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Social Issue : बौडी आप की, हक आप का

Social Issue : एकदूसरे के लिए प्रेम दर्शाना गलत नहीं है, लेकिन पब्लिक प्लेस में कई लोग अश्लीलता की हद पार कर देते हैं, जिस से आसपास के लोग अनकंफर्टेबल हो जाते हैं. ऐसे में लड़कियों को खास ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि पब्लिक प्लेस में ऐसी हरकतों के वीडियोज सैकंड्स में वायरल हो सकते हैं या वीडियोज बना कर उन लोगों को ब्लैकमेल किया जा सकता है.

हालही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो को देख कर यह बहस फिर से छिड़ गई कि आखिर पब्लिक प्लेस पर प्रेम प्रदर्शन के क्या माने हैं. इस वीडियो में देखा जा सकता है कि एक छात्र और एक छात्रा नोएडा की किसी यूनिवर्सिटी में एक सुनसान जगह पर किस कर रहे हैं. दोनों किस करने में इतने मशगूल हो गए हैं कि उन्हें होश ही नहीं रहा कि कोई उन का वीडियो भी रिकौर्ड कर रहा है.

इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए. कुछ लोग तो इसे देख कर लड़कियों के कालेज व यूनिवर्सिटी की पढ़ाई न करवाने की वकालत करते नजर आए.

इस तरह का एक और मामला जनवरी 2023 में भी सामने आया था. लखनऊ की सड़कों पर स्कूटर की सवारी करते हुए रोमांस कर रहे एक युवा जोड़े का अश्लील और आपत्तिजनक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. पुलिस ने स्कूटी चला रहे 23 साल के युवक विक्की शर्मा को हिरासत में लिया था, जिस ने अपनी महिला मित्र को अपनी बाइक के आगे पालथी मार कर बैठाया हुआ था.

खुलेआम प्रेमी जोड़े के रोमांस का वीडियो सड़क पर किसी के द्वारा शूट किया गया और सोशल मीडिया पर साझा किया गया था. पुलिस ने स्कूटर के नंबर से पता लगाया और युवक को गिरफ्तार कर उस पर आईपीसी की धारा 294 और 279 के तहत सार्वजनिक रूप से अश्लील हरकतें करने व लापरवाही से गाड़ी चलाने के मामले दर्ज किए थे, जबकि लड़की के नाबालिग होने पर उसे समझाइश दे कर छोड़ दिया था.

माना कि बौडी आप की है और उस पर हक भी आप का है और प्रेम करना भी गुनाह नहीं है, मगर पब्लिक प्लेस पर इस तरह प्रेम का इजहार एक तरह से पब्लिसिटी के अलावा कुछ नहीं है. इस तरह खुलेआम प्रेमी जोड़े का प्रेम प्रदर्शन सामाजिक तानेबाने को प्रभावित करता है.

युवा प्रेमी जोड़े अधिक रोमांटिक होते हैं, उन्हें जब एकांत स्थान नहीं मिल पाता तो वे पब्लिक प्लेस में भी अपने पार्टनर के प्रति इंटिमेसी व्यक्त करने से नहीं चूकते. अकसर पब्लिक प्लेस या किसी गार्डन में प्रेमी जोड़े एकदूसरे को चूमते, गले लगाते और हाथों में हाथ डाल कर चलते हुए नजर आते हैं.

इन जोड़ों का प्रेमालाप आसपास के लोगों को कई तरह से प्रभावित करता है. दरअसल पब्लिक प्लेस पर बच्चे, फैमिली, बुजुर्ग सभी तरह के लोग मौजूद होते हैं. एकदूसरे के लिए प्रेम दर्शाना कोई गलत बात नहीं है, परंतु हर जगह प्रेम दर्शाने का अलगअलग तरीका भी होता है.

कई देशों में पब्लिक डिस्पले औफ अफैक्शन को लीगल माना जाता है, परंतु बात यदि भारत की करें तो पब्लिक डिसप्ले औफ अफैक्शन तब तक दंडनीय नहीं है जब तक कि यह अश्लीलता में न बदल जाए और दूसरों की भावनाओं को किसी प्रकार से ठेस न पहुंचे. प्रेम प्रदर्शन की सीमारेखा अपने आसपास के माहौल को देखते हुए आप को खुद तय करनी होगी.

पब्लिक प्लेस पर अपने पार्टनर के प्रति प्रेमस्नेह जाहिर करने के और भी तरीके हैं जिन्हें शारीरिक गतिविधियों से परे भावनात्मक प्रेम कह सकते हैं. पब्लिक प्लेस में मौजूद व्यक्ति कई बार इस तरह की प्रतिक्रिया को देख कर अनकंफर्टेबल हो जाते हैं.

जब पब्लिक प्लेस पर स्नेह जताने का तरीका जिस्मानी हो जाता है, जैसे कि एकदूसरे को लंबे समय तक चूमते रहना, अमान्य रूप से इधरउधर टच करना, लंबे समय तक एकदूसरे को बांहों में लिए रहना तो आसपास मौजूद लोग असहज हो जाते हैं. ये गतिविधियां आसपास मौजूद लोगों की स्वेच्छा के बगैर की जाएं तो इस के अनुरूप आप के ऊपर कानूनी कार्रवाई और फाइन चार्ज किया जा सकता है.

सीमारेखा न लांघें

जवान लड़कियां लड़कों की बातों में आ कर प्रेम और वासना के बीच के अंतर को समझ नहीं पातीं. इसी वजह से वे अपना सबकुछ न्योछावर कर देती हैं. पार्टनर के साथ प्रेम करने या सैक्स करने की वीडियो बनाने की बेवकूफी कभी न करें, क्योंकि ब्रेकअप होने पर लड़के आप को ब्लैकमेल करने से गुरेज नहीं करते.

मध्य प्रदेश में पिछले माह एक युवती का वीडियो और व्हाट्सऐप चैट वायरल हुई थी, जिस में वह अपने प्राइवेट पार्ट को अपने पार्टनर को दिखा रही है. बताया जाता है कि युवक युवती से वीडियो कौल के दौरान अपने प्राइवेट पार्ट को दिखाने की डिमांड करता है और युवती सहमति से यह सब करती रही. बाद में जब किसी बात को ले कर दोनों में मतभेद हो गए तो युवक ने वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. पूरे शहर में युवती की बदनामी हुई और अब उस के घरवालों को उस के लिए रिश्ते खोजने में परेशानी हो रही है.

छोटे शहरों से ले कर महानगरों में आजकल एक नई तरह का ट्रैंड चल रहा है. बाइक पर पति या प्रेमी के साथ सवार पत्नी या प्रेमिका अपना हाथ पार्टनर के प्राइवेट पार्ट पर रख बेशर्मी के साथ भीड़भाड़ वाले इलाकों में घूमती है. पब्लिक प्लेस पर यह कर के आखिर वे किस तरह का प्रेम कर रहे हैं. खासतौर पर लड़कियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि प्रेमालाप के दौरान किसी ऐसी जगह का चयन करें जहां उन दोनों के अलावा कोई तीसरा न हो.

मोबाइल में वीडियो बनाने की गलती कभी न करें क्योंकि यह एक तरह का सुबूत होता है. युवा जोड़े जब आपस में मिलते हैं तो जोश में आ कर मर्यादा की सीमा लांघ जाते हैं और फिर समाज में उन की बदनामी होती है.

युवकयुवतियां अकसर फिल्मों या टैलीविजन सीरियल्स में दिखाए जाने वाले दृश्यों से ज्यादा प्रभावित रहते हैं. फिल्मों में नायिका नायक द्वारा प्रेम का सार्वजनिक रूप से इजहार करने पर खुश होती है वहीं असल जिंदगी में इस का असर ठीक विपरीत होता है. ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन के बाद लोगों को प्रेम के इजहार के लिए जगह चुनने में सावधानी बरतने की सलाह दी गई है.

वैबसाइट एमएसएन द्वारा 2,000 लोगों के मध्य किए गए एक सर्वेक्षण में 28 प्रतिशत लोगों ने माना कि सार्वजनिक स्थानों पर और दूसरे लोगों की मौजूदगी में प्रेम का इजहार उन्हें असहज करता है. करीब एकचौथाई ब्रिटिश युवतियां सार्वजनिक स्थानों पर गले लगने और यहां तक कि हाथ थामने में झिझक महसूस करती हैं जबकि हर 10 में से एक महिला ऐसे पुरुषों का साथ पसंद नहीं करती जो सार्वजनिक स्थानों पर भी प्रेम का इजहार करने से बाज नहीं आते.

अपनी बौडी किसी दूसरे को सौंपने से पहले दस बार सोचें कि ऐसा करने से कोई नुकसान तो नहीं है. कई दफा इस तरह के वीडियो की वजह से पुलिस भी प्रेमी जोड़े को परेशान करती है. कानूनी कार्यवाही के नाम पर पुलिस पैसा ऐंठती है या फिर यौनशोषण करती है. कमोबेश यही हालत सोसाइटी में रहने वाले लोगों की भी है.

अगर हम सोसाइटी में रह रहे हैं तो उस के कुछ कायदेकानून मानने भी जरूरी हैं. कहीं ऐसा न हो हमारी एक गलती हमें सोसाइटी में मुंह दिखाने लायक न छोड़े. बंद कमरे और एकांत जगह आप में बिंदास हो कर एकदूसरे को प्यार करें, मगर पब्लिक प्लेस पर खुल्लमखुल्ला प्यार से परहेज करना फायदेमंद साबित न होगा.

लचीला कानून

भारत में अश्लीलता विरोधी कानून बना हुआ है, जिस का उद्देश्य अश्लील सामग्री के वितरण को रोकना या प्रतिबंधित करना है. आईपीसी की धारा 292 इस का विवरण करती है कि किन मानकों को अश्लील माना जाएगा या नहीं जिस के आधार पर अपराधी को सजा भी हो सकती है. अश्लीलता शब्द उन शब्दों में से एक है जिस का अर्थ हमारे भारतीय कानून में स्पष्ट नहीं है.

लचीले कानून की वजह से अश्लील सामग्री है या नहीं, यह पूरी तरह से वकीलों और न्यायाधीशों पर निर्भर करता है और वे अश्लील शब्द की व्याख्या कैसे करते हैं. अश्लीलता की परिभाषा समयसमय पर बदलती रही है. हम जानते हैं कि कानूनों को समयसमय पर बदलना पड़ता है लेकिन अश्लीलता को सही तरीके से परिभाषित करने की आवश्यकता है. वर्तमान समय में यह उल्लेख करना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि फिल्मों, वैब शो, कला, छवियों या चित्रों, साहित्य में अश्लीलता को अभी तक हमारे देश में परिभाषित नहीं किया गया है.

आईपीसी की धारा 294 को भारतीय न्याय संहिता में धारा 296 में बदला गया है, जिस के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि जो कोई दूसरों को क्षोभ पहुंचाने के लिए किसी सार्वजनिक स्थान पर कोई अश्लील कार्य करेगा या किसी सार्वजनिक स्थान पर या उस के निकट कोई अश्लील गीत, गाथा या शब्द गाएगा, सुनाएगा या बोलेगा, उसे 3 महीने की सजा या 1,000 रुपए जुरमाना या दोनों से दंडित किया जाएगा.

सरकार ने कानून की किताब और धाराओं को तो बदल दिया है लेकिन अश्लीलता को सही ढंग से न तो परिभाषित किया है और न ही इस के लिए कोई कड़ी सजा का प्रावधान किया है. यही वजह है कि कानून का खौफ न होने से स्वच्छंदता बढ़ रही है और युवा जोड़े खुलेआम अश्लीलता फैला रहे हैं.

कानूनी फैसले नामचीन लोगों के पक्ष में

भारत में अश्लीलता से संबंधित कई मामले हैं. कई अन्य अवधारणाओं और परंपराओं की तरह अश्लीलता का अर्थ भी हर मामले में बदलता रहता है. अभिनेता और मौडल मिलिंद सोमन ने अपने ट्विटर हैंडल पर अपनी एक तसवीर पोस्ट की थी, जिस में वह अपने जन्मदिन के अवसर पर गोवा बीच पर नग्न अवस्था में दौड़ रहे हैं और कैप्शन में लिखा है, ‘हैप्पी बर्थडे टू मी, 55 एंड रनिंग.’

इस मामले में गोवा पुलिस ने उन्हें सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य को बढ़ावा देने के लिए आईपीसी की धारा 294 और सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री के प्रकाशन के लिए आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत गिरफ्तार किया था, लेकिन उन के अनुसार, वे अपनी फिटनैस को बढ़ावा दे रहे थे.

2018 में अश्लीलता से जुड़ा एक मामला सामने आया था, जिस में फिल्म स्टार रणवीर सिंह, अर्जुन कपूर, दीपिका पादुकोण और मशहूर फिल्म निर्देशक करण जौहर जैसी कई बौलीवुड हस्तियों और कई अन्य लोगों पर अश्लीलता के मामले में आरोप लगाए गए थे.

अवीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में एक जरमन पत्रिका ने एक प्रसिद्ध टैनिस खिलाड़ी बोरिस बेकर की एक तसवीर प्रकाशित की, जिस में वे अपनी मंगेतर बारबरा फेल्टस, एक अभिनेत्री, के साथ नग्न अवस्था में उस के स्तनों को अपने हाथ से ढक रहे थे. यह तसवीर फेल्टस के पिता ने ली थी. जिस लेख में यह फोटो थी, उसे भारतीय समाचारपत्र और पत्रिका में दोबारा से प्रकाशित किया गया.

इस के बाद आईपीसी की धारा 292 के तहत अखबार के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई. लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सामुदायिक मानक परीक्षण लागू करने के बाद फैसला सुनाया कि बोरिस बेकर की अपनी मंगेतर के साथ अर्धनग्न तसवीर अश्लील नहीं थी, क्योंकि यह यौन जनून को उत्तेजित नहीं करती है या लोगों के दिमाग को भ्रष्ट नहीं करती है.

रणजीत डी उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य 1964 मामले में दिए गए फैसले पर गौर करना जरूरी है. उस समय लेडी चैटरलीज लवर्स नाम की एक किताब थी, जिसे प्रतिबंधित कर दिया गया था क्योंकि पुस्तक में कुछ अश्लील सामग्री थी. उन के पास पुस्तक की कुछ प्रतियां मिलीं, जिस से वे आईपीसी की धारा 292 के तहत दोषी माने गए.

उच्चतम न्यायालय में अपनी अपील में उन्होंने तर्क दिया कि यह धारा शून्य थी क्योंकि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत गारंटीकृत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती थी. भले ही धारा वैध थी, पुस्तक में अश्लील सामग्री नहीं थी. वादी द्वारा यह बताया जाना चाहिए कि उस ने खरीदार को भ्रष्ट करने के इरादे से पुस्तक बेची.

विरोधाभास

अश्लीलता को ले कर कानून के साथसाथ धर्म और समाज में विरोधाभास साफतौर पर देखा जाता है. भारतीय कानून में किसी प्राचीन संस्मारक या पुरातात्विक अवशेष पर रेखांकित, साहित्य कलाकृति, रंगचित्र, मूर्ति, कोई भी कलाकृति आदि का होना अश्लीलता का अपराध नहीं है. खजुराहो के मंदिर में बड़ी संख्या में उकेरी गई मैथुन करती मूर्तियां, जिन्हें हजारों की भीड़ देखती है, अश्लीलता के दायरे में नहीं हैं, परंतु कालेज, यूनिवर्सिटी या सड़क पर लड़केलड़कियों का किस करना समाज में अश्लीलता फैलाता है.

कानून के अनुसार, अगर कोई ऐसी रचना है जिस में विवाहित जोड़ों को अपने यौन संबंधों को नियंत्रित करने की गंभीर जानकारी दी जाती है तो भले ही उस में यौन संबंधों का विस्तार से वर्णन क्यों न हो, वह अपराध नहीं मानी जाती. उदाहरण के तौर पर, ‘कामसूत्र’ जैसी किताब अश्लील नहीं मानी जाती. लेकिन यह समझना मुश्किल है कि समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में छपी अर्धनग्न तसवीरें कैसे अश्लीलता को बढ़ावा देती हैं.

पौराणिक काल से ले कर समाज में पितृसत्तात्मक व्यवस्था आज भी हावी है. पुरुषों की सोच स्त्री को केवल भोग की वस्तु समझने की है. यही कारण है कि महिलाओं के कपड़ों पर टीकाटिप्पणी की जाती है और उन पर होने वाले रेप व छेड़छाड़ के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है. महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न पर पुरुषों को दोषी मानने के बजाय महिलाओं को चरित्रहीन समझा जाता है.

यह वही समाज है जो नवरात्र पर सजीधजी महिलाओं को कामुक नजरों से देखता है और अष्टमी, नवमी पर कन्यापूजन और भंडारे का आयोजन करता है. मौका मिलते ही नाबालिग लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाता है. प्रेम करने वाली लड़कियों के चरित्र पर भी समाज सवालिया निशान लगाता है. लड़कियों को ऐसे दौर में यह आवश्यक हो जाता है कि वे स्थानीय परिवेश के अनुसार अपने रहनसहन और पहनावे को प्राथमिकता दे कर प्रेम के दिखावे से बचें और लोगों की छींटाकशी का शिकार होने से बचें.

Politics : वोटोक्रेसी नहीं, डैमोक्रेसी चाहिए

Politics : लोकतंत्र वोट देने और लेने तक सीमित रह गया है. जनता, जिसे कभी सत्ता का मुख्य बिंदु माना जाता था, अब सिर्फ एक दिन भूमिका निभाती है. वोटोक्रेसी व डैमोक्रेसी का फर्क धुंधलाता जा रहा है. आइए समझते हैं कि कैसे लोकतंत्र का रूप बदलते वक्त के साथ अपने माने खो रहा है.

दिल्ली विधानसभा के चुनाव हाल ही में हुए हैं. प्रधानमंत्री तक उस के चुनावी प्रचार में आखिर तक लगे रहे कि किसी तरह से 10 साल से मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठे अरविंद केजरीवाल को बाहर निकाला जा सके. इन 10 सालों में उन के उपराज्यपाल ने अरविंद केजरीवाल को एक रात निश्चिंत रहने नहीं दिया. वे वोटों से जीत कर आए थे. पहली बार उन्होंने कांग्रेस के साथ सरकार बनाई. दूसरी और तीसरी बार वे भारी बहुमत से जीते. लेकिन वे आसानी से राज कभी न कर सके क्योंकि केंद्र के उपराज्यपाल का हंटर उन के सिर पर सभी कार्यकालों के दौरान हमेशा रहा.

यह साबित करता है कि देश में वोटतंत्र या वोटोक्रेसी है पर डैमोक्रेसी कितनी और कैसी है, इस का अंदाजा घटनाओं और मुद्दों को देख कर लगाया जा सकता है, गिना नहीं जा सकता. देश में 1952 से वोटोक्रेसी तो है पर जिसे डैमोक्रेसी कहा जाना चाहिए उस के बारे में पूरा संशय है. हर रोज लगता है कि देश में एक अघोषित तानाशाही, डिक्टेटरशिप चल रही है. जबकि, हर बार समय पर चुनाव हो रहे हैं. सो, वोटोक्रेसी तो पक्का है.

वोटोक्रेसी शब्द का इस्तेमाल कहींकहीं कोई करता है पर इस का अर्थ स्पष्ट है, ऐसी शासन पद्धति जिस में लोग वोट देते हैं पर क्या वोटोक्रेसी ही डैमोक्रेसी या लोकतंत्र है? नहीं, बिलकुल नहीं. वोट दे कर डैमोक्रेसी की पहली और सिर्फ पहली सीढ़ी चढ़ी जाती है. डैमोक्रेसी वह शासन पद्धति है जिस में जनता को लगे कि शासन में जो बैठे हैं वे उस के बलबूते पर, उस की सेवा के लिए, उस की आशाओं व आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उस के ही चुने हुए लोग हैं.

अब्राहम लिंकन आज होते तो लोकतंत्र की अपनी परिभाषा में मामूली फेरबदल करते कहते यही कि बाकी सब तो ठीक है लेकिन अब शासन जनता द्वारा नहीं बल्कि उन के चुने हुए उन प्रतिनिधियों द्वारा होता है जो अपनी मनमरजी करते हैं, अपने लिए राज करते हैं. लोकतंत्र का सीधा सा मतलब अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में वोट लेना और वोट देना रह गया है.

जब कभी चुनाव आते हैं तब मतदाता ही नेताओं का मजाक उड़ाते हैं कि लो आ गए सिर झुकाए, नम्रता की प्रतिमूर्ति बने. जीतने के बाद इन के दर्शन दुर्लभ हो जाएंगे. लेकिन वे क्या करें किसी को तो चुनना है. जो कम बेईमान और कम भ्रष्ट लगता है, जनता उसे ज्यादा बेईमान और ज्यादा भ्रष्ट होने का मौका देते पार्लियामैंट, असैंबली या स्थानीय निकायों में पहुंचा देती है. जो हारते हैं उन का भी कहीं अतापता नहीं चलता. अब जो है वह वोटोक्रेसी है.

विशुद्ध वोटोक्रेसी वैसे तो वह प्रणाली है जिस में हर काम वोट ले कर किया जाता है पर यहां वोटोक्रेसी का अर्थ लिया जा रहा है कि वोट डालने का हक होना और वोटों से चुन कर आए नेताओं को सत्ता दिलवाना. पश्चिम यूरोप, अमेरिका, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया में राज वे करते हैं जो जनता के वोटों से जीत कर आए पर इन देशों में चुने लोग सदा जनता के प्रति ज्यादा जिम्मेदार रहते हैं. अमेरिका में अब डर है कि डोनाल्ड ट्रंप, जो वोटों से ही जीत कर आए हैं, का डैमोक्रेसी से कोई लेनादेना नहीं है.

इस के अलावा बहुत से देश हैं जहां वोटों से नेता चुने जाते हैं, बदले भी जाते हैं पर चुने जाने के बाद अगले चुनावों तक वे निरंकुश तानाशाह बने रहते हैं. यह टूटी डैमोक्रेसी है क्योंकि हर चुना प्रतिनिधि छोटामोटा तानाशाह होता है और उस का सर्वोच्च नेता बड़ा तानाशाह. भारत कुछ इसी तरह का देश है.

भारत के संविधान ने अनुच्छेद 326 से हरेक को वोट देने का अधिकार तो दे दिया पर वोट का अधिकार अपनेआप में कुछ माने नहीं रखता अगर दूसरे अधिकार साथ न हों.

कम्युनिस्ट सोवियत संघ में हर थोड़े सालों में वोटिंग होती थी और लेनिन से ले कर गोर्बाचेव तक हर नेता 90-99 प्रतिशत वोट पाते रहे हैं पर श्रमिकों की कम्युनिस्ट सरकार में किसी नागरिक के पास कोई अधिकार न था. आज उत्तर कोरिया में भी चुनाव हो रहे हैं पर किम जोंग उन ही जीतते हैं, बिना विपक्ष के. 2019 के चुनावों में सभी नागरिकों ने जबरन वोट दे कर हर सीट के अकेले उम्मीदवार को चुनाव में किम जोंग उन की सुप्रीम पीपल्स असैंबली के 687 प्रतिनिधियों को चुना.

वोटोक्रेसी की धमक अमेरिका में भी

रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से टेस्ला और स्पेसएक्स के संस्थापक एलन मस्क को उन का हनुमान कहा जाने लगा है जो अमेरिका की सरकार में दखल दे रहे हैं और यूरोप व जरमनी में दक्षिणपंथी ताकतों को शह दे रहे हैं. यूरोप मस्क को ले कर बेहद बेचैन है. बीते दिनों एलन मस्क ने जम कर यूरोपीय नेताओं की आलोचना की. जरमनी की घोर दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी यानी अल्टरनैटिव फौर जरमनी का समर्थन उन्होंने किया. एलन मस्क ने कोई चुनाव नहीं जीता. वे वोटोक्रेसी के बिना भी शक्तिशाली हैं. क्या यह डैमोक्रेसी है?

