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विवाद हिंदू व हिंदुत्ववादी का

एक पौराणिक पात्र है अष्टावक्र  जिस के बारे में लोग आमतौर पर इतना ही जानते हैं कि वह अपने अहंकारी वेदपाठी पिता कहो के श्राप के चलते 8 भुजाओं वाला हो कर कुरूप दिखने लगा था जिस का हर कोई उस का मजाक बनाता था लेकिन अष्टावक्र ‘हाथी अपने रास्ते चलता है तो कुत्ते भूंका करते हैं’ वाली कहावत पर अमल करता था. ब्राह्मण होते हुए भी उस का आचरण नास्तिकों जैसा था और ज्ञानियों व श्रेष्ठियों की बातों का तार्किक खंडन करता रहता था. जो लोग अष्टावक्र के बारे में और थोड़ाबहुत जानते हैं वह यह है कि उस ने अपने सहज तर्कों से राजा जनक की सभा में बंदी उर्फ वन्दिनी नाम के तत्कालीन प्रकांड पंडित की बोलती बंद कर दी थी.

दरअसल, अष्टावक्र पहला आदमी था जिस ने सत्य को जैसा महसूस किया वैसा ही कहा. ऋषिमुनियों द्वारा परोसे सच को उस ने कभी स्वीकारा नहीं. उस का कहना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है, शास्त्रों में तो शब्दों के संग्रह सहित नियम और सिद्धांत हैं. सत्य और ज्ञान तो आदमी के अंदर होता है. वह मूलतया धर्म के विरुद्ध भी नहीं था बल्कि उस ने सत्य और धर्म के मर्म को अपने तरीके से जाना और उसे व्यक्त भी किया. अष्टावक्र ने कोई गुनाह नहीं किया था बल्कि अपने विचार व्यक्त किए थे जो कट्टरवादियों और परंपरावादियों को आज भी हजम नहीं होते.

अष्टावक्र के प्रसंग से दूसरी कई बातों के साथ एक बात यह भी साबित होती है कि त्रेता और द्वापर युग में हरेक विद्वान का ब्राह्मण होना एक अनिवार्यता थी लेकिन हरेक ब्राह्मण के विद्वान होने की कोई बाध्यता नहीं थी. इस तरह ब्राह्मण और ब्राह्मणत्व 2 अलगअलग शब्द व परिभाषाएं सिद्ध होती हैं ठीक वैसे ही जैसे इन दिनों एक जोरदार बहस हिंदू और हिंदुत्ववादी शब्दों को ले कर छिड़ी हुई है. यह बहस बहुत रोमांचक और दिलचस्प है क्योंकि अधिकतर हिंदू इस गफलत में पड़ गए हैं कि वे हिंदू हैं या फिर हिंदुत्ववादी हैं.

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यह बहस 12 दिसंबर को कांग्रेसी नेता राहुल गांधी ने जयपुर की एक रैली से छेड़ी जिस का कोई ठोस तो क्या हलकाफुलका जवाब भी भगवा गैंग नहीं दे पा रहा. तीसरे और चौथे दरजे के नेताओं व धर्मगुरुओं ने जरूर राहुल गांधी का मजाक बना कर उन के खानदान पर धर्म और चमड़ी की रंगत पर कीचड़ उछाल कर तसल्ली कर ली. हालांकि, संतुष्ट वे भी नहीं हैं क्योंकि किसी का और खासतौर से राहुल गांधी का मजाक बनाना उन के लिए आसान व मनपसंद काम है पर उन के उठाए सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. क्या मौजूदा दौर के ऋषिमुनियों और श्रेष्ठियों की हालत वाकई बंदी और जनक जैसी हो गई है, इसे सम?ाने से पहले राहुल गांधी की बात जान लेना जरूरी है. 18 दिसंबर को अमेठी में उन्होंने इसी बात को शब्दों के थोड़े से हेरफेर के साथ दोहराया भी था .

राहुल गांधी ने कहा-

देश की राजनीति में आज 2 शब्दों की टक्कर है, 2 अलग शब्दों की. इन के मतलब अलग हैं. एक शब्द हिंदू, दूसरा शब्द हिंदुत्ववादी. यह एक चीज नहीं है. ये 2 अलग शब्द हैं. इन का मतलब बिलकुल अलग है. मैं हिंदू हूं मगर हिंदुत्ववादी नहीं हूं.

महात्मा गांधी हिंदू और नाथूराम गोडसे हिंदुत्ववादी. फर्क मैं आप को बताता हूं, चाहे कुछ भी हो जाए हिंदू सत्य को ढूंढ़ता है चाहे मर जाए, कट जाए, पिस जाए. उस का रास्ता सत्याग्रह है. पूरी जिंदगी वह सच को ढूंढ़ने में निकाल देता है.

महात्मा गांधी ने पूरी जिंदगी सच ढूंढ़ने में बिता दी और अंत में एक हिंदुत्ववादी ने उन की छाती में

3 गोलियां मारीं. हिंदुत्ववादी अपनी पूरी जिंदगी सत्ता खोजने में लगा देता है. उसे सिर्फ सत्ता चाहिए और उस के लिए वह कुछ भी कर देगा. उस का रास्ता सत्याग्रह नहीं, सत्ताग्रह है.

यह हिंदुओं का देश है, हिंदुत्ववादियों का नहीं. आज अगर देश में महंगाई है, दर्द है तो यह काम हिंदुत्ववादियों ने किया है. 2014 से इन लोगों का राज है, हिंदुत्ववादियों का राज है, हिंदुओं का नहीं. हमें हिंदुत्ववादियों को बाहर निकालना है और एक बार फिर से हिंदुओं का राज लाना है.

नरेंद्र मोदी और उन के तीनचार उद्योगपति हिंदुत्ववादियों ने देश को

7 साल में बरबाद कर दिया, खत्म कर दिया. मोदीजी ने किसानों की जो आत्मा है, उन का जो दिल है, उसी छाती में चाकू मार दिया. आगे से

नहीं बल्कि पीछे से, क्यों, क्योंकि हिंदुत्ववादी हैं तो पीछे से मारेंगे और जब हिंदू किसान के साथ खड़ा हुआ तो हिंदुत्ववादी ने कहा, ‘मैं माफी मांगता हूं.’

नई बोतल पुरानी शराब

निश्चित रूप से राहुल गांधी ने कोई नई बात नहीं कही है क्योंकि हिंदू कौन, यह बहस बहुत पुरानी है जिस के जिक्र के कोई माने नहीं लेकिन आमतौर पर हर उस आदमी को हिंदू मान लिया जाता है जो किसी गैरधर्म का नहीं है. आजादी के पहले से ही विनाशक सरकार द्वारा गढ़े शब्द हिंदुत्व की राजनीति के कौपीराइट रामराज्य परिषद, हिंदू महासभा और जनसंघ सरीखे हिंदूवादी दलों के हुआ करते थे पर अब हर कोई खुद को हिंदू दिखाने व साबित करने के ट्रैक पर दौड़ रहा है. ममता बनर्जी का चंडीपाठ, अरविंद केजरीवाल की राम और हनुमान भक्ति के अलावा खुद राहुल गांधी का जनेऊ पहन कर कैलाश मानसरोवर व वैष्णो देवी की यात्रा करना भाजपा से उस का प्रिय मुद्दा और पहचान छीनने जैसी हरकतें हैं.

राहुल गांधी क्यों इस संदर्भप्रसंग में गांधी और गोडसे को खींच लाए, इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि गांधी दलितों और मुसलमानों के प्रति सौफ्ट कौर्नर रखते थे, इसीलिए आज भी उन के पुतले पर गोलियां दागी जाती हैं. कट्टरवादी जिन्हें राहुल गांधी हिंदुत्ववादी कह रहे हैं इस देश को सिर्फ हिंदुओं का देश मानते हैं लेकिन वे महात्मा गांधी को मुसलमान या ईसाई नहीं कह पाते क्योंकि गांधी घोषित तौर पर वैष्णव हिंदू थे. उलट इस के, राहुल गांधी को ईसाई मां और आधे मुसलमान पिता की वर्णसंकर संतान होने के प्रचार भर से भाजपा 2014 और 2019 का चुनाव जीत ले गई थी, कम से कम उस की यह गलतफहमी तो अभी तक कायम है. छिछोरे किस्म के इस तरह के प्रचार से जरूर ऐसा लगता है कि हिंदुत्ववादी सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

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लाख टके का यह सवाल अकसर मुंहबाए खड़ा रहा है कि हिंदू कोई धर्म है भी या नहीं. जवाब इस सवाल का भी बेहद साफ है कि हिंदू कोई धर्म नहीं है बल्कि एक तरह की पूज्य प्रणाली मानते लोगों की जीवनशैली है जिस में पूजापाठ, दानदक्षिणा, व्रत, उपवास, मंदिर, तीर्थ आदि का माना जाना है और यह बात आरएसएस व भाजपा दोनों स्वीकारते भी हैं. फिर ?ागड़ा किस बात का, इस पर भले ही राहुल गांधी खामोश रहें लेकिन यह बात साफतौर पर सम?ा आती है कि वे ब्राह्मण और वर्णव्यवस्था वाले हिंदुओं को इशारों में हिंदुत्ववादी करार दे रहे हैं जोकि गलत भी नहीं है.

