सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी कर ली है और फैसले को सुरक्षित रख लिया है. देश की सर्वोच्च अदालत के 5 जज अयोध्या का मामला सुल झाने में लगे रहे और 5 जज कश्मीर का मामला. ये दोनों मामले कट्टर हिंदुओं द्वारा पैदा की हुई समस्याओं की देन हैं. और दोनों समस्याएं हिंदू बनाम मुसलिम भेद की उपज हैं. दोनों में धर्मों के कठमुल्लों के हित लगे हैं. भक्तों के आर्थिक विकास, सुखी जीवन और सुरक्षित माहौल से इस तरह की समस्याओं का कोई लेनादेना नहीं.

अगर अयोध्या में राममंदिर बन जाता है तो आम हिंदू को रत्तीभर फर्क नहीं पड़ेगा. उस के लिए तो चप्पेचप्पे पर नए मंदिर हर रोज बन रहे हैं. मुसलमानों को यह नुकसान होगा कि उन की नाक थोड़ी और नीची हो जाएगी. सदियों तक पूरे भारत पर राज करने वाले उन के धर्म के लोगों के पास भारत की मुख्य भूमि में धार्मिक राज नहीं रह पाएगा, हालांकि 1947 के पहले के मुसलमान आज भी पाकिस्तान, बंगलादेश में राज कर ही रहे हैं चाहे कैसा भी हो.

कश्मीर का मामला भी ऐसा ही है. 370 और 35 ए अनुच्छेदों में छेड़छाड़ से पहले भी कश्मीर भारत का ही हिस्सा था और कुछ अलगाववादी हल्ला मचा रहे थे तो वह वैसा ही था जैसा माओवादी छत्तीसगढ़ आदि में करते हैं या पंजाब में खालिस्तानी समर्थकों ने किया था. उलटे, अब कश्मीर कई सालों तक शांत न रह पाएगा क्योंकि जो किया गया है वह सम झौते से नहीं, जबरन किया गया है.

जिस देश की पूरी नहीं तो चौथाई शक्ति हजारों साल पुरानी खींची गई लकीरों को बचाने में लगी रहे, वह कभी नए युग का देश नहीं बन पाएगा. पश्चिमी यूरोप, अमेरिका ने 300 साल पहले और जापान व चीन ने बाद में पुरातनपंथी सोच के लबादे उतार फेंके थे और तभी वे उन्नति कर पाए थे. हम पुराने मामले जमीन में से उखाड़ रहे हैं क्योंकि इन से हमारे पंडेपुजारियों के हित बंधे हैं.

मुसलमानों को छोटा दिखाना है तो सब से आगे पंडितों की फौज खड़ी होती है जो धार्मिक कर्मकांडों, तीर्थों, कुंभों, मंदिरों, आश्रमों, रात्रिजागरणों से मोटा पैसा कमा रही है. पंडित सिद्ध करने में लगे हैं कि पाखंडभरे हिंदू धर्म के कारण अगर 2,000 साल हिंदू गुलाम रहा है तो क्या, आज वह उसी 2,000 साल के पहले वाले भारत में लौटना चाहता है जब राजाओं का कर्म जनता की सेवा करना नहीं, ऋषियोंमुनियों की रक्षा करना या भाइयों से मतभेद सुलटाना ही था. सारी पौराणिक कथाएं, रामायण, महाभारत उन्हीं के इर्दगिर्द घूमती हैं. और आज हम फिर उसी युग में लौट रहे हैं.

अदालत में इन विवादों को ले जा कर अदालत का समय खराब किया गया है और आम लोगों की समस्याओं की सुनवाइयों को रोक दिया गया है. अदालतें वैसे भी बकाया मुकदमों के अंबार से कराह रही हैं, ऊपर से धर्मजनित मामले आने लगे हैं.

अगर देश में जम कर आर्थिक मंदी छाने लगी है तो इसीलिए कि शासकों और जनता का पहला लक्ष्य हिंदू धार्मिक पंडेपुजारियों को दमखम देना और उन्हें शासन तक पहुंचाना हो गया है, जैसा पौराणिक कथाओं में दर्शाया जाता था. शासक धार्मिक हित के फैसले लेते हैं, जनहित के नहीं. कश्मीर और अयोध्या के मामले किसी करवट भी बैठें, न उन से सड़कें बनेंगी, न बीमारियां दूर होंगी और न ही छतें पक्की होंगी.

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