Download App

Congress MP : थरूर का गरूर

Congress MP : कांग्रेस के केरल से सांसद शशि थरूर अब लगता है भाजपा में जाने का मन बना चुके हैं. उन्हें नरेंद्र मोदी ने सांसदों के उस दल का नेतृत्व दिया था जिन्हें विदेशों में औपरेशन सिंदूर के बाद डिप्लोमैसी के लिए भेजा गया था ताकि पाकिस्तानी प्रचार का मुकाबला किया जा सके. विदेशों में बहुत देशों की राय शायद यह है कि पहलगाम में आतंकवादियों के हाथों 26 लोगों की निर्मम हत्या के पीछे हाथ को ले कर भारत की वायुसेना का आक्रमण पाकिस्तानी ठिकानों पर कुछ गलत है.

शशि थरूर, जो चाहे नेता हों या न हों, इंग्लिश बढ़िया बोलते हैं. भारत का पक्ष जिस भी देश में उन्होंने रखा वहां नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की प्रशंसा में खूब पुल बांधे. कांग्रेस को इस पर कोई बड़ा आश्चर्य नहीं था क्योंकि शशि थरूर हमेशा ही अपनी चलाने में लगे रहते रहे हैं. हालांकि, उन्हें ऐसी सीटें मिलती रही हैं जहां पार्टी की बदौलत उन का जीतना आसान रहा है. वे कम मेहनत से कांग्रेस के भरोसे जीतते रहे हैं.

इंग्लिश में महारत के साथ उन्हें ब्राह्मणवादी प्रचार में भी महारत है. इस दृष्टि से वे 1947 के बाद की कांग्रेस के वल्लभभाई पटेल, सी राजगोपालाचारी, श्यामाचरण शुक्ल, डा. संपूर्णानंद, राजेंद्र प्रसाद और उस के बाद के जगन्नाथ मिश्र, विद्याचरण शुक्ल, हेमवती नंदन बहुगुणा के जैसे पौराणिक धर्म के हिमायती हैं. उन की किताब ‘व्हाई आई एम अ हिंदू’ हिंदू धर्म का ढिंढोरा पीटने का वह काम करती है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग भी नहीं कर पाते क्योंकि भाषा पर उन की थरूर जैसी पकड़ नहीं है.

इतने सालों से वे कांग्रेस में इसलिए हैं क्योंकि उन्हें वहां अपनी इंग्लिश के कारण कुछ भाव मिलता रहा है. उन के समर्थकों की बड़ी जमात चाहे न हो पर कांग्रेसी नेता उन से डरेसहमे रहते हैं कि कहीं वे ऐसी इंग्लिश न बोल दें कि उन का इंग्लिश अल्पज्ञान धराशायी हो जाए.

अब वे नरेंद्र मोदी का गुणगान ज्यादा कर रहे हैं जबकि ये वही मोदी हैं जिन्होंने शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर, जिन की संदिग्ध हालत में मृत्यु हुई थी, को 50 करोड़ की गर्लफ्रैंड कहा था.

केरल के बाहर और संसद के अलावा थरूर को कोई राजनेता मानता हो, इस में संदेह ही है. एक तरह से वे कांग्रेस पर बोझ हैं पर जब तक भाजपा उन्हें कोई पद ज्योतिरादित्य सिंधिया, हेमंत बिसवा सरमा की तरह या एकनाथ शिंदे की तरह नहीं देती वे कांग्रेसियों को अपनी इंग्लिश से हड़काते रहेंगे. गांधी जोड़ा (प्रियंका व राहुल) शायद सही मौका ढूंढ़ रहा है कि जब शशि थरूर से मुक्ति पाई जाए. उन्हें पार्टी से निकालने का मलतब होगा तिरुअनंतपुरम में लोकसभा सीट का उपचुनाव कराना और यह जोखिम कांग्रेस फिलहाल नहीं लेना चाहती.

Marriage : शादी वैध है या नहीं, देना होगा गुजारा भत्ता

Marriage : हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के तहत मिलने वाले अंतरिम भरण पोषण को ले कर इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. जिस में कहा गया कि ‘हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण पोषण तय करने के लिए यह देखना आवश्यक नहीं है कि विवाह वैध है या नहीं, बल्कि यह देखा जाता है कि क्या आवेदनकर्ता के पास स्वयं के लिए पर्याप्त आय है या नहीं.

इस मसले में महिला की अंतरिम भरण-पोषण याचिका को फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था. फैमिली कोर्ट में पति ने विवाह को अमान्य घोषित करने की याचिका दी थी. पति ने कहा था कि विवाह के समय पत्नी की पहली शादी अभी भी कायम थी. इस मामले में पत्नी ने धारा 24 के तहत अंतरिम भरण पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की थी.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘महत्वपूर्ण यह है कि कोर्ट यह देखे कि क्या अंतरिम भरण पोषण और खर्च की मांग करने वाले पक्ष को वास्तव में इस की आवश्यकता है, जिसे दूसरे पक्ष द्वारा दिया जाना चाहिए.’ अपीलकर्ता ने कहा कि उस का पति के साथ लंबे समय से संबंध था, जो पुलिस विभाग में कार्यरत है और 65,000 प्रति माह कमाता है, साथ ही बिल्डिंग मटेरियल का व्यवसाय भी करता है. उस ने 20,000 प्रति माह की मांग की.

प्रतिवादी ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि भरण पोषण देना कोर्ट के विवेक पर है और इस में संबंधित पक्षों के आचरण का भी महत्व होता है. उस ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने अपनी पूर्व शादी की जानकारी छुपाई और वह इनकम टैक्स विभाग में कार्यरत है.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 24 के तहत यह देखना आवश्यक नहीं है कि विवाह वैध है या नहीं, बल्कि यह देखा जाता है कि क्या आवेदनकर्ता के पास स्वयं के लिए पर्याप्त आय है या नहीं. फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए, हाईकोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह पत्नी को 15,000 प्रति माह की दर से अंतरिम भरण पोषण दे, जिस की गणना 15 अप्रैल 2025 से की जाएगी.

Police Raids : हुक्का बार पर छापे क्यों ?

Police Raids : हुक्का बार पर पुलिस के छापे क्यों पड़ते हैं ? असल में जो हुक्का बार आपसी मेलजोल बढ़ाने वाली जगह है. यह बार और नाइट क्लब से अलग होते हैं.

लखनऊ के में विकासनगर पुलिस ने ब्लैक शैडो कैफे की आड़ में चल रहे अवैध हुक्का बार पर छापा मार कर एक नाबालिग समेत 12 लोगों को गिरफ्तार किया है. पुलिस का आरोप है कि हुक्का बार में नाबालिगों को हुक्का परोस कर नशे का आदी बनाया जा रहा था. पुलिस ने मौके से 3 हुक्का, चिलम, पाइप, फ्लेवर तंबाकू बरामद किया. संचालक राधेलाल फरार हो गया था. पुलिस जब कैफे पहुंची तो वहां का नजारा भी कुछ अलग था. पुलिस को देख कर हुक्का बार में मौजूद लोगों के बीच भागदौड़ मच गई. पुलिस कहती है कि इस बार में कई बार स्कूली ड्रैस में बच्चे आते देखे गए थे.

लखनऊ में पुलिस कई अलगअलग हुक्का बार पर छापे मार चुकी है. इस से पहले 16 जनवरी को बाजाराखाला के होटल कासा में हुक्का बार पकड़ा गया था. 23 जनवरी को विकासनगर में कैफे ब्लैक एंपायर सील किया गया. 24 जनवरी को इन्दिरानगर नीलगिरी तिराहे के ब्लैकयार्ड बाई लक्स रेस्टोरेंट सील किया गया. 13 फरवरी को आईटी कालेज चैराहे के पास गार्डन कैफे पर छापा मारा गया था. 22 फरवरी को गोमतीनगर के पेबल्स बिस्ट्रो कैफे में हुक्का बार के शराब पिलाई जा रही थी. 27 फरवरी को आईआईएम रोड स्थित डार्क हाउस कैफे में छापेमारी कर संचालक समेत 3 को पकड़ा था. इस तरह की घटनाएं पूरे देश के बड़े शहरों में हो रही है.

पुरानी है हुक्का संस्कृति

हुक्का लाउंज या हुक्का बार का चलन बहुत पुराना है. भारत के कई राज्यों में हुक्का एक बड़ी संस्कृति का हिस्सा है. यह हुक्का मिट्टी का बना होता है. आज भी कई समुदायों में खुलेआम हुक्का पीने की पंरपरा है. जहां गांव की चैपाल में मुखिया हुक्का पीता है. हुक्का के अंदर तंबाकू होता है. तंबाकू को गरम करने के लिए कोयले रखे जाते हैं. हुक्के से जुड़ा होता है. जिस के जरीए तंबाकू को मुंह से खींचा जाता है. उस के साथ गांव के लोग भी उसी हुक्के से कश लेते हैं.

कई जातियों में पंचायत के फैसले में दंड के रूप में हुक्का पानी बंद करने की रवायत है. इस का मतलब यह होता है कि उस व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया गया है. हुक्का महिलाएं भी पीती हैं. हरियाणा और राजस्थान के तमाम समुदायों में महिला प्रमुख भी इस का उपयोग करती है. कई फिल्म और टीवी सीरियलों में ऐसे दृष्य देखे गए हैं. अब कुछ जगहों पर शादी विवाह की दावतों में भी हुक्का अनिवार्य होने लगा है.

हुक्का की यह पंरपरा मुगल काल में नवाबी संस्कृति से जुड़ी रही है. यह हुक्के ग्लास यानि शीशे या चांदी सोने जैसी धातुओं से तैयार होते थे. इस की शुरुआत प्राचीन फारस या भारतीय उपमहाद्वीप में हुई थी. तवायफों के कोठो पर राजा, नवाब और जमींदार हुक्के के कश लेते हुए नृत्य और संगीत का आनंद लेते थे. धीरेधीरे यह पश्चिमी देशों में पहुंच कर बाजार का हिस्सा हो गई. यहां हुक्का लाउंज के नाम से पहचाने जाने लगे. हुक्का लाउंज को ब्रिटेन और कनाडा के कुछ हिस्सों में शीशा बार या डेन या हुक्का बार भी कहा जाता है. यहां हर टेबल पर हुक्के रखे होते हैं. इस में सुगंधित तम्बाकू होती है.

अब हुक्का बार रेस्तरां या नाइट क्लब जैसे हो गए हैं. यह धूम्रपान करने के लिए एक आरामदायक जगह है. इस के साथ ही साथ यहां खाने पीने की सामाग्री भी मिल जाती है. इन का इंटीरियर भी अलग किस्म का होता है. रोशनी कम से कम होती है. कई हुक्का बार में तंबाकू युक्त हुक्का होता है तो अधिकतर जगहों पर फ्लेवर्ड तंबाकू होती है. तंबाकू नियंत्रण कानूनों के कारण के कारण यहां पर कई बार पुलिस को छापा मारने का अधिकार मिल जाता है. हुक्का बार को इस कारण सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता है.

ब्रिटेन में हुक्का सब से ज्यादा लेबनानी, पाकिस्तानी या मिस्र के लोगों द्वारा चलाए जाते है. 2007 में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध के बाद से हुक्का बार की संख्या बढ़ने लगी है. अब यह युवाओं के बीच में भी काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. हुक्का बार अब मनोरंजन का भी साधन बन गए हैं. कई कैफे और रेस्तरां में भी अलग से हुक्का बार बनाया जाने लगा है. हुक्का बार में प्रवेश के लिए आयु का भी कानून है.

21 साल से कम उम्र के लोगों का प्रवेश कानून बंद होता है. असल में स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी है. कालेज परिसरों और आस पास के शहरों में कम दूरी पर हुक्का बार खोलना कानून प्रतिबंधित है. इस के पीछे कारण यह है कि युवा पीढ़ी को नशे से दूर रखा जा सके. खाद्य एवं औशधि प्रशासन ने सिगरेट और अन्य प्रकार के तम्बाकू के साथ साथ हुक्का तम्बाकू को भी नियत्रिंत करना शुरू कर दिया है. कई बार हुक्का बार खोलने वाले इस कानून का पालन नहीं करते हैं. जिस की वजह से पुलिस को यहां पर छापा मारना पड़ता है.

युवाओं को क्यों पसंद आता है हुक्का बार

हुक्का बार तीन या चार दोस्तों के साथ एक टेबल पर बैठने और हल्की रोशनी और मधुर संगीत में एक आरामदायक समय बिताने का सुखद स्थान है. हुक्का बार एक बार या नाइट क्लब नहीं है. नाइट क्लब और हुक्का में थोड़ा अंतर होता है. जिस तरह से चैपाल पर हुक्के के सहारे समाज के कई लोग बैठते थे और अपास में बातचीत करते थे उसी तरह से अब हुक्का बार लोगों के बैठने की जगह बन गए है. हुक्का लाउंज युवा लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. युवाओं में हुक्का बार विचारों का आदान प्रदान करने और वाली आरामदायक जगह मानी जाती है.

हुक्का बार आम तौर पर एक शांत और अधिक अंतरंग वातावरण प्रदान करता है जहां लोग शराब और तेज संगीत के बिना हुक्का और बातचीत का आनंद ले सकते हैं. हुक्का पीना एक सामाजिक गतिविधि जैसी होती है. इसलिए दोस्तों के समूह के लिए हुक्का साझा करना आम बात है. इस में एक ही हुक्का से बारी बारी से धूम्रपान करते हैं. ऐसे में युवा अपने दोस्तों के साथ वहां जाते हैं. समय बिताते हैं. कई बार युवा फ्लेवर्ड वाले तंबाकू का सेवन करते हैं. जिन में तंबाकू जैसा नशा नहीं होता है. इस के बाद भी जब पुलिस छापा मारती है तो यहां के युवाओं को भी थाने ले जाती है.

कड़े हो रहे कानून

यूपी सरकार तंबाकू उत्पादों पर लगातार शिकंजा कसती जा रही है. यूपी में अवैध हुक्का बार चलाने पर तीन साल तक की जेल और 50 हजार से ले कर एक लाख तक जुर्माना लगाए जाने का प्राबधान बन गया है. यूपी सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (विज्ञापन का प्रतिषेध, व्यापार, वाणिज्य, उत्पादन, प्रदाय व वितरण) एक्ट में संशोधन के बाद अवैध हुक्का बार के संचालन पर तीन साल तक की जेल की सजा होगी. सरकार ने तंबाकू सेवन की न्यूनतम उम्र 18 साल से बढ़ा कर 21 साल कर दी है.

प्रदेश में अभी हुक्का बार खोलने के लिए फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड एक्ट के तहत लाइसेंस लेना होगा. अब रेस्टोरेंट में हुक्का बार नहीं खुल सकते. इस के लिए अलग से लाइसेंस लेना होगा. किसी भी सार्वजनिक स्थल या रेस्टोरेंट जहां लंच या डिनर की व्यवस्था होगी वहां हुक्का बार संचालन की अनुमति नहीं दी जाएगी. हुक्का बार की आड़ में नशीली चीजों का इस्तेमाल करने पर रोक है. इस कानून से पुलिस या खाद्य व औशधि विभाग में सब इंस्पेक्टर स्तर तक के अधिकारियों के अधिकार बढ़ा दिए गए है. जिन का दुरूपयोग शुरू हो रहा है. अब यह कानून की आड में कमाई के साधन बनते जा रहे हैं.

Romantic Story In Hindi : उलझन- समीर और शिखा के बीच में कौन आया था

Romantic Story In Hindi : जैसे जैसेशिखा के जन्मदिन की पार्टी में जाने का समय नजदीक आ रहा है, मेरे मन की बेचैनी बढ़ती ही जा रही है. मैं उस के घर जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हूं पर अपने फ्लैट से कदम निकालने की हिम्मत नहीं हो रही है.

मैं करीब 2 महीने पहले शिखा से पहली बार अपने कालेज के दोस्त समीर के घर मिला था. उसी मौके पर मेरा समीर की पत्नी अंजलि, उस के दोस्त मनीष और उस की प्रेमिका नेहा से भी परिचय हुआ था.

शिखा के सुंदर चेहरे से मेरी नजरें हट ही नहीं रही थीं. वह जब छोटीछोटी बातों पर दिल खोल कर हंसती तो सामने वाला खुदबखुद मुसकराने लगता था.

मैं ने मौका पा कर समीर से अकेले में पूछा, ‘‘क्या शिखा का कोई बौयफ्रैंड है?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने मेरे चेहरे को ध्यान से पढ़ते हुए जवाब दिया.

‘‘गुड,’’ उस का जवाब सुन मेरा मन खुशी से उछल पड़ा, ‘‘तू उस से मेरी दोस्ती करा दे, यार.’’

‘‘कपिल, मैं उस के साथ तेरी दोस्ती नहीं सिर्फ परिचय करा सकता था और वह मैं ने करा दिया.’’

‘‘मुझे शिखा से पहली नजर में ही प्यार हो गया है.’’

मेरे मुंह से ये शब्द सुन कर वह हंसा, ‘‘तू ज्यादा बदला नहीं है. कालेज में भी आए दिन तुझे पहली नजर में प्यार कराने वाला कीड़ा काटता रहता था.’’

‘‘पुरानी बातें भूल जा, मेरे दोस्त. अब मैं अपना घर बसाना चाहता हूं. मुझे लगता है कि शिखा ही मेरे सपनों की राजकुमारी है,’’ मैं ने उसे विश्वास दिलाने की कोशिश करी कि मैं प्यार के इस ताजा मामले में एकदम सीरियस हूं.

पहली मुलाकात में ही शिखा ने मेरे दिलोदिमाग पर जबरदस्त जादू कर दिया था. उसे अपना बनाने की चाह ने मेरी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया.

उस मुलाकात के तीसरे दिन शाम को ही मैं शिखा से उस के औफिस के बाहर मिला. वह मुझे देख कर खुश हुई. फिर हम कौफी पीने के लिए एक रेस्तरां में जा बैठे.

हमारे बीच उस शाम ढेर सारी बातें हुईं. हंसीखुशी से बातें करते हुए कब घंटाभर बीत गया, हम दोनों को ही पता नहीं चला.

बाद में उसे उस के घर तक कार से छोड़ने गया. मैं खुद उस के मम्मीपापा से मिलना चाहता था, क्योंकि मेरे लिए उन दोनों का दिल जीतना जरूरी था.

शिखा अपने मातापिता के साथ 3 कमरों के फ्लैट में रह रही थी. उस की मम्मी के कमर दर्द और पापा के बागबानी के शौक के बारे में मैं ने पूरी दिलचस्पी के साथ ढेर सारी बातें कर के दोनों के दिल में अपनी जगह बना ली. मेरे अच्छे व्यवहार का जादू उन दोनों के सिर चढ़ कर बोला और फिर उन्होंने मुझे रात का खाना खिला कर ही बिदा किया.

शहर के जिन नामी हड्डियों के डाक्टर से 2 दिन बाद मैं ने शिखा की मम्मी का इलाज शुरू कराया उन की दवा से उन्हें बहुत फायदा हुआ.

अगले संडे की शाम को मुझ से बागबानी पर एक पुस्तक की भेंट पा कर शिखा के पिता ने मुझे बड़े अपनेपन के साथ छाती से लगाया तो मुझे अपनी मंजिल मिल जाने का विश्वास हो चला.

मेरे आग्रह पर शिखा कुछ दिनों के बाद मेरे साथ बाहर घूमने चली आई. मैं उस का दिल जीतने का वह मौका नहीं चूका. जब मैं ने अचानक उसे गुलाब के फूलों का गुलदस्ता भेंट किया तो वह खुशी से फूली नहीं समाई.

धीरेधीरे हमारे बीच मिलनाजुलना बढ़ता गया. उसे अपने साथ खूब खुश देख कर मेरा दिल कहता कि वह मुझ से शादी करने को जल्दी राजी हो जाएगी.

‘‘तुम्हारे जैसा सुंदर, सुशील, स्मार्ट व कमाऊ लड़का अभी तक बिना

गर्लफ्रैंड के कैसे है?’’ कुछ दिनों बाद मेरे साथ एक दिन पार्क में घूमते हुए शिखा ने अचानक यह सवाल पूछा तो मैं मन ही मन बहुत बेचैन हो उठा.

मैं ने अपने मन की उथलपुथल को काबू में रख सहज आवाज में जवाब दिया, ‘‘शिखा, मेरी जानपहचान तो बहुत सारी लड़कियों से है पर कभीकभी मुझे भी यह सोच कर बहुत हैरानी होती है कि मेरी जिंदगी में आज तक मेरे सपनों की राजकुमारी क्यों नहीं आई.’’

‘‘सपनों की राजकुमारी या राजकुमार कम ही मिलते हैं, कपिल.’’

‘‘मुझे क्या मेरे सपनों की राजकुमारी मिलेगी?’’ मैं ने प्यार से उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘मुझे क्या पता?’’ कह उस का शरमा जाना मेरे मन को गुदगुदा गया.

मैं अगले दिन औफिस बहुत खुश मूड में पहुंचा. मेरी सहयोगी रितु मेरे चैंबर में आई और बोली, ‘‘शनिवार और इतवार को कहां गायब रहे, कपिल?’’

‘‘तबीयत ठीक नहीं थी,’’ उस की नाराजगी दूर करने के लिए मैं ने उस के गाल पर छोटा सा चुंबन अंकित करा.

‘‘इस शनिवार को मेरे साथ रहोगे या मैं कोई और प्रोग्राम बना लूं?’’

‘‘पक्का तुम्हारे साथ रहूंगा,’’ उस के गाल पर शरारती अंदाज में चिकोटी काट कर मैं काम में लग गया.

शिखा से मैं ने पिछले दिन झूठ बोला था. अब तक बहुत सारी लड़कियां मेरी प्रेमिकाएं रह चुकी थीं पर शिखा उन सब से बहुत बेहतर थी. अच्छी पत्नी बनने के सारे गुण उस में मौजूद हैं. मैं ने मन ही मन उस के साथ शादी करने का पक्का फैसला कर लिया.

शनिवार की रात मैं ने रितु के साथ डिनर किया और फिर रात उस की बांहों में उस के फ्लैट में गुजारी. सचाई यही है कि मुझे ऐसा करते हुए कैसी भी ग्लानि महसूस नहीं हुई, क्योंकि तब तक मैं ने शिखा से शादी का कोई वादा तो किया नहीं था.

वैसे 2 हफ्ते बाद आए रविवार को शिखा के सामने शादी का प्रस्ताव रख मैं ने इस कमी को पूरा कर दिया था.

‘‘तुम्हारे बिना मुझे अपनी जिंदगी अधूरी सी लगने लगी है, शिखा. तुम हमेशा के लिए मेरी हो जाओ, मेरे सपनों की राजकुमारी,’’ मैं ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए कहा तो उस के गोरे गाल गुलाबी हो उठे.

‘‘जिंदगी की राहों में तुम्हारी हमसफर बन कर मुझे बहुत खुशी होगी, कपिल.’’

इन शब्दों में उस की ‘हां’ सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

फिर हमारे बीच यह फैसला हुआ कि 3 दिन बाद शिखा के जन्मदिन के अवसर पर हम शादी करने के अपने फैसले से सब दोस्तों, रिश्तेदारों व परिवार के सदस्यों को अवगत करा कर सरप्राइज देंगे.

अगली रात 9 बजे के करीब बिना सूचना दिए समीर, अंजलि, मनीष और नेहा मुझ से मिलने मेरे फ्लैट पर आए.

मेरी तरफ नीले कवर वाली एक फाइल बढ़ाते हुए मनीष बहुत गंभीर लहजे में बोला, ‘‘कपिल, इस फाइल को पढ़ो.’’

पढ़ कर मुझे मालूम पड़ा कि वह शिखा की मैडिकल फाइल थी. उस ने करीब 10 महीने पहले नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने की कोशिश करी थी.

‘‘इस फोटो में शिखा के साथ उस का प्रेमी राजीव खड़ा था. इसी के हाथों प्यार में धोखा खा कर शिखा ने आत्महत्या करने की कोशिश करी थी,’’ अंजलि ने अपने पर्स से निकाल कर एक पोस्टकार्ड साइज का फोटो मेरे हाथ में पकड़ा दिया.

मनीष ने दांत पीसते हुए बताया, ‘‘यह धोखेबाज इंसान एक तरफ तो शिखा से शादी करने का दम भरता था और दूसरी तरफ शिमला में अपनी पुरानी प्रेमिका के साथ होटल में गुलछर्रे उड़ा रहा था. यह खबर शिखा को अपनी जानपहचान की लड़की से मिली तो उसे इतना गहरा सदमा पहुंची कि उस ने आत्महत्या करने की कोशिश करी.’’

‘‘तुम मेरी इस टेढ़ी उंगली को देखो. मुझे राजीव एक बार किसी पार्टी में मिला था. मैं ने गुस्से से पागल हो कर उस के ऊपर इतने घूंसे बरसाए कि मेरी इस उंगली में फ्रैक्चर हो गया. नेहा ने रोक लिया नहीं तो मैं उसे उस दिन जान से ही मार देता.’’

समीर ने गुस्से से लाल हो रहे मनीष को शांत करने के बाद मुझ से कहा, ‘‘शिखा के अंदर वैसा दूसरा सदमा सहने की ताकत नहीं है, कपिल. अगर तुम्हें लगता है कि तुम उस के प्रति जिंदगीभर वफादार नहीं रह पाओगे तो कल उस के जन्मदिन की पार्टी में मत आना. उसे दुख तो बहुत होगा पर हम उसे संभाल लेंगे.’’

अंजलि ने मुझ से भावुक लहजे में प्रार्थना करी, ‘‘फैसला सोचसमझ कर

करना, कपिल. अगर शिखा के हित के खिलाफ जाने वाला कोई रिश्ता आज भी तुम्हारी जिंदगी में बना हुआ है तो उसे आज रात जड़ से नष्ट कर देना. हमेशा उस के प्रति वफादार रहने का प्रण कर ही कल की पार्टी में आना, प्लीज.’’

इस के बाद सभी बारीबारी से मुझे गले लगा कर चले गए. मैं रातभर ठीक से नहीं सो सका. अगले दिन औफिस भी नहीं जा सका. सारा दिन गहन सोचविचार करने के बावजूद किसी फैसले पर पहुंचना संभव नहीं हुआ.

मैं शिखा से शादी करना चाहता हूं पर अपने मन की कमजोरी का भी मुझे एहसास है. किसी एक स्त्री का हो कर रहना मेरी फितरत में नहीं है.

मुझे फैसला सोचसमझ कर ही करना था, क्योंकि मैं ने अब तक जिन लड़कियों के साथ प्यार का खेल खेला था, उन सब के ऐसे खतरनाक शुभचिंतक दोस्त नहीं थे.

फिर धीरेधीरे जबरदस्त टैंशन का शिकार बने मेरे मन में यह बात जड़ें जमाने लगीं कि मैं न शिखा के लायक हूं और न ही उस के शुभचिंतकों की दोस्ती या दुश्मनी के.

ऐसा सोच कर मैं ने शिखा की जिंदगी से निकलने का कठिन और दिल दुखाने वाला फैसला आखिरकार कर ही लिया.

मैं जूते खोल कर वापस पलंग पर लेट गया. मेरे बहुत रोकने के बावजूद आंखों में बारबार आंसू भर आते थे.

8 बजे के करीब मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी तो मैं ने फोन को स्विच्ड औफ कर दिया.

फिर 9 बजे के करीब बाहर से किसी ने घंटी बजाई तो मैं चौंक कर उठ बैठा. दरवाजा खोला तो सामने शिखा को देख मेरा दिल बैठ गया.

‘‘मुझे विश नहीं करोगे?’’ उस ने सहज भाव से मेरे हाथ अपने हाथों में ले लिए.

‘‘हैप्पी बर्थडे,’’ मैं ने जबरदस्ती मुसकराते हुए उसे शुभकामनाएं दीं.

‘‘ऐसे नहीं, जरा प्यार से विश करो,’’ कह वह मेरे गले लग गई.

‘‘हैप्पी बर्थडे, माई लव,’’ पता नहीं कैसे ये शब्द मेरे मुंह से खुद ही निकल कर मुझे हैरान कर गए.

‘‘मुझे मेरे दोस्तों ने कल रात तुम से हुई मुलाकात के बारे में सब बता दिया है, कपिल,’’ वह सहज भाव से मुसकरा रही थी.

‘‘मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं, शिखा. बाद में तुम्हारा दिल तोड़ूं उस से अच्छा यह होगा कि हम अभी अलग…’’

उस ने मेरे मुंह पर हाथ रख कर मुझे खामोश कर कहा, ‘‘अब मैं पहले जितनी कमजोर और भावुक नहीं रही हूं. मुझे भी पहली नजर में तुम से प्यार हो गया था और अब इतनी आसानी से तुम्हें नहीं खोऊंगी… तुम्हें मेरा प्यार जरूर बदल डालेगा.’’

‘‘मुझे डर है कि मैं तुम्हारे इस विश्वास पर खरा नहीं उतर सकूंगा.’’

‘‘मेरे इस विश्वास के कारण को समझ लोगे तो ऐसा नहीं कहोगे. आज मेरी बर्थडे पार्टी में न आ कर तुम ने जिस ईमानदारी का सुबूत दिया है उस का मेरी नजरों में बहुत महत्त्व है. यही ईमानदारी तुम्हारे अंदर भावी बदलाव का बीज बनेगी.’’

‘‘यह कदम तो मैं ने तुम्हारे शुभचिंतकों की धमकी से डर कर उठाया था,’’ मेरे होंठों पर उदास सी मुसकान उभरी.

‘‘वे मुझे बहुत प्यार करते हैं पर तुम्हें धमकाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं था. मैं सचमुच तुम से दूर नहीं होना चाहती हूं,’’ कह वह मेरी छाती से आ लगी.

‘‘मैं भी,’’ मैं ने उसे बहुत मजबूती से अपनी बांहों के घेरे में कैद कर लिया.

उस पल मेरे दिलोदिमाग में कोई उलझन या अनिश्चितता बाकी नहीं बची थी. उस की आंखों में लहरा रहे प्यार के सागर को देख कर मुझे विश्वास हो चला था कि भविष्य में कोई रितु मुझे कभी ललचा कर शिखा के प्रति बेवफाई करने को मजबूर नहीं कर सकेगी.  Romantic Story In Hindi

Hindi Love Stories : साथी – प्रिया किस सच को मानने को तैयार नहीं थी

Hindi Love Stories : प्रिया मोबाइल पर कुछ देख रही थी. उस की नजरें झुकी हुई थीं और मैं एकटक उसे निहार रहा था. कौटन की साधारण सलवारकुरती और ढीली बंधी चोटी में भी वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. गले में पतली सी चेन, माथे पर छोटी काली बिंदी और हाथों में पतलेपतले 2 कंगन, बस इतना ही शृंगार किया था उस ने. मगर उस की वास्तविक खूबसूरती उस के होंठों की मुसकान और चेहरे पर झलक रहे आत्मविश्वास की चमक में थी. वैसे लग रहा था कि वह विवाहित है.

उस की मांग में सिंदूर की हलकी सी लाली नजर आ रही थी. मैं ने गौर से देखा. प्रिया 20-21 साल से अधिक की नहीं थी. मैं भी पिछले साल ही 30 का हुआ हूं. मु झे प्रिया से मिले अभी अधिक समय नहीं हुआ है. 5-6 घंटे ही बीते हैं जब मैं ने मुंबई से रांची की ट्रेन पकड़ी थी. स्टेशन पर भीड़ थी. सब के चेहरे पर मास्क और माथे पर पसीना छलक रहा था. सब अपनेअपने बीवीबच्चों के साथ सामान कंधों पर लादे अपने घर जाने की राह देख रहे थे. ट्रेन के आते ही सब उस की तरफ लपके. मेरी रिजर्वेशन थी. मैं अपनी सीट खोजता हुआ जैसे ही आगे बढ़ा कि एक लड़की से टकरा गया. वह किसी को ढूंढ़ रही थी, इसलिए हड़बड़ी में थी. अपनी सीट के नीचे सामान रख कर मैं बर्थ पर पसर गया. तभी वह लड़की यानी प्रिया मेरे सामने वाली बर्थ पर आ कर बैठ गई.

उस ने अपने सामान में से बोतल निकाली, मास्क हटाया और गटागट आधी बोतल पानी पी गई. मैं उसी की तरफ देख रहा था. तभी उस की नजर मु झ से मिली. उस ने मुसकराते हुए बोतल बंद कर के रख ली. ‘‘आप को कहां जाना है?’’ मैं ने सीधा सवाल पूछा जिस का उस ने सपाट सा जवाब दिया, ‘‘वहीं जहां ट्रेन जा रही है,’’ कह कर वह फिर मुसकरा दी. ‘‘आप अकेली हैं?’’ ‘‘नहीं, भैयाभाभी हैं साथ में. वे बगल के डब्बे में हैं. मेरी सीट अलग इस डब्बे में थी, इसलिए इधर आ गई. वैसे अकेले तो आप भी दिख रहे हैं,’’ उस ने मेरा ही सवाल मेरी तरफ उछाल दिया. ‘‘हां मैं तो अकेला ही हूं अब अपने घर रांची जा रहा हूं. मुंबई में अपनी छोटी सी दुकान है, मु झे लिखनेपढ़ने का शौक है. इसलिए दुकान में बैठ कर पढ़ाई भी करता हूं. लौकडाउन के कारण कामधंधा नहीं चल रहा था, इसलिए सोचा कि घर से दूर अकेले रहने से अच्छा है अपने गांव जा कर अपनों के बीच रहूं.’’ ‘‘यही हाल इस ट्रेन में बैठे हुए सभी मजदूरों का है. नेताओं ने सांत्वना तो बहुत दी, मगर वास्तव में मदद कहीं नजर ही नहीं आती.

भैयाभाभी मजदूरी करते हैं जो अब बंद हैं. मेरा एक छोटामोटा बुटीक था. घर से ही काम करती थी, पर आजकल कोई काम नहीं मिल रहा. तभी हम ने भी गांव जाने का फैसला किया. हम 2 दिन ट्रेन की राह देखदेख कर लौट चुके हैं. कल तो ट्रेन ही कैंसिल हो गई थी. मगर मैं ने हिम्मत नहीं हारी और देखो आज ट्रेन मिल गई तो घर भी पहुंच ही जाएंगे.’’ हमारे कोच के ऊपर की दोनों बर्थ पर 2 बुजुर्ग अंकलआंटी थे. उन के नीचे 2 अधेड़ थे. चारों आपस में ही बातचीत में मगन थे. इधर मैं और प्रिया भी लगातार बातें करने लगे. ‘‘तुम्हारे घर में और कौनकौन है प्रिया?’’ ‘‘मेरे पति, सासससुर, काका ससुर और 1 छोटा देवर. मांबापू, भैयाभाभी और छोटी बहन भी पास में ही रहते हैं.’’ ‘‘अच्छा पति क्या करते हैं?’’ ‘‘कंप्यूटर सिखाते हैं बच्चों को भी और मु झे भी.’’ ‘‘बहुत अच्छा.’’ ‘‘अच्छा यह बताओ तुम्हारा पति गांव में है और तुम शहर में. वे शहर क्यों नहीं आते?’’ ‘‘उन्हें गांव ही भाता है. मु झ से मिलने आते रहते हैं न.

कोई दिक्कत नहीं हमें. हम एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. वे मेरे बचपन के साथी हैं. हम पढ़े हैं. मेरे कहने पर मांबापू ने उन्हीं से मेरी शादी करा दी और अब वे मेरे जीवनसाथी हैं. जब तक जीऊंगी हमारा साथ बना रहेगा. आज भी मैं उन्हें साथी कहती हूं. ऐसा साथी जो कभी साथ न छोड़े. वे रोज सपने में भी आते हैं और मु झे बहुत हंसाते भी हैं. तभी तो मैं इतनी खुश रहती हूं.’’ ‘‘क्या बात है, पति रोज सपनों में आते हैं,’’ कह कर मैं मुसकरा पड़ा और बोला, ‘‘मैं तो मानता हूं सच्चा प्यार गांवों में ही देखने को मिलता है. शहरों की भीड़ में तो लोग खो जाते हैं.’’ ‘‘सही कह रहे हो आप.’’ ‘‘खाली समय में क्या करती हो?’’ ‘‘मैं फिल्में बहुत देखती हूं.’’ ‘‘अच्छा कैसी फिल्में पसंद हैं तुम्हें?’’ ‘‘डरावनी फिल्में तो बिलकुल पसंद नहीं हैं. रोनेधोने वाली फिल्में भी नहीं देखती. ऐसी फिल्में देखती हूं, जिन में न टूटने वाला प्यार हो. एकदूसरे के लिए पूरी जिंदगी इंतजार करने का दर्द हो. आप कैसी फिल्में देखते हो?’’ ‘‘मैं तो हंसीमजाक वाली और मारधाड़ वाली फिल्में देखता हूं. पौलिटिक्स पर बनी फिल्में भी देख लेता हूं.’’ ‘‘पौलिटिक्स और नेताओं से तो मैं दूर रहती हूं. नेताओं ने आज तक किया ही क्या है? भोलीभाली जनता का खून चूसचूस कर अपने बंगले और बैंक बैलेंस ही तो खड़े किए हैं.’’