भाजपा खुलेतौर पर उस हिंदुत्व की राजनीति करती रही है जिस में धर्म राष्ट्र से ऊपर होता है और जिस में धर्म की स्थापना के लिए हिंसा की वकालत की जाती है अब तक भाजपा का काम हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान, वंदे मातरम और भारत माता की जय के अलावा नदियों, मठमंदिरों और मूर्तियों के पाखंड से चल जाता था पर जब राहुल गांधी ने खुद को ब्राह्मण  हिंदू साबित कर दिया और ममता बनर्जी भी खुद को ब्राह्मण  हिंदू कहते यह भी कहती हैं कि उन्हें किसी भाजपा से कास्ट सर्टिफिकेट नहीं चाहिए तो भगवा गैंग में चिंता पसरना स्वाभाविक बात है कि हर कोई अपना धर्मपरायण होने का प्रमाणपत्र खुद बनाने लगेगा तो हमारा और हमारी अब तक की मेहनत का क्या होगा.

गफलत में यह भी

इतिहास क्या कहता है, इस से ज्यादा अहम इन दिनों देश की नई पीढ़ी का हिंदू और हिंदुत्व की राजनीति से ऊबना है.  भोपाल के एक रेफ्रिजरेशन कारोबारी युवा निरंजन सिंह कहते हैं कि यह बहस एकदम निरर्थक नहीं है, लेकिन इस की सार्थकता तभी साबित होगी जब महंगाई और बेरोजगारी काबू में हों जो सीधेतौर पर प्रधानमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारी है. निरंजन को न सावरकर ब्रेन हिंदुत्व से मतलब है और न ही गांधी छाप हिंदुत्व से कोई सरोकार है. वे खुद को हिंदू मानते हैं पर धार्मिक पाखंडों, कर्मकांडों, अंधविश्वास और दानदक्षिणा जैसे रिवाजों से दूर रहते हैं. वे कहते हैं, ‘‘इसी आधार पर युवा वोटर राहुल गांधी पर भरोसा कर सकता है जिसे यह मतलब नहीं कि वे किसकिस धर्म के लोगों के मेल से उपजे हैं. यह काम तो हिंदुत्ववादी करते ही रहते हैं जिन के खुद के देवीदेवता और अवतार खीर और घड़ों से पैदा हुए हैं.

यह एक पीढ़ी का अंतर और विरोधाभास दोनों है क्योंकि निरंजन के रिटायर्ड औडिटर पिताजी एस सूर्यवंशी कहते हैं, ‘‘राहुल गांधी कोई गलत बात नहीं कह रहे हैं. हर हिंदू कट्टर नहीं होता, हां, इतना जरूर है कि भाजपा राज में कट्टरवाद फैला है और जानबू?ा कर फैलाया गया है जो देश के लिए नुकसानदेह है. हमारे कालेज के दिनों में भी हिंदुत्व पर खूब चर्चाएं और बहसें होती थीं और हम लोग सावरकर व गांधी दोनों के हिंदुत्व से सहमत नहीं होते थे लेकिन एक सीमा तक अंबेडकर के हिंदूवाद से आज भी सहमत हैं जिसे राहुल गांधी अलग तरीके से उठाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि अब फिर भाजपा सवर्ण हिंदुओं में सिमटती जा रही है. उस का एक बड़ा डर शूद्र कहे जाने वाले दलित और पिछड़े भी हैं जिन्हें उन के चौथे दरजे का हिंदू होने और हिंदुत्व का एहसास कराया जाने लगा है. लेकिन अफसोस इस बात का है कि इस बाबत उन्हें भी मुसलमानों का डर दिखाया जा रहा है.

हिंदू, हिंदुत्व और अब हिंदुत्ववादी. इस बहस का कोई आदिअंत नहीं है. लेकिन यह तय है कि राहुल गांधी ने एक नई बहस छेड़ दी है जिस का तोड़ भगवा खेमा हालफिलहाल नहीं ढूंढ़ पा रहा है. उस के सब से बड़े मुखिया आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी चकराए हुए हैं क्योंकि कोई सफाई देना उन की शान के खिलाफ है और न देना भी तौहीन से कम नहीं.

भाषण में छिपा कन्फैशन

राहुल के पहेली बू?ाने के तुरंत बाद चित्रकूट में उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनजर आयोजित हिंदू एकता कुंभ में मोहन भागवत इस सवाल से कन्नी काटते दिखे और हिंदुओं की घरवापसी पर जोर देते रहे. उन्होंने स्वयंसेवकों को संकल्प दिलाया कि सब पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति की हिफाजत करेंगे और किसी भी हिंदू भाई को हिंदू धर्म से विमुख नहीं होने देंगे. जो धर्म छोड़ कर चले गए हैं उन की घरवापसी के लिए काम करेंगे और हिंदू बहनों की अस्मिता, सम्मान व शील की रक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण कर देंगे.

जाति, वर्ग, भाषा, पंथ के भेद से ऊपर उठ कर हिंदू समाज को समरस, सशक्त, अभेध बनाने के लिए कार्य करेंगे. यह भी और बात है कि इस आयोजन में ब्राह्मणों ने सम्मान का न मिलने का रोना रोया और मठमंदिरों पर से सरकारी नियंत्रण हटाने की मांग भी की. जबकि जमावड़े में 95 फीसदी ब्राह्मण ही थे.

बारीकी से देखा जाए तो मोहन भागवत के इस भाषण से राहुल गांधी की इस बात की पुष्टि होती है कि देश में 2 तरह के हिंदू हैं. पहले वे जो खुद को सामान्य हिंदू मानतेसम?ाते हैं और दूसरे वे जिन की सदियों से एक ही कोशिश है कि हिंदू हिंदू ही रहें. ये ही हिंदुत्ववादी हैं जो सामान्य हिंदू को धर्मांतरण करने से भी रोक नहीं पाते और उस की घरवापसी भी इन के लिए मुद्दा, मुहिम और अनुष्ठान होती है. लेकिन जाने क्यों अपनी धार्मिक कमजोरियों व खामियों को ये दूर नहीं करते.

आज ही नहीं बल्कि हमेशा से जाति, वर्ग और पंथ व भाषा के भेद यानी भेदभाव से ऊपर उठने के प्रवचन घुट्टी की तरह पिलाए जाते रहे हैं लेकिन ये हैं ही क्यों, इस पर कोई कुछ नहीं बोल पाता क्योंकि बोलना हिंदुत्ववादियों के एजेंडे में नहीं. इसीलिए पीने वाले इन प्रवचनों को शराब की तरह पीते हैं और फिर नशे में ?ामते नजर आते हैं.

आज देश के नव हिंदुत्ववादी कहते हैं कि मुसलमान एक बड़ा खतरा हैं लेकिन आम, सामान्य, उदार, सम?ादार इन चारों में से कुछ भी कह लें, हिंदू इस से सहमत नहीं होता कि हिंदू होने का एक मतलब मुसलमानों से नफरत करना भी है या होना चाहिए. शायद इसीलिए राहुल गांधी भी देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात कहने लगे हैं जो कल तक उन के लिए जोखिमभरी बात होती थी.

महिलाओं का रोल अहम

मुमकिन है राहुल गांधी और कांग्रेस अपना अलग नया हिंदुत्व गढ़ रहे हों जिस में पहले की तरह मुसलमान, दलित, पिछड़े, आदिवासी और औरतें भी होंगी पर उस में हिंदुत्ववादियों को कोई जगह नहीं दिख रही. अब देखना दिलचस्प होगा कि देश में कितने हिंदू हैं और कितने हिंदुत्ववादी हैं. सियासी तौर पर तो यह फैसला 2024 के आम चुनाव के नतीजे बताएंगे, इस में भी महिलाओं की भूमिका अहम रहेगी जिन के शील, सम्मान और अस्मिता की गुहार चित्रकूट से लगाई गई है.

