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Film Story : गुरुदत्त – पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ नारीवादी फिल्मकार

Film Story : आज फिल्में अपने उद्देश्य कि, कला हमेशा से भावनाओं, जिंदगी, दर्शन और साहित्य को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम होती हैं, को छोड़ चुकी हैं. फिल्मकार, लेखक, निर्देशक व कलाकार गुरुदत्त इस में अपवाद रहे हैं. ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के सर्जक गुरुदत्त ने इंसानों को एहसास कराने वाला अस्तित्ववादी सिनेमा व अवसादपूर्ण सिनेमा ही रचा. एक आकर्षक फिल्म निर्माता के रूप में गुरुदत्त की फिल्में मानवीय पीड़ा, कष्ट, जीवन और दर्शन का चित्रण करती हैं. वे ऐसे विरले कलाकार थे जिन की फिल्में व्यक्तिगत व्यक्तिपरक प्रभावों से प्रभावित होती थीं. उन्होंने अंतर्निहित मानवीय मूल्यों वाली फिल्में बनाईं और निर्देशित कीं और उन्हें घटनाओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से चित्रित किया.

इतना ही नहीं, जब दूसरे तमाम फिल्मकार नईनई मिली आजादी के आशावाद से प्रेरित हो कर सिनेमा गढ़ रहे थे तब भी गुरुदत्त ने मानवीय भावनाओं, संवेदनाओं, वर्गभेद, स्त्री की आतंरिक लालसा, पीड़ा, परित्याग और सफलता की कीमत को गहराई से अपनी फिल्मों में पेश किया. जिंदगी, हकीकत, अस्तित्व, दर्शन और कला व जिंदगी के रिश्तों को ले कर गुरुदत्त ने उस वक्त फिल्में बनाईं जब जिंदगी पर आधारित फिल्में बनाने की हिम्मत बहुत कम फिल्मकार करते थे.

गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में कलाकार के एकाकीपन, भौतिकवादी समाज की कठोरता और मानवता की भावनात्मक भेद्यता को गहराई से चित्रित किया. उन की प्रतिभा न केवल उन के द्वारा बनाई गई फिल्मों में बल्कि सिनेमा को एक गहन काव्यात्मक और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली कला रूप में उभारने की उन की क्षमता में भी स्पष्ट है. उन की फिल्मों के संवाद और फिल्मों के गीत गुनगुनाते हुए लोग हमें आज भी मिल जाते हैं. उन के निधन के 60 वर्ष पूरे हो चुके हैं. हम 1924 में जन्मे गुरुदत्त की जन्म शताब्दी मना रहे हैं.

9 जुलाई, 1924 को बेंगलुरु में जन्मे गुरुदत्त का असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोणे था. उन्होंने 1950 और 1960 के दशकों में ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ और ‘चौदहवीं का चांद’ सहित कई उत्कृष्ट फिल्में बनाईं. उन की फिल्म ‘प्यासा’ को विश्व की 100 सार्वकालिक महान फिल्मों में शामिल किया गया. ऐसा सम्मान पाने वाली यह एकमात्र भारतीय फिल्म है जबकि 2002 में साइट एंड साउंड आलोचकों और निर्देशकों के सर्वेक्षण ने भी गुरुदत्त को सब से बड़े फिल्म निर्देशकों की सूची में शामिल किया.

उन्हें कभीकभी ‘भारत का और्सन वेल्स’ भी कहा जाता रहा है. 2010 में उन का नाम सीएनएन के सर्वश्रेष्ठ 25 एशियाई अभिनेताओं की सूची में भी शामिल किया गया. गुरुदत्त 1950 के दशक के लोकप्रिय सिनेमा के प्रसंग में कविता की लय लिए और कलात्मक फिल्मों के व्यावसायिक रूप से सफल होने की कला को विकसित करने के लिए भी मशहूर हैं. उन की फिल्मों को जरमनी, फ्रांस और जापान में अब भी प्रकाशित करने पर सराहा जाता है. इंडियन मेलोड्रेमैटिक ट्रेडिशन को निखारने का श्रेय भी गुरुदत्त को ही जाता है.

नृत्य भी एक किरदार था

इस की मूल वजह यह है कि गुरुदत्त को स्कूली दिनों से ही संगीत, नाट्य व डांस में ट्रेनिंग मिलने लगी थी, जोकि उन के सिनेमा में नजर आता है. यही वजह है कि वे अपनेआप में बेहतरीन नृत्य निर्देशक थे. तभी तो गीतों के फिल्मांकन में गुरुदत्त को महारत हासिल थी. उन के फिल्माए गए सभी गीत लोकप्रिय हैं. उन के गीतों में संगीत के साथ ही लाइट व मूवमैंट की भी कोरियोग्राफी नजर आती है.

गुरुदत्त का जन्म बेंगलुरु में शिवशंकर राव पादुकोणे व वसंती पादुकोणे के यहां हुआ था. उन के मातापिता कोंकण के चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण थे. उन के पिता शुरुआत के दिनों में एक विद्यालय के हैडमास्टर थे जो बाद में एक बैंक के मुलाजिम हो गए. उन की मां एक साधारण गृहिणी, घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने वाली महिला थीं, जो बाद में एक स्कूल में अध्यापिका बन गई थीं. बाद में जब गुरुदत्त के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘बाजी’ हिट हो गई तब गुरुदत्त ने अपनी मां से शिक्षक की नौकरी छोड़ने का आग्रह किया था. यदि यह कहा जाए कि गुरुदत्त को लेखन उन की मां से विरासत में मिला था तो गलत न होगा.

उन की मां वसंती लघुकथाएं लिखने के साथ ही बंगाली उपन्यासों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद भी करती थीं. उन की मां ने एक बंगाली उपन्यास ‘मिथुन’ का कन्नड़ में अनुवाद भी किया था. ऐसा उन्होंने तब किया था जब वे कम शिक्षित थीं. गुरुदत्त की मां ने गुरुदत्त के हाईस्कूल पास करने के बाद हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी, उसी के बाद उन्हें स्कूल में नौकरी मिली थी. मां वसंती की ही वजह से गुरुदत्त का भी साबका बंगाली साहित्य से पड़ा था.

गुरुदत्त ने अपने बचपन के शुरुआती दिन कलकत्ता के भवानीपुर इलाके में गुजारे, इस का भी उन पर बौद्धिक व सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा. उन पर बंगाली संस्कृति व साहित्य की इतनी गहरी छाप पड़ी कि उन्होंने अपने बचपन का नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोणे से बदल कर गुरुदत्त रख लिया था. इतना ही नहीं, आगे चल कर बंगला लेखक बिमल मित्र के उपन्यास पर गुरुदत्त ने फिल्म बनाई थी और वे शरत चंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ को ले कर भी काफी औब्सेस्ड थे. गुरुदत्त भी देवदास पर फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन शरत चंद्र ने जिस तरह से चंद्रमुखी का किरदार लिखा था, उस से वे सहमत नहीं थे, इसी वजह से यह फिल्म बन नहीं पाई.

कला और अकेलेपन की कहानी

उन का बचपन वित्तीय कठिनाइयों और मातापिता के तनावपूर्ण रिश्ते की परछाईं में गूंजा. गुरुदत्त ने 1957 में फिल्म ‘प्यासा’ बनाई थी, जिस की कहानी उन्होंने 1946 में लिखी थी. इस फिल्म के संदर्भ में एक बार गुरुदत्त की छोटी बहन ललिता लाजमी ने हम से कहा था, ‘‘फिल्म ‘प्यासा’ की कहानी उस ने अपने पिता से प्रभावित हो कर लिखी थी.’’

परिवार की आर्थिक हालत को देखते हुए गुरुदत्त ने कोशिश की और उन्हें 16 वर्ष की उम्र यानी कि 1941 में पूरे 5 साल के लिए 75 रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति पर अल्मोड़ा जा कर पंडित रविशंकर के बड़े भाई उदयशंकर की नृत्य, नाटक व संगीत अकादमी में शिक्षा लेने का अवसर मिला पर वहां वे सिर्फ 3 साल ही रुक पाए. इस संदर्भ में दो अलगअलग बातें कही गईं. पहली, यह कि 1944 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ‘उदयशंकर इंडिया कल्चर सैंटर’ के बंद हो जाने पर गुरुदत्त को घर लौटना पड़ा लेकिन कहीं यह भी लिखा हुआ है कि अल्मोड़ा में उदयशंकर के नृत्य और नृत्यकला विद्यालय की प्रमुख महिला के साथ संबंध होने के बाद 1944 में उन्हें वहां से निकाल दिया गया था.

अल्मोड़ा से वे कलकत्ता (अब कोलकाता) आए और लीवर ब्रदर्स की एक फैक्ट्री में टैलीफोन औपरेटर के रूप में नौकरी शुरू की और इस की जानकारी मुंबई, उस वक्त के बंबई, में रह रहे मातापिता को भेज दी थी. हालांकि जल्द ही उन का इस नौकरी से मोह भंग हो गया और वे उस वक्त के बंबई, अब मुंबई, में अपने मातापिता के पास लौट आए थे.

कोरियोग्राफर की नौकरी

कुछ समय बाद अल्मोड़ा में ली थ्रिलर, ऐक्शन, कौमेडी की शिक्षा से आगे बढ़ कर गुरुदत्त अब कुछ और भी गहरा व गंभीर बनाने की इच्छा रखते थे तब उन्होंने दस साल से जी रहे अपनी कहानी पर फिल्म ‘कशमकश’ बनाने का निर्णय लिया. एक बार गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त ने मु झ से कहा था कि उन के पिता ने ‘कशमकश’ कहानी स्कूल के दिनों में लिखी थी, जब वे हाईस्कूल में पढ़ रहे थे लेकिन गुरुदत्त की छोटी बहन और चित्रकार ललिता लाजमी ने मु झ से कहा था कि गुरुदत्त ने 1946 में पुणे में रहते हुए ‘कशमकश’ नामक कहानी लिखी थी. उसी पर ‘प्यासा’ बनी थी. अबरार अलवी की मानें तो गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ की कहानी इस तरह से लिखी थी कि फिर पटकथा लिखने की जरूरत नहीं पड़ी. सिर्फ संवाद अलग से लिखवाए और जौनी वाकर का सत्तार का किरदार व गाना जोड़ा गया था.

1957 में जब ‘प्यासा’ रिलीज हुई तो इस ने दर्शकों और आलोचकों को चौंका दिया. फिल्म ने आलोचकों की प्रशंसा और व्यावसायिक सफलता दोनों ही हासिल की. ‘प्यासा’ में वहीदा रहमान गुलाब नामक वेश्या हैं लेकिन वेश्या के किरदार को गुरुदत्त ने शुद्धता की ऊंचाई प्रदान की. यह फिल्म एक कालातीत क्लासिक बन गई, जिस ने ‘टाइम’ मैगजीन की मरने से पहले देखने वाली 100 फिल्मों की सूची में जगह बनाई.

प्यासा’-फिल्म जो सिनेमा से ज्यादा साहित्य बन गई

फिल्म ‘प्यासा’ में गुरुदत्त ने पितृसत्तात्मक सोच पर आघात करने के साथ ही नारी व नर की समानता की बात की. इस फिल्म में एक सीन है जिस में विजय खाना खा रहे हैं लेकिन विजय के पास पैसे नहीं हैं. उस वक्त गुलाब जा कर उसे पैसा देती है और कहती है कि तुम खाओ. तब जो समानता का भाव आता है वह बहुत कम फिल्मों में नजर आता है. ‘प्यासा’ में वह पनप रहे अमीर समाज पर आघात करने के साथ ही प्रकाशन जगत का नंगा चेहरा भी सामने रख देते हैं. उन की फिल्मों में विलेन में कई स्तरीय परतें नजर आती हैं. उन की फिल्मों के ज्यादातर किरदार ग्रे शेड्स वाले हैं, कोई न दूध का धुला सफेद, न कोयले जैसा काला.

गुरुदत्त अपनी फिल्म ‘प्यासा’ में दिलीप कुमार को लेना चाहते थे, पर जब दिलीप कुमार ने बहाना बना दिया तब गुरुदत्त ने खुद विजय का किरदार निभाया. वास्तव में वे शरतचंद्र जैसे बड़े लेखक से मतभेद रखते हुए लेखन कर रहे थे. माना जाता है कि इसी वजह से दिलीप कुमार ने ‘प्यासा’ में अभिनय करने से बहाना बना कर मना कर दिया था. शरतचंद्र व बिमल राय की सोच वाली एक फिल्म दिलीप कुमार पहले ही कर चुके थे और शरतचंद्र से वे सहमत थे.

‘कागज के फूल’ की असफलता ने तोड़ दिया

‘प्यासा’ को मिली अपार सफलता के बाद गुरुदत्त ने प्रमोद चक्रवर्ती के निर्देशन में जी पी सिप्पी की फिल्म ‘12 ओ क्लौक’ में वहीदा रहमान के साथ अभिनय किया. तो वहीं बतौर निर्माता, निर्देशक व अभिनेता वे 2 जनवरी, 1959 को फिल्म ‘कागज के फूल’ ले कर आए. इसे एक कालजयी फिल्म माना जाता है. इस फिल्म का कुछ हिस्सा मद्रास के विजय वाहिनी स्टूडियो में फिल्माया गया था. फिल्म की कहानी एक प्रसिद्ध निर्देशक सुरेश सिन्हा (गुरुदत्त) की है जो अभिनेत्री शांति (वहीदा रहमान) से प्रेम करने लगता है. उन दिनों वास्तविक निजी जीवन में भी गुरुदत्त व वहीदा रहमान की प्रेम कहानी चर्चा में थी.

अफसोस यह कि फिल्म बुरी तरह से असफल हुई और इस ने गुरुदत्त को बुरी तरह से तोड़ दिया. ‘कागज के फूल’ से गुरुदत्त को 17 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था, यह 1959 की बात है. आज की तारीख में यह रकम 200 करोड़ रुपए से अधिक मानी जाएगी. उन दिनों गुरुदत्त के वैवाहिक जीवन में भी काफी उथलपुथल मची हुई थी. जब ‘कागज के फूल’ बनी, तब तक गुरुदत्त की गीता दत्त के साथ शादी लगभग टूट चुकी थी जिसे सुधारा नहीं जा सकता था. यह एक चिंताजनक, अर्धआत्मकथात्मक फिल्म थी जिस में उन के अपने ही जीवन को दर्शाया गया था.

पत्नी के साथ उन की नाखुश शादी और उन की प्रेरणा के साथ उन के उल झे हुए रिश्ते थे. यह फिल्म भी फिल्म निर्माता की मृत्यु के साथ समाप्त होती है जो अपने अकेलेपन और बरबाद रिश्तों को स्वीकार करने में विफल रहता है. ‘कागज के फूल’ असफल रही लेकिन यह फिल्म सीख देती है कि दर्द जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन वह अंत नहीं है.

फिल्म ‘कागज के फूल’ के संदर्भ में फिल्म इतिहासकार और वृत्तचित्र निर्माता नसरीन मुन्नी कबीर ने अपनी पुस्तक ‘गुरुदत्त: अ लाइफ इन सिनेमा’ में लिखा है कि उन के करीबी और उन के साथ काम करने वाले ज्यादातर लोग कहते हैं कि यह एक काल्पनिक आत्मकथात्मक फिल्म थी जिसे उन्होंने खुद बनाया था. उन के अनुसार, संगीतकार एस डी बर्मन ने उन से कहा था, ‘गुरु, यह फिल्म मत बनाइए, यह आप के जीवन के बारे में है.’ इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘मैं अपना काम करूंगा और आप अपने संगीत पर ध्यान केंद्रित करें.’ गुरु और बर्मन ने फिर कभी साथ में काम नहीं किया.

निर्देशन से तौबा

फिल्म ‘कागज के फूल’ की असफलता के बाद गुरुदत्त ने प्रण कर लिया कि अब वे सिर्फ फिल्म का निर्माण व अभिनय करेंगे, निर्देशन नहीं. गुरुदत्त को लगता था कि उन का नाम बौक्स ?औफिस के लिए अभिशाप है. उस के बाद 1960 में फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ का निर्माण करने के साथ ही वहीदा रहमान के साथ मुख्य भूमिका भी निभाई. इस फिल्म के निर्देशक एम सादिक थे. कहा जाता है कि इस फिल्म के निर्देशन में गुरुदत्त की पूरी दखलंदाजी थी. गाने तो गुरुदत्त ने ही कोरियोग्राफ किए थे. इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर जबरदस्त सफलता बटोरते हुए गुरुदत्त के ‘कागज के फूल’ के नुकसान की भरपाई से कहीं ज्यादा कमाई की. फिल्म का शीर्षक गीत, ‘चौदहवीं का चांद हो…’ एक विशेष रंगीन है

1962 में उन की टीम ने ‘साहिब बीबी और गुलाम’ बनाई. इस फिल्म का निर्देशन दत्त के शिष्य अबरार अलवी ने किया था, जिन्होंने इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार भी जीता था. इस फिल्म में गुरुदत्त और मीना कुमारी के साथ रहमान और वहीदा रहमान ने सहायक भूमिकाएं निभाईं. निजी जीवन में अपनी पत्नी गीता दत्त से गुरुदत्त का अलगाव हो चुका था. तब ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में उन्होंने स्थापित किया कि महिला और पुरुष दोनों अच्छे दोस्त हो सकते हैं. इस फिल्म में एक महिला अपने दिल की बात खुल कर उसी तरह पुरुष के साथ शेयर करती है जिस तरह से वह एक औरत के साथ कर सकती है. पुरुष भी ऐसा ही करता है.

कालजयी फिल्म

‘साहिब बीबी और गुलाम’ में छोटी बहू यानी कि मीना कुमारी का किरदार पितृसत्तात्मक सोच है. लुभावने वाले दृश्यों में सारा ध्यान नायिका पर है. गुरुदत्त ने ही मीना कुमारी को ही सब से ज्यादा खूबसूरत दिखाया है. इस फिल्म में मीना कुमारी ने आंखों से जो भाव दिए हैं वे कमाल के हैं. कहा जाता है कि ‘साहिब बीबी और गुलाम’ की रिलीज के बाद के आसिफ ने गुरुदत्त से कहा था कि फिल्म का अंत बदल दो वरना यह फिल्म कमा कर नहीं देगी. के आसिफ ने सलाह दी थी कि छोटी बहू के किरदार में भी बदलाव कीजिए. सुखद अंत दिखाइए. इस से गुरुदत्त घबरा गए थे क्योंकि वे ‘कागज के फूल’ में गहरी चोट खा चुके थे.

सो, उन्होंने फिर से शूटिंग के लिए सैट बनवाने की सोची पर फिर उन्होंने सोचा कि वे अपनी सोच को नहीं बदलेंगे. यह बात बिमल मित्रा ने ‘बिछुड़े सभी बारीबारी’ में लिखा है लेकिन सच यह है कि ‘साहिब बीवी और गुलाम’ को बौक्स औफिस पर जबरदस्त सफलता मिली. इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार सहित ढेरों पुरस्कार मिले. यह एक कालजयी फिल्म बन गई.

बर्लिन फैस्ट में ‘साहिब बीबी और गुलाम’ असफल क्यों

भारत में ‘साहिब बीबी और गुलाम’ को जबरदस्त सफलता मिली लेकिन ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ को 13वें बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में असफलता हाथ लगी थी. इस पर फिरोज रंगूनवाला ने अपनी पुस्तक ‘गुरुदत्त (1925-1965), एक मोनोग्राफ’ में लिखा है कि ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ इसलिए असफल रही क्योंकि पश्चिमी दर्शक भारत की सामाजिक समस्याओं को नहीं सम झ पाए, जैसे कि महिलाएं अपने पति के लिए सतीत्व क्यों त्याग देती हैं और शराब क्यों पीती है.’

दो साल मद्रास में गुजारे

‘साहिब बीबी और गुलाम’ के बाद गुरुदत्त ने ‘सौतेला भाई’ में अभिनय किया. उस के बाद वे दो साल के लिए मद्रास, अब चेन्नई, चले गए. वास्तव में जब गुरुदत्त ने अपनी फिल्म ‘कागज के फूल’ के कुछ दृश्य मद्रास के

विजय वाहिनी स्टूडियो में फिल्माए थे तब उन के दिमाग में दक्षिण की फिल्मों में अभिनय करने की बात आ गई थी.

गुरुदत्त की पहली दक्षिण भारतीय फिल्म ‘बहूरानी’

गुरुदत्त ने जिस पहली दक्षिण भारतीय हिंदी फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई वह 1963 में प्रदर्शित माला सिन्हा के साथ बनी फिल्म ‘बहूरानी’ थी जिस का निर्देशन तेलुगू व तमिल फिल्म निर्माता टी प्रकाश राव ने किया था, जिन्होंने ‘उत्तमापुथिरम’ (1958) और ‘पदगोट्टी’ (1964) जैसी ब्लौकबस्टर फिल्में दी थीं. हिंदी रीमेक से पहले तेलुगू में ‘अर्धांगी’ (1955) और तमिल में ‘पेनिन पेरुमई’ (1956) के नाम से बनाई गई थी. तमिल संस्करण में जेमिनी गणेशन ने मुख्य भूमिका निभाई थी जबकि तेलुगू संस्करण में अक्किनेनी नागेश्वर राव ने अभिनय किया था. फिल्म के संगीतकार सी रामचंद्र थे.

फिल्म में गुरुदत्त के साथ माला सिन्हा, फिरोज खान, श्यामा, मनोरमा, आगा, मुकरी, प्रतिमा देवी, बद्री प्रसाद, ललिता पवार की भी अहम भूमिकाएं थीं. बाद में 1975 में बंगला में भी इसे ‘बहूरानी’ के नाम से तथा 1981 में दोबारा हिंदी में ‘ज्योति’ के नाम से बनाया गया.

गुरुदत्त की दूसरी दक्षिण भारतीय फिल्म ‘भरोसा’

वर्ष 1963 में ही गुरुदत्त ने वासु फिल्म्स के एन वासुदेव मेनन निर्देशित फिल्म ‘भरोसा’, जो 1958 में रिलीज हुई तमिल फिल्म ‘थेडी वंधा सेल्वम’ की रीमेक थी, बनाई. के शंकर द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आशा पारेख भी थीं. फिल्म का संगीत रवि ने दिया था. राजेंद्र कृष्ण ने गीतों के बोल लिखे थे. लता मंगेशकर द्वारा गाया गया गीत ‘वो दिल कहां से लाऊं…’ सर्वकालिक पसंदीदा गीत है. इसी फिल्म के गीत ‘आज की मुलाकात बस इतनी, कर लेना बातें कल चाहे जितनी…’ के अलावा ‘काहे इतना गुमान छोरिये, ये मेला दो दिन का…’ भी काफी लोकप्रिय रहे.

गुरुदत्त की तीसरी दक्षिण भारतीय फिल्म ‘सुहागन’

गुरुदत्त ने 1962 में प्रदर्शित तमिल सफल फिल्म ‘सारदा’ के हिंदी संस्करण ‘सुहागन’ में भी काम किया. 1964 में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रसिद्ध निर्माता ए एल श्रीनिवासन ने किया था और निर्देशन के एस गोपालकृष्णन ने किया था. अफसोस, फिल्म ‘सुहागन’ के प्रदर्शन से पहले 10 अक्तूबर, 1964 को गुरुदत्त का निधन हो गया.

अंतिम व अधूरी फिल्में

वर्ष 1964 में गुरुदत्त ने ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित अपनी अंतिम फिल्म ‘सां झ और सवेरा’ में मीना कुमारी के साथ अभिनय किया. अक्तूबर 1964 में उन के निधन के वक्त उन की कई फिल्में अधूरी रह गई थीं, जिन में से के आसिफ की फिल्म ‘लव एंड गौड’ भी थी. कई सालों बाद जब फिल्म को फिर से बनाया गया तो उन की जगह संजीव कुमार ने ले ली. उन्होंने साधना के साथ ‘पिकनिक’ में भी काम किया था, जो अधूरी रह गई और बंद हो गई. वे ‘बहारें फिर भी आएंगी’ का निर्माण और अभिनय करने वाले थे लेकिन उन की जगह धर्मेंद्र ने मुख्य भूमिका निभाई और यह फिल्म 1966 में उन की टीम के आखिरी प्रोडक्शन के रूप में रिलीज हुई.

गुरुदत्त के निजी जीवन में कम उतारचढ़ाव नहीं रहे. 26 मई, 1953 को गुरुदत्त ने गीता रौय चौधुरी (बाद में गीता दत्त) से विवाह किया, जो एक प्रसिद्ध पार्श्व गायिका थीं और जिन से उन की मुलाकात ‘बाजी’ (1951) के निर्माण के दौरान हुई थी. उन्होंने परिवार के तमाम विरोधों को पार करते हुए शादी की. शादी के बाद 1956 में वे मुंबई के पाली हिल स्थित एक बंगले में रहने लगे. उन के तीन बच्चे हुए, तरुण, अरुण और नीना. गुरुदत्त और गीता की मृत्यु के बाद बच्चे गुरु के भाई आत्माराम और गीता के भाई मुकुल रौय के घरों में पलेबढ़े.

गुरुदत्त का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहा. उन के छोटे भाई आत्माराम के अनुसार, ‘वे काम के मामले में सख्त अनुशासनप्रिय थे लेकिन निजी जीवन में पूरी तरह से अनुशासनहीन थे.’ वे बहुत ज्यादा सिगरेट और शराब पीते थे और समय से काम के लिए नहीं निकलते थे. अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ गुरुदत्त के रिश्ते ने भी उन की शादी के खिलाफ काम किया. अपनी मृत्यु के समय वे गीता से अलग हो चुके थे और अकेले रह रहे थे. गीता दत्त का 1972 में 41 वर्ष की आयु में अत्यधिक शराब पीने के कारण निधन हो गया, उन का लिवर क्षतिग्रस्त हो गया था.

गुरुदत्त की फिल्में व परछाईं

गुरुदत्त की दादी रोज शाम को दीया जला कर आरती करतीं और 14 वर्षीय गुरुदत्त दीये की रोशनी में दीवार पर अपनी उंगलियों की विभिन्न मुद्राओं से तरहतरह के चित्र बनाते रहते. यहीं से उन के मन में कला के प्रति संस्कार जागृत हुए. दीये की रोशनी से जो परछाईं दीवार पर बनती थी उस ने गुरुदत्त के मनमस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी. उन की फिल्मों का बारीकी से अध्ययन करें तो उन की हर फिल्म के किरदारों का इंट्रोडक्शन परछाईं से ही होता नजर आता है.

किसी परिचर्चा में मशहूर फिल्म पटकथा लेखक कमलेश पांडे ने उन के बारे में कहा यों है- ‘‘गुरुदत्त को मैं परछाइयों की सल्तनत का सुल्तान मानता हूं. उन की हर फिल्म में परछाइयों का खूबसूरत उपयोग है. हर मुख्य किरदार की एंट्री परछाईं से होती है. फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में मीना कुमारी यानी कि छोटी बहू का किरदार भी परछाईं के साथ शुरू होता है.’’ बता दें कि ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में वैवाहिक संस्था पर कटाक्ष किया गया है.

वास्तव में गुरुदत्त के निजी जीवन में जो उथलपुथल हो रही थी वह सब उन की फिल्मों में नजर आता था. इसीलिए कहा जाता है कि गुरुदत्त ने आत्मकथात्मक फिल्में बनाईं.

गुरुदत्त को बहुत जल्द एहसास हो गया था कि लोग उन की इज्जत नहीं करते हैं बल्कि उन की बेहतरीन फिल्मों की इज्जत करते हैं. इस बात को सम झने के बाद ही उन्होंने फिल्म ‘प्यासा’ में एक गाना रखवाया था, जिस के बोल हैं- ‘यह दुनिया अगर मिल भी जाए…’.

गुरुदत्त और उन के नारी किरदार

गुरुदत्त को अवसाद, उदासी का सिनेमा बनाने वाले फिल्मकार के ही साथ नारीवादी फिल्मकार भी माना गया. गुरुदत्त ने अपने महिला किरदारों की मदद से प्रेम, हानि और सामाजिक नियमों के भीतर रहने के संघर्षों से जुड़े विषयों की तलाश की. उन के सिनेमा में महिलाएं कथानक का भावनात्मक और नैतिक केंद्र थीं. उन की फिल्मों में महिला किरदारों का चित्रण बहुत अलग रहा. महिला पात्रों के प्रति इज्जत, सहानुभूति, संजीदगी नजर आती है.

गुरुदत्त की फिल्मों में महिला किरदारों में ट्रांसफौर्मेशन बहुत नजर आता है. पचास व साठ के दशकों में भी गुरुदत्त की महिला किरदार छुईमुई नहीं थीं. ‘आरपार’ में लड़की कार चलाती हुई नजर आती है. ‘प्यासा’ में गुलाबो, ‘कागज के फूल’ में शांति, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में जाब्बा वगैरह दुर्व्यवहार की शिकार यौन वस्तुओं के रूप में चित्रित की गई हैं.

‘कागज के फूल’ में गुरुदत्त यानी कि नायक की स्ट्रैस्ड वाइफ बुरी औरत नहीं है. वहां भी अलगाव के बाद मानवता है. किसी महिला किरदार को पितृसत्तात्मक सोच या आदर्शवाद के शिकंजे पर नहीं कसा गया है लेकिन यह बात उन की फिल्म ‘आरपार’ में नहीं है. तो वहीं ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में छोटी बहू यानी कि मीना कुमारी का किरदार पितृसत्तात्मक सोच है. लुभावने वाले दृश्यों में सारा ध्यान नायिका पर है. कुछ लोग मानते हैं कि वहीदा रहमान जितनी खूबसूरत गुरुदत्त की फिल्मों में नजर आईं, बाकी फिल्मों में उतनी खूबसूरत नजर नहीं आईं.

गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ जैसी फिल्मों में महिला पात्रों का उपयोग गहरी भावनाओं और जटिल विचारों को व्यक्त करने के लिए किया. इन फिल्मों के महिला किरदार अपने युग के संघर्षों, इच्छाओं और विरोधाभासों को मूर्त रूप देते हैं.

‘प्यासा’ में महिला किरदार काफी जटिल रूप में बुने गए हैं. गुलाबो और मीना नारीत्व के विपरीत पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. फिल्म ‘प्यासा’ में गुरुदत्त ने स्वतंत्रता के बाद के भारत की यथार्थवादी स्थिति को दर्शाया है. हाशिए पर और ‘औब्जेक्ट’ के रूप में देखे जाने के बावजूद वेश्या गुलाबो ताकत दिखाती है और विजय की भावनात्मक सहारा बन जाती है.

दूसरी ओर, मीना सामाजिक अपेक्षाओं में फंसी एक आदर्श छवि का प्रतिनिधित्व करती है, जो उस समय महिलाओं पर लगाई गई सीमाओं को उजागर करती है. गुरुदत्त उन मानदंडों की आलोचना करते हैं जो महिलाओं की आजादी को सीमाओं से बांधते हैं. फिल्म में विजय की कालेज की प्रेमिका मीना प्यार के बजाय धन को चुनती है. जैसा कि, वह एक बहस के दौरान उस से कहती है- ‘सिर्फ प्यार काफी नहीं होता.’

इसी फिल्म में एक बातचीत में मीना (अभिनेत्री माला सिन्हा) गुलाबो (अभिनेत्री वहीदा रहमान) से पूछती है कि विजय (अभिनेता गुरुदत्त) जैसा सज्जन व्यक्ति उस की जैसी वेश्या को कैसे जान सकता है? गुलाबो चुपचाप जवाब देती है- ‘सौभाग्य से…’ फिल्म ‘प्यासा’ में गुलाबो का किरदार यानी कि वेश्या को गिरी हुई औरत की तरह नहीं दिखाया गया. उन की बेचारगी को भी नहीं दिखाया गया. उसे औब्जेक्ट की तरह या बाजार/मंडी में बैठने वाली औरत की तरह नहीं दिखाया गया बल्कि एक इंसान की तरह दिखाया गया.

‘प्यासा’ में औरत की लालसा को जिस तरह से बड़े परदे पर दिखाया गया है वह कमाल है जबकि वर्तमान समय की फिल्मों में औरत की डिजायर को दिखाते समय औरत ही औब्जेक्टीफाई हो रही होती है. गुलाबो किताब ढूंढ़ कर उसे प्रकाशित करना चाहती है पर विजय (गुरुदत्त) उसी के पास लौट कर आता है. तो, दोनों एकदूसरे की इज्जत करते हैं, दोनों साथ में रहना चाहते हैं, भले ही गुमनामी में.

चार्ली चैप्लिन का प्रभाव

गुरुदत्त की फिल्में चार्ली चैप्लिन से भी प्रेरित रही हैं. चार्ली चैपलिन ने ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ में कहा था, ‘हम सोचते बहुत ज्यादा हैं जबकि महसूस बहुत कम करते हैं.’ इसे आप गुरुदत्त की फिल्म ‘कागज के फूल’ में सम झ सकते हैं.

इस फिल्म में शांति फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के लिए महज इसलिए वापस आ रही हैं कि जिस से सुरेश को काम मिल जाए. जब वे उन से  झोंपड़ी में मिलती हैं तो वे कहते हैं कि सबकुछ खो देने के बाद अब मेरे पास मेरी खुद्दारी है, जो तुम्हें सौंपता हूं. उस के बाद भी अगर तुम कहोगी तो मैं सेठजी के पास चल दूंगा. मतलब, आप ने अपनी इज्जत उस औरत के हाथ में दी है जिस से आप प्यार करते हैं लेकिन आप उस के साथ नहीं हैं. तो, यहां फिजिकल इंटीमेसी की बात नहीं हो रही है, बल्कि सम झ की बात हो रही है.

इस दृश्य में एक महिला किरदार को जो इज्जत दी गई है वह बहुत ज्यादा है. गुरुदत्त की फिल्में चाहती हैं कि हम सबकुछ महसूस करें. असफलता, दुनिया से कोफ्त, दुनिया से सवाल, दिल का टूटना आदि सब भावनाओं को गुरुदत्त की फिल्में एहसास करने पर मजबूर करती हैं. फिल्म के कवितामय दृश्य दर्शक को फिल्म के साथ जुड़ने पर मजबूर करते हैं.

फिल्म का एक संवाद- ‘शांति, तुम बेहतरीन अभिनेत्री हो तो मैं भी बुरा निर्देशक नहीं’ अपनेआप में अतिखूबसूरत संवाद है जोकि सिर्फ परदे का नहीं बल्कि ऐसा लगता है कि वहीदा रहमान से गुरुदत्त निजी जीवन में यह बात कह रहे हों. तो वहीं, उस का अपना अभिमान भी है. फिल्म ‘कागज के फूल’ में नायक की बेटी और प्रेमिका दोनों ही इंसान होने की कमजोरियों से जू झती हैं.

अबरार अलवी निर्देशित और गुरुदत्त निर्मित ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में कहानी पितृसत्ता, विवाह की संस्था और जमींदारी प्रथा को दर्शाती है. ‘साहिब, बीबी और गुलाम में गुरुदत्त ने एक पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे मानदंडों को उजागर किया है. जहां छोटी बहू (मीना कुमारी) अपने व्यभिचारी पति से स्वीकृति पाने के लिए खुद को शराब के हवाले कर देती है.

मीना कुमारी द्वारा अभिनीत छोटी बहू एक जटिल चरित्र है जो अकेलेपन और लालसा से परिभाषित है. अपनी कुलीन पृष्ठभूमि के बावजूद छोटी बहू का जीवन उस के कुलीन जीवन के खालीपन से घिरा हुआ है. चरित्र ने पारंपरिक दृष्टिकोण को तोड़ा कि एक पवित्र हिंदू पत्नी न तो शराब पी सकती है और न ही अपनी शादी से बाहर किसी पुरुष के करीब हो सकती है, जैसे कि भूतनाथ (गुरुदत्त) के.

यह फिल्म निस्संदेह ब्रिटिश राज में सामंतवाद के पतन पर आधारित है, जब पुरुषत्व ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं के लिए समस्याएं खड़ी की थीं. हालांकि, गुरुदत्त ने एक अकेली ‘कुलीन’ पत्नी के दर्द और आघात को उजागर किया है जो बाद में अपने पति का ध्यान आकर्षित करने के लिए खुद को शराबी बना लेती है.

मीना कुमारी अपने कैरियर के चरम पर थीं जब उन्होंने एक शराबी पत्नी की भूमिका निभाने के लिए सहमति व्यक्त की थी. कुछ दकियानूसी महिलाएं उस दृश्य को घिनौना मानती हैं जिस में मीना कुमारी शराब पीती है. फिल्म इंडस्ट्री पितृसत्तात्मक सोच से लबालब है, इस में दोराय नहीं लेकिन गुरुदत्त में पितृसत्तात्मक सोच नहीं थी. नारीवादी सोच व पितृसत्तात्मक सोच वालों के बीच टकराव बहुत होता

था. गुरुदत्त को इस से भी जू झना पड़ रहा था. Film Story

 Hindi Story : पहली बार का पैसा

Hindi Story, लेखक – सीमा प्रताप

आप का बच्चा पहली बार आप को अपनी कमाई से पैसे देता है तो यह एक बेहद भावुक और गर्व महसूस करने वाला पल होता है. यह किसी बेशकीमती उपहार से कम नहीं होता.

‘‘मां, प्लीज, न मत कहना इस बार,’’ नेहा ने स्कूल से लौटते ही अपना बैग टेबल पर रखते हुए मिन्नतभरे स्वर में कहा.

‘‘किस बात के लिए?’’ मैं ने चकित होते हुए पूछा.

मैं ड्राइंगरूम के सोफे पर बैठी बच्चों के स्कूल से लौटने का इंतजार कर रही थी. हाथ में थाली लिए सौंफ बीन रही थी बड़ी सावधानी से यह चैक करते हुए कि कहीं महीन पत्थर का कण न रह जाए, जो खाने के साथ न मिल जाए. सौंफ का कण तो छोटा होता है लेकिन उस का स्वाद और असर गहरे होते हैं. ऐसे ही अपने जीवन की छोटीछोटी जरूरतों और बच्चों की पढ़ाई पर हर पल ध्यान देना, उन की उन सभी बातों पर गौर करना जो उन के वर्तमान को संवारते हुए उन के भविष्य की नींव रखता था आदि सब था मेरे जीवन का हिस्सा, मेरा धड़कता हुआ रोजमर्रा.

मैं ने अपने हाथ की थाली को परे सरकाते हुए नेहा की ओर देखा और प्यार से उस से पूछा, ‘‘किस बात के लिए परमिशन चाहिए तुम्हें, नेहा?’’

मेरे सवाल का जवाब दिए बिना उस ने कहा, ‘‘पहले यह बोलो कि न नहीं करोगी.’’

उस ने अपने जूतों को खोल एक तरफ सरकाया और अपने मोजे उतारते हुए अपनी बात दोहराते हुए शिकायती लहजे में कहा, ‘‘पिछली बार भी तुम लोगों ने मुझे स्कूल ट्रिप पर जाने की अनुमति नहीं दी थी. हर किसी के मांपापा अपने बच्चों को भेजते हैं, लेकिन आप दोनों ही मुझे भेजने में आनाकानी करते हो.’’

अपनी बात जारी रखते हुए वह आगे बोली, ‘‘कभी आप लोग कहते हो कि मेरा ट्रिप पर जाना सुरक्षित नहीं है तो कभी यह कहते हो कि मुझे ट्रिप पर जाने के बजाय पढ़ाई करनी चाहिए. हर बार कोई न कोई बहाना बना देते हो लेकिन इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा. आप वादा करो कि इस बार मुझे मेरे स्कूल ट्रिप पर जाने देंगी.’’

वह अपनी जिद पर अड़ी थी. मैं उस के आग्रह से मजबूर हो कर चुपचाप उसे सुन रही थी. उसे अपने पास खींच कर, छाती से चिपका कर उसे शांत करते व उस के बालों को सहलाते हुए मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है, पापा को आ जाने दो औफिस से, फिर शाम को सब बैठ कर आराम से बात करेंगे.’’

मैं ने बात को वहीं विराम देने की कोशिश की लेकिन नेहा ने एक बार फिर, ‘‘मां, प्लीज…’’ कहते हुए अपने को मुझ से छुड़ाते अपना बस्ता उठा कर अपने कमरे की ओर बढ़ गई.

स्कूल का सत्र समाप्त होने को था. जाहिर है, यदि बच्चे अलगअलग कक्षाओं में पढ़ रहे हैं तो उन की जरूरतें और उन की मांगें भी भिन्न होंगी. यह मेरी सब से बड़ी बेटी है. यह 8वीं कक्षा की छात्रा अपने सहपाठियों के साथ जिम कौर्बेट की पांचदिवसीय ‘कैम्ंिपग यात्रा’ पर जाना चाहती थी और इस के लिए उसे एक बड़ी राशि की आवश्यकता थी. स्कूल उन पांच दिनों का सारा खर्च वहन करेगा, जिस में भोजन, उन के आवास, परिवहन और अन्य खर्चे शामिल थे. अभिभावकों को बच्चों की पैकिंग में सहायता करनी थी, जिस में उन के जूते, स्लीपर, नाइट सूट, पानी की बोतलें और कई अन्य चीजें शामिल थीं. इस सब का खर्च हजारों में था.

उसे ये सब कैसे बताती कि हम भी चाहते थे कि वह स्कूल ट्रिप पर जाए लेकिन खर्च हमेशा पहाड़ बन कर सामने खड़ा हो जाता था, जिस का इस समय मेरे पास कोई समाधान नहीं था. मेरे पति सरकारी मुलाजिम थे, उन की आमदनी स्थिर तथा सीमित थी. हमारा तो अस्तित्व ही जैसे इन बच्चों में समाहित हो गया था, जिस में बच्चों की शिक्षा सर्वोपरि थी. उस के बाद उन से जुड़ी उन की छोटीछोटी जरूरतें, उन का हर एक सपना साकार करने हेतु हम ने अपने सारे संसाधन उन पर न्योछावर कर दिए थे.

नेहा 9वीं कक्षा में जाने वाली थी, जिस के लिए हमें उस की नई किताबें खरीदने की तैयारी करनी थी. आठवीं कक्षा की फाइनल परीक्षा के बाद मैथ ट्यूशन टीचर को एक बड़ी राशि देनी थी. साथ ही, नए सत्र की स्कूल फीस भी भरनी थी. इन सभी खर्चों का विवरण नेहा को बताना नहीं चाहती थी, ताकि वह किसी तनाव या बोझ तले न आए और उस का मन न दुखे. सिर्फ यही खर्च नहीं था बल्कि इस के बाद हमें छोटी बेटी सोनी की भी तैयारी करनी थी, जो 6ठी कक्षा में थी और एक अंतर-विद्यालय नृत्य प्रतियोगिता में भाग ले रही थी. उस का स्कूल चाहता था कि हम उस के नृत्य प्रदर्शन के लिए पोशाक का खर्च उठाएं, जोकि एक काफी बड़ी राशि थी.

और सब से छोटा, विवान, जो 5वीं से 6ठी कक्षा में जाने वाला था. सालभर स्कूल की कौपीकिताबों से ले कर उस की फीस और यूनिफौर्म तक की जिम्मेदारी रहती थी. कभी टाई चाहिए होती, कभी मोजे फट जाते, कभी काले जूते तो कभी सफेद जूते फट जाते. कभी ड्राइंग बुक भर जाती, कभी विंटर यूनिफौर्म की जरूरत पड़ती तो कभी समर यूनिफौर्म की. इन छोटीछोटी जरूरतों को पूरा करतेकरते हर दिन की अपनी चुनौतियां सामने आती थीं.

इस जीवन यात्रा में, एक ओर जहां जिम्मेदारियों का भार था वहीं दूसरी ओर पैसों की तंगी और बाकी कई जरूरतों का संघर्ष भी हमें लगातार घेरे हुए था. क्या इसे सिर्फ एक समस्या कहें या जीवन की कठिन यात्रा या फिर बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की साधना? हम चाहते थे कि हमारे बच्चे उच्चतम शिक्षा प्राप्त करें ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और अपने जीवन को एक नई दिशा व उद्देश्य दे सकें हमें. यह विश्वास था कि शिक्षा ही उन का सब से बड़ा हथियार बन सकती है.

कई बार शादीब्याह जैसे समारोहों में भी जाने से कतराते रहे, जिस से हमारे खर्च का बजट न बढ़ पाए. इन बातों को बच्चों को समझाना कठिन था. बच्चों से बस यही कहा जाता था, अपनी पढ़ाई पूरे मन से करो ताकि अपने लिए एक मुकाम हासिल कर सको. पर उस बार अपने पति से बात कर हम ने नेहा को उस के स्कूल ट्रिप पर भेज दिया था, बिना उसे इस अतिरिक्त खर्च के बारे में जताए हुए. वहां से लौट कर नेहा बड़ी खुश थी. उस ने जो अपने अनुभव हम से साझा किए, उन्हें सुन कर महसूस हुआ कि बच्चों के लिए इस तरह का अनुभव भी जरूरी हो गया है.

जिंदगी की जद्दोजेहद, आर्थिक तंगी और केवल एक नौकरी पर आश्रित हमारे पूरे परिवार के संघर्ष के बीच जो एक चीज मैं ने सख्ती से पकड़ी थी वह थी आपसी प्रेम और एकदूसरे के प्रति त्याग की भावना. हम सब एक ही पृष्ठ पर रहते थे, जैसे एक पुस्तक के पन्ने, जहां हर शब्द मिल कर एक पूरा अर्थ बनाते हैं. जीवन की इस निरंतर लड़ाई में हम एकदूसरे का संबल बने रहे. मुश्किलें चाहे जितनी भी हों, हम सब एकदूसरे के साथ हंसते, बोलते और अपनी छोटीछोटी खुशियों में सुकून ढूंढ़ते रहे. ‘एकता में शक्ति होती है’ : इस मुहावरे ने हमारे परिवार को कभी हारने नहीं दिया.

समय के साथ बच्चे एकएक कर के उच्च कक्षाओं में बढ़ते जा रहे थे. बड़ी होने के साथसाथ नेहा हमारी आर्थिक स्थिति को समझने लगी थी और हमारी परिस्थितियों को बेहतर तरीके से महसूस करने लगी थी. वह हमेशा अपने छोटे भाईबहन की पढ़ाई में मदद करने के लिए तत्पर रहती. उस की मदद हमारे लिए एक बड़ा सहारा बन गई थी. हालांकि, 12वीं कक्षा में जाने के बाद वह बहुत व्यस्त रहने लगी. हमारे खर्चे भी अपने चरम पर पहुंच चुके थे.

अकसर हर मातापिता की भूमिका एकजैसी होती है लेकिन किसे सफलता मिलती है और किसे नहीं, यह तो भविष्य ही तय करता है. नेहा ने 12वीं की परीक्षा में शानदार अंकों से सफलता हासिल की और उसे एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला भी मिल गया था. यह पल हमारे लिए गर्व और खुशी का था. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे प्रकृति ने हमारी मेहनत का पूरा फल हमें दिया हो. वहीं, हमारी छोटी बेटी सोनी भी अच्छे नंबरों के साथ हाईस्कूल तक पहुंचने में सफल रही थी. वह अपने नृत्य का लगातार अभ्यास करती और प्रस्तुति देती रहती थी. सब से छोटा बेटा विवान भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहा था. बास्केटबौल में भी उस ने अपनी पहचान बनाई थी. यह सब देख कर हमारी मेहनत और संघर्ष का सार्थक परिणाम सामने आ रहा था.

चार साल की इंजीनियरिंग कालेज का सफर भी पूरी तरह से उतारचढ़ाव से भरा हुआ था. कभीकभी रातें आंखों में तारे गिनते कटती थीं, नींद कोसों दूर. नेहा ने अच्छे नंबरों से चार साल की इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. अब वह स्कौलरशिप पर उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने का सपना देख रही थी. उस क्षण में, एक ओर जहां गर्व का अनुभव हो रहा था तो दूसरी ओर दिल में एक गहरी उलझन थी कि नेहा हम से इतनी दूर चली जाएगी.

हम अकसर यह सोचते थे कि जीवन की दिशा हम खुद तय करते हैं लेकिन अब ऐसा महसूस होने लगा था कि शायद सबकुछ पहले से ही नियत है और घटनाएं अपनेआप एक निश्चित दिशा में घटित हो रही हैं. सोचतेसोचते दिल भारी हो जाता था. फिर कुछ समय बाद, नेहा अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने और मास्टर्स की डिग्री प्राप्त करने विदेश चली गई. वह वहां अपने अध्ययन में व्यस्त हो गई और यहां हम सोनी और विवान की पढ़ाई में जुट गए. सोनी और विवान की पढ़ाई और उन की जरूरतें, उन के ट्यूशन, अन्य गतिविधियों और उन के प्रोजैक्ट्स को करवाने में हम पूरी तरह से व्यस्त थे. वहीं, दूसरी ओर नेहा ने अपनी मेहनत और लगन से न सिर्फ शिक्षा में सफलता प्राप्त की बल्कि जीवन के एक नए मुकाम पर भी पहुंच गई थी.

नेहा को वहां एक प्रतिष्ठित कंपनी में उत्कृष्ट नौकरी मिल चुकी थी. उस दिन उस की सफलता की खबर से दिल में एक अपार खुशी और गर्व का एहसास था. इधर, सोनी की भी बोर्ड परीक्षा खत्म हो गई थी और उस ने एक ला कालेज में दाखिला ले लिया, होस्टल जा चुकी थी और विवान बोर्ड परीक्षा दे, ग्रेजुएशन के लिए पुणे जाने वाला था. अपनी नई नौकरी में काम करने के करीब सालभर बाद नेहा चाहती थी कि हम अमेरिका आएं. खर्चों को देखते हुए हम दुविधा में थे, लेकिन नेहा ने हमारा वीजा और टिकट बनवाने में हमारी मदद की.

अमेरिका में जब हम हवाई अड्डे पर पहुंचे तो नेहा ने हमें देख कर खुशी से झूमते हुए हमें अपने गले लगा लिया. उस ने हमें तुरंत टैक्सी में बैठाया और घर की ओर ले चली. हम ने धीरेधीरे आसपास के इलाकों में सैर की. फिर एक दिन, नेहा हमें एक शानदार रैस्तरां में खाना खिलाने ले गई. घर से बाहर निकलने से पहले उस ने कुछ डौलर्स ले कर पापा के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘मांपापा, आप पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिएगा. ये लीजिए.’’ हम दोनों अवाक हो कर अपलक उसे देख रहे थे.

हम तो हमेशा उसे देने के आदी थे. यह पहली बार था जब हमारा बच्चा हमें बिना किसी निहित स्वार्थ के पैसे दे रहा था.

हमारी आंखों में एक अजीब सी नमी थी. उस ने कहा ‘‘चिंता मत कीजिए आप दोनों, जो चाहें खरीदें, जो मन हो खाइए और जहां भी जाना हो, बताइए.’’

ऐसा लगा जैसे वक्त ने एक चक्र पूरा किया हो. हम ने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा कुछ होगा. अचानक वह हमें पैसे दे रही है. यह पल न केवल गर्व का था, बल्कि उस नन्ही बच्ची की, हमारी मेहनत और संघर्ष का दौर याद आया, नन्ही बच्ची अब बड़ी हो चुकी थी, सक्षम और आत्मनिर्भर. मैं समझ नहीं पा रही थी जीवन के इस हिस्से को. वही बच्चा जिस ने पैसों की इतनी तंगी झेली थी, आज हमें पैसे दे रहा है और कह रहा है जो जी में आए खाइए, खरीदिए.  Hindi Story

 

Child Health: आदत न बने बच्चों को टौनिक्स देना

Child Health: प्रिया 8 साल बाद रागिनी से मिल रही थी. दोनों बचपन की सहेलियां हैं. शादी के बाद ऐसे दूरदूर शहरों में चली गईं कि सालों एकदूसरे की शक्ल नहीं देख पातीं. प्रिया को एक काम से रागिनी के शहर आना हुआ तो वह सीधी उस की ससुराल पहुंच गई. रागिनी के भरेपूरे परिवार में सास, ससुर, देवर, ननद सभी हैं. सब बड़े प्यार से रहते हैं, यह देख कर प्रिया को अच्छा लगा. रागिनी का बेटा अब 6 साल का हो गया है. उस की चुलबुली बातें बताते हुए रागिनी खुद बच्ची जैसी हुई जा रही थी.

अचानक प्रिया की नजर रागिनी के पलंग के दाईं तरफ पड़ी एक टेबल पर गई, जिस पर कई प्रकार के सिरप, दवाएं और टौनिक्स रखे हुए थे. उन्हें देख कर प्रिया पूछ बैठी, ‘जीजाजी का स्वास्थ्य ठीक तो है न?’ रागिनी उस की नजर भांप कर बोली, ‘अरे, वह बिलकुल स्वस्थ हैं. ये टौनिक्स और सिरप तो प्रियांशु के हैं.’ प्रियांशु रागिनी के 6 साल के बेटे का नाम है.

‘प्रियांशु को क्या हुआ, कोई सीरियस बीमारी है क्या?’

‘अरे, मेरा बेटा बिलकुल स्वस्थ है. ये दवाएं तो उस की भूख बढ़ाने, कद बढ़ाने और इम्युनिटी बढ़ाने के लिए हैं.’

‘किसी डाक्टर ने बताई हैं?’ प्रिया ने उन टौनिक्स की शीशियों को गौर से देखते हुए हैरानी से पूछा.

‘नहीं, हमारे कैमिस्ट अंकल हैं न जिन की हमारे घर के नीचे ही दुकान है, उन्होंने दी हैं. इन टौनिक्स से प्रियांशु को काफी फायदा है,’ रागिनी ने उत्साहित होते हुए बताया.

‘तू पागल है क्या? इतने छोटे बच्चे को इतनी सारी टौनिक्स पिला रही है, वह भी किसी डाक्टर से पूछे बगैर. क्या तू उस को पौष्टिक भोजन नहीं दे पा रही है?’

‘खानापीना तो ठीक ही है, जूस और दूध भी बराबर पीता है पर मु झे उस की हाइट कम लगती है. कैमिस्ट अंकल ने बोला कि इस की हड्डियों की मजबूती के लिए ये सिरप जरूरी हैं. उन्होंने इम्युनिटी बूस्टर भी दिया और प्रियांशु को भूख खुल कर लगे, इस के लिए भी टौनिक दिया है.’

रागिनी की बातें सुन कर प्रिया ने अपना सिर पकड़ लिया.

आजकल अधिकतर मांएं अपने बच्चों की अच्छी ग्रोथ के लिए उन्हें अनावश्यक रूप से टौनिक्स पिलाने लगती हैं. बिना सोचेसम झे और बिना किसी डाक्टरी परामर्श के अधिकतर माताएं बच्चों की अच्छी ग्रोथ, भूख बढ़ाने या ताकत बढ़ाने के लिए उन्हें टौनिक्स देना शुरू कर देती हैं. इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हैं. सब से पहला कारण है वे विज्ञापन जो दिनरात हमारे कानों में बजते हैं. जिन में सच कम जबकि झूठ भरभर के होता है. विज्ञापनों का प्रभाव हमारे मनमस्तिष्क पर सीधा पड़ता है.

टीवी, सोशल मीडिया पर दिखाए जा रहे टौनिक्स के विज्ञापन मातापिता को भ्रमित कर देते हैं और वे बिना डाक्टर से पूछे कैमिस्ट से टौनिक ला कर अपने बच्चों को पिलाना शुरू कर देते हैं.

इस के अलावा कई मातापिता दूसरों की देखादेखी यह काम करने लगते हैं. पड़ोस के बच्चे को उस की मां अमुक टौनिक देती है तो हमारे बच्चे को भी देना चाहिए. जैसी सोच उन पर हावी रहती है. अधिकांश मांबाप इस गलतफहमी का शिकार हैं कि टौनिक से बच्चा तेज, लंबा और मजबूत बनेगा और उस की भूख बढ़ेगी. जबकि, ऐसा नहीं है. टौनिक्स बच्चे की प्राकृतिक भूख को दबा सकता है.

बहुत से टौनिक्स डाक्टर की सलाह बिना उपभोग किए जाते हैं और टीवी या प्रिंट माध्यमों से होने वाले इन के प्रचार में अकसर अतिशयोक्ति वर्णन होता है. रामदेव अश्वगंधा चूर्ण से बच्चों की हाइट बढ़ाने का दावा करते हैं और इस के लिए उन का उत्पाद मार्केट में है. इस के अलावा हाईट अप, जीनियस हाईट अप, हाई टौप, हाईट डिटौक्स जैसे अनेक टौनिक्स जो बच्चों की लंबाई बढ़ाने का शतप्रतिशत दावा करते हैं, बाजार में छाए हुए हैं और लोग डाक्टर से पूछे बिना किसी करीबी की सलाह पर या कैमिस्ट की राय ले कर इन्हें खरीद लेते हैं और बच्चों को देना शुरू कर देते हैं.

बच्चों को टौनिक की आदत लगना ठीक नहीं होता क्योंकि इस से उन का शरीर प्राकृतिक रूप से पोषण को ग्रहण करने की क्षमता खो सकता है. बच्चों के टौनिक्स से भरा बाजार सही मानो में ‘टौक्सिक’ हो सकता है, न सिर्फ संख्या में बल्कि गुणवत्ता और सुरक्षा के लिहाज से भी. बच्चे पौष्टिक खानेपीने से जितना पोषण प्राप्त कर सकते हैं, वह पोषण एक चम्मच टौनिक से नहीं मिल सकता. केला, दूध, मेवे (पिस्ता/बादाम), देसी घी, बेसन के लड्डू जैसे पारंपरिक उपाय प्रभावी व सुरक्षित हैं.

बच्चा अगर संतुलित आहार ले रहा है तो उसे टौनिक्स की जरूरत ही नहीं है. बच्चों को रोजाना हरी सब्जियां, फल, दालें, दूध, अंडा, घी और अनाज देना आवश्यक है. इन से आयरन, कैल्शियम, विटामिन सी और प्रोटीन उसे नैचुरली मिलेंगे. घर का बना पौष्टिक खाना जैसे खिचड़ी, चटनी, ड्राई फ्रूट लड्डू, मूंगफली, गुड़, दही आदि टौनिक से बेहतर काम करते हैं.

संतुलित आहार, समय पर नींद, पानी व स्वस्थ दिनचर्या बच्चों को स्वस्थ रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं. रोजाना सुबह 20-30 मिनट धूप में खेलना विटामिन डी के लिए जरूरी है. यदि कोई टौनिक लेना आवश्यक ही हो तो पैथोलौजी, सरकारी, स्वीकृत, फार्मास्यूटिकल मानदंडों के अनुसार रजिस्टर्ड और डाक्टर की सलाह के अनुसार और एक निश्चित समय तक ही देनी चाहिए. बच्चे के शरीर में किसी चीज की कमी होने पर अगर डाक्टर कोई टौनिक लिखे तो कोर्स पूरा कर के उसे बंद कर दें. लंबे समय तक टौनिक न दें. टौनिक को मिठाई जैसा पेश न करें.

बच्चों को यह न लगे कि टौनिक कोई ‘ट्रीट’ है. कई बार टौनिक्स की मिठास बच्चों को भा जाती है और वे उसे लेते रहने की जिद करते हैं.

टीवी विज्ञापनों के प्रभाव में आ कर कभी भी हैल्थ से जुड़ी दवाओं, टौनिक्स, कौस्मेटिक आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि विज्ञापन तो बनाए ही जाते हैं आप को बेवकूफ बना कर आप की जेब से पैसे निकालने के लिए.

टौनिक उत्पादों की भरमार

भारत में बच्चों के टौनिक्स की स्थिति पर अगर नजर डालें तो हम देखेंगे कि भारत में बेबी/चाइल्ड केयर उत्पादों का मार्केट 2024 में लगभग 4.4 बिलियन यूएसडी था और 2033 तक इस के 10.6 बिलियन यूएसडी तक बढ़ने की उम्मीद है, जिस में 9.3 फीसदी वार्षिक वृद्धि अनुमानित है. 4.4 बिलियन यूएसडी का मतलब है 4.4 अरब अमेरिकी डौलर यानी लगभग 36,500 करोड़ रुपए जो 2033 तक बढ़ कर 88 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा हो जाएगा. इन में कैल्शियम, विटामिन, आयरन आदि के टौनिक्स के साथ विभिन्न प्रकार के डाइजैस्टिव, स्लीप, इम्यूनिटी, ग्रोथ बढ़ाने वाले टौनिक्स भी शामिल हैं.

ट्रेड इंडिया पर दर्ज सौ से ज्यादा ब्रैंड्स तो होम्योपैथिक और यूनानी टौनिक्स के मौजूद हैं, जैसे एफ्लैट्स बेबीट्स, ग्रुप बेबी टौनिक, न्यू शमा ममता बेबी टौनिक, अल्फाअल्फा टौनिक, बेबी क्योर टौनिक आदिआदि. इन तमाम टौनिक्स की कीमत 30 से 450 रुपए के बीच है और इन की क्वांटिटी 30 से 200 मिलीलिटर तक होती है.

ये टौनिक्स बच्चों को लगातार देना उन की सेहत से खिलवाड़ तो है ही, चिंता के कुछ दूसरे कारण भी हैं जो उन को खतरनाक बीमारियों की ओर धकेलते हैं. दरअसल, ये तमाम टौनिक्स जिन प्लास्टिक की बोतलों या कंटेनरों में आते हैं उन में फेथलेट्स पाए गए हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं. फेथलेट्स एस्टर यौगिकों का एक परिवार है. वे आमतौर पर शौर्ट चेन अल्कोहल अणुओं और फेथलिक एसिड से प्राप्त होते हैं जो 50 से अधिक वर्षों से प्लास्टिक निर्माण में उपयोग किए जाते हैं. ये मुख्य रूप से पोलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) प्लास्टिक में प्लास्टिसाइजर के रूप में उपयोग किए जाते हैं जो प्लास्टिक को नरम और अधिक लचीला बनाने का एक तरीका है.

अधिकांश टौनिक्स जिन प्लास्टिक की बोतलों में आती हैं वे नरम प्लास्टिक की ही बनी होती हैं. इस खतरनाक तत्त्व के अलावा हाल ही में हुई कुछ जांचों में सेहत से जुड़े कुछ उत्पादों में डाइएथिलीन ग्लाइकोल जैसे खतरनाक द्रवों के मिलावट की खबरें भी सामने आई हैं, जैसे नौरिस और फोर्ट्स द्वारा बनाए गए सिरप्स में.

डाक्टर की मानें तो बच्चों को अनावश्यक रूप से टौनिक्स देना उन की सेहत के साथ खिलवाड़ करना है. इस से बच्चों को टौनिक की आदत लग सकती है. बिना जरूरत टौनिक देने से उन के लिवर पर असर पड़ सकता है. कुछ टौनिक्स में शुगर या कैमिकल की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो हानिकारक हो सकते हैं. इसलिए टौनिक्स के बजाय प्राकृतिक विकल्प ही अपनाने चाहिए. Child Health

Indian Politics: दलितपिछड़ों की सोच नहीं बदल पाए चिराग और मायावती

Indian Politics: बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी बीएसपी ने 230 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. रामगढ़ और चैनपुर सीटों पर उसे जीत भी मिली थी. 2020 के चुनाव में बीएसपी ने गठबंधन किया था लेकिन 2015 में अकेले ही 228 सीटों पर चुनाव लड़ा था, कामयाबी बिलकुल नहीं मिल पाई थी.

2025 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने कहा है कि बसपा बिहार चुनाव में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी और अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेगी. चुनाव की जिम्मेदारी बिहार प्रदेश यूनिट के साथसाथ नैशनल कोऔर्डिनेटर रामजी गौतम को सौंपी गई है, जिस का सुपरविजन बीएसपी के राष्ट्रीय संयोजक बने मायावती के भतीजे आकाश आनंद के जिम्मे होगा.

सवाल यह है कि इस से बसपा या मायावती को हासिल क्या होगा? क्या चुनाव चुनावी फायदे के लिए लड़े जाते हैं या दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए? राजनीतिक फायदा तो दूसरों को नुकसान पहुंचा कर भी उठाए जाते हैं. मायावती का मुख्य राजनीतिक आधार उत्तर प्रदेश में ही रहा है. बसपा के संस्थापक कांशीराम ने उत्तर प्रदेश के हालात देख कर ही यहां पहल की थी. उन की दूरदृष्टि सच भी साबित हुई.

बसपा 1993 से ले कर 2012 तक प्रदेश में अपना जनाधार बनाने में सफल हुई थी. उस दौर में 4 बार बसपा नेता मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं. बसपा और समाजवादी पार्टी के नेताओं कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने दलित और पिछड़ा गठजोड़ बनाने का काम किया था. मायावती के अपने फैसलों ने इस गठजोड़ को सफल नहीं होने दिया. जिस के चलते यह साफ हो गया कि कांशीराम और मुलायम की सोच और मेहनत मायावती ने डुबो दी.

राजनीति को सम झने वाले मानते हैं कि जिस तरह से मायावती ने भाजपा को लाभ पहुंचाने वाले फैसले उत्तर प्रदेश में किए वैसे ही फैसले वे बिहार में करने जा रही हैं. वैसे देखें तो बिहार में मायावती के पहले लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान यह काम कर रहे हैं. जो काम मायावती ने उत्तर प्रदेश में जाटव समाज के लिए किया वही काम बिहार में पासवान बिरादरी के लिए राम विलास पासवान ने किया. उन की विरासत संभाल रहे चिराग पासवान भी मायावती वाली गलती कर के उन के ही पदचिह्नों पर चल रहे हैं.

बिहार में जातीय समीकरण

बिहार के जातीय समीकरण को देखें तो वहां पर सामान्य वर्ग 15.52 फीसदी, पिछड़ा वर्ग 27.12 फीसदी, अत्यंत पिछड़ा 36 फीसदी, अनुसूचित जाति (दलित) 19 फीसदी, अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) 1.68 फीसदी हैं. एनडीए गठबंधन के पक्ष में करीब 48 फीसदी वोट रहता है. भाजपा का दावा है कि इस के अलावा दूसरे छोटे समूह की अति पिछड़ी जातियां एनडीए के साथ जुड़ती हैं, जिस से उस की संख्या 55 फीसदी हो जाती है.

इंडिया गठबंधन के पक्ष में यादव, मुसलिम, हरिजन (मोची, रविदास और चर्मकार), पासी और मल्लाह प्रमुख रूप से रहते हैं. लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी का दावा है कि इन जातियों का लगभग 40.81 फीसदी वोटर इंडिया गठबंधन के साथ है. वोट अधिकार यात्रा के बाद इंडिया गठबंधन के साथ 47 से 50 फीसदी वोट जुड़ रहा है. इंडिया गठबंधन ने रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस को साथ ले कर एनडीए के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है. चूंकि पासवान वोटरों की जनसंख्या 5.31 फीसदी है और इस पर चिराग पासवान की मजबूत पकड़ मानी जाती है, लिहाजा, पशुपति पारस को अपने गठबंधन में शामिल कर इंडिया गठबंधन ने एक बड़े वोटबैंक में सेंधमारी की कोशिश की है.

क्या कमाल दिखाएगी लोजपा

लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना वर्ष 2000 में हुई थी तब से अब तक पार्टी ने कभी भी बिहार विधानसभा चुनाव जदयू के साथ नहीं लड़ा. 2025 का विधानसभा चुनाव पहली बार जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी दोनों के लिए ऐतिहासिक होगा. रामविलास पासवान के बाद लोक जनशक्ति पार्टी को विभाजन का संकट भी झेलना पड़ा. इस के बाद चिराग पासवान ने पार्टी को संभाला जो रामविलास पासवान के बेटे हैं. पार्टी का एक गुट रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस के साथ इंडिया ब्लौक के साथ है.

800 से ज्यादा भोजपुरी फिल्मों में 1,000 से अधिक गानों पर आइटम डांस कर चुकी सीमा सिंह ने राजनीति में कदम रखे हैं. वे लोक जनशक्ति पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव हैं. इन के पति सौरव कुमार इन का साथ दे रहे हैं. वे बरबीघा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. वहां पर भूमिहार करीब 20 फीसदी हैं. ऐसे में सीमा सिंह खुद को मजबूत मान रही हैं. चुनाव में उन की आइटम डांसर की छवि, व्यवहार मदद कर रहा है.

वे कहती हैं, ‘चिराग पासवान के नेतृत्व में पार्टी लगातार मजबूत हुई है. इस का लाभ पूरे गठबंधन को मिलेगा.’ पहली बार चिराग पासवान के कंधे पर दबाव अधिक है. दूसरी तरफ बसपा में भी आकाश आनंद भी अपना पार्टी का प्रचार देख रहे हैं. इस चुनाव में बसपा और लोजपा दोनों के युवा नेता कमान संभाले हुए हैं.

बिहार में दलित व पिछड़े साथ क्यों नहीं आते

उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम ने पिछड़ा और दलित को एक मंच पर लाने का काम किया था. बिहार में यह काम नहीं हो पाया. इस कारण 85 फीसदी सवर्ण ही बिहार का राज चलाते रहे. लालू यादव ने यह प्रयास किया लेकिन जब चारा घोटाले में वे फंस गए तो वह काम भी रुक गया. बिहार में कई लोकगीत प्रचलित हैं जिन में यह सुनाया जाता है कि पिछड़ी और दलित जातियों को सम्मान लालू राज में मिला.

जो काम कांशीराम ने उत्तर प्रदेश के दलितों के बीच किया वह काम रामविलास पासवान बिहार में नहीं कर पाए. वे कभी नीतीश तो कभी भाजपा के पिछलग्गू बने रहे. यही काम अब चिराग पासवान भी कर रहे हैं. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हनुमान बन कर खुश हैं. बिहार में दलित पिछड़ों से अधिक परेशान रहता है. ऐसे में बसपा और लोक जनशक्ति पार्टी कुछ नया करेंगी, इस में संदेह है.

ऊंची जातियों और उन के बल पर राज करने वाली पार्टियों की सोच वही पुरानी है. वे दलित नेताओं को लालच में फंसा कर पूरी बिरादरी का नुकसान करती हैं. उन के लिए दलित व पिछड़े गुलामों जैसे हैं. यह बात और है कि मुगलों और अंगरेजों ने जो अधिकार और सम्मान दलित व पिछड़ों को दिए वे आजादी के बाद देश के नेताओं ने नहीं दिए. उन को पूजापाठ में फंसा दिया तो उन के नेताओं को लालच या फिर अपराध में फंसा कर खत्म कर दिया.

लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में फंसा दिया तो रामविलास पासवान और मायावती जैसे नेताओं को सत्ता का लालच दे कर फंसा लिया. दलित व पिछड़ों के नेता सत्ता तो पा सकते हैं पर ऊंची जातियों के आदेश मानने और उन के बताए रास्ते पर चलने को मजबूर होते हैं. यह बात इन जातियों के लोगों की समझ में नहीं आएगी. इन की आजादी किसी मकसद की नहीं है. रामविलास पासवान, मायावती, चिराग पासवान जैसे नेता कांशीराम जैसा बदलाव नहीं कर पाए. ये ऊंची जातियों की पार्टियों में गुलामी के अलावा दलित व पिछड़ों की तरक्की का कोई जरिया नहीं बन सकते. Indian Politics

Stories Hindi : चरित्र

लेखक – अनिल के माथुर

सरिता, बीस साल पहले, अक्तूबर (प्रथम) 2005

आटा गूंध रही मधु सम झ नहीं पा रही थी कि वह गैस पर चढ़ी सब्जी को भूने, बुक्का फाड़ कर रोते विशू को संभाले या पहले फुरती से आटा गूंधने का काम ही निबटा ले. तभी दरवाजे की घंटी बज उठी.

‘‘उफ, इसे भी अभी ही बजना था,’’ आटा सने हाथों से ही मधु ने दरवाजा खोला. सामने मणिकांत खड़ा था, जो उसी के कालेज में लाइब्रेरी का चपरासी था.

‘‘तुम…’’ बात अधूरी छोड़ मधु रोते विशू को उठाने को लपकी मगर अपने आटा सने हाथ देख कर ठिठक गई. परिस्थिति को भांपते हुए मणिकांत ने अपने हाथ की पुस्तकें नीचे रखीं और विशू को गोद में उठा कर चुप कराने लगा.

‘‘मैं अभी आई,’’ कह कर मधु हाथ धोने रसोई में चली गई. एक मिनट बाद ही तौलिए से हाथ पोंछते हुए वह फिर कमरे में आई और मणिकांत की गोद से विशू को ले लिया.

‘‘मैडम, आप ये पुस्तकें लाइब्रेरी में ही भूल आई थीं,’’ पुस्तकों की ओर इशारा करते हुए मणिकांत ने कुछ इस तरह से कहा मानो वह अपने आने के मकसद को जाहिर कर रहा हो.

मधु को याद आया कि पुस्तकें ढूंढ़ कर जब वह उन्हें लाइब्रेरियन से अपने नाम इश्यू करवा रही थी तभी उस का मोबाइल बज उठा था. लाइब्रेरी की शांति भंग न हो, इसलिए वह बात करती हुई बाहर आ गई थी. पति सुमित का फोन था. वे औफिस के कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों को डिनर पर ला रहे थे. मधु को जल्दी

घर पहुंचना था. जल्दबाजी में वह अंदर से पुस्तकें लेना भूल गई और सीधे घर आ गई थी.

‘‘अरे, यह तो मैं कल ले लेती, पर तुम्हें मेरे घर का पता कैसे चला?’’

‘‘जहां चाह वहां राह. किसी से पूछ लिया था. लगता है आप खाना बना रही हैं. बच्चे को तब तक मैं रख लेता हूं,’’ मणिकांत ने विशू को गोद में लेने के लिए दोनों हाथ आगे बढ़ाए तो मधु पीछे हट गई.

‘‘नहींनहीं, मैं सब कर लूंगी. मेरा तो यह रोज का काम है. तुम जाओ,’’ दरवाजा बंद कर वह विशू को सुलाने का प्रयास करने लगी. विशू को थपकी देते हाथ मानो उस के दिमाग को भी थपथपा रहे थे.

उस की जिंदगी कितनी भागमभाग भरी हो गई है. बाई तो बस, बंधाबंधाया काम करती है, बाकी सब तो उसे ही देखना पड़ता है. सुबह जल्दी उठ कर लंच पैक कर सुमित को औफिस रवाना करना, विशू को संभालना, खुद तैयार होना, विशू को रास्ते में क्रैच छोड़ना, कालेज पहुंचना, लौटते समय विशू को लाना, घर पहुंच कर सुबह की बिखरी गृहस्थी समेटना और उबासियां लेते हुए सुमित का इंतजार करना.

थकेहारे सुमित रात को कभी 10 तो कभी 11 बजे लौटते. कभी खाए और कभी बिना खाए ही सो जाते. मधु जानती थी, प्राइवेट नौकरी में वेतन ज्यादा होता है तो काम भी कस कर लिया जाता है. यद्यपि पहले स्थिति ऐसी नहीं थी. सुमित 8 बजे तक घर लौट आते थे और शाम का खाना दोनों साथ खाते थे लेकिन जब से सुमित की कंपनी के मालिक की मृत्यु हुई थी और उन की विधवा ने सारा काम संभाला था तब से सुमित की जिम्मेदारियां बहुत बढ़ गई थीं और उस ने देरी से आना शुरू कर दिया था.

मधु शिकायत करती तो सुमित लाचारी से कहते, ‘क्या करूं डियर, आना तो मैं भी जल्दी चाहता हूं पर मैडम को अभी काम सम झने में समय लगेगा. उन्हें बताने में देर हो जाती है.’

एक विधवा के प्रति सहज सहानुभूति मान कर मधु चुप रह जाती.

शादी से पहले की प्रवक्ता की अपनी नौकरी वह छोड़ना नहीं चाहती थी. उस का पढ़ने का शौक शादी के बाद तक बरकरार था. इसलिए अपनी व्यस्ततम दिनचर्या में से समय निकाल कर वह लाइब्रेरी से पुस्तकें लाती रहती थी और देररात तक सुमित का इंतजार करते हुए उन्हें पढ़ती रहती. हालात से अब उस ने सम झौता कर लिया था पर कभीकभी कुछ बेहद जरूरी मौकों पर उसे सुमित की गैरमौजूदगी खलती भी थी.

उस दिन भी वह औटो में गृहस्थी का सारा सामान ले कर 2 घंटे बाद घर लौटी तो थक कर चूर हो चुकी थी. गोद में विशू को लिए उस ने दोनों हाथों में भरे  हुए थैले उठाने चाहे तो लगा चक्कर खा कर वहीं न गिर पड़े. तभी जाने कहां से मणिकांत आ टपका था. तुरतफुरत मणिकांत ने मधु को मय सामान और विशू को घर के अंदर

पहुंचा दिया था. शिष्टतावश मधु ने उसे चाय पीने के लिए रोक लिया. वह चाय बनाने रसोई में घुसी तो विशू ने पौटी कर दी. मधु उस के कपड़े बदल कर लाई तब तक देखा मणिकांत 2 प्यालों में चाय सजाए उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘अरे, तुम ने क्यों तकलीफ की? मैं तो आ ही रही थी,’’ मधु को संकोच ने आ घेरा था.

‘‘तकलीफ कैसी, मैडम? आप को इतना थका देख कर मैं तो वैसे भी कहने वाला था कि चाय मु झे बनाने दें, पर…’’

‘‘अच्छा, बैठो. चाय पियो,’’ मधु ने सामने के सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘अच्छा, तुम इधर कैसे आए?’’

‘‘इधर मेरा कजिन रहता है. उसी से मिलने जा रहा था कि आप दिख गईं,’’ चाय पीते हुए मणिकांत ने पूछा, ‘‘मैडम, साहब कहीं बाहर नौकरी करते हैं?’’

‘‘अरे, नहीं. इसी शहर में हैं पर दफ्तर में बहुत व्यस्त रहते हैं इसलिए घर देर से आते हैं. सबकुछ मु झे ही देखना पड़ता है,’’ मधु कह तो गई पर फिर बात बदलते हुए बोली, ‘‘तुम्हारे घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘मांपिताजी हैं, जो गांव में रहते हैं. शादी अभी हुई नहीं है. थोड़ा पढ़ालिखा हूं, इसलिए शहर आ कर नौकरी करने लगा. पढ़नेलिखने का शौक है, इसलिए पुराने मालिक ने यहां लाइब्रेरी में लगवा दिया,’’ कहते हुए मणिकांत उठ खड़ा हुआ. मधु उसे छोड़ने बाहर आई. उसे वापस उसी दिशा में जाते देख मधु ने टोका, ‘‘तुम अपने कजिन के यहां जाने वाले थे न?’’

‘‘हांहां. पर आज यहीं बहुत देर हो गई है. फिर कभी चला जाऊंगा.’’

उस का रहस्यमय व्यवहार मधु की सम झ में नहीं आ रहा था. उसे तो यह भी शक होने लगा था कि वह अपने कजिन से नहीं बल्कि उसी से मिलने आया था.

रात को मधु ने सुमित को मणिकांत के बारे में सबकुछ बता दिया.

‘‘भई, कमाल है,’’ सुमित बोले, ‘‘एक तो बेचारा तुम्हारी इतनी मदद कर रहा है और तुम हो कि उसी पर शक कर रही हो. खुद ही तो कहती रहती हो कि मैं गृहस्थी और विशू को अकेली ही संभालतेसंभालते थक जाती हूं. कोई हैल्ंिपगहैंड नहीं है. अब यदि यह हैल्ंिपगहैंड आ गया है तो अपनी शिकायतों को खत्म कर दो. चाहो तो उसे काम के बदले पैसे दे दिया करो ताकि तुम्हें उस से काम लेने में संकोच न हो.’’

‘‘हूं, यह भी ठीक है,’’ मधु को सुमित की बात जंच गई.

अब मधु गाहेबगाहे मणिकांत की मदद ले लेती. वह तो हर रोज आने को तैयार था पर मधु का रवैया भांप कम ही आता था. हां, जब भी मणिकांत आता, मधु के ढेरों काम निबटा जाता. कभी बिना कहे ही शाम को ढेरों सब्जियां ले कर पहुंच जाता. मधु उसे हिसाब से कुछ ज्यादा ही पैसे पकड़ा देती. फिर वह देर तक विशू को खिलाता रहता, तब तक मधु सारे काम निबटा लेती. फिर मधु उसे खाना खिला कर ही भेजती थी.

पैसे लेने में शुरू में तो मणिकांत ने बहुत आनाकानी की पर जब मधु ने धमकी दी कि फिर यहां आने की जरूरत नहीं है तो वह पैसा लेना मान गया. विशू भी अब उस से बहुत हिलमिल गया था. मधु को भी उस की आदत सी पड़ गई थी. मणिकांत का पढ़ने का शौक भी मधु के माध्यम से पूरा हो जाता था क्योंकि वह लाइब्रेरी से अच्छी पुस्तकें चुनने में उस की मदद करती थी. किसी पुस्तक के बारे में उसे घंटों सम झाती. इस तरह अपनी नीरस जिंदगी में अब मधु को कुछ सार नजर आने लगा था.

वह मणिकांत को छोटे भाई की तरह स्नेह करने लगी थी. मणिकांत के मुंह से भी अब उस के लिए मैडम की जगह दीदी संबोधन निकलने लगा था जिसे सुन कर मधु का मन बड़ी बहन के बड़प्पन से फूल उठता. सुमित भी खुश था क्योंकि अब उस के देर से लौटने पर भी मधु खुशीमन से उस का स्वागत करती थी. वरना पहले तो वह शिकायतों का अंबार लगा देती थी लेकिन आश्चर्य की बात थी कि इतने लंबे समय में भी सुमित और मणिकांत का अभी तक आमनासामना नहीं हुआ था. कारण, एक तो वह छुट्टी वाले दिन नहीं आता था. दूसरे, वह कभी देररात तक नहीं रुकता था.

सुमित को मणिकांत से मिलवाने के लिए मधु ने एक रविवार मणिकांत को लंच के समय आने को कहा. नियत समय पर मणिकांत तो पहुंच गया लेकिन औफिस से जरूरी फोन आ जाने के कारण सुमित उस के आने से पहले ही निकल गए. देर तक इंतजार कर आखिर मणिकांत बिना मिले ही चला गया जिस का मधु को भी बहुत अफसोस रहा.

इस घटना के कुछ दिनों बाद मधु एक दिन कालेज पहुंची तो उसे लगा कि आज कालेज की फिजा कुछ बदलीबदली सी है. विद्यार्थी से ले कर साथी अध्यापक तक उसे विचित्र नजरों से घूर रहे थे. किसी अनहोनी की आशंका से पीडि़त मधु स्टाफरूम में जा कर बैठी ही थी कि एक चपरासी ने आ कर सूचित किया कि मैडम, प्रिंसिपल साहब आप को बुला रहे हैं. अनमनी सी वह चुपचाप उस के पीछेपीछे चल दी.

‘‘मु झे सम झ नहीं आ रहा है कि आप जैसी जिम्मेदार और गंभीर व्यक्तित्व वाली प्रवक्ता ने इतना घटिया कदम क्यों उठाया?’’ बिना किसी भूमिका के प्रिंसिपल ने अपनी बात कह दी.

‘‘जी?’’ मधु बौखला उठी, ‘‘आप कहना क्या चाहते हैं?’’

‘‘कालेज के एक अदने से चपरासी मणिकांत के संग नाजायज संबंध रखते हुए आप को शरम नहीं आई? विद्यार्थियों के सम्मुख यह कैसा आदर्श प्रस्तुत कर रही हैं आप?’’

‘‘आप होश में तो हैं? इतना गंदा आरोप लगाने से पहले आप ने कुछ सोचा तो होता,’’ क्रोध के आवेश में मधु थरथर कांप रही थी.

‘‘पूरी तहकीकात करने के बाद ही मैं आप से रूबरू हुआ हूं. आप के साथी अध्यापकों और विद्यार्थियों ने कई बार आप दोनों को अकेले बातचीत करते भी देखा है.’’

‘‘क्या किसी से बात करना गुनाह है?’’

‘‘आप के पड़ोसियों ने भी पूछताछ में बताया है कि वह अकसर आप के यहां आता है और आप के पति की गैरमौजूदगी में काफी वक्त वहां गुजारता है.’’

‘‘हां, तो इस से आप जो आरोप लगा रहे हैं वह तो सिद्ध नहीं होता. मणि मेरे छोटे भाई की तरह है और हम दोनों बहनभाई की तरह ही एकदूसरे का खयाल रखते हैं,’’ मधु गुस्से में बोली, ‘‘आप मणिकांत को बुलवाइए. अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’

‘‘वह आज कालेज नहीं आया है. घर पर भी नहीं मिला. शायद भेद खुल जाने के भय से शहर छोड़ कर भाग गया है.’’

‘‘जब कोई भेद है ही नहीं तो खुलेगा क्या? हमारा रिश्ता शीशे की तरह पाकसाफ है. मेरे पति को भी मु झ पर पूरा विश्वास है. आज तक हमारे संबंधों को ले कर उन्होंने कभी कोई शक नहीं किया.’’

पिं्रसिपल मधु को ऐसे देखने लगे मानो सामने कोई पागल खड़ा हो.

‘‘क्या आप नहीं जानतीं कि आप पर चरित्रहीन होने का आरोप आप के पति ने ही लगाया है?’’

‘‘क्या?’’ मधु के लिए यह दूसरा बड़ा आघात था.

‘‘वे आप से तलाक चाहते हैं,’’ पिं्रसिपल साहब बोले, ‘‘इसी बारे में साक्ष्य जुटाने सुमितजी कल कालेज आए थे. आप तब तक घर जा चुकी थीं. उन्होंने मणिकांत से आप के अवैध संबंधों के बारे में पूछताछ की. आप की चरित्रहीनता विद्यार्थियों पर गलत प्रभाव डाले, इस से पहले मैं चाहूंगा कि आप त्यागपत्र दे दें.’’

मधु किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी रही. उसे गहरा मानसिक आघात लगा था.

‘‘मैं आप की मनोदशा सम झ रहा हूं पर मजबूर हूं. अब आप जा सकती हैं.’’

लड़खड़ाते कदमों से मधु कैसे कालेज से निकली और कैसे घर पहुंची उसे खुद होश न था. उस की दुनिया उजड़ चुकी थी. अपने केबिन में बैठ कर कंपनी की उन्नति के लिए स्ट्रेटेजी रचने वाला उस का पति उस के खिलाफ इतनी बड़ी स्ट्रेटेजी रचता रहा और उसे भनक तक नहीं लगी लेकिन सुमित ने यह सब किया क्यों? क्या मणिकांत उसी का आदमी था? सोचसोच कर मधु का भेजा घूम रहा था.

लाइब्रेरी और औफिस आदि में फोन से पूछताछ करने पर मधु को पता चला कि किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के सुमित साहब ने उसे कालेज लाइब्रेरी में लगवाया था. मधु का अगला दिन भी आंसू बहाने और तहकीकात करने में बीत गया. न मणिकांत मिला और न सुमित ही घर लौटे. सुमित के मोबाइल पर घंटी जाती रहती और फिर फोन कट जाता.

मधु की भूखप्यास गायब हो चुकी थी. आंखों से नींद उड़ चुकी थी. वह छत की ओर टकटकी लगाए लेटी थी. तभी दरवाजे पर ठकठक हुई.

‘जरूर सुमित होंगे,’ सोच कर मधु ने लपक कर दरवाजा खोला लेकिन सामने मणिकांत को देख वह एकबारगी स्तब्ध रह गई. फिर उस का कौलर पकड़ कर 2-3 थप्पड़ जमा दिए.

‘‘आस्तीन के सांप, मेरी जिंदगी बरबाद कर देने के बाद अब यहां क्या लेने आए हो?’’

‘‘दीदी वो…’’

‘‘खबरदार जो अपनी गंदी जबान से मु झे दीदी कहा.’’

‘‘दीदी, प्लीज, मेरी बात तो सुनिए. मु झे खुद नहीं पता था कि सुमित साहब के इरादे इतने भयानक हैं.’’

‘‘कब से जानते हो तुम सुमित को?’’

‘‘मैं पहले उन्हीं के औफिस में काम करता था. उन के बारे में बहुत ज्यादा तो नहीं जानता था. बस, इतना पता था कि मालिक की मौत के बाद अब साहब ही कंपनी के कर्ताधर्ता हैं. मालकिन भी उन्हीं के इशारों पर नाचती हैं.

‘‘मैं अकसर औफिस में खाली समय में पुस्तकें पढ़ा करता था. सुमित साहब मेरे इस शौक से वाकिफ थे. उन्होंने मु झे इस के लिए कभी नहीं टोका जिस के लिए मैं उन का शुक्रगुजार था. एक दिन उन्होंने मु झे अकेले में बुलाया और कहा कि मु झे उन का एक काम करना होगा. औफिस में व्यस्तता की वजह से वे अपनी बीवी यानी आप की पर्याप्त मदद नहीं कर पाते जिस से आप काफी तनाव में रहती हैं. वे मु झे आप के कालेज में लगवा देंगे. मु झे धीरेधीरे आप को विश्वास में ले कर घर और विशू की देखभाल का काम संभालना होगा लेकिन आप को कुछ पता नहीं चलना चाहिए.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’ मधु ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मु झे भी उन की यह बात सम झ में नहीं आई थी. इसीलिए मैं ने भी यही सवाल किया था तब उन्होंने बताया कि आप नौकर या आया रखने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि एक अनजान आदमी से आप को हमेशा घर और विशू की सुरक्षा की चिंता सताती रहेगी. इसलिए मु झे पहले जानेअनजाने आप की मदद कर आप का विश्वास जीतना होगा. इस कार्य में साहब ने मेरी पूरी मदद करने का भरोसा भी दिया क्योंकि वे आप को परेशान नहीं देख सकते थे.

‘‘उस रोज रविवार के दिन जब आप ने मु झे लंच पर साहब से मिलवाने की बात कही थी तो मु झे लगा शायद आज साहब आप के सामने अपने सरप्राइज का खुलासा करेंगे, लेकिन वे तो मेरे आने से पहले ही चले गए थे. सरप्राइज तो उन्होंने मु झे कल बुला कर दिया.

‘‘वे कंपनी की विधवा मालकिन से शादी रचा कर कंपनी के एकछत्र मालिक बनना चाहते हैं लेकिन इस के लिए उन्हें पहले आप से तलाक लेना होगा और इस के लिए उन के पास आप के खिलाफ ठोस साक्ष्य होने चाहिए. आप पर चरित्रहीनता का लांछन लगाने के लिए उन्होंने मु झे मोहरा बनाया. मैं तो यह सोच कर उन के इशारों पर चलता रहा कि एक नेक काम में मैं उन की मदद कर रहा हूं. पर छी, थू है ऐसे आदमी पर जो पैसे के लालच में इतना गिर गया है कि अपनी बीवी के चरित्र पर ही कीचड़ उछाल रहा है.’’

‘‘लेकिन उन्होंने तुम्हें कल क्यों बुलाया?’’

‘‘वह नीच आदमी चाहता है कि सचाई जानने के बाद भी मैं उस के इशारों पर काम करूं. उस ने 50 हजार रुपए निकाल कर मेरे सामने रख दिए और कहा कि वह और भी देने को तैयार है लेकिन मु झे अदालत में उस की हां में हां मिलानी होगी. बयान देना होगा कि आप चरित्रहीन हैं और आप मेरे संग…’’ शरम से मणिकांत ने गरदन  झुका ली.

‘‘तो अब तुम क्या…’’ मधु ने थूक गटकते हुए बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘मेरा चरित्र उस नीच आदमी के चरित्र जितना सस्ता नहीं है, दीदी,’’ मणिकांत बोला, ‘‘पैसा होते हुए भी और पैसे के लालच में वह इतना गिर गया कि अपनी बीवी के चरित्र का सौदा करने लगा. ऐसा पैसा पा कर भी मैं क्या करूंगा जिस से इनसान इनसान न रहे, हैवान बन जाए. हालांकि बात न मानने पर उस ने मु झे जान से मारने की धमकी दी है पर मैं उसे उस के कुटिल मकसद में कामयाब नहीं होने दूंगा. इस के लिए चाहे मु झे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े.’’

‘‘तुम्हें अपनी जान देने की

जरूरत नहीं है, भाई,’’ मधु

भावुक स्वर में बोली, ‘‘मु झे अब न उस आदमी की चाह है और न उस के पैसे की. इसलिए तलाक हो या न हो, मु झे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं अपने विशू को ले कर यहां से बहुत दूर चली जाऊंगी. तुम भी उस की बात मान लो. पैसा सबकुछ तो नहीं होता लेकिन बहुतकुछ होता है. उस पैसे से एक नई जिंदगी शुरू करो.’’

‘‘थूकता हूं मैं ऐसी नई जिंदगी पर. और आप ये कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हैं? अन्याय सहने वाला भी उतना ही दोषी है जितना कि अन्याय करने वाला. दीदी, यह पाठ भी आप ही ने तो मु झे पढ़ाया था. आप कुछ भी करें लेकिन मैं दुनिया को आप के चरित्र की सच्चाई बता कर रहूंगा और उस चरित्रहीन को समाज के सामने नंगा कर दूंगा.’’

आवेश से तमतमाते मणिकांत की बातों ने मधु को  झक झोर कर रख दिया. उस के मानसपटल में बिजली कौंध रही थी और उस में एक ही वाक्य उभरउभर कर आ रहा था—करोड़ों की संपत्ति का स्वामी सुमित इस सद्चरित के स्वामी मणिकांत के सम्मुख कितना दीनहीन है.

इन्हें आजमाइए

? अगर कबूतर बालकनी, खिड़की, छत बीट से गंदा करते हैं तो स्प्रे बोतल में एक कप सफेद सिरका, एक छोटा चम्मच लाल मिर्च या काली मिर्च पाउडर, दो नीबू का रस, एक कप पानी डालें. जहां कबूतर बैठते हैं वहां रोज एकदो बार स्प्रे करें. कबूतर दूर रहते हैं.

? कमरे में पेंट की बदबू दूर करने के लिए एक स्प्रे बोतल में पानी, दो नीबू का रस और एक चम्मच बेकिंग सोडा मिलाएं और पूरे कमरे में स्प्रे करें. यह एक नैचुरल एयरफ्रैशनर की तरह काम करता है.

? जूते के आगे या किनारे जहां भी वह टाइट लग रहा हो, वहां गीला कपड़ा भर कर कुछ घंटों के लिए छोड़ दें, इस से जूता थोड़ा फैल जाएगा.

? मधुमक्खी काट ले तो डंक वाली जगह पर नीबू का रस या सफेद सिरका लगाएं. यह जहर को न्यूट्रल करने में मदद करता है.

? पनीर की भुर्जी बनाते हुए उस में थोड़़ा दूध डाल दें तो वह सौफ्ट बनती है.

? कांच के बरतन से लेबल हटाने के लिए हैंड सैनिटाइजर लेबल पर लगाएं. गोंद धीरेधीरे गलने लगेगा और आसानी से निकल जाएगा.

? रसोई के हर कैबिनेट और ड्रौअर में दोतीन तेजपत्ते रख दें. इस की गंध से कौकरोच दूर रहते हैं. Stories Hindi

 

Stories Hindi : प्रेम की इबारत

Stories Hindi : रात के अंधियारे में पूरा मांडवगढ़ अब कितना खामोश रहता है, यहां की हर चीज में एक भयानकता झलकती है. धीरेधीरे खंडहरों में तबदील होते महल को देख कर इतना तो लगता है कि ये कभी अपार वैभव और सुविधाओं की अद्भुत चमक से रोशन रहते होंगे. कभी गूंजती होंगी यहां रहने वाले सैनिकों की तलवारों की खनक, घोड़ों के टापों की आवाजें, हाथियों की चिंघाड़, जिस की गवाह हैं ये पहाडि़यां, ये दीवारें उस शौर्यगाथा की, जो यहां के चप्पेचप्पे पर बिखरी पड़ी हैं.

यहां बने महल का हर कोना, जिस ने देखे होंगे वह नजारे, युद्ध, संगीत और गायन जिस की स्वर लहरियां बिखरी होेंगी यहां की फिजा में. काश, ये खामोश गवाह बोल सकते तो न जाने कितने भेद खोल देते और खोल देते हर वह राज, जो दफन हैं इन की दीवारों में, इन के दिलों में, इन के फर्श में, मेहराबों में, झरोखों में, सीढि़यों में और यहां के ऊंचेऊंचे गुंबदों में.’’

‘‘चुप क्यों हो गए दोस्त, मैं तो सुन रहा था. तुम ही खामोश हो गए दास्तां कहतेकहते,’’ रानी रूपमती के महल के एक झरोखे ने दूसरे झरोखे से कहा.

‘‘नहीं कह पाऊंगा दोस्त,’’ पहला वाला झरोखा बोलतेबोलते खामोश हो चुका था. किंतु महल की दीवारों ने भी तन्मयता से उन की बातें सुनी थीं. आखिरकार जब नहीं रहा गया तो एक दीवार बोल ही पड़ी :

‘‘दिन भर यहां सैलानियों की भीड़ लगी रहती है. देशीविदेशी इनसानों ने हमारी छाती पर अपने कदमों के जाने कितने निशान बनाए होंगे. अनगिनत लोगों ने यहां की गाथाएं सुनी हैं, विश्व में प्रसिद्ध है यह स्थान.

‘‘मांडवगढ़ के सुल्तानों का इतिहास, उन की वीरता, शौर्य और ऐश्वर्य के तमाम किस्सों ने, जो लेखक लिख गए हैं, यहां के इतिहास को अमर कर दिया है. समूचे मांडव में बिखरा पड़ा है प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य. नीलकंठ का रमणीक स्थान हो या हिंडोला महल की शान, चाहे जामा मसजिद की आन हो, हर दीवार, गुंबद अपने में समेटे हुए है एक ऐसा रहस्य, जहां तक बडे़बडे़ इतिहासकार भी कहां पहुंच पाए हैं.’’

‘‘हां, तुम सच कहती हो, ये कहां पहुंचे?’’ दूसरी दीवार बोली, ‘‘यह तो हम जानते हैं, मांडव का हर वह किला, उस की हर मेहराब, हर सीढ़ी, हर दीवार जो आज चुप है…जानती हो बहन, वह बेबस है. काश, कुदरत ने हमें भी जबां दी होती तो हम बोल पड़ते और वह सब बदल जाता, जो यहां के बारे में दोहराया जाता रहा है, बताया जाता रहा है, कहा जाता रहा है.

‘‘हम ने बादशाह अकबर की यात्रा देखी है. कुल 4 बार अकबर ने मांडवगढ़ के सौंदर्य का आनंद उठाया था. हम ने अपनी आंखों से देखा है उस अकबर महान की छवि को, जो आज भी हमारी आंखों में बसी हुई है. हम ने सुल्तान जहांगीर की वह शानोशौकत भी देखी है जिस का आनंद उठाया था, यहां की हवाओं ने, पत्तों ने, इस चांदनी ने.’’

पहली दीवार की तरफ से कोई संकेत न आते देख दूसरी दीवार ने पूछा, ‘‘सुनो, बहन, क्या तुम सो गईं?’’

‘‘नहीं बहन, कहां नींद आती है,’’ पहली दीवार ने एक ठंडी आह भर कर कहा.

‘‘देखो तो, रात की खामोशी में हवाएं उन मेहराबों को, झरोखों को चूमने के लिए कितनी बेताब हो जाती हैं, जहां कभी रानी रूपमती ने अपने सुंदर और कोमल हाथों से स्पर्श किया था,’’ पहली दीवार बोली, ‘‘ताड़ के दरख्तों को सहलाती हुई आती ये हवाएं धीरेधीरे सीढि़यों पर कदम रख कर महल के ऊपरी हिस्से में चली जाती हैं, जहां से संगीत की पुजारिन और सौंदर्य की मलिका रानी रूपमती कभी सवेरेसवेरे नर्मदा के दर्शन के बाद ही अपनी दिनचर्या शुरू करती थीं.’’

‘‘हां बहन, मैं ने भी देखा है,’’ दूसरी दीवार बोली, ‘‘इस हवा के पागलपन को महसूस किया है. यह रात में भी कभीकभी यहीं घूमती है. सवेरे जब सूरज की किरणों की लालिमा पहाडि़यों पर बिखरने लगती है तो यह छत पर उसी स्थान पर अपनी मंदमंद खुशबू बिखेरती है, जहां कभीकभी रूपमती जा कर खड़ी हो जाती थीं. कैसी दीवानगी है इस हवा की जो हर उस स्थान को चूमती है जहांजहां रूपमती के कदम पडे़ थे.’’

पहली दीवार कहां खामोश रहने वाली थी. झट बोली, ‘‘हां, इन सीढि़यों पर रानी की पायलों की झंकार आज भी मैं महसूस करती हूं. मुझे लगता है कि पायलों की रुनझुन सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर आ रही है.’’

दीवारों की बातें सुन कर अब तक खामोश झरोखा बोल पड़ा, ‘‘आप दोनों ठीक कह रही हैं. वह अनोखा संगीत और रागों का मिलन मैं ने भी देखा है. क्या उसे कलम के ये मतवाले देख पाएंगे? नहीं…बिलकुल नहीं.

‘‘पहाडि़यों से उतरती हुई संगीत की वह मधुर तान, बाजबहादुर के होने का आज भी मुझे एहसास करा देती है कि बाजबहादुर का संगीत प्रेम यहां के चप्पेचप्पे पर बिखरा हुआ है.’’

उपरोक्त बातचीत के 2 दिन बाद :

रात की कालिमा फिर धीरेधीरे गहराने लगी. ताड़ के पेड़ों को वही पागल हवाएं सहलाने लगीं. झरोखों से गुजर कर रूपमती के महल में अपने अंदाज दिखाने लगीं.

झरोखों से रात की यह खामोशी सहन नहीं हो रही थी. आखिरकार दीवारों की ओर देख कर एक झरोखा बोला, ‘‘बहन, चुप क्यों हो. आज भी कुछ कहो न.’’

दीवारों की तरफ से कोई हलचल न होते देख झरोखे अधीर हो गए फिर दूसरा बोला, ‘‘बहन, मुझ से तुम्हारी यह चुप्पी सहन नहीं हो रही है. बोलो न.’’

तभी झरोखों के कानों में धीमे से हवा की सरगोशियां पड़ीं तो झरोखों को लगा कि वह भी बेचैन थीं.

‘‘तुम दोनों आज सो गई हो क्या?’’ हवा ने पूरे वेग से अपने आने का एहसास दीवारों को कराया.

‘‘नहीं, नहीं,’’ दीवारें बोलीं.

‘‘देखो, आज अंधेरा कुछ कम है. शायद पूर्णिमा है. चांद कितना सुंदर है,’’ हवा फिर अपनी दीवानगी पर उतरी.

‘‘मैं आज फिर नीलकंठ गई तो वहां मुझे फूलों की खुशबू अधिक महसूस हुई. मैं ने फूलों को देखा और उन के पराग को स्पर्श भी किया. साथ में उन की कोमल पंखडि़यों और पत्तियों को भी….’’

‘‘क्या कहा तुम ने, जरा फिर से तो कहो,’’ एक दीवार की खामोशी भंग हुई.

हवा आश्चर्य से बोली, ‘‘मैं ने तो यही कहा कि फूलों की पंखडि़यों को…’’

‘‘अरे, नहीं, उस से पहले कहा कुछ?’’ दीवार ने फिर प्रश्न दोहराया.

‘‘मैं ने कहा फूलों के पराग को… पर क्या हुआ, कुछ गलत कहा?’’ हवा के चेहरे पर अपराधबोध झलक रहा था. मानो वह कुछ गलत कह गई हो. वह थम सी गई.

‘‘अरे, तुम को थम जाने की जरूरत नहीं… तुम बहो न,’’ दीवार ने उस की शंका दूर की.

हवा फिर अपनी गति में लौटने लगी.

‘‘वह जो लंबा लड़का आता है न और उस के साथ वह सांवली सी सुंदर लड़की होती है…’’

‘‘हां…हां… होती है,’’ झरोखा बोल पड़ा.

‘‘उस लड़के का नाम पराग है और आज ही उस लड़की ने उसे इस नाम से पुकारा था,’’ दीवार का बारीक मधुर स्वर उभरा.

‘‘अच्छा, इस में आश्चर्य की क्या बात है? हजारों लोग  मांडव की शान देखने आतेजाते हैं,’’ हवा ने चंचलता बिखेरी.

‘‘किस की बात हो रही है,’’ चांदनी भी आ कर अब अपनी शीतल किरणों को बिखेरने लगी थी.

‘‘वह लड़का, जो कभीकभी छत पर आ कर संगीत का रियाज करता है और वह सांवलीसलोनी लड़की उसे प्यार भरी नजरों से निहारती रहती है,’’ दीवार ने अपनी बात आगे बढ़ाई.

‘‘अरे, हां, उसे तो मैं भी देखती हूं जो घंटों रियाज में डूबा रहता है,’’ हवा ने मधुर शब्दों में कहा, ‘‘और लड़की बावली सी उसे देखती है. लड़का बेसुध हो जाता है रियाज करतेकरते, फिर भी उस की लंबीलंबी उंगलियां थकती नहीं… सितार की मधुर ध्वनि पहाडि़यों में गूंजती रहती है .’’

‘‘उस लड़की का क्या नाम है?’’ झरोखा, जो खामोश था, बोला.

‘‘नहीं पता, देखना कहीं मेरे दामन पर उस लड़की का तो नाम नहीं,’’ दीवार ने झरोखे से कहा.

‘‘नहीं, तुम्हारे दामन में पराग नाम कहीं भी उकेरा हुआ नहीं है,’’ एक झरोखा अपनी नजरों को दीवार पर डालते हुए बोला.

‘‘हां, यहां आने वाले प्रेमी जोड़ों की यह सब से गंदी आदत है कि मेरे ऊपर खुरचखुरच कर अपना नाम लिख जाते हैं, जिन की खुद की कोई पहचान नहीं. भला यों ही दीवारों पर नाम लिख देने से कोई अमर हुआ है क्या?’’ दीवार का स्वर दर्द भरा था.

‘‘कहती तो तुम सच हो,’’ शीतल चांदनी बोली, ‘‘मांडव की लगभग हर किले की दीवारों का यही हाल है.’’

‘‘हां, बहन, तुम सच कह रही हो,’’ नर्मदा की पवित्रता बोली, जो अब तक खामोशी से उन की यह बातचीत सुन रही थी.

‘‘तुम,’’ झरोखा, दीवार, हवा और शीतल चांदनी के अधरों से एकसाथ निकला.

‘‘हर जगह नाम लिखे हैं, ‘सविता- राजेश’, ‘नैना-सुनीला’, ‘रमेश, नीता को नहीं भूलेगा’, ‘रीतू, दीपक की है’, ‘हम दोनों साथ मरेंगे’, ‘हमारा प्रेम अमर है’, ‘हम दोनों एकदूसरे के लिए बने हैं.’ यही सब लिखते हैं ये प्रेमी जोडे़,’’ नर्मदा की पवित्रता ने कहा.

‘‘बडे़ कठोर प्रेमी हैं ये लोग, जिस बेदर्दी से दीवारों पर लिखते हैं, इस से क्या इन का प्रेम अमर हो गया?’’ दीवार के स्वर में अब गुस्सा था.

‘‘ये क्या जानें प्रेम के बारे में?’’ झरोखे ने कहा, ‘‘प्रेम था रानी रूपमती का. गायन व संगीत मिलन, सबकुछ अलौकिक…’’

नर्मदा की पवित्रता की मुसकान उभरी, ‘‘मेरे दर्शनों के बाद रूपमती अपना काम शुरू करती थीं, संगीत की पूजा करती थीं.’’

बिलकुल, या फिर प्रेम का बावलापन देखा है तो मैं ने उस लड़की की काली आंखों में, उस के मुसकराते हुए होंठों में’’, हवा बोली, ‘‘मैं ने कई बार उस के चंदन से शीतल, सांवले शरीर का स्पर्श किया है. मेरे स्पर्श से वह उसी तरह सिहर उठती है जिस तरह पराग के छूने से.’’

चांदनी की किरणों में हलचल होती देख कर हवा ने पूछा, ‘‘कुछ कहोगी?’’

‘‘नहीं, मैं सिर्फ महसूस कर रही हूं उस लड़की व पराग के प्रेम को,’’ किरणों ने कहा.

‘‘मैं ने छेड़ा है पराग के कत्थई रेशमी बालों को,’’ हवा ने कहा, ‘‘उस के कत्थई बालों मेें मैं ने मदहोश करने वाली खुशबू भी महसूस की है. कितनी खुशनसीब है वह लड़की, जिसे पराग स्पर्श करता है, उस से बातें करता है धीमेधीमे कही गई उस की बातों को मैं ने सुना है…देखती रहती हूं घंटों तक उन का मिलन. कभी छेड़ने का मन हुआ तो अपनी गति को बढ़ा कर उन दोनों को परेशान कर देती हूं.’’

‘‘सितार के उस के रियाज को मैं भी सुनता रहता हूं. कभी घंटों तक वह खोया रहेगा रियाज में, तो कभी डूबने लगेगा उस लड़की की काली आंखों के जाल में,’’ झरोखा चुप कब रहने वाला था, बोल पड़ा.

ताड़ के पेड़ों की हिलती परछाइयों से इन की बातचीत को विराम मिला. एक पल के लिए वे खामोश हुए फिर शुरू हो गए, लेकिन अब सोया हुआ जीवन धीरे से जागने लगा था. पक्षियों ने अंगड़ाई लेने की तैयारी शुरू कर दी थी.

दीवार, झरोखा, पर्यटकों के कदमों की आहटों को सुन कर खामोश हो चले थे.

दिन का उजाला अब रात के सूनेपन की ओर बढ़ रहा था. दीवार, झरोखा, हवा, किरण आदि वह सब सुनने को उत्सुक थे, जो नर्मदा की पवित्रता उन से कहने वाली थी पर उस रात कह नहीं पाई थी. वे इंतजार कर रहे थे कि कहीं से एक अलग तरह की खुशबू उन्हें आती लगी. सभी समझ गए कि नर्मदा की पवित्रता आ गई है. कुछ पल में ही नर्मदा की पवित्रता अपने धवल वेश में मौजूद थी. उस के आने भर से ही एक आभा सी चारों तरफ बिखर गई.

‘‘मेरा आप सब इंतजार कर रहे थे न,’’ पवित्रता की उज्ज्वल मुसकान उभरी.

‘‘हां, बिलकुल सही कहा तुम ने,’’ दीवार की मधुर आवाज गूंजी.

उन की जिज्ञासा को शांत करने के लिए पवित्रता ने धीमे स्वर में कहा.

‘‘क्या तुम सब को नहीं लगता कि महल के इस हिस्से में अभी कहीं से पायल की आवाज गूंज उठेगी, कहीं से कोई धीमे स्वर में राग बसंत गा उठेगा. कहीं से तबले की थाप की आवाज सुनाई दे जाएगी.’’

‘‘हां, लगता है,’’ हवा ने अपनी गति को धीमा कर कहा.

‘‘यहां, इसी महल में गूंजती थी रानी रूपमती की पायलों की आवाज, उस के घुंघरुओं की मधुर ध्वनि, उस की चूडि़यों की खनक, उस के कपड़ों की सरसराहट,’’ नर्मदा की पवित्रता के शब्दों ने जैसे सब को बांध लिया.

‘‘महल के हर कोने में बसती थी वीणा की झंकार, उस के साथ कोकिलकंठी  रानी के गायन की सम्मोहित कर देने वाली स्वर लहरियां… जब कभी बाजबहादुर और रानी रूपमती के गायन और संगीत का समय होता था तो वह पल वाकई अद्भुत होते थे. ऐसा लगता था कि प्रकृति स्वयं इस मिलन को देखने के लिए थम सी गई हो.

‘‘रूपमती की आंखों की निर्मलता और उस के चेहरे का वह भोलापन कम ही देखने को मिलता है. बाजबहादुर के प्रेम का वह सुरूर, जिस में रानी अंतर तक भीगी हुई थी, बिरलों को ही नसीब होता है ऐसा प्रेम…’’

‘‘उन की छेड़छाड़, उन का मिलन, संगीत के स्वरों में उन का खो जाना, वाकई एक अनुभूति थी और मैं ने उसे महसूस किया था.

‘‘मुझे आज भी ऐसा लगता है कि झील में कोई छाया दिख जाएगी और एहसास दिला जाएगी अपने होने का कि प्रेम कभी मरता नहीं. रूप बदल लेता है समय के साथ…’’

‘‘हां, बिलकुल यही सब देखा है मैं ने पराग के मतवाले प्रेम में, उस की रियाज करती उंगलियों में, उस के तराशे हुए अधरों में,’’ झरोखे ने चुप्पी तोड़ी.

‘‘गूंजती है जब सितार की आवाज तो मांडव की हवाओं में तैरने लगते हैं उस सांवली लड़की के प्रेम स्वर, वह देखती रहती है अपलक उस मासूम और भोले चेहरे को, जो डूबा रहता है अपने सितार के रियाज में,’’ दीवार की मधुर आवाज गूंजी.

‘‘कितना सुंदर लगता था बाजबहादुर, जब वह वीणा ले कर हाथों में बैठता था और रानी रूपमती उसे निहारती थी. कितना अलौकिक दृश्य होता था,’’ नर्मदा की पवित्रता ने बात आगे बढ़ाई.

इस महान प्रेमी को युद्ध और उस के नगाड़ों, तलवारों की आवाजों से कोई मतलब नहीं था, मतलब था तो प्रेम से, संगीत से. बाज बहादुर ने युद्ध कौशल में जरा भी रुचि नहीं ली, खोया रहा वह रानी रूपमती के प्रेम की निर्मल छांह में, वीणा की झंकार में, संगीत के सातों सुरों में.

‘‘ऐसे कलाकार और महान प्रेमी से आदम खान ने मांडव बड़ी आसानी से जीत लिया, फिर शुरू हुई आदम खान की बर्बरता इन 2 महान प्रेमियों के प्रति…’’

‘‘कितने कठोर होंगे वे दिल जिन्होंने इन 2 संगीत प्रेमियों को भी नहीं छोड़ा,’’ हवा ने अपनी गति को बिलकुल रोक लिया.

‘‘हां, वह समय कितना भारी गुजरा होगा रानी पर, बाज बहादुर पर. कितनी पीड़ा हुई होगी रानी को,’’ नर्मदा की पवित्रता बोली, ‘‘रानी इसी महल के कक्ष में फूटफूट कर रोई थीं.’’

‘‘आदम खान रानी के प्रस्ताव से सहमत नहीं हुआ. रानी का कहना था कि वह एक राजपूत हिंदू कन्या है. उस की इज्जत बख्शी जाए…आदम खान ने मांडव जीता पर नहीं जीत पाया रानी के हृदय को, जिस में बसा था संगीत के सुरों का मेल और बाज बहादुर का पे्रम.

‘‘जब आदम खान नियत समय पर रानी से मिलने गया तो उस ने रूपमती को मृत पाया. रानी ने जहर खा कर अमर कर दिया अपने को, अपने प्रेम को, अपने संगीत को.’’

‘‘हां, केवल शरीर ही तो नष्ट होता है, पर प्रेम कभी मरा है क्या?’’ झरोखा अपनी धीमी आवाज में बोला.

तभी दीवार की धीमी आवाज ने वहां छाने लगी खामोशी को भंग किया, ‘‘हर जगह मुझे महसूस होती है रानी की मौजूदगी, कितना कठोर होता है यह समय, जो गुजरता रहता है अपनी रफ्तार से.’’

‘‘पराग, वह लंबा लड़का, जो रियाज करने आता है और उस के साथ आती है वह सुंदर आंखों वाली लड़की. मैं ने उस की बोलती आंखों के भीतर एक मूक दर्द को देखा है. वह कहती कुछ नहीं, न ही उस लड़के से कुछ मांगती है. बस, अपने प्रेम को फलते हुए देखना चाहती है,’’ झरोखा बोला.

‘‘हां, बिलकुल सही कह रहे हो. प्रेम की तड़प और इंतजार की कसक जो उस के अंदर समाई है वह मैं ने महसूस की है,’’ हवा ने अपने पंख फैलाए और अपनी गति को बढ़ाते हुए कहा, ‘‘उस के घंटों रियाज में डूबे रहने पर भी लड़की के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती. वह अपलक उसे निहारती है. मैं जब भी पराग के कोमल बालों को बिखेर देती हूं, वह अपनी पतलीपतली उंगलियों से उन को संवार कर उस के रियाज को निरंतर चलने देती है.’’

‘‘सच, कितनी सुंदर जोड़ी है. मेरे दामन में कभी इस जोड़ी ने बेदर्दी से अपना नाम नहीं खुरचा. अपनी उदासियों को ले कर जब कभी वह पराग के विशाल सीने में खो जाती है तो दिलासा देता है पराग उस बच्ची सी मासूम सांवली लड़की को कि ऐसे उदास नहीं होते प्रीत…’’ दीवार ने कहा.

‘‘यों ही प्रेम अमर होता है, एक अनोखे और अनजाने आकर्षण से बंधा हुआ अलौकिक प्रेम खामोशी से सफर तय करता है,’’ झरोखा बोला.

हवा ने अपनी गति अधिक तेज की. बोली, ‘‘मैं उसे देखने फिर आऊंगी, समझाऊंगी कि ऐ सुंदर लड़की, उदास मत हो, प्रेम इसी को कहते हैं.’’

खामोशी का साम्राज्य अब थोड़ा मंद पड़ने लगा था, सुबह की किरणों ने दस्तक देनी शुरू जो कर दी थी. Stories Hindi

Hindi Kahani : कुत्ते वाले अंकल

Hindi Kahani : मुझे कुत्ते से कोई प्रेम नहीं है. बदले में कुत्ते को भी मु झ से प्रेम नहीं है. जहां आदमी को ही आदमी से प्रेम नहीं है, वहां कोई कुत्ते से प्रेम भला कैसे कर सकता है? मैं ने कभी कुत्ता नहीं पाला. इसलिए मेरी बिल्डिंग में मु झे जानने वाले बहुत कम हैं. यह भी कोई बात हुई कि आप की पहचान कुत्ते के कारण हो. मु झे दुख होता है जब भी कोई अजनबी मेरा पता पूछता है तो लोग उस से सवाल करते हैं, ‘क्या उन के पास कुत्ता है?’ यानी मालिक का नाम केयर औफ कुत्ता.

वाह, अब कुत्ते से आदमी की पहचान होती है. उस के मालिक के स्टेटस की पहचान होती है. कुत्ते की नस्ल से ही उस के मालिक की हैसियत का पता चलता है. उस का नाम भी मालिक की क्वालिटी बताता है. शेरू, फेरु, भेरु, कालू जैसे नाम से पता चलता है कि मालिक गांवखेड़े का है. आजकल कुछ लोग टौमी, लौयन जैसे नाम रख कर अपने कुत्ते की ब्रीड बताते हैं. कुत्ते की तारीफ में भूल जाते हैं कि उस के मालिक वे खुद हैं. कुछ खिसके हुए मालिक अपने कुत्ते का नाम अपने दुश्मन के नाम पर रखते हैं, जैसे… खैर, जाने दीजिए. ये कुत्ते आदमी की भाषा भले ही न सम झें लेकिन कुत्ते की पूंछ हिलाने के ढंग से उस का मूड सम झ जाते हैं कि वह गुस्से में है या प्यार करना या करवाना चाहता है. कुछ लोगों ने कुत्तों के व्यवहार पर पीएचडी कर रखी है.

कुत्ते के प्रति मेरा रवैया मेरी बिल्ंिडग के लोगों को मालूम है. शायद, कुत्ते को मालूम न हो. इसीलिए एक बार जब मैं तलमंजिल में बैठ अपने मित्रों से बात कर रहा था कि एक पालतू कुत्ते ने उन में से मु झे चुन कर मेरे हाथ में काट लिया. खून बहने लगा. कुत्ता मालिक मु झे तुरंत स्कूटर पर बिठा कर डाक्टर के पास ले गया.

‘‘नाम क्या है?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘मालूम नहीं,’’ मैं ने जवाब दिया. डाक्टर ने फिर पूछा. मैं ने फिर वह जवाब दिया. उसे लगा कि मु झे काटने वाला कुत्ता जरूर खतरनाक होगा, मेरे दिमाग पर बुरा असर हुआ है. फिर भी मानसिक रोगों के डाक्टर के पास भेजने से पहले उस ने कहा, ‘‘मैं कुत्ते का नहीं, आप का नाम पूछ रहा हूं. आप का नाम क्या है?’’ मैं ने शरमा कर अपना नाम बताया. अपना नाम बताने में शर्म कैसी. डाक्टर ने मरहमपट्टी व इंजैक्शन के बाद दवा लिख दी और रवाना कर दिया.

घर पहुंचा तो लोग बेसब्री से मेरा इंतजार कर रहे थे. जब उन्होंने मु झे देखा तो सवालों के ढेर लग गए. डाक्टर क्या बोला? खतरे की बात तो नहीं? कितने इंजैक्शन लगेंगे? पेट में लगेंगे या कूल्हे पर? सब से भयानक सवाल तो तीसरी मंजिल के जोशी के थे. ‘‘जब कुत्ते ने काटा तो तुम खड़े थे या बैठे थे? उस हिसाब से कोई मंत्रपाठ करूं. तुम्हारा मुंह किस दिशा में था? कुत्ते का रंग कैसा था?’’

‘‘जन्मपत्री भेजो,’’ दुबेजी ने हुक्म दिया.

‘‘मु झे मालूम नहीं. जिस का कुत्ता है उस से पूछ कर बताता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘अरे, कुत्ते की नहीं, तू अपनी जन्मपत्री भेज. नहीं तो कम से कम अपनी जन्म तारीख और समय बता. देखता हूं कि क्या किया जा सकता है.’’

‘‘6 जनवरी. पैदा होने का ठीक समय मालूम नहीं.’’

‘‘सुबह या शाम?’’

‘‘सुबह, 8 बजे के आसपास.’’

‘‘तब तो खतरे की बात नहीं.’’ उन्होंने चैन की सांस ली और कहा, ‘‘अगर शाम को पैदा हुए होते तो उपवास या हवन कराने पड़ते. दस आवारा कुत्तों को भोज देना पड़ता. इच्छापूर्ति मंदिरों के चक्कर काटने पड़ते. सुबह वालों को श्वान काटने से कम खतरा होता है. मंगलवार को 4 काले कुत्तों को रोटी खिलाना. तीन मंगलवार को अलूना यानी बिना नमक का उपवास रखना. इंजैक्शन न लगाओ तो भी ठीक हो जाओगे.’’ इतने इलाज लादे जाने लगे कि मैं दब गया. इच्छा हुई कि अभी कुत्ते की तरह इन शुभचिंतकों को काट लूं.

दफ्तर से लौटे लोग भी मेरा हालचाल पूछने लगे. सम झदार लोग भी थे. बाकी कुत्ता काट एक्सपर्टों ने इंजैक्शन लगवाया या नहीं, इस की जानकारी ली. अभी और कितने या कब लगेंगे के बारे में भी पूछा. पत्नी ने साफ कहा कि घर में घुसते ही डेटौल से नहा कर ही कमरों में घुसना.

जब लोगों को कुत्ता कांड के बारे में पता चला तो रोज मु झ से हाथ मिलाने वाले, गले लगाने वाले मु झ से दूर रहने लगे. क्या पता मैं उन्हें काट लूं. मेरी हालत उस आवारा कुत्ते जैसी हो गई जिसे देख कर लोग बचने लगते हैं. जैसेजैसे समय बीतता गया, बात पुरानी होती गई, बिल्ंिडग में कई किराएदार अपनेअपने खुद के घरों मे चले गए, कुछ नए किराएदार आए. कुत्ता कांड अब महिलाओं की बैठकों का भी विषय नहीं रहा.

एक दिन जब मैं बाहर जा रहा था तो मेरे रिश्तेदार गुस्से में आते हुए नजर आए. घंटेभर से वे मेरा पता पूछ रहे थे. कोई बता नहीं पा रहा था. उन्हें इस बात का गुस्सा था कि आसपास के लोगों को मेरे बारे में कुछ भी नहीं मालूम. मेरा नाम तक नहीं मालूम. ‘‘तू लेखक तो नहीं बन गया?’’ उन्होंने अपना पसीना पोंछते हुए पूछा, ‘‘ये बच्चे भी नहीं बता पा रहे थे. ऐसे कैसे बच्चे हैं ये? तेरा पता पूछा तो साफ नट गए, ‘हम नहीं जानते.’’ बाहर खेल रहे बच्चों का ध्यान हमारी तरफ गया. वे हमारे पास आए. ‘‘सौरी अंकल. आप इन के बारे में पूछ रहे थे? हमें इन का नाम नहीं मालूम, इसलिए हम बता नहीं पाए. आप बस, इतना ही कहते कि कुत्ते से कटे वाले अंकल का घर कहां है तो हम आप को इन के फ्लैट तक पहुंचा आते. सौरी.’’

यह है मेरी पहचान. Hindi Kahani

Hindi Kahani : मौत न बने जिंदगी

लेखक – सुमित सेनगुप्ता

Hindi Kahani : रात साढ़े ग्यारह बज चुके हैं. सुशांत का सैशन अभी भी खत्म नहीं हुआ है. बाहर घुप अंधेरा है. चांद काले बादलों की घनी परत से ढका हुआ है. सुशांत शाम से बालकनी में बैठा हुआ है. एक सिगरेट का पैकेट खाली हो चुका है, दूसरा आधा खाली हो गया है. उस की पत्नी रिनी कमरे में सो रही है, उस ने नींद की गोली खा ली है. इतनी व्हिस्की पीने के बाद भी सुशांत की आंखों से नींद गायब है. उस की सारी मेहनत और कोशिशें आज बेकार साबित हो गई हैं.

बचपन में कुमिल्ला से कोलकाता भाग कर आना पड़ा. पिता की बचत और संपत्ति सब दंगे के कारण पानी की तरह बह गई. दक्षिण कोलकाता में यादवपुर के इस इलाके में आ कर पिता ने कपड़े की दुकान में लेखाजोखा का काम शुरू किया. बहुत कठिनाई से दिन गुजरते थे. एक भाई, एक बहन, मां और पिता के साथ छोटा सा परिवार था. मां एक ब्रैड फैक्ट्री में काम करने जाती थीं. उन का काम ब्रैड के पैकेट पर मोम की परत चढ़ाना था. गरमी के दिनों में फैक्ट्री की आग की गरमी मां के शरीर की सारी ऊर्जा खत्म कर देती थी. रात में मां को रसोई में नहीं जाने दिया जाता था. भाईबहन मिल कर रात का खाना बनाते थे. बचपन में सीखा हुआ खाना बनाने का हुनर आज भी सुशांत के काम आता है. रसोई में जा कर उस ने अंडे का आमलेट और चीज स्प्रैड के साथ चार सैंडविच बनाए. पेट में शराब पड़ने से भूख बढ़ गई है. रिनी को अभी जगाना नहीं है.

दोपहर में ब्रिस्टल से पुत्र सुपर्ण के दोस्त सुमन का फोन आया था. उस के बाद से सुशांत मानसिक रूप से बहुत परेशान हो गया है. सुपर्ण अस्पताल में है, गहरे अवसाद में है, उस का इलाज चल रहा है. सुशांत का सजाया हुआ बगीचा बिखर गया है. सुशांत हमेशा से ही परिवारप्रेमी रहा है. परिवार पर किसी तरह की आंच नहीं आने देता था. एक तरफ अपने कैरियर को बनाने में लगा रहता तो दूसरी तरफ परिवार की देखभाल करता था. जीवन की इस सफल प्रोग्रामिंग ने सुशांत को सामाजिक मानदंडों में ‘द कंप्लीट मैन’ का खिताब दिला दिया. सुशांत ने इस बात का आनंद लिया. बचपन में इस चीज की कमी महसूस होती थी.

मांपिता दिनरात मेहनत करते थे. भाईबहन पढ़ाई और काम में अच्छे थे, लेकिन आर्थिक कमजोरी के कारण सामाजिक सम्मान नहीं मिलता था. कुछ दिनों पहले सुपर्ण और कैरल भारत आए थे. उन की शादी का जश्न मनाने के लिए सुशांत ने बड़ी पार्टी दी थी. सब को दिखा कर सुशांत ने कहा था कि सुपर्ण ने सिर्फ एक अंगरेज लड़की नहीं, बल्कि एक सुंदर लड़की से शादी की है. सुपर्ण बिलकुल पिता की तरह दिखता है. पिता की तरह नहीं, बल्कि पिता से भी एक कदम आगे. बड़े घर की लड़की रिनी को प्यार के बंधन में बांध कर सुशांत ने दोस्तों को दिखाया था, ‘देखो मेरे कैलिबर को’. उस दिन पार्टी में सुपर्ण और कैरल को सब को दिखाया, खासकर अपनी ससुराल वालों को.

 

रिनी के घर वालों को सुशांत से शादी कराने का बिलकुल मन नहीं था. सुशांत छोटी जात का था, घर की स्थिति अच्छी नहीं थी और उस के चेहरे पर कोई चमक नहीं थी. वह कांटा अभी भी उस के मन में चुभता है. उस दिन सब को दिखा कर सुशांत ने कहा था, ‘कैरल जैसी सुंदर लड़की कहीं नहीं दिखती.’ मन में सोचा था कि इस का मतलब सब को सम झ में आ गया होगा. सब को दिखाते हुए सुपर्ण को पास खींच कर सुशांत ने कैरल से कहा था, ‘यह मेरा पर्ण है. सिर्फ मेरा.’ सुंदरी कैरल सुपर्ण को अपने पास खींच कर होंठों पर चुंबन लगा कर बोली थी, ‘नहीं, पर्ण मेरा है, मेरा दिल, मेरी जिंदगी. सिर्फ मेरा.’ उस दिन सुशांत खुशी से  झूम उठा था कि वह सब को पीछे छोड़ कर काफी आगे निकल चुका है.

सुशांत और रिनी ने बचपन से पर्ण को बहुत लाड़प्यार से पाला है. क्लास 8 तक सुशांत ने पर्ण को सभी विषय खुद पढ़ाए. आजकल के सिलेबस में अंगरेजी व्याकरण में कुछ खास नहीं है. इसलिए अच्छी अंगरेजी सीखने के लिए सिलेबस से बाहर जा कर पढ़ना पड़ता है. पर्ण के लिए रेन मार्टिन और पीके दि सरकार की अंगरेजी व्याकरण की किताबें खरीद कर पढ़ाईं. पति और पत्नी दोनों का ध्यान पर्ण पर था. पर्ण को सब से अच्छा बनाना था. इस के लिए जीवन में उन्हें बहुत त्याग करना पड़ा. दोस्तों के साथ आउटिंग या पिकनिक पर नहीं जाते थे वे. यहां तक कि उन्होंने रिश्तेदारों से भी संपर्क कम कर दिया. पर्ण ने भी मातापिता को निराश नहीं किया. एक बार में जौइंट क्लियर कर दिया. सुशांत हर कदम पर बेटे को जीवन का पाठ पढ़ाता, कहता, ‘जीवन में कोई फिक्स्ड थ्योरी नहीं चलती. स्थिति को सम झ कर चलना होता है. भावुक मत होना. भावुकता हमारे निर्णय के सामने एक अदृश्य परदा डाल देती है. जो लोग जीवन में तरक्की करते हैं वे बचपन से ही भविष्य का रोडमैप बना लेते हैं.’

अपने चेहरे को ले कर पर्ण हमेशा शर्मिंदा रहता. चेहरे और बुद्धि में पर्ण पूरी तरह से पिता का बेटा था. त्वचा का रंग काला होने के साथसाथ पूरे शरीर पर बड़ेबड़े बाल थे. कालेज में पर्ण के दोस्त उसे ‘भालू’ कह कर बुलाते थे. पर्ण कालेज के दिनों में बहुत शर्मीला था. होस्टल में रहने के बावजूद उस की शर्म दूर न होती थी. घर आने पर वह अपने मोबाइल, लैपटौप और गिटार में व्यस्त रहता. शारीरिक कुरूपता के कारण पर्ण खुद को सिमटा कर रखता था. एक बार न्यू मार्केट में शौपिंग करते समय पर्ण की कालेज की एक सहेली और उस के परिवार से मुलाकात हुई. पर्ण न देखने का नाटक कर के भागने लगा लेकिन वह लड़की आगे बढ़ कर बात करने लगी.

जब पर्ण की इंग्लिश लड़की कैरल से दोस्ती हुई तो सुशांत और रिनी दोनों हैरान रह गए. कैरल सुंदर और स्मार्ट थी. फेसबुक पर पर्ण को फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. पहले मैसेंजर बौक्स में बातचीत होती थी. फिर व्हाट्सऐप पर. कैरल ब्रिस्टल में रहती थी, जो भारतीय समय के अनुसार कोलकाता से चार घंटे पीछे है. सुबह ग्यारह बजे पहला गुडमौर्निंग मैसेज आता था. फिर पूरे दिन चैटिंग और वीडियो कौलिंग चलती. सुशांत ने कभी किसी विदेशी से बात नहीं की थी. जब पर्ण ने कहा कि वह कैरल से बात कराएगा तो रिनी तो क्या, सुशांत भी बहुत डर गया, क्या वह ब्रिटिश एक्सेंट सम झ पाएगा. लेकिन पहली बार बात करने के बाद सारे डर दूर हो गए.

कैरल से बात कर के बहुत अच्छा लगा. लड़की बहुत उत्साही और बातूनी थी. सुशांत को डैड कह कर बुलाती थी. सुशांत की कोई बेटी नहीं थी, इसलिए किसी लड़की के मुंह से डैड सुनना नया था. जल्दी ही पूरे परिवार के साथ कैरल का रिश्ता बन गया. कैरल ने सुशांत और रिनी के कपड़ों का साइज मांगा. फिर विदेश से गिफ्ट आया. सुशांत ने भी बहुतकुछ भेजा.

पर्ण का बीटैक पूरा हो गया. सुशांत ने कहा, ‘कहीं नौकरी कर लो. दो साल बाद एमबीए कर लेना.’

पर्ण ने दृढ़ता से कहा, ‘नहीं पापा, मैं मास्टर्स करूंगा.’

सुशांत ने थोड़ा चिंतित हो कर पूछा, ‘वह कहां करना चाहते हो?’

पर्ण ने जवाब दिया, ‘ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में मु झे आंशिक छात्रवृत्ति मिली है. रहने का खर्च नहीं लगेगा. जाने का किराया लगेगा. बाकी खर्चा चला लूंगा.’

सुशांत ने थोड़ा चिढ़ कर कहा, ‘सम झ में नहीं आया, रहने का खर्च नहीं लगेगा का मतलब? इस के अलावा भी तो खर्च बहुत हैं.’

कुछ देर रुक कर पर्ण ने संकोच के साथ कहा, ‘मतलब, मैं कैरल के घर रहूंगा. उस ने मेरे लिए एक पार्टटाइम नौकरी भी ढूंढ़ी है.’

सुशांत को यह बात  झटके की तरह लगी. अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. मन में सोचा, मेरा बेटा उस्ताद बन गया है, बहुत आगे निकल गया है. मेरी चिंता कम हो गई. फिर भी, आश्चर्य जताते हुए बोला, ‘क्या, विदेश में ऐसे किसी को जाने बिना उस के घर पर रहोगे? तुम हमारे इकलौते बेटे हो, इतना रिस्क लेना ठीक नहीं है.’

तीन दिनों तक पर्ण ने पिता से बात नहीं की. पिता को देख कर दूसरी तरफ मुड़ जाता. रिनी आ कर सुशांत से बोली, ‘देखो, बेटा बड़ा हो गया है, विदेश जाने का मौका मिला है. जाने दो उसे एक बार. कुछ गड़बड़ लगे तो वापस आ जाएगा. उम्र तो कम है, एक मौका मिला है, जाने दो.’

सुशांत ने पर्ण का फ्लाइट टिकट कटवा दिया. उस के खाते में कुछ पाउंड डाल दिए ताकि पहला  झटका सहने में मदद मिले. कैरल और उस का भाई एयरपोर्ट पर पर्ण को लेने आए और उसे अपने घर ले गए. रिनी के जरिए सुशांत को पता चला कि कैरल की मां तलाकशुदा है. वह, उस का भाई और मां एकसाथ रहते हैं. कैरल फैशन डिजाइनर है. एक लड़की के साथ मिल कर गारमैंट बनाने की दुकान चलाती है. कैरल की पढ़ाई ज्यादा आगे नहीं बढ़ी. कभीकभी फोन आता है, वे सब ठीक हैं.

छह महीने बाद रात में खाना खाने के बाद रिनी ने सुशांत को पास बिठा कर कहा, ‘पर्ण ने फोन किया था. कुछ नया हुआ है. तुम शांत मन से सुनो.’

रिनी की बात सुन कर सुशांत सम झ नहीं पा रहा था कि क्या होगा. ‘कैरल प्रैग्नैंट है और पर्ण उस से शादी करेगा.’ पर्ण ने अपनी मां को सम झाया, ‘मां, सम झा करो, कैरल से शादी करने से कैरियर में बहुत फायदा होगा. स्टूडैंट वीजा में बहुत परेशानी है. कैरल से शादी करने पर वह ग्रीनकार्ड होल्डर बन जाएगा. यूके में स्थायी रूप से रह सकेगा और सरकारी नौकरी भी मिल जाएगी.’

जल्दी से वीजा व पासपोर्ट बनवा कर सुशांत और रिनी ब्रिस्टल पहुंचे. शादी कर बेटे और बहू को साथ ले कर भारत लौटे. भारत में इस बात का सामाजिक पहलू भी संभालना था. भारत में 15 दिन रह कर पर्ण और कैरल ब्रिस्टल लौट गए. तीन महीने बाद सुशांत और रिनी दादादादी बन गए. पोता हुआ है, रंग कैरल की तरह है. पर्ण के कैरियर की चिंता अब सुशांत को नहीं है. मास्टर्स का काम अब रुक गया है. नौकरी कर के पैसा कमाना अब पर्ण के लिए मुख्य हो गया है, यह सुशांत अच्छी तरह सम झता है. इस निराशा को जाहिर कर के हलका होने का कोई रास्ता नहीं है. प्रतियोगिता में पीछे रह जाएगा. पर्ण के पिता होने की बात को कुछ लोगों से छिपा कर रखना पड़ा. एक के साथ एक मिला कर तीन करने वाले लोगों की कमी नहीं है.

आजकल सुशांत को वीडियो कौलिंग पर बात करने का मन नहीं करता. कहीं रिनी दुखी न हो जाए, पर्ण को तकलीफ न हो, इसलिए कैमरे के सामने बिना किसी गलती के अभिनय करना पड़ता है. कभीकभी जबरदस्ती पर्ण को पैसे भेजता है. नए कपड़े खरीद कर रिश्तेदारों और दोस्तों को बताता है, ‘यह पर्ण ने मु झे दिया है.’ लेकिन मेहनत से कमाए गए पैसों का सही उपयोग नहीं हो रहा है, इस का जवाब अपने मन को कैसे दे. पर्ण को भी अब थोड़ी शर्म आती है. भारत आने की बात नहीं करता. आने की बात उठने से कहता है, ‘तुम लोग आओ.’

सुशांत सम झता है कि पर्ण के लिए इतने पैसे फ्लाइट के किराए में देना अब संभव नहीं है. सुशांत ने टिकट कटवाने की पेशकश की थी, लेकिन पर्ण ने लेने से मना कर दिया. ब्रिस्टल जा कर सुशांत ने सम झ लिया कि कैरल के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. कैरल जो दुकान चलाती है, वह एक तरह की दरजी की दुकान है. सारा काम कैरल और उस की पार्टनर मिल कर करती हैं. कुछ दिनों पहले रिनी ने जबरदस्ती वीडियो कौलिंग की. पर्ण को देख कर रिनी चौंक गई. यह क्या हालत हो गई है, दुबलापतला चेहरा, आंखों के नीचे गहरे काले घेरे, बाल बिखरे हुए. पूछने पर पर्ण ने कहा, ‘काम का दबाव और बेटे पौल की वजह से रात को ठीक से नींद नहीं आती.’

फोन पर रिनी गरज उठी, ‘पर्ण, मैं तेरी मां हूं. मु झ से कुछ मत छिपाओ. अगर खराब लगे तो सब को ले कर चले आओ.’

यह सुन कर पर्ण हंस दिया, बोला, ‘तुम लोग चिंता मत करो. थोड़ा आराम कर लूंगा तो सब ठीक हो जाएगा.’ फिर आज पर्ण के कालेज के दोस्त सुमन का फोन आया, ‘आंटी, सुपर्ण को अस्पताल में भरती कराना पड़ा है. उस की मानसिक स्थिति बहुत खराब है. वह ‘डीप डिप्रैशन’ में है. ट्रीटमैंट चल रहा है. आप लोग चले आओ. नहीं तो उसे ठीक नहीं किया जा सकेगा.’

चिंतित स्वर में रिनी ने पूछा, ‘कैरल कहां है?’

सुमन ने कहा, ‘कैरल ने उसे छोड़ दिया है.’

रिनी ने पूछा, ‘कैरल कहां गई है? उस के घर?’

सुमन ने कहा, ‘नहीं आंटी, वह अब अपने बिजनैस पार्टनर के साथ रहती है.’

रिनी थोड़ी राहत महसूस करती है, हौसला दे कर बोली, ‘ठीक है, हम आ रहे हैं. गुस्से में दोस्त के घर चली गई है. देखते हैं, जा कर सम झाबु झा कर कुछ कर सकते हैं.’

सुमन हंस पड़ा, बोला, ‘आंटी, बात इतनी आसान नहीं है. कैरल अपने बिजनैस पार्टनर से शादी कर रही है. उन का यह रिश्ता बहुत पुराना है.’

रिनी थोड़ी हैरान हो कर बोली, ‘उस का बिजनैस पार्टनर तो एक लड़की है.’

सुमन फिर हंस पड़ा, खुद को संभाल कर बोला, ‘आंटी, यहां यह भी होता है. एक बच्चा पाने के लिए कैरल ने सुपर्ण से शादी की थी. उस ने सुपर्ण को अपने मिशन को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया.’

रिनी मोबाइल पकड़े नहीं रह सकी, लाइन काटे बिना ही पास की मेज पर रख दिया. उधर से सुमन की आवाज आ रही थी, ‘आंटी, आंटी, क्या आप मु झे सुन सकती हैं? कैन यू हियर मी? आप लोग जल्दी चले आओ.’ Hindi Kahani

Hindi Kahani : उसे किस ने मारा

Hindi Kahani : ईमानदारी की कंटीली राह पर चलने वाले आकाश को ऊंचे सरकारी पद पर आसीन होने पर कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता था.

आज आकाश चला गया…लोग कहते हैं, उस की मौत हार्ट अटैक से हुई है पर मैं कहती हूं कि उसे जमाने ने मौत के आगोश में धकेला है, उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया है. हां, आत्महत्या… आप लोग समझ रहे होंगे कि आकाश की मृत्यु के बाद मैं पागल हो गई हूं…हां…हां मैं पागल हो गई हूं…आज मुझे लग रहा है, इस दुनिया में जो सही है, ईमानदार है, कर्मठ है, वह शायद पागल ही है…यह दुनिया उस के रहने लायक नहीं है.

आज भी ऐसे पागल इस दुनिया में मौजूद हैं, जो अपने उसूलों पर चलते हुए शायद वे भी आकाश की तरह ही सिसकतेसिसकते मौत को गले लगा लें, इस से दुनिया को क्या फर्क पड़ने वाला है. वह तो यों ही चलती जाएगी. सिसकने के लिए रह जाएंगे उस बदनसीब के घर वाले.

दीपाली का प्रलाप सुन कर वसुधा चौंकी थी. दीपाली उस की प्रिय सखी थी. उस के जीवन का हर राज उस का अपना था. यहां तक कि उस के घर अगर एक गमला भी टूटता तो उस की खबर भी उसे लग ही जाती. उन में इतनी अंतरंगता थी.

लेकिन क्या आकाश की हालत के लिए वह स्वयं जिम्मेदार नहीं थी. वह आकाश की जीवनसाथी थी. उस के हर सुखदुख में शामिल होने का हक ही नहीं, उस का कर्तव्य भी था पर क्या वह उस का साथ दे पाई? शायद नहीं, अगर ऐसा होता तो इतनी कम उम्र में आकाश का यह हश्र न होता.

आकाश एक साधारण किसान परिवार से था. पढ़ने में तेज, धुन का पक्का, मन में एक बार जो ठान लेता उसे कर के ही रहता था. अच्छा खातापीता परिवार था. अभाव था तो सिर्फ शिक्षा का…उस के पिताजी ने उस की योग्यता को पहचाना. गांव में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने घर वालों के विरोध के बावजूद बेटे को उच्च शिक्षा के लिए शहर भेजा, तो शहर की चकाचौंध से कुछ पलों के लिए आकाश भ्रमित हो गया था.

यहां की तामझाम, गिटरपिटर अंगरेजी बोलते बच्चों के बीच उसे लगा था कि वह सामंजस्य नहीं बिठा पाएगा पर धीरेधीरे अपने आत्मविश्वास के कारण अपनी कमियों पर आकाश विजय प्राप्त करता गया और अव्वल आने लगा. जहां पहले उस के शिक्षक और मित्र उस के देहातीपन को ले कर मजाक बनाते रहते थे, अब उस की योग्यता देख कर कायल होने लगे. हायर सेकंडरी में जब वह पूरे राज्य में प्रथम आया तो पेपर में नाम देख कर घर वालों की छाती गर्व से फूल उठी.

उसी साल उस का इंजीनियरिंग कालिज इलाहाबाद में चयन हो गया. पिता ने अपनी सारी जमापूंजी लगा कर उस का दाखिला करवा दिया. बस, यही बात उस के बड़े भाइयों को खली, कुछ सालों से फसल भी अच्छी नहीं हो रही थी. भाइयों को लग रहा था, मेहनत वे करते हैं पर उन की कमाई पर मजा वह लूट रहा है.

कहते हैं न कि ईर्ष्या से बड़ा जानवर कोई नहीं होता. वह कभीकभी इनसान को पूरा निगल जाता है. उस के भाइयों का यही हाल था और उन के वहशीपन का शिकार उस के मातापिता बन रहे थे. छुट्टियों में जब आकाश घर गया तो उस की पारखी नजरों से घर में फैला विद्वेष तथा मां और पिताजी के चेहरे पर छाई दयनीयता छिप न सकी. मां ने अपने कुछ जेवर छिपा कर उसे देने चाहे तो उस ने लेने से मना कर दिया.

एक दृढ़ निश्चय के साथ आकाश इलाहाबाद लौट गया था. कुछ ट्यूशन कर ली, साथ ही इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में प्रथम आने के कारण उसे स्कालरशिप भी मिलने लगी. अब उस का अपना खर्चा निकलने लगा. इंजीनियरिंग करते ही उसे सरकारी नौकरी मिल गई.

नौकरी मिलते ही वह अपने मातापिता को साथ ले आया. भाइयों ने भी चैन की सांस ली. पर पानी होते रिश्तों को देख कर आकाश का मन रोने लगा था.

सरकारी नौकरी मिली तो शादी के लिए रिश्ते भी आने शुरू हो गए. वैसे आकाश अभी कुछ दिन विवाह नहीं करना चाहता था पर मां की आंखों में सूनापन देख कर उस ने बेमन से ही विवाह की इजाजत दे दी.

मातापिता के साथ रहने की बात जान कर कुछ लोगों ने आगे बढ़ अपने कदम पीछे खींच लिए थे. रिश्तों में आती संवेदनहीनता को देख कर उस का मन बहुत आहत हुआ था. मातापिता को इस बात का एहसास हुआ तो वे खुद को दोषी समझने लगे, तब आकाश ने उन को दिलासा देते हुए कहा था, ‘आप स्वयं को दोषी क्यों समझ रहे हैं, यह तो अच्छा ही हुआ कि समय रहते उन की असलियत खुल गई, जो रिश्तों का सम्मान करना नहीं जानते. वे भला अन्य रिश्ते कैसे निभा पाएंगे. रिश्तों में स्वार्थ नहीं समर्पण होना चाहिए.’

आखिर एक ऐसा परिवार मिल ही गया. मातापिता के साथ में रहने की बात सुन कर लड़की का भाई विवेक बोला, ‘हम ने मातापिता का सुख नहीं भोगा. पर मुझे उम्मीद है कि आप के सान्निध्य में मेरी बहन को यह सुख नसीब हो जाएगा.’

विवेक और दीपाली के मातापिता बचपन में ही मर गए थे. उन के चाचाचाची ने उन्हें पाला था पर धीरेधीरे रिश्तों में आती कटुता ने उन्हें अलग रहने को मजबूर कर दिया. विवेक ने जैसेतैसे एक नौकरी तलाशी तथा बहन को ले कर अलग हो गया. नौकरी करतेकरते ही उस ने अपनी पढ़ाई जारी रखी, बहन को पढ़ाया और आज वह स्वयं एक अच्छी जगह नौकरी कर रहा था.

दीपाली आकाश को अच्छी लगी. अच्छे संस्कारिक लोग पा कर विवाह के लिए वह तैयार हो गया. दीपाली ने घर अच्छी तरह से संभाल लिया था. मातापिता भी बेहद खुश थे. घर में सुकून पा कर आफिस के कामों में भी मन रमने लगा. अभी तक तो उसे काम सिखाया जा रहा था पर अब स्वतंत्र विभाग उस को दे दिया गया.

आकाश ने जब अपने विभाग की फाइलों को पढ़ा और स्टोर में जा कर सामान का मुआयना किया तो सामान की खरीद में हेराफेरी को देख कर वह सिहर उठा. पेपर पर दिखाया कुछ जाता, खरीदा कुछ और जाता. कभीकभी आवश्यकता न होने पर भी सामान खरीद लिया जाता. सरप्लस स्टाक इतना था कि उस को कहां खपाया जाए, वह समझ नहीं पा रहा था. अपने सीनियर से इस बात का जिक्र किया तो उन्होंने कहा, ‘अभी नएनए आए हो, इसलिए परेशान हो. धीरेधीरे इसी ढर्रे पर ढलते जाओगे. जहां तक सरप्लस सामान की बात है, उसे पड़ा रहने दो, कुछ नहीं होगा.’

एक दिन आकाश अपने आवास पर आराम कर रहा था कि एक सप्लायर आया और उसे एक पैकेट देने लगा. उस ने पूछा, ‘यह क्या है?’

‘स्वयं देख लीजिए सर.’

पैकेट खोला तो उस के अंदर रखी रकम देख कर आकाश का खून जम गया.

‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, यह रकम मुझे पकड़ाने की.’

‘सर, आप नए हैं, इसलिए जानते नहीं हैं, यह आप का हिस्सा है.’

‘पर मैं इसे नहीं ले सकता.’

‘यह आप की मर्जी सर, पर ऐसा कर के आप बहुत बड़ी भूल करेंगे. आखिर घर आई लक्ष्मी को कोई ऐसे ही नहीं लौटाता है.’

‘अब तुम यहां से जाओ वरना मैं पुलिस को बुलवा कर तुम्हें रिश्वत देने के आरोप में गिरफ्तार करवा दूंगा.’

‘ऐसी गलती मत कीजिएगा. यह आरोप तो मैं आप पर भी लगा सकता हूं,’ निर्लज्जता से मुसकराते हुए वह बोला.

अगले दिन आकाश ने अपने सहयोगी से बात की तो वह बोला, ‘इस में तुम या मैं कुछ नहीं कर सकते. यह तो वर्षों से चला आ रहा है. जो भी इस में अड़ंगा डालने का प्रयत्न करता है उस का या तो स्थानांतरण करवा देते हैं या फिर झूठे आरोप में फंसा कर घर बैठने को मजबूर कर देते हैं, वैसे भी घर आई लक्ष्मी को दुत्कारना मूर्खता है.’

उस ने उसी समय निर्णय लिया था कि लोग चाहे जो भी करें पर वह इस पाप की कमाई को हाथ नहीं लगाएगा. वैसे भी पहली बार नौकरी पर जाने से पहले जब वह पिताजी से आशीर्वाद लेने गया था, तो उन्होंने कहा था, ‘बेटा, जिंदगी की डगर बड़ी कठिन है, जो कठिनाइयों को पार कर के आगे बढ़ता जाता है निश्चय ही सफल होता है. कामनाओं की पूर्ति के लिए ऐसा कोई काम मत करना जिस के लिए तुम्हें शर्मिंदा होना पड़े. जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाना.’

वह उन की बातों को दिल में उतार कर जीवन की नई डगर पर नई आशाओं के साथ चल पड़ा था. अपनी पत्नी दीपाली को अपना फैसला सुनाया तो उस ने भी उस की बात का समर्थन कर दिया. तब उसे लगा था कि जीवनसाथी का सहयोग जीवन की कठिन से कठिन राहों पर चलने की प्रेरणा देता है.

काम को आकाश ने बोझ समझ कर नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझ कर अपनाया था, इसलिए काम को संपूर्ण करने के लिए वह ऐसे जुट जाता था कि न दिन देखता न ही रात, इस के लिए उसे अपने परिवार से भी भरपूर सहयोग मिला.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. ऊंचा ओहदा, सम्मान, सुंदर पत्नी, पल्लव और स्मिता जैसे प्यारे 2 बच्चे, बूढ़े मांबाप का सान्निध्य. अपने काम के साथ मातापिता की जिम्मेदारी भी वह सहर्ष निभा रहा था. आखिर उन्होंने ही तो उसे इस मुकाम पर पहुंचने में मदद की थी.

दीपाली और वसुधा साथसाथ पढ़ी थीं. यही कारण था कि विवाह हो जाने के बाद भी हमेशा वे एकदूसरे के संपर्क में रहीं. यहां तक कि वर्ष में एक बार दोनों परिवार मिल कर एकसाथ कहीं घूमने चले जाते. वसुधा के पति सुभाष को भी आकाश का साथ अच्छा लगता. जी भर कर बातें होतीं. लगता, समय यहीं ठहर जाए पर समय कभी किसी के लिए रुका है?

जैसेजैसे खर्चे बढ़ने लगे दीपाली अपने वादे से मुकरने लगी. महीने का अंत होता नहीं था कि हाथ खाली होने लगता था, उस पर बूढ़े मातापिता के साथ 2 बच्चों का खर्चा अलग से बढ़ गया था. दीपाली अकसर अपनी परेशानी का जिक्र वसुधा से करती तो वह उसे संयम से काम लेने के लिए कहती, पर उस पर तो जैसे कोई जनून ही सवार हो गया था, आकाश की बुराई करने का.

यह वही दीपाली है जो एक समय आकाश की तारीफ करते नहीं थकती थी और अब बुराई करते नहीं थकती है. इनसान में इतना परिवर्तन कब, क्यों और कैसे आ जाता है, समझ नहीं पा रही थी वसुधा. आखिर कोई औरत अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पति से वह सबकुछ क्यों करवाना चाहती है जो वह करना नहीं चाहता. दीपाली और आकाश के बीच की दूरी बढ़ती जा रही थी और वसुधा चाह कर भी कुछ कर नहीं पा रही थी.

दीपाली कहती, ‘वसुधा, आखिर इन की ईमानदारी से किसी को क्या फर्क पड़ता है. जो इन की सचाई पर विश्वास करते हैं वह इन्हें गलत प्रोफेशन में आया कह कर इन का मजाक बनाते हैं और जो नहीं करते वे भी कह देते हैं कि भई, हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और. भला आज के जमाने में ऐसा भी कहीं हो सकता है.’

बाहर तो बाहर आकाश घर में भी शिकस्त खाने लगा था. पत्नी और बच्चों के चेहरे पर छाई असंतुष्टि अकसर सोचने को मजबूर करती कि कहीं वह गलत तो नहीं कर रहा है, पर आकाश के अपने संस्कार उस को कुछ भी गलत करने से सदा रोक देते.

वह बच्चों की किसी मांग को अगले महीने के लिए टाल देने को कहता तो उस की 5 वर्षीय बेटी स्मिता ही कह देती, ‘इस का मतलब आप खरीदवाओगे नहीं. अगले महीने फिर अगले महीने पर टाल दोगे.’

आकाश कभी दीपाली को उस का वादा याद दिलाता तो वह कह देती,  ‘वह तो मेरी नादानी थी पर अब जब दुनिया के रंगढंग देखती हूं तो लगता है कि तुम्हारे इस खोखले दंभ के कारण हम कितना सफर कर रहे हैं. तुम्हारे जैसे लोग जहां आज नई गाड़ी खरीदने में जरा भी नहीं सोचते, वहीं हमें रोज की जरूरतों को पूरा करने के लिए अगले महीने का इंतजार करना पड़ता है. कार भी खरीदी तो वह भी सेकंड हैंड. मुझे तो उस में बैठने में भी शर्म आती है.’

‘दीपाली, इच्छाओं की तो कोई सीमा नहीं होती. वैसे भी घर सामानों से नहीं उस में रहने वालों के आपसी प्यार और विश्वास से बनता है.’

‘प्यार और विश्वास भी वहीं होगा, जहां व्यक्ति संतुष्ट होगा, उस की सारी इच्छाएं पूरी हो रही होंगी.’

‘तो क्या तुम सोचती हो जिन्हें तुम संतुष्ट समझ रही हो, उन में कोई असंतुष्टि नहीं है. वहां जा कर देखो तो पता चलेगा कि वे हम से भी ज्यादा असंतुष्ट हैं.’

‘बस, रहने भी दीजिए…कोरे आदर्शों के सहारे दुनिया नहीं चलती.’

‘अगर ऐसा है तो तुम आजाद हो, अपनी नई दुनिया बसा सकती हो, जैसे चाहे रह सकती हो.’

तब तिलमिला कर उस ने कहा था, ‘बस, अब यही तो सुनने को रह गया था.’

यह कह कर दीपाली तो चली गई पर आकाश वहीं बैठाबैठा अपने सिर के बाल नोंचने लगा. उस बार उन दोनों के बीच लगभग हफ्ते भर अबोला रहा. उन के झगड़े अब इतने बढ़ गए थे कि बच्चे भी सहमने लगे थे, कभीकभी लगता कहीं इन दोनों की तकरार के कारण बच्चे अपना स्वाभाविक बचपन न गंवा बैठें.

इसी की आशंका जाहिर करते हुए मैं ने जबजब दीपाली को समझाना चाहा तबतब एक ही उत्तर मिलता, ‘यह बात मैं भी समझती हूं वसुधा, पर केवल दालरोटी से ही तो काम नहीं चलता. अभी बच्चे छोटे हैं, बड़े होंगे तो उन की पढ़ाई, शादीविवाह में भी तो खर्चा होगा, अगर अभी से कुछ बचत नहीं कर पाए तो आगे कैसे होगा.

रोधो कर जिंदगी घिसटती ही गई. पहला झटका आकाश को तब लगा जब उस के पिताजी को हार्ट अटैक आया. डाक्टर ने आकाश से पिता की बाईपास सर्जरी करवाने की सलाह दी. उस समय आकाश के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह खुद के खर्चे पर उन का इलाज करवा पाता. उस के पिताजी उस पर ही आश्रित थे, अत: कानून के अनुसार उन की बीमारी का खर्चा आकाश को कंपनी से मिलना था. उस ने एडवांस के लिए आवेदन कर दिया, पर कागजी खानापूर्ति में ही लगभग 2 महीने निकल गए.

आकाश पिताजी को ले कर अपोलो अस्पताल गया. आपरेशन के पूर्व के टेस्ट चल रहे थे कि उन्हें दूसरा अटैक आया और उन्हें बचाया नहीं जा सका. डाक्टरों ने सिर्फ इतना ही कहा कि इन्हें लाने में देर हो गई.

मां पिताजी से बिछड़ने का दुख सह नहीं पाईं और कुछ ही महीनों के अंतर पर उन की भी मृत्यु हो गई.

आकाश टूट गया था. उसे इस बात का ज्यादा दर्द था कि पैसों के अभाव में वह अपने पिता का उचित उपचार नहीं करा पाया. जबजब इस बात से उस का मन उद्वेलित होता, पिताजी की सीख उस के इरादों को और मजबूत कर देती. अंगरेजी की एक कहावत है ‘ग्रिन एंड बियर’ यानी सहो और मुसकराओ, यही उस के जीने का संबल बन गई थी.

मांपिताजी को तो वह खो चुका था. पल्लव तो अभी छोटा था पर अब बड़ी होती अपनी बेटी की ठीक से परवरिश न कर पाने का दोष भी उस पर लगने लगा था. डोनेशन की मोटी मांग के लिए रकम वह न जुटा पाने के कारण उस स्कूल में बेटी स्मिता का दाखिला नहीं करा पाया जिस में कि दीपाली चाहती थी.

जिस राह पर आकाश चल रहा था उस पर चलने के लिए उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही थी, दुख तो इस बात का था कि उस के अपने ही उसे नहीं समझ पा रहे थे. तनाव के साथ संबंधों में आती दूरी ने उसे तोड़ कर रख दिया. मन ही मन आदर्श और व्यावहारिकता में इतना संघर्ष होने लगा कि वह हाई ब्लडप्रेशर का मरीज बन गया.

अपने ही अंत:कवच में आकाश ने खुद को कैद कर लिया पर दीपाली ने उस की न कोई परवा की और न ही पति को समझना चाहा. उसे तो बस, अपने आकांक्षाओं के आकाश को सजाने के लिए धन चाहिए था. वह रोकताटोकता तो दीपाली सीधे कह देती, ‘अगर तुम अपने वेतन से नहीं कर पाते हो तो लोन ले लो. जिस समाज में रहते हैं उस समाज के अनुसार तो रहना ही होगा. आखिर हमारा भी कोई स्टेटस है या नहीं, तुम्हारे जूनियर भी तुम से अच्छी तरह रहते हैं पर तुम तो स्वयं को बदलना ही नहीं चाहते.’

यह वही दीपाली थी जिस ने मधुयामिनी की रात साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं, सुखदुख में साथ निभाने का वादा किया था. पर जमाने की कू्रर आंधी ने उन्हें इतना दूर कर दिया कि जब मिलते तो लगता अपरिचित हैं. बस, एहसास भर ही रह गया था. बच्चे भी सदा मां का ही पक्ष लेते. मानो वह अपने ही घर में परित्यक्त सा हो गया था.

अपनी लड़ाई आकाश स्वयं लड़ रहा था. प्रमोशन के लिए इंटरव्यू काल आया. इंटरव्यू भी अच्छा ही रहा. पैनल में उस का नाम है, यह पता चलते ही कुछ लोगों ने बधाई देनी भी शुरू कर दी पर जब प्रमोशन लिस्ट निकली तो उस में उस का नाम नहीं था, देख कर वह तो क्या पहले से बधाई देने वाले भी चौंक गए. पता चला कि उस का नाम विजीलेंस से क्लीयर नहीं हुआ है.

उस पर एक सप्लायर कंपनी को फेवर करने का आरोप लगा है, इस के लिए चार्जशीट दायर कर दी गई है. वैसे तो आकाश फाइल पूरी तरह पढ़ कर साइन किया करता था पर यहां न जाने कैसे चूक हो गई. रेट और क्वालिटी आदि की स्कू्रटनी वह अपने जूनियर से करवाया करता था. उन के द्वारा पेश फाइल पर जब वह साइन करता तभी आर्डर प्लेस होता था.

इस फाइल में कम रेट की उपेक्षा कर अधिक रेट वाले को सामान की गुणवत्ता के आधार पर उचित ठहराते हुए आर्डर प्लेस करने की सिफारिश की गई थी. साइन करते हुए आकाश यह भूल गया था कि वह किसी प्राइवेट कंपनी में नहीं एक सरकारी कंपनी में काम करता है जहां सामान की क्वालिटी पर नहीं सामान के रेट पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है.

नियम तो नियम है. इसी बात को आधार बना कर कम रेट वाले कांटे्रक्टर ने आकाश को दोषी ठहराते हुए एक शिकायती पत्र विजीलेंस को भेज दिया था.

नियमों के अनुसार तो गलती उन से हुई थी क्योंकि उन्होंने नियमों की अनदेखी की थी पर उस में उन का अपना कोई स्वार्थ नहीं था वह तो सिर्फ बनने वाले सामान की क्वालिटी में सुधार लाना चाहता था.

आफिस में कानाफूसी प्रारंभ हो गई, ‘बड़े ईमानदार बनते थे. आखिर दूध का दूध पानी का पानी हो ही गया न.’

‘अरे, भाई ऐसे ही लोगों के कारण हमारा विभाग बदनाम है. करता कोई है, भरता कोई है.’

दीपाली के कानों तक जब यह बात पहुंची तो वह तिलमिला कर बोली, ‘तुम तो कहते थे कि मैं किसी का फेवर नहीं करता. जो ठीक होता है वही करता हूं, फिर यह गलती कैसे हो गई. कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम मुझ से छिपा कर पैसा कहीं और रख रहे हो.’

उस के बाद उस से कुछ सुना नहीं गया, उसी रात उसे जो हार्ट अटैक आया. हफ्ते भर जीवनमृत्यु से जूझने के बाद आखिर उस ने दम तोड़ ही दिया.

खबर सुन कर वसुधा एवं सुभाष, आकाश के साथ बिताए खुशनुमा पलों को आंखों में संजोए आ गए. सदा शिकायतों का पुलिंदा पकड़े दीपाली को इस तरह रोते देख कर, आंखें नम हो आई थीं. पर बारबार मन में यही आ रहा था कि सबकुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया?

मां को रोते देख कर मासूम बच्चे अलग एक कोने में सहमे से दुबके खड़े थे, शायद उन की समझ में नहीं आ रहा कि मां रो क्यों रही हैं तथा पापा को हुआ क्या है. मां को रोता देख कर बीचबीच में बच्चे भी रोने लगते. उन्हें ऐसे सहमा देख कर, दीपाली स्वयं को रोक नहीं पाई तथा उन्हें सीने से चिपका कर रो पड़ी. उसे रोता देख कर नन्हा पल्लव बोला, ‘आंटी, ममा भी रो रही हैं और आप भी लेकिन क्यों. पापा को हुआ क्या है, वह चुपचाप क्यों लेटे हैं, बोलते क्यों नहीं हैं?’

उस की मासूमियत भरे प्रश्न का मैं क्या जवाब देती पर इतना अवश्य सोचने को मजबूर हो गई थी कि बच्चों से उन की मासूमियत छीनने का जिम्मेदार कौन है? एक जिंदादिल, उसूलों के पक्के इनसान को किस ने मारा.

Short Hindi Stories : आतंकवादी नहीं हूं मैं

Short Hindi Stories :  एक दिन देर रात तक जब रज्जाक घर नहीं लौटा तो रानो को उस की चिंता सताने लगी. परेशान रानो सुलेमान बेकरी में फोन करती है. उसे पता चलता है कि वह सुबह ही किसी अनजान आदमी के साथ बिना बताए कहीं चला गया है. यह सुन कर रानो परेशान हो जाती है और अतीत की गलियों में खो जाती है. वह एम.ए. की परीक्षा के बाद ननिहाल आई थी. जिस दिन उस ने अपने घर लौटने का प्रोग्राम बनाया था उस से पिछली रात कुछ अज्ञात आतंकवादी आधी रात को ननिहाल में सब को गोलियों से भून देते हैं पर रानो बच जाती है. एक आतंकवादी उसे देख लेता है और उस की जान बख्श देता है.

गांव में दहशत फैलाने के बाद वे नशे में धुत्त हो जाते हैं तो उन में से एक आतंकवादी रानो के पास आता है. वे दोनों वहां से भाग जाते हैं. बस में बैठी रानो अपने घर वालों को याद कर के रोने लगती है. वह उसे सांत्वना देता है और उस को जम्मू उस के घर छोड़ने जाता है. रानो के मातापिता उसे जलीकटी सुना कर घर से निकाल देते हैं. अनजान जगह पर बैठे दोनों भविष्य की योजना बनाते हैं. वह रानो को अपने अतीत के बारे में बताता है. रानो को वहीं छोड़ वह अपनी मां के पास दिल्ली जा कर पैसे ले कर आता है.

दिल्ली में ही दोनों किराए के मकान में रहने लगते हैं. एक दिन वह रानो के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है और दोनों मंदिर में जा कर शादी कर लेते हैं. काम की तलाश में भटकता वह सुलेमान बेकरी पहुंचता है और अब आगे…

रज्जाक की मौत के बाद रानो पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. एक ओर उस की मौत का सदमा तो दूसरी तरफ हिमायत की भूखी नजरें, दिनरात उस का पीछा किया करतीं. रानो जाए तो जाए कहां. अपनों के सहारे की तलाश में भटकती रानो एक बार फिर अपने मासूम बेटे अरमान को ले कर निकल पड़ी. बेसहारा लड़की द्वारा संघर्ष कर के जीवन की ऊंचाइयों को छूने की मर्मस्पर्शी कहानी नलिनी शर्मा द्वारा.

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

राजा के आग्रह पर सुलेमान ने उसे 2 दिन के लिए रख लिया. राजा ने पहले दिन बेकरी में जो बिस्कुट बनाए उन का स्वाद चख कर सुलेमान के मुंह से निकल पड़ा, ‘वाह, क्या लाजवाब स्वाद है. कहां से सीखा यह सब बनाना बर्खुरदार?’

राजा ने विनम्रता से सिर झुका कर कहा,  ‘आप सब बड़ों के आशीर्वाद का फल है.’

योग्यता व विनम्रता का अपूर्व संगम देख सुलेमान ने तुरंत राजा को 2 हजार रुपए मासिक की नौकरी पर रख लिया और एक अच्छे महल्ले में उस के रहने के लिए घर की व्यवस्था कर दी. अब राजा व रानो दोनों खुश थे. सुलेमान व उन की बेगम आयशा भी दोनों को बहुत चाहते थे. जीवन की गाड़ी सुख के साथ चलने लगी. औलाद के लिए तरसते सुलेमान दंपती राजा व रानो को अपनी औलाद समझते और उन्हें भरपूर प्यार देते. दोनों ने यह खुशखबरी अपनेअपने मांबाप के पास भेजी, पर कोई जवाब नहीं आया. 1 साल बाद रानो ने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया जिस का नाम उन्होंने अरमान रखा. धीरेधीरे अरमान 3 साल का हुआ और पास के नर्सरी स्कूल में जाने लगा. जब वह 5 साल का हुआ तो राजा ने उसे एक अच्छे पब्लिक स्कूल में भरती करवा दिया.

राजा के कारण बेकरी दिनदूनी रात चौगुनी प्रगति कर रही थी. सुलेमान बेकरी के व्यंजन खरीदने दूरदूर से लोग आते. साथ ही बडे़बडे़ होटल व थोक दुकानदार सप्लाई करने के लिए बड़ेबडे़ आर्डर देते. एक रात सुलेमान की नींद में ही हार्टअटैक से मृत्यु हो गई. शोकाकुल आयशा को राजा व रानो ने संभाल लिया. सुलेमान की अचानक मौत से स्तब्ध राजा को यह जान कर एक और धक्का लगा  कि उन्होंने अपनी वसीयत में बेकरी सहित सारी जायदाद उस के नाम कर दी है. शोक प्रकट करने आए आयशा के रिश्तेदारों को यह जान कर बहुत बुरा लगा कि सुलेमान ने अपनी पत्नी आयशा को कुछ नहीं दे कर सबकुछ एक अजनबी नौकर के नाम कर दिया है. पर आयशा आश्वस्त थी, उसे राजा पर पूरा भरोसा था.

आयशा के भाई हिमायत की नजर अपनी बहन की संपूर्ण धनसंपत्ति पर थी. बहन को प्यार से फुसला कर हिमायत ने राजा के बारे में सच उगलवा लिया. सब जानते ही हिमायत अपने गांव गया और अपनी पत्नी सलमा व दोनों बच्चों को ले आया. सब मिल कर आयशा की सेवा करते और उस को लुभाने का हर संभव प्रयास करते. बेऔलाद आयशा ने भी अपने भाई के दोनों बच्चों को कलेजे से लगा लिया. हिमायत व उस के परिवार की उपस्थिति से राजा अचानक अपने को वहां बेगाना समझने लगा. यही नहीं, हिमायत ने बेकरी के हिसाबकिताब का  चार्ज राजा से छीन लिया और उसे धमकाया,  ‘मैं तुम्हारी असलियत जान चुका हूं. तुम आतंकवादी हो. सबकुछ मेरे नाम कर दो और पहले जैसे नौकर बन कर काम करो, वरना…’

‘वरना क्या?’ पूछा राजा ने.

‘मैं कुछ भी कर सकता हूं. अभी पुलिस में कंप्लेंट…’ वाक्य अधूरा छोड़ दिया हिमायत ने.

राजा पुलिस व इतवारी को पूर्ण रूप से भूल चुका था. सिहर उठा दोनों को याद कर के. सच्ची लगन व ईमानदारी से सेवा कर के उस ने बेकरी को बुलंदियों पर पहुंचाया था. हिमायत के आक्रामक रुख से वह तनावग्रस्त रहने लगा. रानो के  कई बार पूछने पर भी उस ने उसे कुछ नहीं बताया क्योंकि वह उसे इन सब पचड़ों से दूर रखना चाहता था.

राजा रात भर घर नहीं लौटा तो चिंतित रानो दिन निकलते ही बेकरी जा पहुंची. वहां तहमद बांधे भारीभरकम शरीर का हिमायत काउंटर पर बैठा था. तड़के रूपसी को सामने देख कर हिमायत की आंखें रानो के पूरे शरीर का जायजा लेने लगीं.

रानो की आवाज सुन कर उस का सम्मोहन भंग हुआ,  ‘‘राजा कहां है?’’

हिमायत के मुख खोलने के पहले ही उस के पीछे बैठी आयशा चौंक पड़ी,  ‘‘कौन, रानो? इतनी सवेरे?’’

‘‘अम्मी, राजा रात घर नहीं लौटा.’’

आयशा ने आगे बढ़ कर रानो को गले लगा लिया और आश्चर्य से बोली,  ‘‘क्या कहा, राजा नहीं आया? कहां गया?’’

आयशा ने हिमायत की तरफ प्रश्नसूचक निगाहों से देखा तो उस ने अनजान बनते हुए कंधे उचका दिए. बेकरी के अन्य कर्मचारी भी अनभिज्ञ थे. सुखदेव को कुछ अटपटा सा लगा था. वह शंकाग्रस्त था. आयशा को उस ने बता दिया. रानो को डर लगा कि अगर राजा ने कहीं अचानक आ कर उसे बेकरी में देख लिया तो उस की खैर नहीं. वह वापस घर लौट आई. दरवाजे पर ही पेपर वाला दैनिक समाचारपत्र रख गया था. मुखपृष्ठ पर 2 मृत व्यक्तियों की तसवीरें थीं जिस में एक राजा की थी. राजा की तसवीर देखते ही वह गश खा कर जमीन पर गिर पड़ी.

शोर सुन कर रानो को होश आया तो देखा अरमान उसे देख कर रो रहा था तथा आसपड़ोस के लोग राजा की झूठी  ‘असलियत’ को सच मान कर थूथू कर रहे थे. पासपड़ोस की औरतें उसे सहारा देने के बजाय  ‘आतंकवादी की बीवी’ कह कर डर के मारे अपनेअपने घरों में दुबक गई थीं. उसी समय आयशा दौड़ती हुई आई और रानो और अरमान दोनों को अपने अंक में समेट लिया. फिर तमाशबीनों की ओर देख कर दहाड़ी,  ‘‘राजा एक नेक बंदा था. वह आतंकवादी नहीं था. तुम सब हो आतंकवादी, जो एक निरीह बेवा व उस के बच्चे को सता रहे हो.’’

राजा के घर में ताला लगा कर आयशा, रानो व अरमान दोनों को अपने घर ले आई. रानो व अरमान के प्रति आयशा का स्नेहभाव हिमायत को तनिक भी पसंद नहीं था. लेकिन जिस दिन से उस ने रानो को देखा था उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता था. परिस्थितियां अनुकूल पा कर हिमायत ने अपनी बहन को इस बात के लिए पटा लिया कि वह रानो को उस से विवाह करने के लिए राजी करेगी. एक दिन सवेरे आयशा बोली,  ‘‘देख रानो, तेरा दुनिया में कोई नहीं है. तेरे मायके व ससुराल वालों के लिए तू कब की मर चुकी है. मेरी बात मान, फिर से शादी कर के घर बसा ले.’’

रानो को चुपचाप सुनते देख कर उस ने उस का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और  प्यार से उस के माथे को चूमते हुए असली विषय पर आई,  ‘‘ये रूप की आग बड़ी जालिम है, कहीं तुझे जला कर खाक न कर दे. तेरी किस्मत बहुत अच्छी है कि मेरा भाई हिमायत तेरे से निकाह करना चाहता है. इस तरह से तू मेरी आंखों के सामने सदा रहेगी.’’

स्तब्ध रानो के आंसू सूख गए. मुख से आवाज नहीं निकली. स्नेह से हाथ दबा दिया चुपचाप हिमायत की बीवी सलमा का. आंखों से इशारा किया शांत रहने के लिए और निर्णय लिया कि वह वापस जम्मू जाएगी और अरमान को बुजुर्गों की गोदी में डाल कर सहारा मांगेगी. शायद वे पोते को देख कर पसीज जाएं. हिमायत से खतरा वह बहुत पहले भांप चुकी थी. सलमा को रसोई में अकेले पा कर रानो  ने वहां से बच निकलने की अपनी योजना उसे समझाई और उस से सहयोग मांगा. खुशीखुशी सलमा ने सब की आंख बचा कर रानो व अरमान को शाम के धुंधलके में बिदा कर दिया.

बेकरी में शाम को होने वाली अपार भीड़ को अकेला संभालता, काउंटर पर हिसाबकिताब करता हिमायत जब रात को 12 बजे अपनी बहन के साथ फुरसत पा कर घर के अंदर आया तो उसे भनक तक नहीं थी कि उस का शिकार उस से बहुत दूर जा चुका है. जम्मू पहुंच कर रानो सब से पहले राजा के अब्बू से मिली. उसे देखते ही वह क्रोध से फट पड़े,  ‘‘तेरे कारण मेरे लड़के ने  ‘इतवारी’ से दुश्मनी मोल ली. उस ने आ कर मेरी बेकरी व व्यापार चौपट कर दिया. किस मुंह से आई है तू यहां?’’

गिड़गिड़ाने लगी रानो,  ‘‘अरमान, आप के बेटे की अमानत है. इसे अपना लीजिए.’’

‘‘नहीं, नहीं, इस से हमारा कोई सरोकार नहीं. बुढ़ापे में हम कोई झंझट पालना नहीं चाहते. यहां से जाओ.’’

वहां से निराश रानो ने अपने मांबाप से विनती की तो उस के पिता बोले,  ‘‘तू हमारे लिए उसी दिन मर गई थी जिस दिन उस आतंकवादी के साथ आई थी.

‘‘तेरे कारण कोई भला आदमी तेरी बहनों से शादी नहीं करना चाहता. तेरे कर्मों की सजा भुगत रहे हैं हम.’’

रानो ने अरमान को बंद दरवाजे के बाहर बैठा दिया और जातेजाते आवाज लगाई, ‘‘मां, अरमान को दरवाजे पर बिठा कर नौकरी की तलाश में जा रही हूं. प्लीज, मां, उस का ध्यान रखना.’’

मन पक्का कर के रानो निकल पड़ी. उसे पूरी आशा थी कि उस की मां, नाती का मुख देख कर अवश्य पसीज जाएंगी. दिन भर वह अपने पुराने परिचितों को तलाशती रही, मिलती रही, नौकरी की तलाश में घूमती रही. थकहार कर जब मां के घर वापस लौटी तो बाहर अरमान को न पा कर कुछ राहत महसूस हुई. खुशी के मारे वह आगे बढ़ कर दरवाजे की घंटी दबाने ही वाली थी कि अपने पीछे से ‘मम्मी’ शब्द सुन कर पलटी तो सन्न रह गई. अरमान गोरखा चौकीदार की गोद में था. आघात से रानो अपने स्थान पर जड़ हो गई. उसे ऐसा लगा कि किसी ने उसे आकाश से जमीन पर धकेल दिया है.

गोरखा बोला, ‘‘बहनजी, दोपहर में हम इस तरफ से निकले तो देखा बच्चा बाहर अकेला बैठा रो रहा है. हम से सहन नहीं हुआ. हम छोटे लोग हैं बहनजी, अगर तकलीफ न हो तो मेरी कोठरी में रह जाओ, जब तक कोई दूसरा ठिकाना नहीं मिल जाता.’’

कृतज्ञता से अभिभूत रानो बोली,  ‘‘काका, कौन कहता है तुम छोटे हो. तुम्हारे कर्म बहुत ऊंचे हैं.’’

कुछ झिझकता सा बोला गोरखा,  ‘‘यहां एक एन.जी.ओ. है, जरूरतमंद स्त्रियों के लिए. यदि बुरा न मानें तो…’’

‘‘हां, हां, क्यों नहीं,’’ रानो ने हामी भरी.

वहां पहुंच कर रानो सुखद आश्चर्य से झूम उठी. वहीं उस की पुरानी प्रिंसिपल इंचार्ज थीं. रानो को देख कर वह भी खुश हुईं.

वह बोलीं,  ‘‘रानो, तू कहां चली गई थी. तू ने एम.ए. में विश्वविद्यालय टाप किया था. मैं ने खुद कालिज में लैक्चरर के लिए तुझे आफर भेजा था.’’

जवाब में रानो ने अपनी आपबीती उन्हें सुना दी. सुन कर श्रीमती कौल गंभीर हो गईं और बोलीं,  ‘‘रानो, तेरी त्रासदी के लिए जिम्मेदार केवल तेरे मातापिता हैं. हमारे समाज में लड़की की शुचिता पर इतना अधिक जोर डाला जाता है कि मातापिता बेटी के प्रति क्रूर हो जाते हैं.’’

श्रीमती कौल की सहायता से अगले ही दिन एक निजी शिक्षण संस्था में रानो को संस्कृत शिक्षिका की नौकरी मिल गई. उसी स्कूल में अरमान का दाखिला हो गया. पति की मृत्यु के बाद अकेली रह रही श्रीमती कौल ने अपने ही घर में रानो के रहने की व्यवस्था कर दी. इस तरह रानो के जीवन की गाड़ी फिर से पटरी पर चल पड़ी. उस ने फिर कभी मायके व ससुराल का रुख नहीं किया. अब रानो के जीवन का एक ही मकसद था, अरमान को पढ़ालिखा कर उसे अपने पैरों पर  खड़ा करना. उस के मकसद को पूरा करने  में अरमान पूरा सहयोग दे रहा था. वह पढ़ाई में सदा अव्वल रहता. समय पंख लगा कर उड़ चला.

12वीं में अव्वल आने के बाद अरमान का दिल्ली आई.आई.टी. में चयन हो गया. पलक झपकते 4 वर्ष बीत गए. कैंपस इंटरव्यू में अरमान का एक ग्लोबल कंपनी में चयन हो गया और वह नौकरी करने अमेरिका चला गया. रानो को घर के बाहर से ही खदेड़ने वाले मातापिता और सासससुर अब उस से मिलने आने लगे और मानमनौअल करते उसे अपनेअपने घर ले जाने के लिए, लेकिन रानो उन्हें देख कर जड़ हो जाती. सच तो यह कि उन्हें देख कर उस के सूखते घाव फिर से हरे हो जाते और रिसने लगते. उसे चुप्पी साधे देख कर वे लौट जाते.

अरमान को गए 3 वर्ष हो रहे थे. ढेरों पैसा बैंक में जमा हो रहा था. पहली बार अरमान मां से मिलने भारत आया तो जम्मू की एक बेहद पौश कालोनी में सुंदर सा बंगला खरीद कर मां को भेंट कर दिया. अब तो दूर के भी रिश्तेदार रानो के इर्दगिर्द मंडराने लगे थे. रानो जानती थी कि जितने चेहरे उस के आसपास मंडरा रहे हैं वे सब स्वार्थी हैं. बेटे के विदेश की कमाई का आकर्षण ही उन्हें खींच कर लाया है. रानो की मां तो अब हर रोज ही आने लगी थीं. उन्होंने रानो पर दबाव डाला कि कुछ धन खर्च कर के अपने छोटे भाई शलभ को कोई छोटीमोटी दुकान खुलवा दे, क्योंकि उस की पढ़ाईलिखाई में रुचि नहीं है. रानो के पिता रिटायर हो चुके थे. जमापूंजी बेटियों की शादी में चुक गई थी.

रानो की चुप्पी से त्रस्त हो गईं मां. बेटे की आवारागर्दी और पति की बीमारी से वह टूट चुकी थीं. वह रानो से विनती करने लगीं कि शलभ को वह संभाल ले. जब रानो पर कोई असर नहीं हुआ तो उस की मां क्रोध से चीखने लगीं, ‘‘बहुत घमंड हो गया है तुझे पैसे का. बहुत पछताएगी तू, अगर शलभ किसी के गलत हाथों में पड़ गया और गलत रास्ते पर चल पड़ा.’’

मां के इस कथन पर प्रस्तर प्रतिमा बनी रानो चौंक पड़ी, ‘‘क्या कहा, मां? आप को बेटे की बड़ी चिंता है कि कहीं वह गलत हाथों में न पड़ जाए. मुझे 20 वर्ष की आयु में निरपराध घर से निकाला था. मेरी चिंता क्यों नहीं की? मैं भी तो गलत हाथों में पड़ सकती थी. उस छोटी सी उम्र में मुझे आप के सहारे की जरूरत थी. क्या कुसूर था मेरा? यही कि मैं जिंदा क्यों बच गई. अक्षम्य नहीं थी मैं मां…अक्षम्य नहीं थी मैं?’’

बहुत दिन बाद चुप्पी टूटी तो वर्षों से बांधा आंसुओं का बांध ध्वस्त हो गया. रोतेरोते बोली रानो, ‘‘मां, आप के क्रूर व्यवहार ने मुझे रेगिस्तान का कैक्टस बना दिया है, जिस में नफरत के फूल खिलते हैं…संवेदनशून्य बना दिया है आप ने मुझे अपने समान.’’

अपराधभाव से मां सिर झुका कर हकलाईं, ‘‘लोग नहीं मानते कि तू रात भर राजा के साथ रह कर भी…’’

‘‘लोगों की नहीं अपनी कहो. अपनी बेटी पर विश्वास नहीं था आप को? राजा ने मुझे संभाल लिया नहीं तो मेरा क्या हश्र होता?’’

अचानक मां फूटफूट कर रोते हुए बोलीं,  ‘‘मैं तेरी अपराधी हूं. क्षमा कर दे मुझे.’’

मां उसे गले लगाने के लिए आगे बढ़ीं तो रानो दूर हटती हुई क्रंदन कर उठी,  ‘‘जाओ मां, जाओ, राख न कुरेदो. अरमान को आप के दरवाजे पर बिठा कर नौकरी ढूंढ़ने गई थी. हृदय नहीं पसीजा आप का? अभी तक घाव से खून रिसता है याद कर के.’’

निराश मां चली गईं. मां के जाते ही रानो को याद आया कि दोषी उस की मां है, भाई नहीं. यह विचार आते ही वह अपने भाई का जीवन संवारने को उद्यत हो गई. मां के घर पहुंचने के पहले ही उस ने शलभ को फोन कर के अपने पास बुला लिया. सुखद एहसास हुआ उसे कि जीवन के कड़वे अनुभवों ने उसे पूरी तरह से बंजर नहीं बनाया था. उस में मानवीय संवेदनाएं अभी शेष थीं. Short Hindi Stories

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