अफगानिस्तान ने अमेरिकी फौज को बाहर का रास्ता दिखाया है, उस ने अमेरिका के ढहते प्रभुत्व को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है. दुनियाभर में यह संदेश भी गया कि अमेरिका ऐसा देश है जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता और वह दुनिया का पुलिसमैन नहीं रह गया है. यह हार लड़ाकू तालिबानियों के दम के चलते ही नहीं हुई बल्कि अंदर से खोखले होते अमेरिका के कारण भी हुई है. अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी और तालिबान के वहां की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के पूरे प्रकरण ने अमेरिका की साख को कम किया है. अब तक जो अमेरिका पूरी दुनिया का थानेदार बना हुआ था, उस की औकात अब चौकीदार की भी नहीं बची है.

तालिबान से डर कर अफगानिस्तान को छोड़ना यह बताता है कि वहां अमेरिका का खुफिया तंत्र इतनी बुरी तरह फेल हुआ कि 20 सालों में अंदर ही अंदर तालिबान किस कदर मजबूत और एकजुट होता चला गया, इस की भनक तक अमेरिका को नहीं लगी. गौरतलब है कि अमेरिका दुनियाभर में अपनी खुफिया ताकत के लिए ही मशहूर रहा है. कहा जाता रहा कि अमेरिका की खुफिया शक्ति इतनी मजबूत है कि दुनिया में कहां क्या चल रहा है, सब पर उस की नजर रहती है. 9/11 के हमले के बाद जिस तरह से पाकिस्तान में घुस कर अमेरिकी फौजों ने अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था, उसे अमेरिका के खुफिया तंत्र की ही कामयाबी मानी गई थी. तब जो बाइडेन अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे और बराक ओबामा राष्ट्रपति. 2 मई, 2011 को एबटाबाद में अमेरिकी सेना के हाथों ओसामा बिन लादेन मारा गया और इस सफलता का श्रेय अमेरिकी खुफिया एजेंसी को दिया गया, मगर अफगानिस्तान में तालिबान की स्थिति को ले कर अमेरिका का खुफिया तंत्र बुरी तरह से फेल हुआ.

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