महिलाओं के शील, सम्मान और अस्मिता की बात भी बहुत हास्यास्पद लगती है क्योंकि उन का सब से ज्यादा शोषण तो खुद हिंदू धर्म के मूलभूत सिद्धांत करते हैं जिन के तहत औरत दासी, जायदाद, गुलाम, पांव की जूती और शूद्र तुल्य होती है जिसे संपत्ति रखने का भी अधिकार नहीं और जो शादी के पहले पिता व शादी के बाद पति के नाम से पहचानी जाती है और अगर पति न रहे तो उसे पुत्र के संरक्षण में रहने के स्पष्ट निर्देश हिंदुओं के संविधान मनुस्मृति में दिए गए हैं.

चंद महानगरीय महिलाओं को छोड़ दें तो कोई 90 फीसदी औरतें अभी भी दोयम दरजे की जिंदगी जी रही हैं. धार्मिक रूप से उन की भूमिका और उपयोगिता धार्मिक समारोहों की कलश यात्राओं में नुमाइश के अलावा अपने घर के पुरुषों की सलामती के लिए व्रतउपवास करने में समेट कर रख दी गई है. इस पर भी पुरुष उन्हें तरहतरह से प्रताडि़त करते रहते हैं. यह सोचना बेमानी है कि शिक्षा और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने से उन्हें कोई खास फायदा हुआ है बल्कि उन के प्रति अपराध और बढ़ रहे हैं.

हिंदुत्ववादियों को सम?ाना चाहिए कि हिंदू सशक्त तभी होगा जब युवा के हाथों में रोजगार होगा और महिलाओं को वाकई और वास्तविक सम्मान मिलने लगेगा. लेकिन ऐसा होने दिया जाएगा, इस में शक है क्योंकि फिर तो धर्म की दुकान ही बंद हो जाएगी और निकम्मों को मेहनत की खाने को मजबूर होना पड़ेगा. जरूरत तो इस बात की है कि हर कोई थोपे गए सिद्धांतों और विचारों को नकारते हुए अष्टावक्र बने, असत्य को नकारे और बेखौफ हो कर तर्क करे.

इतना अवैज्ञानिक है हिंदुत्व

राहुल गांधी एक बहस छेड़ने में तो कामयाब रहे लेकिन हिंदुत्व के उन पहलुओं पर चर्चा करने से वे भी यथासंभव कतराते हैं जो हिंदुत्ववाद से कहीं ज्यादा खतरनाक और नुकसानदेह है. हिंदू समाज को पिछड़ा रखने और गुमराह करने में धर्मग्रंथों का योगदान इस बहस में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. रामायण, श्रीमद्भागवतगीता, 4 वेद, 18 पुराण, 24 उपपुराण, 108 उपनिषद और 4 संहिताओं सहित 18 स्मृतियों में ऐसे प्रसंगों की भी भरमार है जिन्हें आधुनिक और सभ्य समाज में सिरे से नकारा जाना चाहिए, मसलन स्वर्गनरक, पापपुण्य, मोक्षपुनर्जन्म वगैरह. लेकिन हो उलटा रहा है. नव हिंदुत्ववादी जिन की तादाद महज 4-5 करोड़ है इन्हीं बेहूदगियों पर गर्व करने की गलती कर रहे हैं जिस का खमियाजा भी उन्हीं को भुगतना पड़ेगा.

धर्मग्रंथों में क्या लिखा है, इसे हिंदुत्ववादियों की ताजा अवैज्ञानिक हरकतों से भी सहज सम?ा जा सकता है. 13 मार्च, 2020 को हिंदू महासभा के राट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि महाराज ने एक पार्टी आयोजित की थी जिस का नाम था गौमूत्र पार्टी, जिस में 200 हिंदुत्ववादियों ने समारोहपूर्वक कुल्हड़ों में गौमूत्र पिया था. दावा यह किया था कि गौमूत्र से कोरोना वायरस भाग जाएगा. इस मूर्खता और चालाकी की तुलना किसी अन्य घटना से नहीं की जा सकती. यह वह वक्त था जब देश में कोरोना का प्रकोप तांडव मचा रहा था. किसी को कुछ नहीं सू?ा रहा था. लेकिन हिंदुत्ववादियों ने इस मजबूरी पर भी दुकान चलाई. वह तो भला हो वैज्ञानिकों का जिन्होंने वक्त पर वैक्सीन ईजाद कर करोड़ों की जिंदगी बचा ली नहीं तो वरना भाई लोग तो गौमूत्र पिला कर ही मार डालने को आमादा हो आए थे जिस का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं.

इस के बाद भी कहा जाता है कि हिंदू धर्म एक उन्नत विज्ञान है. इस उन्नत विज्ञान का बखान भगवा गैंग के मैंबर हर कभी किया करते हैं. साल 2014 में हैरानी उस वक्त भी हुई थी जब नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि एक हिंदू देवता गणेश का सिर कुछ प्लास्टिक सर्जनों द्वारा प्रत्यारोपित किया गया था. अब भला न किसी ने पूछा न उन्होंने बताया कि ये प्लास्टिक सर्जन किस यूनिवर्सिटी से डिग्री ले कर आए थे और उन के नाम क्या थे. पशु और मानव के सम्मिश्रण की कल्पना तो लगभग हर समाज में रही है और मिस्र में प्रसिद्ध पिरामिडों के पास स्ंिफक्स की औरत और शेर की सम्मिलित मूर्ति आज भी मौजूद है. इसी बुद्धिमान गैंग के एक और मैंबर रमेश पोखरियाल ने दावा किया था कि एक ऋषि कणाद ने लाखों साल पहले परमाणु परीक्षण कर डाला था. इन महानुभाव के मुताबिक, अणु और परमाणुओं की खोज चरक नाम का ऋषि लाखों साल पहले कर चुका था.

जानलेवा बीमारी कैंसर के इलाज की खोज में दिनरात जुटे वैज्ञानिकों को तुरंत अपने शोध रद्दी में डालते भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह के इस बयान पर गौर फरमाना चाहिए कि उन का स्तन कैंसर पंचगव्य से ठीक हो गया. दुनियाभर के डाक्टरों को मालेगांव विस्फोट की आरोपी इस नेत्री के सफेद ?ाठ पर हैरत हुई थी. लेकिन यह तरस में उस वक्त बदल गई थी जब प्रज्ञा ने मध्य प्रदेश में भाजपा नेताओं की मौत का जिम्मेदार कांग्रेस की तांत्रिक क्रियाओं को ठहराया था. तभी आम हिंदुओं को भी सम?ा आ गया था कि इस नेत्री को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है लेकिन इसे राजनीति में बनाए रखना जरूरी है क्योंकि इतना साफसुथरा ?ाठ बोलने वाले कम बचे हैं.

इन हिंदुत्ववादियों के ऐसे दावों का संकलन किया जाए तो एक 19वां पुराण तैयार हो जाएगा. इस कड़ी में एक दिलचस्प और हास्यास्पद बयान भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा का भी उल्लेखनीय है जिन के मुताबिक गाय का गोबर कोहिनूर से भी ज्यादा कीमती है. इन धूर्तों की धूर्तता का एक बेहतर उदाहरण एक केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल का 20 जुलाई, 2020 को यह कहना था कि भाभीजी छाप पापड़ खाने से कोरोना नहीं होता. अब यह और बात है कि यह बयान देने के कुछ दिनों बाद उन्हें ही कोरोना हो गया था.

राहुल गांधी के हिंदू और हिंदुत्ववादी बयान पर उन्हें बावला कहने वाले खरबपति योगगुरु रामदेव शायद ही यह बता पाएं कि असल बावला और बावले कौन से किस्म के लोग हैं. रामदेव इसलिए खामोश रहेंगे कि उन्होंने भी कोरोना के नाम पर कोरोनिल नाम की दवा बेच कर करोड़ों रुपए ?ाटके हैं और चूंकि यह धंधा उन्हें आगे भी करते रहना है, इसलिए हिंदुत्ववादियों की चापलूसी और खुशामद करते रहना उन की व्यावसायिक मजबूरी है. जो आदमी योग नाम की कसरत से ही खरबपति बन सकता है उस से बड़ा बावला दुनिया में कौन होगा. उस की नजर में तो पूरी दुनिया ही वेवकूफ होगी.

अफसोस इस बात का नहीं है कि हिंदुत्ववादी आएदिन ऐसे बेतुके बयान देते रहते हैं बल्कि अफसोस इस बात का ज्यादा है कि पढ़ेलिखे बुद्धिजीवी हिंदू भी अक्ल को ताक पर रखते और  वास्तविकता जानतेसम?ाते हुए भी इन की हां में हां मिलाते रहते हैं. वे ऐसा सिर्फ इसलिए करते हैं कि दलितों, मुसलमानों,  आदिवासियों और औरतों को दबाए रखने की हिंदुत्ववादियों की मुहिम कामयाब हो और वे भी इन समुदायों के आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण में शामिल होते धरती पर ही स्वर्ग सा सुख भोगें. बात सही भी है क्योंकि मरने के बाद क्या होता है, यह किस ने देखा है.