गौरतलब है कि जरमनी में फरवरी में आम चुनाव होना है. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में एलन मस्क ने लिखा है कि जरमनी आर्थिक और सांस्कृतिक पतन की कगार पर है. डोनाल्ड ट्रंप को वोट देते समय लोगों ने उन्हें दुनियाभर से बैर लेने का हक नहीं दिया था. वोट राष्ट्रपति के चुनाव का था, किसी देश पर हमले का नहीं, इसलिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर ट्रंप के तीखे हमले से उन्हें ‘दुष्ट तानाशाह’ करार दिया गया.

ट्रंप की हरकतों में छिपे हमले से पूरा यूरोप चिंतित है. स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने मस्क का नाम लिए बिना कहा, ‘दुनिया का सब से अमीर आदमी हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों पर हमला कर रहा है और नफरत फैला रहा है.’ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के मुताबिक, ‘ट्रंप की छत्रछाया में पल रहे टैक अरबपतियों का दखल लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.’

संक्षेप में अगर कहें तो एलन मस्क ट्रंप के दक्षिणपंथी एजेंडे के विस्तार को मुहिम की शक्ल देने में लगे हैं. दिक्कत तो यह है कि अमेरिकी वोटरों के साथसाथ वहां के डैमोक्रेट्स पार्टी के नेता भी खामोशी से सब देख रहे हैं. कोई यह नहीं कह पा रहा कि पहले अपने देश के लोकतंत्र को तो संभाल लो, फिर गैरों की चिंता करना. हार के बाद कमला हैरिस ने बोलना बंद सा कर दिया है, शायद उन्हें एहसास है कि अब दौर डैमोक्रेसी का नहीं, सिर्फ वोटोक्रेसी का है.

संविधान से मिला वोटोक्रेसी का हक

भारत में जनता को वोटोक्रेसी का हक बड़ी आसानी से मिला. 1947 से पहले जनता की मांग गोरे ब्रिटिश, हुकूमत करने वालों को हटाने की तो थी पर वोट से ही अगले शासक चुने जाएंगे, यह पक्का नहीं था. संविधान में वोट का अधिकार अनुच्छेद 326 में दिया गया है जिस की भाषा निम्न है-

‘‘लोकसभा और हरेक राज्य की विधानसभा के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे, यानी हर व्यक्ति, जो भारत का नागरिक है और जिस की आयु 18 वर्ष से कम नहीं है, को ऐसे किसी भी चुनाव में मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार होगा.’’

रोचक बात यह है कि 1948 में संविधान सभा ने जो कच्चा प्रारूप पेश किया था उस में यह प्रस्ताव ही नहीं था. डा. भीमराव अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू ने इसे डलवाया और जून 1949 में हुई संविधान सभा की बैठक में उपरोक्त अनुच्छेद वर्तमान संविधान का हिस्सा बना.

यह एक अकस्मात मिलने वाला वरदान था जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने भी कभी देश की जनता को नहीं दिया था. उन्होंने जो दिया वह या तो राजाओं को दिया या ऋषियोंमुनियों को अगर आप को लगता है कि पुराण कोरे किस्सेकहानियां नहीं हैं तो. इसी देश में नहीं, दुनिया के अधिकांश देशों में बलशाली लुटेरे ही राजा बनते रहते थे और एक बार यदि कोई येनकेन कर के 10-20 हजार को मार कर राजा बना नहीं कि 5-7 पीढि़यों तक उस की संतानें राजगद्दी पर बैठी रहतीं. जनता सिर्फ चढ़ावा देती, सेना में भरती होती, राजा को भगवान कहलाने वाले पुजारियों को दानदक्षिणा देती. वोट से राजा चुना जाता है, यह कल्पना मन में थी ही नहीं.

भारत में 1952 में हुए पहले आम चुनावों से वोटोक्रेसी की शुरुआत हुई पर उस से पहले 26 जनवरी, 1950 में संविधान को देश चलाने का दर्शन व कानून मान कर लागू कर दिया गया. संविधान ने ही डैमोक्रेसी का वादा किया और यह मानना पड़ेगा कि चाहे जैसा भी शासन आज हमें मिल रहा है, संविधान से शिकायत के कम ही अवसर मिल रहे हैं. संविधान के अनुच्छेदों ने डैमोक्रेसी की भावना को घरघर तक पहुंचा दिया और गरीबों, अछूतों व हर धर्म के लोगों को डैमोक्रेसी का हकदार बना दिया.

1947 में जब भारत आजाद हुआ उस से पहले ब्रिटिश सरकार हर मनमानी कर ही सकती थी जिस की भर्त्सना हमारे ऊंची जातियों के लेखक, विचारक, इतिहासकार जम कर करते रहे हैं पर हिंदू अंगरेजों के अंगूठों के नीचे पनपती रियासतों में जो अनाचार होता था उस पर बहुत कम लोगों को बताया जाता है. परोक्ष रूप में सिद्ध करने की कोशिश रही है कि हिंदूमुसलिम राजा उदार व न्यायप्रिय ही थे. हालत उलटी थी. रियासतों में राजाओं की मनमानी चलती थी और वहां 1919, 1935 और 1945 के चुनावों में या नगर निकायों में भी चुनाव नहीं हुए.

अंगरेजों ने बहुत पहले से छिटपुट इलाकों में भद्रजनों से वोट डलवाना शुरू किया था. यह जनता के लिए एकदम नया अनुभव था वरना तो लोग यही समझते थे कि राजा ही नहीं, शहर को चलाने वाला एडमिनिस्ट्रेटर और कोतवाल भी या तो जन्मना होता है या राजा की कृपा पर निर्भर रहता है. अंगरेजों के जाने के साथ ही राजशाही खत्म हो गई. सब को बिना भेदभाव के वोट डाल कर लोकतांत्रिक राजा चुनने का हक मिल गया.

भारत में वोट डालना तो 19वीं सदी में कुछ शहरों में शुरू हो गया था पर उन में थोड़े से लोग वोट डाल पाते थे और यह केवल उन इलाकों में हुआ जो ब्रिटिश गवर्नर जनरल के कंट्रोल में थे. 1909 में इंडियन काउंसिल्स एक्ट के तहत मिंटो-मोर्ले सुधारों के नतीजे में कुछ प्रोविसैंस और म्युनिसिपल बौडीज में चुनाव हुए. कलकत्ता, मद्रास, बंबई, दिल्ली, अहमदाबाद में चुनाव हुए पर वोट का अधिकार सिर्फ शिक्षित, संपत्तिधारी मालिकों या गोरों को था. सुभाषचंद्र बोस और सरदार वल्लभाई पटेल इन चुनावों में उतरे और वहीं से नेता बने पर वे पूरे देश में वोटों से चुनी जाने वाली सरकार चाहते थे लेकिन ऐसी कोई बड़ी मांग नहीं उठ रही थी.

वोटों से डैमोक्रेसी लाने में शिक्षा बहुत जरूरी थी पर भारत के तब के ऊंची जातियों के कांग्रेसी नेता औरतों और शूद्रों व अछूतों को शिक्षा देने के सख्त खिलाफ थे. 1880 के दशक में बाल गंगाधर तिलक ने अंगरेज शासकों की म्युनिसिपल निकायों द्वारा स्कूल खोलने और उन के दरवाजे हरेक के लिए खोलने पर गहरी आपत्ति बारबार जताई. उन का कहना था कि म्युनिसिपल कमेटी रोड बनवाए, शहरों के संभ्रांतों के इलाकों को साफ रखे, फौआरे लगवाए, ट्राम चलवाए. नीची जातियों के सभी लोगों और ऊंची जातियों की औरतों को शिक्षा दिए जाने के खिलाफ मांग को अंगरेज प्रबंधकों ने नहीं माना.

आज फिर यह स्पष्ट दिख रहा है कि सीधे नहीं तो परोक्ष रूप से वोट की ताकत पर हमला हो रहा है. जिन नगर निकायों से बड़े नेता ब्रिटिश काल में निकल कर आए थे उन के चुनाव भी लोकसभा व विधानसभा के चुनावों के साथ कराने की भारतीय जनता पार्टी की जिद यही साबित कर रही है कि वह सारा पैसा एक चुनाव में झोंक कर थोक में लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय, जिला परिषद, पंचायतों के चुनाव करा कर जनता को बहकाना चाहती है. ‘एक देश एक चुनाव’ असल में एक देश, ‘एक बार’ चुनाव, एक पार्टी का चुनाव का रास्ता बनाने की साजिश है.

चुनावों में लालच : कीमत लो पर वोट दो

चुनाव कानून स्पष्टतया कहता है कि वोट के लिए पैसा नहीं दिया जा सकता और 1971 के रायबरेली से राजनारायण के खिलाफ लड़े चुनाव में कुछ साडि़यां बंटवाने के आरोप में 1975 में उच्च न्यायालय के जज जगमोहन लाल सिंह ने भारत और पाकिस्तान युद्ध में जीतीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था जिस के परिणाम में तत्कालीन सरकार ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था, जो आज भी कांग्रेस के गले में मरे व बदबूदार सांप की तरह लटक रहा है.

अब हर विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियां मुफ्त का माल बांटने का वादा कर रही हैं. इस में भी उन का फोकस महिलाओं पर ज्यादा रहता है. किसी न किसी योजना के नाम पर उन्हें हर महीने नकद राशि देने की घोषणा अब सभी पार्टियां करने लगी हैं. इस का असर यह हो रहा है कि महिलाएं अब पुरुषों से ज्यादा वोट डाल रही हैं. आर्थिक सहायता कमजोर वर्गों और महिलाओं को मिले, यह एतराज की बात नहीं, एतराज की बात है उन्हें लालच दे कर वोटों की भीड़ बना देना.

इस की बेहतर मिसाल मध्य प्रदेश का पिछला विधानसभा चुनाव है जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘लाड़ली लक्ष्मी योजना’ की शुरुआत कर हारा हुआ चुनाव जीत लिया था. यह मदद अगर सामाजिक बदलाव के मद्देनजर दी जाती तो जरूर इसे लोकतंत्र का बढ़ता कदम कहा जा सकता. यहां उद्देश्य सिर्फ वोट पाना था. यही महाराष्ट्र में हुआ, दिल्ली में हुआ.

अपनेआप में यह वोटोक्रेसी से डैमोक्रेसी की तरफ का रास्ता है, उलटा नहीं जैसा कि एक वर्ग समझता है. औरतों को सक्षम और स्वतंत्र बनाने का यह एक अच्छा कदम है चाहे इस के पीछे एक गलत स्वार्थ छिपा हो. औरतों को फुसलाने के लिए एक के बाद एक जो होड़ लगी है, वह काले बादलों में चमक है, काले बादल नहीं हैं.

यह नहीं भूलना चाहिए कि जो भी सरकारें, नरेंद्र मोदी के शब्दों में रेवड़ी कही जाने वाली, आर्थिक सहायता गरीबों को दे रही हैं वे लोगों से जबरन लूटे टैक्स में से कुछ पैसा वापस कर रही हैं. सरकारें जो पैसा औरतों को दे रही हैं वह देशवासियों द्वारा खरीदे गए सामान पर लगे जीएसटी, पैट्रोल, टैक्स, इनकम टैक्स के जरिए पहले ही वसूल लिया जाता है.

वोटोक्रेसी से अलग है डैमोक्रेसी

75 सालों में यह साबित हो गया कि वोट बहुत कीमती वस्तु है और इसे थोक में झटकने के लिए लोकतंत्र की नहीं बल्कि वोटतंत्र की जरूरत है. भूख मिटाने के नाम से ले कर मोक्ष दिलाने के नाम तक पर वोट झटके गए और हर बार लोगों को छले जाने के बाद एहसास हुआ कि वोट लेने के लिए जिस लोकतंत्र की दुहाई चुनावप्रचार के दौरान दी जाती है उस लोकतंत्र की हत्या तो उस के जन्म के कुछ सालों बाद ही कर दी गई थी.

मसलन, लोकतंत्र के लिए पहली अनिवार्य शर्त यह है कि चुनाव निष्पक्ष हों जोकि अब नहीं होते. लोग अपनी मरजी से वोट नहीं डाल पा रहे. वे राजनेताओं सहित धर्मगुरुओं, उद्योपतियों और कारोबारियों व समाजसेवियों के कहने पर वोट डालते हैं. लोकतंत्र की दूसरी अनिवार्य शर्त यह है कि लोग किसी लालच या डर के चलते वोट न डालें बल्कि निर्भीक हो कर वोट डालें. यह चलन भी कभी का खत्म हो चुका है. लोग कंबल, बरतन, दारू की बोतल और नकदी के एवज में वोट डालने लगे. उन्हें दीर्घकालिक से ज्यादा तात्कालिक फायदा पसंद आने लगा. लेकिन हद तो पिछले 2 सालों से हो रही है.

कुछ अपवादों को छोड़ कर डैमोक्रेसी को पछाड़ते वोटोक्रेसी इसी तरह परवान चढ़ रही है. अब लोग वोट के जरिए चुनते तो नेता हैं लेकिन वह देखते ही देखते भगवान हो जाता है जो किसी की नहीं सुनता. उस भक्त की तो बिलकुल नहीं सुनता जिस ने बड़ी उम्मीदों और श्रद्धा से उसे वोट की दक्षिणा दी थी.

लोकतंत्र की मूल अवधारणा की वाट तो ऐसी लगी है कि ‘जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा’ में जनता की जगह जाति शब्द चिपक गया. उदाहरणार्थ यादवों का, यादवों के लिए, यादवों द्वारा या कि मुसलमानों द्वारा, मुसलमानों के लिए, मुसलमानों का या फिर कुर्मियों का, कुर्मियों के लिए, कुर्मियों द्वारा शासन ही लोकतंत्र कहलाता है.

यह झंझट दुनियाभर का है कि डैमोक्रेसी की जगह वोटोक्रेसी ले चुकी है. अमेरिका में चुनावी प्रक्रिया जटिल होने के बाद भी वहां अब गोरे ईसाइयों का, गोरे ईसाइयों के लिए, गोरे ईसाइयों द्वारा शासन है जिस के गोरे, कट्टर और झक्की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 20 जनवरी को शपथ ली है.

चुने जाने के बाद ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि 6 जनवरी, 2021 को हुए अमेरिकी संसद पर हमले के दोषियों को बख्श दिया जाएगा. डोनाल्ड ट्रंप अब बड़े शान से कह रहे हैं कि उन का रिजौर्ट (मार-ए-लागो) ब्रह्मांड का केंद्र है. ऐलान बहुत साफ है कि वहां लोकतंत्र कैद है. उन के साथ डिनर लेने वाले लाइन में लग कर 8-8 करोड़ की चढ़ोतरी चढ़ा रहे हैं. अब यह तो समझने वाले ही समझ पा रहे हैं कि ट्रंप न केवल अमेरिका के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा बन गए हैं.

वोटोक्रेसी से डैमोक्रेसी के रास्ते का नक्शा तो हमारी संविधान सभा ने सही ढंग से समझ कर 1950 में लिख दिया पर शायद संविधान निर्माता भलीभांति जानते थे कि जिसे जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन प्रणाली कहा जाता है, वह इस देश में आना आसान नहीं है.

पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वोटोक्रेसी से डैमोक्रेसी तक पहुंचने के रास्ते को बनाने के लिए बहुत सी कोशिशें कानूनों के जरिए की थीं.

नेहरू ने भांप लिया था कि देश को लोकतंत्र देना है तो दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और औरतों को भी वोट डालने का कानूनी अधिकार दिलाना होगा, तभी स्वतंत्रता का उद्देश्य पूरा होगा, साथ ही, कांग्रेस सत्ता में रहेगी. कई चुनावों तक गैरसवर्ण कांग्रेस के शुक्रगुजार होते उसे वोट देते रहे. इस के एवज में उन्हें जो मिला वह भी अकल्पनीय था. वह था अपने अस्तित्व का एहसास, आत्मविश्वास और स्वाभिमान जो पहले राजशाही के दौरान महलों में गिरवी रखे रहते थे या अंगरेजों के गवर्नरहाउसों में गिरवी थे.

1947 से 1975 तक देश में वोटोक्रेसी जमती चली गई पर डैमोक्रेसी भी अपने कदम बढ़ाती रही. जगहजगह स्कूल खुल गए. अछूतों को नौकरियों में आरक्षण मिलने लगा, सरकारी नौकरियां भरभर के मिलने लगीं. जमींदारी का खात्मा हुआ. रियासतों के राजाओं की आन, बान व शान फीकी पड़ने लगी थी. प्रैस आजाद था. कांग्रेस की आलोचना करने वाले अखबार निकल रहे थे. टीवी अभी न के बराबर था पर रेडियो सरकारी भोंपू था जिसे डैमोक्रेसी से कोई मतलब न था.

वोट डालने के बाद डैमोक्रेसी तक पहुंचने का रास्ता संसद और विधानसभाओं से जाता है जहां जनता के वोटों से चुने प्रतिनिधि सरकारों के जनता को प्रभावित करने वाले फैसलों, कानूनों, नीतियों पर अपना यानी जनता का पक्ष रखते हैं और सरकार को निरंकुश व राजशाही बनने से रोकते हैं. जनप्रतिनिधियों की इस मंडली को अपार अधिकार संविधान ने दिए हैं और संसद व विधानसभाओं की सहमति के बिना प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री एक भी कानून नहीं बना सकते.

संसद और विधानसभाएं जनता के सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व करती हैं. जब एक पार्टी का बहुमत बहुत अधिक हो, संविधान को संशोधन करने तक का भी हो तो भी संसद में बिना बहस और बिना संसद की अनुमति के प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल या राष्ट्रपति अकेले कोई कानून नहीं बना सकते, कोई फैसला नहीं ले सकते. चुने हुए प्रतिनिधि जनता के डैमाक्रेटिक अधिकारों के रक्षक माने गए हैं. यह बात दूसरी है कि पिछले 75 सालों में वे जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं उतर सके और कितनी ही बार संसद व विधानसभाएं प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की मोहरा बन कर रह गईं.

संसद या विधानसभाएं अपनी सीमा पार न कर सकें, इस के लिए संविधान ने बहुत से प्रावधान रखे और संविधान संशोधन के बिना जनता का अधिकार छीनने वाले कानून नहीं बन सकते. 1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के दिए डैमोक्रेसी के बहुत से अधिकारों को संसद के संविधान को संशोधित करने के अधिकार से भी ऊपर रख दिया. जजों ने फैसला किया कि संविधान का मूलभूत ढांचा कोई संसद संविधान में संशोधन कर के बदल नहीं सकती.

लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं ने जनता की डैमोक्रेसी की चाहत को पूरी तरह नहीं समझा. आज डैमोक्रेसी जिंदा है क्या, जैसे सवाल किए जा रहे हैं तो इसलिए कि न संविधान, न सुप्रीम कोर्ट बल्कि संसद ने अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं किया. सांसदों और विधायकों ने वोट जनता से लिए पर अपना जमीर अपनी पार्टी के मुखिया को सौंप दिया. जनता की डैमोक्रेसी की संपत्ति राजनीतिक दलों के नेताओं के हाथों में गिरवी रख दी गई.

आज सांसद और विधायक की इज्जत जनता के मन में इतनी कम है कि वह इसी संसद के बनाए कानूनों से नियुक्त अफसरों पर कई बार ज्यादा विश्वास करती है. इस की संक्षिप्त चर्चा आगे होगी पर यह डैमोक्रेसी के आदर्श को हासिल करने में सब से बड़ी अड़चन साबित हुआ है कि जनता उन्हीं पर विश्वास नहीं करती जिन्हें वोट दे कर जिताती है.

वोटोक्रेसी से डैमोक्रेसी के रास्ते का सब से कमजोर हिस्सा लेजिसलेचर साबित हुए हैं. विधायिकाएं जनता के मन में कभी भी आदर का स्थान नहीं पा सकीं और अखबारों व टीवी चैनलों ने संसद या विधानसभाओं की बहसों को जनता तक पहुंचाना तक बंद कर दिया. विधायिकाओं में जनता के अनुसार केवल शोरशराबा होता है, मेजें थपथपाई जाती हैं, गालीगलौच होती है, सरकार के पहले से तय कानूनों पर महज औपचारिक मोहर लगती है.

जनता का पक्ष इन विधानमंडलों में आता है और उस के अनुसार ही काम होता है, यह गलतफहमी डैमोक्रेसी के सब से प्रबल समर्थकों को भी नहीं है.

सांसदों और विधायकों के दलबदल ने डैमोक्रेसी को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. सांसद और विधायक जनता की वोटों की खरीदफरोख्त कर सकें, यह तो वोटरों ने उस समय नहीं सोचा था जब वे वोट दे रहे थे. उन्होंने किसी पार्टी या उस के मनोनीत नेता को वोट दिया पर वह अपने कार्यकाल में पाला बदल ले, यह अधिकार उस वोट में कहीं से शामिल नहीं है. मतदाताओं के पास अपने चुने प्रतिनिधि को बुलाने का हक नहीं है लेकिन यह डैमोक्रेसी की अतिरिक्त भावना है कि चुना हुआ प्रतिनिधि उन वोटों, उन नीतियों, उन भाषणों पर कायम रहेगा जिन के आधार पर उस ने वोट पाए थे.

डैमोक्रेसी की सुरक्षा का जिम्मा जनता वोटों से अपने प्रतिनिधियों को देती है और न उन्हें दलदबल की इजाजत देती है और न डैमोक्रेसी को किसी तरह से चोट पहुंचाने का. अगर 76 सालों का इतिहास देखें तो साफ लगेगा कि चुने हुए प्रतिनिधियों ने, सांसदों ने, विधायकों ने जनता का विश्वास पूरी तरह तोड़ा है. इस के बावजूद अगर देश में डैमोक्रेसी का थोड़ा सा टूटा ही सही भक्त खड़ा है तो इस का श्रेय उस संविधान की नींव की मजबूती को जाता है जिस पर डैमोक्रेसी का ढांचा खड़ा है.

संविधान, सांसद, सुप्रीम कोर्ट और डैमोक्रेसी

यह राहत की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने वह काम किया जो जनता के चुने प्रतिनिधियों को करना चाहिए. सैकड़ों जज, सुप्रीम कोर्ट में आए और गए, ने संविधान की दी गई डैमोक्रेसी को जिंदा रखा है.

सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति केंद्र सरकार ही करती है. पहले तो यह अधिकार सिर्फ मंत्रिमंडल के सहारे प्रधानमंत्री का होता था पर फिर धीरेधीरे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के मौलिक ढांचे को बचाने के नाम पर यह अपने हाथ में लिया और अब सुप्रीम कोर्ट में कौलेजियम की सिफारिशों पर जज नियुक्त होते हैं. यह कदम डैमोक्रेसी की सुरक्षा का एक बड़ा कदम साबित हुआ है और इस मामले में हमारी न्यायपालिका दुनिया के दूसरे लोकतंत्रों से अधिक सही फैसले ले पाई है.

भारत के संविधान में कानूनों का राज है. जिस से हरेक नागरिक को बराबर का सम्मान, बराबर के अवसर और बराबर का व्यवहार गारंटेड है. सरकारें अगर ऐसा कानून बना रही हैं जिन में किसी एक वर्ग को किसी तरह की छूट दी जा रही हो या किसी तरह का गलत आचरण हो रहा हो तो सुप्रीम कोर्ट उस कानून को रद्द करने का साहस रखती है. अभी तक किसी सरकार की सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की अवहेलना का साहस नहीं किया है. हां, सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में ध्यान रखा जाता है कि वे सत्ता पक्ष का खयाल रखें.

संविधान से हटने के हर प्रयास को सुप्रीम कोट ने रोका है. कई बार जजों की अपनी निजी निष्ठा या अवकाशप्राप्ति के बाद सुखों की अपेक्षा के कारण डैमोक्रेसी को सीमित करने वाले जो कानून बने हैं उन्होंने उन्हें स्वीकार कर लिया पर देरसबेर उन्हें पलट दिया गया. 2023 में इलैक्टोरल बौंड्स पर दिया सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण फैसला था. उस ने भारतीय जनता पार्टी के चंदे लेने के तौरतरीके पर पूरी तरह फुलस्टौप लगा दिया.

संविधान का विशाल वृक्ष डैमोक्रेसी की उपजाऊ जमीन में खड़ा रहे और शासक इस पेड़ के तने काट कर अपने महल न बना लें, इस के लिए शुरू से ही सुप्रीम कोर्ट ज्यादा सतर्क रहा है.

जज वी एन खरे ने 2004 के एक निर्णय में कहा कि संविधान की खूबसूरती इसी में है कि पूरे देश का ढांचा इस पर टिका है. यह वह स्तंभ है जिस पर देश की डैमोक्रेसी टिकी है. जज एस पी अरुणा ने कहा कि संविधान, सरकार को संविधान को कुचलने का हक नहीं देता.

अदालत है जो आज की कथित डैमोक्रेसी में आम आदमी का आखिरी सहारा बचा है. लेकिन उस के साथ भी दिक्कत यह है कि वहां सालोंसाल लग जाते हैं. न्याय पाने के लिए जेब में पैसा न हो, जो देश की 90 फीसदी जनता के पास नहीं है तो लोग अपना रोना रोने या इंसाफ मांगने कहां जाएं.

इस के बाद भी अच्छी और सुखद बात यह है कि अदालतें सरकार के गलत फैसलों और नीतियों से इत्तफाक नहीं रखतीं क्योंकि एक तरह से वे सरकार की अभिभावक हैं. बुलडोजर पर अदालत ने अपना रुख साफ कर दिया कि यह गैरकानूनी है तो लाखोंकरोड़ों ने चैन की सांस ली कि कोई तो है जो सरकार की मनमानी पर लगाम कस सकता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर भी सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि उन का चयन एक समिति करेगी जिस में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता सहित सीजेआई यानी उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश करेंगे. लेकिन सरकार ने इस में भी टांग अड़ा कर इसे पेचीदा बना दिया. सरकार ने कानून बना कर सीजेआई की जगह एक केंद्रीय मंत्री को समिति में शामिल कर दिया. मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है जिस की सुनवाई होनी है. ऐसी दर्जनों नियुक्तियों में सरकार की मनमानी चलती है. आम लोगों की राय के कोई माने नहीं होते.

यहां यह दलील बहुत खोखली साबित होती है कि हम ने तो सांसद चुन कर भेज दिया जो अहम मामलों और नियुक्तियों में हमारा प्रतिनिधित्व करेगा. इस दलील की हकीकत यह है कि एक सांसद बहुत मामूली वोटों से भी जीतता है. मान लें कि उसे 100 में से 35 ही वोट मिले जबकि बाकी 65 दूसरे उम्मीदवारों में बंट गए. ऐसे में यह बात दावे से नहीं कही जा सकती कि बाकी 65 भी उस से सहमत हैं. यह एक बड़ी खामी है जो डैमोक्रेसी को वोटोक्रेसी में तबदील करती है. इस का हल निकाला जाना जरूरी है.

बड़े तो बड़े, बहुत छोटे दिखने वाले मामलों, जो एक नागरिक के लिए बेहद अहम होते हैं, में भी अदालतें सरकार के अलावा ब्यूरोक्रेट्स को उन की ड्यूटी व जिम्मेदारी का एहसास कराने से नहीं चूकतीं. ऐसा ही एक वाकेआ मध्य प्रदेश से 10 जनवरी को सामने आया. रीवां जिले के एक किसान राकेश तिवारी की सवा एकड़ जमीन का अधिग्रहण जिला प्रशासन ने 32 साल पहले जबरन कर लिया था.

इस में दूसरी अलोकतांत्रिक बात यह थी कि उन्हें इस जमीन का कोई मुआवजा ही नहीं दिया गया. राकेश सालों तक नेताओं और अधिकारियों के चक्कर काटते रहे लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई. थकहार कर उन्होंने जबलपुर हाईकोर्ट की शरण ली. उन का मुकदमा साल 2015 से ले कर 2023 तक चला. हाईकोर्ट ने राकेश के पक्ष में फैसला देते कहा, ‘मामले की अंतिम सुनवाई तक उन्हें इस जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता.’ राजस्व विभाग ने अदालत के मुआवजा संबंधी जानकारी के नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया.

रीवां कलैक्टर जब यह जानकारी देने में असमर्थ रहे तो कोर्ट ने तत्कालीन कलैक्टर पर 10 हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया. 6 जनवरी की सुनवाई में भी प्रशासन की ढील कायम रही तो झल्लाई अदालत ने मौजूदा कलैक्टर प्रतिभा सिंह को मामले से जुड़े कागजात साथ ले कर आने को तलब किया. कलैक्टर साहिबा ने एक आवेदन दिया कि चूंकि उन के पति बीमार हैं इसलिए वे कोर्ट नहीं आ सकतीं.

इस आवेदन को खारिज करते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल ने उन्हें यह फटकार लगाई कि ‘आप का काम गैरजिम्मेदाराना है. आप को अधिकार जनता की सेवा करने के लिए दिए गए हैं.’ इस फटकार के बाद प्रतिभा सिंह 8 जनवरी को मय कागजात अदालत में हाजिर हुईं. जब वे कोर्ट के सवालों का जवाब देने में नाकाम रहीं तो जस्टिस महोदय ने फैसला दिया कि राकेश तिवारी को उन की जमीन वापस की जाए. कोर्ट ने प्रतिभा सिंह पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी ठोका क्योंकि वे इस मामले की सही तरीके से जानकारी नहीं दे पाई थीं और न ही मुआवजे की बाबत कोई ठोस कार्रवाई उन्होंने की थी.

इस मामले से साबित यही हुआ कि न्यायपालिका ही आम नागरिक की आस है जो यहांवहां भटकने के बाद न्याय के लिए कोर्ट पहुंचता है. राकेश तिवारी जैसे लोगों की परेशानी यह है कि ऐसे किसी मामले में फंस जाने पर वे कहां जाएं?

डैमोक्रेसी को बचाने या मारने वाली नौकरशाही

वोटोक्रेसी से डैमोक्रेसी के रास्ते में संविधान एक मुख्य सड़क है. यह बात दूसरी है कि इस सड़क पर सैकड़ों अतिक्रमण हो चुके हैं. सब से ज्यादा अतिक्रमण सरकार की नौकरशाही ने किए हैं. नौकरशाही ने संविधान की भावना का आदर कभी नहीं किया. उस ने हमेशा मनमानी की है.

2025 में आई ऐक्टर रामचरण की फिल्म ‘गेमचेंजर’ में नेता और सरकारी अफसर का द्वंद्व दिखाया गया है. इस में जनता के वोटों को निरीह दिखाया गया है, निरर्थक बताया गया है. यह दर्शाया गया है कि जनता का हित न संविधान करता है, न वोट करते हैं. हित तो एक कर्मठ-ईमानदार अफसर के हाथों में सुरक्षित हैं. यह संदेश जनता को बहकाने वाला है, वोटोक्रेसी को बदनाम करने वाला है.

इसी तरह ‘पुष्पा 2’ में अल्लू अर्जुन रौबिनहुड की तरह संविधान की दी गई वोटोक्रेसी और डैमोक्रेसी को कुचलता हुआ चंदन की लकडि़यों की स्मगलिंग करता हीरो बना फिरता है और दर्शक तालियां पीटते हैं.

डैमोक्रेसी के खिलाफ ये दोनों और इस से पहले बनी सैकड़ों फिल्में जनता को बहकाती रही हैं. आज जो मनमानी नेता कर पा रहे हैं उस का बहुत बड़ा कारण ये फिल्में भी हैं जिन्होंने संविधान निर्माताओं और संविधान की रक्षक सुप्रीम कोर्ट के काम को कमजोर किया. ‘शोले’ भी इसी गिनती में आएगी जिस में स्पष्ट दिखाया गया है कि देश का संविधान सम्मत कानून, जो वोटों से चुनी सरकार बनवाती है, गब्बर सिंह जैसे डाकू के हाथों हार जाता है और एक पुलिस अफसर को 2 अपराधियों को पैसे दे कर न्याय पाने के लिए हिंसा करने के लिए बुलाना पड़ता है.

वोटोक्रेसी को डैमोक्रेसी से अलग करने की साजिश में ये फिल्में ही नहीं, पूरा मीडिया भी लगा हुआ है. पहले मीडिया कांग्रेस भक्त था, आज वर्णव्यवस्था भक्त है. आज का वर्णव्यवस्था भक्त मीडिया नरेंद्र मोदी के बहाने वोटोक्रेसी के हरेक को मिले बराबर के स्तर, बराबर के हक, बराबर के अवसरों को छीन कर पंडोंपुजारियों की झोली में डालने में लिप्त है.

संविधान को जीवन का सूत्र मानने की भावना आज भी हम में पैदा नहीं हुई है. आज भी हमारे लिए पौराणिक कथाएं-कहानियां ज्यादा महत्त्व की हैं. संसद भवन के उद्घाटन के समय जो नाटक नरेंद्र मोदी ने किया वह यह दर्शाता है कि उन की संवैधानिक भावनाओं के प्रति क्या श्रद्धा है. उन की श्रद्धा तो मंदिरों, मठों के पुजारियों, संतों व महंतों में है जो न वोटोक्रेसी से कोई संबंध रखते हैं, न डैमोक्रेसी से.

पौराणिक स्मृतियों की तरह भारत का संविधान कोई ऐसा डौक्युमैंट नहीं जो ईश्वर (यदि हो) का दिया माना जाए. गीता में कृष्ण बारबार ‘मैं’ ‘मैं’ करते हुए अर्जुन को अपने भाइयों से युद्ध के लिए उकसाते हैं, उस युद्ध के लिए जो जनता के लिए नहीं हो रहा था बल्कि राजपुत्रों के अपने सुखों के लिए हो रहा था, साथ ही, वे वर्णव्यवस्था को ईश्वर की दी व्यवस्था बता जाते हैं. संविधान ने ऐसी कोई गलती नहीं की.

डैमोक्रेसी को वोटोक्रेसी ने खत्म किया या मीडिया ने

वोटोक्रेसी अभी शुक्र है कि डैमोक्रेसी को पूरा निगल नहीं पाई है और जितना निगल चुकी है उस की एक बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की भी है जिसे, कहने को ही सही, प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. मीडिया राजा की ज्यादा सुनता है, जनता की कम. इस की बहुत सी वजहों में से एक यह भी है कि अधिकतर मीडिया हाउस दूसरे कामधंधों और कारोबारों में जुट गए हैं. अधिकतर अखबार, न्यूज चैनल्स, मैगजींस वगैरह अपने दूसरे धंधों को सुचारु रूप से चलाए रखने के लिए चलाए जा रहे हैं.

दूसरे आम लोग भी मोबाइल फोन नाम के पिंजरे में कैद हो चले हैं. उन के पैरोंतले फेसबुक, व्हाट्सऐप, यूट्यूब और इंस्टाग्राम सरीखे दर्जनों सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स धनकुबेरों ने बिछा दिए हैं. जिन पर वे धार्मिक कार्यक्रम देखते हैं, पोर्न फिल्मों का सेवन करते हैं और रील बनाने सहित तमाम फुजूल के काम करते हैं जो उन्हें वोटोक्रेसी का हिस्सा बनाए रखते हैं. इस से होता यह है कि लोग किसी भी मुद्दे या घटना पर मौलिक तर्क और विश्लेषण नहीं कर पाते क्योंकि ये उन्हें रेडीमेड मिल जाते हैं और उपलब्ध कराने वाले वही लोग, दल (गिरोह) और संगठन होते हैं जो वोटोक्रेसी के पालकपोषक हैं.

जब से लोगों ने अखबार, किताबें और पत्रिकाएं पढ़ना छोड़ा है तब से उन के दिमाग पर, बुद्धि पर और जागरूकता पर इंटरनैट की जंग लगी है जिसे ले कर दुनियाभर के जानकार चिंतित हैं क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म के मालिकों ने लोगों को मजबूर कर दिया है कि वे उन के दिमाग से सोचें, उन के सुझाए रास्ते पर चलें, उन के ही विचारों को अंतिम सत्य समझें और कट्टर दक्षिणपंथी शासकों के हर फैसले से इत्तफाक रखें.

ऐसे दौर में जरूरत लोकतंत्र को उस के सही शेप में लाने की है. लेकिन यह आसान काम नहीं है क्योंकि इसे कोई करना ही नहीं चाहता. लोग फौरीतौर पर अपने लोकतांत्रिक अधिकार जानते व समझते हैं और इन्हें भीख की तरह मांगने जाते उन्हीं के पास हैं जो इन के वोटों की ताकत पर राज करते खुद के रिजौर्ट को ब्रह्मांड का केंद्र बताते हैं और जो शासक इतनी हिम्मत या जुर्रत नहीं कर पाते वे मंदिर, मसजिद और चर्चों की शरण में जाने का इशारा करते यह कह देते हैं कि हम तो निमित्त मात्र हैं, सब से बड़ा तो वह है जो दुनिया का कर्ताधर्ता है.

डैमोक्रेसी को मंदिरक्रेसी में बदलने के प्रयास भी पिछले 50 वर्षों से हो रहे हैं और अगले 10 वर्षों तक तो चलेंगे, ऐसा लग रहा है. मंदिर बनवा दिए तो सरकार कैसा काम कर रही है, मत पूछो, मंदिर के नाम पर वोट दो, मंदिर में चंदा चढ़ाओ, धर्मकर्म में लगे रहो. यह डैमोक्रेसी नहीं है.

भारत में यह दूसरे तरीके से भी हो रहा है. विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन ने संविधान सीने से लगा कर डैमोक्रेसी को जिंदा रखने के लिए वोटोक्रेसी को अपनाया तो भाजपा रामलला को कंधे से लगाए रही. जनता अब भ्रमित है कि हमारी सुनेगा कौन, ये भगवानवादी या वे संविधानवादी. असल में सुनता संविधानवादी विपक्ष ही है और कभीकभार वही मुद्दे की बातों पर हल्ला भी मचाता है. यह और बात है कि उस की आवाज घंटेघडि़यालों की आवाज तले दब कर रह जाती है. नोटबंदी के दौरान भी ऐसा ही हुआ था और जीएसटी कानून लागू होने के बाद भी और ऐसे कई मौकों व किसान आंदोलन के दौरान भी यही हुआ था.

लेकिन इस में इकलौती अच्छी बात यह हुई थी कि सरकार को किसानों के आगे झुकते हुए काले कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था. लगभग यही शाहीन बाग के धरनेप्रदर्शन में हुआ था. ये दोनों ही उदाहरण लोकतंत्र की धुंधलाती इबारत को थोड़ा गाढ़ा कर गए क्योंकि इन दोनों के साथ कोई नहीं था, वह मीडिया तो कतई नहीं था जिसे खुद के गोदी मीडिया कहे जाने पर शर्मिंदगी नहीं बल्कि फख्र महसूस होता है. इन दोनों आंदोलनों को कुचलने, दबाने और बदनाम करने में गोदी मीडिया सरकारी भाषा ही बोल रहा था.

सिर्फ वोटोक्रेसी बनी रहे, डैमोक्रेसी न पनपे, इस के लिए भाजपा ने जो और उपाय किए उन में विपक्षी दलों की खरीदफरोख्त और उन में तोड़फोड़ भी अहम है. मसलन, बसपा खत्म की गई तो दलित वोटों की भीड़ का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ बढ़ा. महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के दोदो टुकड़े कर वोट के साथसाथ सत्ता हथिया लेने का दांव भी चला और संक्षेप में कहें कि इस से भी बात न बनी तो ईडी और आईटी जैसी सरकारी एजेंसियों का जम कर कु-इस्तेमाल किया गया. इंदिरा गांधी होतीं तो वे भी हैरान रह जातीं कि इन्होंने तो मुझे भी मात दे दी.

अब जीता और हारा हुआ दोनों ही दोषी हैं डैमोक्रेसी से बहुत दूर ले जाने के लिए. हारजीत के बाद वे जनता को ‘भगवान भरोसे’ छोड़ अपनेअपने काम में लग जाते हैं. आम लोग छोटेबड़े कामों के लिए यहां से वहां भटकते राजनीति और नेताओं को कोसते रहते हैं. वोट मंदिर में चढ़ाए दक्षिणा के पैसों की तरह रहता है जो एक बार दानपेटी में गया तो फिर वापस नहीं आता. जो मंदिर से चाहा था वह मिलेगा, इस की कोई गारंटी तो दूर, यह आश्वासन भी नहीं है कि कभी कुछ मिलेगा.

चुनाव आयोग भी जिम्मेदार

वहीं, निष्पक्षता भी कठघरे में खड़ी हुई और निष्पक्षता से वोट डलवाने की जिम्मेदारी निभाने वाला चुनाव आयोग भी कठघरे में है. अरबोंखरबों रुपए फूंकने के बाद भी देश में मुद्दत से निष्पक्ष चुनाव नहीं हो पा रहे. हर चुनाव में करोड़ों की नकदी पकड़ी जाती है जिसे कानून के तहत राजसात कर लिया जाता है. इस के बाद इस का क्या होता है, यह किसी को नहीं मालूम. धर्म और जाति के नाम पर वोट डालने का रोग जो फैला तो सिमटने का नाम नहीं ले रहा.

चुनाव आयोग चाहे तो भी बहुतकुछ नहीं कर सकता. वह 1 करोड़ लोगों को जैसेतैसे वोट करने का अवसर दे देता है, यही बहुत है. अगर चुनाव में लोग किसी पार्टी की तरफदारी करें तो आयोग वास्तव में कर्म ही कर सकता है. वोटोक्रेसी में चुनाव आयोग की नहीं, वोट डालने वालों की समझ की जरूरत है.

बीमारी के 2 ही इलाज बचते हैं, पहला यह है कि सभी जनप्रतिनिधियों के घरों के बाहर 60 घंटियों वाला घंटा लटकवा देना चाहिए जैसा कि मुगल शासक जहांगीर ने अपने महल के बाहर लगवा कर सुनिश्चित किया था कि कोई भी पीडि़त इस घंटे को बजा कर न्याय मांग सकता था, अपनी परेशानी दूर करने की गुहार लगा सकता था. यह घंटा जरूरी नहीं कि सोने का हो और 240 किलो का ही हो, वह लोहे का हो, तो भी चलेगा और बजेगा बशर्ते छोटेबड़े जनप्रतिनिधि अपनी कुंभकर्णी नींद और ऐशोआराम छोड़ते जहांगीर की तरह आधी रात को भी उठ कर बाहर आएं.

दूसरा रास्ता गलीमहल्लों, गांवदेहातों में संविधान जागरूकता केंद्र खोलने का है जिन में कुछ पढ़ेलिखे जागरूक लोग, जैसे वकील, टीचर, प्रोफैसर, पत्रकार, महिलाएं और हारे हुए उम्मीदवार भी शामिल हों. वे नियमित इन केंद्रों में बैठें और वोटोक्रेसी के नुकसान व डैमोक्रेसी के सही माने समझाएं और लोगों को उन के लोकतांत्रिक अधिकार न केवल बताएं बल्कि उन के लिए सड़कों पर आ कर लड़ें भी.

डैमोक्रेसी एक अद्भुत उपहार है जो पिछले कुछ शतकों में जनता को मिला और जिस के कारण मानव का अभूतपूर्व विकास हुआ. पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, मुसलिम देशों, लैटिन अमेरिका के देशों में भयंकर गरीबी का कारण यह है कि वहां नाम की डैमोक्रेसी है. ह्यूमन डैवलपमैंट डैमोक्रेसी में ही संभव है. विज्ञान की उन्नति का असल लाभ लोगों को डैमोक्रेसी में ही मिला. वोट मशीन से स्वतंत्रता भी निकलती है, जंजीरें भी. यह लोगों के विवेक पर निर्भर है कि वे क्या चाहते हैं.

Hindi Story : सच्ची खुशी – क्या विशाखा को भूलकर खुश रह पाया वसंत ?

Hindi Story : वसंत एक जनरल स्टोर के बाहर खड़ा अपने दोस्तों से बातें कर रहा था. उसे आज फिर विशाखा दिखाई दे गई. विशाखा उस के पास से निकली तो उस के दिल में आंधियां उठने लगीं. उस ने पहले भी कई बार आतेजाते विशाखा को देख कर सोचा, ‘धोखेबाज, कहती थी मेरे बिना जी नहीं सकती, अब यही सब अपने दूसरे पति से कहती होगी. बकवास करती हैं ये औरतें.’ फिर अगले ही पल उस के मन से आवाज आई कि तुम ने भी तो अपनी दूसरी पत्नी से यही सब कहा था. बेवफा तुम हो या विशाखा?

वह अपने दोस्तों से विदा ले कर अपनी गाड़ी में आ बैठा और थोड़ी दूर पर ही सड़क के किनारे गाड़ी खड़ी कर के ड्राइविंग सीट पर सिर टिका कर विशाखा के बारे में सोचने लगा…

वसंत ने विशाखा से प्रेमविवाह किया था. विवाह को 2 साल ही हुए थे कि वसंत की मां उमा देवी को पोतापोती का इंतजार रहने लगा. उन्हें अब विशाखा की हर बात में कमियां दिखने लगी थीं. विशाखा सोचती क्या करे, उस के सिर पर मां का साया था नहीं और पिता अपाहिज थे. बरसों से वे बिस्तर पर पड़े थे. एक ही शहर में होने के कारण वह पिता के पास चक्कर लगाती रहती थी. उस की एक रिश्ते की बूआ और एक नौकर उस के पिता प्रेमशंकर का ध्यान रखते थे.

उमा देवी को अब हर समय वसंत की वंशवृद्धि की चिंता सताती. विशाखा उन की हर कड़वी बात चुपचाप सहन कर जाती. सोचती, जो बात कुदरत के हाथ में है, उस पर अपना खून जलाना बेकार है. वह आराम से घर के कामों में लगी रहती. उसे परेशानी तब होती जब वसंत को उस से कोई शिकायत होती. वह वसंत को इतना प्यार करती थी कि उस की बांहों में पहुंच कर वसंत कह उठता, ‘तुम किस मिट्टी की बनी हो, पहले दिन की तरह आज भी कितनी सुंदर दिखती हो.’

विशाखा हंस कर उस के सीने से लग जाती और इस तरह 5 साल बीत गए थे.

वसंत के औफिस से आने के समय विशाखा उसे तैयार हंसतीमुसकराती मिलती. उमा देवी को यह पसंद नहीं था. एक दिन वे वसंत से बोलीं, ‘तुम उदास और दुखी क्यों रहते हो?’

वसंत हंसा, ‘क्या हुआ है मुझे? अच्छा तो हूं?’

‘बिना बच्चे के भी कोई जीवन है,

बच्चों से ही तो जीवन में रौनक आती है,’ उमा देवी बोलीं.

‘मां, दुनिया में हजारों लोग हैं, जिन्हें बच्चे नहीं हैं,’ वसंत शांत रहते हुए बोला.

‘तुम ढंग से डाक्टर को दिखाते क्यों नहीं हो?’

‘अभी तक इस बारे में गंभीरता से नहीं सोचा था मां, अगले हफ्ते दिखाता हूं,’ यह कह कर वसंत अपने कमरे में चला गया.

विशाखा वसंत के लिए चाय ले कर आई, तो वसंत की मुखमुद्रा देख कर समझ गई कि मांबेटे में क्या बातें हुई होंगी.

फिर डाक्टर, चैकअप, टैस्ट का सिलसिला शुरू हुआ और जब रिपोर्ट आई कि विशाखा कभी मां नहीं बन सकती, तो विशाखा के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

वसंत विशाखा को समझाता रहता कि हम किसी अनाथालय से बच्चा गोद ले लेंगे. लेकिन उमा देवी किसी पराए बच्चे को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हुईं.

वसंत उन्हें भी समझाता, ‘मां, जमाना कहां से कहां पहुंच गया है और आप अपनेपराए में उलझी हुई हैं.’

वसंत के बचपन में ही उस के पिता का देहांत हो गया था. उमा देवी ने बड़ी मेहनत से वसंत को पढ़ायालिखाया था. वसंत मां का दिल कभी नहीं दुखाना चाहता था.

उमा देवी अब कभीकभी वसंत को अपने पास बैठा कर दूसरे विवाह की बात करतीं तो वह चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चला जाता.

अब बच्चे के नाम पर वसंत की ठंडी आहें विशाखा को अंदर तक चीरने लगीं. वसंत की वही आंखें जो पहले उस के प्यार के विश्वास से लबालब नजर आती थीं, अब निरादर और अवहेलना के भाव दर्शाने लगी थीं. वसंत लाख अपने भावों को छिपाने का प्रयास करता, लेकिन विशाखा उस की हर धड़कन, उस की हर नजर पहचानती थी.

मन ही मन घुटती रहती विशाखा, चारों ओर कुहासा सा नजर आता उसे. जीवन के सफर में साथ चलतेचलते अब दोनों के हाथ एकदूसरे से छूटने लगे थे.

एक दिन विशाखा अपने पिता को देखने गई. उन की तबीयत बहुत खराब थी. वसंत ने फोन पर कह दिया, ‘जितने दिन चाहो उतने दिन रह लो.’

विशाखा ने पूछा, ‘तुम्हें परेशानी तो नहीं होगी?’

‘नहीं,’ सपाट स्वर में कह कर वसंत ने रिसीवर रख दिया.

विशाखा हैरान रह गई कि यह वही वसंत है, जिस ने इतने सालों में 2 दिन के लिए भी पिता के पास नहीं छोड़ा था. सुबह छोड़ता तो शाम को अपने साथ ले जाता था. उसे लगा, वसंत सचमुच पूरी तरह बदल गया है और फिर वसंत ने न फोन किया, न आया ही. विशाखा फोन करती तो अनमना सा हां, हूं में जवाब दे कर रिसीवर रख देता.

एक बार भी वसंत ने विशाखा को घर आने के लिए नहीं कहा और अब 2 महीने बीत गए थे.

विशाखा को रोज उस का इंतजार रहता. प्रेमशंकर बोल तो नहीं सकते थे, मगर देख तो सकते थे. उन की हालत बिगड़ती जा रही थी. आंखों में विशाखा के प्रति चिंता व दुख साफ दिखाई देता था.

एक दिन वसंत ने तलाक के पेपर भेज दिए और उसी दिन शाम को किसी से विशाखा का सारा सामान भी भिजवा दिया.

विशाखा के घर में सन्नाटा फैल गया. जिसे दिल की गहराई से इतना प्यार किया था, ऐसा करेगा, विशाखा ने कभी सोचा न था. इतना बड़ा धोखा. जिस आदमी को इतना प्यार किया, जिस के सुख में सुखी, दुख में दुखी हुई, वही आदमी इतना बदल गया… वह जितना सोचती उतना ही उलझती जाती. फिर अपने को समझाने लगती, अगर मैं गलत नहीं हूं तो मैं इतनी दुखी क्यों होऊं? तलाक के पेपर फिर आंखों के आगे घूम गए, वह छटपटाती, बेचैन, असहाय सी सुबकती रही.

इतना बड़ा विस्फोट पर कहीं कोई आवाज नहीं. बाहर से सब कुछ कितना शांत पर भीतर ही भीतर बहुत कुछ टूट कर बिखर गया. पिता की बिगड़ती हालत देख कर वह और दुखी हो जाती.

थोड़े समय बाद तलाक भी हो गया. उसे पता चला कि वसंत ने दूसरा विवाह कर लिया है. रात भर वह रोतीसिसकती रही. वसंत के साथ बिताया 1-1 पल याद आता रहा.

प्रेमशंकर को अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा. उन्होंने अपने वकील सिद्धार्थ गुप्ता को बुला लिया और घर व किराए पर चढ़ी हुई सारी दुकानें विशाखा के नाम कर दीं. उन की आंखों में विशाखा के लिए चिंता साफ दिखाई देती.

सिद्धार्थ गुप्ता शहर के प्रसिद्ध वकील थे, उम्र में विशाखा से कुछ ही बड़े थे, लेकिन बहुत ही सहृदय व सुलझे हुए इंसान थे. इस पूरी दुनिया में प्रेमशंकर को सिद्धार्थ से ज्यादा भरोसा किसी पर न था.

वे जब भी आते, विशाखा ने देखा था प्रेमशंकर की चिंता कुछ कम हो जाती थी. विशाखा के विवाह के बाद भी सिद्धार्थ ही प्रेमशंकर का हर तरह से ध्यान रख रहे थे. प्रेमशंकर सिद्धार्थ को सालों से जानते थे. विशाखा से सिद्धार्थ की जितनी भी बातें होतीं, प्रेमशंकर के बारे में ही होतीं. विशाखा तलाकशुदा है, यह वे जानते थे, लेकिन विशाखा से इस बारे में उन्होंने कभी कुछ नहीं पूछा था.

वसंत के दुख के साथसाथ पिता की आंखों में बसी चिंता विशाखा को और व्याकुल किए रहती. उस की बूआ और नौकर घर संभालते रहे. वह अस्पताल में प्रेमशंकर के पास थी. सिद्धार्थ आतेजाते रहते.

एक दिन सिद्धार्थ जाने लगे, तो विशाखा बोली, ‘एक व्यक्तिगत प्रश्न पूछना चाहती हूं आप से.’

सिद्धार्थ ने देखा, प्रेमशंकर नींद में हैं और विशाखा बहुत परेशान है व कुछ कहने की हिम्मत जुटा रही है. अत: बोले, ‘पूछिए.’

‘आप ने विवाह क्यों नहीं किया?’

सिद्धार्थ को एक झटका सा लगा, लेकिन फिर धीरे से बोले, ‘कोई मजबूरी थी,’ कह कर वे जाने लगे तो विशाखा ने तेजी से आगे बढ़ कर कहा, ‘क्या आप मुझे बता सकते हैं?’

सिद्धार्थ वहीं अपना बैग रख कर बैठ गए और फिर धीरेधीरे बोले, ‘कुछ लोग कमियों के साथ पैदा होते हैं और अगर मैं विवाह के योग्य होता तो सही समय पर विवाह कर लेता… आप मेरी बात समझ गई होंगी.’

‘हां, सिद्धार्थ साहब, ऐसा सिर्फ पुरुषों के साथ ही नहीं, स्त्रियों के साथ भी तो होता है. मैं भी कभी मां नहीं बन सकती. इसी कारण मेरा तलाक हो गया. मैं ने हर संभव तरीके से विवाह को बचाने का प्रयत्न किया, लेकिन बचा नहीं सकी.’

सिद्धार्थ ने हैरान हो कर उस की तरफ देखा तो विशाखा ने कहा, ‘क्या आप मेरे साथ विवाह कर सकते हैं?’

‘विशाखा, आप होश में तो हैं?’

‘बहुत सोचसमझ कर कह रही हूं, मेरे पापा की जान मुझ में अटकी है, आप तो वकील हैं, यह जानते हैं कि एक अकेली औरत को दुनिया कैसे परेशान करती है. अगर आप मुझ से विवाह कर लेंगे तो हम दोनों को एक जीवनसाथी और उस से भी बढ़ कर एक दोस्त मिल जाएगा. हम अच्छे दोस्तों की तरह जीवन बिता लेंगे. बस, आप का साथ मांग रही हूं, मुझे और कुछ नहीं चाहिए. क्या आप मेरी बात मान सकते हैं?’

सिद्धार्थ ने विशाखा को गौर से देखा, उस के सच्चे चेहरे को परखा और फिर मुसकरा दिए.

शीघ्र ही दोनों का विवाह हो गया और विवाह के कुछ समय बाद ही प्रेमशंकर ने हमेशा के लिए आंखें बंद कर लीं.

विशाखा सिद्धार्थ के घर आ गई. घर वैसा ही था जैसा औरत के बिना होता है. नौकर तो थे, लेकिन विशाखा का हाथ लगते ही घर चमक उठा. एक दिन सिद्धार्थ भावुक हो कर बोले, ‘कैसा पति था, जिस ने तुम्हें तलाक दे दिया.’

दोनों अपने मन की ढेरों बातें करते, दोनों को एकदूसरे में अच्छा दोस्त दिखाई देता था. विशाखा दिन भर घर को बनातीसंवारती, उन की फाइलें संभालती. रात को उन के कमरे में उन की दवा और पानी रख कर मुसकरा कर ‘गुडनाइट’ बोल कर अपने बैडरूम में आ जाती. बैड पर लेट कर किताबें पढ़ती और सो जाती. सुबह अच्छी तरह तैयार हो कर सिद्धार्थ के साथ नाश्ता करती. उन के जाने के बाद गाड़ी निकालती और सिद्धार्थ के बताए कामों को पूरा करती यानी कभी बैंक जाना, कभी उन के डाक्टर से मिलती, उन का हिसाबकिताब देखती, उन का हर काम हंसीखुशी करती.

आज वसंत को विशाखा फिर दिखाई दे गई थी. छोटा शहर था, इसलिए कई बार पहले भी दिख चुकी थी. औफिस से उठ कर इधरउधर घूमना वसंत की आदत बन गई थी. न जाने क्यों अब भी जब कभी विशाखा को देख लेता, दिल में एक फांस सी चुभती. कई महीने तो विशाखा उसे नजर नहीं आई थी. वैसे उस ने सुन लिया था कि उस ने शादी कर ली है और बहुत खुश रहती है.

न जाने क्यों उसे विशाखा की शादी से दुख पहुंचा था. शहर के किसी चौराहे पर, किसी मार्केट में विशाखा कभीकभी नजर आ ही जाती थी अपने पति के साथ, किसी नई सहेली के साथ, तो कभी अकेली कार में. उस के शरीर पर शानदार कपड़े होते और चेहरे पर शांति. वसंत का दिल जल कर रह जाता. ऐसी सुखशांति तो उस के जीवन में नहीं आई थी. आज भी जब विशाखा उस के सामने से निकली तो उस का दिल चाहा कि वह उस का पीछा करे, बिलकुल उसी तरह जैसे विवाह से पहले करता था.

गाड़ी खड़ी कर के वसंत बेचैनी में टहलता सड़क पर दूर निकल गया. सड़क के पार उस की नजर ठिठक गई, विशाखा बैंक से आ रही थी. वसंत तेजी से सड़क पार कर के उस तरफ बढ़ा जहां विशाखा अपनी गाड़ी में बैठने वाली थी.

जैसे ही विशाखा गाड़ी में बैठ कर गाड़ी स्टार्ट करने लगी वसंत ने नौक किया.

विशाखा देखती रह गई. वह कभी सोच भी नहीं सकती थी कि इस तरह वसंत से मुलाकात हो जाएगी. वह कुछ बोल ही नहीं पाई.

वसंत ने कहा, ‘‘क्या गाड़ी में बैठ कर बात कर सकता हूं?’’

विशाखा ने पल भर सोचा, फिर कहा, ‘‘नहीं, आप को इस तरह बात करने का कोई हक नहीं है अब.’’

वसंत को धक्का सा लगा. वह टूटे

स्वर में बोला, ‘‘बस थोड़ी देर, फिर खुद ही उतर जाऊंगा.’’

‘‘कौन सी बातें आप को 3 साल बाद याद आ गई हैं?’’

वसंत बैठता हुआ बोला, ‘‘बहुत बदल गई हो… क्या खुश हो अपने जीवन से? कैसा है तुम्हारा पति?’’

‘‘वे बहुत अच्छे हैं और उन्हें बच्चे की भी कोई इच्छा नहीं है. बच्चे के लिए वे पत्नी को धोखा देने वाले इंसान नहीं हैं,’’ विशाखा ने सख्त स्वर में कहा.

वसंत झूठ नहीं बोल सका, कोई बात न बना सका, चोर की तरह अपने दिल का हर राज उगलने लगा, ‘‘विशाखा, मुझे देखो, मैं खुश नहीं हूं.’’

विशाखा ने पलट कर उस की तरफ देखा, सच में वह खुश नहीं लग रहा था. उस का हुलिया ही बदल गया था. वह बहुत सुंदर हुआ करता था, लेकिन आज बदसूरत और बेहाल लग रहा था.

‘‘विशाखा,’’ वसंत शर्मिंदा सा बोला, ‘‘यह तो ठीक है कि बच्चे दुनिया का सब से बड़ा उपहार हैं, लेकिन सिर्फ तुम्हारी खुशी के लिए मैं इस सच से आंखें फेर लिया करता था. लेकिन जब मां ने दूसरे विवाह की बातें कीं तो मेरी इच्छा भी जाग उठी… मेरे जुड़वां बच्चे हुए. मैं ने दुनिया की सब से बड़ी खुशी देख ली है फिर भी मैं टूट गया हूं. मंजिल पर पहुंचने के बाद भी भटक रहा हूं, क्योंकि मेरी पत्नी रेखा बहुत ही कर्कश स्वभाव की है. वह समझती है मैं ने बच्चों के लिए ही शादी की है. उसे अपने सिवा किसी का खयाल नहीं. कहती है कि बच्चे तुम्हारी जिम्मेदारी हैं. बहुत ही फूहड़ और बदमिजाज लड़की है.

‘‘मां से बातबात पर उस का झगड़ा होता है. वही घर, जो तुम्हारी उपस्थिति में खुश और शांत नजर आता था, अब कलह का अड्डा लगता है. घर जाने का मन नहीं होता. तुम ने मेरा इतना खयाल रखा था कि मैं बीते दिन याद कर के रात भर सो नहीं पाता हूं. बहुत दिन बाद मुझे पता चला कि संसार की सब से बड़ी खुशी तुम्हारे जैसी पत्नी है. मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सका और मानता हूं कि बच्चे का न होना इतनी बड़ी कमी नहीं जितनी बड़ी तुम्हारे जैसी पत्नी को ठुकराना है.’’

विशाखा ने बेरुखी से पूछा, ‘‘क्या यही वे बातें हैं, जो आप करना चाहते थे?’’

‘‘विशाखा, मुझे यकीन है तुम भी मेरे बिना खुश तो नहीं होगी. मैं ने तुम से अलग हो कर अच्छा नहीं किया. हम अच्छे दोस्तों की तरह तो रह सकते हैं न?’’

‘‘अच्छे दोस्तों की तरह से मतलब?’’

‘‘और कुछ तो हो नहीं सकता… कुछ समय तो एकदूसरे के साथ बिता ही सकते हैं… मैं तुम्हें अब भी प्यार करता हूं, विशाखा.’’

‘‘तुम्हारे लिए प्यार जैसा पवित्र शब्द एक खेल बन कर रह गया है. मेरे पति का प्रेम कितना शक्तिशाली है, तुम सोच भी नहीं सकते. उन के निश्छल, निर्मल प्रेम के प्रति मेरा मन श्रद्धा से भर उठा है. हमारे रिश्ते में विश्वास, समर्पण, आदर, अपनापन है और जब भी मैं उन के साथ होती हूं, तो मुझे लगता है कि मैं एक घनी छाया में बैठी हूं. निश्चिंत, सुरक्षित और बहुत खुश,’’ कहतेकहते विशाखा ने वसंत की तरफ का दरवाजा खोल दिया, ‘‘अब आप जा सकते हैं.’’

वसंत ने कुछ कहना चाहा, लेकिन विशाखा पहले ही बोल पड़ी, ‘‘अब और नहीं,’’ और फिर वसंत के उतरते ही उस ने गाड़ी आगे बढ़ा दी और अपने दिल में सिद्धार्थ के प्रेम की भीनीभीनी सुगंध से सराबोर घर पहुंची तो सिद्धार्थ उसे देखते ही मुसकरा दिए.

विशाखा को लगा कि कुछ पल आंखों में तैरता प्यार भी कभीकभी पूरा जीवन जीने के लिए काफी होता है. लेकिन इस बात को सिर्फ खुशनुमा पलों को जीने वाले ही समझ सकते हैं.

Hindi Kahani : अमेरिकन बेटा – अपनों से बढ़ कैसा उत्तरदायित्व निभाया पराए खून ने ?

Hindi Kahani : रीता एक दिन अपनी अमेरिकन मित्र ईवा से मिलने उस के घर गई थी, रीता भारतीय मूल की अमेरिकन नागरिक थी. वह अमेरिका के टैक्सास राज्य के ह्यूस्टन शहर में रहती थी. रीता का जन्म अमेरिका में ही हुआ था. जब वह कालेज में थी, उस की मां का देहांत हो गया था. उस के पिता कुछ दिनों के लिए भारत आए थे, उसी बीच हार्ट अटैक से उन की मौत हो गई थी.

रीता और ईवा दोनों बचपन की सहेलियां थीं. दोनों की स्कूल और कालेज की पढ़ाई साथ हुई थी. रीता की शादी अभी तक नहीं हुई थी जबकि ईवा शादीशुदा थी. उस का 3 साल का एक बेटा था डेविड. ईवा का पति रिचर्ड अमेरिकन आर्मी में था और उस समय अफगानिस्तान युद्ध में गया था.

शाम का समय था. ईवा ने ही फोन कर रीता को बुलाया था. शनिवार छुट्टी का दिन था. रीता भी अकेले बोर ही हो रही थी. दोनों सखियां गप मार रही थीं. तभी दरवाजे पर बूटों की आवाज हुई और कौलबैल बजी. अमेरिकन आर्मी के 2 औफिसर्स उस के घर आए थे. ईवा उन को देखते ही भयभीत हो गई थी, क्योंकि घर पर फुल यूनिफौर्म में आर्मी वालों का आना अकसर वीरगति प्राप्त सैनिकों की सूचना ही लाता है. वे डेविड की मृत्यु का संदेश ले कर आए थे और यह भी कि शहीद डेविड का शव कल दोपहर तक ईवा के घर पहुंच जाएगा. ईवा को काटो तो खून नहीं. उस का रोतेरोते बुरा हाल था. अचानक ऐसी घटना की कल्पना उस ने नहीं की थी.

रीता ने ईवा को काफी देर तक गले से लगाए रखा. उसे ढांढ़स बंधाया, उस के आंसू पोंछे. इस बीच ईवा का बेटा डेविड, जो कुछ देर पहले कार्टून देख रहा था, भी पास आ गया. रीता ने उसे भी अपनी गोद में ले लिया. ईवा और रिचर्ड दोनों के मातापिता नहीं थे. उन के भाईबहन थे. समाचार सुन कर वे भी आए थे, पर अंतिम क्रिया निबटा कर चले गए. उन्होंने जाते समय ईवा से कहा कि किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो बताओ, पर उस ने फिलहाल मना कर दिया था.

ईवा जौब में थी. वह औफिस जाते समय बेटे को डेकेयर में छोड़ जाती और दोपहर बाद उसे वापस लौटते वक्त पिक कर लेती थी. इधर, रीता ईवा के यहां अब ज्यादा समय बिताती थी, अकसर रात में उसी के यहां रुक जाती. डेविड को वह बहुत प्यार करती थी, वह भी ईवा से काफी घुलमिल गया था. इस तरह 2 साल बीत गए.

इस बीच रीता की जिंदगी में प्रदीप आया, दोनों ने कुछ महीने डेटिंग पर बिताए, फिर शादी का फैसला किया. प्रदीप भी भारतीय मूल का अमेरिकन था और एक आईटी कंपनी में काम करता था. रीता और प्रदीप दोनों ही ईवा के घर अकसर जाते थे.

कुछ महीनों बाद ईवा बीमार रहने लगी थी. उसे अकसर सिर में जोर का दर्द, चक्कर, कमजोरी और उलटी होती थी. डाक्टर्स को ब्रेन ट्यूमर का शक था. कुछ टैस्ट किए गए. टैस्ट रिपोर्ट्स लेने के लिए ईवा के साथ रीता और प्रदीप दोनों गए थे. डाक्टर ने बताया कि ईवा का ब्रेन ट्यूमर लास्ट स्टेज पर है और वह अब चंद महीनों की मेहमान है. यह सुन कर ईवा टूट चुकी थी, उस ने रीता से कहा, ‘‘मेरी मृत्यु के बाद मेरा बेटा डेविड अनाथ हो जाएगा. मुझे अपने किसी रिश्तेदार पर भरोसा नहीं है. क्या तुम डेविड के बड़ा होने तक उस की जिम्मेदारी ले सकती हो?’’

रीता और प्रदीप दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. उन्होंने ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी. तभी ईवा बोली, ‘‘देखो रीता, वैसे कोई हक तो नहीं है तुम पर कि डेविड की देखभाल की जिम्मेदारी तुम्हें दूं पर 25 वर्षों से हम एकदूसरे को भलीभांति जानते हैं. एकदूसरे के सुखदुख में साथ रहे हैं, इसीलिए तुम से रिक्वैस्ट की.’’

दरअसल, रीता प्रदीप से डेटिंग के बाद प्रैग्नैंट हो गई थी और दोनों जल्दी ही शादी करने जा रहे थे. इसलिए इस जिम्मेदारी को लेने में वे थोड़ा झिझक रहे थे. तभी प्रदीप बोला, ‘‘ईवा, डोंट वरी. हम लोग मैनेज कर लेंगे.’’

ईवा ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘थैंक्स डियर. रीता क्या तुम एक प्रौमिस करोगी?’’ रीता ने स्वीकृति में सिर हिलाया और ईवा से गले लगते हुए कहा, ‘‘तुम अब डेविड की चिंता छोड़ दो. अब वह मेरी और प्रदीप की जिम्मेदारी है.’’

ईवा बोली, ‘‘थैंक्स, बोथ औफ यू. मैं अपनी प्रौपर्टी और बैंक डिपौजिट्स की पावर औफ अटौर्नी तुम दोनों के नाम कर दूंगी. डेविड के एडल्ट होने तक इस की देखभाल तुम लोग करोगे. तुम्हें डेविड के लिए पैसों की चिंता नहीं करनी होगी, प्रौमिस.’’

रीता और प्रदीप ने प्रौमिस किया. और फिर रीता ने अपनी प्रैग्नैंसी की बात बताते हुए कहा, ‘‘हम लोग इसीलिए थोड़ा चिंतित थे. शादी, प्रैग्नैंसी और डेविड सब एकसाथ.’’

ईवा बोली, ‘‘मुबारक हो तुम दोनों को. यह अच्छा ही है डेविड को एक भाई या बहन मिल जाएगी.’’

2 सप्ताह बाद रीता और प्रदीप ने शादी कर ली. डेविड तो पहले से ही रीता से काफी घुलमिल चुका था. अब प्रदीप भी उसे काफी प्यार करने लगा था. ईवा ने छोटे से डेविड को समझाना शुरू कर दिया था कि वह अगर बहुत दूर चली जाए, जहां से वह लौट कर न आ सके, तो रीता और प्रदीप के साथ रहना और उन्हें परेशान मत करना. पता नहीं डेविड ईवा की बातों को कितना समझ रहा था, पर अपना सिर बारबार हिला कर हां करता और मां के सीने से चिपक जाता था.

3 महीने के अंदर ही ईवा का निधन हो गया. रीता ने ईवा के घर को रैंट पर दे कर डेविड को अपने घर में शिफ्ट करा लिया. शुरू के कुछ दिनों तक तो डेविड उदास रहता था, पर रीता और प्रदीप दोनों का प्यार पा कर धीरेधीरे नौर्मल हो गया.

रीता ने एक बच्चे को जन्म दिया. उस का नाम अनुज रखा गया. अनुज के जन्म के कुछ दिनों बाद तक ईवा उसी के साथ व्यस्त रही थी. डेविड कुछ अकेला और उदास दिखता था. रीता ने उसे अपने पास बुला कर प्यार किया और कहा, ‘‘तुम्हारे लिए छोटा भाई लाई हूं. कुछ ही महीनों में तुम इस के साथ बात कर सकोगे और फिर बाद में इस के साथ खेल भी सकते हो.’’

रीता और प्रदीप ने डेविड की देखभाल में कोई कमी नहीं की थी. अनुज भी अब चलने लगा था. घर में वह डेविड के पीछेपीछे लगा रहता था. डेविड के खानपान व रहनसहन पर भारतीय संस्कृति की स्पष्ट छाप थी. शुरू में तो वह रीता को रीता आंटी कहता था, पर बाद में अनुज को मम्मी कहते देख वह भी मम्मी ही कहने लगा था. शुरू के कुछ महीनों तक डेविड की मामी और चाचा उस से मिलने आते थे, पर बाद में उन्होंने आना बंद कर दिया था.

डेविड अब बड़ा हो गया था और कालेज में पढ़ रहा था. रीता ने उस से कहा कि वह अपना बैंक अकाउंट खुद औपरेट किया करे, लेकिन डेविड ने मना कर दिया और कहा कि आप की बहू आने तक आप को ही सबकुछ देखना होगा. रीता भी डेविड के जवाब से खुश हुई थी. अनुज कालेज के फाइनल ईयर में था.

3 वर्षों बाद डेविड को वेस्टकोस्ट, कैलिफोर्निया में नौकरी मिली. वह रीता से बोला, ‘‘मम्मी, कैलिफोर्निया तो दूसरे छोर पर है. 5 घंटे तो प्लेन से जाने में लग जाते हैं. आप से बहुत दूर चला जाऊंगा. आप कहें तो यह नौकरी जौइन ही न करूं. इधर टैक्सास में ही ट्राई करता हूं.’’

रीता ने कहा, ‘‘बेटे, अगर यह नौकरी तुम्हें पसंद है तो जरूर जाओ.’’

प्रदीप ने भी उसे यही सलाह दी. डेविड के जाते समय रीता बोली, ‘‘तुम अब अपना बैंक अकाउंट संभालो.’’

डेविड बोला ‘‘क्या मम्मी, कुछ दिन और तुम्हीं देखो यह सब. कम से कम मेरी शादी तक. वैसे भी आप का दिया क्रैडिट कार्ड तो है ही मेरे पास. मैं जानता हूं मुझे पैसों की कमी नहीं होगी.’’

रीता ने पूछा कि शादी कब करोगे तो वह बोला, ‘‘मेरी गर्लफ्रैंड भी कैलिफोर्निया की ही है. यहां ह्यूस्टन में राइस यूनिवर्सिटी में पढ़ने आई थी. वह भी अब कैलिफोर्निया जा रही है.’’

रीता बोली, ‘‘अच्छा बच्चू, तो यह राज है तेरे कैलिफोर्निया जाने का?’’

डेविड बोला, ‘‘नो मम्मी, नौट ऐट औल. तुम ऐसा बोलोगी तो मैं नहीं जाऊंगा. वैसे, मैं तुम्हें सरप्राइज देने वाला था.’’

‘‘नहीं, तुम कैलिफोर्निया जाओ, मैं ने यों ही कहा था. वैसे, तुम क्या सरप्राइज देने वाले हो.’’

‘‘मेरी गर्लफ्रैंड भी इंडियन अमेरिकन है. मगर तुम उसे पसंद करोगी, तभी शादी की बात होगी.’’

रीता बोली, ‘‘तुम ने नापतोल कर ही पसंद किया होगा, मुझे पूरा भरोसा है.’’

इसी बीच अनुज भी वहां आया. वह बोला, ‘‘मैं ने देखा है भैया की गर्लफ्रैंड को. उस का नाम प्रिया है. डेविड और प्रिया दोनों को लाइब्रेरी में अनेक बार देर तक साथ देखा है. देखनेसुनने में बहुत अच्छी लगती है.’’

डेविड कैलिफोर्निया चला गया.  उस के जाने के कुछ महीनों बाद ही प्रदीप का सीरियस रोड ऐक्सिडैंट हो गया था. उस की लोअर बौडी को लकवा मार गया था. वह अब बिस्तर पर ही था. डेविड खबर मिलते ही तुरंत आया. एक सप्ताह रुक कर प्रदीप के लिए घर पर ही नर्स रख दी. नर्स दिनभर घर पर देखभाल करती थी और शाम के बाद रीता देखती थीं.

रीता को पहले से ही ब्लडप्रैशर की शिकायत थी. प्रदीप के अपंग होने के कारण वह अंदर ही अंदर बहुत दुखी और चिंतित रहती थी. उसे एक माइल्ड अटैक भी पड़ गया, तब डेविड और प्रिया दोनों मिलने आए थे. रीता और प्रदीप दोनों ने उन्हें जल्द ही शादी करने की सलाह दी. वे दोनों तो इस के लिए तैयार हो कर ही आए थे.

शादी के बाद रीता ने डेविड को उस की प्रौपर्टी और बैंक डिपौजिट्स के पेपर सौंप दिए. डेविड और प्रिया कुछ दिनों बाद लौट गए थे. इधर अनुज भी कालेज के फाइनल ईयर में था. पर रीता और प्रदीप दोनों ने महसूस किया कि डेविड उतनी दूर रह कर भी उन का हमेशा खयाल रखता है, जबकि उन का अपना बेटा, बस, औपचारिकताभर निभाता है. इसी बीच, रीता को दूसरा हार्ट अटैक पड़ा, डेविड इस बार अकेले मिलने आया था. प्रिया प्रैग्नैंसी के कारण नहीं आ सकी थी. रीता को 2 स्टेंट हार्ट के आर्टरी में लगाने पड़े थे, पर डाक्टर ने बताया था कि उस के हार्ट की मसल्स बहुत कमजोर हो गई हैं. सावधानी बरतनी होगी. किसी प्रकार की चिंता जानलेवा हो सकती है.

रीता ने डेविड से कहा, ‘‘मुझे तो प्रदीप की चिंता हो रही है. रातरात भर नींद नहीं आती है. मेरे बाद इन का क्या होगा? अनुज तो उतना ध्यान नहीं देता हमारी ओर.’’

डेविड बोला, ‘‘मम्मी, अनुज की तुम बिलकुल चिंता न करो. तुम को भी कुछ नहीं होगा, बस, चिंता छोड़ दो. चिंता करना तुम्हारे लिए खतरनाक है. आप, आराम करो.’’

कुछ महीने बाद थैंक्सगिविंग की छुट्टियों में डेविड और प्रिया रीता के पास आए. साथ में उन का 4 महीने का बेटा भी आया. रीता और प्रदीप दोनों ही बहुत खुश थे. इसी बीच रीता को मैसिव हार्ट अटैक हुआ. आईसीयू में भरती थी. डेविड, प्रिया और अनुज तीनों उस के पास थे. डाक्टर बोल गया कि रीता की हालत नाजुक है. डाक्टर ने मरीज से बातचीत न करने को भी कहा.

रीता ने डाक्टर से कहा, ‘‘अब अंतिम समय में तो अपने बच्चों से थोड़ी देर बात करने दो डाक्टर, प्लीज.’’

फिर रीता किसी तरह डेविड से बोल पाई, ‘‘मुझे अपनी चिंता नहीं है. पर प्रदीप का क्या होगा?’’ डेविड बोला, ‘‘मम्मी, तुम चुप रहो. परेशान मत हो.’’  वहीं अनुज बोला, ‘‘मम्मा, यहां अच्छे ओल्डएज होम्स हैं. हम पापा को वहां शिफ्ट कर देंगे. हम लोग पापा से बीचबीच में मिलते रहेंगे.’’

ओल्डएज होम्स का नाम सुनते ही रीता की आंखों से आंसू गिरने लगे. उसे अपने बेटे से बाप के लिए ऐसी सोच की कतई उम्मीद नहीं थी. उस की सांसें और धड़कन काफी तेज हो गईं.

डेविड अनुज को डांट रहा था, प्रिया ने कहा, ‘‘मम्मी, जब से आप की तबीयत बिगड़ी है, हम लोग भी पापा को ले कर चिंतित हैं. हम लोगों ने आप को और पापा को कैलिफोर्निया में अपने साथ रखने का फैसला किया है. वहां आप लोगों की जरूरतों के लिए खास इंतजाम कर रखा है. बस, आप यहां से ठीक हो कर निकलें, बाकी आगे सब डेविड और मैं संभाल लेंगे.’’

रीता ने डेविड और प्रिया दोनों को अपने पास बुलाया, उन के हाथ पकड़ कर कुछ कहने की कोशिश कर रही थी, उस की सांसें बहुत तेज हो गईं. अनुज दौड़ कर डाक्टर को बुलाने गया. इस बीच रीता किसी तरह टूटतीफूटती बोली में बोली, ‘‘अब मुझे कोई चिंता नहीं है. चैन से मर सकूंगी. मेरा प्यारा अमेरिकन बेटा.’’ इस के आगे वह कुछ नहीं बोल सकी.

जब तक अनुज डाक्टर के साथ आया, रीता की सांसें रुक चुकी थीं. डाक्टर ने चैक कर रहा, ‘‘शी इज नो मोर.’’

Emotional Story : दर्द – जिंदगी के उतारचढ़ावों को झेलती औरत की कहानी

Emotional Story : कनीजा बी करीब 1 घंटे से परेशान थीं. उन का पोता नदीम बाहर कहीं खेलने चला गया था. उसे 15 मिनट की खेलने की मुहलत दी गई थी, लेकिन अब 1 घंटे से भी ऊपर वक्त गुजर गया?था. वह घर आने का नाम ही नहीं ले रहा था.

कनीजा बी को आशंका थी कि वह महल्ले के आवारा बच्चों के साथ खेलने के लिए जरूर कहीं दूर चला गया होगा.

वह नदीम को जीजान से चाहतीं. उन्हें उस का आवारा बच्चों के साथ घर से जाना कतई नहीं सुहाता था.

अत: वह चिंताग्रस्त हो कर भुनभुनाने लगी थीं, ‘‘कितना ही समझाओ, लेकिन ढीठ मानता ही नहीं. लाख बार कहा कि गली के आवारा बच्चों के साथ मत खेला कर, बिगड़ जाएगा, पर उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. आने दो ढीठ को. इस बार वह मरम्मत करूंगी कि तौबा पुकार उठेगा. 7 साल का होने को आया है, पर जरा अक्ल नहीं आई. कोई दुर्घटना हो सकती है, कोई धोखा हो सकता है…’’

कनीजा बी का भुनभुनाना खत्म हुआ ही था कि नदीम दौड़ता हुआ घर में आ गया और कनीजा की खुशामद करता हुआ बोला, ‘‘दादीजान, कुलफी वाला आया है. कुलफी ले दीजिए न. हम ने बहुत दिनों से कुलफी नहीं खाई. आज हम कुलफी खाएंगे.’’

‘‘इधर आ, तुझे अच्छी तरह कुलफी खिलाती हूं,’’ कहते हुए कनीजा बी नदीम पर अपना गुस्सा उतारने लगीं. उन्होंने उस के गाल पर जोर से 3-4 तमाचे जड़ दिए.

नदीम सुबकसुबक कर रोने लगा. वह रोतेरोते कहता जाता, ‘‘पड़ोस वाली चचीजान सच कहती हैं. आप मेरी सगी दादीजान नहीं हैं, तभी तो मुझे इस बेदर्दी से मारती हैं.

‘‘आप मेरी सगी दादीजान होतीं तो मुझ पर ऐसे हाथ न उठातीं. तब्बो की दादीजान उसे कितना प्यार करती हैं. वह उस की सगी दादीजान हैं न. वह उसे उंगली भी नहीं छुआतीं.

‘‘अब मैं इस घर में नहीं रहूंगा. मैं भी अपने अम्मीअब्बू के पास चला जाऊंगा. दूर…बहुत दूर…फिर मारना किसे मारेंगी. ऊं…ऊं…ऊं…’’ वह और जोरजोर से सुबकसुबक कर रोने लगा.

नदीम की हृदयस्पर्शी बातों से कनीजा बी को लगा, जैसे किसी ने उन के दिल पर नश्तर चला दिया हो. अनायास ही उन की आंखें छलक आईं. वह कुछ क्षणों के लिए कहीं खो गईं. उन की आंखों के सामने उन का अतीत एक चलचित्र की तरह आने लगा.

जब वह 3 साल की मासूम बच्ची थीं, तभी उन के सिर से बाप का साया उठ गया था. सभी रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया था. किसी ने भी उन्हें अंग नहीं लगाया था.

मां अनपढ़ थीं और कमाई का कोई साधन नहीं था, लेकिन मां ने कमर कस ली थी. वह मेहनतमजदूरी कर के अपना और अपनी बेटी का पेट पालने लगी थीं. अत: कनीजा बी के बचपन से ले कर जवानी तक के दिन तंगदस्ती में ही गुजरे थे.

तंगदस्ती के बावजूद मां ने कनीजा बी की पढ़ाईलिखाई की ओर खासा ध्यान दिया था. कनीजा बी ने भी अपनी बेवा, बेसहारा मां के सपनों को साकार करने के लिए पूरी लगन व मेहनत से प्रथम श्रेणी में 10वीं पास की थी और यों अपनी तेज बुद्धि का परिचय दिया था.

मैट्रिक पास करते ही कनीजा बी को एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. अत: जल्दी ही उन के घर की तंगदस्ती खुशहाली में बदलने लगी थी.

कनीजा बी एक सांवलीसलोनी एवं सुशील लड़की थीं. उन की नौकरी लगने के बाद जब उन के घर में खुशहाली आने लगी थी तो लोगों का ध्यान उन की ओर जाने लगा था. देखते ही देखते शादी के पैगाम आने लगे थे.

मुसीबत यह थी कि इतने पैगाम आने के बावजूद, रिश्ता कहीं तय नहीं हो रहा था. ज्यादातर लड़कों के अभिभावकों को कनीजा बी की नौकरी पर आपत्ति थी.

वे यह भूल जाते थे कि कनीजा बी के घर की खुशहाली का राज उन की नौकरी में ही तो छिपा है. उन की एक खास शर्त यह होती कि शादी के बाद नौकरी छोड़नी पड़ेगी, लेकिन कनीजा बी किसी भी कीमत पर लगीलगाई अपनी सरकारी नौकरी छोड़ना नहीं चाहती थीं.

कनीजा बी पिता की असमय मृत्यु से बहुत बड़ा सबक सीख चुकी थीं. अर्थोपार्जन की समस्या ने उन की मां को कम परेशान नहीं किया था. रूखेसूखे में ही बचपन से जवानी तक के दिन बीते थे. अत: वह नौकरी छोड़ कर किसी किस्म का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती थीं.

कनीजा बी का खयाल था कि अगर शादी के बाद उन के पति को कुछ हो गया तो उन की नौकरी एक बहुत बड़े सहारे के रूप में काम आ सकती थी.

वैसे भी पतिपत्नी दोनों के द्वारा अर्थोपार्जन से घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सकती थी, जिंदगी मजे में गुजर सकती थी.

देखते ही देखते 4-5 साल का अरसा गुजर गया था और कनीजा बी की शादी की बात कहीं पक्की नहीं हो सकी थी. उन की उम्र भी दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. अत: शादी की बात को ले कर मांबेटी परेशान रहने लगी थीं.

एक दिन पड़ोस के ही प्यारे मियां आए थे. वह उसी शहर के दूसरे महल्ले के रशीद का रिश्ता कनीजा बी के लिए लाए थे. उन के साथ एक महिला?भी थीं, जो स्वयं को रशीद की?भाभी बताती थीं.

रशीद एक छोटे से निजी प्रतिष्ठान में लेखाकार था और खातेपीते घर का था. कनीजा बी की नौकरी पर उसे कोई आपत्ति नहीं थी.

महल्लेपड़ोस वालों ने कनीजा बी की मां पर दबाव डाला था कि उस रिश्ते को हाथ से न जाने दें क्योंकि रिश्ता अच्छा है. वैसे भी लड़कियों के लिए अच्छे रिश्ते मुश्किल से आते हैं. फिर यह रिश्ता तो प्यारे मियां ले कर आए थे.

कनीजा बी की मां ने महल्लेपड़ोस के बुजुर्गों की सलाह मान कर कनीजा बी के लिए रशीद से रिश्ते की हामी?भर दी थी.?

कनीजा बी अपनी शादी की खबर सुन कर मारे खुशी के झूम उठी थीं. वह दिनरात अपने सुखी गृहस्थ जीवन की कल्पना करती रहती थीं.

और एक दिन वह घड़ी भी आ गई, जब कनीजा बी की शादी रशीद के साथ हो गई और वह मायके से विदा हो गईं. लेकिन ससुराल पहुंचते ही इस बात ने उन के होश उड़ा दिए कि जो महिला स्वयं को रशीद की भाभी बता रही थी, वह वास्तव में रशीद की पहली बीवी थी.

असलियत सामने आते ही कनीजा बी का सिर चकराने लगा. उन्हें लगा कि उन के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है और उन्हें फंसाया गया है. प्यारे मियां ने उन के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया था. वह मन ही मन तड़प कर रह गईं.

लेकिन जल्दी ही रशीद ने कनीजा बी के समक्ष वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी, ‘‘बेगम, दरअसल बात यह थी कि शादी के 7 साल बाद?भी जब हलीमा बी मुझे कोई औलाद नहीं दे सकी तो मैं औलाद के लिए तरसने लगा.

‘हम दोनों पतिपत्नी ने किसकिस डाक्टर से इलाज नहीं कराया, क्याक्या कोशिशें नहीं कीं, लेकिन नतीजा शून्य रहा. आखिर, हलीमा बी मुझ पर जोर देने लगी कि मैं दूसरी शादी कर लूं. औलाद और मेरी खुशी की खातिर उस ने घर में सौत लाना मंजूर कर लिया. बड़ी ही अनिच्छा से मुझे संतान सुख की खातिर दूसरी शादी का निर्णय लेना पड़ा.

‘मैं अपनी तनख्वाह में 2 बीवियों का बोझ उठाने के काबिल नहीं था. अत: दूसरी बीवी का चुनाव करते वक्त मैं इस बात पर जोर दे रहा था कि अगर वह नौकरी वाली हो तो बात बन सकती है. जब हमें, प्यारे मियां के जरिए तुम्हारा पता चला तो बात बनाने के लिए इस सचाई को छिपाना पड़ा कि मैं शादीशुदा हूं.

‘मैं झूठ नहीं बोलता. मैं संतान सुख की प्राप्ति की उत्कट इच्छा में इतना अंधा हो चुका था कि मुझे तुम लोगों से अपने विवाहित होने की सचाई छिपाने में कोई संकोच नहीं हुआ.

‘मैं अब महसूस कर रहा हूं कि यह अच्छा नहीं हुआ. सचाई तुम्हें पहले ही बता देनी चाहिए थी. लेकिन अब जो हो गया, सो हो गया.

‘वैसे देखा जाए तो एक तरह से मैं तुम्हारा गुनाहगार हुआ. बेगम, मेरे इस गुनाह को बख्श दो. मेरी तुम से गुजारिश है.’

कनीजा बी ने बहुत सोचविचार के बाद परिस्थिति से समझौता करना ही उचित समझा था, और वह अपनी गृहस्थी के प्रति समर्पित होती चली गई थीं.

कनीजा बी की शादी के बाद डेढ़ साल का अरसा गुजर गया था, लेकिन उन के भी मां बनने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे. उस के विपरीत हलीमा बी में ही मां बनने के लक्षण दिखाई दे रहे थे. डाक्टरी परीक्षण से भी यह बात निश्चित हो गई थी कि हलीमा बी सचमुच मां बनने वाली हैं.

हलीमा बी के दिन पूरे होते ही प्रसव पीड़ा शुरू हो गई, लेकिन बच्चा था कि बाहर आने का नाम ही नहीं ले रहा था. आखिर, आपरेशन द्वारा हलीमा बी के बेटे का जन्म हुआ. लेकिन हलीमा बी की हालत नाजुक हो गई. डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद वह बच नहीं सकी.

हलीमा बी की अकाल मौत से उस के बेटे गनी के लालनपालन की संपूर्ण जिम्मेदारी कनीजा बी पर आन पड़ी. अपनी कोख से बच्चा जने बगैर ही मातृत्व का बोझ ढोने के लिए कनीजा बी को विवश हो जाना पड़ा. उन्होंने उस जिम्मेदारी से दूर भागना उचित नहीं समझा. आखिर, गनी उन के पति की ही औलाद था.

रशीद इस बात का हमेशा खयाल रखा करता था कि उस के व्यवहार से कनीजा बी को किसी किस्म का दुख या तकलीफ न पहुंचे, वह हमेशा खुश रहें, गनी को मां का प्यार देती रहें और उसे किसी किस्म की कमी महसूस न होने दें.

कनीजा बी भी गनी को एक सगे बेटे की तरह चाहने लगीं. वह गनी पर अपना पूरा प्यार उड़ेल देतीं और गनी भी ‘अम्मीअम्मी’ कहता हुआ उन के आंचल से लिपट जाता.

अब गनी 5 साल का हो गया था और स्कूल जाने लगा था. मांबाप बेटे के उज्ज्वल भविष्य को ले कर सपना बुनने लगे थे.

इसी बीच एक हादसे ने कनीजा बी को अंदर तक तोड़ कर रख दिया.

वह मकर संक्रांति का दिन था. रशीद अपने चंद हिंदू दोस्तों के विशेष आग्रह पर उन के साथ नदी पर स्नान करने चला गया. लेकिन रशीद तैरतेतैरते एक भंवर की चपेट में आ कर अपनी जान गंवा बैठा.

रशीद की असमय मौत से कनीजा बी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन उन्होंने साहस का दामन नहीं छोड़ा.

उन्होंने अपने मन में एक गांठ बांध ली, ‘अब मुझे अकेले ही जिंदगी का यह रेगिस्तानी सफर तय करना है. अब और किसी पुरुष के संग की कामना न करते हुए मुझे अकेले ही वक्त के थपेड़ों से जूझना है.

‘पहला ही शौहर जिंदगी की नाव पार नहीं लगा सका तो दूसरा क्या पार लगा देगा. नहीं, मैं दूसरे खाविंद के बारे में सोच भी नहीं सकती.

‘फिर रशीद की एक निशानी गनी के रूप में है. इस का क्या होगा? इसे कौन गले लगाएगा? यह यतीम बच्चे की तरह दरदर भटकता फिरेगा. इस का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. मेरे अलावा इस का?भार उठाने वाला भी तो कोई नहीं.

‘इस के नानानानी, मामामामी कोई भी तो दिल खोल कर नहीं कहता कि गनी का बोझ हम उठाएंगे. सब सुख के साथी?हैं.

‘मैं गनी को लावारिस नहीं बनने दूंगी. मैं भी तो इस की कुछ लगती हूं. मैं सौतेली ही सही, मगर इस की मां हूं. जब यह मुझे प्यार से अम्मी कह कर पुकारता है तब मेरे दिल में ममता कैसे उमड़ आती है.

‘नहींनहीं, गनी को मेरी सख्त जरूरत है. मैं गनी को अपने से जुदा नहीं कर सकती. मेरी तो कोई संतान है ही नहीं. मैं इसे ही देख कर जी लूंगी.

‘मैं गनी को पढ़ालिखा कर एक नेक इनसान बनाऊंगी. इस की जिंदगी को संवारूंगी. यही अब जिंदगी का मकसद है.’

और कनीजा बी ने गनी की खातिर अपना सुखचैन लुटा दिया, अपना सर्वस्व त्याग दिया. फिर उसे एक काबिल और नेक इनसान बना कर ही दम लिया.

गनी पढ़लिख कर इंजीनियर बन गया.

उस दिन कनीजा बी कितनी खुश थीं जब गनी ने अपनी पहली तनख्वाह ला कर उन के हाथ पर रख दी. उन्हें लगा कि उन का सपना साकार हो गया, उन की कुरबानी रंग लाई. अब उन्हें मौत भी आ जाए तो कोई गम नहीं.

फिर गनी की शादी हो गई. वह नदीम जैसे एक प्यारे से बेटे का पिता भी बन गया और कनीजा बी दादी बन गईं.

कनीजा बी नदीम के साथ स्वयं भी खेलने लगतीं. वह बच्चे के साथ बच्चा बन जातीं. उन्हें नदीम के साथ खेलने में बड़ा आनंद आता. नदीम भी मां से ज्यादा दादी को चाहने लगा था.

उस दिन ईद थी. कनीजा बी का घर खुशियों से गूंज रहा था. ईद मिलने आने वालों का तांता लगा हुआ था.

गनी ने अपने दोस्तों तथा दफ्तर के सहकर्मियों के लिए ईद की खुशी में खाने की दावत का विशेष आयोजन किया था.

उस दिन कनीजा बी बहुत खुश थीं. घर में चहलपहल देख कर उन्हें ऐसा लग रहा था मानो दुनिया की सारी खुशियां उन्हीं के घर में सिमट आई हों.

गनी की ससुराल पास ही के शहर में थी. ईद के दूसरे दिन वह ससुराल वालों के विशेष आग्रह पर अपनी बीवी और बेटे के साथ स्कूटर पर बैठ कर ईद की खुशियां मनाने ससुराल की ओर चल पड़ा था.

गनी तेजी से रास्ता तय करता हुआ बढ़ा जा रहा था कि एक ट्रक वाले ने गाय को बचाने की कोशिश में स्टीयरिंग पर अपना संतुलन खो दिया. परिणामस्वरूप उस ने गनी के?स्कूटर को चपेट में ले लिया. पतिपत्नी दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए और डाक्टरों के अथक प्रयास के बावजूद बचाए न जा सके.

लेकिन उस जबरदस्त दुर्घटना में नन्हे नदीम का बाल भी बांका नहीं हुआ था. वह टक्कर लगते ही मां की गोद से उछल कर सीधा सड़क के किनारे की घनी घास पर जा गिरा था और इस तरह साफ बच गया था.

वक्त के थपेड़ों ने कनीजा बी को अंदर ही अंदर तोड़ दिया था. मुश्किल यह थी कि वह अपनी व्यथा किसी से कह नहीं पातीं. उन्हें मालूम था कि लोगों की झूठी हमदर्दी से दिल का बोझ हलका होने वाला नहीं.

उन्हें लगता कि उन की शादी महज एक छलावा थी. गृहस्थ जीवन का कोई भी तो सुख नहीं मिला था उन्हें. शायद वह दुख झेलने के लिए ही इस दुनिया में आई थीं.

रशीद तो उन का पति था, लेकिन हलीमा बी तो उन की अपनी नहीं थी. वह तो एक धोखेबाज सौतन थी, जिस ने छलकपट से उन्हें रशीद के गले मढ़ दिया था.

गनी कौन उन का अपना खून था. फिर भी उन्होंने उसे अपने सगे बेटे की तरह पालापोसा, बड़ा किया, पढ़ाया- लिखाया, किसी काबिल बनाया.

कनीजा बी गनी के बेटे का भी भार उठा ही रही थीं. नदीम का दर्द उन का दर्द था. नदीम की खुशी उन की खुशी थी. वह नदीम की खातिर क्या कुछ नहीं कर रही थीं. कनीजा बी नदीम को डांटतीमारती थीं तो उस के भले के लिए, ताकि वह अपने बाप की तरह एक काबिल इनसान बन जाए.

‘लेकिन ये दुनिया वाले जले पर नमक छिड़कते हैं और मासूम नदीम के दिलोदिमाग में यह बात ठूंसठूंस कर भरते हैं कि मैं उस की सगी दादी नहीं हूं. मैं ने तो नदीम को कभी गैर नहीं समझा. नहीं, नहीं, मैं दुनिया वालों की खातिर नदीम का भविष्य कभी दांव पर नहीं लगाऊंगी.’ कनीजा बी ने यादों के आंसू पोंछते हुए सोचा, ‘दुनिया वाले मुझे सौतेली दादी समझते हैं तो समझें. आखिर, मैं उस की सौतेली दादी ही तो हूं, लेकिन मैं नदीम को काबिल इनसान बना कर ही दम लूंगी. जब नदीम समझदार हो जाएगा तो वह जरूर मेरी नेकदिली को समझने लगेगा.

‘गनी को भी लोगों ने मेरे खिलाफ कम नहीं भड़काया था, लेकिन गनी को मेरे व्यवहार से जरा भी शंका नहीं हुई थी कि मैं उस की बुराई पर अमादा हूं.

अब नदीम का रोना भी बंद हो चुका था. उस का गुस्सा भी ठंडा पड़ गया था. उस ने चोर नजरों से दादी की ओर देखा. दादी की लाललाल आंखों और आंखों में भरे हुए आंसू देख कर उस से चुप न रहा गया. वह बोल उठा, ‘‘दादीजान, पड़ोस वाली चचीजान अच्छी नहीं हैं. वह झूठ बोलती हैं. आप मेरी सौतेली नहीं, सगी दादीजान हैं. नहीं तो आप मेरे लिए यों आंसू न बहातीं.

‘‘दादीजान, मैं जानता हूं कि आप को जोरों की भूख लगी है, अच्छा, पहले आप खाना तो खा लीजिए. मैं भी आप का साथ देता हूं.’’

नदीम की भोली बातों से कनीजा बी मुसकरा दीं और बोलीं, ‘‘बड़ा शरीफ बन रहा है रे तू. ऐसे क्यों नहीं कहता. भूख मुझे नहीं, तुझे लगी है.’’

‘‘अच्छा बाबा, भूख मुझे ही लगी है. अब जरा जल्दी करो न.’’

‘‘ठीक है, लेकिन पहले तुझे यह वादा करना होगा कि फिर कभी तू अपने मुंह से अपने अम्मीअब्बू के पास जाने की बात नहीं करेगा.’’

‘‘लो, कान पकड़े. मैं वादा करता हूं कि अम्मीअब्बू के पास जाने की बात कभी नहीं करूंगा. अब तो खुश हो न?’’

कनीजा बी के दिल में बह रही प्यार की सरिता में बाढ़ सी आ गई. उन्होंने नदीम को खींच कर झट अपने सीने से लगा लिया.

अब वह महसूस कर रही थीं, ‘दुनिया वाले मेरा दर्द समझें न समझें, लेकिन नदीम मेरा दर्द समझने लगा है.’

Best Hindi Story : भीगा मन – कबीर के मन से कैसे मिटा अमीरी गरीबी का फर्क ?

Best Hindi Story : कबीर बारबार घड़ी की ओर देख रहा था. अभी तक उस का ड्राइवर नहीं आया था.

जब ड्राइवर आया तो कबीर उस पर बरस पड़ा, ‘‘तुम लोगों को वक्त की कोई कीमत ही नहीं है. कहां रह गए थे?’’

‘‘साहब, घर में पानी भर गया था, वही निकालने में देर हो गई.’’

‘‘अरे यार, तुम लोगों की यही मुसीबत है. चार बूंदें गिरती नहीं हैं कि तुम्हारा रोना शुरू हो जाता है… पानी… पानी… अब चलो,’’ कार में बैठते हुए कबीर ने कहा.

बरसात के महीने में मुंबई यों बेबस हो जाती है, जैसे कोई गरीब औरत भीगी फटी धोती में खुद को बारिश से बचाने की कोशिश कर रही हो. भरसक कोशिश, मगर सब बेकार… थक कर खड़ी हो जाती है एक जगह और इंतजार करती है बारिश के थमने का.

कार ने रफ्तार पकड़ी और दिनभर का थकामांदा कबीर सीट पर सिर टिका कर बैठ गया. हलकीहलकी बारिश हो रही थी और सड़क पर लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जूझ रहे थे. अनगिनत छाते, पर बचाने में नाकाम. हवा के झोंकों से पानी सब को भिगो गया था.

कबीर ने घड़ी की ओर देखा. 6 बजे थे. सड़क पर भीड़ बढ़ती जा रही थी. ट्रैफिक धीमा पड़ गया था. लोग बेवजह हौर्न बजा रहे थे मानो हौर्न बजाने से ट्रैफिक हट जाएगा. पर वे हौर्न बजा कर अपने बेबस होने की खीज निकाल लेते थे.

ड्राइवर ने कबीर से पूछा, ‘‘रेडियो चला दूं साहब?’’

‘‘क्या… हां, चला दो. लगता है कि आज घर पहुंचने में काफी देर हो जाएगी,’’ कबीर ने कहा.

‘‘हां साहब… बहुत दूर तक जाम लगा है.’’

‘‘तुम्हारा घर कहां है?’’

‘‘साहब, मैं अंधेरी में रहता हूं.’’

‘‘अच्छा… अच्छा…’’ कबीर ने सिर हिलाते हुए कहा.

रेडियो पर गाना बज उठा, ‘रिमझिम गिरे सावन…’

बारिश तेज हो गई थी और सड़क पर पानी भरने लगा था. हर आदमी जल्दी घर पहुंचना चाहता था. गाना बंद हुआ तो रेडियो पर लोगों को घर से न निकलने की हिदायत दी गई.

कबीर ने घड़ी देखी. 7 बजे थे. घर अभी भी 15-20 किलोमीटर दूर था. ट्रैफिक धीरेधीरे सरकने लगा तो कबीर ने राहत की सांस ली. मिनरल वाटर की बोतल खोली और दो घूंट पानी पीया.

धीरेधीरे 20 मिनट बीत गए. बारिश अब बहुत तेज हो गई थी. बौछार के तेज थपेड़े कार की खिड़की से टकराने लगे थे. सड़क पर पानी का लैवल बढ़ता ही जा रहा था. बाहर सब धुंधला हो गया था. सामने विंड शील्ड पर जब वाइपर गुजरता तो थोड़ाबहुत दिखाई देता. हाहाकार सा मचा हुआ था. सड़क ने जैसे नदी का रूप ले लिया था.

‘‘साहब, पानी बहुत बढ़ गया है. हमें कार से बाहर निकल जाना चाहिए.’’

‘‘क्या बात कर रहे हो… बाहर हालत देखी है…’’

‘‘हां साहब, पर अब पानी कार के अंदर आने लगा है.’’

कबीर ने नीचे देखा तो उस के जूते पानी में डूबे हुए थे. उस ने इधरउधर देखा. कोई चारा न था. वह फिर भी कुछ देर बैठा रहा.

‘‘साहब चलिए, वरना दरवाजा खुलना भी मुश्किल हो जाएगा.’’

‘‘हां, चलो.’’

कबीर ने दरवाजा खोला ही था कि तेज बारिश के थपेड़े मुंह पर लगे. उस की बेशकीमती घड़ी और सूट तरबतर हो गए. उस ने चश्मा निकाल कर सिर झटका और चश्मा पोंछा.

‘‘साहब, छाता ले लीजिए,’’ ड्राइवर ने कहा.

‘‘नहीं, रहने दो,’’ कहते हुए कबीर ने चारों ओर देखा. सारा शहर पानी में डूबा हुआ था. कचरा चारों ओर तैर रहा था. इस रास्ते से गुजरते हुए उस ने न जाने कितने लोगों को शौच करते देखा था और आज वह उसी पानी में खड़ा है. उसे उबकाई सी आने लगी थी. इसी सोच में डूबा कबीर जैसे कदम बढ़ाना ही भूल गया था.

‘‘साहब चलिए…’’ ड्राइवर ने कहा.

कबीर ने कभी ऐसे हालात का सामना नहीं किया था. उस के बंगले की खिड़की से तो बारिश हमेशा खूबसूरत ही लगी थी.

कबीर धीरेधीरे पानी को चीरता हुआ आगे बढ़ने लगा. कदम बहुत भारी लग रहे थे. चारों ओर लोग ही लोग… घबराए हुए, अपना घर बचाते, सामान उठाए.

एक मां चीखचीख कर बिफरी सी हालत में इधरउधर भाग रही थी.

उस का बच्चा कहीं खो गया था. उसे अब न बारिश की परवाह थी, न अपनी जान की.

कबीर ने ड्राइवर की तरफ देखा.

‘‘साहब, हर साल यही होता है. किसी का बच्चा… किसी की मां ले जाती है यह बारिश… ये खुले नाले… मेनहोल…’’

‘‘क्या करें…’’ कह कर कबीर ने कदम आगे बढ़ाया तो मानो पैर के नीचे जमीन ही न थी और जब पैर जमीन पर पड़ा तो उस की चीख निकल गई.

‘‘साहब…’’ ड्राइवर भी चीख उठा और कबीर का हाथ थाम लिया.

कबीर का पैर गहरे गड्ढे में गिरा था और कहीं लोहे के पाइपों के बीच फंस गया था.

ड्राइवर ने पैर निकालने की कोशिश की तो कबीर की चीख निकल गई. शायद हड्डी टूट गई थी.

‘‘साहब, आप घबराइए मत…’’ ड्राइवर ने हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘मेरा घर नजदीक ही है. मैं अभी किसी को ले कर आता हूं.’’

कबीर बहुत ज्यादा तकलीफ में उसी गंदे पानी में गरदन तक डूबा बैठा रहा. कुछ देर बाद उसे दूर से ड्राइवर भाग कर आता दिखाई दिया. कबीर को बेहोशी सी आने लगी थी और उस ने आंखें बंद कर लीं.

होश आया तो कबीर एक छोटे से कमरे में था जो घुटनों तक पानी से भरा था. एक मचान बना कर बिस्तर लगाया हुआ था जिस पर वह लेटा हुआ था. ड्राइवर की पत्नी चाय का गिलास लिए खड़ी थी.

‘‘साहब, चाय पी लीजिए. जैसे ही पानी कुछ कम होगा, हम आप को अस्पताल ले जाएंगे,’’ ड्राइवर ने कहा.

चाय तिपाई पर रख कर वे दोनों रात के खाने का इंतजाम करने चले गए. कबीर कमरे में अकेला पड़ा सोच रहा था, ‘कुदरत का बरताव सब के साथ समान है… क्या अमीर, क्या गरीब, सब को एक जगह ला कर खड़ा कर देती है… और ये लोग… कितनी जद्दोजेहद भरी है इन की जिंदगी. दिनरात इन्हीं मुसीबतों से जूझते रहते हैं. आलीशान बंगलों में रहने वालों को इस से कोई सरोकार नहीं होता. कैसे हो? कभी इस जद्दोजेहद को अनुभव ही नहीं किया…’

कबीर आत्मग्लानि से भर उठा था. यह उस की जिंदगी का वह पल था जब उस ने जाना कि सबकुछ क्षणिक है. इनसानियत ही सब से बड़ी दौलत है. बारिश ने उस के तन को ही नहीं, बल्कि मन को भी भिगो दिया था.

कबीर फूटफूट कर रो रहा था. उस के मन से अमीरीगरीबी का फर्क जो मिट गया था.

Love Story : वापसी – दो प्रेमियों की दिलचस्प कहानी

Love Story : आज फिर शुभ्रा का खत आया था, स्पीड पोस्ट से. मैं हैरान था कि हर रोज तो मोबाइल पर इतनी बातें होती हैं फिर खत लिखने की नौबत कैसे आ गई. दरअसल, हमें मिले साल से ऊपर हो गया था, इसीलिए उस के गिलेशिकवे बहुत बढ़ गए थे. भारी मन से मैं उस का खत पढ़ने लगा. उस के खत में शिकायतें, शिकवे, उलाहने थे. अगले पेज पर भी बदस्तूर एकदूसरे की जुदाई में गीली लकडि़यों की तरह सुलगते, पानी के बिना मछली की तरह तड़पते और साबुन की टिकिया की तरह घुलते जाने का जिक्र था.

एक बात हर तीसरे वाक्य के बाद लिखी थी, ‘कहीं तुम मुझ  से दूर तो नहीं हो जाओगे न, मुंह तो नहीं फेर लोगे? मैं ने तो अपना तनमन तुम्हें समर्पित कर दिया, कहीं तुम भी मेरे पति की तरह तो नहीं करोगे? मेरे हो कर भी.’

फिर भावुक शब्दों में लिखा था, ‘मैं यहां इतने लाखों इंसानों के बीच अकेली, लगातार अपनी पहचान खोती जा रही हूं. तुम में वह नजर आता है जो दूसरों में नजर नहीं आता. मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहने में गर्व महसूस करूंगी. कहीं तुम बदलने तो नहीं लगे हो?’ तुम्हारी बातों से तो लगता है कि तुम हारने लगे हो. तुम मिले थे तो लगा था कि अब मेरा कोई है जिस के सहारे मैं जीवन को सार्थक ढंग से काट सकूंगी. अब लगातार तुम से दूर रह कर एक अनसोचा डर मुझे खाए जा रहा है कि कहीं मैं तुम्हें खो न दूं. अब तुम से कब मुलाकात होगी. तुम मिलो तो दिल का सारा गर्द व गुबार उतरे.’

पिछले 1 साल से शुभ्रा मेरी जिंदगी में तूफान बन कर आई थी. दिन में कई बार फोन करती. अपनी कहानियां मुझ से डिस्कस करती. हमारे बीच हर किस्म का फासला था, उम्र का, स्थान का, खयालात का, नजरिए का. 1 साल पहले दिल्ली में एक साहित्यिक गोष्ठी में शुभ्रा से मेरा परिचय हुआ था. उस गोष्ठी में मेरा महत्त्वपूर्ण आख्यान था. शुभ्रा की शिरकत भी एक वक्ता की हैसियत से थी. वह एक सरकारी कालेज में लैक्चरर थी. उस के 2 कविता संग्रह आ चुके थे. विवाहित थी और 2 बच्चों की मां थी. विश्वविद्यालय परिसर में बने विश्रामगृह में हमें ठहराया गया था. वहां हमारे कमरे आमनेसामने थे. मेरे नाम से वह बहुत पहले से ही वाकिफ थी क्योंकि मेरी कहानियां पिछले कई बरसों से अच्छी पत्रिकाओं में छप रही थीं और मेरे  5 कहानी संग्रह भी छप चुके थे.

अभी गोष्ठी का पहला ही दिन था और शुभ्रा ने मुझे ढूंढ़ कर अपना परिचय दिया, ‘मैं शुभ्रा वर्मा. आप तो मुझे जानते नहीं होंगे मगर मैं आप को नाम व चेहरे से अच्छी तरह जानतीपहचानती हूं.’

मैं ने मजाक में कहा, ‘क्या मेरा नाम इतना बदनाम है कि बिना अपना परिचय दिए आप ने मुझे पहचान लिया?’

‘नहीं, सर, आप की तो हमारे शहर की सभाओं में अच्छी धूम है. हम तो आप को आमंत्रित करने की योजना बना रहे थे. मैं तो समझती थी कि आप खासे बुजुर्ग होंगे, जैसा कि आप की कहानियों की परिपक्वता से अंदाजा लगता था मगर आप तो मुझ से भी जवान निकले.’

‘अजी, अभी तो मैं जवां हूं मगर आप भी कम हसीन नहीं हैं.’

बड़ी देर तक हम साथसाथ बैठे चहकते रहे. गोष्ठी के पहले सत्र के बाद शाम को हम कनाट प्लेस की तरफ घूमने निकल गए. शुभ्रा का अंतरंग साथ पाने के लिए मैं ने टैक्सी कर ली थी. इतने सारे लोगों की भीड़ होते हुए भी हम एकदूसरे में इतने खो गए थे कि सब से किनारे होते गए और पहले ही दिन एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था.

शुभ्रा तो मेरे नाम की दीवानी थी. मेरी बहुत सी कहानियों की कटिंग उस ने फाइलों में संभाल कर रखी हुई थी. कई कहानियों के अंत उसे पसंद नहीं थे. उन के बारे में हम बातें करते रहे. लगातार बातें करते वह जरा नहीं थकी थी. मेरी कई कहानियां उसे जबानी याद थीं. इस वजह से भी मेरी उत्सुकता उस में बढ़ गई थी. एक तो वह गजब की सुंदर थी और फिर बुद्धिजीवी भी. ऐसी स्त्रियां तो कहानियों में ही मिलती हैं. उस ने लेखन के बारे में हजारों सवाल पूछे. वह ठहरी साहित्य में पीएचडी और मैं विज्ञान में स्नातक.

साहित्य शुभ्रा के रोमरोम में बसता था. वह पागलों की तरह साहित्य को समर्पित थी. बस, एक समस्या थी उस की. पढ़ने के मामले में उस की बात ठीक थी मगर जब कुछ लिखने की बात आती तो कागजकलम दगा दे जाते थे.

उस शाम हम 10 बजे तक कनाट प्लेस के गोल बरामदों में घूमते रहे. पहले दिन ही उस ने अपने जीवन की सारी बातें मुझे बता दीं और मेरे व्यक्तिगत जीवन में भी झांक लिया था. अकेले दिल्ली आने की यह उस की पहली यात्रा थी. उस के पति महोदय को उस के साथ आना था मगर ऐन वक्त पर 1 दिन पहले उसे अपने बौस के साथ कोलकाता जाना पड़ा. बच्चे अपनी मां को सौंप कर शुभ्रा इस 300 किलोमीटर के सफर पर अकेली चली आई थी. विश्वविद्यालय के सभागार में प्रेमचंद पर प्रवचन देने का लोभ वह रोक न पाई. शुभ्रा ने पीएचडी प्रेमचंद के साहित्य पर ही की थी. अगले दिन कवि सम्मेलन था जिस में उसे भी कविता सुनानी थी. देशभर से चुने हुए साहित्यकार आमंत्रित थे.

बारबार शुभ्रा का मुझे सर कहना अखर रहा था. मैं ने कह दिया कि अब हमारी दोस्ती काफी गहरी हो चुकी है, अब तो मुझे सर कह कर न बुलाओ.

शुभ्रा चहकी, ‘नहीं सर, आप तो मेरे गुरु हैं. अब तो आप की दीक्षा से ही मेरा कल्याण होगा. चाहे दोस्त समझिए या अपनी शिष्या, अब तो आप ही मेरा जीवन सार्थक करेंगे. भागतेभागते मैं थक गई हूं. आप का स्वभाव मुझे बहुत अच्छा लगा और जीवन के प्रति आप का दृष्टिकोण…’

मुझे झिझक हो रही थी. इतनी सुंदर और सुशिक्षित स्त्री, उम्र में मुझ से 10 साल छोटी, सरकारी कालेज में लैक्चरर, मुझ साधारण व्यक्ति की इतनी इज्जत करती है, शायद मेरी कहानियों की वजह से. ऐसी औरत का साथ पाने के लिए जैसे मैं बरसों से तरस रहा था. अब मेरी चिरसंचित इच्छा पूरी होने जा रही थी. अंदर ही अंदर मैं बुरी तरह कांप रहा था. कहीं यह बंद आंखों का सपना तो नहीं. उस के साथ कहां तक जा पाऊंगा मैं.

शुभ्रा कहे जा रही थी, ‘आप की कहानियों की जान है आप की सटीक व सधी हुई भाषा और आज के समय के अनुरूप आप के कथानक. आप पाठक को उलझाते नहीं, उसे सीधे समस्या की जड़ में ले कर जाते हैं. आप की कथाओं में गजब की विविधा है. मैं सोचती थी कि यह आदमी कितनी जगह घूमता होगा. इतने अद्भुत स्थल, इतने अनोखे मंजर, देशदुनिया के हर धर्म व शेड के लोगों को कथा का पात्र बनाना. सर, आप सोच भी नहीं सकते कि कुछ पत्रिकाओं के मैं सारे अंक खरीदती हूं, आप की कोई नई कहानी पढ़ने के लिए. यू टच माई हार्ट, सर. बाकी किताबें तो दिमाग को कंपकंपाती हैं मगर आप के पात्र सीधे मेरे मन को छूते हैं.’

खाना तो हम बाहर ही खा कर आए थे. गैस्ट हाउस के डाइनिंग हाल में अभी मेहमानों ने खाना खत्म नहीं किया था. कुछ लोग मुझे ढूंढ़ रहे थे. मुझे उन से दूर रखने के लिए शुभ्रा मुझे अपने कमरे में ही ले गई. पजैसिव होने की इंतहा थी यह.

मन ही मन मैं भी गहरे रोमांच में था. चाहता था कि हमारा यह संबंध प्रगाढ़ से प्रगाढ़तम हो. मगर बहुत गहरे धंसने का मेरा इरादा नहीं था. मैं तो उसे नजदीक से छू कर महसूस करना चाहता था. हमारे बीच हजार मील का फासला था. हम दोनों शादीशुदा थे, बालबच्चों वाले थे. हमारी दोस्ती का आधार साहित्य ही था और ऐक्सफैक्टर था जो विपरीत लिंगों में अकसर होता है कि वे एकदूसरे के प्रति बड़ी तेजी से खिंचे चले आते हैं मगर बाद में…

शुभ्रा तो दीवानगी की हद तक मुझे पसंद करने लगी थी. इन 3 दिनों की गोष्ठी का एकएक पल मेरे साथ बिताना चाहती थी. दरअसल, मेरी भी कमजोरी थी कि मैं भी उस के रूप पर मोहित हो गया था. इतना कभी किसी ने मुझे नहीं चाहा था. मैं चाहता था कि वह मुझे अपनी बांहों में भर कर मेरा कचूमर निकाल दे.

शुभ्रा कह रही थी, ‘सर, आप का तो पता नहीं मगर मुझे आज मन की मुराद मिल गई है. आप को इतना करीब देख कर मैं ने अपनी सभी वर्जनाओं और मर्यादाओं को तिलांजलि देने का मन बना लिया है. किसी भी कीमत पर मैं आप को सारी उम्र के लिए अपने लिए मांग रही हूं. मेरा सबकुछ ले लो मगर अपना साथ मुझे दे दो. आप के साथ मेरी गजब की कैमिस्ट्री मिलती है. मैं जानती हूं कि इतनी दूर रह कर हम एकदूसरे के साथ किस तरह जुड़े रह सकते हैं. आजकल मोबाइल है, पत्र व्यवहार है और फिर समयसमय पर हम मिलेंगे न. आप सबकुछ जानतेसमझते हैं. मैं खुद ही स्वयं को आप को समर्पित कर रही हूं. समाज इसे गलत समझता होगा मगर आप को सदा के लिए अपने दिल में बसाने के लिए मैं इसे जरूरी समझती हूं. हमारे बीच जिस्म की दीवार नहीं होनी चाहिए. मेरा स्वार्थ आप से कुछ अनुचित काम करवाना नहीं है. मगर आप का साथ अब मुझ से छूटेगा नहीं.’

शुभ्रा मन बना चुकी थी. अब उसे कोई तर्क दे कर समझाना संभव नहीं था. अंदर ही अंदर खुद मैं भी उस के रूप का दीवाना हो चला था. वह मेरे गले से लिपट गई और उस रात हम ने दिल खोल कर एकदूसरे से प्यार किया. धनुष की प्रत्यंचा पर बाण सरीखी चढ़ी शुभ्रा ने दिल से मेरे सामने खुद को प्रस्तुत कर दिया. मैं तो यह देख कर रसविभोर हो गया कि साहित्य में लिखी जाने वाली ये बातें कभी मेरे साथ सच भी हो सकती हैं. मैं ने शुभ्रा से कोई सवाल नहीं किया. उस ने इस जिस्मानी प्रेम को ले कर एक ही तर्क दिया था कि दिमागी खुराफात के साथसाथ अगर हम में एकदूसरे के प्रति शारीरिक आकर्षण भी होगा तो हमारा साथ कभी छूटेगा नहीं. आप मेरी तरफ खिंचे चले आएंगे.

वे 3 रातें मैं ने शुभ्रा के साथ असीम आनंद के साथ काटीं. पहले मुझे लगा था कि शायद पति में कोई कमी होने के कारण शुभ्रा ने पहली ही नजर में मुझ से जिस्मानी संबंध बनाने का मन बना लिया हो मगर जब उस से विस्तार में चर्चा हुई तो पता चला कि अपने पति से उसे कोई शिकायत नहीं थी. एक ही ढर्रे का जीवन जीतेजीते वह बोर हो गई थी. मुझे सामने पा कर उसे लगा कि हजार मील का फासला पाटने के लिए उस के पास एक ही रास्ता है कि वह मुझ से आशिक व महबूब की तरह पेश आए. शुभ्रा के प्रस्ताव में कोई गंदगी नहीं थी. वह आज की औरत की तरह अपने पैरों से चल कर मंजिल तक पहुंचना चाहती थी. साहित्य में दूसरे आदमी के प्रति अतिरिक्त मोह को कागज पर उतारना अलग बात थी मगर कुछ नया अनुभव करने के लिए शुभ्रा ने भी जिस्म की हदों से आगे देखने का साहस करना चाहा और वह कामयाब रही.

चलते समय हमारा मन बहुत भारी था. हमें अपनेअपने घरों को लौटना था. सपनों की दुनिया की अवधि कितनी होती है. आंख खुलते ही आदमी खुद को यथार्थ की जमीन पर पाता है.

आज शुभ्रा के इस भावुक खत ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि हमारे बीच आखिर कैसा रिश्ता है. शुभ्रा भी अपने उद्देश्य से भटक रही थी और मैं भी उसे ही सबकुछ मान बैठा था. ठंडे मन से मैं ने उसे जवाब दिया, ‘शुभ्रा, अपने सुंदर नाम के विपरीत तुम्हारा यह अरण्य रोदन हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा. मान लो, हमें समाज का डर न भी हो तो भी क्या? टीनऐजर्स की तरह हमारा यह व्यवहार कहां तक उचित है. एक सही लेखक समाज को सच्ची राह दिखाता है. साहित्य समाज का दर्पण होता है.

‘एक बार हम बहक गए तो इस का यह अर्थ नहीं कि हम कीचड़ से बाहर ही न निकलें. अपनी सोच को साफ करो और साहित्य को मिशन की तरह समझो और स्वस्थ साहित्य की रचना करो. किसी शायर ने ठीक ही कहा है – जिस्म हमराह बने तो इसे अपना समझो, ये अगर बीच में आए तो हटा दो यारो. तुम से एक अच्छी कहानी के इंतजार में, तुम्हारा… सर.’ पत्र पोस्ट करते ही मेरे मन से सारा बोझ हट गया था.

Romantic Story : ऐ दिले नादां – स्पेनिश लड़की की अनोखी प्रेम कहानी

Romantic Story : मेसी मुझे जयपुर से पुष्कर जाने वाली टूरिस्ट बस में मिला था. मैं अकेला ही सीट पर बैठा था. उस वक्त वे तीनों बस में प्रविष्ट हुए. एक सुंदर विदेशी लड़की और 2 नवयुवक अंगरेज. लड़की और उस का एक साथी तो दूसरी सीट पर जा कर बैठे, वह आ कर मेरे बाजू वाली सीट पर बैठ गया. मैं ने उस की तरफ मुसकरा कर देखा तो उस ने भी जबरदस्ती मुसकराने की कोशिश करते हुए देखा.

‘‘यू आर फ्रौम?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘स्पेन,’’ उस ने उत्तर दिया, ‘‘मेरा नाम क्रिस्टियानो मेसी है. वह लड़की मेरे साथ स्पेन से आई है. उस का नाम ग्रेटा अजीबला है और उस के साथ जो लड़का बैठा है वह अमेरिकी है, रोजर फीडर.’’

लड़की उस के साथ स्पेन से आई थी और अब अमेरिकी के साथ बैठी थी. इस बात ने मुझे चौंका दिया. मैं ने गौर से उस का चेहरा देखा. उस का चेहरा सपाट था और वह सामने देख रहा था. मैं ने लड़की की तरफ नजर डाली तो रोजर ने उसे बांहों में ले रखा था और वह उस के कंधे पर सिर रखे अपनी जीभ उस के कान पर फेर रही थी. विदेशी लोगों के लिए इस तरह की हरकतें सामान्य होती हैं. अब हम भारतीयों को भी इस तरह की हरकतों में कोई आकर्षण अनुभव नहीं होता है बल्कि हमारे नवयुवक तो आजकल उन से भी चार कदम आगे हैं.

रोजर और गे्रटा आपस में हंसीमजाक कर रहे थे. मजाक करतेकरते वे एकदूसरे को चूम लेते थे. उन की ये हरकतें बस के दूसरे मुसाफिरों के ध्यान का केंद्र बन रही थीं. लेकिन मेसी को उन की इन हरकतों की कोई परवा नहीं थी. वह निरंतर उन की तरफ से बेखबर सामने शून्य में घूरे जा रहा था. या तो वह जानबूझ कर उन की तरफ नहीं देख रहा था या फिर वह उन्हें, उन की हरकतों को देखना नहीं चाहता था. मेसी का चेहरा सपाट था मगर चेहरे पर एक अजीब तरह की उदासी थी.

‘‘तुम ने कहा, गे्रटा तुम्हारे साथ स्पेन से आई है?’’

‘‘हां, हम दोनों एकसाथ एक औफिस में काम करते हैं. हम ने छुट्टियों में इंडिया की सैर करने की योजना बनाई थी और हम 4 साल से हर महीने इस के लिए पैसा बचाया करते थे. जब हमें महसूस हुआ, काफी पैसे जमा हो गए हैं तो हम ने दफ्तर से 1 महीने की छुट्टी ली और इंडिया आ गए.’’

उस की इस बात ने मुझे और उलझन में डाल दिया था. दोनों स्पेन से साथ आए थे और इंडिया की सैर के लिए बरसों से एकसाथ पैसा जमा कर रहे थे. इस से स्पष्ट प्रकट होता है कि उस के और ग्रेटा के क्या संबंध हैं. ग्रेटा उस वक्त रोजर के साथ थी जबकि उसे मेसी के साथ होना चाहिए था. मगर वह जिस तरह की हरकतें रोजर के साथ कर रही थी इस से तो ऐसा प्रकट हो रहा था जैसे वे बरसों से एकदूसरे को जानते हैं, एकदूसरे को बेइंतिहा प्यार करते हैं या फिर एकदूसरे से गहरा प्यार करने वाले पतिपत्नी हैं.

‘‘क्या ग्रेटा और रोजर एकदूसरे को पहले से जानते हैं?’’ मैं ने उस से पूछा.

‘‘नहीं,’’ मेसी ने उत्तर दिया, ‘‘ग्रेटा को रोजर 8 दिन पूर्व मिला. वह उसी होटल में ठहरा था जिस में हम ठहरे थे. दोनों की पहचान हो गई और हम लोग साथसाथ घूमने लगे…और एकदूसरे के इतना समीप आ गए…’’ उस ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.

मैं एकटक उसे देखता रहा.

‘‘ये पुष्कर क्या कोई धार्मिक पवित्र स्थान है?’’ मेसी ने विषय बदल कर मुझ से पूछा.

‘‘पता नहीं, मुझे ज्यादा जानकारी नहीं. मैं मुंबई से हूं. अमृतसर से आते हुए 2 दिन के लिए यहां रुक गया था. एक दिन जयपुर की सैर की. आज पुष्कर जा रहा हूं. साथ ही ये बस अजमेर भी जाएगी,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘हम लोग दिल्ली, आगरा में 8 दिन रहे. जयपुर में 8 दिन रहेंगे. वहां से मुंबई जाएंगे. वहां 3-4 दिन रहने के बाद गोआ जाएंगे और फिर गोआ से स्पेन वापस,’’ मेसी ने अपनी सारी भविष्य की यात्रा की योजना सुना दी और आगे कहा, ‘‘सुना है पुष्कर एक पवित्र स्थान है, जहां मंदिर में विदेशी पर्यटक हिंदू रीतिरिवाज से शादी करते हैं. हम लोग इसीलिए पुष्कर जा रहे हैं. वहां ग्रेटा और रोजर हिंदू रीतिरिवाज से शादी करेंगे?’’ मेसी ने बताया.

‘‘लेकिन शादी तो गे्रटा को तुम से करनी चाहिए थी. तुम ने बताया कि तुम ने यहां आने के लिए एकसाथ 4 सालों तक पैसे जमा किए हैं और तुम दोनों एकसाथ काम करते हो.’’

‘‘ये सच है कि इस साल हम शादी करने वाले थे,’’ मेसी ने ठंडी सांस भर कर बताया, ‘‘इसलिए साथसाथ भारत की सैर की योजना बनाई थी. हम बरसों से पतिपत्नी की तरह रह रहे हैं मगर…’’

‘‘मगर क्या?’’ मैं ने प्रश्नभरी नजरों से मेसी की ओर देखा.

‘‘अब ग्रेटा को रोजर पसंद आ गया है,’’ उस ने एक ठंडी सांस ली, ‘‘तो कोई बात नहीं, ग्रेटा की इच्छा, मेरे लिए दुनिया में उस की खुशी से बढ़ कर कोई चीज नहीं है.’’

मेसी की इस बात पर मैं उस की आंखों में झांकने लगा. उस की आंखों से एक पीड़ा झलक रही थी. मैं ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा. वह 28-30 साल का एक मजबूत कदकाठी वाला युवक था. लेकिन जिस तरह बातें कर रहा था और उस के चेहरे के जो भाव थे, आंखों में जो पीड़ा थी मुझे तो वह कोई असफल भारतीय प्रेमी महसूस हो रहा था. उस की प्रेमिका एक पराए पुरुष के साथ मस्ती कर रही है लेकिन वह फिर भी चुपचाप तमाशा देख रहा है, पे्रमिका की खुशी के लिए…इस बारे में सोचते हुए मेरे होंठों पर एक मुसकराहट रेंग गई. यह प्रेम की भावना है. जो भावना भारतीय प्रेमियों के दिल में होती है वही भावना मौडर्न कहलाने वाले यूरोपवासी के दिल में भी होती है. दिल के रिश्ते हर जगह एक से होते हैं. सच्चा और गहरा प्यार हर इंसान की धरोहर है, उसे न तो सीमा में कैद किया जा सकता है और न देशों में बांटा जा सकता है.

जब मेसी ये सारी बातें बता रहा था तो वह एक असफल प्रेमी तो लग ही रहा था, अपनी प्रेमिका से कितना प्यार करता है, उस की बातों से स्पष्ट झलक रहा था साथ ही उस की भावनाओं से एक सच्चे प्रेमी, आशिक का त्याग भी टपक रहा था. बस चल पड़ी. इस के बाद हमारे बीच कोई बात नहीं हो सकी. मगर वह कभीकभी अपनी स्पेनी भाषा में कुछ बड़बड़ाता था जो मेरी समझ में नहीं आता था लेकिन जब मैं ने एक बार उस की आंखों में आंसू देखे तो मैं चौंक पड़ा और मुझे इन आंसुओं का और उस की बड़बड़ाहट का मतलब भी अच्छी तरह समझ में आ गया. आंसू प्रेमिका की बेवफाई के गम में उस की आंखों में आ रहे थे और जो वह बड़बड़ा रहा था, मुझे विश्वास था उस की अपनी बेवफा प्रेमिका से शिकायत के शब्द होंगे. ग्रेटा और रोजर की मस्तियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं. मैं तो पूरे ध्यान से उन की मस्तियां देख रहा था. वह भी कभीकभी मुड़ कर दोनों को देख लेता था लेकिन जैसे ही वह ग्रेटा और रोजर को किसी आपत्तिजनक स्थिति में पाता था, झटके से अपनी गरदन दूसरी ओर कर लेता था. जबकि मैं उन की आपत्तिजनक स्थिति से न सिर्फ पूरी तरह आनंदित हो रहा था बल्कि पहलू बदलबदल कर उन की हरकतों को भी देख रहा था.

पुष्कर आने से पूर्व हम ने एकदूसरे से थोड़ी बातचीत की. एकदूसरे के मोबाइल नंबर और ईमेल लिए, इस के बाद वे तीनों पुष्कर में मुझ से जुदा हो गए क्योंकि पुष्कर में बस 2-3 घंटे रुकने वाली थी. पुष्कर में एक बड़ा सा स्टेडियम है जहां पर हर साल प्रसिद्ध पुष्कर मेला लगता है. इस में ऊंटों की दौड़ भी होती है. वहां मैं ने कई विदेशी जोड़ों को देखा, जिन के माथे पर टीका लगा हुआ था और गले में फूलों का हार था. पुष्कर घूमने के लिए आने वाले विदेशी पर्यटक बड़े शौक से हिंदू परंपरा के अनुसार विवाह करते हैं. उन का वहां हिंदू परंपरा अनुसार विवाह कराया जाता है फिर चाहे वह विवाहित हों या कुंवारे हों.

वापसी में भी वे हमारे साथ थे. मेसी मेरे बाजू में आ बैठा और ग्रेटा और रोजर अपनी सीट पर. तीनों के माथे पर बड़ा सा टीका लगा हुआ था और गले में गेंदे के फूलों का हार था जो इस बात की गवाही दे रहा था कि रोजर और ग्रेटा ने वहां पर हिंदू परंपरा के अनुसार शादी कर ली है. वापसी में बस अजमेर रुकी. मेसी भी मेरे साथ आया. जब वह उस स्थान के बारे में पूछने लगा तो मैं ने संक्षिप्त में ख्वाजा गरीब नवाज के बारे में बताया.

लौट कर बोला, ‘‘यहां बहुत लोग कह रहे थे कि कुछ इच्छा है तो मांग लो, शायद पूरी हो जाए.’’

‘‘तुम ने कुछ मांगा?’’ मैं ने मुसकरा कर पूछा.

‘‘हां,’’ उस का चेहरा गंभीर था.

‘‘क्या?’’

‘‘हम ने अपना प्यार मांगा?’’

‘‘प्यार? कौन?’’

‘‘ग्रेटा.’’

एक शब्द में उस ने सारी कहानी कह दी थी. और उस की इस बात से यह साफ प्रकट हो रहा था कि वह गे्रटा को कितना प्यार करता है. वही गे्रटा जो कुछ दिन पूर्व तक तो उस से प्यार करती थी, इस से शादी भी करना चाहती थी…लेकिन यहां उसे रोजर मिल गया. रोजर उसे पसंद आ गया तो अब वह रोजर के साथ है. यह भी भूल गई है कि मेसी उसे कितना प्यार करता है. वे एकदूसरे को सालों से जानते हैं. सालों से एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी भी करने वाले थे. लेकिन पता नहीं उसे रोजर में ऐसा क्या दिखाई दिया या रोजर ने उस पर क्या जादू किया, अब वह रोजर के साथ है. रोजर से प्यार करती है. मेसी के प्यार को भूल गई है. यह भूल गई है कि वह मेसी के साथ भारत की सैर करने के लिए आई है. वह मेसी, जिसे वह चाहती है और जो उसे दीवानगी की हद तक चाहता है. सुना है कि विदेशों में प्यार नाम की कोई चीज ही नहीं होती है. प्यार के नाम पर सिर्फ जरूरत पूरी की जाती है. जरूरत पूरी हो जाने के बाद सारे रिश्ते खत्म हो जाते हैं.

शायद गे्रटा भी मेसी से अभी तक अपनी जरूरत पूरी कर रही थी. जब उस का दिल मेसी से भर गया तो वह अपनी जरूरत रोजर से पूरी कर रही है. लेकिन मेसी तो इस के प्यार में दीवाना है. बस वाले हमारा ही इंतजार कर रहे थे. हम बस में आए और बस चल पड़ी. रोजर और ग्रेटा एकदूसरे की बांहों में समाते हुए एकदूसरे का चुंबन ले रहे थे. वह पश्चिम का एक सुशिक्षित युवक दिल के हाथों कितना विवश हो गया है और अपने दिल के हाथों मजबूर हो कर स्वयं को धोखा देने वाली की बातें करने लगा है. गंडेतावीज भी पहनने लगा है जो अजमेर की दरगाह पर थोक के भाव में मिलते हैं.

जयपुर में वे अपने होटल के पास उतर गए, मैं अपने होटल पर. उस ने मेरा फोन नंबर व ईमेल आईडी ले लिया और कहा कि वह मुझे फोन करता रहेगा. मैं रात में ही मुंबई के लिए रवाना हो गया और उस को लगभग भूल ही गया. 8 दिन बाद अचानक उस का फोन आया.

‘‘हम लोग मुंबई में हैं और कल गोआ जा रहे हैं.’’

‘‘अरे तो पहले मुझ से क्यों नहीं कहा. मैं तुम से मिलता. आज या कल तुम से मिलूं?’’

‘‘आज हम एलीफैंटा गुफा देखने जाएंगे और कल गोआ के लिए रवाना होना है. इस से कल भी मुलाकात संभव नहीं.’’

‘‘गे्रटा कैसी है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘रोजर के साथ बहुत खुश है,’’ उस का स्वर उदास था.

इस के बाद उस का गोआ से एक बार फोन आया, ‘‘हम गोआ में हैं. बहुत अच्छी जगह है. इतना अच्छा समुद्री तट मैं ने आज तक नहीं देखा. मुझे ऐसा महसूस हो रहा है मानो मैं अपने देश या यूरोप के किसी देश में हूं. 4 दिन के बाद मैं स्पेन चला जाऊंगा. गे्रटा भी मेरे साथ स्पेन जाएगी. लेकिन वह दूसरे दिन न्यूयार्क के लिए रवाना हो जाएगी. वहां रोजर उस का इंतजार कर रहा होगा. वह हमेशा के लिए स्पेन छोड़ देगी. अब वे दोनों वहां के रीतिरिवाज के अनुसार शादी करने वाले हैं.’’ उस की बात सुन कर मैं ने ठंडी सांस ली, ‘‘कोई बात नहीं मेसी, गे्रटा को भूल जाओ, कोई और गे्रटा तुम्हें मिल जाएगी. तुम गे्रटा को प्यार करते हो न. तुम्हारे लिए तो गे्रटा की खुशी से बढ़ कर कोई चीज नहीं है. गे्रटा की खुशी ही तुम्हारी खुशी है,’’ मैं ने समझाया.

‘‘हां,अनवर यह बात तो है,’’ उस ने मरे स्वर में उत्तर दिया. इस के बाद उस से कोई संपर्क नहीं हो सका. एक महीने के बाद जब एक दिन मैं ईमेल चैक कर रहा था तो अचानक उस का ईमेल मिला : ‘गे्रटा अमेरिका नहीं जा सकी. रोजर ने उस से शादी करने से इनकार कर दिया. वह कई दिनों तक बहुत डिस्टर्ब  रही. अब वह नौर्मल हो रही है. ‘हम लोग अगले माह शादी करने वाले हैं. अगर आ सकते हो तो हमारी शादी में शामिल होने जरूर आओ. मैं सारे प्रबंध करा दूंगा.’ उस का ईमेल पढ़ कर मेरे होंठों पर एक मुसकराहट रेंग गई. और मैं उत्तर में उसे मुबारकबाद और शादी में शामिल न हो सकने का ईमेल टाइप करने लगा.

Madhya Pradesh : धर्म परिवर्तन – तालिबान की ओर बढ़ते भारत के कदम

Madhya Pradesh : मध्य प्रदेश सरकार धर्म परिवर्तन के लिए मृत्युदंड का प्रावधान करेगी. यह तालिबान के नियमों की याद दिलाती है. यह एक चिंताजनक बात है कि क्या मध्य प्रदेश तालिबान बनने की ओर बढ़ रहा है?

जब से नरेंद्र मोदी की सत्ता देश में आई है धीरेधीरे देश, धर्म धार्मिकता के मुद्दे पर कट्टरता की ओर बढ़ता चला जा रहा है. ऐसा ही एक मामला अब “धर्म परिवर्तन” पर मृत्युदंड देने की घोषणा बन कर सुर्खियां बटोर रहा है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की घोषणा कि है मध्य प्रदेश सरकार लड़कियों के धर्म परिवर्तन के लिए दोषियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान करेगी.

लोकतंत्र में यह एक ऐसा अधोकदम है, जो महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा की बिनाह पर उठाया गया है. मजे की बात यह कि यह घोषणा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर की गई, जो महिलाओं के सशक्तिकरण और उन के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है. इस तरह मध्यप्रदेश सरकार ने एक तरह से एक तीर से दो निशाने लगाए हैं.

दिखावे के लिए, इस घोषणा के पीछे मुख्यमंत्री का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करना है. उन्होंने कहा- उन की सरकार महिलाओं के खिलाफ अत्याचार करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी और उन्हें “मृत्युदंड की सजा” दिलाने के लिए काम करेगी.

यह कदम मध्य प्रदेश सरकार की ओर से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए उठाया गया एक ऐसा थोथा कदम है जिस के पीछे कट्टरपंथी मानसिकता है. यह घोषणा कहने को महिलाओं को उन के अधिकारों के बारे में जागरूक करने और उन्हें सशक्त बनाने में मदद करेगी. मगर इस के पीछे भयावह सच है की मध्य प्रदेश एक तरह से तालिबान बनने वाला है.

दरअसल, इस तरह के कानून को लागू करने से पहले इस के व्यापक प्रभावों पर विचार किया जाना चाहिए. यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यह कानून महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में मदद करे और उन्हें सशक्त बनाने में योगदान करे. इस के अलावा, यह भी महत्वपूर्ण है कि इस कानून को तत्काल रोकना होगा.

अंत में, यह कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश सरकार की यह घोषणा महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम नहीं कही जा सकती. ‌यह घोषणा महिलाओं को उन के अधिकारों के बारे में जागरूक करने और उन्हें सशक्त बनाने की जगह कट्टरपंथी मानसिकता का प्रसार करेगी.

स्मरण रहे, तालिबान शासन में भी धर्म परिवर्तन और महिलाओं के अधिकारों के मामले में बहुत सख्त नियम थे. तालिबान के अनुसार, इस्लाम छोड़ना या धर्म परिवर्तन करना एक गंभीर अपराध माना जाता था, जिस के लिए मृत्युदंड की सजा दी जा सकती थी.

तालिबान शासन में महिलाओं के अधिकारों को भी बहुत सीमित किया गया था. महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने, काम करने और सार्वजनिक स्थानों पर जाने की अनुमति नहीं थी. उन्हें पुरुषों की उपस्थिति में ही घर से बाहर निकलने की अनुमति थी.

“तालिबान” के इन नियमों का उद्देश्य इस्लामी कानूनों को लागू करना और समाज में इस्लामी मूल्यों को बढ़ावा देना था. लेकिन इन नियमों के कारण महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों का हनन हुआ.

मध्यप्रदेश सरकार आज उसी दिशा में जाना चाहती है, वह धर्म परिवर्तन के लिए मृत्युदंड का प्रावधान करेगी, तालिबान के नियमों की याद दिलाती है. यह एक चिंताजनक बात है कि क्या हम तालिबान की ओर बढ़ते कदम नहीं देख रहे हैं?

धर्म में व्यक्तिगत, सामाजिक, और राजनीतिक पक्ष शामिल

संविधान के अनुसार धर्म अकसर व्यक्तिगत विश्वासों और मूल्यों का प्रतिबिंब होता है. यह व्यक्ति के जीवन को अर्थ और उद्देश्य देता है, और अकसर नैतिक और नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करता है. इस दृष्टिकोण से, धर्म व्यक्तिगत मामला है जो व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन और निर्णयों को प्रभावित करता है.

राजनीतिक दृष्टिकोण

धर्म जब राजनीतिक और सामाजिक शक्ति का स्रोत बन जाता है, तब विध्वंस पैदा होने लगता है. यह राजनीतिक दलों और सरकारों द्वारा उपयोग किया जाने लगा है जैसे महाकुंभ में उत्तरप्रदेश सरकार की भागीदारी. आज के भारत में धर्म शासन का सत्ता का विषय होता जा रहा है, जहां यह राजनीतिक शक्ति और प्रभाव का एक साधन बनाया जा रहा है.

दरअसल,धर्म सामाजिक संरचना और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. यह सामाजिक मूल्यों और नियमों को आकार देता है, और अकसर सामाजिक संगठन और संबंधों को प्रभावित करता है. इस दृष्टिकोण से, धर्म एक सामाजिक मामला भी है जो व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन को प्रभावित करता है.

सवाल यह कि धर्म शासन का, सत्ता का विषय है या व्यक्तिगत आजादी मिलने के बाद संविधान में यही प्रावधान किए गए कि धर्म एक व्यक्तिगत मसला है. मगर अब धीरेधीरे नरेंद्र मोदी की सरकार इसे सत्ता के आधार पर तय करना चाहती है और ऐसे कानून बनाना चाहती है की कोई भी व्यक्ति इस जलती हुई आग में झुलस सकता है.

Trending Debate : फिर निकला भाषा विवाद का जिन्न

Trending Debate : उत्तर भारत में लाखों की संख्या में दक्षिण भारत के लोग रहते हैं, काम करते हैं, व्यापार करते हैं और उत्तर भारतीयों से शादियां भी करते हैं. इसी तरह उत्तर भारत के भी लाखों लोग दक्षिण में रहते हैं. इन्हें भाषाओं को ले कर कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन नेताओं ने हमेशा उत्तर और दक्षिण के बीच भाषा को हथियार बनाया ताकि उन की राजनीति चमकती रहे.

हिंदी फिल्मों की तरह ही दक्षिण भारतीय फिल्मों को भी खूब पसंद किया जाता है. ऐक्शन, इमोशन, ड्रामा और कौमेडी से भरपूर इन फिल्मों को हर आयुवर्ग के लोग देखते हैं. यही वजह है कि साउथ के बड़े सितारों की फिल्में हिंदी भाषा में जम कर कमाई करती हैं. मुंबई फिल्म इंडस्ट्री दक्षिण भारतीय फिल्मों की हिंदी डबिंग या उन के रीमेक वर्जन से खूब कमाई करती है. फिर चाहे वह फिल्म बाहुबली हो, केजीएफ-2 हो, कल्कि 2898 एडी हो, आरआरआर हो, कबीर सिंह, वांटेड, गजनी या तेरे नाम हो. दक्षिण की इन रीमेक फिल्मों में छोटी के कलाकारों ने काम किया है.

इसी तरह कई बौलीवुड फिल्मों की रीमेक फिल्में दक्षिणी भाषाओं में बनीं और जबरदस्त हिट हुईं. 2018 में आई फिल्म ‘अंधाधुन’ बौलीवुड की बेहतरीन फिल्मों में से एक है. मर्डर मिस्ट्री पर बेस्ड इस फिल्म में आयुष्मान खुराना, तबू और राधिका आप्टे ने भूमिकाएं निभाई हैं. यह एक फ्रैंच फिल्म से प्रेरित फिल्म थी. दक्षिण में इस फिल्म का एक तेलुगू रीमेक बना- ‘मेस्ट्रो’. जिस में सुपरस्टार नितिन और तमन्ना भाटिया मुख्य भूमिका में हैं. कोरोना के चलते इस फिल्म को 17 सितंबर 2021 में सीधे ओटीटी पर रिलीज किया गया. इस के अलावा इस फिल्म को मलयालम सिनेमा में भी रीमेक किया गया, जिस में साउथ के फेमस एक्टर पृथ्वीराज को लीडरोल में लिया गया.

अक्षय कुमार और परेश रावल स्टारर फिल्म ‘ओ माय गाड’ एक यूनिक फिल्म थी, जिस के जरिए भगवान के नाम पर होने वाली डार्क पौलिटिक्स को दिखाया गया. यह फिल्म तेलुगु और कन्नड़ में भी रीमेक हुई और खूब चली. तेलुगु में इस फिल्म का नाम ‘गोपालागोपाला’ है, वहीं कन्नड़ में इस फिल्म का नाम ‘मुकुंद मुरारी’ है.

फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ बौलीवुड की सब से बेस्ट कौमेडी ड्रामा फिल्म जिस में आमिर खान, आर माधवन, शरमन जोशी, करीना कपूर और बोमन ईरानी थे और जिस में इंडियन एजुकेशन की कमियों को उजागर किया गया था, इस का तमिल फिल्ममेकर शंकर ने रीमेक बनाया- ‘ननबन’. इस में साउथ के नामी एक्टर विजय, जीवी और सत्यराज को लिया गया.

2007 में आई फिल्म ‘जब वी मेट’ बौलीवुड की रोमांटिक कौमेडी फिल्म थी, जिस में करीना कपूर और शाहिद कपूर लीड रोल में थे. इस फिल्म का साउथ रीमेक बना – ‘कंदर काढलाई’, इस रीमेक में भरत श्रीनिवास और तमन्ना भाटिया लीड रोल में हैं.

इसी तरह संजय दत्त की सुपरहिट फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ के तेलुगू रीमेक में सुपरस्टार चिरंजीवी ने लीड रोल किया है, वहीं इस के तमिल रीमेक में कमल हासन ने मुख्य किरदार निभाया है. तेलुगु में इस फिल्म का नाम ‘शंकर दादा एमबीबीएस’ और तमिल में इस फिल्म का नाम ‘वसूल राजा एमबीबीएस’ है.

2008 में नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर अभिनीत बहुचर्चित फिल्म ‘ए वेडनेसडे’ एक आम आदमी की कहानी है, जो सिस्टम से तंग आ कर ऐसा कदम उठा लेता है कि पुलिस और सरकार को उस की हर मांग के आगे झुकना पड़ता है. इस फिल्म के तमिल रीमेक में कमल हसन और मोहन लाल जैसे एक्टर्स ने काम किया. इस फिल्म को हौलीवुड में भी ‘अ कौमन मैन’ के नाम से रीमेक किया गया.

क्या इन फिल्मों को हिंदी या दक्षिणी भाषाओं को जाने, समझे, बोले और लिखे बगैर रीमेक करना संभव था? क्या रीमेक करते वक्त कोई भाषा विवाद पैदा हुआ? क्या दक्षिण के एक्टर्स ने यह कह कर फिल्म में काम करने से मना किया कि यह हिंदी की रीमेक है? या बौलीवुड एक्टर्स ने दक्षिण की फिल्मों के रीमेक में काम करने से मना किया? नहीं.

उन्हें भाषा, क्षेत्र आदि से कोई फर्क नहीं पड़ा. दक्षिण के लोग हिंदी समझते हैं, हिंदी फिल्में देखते हैं, इसलिए उन्होंने आसानी से हिंदी फिल्मों के रीमेक बनाए और पैसा कमाया. उत्तर के लोग भी अनेक दक्षिणी भाषाएं जानते समझते हैं इसलिए वे दक्षिण की फिल्मों को हिंदी में डब कर सके. यहां भाषा का कोई विवाद कभी नहीं उठा. न ही भाषा के प्रति कोई नफरत दिखी.

उत्तर भारत में लाखों की संख्या में दक्षिण भारत के लोग रहते हैं, काम करते हैं और व्यापार करते हैं. उत्तर भारतीयों से शादियां भी करते हैं. इसी तरह उत्तर भारत के भी लाखों लोग दक्षिण में रहते और काम करते हैं. वे आसानी से काम कर सकते हैं क्योंकि उन को हिंदी भाषा और दक्षिणी भाषा दोनों में कोई दिक्कत नहीं है.

जो बात नहीं समझ में आती उसे अंग्रेजी में समझ लेते हैं. लेकिन राजनेताओं ने हमेशा उत्तर और दक्षिण का भेद बना कर रखा ताकि उन की राजनीति चमकती रहे. आमजन के स्तर पर भाषा का कोई विवाद नहीं है, जो है वह राजनीतिक स्तर पर है. नेता सड़क से संसद तक इस को मुद्दा बना कर अपनी नेतागिरी चमकाते हैं.

भारत हमेशा से विभिन्न भाषाभाषी लोगों का देश रहा है. कहावत भी है कि यहां कोसकोस पर पानी और चार कोस पर वाणी बदल जाती है. देश के नागरिकों को भाषाओं को ले कर दिक्कत होती और भाषा विवाद ही होना होता तो हर चार कोस पर झगड़े हो रहे होते. मगर नहीं होते.

लेकिन जिस तरह दक्षिण में हिंदी के प्रति दुर्भावना दिखाई देती है उस के आधार में दरअसल राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं ही समाई हुई हैं. इतिहास के पन्ने पलटें तो दक्षिण में हिंदी विरोध का लंबा राजनीतिक इतिहास दिखाई देता है.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत में वर्ष 1918 में ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ की स्थापना की थी. वे हिंदी को भारतीयों को एकजुट करने वाली भाषा मानते थे. तब से ही तमिलनाडु में हिंदी विरोध के स्वर उठने शुरू हो गए थे.

भाषा को ले कर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने की बजाय नेता इस मुद्दे पर अपनी राजनीति चमकाने में जुटे रहे और इस विरोध को हवा देते रहे. जबकि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा आज भी सक्रिय है. सभा हिंदी सिखाने का काम करती है. यहां हिंदी पढ़नेवाले तकरीबन 65 फीसद लोग तमिल भाषी हैं. इतने सालों में हिंदी प्रचार सभा से हिंदी सीखने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती ही गई. फिर भी दक्षिण में हिंदी को ले कर विवाद चरम पर है.

नई शिक्षा नीति के तीन भाषा फार्मूले को ले कर तमिलनाडु सरकार लगातार केंद्र सरकार पर दक्षिण भारतीयों पर हिंदी थोपने का आरोप लगा रही है. नई शिक्षा नीति को ले कर तमिलनाडु का वैसे तो कई मसलों पर विरोध है. लेकिन द्रविड़ अभिमान पर गठित हुए इस राज्य की मुख्य आपत्ति तीन भाषा फार्मूला को ले कर ज्यादा है, जिस में हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में अपनाने की सलाह भाजपा और संघ द्वारा दी जा रही है.

केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी एनईपी 2020 के तहत प्रस्तावित तीन भाषा नीति कहती है कि बच्चों को तीन भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए. पहली भाषा छात्र की मातृभाषा या राज्य की क्षेत्रीय भाषा होगी. जैसे तमिलनाडु में तमिल, महाराष्ट्र में मराठी, बंगाल में बंगाली. दूसरी भाषा में कोई अन्य भाषा हो सकती है. भाजपा नीत केंद्र सरकार हिंदी को इस संदर्भ में प्रोत्साहित करती है, खास कर गैरहिंदी भाषी राज्यों में. उस का तर्क है कि इस से राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी. हालांकि यह अनिवार्य नहीं है और राज्य अपने हिसाब से दूसरी भाषा चुन सकते हैं. तमिलनाडु का सख्त विरोध इसी बिंदु पर है. तीसरी भाषा अंग्रेजी या अन्य कोई यूरोपीय भाषा हो सकती है.

तीन भाषा नीति का विरोध ऐसे वक्त में हो रहा है जब दक्षिण के राज्य परिसीमन को ले कर भी सवाल उठा रहे हैं. उन्हें डर है कि परिसीमन होने पर लोकसभा में दक्षिण राज्यों की सीटें कम हो जाएंगी. जिस से केंद्र में उन की आवाज कमजोर हो जाएगी. ऐसे में परिसीमन और हिंदी का विरोध एक साथ चल रहा है और दोनों एकदूसरे को मजबूती दे रहे हैं.

असल बात यह है कि तमिलनाडु की राजनीति में बीते कई दशक से स्थानीय द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व रहा है. कभी डीएमके (द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम) तो कभी एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) जैसी स्थानीय पार्टियां ही सत्ता की मलाई खाती रही हैं. सही मायनों में देखें तो ये महज स्थानीय पार्टियां नहीं, बल्कि अपने अपने हिसाब से तमिल उपराष्ट्रीयता का प्रतिनिधित्व करती हैं.

गौरतलब है की 1916 में साउथ इंडियन लिबरेशन एसोसिएशन की स्थापना हुई थी, जिस का उद्देश्य ब्राह्मण जाति की आर्थिक शक्ति का विरोध करना और गैरब्राह्मण का सामाजिक उत्थान करना था. 17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु में जन्मे पेरियार ने जस्टिस पार्टी का गठन किया, जिस ने ब्राह्मणवादी विचारधारा का घोर विरोध किया. जस्टिस पार्टी ने अस्पृश्यता के लिए बहुत काम किया और मंदिर मार्ग पर अछूतों को चलने के लिए आंदोलन चलाए.

इसी जस्टिस पार्टी को 1944 में पेरियार ने द्रविड़ कड़गम पार्टी का नाम दिया, जो किसी भी हालत में मनुवादी सोच से ग्रस्त भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दक्षिण से दूर रखना चाहती है. इसी तरह अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल है जो ब्राह्मण सोच और वर्चस्व को दक्षिण पर हावी नहीं होने देना चाहता.

दशकों से ये दोनों ही पार्टियां तमिलनाडु की राजनीति में उपराष्ट्रीयता का दबदबा बनाए हुए हैं. तमिल उपराष्ट्रीयता के ही जरिए द्रविड़ राजनीति तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज रही है. ऐसे में दक्षिण में हिंदी भाषा और उस के साथ ही संस्कृत का प्रचारप्रसार भाजपा को द्रविड़ राजनीति में सेंध लगाने का बड़ा मौका दे देगा.

संचार और सूचना क्रांति के दौर में तमिल उपराष्ट्रीयता वाली सोच को लगने लगा है कि यदि हिंदी आई तो उस के जरिए राष्ट्रीयता की विचारधारा मजबूत होगी. जिस का असर स्थानीय राजनीति पर भी पड़ेगा. हिंदी या किसी भी सामान्य संपर्क भाषा के ज्यादा प्रचलन से कट्टरवादी स्थानीय सोच को चोट पहुंचेगी और इस के साथ ही तमिल माटी में राष्ट्रीय राजनीति की जगह मजबूत होगी.

जिस का आखिर में नतीजा हो सकता है कि द्रविड़ राजनीति की विदाई हो जाए. इसलिए तमिलनाडु में हिंदी का विरोध आवश्यक है.

गौरतलब है कि 1937 में सी. राजगोपालाचारी की कांग्रेस सरकार ने तमिलनाडु के स्कूलों में अनिवार्य हिंदी लागू की थी. इस के बाद जस्टिस पार्टी और पेरियार जैसे द्रविड़ नेताओं के नेतृत्व में हिंदी के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए.

1940 में इस नीति को रद्द कर दिया गया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद हिंदी विरोधी भावनाएं बढ़ गईं. जब 1968 में तीन भाषा फार्मूला लागू किया गया, तो तमिलनाडु ने इसे हिंदी थोपने के रूप में देखते हुए इसे अस्वीकार कर दिया.

तत्कालीन मुख्यमंत्री सीएन अन्नादुरई के नेतृत्व में, राज्य ने दो भाषा नीति (तमिल और अंग्रेजी) अपनाई. तमिलनाडु एकमात्र ऐसा राज्य है जिस ने कभी भी तीन भाषा के फार्मूले को लागू नहीं किया, बल्कि हिंदी की जगह अंग्रेजी को प्राथमिकता दी.

भाजपा जब भी तमिलनाडु और दूसरे दक्षिणी राज्यों में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश करती है, वह हिंदी और संस्कृत को बढ़ावा देती है. 2022 में केंद्र सरकार ने काशीतमिल संगम की शुरुआत की थी. इस के जरिए काशी और तमिलनाडु को करीब लाने और दक्षिण को उत्तर भारत की संस्कृति से जोड़ने की कोशिश की गई थी.

हिंदीहिंदुत्व के जरिए पूजापाठी लोगों को स्थापित करने की भाजपा की नीयत भांप कर ही हिंदी के नाम पर भाजपा को वहां घेरा जाता है. डीएमके सहित दूसरी पार्टियां भी हिंदी विरोध और द्रविड़ अस्मिता के नाम पर मैदान में उतर जाती हैं.

2019 में भी हिंदी को ले कर विवाद बढ़ा था, फिर तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टियों को भाजपा की घेराबंदी का मौका मिल गया था. तब हिंदी दिवस पर अमित शाह ने कहा था कि हमारे देश में कई भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन एक भाषा ऐसी होनी चाहिए जो देश का नाम दुनिया में बुलंद करे और हिंदी में यह खूबी है.

शाह के इस बयान का दक्षिण के राज्यों में काफी विरोध हुआ और निशाने पर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों आए. भाजपा के नेता हालांकि वक्तवक्त पर कहते रहे हैं कि भाजपा न भाषा विरोधी पार्टी है, न दक्षिण विरोधी पार्टी और यह कि उस की विचारधारा सब को साथ ले कर चलने की है. लेकिन दक्षिण के राज्यों में क्षेत्रीय दल भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी और ब्राह्मण पार्टी के तौर पर ही देखते हैं और उस पर निशाना साधते हैं.

भाजपा को लगता है कि हिंदी और संस्कृत के प्रचारप्रसार के चलते जहां भाजपा खेमा दक्षिण में मजबूत होगा और मनुवादियों को वहां आगे बढ़ने, नौकरी करने, जमीनजायदाद बनाने आदि में बड़ा फायदा मिलेगा. वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को यह डर भी सताने लगा है कि परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभा की सीटों में बदलाव होगा.

जनसंख्या के लिहाज से उत्तर भारत का पलड़ा भारी है. दक्षिण भारत ने पिछले तीन दशकों में जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतर काम किया और अब इस से उन्हें भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है.

मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र पर हिंदी थोप कर भाषा युद्ध का बीज बोने का आरोप लगाया है. स्टालिन ने कहा कि 1965 से ही डीएमके का अनेकों बलिदानों के जरिए हिंदी से मातृभाषा तमिल की रक्षा करने का इतिहास रहा है. मातृभाषा की रक्षा करना डीएमके के खून में है. कुछ लोग हिंदी को बाकी भाषाओं से ऊपर रखना चाहते हैं और गैरहिंदी राज्यों पर इसे जबरन थोपने की कोशिश कर रहे हैं.

एमके स्टालिन ने कहा कि किसी भी तरह की भाषा थोपने से दुश्मनी ही पैदा होती है. कुछ कट्टरपंथी लोग तमिलनाडु में तमिलों के सही स्थान की मांग करने के ‘अपराध’ के लिए हमें अंधराष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी करार देते हैं. हिंदी थोपना स्वाभाविक और तमिल की बात करना राष्ट्रविरोधी, हमें यह स्वीकार नहीं है.

दरअसल तमिलनाडु में भाषा विरोध की जड़ में द्रविड़ राजनीति ही है, जो ब्राह्मणवादी सोच और उस के फैलाव से घबराई हुई है. हिंदी और संस्कृत को द्रविड़ मानसमनुवाद से जोड़ कर देखते हैं, जिस के विस्तार से द्रविड़ समाज का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है. वैसे आमजन के स्तर पर तमिलनाडु में हिंदी जाननेसमझने और बोलने वाले कम नहीं हैं. हर तीसरा व्यक्ति हिंदी समझता और बोलता है.

तीन भाषा फार्मूले का विकास

इस फार्मूले को सब से पहले शिक्षा आयोग (1964-66) द्वारा प्रस्तावित किया गया था. इसे आधिकारिक तौर पर कोठारी आयोग के रूप में जाना जाता है. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासन के वक्त राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) 1968 को आधिकारिक तौर पर अपनाया गया. प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी एनपीई 1986 को बनाए रखा. इसे भाषाई विविधता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की तरफ से 1992 में संशोधित किया गया.

भौतिक विज्ञानी डा. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता वाले आयोग ने तीन भाषाएं सीखने की सिफारिश की-

➤ मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा
➤ संघ की आधिकारिक भाषा
➤ पहली दो भाषाओं के अलावा कोई आधुनिक भारतीय या यूरोपीय भाषा

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