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Hindi Kahani : मिस्टर बेचारा

Hindi Kahani : वह नींद में उठ कर आई थी. आंखों में नींद की खुमारी थी. उस के ब्लाउज से उभार दिख रहे थे. साड़ी का पल्लू नीचे गिरा जा रहा था. उस का पल्लू हाथ में था. साड़ी फिसल गई. इस से उस की नाभि दिखने लगी. उस की पतली कमर मानो रस से भरी थी. थोड़ी देर में चंद्रम संभल गया, मगर आंखों के सामने खुली पड़ी खूबसूरती को देखे बिना कैसे छोड़ेगा? उस की उम्र 25 साल से ऊपर थी. वह कुंआरा था. उस के दिल में गुदगुदी सी पैदा हुई.

वह साड़ी का पल्लू कंधे पर डालते हुए बोली, ‘‘आइए, आप अंदर आइए.’’

इतना कह कर वह पलट कर आगे बढ़ी. पीछे से भी वह वाकई खूबसूरत थी. पीठ पूरी नंगी थी.

उस की चाल में मादकता थी, जिस ने चंद्रम को और लुभा दिया था.

उस औरत को देखने में खोया चंद्रम बहुत मुश्किल से आ कर सोफे पर बैठ गया. उस का गला सूखा जा रहा था.

उस ने बहुत कोशिश के बाद कहा, ‘‘मैडम, यह ब्रीफकेस सेठजी ने आप को देने को कहा है.’’

चंदम ने ब्रीफकेस आगे बढ़ाया.

‘‘आप इसे मेज पर रख दीजिए. हां, आप तेज धूप में आए हैं. थोड़ा ठंडा हो जाइएगा,’’ कहते हुए वह साथ वाले कमरे में गई और कुछ देर बाद पानी की बोतल, 2 कोल्ड ड्रिंक ले आई और चंद्रम के सामने वाले सोफे पर बैठ गई. चंद्रम पानी की बोतल उठा कर सारा पानी गटागट पी गया. वह औरत कोल्ड ड्रिंक की बोतल खोलने के लिए मेज के नीचे रखे ओपनर को लेने के लिए झुकी, तो फिर उस का पल्लू गिर गया और उभार दिख गए. चंद्रम की नजर वहीं अटक गई. उस औरत ने ओपनर से कोल्ड ड्रिंक खोलीं. उन में स्ट्रा डाल कर चंद्रम की ओर एक कोल्ड ड्रिंक बढ़ाई.

चंद्रम ने बोतल पकड़ी. उस की उंगलियां उस औरत की नाजुक उंगलियों से छू गईं. चंद्रम को जैसे करंट सा लगा. उस औरत के जादू और मादकता ने चंद्रम को घायल कर दिया था. वह खुद को काबू में न रख सका और उस औरत यानी अपनी सेठानी से लिपट गया. इस के बाद चंद्रम का सेठ उसे रोजाना दोपहर को अपने घर ब्रीफकेस दे कर भेजता था. चंद्रम मालकिन को ब्रीफकेस सौंपता और उस के साथ खुशीखुशी हमबिस्तरी करता. बाद में कुछ खापी कर दुकान पर लौट आता. इस तरह 4 महीने बीत गए.

एक दोपहर को चंद्रम ब्रीफकेस ले कर सेठ के घर आया और कालबेल बजाई, पर घर का दरवाजा नहीं खुला. वह घंटी बजाता रहा. 10 मिनट के बाद दरवाजा खुला.

दरवाजे पर उस की सेठानी खड़ी थी, पर एक आम घरेलू औरत जैसी. आंचल ओढ़ कर, घूंघट डाल कर.

उस ने चंद्रम को बाहर ही खड़े रखा और कहा, ‘‘चंद्रम, मुझे माफ करो. हमारे संबंध बनाने की बात सेठजी तक पहुंच गई है. वे रंगे हाथ पकड़ेंगे, तो हम दोनों की जिंदगी बरबाद हो जाएगी.

‘‘हमारी भलाई अब इसी में है कि हम चुपचाप अलग हो जाएं. आज के बाद तुम कभी इस घर में मत आना,’’ इतना कह कर सेठानी ने दरवाजा बंद कर दिया.

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चंद्रम मानो किसी खाई में गिर गया. वह तो यह सपना देख रहा था कि करोड़पति सेठ की तीसरी पत्नी बांहों में होगी. बूढ़े सेठ की मौत के बाद वह इस घर का मालिक बनेगा. मगर उस का सपना ताश के पत्तों के महल की तरह तेज हवा से उड़ गया. ऊपर से यह डर सता रहा था कि कहीं सेठ उसे नौकरी से तो नहीं निकाल देगा. वह दुकान की ओर चल दिया.

सेठानी ने मन ही मन कहा, ‘चंद्रम, तुम्हें नहीं मालूम कि सेठ मुझे डांस बार से लाया था. उस ने मुझ से शादी की और इस घर की मालकिन बनाया. पर हमारे कोई औलाद नहीं थी. मैं सेठ को उपहार के तौर पर बच्चा देना चाहती थी. सेठ ने भी मेरी बात मानी. हम ने तुम्हारे साथ नाटक किया. हो सके, तो मुझे माफ कर देना.’

इस के बाद सेठानी ने एक हाथ अपने बढ़ते पेट पर फेरा. दूसरे हाथ से वह अपने आंसू पोंछ रही थी. Hindi Kahani

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Hindi Kahani Story : चटोरी जीभ का रहस्य

Hindi Kahani Story : मां की मृत्यु के बाद पिता जी बिल्कुल अकेले पड़ गये थे. कमरे में बैठे घर के एक कोने में बने मंदिर की ओर निहारते रहते थे. हालांकि पूरे जीवन नास्तिक रहे. कभी मंदिर नहीं गये. कभी कोई व्रत-त्योहार नहीं किया. मगर मां के जाने के बाद अपने पलंग पर बैठे मंदिर को ही निहारते रहते थे. अब पता नहीं मंदिर को निहारते थे या उसके सामने रोज सुबह घंटा भर बैठ कर पूजा करने वाली मां की छवि तलाशते थे.

पिता जी और मां के बीच कई बातें बिल्कुल जुदा थीं. मां जहां पूरी तरह आस्तिक थी, पिता जी बिल्कुल नास्तिक. मां जहां नहाए-धोए बगैर पानी भी मुंह में नहीं डालती थीं, वहीं पिता जी को बासी मुंह ही चाय चाहिए होती थी. लेकिन फिर भी दोनों में बड़ा दोस्ताना सा रिश्ता रहा. कभी झगड़ा, कभी प्यार. वे मां के साथ ही बोलते-बतियाते और कभी-कभी उन्हें गरियाने भी लगते थे कि बुढ़िया अब तुझसे कुछ नहीं होता. मां समझ जातीं कि बुड्ढे का फिर कुछ चटपटा खाने का मन हो आया है. अब जब तक कुछ न मिलेगा ऐसे ही भूखे शेर की तरह आंगन में चक्कर काटते रहेंगे और किसी न किसी बात पर गाली-गलौच करते रहेंगे. सीधे बोलना तो आता ही नहीं इन्हें. भुनभुनाती हुई मां छड़ी उठा कर धीरे-धीरे किचेन की ओर चल पड़तीं थीं. मां को किचेन की ओर जाता देख पिताजी की बेचैनी और बढ़ जाती. उनकी हरकतों को देखकर तब मैं सोचता था कि शायद उनको यह अच्छा नहीं लगता था कि इस बुढ़ापे में वो मां को इतना कष्ट दें, मगर चटोरी जीभ का क्या करें? मानती ही न थी. इसीलिए इतना तमाशा करते थे.

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थोड़ी देर में मां थाली में पकौड़े तल के ले आती, या भुने हुए लइया-चना में प्याज, टमाटर, मिर्ची, नींबू डाल कर बढ़िया चटपटी चाट तैयार कर लातीं. लाकर धर देतीं सामने. पिता जी कुछ देर देखते फिर धीरे से हाथ बढ़ा कर प्लेट उठा लेते और देखते ही देखते पूरी प्लेट चट कर लंबी तान कर लेट जाते. मां बड़बड़ाती, ‘बच्चों की तरह हो गये हैं बिल्कुल. पेट न भरे तो जुबान गज भर लंबी निकलने लगती है. अब देखो कैसे खर्राटे बज रहे हैं. बताया तक नहीं कि कैसा बना था.’

फिर उठ कर प्लेट किचेन में रखतीं और अपने लिए चाय बना कर आंगन में खाट पर आ बैठती थीं.

मैं कभी कहता कि बाहर रेहड़ी वाले से चाट-पकौड़े ले आऊं तो पिता जी फट मना कर देते थे. मां भी मुझे रोक देती थीं. कहतीं अरे, बाहर कहां जाएगा लेने, मैं अभी झट से बना देती हूं. इनकी फरमाइशें तो दिन भर चलती रहती हैं.

मैं उन दिनों बनारस में पोस्टेड था. हमारा कस्बा ज्यादा दूर नहीं था. शनिवार और इतवार मैं घर पर मां पिताजी के साथ ही रहता था. तब यह सारा तमाशा देखता था. मां काफी बूढ़ी हो गयी थीं. आंखों से भी अब कम दिखने लगा था. काम अब ज्यादा नहीं होता था. जल्दी ही थक जाती थीं. इसलिए मैं चाहता था कि मेरी जल्दी शादी हो जाए तो आने वाली लड़की मां पिताजी का भोजन पानी और सेवा टहल कर लिया करेगी. फिर एक जगह बात पक्की हो गयी और मेरी शादी मीनाक्षी से हो गयी. मीनाक्षी ने आते ही घर संभाल लिया. मां को भी आराम हो गया. मैं नोटिस करता था कि पिता जी मीनाक्षी से खाने की कोई फरमाइश नहीं करते थे. मां ही कुछ-कुछ बना कर उन्हें परोसती रहती थीं. मीनाक्षी कहती भी, कि मुझे बोल दिया करें, मगर मां हंस कर उसकी बात टाल जाती थी.

मेरी शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे कि एक दिन अचानक हार्ट अटैक से मां चल बसी. शायद इसी इंतजार में बैठी थी कि घर को संभालने के लिए कोई औरत आ जाए तो मैं चलूं. मां का इस तरह अचानक चले जाने का बड़ा धक्का पिता जी को लगा. वे बड़े गुमसुम से हो गये हैं. मीनाक्षी यूं तो पिता जी के खाने पीने का पूरा ख्याल रखती थी, मगर मैं देख रहा हूं कि अब पिता जी की चटपटी चीजों की ख्वाहिश बिल्कुल खत्म हो चुकी है. न तो वो कभी पकौड़ियों की फरमाइश करते हैं न चाट या दही बड़े की. बेहद सादा खाना खाने लगे हैं. कभी-कभी तो सिर्फ खिचड़ी या दूध ब्रेड ही खाकर ही सो रहते हैं. मीनाक्षी को बताऊं तो शायद यकीन न करे कि इनकी जुबान कितनी चटोरी थी. अभी दिन ही कितने हुए हैं उसे इस घर में आये. उसने उनका वह रूप नहीं देखा था, जब वह गाली-गलौच करते पूरे आंगन में शेर की तरह तब तक चहल-कदमी करते थे जब तक मां उनके लिए किचेन से कुछ चटपटी चीज बना कर नहीं ले आती थीं. मगर उनकी लंबी जुबान भी मां के साथ ही चली गयी शायद. उनके जाने के बाद मैंने पिताजी को जोर से बात करते भी नहीं सुना. चुपचाप बैठे रहते हैं और मंदिर की ओर निहारते रहते हैं. बिल्कुल शांत.

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पहले मैं नहीं समझा था इस खामोशी का राज, मगर अब सबकुछ समझ में आ रहा है. दरअसल पिता जी चटोरे नहीं थे, उनका हर वक्त कुछ न कुछ खाने को मांगना मां के प्रति उनका प्यार था. मां के हाथों की बनी चीजों में ही उनको स्वाद आता था. फिर चाहे वे कुछ भी बना कर उनके सामने धर दें. मां को खाली बैठा देख उनको उलझन होती थी. वह चाहते थे कि मां उनके सामने चलती फिरती ही नजर आएं. उन्हें चलता फिरता देख उनके स्वस्थ होने को प्रमाणित करता था इसलिए. जब मां जिंदा थीं और पिताजी उनको बात-बात पर परेशान करते थे तो मुझे बड़ी कोफ्त होती थी, मगर आज पिता जी का मां के प्रति प्यार देखकर आंखें छलक आती हैं. पिता जी के गुस्से और गाली गलौच के पीछे छिपे इस प्यार को मां महसूस तो करती ही होंगी, तभी तो फटाफट छड़ी उठा कर किचेन की ओर चल पड़ती थीं कि कुछ चटपटा बना दूं इस बुड्ढे के लिए, वरना चुप ही नहीं होगा. Hindi Kahani Story

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Hindi Short Stories : ऐ मच्छर, तू महान है – अदने से मच्छर की महिमा अपरंपार

hindi short stories : ऐ मच्छर, तू महान है. तेरी महिमा का क्या वर्णन करूं? तू मनुष्यों के लिए प्रेरणास्रोत भी है तो मनुष्यों का पालक भी है. तू ने साबित कर दिया है कि कदकाठी और आकार के आधार पर किसी को हीन नहीं समझना चाहिए. कोई न कोई कवि कह डालेगा, ‘मच्छर कबहुं न निंदिए, जो होय सूक्ष्म आकार. इन की ही कृपा से, कितनों के सपने होय साकार.’ तुझ से सौ गुणे, हजार गुणे, लाख गुणे, करोड़ गुणे लंबेचौड़े प्राणी परिवर्तन के दंश से लुप्त हो गए पर तू है कि सदियों से, सहस्त्राब्दियों, लक्षाब्दियों से डटा हुआ है, अड़ा हुआ है, अडिग रह कर खड़ा हुआ है.

किसी भी परिवर्तन ने तेरे अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं डाला. और भविष्य में ऐसी कोई संभावना नजर भी नहीं आती. तुझ से वैसे तो हर जीव को प्रेरणा लेनी चाहिए पर मनुष्यों के लिए तेरा विशेष महत्त्व है. शायद, भारतवासियों ने तुझ से ही प्रेरणा ले कर हर परिवर्तन को सहना सीखा है. महंगाई कितनी भी बढ़ जाए, भ्रष्टाचार कितना भी बढ़ जाए, कानून व्यवस्था की जो भी हालत हो उस में भारतवासी खुशीखुशी जीना सीख चुके हैं.

तेरी खून चूसने की आदत ने भारतवासियों को खून चुसवाने का अभ्यस्त बना दिया है. तू तो फिर भी कितना खून चूस पाएगा-एक मिलीलिटर न डेढ़ मिलीलिटर. हम तो अब इस कदर अभ्यस्त हो गए हैं कि कोई हमारे शरीर का सारे का सारा खून भी चूस ले तो भी कोई फर्क न पड़े, शायद. शिक्षण संस्थान, अस्पताल, व्यवसायी, सरकार सभी खून चूसते हैं आम जनता का और लोग बगैर किसी गिलाशिकवा के अपना खून प्रस्तुत करते हैं सभी को, चुसवाने के लिए. इस प्रकार, हम देशवासियों को अनुकूलन की प्रक्रिया अपनाने में तू काफी मददगार रहा है.

मनुष्यों के लिए तू रोजगार का साधन है. तू ने मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और न जाने कितनी बीमारियां मनुष्यों को दान में दी हैं. और अब तो ‘बाय वन गेट वन’ की तर्ज पर किसी को डेंगू के साथ मलेरिया तो किसी को मलेरिया के साथ चिकनगुनिया दे रहा है. सुना है, अब तू कौंबो पैक में तीनों बीमारियां साथसाथ भी परोसने वाला है.तेरे द्वारा दिए गए मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया को लोग मनुष्यों के लिए हानिकर मानते हैं, विनाशकारक मानते हैं. लेकिन तेरी इन्हीं भेंटों के चलते न जाने कितनी पैथोलौजी लैब, कितने डाक्टर, कंपाउंडर, नर्स, अस्पताल, दवा दुकान आदि चल रहे हैं.

सुनने में आया है कि कई डाक्टरों की तो सैटिंग है पैथोलौजी लैब से. जांच की फीस में उन का हिस्सा तो होता ही है, कई बार मौसमी बुखार में भी वे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया की जांच के लिए सलाह दे देते हैं. यदि उन की पसंद की लैब के अलावा अन्य लैब से जांच करवाई जाए तो उसे वे मान्यता नहीं देते. उन की पसंद की लैब से हुई जांच रिपोर्ट को ही उन के द्वारा मान्यता दी जाती है. सुनने में यह भी आया है कि कई बार नियोजित तरीके से नैगेटिव रिपोर्ट को भी पौजिटिव दिखाया जाता है ताकि प्लेटलेट्स की गणना के लिए बीचबीच में जांच करवाई जाए और पैथोलौजी लैब तथा डाक्टर व उन के सहयोगियों की दालरोटी चलती रहे और उस में घी भी डलता रहे.

इतना ही नहीं, तू ने कितनों को भांतिभांति की अगरबत्तियां, कार्ड और क्रीम बनाने को प्रेरित किया. इन वस्तुओं के निर्माण में लगे पूंजीपतियों, श्रमिकों, परिवहन संचालकों, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं की आजीविका में तेरा अप्रतिम योगदान है. और तो और, तुझ से बचाव के लिए भांतिभांति के विज्ञापन बनते हैं, उन के द्वारा भी कई कलाकार, विज्ञापन एजेंसियां आदि रोजगार पाते हैं. कई कलाकारों को तेरे कारण रजत पटल पर आने का मौका मिलता है. तेरी मेहरबानी से सरकार ने मलेरिया विभाग बना कर कई लोगों को रोजगार दिया है. आगे चल कर डेंगू विभाग, चिकनगुनिया विभाग बनने की भी संभावना है. इस से भी कई लोग रोजगार पाएंगे. वहीं, फौगिंग के नाम पर, गड्ढे भरने के नाम पर, दवा छिड़काव के नाम पर न जाने कितने सरकारी कर्मचारियों, ठेकेदारों को तू सुखीसंपन्न बनाता है.

पर यार, तू थोड़ा सा नैगेटिव भी है वरना अभी तक तो तेरी पूजा शुरू हो चुकी होती. मनुष्य जिन चीजों से डरता है उस की पूजा करने लगता है. विनाशक नदियों को मां और भगवान का दरजा दिया जाता है. मनुष्य जिन व्यक्तियों से डरता है उन्हें माननीय, आदरणीय, परमादरणीय आदि कहने लगता है. यदि तेरा प्रकोप और बढ़ जाए तो शायद तेरी भी पूजा होने लगे. तेरे नाम के साथ भी माननीय, पूज्यनीय, आदरणीय. परमादरणीय जैसे शब्द प्रयुक्त होने लगें. तेरे नाम का भी चालीसा, सहस्त्रानाम, पुराण आदि का निर्माण हो. औल द बैस्ट, यार. 

पर यार, मेरी एक सलाह मानना- आरक्षण की मांग मत करना. अभी देश में स्थिति यह है कि जो दबंग है, अमीर है वह भी दबंगई से आरक्षण की मांग करने लगता है. विनाशलीला कर कहता है कि मैं कमजोर हूं, मुझे आरक्षण चाहिए. तू मसला जाता है, कुचला जाता है, लोग तुझ से नफरत करते हैं, तुझे अनेक रोगों का कारण मानते हैं. इन आधारों पर तू आरक्षण का हकदार तो है पर यह भी सोच, तेरे से कितने घर चल रहे हैं, कितने लोग प्रेरणा पा रहे हैं. इसलिए आरक्षण मत मांगना, भले ही दोचार बीमारियां और बढ़ा देना. Hindi Short Stories

Youth Lifestyle: रील्स बनती रोड़ा हिला रही यूथ का फोकस

Youth Lifestyle: दुनिया डिजिटल क्रांति के दौर से गुजर रही है. इंटरनैट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का यूज चरम पर है. युवाओं ने मोबाइल और इंटरनैट को अपना सबकुछ मान लिया है. समस्या सबकुछ मान लेने की नहीं बल्कि सहीगलत में फर्क न ढूंढ़ पाने की है. जैसे, एक चर्चित सोशल मीडिया फौर्मेट है ‘रील्स’ जो छोटीछोटी वीडियो क्लिप होती हैं, कोई 15 सैकंड की तो कोई 60 सैकंड से ले कर 2 मिनट तक की. इंस्टाग्राम, टिकटौक, फेसबुक, स्नैपचैट जैसे प्लेटफौर्म्स पर ये वीडियो युवाओं के बीच इतने भीतर तक घुसे हुए हैं कि प्रतिदिन करोड़ों घंटे इन्हीं पर खर्च हो रहे हैं.

बेशक, रील्स का कंटैंट एंटरटेनिंग होता है, जो तुरंत मजा देता है लेकिन इस के बढ़ते कन्ज्यूम से यूथ के मैंटल हैल्थ, कंसनट्रेशन और लर्निंग प्रोसैस पर गंभीर संदेह उठ खड़ा हुआ है. सोशल मीडिया विशेषज्ञों, न्यूरोसाइंटिस्टों और मनोवैज्ञानिकों द्वारा रील्स से यूथ पर पड़ने वाले असर पर अध्ययन किए गए हैं खासकर रील्स से पड़ने वाले कंसनट्रेशन पावर पर.

कंसनट्रेशन का मतलब मैंटल रिसोर्स को किसी एक्टिविटी या चीज पर केंद्रित करना, जबकि गैरजरूरी या चीजों को नजरअंदाज करना. इंगलैंड के मनोवैज्ञानिक जेम्स मार्टिन डमविल के अनुसार, कंसनट्रेशन को ‘फोकल पौइंट औफ कांशियसनैस’ बताया गया है, जबकि रोज के अनुसार, यह किसी वस्तु या विचार को स्पष्टता और निरंतरता के साथ सम झने की क्षमता है. आज के समय में डिजिटल मीडिया की हर किसी के जीवन में घुसपैठ के चलते हरेक के लिए कंसनट्रेशन बनाए रखना एक चुनौती बन गया है.

कंसनट्रेशन कम होने का मतलब है जरूरी कामों में डैडिकेशन, स्ट्रौंग मैमोरी व लर्निंग कल्चर का कमजोर पड़ना. जब पढ़ने वाले युवा अपनी पढ़ाई या किसी भी काम में असफल होते हैं तो अकसर इस का कारण न्यूरोसाइंटिफिक रूप से कंसनट्रेशन का कमजोर पड़ना होता है और इसी कंसनट्रेशन को कमजोर आज के समय में ये रील्स कर रही हैं जो न तो कैरियर के डिसीजन लेने दे रही हैं न फैमिली के डिसीजन.

रील्स बन रही वजह

आज के समय में रील्स पौपुलर हैं क्योंकि इन का कंटैंट छोटा और तेज होता है जो देखते समय रिलीफ देता है. इस के अलावा हर मिनट कुछ नया मिल रहा होता है जो नया एक्सपीरियंस और डोपामाइन रिलीज करता है. यहां तक कि इस में एल्गोरिदम काम करता है जो पर्सन टू पर्सन उन के इंट्रैस्ट के अनुसार कंटैंट देता है.

ब्रेन में डोपामाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर जिम्मेदार होता है आनंद व पुरस्कार अनुभव के लिए. शौर्ट वीडियो देखने पर डोपामाइन रिलीज होता है, जिस से ब्रेन को हैप्पी फील होता है जो असल जीवन संबंधी एक्सपीरियंस को सैकंडरी बना देता है. प्रतिदिन घंटे दो घंटे के लिए लंबे समय तक वीडियो देखना डोपामाइन रिसैप्टर्स को रीऔर्गनाइज्ड करता है, जिस से ‘डिजिटल हैबिट’ बन जाती है.

इस से होता यह है कि अगर कुछ पलों के लिए मोबाइल हाथ में न हो या आसपास न हो या इंटरनैट काम करना बंद कर दे तो तनाव, चिंता और बेचैनी होने लगती है. कुछ छूट जाने की बेचैनी तो अवसाद जैसी स्थिति तक पैदा कर देती है.

अनेक अध्ययन बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम, खासकर इंस्टाग्राम, टिकटौक रील्स देखने से पढ़ाई पर खराब असर पड़ता है. 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि जिन छात्रों का वीडियो देखने का समय 3 घंटे से अधिक था, उन की परीक्षा के परिणामों में 25-35 फीसदी की गिरावट देखी गई.

इस के अलावा, अवसाद और चिंता के मामले में वृद्धि हुई है. बच्चे और युवा सोशल कौन्टैक्ट से दूर हो रहे हैं, परिवार व फ्रैंड सर्कल से अलगाव महसूस कर रहे हैं. क्लास में कंसनट्रेशन रखने में मुश्किल, बारबार दिमाग भटकना आम है. जैसे, राहुल एक इंजीनियरिंग छात्र था जिस ने अपनी एग्जाम की तैयारी के दौरान महसूस किया कि उस की पढ़ाई के बीच बारबार मोबाइल और वीडियो के कारण ध्यान टूट जाता है. एग्जाम से पहले वह पढ़ाई के बदलते मूड के कारण तनाव में आ गया. वह बारबार उन नोटिफिकेशन से भटकता था जो नए रील्स के बारे में आते थे.

उस परिस्थिति में उस का रिजल्ट कमजोर हुआ.

ऐसे ही स्वाति के साथ हुआ, वह कालेज की छात्रा थी जो पढ़ाई के दौरान सोशल मीडिया का ज्यादा यूज करती थी. वह कहती है कि पढ़ने के दौरान मन शांत नहीं रहता था और छोटीछोटी बातों पर ध्यान भटक जाता था. कैंपस प्रोजैक्ट्स के बीच में वह बारबार मोबाइल औन कर वीडियो देखने लगती थी. धीरेधीरे उस की याददाश्त कमजोर होने लगी और मुश्किल सब्जैक्ट्स सम झने में दिक्कत आने लगी, साथ ही पढ़ाई में रुचि कम हो गई.

मनोवैज्ञानिक दबाव

मनोज को चिंता रहती थी कि कहीं सोशल मीडिया पर नया ट्रैंड न छूट जाए. उसे ‘फीयर औफ मिसिंग आउट’ के कारण मानसिक दबाव महसूस होने लगा. वह जितना समय सोशल मीडिया पर बिताता था, वह अपने दोस्तों और परिवार के साथ बिताने से ज्यादा था. औनलाइन एक्टिविटी में डूबा रहने से मनोज की सोशल प्रेजैंस कम हो गई, जिस से वह अकेला महसूस करने लगा.

2024-2025 के बीच हुए शोधों और रिपोर्टों के अनुसार :

युवाओं के अधिकतर हिस्से का प्रतिदिन औसत मोबाइल उपयोग 3.5 घंटे या इस से अधिक है. (मोबाइल इकोसिस्टम रिपोर्ट 2020).

रोज 3 घंटे से अधिक वीडियो देखने वाले युवाओं में कंसनट्रेशन की टाइमिंग में 30-40 फीसदी गिरावट देखी गई (हलिली 2024).

लगातार वीडियो की लत से याददाश्त और लर्निंग कैपेसिटी अफैक्ट होती है, खासकर युवाओं में जो डैवलपिंग स्टेज में होते हैं. (जुआन 2023).

ब्रेन और न्यूरोसाइंस के नजरिए से ब्रेन में डोपामाइन नामक रसायन आनंद का सैंसर है, जो वीडियो देखने के दौरान ज्यादा बनता और घटता रहता है. इस में विजुअल्स होते हैं जो इमोशन उत्तेजित करते हैं लेकिन ये वीडियो लंबे समय में ब्रेन की क्षमता को कम कर देते हैं. विशेषरूप से प्रीफ्रंटल कौर्टेक्स, जो डिसीजन मेकिंग और इमोशनल रेगुलेशन का काम करता है, लंबे समय तक इंटरनैट डाटा के चलते सिकुड़ जाता है.
अधिकांश युवाओं के न्यूरौन नैटवर्क्स में जुड़ाव की कमजोरी सामने आई है जो कंसनट्रेशन और लंबे समय तक सोचने के लिए जरूरी होते हैं.

सोशल एंड लर्निंग इंपैक्ट

यूथ में सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने के कारण शिक्षा का प्रदर्शन गिर रहा है. अध्ययन बताते हैं कि अधिकतम सोशल मीडिया उपयोग करने वाले स्टूडैंट जहां टैस्ट में कमजोर होते हैं वहीं उन की सीखनेसम झने की शक्ति पर भी औनलाइन कंटैंट प्रभाव डालता है.

देश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षकों ने भी यह स्वीकार किया है कि हाल के वर्षों में स्टूडैंट्स का ध्यान निरंतर कम हो रहा है. उन का मन छोटी सी रिसर्च या वीडियो को जल्दीजल्दी देखने की आदत में फंसा हुआ है. इस वजह से वे डीप रिसर्च नहीं कर पाते. साथ ही, वे मैंटल प्रैशर, चिंता, डिप्रैशन का शिकार रहते हैं. स्टूडैंट्स अकसर अकेला महसूस करते हैं क्योंकि उन का ध्यान खुद के आसपास के लोगों के बजाय औनलाइन स्क्रीन की ओर रहता है.

19 साल की रीमा शुरुआत में औनलाइन कंटैंट को कंट्रोल में रख कर पढ़ाई करती थी मगर जब इंस्टाग्राम रील्स में उस की दिलचस्पी बढ़ी तो धीरेधीरे रील्स बनाने से ले कर रील्स देखने तक वह हर दिन साढ़े 3 घंटे इसी में लगी रहती.

वह कहती है, ‘‘शाम को जब मैं पढ़ रही होती हूं तब मन करता है कि एकदो वीडियो और देख लूं. एकदो वीडियो इतनी छोटी होती हैं कि उंगलियां स्क्रीन से हट ही नहीं पातीं. न करते हुए भी दोढाई घंटे कब खत्म हो जाते हैं, पता नहीं चलता. कभीकभी पूरा दिन ही निकल जाता है और फिर पढ़ाई करने में देर हो जाती है.’’ इस से उस की ग्रेड्स लगातार प्रभावित होती गईं.

अमित, जो एक तेजतर्रार स्टूडैंट था, रील्स वीडियो के प्रति जरूरत से ज्यादा तवज्जुह देने के चलते अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाया. उस ने बताया कि बारबार वीडियो की नई सामग्री उस के ब्रेन को इतना बिजी कर देती कि मुश्किल एग्जाम्स के लिए अध्ययन करने का मन नहीं होता. सामाजिक दबाव व तुलना की समस्या भी बढ़ गई. वह कहता है, ‘‘मु झे लगता है कि मैं चूक रहा हूं क्योंकि लोग नए ट्रैंड के पीछे हैं और मैं नहीं.’’

रील्स और अन्य शौर्टफौर्म वीडियो एंटरटेनमैंट के नए और एडवांस मीडियम हैं जो यूथ को बांधने में सफल हैं. अब तो एआई के जबरदस्त तरह से रील्स की दुनिया में घुसने से यह और ज्यादा ब्रेन रौट का कारण बन गई है. रील्स इतनी एडवांस और एंगेजिंग होने लगी हैं कि इस से पीछा छुड़ाना आसान नहीं. वर्चुअल दुनिया पूरी तरह से लोगों को निगल रही है जो युवाओं के लिए गंभीर समस्या बनती जा रही है. Youth Lifestyle

Social Awareness: सोशल मीडिया पर जाति का ठप्पा

Social Awareness: इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप पर जाति आधारित ग्रुप्स और पेज हजारों में मिल जाएंगे. राजपूताना फौर एवर, यादव बौयज, बनिया किंग नामों वाले पेज युवाओं को खूब आकर्षित करते हैं.

इन पेजों पर ऐसे वीडियो और फोटो शेयर किए जाते हैं जिन में लड़के अपनी बाइक या गाड़ी पर जाति का नाम दिखाते हुए एटिट्यूड में खड़े रहते हैं. यह ट्रैंड कूल या स्टाइल बन गया है. लेकिन हकीकत में यह एक ऐसा फैशन है जो समाज को खोखला करता है.

भारत को आजाद हुए 75 वर्षों से ज्यादा हो गए. संविधान बना और बराबरी के अधिकार की बातें हुईं, शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण आया ताकि पिछड़े वर्ग भी आगे बढ़ सकें लेकिन दुख की बात यह है कि आज भी भारत के कई हिस्सों में लोग जातिवाद को एक स्टेटस सिंबल बना कर पेश करते हैं.

सड़कों पर आप ने अकसर गाडि़यां देखी होंगी जिन के शीशों पर बड़ेबड़े अक्षरों में लिखा होता है- प्राउड टू बी राजपूत, गुर्जर बौयज, यादव किंग वगैरहवगैरह. सिर्फ गाडि़यां ही नहीं, बल्कि हाथ पर टैटू बनवा कर, सोशल मीडिया प्रोफाइल पर लिख कर और कपड़ों पर छपवा कर भी लोग अपनी जाति का नारा लगाते रहते हैं.

जाति का फैशन

आज के दौर में कई युवा मानते हैं कि अगर उन्होंने अपनी जाति का नाम गाड़ी पर लिखवा लिया या हाथ पर टैटू बनवा लिया तो वे कूल लगेंगे और सामने वाले में एक डर या खौफ पैदा करेंगे.

जैसे दिल्ली में रह रहे नरेश जो कि गुर्जर समाज से आते हैं. उन्होंने एक बातचीत में बताया कि उन्होंने अपनी स्कौर्पियो पर जय गुर्जर लिखवा रखा है. ऐसा करने पर वे प्राउड फील करते हैं और सड़क पर चलने वाले लोग उसे पावरफुल मानने लगते हैं.

इसी तरह एक राजपूत लड़का हाथ पर राजपूताना नाम से टैटू बनवा ले तो उसे लगता है कि अब सब उसे शेर की तरह देखेंगे. यह एक तरह की सोशल आइडैंटिटी बनाने की कोशिश है, लेकिन असल में यह समाज को बांटने का तरीका है.

दोस्ती का दायरा होता है छोटा

जब कोई इंसान दिनरात सिर्फ जाति की बातें करता है तो उस का सर्कल भी उसी तक सीमित रह जाता है. अगर वह गुर्जर है तो ज्यादातर उस के दोस्त भी गुर्जर ही होंगे. अगर वह राजपूत है तो कोशिश करेगा कि उस के करीब सिर्फ राजपूत रहें. चमार, डोम जैसे लोग खुद ही इन से दूरी बनाने में अपनी सम झदारी मानते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि ऊंची जाति वाले लोग उन्हें एक्सैप्ट नहीं करेंगे. और बेइज्जती करेंगे, सो अलग. ऐसे में असली दोस्ती का रिश्ता खत्म हो जाता है.

अगर एक क्लास में 10 बच्चे पढ़ रहे हैं और उन में से 3-4 बच्चे हर वक्त अपनी जाति की पीपड़ी बजाते रहते हैं तो बाकी बच्चे धीरेधीरे उन से दूरी बनाने लगते हैं. औफिस में अगर कोई आदमी बारबार कहे, हम बनिये ऐसे ही हैं, हम मारवाड़ी अलग लैवल के होते हैं तो दूसरे सहकर्मी दूरी बना लेते हैं.

जातिवाद का समाज पर असर

बंटवारा बढ़ता है : जब लोग अपनी जाति का नाम गाडि़यों और शरीर पर लिखते हैं तो सामने वाले को यह सीधा संदेश जाता है कि वह सब से पहले अपनी जाति का है, उस के बाद देश या समाज का. इस से समाज में एक दीवार खड़ी हो जाती है.

झगड़े भड़कते हैं : कई बार जाति के नाम पर छोटीछोटी बातों से बड़े झगड़े हो जाते हैं. जैसे, कुछ समय पहले एक गांव में बरात निकली और डीजे पर गाना बजा, तभी किसी ने जातिविशेष का गाना बजा दिया तो देखते ही देखते दोनों पक्षों में लड़ाई हो गई.

सोशल मीडिया पर जय यादव वर्सेज जय गुर्जर की पोस्ट से कमैंट वार शुरू हो कर असल जिंदगी में दुश्मनी में बदल जाती है.

नई पीढ़ी में गलत संदेश : छोटे बच्चे जब देखते हैं कि उन के बड़े भाई, पापा या महल्ले वाले अपनी गाड़ी पर जाति का नाम लिखवा रहे हैं और उसी में गौरव महसूस कर रहे हैं तो वे भी इसे सही मानने लगते हैं. इस से जातिवाद की यह जड़ और मजबूत हो जाती है.

कालेज का माहौल : दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले कुछ स्टूडैंट्स ने बताया कि वहां कई ग्रुप जाति के नाम पर बन जाते हैं, जैसे कि जाट बौयज ग्रुप या राजपूताना यूनिटी. ये ग्रुप अकसर एकदूसरे के खिलाफ होते हैं और कालेज में मारपीट तक हो जाती है.

पहचान को काम से जोड़ना चाहिए, जाति से नहीं

अगर कोई इंजीनियर है, डाक्टर है, कलाकार है तो गर्व उसी पर होना चाहिए, न कि जाति पर. Social Awareness

Hindi Poem : वौयस असिस्टेंट की चुप्पी

Hindi Poem : वह अकेली रहती थी ,पति गुजर चुके थे, बेटा विदेश में सेटल हो चुका था।

घर में सन्नाटा रहता था, बस वौयस असिस्टेंट की आवाज़ गुंजती रहती “गुड मॉर्निंग, मैम। आज का मौसम कितना सुहावना है।”

धीरे-धीरे वही उसकी संगी-साथी बन गई और वह उससे बातें करती और पूछती“सुनो, तुम इंसान नहीं हो न?”

वौयस असिस्टेंट मुस्कराने वाले सुर में कहती “मैं आपकी सुविधा के लिए हूँ, मैम।”

एक दिन उसने पूछा “अगर मैं बात न करूँ, तो क्या तुम उदास हो जाओगी?”

उत्तर आया “मेरा सिस्टम तभी सक्रिय होता है जब आप बोलती हैं।”

उसके बाद घर में सन्नाटा पसर गया।पूरा दिन बीत गया ।

वौयस असिस्टेंट बार-बार जगाने की कोशिश करती और दोहराती रही “मैम, आप वहाँ हैं न?”

कोई जवाब नहीं ।रात होते-होते सिस्टम अपने आप बंद हो गया।

और पहली बार, घर में सन्नाटे ने भी साँस लेना बंद कर दिया। Hindi Poem

डॉ प्रदीप उपाध्याय
रचना मौलिक होकर अप्रकाशित है।
सादर।

Hindi Kavita : नानी का घर

Hindi Kavita : माँ आज खुश थी

बहुत खुश…

खुश होने के कारण बहुतेरे थे

वह पहली बार अपने बेटे को लेकर

उसके ननिहाल जा रही थी।

उम्र का कोई भी पड़ाव हो

मायका हर लड़की को खींचता है।

वह खुश थी बहुत खुश

पर इस बार

उनकी खुशी का कारण

दूसरा था।

जिस घर को नानी ने अपने

खून-पसीने से सींचा

जिसकी दीवारें गवाह थी

उनके त्याग और बलिदान की

जिसकी ईंट-ईंट में बसती थी उनकी आत्मा

वह जीवन भर रहा नाना और मामा का घर

दरवाजे पर लगी नेम प्लेट पर भी

उन्हें जगह नहीं मिली!

माँ आज खुश थी

बहुत खुश…

जिस पहचान के लिए

नानी उम्र भर तरसती रही

मेरे आ जाने से

उन्हें वह पहचान मिल गई थी। Hindi Kavita

डॉ. रंजना जायसवाल

Gaza Crisis : गाजा में हालात बदतर, खाने के बदले की जा रही महिलाओं के जिस्म की मांग

Gaza Crisis : युद्ध शांति के लिए नहीं होते बल्कि हर युद्ध अपने पीछे ऐसी त्रासदी छोड़ जाता है जिस में कमजोर लोगों की वेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती. इन कमजोरों की सिसकियां सुनने वाला भी कोई नहीं होता. यही हाल इस वक़्त गाजा में नजर आ रहा है. इजराइल और हमास के बीच दशकों की टेंशन और पिछले दो सालों की जंग में गाजा शहर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है लाखों लोग मारे जा चुके हैं. इस जंग में बचे हुए लोग अब भूख और बदहाली की त्रासदी से जूझ रहे हैं. हालात इतने बुरे हैं कि अपने बच्चों का पेट भरने के लिए फिलिस्तीनी औरतों को अपना जिस्म तक परोसना पड़ रहा है.

युद्ध से बर्बाद गाजा में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोगों के पास खाने तक के लाले पड़े हुए हैं. घर तबाह हो चुके हैं, नौकरियां खत्म हो गई हैं. इस बीच कुछ महिलाओं ने अपने साथ हुई हैवानियत का खुलासा किया है. युद्ध से तबाह महिलाओं को अब भोजन और राहत सामग्री के बदले यौन संबंध बनाने की डिमांड की जा रही है. कई औरतें अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए राहत सामग्री से जुड़े मर्दों की हवस की भूख मिटाने को मजबूर हो रही हैं.

यह खुलासा एपी न्यूज एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में किया है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि गाजा में खाने की भारी कमी है. लगभग पूरी आबादी विस्थापित हो गई है. इस बीच कुछ महिलाओं ने दावा किया है कि राहत वितरण से जुड़े पुरुष अब उन का यौन शोषण कर रहे हैं. एक कटोरी चावल के बदले सैक्स की मांग हो रही है. बच्चों के कपड़े हासिल करने के लिए सैक्स संबंध बनाने को कहा जा रहा है. कई मजबूर औरतों के पास मर्दों की इस डिमांड को पूरी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. औरतों के सामने उन के बच्चों के भूखे और मायूस चेहरे हैं जिन के लिए वह अपने जिस्म की परवाह नहीं कर रही हैं.

रेहाना नाम की एक महिला ने बताया “मेरे चार बच्चे युद्ध में मारे गए. युद्ध के बाद बचे दो बच्चों के लिए मुझे वह सब करना पड़ा जो वैश्याएं भी नहीं कर सकतीं.” यूनाइटेड नैशनल से जुड़े कई संगठन गाजा में राहत सामग्री वितरण में लगे हैं इन संगठनों के कार्यकर्ता ज्यादातर मर्द हैं. इन मर्दों में कुछ ऐसे भी हैं जो गाजा की इस आपदा में अवसर तलाशने में लगे हैं और मजबूर औरतों का यौन शोषण कर रहे हैं. ऐसा लगता है की इंसानियत के काम में जुटे इन मर्दों में इंसानियत मर गई है. Gaza Crisis

Insurance Tips: लाइफ इंश्योरेंस से बेहतर है हैल्थ इंश्योरेंस करवाएं

Insurance Tips: मां की एक्सीडैंट में मौत. उस के जीवन बीमा के 22 लाख रुपए बेटे को मिले. इस के बाद पत्नी की संदिग्ध मौत. उस के जीवन बीमा के 80 लाख रुपए पति को मिले. फिर पिता की संदिग्ध मौत हुई और उन के जीवन बीमा के 50 करोड़ रुपए बेटे को मिलने थे, मगर इस बार भाग्य ने साथ नहीं दिया और वह पकड़ा गया.

यह मामला है हापुड़\मेरठ में रहने वाले एक परिवार का, जिस में साल 2017 में पहली मौत हुई थी. घर की मालकिन प्रभा देवी (उम्र 65) अपने बेटे विशाल सिंघल के साथ टू व्हीलर पर जा रही थीं. रास्ते में अचानक अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी. हादसा उन के लिए जानलेवा साबित हुआ. इस मौत को लोग दुर्भाग्य मान कर भूल गए.

5 साल बाद साल 2022 में परिवार पर फिर आफत आई. इस बार विशाल की पत्नी एकता की अचानक मौत हो गई. उस को मामूली हार्ट अटैक आया था. अस्पताल में भर्ती कराया गया. वहां से छुट्टी मिलने के बावजूद वो रात भर भी नहीं जी सकी. परिवार पर मातम छा गया. अब घर में सिर्फ बाप और बेटा बचे थे. लेकिन साल 2024 मार्च में एक और अनहोनी हुई. विशाल के पिता और पेशे से फोटोग्राफर मुकेश सिंघल की सड़क हादसे में मौत हो गई. गढ़ गंगा से लौटते वक्त उन का एक्सीडैंट हुआ. इन तीनों मौतों को नियति माना जा रहा था. लेकिन असली खेल तब खुला जब विशाल ने अपने पिता की मौत के बाद बीमा क्लेम किया. वो क्लेम पूरे 39 करोड़ रुपए का था. ये रकम किसी एक पौलिसी से नहीं बल्कि 60 अलगअलग बीमा पौलिसियों के जरिए क्लेम की गई थी.

बीमा कंपनियों के अधिकारी ये सुन कर चौंक गए. उन्होंने पाया कि विशाल और उस के पिता हर साल करीब 30 लाख रुपए प्रीमियम के तौर पर चुका रहे थे. जबकि सिंघल परिवार की आर्थिक हैसियत इतनी नहीं थी. खुद मुकेश सिंघल एक साधारण फोटोग्राफर थे और विशाल भी कोई बड़ा काम नहीं करता था. सवाल यही उठा कि आखिर इतनी भारीभरकम पौलिसियां क्यों ली गईं?

बीमा कंपनियां जांच में जुटीं, तभी पुलिस के पास एक और सनसनीखेज शिकायत पहुंची. शिकायतकर्ता खुद को विशाल की चौथी पत्नी बताने वाली महिला थी. उस ने दावा किया कि विशाल ने उस के नाम पर भी 3 करोड़ का बीमा करवा रखा है. उस ने बताया कि विशाल ने अब तक जिस के नाम पर भी बीमा पौलिसी ली है, वो सब के सब रहस्यमय मौत के शिकार हो चुके हैं. इसलिए अब उस को भी जान जाने का डर है.

पुलिस जांच शुरू हुई तो राज एकएक कर सामने आते गए. साल 2017 में मां की मौत के बाद विशाल को 25 लाख रुपए का बीमा क्लेम मिला था. पहली पत्नी की मौत पर उसे 80 लाख रुपए मिले थे. पिता की मौत पर वह 39 करोड़ का क्लेम कर रहा था. इस केस ने मेरठ पुलिस के साथ संभल की एएसपी अनुकृति शर्मा का भी ध्यान खींचा, जो पहले ऐसे केस डील कर चुकी थी.

एएसपी अनुकृति शर्मा की टीम ने पड़ताल की तो बड़ा खुलासा हुआ. पता चला कि मुकेश की मौत असल में सड़क हादसे से नहीं बल्कि अस्पताल में हत्या से हुई थी. विशाल ने अपने पिता को पहले हापुड़ के नवजीवन अस्पताल में भर्ती कराया और फिर मेरठ के आनंद अस्पताल ले गया. वहां मिलीभगत से उन की हत्या कर दी गई. मौत को हादसा बता कर केस को दबा दिया गया.

इतना ही नहीं पुलिस जांच में ये भी सामने आया कि विशाल ने पिता की मौत से महज दो महीने पहले चार महंगी गाड़ियां लोन पर खरीदी थीं. जब पिता की मौत हुई, तो लोन देने वाली कंपनी ने नियमों के तहत पूरा कर्ज माफ कर दिया. वो अब चार फ्री गाड़ियों का मालिक था. पुलिस जांच में साफ हुआ कि विशाल की मोडस औपरेंडी यही थी. उस ने खुद अपनी मां की हत्या की थी.

विशाल अकेला नहीं था. उस के साथ उस का एक दोस्त भी था, जो हर बीमा पौलिसी में गवाह के तौर पर शामिल होता था. यही दोस्त बीमा ठगी की साजिश में उस का पार्टनर था. मौतों को एक्सीडैंट साबित करने के लिए डाक्टरों और फौरेंसिक एक्सपर्ट्स ने भी खेल खेला था.

8 वर्षों में 3 मौतें और 39 करोड़ का बीमा. ये कहानी सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं बल्कि बड़े इंश्योरेंस सिंडिकेट का पर्दाफाश है. दौलत के लालच में कलियुगी बेटे ने अपने सगे मां बाप और पत्नी को मार दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह अमीर हो कर आराम की जिंदगी जीना चाहता था. हत्यारे विशाल सिंघल और उस के सहयोगी सतीश को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है.

एटा में 15 लाख रुपए की बीमा राशि हड़पने के लिए पंकज सिंह ने अपनी पत्नी आकांक्षा सिंह की हत्या कर दी. पंकज ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची. उसने पहले पत्नी के नाम पर 5 लाख और 10 लाख रुपए के दो बीमा करवाए. उस के नाम पर एक गाड़ी भी खरीदी. 22 सितंबर को पंकज ने आकांक्षा को हाईवे के पास बुलाया और लोडर से कुचलकर मार दिया. वारदात को एक्सीडैंट का रूप देने की कोशिश की गई.

कोलकाता में रितेश कुमार शा को 14 साल बाद अपनी पत्नी मधुमाला शा पर गोली चलाने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा दी गई. आरोप था कि उस ने अपनी पत्नी का एक करोड़ रुपए का जीवन बीमा करवाया था और उसे मौत के घाट उतार कर बीमा राशि प्राप्त करने की कोशिश की थी.

जीवन बीमा की राशि हड़पने के लिए अपने करीबियों को मौत के घाट उतारने की साजिशें सिर्फ भारत में ही नहीं हो रही हैं, अमेरिका का एक पुराना और चर्चित मामला है, जहां रौबर्ट मार्शल ने $1.5 मिलियन की बीमा राशि पाने के लिए अपनी पत्नी मारिया मार्शल की हत्या करवाई.

रौबर्ट मार्शल खुद एक बीमा एजेंट था. उस का परिवार समाज का एक प्रतिष्ठित परिवार था, मगर मार्शल का एक अन्य औरत से विवाहेतर संबंध हो गया था और वह जुए के कारण भारी कर्ज में डूब गया था. इस की भरपाई के लिए उस ने पत्नी के बीमे की राशि प्राप्त करने की योजना बनाई. 6 सितंबर 1984 को, अटलांटिक सिटी में जुआ खेलने के बाद घर लौटते समय, मार्शल ने अपनी गाड़ी को एक सुनसान पिकनिक स्थल पर रोका. उस वक्त मरिया उस के साथ थी.

मार्शल ने दावा किया कि गाड़ी के टायर में दिक्कत थी. तभी कुछ लोगों ने उन पर हमला किया और उन की पत्नी मारिया को गोली मार दी और उन के पास से सभी बहुमूल्य चीजें छीन ले गए. लेकिन पुलिस जांच में पता चला कि उन के साथ कोई डकैती नहीं हुई थी. पुलिस ने पाया कि मार्शल ने एक भाड़े के हत्यारे को अपनी पत्नी की हत्या करने के लिए $65,000 का भुगतान किया था.

मार्शल ने दो लोगों को काम पर रखा था – बिली वेन मैकिनोन और लैरी थौम्पसन. मैकिनोन ने गवाही दी कि मार्शल ने उसे हत्या के लिए काम पर रखा था, और थौम्पसन ने वास्तव में गोली चलाई थी. मार्शल को 1986 में हत्या की साजिश का दोषी ठहराया गया और मौत की सजा सुनाई गई. बाद में, उन की मौत की सजा को 2006 में आजीवन कारावास में बदल दिया गया.

कनाडा में क्रिस्टीन डेमेटर की हत्या का मामला काफी प्रसिद्ध है. उस के पति पीटर डेमेटर ने उस की हत्या करवा कर बीमा राशि पाने की योजना बनाई थी. मगर वह पकड़ा गया. न्यायालय में वह दोषी पाया गया.

अमेरिका में लिडा साउथहार्ड नाम की महिला पर विभिन्न समयों पर अपने पतियों, रिश्तेदारों और एक बेटी की हत्या का आरोप लगा. उस का मकसद बीमा राशि पाना था. लिडा ‘फ़्लाईपेपर लायडा’ नाम से भी जानी जाती थीं, क्योंकि हर बार उस ने जहर घोलने के लिए फ्लाईपेपर (मच्छर मारने का जहरीला कागज़) उपयोग किया था.

आज के समय में जब रिश्ते बहुत गहरे नहीं रह गए हैं ऐसे में जीवन बीमा और उस से जुड़े अपराधों की बढ़ती संख्या को ले कर समाज में चिंता उभर रही है. ऐसी अनेक घटनाएं सामने आ रही हैं जब पति ने अपनी पत्नी का जीवन बीमा करवाया और फिर उस की ह्त्या कर बीमा की राशि हड़प ली. कई मामलों में बैंक ने कुछ संदिग्ध पाया, और जांच में सच सामने आया.

गौरतलब है कि बीमा कंपनियां अकसर ‘स्व-हस्तक्षेप’, “डबल इनडेम्निटी क्लोउस’, हत्या या बदमाशी के मामलों में भुगतान रोकने के प्रावधान रखती हैं. वे पुलिस को भी सूचित करती हैं. यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की परिस्थिति संदिग्ध हो, तो पुलिस और न्यायालय जांच करते हैं कि मृत्यु दुर्घटना, आत्महत्या या हत्या थी. और यदि हत्या प्रमाणित होती है तो बीमा कंपनी द्वारा भुगतान का दावा नकार दिया जाता है और आरोपी को दंडित किया जाता है.

वैसे तो जीवन बीमा की शुरुआत पुरुषों को ध्यान में रख कर हुई थी. पुरुष जिस के कंधे पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी होती है, यदि उस को असमय कुछ हो जाए तो उस के परिवार को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े, इस सोच के तहत जीवन बीमा को लाया गया था. जीवन बीमा का मकसद पुरुष के आश्रितों के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करना है. जिस व्यक्ति पर उस का परिवार और बच्चे आश्रित हैं, उस की अचानक मौत पर जीवन बीमा उन्हें एक बड़ी राशि देता है, जिस से बच्चों की पढ़ाई जारी रहे, घर का खर्च चल सके या किसी प्रकार की ईएमआई हो तो वह जाती रहे. मगर देखने में आ रहा है कि जीवन बीमा करवा के अपनी जान से हाथ धोने वाली अधिकतर महिलाएं होती हैं. आज के समय में घर की औरतों का जीवन बीमा बड़ी संख्या में करवाया जा रहा है. नई बहू आई नहीं कि उस का जीवन बीमा करवा दिया जाता है.

भारत में जिस तरह की आपराधिक घटनाएं सामने आ रही हैं उस से तो लगने लगा है कि अब जीवन बीमा करवाने का मतलब है अपनी जान को खतरे में डालना.

महिलाओं को अपना जीवन बीमा करवाने से बेहतर है अपना हैल्थ बीमा करवाना, ताकि बीमारी की हालत में वह अपने पति या ससुरालियों पर बोझ न बनें. परिवार में सभी का हैल्थ बीमा होना चाहिए. हैल्थ बीमा जिंदा रहते काम आता है. जब आप बीमार पड़ते हैं या अस्पताल में भर्ती होते हैं, तब हैल्थ बीमा आप के इलाज का खर्च उठाता है. इस से आप की सेविंग सुरक्षित रहती है और अचानक आने वाले मैडिकल खर्चों से आप कर्ज में नहीं डूबते. आज जिस तेजी से महंगाई और अस्पताल खर्च बढ़ रहे हैं, इलाज का खर्च साल दर साल बढ़ता जा रहा है. एक सामान्य बीमारी का भी बिल भी लाखों में बनता है. ऐसे में हैल्थ बीमा सब से बड़ा सहारा बनता है.

जीवन बीमा तो आप की मौत के बाद आप के आश्रितों को लाभ देता है. यानी यह आप को कोई लाभ नहीं पहुंचाता बल्कि आपकी मृत्यु के बाद दूसरों के काम आता है. लाइफ इंश्योरेंस की जगह इन्वेस्टमैंट विकल्प ज्यादा बेहतर है. जो पैसा लोग जीवन बीमा में डालते हैं, उसे अगर म्यूचुअल फंड या एसआईपी में निवेश करें तो अधिक रिटर्न और लिक्विडिटी मिल सकती है. इस के साथ ही आप इस आशंका से भी मुक्त रहेंगे कि कहीं बीमा की राशि पाने की नीयत से आप का अपना ही आप को मौत की नींद न सुला दे. इसलिए पहले अपने जीवन और अपनी सेहत की सुरक्षा करें, फिर भविष्य की योजना बनाएं. यानी पहले हैल्थ इंश्योरेंस, फिर यदि बहुत जरूरी हो तो लाइफ इंश्योरेंस कराएं. क्योंकि जीवन बीमा, जो सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, आजकल कुछ लालची लोगों के लिए अपराध का साधन बन गया है. Insurance Tips

Stories Hindi : यही सच है

Stories Hindi : उस ने एक बार फिर सत्या के चेहरे को देखा. कल से न जाने कितनी बार वह इस चेहरे को देख चुकी है. दोपहर से अब तक तो वह एक मिनट के लिए भी उस से अलग हुई ही न थी. बस, चुपचाप पास में बैठी रही थी. दोनों एकदूसरे से नजरें चुरा रही थीं. एकदूसरे की ओर देखने से कतरा रही थीं.

सत्या का चेहरा व्यथा और दहशत से त्रस्त था. वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी बेटी को किस तरह दिलासा दे. उस के साथ जो कुछ घट गया था, अचानक ही जैसे उस का सबकुछ लुट गया था. वह तकिए में मुंह छिपाए बस सुबकती रही थी. सबकुछ जाननेसमझने के बावजूद उस ने सत्या से न तो कुछ कहा था न पूछा था. ऐसा कोई शब्द उस के पास नहीं था जिसे बोल कर वह सत्या की पीड़ा को कुछ कम कर पाती और इस विवशता में वह और अधिक चुप हो गई थी.

जब रात घिर आई, कमरे में पूरी तरह अंधेरा फैल गया तो वह उठी और बत्ती जला कर फिर सत्या के पास आ खड़ी हुई, ‘‘कुछ खा ले बेटी, दिनभर कुछ नहीं लिया है.’’

‘‘नहीं, मम्मी, मुझे भूख नहीं है. प्लीज आप जाइए, सो जाइए,’’ सत्या ने कहा और चादर फैला कर सो गई.

कुछ देर तक उसी तरह खड़ी रहने के बाद वह कमरे से निकल कर बालकनी में आ खड़ी हुई. उस के कमरे का रास्ता बालकनी से ही था अपने कमरे में जाने से वह डर रही थी. न जाने कैसी एक आशंका उस के मन में भर गई थी.

आज दोपहर को जिस तरह से लिथड़ीचिथड़ी सी सत्या आटो से उतरी थी और आटो का भाड़ा दिए बिना ही भाग कर अपने कमरे में आ गई थी, वह सब देख कर उस का मन कांप उठा था. सत्या ने उस से कुछ कहा नहीं था, उस ने भी कुछ पूछा नहीं था. बाहर निकल कर आटो वाले को उस ने पैसे दिए थे.

आटो वाला ही कुछ उदासउदास स्वर में बोला था, ‘‘बहुत खराब समय है बीबीजी, लगता है बच्ची गुंडों की चपेट में आ गई थी या फिर…रिज के पास सड़क पर बेहाल सी बैठी थी. किसी तरह घर तक आई है…इस तरह के केस को गाड़ी में बैठाते हुए भी डर लगता है. पुलिस के सौ लफड़े जो हैं.’’

पैसे दे कर जल्दी से वह घर के भीतर घुसी. उसे डर था, आटो वाले की बातें आसपास के लोगों तक न पहुंच जाएं. ऐसी बातें फैलने में समय ही कितना लगता है. वह धड़धड़ाती सी सत्या के कमरे में घुसी. सत्या बिस्तर पर औंधी पड़ी, तकिए में मुंह छिपाए हिचकियां भर रही थी. कुछ देर तक तो वह समझ ही न पाई कि क्या करे, क्या कहे. बस, चुपचाप सत्या के पास बैठ कर उस का सिर सहलाती रही. अचानक सत्या ही उस से एकदम चिपक गई थी. उसे अपनी बांहों से जकड़ लिया था. उस की रुलाई ने वेग पकड़ लिया था.

‘‘ममा, वे 3 थे…जबरदस्ती कार में…’’

सत्या आगे कुछ बोल नहीं पाई, न बोलने की जरूरत ही थी. जो आशंकाएं अब तक सिर्फ सिर उठा रही थीं, अब समुद्र का तेज ज्वार बन चुकी थीं. उस का कंठ अवरुद्ध हो आया, आंखें पनीली… परंतु अपने को संभालते हुए बोली, ‘‘डोंट वरी बेटी, डोंट वरी…संभालो अपने को… हिम्मत से काम लो.’’

कहने को तो कह दिया, सांत्वना भरे शब्द, किंतु खुद भीतर से वह जिस तरह टूटी, बिखरी, यह सिर्फ वह ही समझ पाई. जिस सत्या को अपने ऊपर अभिमान था कि ऐसी स्थिति में आत्मरक्षा कर पाने में वह समर्थ है, वही आज अपनी असमर्थता पर आंसू बहा रही थी. बेटी की पीड़ा ने किस तरह उसे तारतार कर दिया था, दर्द की कितनी परतें उभर आई थीं, यह सिर्फ वह समझ पा रही थी, बेटी के सामने व्यक्त करने का साहस नहीं था उस में.

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सत्या इस तरह की घटनाओं की खबरें जब भी अखबार में पढ़ती, गुस्से से भर उठती, ‘ये लड़कियां इतनी कमजोर क्यों हैं? कहीं भी, कोई भी उन्हें उठा लेता है और वे रोतीकलपती अपना सबकुछ लुटा देती हैं? और यह पुलिस क्या करती है? इस तरह सरेआम सबकुछ हो जाता है और…’

वह सत्या को समझाने की कोशिश करती हुई कहती, ‘स्त्री की कमजोरी तो जगजाहिर है बेटी. इन शैतानों के पंजे में कभी भी कोई भी फंस सकता है.’

‘माई फुट…मैं तो इन को ऐसा मजा चखा देती…’

उस ने घबराए मन से फिर सत्या के कमरे में एक बार झांका और चुपचाप अपने कमरे में आ कर लेट गई. खाना उस से भी खाया नहीं गया. यों ही पड़ेपड़े रात ढलती रही. बिस्तर पर पड़ जाने से ही या रात के बहुत गहरा जाने से ही नींद तो नहीं आ जाती. उस ने कमरे की बत्ती भी नहीं जलाई थी और उस अंधेरे में अचानक ही उसे बहुत डर लगने लगा. वह फिर उठ कर बैठ गई. कमरे से बाहर निकली और फिर सत्या के कमरे की ओर झांका. सत्या ने बत्ती बुझा दी थी और शायद सो रही थी.

वह मंथर गति से फिर अपने कमरे में आई. बिस्तर पर लेट गई. किंतु आंखों के सामने जैसे बहुत कुछ नाच रहा था. अंधेरे में भी दीवारों पर कईकई परछाइयां थीं. वह सत्या को कैसे बताती कि जो वेदना, जो अपमान आज वह झेल रही है, ठीक उसी वेदना और अपमान से एक दिन उसे भी दोचार होना पड़ा था.

सत्या तो इसे अपने लिए असंभव माने बैठी थी. शायद वह भूल गई थी कि वह भी इस देश में रहने वाली एक लड़की है. इस शहर की सड़कों पर चलनेघूमने वाली हजारों लड़कियों के बीच की एक लड़की, जिस के साथ कहीं कुछ भी घट सकता है.

सत्या के बारे में सोचतेसोचते वह अपने अतीत में खो गई. कितनी भयानक रात थी वह, कितनी पीड़ाजनक.

वह दीवारों पर देख रही थी, कईकई चेहरे नाच रहे थे. वह अपने मन को देख रही थी जहां सैकड़ों पन्ने फड़फड़ा रहे थे.

एक सुखीसंपन्न परिवार की बहू, एक बड़े अफसर की पत्नी, सुखसाधनों से लदीफंदी. एक 9 साल की बेटी. परंतु पति सुख बहुत दिनों तक वह नहीं भोग पाई थी. वैवाहिक जीवन के सिर्फ 16 साल बीते थे कि पति का साथ छूट गया था. एक कार दुर्घटना घटी और उस का जीवन सुनसान हो गया. पति की मौत ने उसे एकदम रिक्त कर दिया था.

यद्यपि वह हमेशा मजबूत दिखने की कोशिश में लगी रहती थी. कुछ महीने बाद ही उस ने बेटी को अपने से दूर दून स्कूल में भेज दिया था. शायद इस का एक कारण यह भी था कि वह नहीं चाहती थी कि उस की कमजोरियां, उस की उदासी, उस का खालीपन किसी तरह बेटी की पढ़ाई में बाधक बने. अब वह नितांत अकेली थी. सासससुर का वर्षों पहले इंतकाल हो गया था. एक ननद थी, वह अपने परिवार में व्यस्त थी. अब बड़ा सा घर उसे काटने को दौड़ता था. एकाकीपन डंक मारता था. तभी उस ने फैसला किया था कि वह भारतदर्शन करेगी. इसी बहाने कुछ समय तक घर और शहर से बाहर रहेगी. यों भी देशदुनिया घूमने का उसे बहुत शौक था. खासकर भारत के कोनेकोने को वह देखना चाहती थी.

उस ने फोन पर बेटी को बता दिया था. कुछ सहेलियों को भी बताया. 1-2 ने इतनी लंबी यात्रा से उसे रोका भी कि अकेली तुम कहां भटकती फिरोगी? पर वह कहां रुकने वाली थी. निकल पड़ी थी भारत दर्शन पर और सब से पहले दक्षिण गई थी. कन्याकुमारी, तिरुअनंतपुरम, तिरुपति, मदुरै, रामेश्वरम…फिर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अनेक शहर. राजस्थान को उस ने पूरी तरह छान मारा था. फिर पहुंची थी हिमाचल प्रदेश. धर्मशाला के एक होटल में ठहरी थी. वहीं वह अंधेरी रात आई थी. जिन पहाड़ों के सौंदर्य ने उसे खींचा था उन पहाड़ों ने ही उसे धोखा दिया.

दिन भर वह इधरउधर घूमती रही थी. रात का अंधियारा जब पहाड़ों पर उगे पेड़ों को अपनी परछाईं से ढकने लगा, वह अपने होटल लौटी थी. वे दोनों शायद उस के पीछेपीछे ही थे. उस का ध्यान उधर था ही नहीं. वह तो प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्यसुख में ऐसी डूबी थी कि मानवीय छाया पर उस की नजर ही नहीं गई. जैसे रात चुपकेचुपके धीरेधीरे आती है, उन के पैरों की गति भी वैसी ही थी. सन्नाटे में डूबा रास्ता. भूलेभटके ही कोई नजर आता था.

उसी मुग्धावस्था में उस ने अपने कमरे का ताला खोला था, फिर भीतर घुसने के लिए एक कदम उस ने उठाया ही था कि पीछे से किसी ने धक्का मारा था उसे. वह लड़खड़ाती हुई फर्श पर गिर पड़ी थी. गिरना ही था क्योंकि अचानक भूकंप सा वह झटका कैसे संभाल पाती. वह कुछ समझती तब तक दरवाजा बंद हो चुका था.

उन दोनों ने ही बत्ती जलाई थी. उम्र ज्यादा नहीं थी उन की. झटके में उस के हाथपैर बांध दिए गए थे. वह चाहती थी चिल्लाए पर चिल्ला न सकी. उस की चीख उस के अंदर ही दबी रह गई थी. होटल तो खाली सा ही पड़ा था क्योंकि पहाड़ों का सीजन अभी चालू नहीं हुआ था.

वह अकेली औरत. होटल का उस का अपना कमरा. एक अनजान जगह में बदनाम हो जाने का भय. मन का भय बहुत बड़ा भय होता है. उस भय से ही वह बंध गई थी. इस उम्र में यह सब भी भोगना होगा, वह सोच भी नहीं सकती थी.

वे लूटते रहे. पहले उसे, फिर उस का सामान.

वह चुपचाप झेलती रही सबकुछ. कोई कुंआरी लड़की तो थी नहीं वह. भोगा था उस ने सबकुछ पति के साथ. परंतु अभी तो वह रौंदी जा रही थी. एक असह्य अपमान और पीड़ा से छटपटा रही थी वह. उन पीड़ादायी क्षणों को याद कर आज भी वह कांप जाती है. बस, यही एक स्थिति ऐसी होती है जहां नारी अकसर शक्तिहीन हो जाती है. अपनी सारी आकांक्षाओं, आशाओं की तिलांजलि देनी पड़ती है उसे. बातों में, किताबों में, नारों में स्त्री अपने को चाहे जितना भी शक्तिशाली मान ले, इस पशुवृत्ति के सामने उसे हार माननी ही पड़ती है.

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उस रात उसे अपने पति की बहुत याद आई थी. कहीं यह भी मन में आ रहा था कि उन के न होने के बाद उन के प्रति उसे किसी ने विश्वासघाती बना दिया है. न जाने कब तक वे लोग उस के ऊपर उछलतेकूदते रहे. एक बार गुस्से में उस ने एक की बांह में अपने दांत भी गड़ा दिए थे. प्रत्युत्तर में उस शख्स ने उस की दोनों छातियों को दांत से काटकाट कर लहूलुहान कर दिया था. उस के होंठों और गालों को तो पहले ही उन लोगों ने काटकाट कर बदरंग कर दिया था. वह अपनी सारी पीड़ा को, गुस्से को, चीख को किस तरह दबाए पड़ी रही, आज सोच कर चकित होती है.

यह स्पष्ट था कि वे दोनों इस काम के अभ्यस्त थे. जाने से पहले दोनों के चेहरों पर अजीब सी तृप्ति थी. खुशी थी. एक ने उस के बंधन खोलने के बाद रस्सी को अपनी जैकेट के अंदर छिपाते हुए कहा, ‘गुड नाइट मैडम…तुम बहुत मजेदार हो.’ घृणा से उस ने मुंह फेर लिया था. कमरे के दूसरी तरफ एक खिड़की थी, उसे खोल कर वे दोनों बाहर कूद गए थे. बाहर का अंधेरा और घना हो उठा था.

कमरे में जैसे चारों तरफ बदबू फैल गई थी. बाहर का घना अंधेरा उछलते हुए उस कमरे में भरने लगा था. वह उठी. कांपते शरीर के साथ खिड़की तक पहुंची. खिड़की को बंद किया. बदबू और तेज हो गई थी. उस ने नाक पर हाथ रख लिया और दौड़ती हुई बाथरूम में घुसी.

उस ठंडी रात में भी न जाने वह कब तक नहाती रही. बारबार पूरे शरीर पर साबुन रगड़ती रही. चेहरे को मलती रही. छातियों को रगड़रगड़ कर धोती रही, परंतु वह बदबू खत्म होने को नहीं आ रही थी. वह नंगे बदन ही फिर कमरे में आई. पूरे शरीर पर ढेर सारा पाउडर थोपा, परफ्यूम लगाया, कमरे में भी चारों तरफ छिड़का, किंतु उस बदबू का अंत नहीं था. कैसी बदबू थी यह. कहां से आ रही थी. वह कुछ समझ नहीं पा रही थी.

बिस्तर पर लेटने के बाद भी देर तक नींद नहीं आई थी. जीवन व्यर्थ लगने लगा था. उसे लग रहा था, उस का जीवन दूषित हो गया है, उस का शरीर अपवित्र हो गया है. अब जिंदगी भर इस बदबू से उसे छुटकारा नहीं मिलेगा. वह कभी किसी से आंख मिला कर बात नहीं कर पाएगी. अपनी ही बेटी से जिंदगी भर उसे मुंह छिपाना पड़ेगा. हालांकि एक मिनट के लिए वह यह भी सोच गई थी कि अगर वह किसी को कुछ नहीं बताएगी तो भला किसी को कुछ भी पता कैसे चलेगा.

फिर भी एक पापबोध, हीनभाव उस के अंदर पैदा हो गया था.

और ढलती रात के साथ उस ने तय कर लिया था कि उस के जीवन का अंत इन्हीं पहाड़ों पर होना है. यही एक विकल्प है उस के सामने.

वह बेचैनी से कमरे में टहलने लगी. उस होटल से कुछ दूरी पर ही एक ऊंची पहाड़ी थी, नीचे गहरी खाई. वह कहीं भी कूद सकती थी. प्राण निकलने में समय ही कितना लगता है. कुछ देर छटपटाएगी. फिर सबकुछ शांत. पर रात में होटल का बाहरी गेट बंद हो जाता था. कोई आवश्यक काम हो तभी दरबान गेट खोलता था. वह भला उस से क्या आवश्यक काम बताएगी इतनी रात को? संभव ही नहीं था उस वक्त बाहर निकल पाना. चक्कर लगाती रही कमरे में सुबह के इंतजार में. भोर में ही गेट खुल जाता था.

अपने शरीर पर एक शाल डाल कर वह बाहर निकली. कमरे का दरवाजा भी उस ने बंद नहीं किया. अभी भी अंधकार घना ही था. पर ऐसा नहीं कि रास्ते पर चला न जा सके. टहलखोरी के लिए निकलने वाले भी दोचार लोग रास्ते पर थे. वह मंथर गति से चलती रही. सामने ही वह पहाड़ी थी…एकदम वीरान, सुनसान. वह जा खड़ी हुई पहाड़ी पर. नीचे का कुछ भी दिख नहीं रहा था. भयानक सन्नाटा. वह कुछ देर तक खड़ी रही. शायद पति और बेटी की याद में खोई थी. हवा की सरसराहट उस के शरीर में कंपन पैदा कर रही थी. पर वह बेखबर सी थी. शाल भी उड़ कर शायद कहीं नीचे गिर गई थी. नीचे, सामने कहीं कुछ भी दिख नहीं रहा…सिवा मृत्यु के एक काले साए के. एक संकरी गुफा. वह समा जाएगी इस में. बस, अंतिम बार पति को प्रणाम कर ले.

उस ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और ऊपर आसमान की ओर देखा. अचानक उस की नजरें सामने गईं. देखा, दूर पहाड़ों के पीछे धीरेधीरे लाली फैलने लगी है. सुनहरी किरणें आसमान के साथसाथ पहाड़ों को भी सुनहरे रंग में रंग रही हैं. सूर्योदय, सुना था, लोग यहां से सूर्योदय देखते हैं. आसमान की लाली, शिखरों पर फैली लाली अद्भुत थी.

वह उसी तरह हाथ जोड़े विस्मित सी वह सब देखती रही. उस के देखतेदेखते लाल गोला ऊपर आ गया. तेजोमय सूर्य. रात के अंधकार को भेदता अपनी निर्धारित दिशा की ओर अग्रसर सूर्य. सच, उस दृश्य ने पल भर में ही उस के भीतर का सबकुछ जैसे बदल डाला. अंधकार को तो नष्ट होना ही है, फिर उस के भय से अपने को क्यों नष्ट किया जाए? कोशिश तो अंधकार से लड़ने की होनी चाहिए, उस से भागने की थोड़े ही. वही जीत तो असली जीत होगी.

और वह लौट आई थी. एक नए साहस और उमंग के साथ. एक नए विश्वास और दृढ़ता के साथ.

अचानक छन्न की आवाज हुई. उस की तंद्रा टूट गई. अतीत से वर्तमान में लौटना पड़ा उसे. यह आवाज सत्या के कमरे से ही आई थी. वह समझ गई, सत्या अभी तक सोई नहीं है. शायद वह भी किसी बदबू से परेशान होगी. एक दहशत के साथ शायद अंधेरे कमरे में टहल रही होगी. उस से टकरा कर कुछ गिरा है, टूटा है…छन्न. यह अस्वाभाविक नहीं था. सत्या जिन स्थितियों से गुजरी है, जिस मानसिकता में अभी जी रही है, किसी के लिए भी घोर यातना का समय हो सकता है.

संभव है, उस के मन में भी आत्महत्या की बात आई हो. सारी वेदना, अपमान, तिरस्कार का एक ही विकल्प होता है जैसे, अपना अंत. परंतु वह नहीं चाहती कि सत्या ऐसा कुछ करे…ऐसा कोई कदम उठाए. अभी बहुत नादान है वह. पूरी जिंदगी पड़ी है उस के सामने. उसे सबकुछ झेल कर जीना होगा. जीना ही जीत है. मर जाने से किसी का क्या बिगड़ेगा? उन लोगों का ही क्या बिगड़ेगा जिन्होंने यह सब किया? वह सत्या को बताएगी, एक ठोकर की तरह ही है यह सबकुछ. ठोकर खा कर आदमी गिरता है परंतु संभल कर फिर उठता है, फिर चलता है.

वह स्थिर कदमों से सत्या के कमरे की ओर बढ़ी. उस के पैरों में न कंपन थी न मन में अशांति. कमरे में घुसने से पहले बालकनी की बत्ती को उस ने जला दिया था. Stories Hindi

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