तृष्णा- भाग 1: क्या थी दीपक और दीप्ति की सच्चाई

पार्टीपूरे जोरशोर से चल रही थी. दीप्ति और दीपक की शादी की आज 16वीं सालगिरह थी. दोनों के चेहरे खुशी से दमक रहे थे. दोनों ही नोएडा में रहते हैं. वहां दीप्ति एक कंपनी में सीनियर मैनेजर की पोस्ट पर नियुक्त है तो दीपक बहुराष्ट्रीय कंपनी में वाइस चेयरमैन.

दीप्ति की आसमानी रंग की झिलमिल साड़ी सब पर कहर बरपा रही थी. दोनों ने अपने करीबी दोस्तों को बुला रखा था. जहां दीपक के दोस्त दीप्ति की खूबसूरती को देख कर ठंडी आहें भर रहे थे, वहीं दीपक का दीप्ति के प्रति दीवानापन देख कर उस की सहेलिया भले हंस रही हों पर मन ही मन जलभुन रही थीं.

केक काटने के बाद कुछ कपल गेम्स का आयोजन किया गया. उन में भी दीप्ति और दीपक ही छाए रहे. पार्टी खत्म हो गई. सब दोस्तों को बिदा करने के बाद दीप्ति और दीपक भी अपनेअपने कमरे रूपी उन ग्रहों में छिप गए

जहां पर बस वे ही थे. वे आज के उन युगलों के लिए उदाहरण हैं जो साथ हो कर भी साथ नहीं हैं. दोनों ही, जिंदगी की दौड़ में इतना तेज भाग रहे हैं कि उन के हाथ कब छूट गए, पता ही नहीं चला.

आज रात को बैंगलुरु से दीपक की दीदी आ रही थीं. दीप्ति ने पूरे दिन की छुट्टी ले ली. नौकरों की मदद से घर की सज्जा में थोड़ा परिवर्तन कर दिया. दीपक भी सीधे दफ्तर से दीदी को लेने एअरपोर्ट चला गया. शाम 7 बजे दरवाजे की घंटी बजी, तो दीप्ति ने दौड़ कर दरवाजा खोला. अपनी ससुराल में वह सब से करीब शिखा दीदी के ही थी. शिखा एक बिंदास 46 वर्षीय स्मार्ट महिला थी, जो दूध को दूध और पानी को पानी ही बोलती है. शिखा के साथ ही वह दीपक, अपने सासससुर की भी बिना हिचक के बुराई कर सकती है. शिखा के साथ उस का ननद का नहीं, बल्कि बड़ी दीदी का रिश्ता था.

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शिखा मैरून सूट में बेहद दिलकश लग रही थी. दीप्ति भी सफेद गाउन में बहुत सुंदर लग रही थी. दीप्ति को बांहों में भरते हुए शिखा बोली, ‘‘दीप्ति तुम कब अधेड़ लगोगी, अभी भी बस 16 साल की लग रही हो.’’

‘‘जिस दिन तेरा मोटापा थोड़ा कम होगा मोटी,’’ पीछे से दीपक की हंसी सुनाई दी. रात के खाने में सबकुछ शिखा की पसंद का था. चिल्ली पनीर, फ्राइड राइस, मंचूरियन, रूमाली रोटी और गाजर का हलवा.

‘‘ऐसा लगता ही नहीं कि भाभी के घर आई हूं. ऐसा लगता है कि मम्मीपापा के घर में हूं,’’ शिखा भर्राई आवाज में बोली.

सुबह शिखा जब 9 बजे सो कर उठी तो दीप्ति नाश्ते की तैयारी में लगी हुई थी. ‘‘घर मेरी भतीजियों के बिना कितना सुनसान लग रहा है,’’ शिखा ने कहा तो दीप्ति और दीपक एकदूसरे की तरफ सूनी आंखों से देख रहे हैं,यह दीदी की अनुभवी आंखों से छिपा नहीं रहा.

जैसे एक आम शादी में होता है, ऐसी ही कुछ कहानी उन की शादी की भी थी. कुछ सालों तक वे भी एकदूसरे में प्यार के गोते लगाते रहे और समय बीततेबीतते उन का प्यार भी खत्म हो गया. फिर शुरू हुई एकदूसरे को अपने जैसा बनाने की खींचातानी. उस खींचातानी में रिश्ता कहां चला गया, किसी को नहीं पता चला. दोनों में फिर भी इतनी समझदारी थी कि अपने रिश्ते की कड़वाहट उन्होंने कभी अपने परिवार और बच्चों के आगे जाहिर नहीं करी. उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को बोर्डिंग में डाल दिया था ताकि वे उन के रिश्ते के बीच बढ़ती खाई को महसूस न कर पाएं.

‘‘दीदी, दीपक का कुछ ठीक नहीं है. वे अकसर रात का डिनर बाहर कर के आते हैं,’’ दीप्ति सपाट स्वर में बोली और फिर मोबाइल में व्यस्त हो गई.

शिखा पूरे 4 वर्ष बाद भाईभाभी के पास आई थी पर उसे ऐसा लग रहा था जैसे 4 दशक बाद आई हो.

शिखा मन ही मन मनन कर रही थी कि कहीं न कहीं ऐसा भी होता है जब

जीवन में बहुत कुछ और बहुत जल्दी मिल जाता है तो पता ही नहीं चलता कब एक बोरियत भी रिश्ते में आ गई है. यह संघर्ष ही तो है जो हमें जिंदगी को जिंदादिली से जीने की राह दिखाता है.

दीपक अपने ही औफिस में एक तलाकशुदा महिला निधि के साथ अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना पसंद करने लगा था, क्योंकि उस के साथ उसे ताजगी महसूस होती थी.

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‘‘सुनो, आज रात बाहर डिनर करेंगे,’’ दीपक के बालों में हाथ फेरते हुए निधि ने कहा.

‘‘यार दीदी आई हुई हैं… बताया तो था मैं ने,’’ दीपक ने कहा.

निधि ने थोड़े तेज स्वर में कहा, ‘‘भूल गए, मंगलवार और शुक्रवार की शाम मेरी है,’’ और फिर झुक कर दीपक को चूम लिया.

दीपक का रोमरोम रोमांचित हो उठा. यही तो वह रोमांच है जिसे वह अपने विवाह में मिस करता है. उस रात आतेआते 12 बज गए. शिखा सोई नहीं थी, वह बाहर ड्राइंगरूम में ही बैठ कर काम कर रही थी. दीपक शिखा को देख कर ठिठक गया.

Winter 2022: घर पर बनाएं कुरकुरी भिंडी

क्या आप जानते हैं, भिंडी की सब्जी कई तरह से बनाई जाती है तो आज हम आपको कुरकुरी भिंडी की रेसिपी बताएंगे, जिसे आप गर्मागर्म परांठे के साथ खा सकते हैं.

सामग्री:

– भिंडी (400 ग्राम)

–  बेसन (2 चम्मच)

– चावल का आटा (1 चम्मच)

– अजवाइन (1/3 चम्मच)

– हल्दी पाउडर (1/3चम्मच)

– लाल मिर्च (1/2 चम्मच)

– आमचूर पाउडर (1/2 चम्मच)

– जीरा पाउडर (1/3 चम्मच)

– तेल (फ्राई करने के लिए)

– नमक(स्वादानुसार)

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कुरकुरी भिंडी बनाने कि विधि:-

– सबसे पहले भिंडी को धोकर किसी कपड़े से पोछ दें उसके बाद भिंडी को दो हिस्सों में काट लें और उसका    बीज निकाल दें.

– फिर उसे पतला- पतला काट लें.

– ऐसे ही सारे भिंडी को हम काट लिए है.

– फिर हम उसमें अजवाइन, हल्दी पाउडर, आमचूर पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और जिरा पाउडर डालकर   मिक्स कर लें.

– उसके बाद उसमे चावल का आटा, बेसन और नमक को डालकर अच्छी तरह मिक्स कर लें.

– फिर गैस पे कढ़ाई रखे और उसमे तेल डालें और  तेल गरम हो जाने पे उसमे भिंडी को डाल दें और उसे   मिलायें.

– जब भिंडी फ्राई होकर लाल हो जाये तो उसे किसी टिस्सु पेपर पे निकाल लें, ताकि जो भी एक्स्ट्रा तेल है वो निकाल जाएं और ऐसे ही बाकि भिंडी को फ्राई कर लें.

