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सरोगेसी विधेयक : संस्कारी छाया से अभी भी मुक्त नहीं हुआ?

हम भारतीय इस मामले में बड़े पाखंडी हैं कि हमें सुविधाएं तो हर किस्म की चाहिए.लेकिन वे संस्कार या नैतिकता के लबादे से ढकी भी हों. यह तथाकथित संस्कार या नैतिकता वास्तव में शोषण का एक चोर दरवाजा होता है.कमर्शियल सरोगेसी यानी किराय पर कोख पर प्रतिबंध का अनुमोदन करने वाली  संसदीय तदर्थ समिति की सिफारिशों में भी इसकी मौजूदगी देखी जा सकती है.हालांकि सरोगेसी (नियमन) विधेयक 2019 पहले के मुकाबले काफी बेहतर है.इसकी मौजूदा सिफारशें इस प्रकार हैं-

  • न केवल ‘करीबी रिश्तेदार’ को बल्कि किसी भी ‘इच्छुक महिला’ को सरोगेट मां बनने दिया जाये.
  • कोख किराये पर लेने से पहले पांच वर्ष की प्रतीक्षा अवधि पूरी की जाय.
  • 35 से 45 वर्ष की सिंगल व तलाकशुदा महिला तथा भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ) को भी सरोगेसी की सुविधा लेने दी जाये.
  • सरोगेट मां के लिए बीमा कवर 16 माह से बढ़ाकर 36 माह कर किया जाए.साथ ही सरोगेट मां को मेडिकल खर्च व बीमा कवर (जिसमें पौष्टिक फूड जरूरतें आदि शामिल हैं) के अलावा मुआवजा भी दिया जाए.

भाजपा सांसद भूपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाली 23-सदस्यों की समिति ने दस बैठकों के बाद अपनी ये सिफारिशें 5 फरवरी 2020 को दीं. अब इन सिफारिशों पर स्वास्थ्य मंत्रालय विचार करेगा और विधेयक में संभवतः इनके अनुरूप परिवर्तन करके विधेयक को एक बार फिर संसद में पेश करेगा. सरोगेसी (नियमन) विधेयक 2019 में सरोगेसी के जरिये जन्मे बच्चे के अधिकारों को सुरक्षित रखने का भी प्रस्ताव है. गौरतलब है कि लोकसभा ने 5 अगस्त 2019 को जो सरोगेसी (नियमन) विधेयक 2019 पारित किया था,उसमें कमर्शियल सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने के अलावा केवल नजदीकी रिश्तेदार के जरिये परमार्थ सरोगेसी की ही अनुमति दी गई थी,साथ ही सिंगल महिला के लिए सरोगेसी सुविधा हासिल करने पर प्रतिबंध था.इन्हीं कारणों से यह विधेयक तब राज्यसभा में अटक गया था,इस कारण इसे पुनःमूल्यांकन हेतु तदर्थ समिति के पास भेजा गया था.

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हालांकि तब यह कोई पहला अवसर नहीं था जब यह विधेयक  तदर्थ समिति के पास भेजा गया था.वास्तव में इसके पहले सरोगेसी (नियमन) विधेयक 2016 लोकसभा में 21 नवम्बर 2016 को पेश किया गया था, लेकिन राज्यसभा चेयरमैन व लोकसभा स्पीकर के आपसी मशवरे से 12 जनवरी 2017 को तदर्थ समिति को सौंप दिया गया था. उस समिति के अध्यक्ष समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सदस्य राम गोपाल यादव थे,उस समिति में बीजेपी के 12 सांसद शामिल थे. राम गोपाल यादव के नेतृत्व वाली समिति सरकार के इस ‘संस्कारी’ दृष्टिकोण से सहमत नहीं थी कि ‘केवल संतानहीन विवाहित जोड़ों के लिए ही सरोगेसी की व्यवस्था हो और वह भी परमार्थ’ यानी मुफ्त में. इसलिए उसने कहा था, “एक महिला को यह तो अनुमति हो कि वह दूसरे व्यक्ति को मुफ्त में प्रजनन उपलब्ध कराये,लेकिन उसे अपने प्रजनन श्रम के लिए आर्थिक मेहनताना लेने से रोकना, न सिर्फ अनुचित बल्कि  मनमाना है.इस समिति ने माना था कि अल्ट्रूइस्टिक सरोगेसी यानी परमार्थ या मुफ्त में कोख किराये पर देना एक अन्य अतिवाद है.

वास्तव में सरोगेट बनने की इच्छुक महिला से बहुत अधिक आशाएं लगाई जाती हैं कि वह बिना किसी मुआवजे या मेहनताने के केवल नेक इरादों और दया पर आधारित निर्णय ले व नि:स्वार्थ प्रजनन श्रम प्रदान करे. गर्भधारण कुछ पल का जॉब नहीं है,यह नौ माह का श्रम है, जिसमें संबंधित महिला के स्वास्थ्य, समय व परिवार पर दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं.परमार्थ व्यवस्था में संतान के इच्छुक जोड़े को बच्चा मिल जाता है.डाक्टर, वकील व अस्पताल को अपना पैसा मिल जाता है.सिर्फ सरोगेट मां से यह आशा की जाती है कि वह बिना एक पैसा पाए परहितवाद का पालन करे.”राम गोपाल यादव समिति सरकार के प्रस्तावों के विपरीत सरोगेसी पर अधिक उदार कानून के पक्ष में थी,जिसमें लिव-इन जोड़ों, तलाकशुदा महिलाओं व विधवाओं को भी सरोगेट चयन करने का अधिकार था.भारतीय परिवार में महिला विरोधी शक्ति संरचना की निंदा करते हुए समिति ने सरोगेसी के लिए परमार्थ पर मुआवजे को वरीयता दी थी.

समिति का मानना था कि लिव-इन जोड़ों सहित सभी को परिवार में या परिवार के बाहर सरोगेट चयन का अधिकार हो.दूसरे शब्दों में समिति इस पक्ष में नहीं थी कि सरोगेसी ‘परिवार की बपौती’ बनकर रह जाये.लेकिन सरकार ने राम गोपाल यादव समिति की सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया और सरोगेसी (नियमन) विधेयक 2016 में कुछ गैर जरूरी से परिवर्तन करके उसे सरोगेसी (नियमन) विधेयक 2019 के रूप में लोकसभा में पारित करा दिया, जोकि राज्यसभा में अटका और भूपेन्द्र यादव समिति का गठन हुआ. भूपेन्द्र यादव समिति ने भी लगभग राम गोपाल यादव समिति जैसी ही सिफारिशें की हैं, केवल इस मुख्य अंतर के साथ कि कमर्शियल सरोगेसी पर रोक लगे.इस समिति ने सरोगेट मां के लिए अतिरिक्त मुआवजे का विकल्प खोलने का प्रयास किया है. दूसरे शब्दों में भूपेन्द्र यादव समिति भी स्वीकार करती है कि परामर्थ या मुफ्त सरोगेसी व्यवहारिक नहीं है.

भला एक महिला दूसरों को संतान सुख देने के लिए नौ महीने मुफ्त में क्यों कष्ट उठाये? ‘इच्छुक महिला’ किसी ‘इच्छा’ से ही तो सरोगेट बनने की ‘इच्छा’ व्यक्त करेगी और अधिकतर मामलों में पैसे से बड़ी कोई इच्छा नहीं होती. इसलिए कमर्शियल सरोगेसी पर प्रतिबंध व्यवहारिक नहीं है.हां, गरीब महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए कानून अवश्य होना चाहिए.इसके लिए सरोगेसी को व्यवस्थित व संगठित करने की भी जरूरत है.भूपेन्द्र यादव समिति यह तो चाहती है कि सरोगेसी का विकल्प लेने के लिए पांच वर्ष की प्रतीक्षा अवधि की शर्त हटा दी जाये क्योंकि कुछ मेडिकल स्थितियां ऐसी हैं जिनमें महिला गर्भधारण कर ही नहीं सकती जैसे जन्म से ही गर्भाशय का न होना आदि जिसका अर्थ यह है कि जिस विवाहित जोड़े को मेडिकली यह ज्ञात हो जाता है कि वह सामान्य रूप से संतान सुख प्राप्त नहीं कर सकता, उसे सरोगेसी का विकल्प लेने के लिए पांच वर्ष तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी, लेकिन सिंगल महिला के लिए यह शर्त लगाना कि वह 35 से 45 वर्ष आयु वर्ग में हो और तलाकशुदा या विधवा हो, अजीब व विरोधाभास से भरा प्रतीत होता है.

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आखिर जन्म से गर्भाशय न होने, कैंसर, फिब्रोइडस आदि के कारण गर्भाशय निकलवाने जैसी स्थितियां तो एक अविवाहित या लिव-इन रिलेशनशिप वाली महिला को भी हो सकती हैं तो उसे सरोगेसी का विकल्प लेने से क्यों वंचित किया जाये? उस पर 35 वर्ष से अधिक आयु या तलाकशुदा/विधवा होने की शर्त भी क्यों लगाई जाये? जाहिर है भूपेन्द्र यादव समिति भी ‘संस्कार’ व आधुनिक जरूरतों के बीच पूरी तरह से तालमेल स्थापित नहीं कर पायी है.

सचिन तेंदुलकर से मुठभेड़!

सचिन तेंदुलकर  देश के महान क्रिकेटर हैं सो एक दिन संपादक जी ने कहा- बैठे-बैठे तुम एक नंबर के आलसी पत्रकार हो गए हो, आज हमें किसी दिग्गज क्रिकेटर का इंटरव्यू चाहिए और वह भी सचिन तेंदुलकर का, मैंने सुना तो, खोखली हंसी हंसकर रह गया.संपादक जी ने कहा-जा रहे हो न! उनकी  धमक  भरी वाणी  ने असर किया,मै विवश हो, लडखड़ाता अपने घर की ओर चला. सो मैने  अपना धर्म निभाया. एक पत्रकार क्या कर सकता है ?  मैंने सचिन से मुठभेड़ करने की सोची और चद्दर ओढ़ कर सो गया.
“महाशतक” की खुशी में उद्योगपति मुकेश अंबानी ने जश्न ( पार्टी )का आयोजन रखा था.जिसमें देश के नामचीन लोगों को बुलाया गया  था. आमिर खान, सलमान खान, अभिषेक बच्चन,दीपिका पादुकोण , प्रियंका चोपड़ा सहित बौलीवुड के नगीने भी इस मौके पर मौजूद थे. मैंने देश के एक मूर्धन्य जर्नलिस्ट का वेश बनाकर पार्टी में शिरकत की और मौका देखकर सचिन तेंदुलकर  के आसपास भटकने लगा और मौका मिलते ही बातचीत शुरू कर दी.
मै- सचिन जी, नमस्कार ! मैं जर्नलिस्ट आपका एक धांसू सा साक्षात्कार चाहता हूं.
सचिन- आप ? मैंने पहचाना नहीं, आप किस चैनल  से हैं.
 मै-( हड़बड़ा कर ) जी.. जी ..मै देश के नामचीन मीडिया  का स्पेशल करस्पान्डेट हूं.
सचिन – लेकिन, मैंने पहले तो कभी आपको देखा नहीं.
मै- ( पानी पानी होते हुए ) जी! मैं पहले आपसे मिल चुका हूं, शायद आप भूल रहे हैं, आखिर आपके पास समय ही कहां है. हम जैसे छोटे पत्रकारों को याद रखने का…
 सचिन- नहीं, नहीं, दरअसल, मैं स्मरण कर रहा हूं कि आप से मेरी मुलाकात हुई है या नहीं.
 मै- जी! मैं भी आपका एक छोटा सा फैन हूं आपके इर्द-गिर्द पहुंचने का मौका  कहां मिलता है .आज सौभाग्य से आप तक पहुंच गया हूं.
 सचिन-( हंसकर ) ऐसा नहीं है, मैं भी आपकी ही तरह साधारण हूं .
मै -यह तो आपका बड़प्पन है. मगर सच यह है कि आप  राज ठाकरे, लता मंगेशकर और राहुल गांधी जैसी हस्तियों तक आप कैद होकर रह गए हैं.आम भारतीय आप तक पहुंच ही नहीं सकता…!

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सचिन-( मुस्कुराकर ) दरअसल, मसला सिक्योरिटी का है.

 मै- क्या आपको अपने ही देश के लोगों से खतरा है ?
 सचिन- भई खतरा तो खतरा है और यह अपने आसपास के लोगों से ज्यादा होता है.
मै- मगर यह अन्याय नहीं है क्या ? अपने ही देश के लोगों से खतरा ??
 सचिन- हम सेलिब्रिटी इस हकीकत से गुजरते हैं दोस्त…।
 मै- मुझे लगता है, आपको आम देशवासियों से खतरा नहीं बल्कि…
 सचिन- (आश्चर्यवत् ) बल्कि… क्या मतलब .
मै – आपको देश के विशिष्ट लोगों से ज्यादा खतरा है.
सचिन- (आवाक्) मैं समझा नहीं .
मै- सचिनजी!आपको, राज ठाकरे जैसे इस देश के दिग्गजों से ज्यादा खतरा है.
सचिन- (खोखली हंसी हंसते हुए ) अच्छा… मुझे नहीं पता मुझे नहीं लगता.
 मै-  कभी बालासाहेब ठाकरे  की एक हुंकार पर सचिन, आप की बोलती बंद हो जाती थी, भला क्यो?
सचिन- तुम पत्रकार हो या मिटर (आईना) मैं मौन रहूंगा.
 मै- सचिन, मौन बोलता है. आपका मौन, सर चढ़कर बोल रहा है. आप सच्चाई को स्वीकार करिए.
सचिन- मैं अगर यह कहूं कि मैं बालासाहेब का सम्मान करता था तो…।
मै- और राज ठाकरे का.
सचिन- वे मेरे भाऊ हैं… बड़े भाई साहब (हंसते हैं )
मै- सचिन, आप को भारत रत्न मिलना चाहिए क्या ?
सचिन-( चिरपरिचित मुस्कान बिखेरते हुए ) इस प्रश्न का जवाब मैं आपसे चाहूंगा । बताइए आपको क्या लगता है.
मै- जी… मुझे तो प्रतीत होता है आप भारत रत्न के कतई हकदार नहीं है .
सचिन- (असहज होकर ) भला क्यों ? और अभी तो कहां था आप मेरे फैन हैं…
 मै- मैं चाहता हूं आपको नहीं बल्कि मेजर ध्यानचंद हॉकी के जादूगर का, भारतरत्न पर पहला हक है. अब आप बताइए आप क्या सोचते हैं.
सचिन – मैं चाहता हूं भारत रत्न मुझे मिलना चाहिए.
मै- और मेजर ध्यानचंद…

 सचिन- उनके बारे में देश सोचे,  मैं तो देश के करोड़ों करोड़ों जनता की आवाज को स्वर दे रहा हूं .जनता यही चाहती है.

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मै – मगर सचिन क्या आप चंद वर्ष इंतजार नहीं कर सकते.
 सचिन- मैं तो तैयार हूं, मगर देश तैयार नहीं है.
 मै- आप इंकार तो कर सकते हैं.
 सचिन- यह सभ्यता के खिलाफ होगा.
 मै- क्या सभ्यता का यही तकाजा है. पुरखों को छोड़कर बच्चों को…
 सचिन- यह समय देखे, मैं तो एक नाचीज सा छोटा आदमी हूं.
मै- सचिन! क्या आप भारतरत्न प्राप्त कर सचमुच खुश होंगे.
 सचिन- वाकई यह मेरे लिए प्रसन्नता का सबब होगा.
मै- लेकिन क्या आप वाकई भारतरत्न के काबिल है ? क्या आपने क्रिकेट के अलावा कोई उपलब्धि हासिल की है…
 सचिन तेंदुलकर हो हो कर हंसने लगे. मै पलंग से नीचे गिर पड़ा मेरी नींद टूट चुकी थी.

अधूरी प्रेमकथा

इंटरमीडिएट करने के बाद सोमबीर ने आगे की पढ़ाई का इरादा त्याग दिया था. अब वह कोई कामधंधा करना चाहता था. रोहतक के पास स्थित सोमबीर के गांव सिंहपुरा में कई ऐसे युवक थे, जो ऊंची डिग्रियां ले कर नौकरी की तलाश में भटकने के बाद भी बेरोजगार थे. इसी के मद्देनजर सोमबीर ने पहले ही सोच लिया था कि वह नौकरी के चक्कर में न पड़ कर अपना खुद का कोई काम शुरू करेगा, जिस में सीधा कमाई का जरिया बन जाए.

सोचविचार कर उस ने प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने का फैसला किया. इस काम में न तो ज्यादा मेहनतमशक्कत की जरूरत थी और न ही ज्यादा भागदौड़ की. हां, एक अदद पूंजी की जरूरत जरूर थी, जो उस ने अपने पिता जयराज की मदद से थोड़े ही दिनों में एकत्र कर ली थी. उस ने प्रौपर्टी डीलिंग के काम के लिए पास के गांव गद्दीखेड़ा को चुना.

सोमबीर ने गद्दीखेड़ा के जाट रामकेश के मकान में किराए का कमरा ले कर अपना औफिस खोल लिया. धीरेधीरे उस का काम चल निकला तो वह उसी मकान में एक दूसरा कमरा ले कर रात में भी वहीं रहने लगा. कुछ ही दिनों में वह मकान मालिक रामकेश के पूरे परिवार के साथ काफी घुलमिल गया.

रामकेश के परिवार में पत्नी सरिता के अलावा 3 बेटियां थीं, जिन में सब से बड़ी ममता थी. ममता जब ढाई साल की थी, तभी उसे रोहतक की श्याम कालोनी में रहने वाली उस की बुआ कृष्णा ने गोद ले लिया था. वह रोहतक में बारहवीं में पढ़ रही थी.

पिछले साल ममता रोहतक से अपने जैविक मातापिता के घर गद्दीखेड़ा गई थी. ममता 17 साल की जवान हो चुकी थी. मां सरिता ने बेटी को देखा तो देखती रह गई.

ममता ने आगे बढ़ कर मां के पैर छुए तो सरिता निहाल हो गई. ममता अपनी दोनों छोटी बहनों से गले मिली, कुशलक्षेम पूछा. ममता के आने से पूरे घर का माहौल खुशनुमा हो गया. सरिता ने फोन कर के अपनी ननद कृष्णा से कह दिया कि ममता कुछ दिनों यहां रहने के बाद रोहतक लौटेगी, इसलिए वह उसे जल्दी बुलाने के लिए फोन न करे.

एक दिन ममता का सामना सोमबीर से हुआ तो वह उसे अपलक देखता रह गया. गोरीचिट्टी, बला की खूबसूरत ममता किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. दरअसल, सोमबीर को यह मालूम नहीं था कि रामकेश अंकल की एक और बड़ी लड़की भी है, जिसे बचपन में ही उस के फूफा ने गोद ले लिया था. ममता ने उसे अपनी ओर टकटकी लगाए देखा और पलभर के लिए उसे तिरछी नजरों से देखते हुए मुसकरा कर घर के अंदर चली गई.

ममता और सोमबीर की यह पहली मुलाकात थी, जो कुछ न कह कर भी बहुत कुछ कह गई थी. इस के कुछ दिनों बाद जब सोमबीर को ममता से बात करने का मौका मिला तो वह उस की खूबसूरती की तारीफ करने लगा. ममता को न जाने क्यों उस की बातें अच्छी लगीं.

इसे उम्र का तकाजा कह सकते हैं और पहली नजर का प्यार भी, जिस में आकर्षण की भूमिका बड़ी होती है. बहरहाल, इसी के चलते सोमबीर और ममता ने भी प्यार का इजहार भी किया. प्यार जैसेजैसे दिन गुजरते गए, सोमबीर और ममता एकदूसरे के प्यार में डूबते चले गए.

शुरू में तो सरिता और रामकेश ने ममता और सोमबीर के मिलनेजुलने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वे हद से आगे बढ़ने लगे तो उन का माथा ठनका.

सरिता ने ममता को समझाया कि सोमबीर अनुसूचित जाति का लड़का है, इसलिए उस से ज्यादा घुलनामिलना ठीक नहीं है. ममता ने मां की बातें एक कान से सुन कर दूसरे से बाहर निकाल दीं.

इस के बाद सरिता बेटी पर नजरें रखने लगी. हालांकि ममता और सोमबीर रामकेश और सरिता की नजरों से बच कर मिलते थे, पर उन की अनुभवी आंखों को धोखा देना आसान नहीं था. कई बार किसी न किसी ने दोनों को मिलते हुए देख लिया और इस की खबर रामकेश तक पहुंचा दी.

पानी सिर से ऊपर जाते देख रामकेश ने सोमबीर को ममता से दूर रहने के लिए कहा. इतना ही नहीं, उसे छोटी जाति का हवाला दे कर खतरनाक परिणाम भुगतने की भी चेतावनी दी. रामकेश की धमकी से परेशान सोमबीर ने ममता से कहा कि दोनों के परिवार वाले उन्हें किसी भी हाल में मिलने नहीं देंगे, इसलिए जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया गया तो उन का एक होना मुश्किल हो जाएगा.

सोमबीर की बातें सुन कर ममता उसे विश्वास दिलाते हुए बोली कि वह उस के बिना नहीं जी सकती. इस के बाद दोनों ने एक साथ जीने और मरने की कसमें खाईं. सोमबीर जानता था कि ममता के घर वाले एक तो जाट हैं और दूसरे रसूख वाले दबंग भी, इसलिए उस ने कानून का सहारा ले कर कोर्ट में शादी करने की योजना बनाई.

24 अगस्त, 2017 को ममता मौका पा कर घर से निकली और सोमबीर के पास पहुंच गई. सोमबीर उसे साथ ले कर चंडीगढ़ पहुंचा. वहां दोनों ने पहले आर्यसमाज मंदिर में और फिर कोर्ट में शादी कर ली.

ममता के गायब होने की बात जब उस की मां सरिता को पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सरिता और रामकेश ने यह बात रमेश को बताई तो उन्हें ममता की इस हरकत पर बहुत गुस्सा आया. मां कृष्णा भी ममता की इस हरकत से सन्न रह गई. वे लोग रामकेश के घर आ गए.

सोमबीर के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट

सब ने विचारविमर्श कर के रोहतक के थाना आर्यनगर में ममता के नाबालिग होने और सोमबीर व उस के पिता जयराज के खिलाफ अपनी बेटी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज करवा दिया.

गांवों और ग्रामीण समाज में ऐसी बातें देरसबेर किसी न किसी तरह पहुंच ही जाती हैं. जिस ने भी इस बारे में सुना वह इस बात को और भी बढ़ाचढ़ा कर बखान करने लगा. जितने मुंह उतनी ही बातें होने लगीं.

मामला केवल प्रेम विवाह का नहीं था, बल्कि इस बात का था कि जाट बिरादरी की एक लड़की ने अपने से छोटी जाति के लड़के के साथ शादी रचा ली है. रामकेश और रमेश के परिवार की बिरादरी में थूथू होने लगी. इस सब से गुस्साए रमेश ने ममता की हत्या करने का फैसला कर लिया.

रमेश के इस फैसले से ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी सहमत थे. सब से पहले उन्होंने कोर्ट में ममता का स्कूल सर्टिफिकेट दे कर बताया कि ममता अभी नाबालिग है, 17 साल की. इसलिए कोर्ट उस की शादी को रद्द घोषित करे.

जब कोर्ट ने इस मामले की छानबीन की तो पता चला ममता की उम्र सचमुच 17 साल ही है. हकीकत जानने के बाद कोर्ट ने सोमबीर और ममता को कोर्ट में पेश होने का सम्मन जारी कर दिया. यह बात जनवरी, 2018 की है. जब दोनों कोर्ट में पेश हुए तो पता चला कि सोमबीर ने फरजी तरीके से ममता की उम्र 18 साल बता कर उस से शादी की थी.

कोर्ट को धोखे में रखने के जुर्म में सोमबीर और उस के पिता को जेल और ममता को बालिग होने तक नारी निकेतन भेज दिया गया. ममता के बालिग होने में अभी 17 महीने बाकी थे.

ममता के बालिग हो जाने के बाद 8 अगस्त, 2018 को रोहतक कोर्ट में पेश किया जाना था. उधर करनाल स्थित नारी निकेतन में रह रही ममता की खुशी देखते ही बन रही थी. लोगों ने ममता को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था. वह सब से कह रही थी ‘आज मैं अपने घर चली जाऊंगी.’

सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला ममता को नारी निकेतन से ले कर रोहतक कोर्ट पहुंचे. चूंकि ममता का पति सोमबीर और ससुर जेल में थे, इसलिए सोमबीर की मां सरोज तथा छोटा भाई देवेंद्र कोर्ट पहुंचे थे. सरोज और देवेंद्र काफी डरे हुए थे, जिस की वजह ममता के पिता की ओर से समयसमय पर दी गई जान से मार देने की धमकियां थीं.

यहां तक कि ममता ने यह कह कर कई बार अपने दत्तक पिता रमेश से माफ कर देने की गुहार भी लगाई थी कि वह अपनी इस नई जिंदगी से काफी खुश है. लेकिन ममता द्वारा अपने से छोटी जाति के युवक से शादी कर लेने से बुरी तरह आहत रमेश का एक ही रटारटाया जवाब था, ‘ममता को मरना होगा, क्योंकि उस ने सोमबीर से शादी कर के हमें समाज और बिरादरी के आगे हमेशा के लिए नीचे झुका दिया है.’

ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी उस की जान बख्शने को तैयार नहीं थे. रमेश तथा रामकेश भी कोर्ट में मौजूद थे.

ढाई बजे कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराने के बाद ममता अपनी सास सरोज, देवर देवेंद्र के साथ लघु सचिवालय के गेट नंबर-2 से बाहर निकल रही थी. साथ में सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला भी थे. पांचों लोगों ने सड़क के पार पहुंच कर एक दुकान पर जूस पीया. वहां से निकल कर वे आटो पकड़ने के लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि तभी पीछे से आए 2 मोटरसाइकिल सवारों ने ममता को 3 गोलियां मारीं.

एसआई नरेंद्र ने हमलावरों को मारने के लिए अपना रिवौल्वर निकालने की कोशिश की, लेकिन वे ऐसा कर पाते इस से पहले ही हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी. वह सड़क पर ही ढेर हो गए. हेडकांस्टेबल सुशीला ने सरोज को बदमाशों की गोलियों से बचाने के लिए नीचे गिरा दिया था.

देवेंद्र सड़क से पत्थर उठाने के लिए नीचे झुका तो गोलियां उस के सिर के ऊपर से गुजर गईं. हमलावर उन पर और भी गोलियां चलाना चाहते थे, लेकिन गोलियां खत्म होने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए.

योजना बना कर किया हमला

हमलावरों के भाग जाने के बाद हैडकांस्टेबल सुशीला जैसेतैसे घायल ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र को उठा कर पीजीआई रोहतक ले गई. लेकिन दोनों को बचाया नहीं जा सका. घटना के बाद पूरे क्षेत्र में हडंकंप मच गया. हमलावरों को पकड़ने के लिए रोहतक में सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर तलाशी अभियान चला, लेकिन वे भागने में कामयाब रहे.

8 अगस्त को लेडी हेडकांस्टेबल सुनीता के बयान पर ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र की संदिग्ध हत्यारों के विरुद्ध भादंवि की धारा 333, 353, 196, 307, 302, 34 और 120बी के तहत दर्ज कर के तफ्तीश शुरू की गई. इस केस की जांच आर्यनगर की थानाप्रभारी सुनीता को सौंपी गई.

रोहतक के एसपी जशनदीप सिंह ने डीएसपी रमेश कुमार को निर्देश दिया कि इस केस से संबंधित सभी आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें. थानाप्रभारी सुनीता ने हमलावरों की तलाश में ममता के पिता रामकेश के गांव गद्दीखेड़ा में दबिश दी. वहां वारदात में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल तो मिल गई पर वहां से कातिल फरार हो चुके थे.

रामकेश और सरिता से पूछताछ करने के बाद दोनों को 10 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया. उसी दिन ममता के दत्तक पिता को भी पुलिस उन के घर से गिरफ्तार कर थाना आर्यनगर ले आई.

चारों से प्रारंभिक पूछताछ के बाद ममता हत्याकांड के पीछे यह बात निकल कर सामने आई कि उस की हत्या कराने में मुख्य हाथ उस के दत्तक पिता रमेश का हाथ था. उस की हत्या 7 लाख की सुपारी दे कर कराई गई थी, जिस में मुख्य भूमिका ममता के मौसेरे भाई मोहित उर्फ मंगलू ने निभाई थी.

मंगलू ने उत्तर प्रदेश के 2 पेशेवर शार्पशूटरों को ममता की हत्या की सुपारी दी थी. दोनों शूटर हत्या के एक दिन पहले गद्दीखेड़ी गांव आ गए थे. मोहित ने अगले दिन उन के लिए एक बाइक मुहैया करवाई और खुद शूटर्स की कार में बैठा रहा.

घटना वाले दिन जब ममता अपनी सास के साथ सड़क पर चल रही थी तो उस से कुछ ही दूरी पर खड़े उस के दत्तक पिता ने हत्यारों को ममता की ओर इशारा कर के उसे गोली मारने का इशारा किया.

उस का इशारा पाते ही मोटरसाइकिल सवार हत्यारों ने पहले तो ममता पर गोली चलाई, लेकिन जैसे ही उन्होंने सबइंसपेक्टर नरेंद्र को रिवौल्वर निकालते देखा तो उन्हें भी गोली मार दी. इस के बाद सभी गद्दीखेड़ा गांव पहुंचे.

