Download App

Story : सजा

Story : असगर ने अपने दोस्त शकील से शर्त जीत कर तरन्नुम से निकाह तो कर लिया था लेकिन तरन्नुम को जब उस के विवाहित होने का पता चला तो उस ने आम औरतों की तरह सामंजस्य करने से इनकार कर दिया और असगर को वह सजा दी जिस की कल्पना भी वह नहीं कर सकता था.

असगर अपने दोस्त शकील की शादी में शरीक होने रामपुर गया. स्कूल के दिनों से ही शकील उस के करीबी दोस्तों में शुमार होता था. सो दोस्ती निभाने के लिए उसे जाना मजबूरी लगा था. शादी की मौजमस्ती उस के लिए कोई नई बात नहीं थी और यों भी लड़कपन की उम्र को वह बहुत पीछे छोड़ आया था.

शकील कालेज की पढ़ाई पूरी कर के विदेश चला गया था. पिछले कितने ही सालों से दोनों के बीच चिट्ठियों द्वारा एकदूसरे का हालचाल पता लगते रहने से वे आज भी एकदूसरे के उतने ही नजदीक थे जितना 10 बरस पहले.

असगर को दिल्ली से आया देख शकील खुशी से भर उठा, ‘‘वाह, अब लगा शादी है, वरना तेरे बिना पूरी रौनक में भी लग रहा था कि कुछ कसर बाकी है. तुझ से मिल कर पता लगा क्या कमी थी.’’

‘‘वाह, क्या विदेश में बातचीत करने का सलीका भी सिखाया जाता है या ये संवाद भाभी को सुनाने से पहले हम पर आजमाए जा रहे हैं.’’

‘‘अरे असगर, जब तुझे ही मेरे जजबात का यकीन न आ रहा हो तो वह क्यों करेगी मेरा यकीन, जिसे मैं ने अभी देखा भी नहीं,’’ शकील, असगर के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला.

बातें करतेकरते जैसे ही दोनों कमरे के अंदर आए असगर की निगाहें पल भर के लिए दीवान पर किताब पढ़ती एक लड़की पर अटक कर रह गईं. शकील ने भांपा, फिर मुसकरा दिया. बोला, ‘‘आप से मिलिए, ये हैं तरन्नुम, हमारी खालाजाद बहन और आप हैं असगर कुरैशी, हमारे बचपन के दोस्त. दिल्ली से तशरीफ ला रहे हैं.’’

दुआसलाम के बाद वह नाश्ते का इंतजाम देखने अंदर चली गई. असगर के खयाल जैसे कहीं अटक गए. शकील ने उसे भांप लिया, ‘‘क्यों साहब, क्या हुआ? कुछ खो गया है या याद आ रहा है?’’

ये भी पढ़ें- अपना अपना मापदंड

असगर कुछ नहीं बोला, बस एक नजर शकील की तरफ देख कर मुसकरा भर दिया.

शादी के सारे माहौल में जैसे तरन्नुम ही तरन्नुम असगर को दिखाई दे रही थी. उसे बिना बात ही मौसम, माहौल सभी कुछ गुनगुनाता सा लगने लगा. उस के रंगढंग देख कर शकील को मजा आ रहा था. वह छेड़खानी पर उतर आया. बोला, ‘‘असगर यार, अपनी दुनिया में वापस आ जाओ. कुछ बहारें देखने के लिए होती हैं, महसूस करने के लिए नहीं, क्या समझे? भई, यह औरतों की आजादी के लिए नारा बुलंद करने वालियों की अपने कालेज की जानीमानी सरगना है, तुम्हारे जैसे बहुत आए और बहुत गए. इसे कुछ असर होने वाला नहीं है.’’

‘‘लगानी है शर्त?’’ असगर ने चुनौती दी, ‘‘अगर शादी तक कर के न दिखा दूं तो मेरा नाम असगर कुरैशी नहीं.’’

शकील ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘मियां, लोग तो नींद में ख्वाब देखते हैं, आप जागते में भी.’’

‘‘बकवास नहीं कर रहा मैं,’’ असगर ने कहा, ‘‘बोल, अगर शादी के लिए राजी कर लूं तो?’’

‘‘ऐसा,’’ शकील ने उकसाया, ‘‘जो नई गाड़ी लाया हूं न, उसी में इस की डोली विदा करूंगा, क्या समझा. यह वह तिल है जिस में तेल नहीं निकलता.’’

और इस चुनौती के बाद तो असगर तरन्नुम के आसपास ही नजर आने लगा. अचानक ही एक से एक शेर उस के होंठों पर और हर महफिल में गजलें उस की फनाओं में बिखर रही थीं.

शकील हैरान था. यह तरन्नुम, जो हर आदमी को, आदमी की जात पर लानत देती थी, कैसे अचानक ही बहुत लजीलीशर्मीली ओस से भीगे गुलाब सी धुलीधुली नजर आने लगी.

घर में उस के इस बदलाव पर हलकी सी चर्चा जरूर हुई. शकील के साथ तरन्नुम के अब्बाअम्मी उस से मिलने आए. शकील ने कहा, ‘‘ये तुम से कुछ बातचीत करना चाहते थे, सो मैं ने सोचा अभी ही मौका है फिर शाम को तो तुम वापस दिल्ली जा ही रहे हो.’’

असगर हैरान हो कर बोला, ‘‘किस बारे में बातचीत करना चाहते हैं?’’

‘‘तुम खुद ही पूछ लो, मैं चला,’’ फिर अपनी खाला शहनाज की तरफ मुड़ कर बोला, ‘‘खालू, देखो जो भी बात आप तफसील से जानना चाहें उस से पूछ लें, कल को मेरे पीछे नहीं पडि़एगा कि फलां बात रह गई और यह बात दिमाग में ही नहीं आई,’’ इस के बाद शकील कमरे से बाहर हो गया.

असगर ने कहा, ‘‘आप मुझ से कुछ पूछना चाहते थे, पूछिए?’’

शहनाज बड़ा अटपटा महसूस कर रही थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या सवाल करें. उन के शौहर रज्जाक अली ने चंद सवाल पूछे, ‘‘आप कहां के रहने वाले हैं. कितने बहनभाई हैं, कहां तक पढ़े हैं? सरकारी नौकरी न कर के आप प्राइवेट नौकरी क्यों कर रहे हैं? अपना मकान दिल्ली में कैसे बनवाया? वगैरहवगैरह.’’

असगर जवाब देता रहा लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी तहकीकात किसलिए की जा रही है. शहनाज खाला थीं कि उस की तरफ यों देख रही थीं जैसे वह सरकस का जानवर है और दिल बहलाने के लिए अच्छा तमाशा दिखा रहा है. खालू के चंदएक सवाल थे जो जल्दी ही खत्म हो गए.

शहनाज खाला बोलीं, ‘‘तो बेटा, जब तुम्हारे सिर पर बुजुर्गों का साया नहीं है तो तुम्हें अपने फैसले खुद ही करने होते होंगे, है न…’’

‘‘जी,’’ असगर ने कहा.

‘‘तो बताओ, निकाह कब करना चाहोगे?’’

‘‘निकाह?’’ असगर ने पूछा.

‘‘और क्या,’’ खाला बोलीं, ‘‘भई, हमारे एक ही बेटी है. उस की शादी ही तो हमारी जिंदगी का सब से बड़ा अरमान है. फिर हमारे पास कमी भी किस चीज की है. जो कुछ है सब उसे ही तो देना है,’’ खाला ने खुलासा करते हुए कहा.

‘‘पर आप यह सब मुझ से क्यों कह रही हैं?’’

ये भी पढ़ें- वीआईपी के नए अर्थ

इस पर खालू ने कहा, ‘‘बात ऐसी है बेटा कि आज तक हमारी तरन्नुम ने किसी को भी शादी के लायक नहीं समझा. हम लोगों की अब उम्र हो रही है. अब उस ने तुम्हें पसंद किया है तो हमें भी अपना फर्ज पूरा कर के सुर्खरू हो लेने दो.’’

‘‘क्या?’’ असगर हैरान रह गया, ‘‘तरन्नुम मुझे पसंद करती है? मुझ से शादी करेगी?’’ असगर को यकीन नहीं आ रहा था.

‘‘हां बेटा, उस ने अपनी अम्मी से कहा है कि वह तुम्हें पसंद करती है और तुम्हीं से शादी करेगी. देखो बेटा, अगर लेनेदेने की कोई फरमाइश हो तो अभी बता दो. हमारी तरफ से कोई कसर नहीं रहेगी.’’

‘‘पर खालू मैं तो शादी,’’ असगर कुछ कहने के लिए सही शब्द सोच ही रहा था कि खालू बीच में ही बोले, ‘‘देखो बेटा, मैं अपनी बच्ची की खुशियां तुम से झोली फैला कर मांग रहा हूं, न मत कहना. मेरी बच्ची का दिल टूट जाएगा. वह हमेशा से ही शादी के नाम से किनारा करती रही है. अब अगर तुम ने न कर दी तो वह सहन नहीं कर सकेगी.’’

एक पल को असगर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘आप ने शकील से बात कर ली है.’’

‘‘हां,’’ खालू बोले, ‘‘उस की रजामंदी के बाद ही हम तुम से बात करने आए हैं.’’

शहनाज खाला उतावली सी होती हुई बोलीं, ‘‘तुम हां कह दो और शादी कर के ही दिल्ली जाओ. सभी इंतजाम भी हुए हुए हैं. इस लड़की का कोई भरोसा नहीं कि अपनी हां को कब ना में बदल दे.’’

‘‘ठीक है, जैसा आप सही समझें करें,’’ असगर ने कहा.

शहनाज खाला ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी आंखों से लगाया, ‘‘बेटा, तुम तो मेरे लिए फरिश्ते की तरह आए हो, जिस ने मेरी बच्ची की जिंदगी बहारों से भर दी,’’ खुशी से गमकते वह और खालू घर के अंदर खबर देने चले गए.

उन के जाने के बाद शकील कमरे में आते हुए बोला, ‘‘तो हुजूर ने मुझे शह देने के लिए सब हथकंडे आजमाए.’’

असगर ने कहा, ‘‘तू डर मत, मैं जीत का दावा कार मांग कर नहीं कर रहा हूं.’’

‘‘तू न भी मांगे,’’ शकील ने कहा, ‘‘तो भी मैं कार दूंगा. हम मुगल अपनी जबान पर जान भी दे सकने का दावा करते हैं, कार की तो बात ही क्या.’’

‘‘मजाक छोड़ शकील,’’ असगर ने कहा, ‘‘कल उसे पता लगेगा तब…’’

‘‘अब कुछ असर होने वाला नहीं है,’’ शकील ने कहा, ‘‘अपनेआप शादी के बाद हालात से सुलह करना सीख जाएगी. अपने यहां हर लड़की को ऐसा ही करने की नसीहत दी जाती है.’’

‘‘पर तू कह रहा था शकील कि वह आम लड़कियों जैसी नहीं है, बड़ी तेजतर्रार है.’’

‘‘वह तो शादी से पहले 50 फीसदी लड़कियां खास होने का दावा करती हैं पर असलीयत में वे भी आम ही होती हैं. है न, जब तक तरन्नुम को शादी में दिलचस्पी नहीं थी, मुहब्बत में यकीन नहीं था, वह खास लगती थी. पर तुम्हें चाह कर उस ने जता दिया है कि उस के खयाल भी आम औरतों की तरह घर, खाविंद, बच्चों पर ही खत्म होते हैं. मैं तो उस के ख्वाबों को पूरा करने में उस की मदद कर रहा हूं,’’ शकील ने तफसील से बताते हुए कहा.

और यों दोस्त की शादी में शरीक होने वाला असगर अपनी शादी कर बैठा. तरन्नुम को दिल्ली ले जाने की बात से शकील कन्नी काट रहा था. अपना मकान किराए पर दिया है, किसी के घर में पेइंगगेस्ट की तरह रहता हूं. वे शादीशुदा को नहीं रखेंगे. इंतजाम कर के जल्दी ही बुला लेने का वादा कर के असगर दिल्ली वापस चला आया.

तरन्नुम ने जब घर का पता मांगा तो असगर बोला, ‘‘घर तो अब बदलना ही है. दफ्तर के पते पर चिट्ठी लिखना,’’ और वादे और तसल्लियों की डोर थमा कर असगर दिल्ली चला आया.

7-8 महीने खतों के सहारे ही बीत गए. घर मिलने की बात अब खटाई में पड़ गई. किराएदार घर खाली नहीं कर रहा था इसलिए मुकदमा दायर किया है. असगर की इस बात से तरन्नुम बुझ गई, मुकदमों का क्या है, अब्बा भी कहते हैं वे तो सालोंसाल ही खिंच जाते हैं, फिर क्या जिन के अपने घर नहीं होते वह भी तो कहीं रहते ही हैं. शादी के बाद भी तो अब्बू, अम्मी के ही घर रह रहे हैं, ससुराल नहीं गई, इसी को ले कर लोग सौ तरह की बातें ही तो बनाते हैं.

असगर यों अचानक तरन्नुम को अपने दफ्तर में खड़ा देख कर हैरान हो गया, ‘‘आप यहां? यों अचानक,’’ असगर हकलाता हुआ बोला.

तरन्नुम शरारत से हंस दी, ‘‘जी हां, मैं यों अचानक किसी ख्वाब की तरह,’’ तरन्नुम ने चहकते से अंदाज में कहा, ‘‘है न, यकीन नहीं हो रहा,’’ फिर हाथ आगे बढ़ा कर बोली, ‘‘हैलो, कैसे हो?’’ असगर ने गरमजोशी से फैलाए हाथ को अनदेखा कर के सिगरेट सुलगाई और एक गहरा कश लिया.

ये भी पढ़ें- रिटायरमेंट

तरन्नुम को लगा जैसे किसी ने उसे जोर से तमाचा मारा हो. वह लड़खड़ाती सी कुरसी पकड़ कर बैठ गई. मरियल सी आवाज में बोली, ‘‘हमें आया देख कर आप खुश नहीं हुए, क्यों, क्या बात है?’’

असगर ने अपने को संभालने की कोशिश की, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. तुम्हें यों अचानक आया देख कर मैं घबरा गया था,’’ असगर ने घंटी बजा कर चपरासी से चाय लाने को कहा.

‘‘हमारा आना आप के लिए खुशी की बात न हो कर घबराने की बात होगी, ऐसा तो मैं ने सोचा भी नहीं था,’’ तरन्नुम की आंखें नम हो रही थीं.

तब तक चपरासी चाय रख कर चला गया था. असगर ने चाय में चीनी डाल कर प्याला तरन्नुम की तरफ बढ़ाया. तरन्नुम जैसे एकएक घूंट के साथ आंसू पी रही थी.

असगर ने एकदो फाइलें खोलीं. कुछ पढ़ा, कुछ देखा और बंद कीं. अब उस ने तरन्नुम की तरफ देखा, ‘‘क्या कार्यक्रम है?’’

‘‘मेरा कार्यक्रम तो फेल हो गया,’’ तरन्नुम लजाती सी बोली, ‘‘मैं ने सोचा था पहुंच कर आप को हैरान कर दूंगी. फिर अपना घर देखूंगी. हमेशा ही मेरे दिमाग में एक धुंधला सा नक्शा था अपने घर का, जहां आप एक खास तरीके से रहते होंगे. उस कमरे की किताबें, तसवीरें सभी कुछ मुझे लगता है मेरी पहचानी सी होंगी लेकिन यहां तो अब आप ही जब अजनबी लग रहे हैं तब वे सब…’’

असगर के चेहरे पर एक रंग आया और गया. फिर वह बोला, ‘‘यही परेशानी है तुम औरतों के साथ. हमेशा शायरी में जीना चाहती हो. शायरी और जिंदगी 2 चीजें हैं. शायरी ठीक वैसी ही है जैसे मुहब्बत की इब्तदा.’’

‘‘और मुहब्बत की मौत शादी,’’ असगर की तरफ गहरी आंखों से देखते हुए तरन्नुम बोली.

‘‘मुझे पता है तुम ने बहुत से इनाम जीते हैं वादविवाद में, लेकिन मैं अपनी हार कबूल करता हूं. मैं बहस नहीं करना चाहता,’’ असगर ने उठते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा सामान कहां है?’’

‘‘बाहर टैक्सी में,’’ तरन्नुम ने बताया.

‘‘टैक्सी खड़ी कर के यहां इतनी देर से बैठी हो?’’

‘‘और क्या करती? पता नहीं था कि आप यहां मिलोगे भी या नहीं. फिर सामान भी भारी था,’’?तरन्नुम ने खुलासा किया.

जाहिर था असगर उस की किसी भी बात से खुश नहीं था.

जब टैक्सी में बैठे तो असगर ने टैक्सी चालक को किसी होटल में चलने को कहा, ‘‘पर मैं तो आप का घर देखना…’’

असगर ने तरन्नुम का हाथ दबाया, ‘‘मेरे दोस्त अपने घर में मुझे मेहमान रखने की इजाजत नहीं देंगे.’’

‘‘पर मैं तो मेहमान नहीं, आप की बीवी हूं,’’ तरन्नुम ने मरियल आवाज में दोहराया.

‘‘उन की पहली शर्त ही कुंआरे को रखने की थी और ऐसी जल्दी भी क्या थी. मैं ने लिखा था कि घर मिलते ही बुला लूंगा,’’ असगर का दबा गुस्सा बाहर आया.

‘‘हमारी शादी को 8 महीने हो गए. तब से अभी तक अगर अपना घर नहीं मिला तो क्या किराए का भी नहीं मिल सकता था,’’ तरन्नुम ने खीज कर पूछा. उसे दिल ही दिल में बहुत बुरा लग रहा था कि शादी के चंद महीने बाद ही वह खास औरताना अंदाज में मियांबीवी वाला झगड़ा कर रही थी.

‘‘ठीक है,’’ असगर ने कहा, ‘‘अब तुम दिल्ली आ ही गई हो तो घरों की खोज भी कर लो. तुम्हें खुद ही पता लग जाएगा कि घर ढूंढ़ना कितना आसान है,’’ होटल में आ कर भी तरन्नुम महसूस कर रही थी कहीं कुछ है जो असगर को सामान्य नहीं होने दे रहा.

अगले दिन असगर जब दफ्तर चला गया तब तरन्नुम ने अपनी सहेली रीता अरोड़ा को फोन किया और अपनी घर न मिलने की मुश्किल बताई. रीता ने कहा कि वह शाम को अपने परिचितों, मित्रों से बातचीत कर के कुछ इंतजाम करेगी.

दूसरे दिन रीता अपनी कार ले कर तरन्नुम को लेने आई. रास्ते से उन्होंने एक दलाल को साथ लिया जो विभिन्न स्थानों में उन्हें मकान दिखाता रहा. शाम होने को आई लेकिन अभी तक जैसा घर तरन्नुम चाहती थी वैसा एक भी नहीं मिला. कहीं घर ठीक नहीं लगा तो कहीं पड़ोस तरीके का नहीं. अगर दोनों ठीक मिल गए तो आसपास का माहौल बेतुका. दलाल को छोड़ते हुए रीता ने घर के बारे में पूरी तरह अपनी इच्छा समझाई.

दलाल ने कहा 2-3 दिन के अंदर ही ऐसे कुछ घर खाली होने वाले हैं तब वह खुद ही उन्हें फोन कर के सही घर दिखाएगा.

असगर तरन्नुम से पहले ही होटल आ गया था. थकी, बदहवास तरन्नुम को देख कर उसे बहुत अफसोस हुआ. फोन पर चाय का आदेश दे कर बोला, ‘‘कहां मारीमारी फिर रही हो? यह काम तुम्हारे बस का नहीं है.’’

‘‘वाह, जब शादी की है तो घर भी बसा कर दिखा देंगे. आप हमारे लिए घर नहीं खोज सके तो क्या. हम ही आप को घर ढूंढ़ कर रहने को बुला लेंगे,’’ तरन्नुम खुशी से छलकती हुई बोली.

‘‘चलो, यही सही,’’ असगर ने कहा, ‘‘चायवाय पी कर नहा कर ताजा हो लो फिर घर पर फोन कर देना. अभी अब्बू परेशान हो रहे होंगे. उस के बाद नाटक देखने चलेंगे. और हां, साड़ी की जगह सूट पहनना. तुम पर बहुत फबता है.’’

असगर की इस बात पर तरन्नुम इठलाई, ‘‘अच्छा मियांजी.’’

रात देर से लौटे, दिन भर की थकान थी, इतना तो तरन्नुम कभी नहीं घूमी थी. पर अब रात को भी उसे नींद नहीं आ रही थी. कल देखे जाने वाले घरों के बारे में वह तरहतरह के सपने संजो रही थी. उस का अपना घर, उस का अपना खोजा घर.

ये भी पढ़ें- परीक्षाफल

नाश्ते के बाद असगर दफ्तर चला गया. तरन्नुम रीता के इंतजार में तैयार हो कर बैठी उपन्यास पढ़ रही थी. उस का मन सुबह से ही किसी भी चीज में नहीं लग रहा था. होटल भला घर हो सकता है कभी? उसे लग रहा था जैसे वह मुसाफिरखाने में अपने सामान के साथ बैठी अपनी मंजिल का इंतजार कर रही है और गाड़ी घंटों नहीं, हफ्तों की देर से आने का सिर्फ ऐलान ही कर रही है और हर पल उस की बेचैनी बढ़ती ही जा रही है.

अचानक फोन की घंटी से जैसे वह गहरी सोच से जाग उठी. रीता ने होटल की लौबी से फोन किया था. रीता की आवाज खुशी से खनक रही थी. तरन्नुम ने झटपट पर्स उठाया और लौबी में आ गई. रीता ने बाहर आतेआते कहा, ‘‘आज ही सुबह बिन्नी दी का फोन आया था. उन के पड़ोस में कोई मुसलिम परिवार है, उन्हीं की कोठी का ऊपरी हिस्सा खाली हुआ था. उस घर की मालकिन बिन्नी दी की खास सहेली हैं. उन्हीं की गारंटी पर तुम्हें घर देने के लिए तैयार हैं. जितना किराया तुम दे सकोगी उन्हें मंजूर होगा.’’

रीता और तरन्नुम पंचशील पार्क की उस कोठी में गए. तरन्नुम को गेट खोलते ही बहुत अच्छा लगा. घर के बाहर छोटा सा लेकिन बहुत खूबसूरत लौन, इस भरी गरमी में भी हराभरा नजर आ रहा था.

घंटी की आवाज सुनते ही हमउम्र जुड़वां 3 साल के नन्हे बच्चे, एक पमेरियन कुत्ता और नौकर चारों ही दरवाजे पर लपके. जाली के दरवाजे के अंदर से ही नौकर बोला, ‘‘आप कौन, कहां से तशरीफ ला रही हैं?’’

रीता ने कहा, ‘‘जा कर मालकिन से बोलो, बिन्नी दी ने भेजा है.’’

नौकर ने दरवाजा पूरा खोलते हुए कहा, ‘‘आइए, वे तो सुबह से आप का ही इंतजार कर रही हैं.’’

बैठक कक्ष सजाने वाले की नफासत की दाद दे रहा था जैसे हर चीज अपनी सही जगह पर थी. यहां तक कि खरगोश की तरह सफेद कुरतेपाजामे में उछलकूद मचाते बच्चे भी जैसे इस कमरे की सजावट का हिस्सा हों. उन्हें बैठे 5 मिनट ही बीते होंगे कि कमरे का परदा सरका, आने वाली को देख कर रीता झट से उठी, ‘‘हाय निकहत आपा, कितनी प्यारी दिख रही हैं आप इस फालसाई रंग में.’’

निकहत हंस दी, ‘‘आज ज्यादा ही सुंदर दिख रही हूं. गरज की मारी आ गई वरना तो बिन्नी के पास आ कर गुपचुप से चली जाती है, कभी भूले से भी यहां तशरीफ नहीं लाई.’’

‘‘क्यों बिन्नी के साथ ईद पर नहीं आई थी,’’ रीता ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘पर अभी तो ईद भी नहीं और नया साल भी नहीं. खैर इनायत है, गरज से ही सही, आई तो,’’ निकहत ने कहा, ‘‘और सुनाओ, कैसा चल रहा है तुम्हारा कामकाज.’’

‘‘वहां से आजकल छुट्टी ले रखी है. इन से मिलिए, ये हैं मेरी सहेली तरन्नुम, रामपुर से आई हैं. इन के शौहर यहां पर हैं. अपना मकान है लेकिन किराएदार खाली नहीं कर रहे हैं. शादी को 8-10 महीने होने को आए लेकिन अब तक मियां का साथ नहीं हो पाया. किराए पर ढंग का घर मिल नहीं रहा और होटल में रहते 5-7 दिन हो गए. बिन्नी दी से बात की तो उन्होंने आप के घर का ऊपरी हिस्सा खाली होने की बात कही. सुनते ही मैं तुरंत इन्हें खींचती आप के पास ले आई.’’

‘‘रामपुर में किस के घर से हैं आप?’’ निकहत ने पूछा.

‘‘वहां बहुत बड़ी जमींदारी है मेरे अब्बू की. क्या आप भी वहीं से हैं?’’ तरन्नुम ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो कभी वहां गई नहीं. पिछले साल मेरे शौहर गए थे अपने दोस्त की शादी में. मैं ने सोचा शायद आप उन्हें जानती होंगी.’’

‘‘किस के यहां गए थे? रामपुर में हमारे खानदानी घर ही ज्यादातर हैं.’’

‘‘अब नाम तो मुझे याद नहीं होगा, क्या लेंगी आप…चाय या ठंडा? वैसे अब थोड़ी देर में ही खाना लग रहा है. आप को हमारे साथ आज खाना जरूर खाना होगा. हमारे साहब तो दौरे पर गए हैं. बच्चों के साथ 5-6 दिन से खिचड़ी, दलिया खातेखाते मुंह का स्वाद ही खराब हो गया.

‘‘रीता को तो हैदराबादी बिरयानी पसंद है, साथ में मुर्गमुसल्लम भी. मैं जरा रसोई में खानेपीने का इंतजाम देख लूं. नौकर नया है वरना मुर्गे का भरता ही बना देगा. तब तक आप यह अलबम देखिए. रीता, अपनी पसंद का रेकार्ड लगा लो,’’ कहती हुई निकहत अंदर चली गई.

तरन्नुम ने अलबम खोला और उस की आंखें असगर से मिलतेजुलते एक आदमी पर अटक गईं. अगला पन्ना पलटा. निकहत के साथ असगर जैसा चेहरा. अलगअलग जगह, अलगअलग कपड़े. पर असगर से इतना कोई मिल सकता है वह सोच भी नहीं सकती थी. उस ने रीता को फोटो दिखा कर पूछा, ‘‘ये हजरत कौन हैं?’’

‘‘क्यों, आंखों में चुभ गया है क्या?’’ रीता हंस दी, ‘‘संभल के, यह तो निकहत दीदी के पति हैं. है न व्यक्तित्व जोरदार, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं. असल में इन के मांबाप जल्दी ही गुजर गए. निकहत अपने मांबाप की इकलौती बेटी थी तिस पर लंबीचौड़ी जमीनजायदाद, बस, समझो लाटरी ही लग गई इन साहब की. नौकरी भी निकहत के अब्बू ने दिलवाई थी.’’

तरन्नुम को अब न गजल सुनाई दे रही थी और न ही कमरे में बच्चों की खिलखिलाती हंसी का शोर, वह एकदम जमी बर्फ सी सर्द हो गई. दिल की धड़कन का एहसास ही बताता था कि सांस चल रही है.

निकहत ने जब खाने के लिए बुलाया तब वह जैसे किसी दूसरी दुनिया से लौट कर आई, ‘‘आप बेकार ही तकल्लुफ में पड़ गईं, हमें भूख नहीं थी,’’ उस ने कहा.

‘‘तो क्या हुआ, आज का खाना हमारी भूख के नाम पर ही खा लीजिए. हमें तो आप की सोहबत में ही भूख लग आई है.’’

रोशनी सा दमकता चेहरा, उजली धूप सी मुसकान, तरन्नुम ठगी सी देखती रही. फिर बोली, ‘‘आप के पति कितने खुशकिस्मत हैं, इतनी सुंदर बीवी, तिस पर इतना बढि़या खाना.’’

‘‘अरे आप तो बेकार ही कसीदे पढ़ रही हैं. अब इतने बरसों के बाद तो बीवी एक आदत बन जाती है, जिस में कुछ समझनेबूझने को बाकी ही नहीं रहता. पढ़ी किताब सी उबाऊ वरना क्या इतनेइतने दिन मर्द दौरे पर रहते हैं? बस, उन की तरफ से घर और बच्चे संभाल रहे हैं यही बहुत है,’’ निकहत ने तश्तरी में खाना परोसते हुए कहा.

‘‘कहां काम करते हैं कुरैशी साहब?’’ तरन्नुम ने पूछा.

‘‘कटलर हैमर में, उन का दफ्तर कनाट प्लेस में है. असगर पहले इतना दौरे पर नहीं रहते थे जितना कि पिछले एक बरस से रह रहे हैं.’’

‘‘असगर,’’ तरन्नुम ने दोहराया.

‘‘हां, मेरे शौहर, आप ने बाहर तख्ती पर अ. कुरैशी देखा था. अ. से असगर ही है. हमारे बच्चे हंसते हैं, अब्बू, ‘अ’ से अनार नहीं हम अपनी अध्यापिका को बताएंगे ‘अ’ से असगर,’’ फिर प्यार से बच्चे के सिर पर धौल लगाती बोली, ‘‘मुसकराओ मत, झटपट खाना खत्म करो फिर टीवी देखेंगे.’’

‘‘अरे, तरन्नुम तुम कुछ उठा नहीं रहीं,’’ रीता ने तरन्नुम को हिलाया.

‘‘हूं, खा तो रही हूं.’’

‘‘क्यों, खाना पसंद नहीं आया?’’ निकहत ने कहा, ‘‘सच तरन्नुम, मैं भी बहुत भुलक्कड़ हूं. बस, अपनी कहने की रौ में मुझे दूसरे का ध्यान ही नहीं रहता. खाना सुहा नहीं रहा तो कुछ फल और दही ले लो.’’

‘‘न दीदी, मुझे असल में भूख थी ही नहीं, वह तो खाना बढि़या बना है सो इतना खा गई.’’

‘‘अच्छा अब खाना खत्म कर लो फिर तुम्हें ऊपर वाला हिस्सा दिखाते हैं, जिस में तुम्हें रहना है. तुम्हारे यहां आ कर रहने से मेरा भी अकेलापन खत्म हो जाएगा.’’

‘‘पर किराए पर देने से पहले आप को अपने शौहर से नहीं पूछना होगा,’’ तरन्नुम ने कहा.

‘‘वैसे कानूनन यह कोठी मेरी मिल्कियत है. पहले हमेशा ही उन से पूछ कर किराएदार रखे हैं. इस बार तुम आ रही हो तो बजाय 2 आदमियों के बीच बातचीत हो इस बार तरीका बदला जाए,’’ निकहत शरारत से हंस दी, ‘‘यानी मकान मालकिन और किराएदारनी तथा मध्यस्थ भी इस बार मैं औरत ही रख रही हूं. राजन कपूर की जगह बिन्नी कपूर वकील की हैसियत से हमारे बीच का अनुबंध बनाएंगी, क्यों?’’

रीता जोर से हंस दी, ‘‘रहने दो निकहत दीदी, बिन्नी दी ने शादी के बाद वकालत की छुट्टी कर दी.’’

‘‘इस से क्या हुआ,’’ निकहत हंसी, ‘‘उन्होंने विश्वविद्यालय की डिगरी तो वापस नहीं कर दी है. जो काम कभी न हुआ तो वह आज हो सकता है. क्यों तरन्नुम, तुम्हारी क्या राय है? मैं आज शाम तक कागजात तैयार करवा कर होटल भेज देती हूं. तुम अपनी प्रति रख लेना, मेरी दस्तखत कर के वापस भेज देना. रही किराए के अग्रिम की बात, उस की कोई जल्दी नहीं है, जब रहोगी तब दे देना. आदमी की जबान की भी कोई कीमत होती है.’’

रीता तरन्नुम को तीसरे पहर होटल छोड़ती हुई निकल गई.

ये भी पढ़ें- रीते हाथ

शाम को असगर के आने से पहले तरन्नुम ने खूब शोख रंग के कपड़े, चमकदार गहने पहने, गहरा शृंगार किया, असगर उसे तैयार देख कर हैरान रह गया. यह पहरावा, यह हावभाव उस तरन्नुम के नहीं थे जिसे वह सुबह छोड़ कर गया था.

‘‘आप को यों देख कर मुझे लगा जैसे मैं गलत कमरे में आ गया हूं,’’ असगर ने चौंक कर कहा.

‘‘अब गलत कमरे में आ ही गए हो तो बैठने की गलती भी कर लो,’’ तरन्नुम ने कहा, ‘‘क्या मंगवाऊं आप के लिए, चाय, ठंडा या कुछ और,’’ तरन्नुम ने लहरा कर पूछा.

‘‘होश में तो हो,’’ असगर ने कहा.

‘‘हां, आंखें खुल गईं तो होश में ही हूं,’’ तरन्नुम ने जवाब दिया, ‘‘आज का दिन मेरी जिंदगी का बहुत कीमती दिन है. आज मैं ने अपनी हिम्मत से तुम्हारे शहर में बहुत अच्छा घर ढूंढ़ लिया है. उस की खुशी मनाने को मेरा जी चाह रहा है. अब तो अनुबंध की प्रति भी है मेरे पास. देखो, तुम इतने महीने में जो न कर सके वह मैं ने 6 दिन में कर दिया,’’ अपना पर्स खोल कर तरन्नुम ने कागज असगर की तरफ बढ़ाए.

असगर ने कागज लिए. तरन्नुम ने थरमस से ठंडा पानी निकाल कर असगर की तरफ बढ़ाया. असगर के हाथ कांप रहे थे. उस की आंखें कागज को बहुत तेजी से पढ़ रही थीं. उस ने कागज पढ़े और मेज पर रख दिए. तरन्नुम उस के चेहरे के उतारचढ़ाव देख रही थी लेकिन असगर का चेहरा सपाट था कोरे कागज सा.

‘‘असगर, तुम ने पूछा नहीं कि मैं ने कागजात में खाविंद का नाम न लिख कर वालिद का नाम क्यों लिखा?’’ बहुत बहकी हुई आवाज में तरन्नुम ने कहा.

असगर ने सिर्फ सवालिया नजरों से उस की तरफ देखा.

‘‘इसलिए कि मेरे और निकहत कुरैशी के खाविंद का एक ही नाम है और अलबम की तसवीरें कह रही हैं कि हम दोनों बिना जाने ही एकदूसरे की सौतन बना दी गईं. निकहत बहुत प्यारी शख्सियत है मेरे लिए, बहुत सुलझी हुई, बेहद मासूम.’’

‘‘तरन्नुम,’’ असगर ने कहा.

‘‘हां, मैं कह रही थी वह बहुत अच्छी, बहुत प्यारी है. मैं उन का मन दुखाना नहीं चाहती, वैसा कुछ भी मैं नहीं करूंगी जिस से उन का दिल दुखी हो. इसलिए मैं वह घर किराए पर ले चुकी हूं और वहां रहने का मेरा पूरा इरादा है लेकिन उस घर में मैं अकेली रहूंगी. पर एक सवाल का जवाब तुम्हारी तरफ बाकी है, तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?’’

‘‘मुझे तुम बेहद पसंद थीं,’’ असगर ने हकलाते हुए कहा.

‘‘तो?’’

‘‘जब तुम्हें भी अपनी तरफ चाहत की नजर से देखते पाया तो सोचा…’’

‘‘क्या सोचा?’’ तरन्नुम ने जिरह की.

‘‘यही कि अगर तुम्हारे घर वालों को एतराज नहीं है तो यह निकाह हो सकता है,’’ असगर ने मुंह जोर होने की कोशिश की.

‘‘मेरे घर वालों को तुम ने बताया ही कहां?’’ तरन्नुम गुस्से से तमतमा उठी.

‘‘देखो, तरन्नुम, अब बाल की खाल निकालना बेकार है. शकील को सब पता था. उसी ने कहा था कि एक बार निकाह हो गया तो तुम भी मंजूर कर लोगी. तुम्हारी अम्मी ने झोली फैला कर यह रिश्ता अपनी बेटी की खुशियों की दुहाई दे कर मांगा था. वैसे इसलाम में 4 शादियों तक भी मुमानियत नहीं है.’’

‘‘देखिए, मुझे अपने ईमान के सबक आप जैसे आदमी से नहीं लेने हैं. आप की हिम्मत कैसे हुई निकहत जैसी नेक बीवी के साथ बेईमानी करने की और मुझे धोखा देने की,’’ तरन्नुम ने तमतमा कर कहा.

‘‘धोखाधोखा कहे जा रही हो. शकील को सब पता था, उसी ने चुनौती दे रखी थी तुम से शादी करने की.’’

‘‘वाह, क्या शर्त लगा रहे हैं एक औरत पर 2 दोस्त? आप को जीत मुबारक हो, लेकिन यह आप की जीत आप की जिंदगी की सब से बड़ी हार साबित होगी, असगर साहब. मैं आप के घर में किराएदार बन कर जिंदगी भर रहूंगी और दिल्ली आने के बाद अदालत में तलाक का दावा भी दायर करूंगी. वैसे मेरी जिंदगी में शादी के लिए कोई जगह नहीं थी. शकील ने शादी के बहुत बार पैगाम भेजे, मैं ने हर बार मना कर दिया. उसी का बदला इस तरह वह मुझ से लेगा, मैं ने सोचा भी नहीं था. आज पंचशील पार्क जा कर मुझे एहसास हुआ कि क्यों दिल्ली में घर नहीं मिल रहे? क्यों तुम उखड़ाउखड़ा बरताव कर रहे थे? देर आए दुरुस्त आए.’’

‘‘पर मैं तुम्हें तलाक देना ही नहीं चाहता,’’ असगर ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें अपनी बीवी बनाया है. मैं तुम्हारे लिए दूसरी जगह घर बसाने के लिए तैयार हूं.’’

बहुत खुले दिमाग हैं आप के, लेकिन माफ कीजिए. अब औरत उस कबीली जिंदगी से निकल चुकी है जब मवेशियों की गिनती की तरह हरम में औरत की गिनती से आदमी की हैसियत परखी जाती थी. बच्चों से उन का बाप और निकहत से उस का शौहर छीनने का मेरा बिलकुल इरादा नहीं है और वैसे भी एक धोखेबाज आदमी के साथ मैं जी नहीं सकती. हर घड़ी मेरा दम घुटता रहेगा लेकिन तुम्हें बिना सजा दिए भी मुझे चैन नहीं मिलेगा. इसीलिए तुम्हारे घर के ऊपर मैं किराएदार की हैसियत से आ रही हूं.’’

फिर तेज सांसों पर नियंत्रण करती हुई बोली थी तरन्नुम, ‘‘मैं सामान लेने जा रही हूं. तुम निकहत को कुछ बताने का दम नहीं रखते. तुम बेहद कमजोर और बुजदिल आदमी हो. हम दोनों औरतों के रहमोकरम पर जीने वाले.’’

असगर के चेहरे पर गंभीरता व्याप्त थी. तरन्नुम अपनी अटैची बंद कर रही थी. वह मन ही मन सोच रही थी…अम्मीअब्बू की खुशी के लिए उसे वहां कोई भी बात बतानी नहीं है. यह स्वांग यों ही चलने दो जब तक वे हैं.’’ Story

Religious loot : दान के बहाने धार्मिक लूट

Religious loot : न जाने कब से मंदिरों, मजारों, गुरुद्वारों के बाहर खड़ी भिखारियों की भीड़ दानी लोगों के दान, पुण्य और परोपकार के सहारे ही अपना पेट भर रही है. इन धर्मस्थलों के आगे खड़ी लाचार लोगों की लंबी कतारों में बेबस लोगों की न जाने कितनी पीढि़यां खप चुकी हैं. क्या दान की इस भावना में कुछ इंसानियत होती है? क्या इस पुण्य से गरीबी दूर होती है? परोपकार की मानसिकता से फायदा किस का होता है?

दान, पुण्य और परोपकार की कुसंस्कृति न जाने कब से चलन में है. जब से सभ्यता बनी, लोगों ने एकदूसरे को सहयोग करने की आदत का फायदा उठाया और विपत्ति के समय किसी को कुछ दे देना सभ्यता सम झा गया. शुरुआत में जिस ने शिकार किया, फलफूल एकत्र किए या कुछ उपजाया उस ने उन दूसरों को कुछ देना शुरू किया जो शारीरिक कमजोरी की वजह से खुद का खाना जमा नहीं कर पाए. देने वाले को यह एहसास रहता था कि जिसे जो दिया गया वह उस के काम आ सकता है जब वह कमजोरी, बीमारी या प्राकृतिक आपदा के कारण खुद खाना जुटा न सकेगा. यह दान नहीं है, यह पारस्परिक सहयोग है जो सदियों से चलता आ रहा है और यह सभ्यता की मजबूत ईंटों में से एक आदत है.

इस पारस्परिक सहयोग का दुरुपयोग किया गया. हर धर्म के पुरोहितों ने अपने फायदे के लिए धर्म के नियम, कायदे व कानून बनाए और कहानियां गढ़ीं ताकि दान के नाम पर लोगों से धन ऐंठा जा सके. सो, धर्म की कहानियों में दानदक्षिणा का खूब महिमागान किया गया है. अब ईश्वर के नाम पर दान मांगा जाता है. लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि दान देने से ईश्वर खुश होता है. लोग ईश्वर के नाम पर ठगे चले जाते हैं. यही कारण है कि हर देश में धर्म की बड़ी दुकान में अथाह दौलत इकट्ठी हो गई है. बड़ेबड़े मंदिर, चर्च और मसजिदें इसी हथकंडे के तहत ही बने हैं. ईश्वर के नाम पर इकट्ठी की गई दौलत से पुरोहित ऐश करते हैं जबकि जनता हमेशा गरीब ही बनी रहती है.

विशेष जाति के लोगों के दान की महिमा का सब से ज्यादा गुणगान हिंदू धर्म ने किया है. आज भी धर्मगुरु ब्राह्मणों को दान देने के नाम पर लोगों को बरगलाते हैं और लोग इन धर्मगुरुओं के  झांसे में आ कर खूब दान करते हैं. लोगों के दान के पैसों से ही रातोंरात बड़ेबड़े आश्रम खड़े हो जाते हैं और दो कौड़ी के बाबा बड़ेबड़े गुरु बन जाते हैं. दान देने वाले आदमी का समय भले न बदले लेकिन दान लेने वाले की तो आने वाली सात पीढि़यों का भविष्य उज्ज्वल हो जाता है.

आसाराम बाबू, राम रहीम, संत रामपाल और सद्गुरु जैसे बाबाओं का इतिहास उठा कर देख लीजिए. ये वे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन में लगातार असफल होने के बाद धर्म का धंधा शुरू किया और आज इन के ब्रैंड का खरबों रुपयों का वार्षिक टर्नओवर है. इन जैसे बाबाओं के बड़े शहरों में जमीनें, बड़ेबड़े आश्रम और कई शहरों में कार्यालय बने हैं. यह सब कैसे हुआ? क्या इतनी दौलत इन्हें ईश्वर ने दी? दरअसल, यह सब भक्तों के पैसों के चलते है, दान के महिमागान का परिणाम है.

लोगों के दान के पैसों से ही बड़ेबड़े मंदिर, मसजिद व चर्च बनाए गए. इन धर्मस्थलों के अंदर और बाहर दोनों ओर भिखारी होते हैं जो ईश्वर और धर्मरक्षा के नाम पर लोगों से धन ऐंठते हैं. धर्मस्थल के अंदर बैठा भिखारी कहता है कि धर्म के नाम पर खर्च करो, ईश्वर तुम्हें इस के बदले में बहुतकुछ देगा. वहीं, धर्मस्थल के बाहर बैठा भिखारी कहता है कि भगवान के नाम पर दस रुपए दो, वे तुम्हें हजार गुना देगा. अंदर वाले भिखारी के पास खाना, कपड़ा छत, दवाएं सबकुछ है जबकि बाहर वाले के पास कुछ नहीं है. वह अंदर वाले का एजेंट बना बैठा है और मानवीय सहायता करने के गुण का दुरुपयोग करता है.

कोई यह सवाल नहीं करता कि ईश्वर को धन की जरूरत ही क्या है? ईश्वर के पास कौन सा बैंक है जो दस रुपए के इन्वैस्टमैंट के बदले में हजार रुपए देता है? धार्मिक स्थलों की भीड़ में शामिल लोगों के पास तर्कशक्ति नहीं होती. इतना विवेक भी नहीं होता जो वे खुद से यह सवाल पूछ सकें. आखिर पुरोहितों के लिए धन इतना जरूरी क्यों है? भगवान के एजेंटों का खर्च तो भगवान को ही उठाना चाहिए. मंदिर और मसजिद के निर्माण में जनता के खूनपसीने की कमाई क्यों खर्च की जाए? क्या ईश्वर या अल्लाह अपने लिए मंदिरमसजिद नहीं बनवा सकता?

फल, फूल, किसी जानवर के खाने लायक मांस, अनाज, घरेलू सामान, कपड़ा, मकान सब अपनेआप आदमी के हाथ नहीं लगते. हरेक के लिए कठिन मेहनत करनी होती है. कुछ चीजों के लिए तो वर्षों लग लाते हैं. कुछ चीजों को बनाने की कला सीखने में पीढि़यां लग जाती हैं. धर्मस्थल के अंदर दान पाने वाले लोग इन्हें मुफ्त में पा जाते हैं. बाहर बैठे भिखारी इस दान की महिमा गाते रहते हैं.

ये अंदर वालों के प्रचारक होते हैं. बाहर और अंदर मुफ्त सामान पाने वाले यह नहीं सम झते कि मंदिर, मसजिद, चर्च, मठ आसमान से अपनेआप नहीं उतरते, इस के लिए मानव श्रम व बुद्धि की जरूरत होती है. वे मुफ्त के इस माल को ईश्वर का दिया कह कर आम लोगों को बरगलाते हैं. वे बारबार कहते हैं कि ईश्वर इस के बदले उन का घर भरेगा जबकि तथाकथित ईश्वर तो किसी मंदिर, मसजिद, चर्च, मठ को बिना मानवीय श्रम के दान के बनवा ही नहीं सकता.

भिखारी और दानी

भिखारी और दानी दोनों एकदूसरे की जरूरत हैं. भिखारी दानियों को पैदा करता है और दानी लोग मिल कर भिखारियों की भीड़ बढ़ाते हैं. मतलब, दोनों प्रजातियों का अस्तित्व एकदूसरे पर निर्भर है.

विकसित देशों में दान, पुण्य और परोपकार की संस्कृति कम है, इसलिए वहां गरीबी, बेबसी, भूख, कुपोषण और अन्याय भी नहीं है. यही कारण है कि पश्चिम के लोग मानव विकास में हम से कहीं आगे हैं. जब तक इन देशों में ईश्वरीय दान की महिमा थी, ये देश भी गरीब देशों की तरह भूख, बीमारी, महामारी, ठंड, गरमी के कारण त्रस्त रहते थे. आज उन्होंने श्रम के मूल्य के महत्त्व को सम झ लिया है.

दान की शब्दावली

कुछ धार्मिक देश, जहां मुफ्त का मानव श्रम या किसी आवश्यक वस्तु का प्राकृतिक भंडार नहीं है, आज भूख और बीमारी के बुरी तरह शिकार हैं. उन का ईश्वर उन से लड़नेमरने या भूख व बीमारी के जरिए उन की जान लेता है पर उन के दान के बदले उन्हें देता कुछ नहीं है. ये देशदुनिया के नक्शे पर हैं इसलिए कि यहां के लोग भी अपने श्रम से, ईश्वर की कृपा के बिना, कुछ न कुछ करते हैं व जी भी रहे हैं और उन की संख्या कम भी नहीं होती. सभ्यता ने उन्हें इतनी तकनीक दे दी है कि एक व्यक्ति के श्रम से चारपांच लोग जी सकें चाहे जिंदगी जानवरों जैसी ही हो. शब्दों की भी अपनी फिलौसफी होती है. हर शब्द का अपना मनोविज्ञान होता है. दान, पुण्य और परोपकार जैसे शब्दों के पीछे भी फिलौसफी है और मनोविज्ञान है जिसे सम झने की जरूरत है.

हमें यह सम झना होगा कि सृष्टि के हर तत्त्व में कुछ गुण होते हैं जिन से उस की पहचान होती है. जैसे शेर का गुण है कि वह हिरण को मार कर खाता है तो उस का यह गुण उस की पहचान भी है और उस के अस्तित्व के लिए जरूरी भी. इसी तरह मानव के भी कुछ गुण हैं जो उसे दूसरे जीवों से अलग बनाते हैं. मानव होने का सब से बड़ा गुण है मानव का सामाजिक होना. करोड़ों वर्षों के विकासक्रम के दौरान इंसान एक सामाजिक प्राणी बना. मनुष्य ने जाना कि सामाजिकता से ही वह सुरक्षित रह सकता है और उन्नति कर सकता है. इस तरह आगे चल कर मानव प्रजाति के अस्तित्व में बने रहने के लिए उस का सामाजिक प्राणी बने रहने का गुण ही उस की सब से बड़ी जरूरत बन गई.

सामाजिक प्राणी होने से सामूहिक चेतना का विकास हुआ. खानाबदोश जीवन में संघर्ष के दौरान ज्यादा श्रम के बदले उसे थोड़ाकुछ मिलता था तो सामाजिक हो जाने के बाद कम श्रम के बदले ज्यादा कुछ मिल जाता था. इस से इंसान का बहुत सारा समय बच जाता था. इस नए सामाजिक तानेबाने का मानव पहले से ज्यादा सुरक्षित था, जिस से उस के लिए बौद्धिक उन्नति के मार्ग खुल गए. कुछ लोग जो सामाजिकता की इस संस्कृति में फिट नहीं बैठते थे. वे अराजकता पैदा करते थे. सो, डर, भय, दंड और लालच द्वारा समाज के इन अराजक तत्त्वों को काबू में किया जाता था. कुछ लोग प्राकृतिक आपदाओं की वजह से मुख्यधारा से पिछड़ जाते थे तो सहयोग की संस्कृति द्वारा उन पिछड़े हुए लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा जाता.

इस तरह शुरुआती सामाजिक नियमों का निर्माण हुआ और भय, लालच, दंड और सहयोग की परंपरा का विकास हुआ. और यहीं से सहयोग मानव का गुण बन गया जो मनुष्य के सामाजिक प्राणी बने रहने के लिए बेहद जरूरी था. सामाजिक प्राणी बनाए रखने में राजाओं के कानून का हाथ ज्यादा रहा, धर्म के नियमों-उपदेशों का कम. धर्म तो दंड मृत्यु होने के बाद देते हैं. तमाम धर्म स्वर्ग व नर्क की बात करते हैं, हिंदू और बौद्ध धर्म पुनर्जन्म की जो इस जन्म के कर्म पर आधारित होता है.

आगे चल कर आबादी बढ़ी तो समाज की जरूरतें भी बढ़ीं और सामाजिकता को व्यवस्थित रखने की चुनौतियां भी. इस से कई बड़ीछोटी सभ्यताओं का उदय हुआ. प्रत्येक सभ्यता के नए नियमकानून बने जो आगे चल कर परंपराओं में बदल गए. जैसेजैसे मानवता समृद्धि की ओर बढ़ी, सामाजिकता को बनाए रखने के लिए नए नियमों की जरूरत भी बढ़ती चली गई. मनुष्य के यहां तक पहुंचने में समाज की सब से अहम भूमिका थी.

इसलिए मनुष्य ने समाज की इस अहमियत को हर युग में पहचाना और परिष्कृत किया. सामाजिक भावनाओं ने सामाजिक वर्चस्व की मानसिकता को जन्म दिया जिस से एक इंसानी समाज दूसरे इंसानी समाज से होड़ करने लगा. सामाजिक वर्चस्व की इसी मानसिकता के कारण सभ्यताएं साम्राज्यों में बदलीं और साम्राज्यवाद का उदय हुआ जिस की वजह से लाखों युद्ध हुए. इस भयंकर अराजकता में अपनेअपने वर्चस्व के लिए सभी साम्राज्यों को फिर से नए नियमों की जरूरत पड़ी.

इसी दौरान धर्मों के उपदेशों से करुणा, मैत्री, सद्भाव, अहिंसा और क्षमा जैसे शब्द भी इंसानी सभ्यताओं का हिस्सा बने. ये पहले उस काल्पनिक ईश्वरीय शक्ति के लिए उपयोग किए जाते थे जिसे बिचौलियों ने चुना था. आगे चल कर ये तमाम शब्द इंसान के सामाजिक प्राणी होने के गुण बन गए. जिन में इन मानवीय गुणों का अभाव होता वह समाज के लिए खतरा बन जाता. इसलिए लगभग सभी सभ्यताओं ने मानवीय गुणों को स्वीकार कर लिया और आगे चल कर इन्हीं मानवीय गुणों की विवेचना अनेक दार्शनिकों ने की और इसी मानवीय दर्शन पर बड़ेबड़े दर्शनशास्त्र लिखे गए.

इन तमाम मानवीय शब्दों के पीछे की फिलौसफी और इन के पीछे का मनोविज्ञान यही था कि सामाजिक व्यवस्था में अराजकता खत्म हो और मानवता निर्बाध रूप से आगे बढ़ती चली जाए. ये तमाम शब्द एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान के शोषण के खिलाफ ही बने थे ताकि सामाजिकता कायम रहे, समाज का हर इंसान समाज में खुद को सुरक्षित महसूस करे और प्रत्येक मनुष्य सामाजिक उत्थान में उपयोगी साबित हो सके. खेद इस बात का रहा है कि ये शब्द कोरे हवाहवाई रह गए क्योंकि उन्हें कहने वाले धर्मों और उन के कहने पर चलने वाले राजाओं ने अपने से अलग लोगों को हिंसा, अत्याचार का निशाना बनाया. उन्होंने अपने ही कमजोर लोगों और सभी स्त्रियों को निशाना बनाया.

लंबे वक्त तक फिर से इंसानी समाज करुणा, मैत्री, सद्भाव, अहिंसा, क्षमा और सहयोग जैसे मानवीय गुणों के सहारे आगे बढ़ता चला गया. इन्हीं मानवीय गुणों की बदौलत ही इंसानी सभ्यताओं ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, लोकतंत्र और न्यायव्यवस्था की नई इबारतें लिखीं जिन पर चल कर आज हम यहां तक पहुंचे हैं लेकिन इतिहास के हर पड़ाव पर राजाओं और धर्मगुरुओं ने इन व्यवस्थाओं में विकार पैदा किया. लूट,  झूठ, शोषण और पाखंडवाद की मानसिकता ने सामाजिक तानेबाने को विकृत रूप दे दिया. जिस में औरतें सब से बड़ी शिकार थीं.

इस संस्कृति ने संपन्नता और विपन्नता की खाई को पैदा कर दिया. जब समाज में उत्पादन बहुत होने लगा तो समाज का एक हिस्सा सभी संसाधनों का मालिक बन बैठा, जिस से एक बहुत बड़ा वर्ग इन संसाधनों की पहुंच से दूर छिटक कर हाशिए पर जा पहुंचा. मिस्र के फैरो के शुरू में जो हिंदू पौराणिक कहानियों तक में अमीरों की ही बात की गई जिन्होंने करुणा, मैत्री, सद्भाव का नहीं बल्कि दान और टैक्स का भरपूर प्रचार किया. सो, मंदिर बने, महल बने.

जनता के बड़े वर्ग को काबू में रखने के लिए समृद्ध वर्ग तीन भागों में विभाजित हुआ. राजनीतिक वर्ग, धार्मिक वर्ग और पूंजीपति वर्ग. तीनों के आपसी गठजोड़ ने इस सामाजिक असंतुलन को बरकरार रखने के लिए कई नए नियम रच डाले ताकि वंचित वर्ग में कभी विद्रोह की भावना पैदा न हो सके. दान और टैक्स की महिमामंडन इस का बड़ा हिस्सा था. इन दोनों के कारण एक बड़ा वर्ग भिखारी बन गया. पाकिस्तान की 25 करोड़ जनता में से 4 करोड़, वहां के समाचारपत्र डान के अनुसार, भीख मांगने का धंधा करती है. हमारे यहां तो गिनती भी नहीं होने देते कि उन में दान पाने वाले न आ जाएं.

परोपकारियों का जमावड़ा

समाज ऐसे दानवीर, दयावान, पुण्यात्मा और परोपकारी महात्माओं की भीड़ से भर गया जिन में दया तो थी लेकिन वे परिस्थितियों को नहीं बदल सकते थे. वे दान तो दे सकते थे लेकिन उत्थान नहीं कर सकते थे. वे पुण्य तो कर सकते थे लेकिन परिवर्तन करने की क्षमता उन में न थी. वे परोपकार तो कर सकते थे लेकिन किसी अभागे का समय नहीं बदल सकते थे क्योंकि महानुभावों की यह विशाल भीड़ ईश्वर के नियमों से बंधी थी.

ये महानुभाव मानते थे कि हालात में बदलाव करना उन के बस की बात नहीं है. वे तो बस, महान बनने के लिए पैदा हुए हैं और सदा महान बने रहने के लिए उन्हें दानी, दयालु, पुण्यात्मा और परोपकारी बने रहना जरूरी है. दान, दया, पुण्य और परोपकार के लिए ऐसे लोगों की भी जरूरत है जिन पर दया, दान, पुण्य और परोपकार कर महान बना जा सके.

इसी मानसिकता ने गरीबी कभी खत्म नहीं होने दी क्योंकि गरीब और गरीबी के प्रति जो मानवीय संवेदनाएं होनी चाहिए वे दान, दया, पुण्य और परोपकार की मानसिकता के कारण कभी पनपी ही नहीं. करुणा, सहयोग, न्याय और संवेदनशीलता के मानवीय गुण को हम ने दया, दान, पुण्य और परोपकार में बदल दिया जिस से एक मानव की दूसरे मानव के प्रति कर्तव्य की भावना समाप्त हो गई और एक मानव दूसरे के लिए महान बनता चला गया.

दान, पुण्य और परोपकार की भावना से पैदा होती है गरीबी

हम ने करुणा, मैत्री, सद्भाव और सहयोग के मानवीय गुण को त्याग कर दान, दया, पुण्य और परोपकार का मार्ग अपना लिया जिस से परिस्थितियों में बदलाव की जरूरत ही खत्म हो गई क्योंकि दान, दया, पुण्य और परोपकार की इस मानसिक प्रवृत्ति से शोषक और शोषित दोनों वर्ग संतुष्ट हो गए. एक का मुफ्त में पेट भरने लगा और दूसरा पराए पर किए गए इस उपकार से महान बनने लगा.

इसी मानसिकता ने भीख, भंडारा, जकात, इमदाद और खैरात जैसी कुत्सित सोच को जन्म दिया जिस के द्वारा समृद्ध तबका परस्पर सहयोग की भावना से आजाद हो कर महान हस्ती की श्रेणी में पहुंच गया. महान बनने की इसी होड़ की वजह से गरीबी और गरीबों की जरूरत बनी रही और गरीबी बहुसंख्यक आबादी की सोच और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन कर सदा के लिए स्थायी हो गई.

दान और भीख पाने वाला निकम्मा होता गया. दान और भीख देने वाले को व्यापार और उद्योग के सहारे जनता को लूटने का लाइसैंस मिल गया. लोग भूखे न मरें, इस के लिए मंदिरों के साथ गरीबों को दान करने की आदत डाल दी गई जो धर्म और राजा के टैक्स के अलावा अपनी इच्छा के अनुसार दिया गया पैसा होता है.

हालात कैसे बदलेंगे

देश बनता है गांवों से, कसबों से. लेकिन गांवोंकसबों की स्थिति जा कर देख आइए, चारों ओर बदहाली, परेशानी और लाचारी का अंबार मिलेगा. गांवों के सक्षम लोग कसबों में बस गए. कसबों के सक्षम लोग शहरों की ओर भाग गए और शहरों के सक्षम के लोग विदेशों में जा कर बस रहे हैं. कोई अपने मूल स्थान के हालात को बदलने के लिए कुछ नहीं करता. लेकिन मंदिरों में भंडारा बांट कर लोग परोपकार खूब करते हैं.

विदेशों में बसने वाले लोग जब वहां की मानवतावादी सभ्यता में रचबस जाते हैं तो सदा के लिए वहीं के हो कर रह जाते हैं क्योंकि उन देशों में सामाजिक सुरक्षा, न्याय और परस्पर सहयोग की उत्कृष्ठ व्यवस्था कायम है जिस में उन्हें अपनी पीढि़यों का भविष्य सुरक्षित नजर आता है. उन देशों में रहने वाले भारतीय लोग कभी यह नहीं सोचते कि हमारा देश ऐसा क्यों नहीं बन सकता.

दान की मनोवृत्ति परस्पर सहयोग की भावना को खत्म कर देती है. पुण्य की मानसिकता से परिवर्तन की आवश्यकता खंडित होती है और परोपकार की सोच से एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के प्रति कर्तव्य की सार्थक चेष्टा नष्ट हो जाती है. मानवता के विकास में करुणा, सहयोग परिवर्तन और कर्तव्य की अहमियत है. इस के उलट, दान, पुण्य और परोपकार की मानसिकता मानवता के मार्ग में बाधक ही साबित होती है.

अगर हम मानवता के वास्तविक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं तो हमें मानवता के बुनियादी उसूलों को ही अपना धर्म बनाना होगा जिस में एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति कर्तव्य सर्वोपरि होगा. तभी हम समता, न्याय, प्रेम, सहयोग और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था कायम कर पाएंगे और फिर उस नई मानवीय व्यवस्था में दान, पुण्य और परोपकार जैसी मनोवृत्ति के लिए कोई जगह न होगी.