– हमारी क्रिस्पी भिंडी फ्राई बनकर तैयार हो गयी है, इसे गरमा गरम खायें.

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GHKKPM: सई देगी विराट को तलाक तो श्रुति करेगी ये काम

टीवी सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) की कहानी में बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि विराट श्रुति की मदद करने के चक्कर में बुरा फंस गया है. अब तो सई के साथ-साथ चौहना परिवार ने भी उसका साथ छोड़ दिया है. विराट का परिवार भी उसे गलत समझ रहा है.  शो के आने वाले एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं शो के लेटेस्ट एपिसोड के बारे में.

शो में आप देखेंगे कि सई जल्द ही सई विराट को हमेशा के लिए छोड़कर चली जाएगी. ऐसे में विराट बिल्कुल अकेला रह जाएगा. निनाद और अश्विनी भी विराट पर गुस्सा करेंगे. और कहेंगे कि उनका बेटा उनके लिए मर चुका है.

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तो दूसरी तरफ विराट पर बड़ा आरोप लगेगा. दरअसल श्रुति सदानंद की पत्नी है, इस वजह से विराट को भील देशद्रोह कहा जाएगा. ये बात सामने आते ही विराट की नौकरी पर भी खतरा में होगी. इस दौरान विराट को पता चलेगा कि सदानंद जिंदा है.

 

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शो में आप ये भी देखेंगे कि श्रुति और विराट को साथ देखकर सई का दिल टूट जाएगा. सई विराट को छोड़ने का फैसला करेगी. इतना ही नही वह गुस्से में विराट के पास तलाक के पेपर्स भेज देगी. विराट को बड़ा झटका लगेगा. दूसरी तरफ श्रुति सई की जगह लेने की कोशिश करेगी. श्रुति कहेगी कि विराट को उससे शादी कर लेनी चाहिए. शो में अब ये देखना होगा कि विराट खुद को कैसे सही साबित करता है.

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Anupamaa: पाखी की सच्चाई आएगी सामने! क्यों जाना चाहती है अमेरिका

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupamaa) की कहानी में बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि काव्या कुछ दिन के लिए शाह हाउस से दूर चली गई है, लेकिन इससे वनराज को कोई फर्क नहीं पड़ता है. तो दूसरी तरफ बा और बापूजी आपसे में बात करते हैं कि काव्या को एक और मौका मिलना चाहिए, वनराज को उसे माफ कर देना चाहिए. शो के अपकमिंग एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए ट्रैक के बारे में.

शो में आपने देखा कि अनुज मालविका नये साल का जश्न शाह परिवार और अनुपमा के साथ मनाते हैं. मालविका सबको साथ देखकर काफी खुश हो जाती है. तो दूसरी तरफ अनुपमा अनुज से मालविका के इलाज के बारे में बात करती है.

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इसी बीच सीरियल ‘अनुपमा’ में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. मीटिंग के बाद  मालविका अनुपमा से वनराज के पसंदीदा खाने के बादे में पूछेगी. अनुपमा बताएगी कि वनराज को रसगुल्ले बहुत पसंद है. मालविका वनराज के लिए रसगुल्ले मंगाएगी. मालविका वनराज को अपने हाथ से रसगुल्ले भी खिलाएगी.

 

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इसी बीच अनुज-अनुपमा दोनों को साथ में देख लेंगे. वनराज-मालविका को साथ में देखकर अनुज का पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाएगा. काम को लेकर वनराज और अनुज के बीच कहा-सुनी भी होगी. तो दूसरी तरफ अनुपमा वनराज की क्लास लगाएगी. वनराज अनुपमा को बताएगा कि उसके मन में मालविका के लिए कुछ भी नहीं है.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि पाखी एक ऐसे शख्स के से प्यार करेगी जो उम्र में उससे बड़ा है. आपने देखा कि पाखी अनुपमा से कहती है कि वो अपनी आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना चाहती है  लेकिन सच्चाई यह है कि वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ वहां शिफ्ट होना चाहती है. शो में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि अनुपमा अपनी बेटी के बारे में जानकर क्या कदम उठाएगी?

शरणागत- भाग 1: डा. अमन की जिंदगी क्यों तबाह हो गई?

आईसीयू में लेटे अमन को जब होश आया तो उसे तेज दर्द का एहसास हुआ. कमजोरी की वजह से कांपती आवाज में बोला, ‘‘मैं कहां हूं?’’

पास खड़ी नर्स ने कहा, ‘‘डा. अमन, आप अस्पताल में हैं. अब आप ठीक हैं. आप का ऐक्सिडैंट हो गया था,’’ कह कर नर्स तुरंत सीनियर डाक्टर को बुलाने चली गई.

खबर पाते ही सीनियर डाक्टर आए और डा. अमन की जांच करने लगे. जांच के बाद बोले, ‘‘डा. अमन गनीमत है जो इतने बड़े ऐक्सिडैंट के बाद भी ठीक हैं. हां, एक टांग में फ्रैक्चर हो गया है. कुछ जख्म हैं. आप जल्दी ठीक हो जाएंगे. घबराने की कोई बात नहीं.’’

डाक्टर के चले जाने के बाद नर्स ने डा. अमन को बताया कि उन के परिवार वालों को सूचित कर दिया गया है. वे आते ही होंगे. फिर नर्स पास ही रखे स्टूल पर बैठ गई. अमन गहरी सोच में पड़ गया कि अपनी जान बच जाने की खुशी मनाए या अपने जीवन की बरबादी का शोक मनाए?

कमजोरी के कारण उस ने अपनी आंखें मूंद लीं. एक डाक्टर होने के नाते वह यह अच्छी तरह समझता था कि इस हालत में दिमाग और दिल के लिए कोई चिंता या सोच उस की सेहत पर गलत असर डाल सकती है पर वह क्या करे. वह भी तो एक इंसान है. उस के सीने में भी एक बेटे, एक भाई और पति का दिल धड़कता है. इन यादों और बातों से कहां और कैसे दूर जाए?

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आज उसे मालूम चला कि एक डाक्टर हो कर मरीज को हिदायत देना कितना आसान होता है पर एक सामान्य मरीज बन कर उस का पालन करना कितना कठिन.

डा. अमन के दिलोदिमाग पर अतीत के बादल गरजने लगे…

डा. अमन को याद आया अपना वह पुराना जर्जर मकान जहां वह अपने मातापिता और 2 बहनों के साथ रहता था. उस के पिता सरकारी क्लर्क थे. वे रोज सवेरे 9 बजे अपनी पुरानी साइकिल पर दफ्तर जाते और शाम को 6 बजे थकेहारे लौटते.

उस की मां बहुत ही सीधीसादी महिला थीं. उस ने उन्हें हमेशा घर के कामों में ही व्यस्त देखा, कभी आराम नहीं करती थीं. वे तीनों भाईबहन पढ़नेलिखने में होशियार थे. जैसे ही बहनों की पढ़ाई खत्म हुई उन की शादी कर दी गई. पिताजी का आधे से ज्यादा फंड बहनों की शादी में खर्च हो गया. उस के पिता की इच्छा

थी कि वे अपने बेटे को डाक्टर बनाएं. इस इच्छा के कारण उन्होंने अपने सारे सुख और आराम त्याग दिए.

वे न तो जर्जर मकान को ही ठीक करवा पाए और न ही स्कूटर या कार ले पाए. बरसात में जब जगहजगह से छत से पानी टपकने लगता तो मां जगहजगह बरतन रखने लगतीं. ये सब देख कर उस का मन बहुत दुखता था. वह सोचता कि क्या करना ऐसी पढ़ाई को जो मांबाप का सुखचैन ही छीन ले पर जब वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा था तब पिता के चेहरे पर एक अलग खुशी दिखाई देती. उसे देख उसे बड़ा दिलासा मिलता था.

तभी दरवाजा खुलने की आवाज उसे वर्तमान में लौटा लाई.

उस के मातापिता और बहनें आई थीं. पिता छड़ी टेकते हुए आ रहे थे. मां को बहनें पकड़े थीं. उस का मन घबराने लगा. सोचने लगा कि मैं कपूत उन के किसी काम न आया. मगर वे आज भी उस के बुरे समय में उस के साथ खड़े थे. जिसे सब से पहले यहां पहुंचना चाहिए था उस का कोसों दूर तक पता न था.

काश वह एक पक्षी होता, चुपके से उड़ जाता या कहीं छिप जाता. अपने मातापिता का सामना करने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. उस ने आंखें बंद कर लीं. मां का रोना, बहनों का दिलासा देना, पिता का कुदरत से गुहार लगाना सब उस के कानों में पिघले सीसे की तरह पड़ रहा था.

