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Hindi Love Stories : भ्रम – डा. प्रभाकर के सुकेशी को इनकार करने की आखिर क्या वजह थी

Hindi Love Stories : ‘हां, मैं तुम से प्यार करता हूं, सुकेशी, इसीलिए तुम से विवाह नहीं कर सकता.’

मैं अपने बंगले की वाटिका में एकांत में बैठी डा. प्रभाकर की इस बात के मर्म को समझने का प्रयास कर रही थी, ‘वे मुझ से प्यार भी करते हैं और विवाह के प्रस्ताव को इनकार भी करते हैं.’

उन्होंने जिस दृढ़ता से ये शब्द कहे थे, उस के बाद उन के कमरे में बैठे रहने का मेरा साहस समाप्त हो चुका था. मैं कितनी मूर्ख हूं, उन के सामने भावना में बह कर इतना बड़ा प्रस्ताव रख दिया. हालांकि, वे मेरे इतने निकट आ चुके थे कि यह प्रस्ताव बड़ा होते हुए भी उतना बड़ा नहीं रह गया था.

गत वर्ष के सत्र में मैं उन की कक्षाओं में कई महीने तक सामान्य छात्रा की भांति ही रही थी, किंतु जब उन्होंने मेरी रुचियों को जाना तो…

कालेज के उद्यान में पहुंच कर जब वे विभिन्न फूलों को बीच से चीर कर उस की कायिक प्रक्रिया को बताते तो हम सब विस्मय से नर और मादा फूलों के अंतर को समझने का प्रयास करते.

वह शायद मेरी धृष्टता थी कि एक दिन प्रभाकरजी से उद्यान में ही प्रश्न कर दिया था कि क्या गोभी के फूल में भी नर व मादा का अंतर आंका जा सकता है?

उन्होंने उस बात को उस समय अनसुना कर दिया था, किंतु उसी दिन जब कृषि विद्यालय बंद हुआ तो उन्होंने मुझे गेट पर रोक लिया. मैं उन के पीछेपीछे अध्यापक कक्ष में चली गई थी. उन्होंने मुझे कुरसी पर बिठाते हुए प्रश्न किया था, ‘क्या तुम्हारे यहां गोभी के फूल उगाए जाते हैं?’

‘हां, हमारे बंगले के चारों ओर लंबीचौड़ी जमीन है. मेरे पिता उस के एक भाग में सब्जियां उगाते हैं. कुछ भाग में गोभी भी लगी है.’

‘तुम्हारे पिता क्या करते हैं?’

‘अधिवक्ता हैं, एडवोकेट.’

‘क्या उन्हें फूल, पौधे लगाने का शौक है?’

‘हमारे यहां फूलों के बहुत गमले हैं. एक माली है, जो सप्ताह में 2 दिन हमारी फुलवारी को देखने आता है.’

‘कहां है तुम्हारा बंगला?’

‘जौर्ज टाउन में, पीली कोठी हमारी ही है.’

‘मैं तुम्हारी बगिया देखने कभी आऊंगा.’

‘अवश्य आइए.’

उन्होंने स्वयं से मुझे रोका था. उन्होंने स्वयं ही मेरे घर आने की बात कही थी और दूसरे ही दिन आ भी गए थे. उन के आगमन के बाद ही तो मैं उन की विशिष्ट छात्रा बन गई थी.

मैं गत दिनों के संपूर्ण घटनाक्रम के बारे में सोचती चली जा रही थी. गतवर्ष गरमी की छुट्टियों में जब वे अपने गांव जाने लगे थे तो बातबात में बताया था कि उन के घर में खेती होती है. बड़े भाई खेती का काम देखते हैं.

उस के बाद तो वे बिना बुलाए मेरे घर आने लगे. क्या यह मेरे प्रति उन का आकर्षण नहीं था?

मैं ने अपनी दृष्टि वाटिका के चारों ओर फेरी तो हर फूल और पौधे के विन्यास के पीछे डा. प्रभाकर के योगदान की झलक नजर आई. लौन में जो मखमली घास उगाई गई थी, वह प्रभाकरजी की मंत्रणा का ही फल था. उन्होंने जंगली घास को उखाड़ कर, नए बीज और उर्वरक के प्रयोग से बेरमूडा लगवाई. उन्होंने ही बैडमिंटन कोर्ट के चारों ओर कंबरलैंड टर्फ लगवाई.

प्रभाकरजी ने जब से रुचि लेनी शुरू की थी, हमारी बगिया में गंधराज गमक उठा, हरसिंगार झरने लगा, रजनीगंधा महकने लगी. यह सब उन के प्यार को दर्शाने के लिए क्या पर्याप्त नहीं था? हम अंगरेजी फूलों के बारे में अधिक नहीं जानते थे, स्वीट पी और एलाईसम की गंध से परिचय उन के द्वारा ही हुआ. केवल 8 महीने में प्रभाकरजी ने हमारे इस रूखेसूखे मैदान का हुलिया बदल कर रख दिया था.

मैं अपनी वाटिका के सौंदर्य के परिप्रेक्ष्य में डा. प्रभाकर को याद करते हुए उन के साथ बीते हुए उन क्षणों को भी याद करने लगी, जिन्होंने मेरे अंदर यह भाव जगा दिया था कि डा. प्रभाकर भी शायद अपने जीवन में मेरे साहचर्य की आकांक्षा रखते हैं. इधर, मैं तो उन के संपूर्ण व्यक्तित्व से प्रभावित हो गई थी.

मेरी टूटीफूटी कविताओं की प्रशंसा और कभीकभार रेखाचित्रों की अनुशंसा अथवा जलरंगों से निर्मित लैंडस्केप के प्रयास क्या सचमुच उन के हृदय को नहीं छू रहे थे. उन्होंने ही तो कहा था, ‘सुकेशी, तुम्हारी बहुआयामी प्रतिभा किसी न किसी रूप में यश के सोपानों को चढ़ते हुए शिखर पर पहुंचेगी.’

एक दिन बातोंबातों में मैं ने उन से यह भी बता दिया था कि मैं इस संपूर्ण बंगले की अकेली उत्तराधिकारी हूं, फिर भी मेरे प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया? क्या मैं कुरूप हूं? लेकिन ऐसा तो कुछ नहीं.

उन के एक कमरे के फ्लैट में मैं कई बार गई थी. उन्होंने अनेक फूलों की एक मिश्रित वाटिका की पेंटिंग अपने प्रवेशद्वार पर ही लगा रखी थी, जो कि उन्हीं की बनाई हुई थी. यह बात उन्होंने जानबूझ कर मुझे बताई थी. आखिर इस बात का क्या अभिप्राय था? मेरी वाहवाह पर मुसकराए थे और मेरी परख की प्रशंसा में उन्होंने मेरे मस्तक पर एक चुंबन दिया था. और मैं बाहर से अंदर तक झंकृत हो उठी थी.

उस दिन एकांत के क्षणों में जो प्रस्ताव मैं ने उन के सामने रख दिया था, शायद उस चुंबन द्वारा ही प्रेरित था. उन्हें मेरा प्रस्ताव अस्वीकृत नहीं करना चाहिए था. किंतु उन्होंने तो मुझ से आंखें बचा कर कहा, ‘मैं तुम से प्यार करता हूं, इसीलिए तुम से विवाह नहीं कर सकता.’

मुझे प्रभाकरजी की बात से एक झटका सा लगा था. मैं ने कृषि विद्यालय जाना छोड़ दिया था और अंदर ही अंदर मुरझाने लगी थी.

सप्ताह में एक बार अवश्य ही आने वाले प्रभाकरजी जब 16 दिनों तक नहीं आए तो मैं बीते दिनों की संपूर्ण घटनाओं का निरूपण करने के बाद सोचने लगी, ‘मुझ से कौन सी भूल हुई? प्रभाकरजी नाराज हो गए क्या… लेकिन क्यों?’

आज ठीक 16 दिनों बाद अचानक संध्या समय प्रभाकरजी पधारे. मैं बाहर के कमरे में अकेले ही बैठी थी. मैं ने तिरछी दृष्टि से उन्हें देखा और एक मुसकान बिखेर कर स्वागत किया.

‘‘क्या बिलकुल अकेली हो?’’ उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा.

‘‘हां.’’

‘‘बाबूजी?’’

‘‘वे अभी कोर्ट से नहीं आए, शायद किसी के यहां रुक गए हैं.’’

‘‘और अम्माजी?’’

‘‘वे पड़ोस में गई हैं. आप कहां रहे इतने दिन?’’

‘‘मैं तो मात्र एक सप्ताह के लिए अपने गांव गया था. तुम ने विद्यालय जाना क्यों छोड़ दिया? पिछले सोमवार से तुम मुझे अपनी क्लास में दिखाई नहीं दीं. तुम्हारी सहेली सुरभि से पूछने पर ज्ञात हुआ कि तुम कई दिनों से विद्यालय नहीं जा रही हो, शायद जब से मैं छुट्टी पर गया?’’

लेकिन मैं ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘बोलो, चुप क्यों हो?’’ वे हौले से बोले.

‘‘सच बताऊं? मैं तो अंदर से मुरझा गई हूं. कोई उल्लास ही नहीं रह गया. आप ने उस दिन इतना रूखा उत्तर दिया कि…’’

‘‘रूखा उत्तर नहीं, गुरु और शिष्य के बीच जो संबंध होने चाहिए, वही यदि रहें तो…’’

‘‘आप इतने दकियानूसी हैं. आज के युग में…’’

‘‘दुनिया में जाने क्याक्या होता है, किंतु मैं जिसे जीवन की सफलता की ऊंचाइयों पर देखना चाहता हूं, उसे धोखा नहीं दे सकता.’’

‘‘धोखा, कैसा धोखा?’’

‘‘तुम शायद अभी तक भ्रम में थीं कि मैं कुंआरा हूं, लेकिन मैं विवाहित हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. अभी दूसरे बच्चे के जन्म पर ही गांव गया था.’’

यह बात सुन कर मेरी गरदन झुक गई. किंतु साहस बटोर कर प्रश्न कर बैठी, ‘‘यह कोई गढ़ी हुई कहानी तो नहीं? आप इतना अच्छा वेतन पाते हैं. यदि विवाहित हैं तो परिवार को अपने साथ क्यों नहीं रखते?’’

प्रभाकरजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘मैं अपने गांव से उखड़ कर शहर में रहना नहीं चाहता. यहां छोटा सा फ्लैट है, जो मेरे लिए पर्याप्त है. पौधों के शौक मैं जिस विपुलता से अपने गांव में पूरा कर लेता हूं, यहां 5 हजार रुपए मासिक पर भी वैसी जमीन नहीं मिल सकती.’’

उन के इस उत्तर के बाद कुछ देर को सन्नाटा छा गया. मैं समझ ही न सकी कि अब क्या बोलूं.

प्रभाकरजी कुछ समय तक मेरी मुखमुद्रा को पढ़ते रहे, फिर बोले, ‘‘मेरे गांव का विकास हो गया है-नहर आ गई है, अस्पताल है, समाज कल्याण कार्यालय है, बच्चों को इंटर तक पढ़ाने के लिए कालेज है. एक पक्की सड़क है. मैं अपने घरपरिवार को गांव से उखाड़ कर शहर में रोपना नहीं चाहता.’’

यह सब सुन कर मैं थोड़ी देर को चुप हो गई, किंतु फिर धीरे से बोली, ‘‘आप ने जिस अनौपचारिक रूप से मेरे घर आना शुरू कर दिया था, मैं ने उसे आप का आकर्षण मान लिया था.’’

मेरी बात सुन कर प्रभाकरजी ने कहा, ‘‘हां, मैं यह भूल गया था कि तुम ऐसा भी सोच सकती हो. दरअसल, तुम्हारे यहां निरंतर आने का कारण तो तुम्हारे बंगले से जुड़ा हुआ यह मैदान है, जो अब एक सुंदर वाटिका में बदल गया है. यहां मैं अपनी योजनाओं का प्रैक्टिकल प्रयोग कर सकता था. मैं ने तो सोचा भी नहीं था कि एक दिन तुम विवाह का प्रस्ताव भी…’’

मैं एक बार फिर चुप हो गई. पूर्व इस के कि मैं फिर कोई प्रश्न करती, प्रभाकरजी वहां से अचानक लौट पड़े.