साजिश के तहत पैदा की गई गरीबी

राजनीतिक गिरोह ने वंचित तबके को शारीरिक व सामाजिक सुरक्षा और कुछ सुविधाओं के नाम पर हमेशा भ्रम में रखा तो धार्मिक गिरोहों ने उसे सम झाया कि तुम्हारे दुखों की असली वजह तुम्हारा भाग्य है या ईश्वर की नाराजगी है. तुम्हारे वर्तमान के दुख पिछले जन्म का परिणाम हैं. सुख भोगने वाले लोगों ने दुख भोगने वाले लोगों को सम झाया कि आज अब उन के जीवन में दुख ही दुख है तो मरने के बाद स्वर्ग में या अगले जन्म में सुख ही सुख होगा. अल्लाह को गरीब पसंद हैं, जितना दुख  झेलोगे, खुदा आखिरत में इंसाफ करेगा और तुम्हें जन्नत में उस से बेहतर सुखसुविधाएं प्रदान करेगा जिस की चाह तुम दुनिया में रखते हो.

इस तरह के विचारों के ओवरडोज में गरीब की पीड़ा खत्म हो गई और वह गरीबी को एंजौय करने लगा. बहुसंख्यक शोषित वर्ग मुफलिसी में मुसकराना सीख गया और फिर शासक और शोषक वर्गों द्वारा बनाई गई विघटनकारी नीतियों का शिकार हो कर शिक्षा, न्याय, समता और उन्नति के मार्ग से सदा के लिए दूर हो गया. सभ्यता की नींव का हिस्सा दया, दान, सहयोग और परोपकार की मानसिकता को लूट का हथियार बना डाला गया, जिस के सहारे वंचित समाज में शोषक वर्ग के प्रति प्रतिकार की भावना को खत्म कर दिया गया और वंचित समाज में इस लूट का विरोध करने की जगह लुटेरे के प्रति कृतज्ञता का भाव भर दिया गया.

समाजसेवी संगठनों की बढ़ती तादाद

आज इसी मानसिकता की वजह से देश में 31 लाख रजिस्टर्ड एनजीओ खड़े हो चुके हैं जो दया, दान, पुण्य और परोपकार की मानसिकता को साथ ले कर ‘महान’ कार्य करने में जुटे हुए हैं. देश में स्कूलों की संख्या 15 लाख है और इन गैरसरकारी संस्थाओं की संख्या 31 लाख. दुनिया के कई देशों की आबादी से ज्यादा तो हमारे देश में समाज सुधारने वाले संगठन काम कर रहे हैं. फिर भी स्थिति जस की तस है क्योंकि गरीब और गरीबी दूर करने वाली इन सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं के पास योजनाएं तो बहुत हैं लेकिन उन योजनाओं में संवेदनाएं सिरे से गायब हैं.

जो देश मानवता के सब से उत्कृष्ट पायदान पर खड़े हैं वहां के कल्चर में दया, दान, पुण्य और परोपकार की मानसिकता नहीं है, इसलिए न तो वहां थोक के भाव में महात्मा पैदा होते हैं और न ही वहां समाज सुधार करने वाले लाखों संगठनों की जरूरत पड़ती है. फिर भी वहां गरीबी, कुपोषण, लाचारी और अन्याय का नामोनिशान नहीं है क्योंकि उन की सभ्यता वास्तविक मानवीय गुणों को सम झती है जो करुणा, मैत्री, सद्भाव, न्याय, समानता और सहयोग पर आधारित है. इन्हीं सारे शब्दों को मिला कर एक शब्द बनता है मानवता. और जहां दया, दान, पुण्य और परोपकार होता है वहां मानवता के ये सभी गुण निष्क्रिय हो जाते हैं.

एक परोपकारी अगर जीवनभर भंडारा चलाए तो उस से किसे फर्क पड़ता है? भंडारा खा कर उसे सुबह शौच में बदलने वाली जनता वैसी की वैसी बनी रहती है और भंडारा चलाने वाला वह आदमी महान हो जाता है. सड़कों पर भीख मांगते लाखों बच्चों को मिठाई खिलाने के बजाय आप इन में से मात्र एक बच्चे को भी शिक्षित कर कामयाब बना दें तो आगे चल कर वही बच्चा कइयों को गुरबत के भयंकर दलदल से बाहर निकाल सकता है. इसे ही वास्तविक परिवर्तन कह सकते हैं और यही संवेदनशीलता गरीबी की इस भयंकर समस्या को सदा के लिए मिटा भी सकती है. वरना मिठाई खिलाखिला कर दया, दान, पुण्य और परोपकार करते रहिए, कुछ नहीं होगा. हां, आप महान जरूर बन जाएंगे.

ठीक ऐसे ही जकात, खैरात, इमदाद बांटने वाली मानसिकता से भी हालात नहीं बदलते. जो जितना जकात देता है वह उतना ही बड़ा दानी तो हो जाता है लेकिन गरीब मुसलमानों के हालात नहीं बदलते. ग्रीनलैंड की पूरी आबादी के डेढ़ गुना यानी करीब 73 हजार बच्चे राजधानी दिल्ली की सड़कों पर भटक रहे हैं और इसी राजधानी में करोड़पतियों की संख्या इन बच्चों से ज्यादा है. अगर एक करोड़पति परिवार एक बच्चे की ही जिम्मेदारी उठा ले तो इन 73 हजार बच्चों का भविष्य सुधर सकता है. लेकिन ऐसा वे क्यों करेंगे? उन के पास जो है वह उन के ‘परमात्मा’ ने दिया है तब वे अपने उस खुदा की भक्ति क्यों न करें जिस ने उन्हें धनवान बनाया है, और उन के अनुसार, सड़कों पर भटकते ये बच्चे अपने पिछले जन्मों का कर्मफल ही तो भोग रहे हैं.

फिर ये लोग अपने ईश्वर की बनाई इस व्यवस्था से खिलवाड़ भला कैसे कर सकते हैं? देश को गुरबत की सड़ांध में धकेलने के लिए यही मानसिकता जिम्मेदार है और इस मानसिकता के लोग ही दया, दान, पुण्य और परोपकार पर आधारित इस व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं. इसी वजह से इस सनातन विकृति में कभी परिवर्तन नहीं हो पाता. Religious loot

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Sports And Politics: भारत पाक मैच और आतंकवाद

Sports And Politics: कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकवादियों द्वारा 26 सैलानियों की बर्बर हत्या किए जाने को ले कर पाकिस्तान के साथ अब क्रिकेट मैच खेलने पर विवाद खड़ा करना कोरी छिछली राजनीति है. पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडि़यों को आतंकवादी घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना धर्मों ने बचपन से सिखाया है, जब कहा जाता है कि अगर बारिश नहीं हुई तो किसी के पाप का दंश है या कोई रेल दुर्घटना हुई तो कहा जाता है कि किसी पूजा में कमी है.

किसी एक घटना के लिए, जिस में खुद दोषी हों या प्रकृति का कहर हो, दूर के किसी जने को दोषी ठहराना ऐसी सोच है जिस का न कोई सिर है न पैर. अपने को खुश करने के लिए बिना लक्ष्य और तर्क के जम कर इस बहानेबाजी को इस्तेमाल किया जाता है.

दुबई में आयोजित एशिया कप क्रिकेट टूर्नामैंट में भारत ने पाकिस्तान को हराया पर जीत के बावजूद भारतीय खिलाडि़यों का पाकिस्तानी खिलाडि़यों के साथ, औपचारिकता के लिए ही सही, हाथ न मिलाना वैसा ही था जैसा 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में हिटलर का काले ऐथलीट जेसी ओवेन्स के साथ खड़े न होना था जो अमेरिकी टीम में था.

इन भारतीय खिलाडि़यों से ज्यादा समझदार तो जयपुर के नीरज उधवानी का परिवार है जिस की 22 अप्रैल को हत्या कर दी गई थी. उस के परिवार ने कहा है कि पहलगाम की घटना और क्रिकेट मैच दोनों अलग विषय हैं और दोनों को जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए. इस परिवार ने घर का सदस्य खोया जिस की नईनई शादी हुई थी और उस का दर्द आमजन समझ नहीं सकता.

दुबई में इस मैच को खेलने से पहले देशभर में लंबी बहस चली थी कि जिन्होंने हमारे साथ गद्दारी की उन के साथ खेल खेला जाए या नहीं. भारत ने 22 अप्रैल की घटना में अपनी सुरक्षा की कमी को छिपाने के लिए पूरे पाकिस्तान को बिना किसी दलील के मुजरिम ठहरा दिया.

हमारे यहां कितने ही घरों में असामयिक मौत होने पर किसी नई बहू या नए बच्चे को दोषी ठहराना आम है. यूरोप में प्लेग, हैजा, टायफायड जैसी बीमारियों के लिए डायनों को जिम्मेदार दशकों तक माना गया और चर्च के पादरियों के कहने पर सैकड़ों औरतों को हर साल चौराहों पर जिंदा जला दिया जाता था.

दरअसल, जब से धर्म पैदा हुए हैं और कुछ लोग उन के मालिक बन बैठे हैं जिन्होंने खुद को ईश्वर का एजेंट बता रखा है, तब से हर मुसीबत के लिए ईश्वर या धर्मगुरु पर पड़ने वाले दोष को किसी और पर मढ़ने की चाल चली जा रही है. ईश्वर के एजेंट हमेंशा विश्वास दिलाते रहते हैं कि उन्हें पैसा देते रहो, पूजा करने उन के मंदिर, मठ, मसजिद, चर्च में आते रहो, कष्ट भगाने के लिए वे ईश्वर से कहते रहेंगे, उस की अराधना करते रहेंगे.

अब कुछ बुरी घटनाएं तो घटेंगी ही. जब ऐसी घटनाएं घटती हैं तो उन्हें सहज स्वीकारना अंधभक्तों को पसंद नहीं आता, ऐसे में ये एजेंट किसी और को जिम्मेदार ठहरा देते हैं. यह जना अपनों में से एक कमजोर हो सकता है, दूसरे धर्म का हो सकता है, दूसरे राज्य का हो सकता है या दूसरे रंग का हो सकता है.

एजेंटों के ऐसा करने से धर्मों को लाभ होता है क्योंकि वे आफत में कमाई करते हैं. वे अपने भक्तों को एक विषम स्थिति के बदले दूसरी विषम स्थितियों में डाल देते हैं और फिर बिचौलिए बन कर खूब मजा करते हैं. दुबई में भारतीय टीम को यही करने को कहा गया था ताकि सरकार की कमी छिपाई जा सके. Sports And Politics

Role of Women in Religion : धर्म के टारगेट पर महिलाएं ही क्यों

Role of Women in Religion : अकसर धार्मिक कथावाचकों के सामने बड़ी संख्या में हाथ जोड़े महिलाएं ही दिखाई देती हैं. बावजूद इस के कि ये कथावाचक उन्हीं के बारे में अपने प्रवचनों में अनर्गल बातें करते रहते हैं. उन्हें कमतर तो दिखाया ही जाता है, साथ में पुरुषों के अधीन रहने जैसी बातें भी की जाती हैं. फिर भी महिलाएं इन के प्रवचनों को चाव से सुनती हैं, आखिर क्यों?

खुद को आध्यात्मिक गुरु बताने वाले कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने लिवइन को ले कर विवादित बयान दे डाला. उन्होंने कहा कि पहले 14 वर्ष की उम्र में शादी हो जाती थी तो लड़की परिवार में घुलमिल जाती थी जबकि आज लड़कियां लिवइन में रहती हैं और 4-5 जगह मुंह मारने के बाद ब्याह कर आई होती हैं. 25 वर्ष की अविवाहित लड़कियों का चरित्र ठीक नहीं होता. जब वे 25 वर्ष की जवान होती हैं तो जाहिर है कि वे फिसल जाती हैं. अनिरुद्धाचार्य लड़कियों की शादी की उम्र बतातेबताते सारी मर्यादा ही लांघ गए.  उन का लड़कियों की शादी की उम्र को ले कर यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. अनिरुद्धाचार्य के इस बयान से महिलाओं में आक्रोश है. लोगों का कहना है, उन के ऐसे बयान से महिलाओं की गरिमा आहत हुई है. देश के नागरिकों के साथसाथ कानूनी समुदायों ने भी इस टिप्पणी की आलोचना की है.

उन के इस बयान पर बौलीवुड ऐक्ट्रैस दिशा पाटनी की बहन और पूर्व आर्मी औफिसर खुशबू पाटनी ने कहा कि ‘ऐसे लोगों का तो मैं मुंह तोड़ दूंगी.’ खुशबू पाटनी ने यह भी कहा कि अगर ये शख्स मेरे सामने होता तो मैं इसे अच्छे से समझा देती कि मुंह मारना क्या होता है. इसे राष्ट्रविरोधी कहने में कोई हिचक नहीं है. जिस इंसान की सोच इतनी घटिया है उसे मंच मिलना ही नहीं चाहिए. खुशबू पाटनी ने सवाल उठाया कि ‘अगर कोई लिवइन में है तो क्या अकेली लड़की है? क्या लड़के शामिल नहीं होते? ऐसा बयान केवल महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए दिया गया है. क्या कोई संत ऐसा बोल सकता है, भला?

महिलाओं के बढ़ते आक्रोश को देख अनिरुद्धाचार्य सफाई देते हुए बोले कि उन के कहने का मतलब वह नहीं था बल्कि उन के विचारों को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है.

महिलाओं पर ओछी टिप्पणियां

सरल शब्दों में कहें तो आध्यात्मिक का अर्थ होता है एक ऐसा व्यक्ति जिस में संत के लक्षण हों, वाणी और व्यवहार में सादगी हो, सरलता हो और विनम्रता हो और जो सब के लिए समान भाव रखता हो, लोगों को सही राह दिखाता हो लेकिन आज के कुछ बाबा और संतों में वह बात नहीं है. बड़ेबड़े आसन पर विराजमान और सुखसुविधाओं से लैस ये बाबा अकसर महिलाओं को ले कर कुछ ऐसी बातें बोल जाते हैं जो अमर्यादित होती हैं.

अनिरुद्धाचार्य के बाद, अब मथुरा के जानेमाने संत प्रेमानंद महाराज ने युवाओं के चरित्र पर उंगली उठाते हुए कहा कि आज के पतिपत्नी एकदूसरे के साथ ईमानदार नहीं हैं. 100 में से दोचार लड़कियां ही पवित्र होती हैं. बाकी सभी बौयफ्रैंड के चक्कर में लगी हुई हैं. उन का कहना है कि आजकल की लड़कियों का चरित्र पवित्र नहीं है. वे छोटीछोटी पोशाकें पहन रही हैं. कैसेकैसे आचरण कर रही हैं. एक के बाद दूसरे, फिर तीसरे से ब्रेकअप करती हैं.

प्रेमानंद कहते हैं, ‘जब जबान पर चार होटलों में खाने की आदत पड़ गई हो तो घर का खाना कहां पसंद आएगा. जब चार पुरुष से मिलने की आदत हो गई है, फिर एक पति को स्वीकार करने की उन में हिम्मत नहीं होगी न, क्योंकि आदतें खराब हो गई हैं. आज अच्छी बहू या दामाद मिलना बहुत मुश्किल है.’ प्रेमानंद लिवइन को गंदगी का खजाना मानते हैं. उन का कहना है कि आज के बच्चेबच्चियां पवित्र नहीं रहे, दोचार को छोड़ कर, सब अपवित्र हो गए हैं.

इसी तरह बागेश्वर बाबा ने भी महिलाओं पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि स्त्री की शादी की दो पहचान हैं, पहली मांग में सिंदूर और दूसरी गले में मंगलसूत्र. जिस स्त्री के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर नहीं है तो समझ लो वह प्लौट खाली है और जिस महिला के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर है, समझ जाओ उस प्लौट की रजिस्ट्री हो चुकी है. उन्होंने ब्यूटीपार्लर को भी काफी कोसा कि उन्हें ज्यादा श्राप लगेगा जो जामुन पर इतना क्रीमपाउडर लगा देते हैं. उन का कहना है कि काली लड़कियां ब्यूटीपार्लर में जा कर गोरी बन जाती हैं. उन्हें महिलाओं का चटरपटर दिखना नहीं पसंद. उन का कहना है कि महिलाओं की पहचान उन के गुणों से होनी चाहिए, न कि रूप से.

वैसे, अनिरुद्धाचार्य महिलाओं को ले कर पहले भी विवादित बयान दे चुके हैं. उन के हिसाब से महिलाओं का ग्रेड होता है कि कौन सी महिला किस ग्रेड की है. जो महिलाएं अपने पति से झगड़ा करती हैं, वे थर्ड ग्रेड की हैं. उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को शांति बनाए रखने के लिए चुप रहना चाहिए. यानी उन का कहना है कि देश की आधी आबादी सिर्फ सुने, कुछ कहे नहीं. अनिरुद्धाचार्य का कहना है कि महिलाओं को नौकरी क्यों करना. जब पति कमा रहा है तो महिलाओं को नौकरी करने की जरूरत क्या. जो महिलाएं नौकरी करती हैं वे अपने बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं दे पाती हैं.

उन के हिसाब से जो महिलाएं पार्टी करती हैं या शराबसिगरेट पीती हैं, वे संस्कारी नहीं हैं. उन का कहना है कि महिलाओं को मर्यादित कपड़े पहनने चाहिए. उन्होंने तो यह तक भी कहा कि मां को अपने जवान बेटे के साथ और पिता को अपनी जवान बेटी के साथ अकेले में नहीं रहना चाहिए.

इतनी ओछी बातें उन के दिमाग में आती कहां से हैं, वह भी एक संत हो कर?

भारत के पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों ने महिलाओं को गुलाम बनाए रखने के लिए ही साल में कई सारे त्योहार बनाए, जिन में धर्म व पापपुण्य की दुहाई दे कर स्त्रियों को भूखे रहने के लिए बाध्य किया जाता है और जिन को पवित्र साबित करने के लिए उपवास का नाम दिया गया है. साल का ऐसा कोई महीना और सप्ताह नहीं जाता जब स्त्रियां उपवास न करती हों. मंगलवार, गुरुवार, अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी आदि अनगिनत अवसर आते हैं जिन्हें स्त्रियां अपने पति, बेटे के लंबी उम्र के लिए करती हैं लेकिन शायद ही कोई पुरुष अपनी पत्नी के लिए व्रतउपवास करता होगा.

धर्म का आधार?

यह कहना गलत नहीं होगा कि धर्म के माध्यम से ही औरतों को गुलाम बनाया गया. आज जब लड़कियां और महिलाएं आसमान छू रही हैं, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं तो यह बात कुछ पुरुष समाज को रास नहीं आ रही है. वे औरतों को फिर से गुलामी की जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं. उन्हें फिर से घर की चारदीवारी में कैद कर देना चाहते हैं. चाहते हैं, शादी कर के वे बच्चे पैदा करें और पति व सासससुर की सेवा करें क्योंकि यही एक महिला का धर्म है.

अपनी एक कथा में अनिरुद्धाचार्य ने कहा था कि औरत की मांग में सिंदूर भरते ही पति उस का मालिक बन जाता है और वह पति की संपत्ति बन जाती है. एक औरत कैसे जिए, क्या पहने, कहां जाए, कहां नहीं, नौकरी करे या नहीं, यह सब उसे उस का पति बताता है, क्योंकि उसे लगता है वह उस का मालिक है. सो, हर काम उसे पति से पूछ कर करना चाहिए.

एक पति ने अपनी पत्नी के साथ अंतरंग क्षणों का वीडियो सोशल मीडिया पर बिना पत्नी की सहमति के शेयर कर दिया और उसे अपने चचेरे भाई को भी भेज दिया. उसे लगा वह उस का मालिक है, जो चाहे कर सकता है लेकिन पत्नी ने इस पर एतराज जताया और उस ने पति के खिलाफ थाने में प्राथमिकी दर्ज करा दी. इस पर पति बहुत गुस्सा हुआ और उस ने प्राथमिकी को रद्द करने की मांग को ले कर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति ने कहा कि पत्नी पति की जागीर नहीं है, बल्कि वह एक स्वतंत्र व्यक्ति है, जिस के अपने अधिकार, इच्छाएं और निजता हैं.

एक धोबी के कहने पर सीता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्निपरीक्षा देनी पड़ी थी लेकिन इस के बावजूद राम ने अपनी पत्नी सीता को स्वीकार नहीं किया और उन्हें वनवास भेज दिया वह भी उस समय जब वे उन के बच्चे की मां बनने वाली थीं.

5 पति अपनी पत्नी द्रौपदी को जुए में हार गए. बात तो यही है कि पत्नी को एक संपत्ति के रूप में ही देखा जाता रहा है, जिसे जैसे चाहे यूज कर सकते हैं. कोई अपनी पत्नी को जुए में हार गए और किसी ने एक धोबी के कहने पर पत्नी को देशनिकाला दे दिया.

महिलाओं के चरित्र पर निशाना

फ्रांस की महारानी रिचारडे अपने पति लुईस द स्टाउट (839-888) द्वारा चारित्रिक संदेह किए जाने पर अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिए मोम में डुबोया हुआ एक गाउन पहन कर दहकती आग के ऊपर चलने को बाध्य की गई थी. सीता की तरह यह महारानी भी इस परीक्षा में सफल हो गई लेकिन उस ने अपने पति का ही त्याग कर दिया और उसे छोड़ कर एक महिला आश्रम में रहने चली गई.