वहां खाना खाने के बाद वे अपनी कार से फरार हो गए. पुलिस की जांच में यह तथ्य सामने आया कि ममता के मौसेरे भाई मोहित का मोबाइल फोन गद्दीखेड़ा गांव पहुंचने तक औन था. वहां पहुंचते ही उस का मोबाइल औफ हो गया था. घटना वाले दिन उस की आखिरी लोकेशन गद्दीखेड़ा गांव में ही थी.

उधर पोस्टमार्टम के बाद पुलिस की निगरानी में ममता की लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस की लाश को मुखाग्नि उस के ताऊ के लड़के नान्हा ने दी.

सबइंसपेक्टर नरेंद्र की लाश को उन के घर वालों के हवाले कर दिया गया, जिन्होंने उन का अंतिम संस्कार पुलिस सम्मान के साथ किया. उस समय कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वहां मौजूद थे. शहीद सबइंसपेक्टर नरेंद्र के परिवार वालों को सरकार की ओर से 60 लाख रुपए का अनुदान देने की घोषणा की गई है.

चूंकि नरेंद्र अनुसूचित जाति के थे, इसलिए इस दोहरे हत्याकांड में अब एससी/एसटी एक्ट जोड़ कर आगे की जांच रोहतक के डीएसपी रमेश कुमार करेंगे. ममता का पति सोमबीर और ससुर जयराज अभी भी सुनारिया जेल में बंद हैं. उन्हें अपने घर वालों की हत्या किए जाने की आशंका है. इस हत्याकांड में शामिल अन्य आरोपियों की जोरशोर से तलाश जारी है.

बैरिस्टर बाबू: जब प्रथाओं के भंवर से निकलेगा, तो कैसा होगा अनिरुद्ध और बोंदिता का रिश्ता?

बंगाल में बसी ये कहानी है 8 साल की बोंदिता की, जो बहुत ही शरारती और चंचल है. जाने-अनजाने में ही सही, पर वो समाज में हो रहे भेदभाव और कुरीतियों पर अक्सर सवाल उठाती रहती है. जिसे सुन सब लोग दंग रह जाते हैं. आइए आपको बताते हैं इस नए शो की कहानी की एक खास झलक.

बोंदिता के विवाह की हुई तैयारी 

नन्ही बोंदिता का रिश्ता उसके मामा तय कर चुके हैं, पर अपनी माँ, सुमति से दूर जाने के ख्याल से परेशान बोंदिता अपने होने वाले पति को एक खत के ज़रिए ये लिखकर भेजती है कि वो शादी के बाद अपनी विधवा माँ, सुमति को भी अपने साथ ससुराल लाना चाहती है.

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सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ है अनिरूद्ध

मामी को किसी तरह इस खत के बारे में पता चल जाता है और अब बोंदिता के घरवाले ये बात सोच कर काफी परेशान हैं कि कहीं ये रिश्ता ना टूट जाए. लेकिन वो खत, बोंदिता के होने वाले पति की जगह कहानी के दूसरे मुख्य किरदार, अनिरूद्ध तक पहुंच जाता है. अनिरूद्ध, जो कि लंदन से वकालत की पढ़ाई पूरी करके अपने देश वापस आया है, उसने बाल-विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों से देश को आजाद करने की ठान रखी है.

60 साल के बूढ़े आदमी से होता है बोंदिता का रिश्ता 

खत की वजह से अपनी बेटी की शादी टूटने के डर से परेशान सुमति, हल्दी की रस्म वाले दिन ये देखकर खुश हो जाती है कि एक बूढ़ा आदमी हल्दी लेकर उनके घर आया है. पर उसका दिल दहक जाता है, ये जानकर कि वो 60 साल का आदमी कोई और नहीं बल्कि बोंदिता का होने वाला पति है.

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इन सब बातों से अनजान, 8 साल की हँसती-खेलती बोंदिता की जिंदगी बदलने की कगार पर है. क्या बोंदिता की शादी उस बुढ्ढे आदमी से होगी? या फिर अनिरूद्ध बचा लेगा बोंदिता को इस शादी से? आखिर क्या खेल खेलेगी किस्मत अनिरूद्ध और बोंदिता के साथ? प्रथाओं के भंवर से जब निकलेगा, तो कैसा होगा इनका रिश्ता? जानने के लिए देखिए बैरिस्टर बाबू, आज से, सोमवार से शुक्रवार रात 8:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

सरकार को ललकारते छात्र

एक तरफ जहां प्रशासन व सरकार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं वहीं छात्र भी अपनी आवाज मुखर करने से पीछे नहीं हैं. जामिया, एएमयू और जेएनयू समेत देश के तमाम शैक्षणिक संस्थानों के छात्र बगावत कर रहे हैं, लाठी खा रहे हैं, लड़मर रहे हैं लेकिन फिर भी वे सरकार से दबने को तैयार नहीं.

तुम न दोगे आजादी हम लड़ कर लेंगे आजादी

है हक हमारी आजादी है जान से प्यारी आजादी

पूंजीवाद से आजादीसामंतवाद से आजादी

आजादी, आजादी, आजादी…

छात्रों द्वारा दिया यह आजादी का नारा आज देश के विभिन्न हिस्सों में गूंज रहा है. 2016 में जब जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से कन्हैया कुमार का यह नारा उठा था तब उसे देशद्रोही, आतंकवादी, नक्सली क्याक्या नहीं कहा गया. आज एक बार फिर छात्र उसी दौर से गुजर रहे हैं जब सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को देशद्रोह का नाम दे कर दबाने की कोशिश पुरजोर है. यह मोदी सरकार वह सरकार है जो छात्रों को कुचलने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है.

युवा नेता उमर खालिद ने एक ट्वीट में लिखा, ‘‘2005 में जेएनयू में चल रहे एक प्रोटैस्ट के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को छात्रों ने उन की आर्थिक नीतियों के खिलाफ काले  झंडे दिखाए थे. यह एक बड़ी खबर बन गई थी. ऐडमिन ने तुरंत छात्रों को नोटिस भेजा था. अगले ही दिन पीएमओ ने बीच में उतर कर ऐडमिन से छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह का ऐक्शन लेने के लिए मना किया था क्योंकि विरोध करना छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार है.’’ वहीं, दूसरी तरफ वर्तमान मोदी सरकार है जिस ने विद्रोह कर रहे छात्रों की बोलती बंद करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है.

देश की राजनीति में छात्र आंदोलन अत्यधिक महत्त्व रखते हैं. भारत में छात्र आंदोलनों या युवा विरोध प्रदर्शनों का विस्तृत इतिहास रहा है. आजादी से पहले देश की आजादी के लिए युवाओं ने विरोध प्रदर्शनों, आंदोलनों, रैलियों और सत्याग्रहों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. आजादी के बाद विद्यार्थियों द्वारा स्टूडैंट्स यूनियन का गठन हुआ जिस ने पहलेपहल विद्यार्थियों की आवाज को प्रशासन तक पहुंचाने का काम किया और बाद में देश की सरकारी नीतियों की आलोचना करना शुरू किया. प्रशासन और सरकार को हिला कर रख देने वाले छात्र आंदोलन लोकतंत्र का उदाहरण हैं. लेकिन आज इन्हें दबाने और छात्रों को विरोध करने से रोकने की प्रशासन की कोशिश बढ़ती जा रही है जो लोकतंत्र और देश के संविधान को नकारने से ज्यादा कुछ नहीं.

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वर्तमान में नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर जैसे मुद्दों पर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं. नागरिकता संशोधन कानून के मुताबिक भारत सरकार हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई व पारसी शरणार्थियों को तो भारतीय नागरिकता प्रदान करेगी लेकिन मुसलमान शरणार्थियों को नहीं. सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि हर धर्म के लोगों ने इस कानून को संविधान के विरुद्ध पाया और यही कारण है कि 12 दिसंबर से ही इस कानून के विरोध में छात्र सड़कों पर उतर आए.

जामिया मिलिया इसलामिया, गुवाहाटी यूनिवर्सिटी, कोटन यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी, मद्रास यूनिवर्सिटी, दिल्ली विश्वविद्यालय, आईआईटी मुंबई, पंजाब यूनिवर्सिटी व आईआईएम अहमदाबाद समेत कई शैक्षिक संस्थानों के छात्रों ने इस नए कानून के खिलाफ जम कर विरोधप्रदर्शन किया. नतीजतन प्रशासन द्वारा भारत के कई हिस्सों में धारा 144 लगा कर प्रदर्शनों को रोकने की कोशिश की गई. छात्र आंदोलनों से सरकार कितनी भयभीत है, इस का आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि सड़कों पर ही नहीं, बल्कि कालेज कैंपस में घुस कर जामिया और अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्रों पर पुलिस ने डंडे बरसाए.

छात्रों पर प्रशासन का पंजा

15 दिसंबर के दिन जामिया के छात्रों पर कैंपस के बाहर पुलिस ने लाठीडंडे बरसाए और कैंपस के अंदर डा. जाकिर हुसैन लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों को पीटा. लाइबे्ररी की टूटी खिड़कियों से पुलिस की बर्बरता स्पष्ट दिखाई दे रही थी. पुलिस ने छात्रों पर आंसूगैस भी छोड़ी, साथ ही गोली चलने की आवाज ने छात्रों को अंदर तक  झं झोड़ कर रख दिया.

अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र व वर्तमान में जामिया से एलएलएम कर रहे मोहम्मद मिनहाजुद्दीन ने इस विरोध प्रदर्शन के चलते अपनी एक आंख खो दी. अफसोस इस बात का है कि वह इस आंदोलन का हिस्सा तक नहीं था. वह शांति से लाइब्रेरी में बैठा पढ़ रहा था जब पुलिस ने उस पर हमला किया.

मोहम्मद मिनहाजुद्दीन बताता है, ‘‘पुलिस वाले शीशा तोड़ कर अंदर आए थे. इब्न सीना ब्लौक का जो मेन गेट है, वहां पर शीशे वाला गेट है वे उस शीशे को तोड़ कर आए थे, पूरी तैयारी के साथ आए थे कि इन को मारना है. कोई बातचीत नहीं, कोई पूछताछ नहीं, कोई सवालजवाब नहीं, तुम लोग कौन हो, कहां से आए हो, कैसे बैठे हो, कब से बैठे हो, किसी से कुछ नहीं पूछा गया. बस, सीधे मारना शुरू कर दिया. लगभग 7-8 फुट की लाठियां थीं और एकएक बच्चे को 3-3 पुलिस वाले घेर कर मार रहे थे.’’

15 दिसंबर की ही शाम पुलिस अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी कैंपस में भी जामिया की ही तरह घुसी और स्टूडैंट यूनियन प्रैसिडैंट समेत कई छात्रों की पिटाई की. इस  झड़प में 60 छात्रों को चोटें आईं और वे बुरी तरह घायल हुए. यूनिवर्सिटी छात्रों के अनुसार न केवल पुलिस ने उन्हें आतंकवादी कहा बल्कि उन से जबरदस्ती ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने के लिए भी कहा.

विरोध प्रदर्शन और पुलिस की छात्रों पर हिंसा का दौर यहीं नहीं रुका. पुलिस अभी तक खुद तो छात्रों को पीट ही रही थी लेकिन दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जब गुंडों ने घुस कर छात्रों पर हिंसा की तो पुलिस ने उन्हें रोकने के बजाय गेट के बाहर खड़े हो उन की पहरेदारी भी की. 5 जनवरी की शाम 7:30 बजे हथियारबंद नकाबपोशों ने जेएनयू कैंपस में घुस कर स्टूडैंट यूनियन प्रैसिडैंट आइशी घोष व अन्य छात्रों समेत प्रोफैसरों से भी मारपीट की. पुलिस कैंपस के बाहर थी और 9.30 बजे वह कैंपस में घुसी. इस दौरान छात्रों पर गुंडों का यह हमला चलता रहा. लगभग 23 लोग बुरी तरह घायल हुए व उन्हें एम्स में भरती कराया गया.

जेएनयू स्टूडैंट यूनियन प्रैसिडैंट आइशी घोष के अनुसार, ‘‘घंटों बीत जाने के बाद भी जेएनयू ऐडमिनिस्ट्रेशन में किसी ने आ कर हम से हमारा हाल नहीं पूछा. उन्होंने नहीं पूछा कि हमें किसी तरह की सहायता चाहिए या नहीं. हमारी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए. छात्र डरे हुए हैं. लेकिन, एक बात साफ है कि हम एक रहेंगे. हमारी लड़ाई एडमिनिस्ट्रेशन के खिलाफ है. हम पर कैंपस में हुई हिंसा के लिए एडमिनिस्ट्रेशन जिम्मेदार है.’’ इस हमले के पीछे भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी का नाम भी सामने आया है लेकिन अब तक उस के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई बल्कि आइशी घोष पर ही विरोध करने के कारण एफआईआर दर्ज करा दी गई.

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जेएनयू, जिसे वामपंथी विचारधारा के छात्रों के कारण देशद्रोही यूनिवर्सिटी तक कहा जाता है, के स्टूडैंट्स जेएनयू की बढ़ी फीस पर वाइस चांसलर जगदेश एम कुमार व प्रशासन के खिलाफ हफ्तों से विरोधप्रदर्शन कर रहे थे न कि इस नए कानून पर. लेकिन, जेएनयू पर हुए हमले से यह साफ हो गया कि सरकार की मंशा जेएनयू को हमेशा के लिए बंद करने की है जिस से सरकार की आंख का सब से बड़ा कांटा यानी जेएनयू को हमेशा के लिए हटाया जा सके.

जनआंदोलन का बड़ा हिस्सा छात्र

विश्वविद्यालयों से बाहर दिल्ली के शाहीन बाग, मुंबई, असम, त्रिपुरा आदि राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ हो रहे जनआंदोलनों में छात्र बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं. शाहीन बाग में छात्रों ने ‘रीड टू रिवोल्यूशन’ का एक कोना बनाया है जहां आने वाले हर व्यक्ति को वे किताब देते हैं बैठ कर पढ़ने के लिए, पोस्टर आदि बनाते हैं व लोगों को मदद देने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं.

जिस देश का हर मीडिया हाउस लगातार सरकारी गुलाम बनता जा रहा हो वहां सोशल मीडिया के जरिए ये छात्र सचाई उजागर करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं. आज इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और फेसबुक जैसे प्लेटफौर्म्स छात्रों के लिए वादविवाद का केंद्र बने हुए हैं. वे छात्र जो विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं अपनी बुलंद आवाज को, अपने विचारों को सोशल मीडिया के जरिए जनजन तक पहुंचा रहे हैं. वहीं इस कानून के समर्थक या कहें मोदीभक्त उन के हौसले को कम करने की पूरी कोशिश में लगे हैं.

एकतरफ जहां मोदीभक्त तर्कहीन वाद की कोशिश में लगे रहते हैं वहीं पढ़ेलिखे छात्रों द्वारा तर्कों के साथ विवरण दिया जाता है. एक छात्र पोस्ट करता है, ‘नरेंद्र मोदी के सपोर्टर्स का कहना है कि लैफ्ट ने एबीवीपी को मारा. हिंदू रक्षा दल के पिंकी चौधरी जेएनयू हिंसा की जिम्मेदारी लेते हैं. तो क्या इस का मतलब यह हुआ कि एबीवीपी को हिंदू रक्षा दल के लोगों ने लेफ्ट विंग के साथ मिल कर मारा है? प्रिय नरेंद्र मोदी, अपने सपोर्टर्स के लिए लौजिक की कुछ क्लासेस लगवा लीजिए, और हां, अमित शाह के साथ खुद भी वह क्लास अटैंड कर लीजिएगा.’

इस में दोराय नहीं कि क्यों जगहजगह सरकार इंटरनैट बंद करने में लगी हुई है? सरकार छात्र विद्रोह को सड़कों से तो साफ करना ही चाहती है, साथ ही, सोशल मीडिया पर भी उन्हें कुछ बोलने नहीं देना चाहती, जैसे उस ने कश्मीर का इंटरनैट बंद कर दिया था. अच्छा है, सरकार छात्रों से डर तो रही है, उसे डरना भी चाहिए.

रागिनी दूबे हत्याकांड : भाग 3

जितेंद्र दूबे बेटियों को बेटे से कम नहीं आंकते थे. बेटियों की शिक्षादीक्षा पर भी वह खर्च करने में पीछे नहीं रहते थे. बेटियां भी पिता के विश्वास पर खरा उतरने की कोशिश करती थीं.

तीनों बेटियों में नेहा बीए में थी, रागिनी 11वीं उत्तीर्ण कर के 12वीं में आई थी और सिया 10वीं पास कर के 11वीं में आई थी. रागिनी, नेहा और सिया दोनों से बिलकुल अलग स्वभाव की थी.

रागिनी पढ़ाईलिखाई से ले कर घर के कामकाज तक मन लगा कर करती थी. वह शर्मीली और भावुक लड़की थी. जरा सी डांट पर उस की आंखों से गंगायमुना बहने लगती थी, इसलिए घर वाले उसे बड़े लाड़प्यार से रखते थे.

बात 2015 के करीब की है. उस समय रागिनी और सिया दोनों सलेमपुर के भारतीय संस्कार स्कूल में अलगअलग क्लास में पढ़ती थीं. रागिनी 10वीं में थी और सिया 9वीं में. दोनों बहनें रोजाना बजहां गांव से हो कर पैदल ही स्कूल आतीजाती थी. स्कूल जातेआते उन पर बजहां गांव के ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी के बेटे आदित्य उर्फ प्रिंस की नजर पड़ गई.

प्रिंस पहली ही नजर में रागिनी पर फिदा हो गया. रागिनी साधारण शक्लसूरत की थी लेकिन उस में गजब का आकर्षण था. रागिनी और सिया जब भी स्कूल जातीं, प्रिंस गांव के बाहर 2-3 दोस्तों के साथ उन के इंतजार में खड़ा मिलता. दोनों बहनें उन सब से किनारा कर के राह बदल कर निकल जाती थीं.

ऐसा नहीं था कि दोनों बहनें उन के इरादों से अनजान थीं, इसलिए वे उन से बचने की कोशिश करती थीं. रागिनी प्रिंस से जितनी दूर भागती थी, वह उतना ही उस के करीब आने की कोशिश करता था. वह रागिनी से एकतरफा मोहब्बत करने लगा था. प्रिंस को रागिनी को देखे बिना चैन नहीं मिलता था.

आदित्य तिवारी उर्फ प्रिंस उसी बजहां गांव का रहने वाला था, जहां से हो कर रागिनी और सिया स्कूल जाती थीं. उस के पिता कृपाशंकर तिवारी बजहां के ग्रामप्रधान थे. तिवारी की इलाके में तूती बोलती थी.

कृपाशंकर तिवारी का बेटा प्रिंस बाप के नक्शेकदम पर चल रहा था. पिता की तरह ही वह अभिमानी हो गया था. दूसरों को वह तुच्छ और कीड़ेमकोड़ों से ज्यादा कुछ नहीं समझता था. जब भी वह घर से निकलता तो अकेला नहीं होता था. उस के साथ 5-6 लड़कों की टोली रहती थी. उन में उस के चचेरे भाई नीरज तिवारी, सोनू तिवारी और दोस्त दीपू यादव खास थे.

ये तीनों उस के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे. दोस्तों पर वह पैसा पानी की तरह बहाता था. जब से रागिनी प्रिंस के दिल में उतरी थी, तब से उस का दिन का चैन रातों की नींद उड़ गई थी. वह रागिनी से तथाकथित एकतरफा मोहब्बत करने लगा था.

उसे पाने के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था. जबकि रागिनी उस से प्यार करना तो दूर की बात, उस से घृणा करना भी अपनी तौहीन समझती थी.

प्रिंस रागिनी के प्यार में इस कदर पागल था कि उस ने खुद को कमरे में कैद कर लिया था. न तो वह यारदोस्तों से पहले की तरह मिलता था और न ही उन से बातें करता था. प्रिंस की हालत देख कर उस के दोस्त नीरज, सोनू और दीपू तीनों परेशान थे.

यार की जिंदगी की सलामती की खातिर तीनों ने फैसला किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे सूली पर ही क्यों न चढ़ना पड़े, दोस्त के प्यार को उस के कदमों में ला कर डाल देंगे.

एक दिन की बात है नीरज, सोनू और दीपू ने मिल कर रागिनी और सिया को स्कूल जाते वक्त रास्ते में रोक लिया. तीनों के अचानक रास्ता रोकने से दोनों बहनें बुरी तरह डर गईं. उस के बाद नीरज और सोनू ने प्रिंस के प्रेम करने वाली बातें बता कर रागिनी पर दबाव बनाया कि वह प्रिंस के प्यार को स्वीकार ले. लेकिन रागिनी ने उन तीनों को दुत्कार दिया.

रागिनी की बातें सीधे नीरज के दिल पर छुरी की तरह लगी थीं. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि रागिनी उसे ऐसा जवाब देगी. रागिनी की बातों से उसे धक्का लगा. चूंकि मामला भाई के प्यार से जुड़ा था, इसलिए वह रागिनी के अपमान को अमृत समझ कर पी गया.

उस समय तो नीरज और उस के दोस्तों ने रागिनी को कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन यह बात नीरज ने अपने तक ही सीमित नहीं रखी.

घर पहुंच कर उस ने यह बात प्रिंस को बता दी. भाई की बात सुन कर प्रिंस गुस्से से उबल पड़ा. उसे लगा कि रागिनी में इतनी हिम्मत कहां से आ गई जो उस ने उस के प्यार को ठुकरा दिया. वह उस के प्यार को ठुकरा सकती है तो वह भी उसे जीने नहीं देगा. अगर वह मेरी नहीं हो सकती तो मैं उसे किसी और की भी नहीं होने दूंगा.

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नीरज और उस के दोस्तों ने प्रिंस के गुस्से को और हवा दे दी. रागिनी के प्यार में मर मिटने वाला जुनूनी आशिक प्रिंस रागिनी द्वारा प्रेम प्रस्ताव ठुकराए जाने पर एकदम फिल्मी खलनायक की तरह बन गया. उस दिन के बाद से रागिनी जब भी कहीं आतीजाती दिखती, प्रिंस चारों दोस्तों के साथ अश्लील शब्दों का प्रयोग कर के उसे छेड़ता रहता. वह अपने आवारा दोस्तों को ले कर उस के घर तक पहुंच जाता और घर वालों को धमकाता.

प्रिंस की आवारागर्दी और राह आतेजाते आए दिन छेड़छाड़ करने से रागिनी और उस के घर वाले परेशान हो गए थे. डर के मारे रागिनी ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था. वह स्कूल भी नहीं जा रही थी. प्रिंस का खौफ रागिनी के दिल में उतर गया था.

जब बात हद से आगे बढ़ गई तो रागिनी के पिता जितेंद्र दूबे ने बांसडीह थाने में प्रिंस और उस के दोस्तों के खिलाफ लिखित शिकायत दी. प्रधान कृपाशंकर की ऊंची पहुंच और दरोगा के हस्तक्षेप की वजह से मामला वहीं का वहीं रफादफा हो गया. इस के बाद प्रिंस और भी उग्र हो गया. उसे लग रहा था कि जितेंद्र दूबे की इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि उस के खिलाफ थाने में शिकायत करने पहुंच गया.

बात अप्रैल, 2017 की है. प्रिंस अपने तीनों दोस्तों नीरज, सोनू और दीपू यादव को ले कर दोबारा जितेंद्र दूबे के घर गया और उन्हें धमकाया कि आज के बाद तुम्हारी बेटी रागिनी अगर पढ़ने स्कूल गई तो वह दिन उस की जिंदगी का आखिरी दिन होगा.

प्रिंस की धमकी से रागिनी के घर वाले डर गए. उन्होंने उस दिन से रागिनी को स्कूल भेजना बंद कर दिया. प्रिंस की धमकी से डर कर रागिनी कई महीनों तक स्कूल नहीं गई.

उस साल रागिनी का इंटरमीडिएट था. स्कूल में परीक्षा फार्म भरे जा रहे थे. परीक्षा फार्म भरने के लिए वह 8 अगस्त, 2017 को छोटी बहन सिया के साथ स्कूल जा रही थी. पता नहीं कैसे प्रिंस को उस के जाने की खबर मिल गई और उस ने दोस्तों के साथ मिल कर उसे मार डाला.

पुलिस ने रागिनी हत्याकांड के नामजद 5 आरोपियों में से 2 आरोपियों प्रिंस और दीपू यादव को गोरखपुर भागते समय गिरफ्तार कर लिया था. बाकी के 3 आरोपी प्रधान कृपाशंकर, नीरज तिवारी और सोनू फरार थे.

एसपी सुजाता सिंह ने फरार आरोपियों को गिरफ्तार करने के सख्त आदेश दे दिए थे. आरोपियों को गिरफ्तार कराने के लिए मृतका की बड़ी बहन नेहा दूबे ने सैकड़ों छात्रछात्राओं के साथ कलेक्ट्रेट परिसर में धरनाप्रदर्शन किया. परिवार के सदस्यों को मिल रही धमकी के लिए नेहा ने पुलिस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया.

कांग्रेस के नेता सागर सिंह राहुल ने भी लापरवाही बरतने के लिए पुलिस प्रशासन को कोसा. पूरे बलिया के सभ्य नागरिक जितेंद्र दूबे के साथ थे. रागिनी को न्याय दिलाने के लिए रोज धरनाप्रदर्शन किए जा रहे थे.

पुलिस पर फरार आरोपियों को बचाने के आरोप लगने लगे थे. जब चारों ओर से पुलिस की आलोचना होने लगी, तब कहीं जा कर पुलिस सक्रिय हुई और फरार आरोपियों प्रधान कृपाशंकर तिवारी, सोनू तिवारी और नीरज तिवारी के ऊपर शिकंजा कसा तो एकएक कर के तीनों ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया.

रागिनी दूबे हत्याकांड के पांचों आरोपियों कृपाशंकर तिवारी, प्रिंस तिवारी, नीरज तिवारी, सोनू तिवारी और दीपू यादव जेल पहुंच गए थे.

पुलिस ने इस मुकदमे में भादंसं की धाराओं 147, 148, 149, 302, 354ए व 7/8 पोक्सो एक्ट के अंतर्गत पांचों आरोपियों के खिलाफ 26 अक्तूबर, 2017 को न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. इस के बाद यह मुकदमा न्यायालय में सवा 2 साल तक चलता रहा.

बाहुबली ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी ने मुकदमे को खत्म करने के लिए वादी जितेंद्र दूबे को खूब धमकाया. घटना की एकमात्र चश्मदीद गवाह सिया को गवाही न देने के लिए गुंडे भेज कर रागिनी जैसा अंजाम भुगतने की धमकियां दी गईं, लेकिन ऐसी धमकी का न तो जितेंद्र दूबे पर असर हुआ और न ही सिया पर.

बाहुबली कृपाशंकर तिवारी को कानून के अंतर्गत मुंहतोड़ जवाब देने के लिए जितेंद्र दूबे ने कमर कस ली थी. इस दौरान अभियोजन पक्ष के सरकारी वकील सुनील कुमार ने अदालत को घटना से संबंधित तमाम सबूत दिए, साथ ही 12 गवाहों की गवाहियां कराईं.

बचाव पक्ष के अधिवक्ता अशोक कुमार ने अपने मुवक्किलों को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन वे ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाए, जो उन्हें बचा पाता.

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12 सितंबर, 2019 को दोनों अधिवक्ताओं की बहस पूरी हुई. न्यायाधीश चंद्रभानु सिंह ने दोनों अधिवक्ताओं की बहस सुनी और अपना फैसला सुरक्षित रखा.

9 दिनों बाद यानी 20 सितंबर, 2019 को उन्होंने अपना फैसला सुनाया, जिस में पांचों  अभियुक्त दोषी ठहराए गए. फैसला सुनाए जाने तक पांचों अभियुक्त जेल में ही बंद थे.

गवाहों के बयानों और सबूतों के आधार पर न्यायाधीश चंद्रभानु सिंह ने रागिनी दूबे की हत्या के मामले में सही न्याय कर दिया था.

रागिनी दूबे हत्याकांड : भाग 2

सूचना पा कर थानेदार बृजेश शुक्ल पुलिस टीम के साथ अस्पताल पहुंच गए. रागिनी की हत्या की सूचना मिलते ही गांव वाले और जितेंद्र दूबे के जानने वाले अस्पताल पहुंचने लगे. उन का गुस्सा पुलिस वालों पर निकल रहा था. वे पुलिस मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे.

स्थिति को संभाल पाना पुलिस वालों के लिए मुश्किल हो रहा था. जैसेतैसे स्थिति पर काबू पाया जा सका. भीड़ को अलग कर के पुलिस ने कानूनी काररवाई शुरू कर दी. सब से पहले उन्होंने लाश का मुआयना किया. हत्यारों ने रागिनी के गले पर चाकू से वार कर के उसे मौत के घाट उतारा था.

थानेदार शुक्ल ने शव का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद एकमात्र चश्मदीद गवाह सिया से हत्यारों के बारे में पूछताछ की. सिया हत्यारों को पहचाती थी. उस ने थानेदार को उन के बारे में सब कुछ बता दिया.

हत्यारे बजहां गांव के रहने वाले ग्राम प्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा आदित्य तिवारी उर्फ प्रिंस, भतीजे सोनू तिवारी, नीरज तिवारी और दीपू यादव थे. चाकू से वार प्रिंस ने किया था और उस की मदद सोनू, नीरज और दीपू ने की थी.

सिया ने जो बयान पुलिस को दिया उस के अनुसार मामला कुछ इस तरह था. प्रधान का बेटा प्रिंस सालों से रागिनी को तंग कर रहा था. वह रागिनी से तथाकथित एकतरफा प्रेम करता था, लेकिन रागिनी उसे पसंद नहीं करती थी. रागिनी ने प्रिंस की हरकतों पर कोई तवज्जो नहीं दी, तो वह ओछी हरकतों पर उतर आया. वह रागिनी को रास्ते में आतेजाते छेड़ने लगा.

वह भद्देभद्दे कमेंट करता था. लेकिन रागिनी ने उसे पलट कर जवाब नहीं दिया. वह उस की हरकतों को बरदाश्त करती रही. पर जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो उस ने अपने घर वालों को प्रिंस की हरकतों के बारे में बता दिया.

बेटी की परेशानी सुन कर जितेंद्र को दुख भी हुआ और क्रोध भी आया. बात बेटी के मानसम्मान से जुड़ी थी. वह इतनी बड़ी बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे. जितेंद्र उसी समय शिकायत ले कर ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी के घर जा पहुंचे.

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कृपाशंकर घर पर ही मिल गया. जितेंद्र दूबे ने उस के बेटे की ओछी हरकतों का पिटारा उस के सामने खोल दिया. लेकिन प्रधान ने उन की शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया, उलटे उन्हें ही डांटडपट कर वहां से भगा दिया. जितेंद्र अपना सा मुंह ले कर घर लौट आए.

जाहिर है इस का परिणाम उलटा ही निकलना था. शाम को आवारागर्दी कर के घर लौटे बेटे से कृपाशंकर ने पूछा कि बांसडीह के पंडित जितेंद्र तुम्हारी शिकायत ले कर आए थे. तुम उन की बेटी को आतेजाते छेड़ते हो, तंग करते हो.

इस पर प्रिंस ने सफाई दी कि यह सब झूठ है. मैं ने किसी के साथ कोई बदसलूकी नहीं की. मैं तो उस की बेटी को जानता तक नहीं, छेड़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. पंडित मुझे बदनाम करने के लिए झूठ बोल रहा है.

उस समय प्रिंस ने पिता की आंखों में धूल झोंक कर खुद को बचा लिया. उस के पिता ने उस की बातों पर यकीन भी कर लिया. पैसे और ताकत के गुरूर में अंधे पिता को बेटे की करतूत दिखाई नहीं दी. इस के बाद प्रिंस को रागिनी मामूली सी लड़की लगने लगी.

गुस्से में उस ने रागिनी से बदला लेने की ठान ली. रागिनी ने यह बात अपने घर में क्यों बताई और उस का पिता जितेंद्र दूबे शिकायत ले कर उस के पिता के पास क्यों गया, दोनों ही बातें प्रिंस को कचोट रही थीं. आखिरकार प्रिंस ने वही किया, जो उस ने करने की ठान ली थी.

बहरहाल, थानेदार बृजेश शुक्ल ने जितेंद्र दूबे की तहरीर पर 5 नामजद आरोपियों आदित्य उर्फ प्रिंस, ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी, उन के दोनों भतीजों सोनू तिवारी व नीरज तिवारी तथा दीपू यादव के खिलाफ हत्या व छेड़छाड़ की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया.

मामला बेहद गंभीर और दिल दहला देने वाला था. दिनदहाड़े हुई घटना से पूरा इलाका थर्रा उठा था. एसपी सुजाता सिंह इस मामले को ले कर बेहद गंभीर थीं. उन्होंने अपराधियों को गिरफ्तार करने के सख्त आदेश दिए.

कप्तान का आदेश मिलते ही थानेदार बृजेश शुक्ल और उन की पुलिस टीम ने आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए कमर कस ली. फलस्वरूप जिले से सटे उन बाहरी इलाकों की चारों ओर से नाकाबंदी कर दी गई, जो दूसरे जिलों में जा कर खुलते थे.

अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस मुस्तैद थी. जल्दी ही पुलिस को इस का लाभ भी मिल गया. बलिया से हो कर गोरखपुर जाने वाली रोड पर 2 आरोपी आदित्य तिवारी उर्फ प्रिंस और दीपू यादव उस समय पुलिस के हत्थे चढ़ गए जब वे जिला छोड़ कर गोरखपुर भाग रहे थे.

पुलिस दोनों गिरफ्तार अभियुक्तों को ले कर थाना बांसडीह रोड पहुंची और उन से रागिनी दूबे हत्याकांड की गहनता से पूछताछ की. पहले तो प्रधान के बेटे प्रिंस ने अपने पिता की ताकत की धौंस झाड़ी, अकड़ भी दिखाई, लेकिन पुलिस की अकड़ के सामने उस की अकड़ ढीली पड़ गई.

आखिरकार दोनों ने पुलिस के सामने अपने घुटने टेक दिए और अपना जुर्म कबूल कर लिया. बाकी के तीनों आरोपी मौके से फरार हो गए थे. यह 10 अगस्त, 2017 की बात है.

आदित्य तिवारी उर्फ प्रिंस और दीपू यादव से पुलिसिया पूछताछ और बयानों के आधार पर दिल दहला देने वाली घटना की जो कहानी सामने आई, वह मानव मन को झिंझोड़ देने वाली थी.

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55 वर्षीय जितेंद्र दूबे मूलत: बलिया जिले के गांव बांसडीह के रहने वाले थे. उन का 6 सदस्यों का भरापूरा परिवार था. पतिपत्नी और  4 बच्चे, जिन में 3 बेटियां नेहा, रागिनी और सिया व 1 बेटा अमन था. जितेंद्र निजी व्यवसाय से अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. उन का परिवार खुशहाल था और मजे से जी रहा था.

जितेंद्र दूबे ने अपने बच्चों में संस्कार, आदर्श और मानमर्यादा कूटकूट कर भरी थी. बांसडीह के लोग उन की बेटियों की मिसाल देते थे. उन की बेटियां न तो बेवजह किसी के घर उठतीबैठती थीं और न ही फालतू में गप्पें लड़ाती थीं.

अगले भाग में पढ़ें- प्रिंस को रागिनी को देखे बिना चैन नहीं मिलता था.

रागिनी दूबे हत्याकांड : भाग 1

सदियों से अनचाही सी रवायत चली आ रही है कि धनदौलत और ताकत वाले अपने से कमतर लोगों को दबा कर रखते हैं और उन का मनमाना शोषण करते हैं. यह बात तब और घातक हो जाती है जब ऐसे लोग कमजोरों की बहूबेटियों पर नजरें जमाने लगते हैं. अमीर घर के आदित्य उर्फ प्रिंस द्वारा रागिनी की हत्या भी इसी सब की शृंखला थी. लेकिन कानून ने…

उस रोज सितंबर 2019 की 20 तारीख थी. बलिया के जिला एवं सत्र (विशेष) न्यायाधीश चंद्रभानु

सिंह को बलिया के बहुचर्चित रागिनी दूबे हत्याकांड में फैसला सुनाना था. दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें पूरी हो चुकी थीं. अभियुक्त कृपा शंकर तिवारी, आदित्य तिवारी उर्फ प्रिंस, नीरज तिवारी, सोनू तिवारी और दीपू यादव अदालत में मौजूद थे. उन के अलावा अदालत में फैसला सुनने वालों की भी भीड़ थी.

आखिरी दलीलों के बाद न्यायाधीश चंद्रभानु सिंह ने फैसला लिख कर सुरक्षित रख लिया था. जब उन्होंने फैसले की फाइल उठा कर सामने रखी तो अदालत में सन्नाटा छा गया.

न्यायाधीश चंद्रभानु सिंह ने अदालत में मौजूद पांचों अभियुक्तों पर उड़ती सी नजर डाल कर फैसला सुनाना शुरू किया, ‘अदालत में पेश किए गए तमाम सबूतों और 12 गवाहों की गवाहियों से पांचों अभियुक्त दोषी साबित हुए हैं. इसलिए यह अदालत दोषियों कृपाशंकर तिवारी, आदित्य तिवारी, नीरज तिवारी और सोनू तिवारी को उम्रकैद की सजा सुनाती है. उम्रकैद के साथसाथ इन चारों को 50-50 हजार का जुर्माना भी भरना होगा.’

एक पल रुक कर न्यायाधीश चंद्रभानु सिंह ने आगे कहा, ‘एक अभियुक्त दीपू यादव जो किशोर है का मामला अभी बाल न्यायालय में विचाराधीन है. पांचों मुजरिम जमानत पर चल रहे थे. तत्काल प्रभाव से पांचों के जमानत बांड निरस्त किए जाते हैं. अदालत 4 मुजरिमों को जेल भेजने का आदेश देती है. जबकि पांचवें दोषी दीपू यादव को बाल कारागर भेजा जाएगा.’

अदालत के आदेश का तत्काल पालन हुआ. पुलिस ने पांचों दोषियों को गिरफ्त में ले लिया, जिन में से कृपाशंकर तिवारी, आदित्य तिवारी, नीरज तिवारी और सोनू तिवारी को जिला कारागर भेज दिया गया, जबकि दीपू यादव को बालगृह भेजा गया.

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जिस केस में इन लोगों को सजा सुनाई गई थी, वह 2 साल पहले 8 अगस्त, 2017 को हुआ था. उस दिन नाबालिग रागिनी दूबे के साथ जो कुछ हुआ वह दिल दहला देने वाला था. धनदौलत और गुरूर में अंधे बजहां ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी के बेटे आदित्य तिवारी उर्फ प्रिंस ने एकतरफा प्यार में अपने दोस्तों के साथ मिल कर नाबालिग रागिनी दूबे के साथ जो हैवानियत भरा खेल खेला था, उस से इंसानियत भी शरमा गई थी.

8 अगस्त, 2017 की सुबह रागिनी दूबे तैयार हो कर अपनी बहन सिया के साथ स्कूल जाने के लिए घर से निकली थी. इन बहनों का घर बलिया जिले की बांसडीह रोड थाने के अंतरगत आने वाले बांसडीह गांव में था. रागिनी और सिया सलेमपुर के भारतीय संस्कार स्कूल में पढ़ती थी. रागिनी 12वीं में थी और सिया 11वीं में.

दरअसल डर की वजह से रागिनी महीनों से स्कूल नहीं जा पाई थी. उसे बोर्ड की परीक्षा के फार्म के बारे में पता करना था कि फार्म कब भरा जाएगा. साथ ही गैरहाजिरी में छूटी पढ़ाई के बारे में भी जानना था. इसीलिए वह बहन के साथ स्कूल जा रही थी.

रागिनी और सिया अकसर पड़ोस के गांव बजहां के काली मंदिर के रास्ते से स्कूल जाती थीं. उस दिन भी वे बातें करती हुई उसी रास्ते स्कूल जा रही थीं. जब दोनों बहनें काली मंदिर के पास पहुंची, तो अचानक 2 बाइक आड़ेतिरछे उन के सामने आ कर खड़ी हो गईं. दोनों बाइकों पर 4 युवक सवार थे.

अचानक सामने आ कर रुकी बाइकों को देख रागिनी और सिया सकपका गईं, क्योंकि वे दोनों बाइकों से भिड़तेभिड़ते बची थीं.

उन युवकों की इस हरकत पर रागिनी को गुस्सा आया तो वह उन पर चिल्लाई, ‘‘दिखता नहीं है क्या तुम्हें? अंधे हो गए हो?’’

‘‘दिखता भी है और अंधा भी नहीं हूं. बोल, क्या कर लेगी?’’ गुरूर में डूबा युवक बाइक से उतरते हुए बोला, वह आदित्य तिवारी उर्फ प्रिंस था. उस ने आगे कहा, ‘‘जा तुझे जो करना है, कर लेना. मैं नहीं डरता. मैं यहां से नहीं हटूंगा.’’

‘‘देखो, शराफत से हमारा रास्ता छोड़ दो और हमें जाने दो.’’

‘‘अगर रास्ता नहीं छोड़ा तो क्या करोगी?’’ प्रिंस अकड़ते हुए बोला.

‘‘दीदी, क्यों बहस करती हो इन से. मां ने कहा था कि इन के मुंह मत लगना. इन के मुंह लगोगी तो कीचड़ के छींटे हम पर ही पड़ेंगे.’’ सिया ने रागिनी को समझाया.

‘‘देख, तेरी छोटी बहन कितनी समझदार है, कितनी समझदारी भरी बातें कर रही है.’’ प्रिंस ने रागिनी पर तंज कसा.

‘‘नहीं सिया नहीं, आज मैं रास्ता नहीं बदलूंगी और न ही इन कमीनों से डरूंगी. बहुत जी ली, इन चांडालों से डरडर के. इन कुत्तों ने मेरा जीना हराम कर रखा है. इन से जितना डरेंगे, ये हमें उतना ही डराएंगे. इन्हें इन की औकात दिखानी ही पड़ेगी.’’

‘‘ओ, झांसी की रानी.’’ प्रिंस गुर्राया, ‘‘किसे औकात दिखाएगी तू, मुझे. तुझे पता है किस से पंगा ले रही है. प्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा हूं. प्रिंस नाम है मेरा. मिनटों में छठी का दूध याद दिला दूंगा. तेरी औकात क्या है कुतिया. मैं ने तुझे स्कूल जाने से मना किया था कि तू स्कूल नहीं जाएगी.’’

‘‘हां, तो.’’ रागिनी डरी नहीं बल्कि प्रिंस के सामने तन कर खड़ी हो गई, ‘‘तू होता कौन है, मुझे कहीं जाने से रोकने वाला?’’

‘‘दीदी, क्यों बेकार की बहस किए जा रही हो.’’ सिया बोली, ‘‘चलो यहां से.’’

‘‘नहीं सिया, तुम चुप रहो.’’ रागिनी ने सिया से कहा, ‘‘कहीं नहीं जाऊंगी यहां से. रोजाना मरमर के जीने से तो अच्छा है एक बार मर जाएं. मैं जिल्लत की जिंदगी नहीं जीना चाहती. इन दुष्टों को इन के किए की सजा मिलनी ही चाहिए.’’ रागिनी सिया पर चिल्लाई.

‘‘तूने दुष्ट किसे कहा कमीनी? ’’

‘‘तुझे, और किसे.’’

धीरेधीरे दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया. बात बढ़ती देख प्रिंस के दोस्त अपनी बाइक से नीचे उतर आए और उस के पास जा खड़े हुए, सिया रागिनी को समझाने में लगी थी कि लड़कों से पंगा मत लो, यहां से चलो. लेकिन उस ने सिया की एक न सुनी.

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गुस्से से लाल हुए प्रिंस ने आव देखा न ताव, रागिनी को जोर से धक्का मारा. वह लड़खड़ा कर जमीन पर जा गिरी. रागिनी अभी संभलने की कोशिश कर ही रही थी कि प्रिंस उस पर टूट पड़ा. प्रिंस को रागिनी से भिड़ता देख उस के तीनों साथी भी उस का साथ देने लगे.

सब ने मिल कर रागिनी को कब्जे में ले लिया. दोस्तों का साथ पा कर इंसान से हैवान बने प्रिंस ने कमर में खोंस कर रखे फलदार चाकू से रागिनी के गले पर ताबड़तोड़ वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद चारों बाइक पर सवार हो कर भाग गए.

घटना इतनी अप्रत्याशित थी कि न तो रागिनी ही कुछ समझ पाई थी और न ही सिया. आंखों के सामने बहन की हत्या होते देख सिया के मुंह से दर्दनाक चींख निकल गई. उस की चीख इतनी तेज थी की गांव वाले घरों से बाहर निकल आए और उस ओर दौड़े, जिधर से चीखने की आवाज आई थी.

उन्होंने देखा एक लड़की खून से सनी जमीन पर मरी पड़ी थी. वहीं दूसरी लड़की उस के पास बैठी दहाड़ मार कर रो रही थी. गांव वालों को समझते देर नहीं लगी कि मृतका उस की बहन है.

दिन दहाड़े हुई इस लोमहर्षक घटना से लोग सन्न रह गए. उन्हें लगा कि वाकई बदमाशों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि उन्होंने राह चलते बहूबेटियों का जीना हराम कर दिया है. गांव वालों ने इस घटना की सूचना बांसडीह रोड थाने के थानाप्रभारी बृजेश शुक्ल को दे दी.

गांव वाले जानते थे कि मृतका का नाम रागिनी दूबे है. जो पास के गांव बांसडीह निवासी जितेंद्र दूबे की बेटी है. उन्होंने यह खबर जितेंद्र दूबे को भी दे दी. बेटी की हत्या की सूचना मिलते ही दूबे परिवार में कोहराम मच गया.

जितेंद्र दूबे तुरंत घटना स्थल की ओर दौड़े. उन के पीछेपीछे उन की पत्नी वंदना और बड़ी बेटी नेहा भी थीं. शव के पास बैठी सिया दहाड़ मारमार कर रो रही थी. रागिनी की रक्तरंजित लाश देख जितेंद्र का गुस्सा फूट पड़ा. जैसेतैसे उन्होंने खुद पर काबू पाया और बेटी को टैंपो में लाद कर जिला अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

तभी जितेंद्र को बीते 2-3 दिन पहले की बात याद आ गई. कुछ शरारती तत्त्वों ने उन के घर आ कर धमकी दी थी कि अगर रागिनी स्कूल गई तो वह दिन उस की जिंदगी का आखिरी दिन होगा. आखिरकार हत्यारे अपने मंसूबों में कामयाब हो ही गए थे.

अगले भाग में पढ़ें- तुम उन की बेटी को आतेजाते छेड़ते हो, तंग करते हो.

Bigg Boss 13 : सिद्धार्थ शुक्ला के सपोर्ट में आई राखी सावंत

कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाला रिएलिटी शो Bigg Boss 13 का ग्रैंड फिनाले करीब आ रहा है. इस शो के विनर को लेकर दर्शकों के बीच काफी क्रेज है. आखिर इस शो का विनर कौन होगा. खबरों की माने तो Siddharth Shukla और Asim Riaz में से किसी एक के विनर बनने की संभावना है.

आपको बता दें, Rakhi Sawant ने सिद्धार्थ शुक्ला को सपोर्ट किया है. राखी सावंत ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में  राखी ने ये कहा कि बिग बौस बिल्कुल भी स्क्रिप्टेड नहीं होता है.

राखी ने इस वीडियो में  सिद्धार्थ शुक्ला की तारीफ की है और ये भी कहा इंसान जैसा होता है वैसा ही दिखता है. एक तरफ क्या रट लगा रखी है सबने सिद्धार्थ के बारे में. Siddharth Shukla  के बारे में आप जानते ही कितना हैं ? बहुत अच्छा लड़का है Siddharth. अपनी मेहनत से आगे बढ़ा है. जो भी अपनी मेहनत से आगे बढ़ा है उसे कोई नहीं गिरा सकता.

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राखी ने आगे कहा- मैं दूसरों के बारे में नहीं कहूंगी कि कौन जीतेगा. लेकिन मैं ये जरूर कहूंगी कि सिद्धार्थ बेहद अच्छा इंसान है. जो दोस्तों, पैरेंट्स की इज्जत करता है. उतार चढ़ाव सभी की जिंदगी में आते हैं. खैर, 15 फरवरी को मालूम पड़ेगा कि सीजन 13 का विनर कौन बनता है.

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि सलमान खान ने शहनाज की एक्टिंग देखकर सिडनाज को एक खास टैग दिया.  सलमान ने  ये भी कहा कि आप दोनों को कोई अलग नहीं कर सकता है. आप दोनों ‘दो जिस्म एक जान हो’.

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