प्रभाकर के मस्तिष्क में सुकेशी के प्रस्ताव की बात घुमड़ती रही और उन्हें अपने उस चुंबन की बात याद आई, जो उन्होंने सुकेशी के मस्तक पर दिया था. शायद उस चुंबन ने ही प्रेरित कर दिया था कि वह ऐसा प्रस्ताव रख गई थी. उसे पता नहीं, मस्तक के चुंबनों में और कपोलों अथवा होंठों के चुंबन में क्या अंतर होता है. काश, वह भारतीय परंपराओं से अवगत होती. Hindi Love Stories

Romantic Story In Hindi : दिल मांगे मोर

Romantic Story In Hindi : दिसंबर आने में कुछ ही दिन बाक़ी थे, दिल्ली में सर्दी ने दस्तक दे दी थी. रात में 10 बज रहे थे. तेज हवा के झोंके से खिड़की का परदा कुछ ऊपर सरका और खिड़की की झिर्रियों से ठंडी हवा का झोंका मुझे कंपकंपा गया. मैं क्विल्ट की आग़ोश में समा गई.

मन तो मेरा पति श्रेयांश के सान्निध्य में जा उन के स्पर्श की ऊष्णता में सिमट जाने का था पर वे हमेशा की तरह अपने लैपटौप में व्यस्त थे, साथ में, सामने लगे टीवी की स्क्रीन पर सैंसेक्स के उतारचढ़ाव भी देख रहे थे. बीचबीच में उन की बग़ल में रखे फ़ोन पर मेल्स की बिप्स भी बजबज कर अपनी मौजूदगी का एहसास करवा रही थीं.

कुल मिला कर मैं निसंकोच कहती हूं कि उन्हें सैक्स से ज़्यादा सैंसेक्स में और बीवी से ज़्यादा टीवी में दिलचस्पी है. मैं हर बार मन मसोस कर रह जाती.

मैं उन से कहना चाहती थी, ‘देखो, अभी भी मैं कितनी हसीन हूं और मेरी त्वचा से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता है.’ ऐसा मैं ही नहीं, मेरे संपर्क में आने वाला हर शख़्स कहता है. बस, उन्हें ही दिखाई नहीं देता. फिर मैं भी रूठ, करवट बदल, दूसरी तरफ़ मुंह कर सो ज़ाया करती थी. पर उस निर्मोही को इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. उसे लगता है, मैं थक कर सो गई हूं.

ऐसी ही एक रात मेरे मोबाइल में फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट आई. मैं ने लपक कर फ़ोन उठाया. सैंडर का प्रोफ़ाइल बहुत ही आकर्षित था. मैं ने फ़ोटो को ज़ूम कर के देखा, लाल गालों वाला गोराचिट्टा, कसे डोलेशोले बनाए हुए बाजुओं वाला आकर्षक युवक. मेरा दिल बल्लियों नाचने लगा और मन स्नेहमय निमंत्रण पा कर गदगद हो गया. अगले दिन सब काम निबटा कर मैं मोबाइल ले कर बैठी ही थी कि फिर मेरी नज़र उस रिक्वैस्ट पर गई. मैं ने बिना पल गंवाए उस की रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर ली.

ऐक्सैप्ट करते ही मैसेंजर पर मैसेज की बौछार हुई-

‘हे क्यूट.’

‘हाऊ यू कैन दिस मच फ़िट?’

इन शब्दों की ठंडी बौछार से मैं ऐसी खिल उठी मानो किसी बंजर ज़मीन पर अरसे बाद एक गुलाब खिल आया हो महकता, खिलता, मुसकराता, लुभाता… याद नहीं आख़िरी बार श्रेयांश ने मुझे कब इन शब्दों से संबोधित किया था. मुझ में कुछ आत्मविश्वास जागा था और मैं ने इठलाते हुए रिप्लाई भेजा-

‘इट सीम्ज़ योर कैचफ़्रेज़ फौर एवरी फ़ीमेल फ्रैंड’.

‘इफ़ वी बिकम अ बेस्टी देन इट्स लास्ट,’ उस ने तुरंत जवाब भेजा.

‘कान्ट मेक यू बेस्टी. आई हैव औलरेडी थ्री बेस्टीज़ – माई हबी एंड टू किड्स,’ मेरा जोश दोगुना हो गया था.

‘यू कैन ऐड मी, इफ़ यू वांट,’ उस का मैसेज आया.

कई दिनों तक इस तरह के प्रणय निवेदनों से पिघल मैं ने उस का फ़ेसबुक अकाउंट खोल कर देखा. वह दिल्ली के एविएशन स्कूल से पाइलट की ट्रेनिंग ले रहा था. उस का नाम था सौरभ बहल. प्रभावित हो कर मैं ने भी एक मैसेज कर दिया-

‘हाय डूड, लव्ड योर प्रोफ़ाइल.’

बस, फिर क्या था, मैं एक ऐसी अनजानी राह पर चल पड़ी थी जिस पर कोमल पंखुड़ियां बिखरी थीं और जिन की खूशबू मुझे मदहोश कर रही थी. एक नई ज़िंदगी की आहट अपनी दोनों बांहें पसारे मुझे बुला रही थी. इस राह पर चलने के लिए मुझे हौसले की ज़रूरत थी जो हौसला मैं अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं जुटा पाई थी. पर, अब वह हौसला जाने कहां से मुझ में आ गया था.

उस से बात कर के मैं अपनेआप को बहुत स्पैशल महसूस कर रही थी . एक अलग ही दुनिया जहां मैं मां और पत्नी नहीं, बल्कि 18 साल की नवयौवना थी.

शुरू-शुरू में चैट करते समय मैं स्वयं अचंभित थी कि वह आख़िर चाहता क्या है. उसे पूरी दुनिया में मैं ही मिली, पूरे 10 साल बड़ी और वह भी मैरीड.

मेरे संकोच को देख कर उस ने ही कहा था, ‘विश्वास रखो, कोई ग़लत इरादे से आप से बात नहीं करता हूं. मैं भी साहित्य में रुचि रखता हूं. एफ़बी पर पोस्ट की हुई आप की रचनाएं बहुत अपनी सी लगीं और आप से एक भावनात्मक जुड़ाव

सा हो गया.’

कभी भी उस की बातों में, उस के प्रणय निवेदन में मुझे छिछोरेपन की बू नहीं आई थी. कोई अदृश्य शक्ति मुझे उस की तरफ़ धकेले जा रही थी. मुझे अकसर एक किताब की यह पंक्ति याद आ जाती – कुछ रिश्ते आत्मिक होते हैं और हर जन्म में हम से किसी न किसी रूप में जुड़ ही जाते हैं.- शायद यह पिछले जन्म में बिछड़ा ऐसा ही कोई रिश्ता हो, मैं ने अनुमान लगाया.

‘यू आर लाइक अ डायमंड इन माय लाइफ़,’ यह वह अकसर कहता.

वह विश्वास नहीं कर पा रहा था कि मैं एक बच्चे की मां हूं . वह चुपके से मेरी आदतों में शामिल सा हो गया था. दोपहर के 2 बजते ही मन आतुर हो फ़ेसबुक की तरफ़ खिंचता. वह अपने फ़्लाइंग क्लब की क्लासेज़ ख़त्म कर के 2 बजे

लौटता और आते ही मुझ से चैट करता.

मैसेंजर पर लहराते 3 डॉट्स उभरते ही मेरा मन हिलोरे खाने लगता. मैं चाहती, वह यों ही लिखता रहे, मैं पढ़ती रहूं. उस से चैट कर के मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती थी. उस की इंग्लिश में एक शोख़ी, एक नशा, एक बेफ़िक्री थी नए जमाने की

पुरशोख़ अदा के साथ, जो मेरे तो आसपास भी नहीं फटक सकती थी.

मैं उस से कदम से कदम मिला कर चलना चाहती थी. थैंक्स टू गूगल. मैं चैट की एकएक लाइन का हिंदी से इंग्लिश में अनुवाद करती, फिर उसे मैसेंजर पर टाइप करती. मैं उस के प्यार को, उस के एकएक लफ़्ज़ को बहुत ही आहिस्ता से संभाल कर अपने मन के एक कोने में रखती जा रही थी क्योंकि मैं जानती थी, यह क्षणभंगुर है.

मेरे साथ पहली बार ऐसा हो रहा था. ऐसी आकुलता, ऐसी सिहरन कि रोमरोम पुलकित हो जाता. स्क्रीन पर उभरा एकएक अक्षर मेरी आंखों के रास्ते सीधा दिल में उतर जाता. मैं गुनगुनाने लगी थी, चहकने लगी थी, फुदकने लगी थी. मैं ने उस का नाम अपने फ़ोन में सौरभ नहीं, खूशबू नाम से सेव किया था, जिस से कि भी श्रेयांश को शक न हो सके.

मुद्दतों बाद मेरे इतने रोमैंटिक दिन गुज़र रहे थे. मुझे रहरह कर उस की एकएक बात याद आती और मैं अंदर तक गुदगुदा जाती. मैं सपनों की इस सतरंगी दुनिया से कितनी बार खुद को बुलाती थी जब मैं मायरा को देखती थी. पर वह इतना ज़िद्दी हो गया था कि लौट कर आना ही नहीं चाह रहा था. मैं लाख कोशिश कर खुद को सचाई के धरातल पर लैंड करने की कोशिश कर रही थी. मेरा किसी भी काम में मन नहीं लगता था. मेरी दोनों जिंदगियां आपस में क्लैश हो रही थीं मेरी सचाई और स्वप्निल लोक. पर स्वप्निल ज़िंदगी का पलड़ा भारी हो रहा था.

‘ज़िंदगी ऐसी ही है. मैं दोनों सुख एकसाथ क्यों नहीं पा सकती जहां पति व मायरा भी हो और मेरा स्वप्निल लोक भी. पर नहीं, मुझे एक को चुनना ही पड़ेगा. एक सुख को पाने के लिए दूसरे सुख को दफ़न करना ही पड़ेगा.’ मैं विचारों में डूबी हुई थी, इतने में मेरे फ़ोन की घंटी बजी.

फ़ोन मेरी बेटी के स्कूल से था, ‘मैम, आप मायरा को स्कूल से ले जाइए, उसे तेज बुख़ार है.’ यह सुनते से ही मेरा समूचा बदन कांपने लगा.

मैं कैसे भूल गई? उसे कल भी बुख़ार था. मुझे आज उसे स्कूल न भेज कर डाक्टर को दिखाने ले कर जाना था. मैं डाक्टर का अपौइंटमैंट लेना तक भूल गई. मैं ने अपनी गाड़ी निकाली और स्कूल की तरफ़ बढ़ा ली.

मैं स्वयं को अपराधिनी महसूस करने लगी. मैं बुरी मां नहीं हूं, मायरा से बहुत प्रेम करती हूं. यह मेरा स्वप्न एक छद्म था, फिर भी मैं उस के पीछे बेतहाशा भागे जा रही थी.

मैं ने उस को डाक्टर को दिखा, दवाई दे, सुला दिया. पूरा दिन ऐसे ही भागदौड़ में निकल गया.

रात को थकान से चूर हो मैं ने अपनी गरम क्विल्ट की पनाह ली. और फ़ोन स्क्रोल करने लगी. मोबाइल देखने का समय न मिलने के चलते सौरभ के बहुत सारे मैसेजेज़ इकट्ठे हो गए थे जिन्हें देख कर मेरे चेहरे पर मुसकराहट लौट आई. मैं फिर से अपनी स्वप्निल दुनिया में खो गई और मुझे अपने आसपास का भी होश न रहा.

इतने में श्रेयांश ने मेरे हाथ से फ़ोन छीन लिया और मैसेजेज़ पढ़ने लगे. वे बहुत ही सहज और सुलझे हुए व्यक्तित्व वाले इंसान है. सबकुछ जान लेने के बाद भी वे संयमित ही रहे.

उस दिन श्रेयांश के सामने मेरे सब्र का बांध टूट गया. “आई एम सौरी श्रेयांश, मैं बहुत अकेला महसूस करती थी. आप के टूर्स, औफ़िस के चलते आप को मेरे लिए समय नहीं मिलता था. आप देर से घर लौटते, तो भी फ़ोन पर बात करते हुए और फिर खाना खाते हुए भी लैपटौप आप के चेहरे के सामने होता था. आप के लिए अपनी फ़ीमेल को नहीं, क्लाइन्ट्स को उन की मेल का रिप्लाई देना ज़्यादा ज़रूरी लगता था. काम के दबाव में आप की झल्लाहट और ग़ुस्सा भी बढ़ता जा रहा था.

“मैं अपनेआप को बहुत उपेक्षित महसूस करती थी. प्यारव्यार, रोमांस आप को बहुत बचकाना और फ़ैंटेसी लगते थे. मैं आप के प्यार के लिए, वक़्त के लिए तरस गई थी. सौरभ ठीक ऐसे वक़्त मेरी ज़िंदगी में आया जब मैं अकेलेपन के कारण अवसाद के गर्त में धंसती जा रही थी.” और यह कहते हुए मैं श्रेयांश से लिपट कर रोने लगी.

मैं ने स्वयं को संयत करते हुए आगे कहना शुरू किया, “मैं रोने के लिए एक मजबूत कंधा चाहती थी. पर मेरे हिस्से में हमेशा तकिया ही आया. मेरे आंसू, प्रेम की संवेदनाओं के रेशे, मैं आप तक पहुंचाना चाहती थी. पर वो सब हमेशा आप के सामने रहने वाली स्क्रीन पर ही उलझ कर रह जाते. मैं आप से कहना चाहती थी कि मुझे आप की ज़रूरत है, मैं आप के साथ थोड़ा वक़्त बिताना चाहती हूं.

“हम शादी करते हैं इसलिए कि हमें एक साथी की ज़रूरत होती है. पर समय के साथ यह उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है. मैं जानती हूं आप मुझ से बहुत प्यार करते हैं, पर प्यार जताना भी उतना ही ज़रूरी है जितना प्यार करना. यह दिल मांगे मोर, स्वीटहार्ट.

“मैं कुछ पलों के लिए सिर्फ़ आप की प्रेमिका बन कर रहना चाहती थी. शादी के चंद सालों में ही मैं, बस, मम्मा और आप पापा बन कर रह गए.”

“मैं तुम्हारे साथ ही हूं न. और मैं रातदिन इतनी मेहनत तुम्हारे और मायरा के लिए ही कर रहा हूं न, जिस से तुम दोनों को सारे जहान की ख़ुशियां दे सकूं,” श्रेयांश ने मेरे आंसू पोंछते हुए कहा.

“अकसर ऐसा ही होता है, हम भौतिक सुखों की चाह में जीवन की सच्ची ख़ुशियों को बहुत पीछे छोड़ देते हैं. और शादी का असली उद्देश्य यानी एकदूसरे अच्छे मित्र बन, भावनात्मक सहयोग देना कहीं छूट जाता है,” मैं कहती जा रही थी और श्रेयांश मुझे पहली बार इतनी ध्यान से सुन रहे थे.

मुझे महसूस हुआ, आंसुओं से मेरी पलकों में 2 महीनों से बसे हुए सारे सपने धुल रहे थे.

अगले दिन शाम को मैं अपने बैड की क्विल्ट तैयार कर रही थी. माहिरा को कितना भी टोकूं, वह सारा बैड अस्तव्यस्त कर ही देती है. और श्रेयांश को अस्तव्यस्तता बिलकुल पसंद नहीं. चद्दर पर पड़ी सलवटों को देख कर उन के माथे पर भी सलवटें उभर आएंगी. इतने में श्रेयांश ने पीछे से आ कर मुझे अपनी बांहों में भर लिया.

मैं ने चौंक कर खिड़की से बाहर की तरफ़ देखा और उस के बाद घड़ी की तरफ़, जो 5:30 बजा रही थी. यानी, श्रेयांश भी नवंबर की चुलबुली ठंडकभरी शाम की तरह औफ़िस से कुछ जल्दी लौट आए थे, शायद, इन 10 सालों में पहली बार. कोई और दिन होता, तो श्रेयांश औफ़िस से आते ही कुशन को अपनी बांहों में ले, सोफ़े पर उलटे लेटे टीवी देखने लग जाते पर उस दिन उन की बांहों में तकिए की जगह मैं थी.

“मैं ने औफ़िस में लीव ऐप्लिकेशन दे दी है. अगले हफ़्ते हमारी ऐनिवर्सरी है. मैं ने कल की डलहौज़ी जाने के लिए टैक्सी और 5 दिनों के लिए होटल में रूम बुक करवा दिया है. माहिरा को तुम मम्मी के पास छोड़ देना. इट विल बी ओन्ली यू एंड मी टाइम.

“अच्छा बताओ, हमारी 10वीं ऐनिवर्सरी पर तुम्हें क्या गिफ़्ट चाहिए?”

“गुडमौर्निंग और गुड़नाइट के साथ एक प्यारी सी हग और आप मुझे शोना कह कर बुलाएं. बस, इतना सा ख़्वाब है,” मैं ने नज़रें झुकाते हुए यह कह दिया. ख़ुशी के मारे मेरी आंखों से कुछ आंसू पलकों से सरक गालों पर लुढ़क आए.

श्रेयांश ने मेरे सिर पर चुंबन देते हुए कहा, “इस एपिसोड से मैं शादीशुदा ज़िंदगी में प्यार और रोमांस की अहमियत को अच्छे से समझ गया हूं. मैं तुम से वादा करता हूं कि आगे से तुम्हें कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगा.”

हमारी बातों में कब संध्या को हलके से समेट रात की आग़ोश में तारे सरक आए, मुझे पता ही न चला. उस रात मैं बहुत सालों बाद इतनी सुकून की नींद सोई थी…एक मुसकराती हुई, मीठी सी नई सुबह के इंतज़ार में. Romantic Story In Hindi

लेखिका : मेहा गुप्ता

Social Story In Hindi : दहेज – अलका के घरवाले क्यों परेशान थें ?

Social Story In Hindi : डाक्टर के केबिन से बाहर निकल कर राहुल सिर पकड़ कर बैठ गया. उस की मम्मी आईं और उस से पूछने लगीं, ‘‘डाक्टर ने ऐसा क्या कह दिया कि तू अपना सिर पकड़ कर बैठ गया?’’

राहुल बोला, ‘‘मम्मी, अलका डाक्टर बन गई है.’’

‘‘कौन अलका?’’ मम्मी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘वही अलका, जिस से दहेज में 5 लाख रुपए न मिलने की वजह से हम फेरों के समय बरात वापस ले आए थे.’’

‘‘पर बेटा, शादी के लिए तो उस ने ही मना किया था,’’ मम्मी बोलीं.

‘‘और क्या करती वह? ताऊजी और पापा ने उस समय उस के पापा को इतना जलील किया था कि उस ने शादी करने से मना कर दिया,’’ राहुल बोला.

‘‘पर बेटा, तू इतना परेशान क्यों हो गया है?’’

‘‘मम्मी, मैं ने तो बस यही कहा था, ‘डाक्टर, हमें तो अलका की हाय खा गई. शादी को 12-13 साल हो गए, पर औलाद का मुंह देखने को तरस गए. हर बार किसी न किसी वजह से पेट गिर जाता है. इस बार खुश थे कि अब हम औलाद का मुंह देख लेंगे, पर यह समस्या आ गई.’

‘‘हमारी डाक्टर ने अलका का नाम लिया और कहा कि अब वे ही कुछ कर सकती हैं.’’

‘‘मम्मी, अलका रिपोर्ट देखतेदेखते बोली, ‘जिस लड़की की बरात फेरों के समय वापस लौट जाए, वह कभी दुआ तो नहीं देगी.’

‘‘फिर उस ने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा. उस की शक्ल देख कर मेरी बोलती बंद हो गई.

‘‘आगे और कोई बात होती कि तभी नर्स ने आ कर तैयारी शुरू कर दी. अलका उठ कर चलने लगी, फिर मेरी पीठ को सहलाते हुए बोली, ‘डरो मत, मैं डाक्टर पहले हूं, अलका बाद में.’’’

पर राहुल की मम्मी कुछ और ही सोच रही थीं, इसलिए उन्होंने बेटे की बात पर कोई गौर नहीं किया.

थोड़ी देर बाद मम्मी ने पूछा, ‘‘क्या अलका शादीशुदा है?’’

राहुल बोला, ‘‘नहीं मम्मी. लेकिन आप यह क्या पूछ रही हैं?’’

‘‘बेटा सोच, उस ने अभी तक शादी क्यों नहीं की? उस से कह दे कि बच्चे को बचाने की कोशिश करे. बहू न बचे, तो कोई बात नहीं.’’

राहुल चीखा, ‘‘आप कितनी बेरहम हैं. मैं वही गलती दोबारा नहीं करूंगा. एक बार ताऊजी और पापा के खिलाफ नहीं बोल कर मुझे अलका जैसी लड़की से हाथ धोना पड़ा था. मुझे अपनी बीवी और बच्चा दोनों चाहिए.’’

उधर डाक्टर अलका  के सामने लेटी कविता जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी. वह उस शख्स की बीवी थी, जो अलका के साथ होने वाले फेरों पर अपनी बरात वापस ले गया था.

डाक्टर अलका के सामने उस दिन का एकएक सीन घूम गया, जिस ने उन की जिंदगी बदल दी थी.

राहुल और अलका मंडप के नीचे बैठे हुए थे कि तभी राहुल के पापा की आवाज गूंजी थी, ‘रुक जाओ…’

फिर वे अलका के पापा से बोले थे, ‘5 लाख रुपए का इंतजाम और करो. अब फेरे तभी होंगे, जब आप 5 लाख रुपए का इंतजाम कर लोगे.’

अलका और उस के परिवार वाले सभी चौंक कर रह गए थे. अलका के पापा और चाचा दोनों राहुल के पापा के सामने गिड़गिड़ा रहे थे, पर उन का एक ही राग था कि 5 लाख रुपए का इंतजाम करो, नहीं तो बरात वापस ले जाएंगे.

इसी बीच राहुल के ताऊजी बोले थे, ‘अरे समधीजी, आप के लिए गर्व की बात होनी चाहिए कि आप की 12वीं पास लड़की को सरकारी नौकरी वाला लड़का मिल रहा है… ऊपर से यह सांवली भी है. आप 5 लाख रुपए का इंतजाम कर लें, फिर सारी कमियां छिप जाएंगी.’

फिर पापा राहुल से बोले थे, ‘उठ बेटा, हम वापस चलते हैं.’

बहुत देर से चुपचाप सुन रही अलका उठी और दहाड़ी, ‘अरे, यह क्या उठेगा, मैं ही उठ जाती हूं.

‘मैं अब यह शादी नहीं करूंगी. आप शौक से बरात ले जाएं. लेकिन मेरे पापा का जो अब तक खर्च हुआ है, सब दे कर जाएं.’

फिर अलका अपने चाचा से बोली थी, ‘चाचाजी, आप पुलिस को बुलाइए.’

अब तक जो शेर की तरह दहाड़ रहे थे, वे भीगी बिल्ली बन गए थे. वे अलका पर शादी के लिए दबाव डालने लगे थे, पर अलका ने शादी करने से साफ मना कर दिया और बरात लौट गई थी. कमरे में आ कर अलका रोने लगी थी. उस की बूआ पास आ गई थीं. वह उन से लिपट कर रोने लगी और बोली थी, ‘बूआ, मैं और पढ़ना चाहती हूं.’

बूआ ने अपने भाई से कहा था, ‘भैया, मैं ने पहले ही कहा था कि अभी अलका की उम्र ही क्या हुई है… पर आप को तो बस नौकरीपेशा लड़के का लालच आ गया. देख लिया नतीजा…

‘भैया, मेरे कोई बच्चा नहीं है, इसलिए अलका की जिम्मेदारी मुझे सौंप दो. इसे मैं अपने साथ ले जाऊंगी. मैं इसे आगे पढ़ाऊंगी.’

इस के बाद बूआ अलका को अपने साथ ले गई थीं. उस समय वह 12वीं जमात विज्ञान से कर रही थी, तभी पीएमटी का इश्तिहार आया था. अलका ने पीएमटी का इम्तिहान देने की इच्छा जाहिर की, तो उस की बूआ ने उस की इच्छा पूरी की.

अलका ने बहुत मेहनत की. अब उस का एक ही मकसद था कि कुछ कर के दिखाना है. उस की मेहनत रंग लाई और उस का पीएमटी में चयन हो गया. अलका को पता था कि बूआ भी माली रूप से कमजोर थीं, लेकिन बूआ ने किसी तरह उसे डाक्टरी पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया था. अलका को बाद में पता चला था कि उस की बूआ ने उस के दाखिले के लिए अपने कुछ जेवर बेचे थे, इसलिए उस ने अपने सहपाठियों से कहा कि उस के लिए कुछ ट्यूशन बता दें, जिस से वह अपनी बूआ को कुछ राहत दे सके.

अलका के सहपाठी उस के काम आए. उन्हीं में डाक्टर विश्वास भी थे. उन्होंने कुछ ट्यूशन बता दिए. बस, यहीं से अलका की निकटता डाक्टर विश्वास से बढ़ने लगी और उस हद तक पहुंच गई, जहां दोनों एकदूसरे के बिना नहीं रह पा रहे थे. 3 साल बाद अलका एक नर्सिंगहोम की मालकिन थी. इस नर्सिंगहोम की मालकिन बनने में भी डाक्टर विश्वास ने ही मदद की थी  अब अलका इतनी काबिल डाक्टर हो गई थी कि बिगड़े केस भी ठीक कर देती थी. कविता का केस भी तभी अलका के पास आया, जब दूसरे डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे.

डाक्टर अलका के लिए यह सब से मुश्किल केस था, क्योंकि अगर वह अपने काम में नाकाम हुई तो लोग यही कहेंगे कि अलका ने अपना बदला ले लिया. उस का कैरियर भी चौपट हो जाएगा, जबकि उस को पता था कि उस के सामने लेटी औरत का कोई कुसूर नहीं था. अलका को बारबार पसीना आ रहा था. उस की ऐसी हालत देख कर नर्स बोली, ‘‘डाक्टर क्या हुआ? आप अपनेआप को संभालो.’’

अलका बोली, ‘‘डाक्टर विश्वास को फोन लगाओ.’’

थोड़ी देर बाद जब नर्स ने कहा कि डाक्टर विश्वास कुछ ही देर में पहुंचने वाले हैं, तब जैसे अलका को हिम्मत मिली. अब उस के लिए कविता एक आम मरीज थी. 2 घंटे बाद जब बच्चे के रोने की आवाज गूंजी, तब सब खुशी से उछल पड़े. बाकी काम अपने सहायकों पर छोड़ कर डाक्टर अलका डाक्टर विश्वास के साथ बाहर निकल गई. कविता 3 दिन अस्पताल में रही. राहुल और अलका की मुलाकात नहीं हुई या राहुल ही खुद अलका से कन्नी काट लेता था.

3 महीने बीत गए थे. अलका अस्पताल जाने की तैयारी कर रही थी कि तभी एक आवाज ने उसे चौंकाया. उस ने आवाज की तरफ देखा और बोली, ‘‘अरे कविताजी, आप?’’ अपने बच्चे को डाक्टर अलका की गोद में सौंपते हुए कविता बोली, ‘‘मुझे सब पता चल गया है, जो इन्होंने आप के साथ किया था.’’

‘‘मैं तो अब सबकुछ भूल गई हूं, क्योंकि आज मैं जिस मुकाम पर खड़ी हूं, तब मैं सोचती हूं कि अगर उस समय मेरी शादी हो गई होती, तब मैं इस मुकाम पर नहीं पहुंच पाती.’’

‘‘पर इन्होंने जो किया, वह गलत किया.’’

‘‘हां, मुझे भी उस समय बुरा लगा था कि राहुल ने अपने पापा का विरोध नहीं किया था. तब मुझे लगा कि अगर मेरी शादी राहुल के साथ हो जाती, तो हो सकता है कि बाद में भी दहेज ही मेरी मौत की वजह बन जाए, इसलिए मैं ने शादी के लिए मना कर दिया.’’

फिर अलका ने कविता से पूछा, ‘‘क्या अब भी राहुल ऐसे ही हैं?’’

‘‘नहीं, अब वे बदल गए हैं. मुझे आप के अस्पताल की नर्स ने बताया कि उस दिन भी इन की मम्मी ने दबाव डाला था कि डाक्टर से कह दे कि अगर बचाने की बात हो, तो बहू को नहीं, बल्कि बच्चे को बचा ले. तब इन्होंने मम्मी को डांट दिया था.

‘‘इन्होंने अपनी मां से कहा था कि एक बार पापा की बात का विरोध न कर के अलका जैसी लड़की को खो बैठा हूं, पर वह गलती अब दोबारा नहीं करूंगा.

‘‘तब मुझे यह पता नहीं था कि वह लड़की आप हैं.’’

बात को मोड़ देते हुए अलका ने पूछा, ‘‘इस बच्चे का क्या नाम रखा?’’

‘‘विश्वास,’’ कविता बोली.

तभी डाक्टर विश्वास वहां आए. अपना नाम सुन कर वे बोले, ‘‘मेरा नाम क्यों लिया जा रहा है?’’

कविता ने बताया, ‘‘हम ने अपने बच्चे का नाम आप के नाम पर रखा है.’’

डाक्टर विश्वास बोले, ‘‘अरे, विश्वास नाम मत रखो, वरना मेरी तरह कुंआरा ही रह जाएगा.’’

‘‘देखो, कैसे ताना मार रहे हैं,’’ अलका बोली, ‘‘आज से पहले कभी इन्होंने प्रपोज नहीं किया? और आज प्रपोज किया है, तो ताना भी मार रहे हैं. अब मुझे क्या सपना आया था कि आप से केवल दोस्ती नहीं है, कुछ और भी है.’’

डाक्टर विश्वास के बोलने से पहले ही कविता बोली, ‘‘बहुत खूब. दोनों ने प्रपोज भी किया और ताना भी मारा. अब शादी की तारीख भी तय कर लो.’’

‘शादी की तारीख तो हमारे बड़े तय करेंगे,’ वे दोनों एकसाथ बोले.

कुछ दिन बाद अलका और विश्वास की शादी की तारीख तय हो गई. राहुल और कविता उन के खास मेहमान थे. Social Story In Hindi

Family Story In Hindi : खट्टामीटा – इकलौते बच्चे के सुखदुख से जूझती मां की कहानी

Family Story In Hindi : साढ़े 4 बजने में अभी पूरा आधा घंटा बाकी था पर रश्मि के लिए दफ्तर में बैठना दूभर हो रहा था. छटपटाता मन बारबार बेटे को याद कर रहा था. जाने क्या कर रहा होगा? स्कूल से आ कर दूध पिया या नहीं? खाना ठीक से खाया या नहीं? सास को ठीक से दिखाई नहीं देता. मोतियाबिंद के कारण कहीं बेटे स्वरूप की रोटियां जला न डाली हों? सवेरे रश्मि स्वयं बना कर आए तो रोटियां ठंडी हो जाती हैं. आखिर रहा नहीं गया तो रश्मि बैग कंधे पर डाल कुरसी छोड़ कर उठ खड़ी हुई. आज का काम रश्मि खत्म कर चुकी है, जो बाकी है वह अभी शुरू करने पर भी पूरा न होगा. इस समय एक बस आती है, भीड़ भी नहीं होती.

‘‘प्रभा, साहब पूछें तो बोलना कि…’’

‘‘कि आप विधि या व्यवसाय विभाग में हैं, बस,’’ प्रभा ने रश्मि का वाक्य पूरा कर दिया, ‘‘पर देखो, रोजरोज इस तरह जल्दी भागना ठीक नहीं.’’

रश्मि संकुचित हो उठी, पर उस के पास समय नहीं था. अत: जवाब दिए बिना आगे बढ़ी. जाने कैसा पत्थर दिल है प्रभा का. उस के भी 2 छोटेछोटे बच्चे हैं. सास के ही पास छोड़ कर आती है, पर उसे घर जाने की जल्दी कभी नहीं होती. सुबह भी रोज समय से पहले आती है. छुट्टियां भी नहीं लेती. मोटीताजी है, बच्चों की कोई फिक्र नहीं करती. उस के हावभाव से लगता है घर से अधिक उसे दफ्तर ही पसंद है. बस, यहीं पर वह रश्मि से बाजी मार ले जाती है वरना रश्मि कामकाज में उस से बीस ही है. अपना काम कभी अधूरा नहीं रखती. छुट्टियां अधिक लेती है तो क्या, आवश्यकता होने पर दोपहर की छुट्टी में भी काम करती है. प्रभा जब स्वयं दफ्तर के समय में लंबे समय तक खरीदारी करती है तब कुछ नहीं होता. रश्मि के ऊपर कटाक्ष करती रहती है. मन तो करता है दोचार खरीखरी सुनाने को, पर वक्त बे वक्त इसी का एहसान लेना पड़ता है.

रश्मि मायूस हो उठी, पर बेटे का चेहरा उसे दौड़ाए लिए जा रहा था. साहब के कमरे के सामने से निकलते समय रश्मि का दिल जोर से धड़कने लगा. कहीं देख लिया तो क्या सोचेंगे, रोज ही जल्दी चली जाती है. 5-7 लोगों से घिरे हुए साहब कागजपत्र मेज पर फैलाए किसी जरूरी विचारविमर्श में डूबे थे. रश्मि की जान में जान आई. 1 घंटे से पहले यह विचार- विमर्श समाप्त नहीं होगा.

वह तेज कदमों से सीढि़यां उतरने लगी. बसस्टैंड भी तो पास नहीं, पूरे 15 मिनट चलना पड़ता है. प्रभा तो बीमारी में भी बच्चों को छोड़ कर दफ्तर चली आती है. कहती है, ‘बच्चों के लिए अधिक दिमागखपाई नहीं करनी चाहिए. बड़े हो कर कौन सी हमारी देखभाल करेंगे.’

बड़ा हो कर स्वरूप क्या करेगा यह तो तब पता चलेगा. फिलहाल वह अपना कर्तव्य अवश्य निभाएगी. कहीं वह अपने इकलौते पुत्र के लिए आवश्यकता से अधिक तो नहीं कर रही. यदि उस के भी 2 बच्चे होते तो क्या वह भी प्रभा के ढंग से सोचती? तभी तेज हार्न की आवाज सुन कर रश्मि ने चौंक कर उस ओर देखा, ‘अरे, यह तो विभाग की गाड़ी है,’ रश्मि गाड़ी की ओर लपकी.

‘‘विनोद, किस तरफ जा रहे हो?’’ उस ने ड्राइवर को पुकारा.

‘‘लाजपत नगर,’’ विनोद ने गरदन घुमा कर जवाब दिया.

‘‘ठहर, मैं भी आती हूं,’’ रश्मि लगभग छलांग लगा कर पिछला दरवाजा खोल कर गाड़ी में जा बैठी. अब तो पलक झपकते ही घर पहुंच जाएगी. तनाव भूल कर रश्मि प्रसन्न हो उठी.

‘‘और क्या हालचाल है, रश्मिजी?’’ होंठों के कोने पर बीड़ी दबा कर एक आंख कुछ छोटी कर पान से सने दांत निपोर कर विनोद ने रश्मि की ओर देखा.

वितृष्णा से रश्मि का मन भर गया पर इसी विनोद के सहारे जल्दी घर पहुंचना है. अत: मन मार कर हलकी हंसी लिए चुप बैठी रही.

घर में घुसने से पहले ही रश्मि को बेटे का स्वर सुनाई दिया, ‘‘दादाजी, टीवी बंद करो. मुझ से गृहकार्य नहीं हो रहा है.’’