‘‘बात तो तुम ने सोलह आने सही कही है.’’ प्रिया की हर बात में खुद पर भरोसा और हंस कर जीने की ललक साफ दिख रही थी. मु झे उस की बातें अच्छी लग रही थीं. हम ने स्कूल के किस्सों से ले कर सीरियलों और फिल्मों तक की सारी बातें कर लीं. यहां तक कि सरकार और राजनेताओं के ढकोसलों पर भी लंबी चर्चा हुई. इस बीच प्रिया ने घर की बनी मट्ठी खिलाई. खिलाने से पहले उस ने सैनिटाइजर की कुछ बूंदें मेरे हाथों पर डालीं. मैं मुसकरा उठा. इस के बाद मैं ने भी उसे अपने हाथ के बने बेसन के लड्डू खिलाए. हम दोनों के बीच अच्छी ट्यूनिंग हो गई थी. आधे से ज्यादा सफर बीत चुका था. अचानक ट्रेन की गति धीमी हुई और डाल्टनगंज स्टेशन पर आ कर रुक गई. डाल्टनगंज झारखंड का एक छोटा सा स्टेशन है. मैं ट्रेन से उतर कर इधरउधर देखने लगा. जल्द ही मु झे पता चला कि हमें ट्रेन बदलनी पड़ेगी. किसी तकनीकी खराबी के कारण यह ट्रेन आगे नहीं जा सकती.

मैं ने प्रिया को सारी जानकारी दे दी. वह भी अपने भैयाभाभी के साथ उतर कर प्लेटफौर्म पर बैठ गई. अगली ट्रेन दूसरे प्लेटफार्म से मिलनी थी और वह भी 2-3 घंटे बाद. हम तय प्लेटफौर्म पर पहुंच कर ट्रेन का इंतजार करने लगे. धूप बहुत तेज थी. गला सूख रहा था. अब तक साथ लाया पानी भी खत्म हो चुका था. हम ने सुना था कि ट्रेन में पानी मिलेगा, मगर मिला नहीं. करीब 4 घंटे बाद दूसरी ट्रेन आई जो बिलकुल भरी हुई थी. प्लेटफौर्म पर बैठे सभी मजदूर सोशल डिस्टैंसिंग भूल कर ट्रेन पकड़ने लपके. सब को पता था कि यह ट्रेन छूटी तो रात प्लेटफौर्म पर गुजारनी पड़ेगी. भैयाभाभी के साथ प्रिया भी चढ़ने की कोशिश करने लगी. इधर मैं भी बगल वाले डब्बे में चढ़ चुका था. तभी मैं ने देखा कि भैयाभाभी के बाद जैसे ही प्रिया चढ़ने को हुई कि कोई बदतमीज व्यक्ति उस को गलत तरीके से छूते हुए धक्का दे कर खुद चढ़ गया. प्रिया एकदम से छिटक गई. उस मजदूर की हरकत पर मु झे बहुत गुस्सा आया. जिस तरह गंदे ढंग से उस ने प्रिया को छुआ था, मेरा वश चलता तो वहीं उस का सिर फोड़ देता. ट्रेन ने चलने के लिए सीटी दे दी थी. मगर प्रिया चढ़ नहीं पाई. वह प्लेटफार्म पर दूर खड़ी रह गई जबकि उस के भैयाभाभी धक्के के साथ बोगी के अंदर चले गए थे. मैं गेट पर खड़ा था. उसे अकेला देख कर मैं ने एक पल को सोचा और तुरंत ट्रेन से उतर गया. प्रिया मेरी हरकत देख कर चौंक गई फिर दौड़ कर आई और मेरे गले लग गई. उस की आंखों में आंसू थे. मैं ने उसे दिलासा दिया, ‘‘रोते नहीं प्रिया. मैं हूं न. मैं तुम्हें तुम्हारे घर तक सुरक्षित पहुंचा दूंगा तभी अपने घर जाऊंगा. तुम जरा भी मत घबराओ.’’

प्रिया एकटक मेरी तरफ देखती हुई बोली, ‘‘एक अजनबी हो कर इतना बड़ा एहसान?’’ ‘‘पागल हो क्या? यह एहसान नहीं. हमारे बीच इन कुछ घंटों में इतना रिश्ता तो बन ही गया है कि मैं तुम्हारी केयर करूं.’’ ‘‘कुछ घंटों में तुम ने ऐसा गहरा रिश्ता बना लिया?’’ ‘‘ज्यादा सोचो नहीं. चलो अब तुम आराम से बैठ जाओ. मैं पानी का इंतजाम कर के आता हूं.’’ प्रिया को बैंच पर बैठा कर मैं पानी लेने चला गया. किसी तरह पानी की बोतल मिली. उसे ले कर लौटा तो देखा कि प्रिया हर बात से बेखर अपने में खोई जमीन की तरफ एकटक देख रही थी. उस के पास एक गुंडा सा लड़का खड़ा था जो उसे घूरे जा रहा था. मैं जा कर प्रिया के सामने खड़ा हो गया और बातें करने लगा. फिर मैं ने खा जाने वाली नजरों से उस लड़के की तरफ देखा. वह तुरंत मुंह फेर कर दूसरी तरफ चला गया. अब मैं प्रिया की बगल में थोड़ी दूरी बना कर बैठ गया. ‘‘लो प्रिया, पानी पी लो. मैं 2 बोतल पानी ले आया हूं.’’ ‘‘थैक्यू.’’ उस ने मुसकरा कर बोतल ली, मगर आंखों में घर पहंचने की चिंता भी झलक रही थी. भूख और थकान से उस का चेहरा सूख रहा था.

उस का मन बदलने के लिए मैं उस के गांव और घर वालों के बारे में पूछने लगा. वह मु झे विस्तार से अपनी जिंदगी और घरपरिवार के बारे में बताती रही. 2-3 घंटे ऐसे ही बीत गए. शाम का धुंधलका अब रात की कालिमा में तबदील हो चुका था. प्रिया को जम्हाई लेता देख मैं बैंच से उठ गया और प्रिया से बोला, ‘‘बैंच पर आराम से सो जाओ. मैं जागा हुआ हूं. तुम्हारा और सामान का ध्यान रखूंगा.’’ ‘‘अरे ऐसे कैसे? नींद तो तुम्हें भी आ रही होगी न.’’ ‘‘नहीं मेरी तो आदत है देर रात तक जागने की. मैं देर तक जाग कर पढ़ता हूं. चलो तुम सो जाओ.’’ प्रिया सो गई. मैं बगल की बैंच पर बैठ गया. 2-3 घंटे बाद मैं भी ऊंघने लगा. बैठेबैठे कब हलकी सी नींद लग गई, पता ही नहीं चला. अचानक झटका सा लगा और मेरी आंखें खुल गईं. देखा प्रिया की बैंच पर एक और मजदूर बैठ गया है और गंदी व ललचाई नजरों से उस की तरफ देख रहा है. उस के हाथ प्रिया के पैरों को छू रहे थे. प्रिया नींद में थी. मैं एकदम से उठ बैठा और उस मजदूर पर चिल्ला पड़ा, ‘‘देखते नहीं वह सो रही है. जबरदस्ती आ कर बैठना है तुम्हें..

. उसे यहां से.’’ मेरा गुस्सा देख कर वह भाग गया. मु झे महसूस हो गया कि इस दुनिया में अकेली लड़की को देख कर लोगों की लार टपकने लगती है. इसलिए मु झे ज्यादा सावधान रहना होगा. मैं एकदम सामान ले कर उसी बैंच पर आ कर बैठ गया, जिस पर प्रिया सोई हुई थी. अब तक मेरी आवाज सुन कर वह भी उठ कर बैठ गई थी. फिर रातभर हम बैठ कर बातें करते रहे. भूख भी लग रही थी, मगर प्लेटफौर्म पर खानेपीने का इंतजाम नहीं था. सुबह के समय प्रिया फिर सो गई. इस बीच चोरीछिपे एक कचौड़ी बेचने वाला प्लेटफौर्म पर आया तो मैं ने जल्दी से 8-10 कचौडि़यां खरीदीं और प्रिया को उठा दिया. दोनों ने बैठ कर नाश्ता किया. फिर दोपहर तक हमें खाने को कुछ नहीं मिला. रांची जाने वाली एक ट्रेन आई, हम उस में चढ़ गए. भीड़ काफी थी. मौका देख कर 1-2 आवारा टाइप के लड़कों ने प्रिया के साथ बदतमीजी की कोशिश भी की, मगर मैं हर वक्त उस के आगे ढाल बन कर खड़ा रहा.

किसी तरह हम रांची जंक्शन पर उतर गए. प्रिया का घर वहां से 2 घंटे की दूरी पर था. जाने के लिए कोई साधन भी नजर नहीं आ रहा था. हम करीब आधे 1 घंटा परेशान रहे. तभी हमें एक जीप दिखाई दी. उस में 2 लोग और बैठे थे. मेरे द्वारा विनती किए जाने पर उन लोगों ने हमें पीछे बैठा लिया और हमें हमारे गंतव्य से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर उतार दिया. क्व2 हजार भी लिए. प्रिया के मना करने के बावजूद मैं ने अपने पास से रुपए दे दिए. अब हमें अंधेरे में दोढाई घंटे पैदल चलना था और वह भी कच्चीपक्की सड़कों पर. किसी तरह हम ने वह रास्ता भी तय कर लिया और प्रिया के घर पहुंच गए. सब बहुत खुश थे. प्रिया की मां ने मु झे बैठने को कुरसी दी और अंदर से पानी ले आईं. तब तक प्रिया ने ट्रेन से उतरने से ले कर अब तक की सारी कहानी सुना दी. फिर घर वालों ने उसे अंदर नहाने भेज दिया और मु झे चायनाश्ता ला कर दिया. चाय पीतेपीते मैं ने पूछा, ‘‘प्रिया के पति कहां हैं? पास में ही रहते हैं न? प्रिया ने बताया था कि ससुराल और मायका आसपास है. वे दिख नहीं रहे.’’

प्रिया की मां और भाई ने एकदूसरे की तरफ देखा. तब तक भाभी कहने लगीं, ‘‘प्रिया के पति जिंदा कहां हैं? शादी के सप्ताह भर बाद ही गुजर गए थे.’’ मैं चौंक पड़ा, ‘‘पर रास्ते में तो उस ने मु झे बताया कि उस के पति उस से बहुत प्यार करते हैं. उस से मिलने शहर भी आते रहते हैं.’’ ‘‘ये सारी कहानियां प्रिया ने मन ने बनाई हैं. वह पति को खुद से अलग करने को तैयार ही नहीं. वह अब भी 2 साल पहले की दुनिया में ही जी रही है. उसे लगता है जैसे उस का साथी आसपास ही है. सपनों के साथसाथ सच में भी मिलने आता है. पर भैया आप ही सोचो, जो चला गया वह भला लौट कर आता है कभी? उस का मन बदलने के लिए हम उसे शहर ले गए थे. हम ने उस से दूसरी शादी करने को भी कहा, पर वह अपनी कल्पना की दुनिया में ही खुश है. कहती है कि जैसे भी हो सारी उम्र अपने साथी के साथ ही रहेगी.’’ प्रिया की मां कहने लगीं, ‘‘ऐसा नहीं है बेटा कि वह रोती ही रहती है, उलटा वह तो पति की यादों के साथ खुश भी रहती है.

अपना काम भी पूरी मेहनत से करती है. इसलिए हम लोगों ने भी उसे इसी तरह जीने की छूट दे दी है.’’ उन की बात सुन कर मैं भी सिर हिलाने लगा, ‘‘यह तो बिलकुल सच है कि वह खुश रहती है, क्योंकि उस ने अपने साथी से बहुत गहरा प्रेम किया है. बस वह हमेशा खुश रहे इतना ही चाहता हूं. अच्छा मांजी मैं चलता हूं.’’ ‘‘बेटा इतनी रात कहां जाओगे? तुम आज यहीं रुक जाओ. कल चले जाना.’’ ‘‘जी.’’ मैं रुक तो गया पर सारी रात प्रिया का चेहरा ही मेरी आंखों के आगे नाचता रहा. मेरे लिए प्रिया की जिंदगी दिल को छू लेने वाली एक ऐसी कहानी थी जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता. अब मु झे लौटना था पर प्रिया से दूर जाने को मन नहीं कर रहा था. सुबहसुबह मैं निकलने लगा तो प्रिया मेरे पास आ गई और बोली, ‘‘एक अनजान जो न मेरा पति था, न भाई और न प्रेमी फिर भी हर पल उस ने मेरी रक्षा की. उसे आज रुकने को भी नहीं कह सकती. उस से दोबारा कब मिलूंगी यह भी नहीं जानती, पर सिर्फ इतना चाहती हूं कि वह उम्रभर खुश रहे और ऐसे ही सच्चे दिल से दूसरों का सहारा बने,’’ कह कर प्रिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया. मेरी नजरें प्रिया से बहुत कुछ कह रही थीं.

मगर जबान से मैं सिर्फ इतना ही कह सका, ‘‘अपना खयाल रखना प्रिया, क्योंकि मेरी जिंदगी में तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता… और हां जिंदगी में कभी किसी भी पल मेरी याद आए तो मेरे पास आ जाना. मैं इंतजार करूंगा.’’ प्रिया एकटक मु झे देखती रह गई. मैं मुसकरा कर आगे बढ़ गया. घर लौटते समय मेरे दिल में बस एक प्रिया ही थी और मैं जानता हूं मु झे उस का इंतजार हमेशा रहेगा. मैं नहीं जानता वह अपने साथी को छोड़ कर मेरे पास आएगी या नहीं, लेकिन मैं हमेशा उस का साथी बनने को तैयार रहूंगा. Hindi Love Stories

Social Story In Hindi : एक कागज मैला सा – किस ने लिखा था वासंती को खत ?

Social Story In Hindi : वासंती की तबीयत आज सुबह से ही कुछ नासाज थी. न बुखार था, न जुकाम, न सिरदर्द, न जिस्म टूट रहा था, फिर भी कुछ ठीक नहीं लग रहा था. लगभग 10 बजे पति दफ्तर गए और बिटिया मेघा कालेज चली गई.

वासंती ने थोड़ा विश्राम किया, लेकिन शारीरिक परिस्थिति में कुछ परिवर्तन होते न देख उन्होंने कालेज में फोन किया और प्रिंसिपल से 1 दिन की छुट्टी मांग ली. हलका सा भोजन कर वे लेटने ही वाली थीं कि घंटी बजी. उन्होंने दरवाजा खोला. बाहर डाकिया खड़ा था. उस ने वासंती को एक मोटा सा लिफाफा दिया और दूसरे फ्लैट की ओर मुड़ गया.

वासंती ने दरवाजा बंद किया और धीमे कदमों से शयनकक्ष में आईं. लिफाफे पर उन्हीं का पता लिखा था और पीछे की ओर खत भेजने वाले ने अपना पता लिखा था :

‘हिंदी

आई सी 3480

कैप्टन अक्षय कुमार

द्वारा, 56 एपीओ’

वासंती हस्ताक्षर से अच्छी तरह परिचित थीं. अक्षरों को हलके से चूमते हुए उन्होंने अधीर हाथों से लिफाफा खोला. अंदर 3-4 मैले से मुड़े हुए पन्ने थे. पत्र काफी लंबा था. वे आराम से लेट गईं और पत्र पढ़ने लगीं.

मेरी प्यारी मां,

प्रणाम.

काफी दिनों से मेरा पत्र न आने से आप मुझ से खफा अवश्य होंगी. लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि आज मेरा पत्र देखते ही आप ने उसे कलेजे से लगा कर धीरे से चूम कर कहा होगा, ‘अक्षय, मेरे बेटे…’

मां, यह लिखते समय मैं यों महसूस कर रहा हूं जैसे आप यहां मेरे पास हैं और मेरे गालों को हलके से चूम रही हैं. दरअसल, जब मैं छोटा था तो आप रोज मुझे सुलाते समय मेरे गालों को चूम कर कहा करती थीं, ‘कैसा पगला राजा बेटा है, मेरा बेटा. सो जा मुन्ने, आराम से सो… कल स्कूल जाना है…अक्षू बेटे को जल्दी उठना है…स्कूल जाना है…अब सो भी जा बेटे…’ और फिर मैं शीघ्र ही सपनों के देश में पहुंच जाता था.

दिनभर स्कूल में मस्ती, शाम को क्रिकेट और उस के बाद माहीम के तरणताल में भरपूर तैरने के बाद रात को जब मैं खाने की मेज पर बैठता तब आप मुझे डांट कर, दुलार कर किसी तरह खाना खिलाती थीं.

अरे, हां, याद आया. मां, कल मुझे सचमुच ही बहुत जल्दी उठना है. जल्दी यानी ठीक 2 बजे. हां मां, सच कह रहा हूं. सचमुच सुबह 2 बजे. काम ही कुछ ऐसा है कि उठना ही पड़ेगा. वैसे इस वक्त रात के साढ़े 10 बज रहे हैं और मुझे सो जाना चाहिए.

लेकिन मां, मुझे नींद ही नहीं आ रही है. लगभग 8 बजे से मैं करवटें बदल रहा हूं, लेकिन नींद कोसों दूर है. इस वक्त मैं बहुत उत्तेजित हूं मां, किसी से बातें करने को मन कर रहा है और यहां मैं अकेला हूं. नींद की प्रतीक्षा करते हुए, हृदय में यादों का बवंडर, अकेला, बिलकुल तनहा.

यादों के बवंडर में बचपन याद आया. आप आईं और आंखें नम हुईं. मैं उठा और अपना झोला खोला. नीचे ठूंसे हुए कुछ मैले से मुड़े हुए कागज निकाले, सिलवटें ठीक कीं, धीरे से झोले की आड़ ले कर टौर्च जलाई और लिखा, ‘मेरी प्यारी मां.’

मां, यहां पर रात को रोशनी करना मना है. अगर सावधानी न बरती जाए तो गोली चल जाती है. मां, मुझे मालूम है कि तुम्हें मैले, मुडे़ हुए कागज नहीं भाते. लेकिन क्या करूं, मजबूरी है. मां, आज आप कृपया मेरी भाषा पर न हंसें. जो भी मैं ने लिखा है, पढ़ लें. मैं आप जैसा हिंदी का प्राध्यापक तो हूं नहीं. मैं तो एक फौजी हूं, एक फौजी कप्तान. बौंबे इंजीनियर्स ग्रुप का. अक्षय कुमार, एक युवा कप्तान.

अरे हां, इस कप्तान शब्द से कुछ याद आया. 8वीं में उत्तीर्ण हो कर मैं 9वीं में दाखिल हुआ था. शाम का समय था. मैं क्रिकेट खेलने के लिए निकलने ही वाला था कि हैडमास्टरजी आ धमके.

उन्होंने मुझे रोका और आप से कहा, ‘वासंतीजी, कृपया अपने पुत्र को संभालिए, दिनभर शरारतें करता है, पढ़ता नहीं है. बहनजी, यह आप का बेटा है, एक प्राध्यापिका का बेटा, इसलिए मैं ने इस वर्ष इसे किसी तरह उत्तीर्ण किया है अन्यथा आप का लाड़ला फेल हो जाता. लेकिन अगले वर्ष मैं सहायता नहीं कर सकूंगा. क्षमा करें. आप जानें और आप का बेटा.’

यह सब सुन कर आप आगबबूला हो उठीं और मुझे डांटते हुए बोलीं, ‘अक्षय, शर्म करो, आखिर तुम क्या करना चाहते हो? नहीं पढ़ना चाहते तो मत पढ़ो. यहीं रहो और चौपाटी पर पानीपूरी की दुकान खोल लो. बेशर्म कहीं के.’ और आपे से बाहर हो कर आप ने मुझे पहली बार मारा था.

गालों पर आप की उंगलियों के निशान ले कर मैं चीखते हुए बाहर निकला था कि मुझे नहीं पढ़ना है. मुझे बंदूक चलानी है. फौज में जाना है. कप्तान बनना है.

ओह मां, ठंड के मारे लिखतेलिखते उंगलियां जाम हो गई हैं. यहां इतनी ठंड पड़ती है कि क्या बताऊं. अब इस मार्च के महीने में तो कुछ कम है लेकिन ठंड के मौसम में मुंह से शब्द बाहर निकलते ही जम कर बर्फ हो जाते हैं. मां, एक बार यहां आइए. हजार फुट की ऊंचाई पर तब आप को पता चलेगा कि ठंड किसे कहते हैं और बर्फ क्या होती है?

वैसे अब बर्फ काफी हद तक पिघल गई है. पहाड़ों के पत्थरों, दरख्तों की शाखाएं और यहांवहां हरी घास भी दिख रही है. नजदीक बहने वाली हिम नदी से पानी बहने की आवाज बर्फ की ऊपरी सतह के नीचे से आ रही है. हिम नदी पर अभी भी बर्फ की मोटी सतह है लेकिन उस के नीचे तेज बहता हुआ बर्फीला पानी है. परंतु बर्फ की ऊपरी सतह में कहींकहीं दरारें पड़ गई हैं और बर्फ पिघलने से छोटेबड़े छेद भी प्रकृति ने बना दिए हैं. दृश्य बड़ा ही मनोहारी है मां, लेकिन… लेकिन…

हिम नदी के उस छोर पर दुश्मन बैठा है. नदी का पाट बड़ा नहीं है किंतु दूसरे किनारे पर एक ऊंचा पहाड़ है. उस पर्वत के बीच से एक चोटी बाहर निकली है, तोते की चोंच जैसी. और चोंच में दुश्मन बैठा है. बिलकुल हमारे सिर पर, हमें हर क्षण घूरता हुआ. हमारी जरा सी आहट होते ही हमारी तरफ गोलियों की बौछार करता हुआ.

हमें आगे बढ़ना है. उस चोंच को तहसनहस करना है और दुश्मन का सफाया कर सामने वाली घाटी को दुश्मन के चंगुल से छुड़ा कर अपना तिरंगा वहां लहराना है. काम आसान नहीं है. हम यहां से एक गज भी आगे नहीं बढ़ सकते, दुश्मन के पास मशीनगनें तो हैं ही, शक्तिशाली तोपें भी हैं, जिन से वे हवाई जहाज को भगा सकते हैं अथवा मार गिरा सकते हैं.

परिस्थिति गंभीर है दुश्मन का सफाया करने के लिए, इस चोटी को बारूद से उड़ाने के लिए ब्रिगेड ने हमारी इंजीनियर्स कंपनी को यहां भेजा है. हम यहां लगभग 20 दिनों से बैठे हैं, लेकिन अभी तक कामयाबी हासिल नहीं हुई है. अलबत्ता, यहां आते ही हम ने कोशिश जरूर की थी.

15 दिन पहले मेरा वरिष्ठ अफसर मेजर दयाल, अपने साथ 8 जवानों को ले कर आधी रात को हिम नदी पर चल पड़ा. सब जवानों ने सफेद वरदी पहन रखी थी. जूते भी सफेद थे.

हिम नदी पूरी तरह बर्फीली थी. मेजर दयाल आधे रास्ते तक पहुंचा ही था कि ऊपर से फायरिंग शुरू हुई. सब ने बर्फ में छिप कर अपनी जान बचाई और उसी समय मेजर दयाल के अरदली सिपाही रामसिंह को फायरिंग की वजह मालूम हुई. मेजर की सफेद जरसी के गले के नीचे एक काला पट्टा था. रामसिंह ने अपनी जरसी साहब को दी और उन की खुद पहन ली. फिर दुश्मन को चकमा देने के लिए खुद एक रास्ते से और बाकी जवानों को दूसरे रास्ते से पीछे हटने को कहा. 2 घंटे बाद सब लौट आए, लेकिन सिपाही रामसिंह…

खैर, इन 20 दिनों में परिस्थिति काफी बदल गई है. बर्फ काफी पिघल गई है और हिम नदी की ऊपरी बर्फीली सतह में गड्ढे पड़ गए हैं. बर्फ की ऊपरी सतह और नीचे बहने वाले पानी के मध्य कुदरत ने काफी जगह बना दी है. इसी जगह का फायदा उठाते हुए बर्फ की सतह से नीचे, दुश्मन की नजरों से बच कर तेज बहते हुए बर्फीले पानी को चीर कर हमें दूसरे तट पर पहुंचना है, मां. पानी इतना ठंडा है कि अगर आदमी असावधानी से गिर पडे़ तो कुछ क्षणों में ही जम कर वह आइसक्रीम बन जाएगा.

लेकिन 3 दिन पहले ही हमें दिल्ली से बर्फीले पानी में तैरने के लिए विशिष्ट पोशाक मिली है. साथ में पानी में रह कर भी गीला न होने वाला गोलाबारूद, बंदूकें, टौर्च, प्लास्टिक के झोले और खाने की डब्बाबंद वस्तुएं भी मिली हैं.

मां, जिस क्षण की प्रतीक्षा हर फौजी को होती है वह क्षण आज मेरे जीवन में आया है. जिस क्षण के लिए हम फौज में भरती होते हैं, प्रशिक्षण पाते हैं, वेतन पाते हैं, वह क्षण अब मुझ से थोड़ी ही दूरी पर है. मुझे उस क्षण का बेसब्री से इंतजार है. इसी लिए मैं बहुत उत्तेजित हूं और मुझे नींद नहीं आ रही है.

आज दोपहर को इस ‘मिशन’ के लिए, जिसे हम ने ‘औपरेशन पैरट्स बीक’ नाम दिया है, मेरा चयन हुआ है.

हां, तो मां, अब थोड़ी ही देर बाद रात के ठीक 2 बजे मैं वह विशिष्ट पोशाक पहन कर हिम नदी में बनी दरार के जरिए पानी में कूदूंगा. तेज बहते हुए पानी को किसी तरह चीर कर चट्टानों, पत्थरों और बर्फ का सहारा ले कर नदी का दूसरा किनारा पकड़ूंगा और सावधानी से किसी दूसरी दरार से बाहर निकलूंगा. मेरी कमर में बंधी लंबी रस्सी का सहारा ले कर मेरे 4 जवान हथियार, गोलाबारूद और बम ले कर मेरे पास आएंगे.

उस के बाद उस चोटी के नीचे बारूद भर कर हम उसे उड़ा देंगे. संयोग से दूसरे तट पर खड़े हुए मनुष्य को दुश्मन देख नहीं सकता क्योंकि वह बिलकुल उस की नाक के नीचे होता है. दूसरा यह कि दुश्मन यह ख्वाब में भी नहीं सोच सकता कि रात के अंधेरे में हिम नदी के नीचे से तैर कर इंसान दूसरे तट पर आ सकता है.

मां, यह समूची कार्यवाही साढ़े 3-4 बजे तक हो जानी चाहिए. उस के बाद हमारी ब्रिगेड आगे बढ़ेगी और समूची घाटी पर कब्जा कर लेगी. मैं जानता हूं कि काम खतरनाक है, लेकिन फिर भी मैं कामयाबी हासिल कर के रहूंगा और इतिहास में अपना नाम सुरक्षित कर दूंगा.

याद है मां, कुछ वर्ष पूर्व हम ने मैट्रो में एक फिल्म देखी थी, ‘दि गंस औफ नेव्हरौन’, यहां भी लगभग वही परिस्थिति है. फर्क इतना है कि वहां खौलता हुआ डरावना समुद्र था और यहां बर्फीली हिम नदी और बर्फीला पानी है.

मैं जानता हूं कि मुझे यह सब नहीं लिखना चाहिए. यह सब गोपनीयता और सुरक्षा के खिलाफ है. फिर भी आज शाम से ही मैं इतना रोमांचित हूं कि किसी से कुछ कहने के लिए मन व्याकुल हो रहा है. फिर दुनिया में मां के सिवा और कौन है जो बेटे की हकीकत सुन कर उसे दिल में छिपा सकती है. हो सकता है कि इस मिशन के बाद मुझे वीरचक्र मिले. मैं चाहता हूं कि उस वक्त आप अपनी सहेलियों से और रिश्तेदारों से बड़े फख्र से कहें कि मेरे अक्षू ने ऐसा किया…वैसा किया…

आज मैं एक और अपराध कर रहा हूं, मैं यह पत्र सेना के डाकघर के माध्यम से न भेजते हुए एक सिपाही के हाथ भेज रहा हूं. यह सिपाही कल दिल्ली जा रहा है. बर्फ के प्रभाव से उस की उंगलियां गल गई हैं. दिल्ली पहुंचते ही वह इस पर टिकट लगा कर किसी लाल डब्बे में डाल देगा. हो सकता है, यह लिफाफा आप को 3 दिनों में ही मिल जाए. सेना के डाकघर से यह आप को शायद 15 दिन बाद मिले.

अरे, बाप रे. आधी रात हो गई है. थोड़ा सोना चाहिए. अच्छा मां, बाकी बातें अगले खत में लिखूंगा. सच कहता हूं, आप से बातें क्या हुईं, मन शांत हो गया है. अरे हां, अच्छा हुआ कि कुछ याद आया. मैं ने बीमा की एक किस्त शायद नहीं भरी है, पिताजी से कह कर भुगतान करवा देना.

मेरे लिए खाने की कोई चीज न भेजें, रास्ते में, दिल्ली वाले चोर सब खा जाते हैं. कोई अच्छा उपन्यास अवश्य भेजें, यहां पढ़ने के लिए सिर्फ फिल्मी पत्रिकाएं ही हैं. मेघा से कहना कि मन लगा कर पढ़ाई करे, उसे डाक्टर जो बनना है. आप दोनों अपनी तबीयत का खयाल रखें. ज्यादा दौड़धूप करने की कोई आवश्यकता नहीं है. अब मैं बड़ा हो गया हूं. फौजी कप्तान हूं. आप सब की देखभाल कर सकता हूं.

अच्छा मां, अब मैं सोता हूं. आंखें अपनेआप बंद हो रही हैं. मां, बस एक बार, सिर्फ एक बार मेरे गालों को चूम कर कहो, ‘कैसा पगला राजा बेटा है, मेरा मुन्ना…सो जा बेटे, सो जा…कल जल्दी जो उठना है.’

आप का, प्यारा अक्षय

अक्षय के पत्र के आखिरी अक्षर तो वासंती के आंसुओं में ही धुल गए. उन्होंने आंखें पोंछीं, मन शांत किया. आखिरी पंक्तियां फिर से पढ़ीं और ‘अक्षय’ शब्द को चूम कर बोलीं, ‘‘बिलकुल पगला है, मेरा राजा बेटा…’’

उसी वक्त घंटी खनकी और वासंती के मुंह से अनायास शब्द फूट पड़े, ‘‘अक्षू बेटा, रुक, मैं आ रही हूं.’’

उन्होंने दौड़ कर दरवाजा खोला. दरवाजे पर अक्षय नहीं था, लेकिन उसी की रैजीमैंट का एक युवा अफसर खड़ा था. वह वरदी पहने था. सिर पर ‘पी कैप’ थी. उस ने वासंती को सैल्यूट करते हुए धीरे से पूछा, ‘‘कैप्टन अक्षय कुमार?’’

‘‘जी हां, यह अक्षय का ही घर है.’’

‘‘आप?’’

‘‘मैं उस की मां हूं, वैसे अभी घर में कोई नहीं है. साहब दफ्तर गए हैं. मेघा कालेज में है और अक्षय तो सीमा क्षेत्र में तैनात है. तबीयत नासाज थी, इसलिए मैं रुक गई अन्यथा मैं भी कालेज गई होती. आप अंदर आइए.’’

अफसर हौले से अंदर आया. उस ने धीरे से कुछ इशारा किया. खुले दरवाजे से 2 सिपाही लोहे का एक बड़ा संदूक ले कर अंदर आए. उन्होंने उसे नीचे रखा और दोनों सावधान मुद्रा में खड़े हो गए. संदूक के बीचोबीच एक ‘पी कैप’ रखी हुई थी और उस के सामने वाले भाग पर लिखा था, ‘कैप्टन अक्षय कुमार, बौंबे इंजीनियर्स ग्रुप, इंजीनियर्स रैजीमैंट’.

‘‘यह सब क्या है?’’ वासंती ने घबरा कर पूछा, उस का दिल तेजी से धड़क रहा था.

‘‘अक्षय का सामान है,’’ अफसर धीरे से बोला.

‘‘अक्षय कहां है?’’ वासंती ने संदूक की ओर एकटक देखते हुए पूछा.

अफसर कुछ नहीं बोला. उस ने अपनी टोपी उतारी और वह जमीन ताकने लगा.

‘‘आप बोलते क्यों नहीं? अक्षय कहां है? यह सब क्या हो रहा है? अक्षय को क्या हुआ है? बोलिए, कुछ तो बोलिए?’’ वासंती ने चीख कर कहा.

अफसर ने अपनी जेब से कागज का एक छोटा सा टुकड़ा निकाला, जो मैला था और बुरी तरह मुड़ा हुआ था.

‘‘अक्षय की वरदी की ऊपरी जेब से यह टुकड़ा बरामद हुआ है, टुकड़ा गीला था, अब सूख चुका है. कृपया, आप पढ़ लें,’’ अफसर धीमी आवाज में बोला.

थरथराते हाथों से वासंती ने कागज का टुकड़ा लिया. उस मैले से मुड़े हुए कागज के टुकड़े पर केवल 3 पंक्तियां लिखी थीं:

‘अगर मैं बढ़ूं, मेरे पीछे आएं,

अगर मैं मुड़ूं, मुझे शूट करें,

अगर मैं मरूं, मुझे भूल जाएं.’ Social Story In Hindi

Family Story In Hindi : फ्लौपी – आखिर में क्या मां बच्चों की सच्चाई जान सकी?

Family Story In Hindi : कलकत्ता के लिए प्रस्थान करने में केवल 2 दिन शेष रह गए थे. जाती बार सुदर्शन हिदायत दे गए थे कि सांझ तक अपना पूरा काम निबटा लूं. सारे फर्नीचर को ठिकाने से व्यवस्थित कर दूं. बारबार के तबादलों ने दुखी कर रखा था. कितने परिश्रम और चाव से एक अरसे बाद घर बन कर पूरा हुआ था. अब सब छोड़छाड़ कर कलकत्ता चलो. अचानक घंटी ने ध्यान अपनी ओर खींच लिया. भाग कर किवाड़ खोला तो बबल को सामने खड़ा मुसकराता पाया. उस के हाथ में खूबसूरत सा काला और सफेद पिल्ला था.

‘‘कहां से लाए? बड़ा प्यारा है,’’ मैं ने उस के नन्हे मुख को हाथ में ले कर पुचकारा.

‘‘मां, यह बी ब्लाक वाली चाचीजी का है. पूरे साढ़े 700 रुपए का है,’’ उस ने उत्साह से भर कर उस के कीमती होने का  बखान किया.

‘‘हां, बहुत प्यारा है,’’ मैं ने पिल्ले को हाथ में ले कर कहा.

‘‘गोद में ले लो. देखो, कैसे रेशम जैसे बाल हैं इस के,’’ उस ने पिल्ले के चमकते हुए बालों को हाथ से सहलाया.

गोद में ले कर मैं ने उसे 3-4 बिस्कुट खिलाए तो वह गपागप चट कर गया और जब उस की आंखें डब्बे में बंद शेष बिस्कुटों की तरफ भी लोलुपता से निहारने लगीं तो मैं ने उसे डांट दिया, ‘‘बस, चलो भागो यहां से. बहुत हो गया लाड़प्यार.’’

फिर मैं ने बबल से कहा, ‘‘बबल, देखो अब ज्यादा समय नष्ट मत करो. इस पिल्ले को इस के घर छोड़ आओ और वापस आ कर अपना सामान बांधो. विकी से भी कहना कि जल्दी घर लौटे. अपने- अपने कमरों का जिम्मा तुम्हारा है, मैं कुछ नहीं करूंगी.’’

‘‘चलो भई, मां तुम्हारे साथ खेलने नहीं देंगी,’’ उस ने पिल्ले का मुख चूम लिया और बी ब्लाक की तरफ भाग गया.

आधे घंटे बाद जब वह पुन: लौटा तो विकी उस के साथ था. दोनों अपने- अपने कमरों में जा कर सामान समेटने लगे परंतु बीचबीच में कुछ खुसुरफुसुर की आवाजों से मैं शंकित हो उठी. मैं ने आवाज दे कर पूछा, ‘‘क्या बात है. आज तो दोनों भाइयों में बड़े प्रेम से बातचीत हो रही है.’’

जब भी मेरे दोनों बेटे आपस में घुलमिल कर एक हो जाते हैं तो मुझे भ्रम होता है कि जरूर मेरे खिलाफ कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है. जैसे वे घर में देवरानी और जेठानी हों और मैं उन की कठोर सास. एक बार हंस कर मेरे पति ने पूछा भी था, ‘‘तुम इन्हें देवरानीजेठानी क्यों कहती हो?’’

‘‘इसलिए कि वैसे तो दोनों में पटती नहीं, परंतु जब भी मेरे खिलाफ होते हैं तो आपस में मिल कर एक हो जाते हैं. आप ने देखा होगा, अकसर देवरानीजेठानी के रिश्तों में ऐसा ही होता है,’’ मेरी इस बात पर घर में सब बहुत हंसे थे.

‘‘मेरी प्यारीप्यारी मां,’’ पीठ के पीछे से आ कर बबल ने मुझे आलिंगनबद्ध कर लिया.

‘‘जरूर कोई बात है, तभी मस्का लगा रहे हो?’’

‘‘फ्लौपी है न सुंदर.’’

‘‘कौन फ्लौपी?’’

‘‘वही पिल्ला, जिसे मैं घर लाया था.’’

‘‘उस का नाम फ्लौपी है, बड़ा अजीब सा नाम है,’’ मैं ने व्यंग्य से मुंह बिचकाया.

‘‘वह गिरता बहुत है न, इसलिए चाचीजी ने उस का नाम फ्लौपी रख दिया है.’’

‘‘हमारे पामेरियन माशा के साथ उस की कोई तुलना नहीं. जैसी शक्ल वैसी ही अक्ल पाई थी उस ने. कितनी मेहनत की थी मैं ने उस पर. हमारे दिल्ली आने से पहले ही बेचारा मर गया,’’ मैं ने एक ठंडी आह भरी, ‘‘कोई भी घर आता तो कैसे 2 पांवों पर खड़ा हो कर हाथ जोड़ कर नमस्ते करता. मैं उसे कभी भूल नहीं सकती.’’

‘‘वैसे तो मां अपना ब्ंिलकर भी किसी से कम न था, जिसे आप की एक सहेली ने भेंट किया था,’’ उस ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘पर उस के बाल बड़े लंबे थे. बेचारा ठीक से देख भी नहीं सकता था. हर समय अपनी आंखें ही झपकता रहता था. तभी तो पिताजी ने उस का नाम ब्ंिलकर रख छोड़ा था.’’

बबल की बातें सुन कर मैं कुछ देर के लिए खो सी गई और एक ठंडी आह भर कर बोली, ‘‘1 साल बाद ब्ंिलकर चोरी हो गया और माशा को किसी ने मार डाला.’’

‘‘कई लोग बड़े निर्दयी होते हैं,’’ बबल ने मेरी दुखती रग पकड़ी.

‘‘तुम्हें याद है, जिस दिन मैं एक पत्रिका के लिए साक्षात्कार कर के लौटी तो कितनी देर तक मेरे हाथपांव चाटता रहा. जहां भी जा कर लेटती वहीं भाग आता. मैं सुबह से गायब रही, शायद इसलिए उदास हो गया था. उस रात हम किसी के घर आमंत्रित थे. चुपके से कमरे से बाहर निकल गया और लगा कार के पीछे भागने. मैं कार से उतर कर पुन: उसे घर छोड़ आई. पर वह था बड़ा बदमाश. हमारे जाते ही गेट से निकल कर फिर कहीं मटरगश्ती करने निकल पड़ा.’’

‘‘मां, उस रात आप ने बड़ी गलती की. वह आप के साथ कार में जाना चाहता था. आप उसे साथ ले जातीं तो वह बच जाता.’’

‘‘बच्चे, अगर उसे बचना होता तो उसे एक जगह टिक कर बंधे रहने की समझ अपनेआप आ जाती. उस का सब से बड़ा दोष था कि वह एक जगह बंध कर नहीं रहना चाहता था. जब भी बांधने का नाम लो, आगे से गुर्राना शुरू कर देता. उस रात भी तो उस ने ऐसा ही किया था.’’

‘‘मां, आप मेरी बात मानो, वह किसी की कार के नीचे आ कर नहीं मरा. उस के शरीर पर एक भी जख्म नहीं था. ऐसे लगता था जैसे सो रहा हो. जरूर उस निकम्मे नौकर ने ही उसे मार डाला था. माशा उसे पसंद नहीं करता था. नौकर ने ही तो आ कर खबर दी थी कि माशा मर गया है,’’ बबल ने क्रोध में अपने दांत पीसे.

‘‘हम कुत्ता पालते तो हैं लेकिन उस का सुख नहीं भोग सकते,’’ मैं ने उदास हो कर कहा.

‘‘मां, अगर आप को फ्लौपी जैसा पिल्ला मिल जाए तो आप ले लेंगी?’’ विनम्रता से चहक कर उस ने मतलब की बात कही.

‘‘मैं साढ़े 700 रुपए खर्च करने वाली नहीं. कोई मजाक है क्या? मुझे नहीं चाहिए फ्लौपी,’’ मैं ने गुस्से में अपने तेवर बदले.

‘‘कौन कहता है आप को रुपए खर्च करने को. चाचीजी तो उसे मुफ्त में दे रही हैं.’’

‘‘क्यों? तो फिर जरूर उस में कोई खोट होगी. वरना कौन अपना कुत्ता किसी को देता है?’’

‘‘खोटवोट कुछ नहीं. उन का बच्चा छोटा है, इसलिए उसे समय नहीं दे पातीं. आप तो बस हर बात पर शक करती हैं.’’

हम दोनों की बहस सुन कर मेरा बड़ा बेटा विकी भी उस की तरफदारी करने अपने कमरे से निकल आया, ‘‘मां, बबल बिलकुल ठीक कह रहा है. चाचीजी पिल्ले के लिए कोई अच्छा सा परिवार ढूंढ़ रही हैं. आप को शक हो तो स्वयं उन से मिल लो.’’

‘‘मुझे नहीं मिलना किसी से. माशा के बाद अब मुझे कोई कुत्ता नहीं पालना. सुना तुम ने,’’ मैं पांव पटकती पुन: सामान समेटने लगी, ‘‘कलकत्ता के 8वें तल्ले पर है हमारा फ्लैट. उसे पालना कोई मजाक नहीं. तुम्हारे पिता भी नहीं मानेंगे,’’ मैं ने कड़ा विरोध किया. परंतु उन दोनों में से मेरी बात मानने वाला वहां था कौन?

‘‘हम तो फ्लौपी को जरूर पालेंगे,’’ दोनों भाई जोरदार शब्दों में घोषणा कर के अपनेअपने कमरों में चले गए.

जब दूसरे दिन इस विषय पर कोई चर्चा न हुई तो मैं ने चैन की सांस ली. परंतु तीसरे दिन सवेरा होते ही पुन: वही रट शुरू हो गई, ‘‘मां, कृपया फ्लौपी को ले लो न. हम वादा करते हैं, उस की सारी जिम्मेदारी हमारी होगी. आप को कुछ भी नहीं करना होगा,’’ दोनों भाई एकसाथ बोल पड़े.

इस तरह मेरे कड़े विरोध के बावजूद उस रोज 1 घंटे के अंदर ही नन्हा फ्लौपी हमारे परिवार का सदस्य हो गया. शाम को जब यह दफ्तर से घर आए तो फ्लौपी को देख कर बोले, ‘‘तो इन दोनों ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया. बड़ा मुश्किल काम है इसे पालना.’’

इस बार मेरे साहित्यप्रेमी पति को पिल्ले का नाम सोचने के सुख से हमें वंचित ही रखा, क्योंकि गिरतालुढ़कता फ्लौपी अपना नामकरण तो पहले परिवार से ही करवा कर आया था. दूसरे दिन लाख कोशिशों के बावजूद राजधानी एक्सप्रेस से जब फ्लौपी की बुकिंग न हो सकी तो मैं ने पुन: खैर मनाई. सोचा, चलो सिर से बला टली. पर बबल की आंखों से बहती आंसुओं की अविरल धारा ने मेरे पति के कोमल हृदय को छू लिया और बाध्य हो कर उन्होंने वादा किया कि किसी भी हालत में वे फ्लौपी को कलकत्ता जरूर पहुंचा देंगे.

लगभग 20 रोज पश्चात जब यह दिल्ली दौरे पर गए तो फ्लौपी को लिवा लेने के लिए बच्चों ने फिर जिद की. फिर एक रात सचमुच मैं ने फ्लौपी को सुदर्शन के साथ मुख्यद्वार पर खड़ा पाया.

दोनों बच्चों के मुख पर खुशी का वेग उमड़ आया, ‘‘अरे, तू तो कितना मोटू हो गया है,’’ दोनों उसे बारीबारी सहलाने लगे और बदले में फ्लौपी उन का मुख चाटचाट कर दुम हिलाता रहा.

सवेरा होते ही सारे मिंटो पार्क में हर्षोल्लास की लहर दौड़ गई. बारीबारी सब बच्चे उसे देखने आए, मानो घर में कोई नववधू विराजी हो. पड़ोस की लाहसा ऐप्सो टापिसी तो अपनी मालकिन को हमारे घर ऐसे खींच ले आई मानो फ्लौपी उस का भावी दूल्हा हो और सब बच्चों में धाक अलग से जमी कि बबल का कुत्ता हवाई जहाज से आया है.

कलकत्ता में मिंटो पार्क के मैदान और बगीचे की कोई सानी नहीं. हरी मखमली घास पर जब हमारा फ्लौपी चिडि़यों के पीछे भागता तो बच्चे भी उस के साथ भागते. अच्छाखासा बच्चों का जमघट कहकहों और किलकारियों से गूंजता रहता.

एक रोज हमें कहीं बाहर जाना पड़ा तो हम फ्लौपी को एक कमरे में बंद कर के खुला छोड़ गए. सोचा, आखिर कुत्ते को घर में रह कर मकान की रखवाली करनी चाहिए. लौट कर आसपड़ोस से पता चला कि पीछे से भौंकभौंक कर उस ने सारा मिंटो पार्क सिर पर उठा लिया था. अपने प्रति अन्याय का ढोल पीटपीट कर सब को खूब परेशान किया. अब एक ही चारा था कि या तो कोई घर में सदा उस के पास रहे या फिर वह कार में हमारे साथ चले.

बहुत सोचविचार करने पर दूसरा उपाय ही सब को ठीक लगा. एक रविवार हम टालीगंज क्लब गए तो उसे भी अपने साथ ले गए. मैं ने तरणताल के साथ रखी एक बेंच से उसे बांध दिया और स्वयं तैरने चली गई. तैरते हुए हंसतेखेलते बच्चों व अन्य लोगों को देख कर फ्लौपी ऐसा अभिभूत हुआ कि वहां पर आतीजाती सभी सुंदरियां उसी की हो गईं. जो भी लड़की वहां से गुजरती हम से हैलो पीछे करती, पहले फ्लौपी का मुख चूमती. क्लब का बैरा उस के लिए मीट की हड्डी ले आया. अब हम जहां भी जाते, उसे साथ ले जाते.

फिर बारी आई डाक्टर और दवाइयों के खर्चों की. परंतु जब विटामिन की ताकत उच्छृंखलता में परिवर्तित होने लगी तो मैं सकते में आ गई. अब उसे बांधा जाने लगा. परंतु जैसे ही उस नटखट पिल्ले को मौका मिलता, वह चीजों को मटियामेट करने से न चूकता. कभी जुराब तो कभी बनियान तो कभी परदा यानी जो भी उस के हाथ लगता, हम से नजर चुरा कर उस का कचूमर निकाल डालता.

एक रोज एक कीमती ब्लाउज इस्तरी करने लगी. उसे खोल कर मेज पर बिछाया तो उस की हालत देख कर दंग रह गई, ‘‘ओ मंगला, यह देख इस की हालत, क्या इसे किसी काकरोच ने काट डाला?’’ मैं ने हैरानगी जाहिर की.

मंगला बेचारी सारा काम छोड़ कर भागी आई, ‘‘मेमसाहब, इसे तो फ्लौपी ने काटा है.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? देखो, गले के पीछे से और बाजुओं पर से ही तो काटा गया है.’’

‘‘हां, जहांजहां पसीने के दाग थे, वह हिस्सा चबा गया.’’

‘‘इस मुसीबत ने तो जीना मुश्किल कर दिया है,’’ मैं ने फ्लौपी को जंजीर समेत घसीट कर अपना ब्लाउज दिखाया.

मेरी कठोर आवाज सुन कर वह सहम गया और उस ने अपना मुख दूसरी तरफ फेर लिया. मेरी गुस्से भरी आवाज सुन कर बबल भी अपने कमरे से भाग आया और गुस्से से बोला, ‘‘हमें जीने नहीं देगा. अब तू क्या चाहता है?’’ उस ने उस रात उसे पलंग के पाए से कस कर बांध दिया, ‘‘बच्चू, तेरी यही सजा है. अपनी हरकतों से बाज आ जा वरना मार डालूंगा,’’ बबल ने उंगली दिखा कर उसे कड़ा आदेश दिया.

फ्लौपी दुम दबा कर पलंग के नीचे दुबक गया.

‘‘मां, आप मेरी बात मानो. इस बेवकूफ को मीट की हड्डी ला दो, सारा दिन बैठा चबाता रहेगा. याद है, माशा हड्डी से कितना खुश रहता था,’’ रात को मेरे बड़े बेटे ने खाने की मेज पर हिदायत दी.

‘‘पर माशा ने हमारी एक भी चीज खराब नहीं की थी. बड़ा ही समझदार कुत्ता था.’’

‘‘हां मां, पर वह बंगले के बाहर के बरामदे में बंधा रहता था और रात को अपना चौकीदार उस की देखभाल करता था. आप उस को घर के अंदर कहां आने देती थीं.’’

‘‘बेटे, यही तरीका है कुत्ता पालने का और यहां इस 8वें तल्ले पर हम इस बेजबान के साथ सरासर अन्याय कर रहे हैं,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘मेमसाहब. कितनी बार हम इस के साथ नीचे जाएंगे,’’ मंगला ने गुस्से में मेरी बात का समर्थन किया.

अगले दिन खरीदारी करने जब मैं बाजार गई तो 4-5 मोटीमोटी मीट की हड्डियां खरीद लाई. रोज उसे एक पकड़ा देती. हड्डी देख कर वह नाच उठता. दिन के समय वह कुरसी के पाए से बंधा रहता और रात को पलंग के पाए से. हड्डी उस के पास धरी रहती. जब उस का जी करता, चबा लेता. 5-6 रोज तक फिर उस ने कोई चीज न फाड़ी. एक सुबह सो कर उठी तो यह सोच कर बहुत प्रसन्न थी कि फ्लौपी की आदतों में सुधार हो रहा है. मैं ने उसे प्यार से सहलाया और फिर रसोई में नाश्ता बनाने चली गई.

इस बीच बच्चे अपना कमरा बंद कर के पढ़ने का नाटक रचते रहे और फ्लौपी को बड़ी मेज की कुरसी के पाए से बांध गए. जब खापी कर नाश्ता खत्म हो गया तो मैं ने आमलेट का एक टुकड़ा दे कर फ्लौपी को पुचकारा, ‘‘अब तो मेरा फ्लौपी बहुत सयाना हो गया है.’’

मेरी बात सुन कर बबल सहम गया. पर उस के सहज होने के नाटक से मैं ताड़ गई कि कोई न कोई बात जरूर है जो मुझ से छिपाई जा रही है. चुपके से जा कर मैं ने विकी के कमरे का दरवाजा सरकाया तो दंग रह गई. हाल ही में खरीदे गए गद्दे पर विकी सफाई से पैबंद लगा रहा था.

‘‘तो यह बात है. 400 रुपए का नया गद्दा है मेरा. इस मुसीबत के कारण तो सारे घर की शांति भंग हो गई है,’’ मैं ने दोचार करारे थप्पड़ उस बेजबान के मुख पर जड़ दिए, ‘‘तू है ही नालायक.’’

रोजरोज घर की शांति भंग होने लगी. शेष बची चीजों को मैं संभालती ताकि कंबल, साडि़यां आदि पर वह अपने दांत न आजमाए. अब उस ने हमारे एक कीमती गलीचे को अपना शिकार बनाया और हमारे बारबार मना करने पर भी वह नजर चुरा कर उसे पेशाब और मल से गंदा कर देता. दिल चाहा कि फ्लौपी के टुकड़े कर दिए जाएं और बच्चों की भी जम कर पिटाई की जाए, जो उसे घर में लाने के जिम्मेदार थे.

एक रात को तो हद हो गई. रात के 3 बजे थे. यह दौरे पर थे. मेरी तबीयत खराब थी. फ्लौपी ने मुझे पांव मार कर जगाया कि उसे नीचे जाना है. मैं ने बबल को आवाज दी, ‘‘रात का समय है, मेरे साथ नीचे चलो.’’

बेचारा झट उठ खड़ा हुआ. बाहर बरामदे में जा कर देखा तो लिफ्ट काम नहीं कर रही थी. अब एक ही चारा था कि सीढि़यों से नीचे उतरा जाए. बेचारा जानवर अपनेआप को कब तक रोकता. उस ने सीढि़यों में ही ‘गंदा’ कर दिया.

मिंटो पार्क कलकत्ता की एक बेहद आधुनिक जगह है. कागज का एक टुकड़ा भी सारे अहाते में दिखाई दे जाए तो बहुत बड़ी बात है.

सवेरा होते मैं डर ही रही थी कि यहां के प्रभारी आ धमके, ‘‘सुनिए, या तो आप अपने कुत्ते को पैंट पहनाइए या फिर किसी नीचे रहने वाले निवासी को सौंप दीजिए. यही मेरी राय है.’’

उस दिन से हम एक ऐसे अदद परिवार की तलाश करने लगे जो फ्लौपी को उस की शैतानियों के साथ स्वीकार कर सके.

हमारे घर विधान नामक एक युवक दूध देने आता था. वह फ्लौपी को बहुत प्यार करता था. हमारी समस्या से वह कुछकुछ वाकिफ हो गया. एक रोज साहस कर के बोला, ‘‘मेमसाहब, नीचे वाला दरबान बोल रहा है कि आप फ्लौपी किसी को दे रहे हैं.’’

‘‘हां, हमारा ऊपर का फ्लैट है न, इसलिए कुछ मुश्किल हो रही है.’’

‘‘मेमसाहब, हमारा घर तो नीचे का है. हमें दे दीजिए न फ्लौपी को.’’

‘‘पूरे 800 रुपए का कुत्ता है, भैया,’’ पास खड़ी मंगला ने रोबदार आवाज में कहा.

‘‘नहींनहीं, हमें इसे बेचना नहीं है. देंगे तो वैसे ही. जो भी इसे प्यार से, ठीक से रख सके.’’

‘‘हम तो इसे बहुत प्यार से रखेंगे,’’ विधान बोला.

‘‘पर तुम तो काम करते हो. घर पर इस की देखभाल कौन करेगा,’’ मैं ने पूछा.

‘‘घर में मां, बहन और एक छोटा भाई है.’’

‘‘इस का खर्चा बहुत है, कर सकोगे?’’

‘‘दूध तो अपने पास बहुत है और मीट भी हम खाते ही हैं.’’

‘‘इस की दवाइयों और डाक्टर का खर्चा?’’

‘‘आप चिंता न करें,’’ विधान ने मुसकराते हुए कहा.

हम दोनों की बातें सुन कर विकी अपने कमरे से भागा आया, ‘‘मां, वह प्यार से फ्लौपी को मांग रहा है. मेरी बात मानो, दे दो इसे. मुझे घर की शांति ज्यादा प्यारी है.’’

सचमुच उस ने फ्लौपी को दोनों हाथों से उठा कर विधान के हाथों में दे दिया.

मैं हतप्रभ सी खड़ी बबल के चेहरे पर उतरतेचढ़ते भावों को पढ़ कर बोली, ‘‘विधान, तुम इसे कुछ रोज अपने पास रखो, फिर मैं सोचूंगी.’’

फ्लौपी चला गया तो ऐसा लगा कि घर में कुछ विशेष काम ही नहीं. ‘चलो मुसीबत टली,’ मैं ने सोचा. पर 2 दिन पश्चात ही महसूस होने लगा कि घर का सारा माहौल ही कसैला हो गया है. बच्चे स्कूल से लौटते तो चुपचाप अपनेअपने कमरों में दुबक जाते. न कोई हंसी न खेल. 2 रोज पहले तो फ्लौपी था. बच्चों की आहट पाते ही भौंभौं कर के झूमझूम जाता था और बदले में विकी और बबल के प्रेमरस से सराबोर फिकरे सुनने को मिलते.

उल्लासरहित वातावरण मन को अखरने लगा. जब खाने की मेज पर बच्चे बैठते तो बारबार उस कोने को देख कर ठंडी आहें भरते जहां वह बंधा रहता था. मन एक तीव्र उदासी से लबालब हो उठा. अगली सुबह जब विधान दूध देने आया तो मैं ने फ्लौपी के बारे में पूछताछ की.

‘‘बहुत खुश है, मेमसाहब. मेरी बहन उसे बहुत प्यार करती है,’’ विधान ने बताया.

‘‘कल शाम को उसे मिलाने के लिए जरूर लाना. बच्चे उसे बहुत याद करते हैं.’’

‘‘अच्छा मेमसाहब, कल शाम 4 बजे उसे जरूर लाऊंगा,’’ वह कुछ सोच कर बोला.

दूसरे दिन 3 बजते ही बच्चे फ्लौपी का बेसब्री से इंतजार करने लगे थे. इतने उत्साहित थे कि अपने मित्रों के साथ नीचे खेलने भी न गए. जरा सी आहट पाते ही मंगला बारबार दरवाजा खोल कर देखती. पहले 4 बजे, फिर 5 बज गए, पर फ्लौपी न आया और न विधान ही दिखाई दिया. हम सब का धैर्य जवाब देने लगा. बबल उदास स्वर में बोला, ‘‘अब वह लड़का फ्लौपी को कभी नहीं लाएगा.’’

‘‘क्यों?’’ मैं हैरान हो कर बोली.

‘‘उस ने उस पर अपना हक जमा लिया है.’’

‘‘तो क्या, 2 रोज में ही फ्लौपी विधान का हो गया. मैं कल ही उस से बात करूंगा,’’ विकी क्रोध में बोला.

‘‘कितना महंगा कुत्ता है. कहीं उस ने बेच न दिया हो, मेमसाहब,’’ मंगला ने अपनी शंका व्यक्त की.

‘‘बेच कर तो देखे. हम उस की पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे,’’ विकी ने ऊंचे स्वर में कहा.

‘‘ऐसा करो बबल, जा कर देख आओ कि सब ठीक है न,’’ इन्हीं बातों में शाम बीत गई पर विधान न आया.

‘‘मां, एक बात कहूं पर डर लगता है,’’ विकी बोला.

‘‘क्या बात है?’’

‘‘कहीं फ्लौपी का एक्सीडेंट तो नहीं हो गया,’’ उस की बात सुन कर मेरा कलेजा धक से रह गया कि कहीं माशा वाले अंत की पुनरावृत्ति न हो जाए. मुझे तो विधान से यह भी पूछना याद नहीं रहा कि कहीं उस का घर सड़क के किनारे तो नहीं.

अज्ञात आशंका के कारण सारा उत्साह भय में तबदील हो गया. मन एक तीव्र अपराधबोध से भर उठा. एक घुटन सी मेरे भीतर गूंजने लगी. सोचा, जल्दबाजी में सब गड़बड़ हो गया. कुछ दिनों में फ्लौपी अपनेआप ठीक हो जाता.

सवेरा होते ही मैं दरवाजे पर टकटकी लगाए विधान की राह देखने लगी. जैसे ही लिफ्ट की आहट हुई, मैं ने झट से किवाड़ खोला, उसे अकेला आया देख कर एक बार तो संशय तनमन को झकझोरने लगा.

‘‘फ्लौपी को क्यों नहीं लाए? सब ठीक तो है न?’’ मैं एकसाथ कई प्रश्न कर उठी.

‘‘कल कुछ मेहमान आ गए थे, मेमसाहब. इसलिए नहीं आ सका. वैसे वह ठीक है.’’

विधान की बात सुन कर मैं एक सुखद आश्चर्य से अभिभूत हो कर बोली, ‘‘देखो, आज शाम को फ्लौपी को जरूर लाना वरना बच्चे बहुत नाराज होंगे.’’

शाम को 3 बजे जैसे ही बाहर की घंटी बजी, बच्चों ने लपक कर दरवाजा खोला. फ्लौपी हम सब को देखते ही विधान की बांहों से छूट कर मेरी गोद में आ गया.

मुख चाटचाट कर, दुम हिलाहिला कर और झूमझूम कर वह अपनी खुशी प्रकट करने लगा. बच्चों का उत्साह से नाचना और खिलखिलाना मुझे बड़ा भला लगा. एक बार तो मुझे ऐसा लगा कि दीर्घकाल से बिछुड़ा मेरा तीसरा बच्चा मिल गया हो और हमारी ममता भरी छाया में पहुंच गया हो. आधे घंटे बाद जब विधान पुन: फ्लौपी को लेने के लिए आया तो मेरे मुख से बस इतना ही निकला, ‘‘विधान, अब फ्लौपी को यहीं रहने दो, हमारा मन नहीं मानता.’’ Family Story In Hindi 

Social Story : दूध की धुली – आखिर क्यों पृथ्वी और संगीता घर से भागे?

Social Story : पृथ्वी सड़क के किनारे चुपचाप चल रहा है.  संगीता हरे रंग का सूट पहने हुए है, उस का चेहरा पीला पड़ गया है. हाथों में जेवर की पोटली और किताबों का बैग है. संगीता चलतचलते सरसरी निगाह से पृथ्वी को देख रही है. जब बाजार समाप्त हो गया, तो दोनों पासपास आ गए और एक रिकशे में बैठ कर स्टेशन की ओर चल दिए.

संगीता बोली, ‘‘मुझे बहुत डर लग रहा है.’’

पृथ्वी बोला, ‘‘जब मैं हूं तब किस बात का डर. एक बात बताओ, रास्ते में तुम्हें कोई जानने वाला तो नहीं मिला?’’

संगीता ने कहा, ‘‘नहीं, एक लड़की मिली थी. परंतु तब तुम मेरे से दूर थे. मातापिता परेशान होंगे, मैं उन से कह कर आई थी कि कालेज जा रही हूं. न जाने दिल क्यों इतना घबरा रहा है?’’

पृथ्वी ने आश्वासन दिया, ‘‘डरने की क्या बात है, ट्रेन में बैठ कर सीधे मुंबई पहुंच जाएंगे. एक दिन का तो सफर है. वहां बिलकुल अपरिचित लोग होंगे. बस, मैं और तुम. वहां जा कर एक होटल में ठहर जाएंगे. वैसे भी हमारे घर वालों को, हम पर किसी तरह का शक थोड़े ही हुआ होगा.

संगीता घबराती हुई बोली, ‘‘मुझे घर पर न पा कर मम्मीपापा कितने परेशान होंगे, बहुत डर लग रहा है. पता नहीं क्यों?’’

पृथ्वी हंसते हुए बोला, ‘‘सब से पहले तो तुम्हारे कालेज में पूछताछ होगी. बहरहाल, यह गहने कैसे ले कर आ पाई?’’

‘‘मुझे जगह पता थी. रात को ही अलमारी खोल कर निकाल लिए थे. अलमारी का ताला बंद कर दिया है,’’ संगीता ने बताया.

रिकशा वाला सब सुन रहा था. उन्होंने

स्टेशन के लिए 50 रुपए में रिकशा तय किया था. जब स्टेशन आया तो रिकशा वाला हेकड़ी से बोला, ‘‘मैं तो 500 रुपए लूंगा.’’

‘‘500 रुपए,’’ दोनों एकसाथ बोले, ‘‘500 रुपए किस बात के?’’

‘‘चुपचाप 500 रुपए दे दो वरना अभी पुलिस को बुलाता हूं,’’ रिकशे वाले ने कहा.

पृथ्वी ने चुपचाप जेब से 500 रुपए निकाल कर दे दिए. संगीता घबरा रही थी. जल्दीजल्दी पृथ्वी ने मुंबई के फर्स्टक्लास के 2 टिकट ले लिए. टिकट ले कर तेजी से दोनों ट्रेन के फर्स्टक्लास के डब्बे में जा कर बैठ गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. संगीता ने रोते हुए कहा, ‘‘अब तो मुझे और भी ज्यादा डर लग रहा है.’’

पृथ्वी ने समझाया,  ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. फियर इंस्टिंक्ट एक चीज है. लिखने वाले ने तो यह भी लिखा है कि… मगर… खैर छोड़ो… हां, तुम्हारी जरा सी घबराहट ने रिकशा वाले को 500 रुपए का फायदा करा दिया. यदि तुम रिकशे में यह बात न बोलती तो ऐसा कुछ भी न होता. मुझे कुछ नहीं कहना. मगर दुख है तो सिर्फ इस बात का कि मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी और रिकशे वाला मुझे लूट कर चला गया.’’

बाहर दरवाजे पर खटखट हुई, दोनों ने  एकदूसरे को डरते हुए देखा. पृथ्वी बोला, ‘‘साले ने 500 रुपए ले कर भी पुलिस को खबर कर दी.’’

संगीता घबराहट के मारे कांप रही थी, वह बोली, ‘‘अब क्या होगा?’’

‘‘चुपचाप देखती रहो, मुझ पर विश्वास रखो. पीछे के दरवाजे से उतर कर किसी दूसरे डब्बे में बैठ जाते हैं,’’ कह कर पृथ्वी ने पिछला दरवाजा खोला और दोनों उतर कर चल दिए. परंतु दूसरे किसी डब्बे में नहीं बैठ पाए, क्योंकि किसी भी डब्बे का दरवाजा खुला हुआ नहीं था. दोनों चुपचाप प्लेटफौर्म पर चलने लगे.

‘‘अपना किताबों का यह बैग तो छोड़ दो,’’ पृथ्वी ने संगीता से कहा.

एक सिपाही घूमता हुआ उधर ही आ रहा था. संगीता ने जल्दी से अपना बैग एक मालगाड़ी के डब्बे में रख दिया. सिपाही इतने में पास आ कर पृथ्वी से बोला, ‘‘आप लोग कहां जाएंगे?’’

पृथ्वी बोला, ‘‘हम तो ऐसे ही घूमने चले आए हैं. अब जा रहे हैं.’’

‘‘मगर आप की गाड़ी तो छूटने वाली है. आप ने फर्स्टक्लास का टिकट बुक कराया था,’’ सिपाही अपनी बात पर जोर देते हुए बोला.

‘‘ऐ मिस्टर, मैं ने कहीं का भी टिकट बुक कराया हो आप को इस से क्या लेनादेना. बोलो, क्या कर लोगे तुम? कौन होते हो यह सब पूछने वाले?’’

‘‘अरे भाई, गुस्सा क्यों होते हो? मैं तो सेवक हूं आप का. जब 50 रुपए की जगह 500 रुपए रिकशे वाले को दे सकते हो, तो हुजूर, थोड़ा सा ईनाम हमें भी मिल जाए.’’

पृथ्वी पूरी बात समझ गया. उसे 500 रुपए का नोट देते हुए बोला, ‘‘हांहां, तुम भी लो.’’ सिपाही रुपए ले कर चला गया. संगीता बोली,  ‘‘हमारे मन में चोर है न, इसलिए हम हर बात से डरते हैं. चलो, फिर वापस चलते हैं.’’

‘‘बेकार में डरडर कर इधरउधर भटकते रहें, क्या फायदा,’’ पृथ्वी ने खीझते हुए कहा, ‘‘बेकार ही कंपार्टमैंट से आए. चलो, वापस वहीं चलते हैं.’’

दोनों तेजी से दौड़े परंतु कंपार्टमैंट में घुसने से पहले ही एक और पुलिस वाला आया और बोला,  ‘‘अरे, झगड़ा बढ़ाने से क्या फायदा, हम सब को 1000-1000 रुपए दो और मौज करो,’’ और हाहा कर हंसने लगा.

संगीता तो डर के मारे बुरी तरह से कांप रही थी. पृथ्वी बोला, ‘‘मैं कोई ईनाम वगैरा नहीं दूंगा. मैं ने कोई दानखाता खोल रखा है क्या? मैं आप लोगों की फितरत समझ रहा हूं.’’

‘‘देखिए साहब, आप पढ़ेलिखे मालूम पड़ते हैं. आओ, पहले डब्बे में बैठ जाएं. यहां भीड़ इकट्ठी हो जाएगी और आप की बदनामी होगी. जब दोनों कंपार्टमैंट में चढ़ गए तो पुलिस वाला भी पीछेपीछे पहुंच गया और बोला, ‘‘थोड़ी देर के लिए आप थाने चलिए.’’

‘‘मैं किसी थानेवाने नहीं जाऊंगा. मेरी गाड़ी छूट जाएगी,’’ गुस्से से पृथ्वी ने कहा.

‘‘देखिए भाईसाहब, अब आप इस गाड़ी से तो नहीं जा सकते. मैं ने तो पहले ही आप से कहा था कि आप हमारे साहब की सेवा में 1000 रुपए दे दीजिए.’’ अब की बार साहब भी उसी कंपार्टमैंट में आ गए, बोले,  ‘‘क्यों बे शकीरा के बच्चे, जाओ, हथकड़ी ले कर आओ. यह लड़का इस लड़की को भगा कर लिए जा रहा है. इस को गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दो.’’

पृथ्वी ने 2-2 हजार रुपए के 5 नोट निकाल कर उन के हाथ में थमा दिए. बड़े साहब उन नोटों को जेब में रखते हुए बोले, ‘‘अच्छा सर, चलिए, बिना हथकड़ी लगाए ही आप को ले कर चलते हैं.’’

अब पृथ्वी बोला, ‘‘अब मैं थाने क्यों जाऊं. मैं ने 10,000 रुपए किस बात के दिए हैं?’’

‘‘देखो लड़के, यह 10,000 रुपए मैं ने सिर्फ इस बात के लिए हैं कि तुम्हें थाने हथकड़ी डाल कर न ले कर जाऊं.’’

संगीता बहुत देर से साहस जुटा रही थी, बोली, ‘‘देखिए, मैं अपनी मरजी से जा रही हूं. आप बेकार में हमें परेशान मत कीजिए.’’

‘‘हांहां मुन्नी, मैं भी तो यही कह रहा हूं, थाने चल कर थोड़ी देर बैठिएगा. वहीं आप के मम्मीपापा को बुलाया जाएगा. तब जैसा होगा, कर दिया जाएगा और उस सूरत में आप इसी ट्रेन से शाम को जा सकते.’’ तभी पहला सिपाही भी आ गया और बैग देते हुए बोला, ‘‘संगीताजी, आप का बैग. आप ने मालगाड़ी में छोड़ दिया था.’’

संगीता ने बैग हाथ में ले लिया. उस के बाद दोनों चुपचाप नीचे प्लेटफौर्म पर उतर गए. पृथ्वी ने पुलिस अफसर से इजाजत मांगी कि वह संगीता से एकांत में कुछ बात कर ले. उस पर पुलिस वाले ने कहा, ‘‘हांहां, जरूर कर लीजिए.’’ और थोड़ी दूर जा कर खड़ा हो गया. आसपास काफी भीड़ इकट्ठी हो गई थी. पृथ्वी काफी परेशान था, बोला, ‘‘अब

क्या होगा?’’

‘‘मुझे मेरे घर या कालेज भेज दीजिए,’’ संगीता ने रोते हुए कहा.

‘‘घर मैं भी जाना चाहता हूं, लेकिन ये कमीने आसानी से पीछा नहीं छोड़ रहे.’’

‘‘कोई ऐसी तरकीब निकालें, जिस से पिताजी को पता न चले,’’ संगीता ने पृथ्वी से घबराते हुए कहा.

‘‘कोशिश तो ऐसी ही करूंगा. मेरा विचार है कि जितना भी रुपया है, इन्हें दे दिया जाए और यहां से वापस चलते हैं. यहां अगर हमें किसी ने पहचान लिया तो मुसीबत हो जाएगी.’’ इस बीच, सिपाही बोला, ‘‘चलिए साहब, थाने.’’

‘‘इंस्पैक्टर साहब, हम से गलती हुई है. अब हम वापस जा रहे हैं,’’ संगीता ने इंस्पैक्टर साहब को अपनी पोटली दे दी.

पृथ्वी का साथ दम तोड़ चुका था. संगीता निर्जीव सी सब कार्य कर रही थी. इसी झगड़े में 11 बज गए. संगीता एक रिकशे पर बैठ कर कालेज चली गई. पृथ्वी दूसरे रिकशे पर बैठ कर अपने घर चला गया. शकीरा ने इंस्पैक्टर से पूछा, ‘‘अगर इन लोगों ने अपने मांबाप को बता दिया तो क्या होगा?’’

‘‘तू गधा है. क्या वे अपने मांबाप को यह बताएंगे कि हम भाग रहे थे. फिर मैं तो उन को जानता भी नहीं. हमें कोई कुछ क्यों बताएगा या देगा?’’

शाम को 4 बजे जब संगीता घर पहुंची तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. फिर भी वह हंस रही थी. कहने लगी, ‘‘मम्मी, आज तो कालेज में यह हुआ वह हुआ.’’ उस के बाद कमरे में अकेली जा कर लेट गई और सोचने लगी, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

संगीता को कड़वा लग रहा था. उस ने अधिक नहीं खाया. बस, एक ही सवाल उस के जेहन में घूम रहा था, ‘कैसे होगा?’

अलमारी की तरफ अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया था.  कैसे होगा? शाम को उस की सहेली आ गई थी. उस ने बताया, ‘‘आज उस के कालेज में फिजिक्स के पीरियड में सब लड़कियां खिड़कियों पर चढ़ गईं और जब फिजिक्स की टीचर आईं, तो उन के कहने पर नीचे उतरीं.’’ संगीता ने कुछ नहीं सुना. बस, उस का दिल घबरा रहा था, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

रात को उसे नींद भी नहीं आई. पुलिस, भीड़, रेलवे स्टेशन, बैग, गहने, पोटली बराबर दिमाग में घूम रहे थे और एक ही सवाल बारबार दिमाग में हथियार के जैसे प्रहार कर रहा था, अब कैसे होगा?’

2 बजे रात चुपके से संगीता उठी. उस ने छिपाई हुई चाबी को हाथ में ले कर अलमारी का दरवाजा खोल दिया. बचे हुए गहनों को तितरबितर कर दिया. एक हार पोटली में से जमीन पर डाल दिया. कपड़े आंगन में फैला दिए. दरवाजे की चटकनी खोल दी और फिर जा कर अपने बैड पर लेट गई. दिमाग में एक ही बात हथौड़े जैसे प्रहार कर रही थी कि अब क्या होगा?

सुबह होते ही अड़ोसपड़ोस में शोर मचा हुआ था कि रामप्रकाश के घर में चोरी हो गई. चोर अलमारी खोल कर कुछ लाख रुपए और गहने ले गए हैं. शायद किसी आवाज से डर गए थे. इसलिए सारे गहने ले कर नहीं गए. रामप्रकाश ने लोगों को बताया कि बड़े कमाल की बात है. उन चोरों ने बाहर का दरवाजा कैसे खोला? समझ में नहीं आ रहा है. मैं तो रात को सबकुछ देख कर सोता हूं और सब से बड़ी बात, वे सारे गहने ले कर नहीं गए. यों समझो कि भारी नुकसान होने से बच गए.

चोरी की सूचना पुलिस को दी गई. वहां से एक इंस्पैक्टर और 2 सिपाही जांचपड़ताल के लिए आए. उन्होंने दरवाजे को गौर से देखा. वह अलमारी भी देखी. अलमारी की चाबी भी देखी. लेकिन संगीता को देखते ही पहचान गए. संगीता भी उस पुलिस औफिसर और सिपाही को पहचान गई. तब पुलिस वाले ने संगीता की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘यह काम तो किसी घर वाले का ही लगता है.’’

इस पर संगीता की आंखें, पुलिस वाले की आंखों से जा मिलीं. उन में याचना थी. पुलिस वाले ने घर के चारों और देखा और बोला, ‘‘कोई किराएदार ऊपर रहता है क्या?’’

‘‘नहीं साहब,’’ राम प्रकाश ने कहा.

‘‘यह घर के आदमी का काम नहीं हो सकता. मेरा एक लड़का 8 साल का है. एक लड़की है, जो दूध की जैसी धुली हुई है. मैं हूं. मेरी पत्नी है. यह सच्ची बात है कि दरवाजा बाहर से ही खुला है. मगर कमाल है, साहब,’’ राम प्रकाश बोला.

पुलिस वाले ने कहा, ‘‘चोरी का पता लगाने की पूरी कोशिश की जाएगी. मगर मेरी सलाह मानिए, आप अपना जेवरपैसा. अब अलमारी में न रख कर, बैंक में रखें. हो सकता है चोर दोबारा चोट करे.’’

पुलिस वाले ने वहीं बैठ कर रिपोर्ट तैयार की. वहां उपस्थित लोगों के हस्ताक्षर लिए. पुलिस वाले के साथ आए सिपाही ने जाते हुए सरसरी निगाह से संगीता की तरफ देखा और बोला, ‘दूध की धुली’ और लंबी सी डकार लेता हुआ दरवाजे से बाहर निकल गया. Social Story

Family Story : निराधार डर – माया क्यों शक करती थी

Family Story : ‘‘शादी हुई नहीं कि बेटा पराया हो जाता है,’’ माया किसी से फोन पर कह रही थीं, ‘‘दीप की शादी हुए अभी तो केवल 15 दिन ही हुए हैं और अभी से उस में इतना बदलाव आ गया है. पलक के सिवा उसे न कोई दिखाई देता है, न ही कुछ सूझता है. ठीक है कि पत्नी के साथ वह ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता है, पर मां की उपेक्षा करना क्या ठीक है.’’ यह सुन कर दीप हैरान रह गया. उस ने अनुमान लगाया कि फोन के दूसरी तरफ सोमा बूआ ही होंगी. वही हैं जो इस तरह की बातों को शह देती हैं. वह भी तो हमेशा अपने बेटेबहू को ले कर नाराज रहती हैं. सब जानते हैं कि सोमा बूआ की किसी से नहीं बनती. वे तो सभी से परेशान रहती हैं और दूरपास का कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं है जो उन के व्यंग्यबाणों का शिकार न हुआ हो. अपने बेटे को तो वे सब के सामने जोरू का गुलाम तक कहने से नहीं चूकती हैं. पर मां, उस के बारे में ऐसा सोचती हैं, यह बात उसे भीतर तक झकझोर गई. घर में और तो किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, तो मां को ऐसा क्यों लग रहा है. पापा, उस की बहन दीपा, किसी ने भी तो ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया है जिस से लगे कि वह शादी के बाद बदल गया है. फिर मां को ही क्यों लग रहा है कि वह बदल गया है.

पलक को इस समय नए घर में एडजस्ट होने में उस का सहयोग और साथ चाहिए और वही वह उसे दे रहा है तो इस से क्या वह मां के लिए पराया हो गया है. पलक के लिए यह घर नया है, यहां के तौरतरीके, रहनसहन सीखनेसमझने में उसे समय तो लगेगा ही और अगर वह यहां के अनुरूप नहीं ढलेगी तो क्या मां नाराज नहीं होंगी. आखिर मां क्यों नहीं समझ पा रही हैं कि पलक के लिए नए माहौल में ढल पाना सहज नहीं है. इस के लिए उसे पूरी तरह से अपने को बदलना होगा और वह चाहती है कि इस घर को जल्दी से जल्दी अपना बना लें ताकि सारी असहजता खत्म हो जाए. वह पूरी कोशिश कर रही है, पर मां का असहयोग उसे विचलित कर देता है. दीप खुद हैरान था मां के व्यवहार को देख कर. मां तो ऐसी नहीं हैं, फिर पलक के प्रति वे कटु कैसे हो गई हैं.

‘‘मां, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? मैं पराया कहां हुआ हूं? बताइए न मुझ से कहां चूक हो गई या आप की कौन सी बात की अवहेलना की है मैं ने? हां, इतना अवश्य हुआ है कि मेरा समय अब बंट गया है. मुझे अब पलक को भी समय देना है ताकि वह अकेलापन महसूस न करे.

‘‘अभी मायके की यादें, मांबाप, भाईबहन से बिछुड़ने का दुख उस पर हावी है. हम सब को उसे सहयोग देना चाहिए ताकि वह खुल कर अपनी बात सब से कह सके. उसे थोड़ा वक्त तो हमें देना ही होगा, मां छुट्टियां खत्म हो जाने से पहले वह भी सब कुछ समझ लेना चाहती है, जिस से औफिस और घर के काम में उसे तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो.’’

‘‘मुझे तुझ से बहस नहीं करनी है, चार दिन हुए हैं उसे आए और लगा है उस की तरफदारी करने.’’ पलक अपने कमरे में बैठी मांबेटे की बातें सुन रही थी. उसे हैरानी के साथसाथ दुख भी हो रहा था कि आखिर मां, इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. वह तो उन के तौरतरीके अपनाने को पूरे मन से तैयार है, फिर मां की यह सोच कैसे बन गई कि उस ने दीप को अपनी मुट्ठी में कर लिया है. कमरे में दीप के आते ही उस ने पूछा, ‘‘मुझ से कहां चूक हो गई, दीप, जो मां इस तरह की बात कर रही हैं. मैं ने कब कहा कि तुम हमेशा मेरे पल्लू से बंधे रहो. इतना अवश्य है कि मां से मुझे किसी तरह भी सहयोग नहीं मिल रहा है, इसलिए मुझे तुम्हारे ऊपर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है. फिर चाहे वह घरगृहस्थी से जुड़ी बात हो या रसोई के काम की या फिर मेरे दायित्वों की. इसी कारण तो हम हनीमून के लिए भी नहीं गए ताकि मुझे इस माहौल में एडजस्ट होने के लिए समय मिल जाए. जानते ही हो कि छुट्टी भी मुश्किल से एक महीने की ही मिली है.’’

‘‘मैं खुद हैरान हूं, पलक कि मां इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. जबकि उन्हें ही मेरी शादी की जल्दी थी. हमारी लव मैरिज उन की स्वीकृति के बाद ही हुई है. शादी से पहले तो वे तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं, फिर अब अचानक क्या हो गया. कितने चाव से उन्होंने शादी की एकएक रस्म निभाई थी. सोमा बूआ टोकती थीं तो मां उन की बातों को नजरअंदाज कर देती थीं. सब से यही कहतीं, मेरा तो एक ही बेटा है, उस की शादी में अपने सारे चाव पूरे करूंगी. आज वे सोमा बूआ की बातों को सुन रही हैं, उन से ही हमारी शिकायत कर रही हैं. ‘‘आज उन्हें अपने ही बेटे की खुशी खल रही है. उन्हें तो इस बात की तसल्ली होनी चाहिए कि हम दोनों खुश हैं और एकदूसरे से प्यार करते हैं. डरता हूं सोमा बूआ कहीं हमारे बीच भी तनाव न पैदा कर दें. मां ने उन की बातें सुनीं तो अवश्य ही उन के बेटेबहू की तरह हमारे बीच भी झगड़े होने लगेंगे.’’

‘‘मुझ पर विश्वास रखो दीप, ऐसा कुछ नहीं होगा,’’ पलक के स्वर में दृढ़ता थी. ‘‘हमें मां के भीतर चल रही उथलपुथल को समझ कर उन से व्यवहार करना होगा. उन के मनोविज्ञान को समझना होगा. दीप, मनोविज्ञान की छात्र रहने के कारण मैं उन की मानसिक स्थिति बखूबी समझ सकती हूं. जब बेटे की शादी होती है तो कई बार एक डर मां के मन में समा जाता है कि अब तो उस का बेटा हाथ से निकल गया. उस में सब से खराब स्थिति बेटे की ही होती है, क्योंकि वह ‘किस की सुने’ के चक्रव्यूह में फंस जाता है. त्रिशंकु जैसी स्थिति हो जाती है उस की. पत्नी जो दूसरे घर से आती है वह पूरी तरह से नए परिवेश में ढलने के लिए उस पर ही निर्भर होती है, और मां को लगता है कि बेटा जो आज तक हर काम उन से पूछ कर करता था, अब बीवी को हर बात बताने लगा है. बस, यही वजह है जब मां को लगता है कि उन की सत्ता में सेंध लगाने वाली आ गई है और वह बहू के खिलाफ मोरचा संभाल लेती है. लेकिन हमें मां को उस डर से बाहर निकालना ही होगा.’’

‘‘पर यह कैसे होगा?’’ दीप पलक की बात सुन थोड़ा असमंजस में था. वह किसी भी तरह से मां को दुखी नहीं देख सकता था और न ही चाहता था कि पलक और मां के संबंधों में कटुता आए.

‘‘यह तुम मुझ पर छोड़ दो, दीप. बस यह खयाल रखना कि मां चाहे मुझ से जो भी कहें, तुम हमारे बीच में नहीं बोलोगे. इस तरह बात और बिगड़ जाएगी और मां को लगेगा कि मेरी वजह से मांबेटे के रिश्ते में दरार आ रही है या बेटा मां से बहस कर रहा है. हालांकि उन की जगह कोई नहीं ले सकता पर फिर भी हमें उन्हें बारबार यह एहसास कराना होगा कि उन की सत्ता में सेंध लगाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ‘‘हर सदस्य की परिवार में अपनी तरह से अहमियत होती है. बस, यही उन्हें समझाना होगा. उस के बाद उन के मन से सारे भय निकल जाएंगे तब वे तुम्हें ले कर शंकित नहीं होंगी कि तुम उन के बुढ़ापे का सहारा नहीं बनोगे, न ही वे इस बात से चिंतित रहेंगी कि मैं उन के बेटे को उन से छीन लूंगी.’’

‘‘सही कह रही हो तुम, पलक. मैं ने भी कई घरों में यही बात देखी है. इसी की वजह से न चाहते हुए मेरे दोस्त वैभव को शादी के बाद अलग होने को मजबूर होना पड़ा था. सासबहू की लड़ाई में वह पिस रहा था. यह देख उस के पापा ने ही उस से अलग हो जाने को कहा था. बेटा हाथ से न निकल जाए का डर, यह अनिश्चतता कि बुढ़ापे में कहीं वे अकेले न रह जाएं, बहू घर पर अधिकार न कर ले, बहू की बातों में आ कर कहीं बेटा बुरा व्यवहार न करे या घर से न निकाल दे, ये बातें जब मन में पलने लगती हैं तो निराधार होने के बावजूद संबंधों में कड़वाहट ले आती हैं. मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार में ऐसा कुछ हो. मैं अपने मांबाप को किसी हाल में नहीं छोड़ सकता,’’ दीप भावुक हो गया था.

‘‘दीप, अब अंदर ही बैठा रहेगा या बाहर भी आएगा. देखो, तुम्हारे मामामामी आए हैं,’’ मां के स्वर में झल्लाहट साफ झलक रही थी. दीप को बुरा लगा पर पलक ने उसे शांत रहने का इशारा किया. बाहर आ कर दोनों ने मामामामी के पैर छुए. फिर पलक किचन में उन के लिए चायनाश्ता लेने चली गई. ‘‘दीदी, अब तो आप का मन खूब लग रहा होगा. पलक काफी मिलनसार और खुशमिजाज लड़की है. बड़ों का आदर भी करती है. जब कुछ दिन पहले दीप और पलक घर आए थे तभी पता लग गया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’ अपनी भाभी के मुंह से पलक की तारीफ सुन माया ने सिर्फ सिर हिलाया. यह सच था कि पलक उन्हें भी अच्छी लगती थी, पर उस की तारीफ करने से वे डरती थीं कि कहीं इस से उन का दिमाग खराब न हो जाए. पलक उस की हर बात को मानती थी, पर वे थीं कि एक दूरी बनाए हुए थीं, पता नहीं पढ़ीलिखी, नौकरी वाली बहू बाद में कैसे रंग दिखाए. वैसे ही बेटा उस के आगेपीछे घूमता रहता है, न जाने क्यों उन के अंदर एक खीझ भर गई थी जिस के कारण वे पलक से खिंचीखिंची रहती थी. और इस वजह से उन के पति और बेटी भी उन से नाराज थे.

‘‘मां, आप एक मिनट के लिए यहां आएंगी,’’ पलक ने 5 मिनट बाद आवाज लगाई, ‘‘मां, प्लीज मुझे बता दीजिए कि मामामामी को क्या पसंद है. आप तो सब जानती हैं.’’ माया को यह सुन अच्छा लगा. पलक जब नाश्ता ले कर आ रही थी तो उस ने मामी को कहते सुना, ‘‘मानना पड़ेगा दीदी, इतनी पढ़ीलिखी होने पर भी पलक में घमंड बिलकुल नहीं है, वरना कमाने वाली लड़कियां तो आजकल रसोई में जाने से ही परहेज करती हैं. ‘‘उस दिन जब हमारे घर आई थी तभी परख लिया था मैं ने कि इस में नखरे तो बिलकुल नहीं हैं. मेरी भाभी की बहू को ही देख लो. उस ने शादी के बाद ही साफ कह दिया था कि घर का कोई काम नहीं करेगी. नौकर रखो या और कोई व्यवस्था करो, उसे कोई मतलब नहीं है. भाभी की तो उस के सामने एक नहीं चलती. आप को तो खुश होना चाहिए बेटाबहू दोनों ही आप को इतना मान देते हैं.’’

‘‘अरे, अभी उसे आए दिन ही कितने हुए हैं. औफिस जाना एक बार शुरू करने दो, सारे रंग सामने आ जाएंगे,’’ पलक को आते देख माया एकदम चुप हो गईं. पलक को बुरा तो बहुत लगा पर वह हंसते हुए नाश्ता परोसने लगी. दीप अंदर ही अंदर कुढ़ कर रहा गया था. वह कुछ कहना ही चाहता था कि पलक ने उसे इशारे से मना कर दिया. मामी ने महसूस किया कि माया पलक के प्रति कुछ ज्यादा ही कटु हो रही हैं और दीप को अच्छा न लगना स्वाभाविक ही था. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘दीदी, हो सकता है आप को मेरा कुछ कहना अच्छा न लगे, पर आप पलक के बारे में कुछ ज्यादा ही गलत सोच रही हैं. हो सकता है उस में कुछ कमियां हों, तो क्या हुआ. वे तो सभी में होती हैं. बच्ची को प्यार देंगी तो वह भी आप का सम्मान करेगी. मुझे तो लगता है कि वह आप के जितना निकट आना चाहती है, आप उस से उतनी ही दूरियां बनाती जा रही हैं. ‘‘दीप की खुशी के बारे में सोचें. पलक की वजह से ही वह चुप है, पर कब तक चुप रहेगा. बेटा चाहे वैसे दूर न हो, पर आप की सोच की वजह से दूर हो जाएगा. बहू बेटे को छीन लेगी, यह डर ही आप को रिश्ते में दरार डालने के लिए मजबूर कर रहा है. पलक को खुलेदिल से अपना लीजिए, वरना बेटा सचमुच छिन जाएगा.’’

‘‘सही तो कह रही थीं तुम्हारी भाभी,’’ रात को मौका पाते ही उन के पति ने उन्हें समझाना चाहा, ‘‘इतनी अच्छी बहू मिली है, पर तुम ने दूसरों के बेटेबहू के किस्से सुन एक धारणा बना ली है जो निराधार है. आज वह हर बात तुम से पूछ रही है, लेकिन अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो दीप ही सब से पहले तुम्हारा विरोध करेगा. ‘‘सोचो, अगर पलक उसे तुम्हारे खिलाफ भड़काने लगे तो क्या होगा. सोमा की बातों पर मत जाओ. बहू को दिनरात ताने दे कर उस ने संबंध खराब किए हैं. नए घर में जब एक लड़की आती है तो उस के कुछ सपने होते हैं, वह नए रिश्तों से जुड़ने की कोशिश करती है. पर तुम हो कि उस की गलतियां ही ढूंढ़ती रहती हो. इस तरह तुम दीप को दुखी कर रही हो. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा बेटा खुश रहे.

‘‘कल हमारी दीपा के साथ भी उस की सास ऐसा ही व्यवहार करेगी तो क्या वह सुखी रह पाएगी या तुम बरदाश्त कर पाओगी? अपने डर से बाहर निकलो माया, और पलक व दीप पर विश्वास करो.’’ पूरी रात माया कशमकश से जूझती रहीं. सच में बेटे के छिन जाने का डर ही उन्हें पलक के साथ कठोर व्यवहार करने को मजबूर कर रहा है. आखिर जितना प्यार वे दीप और दीपा पर उड़ेलती हैं, पलक को दें तो क्या वह भी उन की बेटी नहीं बन जाएगी. जरूरी है कि उसे बहू के खांचे में जकड़ कर ही रखा जाए? वह भी तो माया में मां को ही तलाश रही होगी? माया जब सुबह उठीं तो उन के चेहरे पर कठोरता और खीझ के भाव की जगह एक कोमलता व नजरों में प्यार देख पलक बोली, ‘‘मां, आइए न, साथ बैठ कर चाय पीते हैं. आज संडे है तो दीप तो देर तक ही सोने वाले हैं.’’

‘‘तुम क्यों इतनी जल्दी उठ गईं? जाओ आराम करो. नाश्ता मैं बना लूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, हम मिल कर नाश्ता बनाएंगे और इस बहाने मैं आप से नईनई चीजें भी सीख लूंगी.’’ डाइनिंग टेबल पर मां को पलक से बात करते और खिलखिलाते देख दीप हैरान था. पलक ने आंखों ही आंखों में जैसे उसे बताया कि उसे यहां भी मां मिल गई हैं. Family Story 

Bihar Elections : बिहार की सियासत में किसका पलड़ा भारी

Bihar Elections : बिहार में चुनाव सिर पर हैं मगर एनडीए पूरी तरह से अस्तव्यस्त नजर आ रही है. कहने को सीएम का चेहरा फिलहाल नीतीश जरूर हैं पर चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर लड़ने की तैयारी चल रही है. कमजोर नेतृत्व और अलग अलग समाज के प्रतिनिधित्व की कमी एनडीए की उम्मीद को लेकर कई सवाल खड़े करती हैं.

बिहार की राजनीति इन दिनों उफान मार रही है. आने वाले समय में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और बिहार का भविष्य तय होना है. यहां की राजनीति के साथ गंगा भी उफान पर है. बिहार इन दिनों बाढ़ से ग्रस्त है और आम जनता ही त्राहित्राहि कर रही है. बिहार में कितना विकास हुआ है इसकी पोल इस बाढ़ ने खोल कर रख दिए. मुख्यमंत्री नीतीश बाबू अपनी छवि सुधारने के लिए आनन फानन में सिर्फ चार स्टेशनों के लिए पटना मेट्रो का उद्घाटन करने जा रहे हैं.

बिहार की राजनीति देश की अन्य राज्यों से बिल्कुल अलग है, अन्य राज्यों में वोट शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और विकास के नाम पर पड़ते हैं वहीं बिहार एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां आज भी वोट जाति के नाम पर पड़ते हैं. बिहार की राजनीति में जाति एक ऐसा सत्य है जो चाहे अनचाहे हर चुनावी राजनीति में हावी रहती है. दलित वर्ग इस राज्य की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है लेकिन आज भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से यह सबसे अधिक वंचित वर्ग में गिने जाते हैं. वर्षों से यह वर्ग सत्ता परिवर्तन का निर्णायक वर्ग रहा है लेकिन अब तक सत्ता में इस वर्ग को वास्तविक भागीदारी नहीं मिली.

केंद्र और राज्य दोनों में वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन की सरकार है, लेकिन इसके बावजूद बीजेपी बिहार में कोई भी दलित चेहरा सामने नहीं ला पाई है. बिहार में भाजपा प्रमुख शक्ति बना है लेकिन वह वंचित वर्गों के साथ न्याय नहीं करना चाहती है. भाजपा बिहार में आज तक मजबूत जन स्वीकार चेहरा दलित समुदाय से नहीं ला पाई है. यही नहीं दलितों की शिक्षा रोजगार और सामाजिक स्थिति के मामले में भी भाजपा रिकौर्ड सवालों के घेरे में है.

राष्ट्रीय स्तर पर रामदास आठवले, थावरचंद गहलोत और अर्जुन राम मेघवाल जैसे दलित नेताओं को भाजपा सामने लाया तो है लेकिन बिहार में स्थिति काफी अलग है. यहां न तो ऐसा कोई चेहरा भाजपा लापाई है न ही पार्टी ने किसी को तैयार करने की कभी कोई गंभीर कोशिश की है. रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी का बिखराव भाजपा के लिए और मुश्किल पैदा करता है. चिराग पासवान की स्थिति खुद ही डगमग है और वह भाजपा के लिए एक अस्थाई दलित चेहरा नहीं बन पाए हैं. दलित समुदाय के लिए कोई व्यापक नीति या कार्यक्रम भी भाजपा की बिहार इकाई के पास नहीं है. जो दर्शाता है कि यह वर्ग उनके एजेंडे के प्राथमिकता से बाहर है.

भाजपा का राजनीतिक रवैया दलितों के लिए प्राय प्रतीकात्मक रहा है. उनके घर पर खाना खाना, मंदिर में दलित पुजारी की नियुक्ति की बातें करना, या समय-समय पर कुछ आरक्षित सीटें देना. लेकिन आज का दलित समाज केवल सांकेतिक प्रतिनिधित्व से संतुष्ट नहीं है, वह भागीदारी की बात कर रहा है, नीति निर्माण में हिस्सेदारी चाहता है. दलित युवा सरकारी नौकरियां उच्च शिक्षा और सामाजिक सम्मान की मांग कर रहे हैं. उनकी आकांक्षाएं बढ़ी हैं लेकिन भाजपा के पास उनके लिए संतोषजनक उत्तर नहीं है.

इसके ठीक उलट भाजपा के कार्यकाल में दलितों को प्रताड़ना ही झेलनी पड़ी है, चाहे वह मध्य प्रदेश में भाजपा नेता के द्वारा दलित व्यक्ति पर पेशाब करने का मामला हो, या उत्तर प्रदेश में दलित युवक की बारात की पिटाई हो. दलितों के लिए भाजपा कभी भी मसीहा का रोल नहीं निभा पाई है. दलितों की जिंदगी में भाजपा ने खुद को विलेन बनाकर पेश किया है. दलित बेटियों की आबरू लूटी जा रही हो या सरेआम दलितों की पिटाई हो, भाजपा और भाजपा के नेता इसको लेकर कोई भी बयान टीवी के डिबेट में या सोशल मीडिया पर नहीं देते हैं. शायद जिस सनातन धर्म की बात बीजेपी करती है दलित खुद को उस सनातन का हिस्सा नहीं मानते हैं. यही कारण है कि भाजपा दलितों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम या कोई ठोस कानून नहीं बन पाई है.

अगर संविधान डाक्टर हेडगेवार ने लिखा होता तो पता नहीं आज दलित समाज अस्तित्व में होता या नहीं होता. वैसे डाक्टर हेडगेवार और संघ की नीतियों को बीजेपी आगे बढ़ा रही है और संविधान को बदलने का काम कर रही है. भाजपा और संघियों का एक ही सपना है कि सत्ता में जमे रहकर किसी तरह संविधान को बदला जाए ताकि दलित और मुस्लिम समाज, जो इस देश में अभी अघोषित दोयम दर्जे के नागरिक हैं, उन्हें आधिकारिक रूप से दोयम दर्जे की नागरिकता दी जाए और उन्हें जबरन केसों में फंसा कर जेल में बंद किया जाए.

बिहार की शिक्षा व्यवस्था में दलित

दलितों की स्थिति बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में बेहद चिंताजनक है. सरकार ने शिक्षकों की नियुक्तियां तो की है लेकिन दलित समुदाय के लोग इसमें उंगली पर की जाने वाली गिनती भर है. इसके ठीक विपरीत जिन शिक्षकों की नियुक्ति भारी संख्या में हुई है जमीनी स्तर पर देखा जाए तो इन शिक्षकों का कौशल निराशाजनक है. बहुत से शिक्षक खुद विषयों की बुनियादी समझ से वंचित हैं. सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति कम है स्कूल भवन जर्जर हैं और पढ़ाई केवल उपस्थिति रजिस्टर तक की सीमित रह गई है. इससे सबसे अधिक नुकसान दलित और गरीब वर्ग के बच्चों को हो रहा है जिनके पास प्राइवेट स्कूल या ट्यूशन जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं है.

दलित की पढ़ाई ताक पर

बिहार बोर्ड की परीक्षा में खराब प्रदर्शन इस बात की पुष्टि करता है कि शिक्षा की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है. दलित छात्रों को सरकारी योजनाओं के तहत नामांकन और किताबें तो मिल जाती हैं लेकिन उन्हें वह गुणवत्ता नहीं मिलती जो उन्हें प्रतिस्पर्धा की दौड़ में टिकने लायक बना सके. इसलिए वह पीछे रह जाते हैं. उच्च शिक्षा की ओर उनका रुझान लगातार घट रहा है क्योंकि बुनियादी शिक्षा ही सशक्त नहीं है. शिक्षा के बिना न तो समाज में जागरुकता आएगी और न ही आर्थिक क्रांति संभव है.

बिहार के शिक्षक खुद को बाबू साहब और लाट साहब समझने लगे हैं. ये पढ़ाने में रुचि कम रखते हैं और स्कूल के भवन के टेंडर में रुचि ज्यादा रखते हैं. बिहार में शिक्षकों को वेतन तो मिलता है लेकिन इसके साथसाथ वे विद्यालय की कायाकल्प के लिए जब पैसे आते हैं उसमें भी बंटवारा करते हैं और अपनाअपना हिस्सा अपनी अपनी जेब में डालकर चल देते हैं.

“आदर्श विद्यालय सिर्फ फाइलों में ही सिमट कर रह गई है. आदर्श विद्यालय एक दो गिनेचुने इसलिए बना दिए गए ताकि मीडिया को यह दिखाया जा सके कि बिहार में सब कुछ ठीक बा, बिहार में शिक्षा बा, बढ़िया अस्पताल बा, और अपराध करे के लेल कौनो अपराधी जिंदा नइखे.”

बिहार में दलित युवाओं की रोजगार की स्थिति बेहद भयावह है. गिनेचुने ही दलितों की सरकारी नौकरी हुई है. आरक्षण के सहारे दलित समाज में पिछली पीढ़ियों में थोड़ा बहुत ऊपर उठाना शुरू हुआ था, वह अब धीमा पड़ गया है क्योंकि नौकरियां ही नहीं हैं जो भी भर्तियां हो रही हैं वह संविदा, आउटसोर्सिंग और प्राइवेट एजेंसियों के जरिए हो रही है. दलित युवा बेरोजगारी के चक्रव्यूह में फंस गए हैं जहां न स्किल्स है, न अवसर हैं और न ही नीति निर्माता की कोई स्पष्ट योजना.

सम्राट चौधरी और भाजपा

भाजपा में सम्राट चौधरी का उदय, यह घटना भी अपनी जगह पर दलित राजनीति से इतर एक नई चाल को दर्शाती है. सम्राट चौधरी कुशवाहा यानी कोइरी जाति से आते हैं. और कई बार पार्टी बदल चुके हैं. वह पहले राजद, फिर जेडीयू में थे और अब भाजपा में हैं. भाजपा ने इन्हें राज्य इकाई का अध्यक्ष भी बनाया था, लेकिन यह नियुक्ति दलितों को कोई संदेश नहीं दे सकी. क्योंकि वह खुद दलित समुदाय से नहीं हैं और उन्हें एक करामाती हिंदू नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो तेजस्वी यादव के खिलाफ राजनीतिक हथियार बन सके. लेकिन यह सवाल यथावत है कि क्या वह सुशील मोदी का विकल्प हैं?

सुशील मोदी बिहार भाजपा के सबसे अनुभवी और संतुलित नेता के रूप में जाने जाते थे. गठबंधन की राजनीति के जानकार थे और प्रशासनिक अनुभव में माहिर थे. बिहार के वित्त मंत्री का कार्य भार संभालने के दौरान उन्होंने राज्य के बजट और आर्थिक नीतियों को स्थाई कर दिया था. सम्राट चौधरी का अंदाज इससे बिल्कुल अलग है वह अक्सर उग्र बयानबाजी करते हैं जिसकी वजह से कई बार भाजपा को उनके बयानों से दूरी बनानी पड़ी है.

इसके अलावा पार्टी के पुराने नेताओं में उन्हें लेकर असंतोष भी है जो उन्हें एक बाहरी और अवसरवादी चेहरा मानते हैं. उन्हें न दलितों में स्वीकार्यता है और न ही ओबीसी समुदाय में व्यापक समर्थन प्राप्त है. जो सम्राट चौधरी विपक्ष में रहकर नीतीश कुमार को खूब उल्टा सीधा कहते थे अब वही सम्राट चौधरी नीतीश के पाले में जाकर बैठ गए और बिहार के उपमुख्यमंत्री बन गए.

सम्राट चौधरी ने पगड़ी पहनकर यह कसम खाई थी कि जब तक नीतीश कुमार की सरकार को गिरा न देंगे वह अपनी पगड़ी नहीं खोलेंगे. और अब नीतीश कुमार की सरकार में खुद उपमुख्यमंत्री बन कर बैठे हैं, यानी उनकी कसम और उनकी करनी का कोई मेल नजर नहीं आ रहा है. इसके बाद उन्होंने एक ढोंग रचा और गंगा में स्नान कर अपनी पगड़ी उतारी.

दलित समुदाय सम्राट चौधरी को अपना नेता नहीं मानता है और न ही कभी सम्राट को दलित के मुद्दों पर खुलकर बोलते देखा गया है. इसके साथ ही उनके पास इस वर्ग से आने वाले लोगों के लिए कोई ठोस योजना या दृष्टिकोण नहीं है. भाजपा ने सम्राट चौधरी को आगे लाकर यह जताने की कोशिश की कि वह पिछड़े वर्ग के साथ खड़े हैं, लेकिन इससे दलित समाज व पिछड़े समाज को कोई भरोसा नहीं मिला है. उल्टे भाजपा की यह रणनीति उसे दलित के और भी दूर ले जा सकती है. पहले ही उसे सवर्ण पार्टी के रूप में देखा जाता रहा है.

भाजपा और जदयू का समीकरण

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 बहुत नजदीक है और बिहार की राजनीति में फिर से हलचल मचने लगी है. भाजपा 2025 की विधानसभा चुनाव नई रणनीति के साथ लड़ने की कोशिश में है लेकिन जमीनी स्तर पर देखें तो उनके सामने कई चुनौतियां हैं. स्वास्थ्य से उनके साथ तो कहीं भी दिखाई नहीं देते हैं. राजद, कांग्रेस और वाम दल मिलकर एक मजबूत महागठबंधन बना रहे हैं. ऐसे में भाजपा टूटी-फूटी जदयू के साथ चुनाव में उतरेगी. जदयू के पास न विजन है और न ही मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य में अब पहले जैसा वजन है.

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे पर आक्रामक हो रहे हैं. उनका सामाजिक आधार दलित मुस्लिम और पिछड़े वर्ग तक फैल रहा है. अगर वह आने वाले महीने में युवाओं और महिलाओं को लेकर कुछ ठोस घोषणाएं कर देते हैं तो उनकी स्थिति और मजबूत हो सकती है. भाजपा की ओर से कोई बड़ा दलित या पिछड़ा चेहरा नहीं दिखता जो तेजस्वी का मुकाबला कर सके. कारण है कि बीजेपी ‘मोदी चेहरे’ के सहारे बिहार की सियासत में रहना चाहती है, जो क्षेत्रीय राजनीति में हमेशा कारगर साबित नहीं होता.

जदयू, भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी बन कर आगे बढ़ रही है. हालांकि जदयू को भाजपा की ताकत होना थी लेकिन जदयू ही भाजपा की कमजोरी बन रही है. सिर्फ नीतीश कुमार की ब्रांडिंग से जदयू और भाजपा चुनाव में दम झोंकने का प्रयास करेगी. भाजपा की ओर से अगर बाहरी चेहरे या धार्मिक मुद्दे के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश की जाएगी तो उसका असर सीमित रहेगा.

इस पूरे परिदृश्य में दलितों की भूमिका निर्णायक हो सकती है लेकिन यह तभी होगा जब दलित समाज खुद अपनी राजनीतिक समझ को धार दे और केवल भावनाओं में बहकर वोट न करें. अब दलितों को यह सवाल नेताओं से करना होगा कि कौन नेता उनके बच्चों को पढ़ा पाएगा, कौन उनकी बेटियों को कालेज तक पहुंचा पाएगा और कौन रोजगार के लिए ठोस योजना बना पाएगा.

कहा जा सकता है कि बिहार की राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है. भाजपा और जदयू को अगर 2025 में सत्ता में वापस आना है तो सिर्फ धार्मिक ध्रुवीकरण सवर्ण एजेंडा और मोदी ब्रांडिंग से बात नहीं बनेगी. उसे दलितों के लिए शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर ठोस कार्य करना होगा.

सम्राट चौधरी जैसे प्रयोग तब तक अधूरे हैं जब तक वह जमीन पर भरोसा नहीं पैदा करते. जमीनी स्तर पर सम्राट चौधरी को कोई नहीं पहचानता है. सम्राट चौधरी को नेता सिर्फ मीडिया के भोपू ने बनाया है जनता ने नहीं. भाजपा के पास आज न तो कोई विश्वासपात्र दलित चेहरा है और न ही उनके लिए कोई ठोस दृष्टिकोण. यह स्थिति अगर यूं ही बनी रही तो 2025 के चुनाव में भाजपा को अयोध्या जैसे परिणाम नजर आ सकते हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें