कटोरी में दो चम्मच टमाटर का रस लें. इसमें एक चम्मच शहद व आधा चम्मच बेकिंग सोडा डालकर एक पेस्ट बना लें और पिंपल्स पर लगाएं. 10 मिनट तक के बाद ठंडे दूध से चेहरे की मसाज करें और साफ पानी से चेहरा धो लें.

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3. नींबू

नींबू को काटकर उसका रस एक छोटी कटोरी में नि‍चोड़ लें. इसमें थोड़ा नमक व शहद मिलाकर मिश्रण बना लें और प्रभावित जगह पर लगाएं. 15 मिनट के लिए सूखने दें और फिर त्वचा को गुनगुने पानी से साफ कर लें.

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4. शहद

पिंपल्स की समस्या से छुटकारा पाने के लिए शहद भी बहुत मददगार है. शहद को पिंपल्स पर लगा कर छोड़ दें. कुछ देर के बाद ठंडे दूध से चेहरे की मसाज करते हुए इसे हटा लें. 15 मिनट के इस उपाय को लगातार करने से पिंपल्स खत्म हो जाएंगे.

posted by- saloni

भैंस और बहस की मारामारी

मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं कि ‘अक्ल बड़ी या…’ में बाद का सही शब्द क्या है. भैंस या बहस? और अक्ल से बड़ी कौन है, बहस या भैंस? अनिर्णीत विवाद है यह. लेकिन इस का हल मेरे पास है. इतना तो साफ है कि इस विवाद में अक्ल कौमन है, लेकिन समस्या भैंस और बहस को ले कर होती है. भैंस वाले डंडा ले कर अपनी हांकते हैं तो बहस वाले शब्दबाण चलाते हैं. उदाहरण पर उदाहरण दागे जाते हैं. अक्ल का पक्ष लेने वालों की दलील है कि सही शब्द ‘बहस’ ही है जो बहतेबहते ‘भैंस’ हो गया है. इसके पहले कि मैं अपना हल बताऊं, विद्वानों को सम्मान देते हुए पहले उन का पक्ष देखें.

तो चलिए पहले लेते हैं बहस. एक बहस वह जो टीवी पर आती है. बड़ी मनोरंजक होती है. बहसिये केकड़ेजैसे एकदूसरे पर चढ़े आते हैं. किसी को बोलने नहीं देते. यदि सचमुच आमनेसामने हों तो हाथापाई हो जाए. इस से आगे भी जा सकते हैं. कुछ कह नहीं सकते. बहस इसीलिए की जाती है कि नतीजा कुछ भी न निकले. जनता का पैसा और टाइम बरबाद करने पर शिकायत की है किसी ने? नहीं न. जनता के पास फालतू टाइम है. बहसियों के पास इस नौटंकी से तो पैसा आता है. जनता बड़े मजे लेले कर देखती है. और बहसबाज टीवी कैमरे के सामने अपनी मुंडी दिखाने के लिए बेताब रहते हैं.

मल्टीप्लैक्स में मनोरंजन महंगा है. फिर वहां घुसने के पहले कड़ी जांच होती है जैसे हर आदमी टिकट नहीं, बल्कि बम लिए हुए आया हो. इसलिए आज की तारीख में सब से सस्ता मनोरंजन टीवी बहस है. लेकिन याद रखिए, बहस संसद में भी होती है. हम वह भी देखते हैं टीवी पर. इस बहस का क्लाइमैक्स मारामारी है. तब सांसद अपनी निजी ताकत दिखाते हैं.

फिल्मों की तरह डुप्लिकेट से काम नहीं लेते. देखने वालों को लगता है कि पैसा वसूल हो गया. सांसद भी जैसे कहते हों कि देखो वोटर भाइयो, हम ने आप का पैसा वसूल करवा दिया. आप के दुखी क्षणों में सुख घोल दिया. यह सब आप ही के लिए कर रहे हैं. और प्लीज नोट, इस बहस का समाज की भलाई या बुराई से कोई सरोकार नहीं है. यह शुद्ध मनोरंजन का कार्यक्रम है. इसे उसी भावना से लीजिए.

मैं तो मानता हूं कि भैंस ही बड़ी होती है. आप मुझ पर हंसेंगे. मैं साबित कर दूंगा कि भैंस अक्ल से बड़ी होती है. इस अंतहीन बहस का मैं अंत करना चाहूंगा. भैंस जन सहयोग से बनी सीमेंट की सड़क पर सशरीर नजर तो आती है. इस मोटे पशु को तीखी अक्ल वाले पालते हैं. गाय के दूध के मुकाबले इस का दूध गाढ़ा होता है. इसलिए इस के दूध में गाय के दूध के मुकाबले ज्यादा पानी मिलाया जाता है.

प्रौफिट मार्जिन ज्यादा है. घी, मावा और मिठाइयों की मिलावट की दुनिया में उस का महत्त्वपूर्ण योगदान नकारा नहीं जा सकता.

अब देखिए, उसे हम देख सकते हैं, कालीकाली, बहुत बड़ी है. छू सकते हैं, ये मोटी. उस की मार खा सकते हैं. भैंस पालने का एक फायदा और भी है. दुहो और खुला छोड़ दो सड़क पर. नगरनिगम वाले यदि अपनी फर्जअदायगी की नौटंकी दिखाएं तो उन्हें पसीना आ जाए. एक तो उसे घेरना मुश्किल. वह कोई गाय तो है नहीं जो आसानी से पकड़ में आए. गाय तो बेचारी दुबलीपतली, मरियल, कुपोषित होती है.

भैंस खाएपिए घर की लगती है. यों वह आरामजीवी है. किसी को परेशान नहीं करती. लेकिन जब उसे गुस्सा आए तो अपनी खोपड़ी पकड़ने वाले को ठोक कर उस की खोपड़ी तोड़ दे. चलो, मान लो उसे सीमेंट की सड़कों की तरह जनसहयोग से पकड़ भी लिया, तो पिंजरे में ठूंसना मुश्किल. इतनी वजनदार होती है कि नगरनिगम के चपरासी से लगा कर महापौर भी मिलजुल कर नहीं पकड़ पाएं. इसलिए नगरनिगम भैंसमाता को पकड़ने का पाप नहीं करता.

भारत महाद्वीप के अलावा दुनिया में कहीं भैंस होती है, इस की जानकारी मुझे नहीं है. भैंसमाता वोट नहीं दिलाती जैसा कि कभी गौमाता दिलवाया करती थी. फिर भी भैंस के ठाट अलग ही हैं. उस का चलने का अंदाज देखो. हाथी के बाद उसी की चाल मस्तानी लगती है. अपनी ही धुन में चलती है. किसी की परवा नहीं करती. चाहे जितनी बीन बजाइए, फूंकफूंक कर मर जाइए, वह अपनी मरजी से ही हटती है.

पालतू और दुधारू जानवर होने के बावजूद उसे गाय की तरह पवित्र नहीं माना जाता. गौमूत्र को पवित्र मान कर उस का सेवन किया जाता है. उसे कई रोगों की औषधि भी माना जाता है. लेकिन बेचारी भैंस के पल्ले यह सम्मान नहीं है. मिस्टर गाय यानी बैल के रंभाने को संगीत में ‘रे’ कहा गया है. गाय की दूर की चचेरी की चचेरी बहन भैंस के रंभाने को कोई स्वर अलौट नहीं किया गया है. फिर भी वह किसी से शिकायत नहीं करती. मानव की तरह आरक्षण की मांग नहीं करती.

भैंस का पुल्ंिलग भैंसा बड़ा खतरनाक होता है. मैं जब भी भैंसा देखता हूं, तो उस के ऊपर बैठा यमराज ढूंढ़ता हूं. वैसे इन दिनों यमराज की सवारी मौडर्न हो गई है. वह बाइक या ट्रक या ट्रैक्टर या टैंकर पर सवार हो कर आता है. टारगेट जल्दी पूरा होता है. जब धार्मिक कार्यक्रम में मोटेबासे लोग धर्मगुरु के आदेश पर नाचने लगते हैं, तो भैंसा डांस देखने को मिलता है. अगर आज भैंस को संत ज्ञानेश्वर मिल जाएं तो कहना ही क्या. ऐसा गा सकती है कि वह बौलीवुड का बैस्ट सिंगर का अवार्ड भी जीत ले. वैसे भी आजकल बौलीवुड में भैंसा राग ही तो चल रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इसे मानवजाति गा रही है.

इस विश्लेषण के बाद अब तो आप भी मानेंगे कि भैंस न सिर्फ बहस पर भारी है, बल्कि अक्ल से भी बड़ी है. अक्ल तो उस की दासी है. कौन कहता है कि भैंस का दूध पीने वाले की अक्ल मोटी हो जाती है? देखा नहीं, अक्ल किस तरह यूपी की राजकीय मेहमान भैसों की सेवा में लगी हुई थी. इक्कीस तोपों की सलामी ही बाकी रह जाती है.

एक और बात. हिंदी की ‘जिस की लाठी उस की भैंस’ वाली कहावत भी हटा दीजिए. कहिए, ‘जिस की भैंस उस की लाठी.’ कम से कम यूपी में तो यही चलता है. अब तो अक्ल बड़ी या भैंस वाली पहेली उतार फेंकिए. मैं ने हल कर दी है. तो आप भी मेरे साथ कहिए, भैंस अक्ल से बड़ी होती है. बहुत ही बड़ी.

500 टुकड़ो में बंटा दोस्त

मुंबई के विरार (पश्चिम) में स्थित है ग्लोबल सिटी. यहीं पर पैराडाइज सोसाइटी के फ्लैट बने हुए हैं. जिन में सैकड़ों लोग रहते हैं.

को इस सोसाइटी में रहने वाले लोग जब नीचे आ जा रहे थे, तभी उन्हें तेज बदबू आती महसूस हुई. वैसे तो यह बदबू पिछले 2 दिनों से महसूस हो रही लेकिन उस दिन बदबू असहनीय थी.

कई दिन से बदबू की वजह से लोग नाक बंद कर चले जाते थे. उन्हें यह पता नहीं लग रहा था कि आखिर दुर्गंध आ कहां से रही है. सोसाइटी के गार्डों ने भी इधरउधर देखा कि कहीं कोई बिल्ली या कुत्ता तो नहीं मर गया, पर ऐसा कुछ नहीं मिला.

20 जनवरी को अपराह्न 11 बजे के करीब सोसाइटी के लोग इकट्ठा हुए और यह पता लगाने में जुट गए कि आखिर बदबू आ कहां से रही है. थोड़ी देर की कोशिश के बाद उन्हें पता चल गया कि बदबू और कहीं से नहीं बल्कि सेप्टिक टैंक के चैंबर से आ रही है. किस फ्लैट की टायलेट का पाइप बंद है, यह पता लगाने और उसे खुलवाने के लिए सोसाइटी के लोगों ने 2 सफाईकर्मियों को बुलवाया.

सफाई कर्मचारियों ने चैक करने के बाद पता लगा लिया कि सोसाइटी की सी विंग के फ्लैटों का जो पाइप सैप्टिक टैंक में आ रहा था, वह बंद है. सी विंग में 7 फ्लैट थे, उन्हीं का पाइप नीचे से बंद हो गया था. पाइप बंद होना आम बात होती है जो आए दिन फ्लैटों में देखने को मिलती रहती है.

सफाई कर्मियों ने जब वह पाइप खोलना शुरू किया तो उस में मांस के टुकड़े मिले. पाइप में मांस के टुकड़े फंसे हुए थे, जिन की सड़ांध वहां फैल रही थी.

सोसाइटी के लोगों को यह बात समझ नहीं आ रही थी कि किसी ने मांस डस्टबिन में फेंकने के बजाए फ्लैट में क्यों डाला. जब पाइप में मांस ज्यादा मात्रा में निकलने लगा तो सफाईकर्मियों के अलावा सोसाइटी के लोगों को भी आश्चर्य हुआ. शक होने पर सोसाइटी के एक पदाधिकारी ने पुलिस को फोन कर इस की जानकारी दे दी.

सूचना मिलने पर अर्नाला थाने के इंसपेक्टर सुनील माने पैराडाइज सोसाइटी पहुंच गए. पाइप में फंसा मांस देख कर उन्हें भी आश्चर्य हुआ. उसी दौरान उन्हें उस मांस में इंसान के हाथ की 3 उंगलियां दिखीं.

उंगलियां देखते ही उन्हें माजरा समझते देर नहीं लगी. वह समझ गए कि किसी ने कत्ल कर के, लाश के छोटेछोटे टुकड़े कर के इस तरह ठिकाने लगाने की कोशिश की है. जल्दी ही यह बात पूरी सोसाइटी में फैल गई, जिस के चलते आदमियों के अलावा तमाम महिलाएं भी वहां जुटने लगीं.

मामला सनसनीखेज था इसलिए इंसपेक्टर माने ने फोन द्वारा इस की सूचना पालघर के एसपी गौरव सिंह और डीवाईएसपी जयंत बजबले के अलावा अपने थाने के सीनियर इंसपेक्टर घनश्याम आढाव को दे दी.

पुलिस कंट्रोल रूम में यह सूचना प्रसारित होने के बाद क्राइम ब्रांच की टीम भी मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने मांस के समस्त टुकड़े अपने कब्जे में लिए. पुलिस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि जिस की हत्या की गई है, वह इसी सोसाइटी का रहने वाला था या फिर कहीं बाहर का.

जिस पाइप में मांस के टुकड़े फंसे मिले थे वह पाइप सी विंग के फ्लैटों का था. इस से यह बात साफ हो गई थी कि कत्ल इस विंग के ही किसी फ्लैट में किया गया है. सी विंग में 7 फ्लैट थे. पुलिस ने उन फ्लैटों को चारों ओर से घेर लिया ताकि कोई भी वहां से पुलिस की मरजी के बिना कहीं न जा सके. फोरेंसिक एक्सपर्ट की टीम भी बुला ली गई थी.

रहस्य फ्लैट नंबर 602 का

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पुलिस ने उन सभी फ्लैटों की तलाशी शुरू कर दी. तलाशी के लिए पुलिस फ्लैट नंबर 602 में पहुंची. वह फ्लैट बाहर से बंद था. लोगों ने बताया कि वैसे तो इस फ्लैट की मालिक पूनम टपरिया हैं लेकिन कुछ दिनों पहले उन्होंने यह फ्लैट किशन शर्मा उर्फ पिंटू नाम के एक आदमी को किराए पर दे दिया था. वही इस में रहता है.

किशन शर्मा उस समय वहां नहीं था इसलिए सोसाइटी के लोगों की मौजूदगी में पुलिस ने उस फ्लैट का ताला तोड़ कर तलाशी ली तो वहां इंसान की कुछ हड्डियां मिलीं. इस से इस बात की पुष्टि हो गई कि कत्ल इसी फ्लैट में किया गया था. कत्ल किस का किया गया था यह जानकारी किशन शर्मा से पूछताछ के बाद ही मिल सकती थी. बहरहाल, पुलिस ने मांस के टुकड़े, हड्डियां आदि अपने कब्जे में ली.

थोड़ी कोशिश कर के पुलिस को किशन शर्मा उर्फ पिंटू का फोन नंबर भी मिल गया था. वह कहीं फरार न हो जाए इसलिए पुलिस ने बड़े रेलवे स्टेशनों, बस अड्डे व हवाई अड्डे पर भी पुलिस टीमें भेज दीं.

इस के अलावा सीनियर पुलिस इंसपेक्टर घनश्याम आढाव ने किशन शर्मा का मोबाइल नंबर मिलाया. इत्तेफाक से उस का नंबर मिल गया. उन्होंने अपनी पहचान छिपाते हुए किसी बहाने से उसे एक जगह मिलने के लिए बुलाया. उस ने आने के लिए हां कर दी तो वहां पुलिस टीम भेज दी गई. वह आया तो सादा लिबास में मौजूद पुलिस कर्मियों ने उसे दबोच लिया.

40 वर्षीय किशन शर्मा को हिरासत में ले कर पुलिस थाने लौट आई. एसपी गौरव सिंह की मौजूदगी में जब उस से उस के फ्लैट नंबर- 602 में मिली मानव हड्डियों और मांस के बारे में पूछताछ की गई तो थोड़ी सी सख्ती के बाद उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने अपने 58 वर्षीय लंगोटिया यार गणेश विट्ठल कोलटकर की हत्या की थी.

पुलिस ने मृतक के शरीर के अन्य हिस्सों के बारे में पूछा तो किशन ने बताया कि उस ने गणेश की लाश के करीब 500 टुकड़े किए थे. कुछ टुकड़े टायलेट में फ्लश कर दिए और कुछ टुकड़े टे्रन से सफर के दौरान फेंक दिए थे. किशन के अनुसार, उस ने सिर तथा हड्डियां भायंदर की खाड़ी में फेंकी थीं.

गणेश विट्ठल किशन शर्मा का घनिष्ठ दोस्त था तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि दोनों के बीच दुश्मनी हो गई. दुश्मनी भी ऐसी कि किशन शर्मा ने उस की हत्या कर लाश का कीमा बना डाला. इस बारे में पुलिस ने किशन शर्मा से पूछताछ की तो इस हत्याकांड की दिल दहला देने वाली कहानी सामने आई—

किशन शर्मा मुंबई के सांताक्रुज इलाके की राजपूत चाल के कमरा नंबर 4/13 में अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ रहता था. उस ने मुंबई विश्वविद्यालय से मानव शरीर रचना एवं क्रिया विज्ञान में सर्टिफिकेट कोर्स किया था.

लेकिन अपने कोर्स के मुताबिक उस की कहीं नौकरी नहीं लगी तो वह शेयर मार्केट में काम करने लगा. करीब 8 महीने पहले उस की मुलाकात थाणे जिले के मीरा रोड की आविष्कार सोसाइटी में रहने वाले गणेश विट्ठल कोलटकर से हुई जो बाद में गहरी दोस्ती में तब्दील हो गई थी. गणेश की अपनी छोटी सी प्रिंटिंग प्रैस थी.

एक दिन गणेश ने किशन शर्मा से कहा कि अगर वह प्रिंटिंग प्रैस के काम में एक लाख रुपए लगा दे तो पार्टनरशिप में प्रिंटिंग प्रैस का धंधा किया जा सकता है. किशन इस बात पर राजी हो गया और उस ने एक लाख रुपए अपने दोस्त गणेश को दे दिए. इस के बाद दोनों दोस्त मिल कर धंधा करने लगे. किशन मार्केट का काम देखता था.

कुछ दिनों तक तो दोनों की साझेदारी ईमानदारी से चलती रही पर जल्द ही गणेश के मन में लालच आ गया. वह हिसाब में हेराफेरी करने लगा. किशन को इस बात का आभास हुआ तो उस ने साझेदारी में काम करने से मना करते हुए गणेश से अपने एक लाख रुपए वापस मांगे. काफी कहने के बाद गणेश ने उस के 40 हजार रुपए तो वापस दे दिए लेकिन 60 हजार रुपए वह लौटाने का नाम नहीं ले रहा था.

किशन जब भी बाकी पैसे मांगता तो वह कोई न कोई बहाना बना देता था. वह उसे लगातार टालता रहा. इसी दौरान किशन को सूचना मिली कि गणेश 56 साल की उम्र में शादी करने वाला है. इस बारे में किशन ने उस से बात की तो गणेश ने साफ कह दिया कि अभी उस के पास पैसे नहीं हैं. पहले वह शादी करेगा. इस के बाद पैसों की व्यवस्था हो जाएगी तो दे देगा.

गणेश की यह बात किशन को बहुत बुरी लगी. वह समझ गया कि गणेश के पास पैसे तो हैं लेकिन वह देना नहीं चाहता. लिहाजा उस ने दोस्त को सबक सिखाने की ठान ली. उस ने तय कर लिया कि वह गणेश को ठिकाने लगाएगा.

योजना बनाने के बाद उस ने विरार क्षेत्र की पैराडाइज सोसाइटी में फ्लैट नंबर 602 किराए पर ले लिया. वह फ्लैट पूनम टपरिया नाम की महिला का था. किशन कभीकभी अकेला ही उस फ्लैट में सोने के लिए चला आता था.

योजना के अनुसार 16 जनवरी, 2019 को किशन शर्मा अपने दोस्त गणेश विट्ठल कोलटकर को ले कर पैराडाइज सोसाइटी के फ्लैट में गया. फ्लैट में घुसते ही किशन ने उस से अपने 60 हजार रुपए मांगे. इसी बात पर दोनों के बीच झगड़ा हो गया. झगड़े के दौरान किशन ने कमरे में रखा डंडा गणेश के सिर पर मारा. एक ही प्रहार में गणेश फर्श पर गिर गया. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

गणेश की मौत हो जाने के बाद किशन के सामने सब से बड़ी समस्या उस की लाश को ठिकाने लगाने की थी. इस के लिए उस ने असिस्टेंट पुलिस इंसपेक्टर अश्वनि बिदरे गोरे की हत्या से संबंधित जानकारियां इकट्ठा कीं, ताकि पुलिस को आसानी से गुमराह किया जा सके. उस ने यूट्यूब पर भी डैड बौडी को ठिकाने लगाने के वीडियो देखे. उन में से उसे एक वीडियो पसंद आया जिस में लाश को छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर उन्हें ठिकाने लगाने का तरीका बताया गया था.

यह तरीका उसे आसान भी लगा. क्योंकि वह मानव शरीर रचना एवं क्रिया विज्ञान की पढ़ाई कर चुका था. इस के लिए तेजधार के चाकू की जरूरत थी. किशन शर्मा सांताकु्रज इलाके की एक दुकान से बड़ा सा चाकू और चाकू को तेज करने वाला पत्थर खरीद लाया.

खरीद लाया मौत का सामान फ्लैट पर पहुंच कर किशन शर्मा ने सब से पहले गणेश विट्ठल कोलटकर की लाश का सिर धड़ से अलग कर उसे एक पालीथीन में रख लिया. इस के बाद उस ने लाश के 500 से अधिक टुकड़े कर दिए. शरीर की हड्डियों और पसलियों को उस ने तोड़ कर अलग कर लिया था.

वह मांस के टुकड़ों को टायलेट की फ्लश में डालता रहा. सिर और हड्डियां उस ने भायंदर की खाड़ी में फेंक दीं. कुछ हड्डियां उस ने पालीथिन की थैली में भर कर ट्रेन से सफर के दौरान रास्ते में फेंक दी थी. उस का फोन भी उस ने तोड़ कर फेंक दिया था.

उधर गणेश विट्ठल कई दिनों से घर नहीं पहुंचा तो उस की बहन अनधा गोखले परेशान हो गई. उस ने भाई को फोन कर के बात करने की कोशिश की लेकिन उस का फोन बंद मिला. फिर वह 20 जनवरी को मीरा रोड के नया नगर थाने पहुंची और पिछले 4 दिनों से लापता चल रहे भाई गणेश विट्ठल की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

पुलिस ने किशन शर्मा से पूछताछ के बाद गणेश विट्ठल का सिर बरामद करने की कोशिश की लेकिन वह नहीं मिला. अंतत: जरूरी सबूत जुटाने के बाद हत्यारोपी किशन शर्मा को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.

10 टिप्स: जब पहली बार मिले गर्लफ्रेंड के माता-पिता से…

कई प्रेमी हैं, जो अपनी प्रेमिका के पेरैंट्स का सामना नहीं कर पाते. यही कारण है कि वे उन से मिलना टालते रहते हैं या इस से बचना चाहते हैं. वे अपनी प्रेमिका के पिता से मिलने के बजाय उस के साथ भाग कर शादी करना चाहते हैं, लेकिन प्रेमिका अपने पेरैंट्स की रजामंदी से शादी करना चाहती है. यदि आप अपनी प्रेमिका के पिता से उन की बेटी का हाथ मांगने जा रहे हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखें ताकि पहली मुलाकात में ही आप का अच्छा प्रभाव उन पर पड़े और वे आप के जवाब से संतुष्ट हो जाएं…

  1. पहली मुलाकात में ही लुभाएं…

आप की हरसंभव कोशिश होनी चाहिए कि पहली ही मुलाकात में उन्हें अपने पक्ष में कर पाएं. अपनी प्रेमिका के पिता से मुलाकात से पहले उन के स्वभाव या मिजाज के बारे में उस से पूछताछ कर लें. उन्हें किस तरह के लोग पसंद हैं, यह भी पूछ लें. आप उसी के अनुरूप अपना आचरण और व्यवहार रखें. इसी प्रकार उन की पसंद-नापसंद की भी जानकारी लें. वे किन मुद्दों पर बातचीत करना पसंद करते हैं. यदि यह सब आप को पहले से ही पता हो तो उन से बात करना आसान हो जाएगा और बातचीत रुचिकर भी होगी.

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2. मोबाइल को करे साइलेंट…

जब आप प्रेमिका के पेरैंट्स से पहली बार मिलने जाएं तो अपने मोबाइल को साइलैंट मोड पर डाल दें. बातचीत के दौरान बारबार मोबाइल की घंटी बजना बातचीत में व्यवधान पैदा करता है.

3. पहली मुलाकात में ही बड़बोले न बनें…

पहली मुलाकात में ही बड़बोले न बनें. न अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने की कोशिश करें. अपनी हैसियत बढ़ाचढ़ा कर पेश न करें. हकीकत में जो है, वही बताएं. यदि आप की आमदनी कम है, तो उसे बढ़ाने के लिए आप के दिमाग में क्या योजना है, उन्हें बताएं. यदि वर्तमान में आप बेरोजगार हैं, तो शादी के बाद परिवार कैसे चलाएंगे, इस बारे में भी उन्हें संतोषजनक जवाब दें ताकि उन्हें अपनी बेटी का हाथ आप के हाथ में देने में कोई परेशानी न हो.

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4. फर्स्ट इंप्रैशन इज द लास्ट इंप्रैशन

अंगरेजी में एक कहावत है, फर्स्ट इंप्रैशन इज द लास्ट इंप्रैशन. यदि पहला प्रभाव ही खराब हो गया तो बात आगे बढ़ने के बजाय वहीं खत्म हो जाएगी क्योंकि वे फिर आसानी से मानने वाले नहीं हैं. चूंकि वे एक पिता हैं, इस नाते उन्हें यह अधिकार है कि वे लड़के के बारे में पूर्ण तसल्ली और संतोष कर लें ताकि उन की बेटी को बाद में पछताना न पड़े.

5. टाइम पर पहुंचे

जब भी पहली मुलाकात फिक्स हो, नियत समय पर पहुंचने की कोशिश करें. लड़के या लड़की के पेरैंट्स को इंतजार कराना ठीक नहीं. अन्यथा यह संदेश जाएगा कि आप वक्त के पाबंद नहीं हैं. आप को उन के समय की कीमत समझनी चाहिए. यदि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से आप को पहुंचने में विलंब हो रहा हो, तो इस बारे में उन्हें अवश्य सूचित करें.

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6. पहली मीटिंग में ओवरस्मार्ट न बनें…

पहली मीटिंग में ओवरस्मार्ट बनने की कोशिश न करें और न ही दब्बू नजर आएं. उन्हें अपनी बेटी के लिए स्मार्ट लड़का चाहिए जो आधुनिक विचारों वाला हो और महिलाओं की इज्जत करता हो. आजकल लड़कियां भी जौब करना चाहती हैं, हो सकता है कि उस के पिता इस संबंध में आप के विचार जानना चाहें कि शादी के बाद आप उसे नौकरी करने देंगे या नहीं. इस बात का उत्तर स्पष्ट व सकारात्मक ही देना चाहिए.

7. पहनावे पर दें ध्यान…

आप को अपने पहनावे पर भी खास ध्यान देना चाहिए. पोशाक सौम्य होनी चाहिए, भड़कीली नहीं. मौसम के अनुकूल पोशाक हो तो बेहतर अन्यथा आप असहज ही रहेंगे.

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8. साफ-साफ करें बात

बातचीत करते समय यह ध्यान रहे कि आप को उन की बात सुननी है और उन के प्रश्नों के उत्तर देने हैं. प्रश्नों के जवाब सीधे और सपाट होने चाहिएं. घुमाफिरा कर जवाब देने की प्रवृत्ति ठीक नहीं.

9. रखे हर चीज की जानकारी

आप को धर्म, राजनीति, आध्यात्म, योग आदि के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि पहली बार की मीटिंग में इन्हीं सब बातों पर भी चर्चा हो सकती है. आप की बातों से आप का आत्मविश्वास झलकना चाहिए. यदि किसी मुद्दे पर विवाद होता दिखाई दे तो बात बदल देनी चाहिए.

(Edited By- Nisha Rai)

अपहरण

जनार्दन जिस समय अपनी कोठी पर पहुंचे, शाम के 6 बज रहे थे. उन्होंने बिना आवाज दिए बड़ी सहजता से दरवाजा बंद किया. ऐसा उन्होंने इसलिए किया था, ताकि लीना जाग न जाए. डाक्टर ने कहा था कि उसे पूरी तरह आराम की जरूरत है. आराम मिलने पर जल्दी स्वस्थ हो जाएगी. लेकिन अंदर पहुंच कर उन्होंने देखा कि लीना जाग रही थी. वह अंदर वाले कमरे में खिड़की के पास ईजीचेयर पर बैठी कोई पत्रिका पढ़ रही थी.

‘‘आज थोड़ी देर हो गई.’’ कह कर जनार्दन ने पत्नी के कंधे पर हाथ रख कर प्यार से पूछा, ‘‘अब तबीयत कैसी है?’’

लीना कोई जवाब देती, इस से पहले ही फोन की घंटी बजने लगी. जनार्दन ने रिसीवर उठा कर कहा, ‘‘जीनार्दन पांडेय…’’

दूसरी ओर से घुटी हुई गंभीर अस्पष्ट आवाज आई, ‘‘पांडेय… स्टेट बैंक के मैनेजर…?’’

‘‘जी आप कौन?’’ जनार्दन पांडे ने पूछा.

‘‘यह जानने की जरूरत नहीं है मि. पांडेय. मैं जो कह रहा हूं, ध्यान से सुनो, बीच में बोलने की जरूरत नहीं है.’’ फोन करने वाले ने उसी तरह घुटी आवाज में धमकाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी बेटी मेरे कब्जे में है. इसलिए मैं जैसा कहूंगा, तुम्हें वैसा ही करना होगा. थोड़ी देर बाद मैं फिर फोन करूंगा, तब बताऊंगा कि तुम्हें क्या करना है.’’

दूसरी ओर से फोन कट गया. जनार्दन थोड़ी देर तक रिसीवर लिए फोन को एकटक ताकते रहे. एकाएक उन की मुखाकृति निस्तेज हो गई. पीछे से लीना ने पूछा, ‘‘किस का फोन था?’’

जनार्दन ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘कोई खास बात नहीं थी.’’

जनार्दन पत्नी से सच्चाई नहीं बता सकते थे. क्योंकि उस की तबीयत वैसे ही ठीक नहीं थी. यह सदमा सीधे दिमाग पर असर करता. इस से मामला और बिगड़ जाता. जनार्दन रिसीवर रख कर पूरे घर में घूम आए, सैवी कहीं दिखाई नहीं दी. उन्होंने पत्नी से पूछा, ‘‘सैवी घर में नहीं है, लगता है पार्क में खेलने गई है?’’

‘‘हां, आप के आने से थोड़ी देर पहले ही निकली है,’’ लीना खड़ी होती हुई बोली, ‘‘मैं ने तो चाय पी ली है, आप के लिए बनाऊं?’’

जनार्दन ने चाय के लिए मना कर दिया. घड़ी पर नजर डाली, सवा 6 बज रहे थे. उन्होंने कहा, ‘‘अभी नहीं, थोड़ी देर बाद चाय पिऊंगा. अभी एक आदमी से मिल कर उस के एक चैक के बारे में पता करना है.’’

दरवाजा खोलते हुए उन के दिमाग में एक बात आई तो उन्होंने पलट कर लीना से पूछा, ‘‘इस के पहले तो मेरे लिए कोई फोन नहीं आया था?’’

‘‘नहीं, फोन तो नहीं आया.’’ लीना ने कहा.

जनार्दन ने राहत की सांस ली. लेकिन इसी के साथ ध्यान आया कि अगर सैवी के अपहरण का फोन पहले आया होता, तो घर में हड़कंप मचा होता. वह सोचने लगे कि इस मामले से कैसे निपटा जाए. उन्हें लगा कि कहीं बैठ कर शांति से विचार करना चाहिए.

वह घर से बाहर निकले और सोसाइटी के बाहर बने सार्वजनिक पार्क में फव्वारे के पास बैठ कर सोचने लगे. उन्हें लगा कि सैवी के अपहरण की योजना बहुत सोचसमझ कर बनाई गई थी. उस ने फोन भी मोबाइल के बजाए लैंडलाइन पर किया. क्योंकि मोबाइल पर नंबर आ जाता और वह पकड़ा जाता.

शायद उसे हमारे घर का नंबर ही नहीं, यह भी पता है कि हमारे फोन में कौलर आईडी नहीं है. अपहर्त्ता न जाने कब से सेबी के अपहरण की योजना बना रहे थे. योजना बना कर ही उन्होंने आज का दिन चुना होगा. आज बैंक की तिजोरी में पूरे 80 लाख की रकम रखी है.

लगता है, अपहर्त्ताओं को कहीं से इस की जानकारी मिल गई होगी. यह भी संभव है कि आज इतने रुपए आना और सैवी का अपहरण होना, महज एक संयोग हो. अगर यह संयोग नहीं है, तो इस अपहरण में बैंक का कोई कर्मचारी भी शामिल हो सकता है?

यह बात दिमाग में आते ही जनार्दन का मूड खराब हो गया. वह सोचने लगे कि बैंक का कौन सा कर्मचारी ऐसा कर सकता है. तभी उन्हें लगा कि मूड खराब करना ठीक नहीं है. मूड ठीक रख कर शांति से सोचनाविचारना चाहिए. अपहर्त्ताओं के चंगुल में फंसी बेटी और लीना की बीमारी को भूल कर गंभीरता से विचार करना चाहिए. वह बैंक के एकएक कर्मचारी के बारे में सोचने लगे कि उन में कौन अपहर्त्ता हो सकता है या कौन मदद कर सकता है. उन्हें लगा कि मोटे कांच का चश्मा लगाने वाला चीफ कैशियर उन की मदद कर सकता है.

जनार्दन पांडेय अपने कर्मचारियों में बिलकुल प्रिय नहीं थे. पीछेपीछे उन्हें सभी ‘जनार्दन….’ कहते थे. इस की वजह यह थी कि वह छोटीछोटी बातों पर सभी से सतर्क रहने को कहते थे और जरा भी गफलत बरदाश्त नहीं करते थे.

वह झटके से उठे, क्योंकि उन के पास समय कम था. घटना कैसे घटी, इस के बारे में जानकारी जुटाना जरूरी थी. फिर दूसरे फोन का भी इंतजार करना था. अगर फोन आ गया और उन की गैरमौजूदगी में लीना ने फोन उठा लिया, तो…तभी उन्हें लगा कि एक बार वह पार्क में घूम कर सैवी को देख लें.

उन्होंने पार्क में खेल रहे बच्चों पर नजर डाली, सैवी दिखाई नहीं दी. फोन पर घुटी हुई अस्पष्ट आवाज सुनाई दी थी. ऐसा लग रहा था, जैसे आवाज को दबा कर बदलने की कोशिश की जा रही हो. शायद रिसीवर पर कपड़ा रख कर अस्पष्ट बनाने की कोशिश की गई थी. लेकिन उस का कहने का ढंग जानापहचाना लग रहा था.

उस समय जनार्दन याद नहीं कर पाए कि वह आवाज किस की हो सकती थी. जनार्दन के घर में कदम रखते ही फोन की घंटी बज उठी. यह संयोग था या उन पर कोई नजर रख रहा था कुछ भी हो सकता था. फोन कहीं आसपास से ही किया जा रहा था और फोन करने वाले को अपनी आवज पहचाने जाने का डर था, इसीलिए वह अपनी आवाज को छिपा रहा था. जनार्दन ने लपक कर फोन उठा लिया. उन के कुछ कहने के पहले ही दूसरी ओर से पहले की ही तरह कहा गया, ‘‘बेटी को सब जगह देख लिया न? अब मेरी बात पर विश्वास हो गया होगा. खैर, मेरे अगले फोन का इंतजार करो.’’

फोन की घंटी सुन कर लीना भी कमरे में आ गई थी. जनार्दन के फोन रखते ही उस ने पूछा, ‘‘किस का फोन था? आप का काम हो गया?’’

पहले सवाल के जवाब को गोल करते हुए जनार्दन ने कहा, ‘‘वह आदमी घर में नहीं था. अभी फिर जाना होगा.’’

कह कर जनार्दन ने बाहर जाने का बहाना बना दिया.

‘‘मैं चाय बनाए देती हूं. चाय पी कर जाना.’’ लीना ने कहा. लीना बीमार थी, लेकिन घर के काम करती रहती थी.

जनार्दन ने बाथरूम में जा कर ठंडे पानी से मुंह धोया. मन में उथलपुथल मची थी. फोन पड़ोस के मकान से हो सकता है या फिर ऐसी जगह से, जहां से उन के घर पर ठीक से नजर रखी जा सकती थी. उन्हें पूरी संभावना थी कि ये फोन उन्हीं की सोसाइटी के किसी मकान से आ रहे थे.

जनार्दन ने बाथरूम से बाहर आ कर ड्राइंगरूम की खिड़की खोली. सिर बाहर निकाल कर इधरउधर देखा. उस गली में कुल 12 मकान थे. 6 एक तरफ और 6 दूसरी तरफ. उन के मकान के बाईं ओर एक मकान था. जबकि दाहिनी ओर 4 मकान थे. उस के बाद पार्क था. उसी तरह सामने की लाइन में 6 मकान थे. पार्क के आगे वाले हिस्से में माली का क्वार्टर था. उसी के सामने एक दुकान थी. इस इलाके में घर के रोजमर्रा के सामानों की वही एक दुकान थी.

कालोनी के अन्य 11 मकानों में रहने वालों को जनार्दन अच्छी तरह जानते थे. उन्हें लगता नहीं था कि इन लोगों में कोई ऐसा काम कर सकता है. दुकान का मालिक पंडित अधेड़ था. उसे भी जनार्दन अच्छे से जानते थे. उन्हें पूरा विश्वास था कि पंडित इस तरह का काम कतई नहीं कर सकता. चाय पी कर वह बाहर निकलने लगे तो लीना ने कहा, ‘‘सैवी अभी तक नहीं आई. जाते हुए जरा उसे भी देख लेना.’’

‘‘आ जाएगी. अभी तो कालोनी के सभी बच्चे खेल रहे हैं. और हां, खाना खाने की इच्छा नहीं है, इसलिए खाना थोड़ा देर से बनाना.’’

लीना ने जनार्दन के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ‘‘आज तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘आज काम थोड़ा ज्यादा था, इसलिए भूख मर सी गई है.’’ जनार्दन ने सफाई दी तो लीना बोली, ‘‘इस तरह काम करोगे, तो कैसे काम चलेगा.’’

खिड़की से हवा का झोंका आया. उस में ठंडक थी. नहीं तो पूरे दिन आकाश से लू बरसी थी. पत्थर को भी पिघला दे, इस तरह की लू जनार्दन सैवी के बारे में सोच रहे थे. बदमाशों ने उसे न जाने कहां छिपा रखा होगा? उस के हाथपैर बांध कर इस भीषण गर्मी में कहीं फर्श पर फेंक दिया होगा. जनार्दन का मन द्रवित हो उठा और आंखें भर आईं.

‘‘मैं जरा चैक के इस बारे में पता कर लूं.’’ दूसरी ओर मुंह कर के जनार्दन घर से बाहर आ गए. गली सुनसान थी. वह पंडित की दुकान पर जा कर बोले, ‘‘कैसे हो पंडितजी, आज इधर कोई अनजान आदमी तो दिखाई नहीं दिया?’’

पंडित थोड़ी देर सोचता रहा. उस के बाद हैरान सा होता हुआ बोला, ‘‘नहीं साहब, कोई अनजान आदमी तो नहीं दिखाई दिया.’’ इस के बाद उस ने मजाक किया, ‘‘बैंक मैनेजर अब नौकरी बचाने के लिए खातेदारों की तलाश करने लगे हैं क्या?’’

पंडित के इस मजाक का जवाब दिए बगैर जनार्दन आगे बढ़ गए. वह पलट कर चले ही थे कि पंडित के दुकान में लगे फोन की घंटी बजी. पंडित ने रिसीवर उठाया, उस के बाद हैरानी से बोला, ‘‘अरे पांडेजी, आप का फोन है. ताज्जुब है, फोन करने वाले को यह कैसे पता चला कि आप यहां हैं?’’

जनार्दन ने फुर्ती से पंडित के हाथ से रिसीवर ले कर कहा, ‘‘हैलो.’’

वही पहले वाली जानीपहचानी घुटी हुई अस्पष्ट आवाज, ‘‘पांडेजी आप अपनी बेटी को जीवित देखना चाहते हैं, तो मैं जैसा कहूं, वैसा करो. देख ही रहे हो. आजकल एक्सीडेंट बहुत हो रहे हैं, आप की बेटी का भी हो सकता है. याद रखिएगा 9 बजे.’’

‘‘मुझे पता कैसे चलेगा…?’’ जनार्दन ने कहा. लेकिन उन की बात सुने बगैर ही अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. उन्होंने तुरंत रिसीवर रख दिया और उत्सुकता की उपेक्षा कर के आगे बढ़ गए.

अब उन्हें 9 बजे का इंतजार करना था. वह परेशान हो उठे. इतनी देर तक वह अपना क्षोभ और सैवी के अपहरण की बात कैसे छिपा पाएंगे. क्योंकि घर पहुंचते ही लीना बेटी के बारे में पूछने लगेगी. उन्हें लगा लीना को सच्चाई बतानी ही पड़ेगी. यही सोचते हुए वह कालोनी के गेट की ओर बढ़े. तभी उन्होंने देखा, कालू माली 2 बच्चों को गालियां देते हुए दौड़ा रहा था.

शायद उन्होंने फूल तोड़ लिए थे. गेट के बाहर आते ही एक बच्चा सड़क पर गिर पड़ा. भयंकर गर्मी से सड़क का पिघला तारकोल अभी ठंडा नहीं पड़ा था. वह बच्चे के घुटने में लग गया तो वह कुछ उस से और कुछ कालू माली के डर से रोने लगा. बड़बड़ाता हुआ कालू उस की ओर दौड़ा. उस ने बच्चे को उठा कर खड़ा किया और उस के घुटने में लगा तारकोल अपने अंगौछे से साफ कर दिया. तारकोल पूरी साफ तो नहीं हुआ फिर भी बच्चे को सांत्वना मिल गई. उस का रोना बंद हो गया.

कालू अपना अंगौछा रख कर खड़ा हुआ, तब तक जनार्दन उस के पास पहुंच गए. उन्हें देख कर वह जानेपहचाने अंदाज में मुसकराया. जनार्दन ने पूछा, ‘‘कालू, इधर कोई अनजान आदमी तो नहीं दिखाई दिया?’’

‘‘नहीं साहेब, अनजान पर तो मैं खुद ही नजर रखता हूं. आज तो इधर कोई अनजान आदमी नहीं दिखा.’’

जनार्दन घर की ओर बढ़े. अब 9 बजे तक इंतजार करने के अलावा उन के पास कोई दूसरा चारा नहीं था. वह जैसे ही घर पहुंचे, फोन की घंटी बजी. जनार्दन चौंके. अपहर्त्ता ने तो 9 बजे फोन करने को कहा था. फिर किस का फोन हो सकता है. कहीं अपहर्त्ता का ही फोन तो नहीं, यह सोच कर उन्होंने लपक कर फोन उठा लिया.

उन के ‘हैलो’ कहते ही इस बार अपहर्त्ता ने कुछ अलग ही अंदाज में कहा, ‘‘मैं ने 9 बजे फोन करने को कहा था. लेकिन 9 बजे फोन करता, तो आप के पास मेरी योजना को साकार करने के लिए समय कम रहता. इसलिए अभी फोन कर रहा हूं. मेरी बात ध्यान से सुनो, जैसे ही बात खत्म हो, कार से बैंक की ओर चल देना.

‘‘बैंक के पीछे वाले दरवाजे से अंदर जाना और उसे खुला छोड़ देना. गार्ड को कहना वह आगे ही अपनी जगह बैठा रहे. तुम तिजोरी वाले स्ट्रांगरूम में जाना और तिजोरी खुली छोड़ देना. तिजोरी और स्ट्रांगरूम का दरवाजा खुला छोड़ कर तुम जा कर अपने चैंबर में बैठ जाना.

चैंबर का दरवाजा अंदर से बंद कर के साढ़े 10 बजे तक वहीं बैठे रहना. उस के बाद तुम्हें जो करना हो करना, मेरी ओर से छूट होगी.’’

‘‘और उस की सलामती का क्या?’’ जनार्दन ने लीना के आगे सैवी का नाम लिए बगैर पूछा, ‘‘मुझे कैसे विश्वास हो कि उस का कुछ…’’

अपहर्त्ता ने जनार्दन को रोक लिया, ‘‘मैं तुम्हें एक बात की गारंटी दे सकता हूं. अगर हमारी योजना में कोई खलल पड़ी, हमारे कहे अनुसार न हुआ या हमें रात 11 बजे तक पैसा ले कर शहर के बाहर न जाने दिया गया, तो तुम अपनी बेटी को जीवित नहीं देख पाओगे.’’

जनार्दन का कलेजा कांप उठा. उन्होंने स्वयं को संभाल कर कहा, ‘‘तुम जो कह रहे हो, यह सब इतना आसान नहीं है. तिजोरी में 2 चाभियां लगती हैं, एक चाभी मेरे पास है, तो दूसरी हमारे चीफ कैशियर राजकुमार के पास.’’

‘‘मुझे पता है. इसीलिए तो अभी फोन किया है और कार ले कर चल देने को कह रहा हूं. राजकुमार से मिलने का अभी तुम्हारे पास पर्याप्त समय है. उस से कैसे चाभी लेनी है. यह तुम्हारी जिम्मेदारी है.’’

‘‘अगर वह घर में न हुआ तो…?’’

‘‘वह घर में ही है,’’ उस ने कहा, ‘‘मैं ने इस बारे में पता कर लिया है. नहीं भी होगा तो फोन कर के बुला लेना.’’ कहते हुए उस ने फोन काट दिया.

रिसीवर रखते हुए जनार्दन का हाथ कांप रहा था. लीना ने पूछा, ‘‘यह सब क्या है? तिजोरी की चाभी की क्या बात हो रही थी?’’

‘‘अरे उसी चैक की बात हो रही थी,’’ जनार्दन ने सहमी आवाज में कहा, ‘‘मुझे अभी बाहर जाना होगा. थोड़ी परेशानी खड़ी हो गई है, लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है.’’

‘‘सेवी अभी तक नहीं आई है. जाते समय उसे घर भेज देना. बहुत खेल लिया.’’

सैवी का नाम सुनते ही जनार्दन का दिल धड़क उठा. उन्होंने घर से बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘ठीक है, भेज दूंगा.’’

जनार्दन ने कार निकाली. थोड़ी देर स्टीयरिंग पर हाथ रखे चुपचाप बैठे रहे. अपहर्त्ता की बात मानना उन की मजबूरी थी. उन्होंने समय देखा, राजकुमार शहर के दूसरे छोर पर रहता था. शाम के ट्रैफिक में आनेजाने में कितना समय लग जाए, कहा नहीं जा सकता. उन्हेंने उसे फोन कर के चाबी के साथ बैंक में ही बुलाने की सोची.

असहाय क्रोध की एक सिहरन सी पूरे शरीर में दौड़ गई. लेकिन उस समय शांति और धैर्य की जरूरत थी. उन्होंने बड़ी मुश्किल से क्रोध पर काबू पाया. घर से तो राजकुमार को फोन किया नहीं जा सकता था. मोबाइल फोन भी वह घर पर ही छोड़ आए थे. जिस से लीना फोन करे, तो पता चले कि फोन तो घर पर ही रह गया है. उस स्थिति में वह न उन के बारे में पता कर पाएगी, न सैवी के बारे में.

अब तक के वैवाहिक जीवन में उन्हें इस तरह कभी दोबारा बैंक जाने की जरूरत नहीं पड़ी थी. आज चैक के नाम पर वह लीना को बेवकूफ बना रहे थे. राजकुमार को तिजोरी की चाभी ले कर आने को कहते हैं, तो लीना समझ जाएगी कि जरूर कोई गड़बड़ है. उसे इस हालत में चिंता में डालना ठीक नहीं है.

उन्हें लगा कि फोन कर के लीना को बता दें कि सैवी उन के साथ है. इस से लीना उस के लिए परेशान नहीं होगी. रात में वह लौटेंगे, तो सैवी उन के साथ होगी. जनार्दन ने गाड़ी आगे बढ़ाई. कालोनी से बाहर आ कर उन्होंने पार्क के पास सड़क के किनारे कार रोक दी. दुकान पर काफी भीड़भाड़ थी, इसलिए वहां से उन्होंने फोन करना ठीक नहीं समझा. उन्होंने पार्क की ओर देखा, कालू माली गेट पर खड़ा सिगरेट पी रहा था. उस की निगाहें उन्हीं पर जमी थीं.

पार्क में खेलने वाले बच्चे अपनेअपने दादीदादा या मम्मियों के साथ चले गए थे या जा रहे थे. जनार्दन पार्क की ओर बढ़े. उन्हें अपनी ओर आते देख मुंह से सिगरेट का धुआं उगलते हुए कालू ने पूछा, ‘‘कोई काम है क्या साहब?’’

‘‘मेरी थोड़ी मदद करो कालू. मैं मोबाइल घर में भूल आया हूं. लौट कर जाऊंगा तो समय लगेगा. मुझे जल्दी से कहीं पहुंचना है. एक जरूरी फोन करना था. पार्क के फोन से एक फोन कर लूं?’’

कालू ने सिगरेट का एक लंबा कश लिया और मुंह से सिगरेट हटा कर धुआं उगलते हुए कहा, ‘‘क्या बात करते हैं साहब, यह भी कोई पूछने की बात है? आप का काम मेरा काम. यह फोन सरकार ने आप लोगों के लिए ही तो लगवाया है. फोन कमरे में मेज पर रखा है. जाइए, कर लीजिए.’’

पार्क के गेट के पास ही बाईं ओर 2 कमरों का एक छोटा सा बरामदे वाला मकान था. वही कालू का घर, औफिस स्टोर सब कुछ था. आगे वाले कमरे में कोने में रखी एक छोटी सी मेज पर फोन रखा था. पास ही टूटी हुई मूर्ति रखी थी. जनार्दन को याद आया, जब पार्क में फव्वारा बना था, तब उस में यही मूर्ति लगी थी. लेकिन कुछ ही दिनों में मूर्ति को बच्चों ने तोड़ दिया था.

जनार्दन को लगा, मूर्ति मेज के पीछे ठीक से नहीं रखी थी. स्वभाववश छोटीछोटी बातों का ध्यान रखने वाले जनार्दन ने मूर्ति को उठा कर ठीक से रखा. मूर्ति को ठीक करने के बाद उन्होंने फोन करने के लिए जैसे ही रिसीवर उठाया, उन्हें झटका सा लगा. रिसीवर को गौर से देखा, उस पर उन्हें कालेकाले दाग दिखाई दिए. वह सोच में डूब गए. उन्हें कुछ याद आने लगा, जिसे वह रिसीवर से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे.

अचानक दिमाग में बिजली सी कौंधी. समस्या के सारे समाधान अपने आप अपनीअपनी जगह फिट होते चले गए. एक ही झटके में उन की समझ में आ गया कि सैवी का अपहरण कोई देख क्यों नहीं सका. उन्हें विश्वास हो गया कि सैवी के अपहरण के किए गए फोनों से आने वाली आवाज कालू की थी. इस का मतलब सैवी को यहीं कहीं होना चाहिए. माली ने अपने इसी मकान में उसे कहीं छिपा रखा होगा.

मारे गुस्से के जनार्दन का शरीर कांपने लगा. लेकिन उन्होंने तुरंत अपने गुस्से को काबू में किया. दिमाग शांत और तीक्ष्ण बन गया. आखिर एक बैंकर का दिमाग था. वह जानते थे कि पहलवानी वाले शरीर का मालिक कालू काफी ताकतवर था. अब तक पार्क में सिर्फ कुछ बुजुर्ग और 2-4 महिलाएं बची थीं. वहां ऐसा कोई नहीं था जो कालू को रोक पाता, इसलिए जनार्दन कुछ ऐसा करना चाहते थे कि कालू भाग न सके. यही सोच कर उन्होंने आराम से रिसीवर रख दिया और मेज के पीछे रखी कांसे की मूर्ति उठा ली.

मूर्ति के वजन का अंदाजा लगा कर जनार्दन ने तुरंत कालू पर हमले की योजना बना ली. कालू पार्क की ओर मुंह किए बरामदे में खड़ा था. जनार्दन दबे पांव फुर्ती से 3 कदम आगे बढ़े और कालू की गर्दन पर मूर्ति का तेज प्रहार कर दिया. एक ही वार में कालू जमीन पर गिरा और बेहोश हो गया. जनार्दन ने तुरंत वहां पेड़ों को बांधने के लिए रखी प्लास्टिक की रस्सी उठाई और पीछे कर के उस के देनों हाथ बांधने लगे. कालू की चीख सुन कर पार्क में बैठे बुजुर्ग और टहल रही महिलाएं वहां आ गईं. लेकिन तब तक जनार्दन कालू के हाथ बांध चुके थे.

उन लोगों से शांति से खड़े रहने को कह कर जनार्दन कालू के क्वार्टर में घुसे. पीछे के बंद कमरे में पड़ी चारपाई पर सैवी पड़ी थी. उस के मुंह पर कपड़ा बंधा था. उस भीषण गर्मी में अंदर का पंखा भी बंद था. जनार्दन ने जल्दी से मुंह पर बंधा कपड़ा खोला और बेटी को सीने से लगा कर बाहर आ गए.

जनार्दन के साथ पसीने से लथपथ उन की बेटी को देख कर लोग हैरान रह गए. रोने से सैवी की आंखों से बहे आंसुओं की लाइन गालों पर साफ नजर आ रही थी. सैवी को देख कर सभी समझ गए कि मामला क्या था.

पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया गया, कंट्रोल रूम की जीप पास में ही कहीं थी, 5 मिनट में आ गई. अब तक कालू को होश आ गया था. जनार्दन की गोद में सैवी को और पुलिस को देख कर वह समझ गया कि उस की पोल खुल चुकी है. थोड़ी देर में कंट्रोल रूम से सूचना पा कर थाना पुलिस भी आ गई. कालू को हिरासत में ले कर थानाप्रभारी ने जनार्दन से पूछा, ‘‘आप को कैसे पता चला कि आप की बेटी का अपहरण कालू ने किया है?’’

बेटी की पीठ सहलाते हुए जनार्दन ने कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, मैं यहां फोन करने न आया होता तो कालू की करतूत का पता न चलता. अपहर्त्ता मेरे आसपास ही है, इस बात का अंदाजा तो मुझे पहले ही हो गया था. लेकिन थोड़ी देर पहले एक घटना घटी थी, जिस की वजह से कालू पकड़ा गया.

‘‘शाम को एक बच्चे के घुटने में लगा सड़क का तारकोल कालू ने अपने अंगौछे से पोंछा था. उस के बाद इस ने मुझे फोन किया, इस ने अपनी आवाज बदलने के लिए रिसीवर पर अंगौछा रखने की युक्ति अपनाई थी. उसी समय इस के अंगोछे का तारकोल रिसीवर में लग गया होगा. वही दाग मैं ने रिसीवर पर देखा तो समझ गया कि जिस अंगोछे से बच्चे के घुटने का तारकोल साफ किया गया था, वही अंगोछा इस रिसीवर पर रखा गया था, जिस का तारकोल इस में लग गया है.’’

पुलिस कालू को पकड़ कर ले जाने लगी तो सैवी ने कहा, ‘‘डैडी, अब आप हमें पार्क में खेलने के लिए कभी नहीं आने देंगे?’’

‘‘क्यों नहीं आने देंगे बेटा,’’ जनार्दन ने बेटी का गाल चूमते हुए कहा, ‘‘बिलकुल आने दूंगा. बेटा हर आदमी कालू की तरह खराब नहीं होता. और जो खराब होता है, वह कालू की तरह जेल जाता है.’’

बेटी के अपहरण और बरामद होने की जानकारी लीना को हुई तो उस ने बेटी को सीने से लगा कर अपना सिर जनार्दन के कंधे पर रख दिया, ‘‘इतना बड़ा संकट आप ने अकेले कैसे झेल लिया. बेटी को मिलने में देर होती तो क्या करते?’’

‘‘कह देता कि वह मेरे साथ है. मैं जरूरी काम से बैंक में हूं. वह मिल जाती, मैं तभी घर लौटता.’’ जनार्दन ने लीना का सिर सहलाते हुए कहा.

अस्वच्छ भारत

हिंदुस्तान के कई शहरों को दुनिया के सबसे ज्यादा गंदे शहरों में शामिल किया गया है. वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन ने 6 वर्षों तक 1,600 शहरों में सर्वे किया है जिन में सफाई व स्वास्थ्य के पैमानों पर दुनिया के शहरों को सब से गंदे व सब से साफ शहरों का क्रम दिया गया है. यह गर्व की ही बात है न, कि स्वच्छ भारत का नारा देने वाले, स्वयं झाड़ू पकड़ने वाले, सफाईकर्मचारियों को साफ कपड़े पहना कर उन के पांव साफ परात में धोने वाले नरेंद्र मोदी का 5 वर्षों से अपना शहर दिल्ली दुनिया का सब से गंदा, प्रदूषित शहर घोषित किया गया है.

साफ है कि मोदी का स्वच्छ भारत अभियान झाड़ू ले कर फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रहा. दूसरे नंबर का शहर पटना है, गंगा के किनारे वाला नीतीश कुमार और मोदी की जोड़ी  का शहर. फिर इथियोपिया का अदीस अबीबा है. उस के बाद ग्वालियर है, फिर रायपुर. मैक्सिको भी गंदे शहरों में है. कराची, पेशावर और रावलपिंडी,  (पाकिस्तान), खुर्रमाबाद (ईरान), ऊंटानरीवो (मेडागास्कर) के बाद हमारा अपना मुंबई, फिर साबरमती के संत का अहमदाबाद, योगी आदित्यनाथ का लखनऊ हैं. और फिर ढाका (बंगलादेश), बाकू (अजरबैजान) हैं.

हमारी गंदगी की वजह क्या है, यह हम जानने की कोशिश ही नहीं करते. हां, नारे लगाना हम जरूर जानते हैं. ज्यादा हुआ तो इंग्लिश के  अखबारों में क्लीन इंडिया के पूरे पेज के विज्ञापन नरेंद्र मोदी या अरविंद केजरीवाल के फोटो छाप कर दे देंगे. ओम शांति के पाठ की तरह हम सोचते हैं कि सफाई हो. सफाई हो कहने भर से क्या सफाई हो जाएगी?

असलियत यह है कि हमें आदत है कि हमारी सफाई वे दलित करेंगे जो बेहद गंदगी में, गंदे नालों व घास, गंदी झुग्गियों में, बदबूदार माहौल में रहेंगे. उन्हें न नई झाड़ू दी जाती है, न नई कूड़ा उठाने वाली रेडि़यां ही दी जाती हैं.

हमारे अच्छेभले, चमचमाते रैस्तरां के पीछे जा कर देखें, आप को मक्खियां भिनभिनाती मिलेंगी और वहां बदबू होगी. सब्जी मंडियों में बदबू का जोरदार भभका मिलेगा. ज्यादातर घरों में अगरबत्ती की महक के साथ सड़े खाने की बदबू भी मिलेगी. साफसफाई करना तो हमारे खून में है ही नहीं.

5 वर्षों से शौचालयशौचालय का हल्ला सुना, पर दिल्ली जैसे शहर में मूत्रालय भी ढूंढ़ना हो तो जोर से सांस लें तो अपनेआप या कोई बदबूदार कोना मिलेगा या गनीमत हुई तो टूटीफूटी सफेद टाइलों वाली गंदी बालटीनुमा जगह. प्रधानमंत्री कार्यालय के इर्दगिर्द एक किलोमीटर का इलाका भी साफ नहीं है. उलटे वह इलाका, जहां से प्रधानमंत्री, मंत्री, अफसर रोज गुजरते हैं, साफ नहीं है, तो क्या साफ होगा?

चलिए, सफाई यज्ञ करते हैं, सफाई रथयात्रा निकालते हैं, सफाई स्नान करते हैं, सफाई पूजा करते हैं. सब में पंडों को पैसा देंगे. वास्तविक सफाई करने वालों को दूर रखेंगे क्योंकि हम दलितों के साथ कैसे बैठ सकते हैं?

5 टिप्स: स्किन के लिए चाय है एक अच्छा ब्यूटी प्रोडक्ट

रोजाना लोग चाय जरूर पीते हैं. चाहे वह काम करते समय हो या खाना खाते समय, पर क्या आपको पता है चाय जितना आपको रिलेक्स करती है उतना ही चाय की पत्ती स्किन को फायदा पहुंचाती है. चाय की पत्त‍ियां एक अच्छा ब्यूटी प्रोडक्ट हैं, जिसका इस्तेमाल न केवल स्किन को ब्यूटीफुल बनाने के लिए किया जाता है, बल्क‍ि ये बालों को हेल्दी रखने के लिए भी बहुत इफेक्टिव होता है. चाय की पत्तियों में एंटी-औक्सीडेंट पाया जाता है. इसके अलावा इसमें एंटी एजिंग जैसे गुण पाए जाते हैं. जो ब्यूटी से जुड़ी प्रौब्लम्स से छुटकारा दिलाता है.

  1. गरमी में रूखे और बेजान बालों के लिए

बालों में शाइन लाने के लिए आप ग्रीन टी या ब्लैक टी बैग्स का इस्तेमाल कर सकती हैं. इसके लिए एक बर्तन में पानी उबालते समय कुछ टी-बैग्स भी डाल दें. 15 मिनट तक उबालने के बाद ठंडा होने के लिए रख दें. बालों में शैंपू करने के बाद चाय पत्ती के पानी को बालों में लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें. इसके बाद किसी माइल्ड शैंपू से बालों को धो लें. आपको एक वौश में ही बालों में फर्क दिखने लगेगा.

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  1. चाय की पत्ती से सनबर्न की परेशानी से बचें

अगर आपको सनबर्न दूर करने का कोई सही तरीका समझ नहीं आ रहा है तो एक बार टी-बैग्स का इस्तेमाल करके देखें. कुछ टी-बैग्स लेकर ठंडे पानी में डुबो दें और उन्हें हल्के हाथों से दबाकर चेहरे पर रखकर कुछ देर के लिए लेट जाए. इससे आपकी सनबर्न की प्रौब्लम से आपको छुटकारा मिल जाएगा.

  1. कोई कीड़ा काट ले तो चायपत्ती है इफेक्टिव

कई बार ऐसा होता है कि पार्क में जाने पर हमें कोई कीडा काट लेता है, जिससे लाल कलर के निशान पड़ जाता है. चाय की पत्त‍ियों का ये फार्मूला आप किसी भी कीट के काटने पर अपना सकते हैं. वो चाहे मच्छर ही क्यों न हो. इफेक्ट‍िव जगह पर ठंडे टी-बैग्स रखने से आपको बहुत जल्दी फायदा होता है.

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  1. डार्क सर्कल को दूर करेगी चायपत्ती

देर तक काम करने या नीद न आने की वजह से आपकी आंखों के नीचे डार्क सर्कल हो गए हैं या फिर आपकी आंखें पफी-पफी रहती हैं तो भी ठंडे टी-बैग्स का इस्तेमाल करना आपके लिए फायदेमंद रहेगा. इसमें मौजूद कैफीन आंखों के नीचे के डार्क सर्कल को दूर करने में मदद करता है.

  1. पैरों की बदबू दूर करने के लिए

रोजाना सुबह से शाम तक अगर आप जूते पहन कर रखते हैं तो आपके पैरों से बदबू आती है तो भी चाय पत्ती का इस्तेमाल करना असरदार रहेगा. चाय की पत्त‍ियों को पानी में डालकर उबाल लें. जब ये पानी ठंडा हो जाए तो इसे किसी टब में डाल दें. पैरों को कुछ देर तक इसमें डुबोकर रखें. ऐसा करने से पैरों की बदबू दूर हो जाएगी.

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खीरा खाने से पहले इसके नुकसान के बारे में जान लें

गरमी आते ही ठंडे खाद्य पदार्थों की खपत अधिक हो जाती है. लोग ऐसे फलों और सब्जियों का सेवन अधिक कर देते हैं जो पेट को ठंडक देते हैं, ऐसे ही फलों में से एक है खीरा. खीरा ना सिर्फ पेट के लिए अच्छा होता है बल्कि इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्व हमारी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं. पर ऐसा नहीं है कि खीरा खाने के केवल फायदे ही हैं, इसके बहुत से नुकसान भी हैं जिनके बारे में हम आपको बताने वाले हैं.

तो आइए शुरू करें.

जिन लोगों को साइनसाइटिस की बीमारी होती है उन्हें खीरे से परहेज की सलाह दी जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि खीरे की तासीर ठंडी होती है.  ऐसे में अगर साइनसाइटिस से पीड़ित लोग इसका सेवन करेंगे तो उनकी समस्या बढ़ सकती है.

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आमतौर पर गर्भवती महिलाओं को खीरा खाने की सलाह दी जाती है पर जरूरत से अधिक खीरा खाने से उन्हें बार बार टौयलेट जाना पड़ता है. किसी गर्भवती महिला के लिए बार बार टौयलेट जाना काफी असुविधा भरा काम होता है.

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अगर आप खीरे का ज़्यादा मात्रा में सेवन करते हैं तो आपका पेट भरा हुआ महसूस होता है. खीरा फाइबर का अच्छा स्रोत है लेकिन ज्यादा खाने से आपको डकारें आ सकती हैं.

posted by Shubham

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