तभी नर्स ने आ कर सब को मरीज की खराब हालत का हवाला देते हुए बाहर जाने को कहा. मातापिता ने अमन के सिर पर हाथ फेरा तो उसे ऐसे लगा मानो ठंडी वादियों की हवा उसे सहला रही हो. धीरेधीरे सब बाहर चले गए.

अमन फिर अतीत के टूटे तार जोड़ने लगा…

जैसे ही अमन को डाक्टर की डिग्री मिली घर में खुशी की लहर दौड़ गई. मातापिता खुशी से फूले नहीं समा रहे थे. बहनें भी खुशी से बावली हुई जा रही थीं. 2 दिन बाद ही इन खुशियों को दोगुना करते हुए एक और खबर मिली. शहर के नामी अस्पताल ने उसे इंटरव्यू के लिए बुलाया था. 2 सप्ताह बाद अमन की उस में नौकरी लग गई. उस के पिता की बहुत इच्छा थी

कि वह अपना क्लीनिक भी खोले. उस ने पिता की इच्छा पर अपनी हामी की मुहर लगा दी. वह अस्पताल में बड़े जोश से काम करने लगा.

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अभी अमन की नौकरी लगे 1 साल भी नहीं हुआ था कि अचानक उस की जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया कि उस ने उस के जीवन की दिशा ही बदल दी.

दोपहर के लंच के बाद अमन डा. जावेद के साथ बातचीत कर रहा था. डा. जावेद सीनियर, अनुभवी और शालीन स्वभाव के थे. वे अमन की मेहनत और लगन से प्रभावित हो कर उसे छोटे भाई की तरह मानने लगे थे.डा. अमन को याद आया अपना वह पुराना जर्जर मकान जहां वह अपने मातापिता और 2 बहनों के साथ रहता था. उस के पिता सरकारी क्लर्क थे.

अन्यपूर्वा: क्यों राजा दशरथ देव ने विवाह न करने की शपथ ली?

Writer- विश्वनाथ यादव

विशाली मयूरपंखी बजरा पद्मा नदी की लहरों को काटता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था. बजरे के पीछे कुछ बड़ी नौकाएं थीं, जिन में शस्त्रधारी सैनिकों के अलावा दासदासियां भी सवार थे. 2 बड़ी नावों पर खाद्य सामग्री लदी हुई थी.

पिछले 12 सालों से वह हर साल दलबल के साथ घूमने निकल पड़ता. राज्य नर्तकियां नृत्य कर उसे लुभाने की, हंसाने की बहुत कोशिश करतीं, किंतु उस का चेहरा गमगीन ही बना रहता. ऐश्वर्य के हर साधन मौजूद होने पर भी वह उन का उपभोग नहीं कर पाता था. वह बंगाल के सोनार गांव का राजा था.

हर साल घूमने के लिए राजा सोनार गांव के किले से निकलता था. अपने राज्य के अधीन गांवों के घाटों पर अपना बजरा रुकवा कर प्रजा का हालचाल पूछता तथा कोई शिकायत होने पर उसे दूर करने की व्यवस्था कर देता.

यद्यपि राजा अपने को व्यस्त रखने की भरपूर कोशिश करता. फिर भी कुछ लम्हे ऐसे आ ही जाते थे जब वह बिलकुल अकेला होता. ऐसे समय पिछली यादें जब भी आतीं तो वह बेचैन हो उठता था.

20 साल हो गए, उस ने उस की सूरत नहीं देखी. अब तो वह उस का चेहरा भी ठीक से याद नहीं कर पाया था. 20 सालों में उस में न जाने कितने परिवर्तन हुए होंगे. उस में भी तो परिवर्तन हुए हैं.

उस राजा की मौसी के गांव का नाम मंदिरपुर था. जब उस का बजरा मंदिरपुर के गांव के सामने से गुजरता तो वह अपने मन को दृढ़ कर लेता. इन 12 वर्षों के राजकीय जीवन में वह हजारों गांवों में गया, किंतु मंदिरपुर नहीं जा सका.

सुबह की मलय समीर बह रही थी. मल्लाह मुस्तैदी से मयूरपंखी बजरे को चला रहे थे. राजा बजरे पर खड़ा था और उस की आंखें हर साल की तरह कुछ ढूंढ़ रही थीं. राजा ने मन में सोचा कि इस गांव के बाद ही तो मंदिरपुर गांव है. कुछ ही देर में दूर से ही गांव का राधाकृष्ण मंदिर का चूड़ा दिखाई देने लगेगा. इस मंदिर के बगल में ही एक जमींदार की हवेली है. उसी में वह रहती होगी और यह सोच वह व्याकुल हो उठा.

20 साल पहले की स्मृतियां उसे बेचैन करने लगीं. मंदिर का चूड़ा अब दिखाई पड़ने लगा था. अनायास ही उस की आंखों से आंसू बहने लगे. उस ने धीमे स्वर में मल्लाहों को मंदिरपुर घाट पर बजरे को रोकने का आदेश दिया. राजकीय पोशाक उतार कर राजा ने साधारण कपड़े पहने और अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को कुछ निर्देश दे वह घाट से मंदिरपुर गांव की ओर अकेला ही चल दिया. राधाकृष्ण मंदिर के पास स्थित जमींदार की हवेली पहुंच कर वह उत्साह से बोला, ‘‘सुरभि…’’

एक वृद्ध दासी बाहर निकल कर बोली, ‘‘मां तो मंदिर गई हैं.’’

‘‘ठीक है, मैं प्रतीक्षा करता हूं.’’

‘‘मां अभी आ जाएंगी, पूजा को गए काफी समय हो गया है,’’ फिर दासी मंदिर की ओर से किसी को आते देख कर बोली, ‘‘लीजिए, मां आ रही हैं.’’

राजा ने सिर घुमा कर देखा. सादे कपड़े में लिपटी एक औरत हाथ में पूजा का थाल लिए धीमे कदमों से चली आ रही थी. औरत नजदीक आते ही राजा को पहचान खुशी से बोली, ‘‘अरे, दशरथ दादा (भाई), तुम?’’

‘‘हां.’’

‘‘चलो, घर के अंदर चलो.’’

राजा किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह सुरभि के पीछेपीछे चल पड़ा. वह दशरथ को ले कर एक कमरे में पहुंची. दशरथ एक सजे पलंग पर बैठ गया. सुरभि ने उसे प्रेम से देख कर कहा, ‘‘20 सालों के बाद तुम्हें देख रही हूं.’’

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‘‘हां, मैं भी.’’

‘‘तुम्हारे लिए भोजन की व्यवस्था करूं, तुम भूखे होगे?’’

‘‘नहीं, तुम बैठो.’’

सुरभि सकुचा कर पलंग के एक तरफ बैठ गई. फिर कुछ याद आने पर पूछा, ‘‘तुम ने विवाह किया?’’

‘‘अभी तक नहीं.’’

‘‘क्या कहते हो, दशरथ दा? राजा महाराजा तो दर्जनों विवाह करते हैं… और तुम?’’

‘‘तुम ने भी तो विवाह नहीं किया?’’

‘‘मेरी बात अलग है. मैं विवाह नहीं कर सकती.’’

‘‘तुम एक जमींदार की बेटी हो.

धनसपंत्ति का तुम्हें अभाव

नहीं है, फिर भी विवाह…’’

दशरथ की बात बीच में काटते हुए सुरभि बोली, ‘‘मेरे पिता अपनी सारी जायदाद देवता को अर्पण कर गए. मैं तो भगवान की दासी हूं.’’

‘‘तुम विवाह करतीं तो क्या कोई तुम्हें रोक देता?’’

‘‘हिंदू विधवा का विवाह होता है?’’

‘‘जहां तक मु?ो खबर है कि तुम्हारा विवाह ही नहीं हुआ. फिर तुम अपने को विधवा कैसे कहती हो?’’

‘‘विवाह न होने पर भी मैं विधवा हूं. जिस व्यक्ति के साथ मेरे पिता ने मेरा विवाह तय किया था वह विवाह करने ही तो आ रहा था. पद्मा नदी पार करते समय नौका डूब जाने से उन की मौत हो गई. हिंदू संस्कार के अनुसार उन की मौत के साथ ही मैं विधवा हो गई.’’

‘‘उस व्यक्ति के साथ तुम ने 7 फेरे नहीं लगाए तो विधवा कैसे हो सकती हो?’’

‘‘ब्राह्मण मु?ा जैसी अभागिनों को विधवा न कह कुछ और कहते हैं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘अन्यपूर्वा.’’

दशरथ ने ‘अन्यपूर्वा’ सुन कर प्रश्न भरी नजरों से सुरभि को देखा.

सुरभि उस का आशय सम?ा कर बोली, ‘‘दादा, मेरे पिता को एक पंडित ने बताया था कि जिस लड़की का विवाह तय हो जाता है और विवाह के पहले उस के भावी पति की मृत्यु हो जाती है वह अन्यपूर्वा कहलाती है. उस का बाद में विवाह नहीं होता है. उसे अपने पिता या भाई के घर जीवनभर आश्रित बन कर रहना पड़ता है.’’

‘‘विधवाओं की तरह?’’

‘‘हां, विधवाओं की तरह.’’

‘‘तुम बताओ. तुम ने अभी तक विवाह क्यों नहीं किया?’’

‘‘आप भूल गईं. 20 वर्ष पहले हम ने शपथ ली कि यदि हम दोनों का विवाह संभव नहीं हुआ तो आजन्म कुंआरे रहेंगे.’’

‘‘मेरी बात अलग है. धर्म और समाज मेरे विरुद्ध है. फिर राधाकृष्ण मंदिर की देखभाल करने की मुझ पर पैतृक जिम्मेदारी है.’’

‘‘मेरी तरफ देखो,’’ दशरथ बोला, ‘‘मैं सोनार गांव का राजा हूं. संपत्ति व शक्ति का अधिकारी. धर्म और समाज मेरे किसी कार्य में बाधक नहीं बनेंगे.’’

‘‘वह 13 वर्ष की अबोध बालिका का पागलपन था. मैं तुम्हारी मौसेरी बहन हूं. हिंदू समाज में मौसेरी बहन से विवाह करने का प्रचलन नहीं.’’

दशरथ खामोश हो गया. उसे 20 वर्ष पूर्व अपनी मां को दिया वचन याद आ गया कि वह अपनी इस मौसेरी बहन से किसी भी दशा में विवाह नहीं करेगा. उस ने एक विश्वास ले कर सुरभि की ओर देखा और बोला, ‘‘सुरभि, मु?ो जोरों से भूख लगी है.’’

वह तुरंत उठ कर भोजन की व्यवस्था करने चली गई.

दशरथ देव अपने पिता दामोदर देव की मौत के बाद 1243 ईसवी में सोनार गांव का राजा बना था. उस ने ‘अरिराज दनुध माधव’ की उपाधि धारण की. किंतु जनसाधारण में वह रायदनुज के नाम से प्रसिद्ध हुआ, पर सुरभि के लिए वह दशरथ दा ही था.

सुरभि के पिता सूर्यमोहन मंदिरपुर के जमींदार थे. उन्होंने अपनी एकमात्र संतान सुरभि का विवाह ?ान?ानी के जमींदार माधवलाल के एकलौते बेटे से तय किया था. दिल से सुरभि इस विवाह के लिए तैयार नहीं थी. सुरभि की मां इस सचाई को जानती थीं कि सुरभि और दशरथ एकदूसरे को चाहते हैं, फिर भी उन्होंने इस बात को अपने पति से छिपा कर रखा.

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नौका डूब जाने के कारण भावी दामाद की मौत हो जाने से जमींदार सूर्यमोहन को काफी सदमा पहुंचा और उन की मौत हो गई. सुरभि की मां पति की मौत के कुछ दिनों बाद ही गुजर गईं.

भोजन करते हुए दशरथ देव सोच रहा था, ‘सुरभि मौसेरी बहन होने के कारण मु?ा से विवाह बंधन में नहीं बंध सकती, किंतु वह किसी अन्य से तो विवाह कर सकती है.’

उसी तरह सुरभि भी सोच रही थी, ‘मैं अब अन्यपूर्वा हूं किंतु दशरथ दा तो किसी सुयोग्य कन्या से विवाह कर सकते हैं.’

भोजन के बाद विश्राम कर जब दशरथ नींद से जागे तो उस समय संध्या हो रही थी. सुरभि अल्पाहार ले कर उन के कमरे में पहुंची. उस के साथ एक नवयुवती थी. दशरथ साथ आई उस नवयुवती को एकटक देख रहे थे.

दशरथ के सामने अल्पाहार रख सुरभि ने उस युवती से कहा, ‘‘दशरथ दा, बहुत बड़े राजा हैं, इन्हें प्रणाम करो.’’

नवयुवती ने लाज भरी आंखों से अपने राजा को देखा, फिर नजरें नीचे ?ाका दोनों हाथ को जोड़ प्रमाण किया.

उस नवयुवती में ऐसा कुछ था जो दशरथ को आकर्षित कर रहा था. वह क्या था? रूप और यौवन? राजा के मन ने खुद से प्रश्न किया और खुद ही उत्तर दिया. शायद नहीं, क्योंकि दशरथ ने उस नवयुवती से भी सुंदर सैकड़ों युवतियों को देखा था, जो उसे आकर्षित नहीं कर सकी थीं. तब? निश्चय ही उस नवयुवती के चेहरे की आभिजात्य तथा बुद्धिमत्ता की छाप दूसरी युवतियों से अलग दिखी थी.

‘‘क्या नाम है इस का?’’ दशरथ ने सुरभि से पूछा.

‘‘पद्मा,’’ सुरभि ने प्रेम से नवयुवती की तरफ देख कर कहा.

‘‘यहीं रहती है?’’ राजा ने पूछा.

‘‘रहती है? यह तो मेरी बेटी है.’’

‘‘तुम्हारा विवाह नहीं हुआ. तुम अपने को अन्यपूर्वा मानती हो. फिर तुम्हारी संतान कब हो गई?’’

‘‘क्या मैं किसी को गोद नहीं ले सकती?’’

‘‘तो यह तुम्हारी पोष्यपुत्री है.’’

‘‘हां, बड़े संयोग से वह मु?ो प्राप्त हुई थी.’’

‘‘कैसा संयोग?’’

‘‘पिता की मौत के 2 साल पहले की घटना है. पिता के साथ नौका पर नारायणगंज जा रही थी. बीच रास्ते में हमारी नौका के सामने एक मिट्टी का बड़ा घड़ा जल में तैरते हुए आ रहा था. नजदीक आने पर उस मिट्टी के घड़े से किसी शिशु के रोने की आवाज आई तो पिताजी ने मल्लाहों को घड़ा नौका पर उठा लाने का आदेश दिया.’’

घड़े के अंदर एक शिशु था. पिता ने घड़े से शिशु को निकाल कर मेरी गोद में देते हुए कहा, ‘बेटी, आज से यह तुम्हारी बेटी हुई. पद्मा नदी में यह मिली है, अत: इस का नाम पद्मा रख रहा हूं.’’’

दशरथ कुछ सोचने लगा. इस पर सुरभि ने पूछा, ‘‘क्या सोचने लगे, दादा?’’

‘‘सोच रहा हूं, नियति ने तुम्हारे साथ कैसा क्रूर उपहास किया है. 7 फेरे नहीं लगाए और अन्यपूर्वा बन गई. सुहाग सुख नहीं मिला और मां बन गई.’’

‘‘सब राधाकृष्ण की कृपा है.’’

‘‘हां, राधा भी तो कृष्णा को प्राप्त नहीं कर सकी थी.’’

राधाकृष्ण मंदिर भव्य और विशाल था. उस के प्रबंध के लिए एक पुरोहित और कुछ नौकर नियुक्त थे. उन्हें वेतन मिलता था. सुरभि सुबहशाम खुद पूजाआरती कर जाती थी.

मंदिर से जब वे लौटे तो रात हो रही थी. सुरभि जब पद्मा के साथ भोजन ले कर आई तो दशरथ ने एक बार फिर गौर से पद्मा को देखा. दशरथ को अपनी तरफ देखते देख पद्मा के कपोलों पर लालिमा दौड़ गई.

भोजन समाप्त कर दशरथ अपने स्थान से उठे, हाथमुंह धोया. भोजन के जूठे बरतन ले कर पद्मा चली गई तो सुरभि ने पूछा, ‘‘दादा, तुम ने क्या निर्णय लिया?’’

‘‘कैसा निर्णय?’’ दशरथ कुछ आश्चर्यचकित हो कर बोले.

‘‘तुम सोनार गांव के राजा हो. तुम्हारा प्रजा के प्रति कुछ कर्तव्य बनता है?’’

‘‘वह तो मैं पूरा कर ही रहा हूं.’’

‘‘कहां? तुम ने सोनार गांव की प्रजा को उस के उत्तराधिकारी से वंचित कर रखा है?’’ दशरथ दा के पास इस का कोई उत्तर नहीं था.