कई सदियों से बेचारी ुमहिलाओं को ‘अग्निपरीक्षा’ जैसी स्थितियों से गुजरना पड़ा है, जोकि उन के चरित्र और पवित्रता को साबित करने के लिए एक कठोर परीक्षण है. यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं है, बल्कि एक ऐसी प्रथा है जो आज भी कुछ समुदायों में प्रचलित है, जहां महिलाओं को अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिए शारीरिक यातना सहनी पड़ती है.

कुछ समुदायों में ‘अग्निपरीक्षा’ आज भी एक प्रथा के रूप में मौजूद है, जहां महिलाओं को अपने चरित्र पर संदेह होने पर अग्नि में प्रवेश करने या अंगारों पर चलने जैसी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. यह परीक्षा महिलाओं के चरित्र और पवित्रता को साबित करने का एक तरीका है और अकसर सामाजिक दबाव या संदेह के कारण होती है लेकिन पुरुषों को कभी कोई ऐसी प्रथा से नहीं गुजरना पड़ता है.

महिलाओं को अग्निपरीक्षाएं आज भी देनी पड़ रही हैं लेकिन परीक्षण के तौरतरीके में बदलाव हो गया है. यहां सब से बड़ा सवाल है कि आखिर महिलाओं के संदर्भ में पवित्रता का मतलब क्या है और महिलाओं की पवित्रता का मालिक और रक्षक पुरुष ही क्यों है? महिलाओं के संदर्भ में ‘पवित्रता’ का मतलब महिलाओं की यौनिकता से जोड़ कर देखते हैं. पितृसत्तात्मक सोच है कि किसी भी महिला की कामुकता पर सिर्फ और सिर्फ उस के पति का ही हक है. यह इसलिए भी किया जाता है ताकि महिला पितृसत्ता द्वारा बनाए गए दायरों से बाहर न जा पाए.

अनिरुद्धाचार्य का कहना है कि सीता अति सुंदर थीं, इसलिए रावण उन्हें हर ले गया. द्रौपदी का अति सुंदर होना ही उन का चीरहरण का कारण बना. यानी दोषी यहां राम, रावण या कौरव-पांडव नहीं हैं बल्कि सीता, द्रौपदी का अति सुंदर होना था? तो क्या किसी का सुंदर होना या न होना व्यक्ति के अपने हाथ में है? उन का कहना है, स्त्रियों की सुंदरता उन के पति के लिए होनी चाहिए, न कि गैरमर्दों के लिए, वरना उन में और वेश्याओं में फर्क ही क्या रह जाएगा?

रामदेव ने भी महिलाओं को ले कर अभद्र टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि महिलाएं साड़ी और सलवारसूट में ही अच्छी लगती हैं और अगर वे कुछ न पहनें तो और अच्छी लगती हैं. बाद में उन्होंने अपने बयान पर माफी भी मांगी लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कब तक, कब तक महिलाओं को टारगेट किया जाता रहेगा? और क्यों नहीं ऐसी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों पर कोई कार्यवाही की जाती है? क्या एक माफी मांग लेने से बात खत्म हो जाती है?

वैसे, इन सब के लिए कुछ औरतें भी कम जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि ज्यादातर औरतें ही ऐसे सैल्फमेड बाबाओं को बढ़ावा देती हैं. आप ने देखा होगा, बाबाओं के प्रवचन और सत्संग में ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं.

अभी एक साल पहले ही हाथरस में भोले बाबा उर्फ सूरजपाल जाटव के सत्संग में शामिल हुए कई भक्त भगदड़ में मारे गए. उस भगदड़ में 121 लोगों की मौत हो गई थी. मरने वालों में 113 महिलाएं थीं. तो समझ सकते हैं कि ऐसे कर्मकांडों में ज्यादातर महिलाएं ही शामिल होती हैं. एक व्यक्ति का कहना है कि भोले बाबा उर्फ सूरजपाल के सत्संग में जो भगदड़ हुई उस में उस की मां घायल हो गई और ताई और मौसी की जान चली गई लेकिन इतने पर भी उस व्यक्ति की मां यह मानने को तैयार नहीं है कि इन सब में बाबा की गलती है. उस की मां का कहना है कि जब भी बाबा का सत्संग होगा, वह फिर जाएगी.

मीडिया रिपोर्ट बताती है कि सत्संग खत्म होने के बाद भोले बाबा उर्फ सूरज जाटव ने ऐलान किया था कि भक्त उन के जाने के बाद उन के पैरों की धूल उठा सकते हैं. भीड़ बेकाबू हो कर जब उन के पैरों की धूल लेने को आगे बढ़ी तो भगदड़ मच गई जिस से कई लोगों की जानें चली गईं.

यह उस भीड़ की ओर इशारा करती है जिस का जिक्र जरमन लेखक एलियस कनेटी ने अपनी किताब ‘क्राउड्स एंड पावर’ में किया था. वे लिखते हैं कि धर्म एक आज्ञाकारी भीड़ चाहती है. लोगों की ऐसी भीड़ जिसे भेड़ माना जाए और उन की विनम्रता के लिए उन की प्रशंसा की जाए.

जर्नल साइंस की एक रिसर्च बताती है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएं जादुई घटनाओं, चमत्कार, किसी अनहोनी जैसी चीजों पर अधिक भरोसा करती हैं. इस के पीछे उन की परवरिश होती है. रिसर्च के मुताबिक, पुरुष हमारे समाज में इस तरह से बड़े होते हैं जहां उन्हें तर्कसंगत होने और निर्णय लेने के लिए भावनाओं या भावनाओं के उपयोग से इनकार करने के काबिल बनाया जाता है. इसलिए वे किसी चीज पर तुरंत भरोसा करने की जगह विश्लेषण और सोचविचार करने को प्राथमिकता देते हैं, जबकि महिलाओं में ऐसी बात नहीं होती है.

जानकारी के अभाव में महिलाएं बाबाओं के चंगुल में फंसती चली जाती हैं और बाबा खुद को भगवान का दूत बता कर अपना उल्लू सीधा करते हैं. गुरमीत राम रहीम, नित्यानंद, आसाराम बापू आदि कुछ सैल्फमेड बाबा हैं जिन पर हत्या, फ्रौड और यौनशोषण के मामले दर्ज हैं लेकिन इतना होने पर भी बाबाओं की भक्तों में कमी नहीं दिखती और न ही इन बाबाओं पर उन के भक्त कोई आरोपप्रत्यारोप लगाते हैं.

नारीवादी लेखिका सिमोन द बोउवा लिखती हैं कि धर्म या धार्मिक कर्मकांड महिलाओं को नम्र बनने, असमानता और शोषण सहने के लिए प्रोसाहित करते हैं. उन्हें बताया जाता है कि अगर वे ऐसा करेंगी तो मरने के बाद उन्हें इस का फल मिलेगा. धार्मिक कर्मकांडों में शामिल होने और सत्संग जाने वाली महिलाओं को समाज ‘अच्छी महिलाओं’ की श्रेणी में रखता है.

डा. संजोत सेठ इस पूरे प्रकरण को सत्ता से जोड़ कर देखती हैं. वे कहती हैं, ‘‘हमारे समाज में महिलाओं के पास कोई सत्ता नहीं होती. उन्हें शुरू से यही सीख दी जाती है कि वे जितनी अधिक भक्ति में लीन होंगी, उन्हें उतना अधिक अच्छा माना जाएगा. उन्हें इस मापदंड पर तोला जाता है कि वे धर्म और भगवान के प्रति कितनी समर्पित हैं.’’

पूजा, सत्संग, प्रवचन कई महिलाओं के लिए अपने जीवन के खालीपन को भरने का एक जरिया भी हो सकता है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं को खुल कर अपनी बात कहने की, पढ़नेलिखने और अपने हिसाब से जीने की आजादी ही कहां दी. ऐसे में ये धार्मिक आयोजन इस खालीपन को भरने का जरिया बनता चला गया.

और, अब तो सोशल मीडिया और टीवी भी एक बड़ा माध्यम बन गया है जिस के जरिए ये बाबा लोगों के घरों तक पहुंच रहे हैं. कुछ महिलाएं न सिर्फ इन आयोजनों में शामिल होती हैं बल्कि इन बाबाओं से जुड़ा कंटैंट भी इंटरनैट पर देखती हैं.

महिलाओं का सब से अधिक शोषण धर्मों द्वारा ही किया गया लेकिन फिर भी ये सब से अधिक कर्मकांडों में उलझी होती हैं. उन्हें यह भान ही नहीं है कि जिन धार्मिक परंपराओं को वे मान रही हैं वह सब उन्हें गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र है.

 

 

Digital Life : पानी के बुलबुले जैसी सोशल मीडिया पोस्ट की जिंदगी

Digital Life : सोशल मीडिया मौजूदा दौर का नुक्कड़ भी है और कौफीहाउस भी, जहां आम से ले कर खास लोग तक अपनी बात कहते हैं लेकिन कुछ लोग भड़ास निकालते हैं जो अकसर तर्क और तथ्यहीन होती हैं. लिहाजा, कोई इस प्लेटफौर्म को गंभीरता से नहीं लेता. इस की हैसियत टाइमपास मूंगफली सरीखी होती जा रही है जो मोदीजी की मां को गाली दिए जाने पर भी देखी गई.

‘जीवन चार दिनों का मेला है’ की जगह अब कहना यह चाहिए कि ‘सोशल मीडिया पोस्टों की जिंदगी चार घंटे की होती है.’ एक पोस्ट मरती है तो दूसरी पोस्ट आ धमकती है लेकिन मोक्ष किसी को नहीं मिलता. वे आत्मा की तरह भटकती रहती हैं, बिलकुल इस भ्रम की तरह कि यही शाश्वत है, बाकी सब पोस्टें नश्वर थीं. मोदी की मां को गाली वाले एपिसोड का भी उम्मीद के मुताबिक यही हश्र हुआ.

मां की गाली बातबात पर दी जाती है, इसलिए अघोषित रूप से इसे ‘राष्ट्रीय गाली’ का दर्जा मिला हुआ है. इस मेलेझमेले में लोग यही सोचते रह गए कि क्या वाकई में राहुल गांधी नरेंद्र मोदी की मां को गाली देने जैसा छिछोरा और घटिया काम कर सकते हैं. पक्के से पक्के भक्त ने भी दिमाग से इसे सच नहीं माना क्योंकि इस पर तो कौपीराइट वे खुद के ही मानते हैं. किसी और को यह हक नहीं कि वह औरतों को यों बेइज्जत करे. उन की दिल की शंका को दूर किया उन दिमाग वालों ने जिन की तादाद 5 फीसदी के लगभग है. ये लोग एआई का इस्तेमाल करते हैं. ये वे लोग हैं जो न मोदी का भरोसा करते और न ही राहुल का करते हैं. ये ग्रोक, चैट जीपीटी और मेटा वगैरह को ही अपना बह्मा, विष्णु और महेश मानते हैं. यही उन की गीता, कुरान और बाइबिल हैं. जब इन से उन्होंने इस गाली कांड का सच जानना चाहा तो जवाब कुछ यों मोबाइल स्क्रीन पर नजर आया-

27 अगस्त : वोटर अधिकार यात्रा के दौरान कांग्रेस के स्वागत मंच से एक शख्स ने पीएम मोदी और उन की दिवंगत मां के बारे में अपमानजनक शब्द बोले. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव उस वक्त मंच पर नहीं थे पर घटना का वीडियो वायरल हुआ.

29-30 अगस्त : पुलिस ने आरोपी मोहम्मद रिजवी उर्फ राजा (कुछ रिपोर्टों में रफीक) को दरभंगा से गिरफ्तार किया.

2 सितंबर : पीएम मोदी ने पहली बार प्रतिक्रिया दी, कहा, ‘‘मेरी मां का अपमान देश की हर मांबहनबेटी का अपमान है.’’

2 सितंबर रात : पटना की एक अदालत में राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, मुकेश साहनी और मो. रिजवी के खिलाफ मानहानि का परिवाद दायर किया गया.

3 सितंबर : सुनवाई सूचीबद्ध हुई.

4 सितंबर : सुबह एनडीए ने बिहार बंद का आह्वान किया. आवश्यक सेवाएं/रेलवे को छूट.

गालीकांड यहीं खत्म सा हो गया. लेकिन भक्त सोशल मीडिया पर अपना धर्म निभाते गांधी परिवार और कांग्रेस को गालियां बकते रहे जो 11 सालों में उन्हें हनुमान चालीसा की तरह कंठस्थ हो गई हैं. करोड़ कोशिशों के बाद भी वे इसे ‘कट्टप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा’ और ‘रसोड़े में कौन था’ जैसा वजन नहीं दिला पाए. हाल तो यह है कि वे नींद में भी गांधी-नेहरू खानदान को गाली दे सकते हैं लेकिन उन्होंने या किसी ने भी यह नहीं सोचा (कभी औफलाइन हों और कुछ पढ़ेंलिखें तो सोच भी पाएं) कि आखिर गाली मां, बहन या बेटी की ही क्यों बकी जाती है, पत्नी की क्यों नहीं.

विषय गंभीर है. इस पर शोध होना चाहिए कि लोग दूसरे की मां, बहन या बेटी से तो शाब्दिक संबंध स्थापित कर लेते हैं लेकिन पत्नी को क्यों छोड़ देते हैं, जबकि, सनातन संस्कृति में पत्नी को छोड़ देना बड़ा पुण्य, पुनीत कार्य माना गया है. खुद मोदीजी इस का सब से बड़ा उपलब्ध उदाहरण हैं. इस तरफ न राहुल का ध्यान गया, न किसी और का.

जब यह उबाऊ सा रहस्य उद्घाटित हो गया कि गाली राहुल ने नहीं दी तो भक्तों को तसल्ली हुई कि राहुल ने उन की संस्कृति और धर्म से कोई छेड़छाड़ नहीं की है. अब लोग क्या खा कर इसे देशभर की महिलाओं का अपमान मान लेते. लिहाजा, वे इस मुद्दे से छुटकारा पाने के जतन सोचने लगे. कानूनन भी इस में कोई दम नहीं था क्योंकि गाली, मां की हो या कोई और, को बकने या देने पर आईपीसी की धाराएं 294, 504 और संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं को गाली देने पर 505 और 153 (ए) लगती हैं जिन में 3 महीने तक की सजा और मामूली ही जुर्माने की सजा का प्रावधान है.

इस दौरान गंगाजी का अरबों गैलन पानी बह गया और बिहार बंद फुस्स हो कर रह गया. न्यूज चैनल्स के एंकरों ने असफल कोशिश की कि यही चुनावी मुद्दा बन जाए तो रोजरोज की कसरत-कवायद से मुक्ति मिले. इस बाबत उन्होंने तरहतरह से कहा कि इंडी गठबंधन ने खुद अपनी कब्र खोद ली. अब बिहार की जनता कांग्रेस और आरजेडी को बख्शेगी नहीं लेकिन जनता ने इस मूर्खता में खास दिलचस्पी नहीं ली. उस की नजर में सब माएं बराबर हैं मोदी की कोई विशेष नहीं.

उधर भक्तों की टोली भी गफलत में आ गई थी क्योंकि कांग्रेसियों ने ग्रोक देव की कृपा से ही यह बताना और पोस्टें बना कर वायरल करना शुरू कर दिया था कि महिला अपमान में मोदीजी और भाजपाई कम गुरु नहीं जिन्होंने कभी सोनिया गांधी को कांग्रेसी विधवा कहा था. इन्होंने ही शशि थरूर की पत्नीनुमा प्रेमिका या प्रेमिकानुमा पत्नी को 50 करोड़ की गर्लफ्रैंड कहा था. यही लोग प्रियंका गांधी को शराबी कह कर प्रचारित करते हैं. इन से ज्यादा नीच और घटिया कौन होगा. ऐसे कोई डेढ़ दर्जन बयान जिन में ‘दीदी ओ दीदी’ और ‘ताड़का सी हंसी’ भी शामिल थी, आम हुए तो गालीकांड दम तोड़ता नजर आया.

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह की राख में हवन करने की कोशिश भी नाकाम हो गई, जिन्होंने यह कहते मोदी को घेरने की कोशिश की थी कि मोदीजी ने तो अपनी मां के निधन पर मुंडन तक नहीं कराया था और खुद को सनातनी कहते हैं. इस पर बेंगलुरु में एक आईटी कंपनी में नौकरी कर रहे रंजन सिन्हा की मानें तो दिग्विजय की बात में दम है क्योंकि किसी रिश्तेदार के मरने पर मुंडन करा लेने में हम बिहारियों का कोई मुकाबला नहीं. उधर, हमारे कटिहार में किसी का चचेरा दादा भी मरता है तो कनाडा में बैठा कुणाल भी इस डर से सिर मुंडा लेता है कि कहीं ऐसा न हो कि कजिन दादा प्रेत बन कर यहां कनाडा आ धमकें क्योंकि भूतप्रेतों को तो पासपोर्ट और वीजा की भी जरूरत नहीं पड़ती, फिर सगी मां की तो बात कुछ और ही है.

वैसे श्राद्ध के दौरान गयाजी में मुंडे घुटमुंडे ही नजर आए. असली सनातनी तो बरसी और श्राद्ध तक में मुंडन कराता है. 40-50 साल पहले तो गांव के गांव मुंडे हो जाते थे जिस से पता ही नहीं चलता था कि आखिर किस की मां या किस का बाप मरा है. यही हिंदू धर्म की एकता थी जो अब लुप्त होती जा रही है.

हुआ भी यही, 5 सितंबर से सोशल मीडिया पितृपक्ष की पोस्टों से भर गया. गालीकांड के कदमों के धुंधलाते निशान ही स्क्रीनों पर नजर आने लगे. पितृमोक्ष अमावस्या तक आम और खास लोग पंडों को पूरीहलवा खिलाते नजर आए. तरहतरह से हर तिथि पर श्राद्ध की महत्ता और विधि बताई जाती रहेगी. औनलाइन भी यह धंधा खूब फलफूल रहा है. इस के पहले पलभर के किस्से की तरह कितने मुद्दे आए और आ कर चले गए, किसी को याद नहीं. और जो याद है वह इतना भर है कि हम ने अमेरिका और ट्रंप को सबक सिखा दिया. विदेशी सामान के बहिष्कार की घोषणा और वायरल होती पोस्टों मात्र से अमेरिका घुटनों पर आ गया.

देश में यह हुआ कि ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ की गूंज भी कम हुई, एसआईआर तो कब का बुजुर्ग हो चुका था लेकिन नुकसान सत्तापक्ष का भी बराबरी से हुआ जो वह संशोधित जीएसटी स्लैब की वाहवाही, उम्मीद के मुताबिक, नहीं लूट पाया. लूटता भी कैसे, एक तो बात में ही दम नहीं था, दूसरे, बात को दम देने वाले यानी तिल का ताड़ बनाने वाले महारथी अभीअभी गणपति और गालीकांड का विसर्जन कर आराम कर रहे थे.

इन अंधभक्तों को धक्का इस बात से भी लगा था कि भारत ने दोगले चीन को फिर गले लगा लिया. इस पर अंधभक्तों ने उन को खूब घेरा और ताने कसे जिन के जवाब उन के पास नहीं थे क्योंकि नागपुर ने इस में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली थी और पीएमओ सहित भाजपा का आईटी सैल भी असमंजस में था कि नया शिगूफा क्या लाए. गाली से तो हमदर्दी मिली नहीं, उलटे, लोग यह ढूंढ़ने लगे थे और पूछने भी लगे थे कि आखिर राहुल ने गाली जब दी ही नहीं तो बेवजह ढोल फटवाने से फायदा क्या. इसलिए उन का ज्यादा फोकस पितरों वाली पोस्टों पर रहा.

उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही कुछ नई पोस्टें मार्केट में आएंगी लेकिन यह उम्मीद बिलकुल नहीं करनी चाहिए कि उन में तुक की या मुद्दों की कोई बात होगी. न तो कोई बेरोजगारी पर कोई मीम बनाएगा और न ही महंगाई और भ्रष्टाचार पर आंसू बहाएगा. ऐसा नहीं कि देश का युवा ऐसा कुछ नहीं चाहता हो, बल्कि है ऐसा कि वह सरकार से नाउम्मीद हो चुका है और उसे यह ज्ञान प्राप्त हो गया है कि सोशल मीडिया गपोडि़यों का अड्डा है जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता. इस पर लोग पोस्ट पढ़ते नहीं बल्कि आंख बंद कर फौरवर्ड करते हैं. महंगाई और रोजगार की समस्या इन फुरसतियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती. भले ही कोई छोटाबड़ा आंदोलन न हो लेकिन हम जवाब तो अब चुनाव में ही देंगे. Digital Life

 

 

Hindi Kahaniya : त्यागपत्र

लेखक – गायत्री ठाकुर, Hindi Kahaniya : ‘‘मौम घर में ही होंगी, वे भला कहां जा सकती हैं. डैड प्लीज, आप बच्चों जैसी बातें मत करो. हो सकता है वे किसी काम में व्यस्त हों,  इसलिए दरवाजा खोलने में देरी हो रही होगी. आप थोड़ी देर और प्रतीक्षा करें.’’