‘‘अरे, तू न देख,’’ रश्मि के ससुर लापरवाही से बोले.

‘‘न देखूं तो क्या कान में आवाज नहीं पड़ती?’’

रश्मि ने संतुष्टि अनुभव की. सब कहते हैं उस का अत्यधिक लाड़प्यार स्वरूप को बिगाड़ देगा. पर रश्मि ने ध्यान से परखा है, स्वरूप अभी से अपनी जिम्मेदारी समझता है. अपनी बात अगर सही है तो उस पर अड़ जाता है, साथ ही दूसरों के एहसासों की कद्र भी करता है. संभवत: रश्मि के आधे दिन की अनुपस्थिति के कारण ही आत्मनिर्भर होता जा रहा है.

‘‘मां, यह सवाल नहीं हो रहा है,’’ रश्मि को देखते ही स्वरूप कापी उठा कर दौड़ आया.

बेटे को सवाल समझा व चाय- पानी पी कर रश्मि इतमीनान से रसोईघर में घुसी. दफ्तर से जल्दी लौटी है, थकावट भी कम है. आज वह कढ़ीचावल और बैगन का भरता बनाएगी. स्वरूप को बहुत पसंद है.

खाना बनाने के बाद कपड़े बदल कर तैयार हो रश्मि बेटे को ले कर सैर करने निकली. फागुन की हवा ठंडी होते हुए भी आरामदेह लग रही थी. बच्चे चहलपहल करते हुए मैदान में खेल रहे थे. मां की उंगली पकड़े चलते हुए स्वरूप दुनिया भर की बकबक किए जा रहा था. रश्मि सोच रही थी जीवन सदा ही इतना मधुर क्यों नहीं लगता.

‘‘मां, क्या मुझे एक छोटी सी बहन नहीं मिल सकती. मैं उस के संग खेलूंगा. उसे गोद में ले कर घूमूंगा, उसे पढ़ाऊंगा. उस को…’’

रश्मि के मन का उल्लास एकाएक विषाद में बदल गया. स्वरूप के जीवन के इस पहलू की ओर रश्मि का ध्यान ही नहीं गया था. सरकार जो चाहे कहे. आधुनिकता, महंगाई और बढ़ते हुए दुनियादारी के तनावों का तकाजा कुछ भी हो, रश्मि मन से 2 बच्चे चाहती थी, मगर मनुष्य की कई चाहतें पूरी नहीं होतीं.

स्वरूप के बाद रश्मि 2 बार गर्भवती हुई थी पर दोनों ही बार गर्भपात हो गया. अब तो उस के लिए गर्भधारण करना भी खतरनाक है.

रश्मि ने समझौता कर लिया था. आखिर वह उन लोगों से तो बेहतर है जिन के संतान होती ही नहीं. यह सही है कपड़ेलत्ते, खिलौने, पुस्तकें, टौफी, चाकलेट स्वरूप की हर छोटीबड़ी मांग रश्मि जहां तक संभव होता है, पूरी करती है. पर जो वस्तु नहीं होती उस की कमी तो रहती ही है.

‘‘देख बेटा,’’ 7 वर्षीय पुत्र को रश्मि ने समझाना आरंभ कर दिया, ‘‘अगर छोटी बहन होगी तो तेरे साथ लड़ेगी. टौफी, चाकलेट, खिलौनों में हिस्सा मांगेगी और…’’

‘‘तो क्या मां,’’ स्वरूप ने मां की बात को बीच में ही काट दिया, ‘‘मैं तो बड़ा हूं, छोटी बहन से थोड़े ही लड़ूंगा. टौफी, चाकलेट, खिलौने सब उस को दूंगा. मेरे पास तो बहुत हैं.’’

रश्मि की बोलती बंद हो गई. समय से पहले क्यों इतना समझदार हो गया स्वरूप? रात का भोजन देख कर नन्हे स्वरूप के मस्तिष्क से छोटी बहन वाला विषय निकल गया. पर रश्मि जानती है यह भूलना और याद आना चलता ही रहेगा. हो सकता है बड़ा होने पर रश्मि स्वरूप को बहन न होने का सही कारण बता भी दे लेकिन जब तक वह इसी तरह जीने का आदी नहीं हो जाता, रश्मि को इस प्रसंग का सामना करना ही होगा.

मनपसंद व्यंजन पा कर स्वरूप चटखारे लेले कर खा रहा था, ‘‘कितना अच्छा खाना है. सलाद भी बहुत अच्छा है. मां, आप रोज जल्दी घर आ जाया करो.’’

रश्मि का मन कमजोर पड़ने लगा. मन हुआ कल ही त्यागपत्र भेज दे, नहीं चाहिए यह दो कौड़ी की नौकरी, जिस के कारण उस के लाड़ले को मनपसंद खाना भी नसीब नहीं होता.

‘‘चलो मां, लूडो खेलते हैं,’’ स्वरूप हाथमुंह धो आया था.

‘‘थोड़ी देर तक पिता के संग खेलो, मैं चौका संभाल कर आती हूं,’’ रश्मि ने बरतन समेटते हुए कहा.

ऐसा नहीं कि केवल सतीश की तनख्वाह से गृहस्थी नहीं चलेगी लेकिन घर में स्वयं उस की तनख्वाह का महत्त्व भी कम नहीं. रोज तरहतरह का खाना, स्वरूप के लिए विभिन्न शौकिया खर्चे, उस के कानवैंट स्कूल का खर्चा आदि मिला कर कोई कम रुपयों की जरूरत नहीं पड़ती. अभी तो अपना मकान भी नहीं. फिर वास्तविकता यह है कि प्रतिदिन हर समय मां घर में दिखेगी तो मां के प्रति उस का आकर्षण कम हो जाएगा. इसी तरह रोज ही अच्छा भोजन मिलेगा तो उस भोजन का महत्त्व भी उस के लिए कम हो जाएगा. जैसेजैसे स्वरूप बड़ा होगा उस की अपनी दुनिया विकसित होती जाएगी. मां के आंचल से निकल कर पढ़ाई- लिखाई, खेलकूद और दोस्तों में व्यस्त हो जाएगा. उस समय रश्मि अकेली पड़ जाएगी. इस से यही बेहतर है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ेगा.

सब काम निबटा कर रश्मि की आंखें थकावट से बोझिल होने लगीं. निद्रित पुत्र के ऊपर चादर डाल कर वह सतीश की ओर मुड़ी.

‘‘कभी मेरा भी ध्यान कर लिया करो. हमेशा बेटे में ही रमी रहती हो,’’ सतीश ने रश्मि का हाथ थामा.

‘‘जरा याद करो तुम्हारी मां ने भी कभी तुम्हारा इतना ही ध्यान रखा था,’’ रश्मि ने शरारत से कहा.

‘‘वह उम्र तो गई, अब तो हमें तुम्हारा ध्यान चाहिए.’’

‘‘अच्छा, यह लो ध्यान,’’ रश्मि पति से लिपट गई.

सुबह उठ कर, सब को चाय दे कर रश्मि ने स्वरूप के स्कूल का टिफिन तैयार किया. फिर दूध गरम कर के उसे उठाने चली.

‘‘ऊं, ऊं, अभी नहीं,’’ स्वरूप ने चादर तान ली.

‘‘नहीं बेटा, और नहीं सोते. देखो, सुबह हो गई है.’’

‘‘नहीं, बस मुझे सोना है,’’ स्वरूप ने अड़ कर कहा.

आखिर 15 मिनट तक समझाने- बुझाने के बाद उस ने बेमन से बिस्तर छोड़ा. पर ब्रश करने, कपड़े पहनने व दूध पीने के बीच वह बारबार जा कर फिर से चादर ओढ़ कर लेट जाता और मनाने के बाद ही उठता. अंत में बैग कंधे पर डाले सतीश का हाथ पकड़े वह बस स्टाप की ओर रवाना हुआ तो रश्मि ने चैन की सांस ली. बिस्तर संवारना है, खाना बनाना, नाश्ता बनाना, नहाना फिर तैयार हो कर दफ्तर जाना है. रश्मि झटपट हाथ चलाने लगी. कपड़ों का ढेर बड़ा होता जा रहा है. 2 दिन से समय ही नहीं मिल रहा. आज शाम को आ कर अवश्य धोएगी.

‘‘कभी तो आंगन में झाड़ू लगा दिया कर रश्मि,’’ सब्जी छौंकते हुए रश्मि के कान में सास की आवाज पड़ी. कमरों के सामने अहाते के भीतर लंबाचौड़ा आंगन है, पक्के फर्श वाला. झाड़ू लगाने में 15-20 मिनट लग जाना मामूली बात है.

‘‘आप ही बताओ अम्मां, किस समय लगाऊं?’’

‘‘अब यह भी कोई समस्या है? जो दफ्तर जाती हैं क्या वे झाड़ू नहीं लगातीं?’’

रश्मि चुप हो गई. बहस में कुछ नहीं रखा. सब्जी में पानी डाल कर वह कपड़े निकालने लगी.

मांजी अब भी बोले जा रही थीं, ‘‘करने वाले बहुत कुछ करते हैं. स्वेटर बनाते हैं, पापड़बड़ी अचार, डालते हैं, कशीदाकारी करते हैं…’’

बदन पर पानी डालते हुए रश्मि सोच रही थी, ‘आज जा कर सब से पहले मार्च के महीने का ड्यूटी चार्ट बनाना है.’

‘‘अम्मां, जमादार आए तो उसे 2 रुपए दे कर आंगन में झाड़ू लगवा लेना,’’ रश्मि ने सास को आवाज दी.

‘‘सुन, मेरे लिए एक जोड़ी चप्पल ले आना.’’

‘‘ठीक है, अम्मां,’’ कंघी कर के रश्मि ने लिपस्टिक लगाई.

‘‘वह सामने अंगूठे और पीछे पट्टी वाली चप्पल.’’

रश्मि ने भौंहें सिकोड़ीं, सास किसी खास डिजाइन के बारे में कह रही थीं.

‘‘अरे, वैसी ही जैसी स्वीटी की नानी ने पहनी थी, हलके पीले से रंग की.’’

‘‘अम्मां, मैं शाम को समझ लूंगी और कल चप्पल ला दूंगी.’’

रश्मि टिफिन पैक करने लगी. परांठा भी पैक कर लिया. नाश्ता करने का समय नहीं था.

‘‘मेरे ब्लाउज के जो बटन टूटे थे, लगा दिए हैं?’’

‘‘ओह,’’ रश्मि को याद आया, ‘‘शाम को लगा दूंगी.’’

अम्मां का चेहरा असंतुष्ट हो उठा. रश्मि किसी तरह पैरों में चप्पल डाल कर दफ्तर के लिए रवाना हुई. तेज चले तो 9 बजे वाली बस अब भी मिल सकती है.

आज शाम रश्मि जल्दी नहीं निकल सकी. 4 बजे साहब ने बुला कर जो टारक योजना समझानी शुरू की तो 5 बजने पर भी नहीं रुके.

‘‘मेरी बस निकल जाएगी, साहब,’’ उस ने झिझकते हुए कहा.

‘‘ओह, मैं तो भूल ही गया,’’ बौस ने चौंक कर घड़ी देखी.

‘‘जी, कोई बात नहीं,’’ रश्मि ने मुसकराने का प्रयास किया.

दफ्तर से निकलते ही टारक योजना दिमाग से निकल गई और रात को क्या भोजन बनाए इस की चिंता ने आ घेरा. जाते हुए सब्जी भी खरीदनी है. बस आने पर धक्कामुक्की कर के चढ़ी पर वह बीच रास्ते में खराब हो गई. रश्मि मन ही मन गालियां देने लगी. दूसरी बस ले कर घर पहुंचतेपहुंचते 7 बज गए. दूर से ही छत के ऊपर छज्जे पर खड़ा स्वरूप दिख गया. छुपनछुपाई खेल रहा था बच्चों के संग. बहुत ही खतरनाक स्थिति में खड़ा था. गलती से भी थोड़ा और खिसक आया तो सीधे नीचे आ गिरेगा. रश्मि का तो कलेजा मुंह को आ गया.

‘‘स्वरूप,’’ उस ने कठोर स्वर में आवाज दी, ‘‘जल्दी नीचे उतर आओ.’’

‘‘अभी आया, मां,’’ कह कर स्वरूप दीवार फांद कर छत के दूसरी ओर गायब हो गया. अभी तक स्कूल के कपड़े भी नहीं बदले थे. सफेद कमीज व निकर पर दिनभर की गर्द जमा हो गई थी. बाल अस्तव्यस्त और हाथपांव धूल में सने थे. रश्मि का खून खौलने लगा. अम्मां दिन भर क्या करती रहती हैं. लगता है सारा दिन धूप में खेलता रहा है. हजार बार कहा है उसे छत के ऊपर न जाने दिया करें.

‘‘अम्मां,’’ अभी रश्मि ने आवाज ही दी थी कि सास फूट पड़ीं, ‘‘तेरा बेटा मुझ से नहीं संभलता. कल ही किसी क्रेच में इस का बंदोबस्त कर दे. सारा दिन इस के पीछे दौड़दौड़ कर मेरे पैरों में दर्द हो गया. कोई कहना नहीं मानता. स्कूल से लौट कर न नहाया, न कपड़े बदले, न ही ठीक से खाना खाया. ऊधम मचाने में लगा है. तू अपनी आंखों से देख क्या हाल बनाया है. मैं ने छत पर जाने से रोका तो मुझे धक्का मार कर निकल गया.’’

‘‘है कहां वह? अभी तक आया नहीं नीचे,’’ क्रोध से आगबबूला होती रश्मि स्वयं ही छत पर चली.

‘‘क्या बात है? नीचे क्यों नहीं आए?’’ ऊपर पहुंच कर उस ने स्वरूप को झिंझोड़ा.

‘‘बस, अपनी पारी दे कर आ रहा था मां.’’

मां के क्रोध से बेखबर स्वरूप की मासूमियत रश्मि के क्रोध को पिघलाने लगी, ‘‘चलो नीचे. दादी का कहा क्यों नहीं माना?’’

‘‘मुझे अच्छा नहीं लगता,’’ स्वरूप ने मुंह फुलाया, ‘‘इधर मत कूदो, कागज मत फैलाओ. कमरे में बौल से मत खेलो, गंदे पांव ले कर सोफे पर मत चढ़ो.’’

रश्मि की समझ में न आया किस पर क्रोध करे. बच्चे को बचपना करने से कैसे रोका जा सकता है? सास की भी उम्र बढ़ रही है, ऐसे में सहनशीलता कम होना स्वाभाविक है.

‘‘दादी तुम से बड़ी हैं स्वरूप. तुम्हें बहुत प्यार करती हैं. उन का कहना मानना चाहिए.’’

‘‘फिर मुझे आइसक्रीम क्यों नहीं खाने देतीं?’’

रश्मि थकावट महसूस करने लगी. कब तक नासमझ रहेगा स्वरूप.

‘‘आ गए लाट साहब,’’ पोते को देखते ही दादी का गुस्सा भड़क उठा, ‘‘तुम ने अभी तक इसे कुछ भी नहीं कहा? अरे, मैं कहती हूं इतना सिर न चढ़ाओ,’’ अपने प्रति दोषारोपण होते देख रश्मि का शांत होता क्रोध फिर उबल पड़ा.

‘‘चलो, कपड़े बदल कर हाथमुंह धोओ.’’

‘‘मैं नहीं धोऊंगा,’’ स्वरूप ने अड़ कर कहा.

‘‘क्या?’’ रश्मि जोर से चिल्लाई.

‘‘बस, मैं न कहती थी तुम्हारा लाड़प्यार इसे जरूर बिगाड़ेगा. लो, अब भुगतो,’’ सास ने निसंदेह उसे उकसाने के लिए नहीं कहा था पर रश्मि ने तड़ाक से एक चांटा बेटे के कोमल गाल पर जड़ दिया.

स्वरूप जोर से रो पड़ा, ‘‘नहीं बदलूंगा कपड़े. जाओ, कभी नहीं बदलूंगा,’’ कह कर दूर जा कर खड़ा हो गया.

‘‘हांहां, कपड़े क्यों बदलोगे, सारा दिन आवारा बच्चों के साथ मटरगश्ती के सिवा क्या करोगे? देख रश्मि, असली बात तो मैं भूल गई, जा कर देख बौल मार कर ड्रेसिंग टेबल का शीशा तोड़ डाला है.’’

रश्मि को अब अचानक सास के ऊपर क्रोध आने लगा. थकीमांदी लौटी हूं और घर में घुसते ही राग अलापना शुरू कर दिया. गुस्से में उस ने स्वरूप के गाल पर 2 चांटे और जड़ दिए.

रश्मि क्रोध से और भड़की. पुत्र को खींच कर खड़ा किया और तड़ातड़ पीटना शुरू कर दिया.

‘‘सारी उम्र मुझे तंग करने के लिए ही पैदा हुआ था? बाकी 2 तो मर गए, तू भी मर क्यों न गया?’’

‘‘क्या पागल हो गई है रश्मि. बच्चे ने शरारत की, 2 थप्पड़ लगा दिए बस. अब गाली क्यों दे रही है? क्या पीटपीट कर इसे मार डालेगी?’’

क्रोध, ग्लानि और अवसाद ने रश्मि को तोड़ कर रख दिया था. कमरे में आ कर वह फफकफफक कर रो पड़ी. यह क्या किया उस ने. जान से भी प्रिय एकमात्र पुत्र के लिए ऐसी अशुभ बातें उस के मुंह से कैसे निकलीं?

‘‘जोश को समय पर लगाम दिया कर. जो मुंह में आता है वही बकने लगती है,’’ इकलौता पोता रश्मि की सास को भी कम प्रिय न था, ‘‘अरे, मैं सारा दिन सहती हूं इस की शरारतें और तू ने सुन कर ही पीटना शुरू कर दिया,’’ रश्मि की सास देर तक उसे कोसती रही. रश्मि के आंसू थम ही नहीं रहे थे. रहरह कर किसी अज्ञात आशंका से हृदय डूबता जा रहा था.

तभी एक कोमल स्पर्श पा कर रश्मि ने आंखें खोलीं. जाने स्वरूप कब आंगन से उठ आया था और यत्न से उस के आंसू पोंछ रहा था, ‘‘मत रोओ, मां. कोई मां की बद्दुआ लगती थोड़ी है.’’

रश्मि ने खींच कर पुत्र को हृदय से लगा लिया. कौन सिखाता है इसे इस तरह बोलना. समय से पहले ही संवेदनशील हो गया. फिर अभीअभी जो नासमझी कर रहा था वह क्या था?

जो हो, नासमझ, समझदार या परिपक्व, रश्मि के हृदय का टुकड़ा हर स्थिति में अतुलनीय है. पुत्र को बांहों में भींच कर रश्मि सुख का अनुभव कर रही थी. Family Story In Hindi

Social Story : जीवन चक्र – आशा ने जिंदगी के कौन से बड़े उतारचढ़ाव देखे थे ?

Social Story : उस का नाम कई बार बदला गया. उस ने जिंदगी के कई बडे़ उतारचढ़ाव देखे. झुग्गीझोंपड़ी की जिंदगी वही जान सकता है, जिस ने वहां जिंदगी बिताई हो. तंग गलियां, बारिश में टपकती छत. बाप मजदूरी करता, मां का साया था नहीं, मगर लगन थी पढ़ने की. सो, वह पास के ही एक स्कूल से मिडिल पास कर गई.

मिसेज क्लैरा से बातचीत कर के उस की अंगरेजी भी ठीक हो चली थी. पासपड़ोस के आवारा, निठल्ले लड़के जब फिकरे कसते, तो दिल करता कि वह यहां से निकल भागे. मगर वह जाती कहां? बाप ही तो एकमात्र सहारा था उस का. आम लड़कियों की तरह उस के भी सपने थे. अच्छा सा घर, पढ़ालिखा, अच्छे से कमाता पति. मगर सपने कब पूरे होते हैं?

उस का नाम आशा था. उस के लिए मिसेज क्लैरा ही सबकुछ थीं. वही उसे पढ़ालिखा भी रही थीं. वे कहतीं कि आगे पढ़ाई कर. नर्सिंग की ट्रेनिंग कराने का जिम्मा भी उन्हीं के सिर जाता है. उसे अच्छे से अस्पताल में नौकरी दिलाने में मिसेज क्लैरा का ही योगदान था. वह फूली नहीं समाती थी.

सफेद यूनिफौर्म में वह घर से जब निकली, तो वही आवारा लड़के आंखें फाड़ कर कहते, ‘‘मेम साहब, हम भी तो बीमार हैं. एक नजर इधर भी,’’ पर वह अनसुना कर के आगे बढ़ जाती. पड़ोस का कलुआ भी उम्मीदवारों की लिस्ट में था. अस्पताल में शकील भी था. वह वहां फार्मासिस्ट था. वह था बेहद गोराचिट्टा और उस की बातों से फूल झड़ते थे. लोगों ने महसूस किया कि फुरसत में वे दोनों गपें हांकते थे. आशा की हंसी को लोग शक की नजरों से देखने लगे थे. सोचते कि कुछ तो खिचड़ी पक रही है. इस बात से मिसेज क्लैरा दुखी थीं. वे तो अपने भाई के साथ आशा को ब्याहना चाहती थीं. इश्क और मुश्क की गंध छिपती नहीं है. आखिरकार आशा से वह आयशा शकील बन गई. उन दोनों ने शानदार पार्टी दी थी.

यह देख मिसेज क्लैरा दिमागी आघात का शिकार हो गई थीं. वे कई दिन छुट्टी पर रहीं… आशा यानी आयशा उन से नजरें मिलाने से कतरा रही थी.

मिसेज क्लैरा का गुस्सा वाजिब था. वे तो अपने निखट्टू भाई के लिए एक कमाऊ पत्नी चाहती थीं. मगर अब क्या हो सकता था, तीर कमान से निकल चुका था.

आयशा वैसे तो हंसबोल रही थी, मगर उस के दिल पर एक बोझ था.

शकील ने भांपते हुए कहा, ‘‘क्या बात है? क्या तबीयत ठीक नहीं है?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं. बस, थकान है,’’ कह कर उस ने बात टाल दी.

मिसेज क्लैरा सबकुछ भुला कर अपने काम में बिजी हो गईं. आयशा ने उन की नजरों से बचने के लिए दूसरे अस्पताल में नौकरी तलाश ली थी. आयशा की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया था. उस का स्वभाव अब भी वैसा ही था. मरीजों को दवा देना, उन का हालचाल पूछना. उस का बचपन का देखा सपना पूरा हो चला था. वह कच्चे मकान और बदबूदार गलियों से निकल कर स्टाफ क्वार्टर में रहने को आ गई थी. धीरेधीरे कुशल घरेलू औरत की तरह उस ने सारे सुख के साधन जुटा लिए थे. 3 साल में वह दोनों 2 से 4 बन चुके थे. एक बेटा और एक बेटी.

कल्पनाओं की उड़ान इनसान को कहां से कहां ले जाती है. इच्छाएं दिनोंदिन बढ़ती चली जाती हैं. बच्चों की देखभाल की चिंता किए बिना ही शकील परदेश चला गया… आयशा ने लाख मना किया, मगर वह नहीं माना. आयशा रोज परदेश में शकील से बातें करती व बच्चों का और अपने प्यार का वास्ता देती. बस, उस के सपने 4 साल ही चल सके. मिडिल ईस्ट में शायद शकील ने अलग घर बसा लिया था. आयशा के सपने बिखर गए. शुरूशुरू में तो शकील के फोन भी आ जाते थे कि अपना और बच्चों का ध्यान रखना. कभीकभार वैसे भी आते रहे. दिनों के साथ प्यार पर नफरत की छाया पड़ने लगी.

‘‘बुजदिल… बच्चों पर ऐसा ही प्यार उमड़ रहा था, तो देश छोड़ कर गया ही क्यों?’’

आयशा समझ गई थी कि शकील अब लौट कर नहीं आएगा… वह नफरत से कहती, ‘‘सभी मर्द होते ही बेवफा हैं.’’ आयशा अब पछता रही थी. उसे अपने सपने पूरे करने के बजाय मिसेज क्लैरा के सपने पूरे करने चाहिए थे. ‘पलभर की भूल, जीवन का रोग’ सच साबित हो गया. शकील भी शायद आयशा से छुटकारा पाना चाहता था और वह भी… आसानी से तलाक भी हो गया. उस दिन वह फूटफूट कर रोई थी.

बच्चों ने पूछा, ‘मम्मी, क्या पापा अब नहीं आएंगे?’

‘‘नहीं…’’ आयशा रोते हुए बोली थी.

‘क्यों नहीं?’ बच्चों ने पूछा था.

‘‘क्योंकि, तुम्हारे पापा ने नई मम्मी ढूंढ़ ली है.’’

आशा ने मिसेज क्लैरा के भाई से शादी कर ली… उन्हें शांति मिल गई थी. पर वे खुद कैंसर से पीडि़त थीं. अब वह आशा ग्रेस मैसी बन चुकी थी. मिसेज क्लैरा की जिंदगी ने आखिरी पड़ाव ले लिया था. वे भी दुनिया सिधार चुकी थीं. अब वह और ग्रेस मैस्सी… यही जीवन चक्र रह गया था. मगर उस का बेटा शारिक ग्रेस को स्वीकार न कर सका. शारिक अकसर घर से बाहर रहने लगा. वह समझदार हो चला था. वह लाख मनाती कि अब तुम्हारे पापा यही हैं.

‘‘नहीं… मेरे पापा तो विदेश में हैं. मैं अभी तुम्हारी शिकायत पापा से करूंगा. मुझे पापा का फोन नंबर दो.’’

यह सुन कर आशा हैरान रह जाती. आशा की बेटी समीरा गुमसुम सी रहने लगी थी. ग्रेस भी आशा के पैसों पर ऐश कर रहा था. आज मिसेज क्लैरा न थीं, जो हालात संभाल लेतीं. आशा आज कितनी अकेली पड़ गई थी. अस्पताल और घर के अलावा उस ने कहीं आनाजाना छोड़ दिया था. हंसी उस से कोसों दूर हो चली थी, मगर जिम्मेदारियों से वह खुद को अलग नहीं कर सकी थी.

शारिक को आशा ने अच्छी तालीम दिलाई. वह घर छोड़ कर जाना चाहता था. सो, वह भी चला गया. शराब ने ग्रेस को खोखला कर दिया था. वह दमे का मरीज बन चुका था.

शारिक 2-4 दिन को घर आता, तो नाराज हो जाता. वह कहता, ‘‘मम्मी, कहे देता हूं कि इसे घर से निकालो. यह हरदम खांसता रहता है. सारा पैसा इस की दवाओं पर खर्च हो जाता है.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते बेटा.’’

‘‘मम्मी, आप ने दूसरी शादी क्यों की?’’

और यह सुन कर आशा चुप्पी लगा जाती. वह तो खुद को ही गुनाहगार मानती थी, मगर वह जानती थी कि उस ने मिसेज क्लैरा के चलते ऐसा किया. वह उस की गौडमदर थीं न? आशा अब खुद ईसाई थी, मगर उस ने अपने बच्चों को वही धर्म दिया, जिस का अनुयायी उन का बाप था.

समीरा की शादी भी उस ने उसी धर्म में की, जिस का अनुयायी उस का बाप था. आशा का घर दीमक का शिकार हो चला था. वह फिर से झुगनी बस्ती में रहने को पहुंच गई थी. ग्रेस ने उसी झुगनी बस्ती में दम तोड़ा. बेटे शारिक को उस ने ग्रेस के मरने की सूचना दी, मगर वह नहीं आया.

आशा अब तनहा जिंदगी गुजार रही थी. उस की ढलती उम्र ने उसे भी जर्जर कर दिया था. रात में न जाने कितनी यादें, न जाने कितने आघात उसे घेर लेते. वह खुद से ही पूछती, ‘‘मां बनना क्या जुर्म है? क्या वही जिंदगी का बोझ ढोने को पैदा होती है?’’ उसे फिल्म ‘काजल’ का वह डायलौग याद आ रहा था, जिस में मां अपने बेटे का इंतजार करती है. धूपबत्ती जल रही है. गंगाजल मुंह में टपकाया जा रहा है. डूबती सांसों से कहती है, ‘स्त्री और पृथ्वी का जन्म तो बोझ उठाने के लिए ही हुआ है.’

आशा के सीने पर लगी चोट अब धीरेधीरे नासूर बन कर रिस रही थी.

बेटा शारिक आखिरी समय में आया और बेटी समीरा भी आई. मां को देख बेटा भावविभोर था, ‘‘मम्मी, आखिरी समय है आप का. अब भी लौट आओ. ‘‘अच्छा, जैसी तुम्हारी इच्छा. मरने के बाद इस शरीर को चाहे आग में जला देना, चाहे मिट्टी के हवाले करना…’’ और वह दुनिया से चली गई. किसी की आंख से एक आंसू भी नहीं टपका. अंतिम यात्रा में कुछ लोग ही शामिल थे.

‘‘क्या यह वही नर्स थी. क्या नाम था… मैसी?’’

‘‘तो क्या हुआ अंतिम समय में तो वह कलमा गो यानी मुसलिम थी. कहां ले जाएं इसे. यहीं पास में एक कब्रिस्तान है. वहीं ले चलें. और आशा मिट्टी में समा गई.’’ मैं अकसर उधर से गुजर रहा होता. आवारा लड़के क्रिकेट खेलते नजर आते. वहां कुछ ही कबे्रं रही होंगी. शायद लावारिस लोगों की होंगी. लेकिन आशा के वारिस भी थे. एक बेटा और एक बेटी. इस नाम के कब्रिस्तान में कोई दीया जलाने वाला न था. अब चारों तरफ ऊंचीऊंची इमारतें बन गई थीं. लोगों ने अपनी नालियों के पाइप इस कब्रिस्तान में डाल दिए थे. 3 महीने बाद आशा की बेटी समीरा बैंक की पासबुक लिए मेरे पास आई और बोली, ‘‘मम्मी के 50 हजार रुपए बैंक में जमा हैं. जरा चल कर आप सत्यापन कर दें. हम वारिस हैं न?’’ और मैं सोच रहा था कि आशा न जाने कितनी उम्मीदें लिए दुनिया से चली गई. वह जिस गंदी बस्ती में पलीबढ़ी, वहीं उस ने दम तोड़ा.

मेरे दिमाग में कई सवाल उभरे, ‘क्या फर्क पड़ता है, अगर आशा किसी ईसाई कब्रिस्तान में दफनाई जाती? क्या फर्क पड़ता है, अगर वह ताबूत में सोई होती? शायद, उस के नाम का एक पत्थर तो लगा होगा.’

‘‘हाय आशा…’’ मेरे मुंह से निकला और मेरी पलकें भीग गईं. Social Story 

Family Story : बदला – मंजूषा को क्यों हो रही थी कॉलेज जाने की जल्दी ?

Family Story : चमन, दौड़ता हुआ मंजूषा के पास पहुंचा. चमन को हांफते देख मंजूषा एकदम सकते में आ गई.

‘‘अरे…अरे, क्या हुआ चमन? किसी से झगड़ा हो गया क्या? भंवर भैया कहां हैं? जल्दी बताओ. तुम दौड़ते हुए क्यों आए हो?’’ मंजूषा ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

‘‘ब…बतलाता… हूं दीदी. पहले सांस तो ले लेने दो,’’ चमन एक पल को रुका. फिर गहरी सांस लेता हुआ बोला, ‘‘मंजूषा दी, मेरी बात ध्यान से सुनो…’’ चमन फुसफुसा कर मंजूषा के कान में कुछ कहने लगा.

 पूरी बात सुन कर मंजूषा होंठों ही होंठों में बुदबुदाई, ‘‘उस की यह मजाल…?’’

‘‘आप कुछ करें दीदी वरना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा.’’

मंजूषा ने कुछ सोचते हुए चमन से कहा, ‘‘तुम जाओ, मैं सब संभाल लूंगी.’’

‘‘हां दीदी, कुछ करो, वरना गोपाल और भंवर आपस में जरूर टकरा जाएंगे,’’ इतना कह कर चमन चला गया.

मंजूषा ने अपनी किताबें लीं और झटपट कालेज जाने के लिए घर से निकल पड़ी. मंजूषा जल्दीजल्दी कदम बढ़ाती हुई सुरसी के घर की ओर चली जा रही थी. ‘कहीं सुरसी कालेज के लिए घर से निकल न पड़ी हो,’ सोच कर मंजूषा ऊपर से नीचे तक कांप जाती थी. उस के कदम पहले से और तेज हो गए. सुरसी के घर पर पहुंचते ही उस ने घंटी बजाई.

‘‘आती हूं, आती हूं,’’ और उसी समय दरवाजा खुल गया. सामने सुरसी की मां को खड़ी देख कर मंजूषा का दिल एकदम ‘धक्क’ रह गया. फिर संयत हो कर बोली, ‘‘नमस्ते आंटी, सुरसी कालेज चली गई क्या?’’

‘‘अभी नहीं गई. जाने ही वाली है बस, नाश्ता कर रही है. आओ, अंदर आओ,’’ सुरसी की मां ने कहा. यह सुन कर मंजूषा को बड़ी राहत महसूस हुई.

‘‘कौन है मां?’’ पूछती हुई सुरसी की निगाह मंजूषा पर पड़ी तो वह खुशी से चहक पड़ी, ‘‘अरे, तुम?’’

‘‘हां सुरसी… मैं ने सोचा आज तुम्हारे साथ चलूं. रजनी  आज मुझ से पहले ही कालेज निकल गई.’’

‘‘अच्छा, बस थोड़ी देर रुको, अभी चलती हूं. मुझे भी आज जल्दी पहुंचना है. आज भौतिकी का प्रैक्टिकल है,’’ सुरसी ने कहा और अपनी जरूरी चीजें उठाने में लग गई.

उधर, बाजार के चौैराहे के पास ही भंवर अपने दोस्तों के साथ बड़ी बेसब्री से सुरसी का इंतजार कर रहा था. उस ने चंदन से कहा, ‘‘मैं गोपाल की बहन को आज रंग व गुलाल से रंग कर ही रहूंगा, चाहे जो भी हो जाए. मैं उसे बताना चाहता हूं कि भंवर से दुश्मनी लेना कितना महंगा पड़ता है. बदला लेना है मुझे उस से.’’

‘‘हां भंवर,’’ चंदन बोला, ‘‘वह अपनेआप को बहुत होशियार समझता है. उसे सबक सिखाना ही चाहिए.’’

‘‘उस ने मेरी बहन को स्कूल में रंगा था तो मैं उस की बहन को बीच चौराहे पर रंग दूंगा,’’ भंवर ने उत्तेजित होते हुए कहा.

‘‘भंवर,’’ दीपक बोला, ‘‘अभी तक चमन का पता नहीं है. उसे गुलाबी रंग लेने को भेजा था. अभी तक नहीं आया.’’

‘‘अरे, वह तो एकदम मूर्ख है. तू खुद ही क्यों नहीं चला गया रंग लेने?’’ चंदन ने कहा.

‘‘मैं कैसे जाता? वह खुद जाने के लिए जिद कर रहा था.’’

‘‘ठीक है, ठीक है,’’ भंवर झल्ला कर बोला, ‘‘मैं उसे बाद में देख लूंगा. अब तुम सब तैयार हो जाओ. हमारे पास जितना गुलाल है, उसी से होली खेल लेंगे.’’

‘‘अरे, कैसे खेल लोगे दोस्तो?’’ चमन ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘लो… ले आया मैं गुलाबी रंग और गुलाल,’’ कहते हुए चमन ने पु़िड़या भंवर की ओर बढ़ा दी.

‘‘अब मजा आएगा, जब सुरसी के मुंह पर, दांतों पर, बालों में, गुलाबी रंग चमकेगा… हा…हा…’’ खुशी से झूमता हुआ भंवर बोला.

उसी समय दीपक उछलता हुआ बोला, ‘‘भंवर, वह देख सुरसी आ रही है. उस के साथ मंजूषा दीदी भी हैं…’’

भंवर एकदम सकपका गया. फिर संभलता हुआ बुदबुदाया, ‘‘मंजूषा दीदी, सुरसी के साथ?’’

‘‘अब क्या होगा?’’ चंदन फुसफुसा कर बोला.

भंवर कुछ कहता, तब तक सुरसी और मंजूषा बिलकुल उस के पास पहुंच गई थीं. भंवर तिलमिला उठा. उस ने रंग से सने अपने हाथ चुपचाप पीछे कर लिए. दीपक, चंदन और लखन पहले ही मंजूषा को सुरसी के साथ देख कर भंवर से कुछ दूर हट गए थे. चमन मन ही मन बेहद खुश हो रहा था. उस ने भंवर के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘यार, मंजूषा दीदी ने बचा लिया सुरसी को, लेकिन जो भी होता है, अच्छा ही होता है.’’ भंवर ने चमन को खा जाने वाली नजरों से देखा.

दोनों सहेलियां आगे निकल गईं. उन के काफी दूर निकल जाने के बाद भंवर ने तमतमा कर गुस्से में दोनों मुट्ठियों में लिया हुआ रंग जमीन पर बिखेर दिया और खीज कर रह गया. शाम को भंवर भन्नाया हुआ घर पहुंचा. मंजूषा पहले ही घर पहुंच चुकी थी. भंवर ने दरवाजे की घंटी बजाई तो दरवाजा मंजूषा ने ही खोला. सामने मंजूषा को देख वह चीख कर बोला, ‘‘आज बचा लिया अपनी सहेली को? आखिर इस तरह वह कब तक बच पाएगी?’’

‘‘क्या मतलब?’’ मंजूषा बोली.

 ‘‘मतलब साफ है. आज मैं सुरसी को बीच चौराहे पर रंगना चाहता था.’’

‘‘क्यों, आखिर क्यों रंगना चाहते थे?’’ मंजूषा ने पूछा.

‘‘इसलिए कि उस के भाई गोपाल ने पिछले साल तुम्हें रंगा था,’’ भंवर चिल्ला कर बोला.

‘‘वाह भंवर, खूब बदला लेने की ठानी थी.’’

‘‘ठानी थी नहीं, ठानी है. आज नहीं तो कल, मैं सुरसी को रंग कर ही रहूंगा.’’

‘‘लेकिन यह मत भूलो कि जब गोपाल ने मुझे रंगा था तब वह होली स्कूल में बच्चों की स्नेह भरी होली थी. हम सभी ने खुशी से एकदूसरे को रंगा था न कि जबदरस्ती, लेकिन तुम और तुम्हारी सड़कछाप टोली…’’

‘‘मंजूषा…’’ भंवर जोर से चीखा.

उसी समय बगल वाले कमरे से परदे की आड़ में खड़ी सुरसी सामने आ गई. उसे देख भंवर हक्काबक्का रह गया. दोनों एकदूसरे को देखते ही रह गए. सुरसी बोली, ‘‘तो यह बात थी. मंजूषा इसीलिए मेरे साथ कालेज गई थी?’’ फिर सुरसी भंवर की ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘लो… मैं खड़ी हूं. जितना चाहो, उतना रंग लो. ले लो अपना बदला.’’ भंवर से कुछ बोलते नहीं बना. उस की जबान में मानो ताला पड़ गया. उस ने मंजूषा की ओर देखा. मंजूषा ने कहा, ‘‘हां, रंग डालोे. होली चौराहे की नहीं, चौखट के अंदर वाली अच्छी होती है.’’

भंवर ने एक नजर सुरसी पर डाली. फिर जेब में रखी गुलाल की थैली से एक चुटकी गुलाल निकाल कर सुरसी के माथे पर तिलक लगा दिया और झटके से मुड़ कर बाहर जाने लगा. सुरसी ने आवाज दी, ‘‘रुको भैया,’’ और वह भंवर के सामने जा पहुंची, बोली, ‘‘इस तरह नहीं, आप ने तो तिलक लगा दिया अब मैं भी तो लगाऊंगी,’’ कहते हुए सुरसी ने भंवर के हाथ से गुलाल की थैली ले कर भरपूर गुलाल से भंवर के गालों व बालों को रंग दिया. Family Story

Muslim Women : मुसलिम औरतों का हलाला – धर्म की आड़ में ‘बलात्कार’

Muslim Women : मुसलिम तबके के लिए यह कितने बड़े मजाक का विषय है कि उस की औरतों के लिए एकतरफ बुर्का है और दूसरी तरफ हलाला. यह बात ध्यान देने वाली है कि मुसलिम समाज का जहां एक बड़ा वर्ग ये दलीलें देते नहीं थकता कि औरतों का परदे में रहना फर्ज है, वे किसी के सामने न जाएं, यहां तक कि ऐसे फतवे भी आते रहते हैं कि जिस दफ्तर में मर्द काम करते हों वहां औरतें काम तक न करें, वहीं यह विरोधाभास कि यदि तलाक के बाद अपनी ही बीवी को वापस रिश्ते में लेना है तो उसे वही मर्द (पति) दूसरे मर्द के साथ निकाह कर ने व यौन संबंध बनाने के लिए भेजता है. वही आदमी दूसरे आदमी के सामने अपनी पूर्व पत्नी को बेपरदा करता है जो उसे बिना बुर्के के घर से बाहर कदम नहीं रखने देता था. धर्म के नाम पर यह घिनौना बलात्कार है जिस के खिलाफ दुनियाभर की मुसलमान औरतों को अब एकजुट हो जाना चाहिए.

Laser Technology : बिना तारों की बिजली

Laser Technology : आज भी देश में दूरदराज के कई इलाकों तक बिजली नहीं पहुंची है. कई इलाकों तक बिजली पहुंची भी है तो आंधी और बारिश के मौसम में बिजली के खंबों के गिर जाने के कारण महीनों तक बिजली गुल रहती है. क्या हो अगर बिजली के लिए खंबों और लंबी तारों की जरूरत ही न हो?

जून 2025 में अमेरिकी रक्षा अनुसंधान एजेंसी डीएआरपीए ने न्यू मैक्सिको में एक हैरतअंगेज कारनामा कर दिखाया है. डीएआरपीए ने लेजर तकनीक की मदद से 800 वौट ऊर्जा को 8.6 किलोमीटर दूर तक सफलतापूर्वक भेजने में सफलता हासिल की है. इस 30 सैकंड के प्रयोग में एक मेगाजूल से अधिक ऊर्जा भेजी गई है जो पहली बार हुआ है.

यह सफलता साबित करती है कि लंबी दूरी तक वायरलैस बिजली भेजना अब कोई सपना नहीं, बल्कि एक उज्ज्वल वास्तविकता है. एक शक्तिशाली लेजर और दूर स्थित विशेष प्रकार के रिसीवर का उपयोग कर के दुर्गम इलाकों तक भी बिजली पहुंचाई जा सकती है.

वायरलैस बिजली भेजने का यह सपना लगभग एक सदी से भी पहले महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला ने देखा था. उन्होंने ‘वर्ल्ड सिस्टम’ नामक एक विशाल टावर के निर्माण के माध्यम से दुनियाभर में वायरलैस बिजली वितरण की कल्पना की थी लेकिन पिछली सदी में हुए तमाम प्रयासों के बावजूद निकोला का यह सपना पूरा न हो सका. लेकिन अब डीएआरपीए ने इस अधूरे ख्वाब को पूरा करने में सफलता हासिल कर ली है. यह बिजली के आविष्कार जितना ही महत्त्वपूर्ण साबित होने वाला आविष्कार है.

आने वाले वक्त में हम एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहां बिजली के खंबों और बिजली की मीलों लंबी तारों से छुटकारा मिल जाएगा और आप के हाथ का मोबाइल बिना चार्जर के चार्ज हो जाएगा.

Medicines : दवाएं हो जाएंगी बेअसर

Medicines : मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया है कि पशुओं के गोबर में एंटीबायोटिक रैसिस्टेंस जीन्स भरे पड़े हैं, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं. इस अध्ययन के नतीजे जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं. यह मवेशियों के गोबर में मौजूद एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीनों पर किया अब तक का सब से व्यापक अध्ययन है.

14 वर्षों तक चले इस वैश्विक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 26 देशों से 4,000 से ज्यादा गोबर के नमूनों की जांच की है. इस दौरान गाय, सूअर और मुरगियों के गोबर का विश्लेषण किया गया. इस विश्लेषण के जो नतीजे सामने आए हैं, वो हैरान करने वाले हैं.

किसान जिस गोबर को खाद मानते हैं, वो अब धीरेधीरे मानव स्वास्थ्य के लिए एक अदृश्य खतरा बनता जा रहा है. जानवरों के इलाज में की जाने वाली गलतियां, एंटीबायोटिक दवाएं और पेड़पौधों पर डाले जाने वाले कीटनाशक भोजन के माध्यम से जानवरों के शरीर में जा रहे हैं और गोबर की खाद में पनपने वाले एंटीबायोटिक रैसिस्टेंस जीन्स इंसानों की सेहत पर भारी पड़ रहे हैं. पशुपालन से जुड़ा एक खामोश खतरा धीरेधीरे दबेपांव दुनिया में पैर पसार रहा है.

नतीजे दर्शाते हैं कि जानवरों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के असर से ऐसे जीन बन रहे हैं जो इंसानी शरीर में जा कर एंटीबायोटिक्स को बेअसर कर देते हैं. ऐसे में सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या हम उस दौर की ओर बढ़ रहे हैं जब मामूली बुखार भी जानलेवा हो सकता है.

Health Update : औरतों को मर्दों के मुकाबले ज्यादा नींद चाहिए

Health Update : नींद हमारे शरीर और दिमाग के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कि खाना और पानी. मैंटल, फिजिकल और इमोशनल तौर से हैल्दी रहने के लिए भरपूर नींद लेना बेहद जरूरी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिक नींद लेने की जरूरत होती है.

दरअसल मनुष्य का शरीर बिना किसी बाहरी मदद के भी अपने अंदर आई अनेक खराबियों को दुरुस्त करता रहता है और विकास के लिए लगातार काम करता है. ये सारे काम ज्यादातर नींद के दौरान ही होते हैं जब हमारी ग्रोथ हार्मोन सब से ज्यादा सक्रिय होते हैं. हाल ही में नैशनल लाइब्रेरी औफ मैडिसिन में ‘अ सोसाइटी फौर वुमन हैल्थ रिसर्च’ की एक रिपोर्ट पब्लिश की गई. इस रिपोर्ट की मानें तो महिलाओं और पुरुषों में नींद के घंटे अलगअलग होते हैं. मतलब दोनों को सोने के लिए अलगअलग घंटे चाहिए, क्योंकि महिलाएं दिनभर में पुरुषों की तुलना में ज्यादा मानसिक ऊर्जा खर्च करती हैं, जिस से उन के ब्रेन को ज्यादा रिकवरी टाइम यानी नींद की जरूरत होती है.

ब्रिटिश जर्नल औफ स्पोर्ट्स मैडिसिन की रिपोर्ट भी कहती है कि महिलाओं का दिमाग अधिक जटिल होता है और वे एक समय में कई काम करने की क्षमता रखती हैं. इस का मतलब यह हुआ कि उन का दिमाग ज्यादा मेहनत करता है और उसे ठीक से रिपेयर होने के लिए ज्यादा आराम यानी ज्यादा नींद चाहिए. महिलाओं को औसतन 7.5 से 9 घंटे की नींद की जरूरत होती है, जबकि पुरुषों के लिए 7-8 घंटे पर्याप्त हैं. इस के अलावा महिलाएं ज्यादा रैपिड आई मूवमैंट स्लीप लेती हैं, जो ड्रीमिंग और मैमोरी बूस्टिंग के लिए जरूरी होती है.

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