‘‘तुम्हारे सामने योग्य कन्या है. तुम उस से विवाह कर सुखी रहोगे.’’

‘‘कौन है वह?’’ दशरथ प्रश्न कर सकुचा गए.

‘‘पद्मा.’’

‘‘तुम्हारी बेटी?’’

‘‘वह मेरी कोख से जन्मी बेटी नहीं है.’’

‘‘फिर भी तुम उसे अपनी कन्या तो मानती हो?’’

‘‘उस से मेरा रक्त संबंध नहीं है. यह विवाह शास्त्र और समाज की सहमति से ही होगा.’’

दशरथ को सोचते देख सुरभि ने सजल नेत्रों को पोंछते हुए कहा, ‘‘दशरथ दा, पद्मा को स्वीकार लो, उसे मैं ने घर में शिक्षा दी है. वह सब तरह से तुम्हारे योग्य है. मु?ो उबार लो, दशरथ दा.’’

‘‘रोओ मत. तुम जैसा चाहोगी, वैसा ही होगा.’’

‘‘सच,’’ सुरभि ने आंखें फाड़

कर दशरथ की तरफ देखा और पद्मापद्मा पुकारती हुई खुशी से कमरे से बाहर दौड़ी.

पद्मा का सोनार गांव के राजा राय दनुज के साथ दूसरे दिन ही विवाह हो गया. कुछ दिन मंदिरपुर में गुजार कर राजा रायदनुज अपनी नवविवाहिता के साथ राजधानी जाने की तैयारी करने लगे.

जाने के दिन मंदिरपुर घाट पर काफी भीड़ थी. तब तक लोग दशरथ दा का वास्तविक परिचय जान गए थे.

अपने राजा को विदाई देने मंदिरपुर गांव ही नहीं, आसपास के दूसरे गांवों से भी प्रजाजन आए हुए थे.

मयूरपंखी बजरा घाट छोड़ आगे बढ़ने लगा. बजरे पर खड़े हो राजा राय दनुज एकटक सुरभि को देख रहे थे. जिस औरत को उन्होंने प्रेम किया वह मौसेरी बहन होने के कारण उन से विवाह नहीं कर सकी. आज वही औरत उन के सुख के लिए अपनी पालिता कन्या का उन से विवाह करा कर मां का दरजा प्राप्त कर गई. प्रेम की इस उपलब्धि से राजा रायदनुज आप्लावित हो उठे.

मयूरपंखी बजरा घाट छोड़ आगे बढ़ता जा रहा था. राय दनुज की आंखों से आंसू बह रहे थे.

उस के दोनों हाथ सुरभि के लिए अपनेआप श्रद्धा से जुड़ गए. उन की नजरें तब तक सुरभि पर ही जमी रहीं जब तक एक पूर्ण आकृति धीरेधीरे बिंदु बन विलुप्त न हो गई.

व्यंग्य: नाक बचाओ वाया तीर्थयात्रा

Writer- अशोक गौतम

जिन टमाटरों को रोटी के बदले खाखा कर कभी मैं लाल रहा करता था, आजकल वही टमाटर मु?ो औनलाइन दर्शन दे लाल किए जा रहे हैं. गूगल पर टमाटरों को सर्च करतेकरते मेरे ऐसे पसीने छूटने लगते हैं मानो मैं ने टमाटर नहीं, सांप देख लिया हो, वह भी फुंफकारता हुआ.

जिस सरसों के तेल को बौडी में खूब रचारचा कर कभी मैं अपने को वैवाहिक जीवन का बो?ा उठाने के लिए तैयार किया करता, दंड बैठकें निकाल तेल का तेल निकाल दिया करता था, आजकल उसी तेल के कनस्तर को बाजार में दूर से देख कर ही मेरे पसीने छूटने लगते हैं. मु?ो देखते ही वह इस कदर दंडबैठकें निकालने लगता है मानो जवानी के दिनों का हिसाब बराबर करना चाहता हो.

मत पूछो, घर का मुखिया होने के चलते मेरे कितने बुरे हाल हैं. इन दिनों मैं घर का मुखिया कम, घर में दुखिया सब से अधिक चल रहा हूं. किसी भी लैवल के मुखिया की वैसे तो नाक आज तक कभी बची नहीं, पर फिर भी सम?ा में नहीं आ रहा, महंगाई के इस दौर में किस तरह अपनी नाक बचाऊं?

पार्टी के चुनाव में हार जाने पर हार पर होने वाले मंथन के स्टाइल में जब मैं थकहार कर अपनी नाक बचाने पर मंथन कर ही रहा था कि अचानक मु?ो एक आइडिया आया कि क्यों न महंगाई के इस दौर में नाकबचाई के लिए परिवार को विभाग से एलटीसी ले कर तीर्थयात्रा पर धकेला जाए.

एक पंथ कई काज! इस बहाने उन का धार्मिक पर्यटन हो जाएगा और सरकार की तरह अपनी गिरती साख को, मुगालते में ही सही, आठ चांद भी लग जाएंगे. इस बहाने तीर्थयात्रा में शुद्ध वैष्णव खाने के बहाने टमाटरतेल के भाव का भी कुछ दिनों के लिए डर दिमाग से जाता रहेगा. हो सकता है तब तक टमाटर और तेल औंधेमुंह रसोई में गिर जाएं, या कि मेरी ही टमाटरतेल खाने की आदत ही छूट जाए. ऊपर से मोक्ष का सब से बड़ा फल अलग.

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वैसे भी, मोक्ष के फल बेचने वाले छाती पीटपीट कर दावे करते रहते हैं कि फलों में सब से श्रेष्ठ फल कोई जो है तो बस, मोक्ष का फल है. फलों का राजा आम नहीं, मोक्ष का फल है. मोक्ष के फल को खा कर शरीर में केवल खून नहीं बढ़ता, कोलैस्ट्रौल ही कम नहीं होता, बौडी स्लिम एंड ट्रिम ही नहीं होती, बल्कि मरने के तुरंत बाद शर्तिया स्वर्ग मिलता है.

स्वर्ग मिल जाने के बाद तब वहां न टमाटर की जरूरत होती है, न तेल की, न पैट्रोल की जरूरत पड़ती है, न डीजल की, न लाइन में घंटों सरकारी राशन की दुकान के आगे एकदूसरे को धक्के देते, एकदूसरे से धक्के खाते खड़े होना पड़ता है और न ही आसान किस्तों पर लोन लेना पड़ता है जिसे बाद में कठिन किस्तों पर लौटाना दम निकाल देता है, तब हर महीने किस्त देते हुए ऐसे लगता है जैसे हम लोन की मासिक किस्त न दे कर अपने प्राण दे रहे हों.

सो, मैं ने घर का मुखिया होने के नाते एक तीर से कई निशाने साधने की राजनीतिक साध मन में लिए, आव देखा न ताव, सपरिवार एलटीसी पर तीर्थयात्रा पर जाने के लिए अप्लाई कर दिया.

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जैसे ही मैं ने यह खबर हाथ जोड़ घर में प्रैस कौन्फैंस कर अपने घरवालों को बताई कि वे भी सरकार की तर्ज पर चाहते हैं कि उन के परिवार के मैंबर मुफ्त में तीर्थयात्रा पर जा समय से पहले पुण्य बटोर सकते हैं तो वे पागल हो गए. मुफ्त में खानेखिलाने की यह बीमारी महामारी से भी खतरनाक बीमारी होती है, भाईसाहब.

वैसे, अमूमन आदमी बुढ़ापे में तीर्थयात्रा करता है जब उस की टांगें जवाब दे चुकी होती हैं. जब तक उस की टांगें चलने लायक रहती हैं तब तक वह इधरउधर दौड़ता रहता है. बुढ़ापे में आदमी कुछ और करने को लालायित हो या न, पर वह अपनी सारी जिंदगी के पापों का प्रायश्चित्त करने को पगलाया रहता है. अगर गलती से तो आदमी कभी बूढ़ा न हुआ करता तो क्या मजाल जो वह तीर्थयात्रा पर जाया करता. सरकार की सारी मुफ्त में तीर्थों का लाभ दिलवाने वाली सारी ट्रेनें खाली ही चला करती हैं. स्वर्ग उजाड़ का उजाड़ रहता है.

और कल, मैं अपने परिवार के साथ धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देता टमाटरों को ठेंगा दिखाता, तेल को गंदी नाली में बहाता तीर्थयात्रा वाली ट्रेन में सवार हुआ तो मु?ो उसी वक्त मोक्ष के टैस्ट की फीलिंग होनी शुरू हो गई. घरवालों को हुई होगी कि नहीं, वही जानें.

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