आरव, तुम मेरी बात नहीं समझ पा  रहे हो. मैं पिछले आधे घंटे से दरवाजे के बाहर खड़ा हूं, कितनी बार डोरबेल बजा  चुका हूं, लेकिन अंदर से कोई जवाब  नहीं आ रहा. ऐसा लग रहा है जैसे बाहर से डोरलौक कर के वह कहीं चली गई है.’’

‘‘डैड, हो सकता है मौम किसी के घर गई हो या फिर मार्केट या कहीं और गई हो, आप उन के मोबाइल पर कौल क्यों नहीं कर लेते?’’ फोन के दूसरी तरफ से आरव का झुंझलाता स्वर गूंज उठा था.

‘‘उसे कितनी बार कौल कर चुका हूं, फोन स्विचऔफ है,’’ कबीर ने अपनी परेशानी समझाने की कोशिश की. दिल्ली में अपने दोस्तों के साथ पार्टी एंजौय कर रहा उस का 20 वर्षीय बेटा आरव सिचुएशन की गंभीरता को समझने में असमर्थ था.

‘‘क्या आप ने मौम के किसी फ्रैंड को कौल कर के पता किया? हो सकता है उन में से किसी को कुछ पता हो. डैड, आप बेवजह परेशान हो रहे हो,’’ आरव  ने चिढ़ते हुए फोन कट कर दिया.

उस की शादीशुदा जिंदगी के 25 वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि वह औफिस से घर लौटा हो और नीता उस की प्रतीक्षा में घर के दरवाजे पर  खड़ी न  मिली हो. उन दोनों के बीच चाहे कितना भी झगड़ा, कितना भी वादविवाद हुआ हो, तब भी उसे इस प्रकार से घर के बाहर  प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. जाने कितनी बार उस ने नीता को भलाबुरा कहा था, उस के  आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचाई थी.  उस की बातों से आहत हो कर नीता ज्यादा से ज्यादा दोतीन दिन उस से बात नहीं करती, आंसू बहाती, नाराज रहती. उन दोनों के बीच फिर से सबकुछ नौर्मल  हो जाता था. आज  भी सुबह औफिस के लिए घर से निकलने से पहले उस की नीता के साथ लड़ाई हुई थी लेकिन उस ने नीता से ऐसा कुछ भी नहीं कहा था जो  गुस्से में आज से पहले कभी न कहा हो.

हां, वह उस पर क्रोधित हुआ था और वह उस पर क्रोधित होता भी क्यों न, कितने साल हो गए नीता को खाना बनाते हुए लेकिन आज तक उसे नमक के अनुपात का ज्ञान नहीं हुआ. नमक किस मात्रा में सब्जी में डालना चाहिए, इतने वर्षों में वह इतना भी नहीं सीख पाई. या तो सब्जी तीखी होगी या नमक इतना अधिक कि खाना गले से नीचे ही न उतरे.

उस की टाई, मोजे, रूमाल कभी भी उसे जगह पर नहीं मिलते, कितनी  बार  उस ने नीता से कहा था कि उस की चीजों को संभाल कर रखा करे लेकिन मजाल है कि कोई चीज उसे जगह पर मिल जाए. दो  दिन पहले ही कमीज के बटन को उस से टांकने के लिए कहा था लेकिन उस से इतना  सा  भी  काम  न  हुआ. दरवाजे और खिड़कियों पर नए परदे लगाने के लिए दरजी को बुला कर मेजरमैंट  दिलवाना  था. एक हफ्ता हो गया उसे यह काम सौंपे हुए लेकिन अभी तक यह काम  भी न  हुआ. ड्राईक्लीन में देने के लिए  उस के कपड़े अभी तक पड़े हुए थे. कोई भी काम नीता से वक्त पर नहीं होता. सारे दिन घर में बैठेबैठे पता नहीं क्या करती रहती है.

हां, वह मानता है कई बार उस ने उस के ऊपर अपनी कमाई की धौंस दिखाई है. आज सुबह भी गुस्से में उस से ऐसा ही कुछ कह दिया था. वह मानता है, उस का लहजा गलत था, वह उसे कमा कर खिलाता है. यह बात भी उस से उस ने  गुस्से में कही थी लेकिन इतनी सी बात पर वह घर छोड़ कर तो नहीं जा सकती. हां, वह जरूर आसपास ही कहीं गई  होगी. कबीर बाहर दरवाजे पर खड़ा मन ही मन यही सब सोच रहा था. उस के मन में नीता को ले कर तरहतरह की आशंकाएं और चिंताएं  उभरती  चली जा रही थीं.

नीता घर छोड़ कर चली गई होगी, इस बात पर उस का मन जरा भी विश्वास करने को तैयार नहीं था. हां, सुबह औफिस के लिए जब वह निकल रहा था तब नीता की क्रोध से  भरी आवाज उस के कानों में जरूर पड़ी थी. नीता ने कहा था कि वह सबकुछ छोड़छाड़ कर चली जाएगी लेकिन यह  क्रोध में कही गई बात थी. वह सच में तो ऐसा नहीं कर सकती.

नीता उस की प्रतीक्षा में घर पर ही होती थी. अगर कभी कहीं बाहर गई भी तो शाम तक वह उस के औफिस से लौटने के पहलेपहले घर आ जाती थी. एकदो बार तो ऐसा भी हुआ था कि उस के डोरबेल बजाने से पहले ही नीता ने घर का दरवाजा खोल दिया था. आश्चर्य में डूबा  हुआ वह उस की ओर  देखता रह गया था तब नीता ने मुसकराते हुए उस से कहा था, ‘तुम्हारे आने की सूचना मेरे दिल को पहले ही मिल चुकी होती है, इसलिए दरवाजे पर दस्तक देने की जरूरत नहीं.’ डोरबेल बजाने के लिए उठा हुआ हाथ उस ने पीछे खींच लिया था तब नीता के इस प्यारभरे अंदाज के बावजूद बेहद रूखेपन के साथ, बिना कोई प्रतिक्रिया दिए ही अंदर जा कर सोफे पर पसर गया था मानो जैसे उस की नजर में, उस के लिए दरवाजा खोलना नीता की सिर्फ ड्यूटी है और वह अपनी ड्यूटी ही कर रही है.

सोफे पर बैठेबैठे ही वह अपने जूते  उतारता, फिर अपने पैरों से ठेल कर उन जूतों को एक ओर सरका देता. औफिस के काम से हुई थकान की उद्घोषणा वह कुछ इस प्रकार से करता कि नीता उस के  हुक्म की तामील में एक सेविका की तरह जुट जाती थी. सुबह नीता के साथ हुए झगड़े व वादविवाद पर गहन विश्लेषण करने के बाद भी कबीर को ऐसी कोई बात नजर नहीं आ रही थी, ऐसा कोई सूत्र समझ में नहीं आ रहा था कि जिस के आधार पर वह नीता के घर छोड़ कर चले जाने की अपने मन में उठ रही आशंकाओं पर  यकीन कर सके.

चंडीगढ़ ऐसा शहर है जहां रात्रि 9:30 के बाद से ही शांति पसरने लगती है. पूरा शहर सुस्त पड़ने  लगता है. गरमी में  रात के वक्त थोड़ीबहुत चहलपहल  दिख भी जाती है, लेकिन ठंड के मौसम में तो बिलकुल सन्नाटा रहता है. सड़कों एवं बाजारों में भी लोगों की चहलपहल कम होने लगती है, दुकानें भी करीबकरीब बंद हो चुकी होती हैं. उस ने अपनी कलाई घड़ी पर नजर दौड़ाई तो उस के चेहरे पर चिंता की रेखाएं और भी गहरी हो गईं.

रात के 10:30 बज रहे थे, ऐसे में नीता भला कहां जा सकती है और कहीं गई भी, तो उस का फोन क्यों स्विचऔफ है. सोचसोच कर अब उस के दिमाग की नसें फटने लगी थीं. घर की दूसरी चाबी उस के पास नहीं थी. अपने पास घर की दूसरी चाबी रखने की उस ने कभी जरूरत महसूस ही नहीं की थी क्योंकि वह हमेशा से यही मान कर चलता आया था कि नीता घर पर ही होगी, उस के औफिस से लौट के आने तक, उस की प्रतीक्षा में दरवाजे पर खड़ी मिलेगी.

चंडीगढ़, सैक्टर-11 ए  का यह एरिया  इस वक्त बिलकुल शांति में डूबा हुआ था. शायद सभी अपनेअपने घरों में चैन की नींद सो रहे थे. ऐसे में किसी के घर जा कर दरवाजा खटखटाना भी उसे ठीक प्रतीत नहीं हो रहा था. कबीर बेचैनी में सड़क पर यहां से वहां चक्कर लगाने लगता है, उस का दिमाग इस वक्त बिलकुल काम नहीं कर रहा था. वह  यह  तय तक नहीं कर पा रहा था कि ऐसी  स्थिति में किसे फोन किया जाए, किस से पूछा जाए. आसपड़ोस के घरों में भी तो उस का आनाजाना, उठनाबैठना, नीता के  अपेक्षाकृत कम ही था. आसपड़ोस  के साथ मेलमिलाप का काम तो नीता ही किया करती थी. वैसे भी, सामाजिकता के मामले में पुरुष अकसर औरतों की  तुलना में कुछ कदम पीछे ही होते हैं.

तीन साल पहले ही तो वह जयपुर से तबादले के बाद चंडीगढ़ के सैक्टर 11ए  के मकान नंबर ‘ 80 ए’ में रहने आया था. उसे अपने आसपड़ोस की कोई खास जानकारी नहीं थी. सरकारी नौकरी में हर 3 साल पर उस का किसी नए शहर में तबादला होना आम बात थी. नए शहर में नए लोगों के साथ घुलमिल जाना उस के स्वभाव में नहीं था. लोगों के सुखदुख में भी वह कम ही शामिल होता था. जबकि, नीता का आसपड़ोस में उठनाबैठना होता रहता था. सो, आसपड़ोस की जानकारी  उसे नीता के माध्यम से ही मिलती थी.सउसे तो यह भी मालूम नहीं था कि सुरक्षा तथा आकस्मिक जरूरतों को ध्यान में रख कर घर की दूसरी चाबी नीता ने उस के किस पड़ोसी के पास रखी हुई है. अकसर लोग अपने घर की दूसरी चाबी पड़ोस में किसी के पास रख देते हैं.

किस से पूछे, किस से बात करे, कहां जाए? नीता के विषय में किस से जानकारी प्राप्त होगी? अगर सीधासीधा किसी से पूछ लिया, तो लोग कई सवाल करेंगे. उस से कुछ तय करते नहीं बन रहा था. इसी ऊहापोह की स्थिति में काफीकुछ सोचताविचारता वह बेचैनी के आलम में अपने घर के सामने के पार्क में टहलने लगता है.सउस के मकान के ठीक बगल में मिस्टर गिल का मकान था, जो पिछलेस2 महीने से बंद पड़ा था. मिस्टर गिल  अपनी पत्नी के साथ, अपनी बेटी के पास कनाडा गए हुए थे. नहीं तो, उन से मदद मांग सकता था.

उस ने देखा सामने कोठी नंबर 89 ए की कांच की खिड़की से रोशनी आ रही है. उस घर की लाइट अभी तक जल रही थी. शायद मल्होत्रा फैमिली अभी जगी हुई है. वह एकाएक मकान नंबर 89ए की तरफ चल पड़ता है. हालांकि फरवरी महीने का अंत आतेआते ठंड कुछ कम हो गई थी लेकिन मौसम के अचानक करवट बदलने से पिछले दोतीन दिनों से ठंड वापस बढ़ गई थी. तेज ठंडी हवाओं ने उस के पूरे बदन में ठंडी सिहरन पैदा कर दी थी, जैकेट के अंदर भी उसे काफी ठंड महसूस हो रही थी. उसे ध्यान आता है, अनीता मल्होत्रा से उस की पत्नी नीता की अच्छी निभती है. नीता अकसर ही मिसेज मल्होत्रा की बातें किया करती थी. हो सकता है अनीता मल्होत्रा से बात करने पर उस की पत्नी के विषय में उसे कुछ जानकारी प्राप्त हो.

अनीता मल्होत्रा का घर पार्क की दूसरी छोर पर था. पार्क के रास्ते कोई 2 मिनट उसे लगे होंगे वहां तक पहुंचने में. थोड़ी झिझक के साथ उस ने बाहर गेट पर लगी घंटी के बटन को दबा दिया. अंदर से टीवी पर इंग्लिश मूवी की आवाज आ रही थी. घंटी की आवाज मिलते ही अंदर से टीवी की आवाज आनी अचानक बंद हो गई. अनीता मल्होत्रा की 18 वर्षीया बेटी डौली ने खिड़की से बाहर झांका. बाहर स्ट्रीट लाइट की रोशनी में एक जानापहचाना चेहरा दिखा. चेहरा पहचान कर डौली ने दरवाजा खोला. डौली उस के बेटे आरव के साथ कालेज में पढ़ती है, एकदो बार वह उस से अपने बेटे के माध्यम से मिल चुका है.

‘‘सौरी बेटा, आप को इस वक्त डिस्टर्ब किया.’’

‘‘इट्स ओके अंकल, प्लीज आप अंदर आ जाइए. कहिए, मैं आप की क्या मदद कर सकती हूं.’’

‘‘दरअसल बात यह है कि, उस ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, ‘‘हमारे घर का दरवाजा नहीं खुल रहा. वो, आप की नीता आंटी, घर में नहीं हैं. मेरे घर की कोई डुप्लीकेट चाबी आप के पास है? उस ने  अंधेरे में तीर मारा.

‘‘ओ हो, मम्मी तो परसों ही पापा के साथ पटियाला चली गईं. रुकिए, मैं आप की बात उन से करवा देती हूं, शायद उन्हें कोई जानकारी हो,’’ डौली ने पानी का गिलास कबीर को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘अंकल आप रिलैक्स हो कर बैठिए, मैं आप के लिए कौफी  बनाऊं?’’ डौली ने बड़ी विनम्रता के साथ आग्रह किया.

‘‘नहीं, थैंक यू बेटा. कौफी पीने की मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं है.’’

डौली ने अपनी मम्मी को कौल किया और मोबाइल कबीर को थमा दिया, ‘‘अंकल, मम्मी से बात कर लीजिए.’’

कबीर ने अपनी सारी स्थिति मिसेज मल्होत्रा को बताई.

‘‘भाईसाहब मुझे तो खास पता नहीं, मैं तो पटियाला में हूं. मेरी मम्मी की तबीयत अचानक बिगड़  गई तो  मैनु  इत्थे आना पड़ा. नीता ने तो बड़ा गलत किया, ऐसे कैसे बिना बताए कहीं चली गई. आप लोगों के बीच कुछ तो कहासुनी हुई होगी, कोई तो बात हुई होगी, ऐसे कोई नाराज हो कर घर छोड़ कर थोड़ी न चला जाता है. अभी देखो, रात का कितना वक्त हो रहा है, इतनी रात गए आप कहां जाओगे. उस ने यह भी न सोचा.

‘‘अरे हां, पल्लवी के घर में आप की चाबी है. जल्दीजल्दी में आप के घर की चाबी उस के पास रख दी थी.  पल्लवी से मैं ने कहा भी था कि वह चाबी आप लोगों को पहुंचा दे या बता दे कि आप लोगों के घर की चाबी उस के पास रखी हुई है. हो सकता है, बात उस के दिमाग से निकल गई हो. आखिर कोई बंदा कितनी बात याद रखे. कोई बात नहीं, मैं डौली को अभी कह देती हूं. पल्लवी के घर से ला कर चाबी आप को दे देगी. और वैसे, कोई भी जरूरत पड़ी तो हम सब हैं ही. आखिर, इंसान ही तो इंसान के काम आता है.’’ (अनीता मल्होत्रा एक बार बोलना शुरू कर दे तो सामने वाले को शायद ही बोलने का मौका मिले, यह बात उस ने नीता के मुंह से कई बार सुनी थी.)

डौली पल्लवी के घर से चाबी ला कर कबीर को दे देती है. चाबी पा कर वह थोड़ी राहत की सांस लेता है. कबीर दरवाजा खोल कर घर के अंदर आता है. घर का सारा सामान यहांवहां बिखरा पड़ा था. रोज व्यवस्थित दिखने वाला घर आज बड़ा ही अस्तव्यस्त था. आदतन, उस ने अपने जूते उतारे और वहीं बैठेबैठे एक ओर सरका दिए.

रात को 11 बज रहे थे. नीता जाने कहां चली गई, उस की कोई खबर नहीं.  गलती उस की भी है, उसे जरूरत क्या थी सुबहसुबह उस से उलझने की. उस ने मन ही मन खुद को कोसा. कमरे की तरफ गया तो पाया कमरे की लाइट औन थी, बाथरूम में गीजर औन था, वह अकसर बाथरूम का गीजर औन ही छोड़ देता था. जिसे उस के जाने के बाद नीता ही बंद करती थी. लाइट, पंखा, टीवी सभी चीजों  को बंद करने का काम नीता का ही था.  बैडरूम के पलंग पर उस के कपड़े तथा  गीला तौलिया सुबह से वैसे ही पड़े हुए थे.

हैरानपरेशान सा वह पूरे कमरे को देख ही रहा था कि उस के मोबाइल फोन की स्क्रीन पर बारबार हो रहे फ्लैश एसएमएस ने उस का ध्यान खींचा. अब तक इन सारे घटनाक्रम के बीच उस का ध्यान इस तरफ गया ही नहीं था. उस के बैंक के जौइंट अकाउंट से पैसे विदड्रौल के काफी सारे मैसेज आए हुए थे. जौइंट बैंक अकाउंट से बहुत बड़ा अमाउंट निकाला जा चुका था.

बौखलाहट में उस ने नीता को फिर से कौल करने की कोशिश की. इस बार रिंग हुई लेकिन फोन बिजी आ रहा था, ‘द नंबर यू हैव कौल्ड इज बिजी… आप ने जिस नंबर को कौल किया है वह व्यस्त है,’ फोन पर लगातार मिल रहे इस संदेश से वह बौखला उठता है और बौखलाहट में अपने फोन को पलंग पर पटक देता है. गुस्से में वह अपने सिर के बालों को नोंचने लगता है कि फिर से उसे अपने मोबाइल फोन पर फ्लैश मैसेज के साथ रिंगटोन सुनाई पड़ती है, फोन उठा कर मैसेज पढ़ता है.

‘बैंक खाते से पैसे निकाले जाने पर इतना परेशान होने की जरूरत नहीं. मैं ने 25 साल तुम्हारे यहां नौकरी की है.’

‘नौकरी की है, होश तो ठिकाने हैं इस के, कैसी बहकीबहकी बातें कर रही है यह.’ गुस्से में वह बड़बड़ाने लगता है.

‘हां, यह बात मैं अपने पूरे होशोहवास में कह रही हूं.’

(नीता का यह अगला मैसेज वापस उस के मोबाइल के स्क्रीन पर फ्लैश  होता है) ‘इस बात पर चौंकने की जरूरत नहीं है. मैं ने 25 साल तक तुम्हारे यहां नौकरी ही तो की है. यह एहसास तुम ने ही मुझे दिलाया है. तुम ने मुझे अपने बराबर समझा ही कब था. यदि समझा होता तो एक मालिक की तरह तुम्हारा आदेशात्मक व्यवहार मेरे प्रति न होता. मेरी छोटी सी छोटी भूल पर तुम्हारा चिल्लाना, हमारे रिश्ते को पतिपत्नी के रिश्ते से एक बौस और एम्प्लौई के रिश्ते में बदल दिया.

‘तुम्हें हमेशा ही इस बात का गरूर रहा कि तुम मुझे कमा कर खिलाते हो, मुझे पाल रहे हो. तुम ने एक बार नहीं सैकड़ो, हजारों बार इस बात का एहसास कराया  होगा. क्या तुम ने कभी यह सोचा कि यदि तुम बाहर काम करते हो, पैसे कमाते हो तो मैं भी घर संभालती हूं, घर के लिए मेरा योगदान, तुम्हारे योगदान से छोटा  कैसे?

‘तुम्हें औफिस के  8 घंटे के काम के लिए सरकार अच्छाखासा वेतन देती है, जबकि 24×7 काम कर के भी मुझे क्या मिला, तुम मुझ से अकसर यह सवाल करते थे न, कि सारे दिन घर में मेरा काम ही क्या रहता है, तुम्हें यह लगता था कि मैं सारे दिन बैठी आराम फरमाती हूं, तो निश्चय ही आज तुम्हें तुम्हारे सवाल का जवाब मिल गया होगा.  तुम्हारी नौकरी अब और नहीं कर सकती. मैं इस नौकरी से त्यागपत्र देती हूं.’ Hindi Kahaniya

Jolly LLB 3 में भूमि अधिग्रहण होते हुए भी क्यों नहीं है

Jolly LLB 3: सुभाष कपूर एक सधे हुए व्यवसायिक निर्देशक हैं जिन्होंने जोली एलएलबी 3 में निर्माताओं आलोक जैन और अजीत अंधारे के मुनाफे का पूरा पूरा ध्यान रखा है. 120 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म ठीक है कि औसत से बेहतर और उम्मीद के मुताबिक कमाई कर गई लेकिन यह आंकड़ा उलट भी हो सकता था बशर्ते इस में लगभग सस्ते ड्रामाई मनोरंजन के टोटके न ठूंसे गए होते. यानी मुनाफे की इस शर्त को टीम ने पूरा किया कि हमें मेरा नाम जोकरनुमा आधी कमर्शियल और आधी आर्ट फिल्म नहीं बनाना है. बस मुद्दे की बात या विषय को छूते हुए आगे बढ़ लेना है उस में डूब नहीं जाना है. क्योंकि दर्शक अब फिल्म मनोरंजन के लिए देखने जाते हैं बोझिल होती रोजमर्राई जिन्दगी पर और बोझ लादने नहीं.

इस लिहाज से कोई लोंचा नहीं, फिल्म ठीक ठाक है जिसे देखने के बाद पछताना नहीं पड़ता कि खामोख्वाह में 4 – 5 घंटे और 400 – 500 रुपए जाया किए. कोर्ट रूम ड्रामा के लिहाज से इस के पार्ट 1 और 2 भी ठीकठाक थे जिन्हें दर्शकों की तारीफ मिली थी, किसी फिल्म में और अच्छा कुछ होने की गुंजाईशों को देखें तो जोली एलएलबी 3 में इकलौती सम्भावना यह दिखती है कि इसे भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील विषय पर सलीके से फ़ोकस किया जा सकता था. एक ऐसा मुद्दा जिस से आम आदमी को कोई खास लेना देना नहीं होता लेकिन दरअसल में वह किसानों के लिहाज से बेहद अहम होता है और कानूनन व वैचारिक तौर पर इस के अपने अलग माने होते हैं.

फिल्म की कहानी राजस्थान के बीकानेर इलाके के गांव पारसोल के एक किसान राजाराम सोलंकी जो आंचलिक कवि भी है से शुरू हो कर उसी पर खत्म हो जाती है. उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसोल का भूमि अधिग्रहण को ढाल बना कर बुनी इस कहानी को कौर्पोरेट बनाम किसान कहा जा सकता है. हरिभाई खेतान इम्पीरियल ग्रुप का मालिक है जो बीकानेर टू बोस्टन नाम के प्रोजेक्ट के लिए गांव के किसानों की जमीन खरीदता है. जबरन खरीदता है या सभी किसान मर्जी से दे देते हैं यह फिल्म साफतौर पर नहीं बता पाती. राजाराम की जमीन को खेतान एक दलाल के जरिये धोखे से हथिया लेता है जिस से आहत हो कर राजाराम आत्महत्या कर लेता है.

राजाराम की पत्नी जानकी इंसाफ की गुहार लगाने दिल्ली जाती है जहां उस की मुलाकात दोनों जौलियों से एकएक कर होती है. खेतान जमीन हड़पने के लिए यह दुष्प्रचार करता है कि राजाराम ने जमीन के दुःख में नहीं बल्कि अपनी विधवा बहू से नाजायज संबंधों के उजागर हो जाने के चलते ख़ुदकुशी की थी तो बदनामी के डर से बहू भी आत्महत्या कर लेती है. जानकी बजाय खेतान के सामने झुकने के अदालत में दोनों जौलियों को खड़ा कर देती है जो उस की और किसानों की लड़ाई को कानून के साथसाथ मैदान यानी गांव जा कर भी लड़ते हैं.

लेकिन अदालत में जानकी के दोनों वकील भूमि अधिग्रहण पर ज्यादा बोलते नजर नहीं आए क्योंकि अच्छे वकीलों को इस कानून की बारीकियां समझने में पसीने आ जाते हैं फिर इन फ़िल्मी जौलियों के जरिये निर्देशक से कोई उम्मीद करना बेकार की बात थी. आम दर्शक इस अधिग्रहण के बारे में फौरी तौर पर इतना ही जानता है कि वे दिन गए जब सरकार या उद्योगपति मनमाने दामों पर जमीन हथिया लेते थे. अब तो ऐसेऐसे कानून बन गए हैं कि कोई भी किसान की जमीन बिना उस की सहमती के नहीं हथिया सकता. यह कितना सच है आइए इसे कानून की किताबों और भूमि अधिग्रहण के उतार चढ़ाव भरे इतिहास से देखें और समझें –

साल 2013 में यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में कई व्यापक फेरबदल किए थे जो किसानों के हित साधते हुए थे. भूमि अधिग्रहण मुआवजा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम यानी एलएआरआर 2013 बना कर सरकार ने पुराने कानूनों को बेअसर कर दिया था. यह अधिनियम दरअसल में किसानों से भूमि लेने प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा देने और उन का पुनर्वास सुनिश्चित करने के मकसद से बनाया गया था, इस के अलावा भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में ट्रांसपेरेंसी और सामाजिक न्याय का भी प्रावधान रखा गया था.

इस की धारा 4-8 में प्रावधान है कि भूमि अधिग्रहित करने से पहले समाज और पर्यावरण पर प्रभाव का मूल्याकंन अनिवार्य होगा. नगर निकाय और ग्राम सभा की राय लेना जरुरी होगा.

– धारा 26-30 मुआवजे से संबंधित हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनों पर बाजार भाव से 4 गुना और शहरी इलाकों की जमीन पर बाजार भाव से दोगुना मुआवजा दिया जाना अनिवार्य है.

धारा 31 – 42 स्पष्ट करती हैं कि प्रभावित परिवारों के लिए घर नौकरी की सहूलियत जरुरी है और अनुसूचित जाति / जनजाति के किसानों को विशेष सुरक्षा मुहैया कराइ जाएगी.

– धारा 50 -51 सहमती से ताल्लुक रखती हुई हैं कि निजी परियोजनाओं के लिए 80 फीसदी भुमिधारकों की सहमती और प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप वाली योजनाओं के लिए 70 फीसदी किसानों की रजामंदी होना जरुरी है.

धारा 55 – 56 के मुताबिक भूमि अधिग्रहण का रिकौर्ड और एसआईए यानी सामाजिक प्रभाव आंकलन रिपोर्ट सार्वजनिक करना अनिवार्य है.

– धारा 101 तो किसानों को और राहत देने वाली है कि अगर 5 साल तक भूमि का उपयोग नहीं होता है तो उसे असल जमीन मालिकों को वापस कर दिया जाएगा. इन सब प्रावधानों को लागू करने धारा 114 बनाई गई जिस के तहत भूमि अधिग्रहण से सम्बंधित पुराने कानून रद्द किए गए.

ऐसा भी नहीं है कि जौली एलएलबी 3 में इन कानूनों का जिक्र बिलकुल न हुआ हो लेकिन ऐसा तो है कि जबजब भी इन का हवाला दिया गया बात दर्शकों के सर से बाउंसर हो गई जो कि एक स्वभाविक बात थी और निर्देशक की कमजोरी भी कि जो उस ने तकनीकी तौर पर दर्शकों को इन धाराओं से कनेक्ट नहीं किया. अगर करता तो तय है उसे फूहड़ मनोरंजन वाले दृश्य हटाने पड़ते जिन की वजह से फिल्म ने मुनाफा कमाया.

दोनों जौलियों और खेतान के वकील ने जिन धाराओं का हवाला जज सुंदर लाल त्रिपाठी की अदालत में दिया, वे हैं धारा 4, 5, 7, 26, 27, 28, 30, 31, 38, 42 और 50. इन धाराओं के बारे में ऊपर बताया गया है कि इन के तहत क्याक्या प्रावधान हैं जिन का पालन फिल्म में नहीं हुआ.

लेकिन जैसे ही गांव में पुलिस सक्रिय हुई तो दोनों हीरो वकील कूद कर जेम्स बांड बन गए और ये धाराएं हवा हो गईं. अदालत में बहस अर्थशास्त्र पर होने लगी कि न्यू इंडिया के लिए कुछ लोगों को त्याग करना पड़ेगा लेकिन वे लोग किसान ही क्यों, उद्योगपति वकील और जज क्यों नहीं जो दिल्ली के ही एक प्रोजेक्ट के लिए अपनी कोठियां देने तैयार नहीं.

क्लाइमैक्स की उत्तेजना से भरी बहस में ज्ञान की भार भारी बातें हुईं और बिना नाम लिए विजय माल्या जैसे शराब कारोबारियों का भी जिक्र हुआ जो देश का अरबों रुपए डकार कर विदेश भाग गया. लेकिन सरकार उस का या उस जैसों का कुछ नहीं बिगाड़ पाती जिन का सब कुछ बिगड़ता और उजड़ता है वे गरीब किसान ही क्यों होते हैं.

हल्कीफुलकी कौमेडी के बाद क्लाइमैक्स की बहस ही फिल्म की जान है जो दर्शकों को किसानों के पाले में ला खड़ी करती है और खेतान और उस के संभ्रांत लोगों के गिरोह से नकाब हट जाती है. और ज्यादा तालियां बजवाने के लिए आखिर में जय जवान जय किसान के नारे का भी तड़का सुभाष कपूर ने लगा दिया.

फिल्म का सब से प्रभावी दृश्य आखिर में है जिस में एक निचली अदालत का जज सुंदर लाल त्रिपाठी भूमि अधिग्रहण का आदेश रद्द करते राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का आदेश देता है कि बीकानेर टू बोस्टन के प्रभावित सभी किसानों और परिवारों को एलएआरआर एक्ट 2013 के मुताबिक मुआवजा दिलवाए. फिल्म के इस फ्रेम में ही भूमि अधिग्रहण दिखता है जिस में जज अपने आदेश में यह भी लिखवा रहा है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स न्यायपालिका की निगरानी में ही चलाए जाएं.

भूमि अधिग्रहण पर अब तक बनी फिल्में और कुछ डाक्यूमैंट्री फ्लौप ही रही हैं इसलिए भी सुभाष कपूर ने कोई जोखिम नहीं उठाया. 2005 में आई फिल्म ‘शिखर’, 2016 की वाह ‘ताज’ आदि ओंधे मुंह लुढ़की थीं. केवल ‘पीपली लाइव’ और ‘लगान’ चर्चित हुई थीं जो कि जौली की तरह कमर्शियल ही थीं.

जौली एलएलबी में 1957 की मदर इंडिया का हल्का सा लुक कहींकहीं दिखता है. खेतान सुक्खी लाला का आधुनिक संस्करण दिखता है तो जानकी में राधा की बेबसी नजर आती है. लेकिन मदर इंडिया की बात और थी उस में तत्कालीन व्यवस्था थी जिस में कानून से कोई वास्ता नहीं रखा गया था. मामला गांव में ही निबट गया था कोर्ट कचहरी की नौबत नहीं आई थी.

तब हालांकि अंगरेजों का बनाया भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 वजूद में था लेकिन ब्रिटिश सरकार इस का इस्तेमाल रेलवे, अपने दफ्तरों को बनाने जैसे कामों के लिए करती थी लेकिन किसानों को जमीन की कीमत देती थी. नहीं तो उस के पहले रियासतों के दौर में तो जमीन सीधे छीन ली जाती थी यानी जमीन किसान की है यह एहसास अंगरेजों का दिया हुआ था. बाद में 1894 के अधिनियम में बदलाव होते रहे लेकिन 2013 के कानून ने किसानों के शोषण पर लगाम कसने में अहम रोल निभाया. Jolly LLB 3

Bollywood September Business: पूरे महीने सिनेमाघर पड़े रहे सूने

Bollywood September Business: 2025 के नौवें यानी कि सितंबर माह में बौलीवुड के चलते सिनेमाघरों में रौनक लौटेगी, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था. अक्षय कुमार के कई समर्थक और उन के पीआरओ से ले कर मोदी भक्त फिल्म निर्देशक अशोक त्यागी तक यूट्यूब पर वीडियो पोस्ट कर लगातार अक्षय कुमार को बौलीवुड का मसीहा बता रहे थे. लेकिन अफसोस अक्षय कुमार ने अपनी लुटिया डुबाने के साथ ही बौलीवुड की लुटिया डुबाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. इस के ठीक विपरीत दक्षिण भारत की मूलतः तेलुगु व कन्नड़ में बनी, मगर हिंदी में डब हो कर रिलीज हुई फिल्मों ने जरुर सिनेमाघरों को थोड़ी सी राहत दिलाई.

सितंबर माह के पहले सप्ताह की शुरूआत पांच सितंबर को दो हिंदी फिल्मों टाइगर श्राफ की फिल्म ‘बागी 4’ और विवेक रंजन अग्निहोत्री की ‘द बंगाल फाइल्स’ से हुई. 100 करोड़ रुपए की लागत से बनी फिल्म ‘बागी 4’ एक्शन और खून खराबा से भरपूर एक वाहियात फिल्म रही, इस ने बौक्स औफिस पर चार सप्ताह के अंदर महज 53 करोड़ रुपए ही कमाए. इस में से निर्माता की जेब में लगभग 17 करोड़ रुपए ही आए.

लगभग सभी फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को घटिया फिल्म बताया, जिस से नाराज हो कर फिल्म के निर्माता साजिद नाडियादवाला ने कुछ फिल्म समीक्षकों को नोटिस भेजी और कुछ के यूट्यूब चैनल बंद करवाने के प्रयास किए. पर मिला कुछ नहीं.

विवेक रंजन अग्निहोत्री की 80 करोड़ रुपए की लागत में बनी फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ ने चार सप्ताह में केवल 15 करोड़ रुपए ही एकत्र किए, इस में से निर्माता की जेब में 5 करोड़ रुपए ही जाएंगे. विवेक रंजन अग्निहोत्री ने इस फिल्म को ले कर कई विवाद पैदा किए. पर दर्शकों ने नफरती फिल्म को देखने से मना कर दिया.

विवेक रंजन अग्निहोत्री ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर हिंदुओं को भड़काने का असफल प्रयास किया और वह रोते रहे कि अगर हिंदू भाई भी उन की इस फिल्म को नहीं देंखेंगे, तो वह आगे कोई फिल्म नहीं बना सकेंगे. जबकि 5 सितंबर को ही रिलीज हुई कम बजट की कन्नड़ फिल्म ‘‘दिल मद्रासी’ की डब हिंदी फिल्म ने 62 करोड़ रुपए एकत्र कर लिए.

12 सितंबर को ‘एक चतुर नार’,‘मनु क्या करेगा’,यशराज फिल्मस की फिल्म ‘हीर एक्सप्रेस’ सहित तीन हिंदी फिल्मों के साथ हिंदी में डब तेलुगु फिल्म ‘मिराई’ रिलीज हुई. तीन सप्ताह के अंदर ‘एक चतुर नार’ ने दो करोड़ रुपए, ‘मनु क्या करेगा’ ने डेढ़ करोड़ रुपए और ‘हीर एक्सप्रेस’ ने तीन करोड़ रुपए ही एकत्र किए. यानी कि इन तीनों फिल्मों के निर्माता को पूरा नुकसान हो गया. मगर हिंदी में डब तेलुगु फिल्म ‘मिराई’ ने 92 करोड़ 65 लाख रुपए एकत्र किए.

बौलीवुड मे हर किसी को 19 सितंबर का इंतजार था.  इसी दिन अक्षय कुमार व अराद वारसी की बहुचर्चित फिल्म ‘जौली एलएलबी 3’ के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर बनी बायोपिक फिल्म ‘अजेय’, अनुराग कश्यप की फिल्म ‘निशांची’ और तेलुगु फिल्म ‘दे काल हिम ओजी’ रिलीज हुई.

अक्षय कुमार ने दबाव बना कर 26 सिंतबर को औस्कर में भेजी जा रही करण जोहर की फिल्म ‘होम बाउंड’ के अलावा एक भी फिल्म रिलीज नहीं होने दी. इस के बावजूद 15 दिनों के अंदर अक्षय कुमार व अरशद वारसी के अभिनय से सजी फिल्म ‘जौली एलएलबी 3’ ने निर्माता के दावे के अनुसार बौक्स औफिस पर महज 104 करोड़ रुपए ही एकत्र किए. सभी को पता है कि अक्षय कुमार हर फिल्म के लिए 135 करोड़ रुपए की फीस लेते हैं. अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म ‘‘निशांची’’, जिस में बाला साहेब ठाकरे के पोते एश्वर्या ठाकरे की मुख्य भूमिका है, ने बौक्स औफिस पर 15 दिनों में केवल एक करोड़ 31 लाख रुपए ही एकत्र किए.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर बनी फिल्म ‘अजेय’ ने 15 दिनों में केवल एक करोड़ 90 लाख रुपए ही एकत्र किए. तो यह है योगी की लोप्रियता का आलम… इस के विपरीत तेलुगु फिल्म ‘दे काल हिम ओ जी’ ने बौक्स औफिस पर 173 करोड़ 82 लाख रुपए एकत्र किए.

26 सितंबर को रिलीज हुई फिल्म 6 होम बाउंड’, जिसे भारत की तरफ से औस्कर में भेजा जा रहा है, ने एक सप्ताह में केवल ढाई करोड़ रुपए ही एकत्र किए. कुल मिला कर सितंबर माह हिंदी फिल्मों ने सिनेमाघरों पर सूखा ही बनाए रखा. Bollywood September Business

Justice System: देर से मिला न्याय किसी अन्याय से कम नहीं

Justice System: न्याय तभी सार्थक होता है जब गुनहगार को सजा और बेगुनाह को रिहाई समय पर मिले. भारत जैसे विशाल देश में न्याय में देरी होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन कई मामलों में न्याय में इतनी देरी हो चुकी होती है कि उसे न्याय कहना ही बेमतलब हो जाता है. समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून का मजबूत होना जरुरी है लेकिन कानून का इस्तेमाल लोगों को न्याय दिलाने के लिए होना चाहिए न कि परेशान करने के लिए. न्याय के कई मामलों में दशकों तक जेलों में सड़ने के बाद कुछ लोग बाइज्जत बरी होते हैं क्या यह न्याय के नाम पर भद्दा मजाक नहीं है?

83 साल के जागेश्वर अवधिया ने न्याय कि जो कीमत चुकाई है वह हमारी न्याय व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करने के लिए काफ़ी है. मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (MPSRTC) के पूर्व बिलिंग सहायक जागेश्वर प्रसाद अवधिया 1986 में 100 रुपए की रिश्वत के मामले में लोकायुक्त के जाल में फंसे. भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ और यह मुकदमा 18 साल तक निचली अदालत में ही अटका रहा.

अवाधिया को 2004 में निचली अदालत ने दोषी ठहराया था. निचली अदालत के फैसले के खिलाफ जागेश्वर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचे. हाई कोर्ट में 21 साल मुकदमा चला और फिर हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में और तमाम खामियों के आधार पर जागेश्वर को दोषमुक्त कर दिया. अदालत ने कहा कि केवल नोटों की बरामदगी से ही वे दोषी साबित नहीं होते. उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके अवाधिया के लिए यह फैसला खोखली जीत से ज्यादा और कुछ नहीं है.

ललितपुर के थाना महरौनी के गांव सिलावन निवासी विष्णु तिवारी की उम्र इस वक्त 46 साल है और वो 19 वर्षों से जेल में बंद थे. विष्णु को दुष्कर्म के झूठे आरोप में आजीवन कारावास की सजा हुई थी. विष्णु के परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी इसलिए वो लोग हाईकोर्ट में अपील न कर सके. विधिक सेवा प्राधिकरण ने विष्णु के मामले की पैरवी हाईकोर्ट में की और 19 साल बाद हाईकोर्ट ने विष्णु को निर्दोष करार देते हुए रिहा करने के आदेश दिए. इस तरह जिंदगी के 19 साल जेल में गुजारने के बाद विष्णु ने बाहर की दुनिया देखी लेकिन इस बीच विष्णु ने बहुत कुछ खो दिया था. जेल में रहने के दौरान विष्णु के दो भाई, मां और पिता गुजर चुके थे और विष्णु इन में से किसी के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच पाए थे.

1982 में मच्छी सिंह और उन के परिवार के सदस्यों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था. करीब 30 साल बाद, 2012 में, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया.

मच्छी सिंह का मुकदमा भी दो दशक तक निचली अदालतों में अटका रहा फिर हाई कोर्ट में अपील हुई यहां भी वर्षों की सुनवाई चली आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट गया जहां सुबूतों के अभाव में मच्छी सिंह और उन का परिवार दोशमुक्त साबित हुआ.

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत कोई व्यक्ति दोषमुक्त तब होता हाई जब अभियोजन पक्ष अपराध को “युक्तियुक्त संदेह से परे” साबित नहीं कर पाता.

रुदुल शाह बनाम बिहार राज्य (1983) का एक ऐतिहासिक मुकदमा

भारत में गलत सजा के लिए मुआवजे का प्रावधान बेहद सिमित है इस के लिए भी कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में मुआवजे का आदेश दिया है. इन में सब से महत्वपूर्ण मामला रुदुल शाह बनाम बिहार राज्य (1983) का मामला है.

यह मामला भारतीय संविधान के इतिहास में एक ऐतिहासिक निर्णय है, जो अवैध हिरासत और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए राज्य को उत्तरदायी ठहराने तथा मुआवजे के अधिकार को मान्यता देने के लिए जाना जाता है. यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर आधारित था, जिस में मौलिक अधिकारों के सीधे उल्लंघन पर अदालत में सीधी अपील का प्रावधान है.

1953 में रुदुल शाह पर उन की पत्नी की हत्या का आरोप लगा और उन्हें गिरफ्तार किया गया. निचली अदालत में 15 सालों तक मुकदमा चलता रहा इस बीच रुदल शाह कारावास में रहे. आखिरकार मुजफ्फरपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 3 जून 1968 को उन्हें निर्दोष घोषित कर रिहा करने का आदेश दिया. निचली अदालत से रिहाई का आदेश मिलने के बावजूद बिहार राज्य की जेल प्रशासन ने रुदुल शाह को अगले 14 वर्षों तक (1968 से 1982 तक) कैद में रखा. 1982 में उन्हें रिहा किया गया. इस बीच बिना किसी जुर्म के रुदल शाह 29 वर्षो तक कैद में रहे.

रुदुल शाह ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की जिस में उन्होंने अपने पुनर्वास और अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की.

1 अगस्त 1983 कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रुदुल शाह की 14 वर्षों की अतिरिक्त हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का घोर उल्लंघन है.

यह पहला मामला था जिस में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध हिरासत के लिए राज्य को मुआवजा देने का आदेश दिया था. कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत न केवल अधिकारों की रक्षा की जा सकती है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन होने पर उन्हें आर्थिक मुआवजा दिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रुदुल शाह को 30,000 रुपए का मुआवजा राज्य सरकार को देने का आदेश दिया.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में मुआवजे की राह खुली और इस निर्णय ने भारत में “संवैधानिक टोर्ट” (constitutional tort) की अवधारणा को जन्म दिया, जहां मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए राज्य मुआवजा देने पर बाध्य हुआ. यह बाद के मामलों जैसे डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) और नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (1993) का आधार बना.

भारत के न्यायालयों में लंबित मामले

भारत की न्यायपालिका दुनिया की सब से सुस्त और धीमी न्याय व्यवस्थाओं में से एक है जहां लाखों करोड़ों मामले लंबित पड़े हैं.
2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के सभी अदालतों (सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालय और जिला अदालतें) में 5.02 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं. यह संख्या लगातार बढ़ रही है, और जिला अदालतों में ही लगभग 4.4 करोड़ मामले अटके हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट में लगभग 80,000 मामले लंबित हैं, जिन में से कई मामले तो दशकों पुराने हैं. हाई कोर्ट में 43 लाख से अधिक मामले अटके हैं इन में भी हजारों मामले दो और तीन दशक पुराने हैं.

न्याय व्यवस्था की इस सुस्त और धीमी गति का एक बड़ा कारण है कर्मचारियों की कमी. जिला स्तर के न्यायिक पदों पर ही 28% पद खाली पड़े हैं, हालांकि न्याय की गति तेज करने के लिए सरकार और न्यायपालिका द्वारा ‘फास्ट-ट्रैक कोर्ट’ और डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम बनाए जा रहे हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की संख्या दोगुनी करने और मुकदमे की प्रक्रियाओं को सरल बनाने से ही स्थायी समाधान संभव है.

लंबे समय तक जेल में रहने के बाद दोषमुक्त हो कर रिहा हुए व्यक्ति को समाज में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. वर्षों जेल में काटने के बाद वह जब समाज में वापस लौटता है तब तक उस की दुनिया बदल चुकी होती है. अपने सगे रिश्ते भी बोझ समझने लगते हैं. दोस्त, रिश्तेदार और सगे संबंधी ऐसे लोगों से दूरी बना लेते हैं. रोजगार पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में आदमी कहीं का नहीं रहता. यदि मुआवजा मिल भी जाए तो उस मुआवजे की रकम से जिंदगी के कीमती समय की भरपाई नहीं हो पाती और न ही आगे की जिंदगी आसान हो पाती है.

सवाल यह है कि आज के समय डीएनए साक्ष्य और फोरेंसिक जांच जैसे वैज्ञानिक तरीकों के उन्नत होने बावजूद दोष साबित होने में या दोशमुक्त होने में इतना वक्त क्यों लगता है? Justice System

Hindi Kahani : पंगत और चांद-थाली

Hindi Kahani, लेखक – डा. किसलय पंचोली

मैं अनुमान लगा रही हूं कि इस बार जन्मदिन पर अनुराग मुझे क्या गिफ्ट देगा, शायद गोल्ड के इयरिंग. यूनिट की पिछली कपल पार्टी में जब मैं मिसेज नाइक की इयरिंग की भूरिभूरि प्रशंसा करते नहीं थक रही थी तब उस की आंखों में उन्हें खरीदने की ललक सोने से भी ज्यादा चमक रही थी पर ऐसी ही फीलिंग खूबसूरत हैदराबादी मोती-नैकलेस के साथ भी मैं ने पढ़ी थी.

मुझे याद है, मैं एक मेले में मोतियों के स्टौल पर ठिठक गई थी. उस ने कहा था, ‘सारिका, ये मोती रियल होंगे या नहीं, आई डाउट?’ और हम आगे बढ़ गए थे. हो सकता है वह इस बार मैसूर सिल्क की साड़ी खरीद लाए. अनुराग को मुझे सिल्क साड़ी में देखना बहुत ही पसंद जो है. मैं ने साड़ी लपेटी कि वह दीवाना सा हो जाता है. संभव है वह मेरे लिए फैंटास्टिक पश्चिमी परिधान गिफ्ट में देना पसंद करे. उसे पता है कि मुझे वैस्टर्न कपड़े कितने भाते हैं.

कुल जमा बात यह बन रही है कि संभावित भेंट का हर खयाल मुझ में ढेर सारी पुलक भर रहा है, खूब रोमांचित कर रहा है. और क्यों न करे, शादी के बाद मुझे पति मेजर अनुराग से हमेशा खास उपहार जो मिलते रहे हैं. तभी घंटी बजी.

‘‘तुम आ गए. व्हाट अ प्लेजैन्ट सरप्राइज’ कह मैं अनुराग से लिपट गई.’’

‘‘कैसे न आता, आज तुम्हारा जन्मदिन है.’’

उस ने मुझे प्रगाढ़ आलिंगन में भर लिया. आलिंगन, जिस में एकदूसरे के प्रति सकारात्मक भावनाएं, ऊर्जाएं तरंगित हो उठीं. हम तरंगों की सवारी पर निकल पड़े. ऐसी सवारी, जब समय स्वयं ठिठक कर प्यार की जादूगरी निहारता है. लगता है हम दो जन हैं ही नहीं, एकमेव हो चुके हैं. सुख और संतुष्टि के अदृश्य रेशमी बंधन हमें सहला रहे हैं. पूरी दुनिया में हम सब से खूबसूरत हैं.

तरंगों के मद्धिम पड़ने पर कुछ समय बाद उस ने कहा, ‘‘सारिका, आंखें

बंद करो.’’

मैं ने कुछ बंद कीं, कुछकुछ खुली रखीं.

‘‘आई से नो चीटिंग, पूरी बंद करो.’’

मैं ने समीप की टेबल पर पड़े स्कार्फ से आंखों पर पट्टी बांधी और कुरसी पर स्थिर बैठ गई.

‘‘ओके बाबा. लो, पूरी बंद कर लीं.’’

मेरी बंद आंखों के सामने तन चुके गहरे भूरे चिदाकाश के परदे पर रहरह कर गोल्ड इयरिंग, हैदराबादी नैकलेस, सिल्क साड़ी, पश्चिमी परिधान दिपदिप कर चमकने लगे. एकदूसरे से बारबार प्रतिस्पर्धा सी करते, प्रकाश की गति से आनेजाने लगे.

गोल्ड इयरिंग की एक में एक फंसते छल्लों की डिजाइन हो या  हैदराबादी नैकलेस की तीन लड़ों के मोतियों का क्रमश: घटता साइज या सिल्क साड़ी का सुआपंखी रंग या हाफशोल्डर वाला क्रीम कलर का पश्चिमी परिधान, मेरी कल्पना उन की डिटेलिंग का काम पूरे मनोयोग से करने लगी.

अनुराग ने बहुत प्यारभरे स्पर्श से मेरे दोनों हाथ थामे और गिफ्ट बौक्स के ऊपर रखते हुए कहा, ‘‘बूझो, इस बार तुम्हारा बर्थडे गिफ्ट क्या है?’’

मैं उपहार बौक्स के चिकने रैपर पर ऊपर से नीचे उंगलियां फेरती गई. अगल से बगल घुमाती गई. अच्छा, काफी बड़ा है. क्या हो सकता है? मेरी झिलमिलाती ज्वैलरी और सिल्की या साटनी कपड़ों की संभावित गिफ्ट्स की पैकिंग इतनी बड़ी तो हो ही नहीं सकती. हूं, कहीं फुटवियर के डब्बे तो नहीं? यस, मेरे मुंह से एक बार निकला था, ‘जूतेचप्पल पुराने हो गए हैं.’

‘क्या पता नया लैपटौप हो?’? हां, मैं ने यह भी कहा था, ‘मेरा लैपटौप बारबार हैंग हो जाता है.’ उहूं, छोटा माइक्रोवेव ओवन भी हो सकता है. मुझे कड़ाही में पैनकेक बनाने की खटखट करते देख अनुराग ने कहा था, ‘अपन जल्दी ही माइक्रोवेव ओवन ले लेंगे. काफी भारी है गिफ्ट, कहीं किताबें तो नहीं मैं ने जियोग्राफी में पीजी करने की इच्छा भी जताई थी.

आकार और वजन से जितने कयास लग सकते थे, मैं ने सब लगा लिए. हर बार अनुराग हंसता गया और ‘न’ कहता गया. फिर मेरा सब्र जवाब देने लगा. मैं आंख की पट्टी खोल उसे दूर फेंकते हुए बोली, ‘‘बस, बहुत हुआ. मेरा बर्थडे है. तुम ने मुझे गिफ्ट दिया है. मैं ओपन कर रही हूं.’’ और मैं ने आननफानन गिफ्ट बौक्स का चिकना रैपर फाड़ फेंका. अलबत्ता मैं हमेशा इत्मीनान से उस पर चिपके सेलोटेप निकालती हूं ताकि रैपर का रीयूज किया जा सके और फिर बौक्स भी खोल डाला.

ओह, गिफ्ट बौक्स क्या खुला मानो समय तेजी से पीछे दौड़ पड़ा. मेरा बचपन फिर से जी उठा. स्मृतियां सैल्फी लेने को आतुर हो उठीं. जैसे खुशी और आंसू  दोस्त बन बैठे. पलभर में मैं कहां से कहां पहुंच गई.

 

वह एक ठीकठाक बड़ा सा हौल था, जिस के दरवाजे के बाहर जूतेचप्पलों का अव्यवस्थित ढेर लगा था. बड़ीबड़ी खिड़कियां थीं, जिन में ग्रिल नहीं लगी थी. नीला आसमान और हरा नीम मजे से हौल का जायजा ले रहे थे. अंदर चार कतारों में मेहरून पर दो पीले पट्टों वाली टाटपट्टियां बिछी थीं.

बहुत से सांवले और काले आदमी नंगे पैर खड़ेखड़े बातें कर रहे थे. बातचीत का खासा शोर था क्योंकि सभी का सुर ऊंची तरफ ही था. ज्यादातर लोगों के सिर पर टोपी या पगड़ी थी और बदन पर सफेद या मटमैले सफेद कुरतेपाजामे या धोती. कई पान या गुटका चबा रहे थे या मुंह में भरे हुए थे.

 

मेरे सिवा वहां कोई स्त्री थी ही नहीं सिवा जामुनी रंग और पतली लाल किनारे की लौंग वाली धोती बांधे, नाक के दोनों तरफ बड़ेबड़े कांटे पहने, दोनों हाथों से झाड़ू की मूठ पकड़े कोने में उकड़ूं बैठी सफाईकर्मी बुढि़या के.

लोग मेरे मामाजी के पास आआ कर हाथ जोड़ रहे थे, गर्मजोशी से मिल रहे थे. हर कोई आतेजाते मेरे भी पैर छू रहा था क्योंकि मैं वहां सब की भानजी थी.

हुआ यह था कि मैं मां के साथ नानी के घर आई थी. गुमसुम सी एक तरफ अकेली बैठी थी. मामा ने कहा था, ‘चल बिट्टो, तुझे घुमा लाऊं.’ और वे मुझे अपने साथ यहां ले आए थे. इस बड़े से हौल में. दरअसल, मेरे ये दाढ़ी वाले बड़े मामाजी जिन सेठ करोड़ीमल के यहां मुनीम थे, उन्होंने परिचितों और स्टाफ के लिए पुत्रप्राप्ति पर भोज रखा था. मामा उन के दाहिने हाथ सरीखे थे.

‘सरु, आ यहां बैठ,’ मामा ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा. कुछ ही देर में हमारे सहित सभी लोग महरून टाटपट्टियों पर बैठ गए.

‘तू ने कभी पंगत खाई है?’ मामा ने मुझ से प्रश्न किया.

‘पंगत? पंगत क्या कोई मिठाई होती है?’ मैं ने मासूमियत से पूछा था. जिसे सुन मामा ठठा के हंस पड़े थे और अगलबगल में बैठे लोगों को मेरा जवाबी प्रश्न सुना रहे थे. वे सब भी हंस रहे थे. ‘बताओ बच्ची को पता ही नहीं कि पंगत क्या होती है. होहो, क्या जमाना आ गया है.’

तभी हमारे सामने पन्नियों की पैकिंग से जल्दी से निकालनिकाल कर बेहद चमचमाती थालियां, कटोरियां, गिलास और चम्मच फटाफट रख दिए गए. मैं देख रही थी पन्नियों को कहीं भी बेतरतीबी से फेंका जा रहा था, जो मुझे अजीब लग रहा था. वह बुढि़या उन्हें गुडीमुडी कर बटोर रही थी.

हमारे सामने रखे गए बरतनों की अनोखी चमक ने मुझे चमत्कृत कर दिया और उन से परावर्तित होते बिंबों ने जैसे मेरा मन मोह लिया. खिड़की से आते प्रकाश के नीचे रखी थाली पर पड़ने से कभीकभी चमचमा उठते चमकीले खिंचते गोलाकारी बिंब, कमरे की दीवारों और छत पर जगमग, छोटामोटा तिलिस्म सा रच रहे थे. मैं उन्हें भौचक सी देखती रह गई.

 

मुझे लगा चांद मानो थाली बन गया

हो और वह भी इतनी बार. मैं

थालियों से अभिभूत थी और अचंभित भी. ‘क्या ये कांच की हैं?’ सोचते हुए मैं थाली को बारबार उठाउठा कर, घुमाघुमा कर उलटनेपुलटने लगी. फिर झुकझुक कर उस में अपना चेहरा निहारने लगी. मुझे यह बहुत अच्छा लगा था.

बहुत से युवा लड़के धड़ाधड़ डोंगों और धामों में पूरी, सब्जी, लौंजी, रायता, मिठाई, परोसने आते तो मैं उन से कहती, ‘बीच में मत डालो’. मैं चाहती थी कि मैं प्रिय चांद थाली में अपना चेहरा और देर तक देखती रह सकूं. पहली क्लास में पढ़ने वाली मुझ आठ साल की बच्ची के लिए कितने अनमोल खुशी के पल थे वे.

फिर सब लोगों ने संस्कृत में मंत्रोच्चार किया और एकसाथ खाना शुरू हुआ. मामाजी थाली में से चुग्गा भर खाना बाहर की तरफ रखते और भोजन को विशेष भाव से देखते हुए मुझे बता रहे थे, ‘ये जो हम यों आलथीपालथी बना कर पंक्तियों में जमीन पर नीचे बैठ कर भोजन कर रहे हैं न, इसे ही पंगत कहते हैं, बिटिया’.

पर मैं पंगत से ज्यादा चमचमाती थाली की दीवानी हो चुकी थी. मुझे लग रहा था, खाने का इतना अच्छा स्वाद इस चमकीली थाली के कारण ही आ रहा है. मैं ने उस दिन खूब छक कर भोजन किया था. न सिर्फ थाली, कटोरियों को भी उंगलियों से चाटचाट कर साफ कर दिया था. मेरा मन कर रहा था मामाजी से कहूं ‘अपन ये थाली घर ले चलें?’

‘‘क्या हुआ सारिका, कहां खो गई? क्या गिफ्ट पसंद नहीं आया?’’ मेरे हाथ में कस कर पकड़े हुए गिफ्ट में मिले स्टेनलैस स्टील के डिनर सैट की ‘चांदथाली’ को छुड़ाते हुए अनुराग ने पूछा.

‘‘नहीं, मुझे गिफ्ट बहुतबहुत पसंद आया है, अनुराग. यह अब तक का द बैस्ट गिफ्ट है. सब से कीमती और अनोखा गिफ्ट. कहते हैं, समय कभी लौट कर नहीं आता पर तुम तो मेरे लिए ऐसा गिफ्ट लाए हो जिस में स्वयं समय ही पैक है. कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, सचमुच तुम ने मुझे बीते हुए दिन की सौगात लौटाई है ‘वो बचपन की कश्ती वो बारिश का पानी’ की तरह. वो ‘पंगत का भोजन वो चमचमाती चांद-थाली’ दे दी है.

‘‘आह, अद्भुत और कभी न भूलने वाला है यह गिफ्ट,’’ कह मैं उस से फिर लिपट गई.

खुशी की तरंगों की फिर हुई सवारी. मेरे मन के चिदाकाश से एकएक कर सभी अनुमानित गिफ्ट विदा हो गए. गोल्ड इयरिंग के छल्ले गायब हो गए. हैदराबादी नैकलेस की तीन लड़ों के मोती बिखर कर तिरोहित हो गए. सिल्क साड़ी का सुआपंखी रंग धुंधला गया. पश्चिमी परिधान तो ध्यान ही नहीं आया. रह गई तो बस बचपने में विशुद्ध, खालिस चमचमाहट वाली ‘चांद-थाली’ में खाई पंगत की याद.

 

‘मेरा बच्चा’ के भाव से अभिभूत लेकिनकाश कि मैं पहले जानती

एक लड़की का उस की जिद के चलते उस का अबौर्शन किया गया था. हाउस सर्जन ने पूछा कि कल जिस का एमटीपी किया था, वह ठीक है, क्या उस को डिस्चार्ज कर दें तो मैडम ने कहा, ‘कर दो लेकिन जाने से पहले उसे उस की वीडियो दिखा देना. लैपटौप और सीडी ले जाना, कहना, जाने से पहले देख ले.’

हाउस सर्जन नर्स के साथ उस के कमरे में गई. वह खूब खुश थी, कह रही थी कि वह बिलकुल फिट है, बिंदास नहा कर नाश्ता कर चुकी है और अगर छुट्टी कर दें तो वह सीधा अपने औफिस चली जाए. उस ने बड़ी खुशी से लैपटौप और अपनी एमटीपी की पैनड्राइव ली और देखने लगी.

लैपटौप के रंगीन स्क्रीन पर नन्हे शिशु का चित्र उभरा. कई एंगल से उसे दिखाया गया. पलकें ढकीं, बंद आंखें, हिलतेडुलते हाथपांव, जैसे शिशु अंगड़ाई ले रहा हो. लड़की ‘मेरा बच्चा’ का भाव महसूस कर अभिभूत हो गई. उसे याद आया जब उस ने पहली बार उस की हलचल महसूस की थी. उस की इच्छा हो गई थी उंगली से उस के प्यारे होंठों को छुए. तभी नीचे से औजार आता दिखा. वह चौंक कर आगे झुक गई. देखती रही कैसे औजार के छूते ही बच्चा अपना हाथपांव हटा लेता था, कैसे एक बार तो उस ने उसे अपनी मुट्ठी में ही पकड़ लिया और फिर जो दिखा उस को देख उस की आंखें फटी रह गईं, मुंह सूख गया. वह सिर पकड़ कर रोने लगी. काश, वह पहले जानती.     -डा. श्रीगोपाल काबरा Hindi Kahani

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें