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सुलझते रिश्ते : भाग 2

दरअसल, हर्षदा दिल्ली की जिस कंपनी में नौकरी कर रही है, वह कंपनी एक साल के लिए उसे कंपनी के हैडक्वार्टर पेरिस भेजा जा रहा है. वैसे, हर्षदा का वहां उतना जाने का मन नहीं था. मगर अखिल ही कहने लगा कि इतना अच्छा मौका उसे अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहिए. और हो सकता है कि कल को उसे कंपनी के हैडक्वार्टर पेरिस में ही शिफ्ट कर दिया जाए, तो कितना अच्छा होगा न.

अखिल ने हर्षदा से यह भी कहा कि अगर तुम वहां चली गई, तो फिर वह भी वहां जाने की कोशिश करेगा. और फिर दोनों वहां अपनी नई दुनिया बसाएंगे.

“ये लो… अरे भाई, मैं तो मजाक कर रहा था और तुम हो कि हिंदी फिल्मों की हीरोइन की तरह आंसू टपकाने लगी,” अखिल ने माहौल को हलका करने की कोशिश की, “अच्छा, वो दिन याद है तुम्हें, जब हम पहली बार डेट पर गए थे? कितनी देर तक तो हम एकदूसरे से कुछ बोल ही नहीं पाए थे, है न? फिर मैं ने ही बात शुरू की थी.”

अखिल की बात पर हर्षदा हंसते हुए बोली, ‘‘हां, याद है उसे. और यह भी कि कैसे अखिल ने उसे देखने के चक्कर में अपना कोल्डड्रिंक्स अपने ही कपड़ों पर गिरा लिया था.’’

“हां, तुम कितना हंसी थी उस पर. और मैं तुम्हारी हंसी देख अपने कपड़े पर लगे कोल्डड्रिंक्स साफ करना भी भूल गया, जिस का दाग आज भी मेरे कपड़ों पर लगा है.“

“जानती हो हर्षु,” अखिल हर्षदा को प्यार से हर्षु बुलाता था, कहने लगा, “मैं ने जब तुम्हें पहली बार अपने एक दोस्त की पार्टी में देखा था, तो तुम पर ऐसा फिदा हुआ कि तुम पर से मेरी नजर ही नहीं हट रही थी. हलके पीले रंग की ड्रैस में तुम वहां सब से अलग दिख रही थी.

‘‘और सच कहूं, तो तुम्हारे गोरे रंग पर पीला सूट तुम्हारी खूबसूरती में और चारचांद लगा रहा था. जब मैं ने अपने दोस्त के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘ये खूबसूरत सी लड़की कौन है? मिलवाओ न मुझ से,’ तो उस ने मेरी बांह पकड़ कर हिलाते हुए कहा था कि ये कर्नल साहब की बहन है. वह उस के साथ उस के ही औफिस में काम करती है. जरा सावधान… क्योंकि, अगर उन की बहन की तरफ आंख उठा कर भी देखा न तू ने, तो गोलियों से भून दिए जाओगे.

उस पर मैं ने अपना सीना चैड़ा करते हुए कहा था, ‘भले ही भून दे गोलियों से मुझे. लेकिन, मेरी जीवनसंगनी तो अब यही लड़की बनेगी. तय कर लिया है. बस, तू इतनी मेहरबानी कर कि मुझे इस लड़की से मिलवा दे.’’

सुनते ही मेरा दोस्त खिलखिला कर हंस पड़ा था कि चल, मिलवाता हूं उस से.

“हां, मुझे भी याद है. उस पार्टी में तुम्हें ब्लू जींस और ब्लैक शर्ट में पहने देख मेरे मुंह से निकला था, ‘हाय, कितना हैंडसम है यह. और एक सच बात और बताऊं…? चुपके से मैं ने अपने मोबाइल में तुम्हारी फोटो भी ले ली थी. तुम से मिलने के बाद जब मुझे लगा कि तुम्हीं मेरे हसफर बन सकते हो, तब मैं ने तुम्हारी फोटो अपने भैया को दिखाते हुए कहा था कि मैं इसी लड़के से शादी करूंगी.“

“फिर, भैया तो बहुत गुस्सा हुए होंगे?” अखिल बोला.

“नहीं, गुस्सा क्यों होंगे? लेकिन इतना जरूर कहा था कि पहले वे अपनी तरफ से पता करेंगे तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के बारे में, फिर ही इस शादी के लिए ‘हां’ करेंगे, क्योंकि ये उन की बहन की जिंदगी का सवाल है.

“ओहो… तो फिर मेरे और मेरे परिवार की जासूसी हो रही थी और हमें खबर तक नहीं?” अखिल हंसा, तो हर्षदा भी हंसने लगी.

“आज सोचती हूं, तो खुद पर हंसी आती है कि कैसे मैं ने भैया से कह दिया था कि मैं ने इसी लड़के से यानी तुम से शादी करूंगी.”

अखिल के सीने से लग हर्षदा कहने लगी, “जानते हो अखिल, मुझे अपने मम्मीपापा का चेहरा ठीक से याद नहीं है, क्योंकि जब मैं बहुत छोटी थी, तभी एक कार एक्सीडेंट में उन की मौत हो गई थी. भैया उस समय महज 13 साल के अबोध बालक थे. फिर हमारी नानी ने हमें संभाला. लेकिन कुछ साल बाद नानी भी नहीं रहीं, तो फिर भैया ही मेरे मम्मीपापा बन कर मुझे संभाला. मुझे बहुत प्यार दिया, मेरी केयर की. आज भी वे अपनी खुशियों से पहले मेरी खुशियों के बारे में सोचते हैं. जानते हो अखिल, आज मैं जोकुछ भी हूं, अपने भैया की बदौलत हूं. सच कहती हूं, अगर भैया इस रिश्ते के लिए न कर देते न, तो मैं उन से कोई बहस नहीं करती. क्योंकि, पता है मुझे कि वे मेरे लिए अच्छा ही सोचेंगे. ”

“हर्षु, तुम बिलकुल सही कह रही हो. और ऐसा भाई तो किस्मत वाले को ही मिलता है,” अखिल कहने लगा कि उस के निखिल भैया भी उस से बहुत प्यार करते हैं. उस की गलती अपने सिर ले कर कई बार उसे मम्मीपापा की डांट खाने से बचाया है.

अखिल हंसते हुए फिर कहता है कि वह अपने निखिल भैया से मात्र डेढ़ साल ही छोटा है. पर, देखने में वही बड़ा लगता है. उस के भैया निखिल इंडियन एयरफोर्स में फाइटर पाइलट हैं और अभी 2 साल पहले ही उन की शादी निकिता से हुई है.

अखिल के मम्मीपापा चाहते थे कि अब उस की भी शादी हो जाए, तो उन की जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी. इसलिए वे लोग अखिल के लिए लड़की भी देखने लगे थे. लेकिन अखिल ने उन से साफसाफ कह दिया कि अभी वो 1-2 साल शादी नहीं करेगा. उस ने हर्षदा के बारे में अभी इसलिए नहीं बताया उन्हें कि जब वह पेरिस से लौट आएगी, तब बता देगा. उसे विश्वास है कि उस के मम्मीपापा ‘न’ नहीं कहेंगे इस रिश्ते के लिए. क्योंकि वे लोग बिलकुल भी दकियानूसी सोच के लोग नहीं हैं.

हर्षदा को एयरपोर्ट तक छोड़ने जाते समय अखिल का दिल रो रहा था, पर वह दिखा नहीं रहा था, बल्कि हर्षदा को ही समझाबुझा रहा था कि वह वहां मन लगा कर काम करे. और एक साल तो यों ही देखतेदेखते हवा की तरह उड़ जाएंगे.

हर्षदा और अखिल भले ही दोनों अपनेअपने कामों में बिजी होते थे, पर रात में दोनों एकदूसरे से जीभर कर बातें करते और बताते कि आज उन का दिन कैसा बीता.

जहां अखिल उसे दिल्ली की बातें बताता, वहीं हर्षदा उसे पेरिस के किस्से सुनाती. इसी तरह 6 महीने बीत गए.

अखिल ने हर्षदा को जब एक दुखद खबर सुनाते हुए कहा कि उस के निखिल भैया प्लेन क्रेश में चल बसे, तो हर्षदा ऊपर से नीचे तक हिल गई.

वह बोली, “हाय, ये क्या अनर्थ हो गया एकदम से.“

अखिल कहने लगा, “उस की मां को बेहोशी का इंजैक्शन लगाया जा रहा है और उस के पापा एकदम गुम से हो गए हैं, कुछ बोल ही नहीं रहे हैं. लेकिन, सब से बड़ा नुकसान तो निकिता भाभी का हुआ है. उन की शादी को महज ढाई साल ही हुए हैं और भैया… “ बोलतेबोलते अखिल फफकफफक कर रो पड़ा और कहने लगा कि आखिर क्यों, क्यों हुआ ऐसा उन के साथ? क्या बिगाड़ा था उन्होंने किसी का, जो पहाड़ जैसा दुख उन के सिर पर आ गिरा. अब क्या होगा निकिता भाभी का…? उस के मम्मीपापा दोनों ही शुगर व बीपी के मरीज हैं, अगर उन्हें कुछ हो गया तो क्या करेगा वह…?“

खुसरो दरिया प्रेम का : भाग 2

इतने में पुष्कर के आने की आहट से माद्री ने आंखें खोलीं। पुष्कर ने उसे इतना खोए हुए देख कर पूछा, “बड़ी चिंता में लग रही होतबीयत तो ठीक है न?”माद्री ने कभी पुष्कर से कुछ नहीं छिपाया थाआज भी उन्हें बैठने का इशारा करते हुए कहा, “सुनोबताओ आज फेसबुक पर कौन मिला?”

पुष्कर हंसे, “पहले यह साफ करोमिली या मिला?”“मिला।”“कोई पुराना स्टूडैंट?”“नहीं।”“तुम्हीं बताओ।”“अभिमन्यु…पुष्कर ने शांत स्वर में कहा, “अच्छाकहां है आजकल?”“पूना,” माद्री के चेहरे की रौनक अभिमन्यु के नाम से कितना बढ़ गईयह पुष्कर ने देखा। बहुत सालों बाद उस के स्वर में यह खनक थी। वे हैरान से माद्री का चेहरा देखते रहे। वे वहां से इस समय हट जाना चाहते थेपता नहीं क्यों… पूछा, “चाय पीओगीबना कर लाऊं?”“हां…

पुष्कर चाय बनाने किचन में चले गए। उन्हें इस समय अपने मन को समझाने के लिए कुछ पल चाहिए थेयही तो कर रहे हैं वे सालों से। माद्री के साथ सामंजस्य बैठातेबैठाते वे मन ही मन थकने लगते हैं पर माद्री को खुश देखने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैंकुछ भी। अब भी उन्होंने चाय बनाते हुए अपने से ही मन ही मन बात की। अच्छा लगा होगा माद्री को जब अभिमन्यु ने उसे आज उस के जन्मदिन पर उस से संपर्क किया। किसे अच्छा नहीं लगेगा। उन्हें कोई ऐसे ढूंढ़ता तो वे भी तो खुश होते। यह अलग बात है कि माद्री के सिवा उन के जीवन में कभी कोई और लड़की आई ही नहीं।

माद्री से विवाह के बाद वे पूरी तरह से घरपरिवार को समर्पित इंसान रहे। माद्री ने उन्हें जब अभिमन्यु के बारे में बताया तो भी उन्होंने उस के असफल प्रेम से सहानुभूति ही हुई। वे हमेशा से बहुत सहृदयशांतगंभीर इंसान थे। माद्री की हर सुविधा का उन्होंने हमेशा बहुत ध्यान रखा था पर माद्री के दिल का एक कोना हमेशा अभिमन्यु के लिए छटपटाता ही रहा।

लोचाय पीयो,”पुष्कर की आवाज से माद्री भी वर्तमान में लौटी।क्या सोच रही हो?”माद्री ने मुसकराते हुए कहा, “आज का जन्मदिन तो अभिमन्यु ने स्पैशल बना दियाचलोअब बाहर चल कर बढ़िया डिनर करते हैं,” माद्री ने हमेशा ही पुष्कर से साफसाफ मन की बात की थीबिना किसी लागलपेट के। वह आज क्यों खुश थींयह भी माद्री ने सहर्ष स्वीकार किया। कनाडा से अंकितउस की पत्नी स्वरा और पोती फ्रेया ने उसे फोन पर विश कर ही दिया था। डिनर करने के लिए आज पुष्कर ने माद्री की पसंद का रेस्तरां बुक किया था। वह तैयार हो कर जैसे ही पर्स उठाने लगीअभिमन्यु का फोन आया। पुष्कर तैयार हो कर सोफे पर बैठे थे। माद्री “अभिमन्यु का फोन है,”कहते हुए वापस अंदर बैडरूम में चली गई। दोनों ने सालों बाद एकदूसरे की आवाज सुनीउम्र के अच्छेखासे अंतराल के बाद भी दोनों के मन में जो भाव थेदोनों महसूस कर रहे थेजैसे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं थी। दूर बैठे दोनों एकदूसरे का मन पढ़ रहे थे। दोनों ने आधे घंटे बात कीतय हुआअब बातें होती ही रहेंगी।

पुष्कर इस दौरान चुपगंभीर बैठे रहे थे। माद्री के स्वभाव में धैर्यस्थिरता नहीं थी। उन्हें गुस्सा भी जल्दी आतायह वे भी समझ गए थे। माद्री बिना आगापीछा सोचे फैसले लेने में भी जल्दबाजी करती थी। इस आदत के चलते उन से ज्यादा दिन कोई जुड़ा न रह पातापड़ोसीरिश्तेदार अगर मतलब रखते तो सिर्फ पुष्कर के स्वभाव के कारण।

मेरी खातिर : भाग 2

‘‘बहुत गर्व है न तुम्हें अपनी दीदी और खुद पर… हम लोगों ने आप को किसी धोखे में नहीं रखा था. बायोडेटा पर साफ लिखा था पोस्टग्रैजुएशन विद हिंदी मीडियम. हम लोग नहीं आए थे आप लोगों के घर रिश्ता मांगने… आप के पिताजी ही आए थे हमारे खानदान की आनबान देख कर हमारी चौखट पर नाक रगड़ने…’’

‘‘निकिता, जुबान को लगाम दो वरना…’’

‘‘पहली बार अनिका ने पापा का ऐसा रौद्र रूप देखा था. इस से पहले पापा ने मम्मी पर कभी हाथ नहीं उठाया था.’’

‘‘पापा, आप मम्मी पर हाथ नहीं उठा सकते हैं. आप भी बाज नहीं आएंगे… मम्मी का दिल दुखाना जरूरी था?’’

‘‘तू भी अपनी मम्मी का पक्ष लेगी. तेरी मम्मी ठीक तरह से 2 शब्द इंग्लिश के नहीं बोल पाती.’’

‘‘पापा, आप मम्मी की एक ही कमी को कब तक भुनाते रहोगे, मम्मी में बहुत से ऐसे गुण भी हैं जो मेरी किसी फ्रैंड की मम्मी में नहीं हैं.’’

क्षणभर में अनिका की खुशी काफूर हो गई. वह भरी आंखों के साथ उलटे पैर अपने कमरे में लौट गई.

पापा ने औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए किया था जबकि मम्मी ने सूरत के लोकल कालेज से एमए. शायद दोनों का बौद्धिक स्तर दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठने देता था.

अनिका ने एक बात और समझी थी पापा के गुस्से के साथ मम्मी के नाम में प्रत्ययों की संख्या और सर्वनाम भी बदलते जाते थे. वैसे पापा अकसर मम्मी को निक्कु बुलाते थे. गुस्से के बढ़ने के साथसाथ मम्मी का नाम निक्की से होता हुआ निकिता, तुम से तू और उस में ‘इडियट’ और ‘डफर’ जैसे विशेषणों का समावेश भी हो जाता था. अपने बचपन के अनुभवों से पापा द्वारा मम्मी को पुकारे गए नाम से ही अनिका पापा का मूड भांप जाती थी.

इस साल मार्च महीने से ही सूरज ने अपनी प्रचंडता दिखानी शुरू कर दी थी. ऐग्जाम की सरगर्मी ने मौसम की तपिश को और बढ़ा दिया था. वह भी दिनरात एक कर पूरे जोश के साथ अपनी 12वीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षा में जुटी हुई थी. सुबह घर से निकलती, स्कूल कोचिंग पूरा करते हुए शाम 8 बजे तक पहुंच पाती. मम्मीपापा के साथ बिलकुल समय नहीं बिता पा रही थी. इतवार के दिन उस की नींद थोड़ी जल्दी खुल गई थी. वह सीधे हौल की तरफ गई तो नजर डाइनिंग टेबल पर रखे थर्मामीटर की तरफ गई.

‘‘मम्मा यह थर्मामीटर क्यों निकला है?’’ उस ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘तेरे पापा को कल से तेज बुखार है. पूरी रात खांसते रहे. मुझे जरा देर को भी नींद नहीं लग पाई.’’

‘‘एकदम से गला इतना कैसे खराब हो गया? डाक्टर को दिखाया?’’

‘‘बच्चे थोड़े हैं जो हाथ पकड़ कर डाक्टर के पास ले जाऊं,’’ मम्मी के स्वर में झुंझलाहट थी.

‘‘मम्मा आप भी हद करती हैं… पापा को तेज बुखार है और आप… मानती हूं आप सारी रात परेशान हुईं. पर अपनी बात को रखने का भी एक समय होता है.’’

‘‘तू भी अपने पापा की ही तरफदारी करेगी न…’’

मेरी हालत भी पेंडुलम की तरह थी… कभी मेरी संवेदनाएं मम्मी की तरफ और कभी मम्मी से हट कर बिलकुल पापा की तरफ हो जाती थी. प्रकृति पूरा साल अपने मौसम बदलती पर हमारे घर में बारहों मास एक ही मौसम रहता था कलह और तनाव का. मैं उन दोनों के बीच की वह डोर थी जिस के सहारे उन के रिश्ते की गाड़ी डगमग करती खिंच रही थी.

उस दिन मेरा अंतिम पेपर था. मैं बहुत हलका महसूस कर रही थी. मैं अपने अच्छे परिणाम को ले कर आश्वस्त थी. आज बहुत दिनों बाद हम तीनों इकट्ठे डिनर टेबल पर थे. मम्मी ने आज सबकुछ मेरी पसंद का बनाया था.

‘‘मम्मीपापा, मैं आप दोनों से कुछ कहना चाहती हूं.’’ आज अनिका की भावभंगिता कुछ गंभीरता लिए थी, जिस के मम्मीपापा अभ्यस्त नहीं थे.

‘‘बोलो बेटे… कुछ परेशान सी लग रही हो?’’ वे दोनों एकसाथ बोल चिंतित निगाहों से उसे देखने लगे.

उस ने बहुत आहिस्ता से कहना शुरू किया जैसे कोई बहुत बड़ा रहस्य उजागर करने जा रही हो, ‘‘पापा, मैं आगे की पढ़ाई सूरत में नहीं, बल्कि अहमदाबाद से करना चाहती हूं.’’

‘‘ये कैसी बातें कर रही हो बेटा… तुम्हें तो सूरत के एनआईटी कालेज में आसानी से एडमिशन मिल जाएगा.’’

‘‘मिल तो जाएगा पापा, पर सूरत के कालेजों की रेटिंग काफी नीचे है.’’

‘‘बेटे, यह तुम्हारा ही फैसला था न कि ग्रैजुएशन सूरत से ही कर पोस्टग्रैजुएशन विदेश से कर लोगी, तुम्हारे अचानक बदले इस फैसले का कारण क्या हम जान सकते हैं?’’ पापा के माथे पर तनाव की रेखाएं साफ झलक रही थी.

घर में अनजानी खामोशी पसर गई. यह खामोशी उस खामोशी से बिलकुल अलग थी जो मम्मीपापा की बहस के बाद घर में पसर जाती थी…बस आ रही थी तो घड़ी की टिकटिक की आवाज.

अपनी जान से प्यारे अपने मम्मीपापा को उदास देख अनिका के गले से रोटी कैसे उतर सकती थी. वह एक रोटी खा कर वाशबेसिन पर पर हाथ धोने लगी. मुंह धोने के बहाने नल से निकलते पानी के साथ उस के आंसू भी धुल गए. वह नैपकिन से अपना मुंह पोंछ रही थी तो सामने लगे आइने में उस ने देखा मम्मीपापा की निगाहें उस पर ही टिकी हैं जिन में बेबस सी अनुनय है.

‘‘आज मुझे महसूस हो रहा है कि सच में जमाना बहुत फौरवर्ड हो गया है… आखिर हमारी बेटी भी इस जमाने के तौरतरीकों बहाव में खुद को बहने से नहीं रोक पाई,’’ पापा के रुंधे स्वर में कहा.

‘‘ये सब आप के लाडप्यार का नतीजा है, और सुनाओ उसे अपने हौस्टल लाइफ के किस्से चटखारे ले कर… तुम तो चाहते ही थे न कि तुम्हारी बेटी तुम्हारी तरह स्मार्ट बने. तो चली हमारी बेटी आजाद पंछी बन जमाने के साथ

ताल मिलाने. उस ने एक बार भी हमारे बारे में नहीं सोचा.’’

‘‘पापामम्मी के बीच चल रही बातचीत के कुछ अंश अनिका के कानों में भी पड़ गए थे. मम्मी ने रोरो कर अपनी आंखें सुजा ली थीं, नाक लाल हो गई थी. पर क्या किया जा सकता था, आखिर यह उस की पूरी जिंदगी का सवाल था.’’

जिंदगी धूप, तुम घना साया : भाग 2

समय की एक खूबसूरत विशेषता है कि वह सब को पुराना करता जाता है. हर नया एक दिन पुराना होना होता है. प्रेम भी पुराना होता है, लोग भी. कई तो पुराने होने के साथ परिपक्व होते है, कई मानो में बहुत समृद्ध होते हैं जैसे पुराने चावल, शराब, प्रेम, यादें. प्रेम भी पुराना होने पर अपनी असलियत पर आ जाता है. आकर्षण से जुड़ा प्रेम पुराना होते ही लड़खड़ा जाता है, गिर पड़ता है.

बलवंत, अनुराधा भी पुराने होने लगे तो एकदूसरे की आदतें, जो कभी आकर्षण के तहत स्वीकार कर रखी थीं, अब चुभने लगी थीं. अनुराधा का उतावलापन बलवंत के लिए खीझ बनने लगा. कभी अपनी अनु का यह उतावलापन सिरमाथे पर ले कर घूमते थे बलवंत. और आज, ‘थोड़ी शांत नहीं रह सकती. हमेशा घोड़े पर ही सवार क्यों रहती हो?’ तक आ गया था. इधर बलवंत हर काम अपने ढंग से करने की आदत कभी भी कहीं किसी काम को हाथ में लेना और फिर छोड़ देना… और तब करना जब मन करे. यह सब अनुराधा के लिए भी असहनीय होता, “तुम एक काम ठीक से नहीं कर सकते. चार काम पिछले ही पड़े हैं. कुछ तो करो, 2 घंटे से बस बिस्तर पर पड़े हो.” छोटीछोटी तकरारें बढ़ती जाती हैं यदि स्वीकार्यता में परिपक्वता की कमी हो. फिर दौड़ शुरू होती है सामने वाले को अपने जैसा बनाने की. जरा भी अपने मन का नहीं हुआ तो शिकायतें शुरू. वास्तव में जिस के साथ भी हम पुराने होते रहते हैं, हमारे असली चेहरे सामने आते जाते हैं, मुखौटे उतरते जाते हैं.” …तुम तो कहते थे मैं शराब को हाथ नहीं लगाता. फिर यह क्या है?” अनुराधा थोड़े गुस्से में बलवंत से पूछती है. बलवंत अपने असली स्वरूप में आ कर बस टाल जाता. इधर अनुराधा को देर तक जागने की आदत और बलवंत अपना पैग लगा कर जल्दी सोने का आदी. इसी बात पर तकरार हो जाती और कई दिन अबोला रहता. यह स्कूटर पर स्कूल जाने तक भी बना रहता. जगजीत सिंह और मुकेश भी बंट गए थे दोनों में. एक को जगजीत सिंह नहीं भाते तो दूसरे को मुकेश. शुरूशुरू में तो खुमारी में सब जायज था. दोनों के बीच ऊंची आवाजों में झगड़े होने लगे. कई बार आवाजें ऊंची हो जातीं तो बाहर भी सुनाई देतीं.

महल्ले वालों के लिए बलवंत, अनुराधा के झगड़े किसी फिल्मी कानाफूसी से कम न थे, चटखारे लेले कर महिलाएं एकदूसरे को सुनातीं. मनोरंजन के इसी साधन का महल्ले और समाज में उपयोग होता था. किसी बात पर दोनों में फिर सुलह हो जाती. लेकिन 2 दिनों बाद नई तकरार, झगड़े… बात कई बार स्टेटस, मातापिता, खानदान पर आ जाती तो बात बढ जाती थी. इन्हीं के बीच अनुराधा गर्भवती हुई. तकरार झगड़ों का स्तर मानक स्तर से ज्यादा ही था. जितनी पतिपत्नी की नोकझोंक होती है, उस से ज्यादा. कई बार तो अलग रहने तक की नौबत आ गई. अनुराधा एक बार तो गुस्सा हो कर सामने वाली काकी के यहां सामान सहित चली गई थी. कुछ बूढ़ी, सयानी महिलाओं ने समझाया कि गर्भावस्था में इतना तनाव नहीं पालना चाहिए, तब जा कर घर लौटी. ‘लव मैरिज’ का यह अनुभव कई महिलाओं के लिए उदाहरण बन गया.” और करो लव मैरिज.”, “हमें तो जहां बांध दी, वहीं की हो गई. अच्छा, बुरा जैसा भी है, सुखी हैं हम तो.”

बात इतनी बड़ी नहीं थी पर अपनेअपने अहं की लड़ाई कई बार इतनी बड़ी हो जाती है कि एक बार रेडियो पर जिंदगी धूप, तुम घना साया गाना बज रहा था, बलवंत ने आव देखा न ताव, रेडियो ही उठा कर पीछे जाने वाली सड़क पर फेंक दिया था. एक अजीब सा तनाव था दोनों के बीच जो बच्ची के जन्म के बाद और उभर आया. दोनों अच्छाखासा कमाते थे, भौतिक सुखसुविधाओं से परिपूर्ण जो उस समय अधिकांश लोगों के पास न थीं. लेकिन मन, अहं, वहम के खेल बहुत निराले. छावं में भी धूप लग रही होती है यदि हमारा अंतर्मन सही नहीं है तो.

बेटी के जन्म के बाद की जिम्मेदारियों ने भी अनु ने बलवंत को जोड़ने से मना कर दिया. अनु ठहरी स्वतंत्र और आत्मसम्मान वाली, उसे लगता था पति का भी गृहस्थी में उतना ही योगदान हो. वह भी बाहर काम करती है तो बलवंत घर में भी सहयोग दे. उस दिन शाम को फिर तकरार छिड़ी,

“बल्लू, तुम जरा सुशी को उठा लो, बहुत देर से कुनमुना रही है.” अनु ने लगभग पुचकारते हुए कहा.

“अरे, इस ने तो पोटी कर ली है. तुम ही देखो,” बलवंत ने हाथ खड़े कर दिए.

“अरे भई, मैं दोतीन बार बदल चुकी हूं, आप बदल दो न.”

“मैं… पागल हो गई हो. यह काम महिलाओं का है.”

“.क्यों और कैसे, मैं भी तुम्हारे साथ कमाने जाती हूं. अभी बस मेटरनिटी पर हूं,” अनु ने तैश में बोला था.

बलवंत कछ नहीं बोले और गुस्से में उठ कर चले गए. दूसरा दिन, रात हुई, बच्ची आधी रात को रोने लगी.

“चुप कराओ न इस को. पूरी नींद खराब कर दी,” बलवंत नींद से उठकर गुस्से से बोला.

“मैं वैसे ही 12 बजे सोई हूं, आप भी करा सकते हैं चुप.”

“सुन, ये सब मेरे से नहीं होगा. यह तेरा काम है. तू कर.”

अपना चादर, तकिया उठा कर पैर पटकते हुए बलंवत बाहर के कमरे में चला गया था. कभी अनुराधा को तुम कह कर बुलाने वाला बलवंत तू पर उतर ही आया.

बस, यही छोटीछोटी बातें बलवंत और अनुराधा को हर्ट कर जातीं और उस रात दोनों को नींद नहीं आई. बच्चे होने के बाद खुशियां आना थीं लेकिन एकल परिवार, दोनों नौकरीपेशा और जिम्मेदारियों का बोझ; फिर ऊपर से दोनों के अहं कुल मिला कर थोड़ी खुशी और ज्यादा गम वाली स्थिति निर्मित कर देता था. पहले धीरेधीरे शौक दम तोड़ने लगते हैं, फिर समय प्रबंधन, फिर खानापीना और जिंदगी में भौतिकता, सांसारिकता तो बढ़ जाती है परंतु मन का प्रबंधन बिगड़ जाता है.

महल्ले वाले अब कहीं भी लव मैरिज सुनते, तो सीधा उदाहरण देते अनु-बलवंत का और नमकमिर्ची मिला कर. “देखा नहीं लैला-मजनूं के हाल, सड़क पर लड़ते हैं. सब निकल गया प्यारव्यार 2 साल में ही.” तब कोई दोनों से सेंपैथी रखने वाला कहता, “किशन दादा, चमन, दिनकर इनने तो कोई न किया लव मैरिज, फिर भी जूतमपैजार हो जाती है. और एक को तो तलाक ही हो गया समझो. इस पे क्या कहोगे??” नमकमिर्ची वाला बस सामने वाले के कान उमेठ कर कहता, “हां, इस को जरूर लव मैरिज करना है. तभी वकील बना फिर रहा है.”

रिश्ते बनाने में देर नहीं लगती लेकिन उन्हे निभाने के लिए बहुत जतन करने होते हैं. यह बात कहने में बहुत आसान है लेकिन व्यावहारिक धरातल पर उतनी ही मुश्किल. 2 लोग शिक्षक जैसे पेशे से जुड़े हो कर भी इस एक लाइन को नहीं समझ पा रहे थे. बात मारपीट तक पहुंच गई जब अनुराधा को पता चला कि बलवंत के एकदूसरे स्कूल की शिक्षिका से अंतरंग संबंध हैं. और तो और, यह सब पिछले 6 महीनों से चल रहा है. कुछ लोगों को हर बात, हर चीज यहां तक कि रिश्तों में भी बोरियत लगती है. बलवंत उसी में से एक. एक जोड़ी कपड़े चारपांच बार से ज्यादा बार पहनना तो दूर देखता भी नहीं. यही आदत क्या रिश्तों के लिए भी हो गई, पता ही नहीं चला. छाया बहुत दिनों तक सहज बनी रहे, तो भी इंसान उक्ताहट का शिकार हो जाता है और उसे वह धूप की भांति लगने लगती है.

मुक्तिद्वार : भाग 2

एक दिन पार्थ और पंखुड़ी का कहीं घूमने का प्रोग्राम बना. माधुरी सोच रही थी कि वह और बच्चे भी जाएंगे. लेकिन पार्थ और पंखुड़ी ने सारी तैयारी कर ली और बोले, ‘मम्मी, आप कहां परेशान होंगी? दोनों बच्चों को हम आप के भरोसे ही छोड़े जा रहे हैं. कहने को हर काम के लिए मेड हैं पर उन पर निगरानी रखना, बच्चों का खानापीना देखना आदि सबकुछ माधुरी की ही ज़िम्मेदारी थी. 3 माह बाद ही माधुरी को लगने लगा था कि बेटे के पास रहने का फ़ैसला ले कर माधुरी ने बहुत बड़ी गलती कर ली है. फिर सोचसमझ कर माधुरी ने रैसिडेंशियल स्कूल में नौकरी करने का फैसला ले लिया था. तब से आज तक माधुरी एक बार ही छुट्टियों में बेटे के घर में गई थी और एक फालतू समान की तरह पड़ी रही थी. तब से ले कर आज तक वह कभी गई नहीं और न ही कभी फ़ोन आया.

कुमुद एक बार प्रेम में असफल हुई और फिर उस ने कभी विवाह न करने का फैसला कर लिया था. जब तक कुमुद अपने घर पर रह कर स्थानीय स्कूल में नौकरी करती रही तब तक भाईभाभी उसे पान के पत्ते की तरह फेंटते रहे. कुमुद के बालबच्चे नहीं हैं. यह ही सोच कर वह 20 वर्षों की नौकरी में भी एक पैसा भी नहीं जोड़ पाई थी. कभी भतीजे की एडमिशन फीस तो कभी भांजी की शादी में ख़र्च करना उस की जिम्मेदारी बन जाती थी. कुमुद को होश तब आया जब पिता की मृत्यु के बाद पूरा घर भाइयों के नाम कर दिया गया था. जब कुमुद ने आवाज़ उठानी चाही तो वह भाइयों के साथसाथ मां और बहनों की भी दुश्मन बन गई थी. वह पिछले 7 वर्षों से इस स्कूल में संस्कृत पढा रही हैं.

जयति 32 वर्ष की सांवलीसलोनी बंगाली बाला थी. मां की मृत्यु के पश्चात जब पिता ने उसी की हमउम्र एक लड़की को उस की मां बना कर खड़ा कर दिया था तो जयति का मन कलकत्ता से ऊब गया था. वह अपना समान बांध कर दिल्ली आ गई थी. दिल्ली के एक बड़े स्कूल में नौकरी भी मिल गई थी. जयति को वहां का स्वच्छंद जीवन रास भी आ गया था लेकिन उसे कुछ बच नहीं रहा था. इसलिए, वह इस रैसिडेंशियल स्कूल में पिछले 4 वर्षों से इंग्लिश अध्यापिका के रूप में नियुक्त थी. यहां पर बचत तो हो रही थी मगर आज़ादी नहीं थी. छुट्टियों में भी उसे लगता जैसे वह नौकरी ही कर रही हो.

विजय की कहानी कुछ अलग थी. उस की पत्नी ने उस के साथ बेवफ़ाई करी थी. उस ने उस के दोस्त के साथ दूसरा विवाह रचा लिया था. विजय एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में इंजीनियर के पद पर कार्यरत था. उस हादसे के बाद सबकुछ छोड़छाड़ कर वह इस स्कूल में आ गया था. यहां पर वह फिजिक्स पढ़ाता था.

इंद्रवेश 32 वर्ष का नौजवान था. अपने परिवार में वह रेशम पर टाट के पैबंद जैसा था. पिता के साथसाथ दोनों भाई भी सरकारी महकमे में अच्छे पद पर कार्य करते थे. इंद्रवेश को नकारा, कामचोर, निक्कमे और भी न जाने किसकिस विश्लेषण से नवाज़ा जाता था. खोते हुए आत्मसम्मान को बचाने के लिए इंद्रवेश इस रैसिडेंशियल स्कूल में मैथ्स पढ़ा रहा था.

कार झटके से एक ढाबे के सामने रुकी. विनोद सब के लिए चाय लेने के लिए चला गया. इंद्रवेश गहरी नींद में सोया हुआ था. तभी माधुरी ने उसे उठा कर खाने की प्लेट पकड़ाई. पूरी, आलू खाते हुए इंद्रवेश के मुंह से निकल गया, “माधुरी मैम, आप ने तो बिलकुल मम्मी जैसा खाना बनाया है. बरसों बाद ऐसा लगा कि आज भूख ख़त्म हुई है.” जयति मुसकराते हुए बोली, “यह राजकुमार घर क्यों नहीं जाता.” फिर मम्मी के हाथ के बने पकवान खाने को इंद्रवेश बोला, “क्योंकि बेरोजगार लड़का और अविवाहित लड़की परिवार के लिए बोझ होते हैं.” जयति यह सुन कर कट कर रह गई. इंद्रवेश बात को संभालते हुए बोला, “यह एक कहावत है, जयति प्लीज, मुझे गलत मत समझना.” विनोद पीछे से बोले, “अरे, तुम सब एंजौय करो, छोड़ो कल की बातें.”

कल की बात पुरानी कार से उतरते ही सब अपना अतीत वहीं छोड़ आए थे. पूरे 2 दिन बेहद मस्ती में बीत गए थे. न स्कूल का शोरगुल, न ही अतीत के साए. वापसी में माधुरी उसांस छोड़ते हुए बोली, “काश, मेरे पास यहां पर अपना छोटा सा कौटेज होता. यहीं पर हर छुट्टियों में आ कर रहती. न स्कूल वालों की धौंस और न ही बेटेबहू को दुनियादारी निभाने की मजबूरी.” विनोद हंसते हुए बोले, “माधुरी जी, विचार तो बहुत अच्छा है पर यहां पर कौटेज की कीमत 50 -60 लाख रुपए के बीच है.”

कुमुद बोली, “यह तो मैं भी चाहती हूं कि मरने से पहले कुछ तो ऐसा हो जो मेरा एकदम निजी हो जिस पर बस मेरा हक हो. जयति और इंद्रवेश, तुम दोनों यह ग़लती मत करना, चाहे एक कमरे का ही सही, पर अपना आशियाना जरूर बनाना.” तभी विजय बोला, “मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए. अगर हम चाहें तो मिल कर खरीद सकते हैं.” विजय की बात सुन कर सब थोड़ा अचकचा गए.

जयति बोली, “क्या ऐसा हो सकता है?” विजय बोला, “जरूर हो सकता हैं मगर प्रौपर प्लानिंग और एक अच्छे वकील की मदद से.” इंद्रवेश बोला, “मेरे दोस्त के पापा, प्रौपर्टी संबंधित कार्य ही देखते हैं. मैं उन से बात करता हूं.” माधुरी बोली, “अरे, पहले स्कूल तो पहुंच जाएं. सब लोगों का ऊर्जा स्तर एकाएक बढ़ गया था. सब लोगों के जीवन को इस नए आइडिया ने एकाएक सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर कर दिया था.

पहले हर छुट्टी सब को निराशा से भर देती थी लेकिन अब आगमी गरमी की छुट्टियों में सब ने एक प्लान बना लिया था. विजय और विनोद धनौटी जा कर वहां पर उपलब्ध मकान और कौटेज का मुआयना करेंगे. इंद्रवेश और जयति देहरादून में रह कर स्थानीय वक़ीलों से इस संबंध में बातचीत करेंगे. वहीं, कुमुद और माधुरी पैसों का लेखाजोखा रखेगी. अगर लोन लेना पड़ा तो कैसे लिया जाएगा और क्या क्या कर सकते हैं, ये सब माधुरी और कुमुद का डिपार्टमैंट था. पूरी छुट्टियां इसी सब में बीत गई थीं.

शुक्रिया श्वेता दी : भाग 2

बूआ के बेटे की शादी थी. सब लोग पटना आए. दीपेन के मम्मीपापा, भाईभाभी और उन के दोनों बच्चे. सभी खुशमिजाज और मिलनसार थे. हां, सुंदरसलोनी भाभी बात कम कर रही थीं. शांत स्वभाव की थीं शायद. अंकिता का रिश्ता वहीं पक्का हो गया. पंडित जी ने दिन, मुहूर्त भी निकलवा दिया. दानदहेज की बात नहीं हुई. दीपेन के पापा ने मजाक में कहा- ‘समधी जी, अंकिता आप  की सब से छोटी और लाडली बेटी है. इस के लिए आप ने बहुतकुछ जोड़ कर रखा ही होगा. अब और आप को करना भी क्या है?’

शादी के दस दिन पहले दीपेन के पापा का फोन आया, ‘समधी जी, दीपेन बड़बोला लगता है लेकिन अंदर से संकोची है. उस की चाहत थी एक गाड़ी अंकिता के लिए आप उसे देते. खुद की गाड़ी खरीदने में तो काफी वक्त लग जाएगा. वैसे, वह आप से कहने को मना कर रहा था लेकिन मैं ने कहा कि इच्छा को इतना क्या दबाना. आप गाड़ी के लिए रुपए ही भेज दीजिए, दीपेन को यहां एक गाड़ी पसंद आ गई है, साढ़े दस लाख की है. लेकिन शोरूम हमारे जानपहचान वालों का है, वे डिस्काउंट दे रहे हैं. दस लाख तक में मिल जाएगी.’

पापा से कुछ कहते नहीं बना. भैया ने सुना तो ताव खा गया- ‘अरे, यह तो सरासर दहेज है. इतनी जल्दी हम कहां से लाएंगे. वे लोग लालची लग रहे हैं.’

अंकिता को बुरा लगा. एक गाड़ी मांग रहा है, वह भी मेरे लिए. भैया वह भी देना नहीं चाहता. शादी के बाद वह बदल गया है. बहन की खुशी कोई माने नहीं रखती. शादी के दिन बहुत कम बचे थे. सारी तैयारी हो चुकी थी. पैसे भी काफी खर्च हो चुके थे. मानमर्यादा की बात थी. सिर्फ इस बात के लिए शादी तोडऩा मूर्खता थी. फिर अंकिता कहां मानने वाली थी. किसी तरह रुपयों का इंतजाम कर के उन लोगों को देना ही पड़ा.

उस के बाद शादी के दिन तक बड़े सलीके से कभी चेन, कभी अंगूठी, कभी सोफा कम बैड और कभी जाने क्याक्या सामानों की डिमांड की गई. अंकिता प्यार में इस तरह अंधी थी, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह डिमांड ही दहेज है. भाई, पापा समझाना चाहते तो उसे लगता, ये लोग आज भी दीपेन को दिल से स्वीकार नहीं कर रहे. मां ठीक से समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे. बेटी का दिल भी नहीं तोडऩा चाहती थी और पति व बेटे  के तर्क भी सही लग रहे थे.

…और अंकिता शादी के बाद इलाहाबाद आ गई. बेहद खुश थी वह. घर ज्यादा बड़ा नहीं था. तीन छोटेछोटे कमरे थे. छोटा सा ड्राइंगरूम, किचन और बाथरूम. वह सोचती, यहां रहना कितने दिन है. उसे बेंगलुरू जाना है.

उस के कमरे में जेठानी के बच्चे दिनभर उधम मचाते, चहकते रहते. उसे बहुत अच्छा लगता. सभी उस से खूब बातें करते, स्नेह लुटाते. जेठानी कम ही बात करती. अंकिता किचन में जाती तब वह कहती- ‘थोड़े दिन आराम कर लो, फिर काम करना ही है.’

धीरेधीरे उस ने गौर करना शुरू किया. उस के सामने सभी ठीक से बात करते लेकिन वह कमरे में होती तो ऐसा लगता वे लोग आपस में खुसरफुसर कर रहे हैं. यदि अचानक वह उन के पास चली जाती, सभी एकाएक चुप हो जाते और उस से बात करने लगते.

एक दिन दोपहर में सभी आराम कर रहे थे. जेठ घर पर नहीं थे. दीपेन लेटेलेटे झपकी लेने लगा. वह उठ कर जेठानी के कमरे में गई. उन्होंने उसे प्यार से अपने पास बैठाया- ‘दीपेन सो रहा है क्या?’

‘हां दीदी, तभी आप के पास चली आई, उस ने मुसकरा कर कहा.

यह कैसा सवाल है, उस ने सोचा. इतने में दीपेन आ गया, ‘अरे यार, तुम यहां हो.  कम औन यार,’ उस ने ऐसी अदा से  यह सब कहा कि वह हंस कर उठ गई. बात अधूरी रह गई लेकिन जेठानी का सवाल उस का पीछा करता रहा. उस ने गौर किया कि हर वक्त कोई न कोई साए की तरह उस के साथ रहता है. वह जेठानी से ज्यादा घुलमिल न पाए, ऐसी कोशिश सब की होती है.

एक दिन शाम में जेठानी नाश्ता बना रही थी. वह किचन में हैल्प करने गई. उस ने देखा, पकौडिय़ां तलते हुए जेठानी की आंखें आंसुओं से तर हैं. उस ने पूछ लिया, ‘दीदी, आप रो रही हैं?’

‘अरे नहीं, प्याज काटे थे न? मेरी आंखों में प्याज ज्यादा लगता है,’ उस ने जल्दी से आंसू पोंछते हुए कहा.

अंकिता ने ताड़ लिया, प्याज नहीं रुला रहे हैं, कोई और बात है.

दसबारह दिन निकल गए.  उन लोगों की छुट्टियां खत्म होने वाली  थीं. दीपेन ने रात में कहा- ‘मैं बैंगलुरु जा रहा हूं. मम्मीपापा चाहते हैं, तुम कुछ दिन उन के साथ रहो.’

‘तुम्हें पता है, हमें और छुट्टी नहीं मिल पाएगी.’

‘अरे यार, अब उस की क्या जरूरत है? मैं भी किसी दूसरी कंपनी में जाने की सोच रहा हूं. वहां हमारी तनख्वाह भी कम है. कभीकभी सोचता हूं अपना काम शुरू करूं.’

‘शादी के पहले तो हमारी ऐसी कोई प्लानिंग नहीं थी?’

‘अब है न.  तुम इतने सवाल क्यों कर रही हो?’ दीपेन का स्वर बदला हुआ था.

अंकिता ने बात आगे नहीं बढ़ाई लेकिन उसे लगा इस से पहले उस का इतना रूखा व्यवहार कभी नहीं था. उस ने सोचा, हो सकता है मम्मीपापा से किसी बात पर टैंशन हुई हो. कुछ दिन यहीं रुक कर एंजौय कर लेती हूं. कौन यहां परमानैंट रहना है.

दीपेन  2 दिनों बाद चला गया. जेठानी से अभी भी वह घुलमिल नहीं पाती थी. जब भी दोनों बात कर रही होतीं, सास उन्हें किसी बहाने अलगअलग काम पर लगा देतीं. उसे लगने लगा, कोर्ई बात है. वह अपने मम्मीपापा से भी ज्यादा बात नहीं कर पाती. उस के जाने के बाद दोनों बच्चे उस के साथ ही सोते. सास भी उसी कमरे में सोने लगी थी. भला नई बहू को अकेले कैसे छोड़े.

दीपेन को गए एक हफ्ता गुजर गया. वह दिन में फोन करती तो यह कह कर बात न करता कि आजकल काम का दबाव बढ़ गया है, सारे पेंडिंग काम निबटाने हैं. रात में दोचार मिनट बात करता, थोड़ाबहुत मांपापा से बात करता और फोन कट.

एक रात बहुत तेजतेज आवाज सुन कर वह हड़बड़ा कर उठ बैठी. आवाज दूसरे कमरे से आ रही थी. वह उठ कर ड्राइंग रूम में आई. आवाज भाभी के कमरे से आ रही थी. सब लोग शायद वहीं थे. वह दबे पांव कमरे की तरफ बढ़ी. दरवाजा भिडक़ा हुआ था. उस ने हलके सूराख से अंदर देखने की कोशिश की. ‘चटाक.’ उसी वक्त ससुर ने जेठानी के गाल पर तमाचा जड़ा. वह कांप गई. जेठानी ऐसे निरीह खड़ी थी जैसे कसाई के सामने मेमना.

‘पापा, गुस्से को काबू में रखिए. दूसरे कमरे में अंकिता सो रही है. मैं देखता हूं,’ जेठ ने कहा.

ससुर गुस्से से तमतमाते हुए कुछ बड़बड़ा रहे थे. वह जल्दी से दबे पांव अपने कमरे में आ गई. आंखें बंद कर सोने का नाटक किया लेकिन उस ने अभीअभी जो देखा था, वह उस की आंखों के सामने से हट नहीं रहा था. थोड़ी देर में सास आई, लाइटवाइट जला कर चैक किया कि इस बीच वह जागी तो नहीं. जब यकीन हो गया कि  सब ठीक है, तब वह भी उस के बगल में सो गई.

‘भला यह भी कहने की बात है? शादी में समधी जी दिली खोल कर खर्च करेंगे. यह शादी शानदार होगी, क्यों समधी जी?’ दीपेन की मां ने हंस कर कहा.

सुबह सब कुछ नौर्मल था. श्वेता दी की आंखें सूजीसूजी थीं  लेकिन वह हर दिन की तरह किचन में थी. नौदस बजे के करीब उस ने देखा, ड्राइंगरूम में कोई बैठा था जिस से ससुर और जेठ बातें कर रहे थे. वह आदमी धीरेधीरे लेकिन कुछ तुनक कर बात कर रहा था. ससुर और जेठ उसे आहिस्ताआहिस्ता शांत करने में लगे थे. उस की समझ में कुछ नहीं आया. हवा में तैरती बातों के टुकड़ों को मिलाने पर लगा जैसे वह आदमी अपनी बकाया रकम मांग रहा था. घर खाली करने जैसी भी बात थी शायद. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. किससे पूछे वह? कैसे जाने इस घर की रहस्मयी बातें. उस ने पति से बात करना चाहा. हायहेलो के बाद पूछा, ‘दीपेन, तुम कब आ रहे हो?’

‘अभी थोड़ा वक्त लगेगा. अब सोच रहा हूं रिजाइन कर के ही आऊं.’

उसे शाक हुआ. वह किसी और बात के लिए फोन कर रही थी, यहां एक नया धमाका था- ‘क्यों, क्या दूसरा जौब मिल गया?’

‘दिनभर काम करता रहूंगा तो जाब कैसे मिलेगी? अब वहां आ कर इत्मीनान से ट्राई करूंगा. यार, एक बात और है. मैं खुद का काम शुरू करना चाहता हूं. अपने पापा से कहो न कि अभी कुछ मदद कर दें. मैं बाद में लौटा दूंगा. अभी चारपांच लाख ही दे दें, फिर देखते हैं.’

दीपेन ने बड़े इत्मीनान से यह सब कहा लेकिन अंकिता  के दिल में लगी.  दीपेन का ऐसा रूप अभी तक नहीं दिखा था. उस ने भरे गले से कहा- ‘पापा से  कैसे कहें, अभीअभी शादी में इतना खर्च किया है…’

‘उन्होंने नया क्या किया है? बेटी की शादी में कौन खर्च नहीं करता? तुम लाडली हो उन की, तुम्हारे लिए इतना नहीं कर सकते?’

और उस ने फोन काट दिया . अंकिता कट कर रह गई.

दोपहर में सब के खाने के बाद श्वेता किचन समेट रही थी. अंकिता पानी लेने गई, धीरे से पूछा, ‘दीदी, रात में क्या हुआ था?’ श्वेता की आंखें डबडबा गईं. उस ने इधरउधर देखा और ब्लाउज में छिपा कर रखा तुड़ामुड़ा कागज निकाल कर जल्दी से उसे थमा दिया. बहुत धीरे से फुसफुसाई- ‘सब की नजर बचा कर इसे पढ़ लेना.’ श्वेता की आंखें भरी थीं, गला भरा था लेकिन पत्र देते समय उस के चेहरे पर दृढ़ता का भाव आ गया. अंकिता भौचक थी. उस ने जल्दी से पत्र ले कर  छिपा लिया और कमरे में आ गई.

सासससुर ड्राइंगरूम में थे. सास सीरियल देख रही थी. उस  ने जल्दी से  वह  कागज निकाला और बिना सांस लिए पढऩे लगी.

‘प्रिय अंकिता,

डॉ. प्रिया आईएएस : कैसे रूढ़ियों को तोड़कर ऊंचाई पर पहुंचीं थी वो ?

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छोटे रिश्ते बड़े काम : भाग 1

वह 13 वर्ष बाद शहर जा रहे थे. इस से पहले इरा के जन्म पर राकेश आ कर उन्हें लिवा ले गया था. आज लग रहा है कि पूरा एक युग समाप्त कर के वह एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं. ऐसा युग जो उन के कंठ से निकल कर एक समूची सृष्टि का सृजनकर्ता बन जाता था.

अपने कसबे के वहीं एकमात्र संगीतज्ञ थे. आंख मूंद कर ध्रुपद का आलाप जब वह लेते थे तो जानकार लोग झूमझूम उठते थे. सीधे हाथ की उंगलियां तानपुरे पर फिसलती रहतीं और कंठ का माधुर्य जनमानस पर बिखरता चला जाता.

कसबे में कोई प्रदर्शनी आती तो संगीत के कार्यक्रम का आरंभ उन के ही किसी गौड़सारंग या ठुमरीदादरा से होता. अंत भी उन की ही भैरवी से किया जाता. बीच में कितने ही संगीतज्ञ अपने कंठ का जादू वहां फैलातेपर कसबे वालों की वाहवाह तो उन के मंच पर पहुंचने के बाद ही सुनाई देती. उन के कंठ की यही विशेषता थी कि जो शास्त्रीय संगीत नहीं समझते थेवे भी उन के स्वर में डूब जाते थे.

बीती हुई बातें अपनेआप में पूरा एक इतिहास छिपाए हुए हैं और उसे जब भी वह दोहराने बैठते हैं तो सब से पहले उभरता है पद्मिनी का चेहरा.पद्मिनी की याद आते ही उन का एकाकी संसार सुधियों के सागर से भर उठता है. घर का कोनाकोना जैसे महक उठता हैऔर वह गीली हो उठी आंखें मूंद कर कहते हैं, ‘‘पद्माइतनी जल्दी भी क्या थी तुम्हें जाने की.’’

राकेश स्टेशन पर लेने आ गया था. उन्होंने स्नेह से उसे गले लगा लिया. चरण छू कर राकेश ने कहा, ‘‘अच्छा किया आप नेआ गए.’’‘‘हांतुम ने जिद की इलाज करवाने कीफिर क्या करताआना ही पड़ा,’’ वह अतिरिक्त प्यार उड़ेल कर बोले और राकेश के साथ जा कर कार में बैठ गए.

राकेश शहर का नामी वकील है. दो बच्चे हैं – इरा और लव. लव 7 वर्ष का हैपर उस के जन्म पर वह शहर नहीं पहुंच सकेन बहू ही उस के बाद उन के पास आई. राकेश बीच में एक  बार आया था. राकेश को भर दृष्टि प्यार से देखते वह समझते हैं. उस के चेहरे पर जैसे पद्मा के चेहरे की छाप है. वही नयननक्शवही हंसी.

कच्ची अवस्था में ही उन का व पद्मा का ब्याह हो गया था. कसबे के विद्यालय में वह संगीत के अध्यापक थे. वेतन अधिक नहीं थापर ट्यूशनें बहुत मिल जाती थींजिस से दोनों पतिपत्नी खूब अच्छा जीवन जी लेते थे.

उन के पिता भी अच्छे संगीतज्ञ थे और वह भी चाहते थे कि उन का इकलौता बेटा राकेश संगीतज्ञ ही बने. बच्चे तो बहुत हुएपर बचा केवल राकेश ही था. पद्मा की इच्छा पर ही उस ने वकालत पढ़ी थी. पद्मा चाहती थीराकेश संगीत भी जानेपर उसे जीवनयापन का साधन न बनाए. उस का बेटा अपार धन का स्वामी होकुछ ऐसी ही महत्त्वाकांक्षा थी उस की.

घर पहुंच कर दो प्यारेप्यारे बच्चों ने उन का स्वागत किया. उन्होंने ध्यान से देखाकैसा सु़ंदरकितने चुस्त हैं बच्चे. भला कसबे का गवैया अध्यापक बन कर राकेश के बच्चे इतने अच्छे दिखार्ई देतेउन्हें अहसास है उस दुख का. सीमित वेतन और ट्यूशनों के बल पर किस तरह उन्होंने राकेश को वकालत पढ़ाई थी. सोचाअच्छा ही किया पद्मा नेइसे गवैया नहीं बनने दिया. वैसेसंगीत की शिक्षा राकेश को भी दी है उन्होंने.

बहू ममता आंचल सिर पर डाल कर उन के पैर छूने झुकी तो वह विचारों की श्रृंखला तोड़ चौंक उठेबोले, ‘‘सदा सुखी रहो. बड़ा सुंदर घर बनाया हैबेटीआज तुुहारी सास होती…’’ और वह चुप हो गए.

छुट्टी का दिन था. घर के उद्यान में नौकर ने कुरसियां डाल दी थीं. बच्चे भागभाग कर हरीहरी घास में खेल रहे थे और वह मंत्रमुग्ध भाव से देख रहे थेे. इतने दिनों तक वह पद्मा की याद लिए उसी घर में पड़े रहे. वहां से कहीं जाने का मन ही नहीं होता था. पद्मा की चूड़ियों की खनकउस की प्यार भरी मीठी हंसीसुखदुख में सहारा देती मधुर वाणीउन्हें जैसे हर पल घेरे रहती. पैर में गठिया का रोग न बढ़ जाता तो शायद अब भी वह नहीं आते.

थोड़ी देर में ही हाल में गिटार की मधुर गूंज उन्हें तड़पा गई. शायद इरा बजा रही है और लोग सांस रोक कर सुन रहे हैंतभी तो सारी आवाजें बंद हैं. उन का मन हुआतुरंत उठ कर देखेंइरा कैसी लग रही हैइतने लोगों के बीच में गिटार बजाती हुई. कोई बात नहींजो इरा को वह कुछ नहीं सिखा सकेपर प्रशंसा के योग्य तो वह है ही.

आधे घंटे तक वहां गिटार और केसियो पर पौप’ संगीत ही गूंजता रहा. फिर अचानक ही बीच का परदा खिंचा और भिड़ा हुआ दरवाजा एकदम खुल गया. कमरा किशोरकिशोरियों से भर गया था. इरा आगेआगे फुदकती हुई कह रही थी, ‘‘यही हैं हमारे बाबाजीअपने घर पर सब को संगीत सिखाते थेपर अब नहीं गाते.’’‘शायद इरा को कुछ समझाना राकेश व बहू भूल गए होंगेतभी तो मेरे दर्शनार्थ अपने साथियों को वह यों समेट लाई है,’

खुसरो दरिया प्रेम का : भाग 1

63वें जन्मदिन पर अगर 18 साल की उम्र का पहला प्यार फेसबुक पर ढूंढ़ कर इतनी उम्र बीत जाने के बाद अचानक फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दे तो किसे हैरानी नहीं होगी। अपने लैपटौप पर माद्री एकटक अभिमन्यु का नाम देख रही थी। अभिवही है न… प्रोफाइल देखी तो समय के साथ आए कई बदलावों के बावजूद आसानी से पहचान लिया। यह चेहरा कौन सा स्मृतियों से कभी अलग हुआ था। जेहन में कुंडली मार कर तो बैठा रहा हमेशा। रिक्वैस्ट ऐक्सेप्ट करते ही मन सालों पहले के सफर पर उड़ चला। अभिमन्यु ने इतने में ही मैसेंजर पर मैसेज भेज दिया, “कैसी हो माद्री?”

ठीक हूं। कहां हो?”“पूना… और तुम?”“मुंबई।”“यह मेरा मोबाइल नंबर हैबात करोगी?”“क्यों नहींतुम कहां खो गए थेअभिमैं ने तुम्हें कितना ढूंढ़ा। तुम्हारा कभी कुछ पता ही नहीं चला।”“अभी दुकान पर हूंशाम को फोन करता हूं।अभी मेरा बेटा विराज मेरे साथ ही दुकान पर बैठा हुआ हैउस के सामने बात नहीं कर पाऊंगा।

डरते हो अब भी?”“हांडरना तो पड़ता ही हैसमाज के आज भी कुछ नियम हैंतब भी थेहमेशा रहेंगे।”“तुम्हारे घर में कौनकौन हैं?”“पत्नी नीताबेटा विराजउस की पत्नी मधु और 2 पोतेपोती मानन और तनिका। तुम्हारे घर में कौनकौन हैं?”

पति पुष्कर अब रिटायर हो चुके हैं। बेटा अंकित अपने परिवार के साथ कनाडा में रहता है। घर में अब हम दोनों ही हैं। मैं भी टीचर रहीअब तो रिटायर हो चुकी हूं।”“ठीक हैशाम को फोन करूंगा।”“अरेसुनोजन्मदिन मुबारक हो।”

तुम्हें याद है अब तक?”“तुम्हें भूला ही कब था?”माद्री के दिल पर ये शब्द जैसे शीतल फुहार से बरसे। मैं इसे याद रही। यह भी मुझे नहीं भूला था। ओहहम क्यों जुदा हुए…काश…लैपटौप बंद कर माद्री अजीब सी मनोदशा में उठी और बालकनी में रखी चेयर पर आंखें बंद कर बैठ गईं। हैरान थींयह क्या हो गयाअभि यों अचानक कैसे मिल गया। ऐसे भी होता है क्याजिसे ढूंढ़तेढूंढ़ते जीवन निकल गयाजिस का कभी कुछ सुराग न मिलावह यों सामने आ गया। वह भी जीवन के इस मोड़ पर। इस अवस्था में जब कोई ख्वाहिश शेष न रही।

भाभी चैताली का कजिन था अभिमन्यु। भाभी को अपने भाई की आंखों में जब माद्री के लिए कोमल भाव दिखेवह मन ही मन इस बात से इतनी चिढ़ गई कि जब भी अभिमन्यु आतावह सिर पर खड़ी रहतीं। दोनों ही उस समय 18-19 की उम्र के रहे होंगे। फिर दोनों ने अपने दिल की बात कहने के लिए खतों का सहारा लिया थाउस की भी भनक चैताली को पड़ गई थी। उस ने साफसाफ अभिमन्यु को आने के लिए मना कर दिया था। उस के मन में न जाने क्यों कभी किसी के लिए कोमल भाव आता ही नहीं था। फिर अभिमन्यु पढ़ने के लिए कहीं चला गया था। वह पत्र लिखता पर सब चैताली के हाथ लग जाते।

माद्री के मातापिता ने चैताली के बारबार कहने पर माद्री की शादी करने के विचार का समर्थन किया था। वे खुश थे कि भाभी को ननद की शादी की बड़ी चिंता है। माद्री धीरेधीरे यही सोचने लगी कि अभिमन्यु उसे भूल गया है। वह जीवन में उस के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहता। ऐसा कोई वादा भी नहीं किया गया था जिस के सहारे माद्री अभिमन्यु की राह देखती। अभिमन्यु के जाने के बाद फिर लखनऊ शहर माद्री के लिए जैसे उस के सपनों का कब्रिस्तान हो गया। उस ने अभिमन्यु को इतना चाहा था कि वह जैसे उस के तनमन से हमेशा ही जुड़ा रहा। यह माद्री के प्रेम की पराकाष्ठा थी कि अभिमन्यु के उस के जीवन से जाने के बाद वह सिर्फ देखने में जीवित रहीमन तो कब का मर चुका था।

पुष्कर इतने सज्जन पति थे कि माद्री की यह प्रेमकथा सुनने के बाद भी न कभी उसे कोई ताना मारान कोई कटु शब्द कहे। जो बीत गईसो बात गई‘ में यकीन रखते थे। वैसे भी माद्री ने अपने सब फर्ज अच्छी तरह से निभाए थे।

इतने में पुष्कर के आने की आहट से माद्री ने आंखें खोलीं। पुष्कर ने उसे इतना खोए हुए देख कर पूछा, “बड़ी चिंता में लग रही होतबीयत तो ठीक है न?”माद्री ने कभी पुष्कर से कुछ नहीं छिपाया थाआज भी उन्हें बैठने का इशारा करते हुए कहा, “सुनोबताओ आज फेसबुक पर कौन मिला?”

पुष्कर हंसे, “पहले यह साफ करोमिली या मिला?”“मिला।”“कोई पुराना स्टूडैंट?”“नहीं।”“तुम्हीं बताओ।”“अभिमन्यु…पुष्कर ने शांत स्वर में कहा, “अच्छाकहां है आजकल?”“पूना,” माद्री के चेहरे की रौनक अभिमन्यु के नाम से कितना बढ़ गईयह पुष्कर ने देखा। बहुत सालों बाद उस के स्वर में यह खनक थी। वे हैरान से माद्री का चेहरा देखते रहे। वे वहां से इस समय हट जाना चाहते थेपता नहीं क्यों… पूछा, “चाय पीओगीबना कर लाऊं?”“हां…

पुष्कर चाय बनाने किचन में चले गए। उन्हें इस समय अपने मन को समझाने के लिए कुछ पल चाहिए थेयही तो कर रहे हैं वे सालों से। माद्री के साथ सामंजस्य बैठातेबैठाते वे मन ही मन थकने लगते हैं पर माद्री को खुश देखने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैंकुछ भी। अब भी उन्होंने चाय बनाते हुए अपने से ही मन ही मन बात की। अच्छा लगा होगा माद्री को जब अभिमन्यु ने उसे आज उस के जन्मदिन पर उस से संपर्क किया। किसे अच्छा नहीं लगेगा। उन्हें कोई ऐसे ढूंढ़ता तो वे भी तो खुश होते। यह अलग बात है कि माद्री के सिवा उन के जीवन में कभी कोई और लड़की आई ही नहीं।

माद्री से विवाह के बाद वे पूरी तरह से घरपरिवार को समर्पित इंसान रहे। माद्री ने उन्हें जब अभिमन्यु के बारे में बताया तो भी उन्होंने उस के असफल प्रेम से सहानुभूति ही हुई। वे हमेशा से बहुत सहृदयशांतगंभीर इंसान थे। माद्री की हर सुविधा का उन्होंने हमेशा बहुत ध्यान रखा था पर माद्री के दिल का एक कोना हमेशा अभिमन्यु के लिए छटपटाता ही रहा।

लोचाय पीयो,”पुष्कर की आवाज से माद्री भी वर्तमान में लौटी।क्या सोच रही हो?”माद्री ने मुसकराते हुए कहा, “आज का जन्मदिन तो अभिमन्यु ने स्पैशल बना दियाचलोअब बाहर चल कर बढ़िया डिनर करते हैं,” माद्री ने हमेशा ही पुष्कर से साफसाफ मन की बात की थीबिना किसी लागलपेट के। वह आज क्यों खुश थींयह भी माद्री ने सहर्ष स्वीकार किया। कनाडा से अंकितउस की पत्नी स्वरा और पोती फ्रेया ने उसे फोन पर विश कर ही दिया था। डिनर करने के लिए आज पुष्कर ने माद्री की पसंद का रेस्तरां बुक किया था। वह तैयार हो कर जैसे ही पर्स उठाने लगीअभिमन्यु का फोन आया। पुष्कर तैयार हो कर सोफे पर बैठे थे। माद्री “अभिमन्यु का फोन है,”कहते हुए वापस अंदर बैडरूम में चली गई। दोनों ने सालों बाद एकदूसरे की आवाज सुनीउम्र के अच्छेखासे अंतराल के बाद भी दोनों के मन में जो भाव थेदोनों महसूस कर रहे थेजैसे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं थी। दूर बैठे दोनों एकदूसरे का मन पढ़ रहे थे। दोनों ने आधे घंटे बात कीतय हुआअब बातें होती ही रहेंगी।

पुष्कर इस दौरान चुपगंभीर बैठे रहे थे। माद्री के स्वभाव में धैर्यस्थिरता नहीं थी। उन्हें गुस्सा भी जल्दी आतायह वे भी समझ गए थे। माद्री बिना आगापीछा सोचे फैसले लेने में भी जल्दबाजी करती थी। इस आदत के चलते उन से ज्यादा दिन कोई जुड़ा न रह पातापड़ोसीरिश्तेदार अगर मतलब रखते तो सिर्फ पुष्कर के स्वभाव के कारण।

आप भी तो नहीं आए थे : भाग 1

‘जो जैसा बोता है वैसी ही फसल काटता है,’ बड़े भैया आज दुखी थे. उन का घर उजड़ गया था. बेटे अपनी मां का मरा मुंह देखने भी न आए. क्या इस सब के लिए अप्रत्यक्ष रूप से वही दोषी नहीं थे?

सुबह 6 बजे का समय था. मैं  अभी बिस्तर से उठा ही था कि फोन घनघना उठा. सीतापुर से बड़े भैया का फोन था जो वहां के मुख्य चिकित्सा अधिकारी थे.

वह बोले, ‘‘भाई श्रीकांत, तुम्हारी भाभी का आज सुबह 5 बजे इंतकाल हो गया,’’ और इतना बतातेबताते वह बिलख पड़े. मैं ने अपने बड़े भाई को ढाढ़स बंधाया और फोन रख दिया.

पत्नी शीला उठ कर किचन में चाय बना रही थी. उसे मैं ने भाभी के मरने का बताया तो वह बोली, ‘‘आप जाएंगे?’’

‘‘अवश्य.’’

‘‘पर बड़े भैया तो आप के किसी भी कार्य व आयोजन में कभी शामिल नहीं होते. कई बार लखनऊ आते हैं पर कभी भी यहां नहीं आते. इतने लंबे समय तक मांजी बीमार रहीं, कभी उन्हें देखने नहीं आए, उन की मृत्यु पर भी नहीं आए, न आप के विवाह में आए,’’ शीला के स्वर में विरोध की खनक थी.

‘‘पर मैं तो जाऊंगा, शीला, क्योंकि मां ऐसा ही चाहती थीं.’’

‘‘ठीक है, जाइए.’’

‘‘तुम नहीं चलोगी?’’

‘‘चलती हूं मैं भी.’’

हम तैयार हो कर 8 बजे की बस से चल पड़े और साढ़े 10 तक सीतापुर पहुंच गए. बाहर से आने वालों में हम ही सब से पहले पहुंचे थे, निकटस्थ थे, अतएव जल्दी पहुंच गए.

भैया की बेटी वसुधा भी वहीं थी, मां की बीमारी बिगड़ने की खबर सुन कर आ गई थी. वह शीला से चिपट कर रो उठी.

‘‘चाची, मां चली गईं.’’

शीला वसुधा को सांत्वना देने लगी, ‘‘रो मत बेटी, दीदी का वक्त पूरा हो गया था, चली गईं. कुदरत का यही विधान है, जो आया है उसे एक दिन जाना है,’’ वह अपनी चाची से लगी सुबकती रही.

इन का रोना सुन कर भैया भी बाहर निकल आए. उन के साथ उन के एक घनिष्ठ मित्र गोपाल बाबू भी थे और 2-3 दूसरे लोग भी. भैया मुझ से लिपट कर रोने लगे.

‘‘चली गई, बहुत इलाज कराया पर बचा न सका, कैंसर ने नहीं छोड़ा उसे.’’

मैं उन की पीठ सहलाता रहा.

थोड़ा सामान्य हुए तो बोले, ‘‘तन्मय (उन का बड़ा बेटा) को फोन कर दिया है. फोन उसी ने उठाया था पर मां की मृत्यु का समाचार सुन कर दुखी हुआ हो ऐसा नहीं लगा. कुछ भी तो न बोला, केवल ‘ओह’ कह कर चुप हो गया. एकदम निर्वाक्.

‘‘मैं ने ही फिर कहा, ‘तन्मय, तू सुन रहा है न बेटा.’

‘‘ ‘जी.’ फिर मौन.

‘‘कुछ देर उस के बोलने की प्रतीक्षा कर के मैं ने फोन रख दिया. पता नहीं आएगा या नहीं,’’ कह कर भैया शून्य में ताकने लगे.

बेटी वसुधा बोल उठी, ‘‘आएंगे… आएंगे…आखिर मां मरी है भैया की. मां…सगी मां, मां की मृत्यु पर भी नहीं आएंगे.’’

वह बोल तो गई पर स्वर की अनुगूंज उसे खोखली ही लगी, वह उदासी से भर गई.

इतने में चाय आ गई. सब चाय पीने लगे.

भैया के मित्र गोपाल बाबू बोल उठे, ‘‘कैंसर की एक से एक अच्छी दवाएं ईजाद हो गई हैं. तमाम डाक्टर दावा करते हैं कि अब कैंसर लाइलाज नहीं रहा…पर बचता तो शायद ही कोई मरीज है.’’

भैया बोल उठे, ‘‘आखिरी 15 दिनों में तो उस ने बहुत कष्ट भोगा. बहुत कठिनाई से प्राण निकले. वह तन्मय से बहुत प्यार करती थी उस की प्रतीक्षा में आंखें दरवाजे की ओर ही टिकाए रखती थी. ‘तन्मय को पता है न मेरी बीमारी के बारे में,’ बारबार यही पूछती रहती थी. मैं कहता था, ‘हां है, मैं जबतब फोन कर के उसे बतलाता रहता हूं.’ ‘तब भी वह मुझे देखने…मेरा दुख बांटने क्यों नहीं आता? बोलिए.’ मैं क्या कहता. पूरे 5 साल बीमार रही वह पर तन्मय एक बार भी देखने नहीं आया. देखने आना तो दूर कभी फोन पर भी मां का हाल न पूछा, मां से कोई बात ही न की, ऐसी निरासक्ति.’’

कहतेकहते भैया सिसक पड़े.

‘भैया, ठीक यही तो आप ने किया था अपनी मां के साथ. वह भी रोग शैया पर लेटी दरवाजे पर टकटकी लगाए आप के आने की राह देखा करती थीं, पर आप न आए. न फोन से ही कभी उन का हाल पूछा. वह भी आप को, अपने बड़े बेटे को बहुत प्यार करती थीं. आप को देखने की चाह मन में लिए ही मां चली गईं, बेचारी, आप भी तो निरासक्त बन गए थे,’ मैं मन ही मन बुदबुदा उठा.

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