कभीकभी कुछ बातें हमें उतना नहीं चौंकातीं जितनी वे गंभीर होती हैं, जैसे कि किसी छात्र द्वारा आत्महत्या कर लेना. आत्महत्या की वजह होती है पढ़ाई के बोझ तले दबा महसूस करना या मातापिता की उम्मीदों पर खरा न उतर पाना. तभी तो कहीं से खबर आती है कि फलां शहर के 10वीं कक्षा के छात्र ने परीक्षा में अंक कम आने के डर से फांसी लगा कर अपनी जान दे दी या कहीं से यह समाचार मिलता है कि परीक्षा में फेल हुए 12वीं कक्षा के छात्र ने नींद की गोलियां खा कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली.

इन आत्महत्याओं के जो कारण बताए जाते हैं, असलियत में क्या वे ही होते हैं या बात दूसरी भी होती है? दरअसल, जब से शिक्षा का अर्थ ‘शिक्षित करने’ से हट कर ‘समृद्ध करना’ बन गया है तब से हमारी महत्त्वाकांक्षाएं बेहिसाब बढ़ी हैं. अब ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ का नारा ‘छोटा परिवार समृद्ध परिवार’ में बदल गया है. तभी तो अकसर शिक्षण संस्थाओं से विद्यार्थी नहीं निकल रहे, बल्कि अब जैसे भी हो डाक्टर, इंजीनियर, एमबीए वगैरह प्रोफैशनल बनाए जा रहे हैं, जिन का एक ही ध्येय है, बेहिसाब पैसा बनाना. भारत पर बाजार का कब्जा होने के बाद से तो स्कूल खासतौर से प्राइवेट स्कूल बच्चों को ‘पैसा कमाने की मशीन’ बनाने वाली फैक्टरियां बन गए हैं. वे अपने तामझाम से बच्चों का ऐडमिशन कराने आए मातापिता को रिझाते हैं, उन्हें बड़ेबड़े सपने दिखाते हैं और यह यकीन तक दिला देते हैं कि अगर वे उन के यहां से अपने बच्चे को शिक्षा दिलाएंगे तो वह बच्चा अंकों के खेल में तो बाजी मारेगा ही, सफलता की रेस में भी सब से आगे निकल जाएगा.

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