Download App

Hindi Story : सजा – अंकिता ने सुमित को ऐसा क्या बताया जिससे वो परेशान हो गया?

Hindi Story : वेटर को कौफी लाने का और्डर देने के बाद सुमित ने अंकिता से अचानक पूछा, ‘‘मेरे साथ 3-4 दिन के लिए मनाली घूमने चलोगी?’’

‘‘तुम पहले कभी मनाली गए हो?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो उस खूबसूरत जगह पहली बार अपनी पत्नी के साथ जाना.’’

‘‘तब तो तुम ही मेरी पत्नी बनने को राजी हो जाओ, क्योंकि मैं वहां तुम्हारे साथ ही जाना चाहता हूं.’’

‘‘यार, एकदम से जज्बाती हो कर शादी करने का फैसला किसी को नहीं करना चाहिए.’’

सुमित उस का हाथ पकड़ कर उत्साहित लहजे में बोला, ‘‘देखो, तुम्हारा साथ मुझे इतनी खुशी देता है कि वक्त के गुजरने का पता ही नहीं चलता. यह गारंटी मेरी रही कि हम शादी कर के बहुत खुश रहेेंगे.’’

ये भी पढ़ें- जय बाबा सैम की

उस के उत्साह से प्रभावित हुए बिना अंकिता संजीदा लहजे में बोली, ‘‘शादी के लिए ‘हां’ या ‘न’ करने से पहले मैं तुम्हें आज अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में कुछ बातें बताना चाहती हूं, सुमित.’’

सुमित आत्मविश्वास से भरी आवाज में बोला, ‘‘तुम जो बताओगी, उस से मेरे फैसले पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है.’’

‘‘फिर भी तुम मेरी बात सुनो. जब मैं 15 साल की थी, तब मेरे मम्मीपापा के बीच तलाक हो गया था. दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर होने के कारण उन के बीच रातदिन झगड़े होते थे.

‘‘तलाक के 2 साल बाद पापा ने दूसरी शादी कर ली. ढेर सारी दौलत कमाने की इच्छुक मेरी मां ने अपना ब्यूटी पार्लर खोल लिया. आज वे इतनी अमीर हो गई हैं कि समाज की परवा किए बिना हर 2-3 साल बाद अपना प्रेमी बदल लेती हैं. हमारे जानकार लोग उन दोनों को इज्जत की नजरों से नहीं देखते हैं.’’

अंकिता उस की प्रतिक्रिया जानने के लिए रुकी हुई है, यह देख कर सुमित ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘मैं मानता हूं कि हर इंसान को अपने हिसाब से अपनी जिंदगी के फैसले करने का अधिकार होना ही चाहिए. तलाक लेने के बजाय रातदिन लड़ कर अपनीअपनी जिंदगी बरबाद करने का भी तो उन दोनों के लिए कोई औचित्य नहीं था. खुश रहने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना, वह सब को स्वीकार करना चाहिए.’’

ये भी पढ़ें- दूसरा पत्र – भाग 1 : क्या था पत्र में खास?

‘‘क्या तुम सचमुच ऐसी सोच रखते हो या मुझे खुश करने के लिए ऐसा बोल रहे हो?’’

‘‘झूठ बोलना मेरी आदत नहीं है, अंकिता.’’

‘‘गुड, तो फिर शादी की बात आगे बढ़ाते हुए कौफी पीने के बाद मैं तुम्हें अपनी मम्मी से मिलाने ले चलती हूं.’’

‘‘मैं उन्हें इंटरव्यू देने के लिए बिलकुल तैयार हूं,’’ सुमित बोला तो उस की आंखों में उभरे प्रसन्नता के भाव पढ़ कर अंकिता खुद को मुसकराने से नहीं रोक पाई. आधे घंटे बाद अंकिता सुमित को ले कर अपनी मां सीमा के ब्यूटी पार्लर में पहुंच गई.

आकर्षक व्यक्तित्व वाली सीमा सुमित से गले लग कर मिली और पूछा, ‘‘क्या तुम इस बात से हैरान नजर आ रहे हो कि हम मांबेटी की शक्लें आपस में बहुत मिलती हैं?’’

‘‘आप ने मेरी हैरानी का बिलकुल ठीक कारण ढूंढ़ा है,’’ सुमित ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘हम दोनों की अक्ल भी एक ही ढंग से काम करती है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘हम दोनों ही ‘जीओ और जीने दो’ के सिद्धांत में विश्वास रखती हैं. उन लोगों से संबंध रखना हमें बिलकुल पसंद नहीं जो हमारी जिंदगी में टैंशन पैदा करने की फिराक में रहते हों.’’

‘‘मम्मी, अब सुमित से भी इस के बारे में कुछ पूछ लो, क्योंकि यह मुझ से शादी करना चाहता है,’’ अंकिता ने अपनी बातूनी मां को टोकना उचित समझा था.

‘‘रियली, दिस इज गुड न्यूज,’’ सीमा ने एक बार फिर सुमित को गले से लगा कर खुश रहने का आशीर्वाद दिया और फिर अपनी बेटी से पूछा, ‘‘क्या तुम ने सुमित को अपने पापा से मिलवाया है?’’

‘‘अभी नहीं.’’

सीमा मुड़ कर फौरन सुमित को समझाने लगी, ‘‘जब तुम इस के पापा से मिलो, तो उन के बेढंगे सवालों का बुरा मत मानना. उन्हें करीबी लोगों की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करने की गंदी आदत है, क्योंकि वे समझते हैं कि उन से ज्यादा समझदार कोई और हो ही नहीं सकता.’’

‘‘मौम, सुमित यहां आप की शिकायतें सुनने नहीं आया है. आप उस के बारे में कोई सवाल क्यों नहीं पूछ रही हैं?’’ अंकिता ने एक बार फिर अपनी मां को विषय परिवर्तन करने की सलाह दी.

‘‘ओकेओके माई डियर सुमित, मुझे तो तुम से एक ही सवाल पूछना है. क्या तुम अंकिता के लिए अच्छे और विश्वसनीय जीवनसाथी साबित होंगे?’’

‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि शादी के बाद हम बहुत खुश रहेंगे,’’ सुमित ने बेझिझक जवाब दिया.

‘‘मैं नहीं चाहती कि अंकिता मेरी तरह जीवनसाथी का चुनाव करने में गलती

करे. मेरी सलाह तो यही है कि तुम दोनों शादी करने का फैसला जल्दबाजी में मत करना. एकदूसरे को अच्छी तरह से समझने के बाद अगर तुम दोनों शादी करने का फैसला करते हो, तो सुखी विवाहित जीवन के लिए मेरा आशीर्वाद तुम दोनों को जरूर  मिलेगा.’’

‘‘थैंक यू, आंटी. मैं तो बस, अंकिता की ‘हां’ का इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘गुड, प्लीज डोंट माइंड, पर इस वक्त मैं जरा जल्दी में हूं. मैं ने एक खास क्लाइंट को उस का ब्राइडल मेकअप करने के लिए अपौइंटमैंट दे रखा है. तुम दोनों से फुरसत से मिलने का कार्यक्रम मैं जल्दी बनाती हूं,’’ सीमा ने बारीबारी दोनों को प्यार से गले लगाया और फिर तेज चाल से चलती हुई पार्लर के अंदरूनी हिस्से में चली गई.

बाहर आ कर सुमित सीमा से हुई मुलाकात के बारे में चर्चा करना चाहता था, पर अंकिता ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘मैं लगे हाथ अपने पापा को भी तुम्हारे बारे में बताने जा रही हूं. मेरे फोन का स्पीकर औन है. हमारे बीच कैसे संबंध हैं, यह समझने के लिए तुम हमारी बातें ध्यान से सुनो, प्लीज.’’

अंकिता ने अपने पापा को सुमित का परिचय देने के बाद जब उस के साथ शादी करने की इच्छा के बारे में बताया, तो उन्होंने गंभीर लहजे में कहा, ‘‘तुम सुमित को कल शाम घर ले आओ.’’

‘‘जरा सोचसमझ कर हमें घर आने का न्योता दो, पापा. आप मेरी जिंदगी में दिलचस्पी ले रहे हैं, यह देख कर आप की दूसरी वाइफ नाराज तो नहीं होंगी न?’’

अंकिता के व्यंग्य से तिलमिलाए उस के पापा ने भी तीखे लहजे में कहा, ‘‘तुम बिलकुल अपनी मां जैसी बददिमाग हो गई हो और उसी के जैसे वाहियात लहजे में बातें भी करती हो. पिता होने के नाते मैं तुम से दूर नहीं हो सकता, वरना तुम्हारा बात करने का ढंग मुझे बिलकुल पसंद नहीं है.’’

‘‘आप दूर जाने की बात मत करिए, क्योंकि आप की सैकंड वाइफ ने आप को मुझ से पहले ही बहुत दूर कर दिया है.’’

‘‘देखो, यह चेतावनी मैं तुम्हें अभी दे रहा हूं कि कल शाम तुम उस के साथ तमीज से पेश…’’

‘‘मैं कल आप के घर नहीं आ रही हूं. सुमित को किसी और दिन आप के औफिस ले आऊंगी.’’

‘‘तुम बहुत ज्यादा जिद्दी और बददिमा होती जा रही हो.’’

‘‘थैंक यू एेंड बाय पापा,’’ चिढ़े अंदाज में ऐसा कह कर अंकिता ने फोन काट दिया था.

अपने मूड को ठीक करने के लिए अंकिता ने पहले कुछ गहरी सांसें लीं और फिर सुमित से पूछा, ‘‘अब बताओ कि तुम्हें मेरे मातापिता कैसे लगे? क्या राय बनाई है तुम ने उन दोनों के बारे में?’’

‘‘अंकिता, मुझे उन दोनों के बारे में कोई भी राय बनाने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है. तुम्हें उन से जुड़ कर रहना ही है और मैं उन के साथ हमेशा इज्जत से पेश आता रहूंगा,’’ सुमित ने उसे अपनी राय बता दी.

उस का जवाब सुन अंकिता खुश हो कर बोली, ‘‘तुम तो शायद दुनिया के सब से ज्यादा समझदार इंसान निकलोगे. मुझे विश्वास होने लगा है कि हम शादी कर के खुश रह सकेंगे, पर…’’

‘‘पर क्या?’’

‘‘पर फिर भी मैं चाहूंगी कि तुम अपना फाइनल जवाब मुझे कल दो.’’

‘‘ओके, कल कब और कहां मिलोगी?’’

‘‘करने को बहुत सी बातें होंगी, इसलिए नेहरू पार्क में मिलते हैं.’’

‘‘ओके.’’

अगले दिन रविवार को दोनों नेहरू पार्क में मिले. सुमित की आंखों में तनाव के भाव पढ़ कर अंकिता ने मजाकिया लहजे में कहा, ‘‘यार, इतनी ज्यादा टैंशन लेने की जरूरत नहीं है. तुम मुझ से शादी नहीं कर सकते हो, अपना यह फैसला बताने से तुम घबराओ मत.’’

उस के मजाक को नजरअंदाज करते हुए सुमित गंभीर लहजे में बोला, ‘‘कल रात को किसी लड़की ने मुझे फोन कर राजीव के बारे में बताया है.’’

‘‘यह तो उस ने अच्छा काम किया, नहीं तो आज मैं खुद ही तुम्हें उस के बारे में बताने वाली थी,’’ अंकिता ने बिना विचलित हुए जवाब दिया.

‘‘क्या तुम उस के बहुत ज्यादा करीब थी?’’

‘‘हां.’’

‘‘तुम दोनों एकदूसरे से दूर क्यों हो गए?’’

‘‘उस का दिल मुझ से भर गया… उस के जीवन में दूसरी लड़की आ गई थी.’’

‘‘क्या तुम उस के साथ शिमला घूमने गई थी?’’

‘‘हां.’’

‘‘क्या तुम वहां उस के साथ एक ही कमरे में रुकी थी’’

उस की आंखों में देखते हुए अंकिता ने दृढ़ लहजे में जवाब दिया, ‘‘रुके तो हम अलगअलग कमरों में थे, पर मैं ने 2 रातें उस के कमरे में ही गुजारी थीं.’’

उस का जवाब सुन कर सुमित को एकदम झटका लगा. अपने आंतरिक तनाव से परेशान हो वह दोनों हाथों से अपनी कनपटियां मसलने लगा.

‘‘मैं तुम से इस वक्त झूठ नहीं बोलूंगी सुमित, क्योंकि तुम से… अपने भावी जीवनसाथी से अपने अतीत को छिपा कर रखना बहुत गलत होगा.’’

‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या कहूं. मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. तुम से शादी करना चाहता हूं, पर…पर…’’

‘‘मैं अच्छी तरह से समझ सकती हूं कि तुम्हारे मन में इस वक्त क्या चल रहा है, सुमित. अच्छा यही रहेगा कि इस मामले में तुम पहले मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं खुद नहीं चाहती हूं कि तुम जल्दबाजी में मुझ से शादी करने का फैसला करो.’’ बहुत दुखी और परेशान नजर आ रहे सुमित ने अपना सारा ध्यान अंकिता पर केंद्रित कर दिया.

अंकिता ने उस की आंखों में देखते हुए गंभीर लहजे में बोलना शुरू किया, ‘‘राजीव मुझ से बहुत प्रेम करने का दम भरता था और मैं उस के ऊपर आंख मूंद कर विश्वास करती थी. इसीलिए जब उस ने जोर डाला तो मैं न उस के साथ शिमला जाने से इनकार कर सकी और न ही कमरे में रात गुजारने से.

‘‘मैं ने फैसला कर रखा है कि उस धोखेबाज इंसान को न पहचान पाने की अपनी गलती के लिए घुटघुट कर जीने की सजा खुद को बिलकुल नहीं दूंगी. अब तुम ही बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए?

‘‘क्या मैं आजीवन अपराधबोध का शिकार बन कर जीऊं? तुम्हारे प्रेम का जवाब प्रेम से न दूं? तुम से शादी हो जाए, तो हमेशा डरतीकांपती रहूं कि कहीं से राजीव और मेरे अतीत के नजदीकी रिश्तों के बारे में तुम्हें पता न लग जाए?

‘‘मैं चाहती हूं कि तुम भावुक हो कर शादी के लिए ‘हां’ मत कहो. तुम्हें राजीव के बारे में पता है… मेरे मातापिता के तलाक, उन की जीवनशैली और उन के मेरे तनाव भरे रिश्तों की जानकारी अब तुम्हें है.

इन सब बातों को जान कर तुम्हारे मन में मेरी इज्जत कम हो गई हो या मेरी छवि बिगड़ गई हो, तो मेरे साथ सात फेरे लेने का फैसला बदल दो.’’

अंकिता की सारी बातें सुन कर सुमित जब खामोश बैठा रहा, तो अंकिता उठ कर खड़ी हो गई और बुझे स्वर में बोली, ‘‘तुम अपना फाइनल फैसला मुझे बाद में फोन कर के बता देना. अभी मैं चलती हूं.’’

पार्क के गेट की तरफ बढ़ रही अंकिता को जब सुमित ने पीछे से आवाज दे कर नहीं रोका, तो उस के तनमन में अजीब सी उदासी और मायूसी भरती चली गई थी.

आंखों से बह रही अविरल अश्रुधारा को रोकने की नाकामयाब कोशिश करते हुए जब वह आटोरिकशा में बैठने जा रही थी, तभी सुमित ने पीछे से आ कर उस का हाथ पकड़ लिया. उस की फूली सांसें बता रही थीं कि वह दौड़ते हुए वहां पहुंचा था.

‘‘तुम्हें मैं इतनी आसानी से जिंदगी से दूर नहीं होने दूंगा, मैडम,’’ सुमित ने उस का हाथ थाम कर भावुक लहजे में अपने दिल की बात कही.

‘‘मेरे अतीत के कारण तुम हमारी शादी होने के बाद दुखी रहो, यह मेरे लिए असहनीय बात होगी. सुमित, अच्छा यही रहेगा कि हम दोस्त…’’

उस के मुंह पर हाथ रख कर सुमित ने उसे आगे बोलने से रोका और कहा, ‘‘जब तुम चलतेचलते मेरी नजरों से ओझल हो गई, तो मेरा मन एकाएक गहरी उदासी से भर गया था…वह मेरे लिए एक महत्त्वपूर्ण फैसला करने की घड़ी थी…और मैं ने फैसला कर लिया है.

‘‘मेरा फैसला है कि मुझे अपनी बाकी की जिंदगी तुम्हारे ही साथ गुजारनी है.’’

‘‘सुमित, भावुक हो कर जल्दबाजी में…’’

उस के कहे पर ध्यान दिए बिना बहुत खुश नजर आ रहा सुमित बोले जा रहा था, ‘‘मेरा यह अहम फैसला दिल से आया है, स्वीटहार्ट. अतीत में किसी और के साथ बने सैक्स संबंध को हमारे आज के प्यार से ज्यादा महत्त्व देने की मूढ़ता मैं नहीं दिखाऊंगा. विल यू मैरी मी?’’

‘‘पर…’’

‘‘अब ज्यादा भाव मत खाओ और फटाफट ‘हां’ कर दो, माई लव,’’ सुमित ने अपनी बांहें फैला दीं.

‘‘हां, माई लव,’’ खुशी से कांप रही आवाज में अपनी रजामंदी प्रकट करने के बाद अंकिता सुमित की बांहों के मजबूत घेरे में कैद हो गई.

Best Hindi Story : यह सलीब – इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबे व्यक्ति की कहानी

Best Hindi Story : मैं  और बूआ अभी चर्चा कर ही रही थीं कि आज किसी के पास इतना समय कहां है जो एकदूसरे से सुखदुख की बात कर सके. तभी कहीं से यह आवाज कानों में पड़ी-

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,

यहां सब के सर पे सलीब है

कोई दोस्त है न रकीब है

तेरा शहर कितना अजीब है.

यहां किस का चेहरा पढ़ा करूं

यहां कौन इतने करीब है…

‘‘सच ही तो कह रहा है गाने वाला. आज किस के पास इतना समय है, जो किसी का चेहरा पढ़ा जा सके. अपने आप को ही पूरी तरह आज कोई नहीं जानता, अपना ही अंतर्मन क्या है क्या नहीं? हर इनसान हर पल मानो एक सूली पर लटका नजर आता है.’’

ये भी पढ़ें- धूमावती- भाग 2 : हेमा अपने पति को क्यूं छोड़ना चाहती थी

मैं ने कहा तो बूआ मेरी तरफ देख कर तनिक मुसकरा दीं.

‘‘सलीब सिर पर उठाने को कहा किस ने? उतार कर एक तरफ रख क्यों नहीं देते और रहा सवाल चेहरा पढ़ने का तो वह भी ज्यादा मुश्किल नहीं है. बस, व्यक्ति में एक ईमानदारी होनी चाहिए.’’

‘‘ईमानदार कौन होना चाहिए? सुनाने वाला या सुनने वाला?’’

‘‘सुनने वाला, सुनाने वाले की पीड़ा को तमाशा न बना दे, उस का दर्द समझे, उस का समाधान करे.’’

अकसर बूआ की बातों से मैं निरुत्तर हो जाती हूं. बड़ी संतुष्ट प्रवृत्ति की हैं मेरी बूआ. जो उन के पास है उस का उन्हें जरा भी अभिमान नहीं और जो नहीं उस का अफसोस भी नहीं है.

‘‘किसी दूसरे की थाली में छप्पन भोग देख कर अपनी थाली की सूखी दालरोटी पर अफसोस मत करो. अगर तुम्हारी थाली में यह भी न होता तो तुम क्या कर लेतीं? अपनी झोंपड़ी का सुख ही परम सुख होता है. पराया महल मात्र मृगतृष्णा है. सुख कहीं बाहर नहीं है…सुख यहीं है तुम्हारे ही भीतर.’’

ये भी पढ़ें- बदल गया जमाना

मुझे कभीकभी यह सब असंभव सा लगता है. ऐसा कैसे हो सकता है कि अपनी किसी सखी या रिश्तेदार महिला के गले में हीरे का हार देख कर उसे अपने गले में देखने की इच्छा न जागे.

एक दिन मेरी भाभी ने ऐसे ही कह दिया कि हीरा आजकल का लेटैस्ट फैशन है तो झट से अपने कुछ टूटेफूटे गहने बेच मैं हीरे के टौप्स खरीद लाई थी और जब तक पहन कर भाभी को दिखा नहीं दिए, हीनभावना से उबर ही नहीं पाई थी. बूआ को सारा किस्सा सुनाया तो पुन: मैं अनुत्तरित रह गई थी.

‘‘आज टूटेफूटे कुछ गहने थे इसलिए बेच कर टौप्स ले लिए…कल अगर कोई हीरों का सैट दिखा कर तुम्हारे स्वाभिमान को चोट पहुंचाएगा तो क्या बेचोगी, शुभा?’’

अवाक् रह गई थी मैं. टौप्स बूआ के हाथ में थे. स्नेहमयी मुसकान थी उन के होंठों पर.

‘‘ऐसा नहीं कह रही मैं कि तुम ने ये टौप्स क्यों लिए? यही तो उम्र है पहननेओढ़ने की. अपनी खुशी के लिए गहने बनाना अच्छी बात है. तुम ने तो टौप्स इसलिए बनाए कि तुम्हारी भाभी ने ऐसा कहा…अपने स्वाभिमान को किसी के पैरों की जूती मत बनाओ, शुभा. हम पर हमारी ही मरजी चलनी चाहिए न कि किसी भी ऐरेगैरे की.

‘‘तुम्हारा अहं इतना हलका क्यों हो गया? हीरे से ही औरत संपूर्ण होती है… यह तुम्हारी भाभी ने यदि कह दिया तो कह दिया. उस ने तुम से यह तो नहीं कहा था कि तुम्हारे पास हीरे नहीं हैं. क्या उस ने तुम्हारी तरफ उंगली कर के कहा था… जरा सोचो?’’

तनिक मुसकरा पड़ी थीं बूआ. मेरा माथा चूम लिया था और मेरे गाल थपक हाथ के टौप्स मेरे कानों में पहना दिए थे.

‘‘बहुत सुंदर लग रहे हैं ये टौप्स तुम्हारे कानों में. मगर भविष्य में ध्यान रहे कि किसी के कहे शब्दों पर पागल होने की जरूरत नहीं है. औरत की संपूर्णता तो उस के चरित्र से, उस के ममतामयी आचरण से होती है.’’

उसी पल मेरे मन से उन हीरों का मोह जाता रहा था. वह भाव कहीं नहीं रहा था कि मेरे पास भी हीरे हैं. अकसर वे नेमतें जिन पर एक आम इनसान इतरा उठता है, बूआ को खुशी का विषय नहीं लगतीं. अकसर बूआ कह देती हैं, ‘‘खुशी कहीं बाहर नहीं होती, खुशी तो यहीं होती है… अपने ही भीतर.

‘‘यही तो सलीब है…और सलीब किसे कहते हैं…अपने दुखों का कारण कभीकभी हम खुद ही होते हैं.’’

सलीब के बारे में खुल कर बूआ से पूछा तो वे समझाने लगीं, ‘‘क्यों अपनी सोच पर हर पल हम सारा संसार लादे रहते हैं…जरा सोचो. अपनी खुशी की खातिर तो हम कुछ भी संजो लें, खरीद लें क्योंकि वे हमारी जरूरतें हैं लेकिन किसी दूसरे को प्रभावित करने के लिए हम अपना सारा बजट ही गड़बड़ कर लें, यह कहां की समझदारी है. एक बहुत बड़ी खुशी पाने के लिए छोटीछोटी सारी खुशियां सूली पर चढ़ा देना क्या उचित लगता है तुम्हें?

‘‘हमें अपनी चादर के अनुसार ही पैर पसारने हैं तो फिर क्यों हमारी खुशी औरों के शब्दों की मुहताज बने.’’

बूआ का चेहरा हर पल दमकता क्यों रहता है? मैं अब समझ पाई थी. बात करने को तो हमारा परिवार कभीकभी बूआ की आलोचना भी करता है. उन का सादगी भरा जीवन आलोचना का विषय होता है. क्यों बूआ ज्यादा तामझाम नहीं करतीं? क्यों फूफाजी और बूआ छोटे से घर में रहते हैं. क्यों गाड़ी नहीं खरीद लेते?

सब से बड़ी बात जो अभीअभी मेरी समझ में आई है, वह यह कि बूआ किसी की मदद करने में या किसी को उपहार देने में कभी कंजूसी नहीं करतीं. पर अपने लिए किसी से सहायता तो नहीं मांगतीं, गाड़ी की जरूरत पड़े तो किराए की गाड़ी उन के दरवाजे पर खड़ी मिलती है, जरूरत पर उन के पास कोई कमी नहीं होती. तो फिर क्यों वे औरों को खुश करने के लिए अपनी सोच बदलें. बूआ के दोनों बच्चे बाहर रहते हैं. साल में कुछ दिनों के लिए वे बूआ के पास आते हैं और कुछ दिन बूआ और फूफाजी उन के पास चले जाते हैं. अपने जीवन को बड़े हलकेफुलके तरीके से जीती हैं बूआ.

एक बार ऐसा हुआ कि बच्चों की छुट्टियां थीं जिस वजह से मैं व्यस्त रही थी. लगभग 10 दिन के बाद फोन किया तो बूआ कुछ उदास सी लगी थीं. उसी शाम मैं उन के घर गई तो पता चला था कि फूफाजी पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. पड़ोसी से नर्सिंगहोम का पता लिया और उसी पड़ोसी से पता चला कि उस को भी कुछ दिनों के बाद ही इस घटना का पता चला था.

‘‘बहुत बहादुर हैं न बूआजी. हमें भी नहीं बुलाया. कम से कम मैं ही आ जाती.’’

रोना आ गया था मुझे. क्या मैं इतनी पराई थी. बचपन से जिस बूआ की गोद में खेली हूं, क्या मुसीबत में मैं उन के काम नहीं आती. क्या मुझ पर इतना सा भी अधिकार नहीं समझतीं बूआ. नाराजगी व्यक्त की थी मैं ने.

‘‘तुम क्या करतीं यहां…गाड़ी बुला ली थी. बाकी सब काम डाक्टर लोगों का था. दवा यहीं पर मिल जाती है. बाहर छोटी सी कैंटीन है, वहां से चाय, कौफी मिल जाती थी. अधिकार समझती हूं तभी तो चाहती हूं तुम अपने बच्चों पर पूरापूरा ध्यान दो. अभी उन के इम्तिहान भी आ गए हैं न.’’

बूआ के इस उत्तर से मेरा रोना बढ़ गया था, ‘‘अपने किस काम के जो वक्त पर काम भी न आएं.’’

फूफाजी मेरी दलीलों पर हंसने लगे थे.

‘‘अरी पगली, काम ही तो नहीं पड़ा न…जिस दिन काम पड़ा तुम ही तो काम आओगी न. तुम्हारा ही तो सहारा है हमें, शुभा. हमारे दोनों बच्चे तो बहुत दूर हैं न बिटिया…हम जानते थे पता चलते ही अपना सारा घर ताक पर रख भागी चली आओगी, इसीलिए तुम्हें नहीं बताया. हलका सा दिल का दौरा ही तो पड़ा था.’’

बूआफूफाजी यों मुसकरा रहे थे मानो कुछ भी नहीं हुआ. मेरा माथा जरा सा तप जाए तो जो बूआ मेरी पीड़ा पर पगला सी जाती हैं वे अपनी पीड़ा पर इतनी चुप हो गईं कि मुझे पता ही न चला. सदा दे कर जिस बूआ को खुशी होती है वही बूआ लेने में पूरापूरा परहेज कर गई थीं. किसी से ज्यादा उम्मीद करना भी दुखी होने का सब से बड़ा कारण है, यह भी बूआ का ही कहना है. किसी आस में जिया जाए, यह भी तो एक सलीब है न जिस पर हम खुद को टांग लेते हैं.

मेरी भाभी भी इसी शहर में हैं, लेकिन उन की आदत में बूआ से मिलना शुमार नहीं होता. उन की अपनी ही दुनिया है जिस में मैं और बूआ कम ही ढल पाते हैं.

‘‘भैया की और हमारी आय लगभग बराबर ही है, उसी आय में भाभी इतनी शानोशौकत कैसे कर लेती हैं जबकि मेरे घर में वह सब नहीं हो पाता. इतना बड़ा घर बना लिया भैया ने और हमारे पास मात्र जमीन का एक टुकड़ा है जिस पर शायद रिटायरमैंट के बाद ही घर बन पाएगा. लगता है हमें ही घर चलाना नहीं आता.’’

एक दिन बूआ से मन की बात कही तो बड़ी गहरी नजर से उन्होंने मुझे देखा था.

‘‘कितना कर्ज है तुम्हारे पति के सिर पर?’’

‘‘एक पैसा भी नहीं. ये कहते हैं कि मुझे सिर पर कर्ज रख कर जीना नहीं आता. रात सोते हैं तो सोने से पहले भी यही सोचते हैं कि किसी का पैसा देना तो नहीं. किसी का 1 रुपया भी देना हो तो इन्हें नींद नहीं आती.’’

‘‘और अपने भाई का हाल भी देख लो. सिर पर 50 लाख का कर्ज है. पत्नी की पूरी सैलरी कर्ज चुकाने में चली जाती है और भाई की दालरोटी और इतने बड़े घर की साजसंभाल में. बच्चों की फीस तक निकालना आजकल उन्हें भारी पड़ रहा है. घर में 3-3 ए.सी. हैं. इन गरमियों में बिजली का बिल 15 हजार रुपए आया था. रात भर तुम्हारा भाई सो नहीं पाता इसी सोच में कि अगर कोई आपातस्थिति आ जाए तो 2 हजार रुपए भी नहीं हाथ में…क्या इसी को तुम शानोशौकत कहती हो जिस में पति की हरेक सांस पर इतना बोझ रहता है और पत्नी समझती ही नहीं.

हीरों के गहने पहने बिना जिस की नाक नहीं बचती, क्या उस औरत को यह समझ में आता है कि उस का पति निरंतर अवसाद में जी रहा है. कल क्या हो जाए, इस का जरा सा भी अंदाजा है तुम्हारी भाभी को?’’

मैं मानो आसमान से नीचे आ गिरी. यह क्या सुना दिया बूआ ने. भैया भी मेरी तरह बूआ के लाड़ले हैं और अवश्य अपना मन कभीकभी खोलते होंगे बूआ के साथ, बूआ ने कभी भैया के घर की बात मुझे नहीं सुनाई थी.

‘‘शुभा, तुम आजाद हवा में सांस लेती हो. किसी का कर्ज नहीं देना तुम्हें. समझ लो तुम संसार की सब से अमीर औरत हो. तुम्हारी जरूरतें इतनी जानलेवा नहीं हैं कि तुम्हारे पति की जान पर बन जाए. ऐसे हीरे औरत के किस काम के कि पति की एकएक सांस शूल बन जाए. तुम्हीं बताओ, क्या तुम भी ऐसा ही जीवन चाहती हो?’’

‘न…’ अस्फुट शब्द कहीं गले में ही खो गए. मैं तो ऐसा जीवन कभी सोच भी नहीं सकती. शायद इसीलिए तब बूआ ने टौप्स लेने पर नाराजगी का इजहार किया था. वे नहीं चाहती थीं कि मैं भी भाभी के पदचिह्नों पर चलूं.

हम हर पल सलीब को सिर पर उठाएउठाए ही क्यों चलते हैं? सलीब उठाते ही क्यों हैं? इसे उतार कर फेंक क्यों नहीं देते?

हमारी अनुचित इच्छाएं, बढ़ती जरूरतें क्या एक सलीब नहीं हैं जिन पर अनजाने ही हमारी जान सूली पर चढ़ जाती है. आखिर क्यों ढोते हैं हम अपने सिर पर ‘यह सलीब

Relationship : पति की कमाई पर पत्नी का कितना हक

Relationship : पतिपत्नी में कमाई और खर्चों को ले कर कलह जब हद से गुजरने लगती है तो नतीजे किसी के हक में अच्छे नहीं निकलते. बात तब ज्यादा बिगड़ती है जब पति अपने घर वालों पर खर्च करने लगता है लेकिन क्या ऐसा करने से पत्नी को उसे रोकना चाहिए?

सोशल मीडिया पर अकसर वायरल होते इस जोक को पढ़ कर कोई भी खुद को मुसकराने से रोक नहीं पाता.
“एक पत्नी ने अपने पति से कहा, सुनो जी मुझे 3000 रुपए उधार दे दो, तुम्हारी सैलरी आते ही चुका दूंगी.”
एक खास बात है इस जोक में जो पतिपत्नी के बीच की आर्थिक आत्मीयता को दर्शाती है जो कि सफल और सुखद दांपत्य के लिए बेहद जरुरी है. लेकिन क्या यह सभी कपल्स को हासिल है तो इस सवाल का जवाब न में ही निकलता है और बताता है कि आज भी अधिकतर पत्नियां पैसों के लिए पति की मोहताज रहती हैं. आज भी मतलब एक ऐसे दौर से हैं जहां लड़कियां तेजी से शिक्षित और जागरूक हुई हैं. बड़ी तादाद में वे नौकरीपेशा भी हैं. मुमकिन है कमाउ पत्नियों को बातबात पर पैसों के लिए पति का मुंह न ताकना पड़ता हो लेकिन कड़वा सच यह भी है कि बड़े खर्चों और इन्वेस्टमेंट के लिए उन्हें भी पति की सहमति या अनुमति की दरकार रहती है.

इस पर विवाद अपेक्षाकृत कम होते हैं पर फसाद उन घरों में ज्यादा खड़े होते हैं जहां सिर्फ पति कमा रहा होता है. कमाउ पति को खर्चों और निवेश के लिए पत्नी की राय कितनी अहमियत रखती है यह उन के आपसी तालमेल और ट्यूनिंग पर निर्भर करता है. अगर ये दोनों न हों तो विवाद अकसर छोटेबड़े हादसों की शक्ल में सामने आते हैं जैसा कि बीती 30 जनवरी को भोपाल से आया.

इसलिए की पत्नी की हत्या

35 वर्षीय रविकांत वर्मा सीआरपीएफ भोपाल में तैनात हो कर सिविल कालोनी में रहते थे. घर उन की पत्नी रेणु वर्मा और 2 बच्चे थे. इस कपल के पास कहने को तो वह सब कुछ था जिस की जरूरत आजकल होती है लेकिन हकीकत में वह प्यार और आपसी समझ नहीं थी जो घर को घर बनाती है. दोनों में आएदिन कलह होती रहती थी. शादी के 8 साल हो चले थे जिस में से ज्यादातर वक्त इन्होंने कलह में ही गुजारा था. कलह भी कोई मामूली नहीं होती थी. आसपास के सारे लोग इस के गवाह या तमाशबीन कुछ भी कह लें होते थे.
बीती 30 जनवरी को भी इन दोनों में जम कर तूतूमैंमैं हुई. इस बार मुद्दा था रविकांत का अपनी भतीजी की शादी में कुछ पैसा खर्च कर देना जो रेणु को बरदाश्त नहीं हो रहा था. लेकिन यह उन की जिंदगी की आखिरी कलह साबित हुई क्योंकि अब दोनों ही दुनिया में नहीं हैं.

हादसे के दिन कोई एक बजे शराब के नशे में चूर रविकांत ने रेणु के जिस्म पर 2 गोलियां अपने सर्विस रिवाल्वर से दागी और फिर एक शरीफ शहरी की तरह फोन कर पुलिस को इन्फौर्म भी कर दिया कि मैं ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी है. पुलिस आई लेकिन तब तक रविकांत ने खुद को भी गोली मार ली थी. दोनों बच्चे दूसरे कमरे में सो रहे थे. इस के बाद शुरू हुआ इन्वेस्टिगेशन और चर्चाओं का दौर कि यह भी भला कोई आत्महत्या और हत्या कर देने वाली बात थी. ऐसे झगड़े तो आएदिन पतिपत्नियों में होते रहते थे.

जड़ में है पैसा

यह सही है कि पतिपत्नी के विवाद, झगड़ों, अलगाव और तलाक की बड़ी वजह पैसा होता है. दोनों पैसे को अपने तरीके से इस्तेमाल करना चाहते हैं और एकदूसरे को गलत ठहराते रहते हैं. यही रवि और रेणु के बेवकूफी भरे दुखद मामले में हुआ था. यह कोई नई या अनूठी बात नहीं थी जिस में पत्नी चाहती है कि पति अपने घर वालों पर पैसा खर्च न करे लेकिन ऐसा होता नहीं है. इसे दुनियादारी के नजरिए से देखें तो पेरैंट्स और घर के मोह से कोई लड़का या पति पूरी तरह उबर नहीं पाता.

उस की जिंदगी की शुरुआत जिस घर से होती है उस के प्रति उस में एक अलग की तरह की कशिश होती है. शादी के बाद पत्नी अगर चाहे कि पति वह सब कुछ भूल जाए तो यह किसी भी पति के लिए मुमकिन नहीं होता. बात ज्यादा तब बिगड़ती है जब पैसा बीच में आने लगता है. पत्नी नहीं चाहती कि पति घर वालों पर खर्च करे जबकि पति के मन में यह भावना रहती है कि जिन लोगों ने मुझे पैदा किया, बेहतर परवरिश दी, पढ़ायालिखाया और भी न जाने क्याक्या किया उन के किए कुछ हिस्सा अगर पैसों से चुका सकूं तो यह मेरा फर्ज है. कृतज्ञता का यह भाव गलत कहीं से नहीं है जिस पर पत्नी के स्वार्थ का ग्रहण लगता है तो जिंदगी दुश्वार हो जाती है.

पत्नी जब इसे इशू बना लेती है तो पति 2 पाटों के बीच फंस जाता है. एक तरफ उस का गुजरा कल होता है और दूसरी तरफ भविष्य होता है. इन में तालमेल बैठाने में अकसर वह लड़खड़ा जाता है. उस से न वह छोड़ा जाता और न ही यह छोड़ा जाता. लेकिन एक बड़ा फर्क यह आ रहा है कि पहले के पति, पत्नी के मुकाबले घर वालों पर ज्यादा तबज्जुह देते थे और आजकल के पतिपत्नी और बच्चों को प्राथमिकता में रखते हैं. फर्क तो यह भी है कि उसे यह जिम्मेदारी निभाने के लिए पेरैंट्स या घर वाले रोकतेटोकते नहीं हैं उलटे प्रोत्साहित ही करते हैं.

नए दौर के पतियों को कोई जोरू का गुलाम कहते ताना नहीं मारता जो 3 दशक पहले तक बेहद आम हुआ करता था. यह संयुक्त परिवारों के दौर की बात है जो आजकल न के बराबर देखने में आते हैं अब तो लड़का कालेज में दाखिला लेते ही पराया मान लिया जाता है क्योंकि नौकरी करने के लिए उसे बाहर ही रहना होता है.

हाउसवाइव्स रहती हैं परेशान

बेटा बाहर यानी बहू भी उस के साथ ही बाहर जो 90 फीसदी मामलों में नौकरीपेशा होती है. झंझट रविकांत और रेणु जैसे कपल्स के मामलों में ज्यादा होती है जिन में पत्नी हाउसवाइफ रहती है और खुद की तुलना जौब वाली पत्नियों से करने लगती हैं. जाहिर है उन की जिंदगी उसे बहुत सुहानी और आजाद लगती है कि क्या ठाट हैं इन के. दोनों खूब कमाते हैं और खर्च करते हैं. जाहिर यह भी है कि ऐसी महिलाओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे नौकरीपेशा कपल्स की कठिनाईयों को समझेंगी.

इन पत्नियों को लगता है कि अब पति की जिंदगी और कमाई पर सिर्फ उन का ही हक है. पति ये दोनों देने में नहीं हिचकिचाता पर सौ फीसदी देना उस के लिए संभव नहीं होता इसलिए वह चाहता है कि कुछ पैसा घर पर भी खर्च किया जाए.

वह अपनों के उपकार और प्यार को नहीं भुला पाता और उस की कीमत कुछ पैसे खर्च कर चुकाना चाहता है तो गलत कहीं से नहीं होता और किसी पत्नी को यह हक नहीं जाता कि वह पति को इस बाबत रोकेटोके और कोसे और अगर ऐसा वह करती है तो खुद ही अपने वैवाहिक जीवन में आग लगा रही होती है जिस की आंच में काफी कुछ झुलसता है.

बात अगर वक्त रहते न संभले तो लगातार बिगड़ती ही जाती है क्योंकि पति का सोचना यह रहता है कि सब कुछ तो इन्हीं लोगों यानी अपनी पत्नी व बच्चों के लिए कर रहा हूं. अब अगर तीजत्यौहार शादीब्याह वगैरह में घर वालों की थोड़ी मदद कर दी, कुछ पैसा खर्च कर दिया तो कौन सा गुनाह कर दिया. आगे कभी जरूरत पड़ी तो भी काम मांबाप भाईबहन ही आएंगे और क्या मेरी कमाई पर खुद मेरा भी इतना हक नहीं कि अपनी मर्जी से खर्च कर सकूं. यह ख्याल दिल में आते ही उसे पत्नी दुश्मन नजर आने लगती है जबकि उस से बेहतर दोस्त कोई और हो ही नहीं सकता.

इलाज क्या

लेकिन ऐसी पत्नी दोस्त साबित नहीं हो पाती जो पति की इन फीलिंग्स को न समझे. उसे लगता है कि पति अपनी कमाई घर वालों पर उड़ा रहा है तो वह कुंठित और असुरक्षित हो उठती है. कई बार तो वह पति के प्रति इतनी पजेसिव हो जाती है कि बातबात में शक करने लगती है कि ये मुझ से छिप कर घर वालों को पैसा दे रहे हैं. पति से पूछती है तो उस का झल्लाना स्वभाविक बात है.
इस की दूसरी स्टेज होती है पत्नी का यह चाहने लगना कि पति घर वालों से ज्यादा बात न करे. इस के लिए वह अकसर पति को फोन भी चेक करने लगती है कि कहीं वह घर वालों के ज्यादा संपर्क में तो नहीं. ऐसे में वह पति से शिकायत करती है या सफाई मांगती है फिर पति भी भड़क उठता है.

वह दौर कभी का गुजर चुका है जिस में बेटा पूरी कमाई मांबाप के हाथ में रख देता था और पत्नी ताकती रह जाती थी. अब पत्नी की परिवार आर्थिक भागीदारी या भूमिका बढ़ी है लेकिन इतनी नहीं कि वह पुराने जमाने की सास की तरह घर की वित्त मंत्री हो जाए.

परिवार एकल हो या संयुक्त पत्नी को खर्च और जरूरत के लिए मुनासिब पैसे मिलते हैं, सास की गैरमौजूदगी में घर वही चलाती है. ऐसे में वह अगर चाहे कि पति अपनी मर्जी से खर्च ही न करे तो कलह तो होगी जिस से बचने कुछ टिप्स यहां दिए जा रहे हैं-

पति के लिए

-पति यह समझे कि उस की कमाई पर हक जमा कर पत्नी कोई गुनाह नहीं कर रही. यह बेहद स्वभाविक मनोवृति है आप की कमाई पर आप के बाद पहला हक उसी का बनता है.
– हर खर्च में पत्नी की सलाह लेना एक अच्छा रास्ता है जिस से पत्नी को अपने वजूद और बराबरी का एहसास होता है.
– घर वालों पर जो भी खर्च करें वह पत्नी की जानकारी में होना चाहिए. अगर वह एतराज जताए तो उसे समझाएं कि ऐसा क्यों किया जा रहा है.
– घर वालों के लिए पत्नी की उपेक्षा न करें, इस से उस की जलनकुढ़न बढ़ती है.
– पत्नी को खर्च करने का अधिकार दें, इस से वह किफायत से चलेगी.
– जब कभी ससुराल में खर्च करने की नौबत आए तो नानुकुर न करें. याद रखें मायके में पत्नी की शान इस से बढ़ती है और उस का आत्मविश्वास व आप के प्रति प्यार सम्मान भी बढ़ता है.

पत्नी के लिए

पति अगर घर वालों पर खर्च करे तो उसे ज्यादा रोकेटोके नहीं. यह याद रखें कि आप से इतर भी उस के कुछ फर्ज और जिम्मेदारियां हैं जिन में हाथ बटाने से उसे खुशी और संतुष्टि ही मिलेगी.
– अगर आप को लगता है कि पति घर वालों पर जरूरत से ज्यादा खर्च कर रहा है या पैसों के बाबत उसे घर वाले इमोशनली ब्लैकमेल कर रहे हैं तो समझ और सब्र से काम लें. उसे उन की नीयत और अपने घर की जरूरतों और जिम्मेदारियों का एहसास कराएं.
– वक्त रहते कोई बड़ा इन्वेस्टमेंट करने के लिए पति को राजी करें, मसलन होम लोन या कार लोन ले लेना इस से नियमित किश्त जाएगी तो उसे सीमित पैसे में खर्च करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.
– कलह कर या परेशान कर पति को उस के घर वालों पर खर्च करने से रोकने की कोशिश अकसर बेकार जाती है. अगर वह मान भी जाएगा तो आप के प्रति पहले सा नहीं रह पाएगा.
– बचत नगद करने के बजाय सोना आदि खरीदें. नगदी पास में देख कर घर वाले तो क्या हर कोई बालूशाही की मक्खियों की तरह मंडराने लगता है.
– अगर घर वालों से पति की नजदीकियां जरूरत से ज्यादा बढ़ रही हैं तो उस का ध्यान कहीं और बटाएं सीधे ऐसा करने से न रोकें.
– बातबात में पति के घर वालों की आलोचना न करें, इसे वह अन्यथा ले सकता है.

Marriage : शादी से पहले अगर लड़के या लड़की की हो जाए अचानक मृत्यु

Marriage : शादी से पहले यदि किसी लड़की या लड़के की अचानक मृत्यु हो जाए तो परिवार वाले से अधिक ट्रामा उस के पार्टनर को झेलना पड़ता है, उसे गहरा आघात लगता है. ऐसे में कैसे डील करें.

इकलौती बेटी पूनम की शादी की सारी तैयारियां हो चुकी थीं. 15 दिन बाद उस की शादी दा. आलोक से होने वाली थी. वह खुश थी और खूब सारी शौपिंग भी कर चुकी थी. उसे अधिक खुशी इस बात से भी थी कि वह अपने मनपसंद साथी आलोक के साथ शादी कर रही थी, जिसे वह पिछले 10 सालों से जानती थी.

आलोक से हर दिन उस की बातचीत औफिस जाते हुए हो जाया करती थी, जिस में वह पूरे दिन की प्लानिंग का जिक्र करती थी, लेकिन जब आलोक का फोन एक सोमवार की सुबह नहीं आया, तो पूनम चिंता में पड़ गई. उस ने कई बार आलोक को फोन किया, उस का फोन बज रहा था, लेकिन कोई उठा नहीं रहा था, फिर उस ने आलोक के पेरैंट्स और बहन को फोन किया, कोई फोन उठा नहीं रहा था. पूनम को लगने लगा कि कुछ गड़बड़ है, उस ने अपनी मां को फोन किया, तो पता चला कि आलोक को ले कर सभी अस्पताल गए हैं, वह भी उन के पिता के साथ वहीँ जा रही है.
पूनम औफिस से छुट्टी ले कर घर पहुंचती है, तो पता चलता है कि उस के होने वाले पति आलोक को सांप ने डस लिया है. जब रात में उस की उल्टी शुरू हुई, असहज महसूस हुआ और बेहोश हो गया, तो सभी डर गए और उन्हें ले कर अस्पताल पहुंचे. डाक्टर ने इसे करैत बाइट बताया, जिस का इलाज किया गया और 7 दिन के बाद आलोक ठीक हो गया और उस की शादी पूनम से हो गई.

परिवार की एलर्टनेस ने बचाई जान

दरअसल आलोक को परिवार वालों की एलर्टनेस की वजह से समय पर इलाज मिला, जिस से वह ठीक हो गया. इस बारे में स्नेक बाइट एक्सपर्ट डाक्टर सदानंद राऊत कहते हैं कि यहां आलोक को इसलिए बचाया जा सका, क्योंकि उस के परिवार वाले समय से अस्पताल पहुंचे हैं जिस से उन्हे एंटी वेनम और वेनटिलेटर पर रख कर बचाया जा सका. थोड़ी सी देर होने पर उस की जान जा सकती थी, क्योंकि उसे काटने वाला सांप सब से अधिक विषाक्त होता है, जिस में समय पर इलाज न मिलने पर रोगी की मृत्यु हो जाती है.

डाक्टर आगे कहते हैं कि असल में सांप अधिकतर यंग बच्चों और टीनेजर्स को ही काटते हैं. आलोक की जिंदगी परिवार के लिए कीमती रही साथ ही उस की होने वाली पत्नी पूनम भी सदमें से बच गई.

ऐसा देखा गया है कि करैत अधिकतर रात के अंधेरे में चूहों का शिकार करने के लिए निकलते हैं, ऐसे में नीचे लेटे हुए किसी भी व्यक्ति के ऊपर से गुजरता है, व्यक्ति के थोड़ा सा हिलने पर वह उसे डस लेता है.

करैत अधिकतर रात के 12 बजे के बाद से सुबह 5 बजे तक में ही काटता है, इस के काटने में अधिक लक्षण नहीं दिखाई, न ही अधिक सूजन होती है और न ही खून निकलता है, ऐसे में इंसान इसे चींटी या चूहे की बाइट समझते हैं और झाड़फूंक या आयुर्वेदिक दवाइयां लेते हैं, जिस से रोगी को बचाना मुश्किल होता है. इस में रोगी को पहले उलटी, कन्वल्शन, बेहोशी, कोमा और फिर मृत्यु होती है.

मातम का माहौल

यहां पर पूनम को उस का पति मिल गया, लेकिन नीलिमा के साथ ऐसा नहीं हुआ. उस के होने वाले पति गिरीश की शादी से 2 दिन पहले अचानक हार्ट अटैक में मृत्यु हो गई. मृत्यु के पिछले रात को सारा परिवार शादी की खुशियां मना रहा था. गिरीश भी सब के साथ डांस करना और गाने गा रहा था, लेकिन उस की ये खुशी उस पर ही भारी पड़ी. रात को सोया गिरीश सुबह न उठा. अस्पताल ले जाने पर डाक्टर ने उसे हार्ट एटैक का केस बताया और मृत घोषित किया.

कुछ घंटे बाद जहां परिवार को रंगबिरंगे कपड़े पहन कर जश्न मनाना था, वहीं सादे श्वेत वस्त्रों में इकट्ठा हुआ. सभी के चेहरे दुख और पीड़ा से भरे हुए थे. किसी को समझ नहीं आ रहा था सांत्वना किसे, कैसे दिया जाए. मातापिता का इकलौता संतान अब इस दुनिया में नहीं रहा. जिस होटल में शादी की खुशियां मनाई जाने वाली थी, वहीं मातम मनाया गया.

लगता है भारी सदमा

उत्तर प्रदेश के हाथरस के गांव भोजपुर निवासी शिवम से मोहिनी की पिछले साल तय हुई थी. कृष्णाबाग कालोनी स्थित मैरिज होम में बरात आनी थी. हाथरस में भात की रस्म के दौरान नाचतेनाचते शिवम गिर गया और उस की हार्ट एटैक हो गई. शिवम की मौत की खबर दुल्हन के घरवालों को मिली तो मानो उन पर वज्रपात हो गया.

मनपसंद की शादी तय होने पर मोहिनी ने बड़े सपने संजोए थे कि एकदूसरे का हाथ कभी नहीं छोड़ेंगे. शिवम की मौत की खबर सुनते ही मोहिनी की तबीयत बिगड़ गई. उस ने खाना छोड़ दिया. सदमा इतना गहरा था कि वह किसी से बात नहीं करती थी. अपने हाथों में लगी मेहंदी को देख कर चीख उठती कि मैं भी शिवम के पास जाऊंगी.

मोहिनी के पिता बनी सिंह जूता फैक्टरी में मजदूरी कर महज 12 हजार रुपये कमाते हैं. मोहिनी की शादी के लिए ओवरटाइम काम कर के रुपये इकट्ठे किए थे. जमीन भी गिरवी रख कर इंतजाम किया. इस हादसे से दोनों परिवार में मातम छा गया.

शादी से पहले ऐसी अचानक हुई दुर्घटना हर किसी के लिए सदमे जैसा होता है, लेकिन इस से निकलना जितना मुश्किल पेरैंट्स को होता है, उस से कहीं अधिक उस लड़की या लड़के के लिए होता है, जो उस विवाह बंधन में बंधने जा रहे थे. उन के जीवन की नई शुरुआत होने वाली थी, जो बीच में हादसे का शिकार हो गए.

जानें एक्सपर्ट राय

इस बारे में मनोवैज्ञानिक राशीदा कपाडिया कहती हैं कि शादी से चंद दिन पहले लड़के या लड़की में किसी एक की अचानक मृत्यु हो जाने पर बहुत बड़ा ट्रोमा में बचे हुए लड़का या लड़की और पूरा परिवार चला जाता है, क्योंकि अगर किसी लड़के की डेथ शादी से ठीक पहले हुई है, तो पूरा परिवार लड़की को अपशकुन समझने लगते हैं और उस की शादी बाद में होना मुश्किल हो सकता है और लड़की के दुख को लोग कम समझ पाते हैं.

जबकि शादी से पहले किसी लड़की की अचानक मृत्यु को परिवार वाले भले ही उतनी गंभीरता से न लें, लेकिन अगर उस लड़के ने उस लड़की से प्यार किया हो और उस की मृत्यु हो गई हो, तो उसे गहरा आघात लगता है और कई बार लड़का बाद में किसी लड़की से शादी करने से भी इनकार करता है, क्योंकि विवाह उन के संबंधों की एक नई शुरुआत होती है. ऐसे में कुछ बातों का उन्हें ध्यान देने की जरूरत है, ताकि फिर से वे नई जिंदगी की शुरुआत कर सकें, सुझाव निम्न है,

* कई बार लड़कियां या लड़के डिप्रेशन में जा सकते हैं. कुछ बुरी आदतों का शिकार हो सकते हैं, ऐसे में जरूरी है कि वह अपने परिवार वालों या दोस्तों के बीच रहें, ताकि उन्हें उन का सहारा मिलता रहे.

* अकेले कभी न रहें, अकेलापन व्यक्ति के जीवन का सब से खराब दौर होता है, जो व्यक्ति उन्हें अबतक सहयोग देता आया है और साथ रह सकता है. उन से बातचीत करते रहना चाहिए और अधिक से अधिक समय बिताते रहना चाहिए. सदमे के लिए 30 दिन से अधिक समय खुद को न दें और उस से निकल कर दैनिक काम काज में लग जाना चाहिए, मसलन घर के काम, वर्कआउट, जौब या बिजनैस आदि जो भी हो उसे करें और पुरानी रूटीन को फौलो करते रहना चाहिए. उन्हें पीछे हटना नहीं चाहिए.

* स्वास्थ्य पर ध्यान दें, संतुलित आहार लें, जंक फूड को अवौइड करें, क्योंकि ये किसी भी लड़के और लड़की के जीवन का सब से कठिन दौर होता है, जो समय के साथसाथ ठीक होता चला जाता है, लेकिन इस में सब से अधिक मानसिक संतुलन बिगड़ता है, जिस से शारीरिक समस्या उत्पन्न होती है.

* इस समय अधिकतर युवा को अपने कजिन्स या अच्छे दोस्त का सहयोग लेना चाहिए, क्योंकि कई बार ऐसी दुर्बल मानसिक अस्थिरता में आसपास के गलत लोग उन्हें सहानुभूति दिखाने लगते हैं, जो पहले तो अच्छा लगता है, लेकिन बाद में कई बार घातक हो सकता है. फिर से दिल टूटने के चांसेज रहते हैं.

अपने अनुभव के बारे में राशिदा कहती हैं कि कई बार ऐसा भी देखा गया है कि शादी वाले लड़के की मृत्यु के बाद उस की शादी दोनों परिवार राजीखुशी से कुछ दिनों बाद उस के बड़े या छोटे भाई के साथ करवा देते हैं, क्योंकि शादी की तैयारी लोग कई महीनों या सालों पहले से करने लगते हैं. पेरैंट्स एक बड़ी धनराशि इस पर खर्च किए होते हैं. ऐसे में लड़की को थोड़ी समस्या उस लड़के से सामंजस्य बिठाना होता है, जो कुछ दिनों बाद ही ठीक हो पाता है.

वैसे ही अगर किसी लड़की की मृत्यु शादी से तुरंत पहले हुई हो तो लड़के की शादी उस की बड़ी या छोटी बहन से करवाते हैं, लेकिन ऐसा तभी संभव होता है, जब परिवार में कोई बिनब्याही लड़की या लड़का हो. आज के परिवार में ये करना संभव नहीं होता, क्योंकि अधिकतर लड़के या लड़की अपने पेरैंट्स के अकेले संतान होते हैं. साथ ही लड़की या लड़के की रजामंदी भी आज बहुत बड़ी बात होती है.

इस प्रकार शादी से तुरंत पहले लड़के या लड़की की मृत्यु एक बड़ा हादसा है, जिसे पूरे परिवार के साथसाथ लड़की और लड़का दोनों को ही मानसिक समस्या से गुजरना पड़ता है. ऐसे में जरूरत होती है, धैर्य और मानसिक शांति को बना कर आगे बढ़ने की, जिस में परिवार का साथ देना बहुत आवश्यक है, ताकि लड़का या लड़की उस हादसे से खुद को बाहर निकाल सकें.

Guest : ऐसे मेहमान न बनें

Guest : घर में मेहमान आते हैं तो चहलपहल बनी रहती है. लेकिन मेहमान अगर मेहमाननवाजी कराने में आए तो मेजबान के पसीने छूट जाते हैं और चिड़चिड़ापन होने लगती है. जरुरी है कि मेहमान कुछ एथिक्स का ध्यान रखें.

रेखा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, जब से उस ने सुना था कि उस के देवर के बेटे आशीष का एडमिशन पुणे के इंजीनिरिंग कालेज में हुआ है और देवर मोहित अपनी पत्नी रूपा और बेटी अंशिका के साथ उस के घर आ रहे हैं, वह उत्साहित थी. रेखा की एक ही बेटी थी रूही,जो इस समय कनाडा में जौब करती थी. रेखा के पति मनोज औफिस के टूर पर काफी व्यस्त रहते थे तो वह अब यह सोच कर काफी खुश थी कि देवरानी भी दिल्ली से पहली बार उन के घर पुणे आ रही है, कुछ दिन सब साथ रहेंगें, बातें करेंगें, महफिल जमेगी, खूब अच्छा टाइम पास होगा. मायका ससुराल सब दिल्ली में था, किसी का जल्दी पुणे आना नहीं होता था.

पूरा परिवार आया, रेखा ने अच्छे होस्ट की तरह सब की खूब मेहमाननवाजी की. सब की पसंद की खूब चीजें बना कर तैयारी कर रखी थीं. आशीष हौस्टल चला गया, मोहित का परिवार एक हफ्ता रुकने वाला था. मनोज टूर पर थे. रेखा का टूबैडरूम फ्लैट था, अब रूही भी बाहर थी तो उस का रूम पूरी तरह से खाली था. उस के देवर ने कहा, “भाभी, हम रूही के रूम में ही रह लेंगें.”
“हां, अंशिका मेरे रूम में सो जाएगी.”
“नहीं, ताई जी! मैं तो मम्मीपापा के साथ ही सोऊंगी.”
“अरे, अंशिका! तीनों को एक ही बेड पर सोने में दिक्कत होगी. तुम्हारे ताऊजी भी बाहर हैं, आराम से तुम मेरे साथ सो जाओ!”
रूपा ने कहा, “रहने दो, भाभी! कोई गद्दा हो तो रूही के रूम में नीचे बिछा देंगें, अंशिका नीचे सो जाएगी. असल में हम चाहते हैं कि एक ही रूम में रहें. गद्दा है न?”
“हां, है! निकाल देती हूं.”
रूही के रूम में गद्दा नीचे बिछा दिया गया, तीनों एक ही रूम में अपना सामान सेट कर के आराम करने लगे. अब अगले कुछ दिन रेखा के हैरान होने की बारी थी. वे तीनों उसी रूम में दिनरात रहते, खानेपीने या नहानेधोने निकलते.
रूपा ने कहा, “भाभी, हमारा आप का खानेपीने का टाइम अलग है, हम आराम से बाद में खाते हैं, आप खा लिया करो.”
तीन मेहमानों के घर में होते हुए रेखा घर में हमेशा की तरह अकेले बैठ कर खा रही होती. यही होता रहा, वे लोग जरूरी काम से ही रूम से बाहर आते, अपने रूम में ही या तो फोन ले कर बैठे रहते या आपस में बातें करते रहते.

रूम का दरवाजा भी आधे से ज्यादा बंद ही रहता, अंदर से हंसनेखिलखिलाने की आवाजें आती रहतीं. रेखा इंतजार करती रहती कि कब सब साथ बैठेंगें, बातें करेंगें, धीरेधीरे उसे समझ आ ही गया कि उन के घर को बस किसी होटल की तरह ही यूज़ किया जा रहा है. मेहमानों को रहने खाने का ठिकाना ही चाहिए था. कोई अपनापन नहीं, कोई साथ बैठना नहीं, कुछ भी ऐसा नहीं हो रहा था कि किसी बात पर खुश हुआ जाए कि घर में कोई अपना आया है. निराश मन से अपने सारे फर्ज पूरे कर रेखा ने मेहमानों को विदा तो कर दिया पर उसे यह बात कई दिनों तक सालती रही.
यह एक वास्तविक जीवन का उदाहरण है, कहीं आप भी तो यह गलती नहीं करते?

वहीँ दूसरी तरफ लखनऊ की रहने वाली रेनू अपने घर एक मेहमान परिवार के आने का अपना सुखद अनुभव बताते हुए कहती हैं, “मेरे पति अमित के एक दोस्त सुहास, अपनी पत्नी मीरा और दो बच्चे कुहू और पराग के साथ हमारे घर एक हफ्ते रुके. वे पराग के एडमिशन के लिए आए थे. वह एक हफ्ता इतना अच्छा समय था कि याद रहेगा. वे हम सब के लिए कुछ न कुछ गिफ्ट लाए थे. हम सब ने खूब बातें की, घर परिवार की, पुराने दिनों की, फोन को एक तरफ रख दिया गया था. खूब हंसे, गपें मारीं. उन्होंने अपना एक भी सामान इधरउधर नहीं फैलाया. हम अपने रोज के काम अपने रूटीन से करते रहे, उन की तरफ से कोई परेशानी नहीं हुई. वे जब भी कहीं गए तो कुछ न कुछ खाने का सामान ले कर आए. जाते हुए हमारी मेड को अच्छी टिप भी दी, बीचबीच में भी उसे कुछ दे रहे थे. कहीं भी गए, टाइम से आए, देर हुई तो हमें इन्फौर्म कर दिया. उन के बच्चे बिलकुल फोन में नहीं लगे रहे, मेरा खूब हाथ बटाते रहे, खाना खा कर सब लोग टेबल से सामान उठा कर किचन में रखते, मुझे किसी मेहमान के आने पर इतना आराम कभी नहीं मिला था.

आजकल हर इंसान अपने जीवन में बहुत व्यस्त है, कोई किसी के घर जाता है तो मेजबान को भी कुछ तो असुविधा होती ही है, बड़े शहरों के फ्लैट्स की सीमित जगह में मेहमानों के लिए सब व्यवस्था करनी होती है, ऐसे में मेहमानों का भी फर्ज होता है कि कई बातों का ध्यान रखें, जैसे कि –

– छोटेछोटे कामों में हाथ जरूर बटांएं.

– अपने छोटेछोटे काम खुद ही करें.

– हो सके तो घर के खाने बनने के समय ही सब के साथ ही खाना खाने की कोशिश करें जिस से घर की महिला पूरा दिन सब के अलगअलग टाइम पर खाना खाने के कारण ज्यादा व्यस्त न रहे. मेजबान के घर के हिसाब से अपनी दिनचर्या व्यवस्थित करें.

– कहीं बाहर जाएं और खाना बाहर ही खा कर आने का प्रोग्राम हो तो स्पष्ट कर दें कि आप खाना घर में नहीं खाएंगे, कई बार मेजबान महिला को यह बात स्पष्ट नहीं होती तो उस की मेहनत बेकार चली जाती है. उन्हें अपने आनेजाने की जानकारी दें.

– मेहमान बनने का मतलब यह नहीं है कि हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहें. घरेलू कामों में सहयोग दें.

– जाने से पहले बिखरे कमरे को समेट दें, अपने पीछे गंदगी भरी निशानियां न छोड़ जाएं.

– हो सके तो रेनू के मेहमानों जैसे मेहमान बनें, फिर मेजबान आप को अपने घर बुलाने से कभी नहीं हिचकेगा.

Ujjain : अब सुर्ख़ियों में महाकाल दर्शन घोटाला, जानिए आप के दान का पैसा कैसे और कहां जाता है

Ujjain : उज्जैन के महाकाल मन्दिर दर्शन घोटाले की ऍफ़आईआर अभी दर्ज ही हो रही थी कि नई सनसनी वृन्दावन के इस्कान मन्दिर से आई कि यहाँ भी एक सेवादार करोड़ों का चूना लगाकर भाग गया. ऐसी खबरें हर उस मन्दिर से आए दिन आती रहती हैं जहाँ भक्तों की भीड़ उमड़ती है जाहिर है यह भीड़ भगवान को पैसा चढ़ाने ही आती है जिसे मन्दिर के ही सेवादार झटक लें तो हैरानी किस बात की.

उज्जैन के महाकाल मन्दिर में 15 दिसम्बर 2024 तक 165.82 करोड़ रु से भी ज्यादा का चढ़ावा आया था लेकिन यह 2023 के मुकाबले कोई 18.16 करोड़ रु कम था. इसका यह मतलब नहीं कि भक्तों और श्रद्धालुओं ने कोई कंजूसी (असल में समझदारी) अपनी तरफ से दिखाई थी बल्कि हकीकत यह है कि यहाँ के सेवादारों और जिम्मेदार लोगों ने ही भगवान के हिस्से के करोड़ों रु को अपना समझते घालमेल कर दिया था. साल भर के इस चढ़ावे की गिनती के 10 दिन बाद ही खबर आई थी कि दूसरे छोटे बड़े मन्दिरों की तरह महाकाल मन्दिर भी घोटालों से अछूता नहीं है.
क्या है यह अदभुद महाकाल घोटाला, कौन हैं ये घोटालेबाज और कैसे उन्होंने एन भगवान की नाक के नीचे से उन्हें ही करोड़ों का चूना लगा दिया , इस गोरखधंधे (असल में धंधे) को समझने से पहले यह समझना जरुरी है कि जब से इस मंदिर में महाकाल लोक बना है तब से चढ़ावे में भी रिकार्ड बढ़ोतरी हो रही है जो कि इस मन्दिर को चमकाने का असल मकसद सनातनियों का था . भाजपा सरकार ने करोड़ों अरबो रु लगाकर इस मन्दिर को भव्य रूप दिया और उसका प्रचार भी जमकर किया तो देश के कोने से लोग उज्जैन आने लगे.

अब कोई मन्दिर आए और दान दक्षिणा और चढ़ावे के नाम पर अपनी जेब ढीली न करे ऐसा होना तो मुमकिन नहीं . लिहाजा भक्तों ने आँख बंद कर महाकाल मन्दिर में अपने खून पसीने की कमाई का कुछ हिस्सा अर्पण किया और चलते बने . साथ ले गये उज्जैन की मशहूर दाल बाटी और उससे भी ज्यादा लजीज कचोरी के जायके के साथ मन्नत पूरा होने की झूठी आस और आश्वासन (असल में भ्रम) कि भगवान महाकाल कुछ पैसों के एवज में उनके दुःख दूर करेंगे , बेटे बेटी की नौकरी लगवाएंगे, जिनके ब्याह नहीं हो रहे उनके आंगन में शहनाईया बजवायेंगे , सुगर , केंसर , ब्लडप्रेशर और हार्टअटक जसी बीमारियों से दूर रखेंगे, बेओलादों के आंगन में किलकारियां गुन्जायेंगे, कर्ज उतारेंगे, कारोबार में बरकत दिलवाएंगे बगैरह बगैरह.

अपने हिस्से के दुःख और परेशानियाँ महाकाल के सर डालकर भक्त तो निकल लिए लेकिन घोटालेबाजों को घोटाला करने का मौका दे गए जिसे चूकने में घोटालेबाजों ने कोई कोताही नहीं बरती लेकिन उनके पाप के घड़े का साइज़ थोडा छोटा था सो जल्द ही धर लिए गये. 23 दिसंबर के अख़बारों में मोटे मोटे अक्षरों में खबर छपी कि महाकाल मन्दिर में दर्शन के नाम पर हो रही थी करोड़ों की हेराफेरी , सामने आया चौकाने बाला बड़ा घोटाला. घोटाला उजागर होने बाले दिन दो कर्मचारियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया. पहला था सफाई प्रभारी विनोद चौकसे और दूसरा था नंदी हाल का प्रभारी राकेश श्रीवास्तव. शुरुआती जांच में ही यह उजागर हो गया कि घड़े के मुकाबले घोटाले का साइज़ बड़ा है मामला चूँकि करोड़ों का था जिसे महज 2 अदने से मुलाजिम अंजाम नही दे सकते थे . इसलिए इस बिना पर जांच आगे बढ़ी तो छह और नाम सामने आए.

ये छह सूरमा थे आईटी सेल के इंचार्ज राजकुमार सिंह , सभा मंडप प्रभारी राजेंद्र सिसोदिया , प्रोटोकाल इंचार्ज अभिषेक भार्गव , भस्म आरती प्रभारी रितेश शर्मा और क्रिस्टल कम्पनी के जितेन्द्र पंवार और ओम प्रकाश माली. इन को भी गिरफ्तार कर लिया गया. ये पंक्तियाँ लिखे जाने तक जांच रेंग रही थी आगे मुमकिन है और भी आरोपी पकडाए जिन्होंने गुनाह तो भगवान के प्रति किया है लेकिन सजा इन्हें नीचे की अदालत देगी. इन सभी पर चार सौ बीसी और धारा 406 के तहत अमानत में खयानत का मामला दर्ज किया गया.

यह गिरोह कैसे दान के पैसे उड़ा रहा था यह भी कम दिलचस्प बात नहीं. महाकाल मन्दिर में अल सुबह भस्म आरती होती है जिसमे श्मशान से लाई गई ताजी राख का इस्तेमाल होता है. इस भस्म आरती का स्वभाविक तौर पर शिव के श्मशान साधक होने के चलते अपना अलग महत्व और आकर्षण है. इसलिए भक्त मुंह अँधेरे मन्दिर पहुँच जाया करते हैं.

मोटे तौर पर भक्तों को भस्म आरती के जरिये जीवन की क्षणभंगुरता का सन्देश देते दान के लिए उकसाया जाता है मसलन यह कि इस दुनिया में तुम्हारा क्या है , तुम क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जाओगे इसलिए दान कर पुण्य अर्जित कर लो , परलोक सुधार लो, शरीर नष्ट हो जाता है आत्मा अमर है आदि आदि. भस्म आरती के जल्द दर्शन लाभ के लिए श्रद्धालुओं को 200 रु की रसीद कटाना पडती है यह पैसा मन्दिर समीति के जरिये मन्दिर के खाते में पहुँचता है.

इधर घोटालेबाजों ने नश्वरता और क्षणभंगुरता के फलसफे से इत्तफाक नहीं रखा. उन्हें यह देख हैरानी होती थी कि भक्त इस दुर्लभ आरती को देखने 200 तो क्या 2000 और उससे भी ज्यादा पैसा देने तैयार रहते हैं लेकिन खत्म हो जाने के कारण उन्हें टिकिट नहीं मिलती तो उन्होंने भक्तों को बिना टिकिट 2 – 3 हजार में आरती देखने की व्यवस्था करने का गुनाह कर डाला. भगवान या आरती के दर्शन करा देना अपराध नहीं है बल्कि उसके पैसे खुद डकार जाना जुर्म है धर्म की भाषा में दान के पैसे को निर्माल्य कहा जाता है जिसे हडप कर जाना घोर पाप है सो पकड़े जाने के बाद यह गिरोह जेल में है अब आगे क्या होगा यह शंकर जाने या वह जज जो इनकी चारसौबीसी की सजा इन्हें देखा.

यह फर्जीबाड़ा या घोटाला आसानी से पकड़ में नहीं जाता अगर कलेक्टर उज्जैन नीरज सिंह जो मन्दिर प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष भी होते हैं को भस्म आरती से कम होती आमदनी पर शक नहीं होता. दूसरे गुजरात तरफ के कुछ श्रद्धालुओं ने शिकायत भी की थी कि उन्हें दान की रसीद नहीं मिली. इसलिए जाल फैलाया गया जिसमे ये घोटालेबाज फस गये . तो इस साल जो कम आमदनी महाकाल मन्दिर को हुई उसकी इकलौती वजह यह घोटाला था जिसमे समानांतर दर्शनों का सशुल्क इंतजाम सेवादारों ने कर रखा था. इन आठों ने इस कमाई को अपने खातों में तो जमा किया ही लेकिन एहतियात बरतते अपने परिवार बालों के बेंक खातों में भी यह पैसा डाला जिसकी जांच जारी है और प्रशासन इनकी जायदाद बेचकर मन्दिर का घाटा पूरा करने का प्लान बना रहा है .जांच का बड़ा मुद्दा आय से अधिक संपत्ति है. इनकी आय का पैमाना इनकी पगार है जो इन आठों को ओहदे के मुताबिक 20 से 40 हजार रु तक मिल रही थी.

उज्जैन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का गृह नगर है इसलिए भी इस दर्शन घोटाले की चर्चा ज्यादा हो रही है जिसमे एक बड़ा तबका यह दलील दे रहा है कि इसमें हर्ज क्या है अगर पैसे देकर ही भगवान के दर्शन करना है तो लोग अपनी हैसियत के मुताबिक देंगे ही दूसरी चर्चा यह रही कि इस घोटाले के तार उपर तक जुड़े हैं वहां मुनासिब हिस्सा नहीं पहुंचा होगा इसलिए प्यादों को सबक सिखा दिया गया.

इस खुलासे से भक्तों को यह एहसास हुआ या नहीं यह तो वे ही जाने कि वे जो पैसा चढ़ाते हैं वह भगवान तक नही पहुँचता क्योंकि भगवान को पैसों की क्या जरूरत हाँ उसके नीचे बालों जायज और नाजायज दोनों किस्म के दलालों को जरुर इस पैसे की जरूरत रहती है क्योंकि वे सांसारिक हैं घर गृहस्थी बाले हैं जो रोज रोज यह भी महसूसते हैं कि अरबों के इस चढ़ावे से उपर बाले को कोई सरोकार नहीं है तो क्यों न इस बहती गंगा में हम ही थोड़े बहुत ही सही हाथ धो लें.

आप मन्दिर या दूसरे धर्म स्थल जाकर पैसा क्यों चढ़ाते हैं यह सवाल बेहद अचकचा देने बाला हर किसी के लिए है जिसके कई जबाब हैं. लेकिन हकीकत यह है कि उपर बाले का डर दान दक्षिणा के लिए मजबूर करता है. हैरानी की बात तो यह है कि इस उपर बाले का कोई वजूद कभी साबित नहीं हुआ है. यह डर धर्म ग्रंथो के जरिये धर्म के दुकानदारों ने फैला रखा है जिससे उनकी रोजी रोटी चलती रहे. यह मुफ्त का चन्दन हर धर्म का रोग है जिससे करोड़ों निकम्मे फल फूल रहे हैं वर्ना तो मामूली अक्ल रखने बाला भी बेहतर जानता है कि मूर्तियों और पत्थर से बने धर्म स्थलों को पैसे से कोई लेना देना नहीं.

अक्सर लोगों के लिए इस हकीकत को स्वीकारना भी कठिन होता है कि धर्म दुनिया का सबसे बड़ा कारोबार है जो निर्बाध 24 X 7 चलता है. लेकिन इसकी रीढ़ वही दान दक्षिणा और चढ़ावा है जिसमें से उज्जैन के घोटालेबाजों ने अपना हिस्सा शायद यह सोचकर ले लिया था कि भक्तों को दर्शन कराना और आरती में शामिल करवाना कम से कम उपर बाले की निगाह में तो अपराध नही हो सकता जो धन का नहीं भाव का भूखा होता है .

इस लिहाज से तो ये गलत कुछ नहीं कर रहे थे उलटे पुण्य का ही काम कर रहे थे लेकिन मन्दिरों में भी उपर बाले के न्याय की नहीं बल्कि संविधान के बनाये कानूनों की धाराएँ चलती हैं. इसलिए आठों इंडियन पीनल कोड की धाराओ के तहत सजा भुगतेंगे. लेकिन नाजायज तरीके से दान ( असल में घूस ) देकर भगवान के दर्शन करने बालों से कोई यह भी नहीं पूछता कि आपने नाजायज पैसे क्यों दिए और ऐसा कर आप क्या साबित करना चाहते थे जब हर मन्दिर में दान पेटियां रखी हैं तो पैसे उसमे ही क्यों नहीं डालते जबकि मन्दिर में जगह जगह लिखा होता है कि पैसा दान पेटी में ही डालें किसी को न दें. साफ़ दिख रहा है कि मन्दिरों में भी भ्रष्टाचार है या यह कि पैसे को कलयुग का भगवान गलत नही कहा जाता जिससे आप सेवादारों का भी इमान डगमगा सकते हैं. असल में इन लोगों में भी आस्था नहीं होती जो एक मूर्ति को देखने गवारों की तरह धक्का मुक्की करते हैं गाली गलोच करते हैं सेवादारों सिक्योरटी बालों सहित पंडे पुजारियों की भी झिडकियां और बदतमीजियां प्रसाद की तरह गप कर जाते हैं.

यह सोचना भी बेमानी और नादानी है कि ऐसे घपले घोटाले कुछ ही मन्दिरों में होते हैं . हकीकत में हर मन्दिर में ऐसा होता है. छोटे मन्दिर चूँकि घोषित अघोषित तौर पर पुजारी की मिल्कियत होते हैं इसलिए उनमे विवाद कम ही होते हैं दान दक्षिणा का सारा पैसा पुजारी की आमदनी होता है फसाद और घोटाले उन बड़े ब्रांडेड मन्दिरों में जहाँ ज्यादा गुड होगा वहां मक्खियाँ भी ज्यादा भिनभिनायेंग की तर्ज पर ज्यादा होते हैं जिनका सालाना टर्न ओवर करोड़ों अअरबों खरबों का होता है . कैसे मन्दिरों से जुड़े लोग ही घोटालों को बिना भगवान से डरे अंजाम देते हैं इसे समझने समझाने कुछ ताजे उदाहरण यों हैं –

– अभी उज्जैन के महाकाल दर्शन घोटाले की जांच चल ही रही थी कि 4 जनबरी को वृन्दावन इस्कान मन्दिर से भी दान की रकम में करोड़ों का घपला उजागर हुआ. इस भव्य और महंगे मन्दिर के सदस्यता विभाग का कर्मचारी मुरलीधर दान के कई करोड़ रु हडप कर फरार हो गया. जांच में उजागर हुआ कि मन्दिर के एकाउंट्स डिपार्टमेंट ने मुरलीधर को 32 रसीदे बुक दी थीं जिनके जरिये उसने भक्तों से करोड़ों रु वसूले लेकिन मन्दिर के खाते में जमा नहीं किये. इस पर मन्दिर प्रबंधन के विश्व्नाम दास ने पुलिस में शिकायत की . इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पुलिस आरोपी के संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही थी .

– दान घोटालों की सीरिज में करोड़ों का ही एक बड़ा घपला अप्रेल 2023 में उजागर हुआ था टीडीपी यानी तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम का एक कर्मचारी सीवी रवि कुमार श्रीवारी हुंडी से नगद ले जाते हुए रँगे हाथों पकडाया था. यह मामला हाई प्रोफाइल किस्म का है. टीडीपी के एक सदस्य भानुप्रकाश रेड्डी ने सनसनीखेज आरोप यह लगाया था कि सीवी रविकुमार ने सर्जरी के जरिये अपने शरीर में संदूक इम्प्लांट करवाया है जिससे वह बिना किसी डिटेक्शन के करेंसी की तस्करी कर रहा था. आरोप हालाँकि अव्यवहारिक है लेकिन यह सच है कि उक्त कर्मचारी को दान में आई विदेशी मुद्रा गिनने का काम मिला था जिसमे कोई सौ करोड़ का घपला उजागर हो चुका है . बीती 25 दिसबर तक इस मामले में खास कुछ नहीं हुआ था लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कुछ हुआ ही नही हुआ था . अब जांच में क्या क्या सामने आता है यह देखना दिलचस्प होगा.

प्रसाद में मिलावट के लिए सुर्ख़ियों में रह चुके दक्षिण भारत के इस मन्दिर में तरह तरह के विवाद और फसाद आए दिन की बात है जिनका कोई असर भक्तों की चढ़ावे बाली मानसिकता पर नहीं होता. उन्हें इस बात से भी कोई मतलब नहीं रहता कि कितने रविकुमार मुरलीधर और उज्जैन के आठ आरोपी उनका पैसा कैसे उड़ा ले जाते हैं. वे तो अपनी तरफ से इसे भगवान को दान कर चुके होते हैं. इस दान राशि के बारे में इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि 2024 के आखिर में जब तिरुपति मन्दिर की हुंडियां खोली गईं तो कुल दान राशि 1365 करोड़ रु से भी ज्यादा आंकी गई थी . यह नगदी के अलावा सोने चाँदी और विदेशी मुद्रा की शक्ल में भी थी जिस पर रविकुमार का दिल यह सोचते आ गया था कि देसी भगवान बेचारे कहाँ विदेशों में इसे खर्च करने जायेंगे.

– कासी विश्वनाथ मन्दिर आए दिन चर्चाओं में रहता है क्योंकि वाराणसी प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है. वे अक्सर विश्वनाथ मन्दिर दर्शन करने जाया करते हैं. दूसरे चमत्कारी मन्दिरों की तरह इस मन्दिर की भी महिमा अपरम्पार है. हालाँकि इस मन्दिर का घपला करोड़ों का नहीं है लेकिन है तो जिसका खुलासा कोई 2 साल पहले हुआ था. जो भक्त मन्दिर तक नही आ पाते वे मनीआर्डर के जरिये दान राशि भेजते हैं. शशिभूषण नाम के कम्प्यूटर आपरेटर ने मनीआर्डर के जरिये आया लाखों का दान खुद हडप लिया तो मन्दिर के अपर कार्यपालक निखिलेश मिश्रा ने नजदीकी चौक थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस मामले में मन्दिर के दूसरे कुछ सेवादार भी शक के दायरे में हैं.

– राजस्थान के नाथद्वारा जिले के शिशोदा गाँव स्थित भेरूजी क्षेत्रपाल मन्दिर में डेढ़ साल पहले 123 करोड़ रु का गबन हुआ था. इस मामले में तत्कालीन अशोक गहलौत सरकार ने एक कमेटी गठित कर उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे. इस गबन का मुख्य आरोपी पुजारी विजय सिंह के अलावा तीन और कर्मचारी थे.

ऐसे उदाहरानो की भरमार है जिनमे दान के पैसों में जमकर घपले घोटाले हुए और तय है जब तक दान की मानसिकता है तब तक होते रहेंगे. इस मर्ज का कोई इलाज आम अपराधों की तरह नहीं है. लेकिन इनका भगवान के दरबार में होना कई सच उजागर करता है. जिनमे से पहला तो यह है कि वह भगवान कहीं है ही नही जिसके नाम पर खरबों का दान किया जाता है यह पैसा कहाँ जाता है यह भी आम लोग नहीं जानते. कहने को तो दान राशि का उपयोग भक्तों की सहूलियत बाले कामों में किया जाता है लेकिन यह पूरी तरह सच होता तो मन्दिरों में अफरातफरी न होती, गंदगी के ढेर न होते और न ही धक्का मुक्की होती.

किसी भी मन्दिर को देखलें वहां अव्यवस्थाओं की भरमार मिलेगी. लम्बी लम्बी लाइनों में घंटों खड़े भक्त मिलेंगे, उनकी जेब में चढ़ावे का पैसा मिलेगा जो उन्हें इस खुशफहमी में रखता है कि पैसे से भगवान खुश होते हैं. भगवान तो होने से रहा लेकिन उसके नाम पर पल रहे पंडे पुजारी जरुर उमड़ती भीड़ देख यह सोचते खुश होते रहते हैं कि धंधा अच्छा चल रहा है और आज भी चाँदी रहेगी . इसीलिए दान की महिमा दिन रात तरह तरह से गाई जाती है. अगर यह नियम बना दिया जाये कि भक्त मन्दिर में केश लेस होकर जायेंगे तो यकीन माने तमाम पंडे पुजारी कहीं दिहाड़ी करते नजर आयेंगे.

 

Best Hindi Story : मलिका – अपनी बदसूरती को खूबसूरती में बदलती लड़की की कथा

Best Hindi Story : यह-कहानी शुरू होती है एक साधारण सी लड़की से, जिसे शायद कुदरत रंगरूप देना भूल गई थी, या फिर यों कहिए कि कुदरत ने उस साधारण लड़की में कुछ असाधारण गुण जड़ दिए थे जो वक्त के साथ उभरते और निखरते रहे. 3 बहनों में दूसरे नंबर की सांवली का नाम शायद उस के मातापिता ने उस के रंग के कारण ही रखा था. एक तो सांवली ऊपर से दांत भी बाहर निकले हुए, एक नजर में कुरूपता की निशानी. बड़ी और छोटी बहनें गजब की खूबसूरत थीं. दोनों बहनों में जैसे एक बदनुमा दाग की तरह दिखने वाली, मातपिता की सहानुभूति, रिश्तेदारों, परिचितों से मिली उपेक्षा ने सांवली में एक अद्भुत स्वरूप को उकेरना शुरू कर दिया था.

वह था स्वयं से प्यार. बचपन से ही अंतर्मुखी सांवली का दिमाग उम्र से ज्यादा तेज था. छोटीमोटी उलझनों को चुटकी में सुलझा देना उस के नैसर्गिक गुणों से शुमार था. जहां एक ओर उस की दोनों बहनें घरघर खेलतीं, सजतींसंवरतीं, वहीं सांवली गणित के सवालों को हल करती दिखती. वक्त के साथ तीनों जवान हो गईं. सांवली पढ़ाई में हमेशा अव्वल रही. बहनों की खूबसूरती और निखर गई, सांवली अपना संसार बुनती रही, जहां उस के अपने सपने थे. अपने दम पर खुद को सिर्फ खुद के लिए साबित करना, उस की प्रतियोगिता किसी और से नहीं, स्वयं से थी. जूडो और बौक्सिंग उस के पसंदीदा खेल थे. स्कूल और कालेज स्तरीय कई प्रतियोगिताओं के मैडल उस ने अपने नाम कर लिए थे. मातापिता को चिंता खाए जा रही थी कि तीनों का विवाह करना है और खासकर सांवली को ले कर चिंतित रहते थे कि कैसे होगा इस का विवाह, कौन इसे पसंद करेगा, ज्यादा दहेज देने की हैसियत नहीं है, क्या होगा? लेकिन सांवली इन सब बातों से बेफिक्र थी, उस की डिक्शनरी में अभी विवाह नाम का कोई शब्द नहीं था.

ये भी पढ़ें- दीदी, मुझे माफ कर दो : नेहा किस दुविधा में पड़ी थी

उस ने तो ठान लिया था कि मरुस्थल में फूल खिलाना है. ‘‘पता नहीं, रिद्धिमा के पापा ने लड़के वालों से बात की होगी या नहीं?’’ सांवली की मां मालती ने अपनी सासुमां गिरिजा देवी से कहा. ‘‘अब तो आता ही होगा, आ कर बताएगा कि क्या बात हुई, फिक्र क्यों करती हो,’’ गिरिजा देवी ने कहा. ‘‘अम्मां, 3 जवान लड़कियां छाती पर बैठी हों तो फिक्र तो होती ही है,’’ मालती बोली. ‘‘अरे रिद्धिमा तो खूबसूरत है, निबट ही जाएगी, फिक्र तो सांवली की रहती है, इस का क्या होगा,’’ गिरिजा देवी माथे पर हाथ रखती हुई बोलीं. ‘‘हमारी फिक्र न करो दादी, हमारा लक्ष्य सिर्फ शादी नहीं है, हम तो वे करेंगे जो कोई दूसरा नहीं करता,’’ सांवली ने तपाक से कहा. ‘‘क्या मतलब, क्या तू लड़की नहीं है,

लड़की की जात को चूल्हाचौका ही सुहाता है, समझी,’’ दादी ने आंखें तरेर कर कहा. ‘‘हां दादी, मैं तो समझी, पर आप नहीं समझीं,’’ कह सांवली हंस पड़ी. तभी सांवली के पिता बलरामजी के खखारने की आवाज सुनाई दी. ‘‘अरी जा, देख पापा आ गए,’’ मालती ने सांवली से कहा और खुद भी दरवाजे की ओर दौड़ी. मां पानी का गिलास ले आईं, बोलीं, ‘‘बताओ, लड़के वालों से क्या बात हुई आप की?’’ ‘‘हां, परसों आ रहे हैं, समीक्षा को देखने,’’ बदलेव सिंह सोफे पर बैठते हुए बोले. ‘‘कौनकौन आएगा?’’ मां ने प्रश्न किया. ‘‘अब यह तो नहीं पूछा, 3-4 लोग तो होंगे ही,’’ बलदेव सिंह बोले. ‘‘अच्छा, कितने बजे तक आएंगे, यह तो पूछा होगा?’’ मां ने अगला प्रश्न किया. ‘‘दोपहर 1 बजे. रविवार है… सभी के लिए सुविधाजनक है,’’ बलदेव सिंह ने बताया. ‘‘सांवली ओ सांवली,’’ मां ने पुकारा. ‘‘हां, मां क्या बात है कहो,’’ सांवली ने बैठक में आते हुए पूछा. ‘‘सुन, परसों तेरी समीक्षा जीजी को लड़के वाले देखने आ रहे हैं, तो तू अभी तैयारी शुरू कर दे, क्या बनाएगी? उस के लिए क्या कुछ सामान बाजार से लाना है.

एक लिस्ट बना ले, तेरे पापा शाम को ले आएंगे और सुन तू भी जरा बेसन का लेप लगा लेना, रंग थोड़ा खुला दिखेगा,’’ मां ने सांवली को देखते हुए कहा. ‘‘मां… अब इस में मुझे बेसन का लेप लगाने की क्या जरूरत आन पड़ी? वे लोग तो जीजी को देखने आ रहे हैं,’’ सांवली ने कंधे उचकाते हुए कहा. ‘‘अरे, ऐसे ही एक के बाद एक रस्ते खुलते हैं, हो सकता है उन की नजर में तेरे लायक भी कोई रिश्ता हो, चल अब जा, परसों की तैयारियां कर,’’ मां ने कहा. तैयारियां शुरू हो गईं, समीक्षा फेशियल, साडि़यों के चयन आदि में व्यस्त रही और सांवली किचन की तैयारियों में, जो सूखा नाश्ता जैसे मठरी, गुझिया, चिवड़ा आदि उस ने एक दिन पहले ही बना कर तैयार कर लिए थे. रविवार सुबह से समोसे, मूंग का हलवा और बादाम की खीर की खूशबू से सारा घर महक रहा था. समीक्षा साडि़यों पर साडि़यां बदले जा रही थी, छोटी बहन सुनीति उस की मदद कर रही थी. ‘‘समीक्षा, तू कुछ भी पहन ले, सुंदर ही दिखेगी, तुझे तो एक नजर में पसंद कर लेंगे वे, चिंता मत कर, कुछ भी पहन ले,’’ मां ने पूर्ण विश्वास से कहा.

ये भी पढ़ें- रफ्तार : क्या सुधीर को मिली अपनी पसंद की लड़की?

‘‘सांवली ओ सांवली,’’ मां ने सांवली को पुकारा. ‘‘क्या है मां,’’ किचन से निकलते हुए सांवली बोली. ‘‘सुन, तू भी अब मुंह धो ले, और अच्छी तरह पाउडर लगा कर, हलकेपीले रंग का जो सूट है न उसे पहन ले, उस में तेरा रंग खिला हुआ लगता है,’’ मां ने सांवली को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा. ‘‘मां… तुम भी न… आज तो समीक्षा जीजी को तैयार होने दो, क्यों जीजी…’’ सांवली ने समीक्षा से चुटकी ली. ‘‘जा, तू भी तैयार हो जा…’’ समीक्षा ने मुसकराते हुए सांवली से कहा. ‘‘ठीक है जीजी,’’ सांवली हंसते हुए बोली. ‘‘डेढ़ बजे के करीब लड़के वाले तशरीफ ले आए, मातापिता, लड़का और उस की छोटी बहन, कुल 4 लोग आए थे.’’ ‘‘आइए भाई साहब, नमस्ते बहनजी, आओ बेटा आओ…’’ बलदेव सिंह सब का स्वागत करते हुए बोले. ‘‘बहनजी, आप का घर तो खाने की खुशबूओं से महक रहा है, कितने पकवान बनवा लिए आप ने?’’ लड़के की मां ने घर में घुसते ही कहा. ‘‘अरे बहनजी, बच्चियों से जो कुछ बन सका, बस यों ही थोड़ाबहुत…’’ मां ने मुसकान बिखेरते हुए कहा. सभी को बैठक में बैठाया गया,

जो सांवली की कलाकृतियों से बहुत ही करीने से सजासंवरा, छोटा सा कमरा था. सांवली पानी की ट्रे लिए बैठक में दाखिल हुईर्. लड़के की मां उसे कुछ ज्यादा ही ध्यान से देखने लगी. ‘‘बहनजी, यह मझली बेटी सांवली है, समीक्षा, जिसे आप देखने आई हैं, वह अभी अंदर है,’’ मां ने लड़के की मां की नजरों को ताड़ते हुए कहा. ‘‘ओह, अच्छा…’’ लड़के की मां सोफे से पीठ टिकाती हुई बोली. सांवली ने सभी को नमस्ते कर ट्रे में पानी के गिलास रख दिए. ‘‘जा वांवली, जीजी को ले आ,’’ मां ने कहा. ‘‘ये वौल पीस, हैंगिंग और पेंटिंग्स तो बहुत जोरदार हैं, बिटिया ने बनाई हैं क्या?’’ लड़के की मां ने चारों तरफ नजर घुमाते हुए पूछा. ‘‘हं… हां… हां…’’ मां ने कहा, पर यह बात गोल कर दी कि किस बिटिया ने बनाई है, क्योंकि अभी तो समीक्षा को निबटाना था. तभी सांवली अपनी समीक्षा जीजी के साथ बैठक में दाखिल हुई. लड़के की मां का चेहरा खिल उठा. ‘‘आओ… आओ, बिटिया… वाह… बहुत ही सुंदर, क्यों बेटा है न?’’ लड़के की मां ने अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा. लड़के ने आंखें उठा कर देखा तो उस की नजर सांवली की नजर से टकराई, जो उस का रिएक्शन देखने के लिए उसे ही देख रही थी. लड़के ने झेंप कर नजर झुका ली. ‘‘भई मुझे तो बिटिया बहुत पसंद है, अब फैसला तो श्याम के हाथ में है, मेरे खयाल से हमें इन दोनों को भी एकदूसरे से खुल कर बातचीत करने के लिए अकेला छोड़ देना चाहिए, क्यों जी, सही न,’’ लड़के की मां ने लड़के के पिता से कहा. ‘‘हां बिलकुल ठीक है,’’ लड़के के पिता ने कहा. ‘‘सांवली, जाओ बेटा जीजी और श्याम बाबू को बगीचे की सैर करवा दो,’’ मां ने झट से कहा. ‘‘

जी ठीक है मां, आइए जीजी…’’ सांवली ने समीक्षा और श्याम से चलने को कहा. बगीचे में पहुंच कर सांवली ने कहा, ‘‘जीजी, आप लोग बात कीजिए, तब तक मैं नाश्ते का प्रबंध करती हूं,’’ और वह भीतर चली आई. समीक्षा और श्याम करीब 15 मिनट बातचीत करते रहे, फिर वे भी भीतर बैठक में आ गए. ‘‘वाह भई, ऐसा स्वादिष्ठ नाश्ता कर के मजा आ गया, भई अब तो जी चाहता है सारा जीवन ऐसा ही नाश्ता मिलता रहे,’’ लड़के की मां ने कनखियों से समीक्षा को देखते हुए कहा. समीक्षा मुसकरा रही थी. श्याम और समीक्षा की रजामंदी से विवाह पक्का हो गया. इधर सांवली अपनी परीक्षा की तैयारियों में जुटी थी, उधर समीक्षा का विवाह भी हो गया. सांवली ने एमबीए के कोर्स में प्रवेश ले लिया, मैनेजमैंट और अकाउंटैंसी दोनों में ही सांवली का कोई जोड़ नहीं था. एमबीए पूरा होतेहोते छोटी बहन भी ब्याह कर ससुराल चली गई. अब मातापिता को सांवली की चिंता थी, हालांकि वे यह भी जानते थे कि सारे घर का दारोमदार अब सांवली के कंधों पर ही है, पिता रिटायर हो चुके थे, उन की पैंशन और सांवली की कमाई से ही घर का खर्च चलता था, पिता के पैंशन का मैटर भी विभागीय मसले में उलझ गया था,

जिसे सांवली ने ही अपनी सूझबूझ से निबटाया और पैंशन पक्की हो पाई. पिता तो सांवली के ऐसे कायल हो गए कि हर समस्या के समाधान के लिए उन की जबान पर एक ही नाम होता था सांवली. ‘‘अरे बेटा रो मत, सांवली घर आ जाए, मैं उस से बात करता हूं, दामादजी को वह इस मुश्किल से चुटकी में निकाल देगी, तू फिक्र मत कर,’’ पिता ने समीक्षा से फोन पर कहा. ‘‘ठीक है पापा, मैं कल श्याम के साथ घर आती हूं, सांवली को सारा मसला समझा देंगे,’’ समीक्षा ने कहा और फोन रख दिया. अगले दिन सुबह ही समीक्षा अपने पति के साथ घर आ गई. सांवली को श्याम ने अपने व्यापार में हुए घोटाले और घाटे से सड़क पर आ जाने का पूरा विवरण बताया. सांवली बहुत ही गंभीर मुद्रा में हर बात सुनती रही, फिर उस ने श्याम से कुछ प्रश्न किए जिन के उत्तरों से उसे समझ में आ गया कि आखिर चूक कहां हुई है. उस ने कुछ सुझाव दिए और कहा कि तुम इन पर अमल करो, बाकी मैं संभाल लूंगी. सांवली ने अपने तेज दिमाग से अपने जीजाजी का न केवल घाटा पूरा करवाया, बल्कि उस के बाद उन का बिजनैस जोर पकड़ता गया. अब तो श्याम जैसे सांवली का दीवाना हो गया, कभीकभी मजाक में कह भी देता था कि इस से तो मैं तुम से शादी करता तो ज्यादा अच्छा रहता. खैर, आधी घरवाली तो तुम हो ही.’’ इस पर सांवली कहती,

‘‘इस मुगालते में मत रहना जीजाजी, सांवली सिर्फ सांवली है, किसी की घरवाली नहीं, न आधी न पूरी.’’ जीजाजी जैसे मन मसोस कर रह जाते. कई बार कोशिश करने पर भी सांवली ने उन की दाल गलने न दी. सांवली जानती थी कि, उस का दिमाग और फिट फिगर पुरुषों को बेहद आकर्षित करता है, हर कोई चाहता है कि उस की बीवी खूबसूरत होने के साथ स्मार्ट माइंड भी रखती हो. वह अब यह भी जानती थी कि आज इस समय उस से कोई भी शादी करने के लिए तैयार हो जाएगा, लेकिन अब वह अपनी शर्तों पर जीवन जीना सीख चुकी थी, अब तो पुरुषों को अपनी उंगली पर नचाने में उसे मजा आता था. मन में एक भड़ास थी कि कभी उसे रूप के कारण कमतर आंका गया है, बहुत परिश्रम करना पड़ा है उसे यह मुकाम हासिल करने में. ‘‘हैलो, क्या मैं सांवलीजी से बात कर सकता हूं?’’ फोन पर किसी ने सांवली से कहा. ‘‘जी, कहिए, मैं सांवली बोल रही हूं,’’ सांवली ने जवाब दिया. ‘‘मैडम, आप से अपौइंटमैंट लेना था, एक प्रौपर्टी केस के सिलसिले में आप से कंसल्ट करना चाहता हूं, प्लीज बताइए, मैं आप से किस समय मिल सकता हूं?’’ अजनबी ने कहा.

‘‘आप सारे डौक्युमैंट्स ले कर परसों मेरे औफिस आ जाइए, बाइ दा वे, आप का शुभनाम?’’ सांवली ने पूछा. ‘‘ओह, आई एम सौरी, माई नेम इज बृज, मैं परसों मिलता हूं आप से, थैंक यू सो मच,’’ और फोन काट दिया गया. नियत समय पर बृज सांवली के औफिस पहुंचा. ‘‘गुड मौर्निंग… सांवली,’’ बृज ने अभिवादन किया. ‘‘वैरी गुड मौर्निंग बृज, टेक योर सीट,’’ सांवली ने मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘पेपर्स दिखाइए और केस की डिटेल्स बताइए.’’ ‘‘ओके, ये लीजिए पेपर्स. दरअसल, मेरी पार्टनर मेरी वाइफ ही थी, उस ने अपनी खूबसूरती के जाल में उलझा कर मुझ से कहांकहां साइन करवा लिए, मुझे पता नहीं चला, मेरा सारा बिजनैस खुद के नाम कर के मुझे डिवोर्स पेपर्स भेज दिए, मैं चाहता हूं कि उसे इस की सजा मिले, मुझे किसी ने आप का नाम सजेस्ट किया, बताया कि ऐसे उलझे मामलों को आप ने बड़ी होशियारी से सुलझाया है. मैं चाहता तो किसी वकील के पास भी जा सकता था, लेकिन इस केस को कैसे डील करना है, वह अब आप ही देखिए, वकील तो जो आप कहेंगी उसे कर लेंगे,’’ बृज एक सांस में बोल गया.

‘‘ओके, डौंट वरी, आई विल मैनेज एवरीथिंग, मैं प्लान प्रोग्राम कर आप से कौंटैक्ट करती हूं,’’ सांवली ने फिर एक गहरी मुसकान बिखेरते हुए कहा. ‘‘ओके, थैंक्स,’’ कह कर बृज ने हाथ आगे बढ़ाया, सांवली ने अपना हाथ बढ़ा कर शेक हैंड किया. महीनेभर की मशक्कत के बाद आखिर सांवली केस को सुलझाने में सफल हो गई. बृज की बीवी को स्वीकार करना पड़ा कि उस ने जालसाजी से ये सब किया था, क्योंकि बृज को उस पर अंधाविश्वास था, इसलिए उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाने में वह कामयाब रही, लेकिन जिन पौइंट्स पर वाह चूक गई थी, सांवली ने उन्हें पकड़ कर उस की जालसाजी पकड़ ली, बृज को अपनी प्रौपर्टी वापस मिल गई और महीनेभर की मुलाकातों ने उसे सांवली के व्यक्तित्व ने इतना प्रभावित किया कि उस ने फैसला कर लिया कि वह सांवली को अपना जीवनसाथी बनाएगा, यही सोच कर वह फूलों का बड़ा गुलदस्ता ले कर सांवली के औफिस पहुंचा. ‘‘हैलो मिस सांवली,’’ बृज ने सांवली से कहा. ‘‘हैलो बृज, बधाई हो आप को, अब तो आप खुश हैं न?’’ सांवली ने मुसकान बिखेरते हुए कहा. ‘‘हां, लेकिन यह खुशी दोगुना हो सकती है, अगर आप मेरी हमसफर बनने के लिए राजी हो जाएं?’’

बृज ने बिना किसी भूमिका के दिल की बात कह दी. ‘‘क्यों, एक धोखा खा कर तसल्ली नहीं हुई आप को, जो फिर ओखली में सिर डालने चले हो?’’ अभी तो मैं निकाल लाई आप को, मुझ से कौन बचाएगा आप को? सांवली ने खिलखिलाते हुए कहा. ‘‘अब तुम ने निकलना ही नहीं है. बिजनैस तुम ही संभालोगी, मुझे तो बस एक प्यार करने वाली बीवी चाहिए, जिस की मुसकराहट मेरी जिंदगी संवार दे और जो एक बेहतरीन दिल के साथ, शानदार दिमाग की भी मालिक हो, और वह हो तुम, तो कहो मेरी मलिका बनने को तैयार हो?’’ बृज ने दिल पर हाथ रख कर कुछ झुकते हुए कहा. ‘‘यस जहांपनाह, बाअदब, बामुलाहिजा, होशियार… मलिका ए दिमाग, आप के दिल में दाखिल होने जा रहा है.’’ ‘‘दिमाग चाहे तो वह हर मुकाम हासिल कर सकता है, जो रूप के बूते मिलता है, लेकिन रूप चाह कर भी वह मुकाम हासिल नहीं कर सकता, जो दिमाग हासिल कर सकता है,’’ सांवली बृज की बांहों में झूल रही थी. द्य ‘‘बृज की बीवी को स्वीकार करना पड़ा कि उस ने जालसाजी से ये सब किया था, क्योंकि ब्रिज को उस पर अंधाविश्वास था, इसलिए उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाने में वह कामयाब रही…’’

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें