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Family Story in Hindi : घुंघरू वाला दरवाजा – संज्ञा को क्या कचोट रहा था?

Family Story in Hindi : दरवाजों के घुंघरुओं की रुनझुन से संज्ञा का मन झंकृत हो उठता था. उस का पूरा अस्तित्व मानो उन घुंघरुओं से बंध गया था, फिर भला वह कैसे दूर कर सकती उस घुंघरू वाले दरवाजे को अपनेआप से.

आज फिर जब घुंघरुओं के बजने की आवाज आई तब ‘संज्ञा’ ने झांक कर देखा. वहां तो कोई न था. हवा के झंकों से ये घुंघरू बज उठे थे. संज्ञा के लिए यह घुंघरुओं की आवाज कोई साधारण आवाज न थी. यह तो संजीवनी थी जो उस के बुझे से मन को झंकृत कर देती थी.

संज्ञा का बचपन तो हरीतिमा की गोद में ही बीता था. सागौन, शीशम, सरगी के वृक्षों की लोरी सुनसुन कर वह बड़ी हुई. गन्ने के खेत की सरसराहटों ने उसे यौवन की दहलीज पर ला खड़ा किया था.

मोरटपाल गांव की नदी की थाप से ही उसे नींद आती थी. अभिजात्य वर्ग से संबंधित संज्ञा संज्ञाशून्य थी, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी.

नाम, पद, प्रतिष्ठा जैसे ऐश्वर्य उस के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं थे जितना कि उसे आदिवासियों की बोली, उन के पहनावे, खानपान, बस्तर के कणकण में बसी जिंदादिली  से मोह था. वह तो बादल का टुकड़ा बनना चाहती थी जो क्षण में इंद्रावती तो क्षण में केशकाल घूम कर आ जाए. जब वापस आए तो महुआ सी बौराती, गन्ने की पत्तियों की तरह सरसराती, शीशम, साल के जंगलों में बजती सीटी की आवाज की तरह ही गूंजती जाए, गूंजती जाए. इन सब से सराबोर उस की तरुणाई में घंटियों की ध्वनियां तो झंकृत होती थीं, साथ ही साथ, घुंघरुओं सा अल्हड़पन, खिलंदड़ी, फाकामस्ती जैसी स्वर लहरियां भी उस के व्यक्तित्व में समाहित थीं.

समय करवट लेता गया. दादाजी की उस बड़ी सी हवेली का मुख्यद्वार ही संज्ञा की सार्वभौमिक सत्ता थी. उस दरवाजे से ही उस की सुबह, वहीं दोपहर, वहीं शाम हुआ करती थी. सुबह बड़े से दरवाजे को खोलने के लिए संज्ञा लगभग उतावली हो जाती थी. नन्ही हथेलियों से पूरे शरीर का बल लगा कर जब वह दरवाजे को ढकेलती थी तो चर्रचर्र की आवाज उस के बालसुलभ चेहरे को आरक्त कर देती थी. दरवाजे को पूरा खोलने में वह पसीने से तरबतर हो जाती थी.

और जब अपने इस प्रयास में सफल हो जाती तब वह बड़े गर्व से सूरज की ओर मिचियाती आंखों से देख कर इतराती फिरती.

दरवाजा था या फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा? भारी लकड़ी से बना वह दरवाजा संज्ञा के लिए खजाने से कम न था. लकड़ी के खांचे से चौकोर डिजाइन उकेरे गए थे. इस में सुंदर बेलबूटे बने थे. साथ ही, न जाने कहांकहां से इकट्ठा की गईं सुंदर घंटियां भी इन में लोरती रहती थीं. घंटियां पीतल की बनी थीं, उन्हें बड़े करीने से लकडि़यों के साथ जोड़ा गया था. उन्हें इस तरह से लगाया गया था मानो वे हवाओं के इशारे से या यों कहिए कि संज्ञा के हाथों की कठपुतलियां हों.

बजने वाली घंटियां सारी की सारी संज्ञा की पहुंच से दूर थीं लेकिन मजाल है दरवाजे की घंटियां संज्ञा की बात न मानें. दरवाजे के नीचे पल्ले को संज्ञा प्यार से झिंझंड़ कर थपथपाती तो कंपन नीचे से ऊपर की ओर जाता और स्वर लहरियां तैरने लगतीं. संज्ञा की बात मान कर जैसे उन सब ने अपने सिर हिला दिए हों.

गुडि़यागुड्डे की शादी से पहले दरवाजे के खोखों में संज्ञा अपने गुड्डेगुडि़यों को बिठा कर देखा करती और अपलक निहारती. वह सोचती कि मेरी गुडि़या कैसी दिख रही है? गुड्डा रोबीला है कि नहीं?

मां की पाकशाला से मित्रमंडली के लिए चुराए गए आम के भरवां अचार को भी इसी दरवाजे की खोह में पनाह मिलती. संज्ञा जब कहीं न मिलती तो पूरा घर समझा जाता कि वह किसी दरवाजे के पीछे जा छिपी होगी. सहेलियों के साथ लुकाछिपी में भी यही दरवाजे संज्ञा के सब से विश्वसनीय साथी थे जो शाम के धुंधलके में अपने स्याह रंग होने के कारण संज्ञा को अपनी ओट में छिपाए रखते थे. सारी सहेलियां उसे ढूंढ़ती रह जाती थीं.

महानगर में ब्याहे जाने के बाद अपनी जिम्मेदारियों को निबाहते हुए संज्ञा आगे बढ़ती जा रही थी. आज इतने सालों के बाद संज्ञा को जैसे ही यह खबर मिली कि पैतृक संपत्ति के बंटवारे में भी यह दरवाजा भी बेचा जाएगा. यह सुन कर वह कटे हुए वृक्ष के समान  निढाल हो गई. अबोध शिशु की तरह फफकफफक कर रोने लगी. अगले ही पल कुछ कर गुजरने का भाव लिए वह पहली बस से अपने मायके जा पहुंची.

सब के सब हतप्रभ थे, संज्ञा क्या मांग रही है. उस इकलौती कन्या को अपने पिता की संपत्ति में से कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ यही दरवाजा चाहिए. रिश्तेदारों की कलई   खुलती गई. चमकदार कलई के भीतर की बदरंग परत उधड़ कर सामने आ चुकी थी.

सौदा यह हुआ कि वह नकद भुगतान करे वह भी अधिक राशि का. उस के बाद ही  वह अपने मायके से वह दरवाजा संज्ञा खरीद सकती है.

संज्ञा को सब मंजूर था. मायके से बड़ी जतन से सहेज कर जब महानगरीय ससुराल में वह दरवाजा पहुंचा तो संज्ञा ने विधिवत उस की आरती उतारी. आज उसे ऐसा लग रहा था मानो अपने अभिभावकों को वह वृद्धाश्रम से उठा कर ससम्मान अपने घर ले आई हो.

अब संज्ञा के घर पर वात्सल्य से भरा वह दरवाजा स्थिर हो चुका था. दरवाजा भी कभी बूढ़ा होता है क्या?

हां, संज्ञा को अब उस दरवाजे से बचपन वाली चर्रचर्र की आवाज कम ही सुनाई देती. घंटियां भी महानगरीय हवा की गुलामी से इनकार कर चुकी थीं. संज्ञा को सब मंजूर था. बस, यह दरवाजा यों ही चुपचाप रहे.

उस के जीतेजी उस की आंखों के सामने अपनी जन्मभूमि से विलग हुए दरवाजे महानगर में आ कर बेहद उदास थे. संज्ञा को न जाने क्यों ऐसा बारबार लगता था.

दरवाजों की नसनस से संज्ञा वाकिफ थी. उस ने इन बेजबान दरवाजों के हमराही दो आदिवासी महिला, पुरुष की लौह आकृति दोनों दरवाजों पर ठुकवा दी थीं. लौह आकृतियों के सिर पर कलगी को सुनहरे रंग से, उन के कपड़ों को लाल रंग से पेंट करवा दी थी. पैरों में पायली को सफेद रंग से संज्ञा ने रंगवा दिया था. फिर भी उसे कुछ कमी लग रही थी. उस ने आदिवासी महिला के कानों में घुंघरुओं को वेल्डिंग कर कुछ इस तरह से चिपकवा दिया था कि ये हलके झंकों से भी बजने लगें. उन्हें सुनहरे रंग से पेंट करवाने के बाद संज्ञा उस दरवाजे को घंटों निहारती रहती थी.

शाम को बालकनी में बैठ कर जाने कितने घंटे उन दरवाजों को निहारने में व्यतीत हो जाते थे. समय ने करवट ली. संज्ञा व दरवाजे दोनों बुढ़ाने लगे. अधेड़ावस्था का अकेलापन अब संज्ञा के सामने था. उस ने उसे नियति मान कर स्वीकार कर लिया था.  अब भी वह अपनी बालकनी में रखे स्टूल पर बैठ कर आने वाली आहटों का इंतजार  किया करती थी.

अचानक खिलखिलाने की आवाज आई. संज्ञा के स्नायुतंत्र में फुरती वाली बिजली  दौड़ पड़ी. दरवाजे भी किलक उठे. अरे, वही बचपन वाली घुंघरुओं की आवाज. उस ने बालकनी से देखा तो सरकारी स्कूल का एक बच्चा, जो नंगेपांव था, फाटक पर चढ़ कर आदिवासी महिला के कानों में लगे घुंघरुओं को बजाने की कोशिश कर रहा था और लौह प्रतिमा भी वात्सल्य से भरी उस को अपने कान दिए जा रही थी. जब कानों में लगे घुंघरू बजे तब वह बच्चा विजयी मुद्रा में धड़ाम से नीचे कूदा.

घुंघरुओं की स्वर लहरियों ने संज्ञा के नीरस जीवन में मानो फिर से जान फूंक दी थी. अब तो रोजरोज का यह सिलसिला था. बच्चों की टोली उस के घर के सामने से  गुजरती और जब तक दरवाजे पर लगी लौह प्रतिमा के कानों के घुंघरुओं को उछाल कर न बजा लेते, वे आगे बढ़ते ही नहीं थे.

संज्ञा को आज दरवाजे हंसते हुए दिखे. उदास संज्ञा के चेहरे पर सुकून था. बच्चों की टोली उधम मचाती दरवाजे पर चढ़ी जा रही थी. घुंघरू फिर बज उठे, फिर खिलखिला उठे. आखिर दरवाजे घुंघरू वाले जो थे. Family Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : अकेलापन – निशा सरोज से प्रभावित क्यों हुई?

Romantic Story in Hindi :

सरिता, बीस साल पहले, फरवरी (प्रथम) 2006

सरोज से मिल कर निशा को लगा कि सरोज के अकेलेपन के आगे उस का अकेलापन तो बहुत छोटा है, लेकिन सरोज ने अपने अकेलेपन को अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया था.

आज मेरा 32वां जन्मदिन था और मैं यह दिन राजेश के साथ गुजारना चाहती थी. उन के घर 10 बजे तक पहुंचने के लिए मैं ने सुबह 6 बजे ही कार से सफर शुरू कर दिया.

राजेश पिछले शनिवार को अपने घर गए थे लेकिन तेज बुखार के कारण वे सोमवार को वापस नहीं लौटे. आज का पूरा दिन उन्होंने मेरे साथ गुजारने का वादा किया था. अपने जन्मदिन पर उन से न मिल कर मेरा मन सचमुच बहुत दुखी होता.

राजेश को अपने प्रेमी के रूप में स्वीकार किए मुझे करीब 2 साल बीत चुके हैं. उन के दोनों बेटों सोनू और मोनू व पत्नी सरोज से आज मैं पहली बार मिलूंगी.

राजेश के घर जाने से एक दिन पहले हमारे बीच जो वार्त्तालाप हुआ था वह रास्तेभर मेरे जेहन में गूंजता रहा.

‘मैं शादी कर के घर बसाना चाहती हूं, मां बनना चाहती हूं,’ उन की बांहों के घेरे में कैद होने के बाद मैं ने भावुक स्वर में अपने दिल की इच्छा उन से जाहिर की थी.

‘कोई उपयुक्त साथी ढूंढ़ लिया है?’ उन्होंने मुझे शरारती अंदाज में मुसकराते हुए छेड़ा.

उन की छाती पर बनावटी गुस्से में कुछ घूंसे मारने के बाद मैं ने जवाब दिया, ‘मैं तुम्हारे साथ घर बसाने की बात कर रही हूं.’

‘धर्मेंद्र और हेमामालिनी वाली कहानी दोहराना चाहती हो?’

‘मेरी बात को मजाक में मत उड़ाओ, प्लीज.’

‘निशा, ऐसी इच्छा को मन में क्यों स्थान देती हो जो पूरी नहीं हो सकती,’ अब वे भी गंभीर हो गए.

‘देखिए, मैं सरोज को कोई तकलीफ नहीं होने दूंगी. अपनी पूरी तनख्वाह उसे दे दिया करूंगी. मैं अपना सारा बैंकबैलेंस बच्चों के नाम कर दूंगी. उन्हें पूर्ण आर्थिक सुरक्षा देने…’

उन्होंने मेरे मुंह पर हाथ रखा और उदास लहजे में बोले, ‘तुम समझती क्यों नहीं कि सरोज को तलाक नहीं दिया जा सकता. मैं चाहूं भी तो ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं.’

‘पर क्यों?’ मैं ने तड़प कर पूछा.

‘तुम सरोज को जानती होतीं तो यह सवाल न पूछतीं.’

‘मैं अपने अकेलेपन को जानने लगी हूं. पहले मैं ने सारी जिंदगी अकेले रहने का मन बना लिया था पर अब सब डांवांडोल हो गया है. तुम मुझे सरोज से ज्यादा चाहते हो?’

‘हां,’ उन्होंने बेझिझक जवाब दिया था.

‘तब उसे छोड़ कर तुम मेरे हो जाओ,’ उन की छाती से लिपट कर मैं ने अपनी इच्छा दोहरा दी.

‘निशा, तुम मेरे बच्चे की मां बनना चाहती हो तो बनो. अगर अकेली मां बन कर समाज में रहने का साहस तुम में है तो मैं हर कदम पर तुम्हारा साथ दूंगा. बस, तुम सरोज से तलाक लेने की जिद मत करो, प्लीज. मेरे लिए यह संभव नहीं होगा,’ उन की आंखों में आंसू झिलमिलाते देख मैं खामोश हो गई.

सरोज के बारे में राजेश ने मुझे थोड़ी सी जानकारी दे रखी थी. बचपन में मातापिता के गुजर जाने के कारण उसे उस के मामा ने पाला था. 8वीं तक शिक्षा पाई थी. रंग सांवला और चेहरामोहरा साधारण सा था. वह एक कुशल गृहिणी थी. अपने दोनों बेटों में उस की जान बसती थी. घरगृहस्थी के संचालन को ले कर राजेश ने उस के प्रति कभी कोई शिकायत मुंह से नहीं निकाली थी.

सरोज से मुलाकात करने का यह अवसर चूकना मुझे उचित नहीं लगा. इसलिए उन के घर जाने का निर्णय लेने में मुझे ज्यादा कठिनाई नहीं हुई.

राजेश इनकार न कर दें, इसलिए मैं ने उन्हें अपने आने की कोई खबर फोन से नहीं दी थी. उस कसबे में उन का घर ढूंढ़ने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई. उस एकमंजिला साधारण से घर के बरामदे में बैठ कर मैं ने उन्हें अखबार पढ़ते पाया.

मुझे अचानक सामने देख कर वे पहले चौंके, फिर जो खुशी उन के होंठों पर उभरी, उस ने सफर की सारी थकावट दूर कर मुझे एकदम से तरोताजा कर दिया.

‘‘बहुत कमजोर नजर आ रहे हो, अब तबीयत कैसी है?’’ मैं भावुक हो उठी.

‘‘पहले से बहुत बेहतर हूं. जन्मदिन की शुभकामनाएं. तुम्हें सामने देख कर दिल बहुत खुश हो रहा है,’’ राजेश ने मिलाने के लिए अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया.

राजेश से जिस पल मैं ने हाथ मिलाया उसी पल सरोज ने घर के भीतरी भाग से दरवाजे पर कदम रखा.

आंखों से आंखें मिलते ही मेरे मन में तेज झटका लगा.

सरोज की आंखों में अजीब सा भोलापन था. छोटी सी मुसकान होंठों पर सजा कर वह दोस्ताना अंदाज में मेरी तरफ देख रही थी.

जाने क्यों मैं ने अचानक अपने को अपराधी सा महसूस किया. मुझे एहसास हुआ कि राजेश को उस से छीनने के मेरे इरादे को उस की आंखों ने मेरे मन की गहराइयों में झंक कर बड़ी आसानी से पढ़ लिया था.

‘‘सरोज, ये निशा हैं. मेरे साथ दिल्ली में काम करती हैं. आज इन का जन्मदिन भी है. इसलिए कुछ बढि़या सा खाना बना कर इन्हें जरूर खिलाना,’’ हमारा परिचय कराते समय राजेश जरा भी असहज नजर नहीं आ रहे थे.

‘‘सोनू और मोनू के लिए हलवा बनाया था. वह बिलकुल तैयार है और मैं अभी आप को खिलाती हूं,’’ सरोज की आवाज में भी किसी तरह का खिंचाव मैं ने महसूस नहीं किया.

‘‘थैंक यू,’’ अपने मन की बेचैनी के कारण मैं कुछ और ज्यादा नहीं कह पाई.

‘‘मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ यह कह कर सरोज तेजी से मुड़ी और घर के अंदर चली गई.

राजेश के सामने बैठ कर मैं उन से उन की बीमारी का ब्योरा पूछने लगी. फिर उन्होंने औफिस के समाचार मुझ से पूछे. यों हलकेफुलके अंदाज में वार्त्तालाप करते हुए मैं सरोज की आंखों को भुला पाने में असमर्थ हो रही थी.

अचानक राजेश ने पूछा, ‘‘निशा, क्या तुम सरोज से अपने और मेरे प्रेम संबंध को ले कर बातें करने का निश्चय कर के यहां आई हो?’’

एकदम से जवाब न दे कर मैं ने सवाल किया, ‘‘क्या तुम ने कभी उसे मेरे बारे में बताया है?’’

‘‘कभी नहीं, मुझे लगता है कि वह हमारे प्रेम के बारे में जानती है.’’

कुछ देर खामोश रहने के बाद मैं ने अपना फैसला राजेश को बता दिया, ‘‘तुम्हें एतराज नहीं हो तो मैं सरोज से खुल कर बातें करना चाहूंगी. आगे की जिंदगी तुम से दूर रह कर गुजारने को अब मेरा दिल तैयार नहीं है.’’

‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं कहूंगा. अब तुम हाथमुंह धो कर फ्रैश हो जाओ. सरोज चाय लाती ही होगी.’’

राजेश के पुकारने पर सोनू और मोनू दोनों भागते हुए बाहर आए. दोनों बच्चे मुझे स्मार्ट और शरारती लगे. मैं उन से उन की पढ़ाई व शौकों के बारे में बातें करते हुए घर के भीतर चली गई.

घर बहुत करीने से सजा हुआ था. सरोज के सुघड़ गृहिणी होने की छाप हर तरफ नजर आ रही थी.

मेरे मन में उथलपुथल न चल रही होती तो सरोज के प्रति मैं ज्यादा सहज व मैत्रीपूर्ण व्यवहार करती. वह मेरे साथ बड़े अपनेपन से पेश आ रही थी. उस ने मेरी देखभाल और खातिर में जरा भी कमी नहीं की.

उस की बातचीत का बड़ा भाग सोनू और मोनू से जुड़ा था. उन की शरारतों, खूबियों और कमियों की चर्चा करते हुए उस की जबान जरा नहीं थकी. वे दोनों बातचीत का विषय होते तो उस का चेहरा खुशी और उत्साह से दमकने लगता.

हलवा बहुत स्वादिष्ठ बना था. साथसाथ चाय पीने के बाद सरोज दोपहर के खाने की तैयारी करने रसोई में चली गई.

‘‘सरोज के व्यवहार से तो अब ऐसा नहीं लगता है कि उसे तुम्हारे और मेरे प्रेम संबंध की जानकारी नहीं है,’’ मैं ने अपनी राय राजेश को बता दी.

‘‘सरोज सभी से अपनत्वभरा व्यवहार करती है, निशा. उस के मन में क्या है, इस का अंदाजा उस के व्यवहार से लगाना आसान नहीं,’’ राजेश ने गंभीर लहजे में जवाब दिया.

‘‘अपनी 12 सालों की विवाहित जिंदगी में सरोज ने क्या कभी तुम्हें अपने दिल में झंकने दिया है?’’

‘‘कभी नहीं. और यह भी सच है कि मैं ने भी उसे समझने की कोशिश कभी नहीं की.’’

‘‘राजेश, मैं तुम्हें एक संवेदनशील इंसान के रूप में पहचानती हूं. सरोज के साथ तुम्हारे इस रूखे व्यवहार का क्या कारण है?’’

‘‘निशा, तुम मेरी पसंद, मेरा प्यार हो, जबकि सरोज के साथ मेरी शादी मेरे मातापिता की जिद के कारण हुई. उस के पिता मेरे पापा के पक्के दोस्त थे. आपस में दिए वचन के कारण सरोज, एक बेहद साधारण सी लड़की, मेरी इच्छा के खिलाफ मेरे साथ आ जुड़ी थी. वह मेरे बच्चों की मां है, मेरे घर को चला रही है, पर मेरे दिल में उस ने कभी जगह नहीं पाई,’’ राजेश के स्वर की उदासी मेरे दिल को छू गई.

‘‘उसे तलाक देते हुए तुम कहीं गहरे अपराधबोध का शिकार तो नहीं हो जाओगे?’’ मेरी आंखों में चिंता के भाव उभरे.

‘‘निशा, तुम्हारी खुशी की खातिर मैं वह कदम उठा सकता हूं पर तलाक की मांग सरोज के सामने रखना मेरे लिए संभव नहीं होगा.’’

‘‘मौका मिलते ही इस विषय पर मैं उस से चर्चा करूंगी.’’

‘‘तुम जैसा उचित समझे, करो. मैं कुछ देर आराम कर लेता हूं,’’ राजेश बैठक से उठ कर अपने कमरे में चले गए और मैं रसोई में सरोज के पास चली आई.

हमारे बीच बातचीत का विषय सोनू और मोनू ही बने रहे. एक बार को मुझे ऐसा भी लगा कि सरोज शायद जानबूझ कर उन के बारे में इसीलिए खूब बोल रही है कि मैं किसी दूसरे विषय पर कुछ कह ही न पाऊं.

घर और बाहर दोनों तरह की टैंशन से निबटना मुझे अच्छी तरह से आता है. अगर मुझे देख कर सरोज तनाव, नाराजगी, गुस्से या डर का शिकार बनी होती तो मुझे उस से मनचाहा वार्त्तालाप करने में कोई असुविधा न महसूस होती.

उस का साधारण सा व्यक्तित्व, उस की बड़ीबड़ी आंखों का भोलापन, अपने बच्चों की देखभाल व घरगृहस्थी की जिम्मेदारियों के प्रति उस का समर्पण मेरे रास्ते की रुकावट बन जाते.

मेरी मौजूदगी के कारण उस के दिलोदिमाग पर किसी तरह का दबाव मुझे नजर नहीं आया. हमारे बीच हो रहे वार्त्तालाप की बागडोर अधिकतर उसी के हाथों में रही. जो शब्द उस की जिंदगी में भारी उथलपुथल मचा सकते थे वे मेरी जबान तक आ कर लौट जाते.

दोपहर का खाना सरोज ने बहुत अच्छा बनाया था, पर मैं ने बड़े अनमने भाव से थोड़ा सा खाया. राजेश मेरे हावभाव को नोट कर रहे थे पर मुंह से कुछ नहीं बोले. अपने बेटों को प्यार से खाना खिलाने में व्यस्त सरोज हम दोनों के दिल में मची हलचल से शायद पूरी तरह अनजान थी.

कुछ देर आराम करने के बाद हम सब पास के पार्क में घूमने पहुंच गए. सोनू और मोनू झलों में झलने लगे. राजेश एक बैंच पर लेटे और धूप का आनंद आंखें मूंद कर लेने लगे.

‘‘आइए, हम दोनों पार्क में घूमें. आपस में खुल कर बातें करने का इस से बढि़या मौका शायद आगे न मिले,’’ सरोज के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर मैं मन ही मन चौंक पड़ी.

उस की भोली सी आंखों में झंक कर अपने को उलझन का शिकार बनने से मैं ने खुद को इस बार बचाया और गंभीर लहजे में बोली, ‘‘सरोज, मैं सचमुच तुम से कुछ जरूरी बातें खुल कर करने के लिए ही यहां आई हूं.’’

‘‘आप की ऐसी इच्छा का अंदाजा मुझे हो चुका है,’’ एक उदास सी मुसकान उस के होंठों पर उभर कर लुप्त हो गई.

‘‘क्या तुम जानती हो कि मैं राजेश से बहुत पे्रम करती हूं?’’

‘‘प्रेम को आंखों में पढ़ लेना ज्यादा कठिन काम नहीं है, निशाजी.’’

‘‘तुम मुझ से नाराज मत होना क्योंकि मैं अपने दिल के चलते मजबूर हूं.’’

‘‘मैं आप से नाराज नहीं हूं. सच तो यह है कि मैं ने इस बारे में सोचविचार किया ही नहीं है. मैं तो एक ही बात पूछना चाहूंगी,’’ सरोज ने इतना कह कर अपनी भोली आंखें मेरे चेहरे पर जमा दीं तो मैं मन में बेचैनी महसूस करने लगी.

‘‘पूछो,’’ मैं ने दबी सी आवाज में उस से कहा.

‘‘वे 14 में से 12 दिन आप के साथ रहते हैं, फिर भी आप खुश और संतुष्ट क्यों नहीं हैं? मेरे हिस्से के 2 दिन छीन कर आप को कौन सा खजाना मिल जाएगा?’’

‘‘तुम्हारे उन 2 दिनों के कारण मैं राजेश के साथ अपना घर नहीं बसा सकती हूं, अपनी मांग में सिंदूर नहीं भर सकती हूं,’’ मैं ने चिढ़े से लहजे में जवाब दिया.

‘‘मांग के सिंदूर का महत्त्व और उस की ताकत मुझ से ज्यादा कौन समझेगा?’’ उस के होंठों पर उभरी व्यंग्यभरी मुसकान ने मेरे अपराधबोध को और भी बढ़ा दिया.

‘‘राजेश सिर्फ मुझे प्यार करते हैं, सरोज. हम तुम्हें कभी आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करने देंगे, पर तुम्हें, उन्हें तलाक देना ही होगा,’’ मैं ने कोशिश कर के अपनी आवाज मजबूत कर ली.

‘‘वे क्या कहते हैं तलाक लेने के बारे में?’’ कुछ देर खामोश रह कर सरोज ने पूछा.

‘‘तुम राजी हो तो उन्हें कोई एतराज नहीं है.’’

‘‘मुझे तलाक लेनेदेने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है, निशाजी. इस बारे में फैसला भी उन्हीं को करना होगा.’’

‘‘वे तलाक चाहेंगे तो तुम शोर तो नहीं मचाओगी?’’

मेरे इस सवाल का जवाब देने के लिए सरोज चलतेचलते रुक गई. उस ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए. इस पल उस से नजर मिलाना मुझे बड़ा कठिन महसूस हुआ.

‘‘निशाजी, अपने बारे में मैं सिर्फ एक बात आप को इसलिए बताना चाहती हूं ताकि आप कभी मुझे ले कर भविष्य में परेशान न हों. मेरे कारण कोई दुख या अपराधबोध का शिकार बने, यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’’

‘‘सरोज, मैं तुम्हारी दुश्मन नहीं हूं, पर परिस्थितियां ही कुछ…’’

उस ने मुझे टोक कर अपनी बात कहना जारी रखा, ‘‘अकेलेपन से मेरा रिश्ता अब बहुत पुराना हो गया है. मातापिता का साया जल्दी मेरे सिर से उठ गया था. मामामामी ने नौकरानी की तरह पाला. जिंदगी में कभी ढंग के संगीसाथी नहीं मिले. खराब शक्लसूरत के कारण पति ने दिल में जगह नहीं दी और अब आप मेरे बच्चों के पिता को उन से छीन कर ले जाना चाहती हैं.

‘‘यह तो कुदरत की मेहरबानी है कि मैं ने अकेलेपन में भी सदा खुशियों को ढूंढ़ निकाला. मामा के यहां घर के कामों को खूब दिल लगा कर करती. दोस्त नहीं मिले तो मिट्टी के खिलौनों, गुडि़या और भेड़बकरियों को अपना साथी मान लिया. ससुराल में सासससुर की खूब सेवा कर उन के आशीर्वाद पाती रही. अब सोनूमोनू के साथ मैं बहुत सुखी और संतुष्ट हूं.

‘‘मेरे अपनों ने और समाज ने कभी मेरी खुशियों की फिक्र नहीं की. अपने अकेलेपन को स्वीकार कर के मैं ने खुद अपनी खुशियां पाई हैं और मैं उन्हें विश्वसनीय मानती हूं. उदासी, निराशा, दुख, तनाव और चिंताएं मेरे अकेलेपन से न कभी जुड़ी हैं और न जुड़ पाएंगी. मेरी जिंदगी में जो भी घटेगा उस का सामना करने को मैं तैयार हूं.’’

मैं चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाई. राजेश ठीक ही कहते थे कि सरोज से तलाक के बारे में चर्चा करना असंभव था. बिलकुल ऐसा ही अब मैं महसूस कर रही थी.

सरोज के लिए मेरे मन में इस समय सहानुभूति से कहीं ज्यादा गहरे भाव मौजूद थे. मेरा मन उसे गले लगा कर उस की पीठ थपथपाने का किया और ऐसा ही मैं ने किया भी.

उस का हाथ पकड़ कर मैं राजेश की तरफ चल पड़ी. मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला, पर मन में बहुतकुछ चल रहा था.

सरोज से कुछ छीनना किसी भोले बच्चे को धोखा देने जैसा होगा. अपने अकेलेपन से जुड़ी ऊब, तनाव व उदासी को दूर करने के लिए मुझे सरोज से सीख लेनी चाहिए. उस की घरगृहस्थी का संतुलन नष्ट कर के अपनी घरगृहस्थी की नींव मैं नहीं डालूंगी. अपनी जिंदगी और राजेश से अपने प्रेम संबंध के बारे में मुझे नई दृष्टि से सोचना होगा, यही सबकुछ सोचते हुए मैं ने साफ महसूस किया कि मैं पूरी तरह से तनावमुक्त हो भविष्य के प्रति जोश, उत्साह और आशा प्रदान करने वाली नई तरह की ऊर्जा से भर गई हूं. Romantic Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : सांझ – प्रेमी को पाने की कोशिश करती प्रेमिका

Romantic Story in Hindi : सागर सिर्फ उस का है, ऐसा विश्वास था वसुधा को कि सरिता की यादों को सागर के जीवन से निकाल देगी वह लेकिन सागर था कि वसुधा में ही सरिता को ढूंढ़ रहा था. जो वसुधा को नागवार गुजर रहा था.

आज रहरह कर वह हाथों की लकीरें देख रही है. देख क्या रही है बल्कि घूर रही है. अभी कुछ ही महीनों पहले की बात उसे अच्छी तरह से याद है जब सागर की लकीरों संग अपनी लकीरें मैच करती खिलखिला उठी थी.

‘‘कैसे हर बात पर इतना हंस लेती हो?’’

‘‘कनक कनक तैं सौगुनौ मादकता अधिकाय, उहिं खाऐं बौराए जग इहिं पाऐं हीं बौराए, नहीं सुना है क्या यह दोहा?’’

‘‘जो सोचा भी न हो वह आंचल में आ गिरे तो खुशी से पागल न होऊं तो क्या करूं?’’

‘‘इतना चाहती थीं तो तब क्यों न मिलीं?’’

‘‘तुम जरमनी चले गए और लंबेलंबे समय तक न चिट्ठी न फोन. पापा ने मेरी इकतरफा जिद सम झ कहीं और थमा दिया.’’

‘‘और तुम, तुम तो मु झे इष्ट मानती थीं, तुम कैसे बदल गईं?’’

‘‘कहां बदली, युग कन्यादान का था, दान से कौन पूछता है उस की मरजी क्या है?’’

‘‘स्ट्रैंज!’’

‘‘स्ट्रैंज ही था. एक स्ट्रेंजर के साथ विदा हुई. घर वाले पीछा छुड़ा कर काफी खुश थे. खैर, तुम अपने बारे में बताओ.’’

‘‘मेरी जिंदगी तो खुली किताब की मानिंद रही. जरमनी से लौटा तो तुम मिलीं नहीं. तुम्हारेमेरे प्यार की बात जानते हुए भी जिस लड़की ने विवाह के लिए हामी भरी वह मन के अंतरंग में समाती चली गई.’’

‘‘पर तुम तो मेरे थे, सिर्फ मेरे. तुम किसी और के कैसे?’’

‘‘उस का जादू चल गया था.’’

यह सुनते ही एक नारी सुलभ ईर्ष्या ने जैसे तनमन में आग लगा दी थी.

कौन कहता है वक्त के साथ सब बदल जाता है, वह तो नहीं बदली. ठीक है, अगर सरिता ने खुद को समर्पित कर दिया तो क्या हुआ, वह प्रेयसी है और प्रेयसी का कद पत्नी से बड़ा होता है. 45 साल की उम्र में भी वह 15 वर्षीया किशोरी सी चहक उठी.

सागर ने उसे ठीक से देखा कहां है.

यह खयाल उसके रूपगर्विता स्वभाव को विकृत कर रहा था. इस समय सरिता एक अवसरवादी नारी नजर आ रही थी. अरे, विदेश से पैसे ले कर लौटे शख्स से तो कोई भी प्यार कर सकता है. उस ने तो उस वक्त मोहब्बत की जब सागर कुछ भी न था. सागर ने सरिता का समर्पण देखा है, उस का नहीं. जब वह खुद को समर्पित करेगी, वह सरिता को पक्का भूल जाएगा, यह सोच कर वह मिलती रही. इतने सालों बाद सागर को पा कर बावरी हो गई थी. इन्हीं खयालों में खोई थी कि बेटे के फोन ने तंद्रा तोड़ दी, ‘‘मां, मैं यह क्या सुन रहा हूं, आप इस उम्र में डेटिंग कर रही हैं.’’

‘‘न बाबा, डेटिंग कैसी. अरे, कालेज के कुछ दोस्तों संग घूमने निकली थी. वैसे, तु झ से किस ने कहा?’’

‘‘अरे, आप का फोन औफ था तो नितिन को किया था. उस ने ही बताया कि आप कुछ दिनों से शाम को घर पर नहीं मिलतीं, अकसर ताला लटका होता है.’’

ओह, तो बेटे के ससुरालियों ने चुगली लगाई है. ठीक है, जब बात खुल गई तो यही सही. अब वह अपनी भड़ास भी निकाल कर रहेगी.

‘‘हां, तो तुम्हारे फोन के इंतजार में कब तक बैठी रहूं. पहले रोज बात होती थी पर अब हफ्ते में एक बार बात होती है. बाकी के 6 दिन मैं क्या करूं?’’

‘‘एनजीओ जौइन कर लीजिए.’’

‘‘वह भी दिखावा है, बेटे. तुम्हारे पापा के जाने के बाद हर चीज से मन भर गया है. जिंदगी को दोस्तों संग गुजारना चाहती हूं.’’

‘‘आप को जैसा ठीक लगे, मां,’’ समवित ने कह तो दिया पर उस की बातों ने वसुधा के जीवन के तार हिला दिए.

कभी जो ताने बाहर वाले देते थे वह अब खुद का जना दे रहा था जबकि इसे पालने में उस ने अपनी पूरी जवानी ऐसे ही गुजार दी. कभी वह और आकाश एक छत के नीचे सुकून से न रह सके. दोनों का स्वभाव उन के नाम के अनुरूप ही विपरीत जो था. वसुधा शांत थी. बस, अपने काम से काम रखती, जबकि आकाश अपने अलावा सब के मामले में घुसने की आदत से मजबूर था. वसुधा जब भी उसे टोकती, उस पर ही बिफर पड़ता. कभीकभी तो कईकई दिनों तक दोनों में बातचीत तक न होती. जवानी तो फिर भी एकदूसरे संग सम झौते करा देती है पर उम्र बढ़ने के साथ दूरियां बढ़ती चली जाती हैं. असली स्वभाव तो दूसरी पारी में नजर आता है.

शराब व शबाब का शौकीन आकाश अधिक जी न सका. पहले एक किडनी खराब हुई, फिर दूसरी. एक बार अस्पताल का चक्कर लगा तो लगता ही चला गया. वसुधा यंत्रवत अस्पताल जातीआती मगर वह नहीं कर पाती जो आकाश उस से उम्मीद करता. शायद दोनों एकदूसरे के लिए बने ही न थे. मातापिता के दबाव में आ कर जिस विवाह को अंजाम दिया था, आखिरकार उस का अंत भी उतना ही बुरा हुआ. आकाश ने शुरू के 10 साल पत्नी को अपने अनुकूल ढालने में और बाद के 10 बरस पत्नी को न जीत पाने के गम को शराब में डुबो कर निकाले. नतीजतन, शराब ने उसे लील लिया.

समवित को इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिला तो उस ने खुद को पढ़ाई में लगा दिया. पिता के जाने से उस के जीवन पर खास प्रभाव न पड़ा. उस ने अपने होशोहवास में कभी मांबाप को साथ खुश न देखा था. कुल मिला कर वह असफल विवाह की पैदाइश था, तभी तो घर से एक बार गया तो वापस आया ही नहीं. अपने अभिभावकों से ऊब कर उस ने कभी विवाह न करने का फैसला कर लिया था. मगर भला हो सारा का जिस ने उस का मन बदल दिया और वे परिणय सूत्र में बंध गए.

अब पतिपत्नी दोनों विदेश में जा बसे थे. सालदोसाल में एक बार आते तो वसुधा के हिस्से एक हफ्ता ही आता. फिर सारा अपने परिवार के साथ घूमने निकल जाती. ऐसे में वसुधा के लिए मन में भरते खालीपन को भरना जटिल होता जा रहा था. आखिरकार, उस ने नौकरी करने का फैसला किया. सवाल यह था कि रिटायरमैंट की उम्र में उसे कैसी नौकरी करनी चाहिए. साहित्य में उस का विशेष रु झान था. सो, नजदीकी अखबार के दफ्तर चली गई.

‘इन सालों में सबकुछ कितना बदल गया न,’ बुदबुदाती हुई ‘खबर आजकल’ अख़बार के चमकदार औफिस में घुसी, सामने से रेहान आता दिख गया.

‘‘वसुधा, तुम?’’

‘‘आप कौन?’’

‘‘कम औन, यह न कहना कि पहचाना नहीं.’’

‘‘माफ कीजिए, मैं ने आप को नहीं पहचाना.’’

‘‘एक कौफी साथ पी सकते हैं?’’

‘‘श्योर.’’ और वे कैंटीन में जा बैठे. वसुधा बारबार घड़ी देख रही थी और वह उसे घड़ी देखते हुए देख रहा था.

‘‘बारबार घड़ी देखने से घड़ी दौड़ेगी नहीं. मगर तुम तो तुम ही हो. हमेशा जल्दी में. वह दिन याद है जब तुम्हें घर जाने की जल्दी थी और सागर कौफी पीने में देर लगा रहा था?’’

‘‘रेहान भैया.’’

‘‘पहचान लिया न.’’

उस दिन वसुधा को न केवल अखबार में आध्यात्मिक कौलम लिखने का काम मिल गया बल्कि पुरानेबिछड़े दोस्त भी मिल गए. अब वह घर के काम निबटा कर अकसर औफिस में आ बैठती. रेहान का ही अखबार था तो हफ्तेदोहफ्ते में आर्टिकल छप ही जाता. ज्यादातर उस के सामने चुप ही रहते. ऐसे ही एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘भैया, सागर कहां है?’’

‘‘तुम्हारी शादी के बाद परेशान था. तभी उस के घरवालों ने उस की भी शादी करा दी. मगर पत्नी कुछ ही सालों बाद चल बसी.’’

‘‘ओह, और बच्चे?’’

‘‘एक बेटी है जो शादी कर के सैटल हो गई है.’’

‘‘सागर क्या करता है?’’

‘‘जरमनी से लौटा तो मैनेजमैंट कालेज में पढ़ाने लगा. मगर सरिता के बाद दुनियादारी से दूर अपनेआप में गुमसुम रहता है. एक फार्महाउस में और्गेनिक खेती करता है.’’

‘‘अच्छा.’’ कह कर घर आ गई. सागर के दुख के आगे अपना दुख कुछ भी नहीं लग रहा था. एकएक कर उसे सारी बातें याद हो आईं. कैसे दोनों एकदूसरे के प्यार में गिरफ्तार थे. कहीं और बंधने की सोच भी नहीं सकते थे कि एक दिन उस के पिता अपने बचपन के मित्र के बेटे से विवाह तय कर आए और उस की एक नहीं सुनी गई.

विवाह क्या था, व्यापार था. बिजनैस चलाने का सम झौता था. जबरन हुए विवाह में बेटी की उदासी देख उन्हें अंदर ही अंदर अफसोस होने लगा. अपने ही अपराधबोध में उस के मातापिता अधिक दिन न जी सके और वसुधा दुनिया में अकेली रह गई. मगर इतने सालों बाद सागर अकेला क्यों है? दोनों के जीवन का एकाकीपन बेवजह तो नहीं हो सकता. जरूर इस के पीछे प्रकृति का इशारा है. शायद उन्हें दोबारा जीने का अवसर मिला है, यह खयाल आते ही शरीर में एक  झुर झुरी सी दौड़ गई, एक कंपन सा महसूस हुआ और एक  झटके से जैसे युवा अवस्था में लौट आई वह.

उस रोज ही रेहान से सागर का फोन नंबर लिया और दोनों खूब बातें करने लगे. मानो जवानी जातेजाते रास्ता भूल कर लौट आई. कभी जो दिनरात साथ होने का सपना देखते थे वे अब शाम के साथी थे. आएदिन डेटिंग करने लगे. शायद उन्हें साथ देख कर ही नितिन ने चुगली की थी.

इश्क और मुश्क छिपाए कब छिपते हैं. दोनों के मिलनेजुलने की बात बच्चों को पता लगी तो उन्होंने विवाहबंधन में बंधने की सलाह दी.

इस बात पर वसुधा कितनी खुश थी. कभी साथ सैल्फी लेती तो कभी हाथों की लकीरें निहारती. जीवनसंध्या में ही सही, उसे उस का प्यार वापस मिल रहा था. सागर भी खुश था. दोनों की खुशी अपने ढंग की अनोखी थी. बच्चों की रजामंदी से उन्होंने शादी कर ली. कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें प्यार नसीब होता है और कितने कम लोग अपने बिछड़े यार से मिल पाते हैं.

सागर से मिलते ही दिल धड़का था मगर यह क्या, एक हफ्ते में ही वह वापस अपने घर क्यों आ गई. उस की पड़ोसिन शैली जब उस के पास गई तो उस ने उसे बताया, ‘‘शादी की पहली सुबह जब साथ चाय पी रहे थे, ‘पता है वसु, इस घर में 20 साल बाद चाय बनी है.’ अच्छा, तुम क्या पीते थे? ‘सीधे औफिस निकल जाता था और कुछ बाहर का खा कर कौफी पी लेता.’

‘‘वह कभी खुश हो कर अपने अलबम दिखाता तो कभी पुरानी यादें सा झा करता. हर शय में सरिता मौजूद थी. यह सब देख वह बहुत जल्द व्याकुल होने लगी. वह जहां अपने प्रेम को पा कर निहाल थी वहीं उस का प्रेमी उस में किसी और का अक्स ढूंढ़ रहा था. दो प्रेम के प्यासे अलग किस्म की आग में जल रहे थे. पहलेपहल उस ने दिल बड़ा कर सागर की मनोदशा को सम झने का प्रयास किया ताकि उसे दुख से बाहर निकाल सके. कभी उस के अनुरोध पर सरिता की साडि़यां पहनती तो कभी उस की ही तरह के स्वांग रचती. यह सब करती सागर के मन में उतर ही रही थी कि एक अलग घटना घट गई.

‘‘एक स्वाभाविक मासूमियत के तहत सागर के बाहुपाश में समाई थी कि भावावेश में उस की लटों से खेलता हुआ वह उसे सरिता कह कर पुकार उठा. एक सती के लिए प्रेम और छद्म में भेद करना कठिन तो नहीं. उस रात के बाद कई रातों तक सो न सकी. उसे एहसास हो गया कि जिस साए के पीछे वह सारी उम्र भागती रही, कभी सुकून के दो पल भी जी न सकी वह शख्स दरअसल उस का था ही नहीं. सागर तो कब का सरिता का हो चुका था. अब उस के साथ जीना अपने दुख को बढ़ाना है, तिलतिल कर मरना है. इस से तो अच्छा होता कि उस से मिली ही न होती. कम से कम प्यार पर यकीन बना रह जाता.’’

शैली जो उम्र में उस से बड़ी थी, उस ने उस के हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘जो चीज खो जाती है, याद आती है. तुम अपना बेस बनाओ. सागर वास्तव में तुम्हारा है. एक बार तुम्हारे दूर होने ने उस के पौरुष को ललकारा है, इसलिए दोबारा जुड़ने में हिचकिचा रहा है. अपने रिश्ते को थोड़ा समय दो, वसुधा. एक बार उस की पूरी व्यथाकथा सुन लो. सरिता के साथ बिताए 10 वर्ष तुम्हारे सुदीर्घ प्रेम पर भारी नहीं पड़ेंगे. सरिता को वसुधा का सागर मिला और उस ने वसुधा के साथ उसे स्वीकार किया. तुम दोनों एकदूसरे से जुड़े हो, तभी साथ हो. याद रखो, प्रेम में वह ताकत है जो टूटे को जोड़ सकती है. तुम सागर को समेट लो. सरिता स्वयं सिमट जाएगी. जाओ, अपने सागर के प्रेम में गोते लगाओ. इस अधूरे जीवन को मुकम्मल बनाओ.’’

शैली की बातों ने जैसे काले डरावने मेघों को भगा दिया और वह पूरे उत्साह से जीवन की सांझ में आए साजन के आलिंगन को निकल पड़ी. Romantic Story in Hindi

Caste Politics in India : क्या जातीय युद्ध में टूटेगी भाजपा?

Caste Politics in India : दुनिया के सब से बड़े राजनीतिक दल भाजपा के सामने दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं. अब विपक्ष पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुका है. ऐसे में भाजपा क्या अपने ही बोझ से दब कर टूट जाएगी?

भारतीय जनता पार्टी देश की सब से बड़ी पार्टी बन चुकी है. भाजपा का दावा है कि वह दुनिया की सब से बड़ी राजनीतिक पार्टी है. 18 से 20 करोड़ के बीच भाजपा के सदस्यों की संख्या है. केंद्र में 2014 के बाद से लगातार एनडीए की अगुवाई करते हुए भाजपा नेता नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हुए हैं. देश के 20 राज्यों में भी भाजपा सत्ता में है. उन में से 14 राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं और 6 राज्यों में सहयोगी दलों के साथ सत्ता में हैं. एक समय में यही हालत कांग्रेस की थी. कुछ समय के बाद अपने ही बोझ से दब कर कांग्रेस डूब गई.

भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में बने रहने के लिए जिस तरह से अलगअलग विचारधाराओं के नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ा उस से पार्टी के अंदर ही अंदर काफी रोष फैला हुआ है. इस के अलावा भाजपा अगड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करती रही है. अब सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा को जिस तरह से एससी और ओबीसी जातियों की जीहुजूरी करनी पड़ रही है उस से अगड़ी जातियों के नेता और कार्यकर्ता कसमसा रहे हैं. जातियों के बीच संतुलन बनाए रखना पार्टी की सब से बड़ी परेशनी बन गई है. अब यह परेशानी खुल कर सामने आ रही है.

इस का सब से बड़ा उदाहरण पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने में पहली बार इतनी देरी हो रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल लोकसभा चुनाव के समय खत्म हो गया था. 2024 से अब तक एक साल बीतने के बाद भी पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर पाई. बात केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने तक सीमित नहीं रही है. प्रदेश अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल बनाने तक में उस को जातीय समीकरण बैठाना पड़ता है. पहले यह काम संगठन स्तर पर हो जाता था. अब जैसे ही एक नाम सामने आता है दूसरा खेमा विरोध करने लगता है. जिस की वजह से किसी पदाधिकारी का चुनाव करना मुश्किल हो जाता है. अलगअलग प्रदेशों में अध्यक्ष के चुनाव में इस तरह का विरोध खूब देखने को मिल रहा है.

भाजपा जब तक सत्ता में है, मीडिया पर उस का पूरा कंट्रोल है, पैसा कुछ के ही हाथ में है. ऐसे में विरोध के स्वर मुखर नहीं हो रहे हैं लेकिन जैसे ही वह कोई कदम लेने को होती है, पार्टी के भीतर और बाहर विरोध से सुर उभरने लगते हैं. यह किसी एक प्रदेश की कहानी नहीं है. विरोध के सुर कई प्रदेशों में खदबदा रहे हैं. जिस तरह से हांडी के एक चावल को देखने से पता चल जाता है कि पूरी हांडी के चावल पके हैं या नहीं उसी तरह से विरोध का एक स्वर बता देता है कि पार्टी में क्या चल रहा है?

तेलंगाना का ताजा उदाहरण सामने है. वहां भाजपा को बड़ा झटका तब लगा जब उस के फायर ब्रैंड नेता और विधायक टी राजा सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. टी राजा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर एन रामचंद्र राव का नाम सामने आने के बाद नाराज हो गए थे. टी राजा सिंह ने सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट में लिखा कि ‘बहुत से लोगों की चुप्पी को सहमति नहीं समझ जाना चाहिए. मैं सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि उन अनगिनत कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के लिए बोल रहा हूं जो हमारे साथ आस्था के साथ खड़े थे और जो आज निराशा महसूस कर रहे हैं’. तेलंगाना में सरकार कांग्रेस की है और नेताओं के पास अवसर हैं कि वे कांग्रेस में जा मिले.

टी राजा ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय कुमार को भेजे पत्र में लिखा कि ‘भले ही मैं पार्टी से अलग हो रहा हूं, लेकिन मैं हिंदुत्व की विचारधारा और हमारे धर्म और गोशामहल के लोगों की सेवा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हूं. मैं अपनी आवाज उठाता रहूंगा और हिंदू समुदाय के साथ और भी अधिक मजबूती से खड़ा रहूंगा. यह एक कठिन निर्णय है, लेकिन एक जरूरी निर्णय है.’ टी राजा सिंह भाजपा के लिए मजबूत नेता थे. उन की तरह ही अलगअलग राज्यों में यह बेचैनी अंदर ही अंदर बढ़ रही है. हिंदुत्व की ढाल ही अब भारतीय जनता पार्टी के पास बची है पर उस से वोट नहीं मिलते. यह जून 2024 के लोकसभा चुनाव और तेलंगाना के विधानसभा चुनावों में साफ हो गया था.

कहां चला गया एक नेता एक पद का सिद्धांत?

भाजपा को अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को उन का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी उन को लंबे समय तक पद पर बनाए रखना पड़ा. भाजपा इस बात का बखान बड़े जोरशोर से करती है कि उस की पार्टी में एक नेता एक पद का सिद्धांत ही काम करता है. इसी वजह से जब 2019 में अमित शाह को मोदी मंत्रिमंडल में गृहमंत्री बनाया गया तो उन को राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा. जिस के बाद जेपी नड्डा राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. आखिर 2019 और 2024 के बीच क्या बदल गया जो जेपी नड्डा को उन के पद से हटाने में मुश्किल आ गई.

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद

जेपी नड्डा को मोदी मंत्रिमंडल में जगह दी गई. इस के बाद भी जेपी नड्डा राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर भी बने रहे. सवाल उठता है कि जो सिद्धांत अमित शाह के मामले में काम कर रहा था उस ने जेपी नड्डा के समय काम क्यों नहीं किया. असल में 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिस तरह से वोट मिले जितनी भाजपा की सीटें आईं उन के कारण ही भाजपा को फैसला करने में कठिनाई आई. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 2014 के लोकसभा से अधिक सीटें मिली थीं. ऐसे में भाजपा ताकतवर थी. उस ने एक झटके में अमित शाह को गृहमंत्री बना दिया और जेपी नड्डा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया.

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें घट कर 240 रह गईं. वह अपने बूते सरकार बनाने में सफल नहीं हुई. उस को दूसरे दलों का सहारा लेना पड़ा. चुनावी हार का कारण यह था कि हिंदुत्व के बावजूद एससी और ओबीसी का समर्थन उस को नहीं मिला. उत्तर प्रदेश में उस को केवल 33 सीटें ही मिल सकीं जबकि उस की विरोधी समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिलीं. यानी भाजपा की ताकत घटी.

पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया पर उन की जगह पर अपनी मनपसंद का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाने में दिक्कत पेश आ रही है. ऐसे में लगातार एक पद एक नेता सिद्धांत को दरकिनार कर के जेपी नड्डा ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे.

लोकसभा में भाजपा की सीटें घटने का प्रभाव भले ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोक पाया पर पार्टी के भीतर मोदीशाह के फैसलों को प्रभावित किया. अगर 2019 के चुनाव जैसी सफलता भाजपा को 2024 के चुनाव में भी मिली होती तो जेपी नड्डा को हटा कर दूसरा कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने में दिक्कत नहीं आती. भाजपा के कमजोर होने से मोदीशाह के फैसलों पर आरएसएस अपनी धौंस जमाने लगा है. वह अपनी पसंद का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना चाहता है. मोदीशाह अपनी पसंद को बनाए रखना चाहते हैं. ऐसे में बीच का रास्ता यह निकाला गया कि एक नाम पर दोनों सहमत हो जाएं. अब भाजपा पर आरएसएस की पकड़ मजबूत होती जा रही है. अब भाजपा को संतुलन बना कर काम करना पड़ रहा है.

उत्तर प्रदेश में बढ़ी मुश्किल

भाजपा में सब से बड़ी गुटबाजी उत्तर प्रदेश में चल रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सब से बड़ा नुकसान भाजपा को इसी प्रदेश में हुआ जबकि भाजपा को यह लग रहा था कि अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण के बाद उत्तर प्रदेश में उस की स्थिति मजबूत होगी. लोकसभा चुनाव में राममंदिर के नाम पर भाजपा को वोट नहीं मिले. यही भाजपा और आरएसएस की चिंता का कारण है. चुनाव में धर्म का असर खत्म होते ही मसला जाति पर टिक जाता है. जाति के मसले पर भाजपा को नुकसान हो जाता है. ऐसे में जातीय गुटबाजी उभार मारने लगती है.

लोकसभा चुनाव में हार के बाद उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने हार का ठीकरा प्रदेश सरकार पर फोड़ दिया. उन के निशाने पर शुरू से ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रहे हैं. भाजपा धर्म के वोट पर प्रभाव के कारण ही योगी आदित्यनाथ को आगे किए है. सवाल उठ रहा है कि जब धर्म का मुद्दा वोट नहीं दिला पा रहा क्या तब भी भाजपा योगी आदित्यनाथ पर ही दांव लगाने का खतरा मोल लेगी? तेलंगाना में फायरब्रैंड नेता और विधायक टी राजा सिंह को दरकिनार किया गया, उस से साफ संकेत मिल रहा है कि उत्तर प्रदेश में भी धर्म की जगह जातीय समीकरणों पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा.

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद जब से योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया. उसी समय से उन का विरोध चल रहा है. केशव प्रसाद मौर्य का लगातार दूसरी बार उपमुख्यमंत्री का पद दिया गया जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में वह अपनी सीट भी हार गए थे. योगी आदित्यनाथ और पार्टी संगठन मंत्री सुनील बंसल के बीच भी टकराव होता रहा. जिस के कारण सुनील बंसल को उत्तर प्रदेश से हटाया गया.

योगी आदित्यनाथ पर जातिगत राजनीति करने का आरोप लगा. यह आरोप उस समय कांग्रेस के नेता रहे जतिन प्रसाद ने लगाया. योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मण विरोधी बताया. यह बात और थी कि इस के बाद जतिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो गए. पहले वह प्रदेश सरकार में मंत्री थे. 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उन को केंद्र सरकार में मंत्री बना दिया गया. योगी आदित्यनाथ को हटाने की खबरें लगातार उत्तर प्रदेश में आती रहती हैं. इस के पीछे भाजपा के नेताओं की गुटबाजी सब से प्रमुख कारण है.

बिहार में क्यों नाराज हो रहे हैं चिराग पासवान लोकजनशक्ति पार्टी के नेता और केंद्र सरकार में मंत्री चिराग पासवान बिहार के विधानसभा चुनाव में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए भाजपा पर दबाव बना रहे हैं. वैसे तो वह खुद को नरेंद्र मोदी का हनुमान कहते हैं. इस के बाद भी अंदर ही अंदर वह दबाव की राजनीति अपना रहे हैं. बिहार में इस साल के आखिरी में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं. बिहार में भाजपा का प्रमुख सहयोगी जदयू है. जदयू यह चाहता है कि भाजपा चुनाव के पहले ही नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दे.

दूसरी तरफ चिराग पासवान यह चाहते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव में उन को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया जाए. वही भाजपा का एक खेमा यह चाहता है कि पार्टी अपने नेता को मुख्यमंत्री का फेस बना कर चुनाव में उतरे. इसी कारण चिराग पासवान और जदयू अपनीअपनी खींचतान में लगे हैं. भाजपा को पता है कि अकेले वह बिहार के चुनाव में राजद और कांग्रेस का मुकाबला नहीं कर सकती है. ऐसे में उस को चिराग पासवान और नीतीश कुमार सहित दूसरे नेताओं को भी साधना पड़ेगा.

हरियाणा, महाराष्ट्र और राजस्थान राज्यों के नेता अनिल विज, किरोड़ी लाल मीणा और पंकजा मुंडे नाराज चल रहे हैं. पंकजा मुंडे ने पिछले दिनों यह कह कर विवाद खड़ा कर दिया कि उन के पिता के समर्थक एकत्र हो जाएं तो वह एक नई पार्टी खड़ी कर सकती है. पंकजा मुंडे भाजपा के बड़े नेता रहे गोपीनाथ मुंडे की पुत्री हैं. पंकजा मुंडे को पार्टी से जितनी उम्मीद थी उतना उन को नहीं मिला, इस को ले कर वह लंबे समय से पार्टी से नाराज चल रही है. महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस को महत्त्व मिलने से पंकजा मुंडे को नाराजगी है.

राजस्थान में विधानसभा चुनाव के बाद जब भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया तब से किरोड़ी लाल मीणा नाराज चल रहे हैं. वह लगातार सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं. उन का कहना है कि जिन बुराइयों को दूर करने के लिए हम ने आंदोलन किए, सरकार बनाई वह बुराइयां आज भी कायम हैं. उन मुद्दों पर काम नहीं किया गया वे आज भी कायम हैं. किरोड़ी लाल मीणा राज्य सरकार में अच्छा विभाग न मिलने से नाराज चल रहे हैं.

हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री अनिल विज भी नाराज हैं. वह हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बडौली के खिलाफ लगातार बयानबाजी कर रहे थे. प्रदेश अध्यक्ष की तरफ से उन को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया है. इस को पार्टी की नीति के खिलाफ और पार्टी की छवि को खराब करने वाला बताया गया है. ऐसे में पार्टी का अनुशासन टूट रहा है. अब पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही पार्टी पर हमले कर रहे हैं. कमोबेश यह हालत पूरे देश में पार्टी की हो गई है. अब पार्टी अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बोझ को संभाल नहीं पा रही है.

पुरू की सेना के हाथी हो गए हैं भाजपा के जातीय महारथी

जातीय गुटबाजी में संतुलन बनाए रखने के कारण ही मुख्यमंत्री के साथ 2 उपमुख्यमंत्री बनाए गए. उत्तर प्रदेश से निकला यह फार्मूला राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी चला. अब प्रदेश अध्यक्षों के चुनाव में यह संतुलन फिर से बनाना होगा. राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर पहली बार जातीय दबाव महसूस किया जा रहा है. भाजपा के जातीय महारथी अब पुरु की सेना के हाथी जैसे हो गए हैं, जिस के चलते वे अपनी ही पार्टी के लिए खतरा बन गए हैं.

झेलम नदी के किनारे सिकंदर और पुरु के बीच युद्ध हुआ. पुरु की सेना में बड़ी संख्या में हाथी थे जो दीवार की तरह से सिकंदर की सेना के सामने खड़े हो गए. सिकंदर को समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे पुरु की सेना का मुकाबला करे. ऐसे में सिकंदर को एक युक्ति सूझी और तब सिकंदर की सेना ने हाथियों को घेर कर उन पर भाले से हमला किया. एक तीरंदाज ने हाथी की आंख में तीर मारा, जिस से वह बेकाबू हो कर अपनी ही सेना को कुचलने लगा. जिस से पुरु की हार हो गई.

भाजपा में अटलआडवाणी युग की 2004 में हार हुई तो 2014 तक भाजपा को केंद्र की सरकार नसीब नहीं हुई. इस दौर में भाजपा ने जातियों में राष्ट्रवाद और धर्म को जाग्रत करने का काम किया. जिस के बाद एससी और ओबीसी जातियों ने भाजपा को साथ दिया. नतीजा यह हुआ कि भाजपा की न केवल केंद्र में वापसी हुई बल्कि कई प्रदेशों में भाजपा सरकार बनाने में सफल रही.

2024 में विपक्ष जनता को यह समझने में सफल रहा कि अगर भाजपा की 400 से अधिक सीटें आ गईं तो संविधान और आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा. यह बात जनता समझ गई और भाजपा को 240 सीटों से संतोष करना पड़ा. कमजोर होती भाजपा को पार्टी के अंदर और बाहर दोनों ही जगहों पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है. पार्टी के भीतर के एससी और ओबीसी नेताओं में अपना हक लेने की होड़ लग गई है. जिस जातीय समीकरण को बना कर भाजपा सत्ता तक पहुंची अब वही उस के लिए चुनौती बन गए हैं.

सजग हो गया विपक्ष

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और विपक्ष के बीच मिले वोटों में बहुत अंतर नहीं था. जो भाजपा पहले अजेय समझ जा रही थी उस के बारे में यह सच सामने आ गया कि उस को हराया भी जा सकता है. अब विपक्ष चुनाव दर चुनाव ज्यादा समझदार और आक्रामक हो रहा है जिस से उस के नेताओं में आत्मविश्वास आ गया है. वह एकजुट हो रहा है. चुनाव आयोग को ले कर विपक्ष सचेत हो चुका है. महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग की भूमिका को ले कर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विस्तार से लिखा. उस से सबक लेते हुए अब बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है जिस से निष्पक्ष चुनाव हो सकें.

अब विपक्षी दल अपने वोटों को बिखरने से रोकने के लिए एकजुट हो रहे हैं. बिहार में राजद और कांग्रेस सहित गैर भाजपाई खेमा इस प्रयास में है कि वोट बिखरने न पाएं. महाराष्ट्र में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एकसाथ आ खड़े हुए हैं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सपा साथ है. ऐसे में जहां एक तरफ भाजपा में बिखराव दिख रहा है वहीं विपक्ष अपनी पूरी ताकत से एकजुट हो कर चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहा है. भाजपा दोहरी मुसीबत में फंस गई है.

विपक्ष के आरोपों से बैकफुट पर भाजपा

2024 के लोकसभा चुनावों ने जहां विपक्ष को ताकत दी वहीं भाजपा को बैकफुट पर ढकेल दिया. इस के बाद भाजपा को वे काम करने पड़ रहे हैं जिन को वह पहले नहीं करती थी. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद सदन में नेता प्रतिपक्ष का पद कांग्रेस के राहुल गांधी को देना पड़ा. राहुल गांधी लगातार भाजपा पर ओबीसी और एससी की उपेक्षा का सवाल उठा रहे थे. ब्यूरोक्रेसी में ओबीसी अफसरों की नियुक्ति पर सवाल कर रहे थे. राहुल गांधी लगातार जातीय गणना की मांग कर रहे थे. यह सवाल पहले भाजपा हंसीमजाक समझ कर टाल देती थी.

2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद भाजपा बैकफुट पर आ गई. उस ने जातीय गणना की मांग मान ली. अब दबाव इस बात का है कि वह पार्टी संगठन में भी ओबीसी को उन का हक देते दिखे. ओबीसी को अब केवल दिखावे वाले पद देने से काम नहीं चलने वाला. जैसे ही संगठन में ओबीसी और एससी नेताओं का बोलबाला बढ़ेगा टी राजा जैसे नेताओं में बेचैनी होगी. भाजपा के शिखर और निर्णायक पदों पर अगड़ी जाति की सोच रखने वालों का बोलबाला है. मजबूरी में उन को ओबीसी और एससी के लोगों को संगठन में रखना पड़ रहा है.

भाजपा चुनाव जीतने के लिए जिस तरह के टोटके करती रहती है वे अब काम नहीं आ रहे हैं. 2019 में लोकसभा चुनावों के पहले पुलवामा अटैक हो गया था. जिस के बाद भाजपा ने राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बना कर वैतरणी पार कर ली थी. अब भाजपा ने पहलगाम हमले के औपरेशन सिंदूर को भुनाने का जब काम किया तो यह मुद्दा टांयटांय फिस्स हो गया.

पुलवामा अटैक के बाद देश के 4 राज्यों गुजरात, पंजाब, पश्चिम बंगाल और केरल में 5 विधानसभा की सीटों पर चुनाव हुए. इस में से गुजरात की विसादर विधानसभा की सीट पर आम आदमी पार्टी के गोपाल अटालिया चुनाव जीत गए. भाजपा यहां केवल कड़ी सीट पर जीत हासिल कर पाई. जहां उस के उम्मीदवार राजेंद्र चावला चुनाव जीत गए. पंजाब, पश्चिम बंगाल औैर केरल में भाजपा को कोई सफलता नहीं मिली. इस से साफ पता चलता है कि औपरेशन सिंदूर को ले कर भाजपा ने जो सोचा था वह नहीं हो पाया.

भाजपा ने जातीय गणना को भी स्वीकार कर लिया है. यह मुद्दा भी बहुत प्रभावी नहीं होता दिख रहा है. इस से भाजपा के अगड़े नेता नाराज हो रहे हैं. उन को डर है कि अगर जातीय गणना हुई तो एससी और ओबीसी को इस का लाभ मिलेगा. उन को सत्ता में अधिक हिस्सेदारी देनी पड़ेगी. भाजपा में अगड़ेपिछड़ों का जो संघर्ष कल्याण सिंह के दौर में शुरू हुआ था वह एक बार फिर होता दिख रहा है. अब पिछड़े नेता भी मुखर हो कर अगड़ों के सामने खड़े हो गए हैं.

भाजपा की ताकत ही उस की कमजोरी बन गई है. जिस के कारण पार्टी जातीय संघर्ष में फंसती नजर आ रही है. यही जातीय युद्ध उस के पतन का कारण बन सकता है. भाजपा ने जातियों के समीकरण का जो बोझ अपनी पीठ पर लाद लिया था उसी बोझ से अब वह दब रही है. देखने वाली बात यह है कि कब तक उस की रीढ़ की हड्डी इस बोझ को सहन कर पाती है?

वैसे दक्षिणापंथी दल में टूटन पहले भी होती रही है. हिंदू महासभा के बाद भारतीय जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी का बनना वैसी ही एक का हिस्सा रहा है. भारतीय जनता पार्टी की शुरुआत अटल आडवाणी की जोड़ी के साथ हुई. 2004 में यह जोड़ी फेल हो गई. 10 साल सत्ता से बाहर रहने के बाद मोदीशाह की जोड़ी को भी 10 साल से अधिक का समय बीत चुका है. 2024 के लोकसभा चुनाव में इस जोड़ी को झटका लगा है. अब विपक्ष की मजबूत घेराबंदी से भाजपा कैसे खुद को बचाती है यह देखने वाली बात होगी? Caste Politics in India

Romantic Story in Hindi : प्यार की अनंत यात्रा – दो दिलों की तड़प की दिल छूती कहानी

Romantic Story in Hindi : राजेश और प्रज्ञा एकदूसरे की ओर खिंचे जा रहे थे. दिल ने दिल की भाषा पढ़ ली थी. फिर क्यों इन दोनों चाहने वालों की चाहत अधूरी ही रह गई?

प्रज्ञा जब अस्पताल पहुंची तब तक राजेश की हालत और खराब हो चुकी थी. उसे कुछ दिनों पहले ही समाचार मिल गया था कि राजेश अस्पताल में भरती है लेकिन वह जानबूझ कर अनदेखा करती रही, ‘उसे क्या लेना राजेश से’ वह मन में सोचती लेकिन सच यह था कि ऐसा सोच लेने के बाद भी उस का मन राजेश में ही लगा था.

भले ही वह सालों पहले राजेश से दूर हो चुकी हो पर राजेश था तो उस का पहला प्यार. उस ने उस के साथ जाने कितने हसीन पल गुजारे हैं. उस की आंखों के सामने एकएक दृश्य सजीव होते चले गए.

‘सुनिए मिस्टर, आप जो इस तरह मेरा पीछा कर रहे हैं न, यह ठीक नहीं है.’

राजेश घबरा गया, ‘पीछा, नहीं मैम, आप को कुछ गलतफहमी हुई है.’

‘कोई गलतफहमी नहीं हुई है. मैं आप जैसे लड़कों को अच्छी तरह जानती हूं,’ वह गुस्से से लाल हो चुकी थी.

राजेश कुछ नहीं बोला, अपनी आंखें झकाए वह निकल गया.

प्रज्ञा बहुत देर तक उसे जाते हुए देखती रही. उसे वाकई उस पर तेज गुस्सा आ रहा था. उसे लग रहा था कि राजेश जानबूझ कर बारबार उस के सामने आ रहा है.

वैसे यह तो सच ही था कि राजेश कई बार उस के सामने से निकल रहा था पर ऐसा वह जानबूझ कर नहीं कर रहा था. वह तो प्रज्ञा को जानता तक नहीं था. दरअसल, प्रज्ञा उस के महल्ले में रहने के लिए कुछ ही दिनों पहले आई थी. किसी कंपनी में उस की फर्स्ट जौइनिंग हुई थी. राजेश भी किसी कंपनी में नौकरी करता था और वह भी इसी महल्ले में एक कमरे में रह रहा था.

यह संयोग ही था कि दोनों लगभग एक ही समय अपने घर से निकलते और दोनों ही एकसाथ ही बसस्टौप पर पहुंचते. दोनों एक ही बस में चढ़ते और एक ही स्थान पर उतरते. कुछ दूर तक साथ जाने के बाद दोनों के रास्ते एक होते हुए भी बदल जाते. यह क्रम शाम को भी चलता था. शाम को राजेश बस से उतरते हुए होटल से अपना भोजन पैक करा कर वापस होता पर प्रज्ञा सीधे अपने महल्ले की ओर बढ़ जाती.

राजेश होटल से भोजन का पैकेट ले कर पतली गली से निकलता तो प्रज्ञा फिर उस के सामने पड़ जाती. हालांकि राजेश का ध्यान प्रज्ञा की ओर नहीं जाता था, उस ने कभी इंट्रैस्ट भी नहीं लिया था पर प्रज्ञा राजेश की हर गतिविधि को देख रही थी. उस को लग रहा था कि राजेश जानबूझ कर उस का पीछा कर रहा है. उस ने दोतीन दिनों तक राजेश की गतिविधियों को देखा.

उस के दिमाग में यह बात जम गई कि राजेश उस का पीछा कर रहा है. चूंकि वह भी अपने शहर से दूर नए शहर में अकेले रहने आई है तो उसे सतर्क तो रहना ही होता था. यही कारण था कि जैसे ही उस के दिमाग में राजेश के पीछा करने की बात आई तो वह बिफर पड़ी.

इस घटना के बाद राजेश उस के सामने नहीं पड़ा. राजेश ने दिनचर्या बदल ली थी. अब वह प्रज्ञा के निकलने के पहले ही अपने घर से निकल जाता और पहली बस से ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ जाता. शाम को भी वह लेट आने लगा था. वह प्रज्ञा को जाते देखता रहता और जब वह बस में बैठ जाती, तब वह अपने औफिस से निकलता और दूसरी बस में बैठ कर लौटता.

राजेश के पीछा छोड़ देने से प्रज्ञा को राहत मिल गई थी. उस के चेहरे पर जो अनावश्यक सा तनाव आ गया था उस से अब वह मुक्त होती जा रही थी. वैसे, उसे अब भी लग रहा था कि राजेश उसे अकेला समझ कर उस का पीछा ही कर रहा था, यदि उस ने दमदारी से उसे डांटा न होता तो उस का हौसला बढ़ जाता.

प्रज्ञा अपने हाथों में एक फाइल लिए अपने सीनियर के रूम की ओर बढ़ रही थी. वह नईनई ही इस कंपनी में आई थी, इसलिए उसे काम को समझना पड़ता था. बहुतकुछ तो वह अपने सहकर्मियों की मदद ले लेती थी पर वह उस से संतुष्ट न हो पा रही थी. उस ने तय कर लिया था कि वह अपने सीनियर के साथ बैठ कर पूरा काम समझ ही लेगी. वैसे भी, वह अभी तक अपने सीनियर और अन्य अधिकारियों से मिली ही कहां थी.

प्रज्ञा रूम के सामने जा कर खड़ी हो गई थी. रूम का दरवाजा खोलने में उसे हिचकिचाहट हो रही थी पर उस के पास और कोई विकल्प था भी नहीं. उस ने धीरे से दरवाजे को खोला.

‘मे आई कम इन, सर?’

कोई तो था जिस का चेहरा फाइलों की ओट में था, ‘यस.’

प्रज्ञा हलके कदमों से कमरे के अंदर दाखिल हो गई और चुपचाप खड़ी हो गई. फाइल की ओट में छिपा चेहरा बहुत देर तक अनदेखा ही रहा. वे शायद भूल गए थे कि उन के कमरे में कोई आया है. प्रज्ञा कुछ देर तक यों ही मौन खड़ी रही.

‘गुडमौर्निंग सर.’ उसे फाइल में छिपे चेहरे को याद दिलाना था कि कोई उन के सामने खड़ा है. आवाज कानों तक पहुंच गई थी पर आवाज अभी भी फाइल की ओट से ही आ रही थी, ‘यस.’

‘वो सर, मैं आप की जूनियर, अभी अपौइंट हुई हूं.’

इस बार प्रज्ञा की आवाज ने फाइल की ओट वाले को चौंका दिया था.

उत्सुकता के भाव लिए सीनियर ने अपना चेहरा फाइल की ओट से बाहर निकाला,

‘तुम.’ उस की आवाज में आश्चर्यमिश्रित घबराहट थी. घबरा तो प्रज्ञा भी गई थी.

‘आप.’

दोनों को सामान्य होने में समय लगा पर जब सामान्य हो गए तो सबकुछ विस्मृत कर बात करने लगे. ‘यस, बताएं प्रज्ञाजी.’

प्रज्ञा को आश्चर्य हुआ कि उन्हें उन का नाम कैसे मालूम हुआ पर वह खामोश ही रही. वैसे तो वह भी सामान्य होने की चेष्टा कर रही थी पर सच तो यह है कि वह सामान्य हो ही नहीं पा रही थी.

‘सौरी सर,’ उस की आवाज में पश्चात्ताप था.

‘किस बात की सौरी, अभी तो तुम ने कोई बात की ही नहीं.’

‘वो, उस दिन…’

‘हम अभी औफिस में हैं. तो हम औफिस की ही बात करें.’

‘जी,’ अब की बार प्रज्ञा घबरा गई थी. उसे मालूम नहीं था कि कुछ दिनों पहले उस ने जिस लड़के पर अपना पीछा करने का आरोप लगाया था वह उस की ही कंपनी में काम करने वाला उस का सीनियर है. वह कुछ देर तक अपने मन को ही समझती रही, भले ही सीनियर हो पर यदि वह उस का पीछा कर रहा था तो वह बोलेगी नहीं क्या. पर कहीं ऐसा न हो कि वह उस दिन का बदला निकालने लगे.

यदि ऐसा हुआ तो उस की नौकरी तो खतरे में पड़ जाएगी. पड़ जाने दो. नौकरी के भय से वह अन्याय सहन नहीं करेगी. उस के मन के कुरुक्षेत्र में द्वंद्व चल रहा था. द्वंद के भाव उस के चेहरे पर आजा रहे थे पर इस का परिणाम यह हुआ कि उस का आत्मविश्वास बढ़ गया. यदि इस ने कुछ बोला तो वह उस दिन जैसी ही डांट देगी भले ही उसे नौकरी से अलग कर दिया जाए.

राजेश सामने खड़ी प्रज्ञा के चेहरे पर आ रहे भावों को देख रहा था.

‘यस, आप बताएं मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?’ उस का स्वर शांत था. उस के शांत स्वर ने प्रज्ञा का हौसला बढ़ा दिया. ‘वो सर, मैं इस फाइल को ले कर आप के पास आई हूं, इस में मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’

‘हां, बताएं.’

राजेश बहुत देर तक प्रज्ञा को काम के बारे में समझता रहा. काम खत्म हो जाने के बाद उस ने चपरासी को चाय ले आने का बोल दिया था. प्रज्ञा और राजेश सामने के सोफे पर आ कर बैठ गए थे. प्रज्ञा इतनी देर में राजेश के स्वभाव को समझ चुकी थी. उसे एहसास होने लगा था कि उस ने राजेश पर उस का पीछा करने का जो आरोप लगाया है वह सच नहीं हो सकता. उस ने जल्दबाजी में बगैर जांचेसमझे उस से कह दिया था.

‘वो सर, उस दिन मैं ने आप को कुछ ज्यादा ही बोल दिया था. क्षमा चाहती हूं.’ ‘नहीं, आप ने जो समझ, उस की प्रतिक्रिया तो ऐसी होनी ही चाहिए.’

प्रज्ञा कुछ नहीं बोली.

‘केवल एक बात कहनी है कि आप प्रतिक्रिया देने के पहले सही और गलत को समझ अवश्य लें ताकि कोई भला आदमी आप की कठोर बातों से आहत न हो सके.’

राजेश की आवाज अभी भी शांत ही थी. प्रज्ञा के चेहरे पर भी पश्चात्ताप के भाव थे.

‘मैं आप का पीछा नहीं कर रहा था. यह तो मात्र संयोग ही था कि हम दोनों एक ही महल्ले में रहते हैं और एक ही समय पर घर से निकलते हैं और हमारा गंतव्य भी एक ही है.’

‘सौरी,’ बहुत धीमी आवाज में प्रज्ञा बोली.

‘ओके.’

चाय खत्म हो चुकी थी.

‘मैं चलूं, सर?’

‘यस.’

लौटते समय प्रज्ञा के कदमों में उत्साह परिलक्षित हो रहा था. शाम को औफिस से निकल कर वह अपने नियमानुसार सीधे बसस्टौप की ओर नहीं बढ़ी. वह एक ओर जा कर खड़ी हो गई. उसे राजेश की प्रतीक्षा थी. उस ने अंदाज लगाया था कि राजेश भी इसी समय औफिस से निकलता होगा. यह अलग बात है कि वह उस के सामने नहीं आता था. उस की आंखें कंपनी के गेट को एकटक देख रही थीं.

वैसे तो राजेश को भी सभी के साथ औफिस से निकल जाना चाहिए होता था और पहले वह ऐसा करता भी था पर जब से प्रज्ञा ने उस को आरोपों के घेरे में लिया है तब से उस ने प्रज्ञा के निकल जाने के बाद ही निकलना शुरू कर दिया था. आज भी वह कुछ देर बाद ही अपनी केबिन से निकला और रोज की तरह बसस्टौप की ओर बढ़ गया. वह कुछ कदम ही बढ़ा था कि पीछे से आई आवाज ने उस के कदमों को रोक दिया. किसी ने तो उसे पुकारा था. राजेश ने पलट कर देखा. उसे आश्चर्य हुआ प्रज्ञा को अपने सामने देख कर.

‘जी.’

‘अरे, मैं आप की ही राह देख रही थी,’ तेज चलने के कारण प्रज्ञा की सांस फूल रही थी.

राजेश सशंकित हो गया, कहीं उस से फिर से तो कोई गलती नहीं हो गई. वैसे, आज जब वह अपने औफिस में प्रज्ञा से मिला था तो उसे उस से मिल कर अच्छा लगा था. उस ने प्रज्ञा के बारे में जो छवि बनाई थी, प्रज्ञा उस से विपरीत थी. इस के पहले कि राजेश कुछ बोल पाता, प्रज्ञा ने ही उत्तर दे दिया, ‘मैं आप को सौरी नहीं बोल पाई थी न.’

‘किस बात के लिए?’

‘वो कुछ दिनों पहले मैं ने आप को…’ उस ने जानबूझ कर वाक्य पूरा नहीं किया.

‘हां, वो तो ठीक है लेकिन मैं ने इस के बारे में ज्यादा नहीं सोचा है, केवल अपनी राह बदल ली है ताकि कोई गलतफहमी न हो.’

‘मैं वही कह रही थी कि मैं ने अपनी गलती मान ली है तो आप अब राह क्यों बदल रहे हैं.’

‘क्या मतलब?’ राजेश सच में नहीं समझ था प्रज्ञा की बातों को.

‘अरे, मेरा मतलब है कि हम दोनों का औफिस एक है, दोनों का औफिस एक ही समय पर छूटता है और हम को एक ही कालोनी में जाना होता है. सो, हम अकेलेअकेले क्यों जाते हैं?’

राजेश चुप रहा. सच तो यह है कि वह प्रज्ञा की बातों को समझ ही नहीं पा रहा था.

प्रज्ञा उसे एकटक देख रही थी. उसे लग रहा था कि राजेश को उस के प्रश्नों के उत्तर देने चाहिए पर राजेश तो मौन था.

‘सर, मैं यह कह रही थी कि मैं आप के साथ ही औफिस आना चाहती हूं और आप के साथ ही अपने घर लौटना चाहती हूं ताकि मुझे आप की कंपनी मिल सके.’ प्रज्ञा ने यह कह कर अपनी नजरों को दूसरी ओर कर लिया था.

‘देखो, पहले तो आप मुझे सर कहना बंद करें. ऐसा लगता है कि मैं बहुत सीनियर हो चुका हूं. वैसे भी, हम सहकर्मी ही हैं. सो आप मुझे मेरे नाम से ही बुलाएं.’

‘जी. पर आप मुझे जो बारबार ‘आप’ कह रहे हैं, वह भी तो…’

‘ओके.’ राजेश को भी उसे आप कहना अच्छा नहीं लग रहा था.

‘अब मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर?’ प्रज्ञा ने उस की आंखों में झंकना शुरू कर दिया था.

‘अच्छा, ठीक है, मुझे क्या परेशानी,’ कहते हुए राजेश ने अपने कदम आगे बढ़ा दिए. प्रज्ञा भी उस के साथ कदमताल करते हुए चल रही थी. कालेनी के बसस्टौप पर दोनों साथ ही उतरे. ‘देखो, अब तुम कालोनी में चली जाओ, मुझे खाना लेने के लिए होटल पर रुकना पड़ेगा.’

‘अच्छा, आप यहां से खाना लेते हैं, खुद नहीं बनाते?’

‘नहीं. मुझ से खाना बनाते नहीं बनता,’ कहते हुए राजेश होटल की ओर बढ़ गया.

प्रज्ञा कुछ देर तक तो ठिठकी खड़ी रही, फिर वह धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ गई. प्रज्ञा को आज राजेश के साथ बात करने में और साथ घर लौटने में बहुत आनंद आया था.

दूसरे दिन प्रज्ञा कालोनी के मेन गेट पर खड़ी हो कर राजेश की प्रतीक्षा करती रही. राजेश के आते ही दोनों साथ ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए. अब तो यह सिलसिला शुरू ही हो चुका था. दोनों साथ ही आतेजाते और औफिस में ज्यादातर समय साथ ही रहते. दोपहर में लंच साथ होता और चाय भी. दोनों की झिझक खत्म हो गई थी और वे बेतकल्लुफ होते जा रहे थे.

शाम को औफिस से लौटते समय जैसे ही राजेश के कदम नियमानुसार होटल की ओर बढ़े, प्रज्ञा ने उसे रोक दिया, ‘आज आप हमारे साथ डिनर करेंगे, होटल जाने की जरूरत नहीं है.’ प्रज्ञा ने पूरे अधिकार के साथ बोला था.

राजेश के कदम ठिठक गए. ‘पर?’

‘परवर कुछ नहीं. मैं बहुत अच्छा खाना बनाती हूं, सच में.’

वैसे तो प्रज्ञा ने कई बार लंच पर भी कोशिश की थी कि राजेश उस के डब्बे से ही लंच करे पर हर बार राजेश कोई न कोई बहाना ले कर बात को टाल देता था. प्रज्ञा जानती थी कि रोजरोज होटल का खाना खाने में ऊब होने लगती है. वह तो अपने लिए खाना बनाती ही है, उस में से राजेश के लिए भी बना सकती है पर यह बात कहने में उसे हिचक हो रही थी, इसलिए उस ने राजेश को नहीं बोला था पर आज तो दोपहर में ही उस ने तय कर लिया था कि आज राजेश को वह अपने हाथ का भोजन जरूर कराएगी.

उस ने राजेश से पूछा भी नहीं था, सीधा आदेशात्मक बोला था. वह जानती थी कि यदि उस ने राजेश से पूछा तो वह मना कर देगा. राजेश ने उस के आदेशात्मक स्वर को सुना था. उसे अच्छा लगा पर वह उस के साथ डिनर करने में हिचक रहा था.

‘देखो प्रज्ञा, मुझे तो रोज ही होटल में खाना है. ऐसे में एकाध दिन तुम्हारे हाथ का खाना खा लिया तो मुझे होटल का खाना स्वादिष्ठ नहीं लगेगा. इसलिए…’

प्रज्ञा कुछ देर तक चुप रही, फिर बोली, ‘मैं ने आप से पूछा नहीं है. आप को बोला है कि आप आज मेरे साथ डिनर लेंगे. आप के पास कोई विकल्प नहीं है, इसलिए आप सारे बहानों को कोनों में रख दो और मेरे साथ चलो.’

इस बार भी प्रज्ञा का स्वर आदेशात्मक ही था बल्कि कुछ और कठोर भी था. राजेश कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में खड़ा रहा, फिर उस ने अपने कदमों को प्रज्ञा के साथ कालोनी की ओर बढ़ा दिया. दोनों साथ ही साथ अपनेअपने घरों की ओर बढ़े.

‘आप हाथमुंह धो कर तैयार हो जाएं, मैं आप को लेने आऊंगी.’

‘अरे, मैं आ जाऊंगा.’

‘नहीं, मैं ही आऊंगी. आप तैयार रहना,’ कहते हुए प्रज्ञा के कदम अपने घर की ओर बढ़ गए.

खाना बहुत अच्छा बना था. प्रज्ञा ने पिंक कलर का सूट पहना था. ऐसा लग रहा था कि वह आज विशेष रूप से तैयार हो रही थी. उस के बाल तो वैसे भी लंबे थे जिन्हें वह औफिस जाते समय जूड़ा बना कर ढंक लेती थी पर आज उस ने अपने बालों को यों ही अवारागर्दी करने के लिए खुला छोड़ दिया था. हवा के झंके के साथ उस के बालों की कोई न कोई लट उस के गालों पर आ कर टकरा जाती. वह हौले से उन्हें अपने हाथों से अलग कर देती. उस के चेहरे पर आज अजीब सी ताजगी दिखाई दे रही थी.

राजेश कनखियों से उसे बारबार देख रहा था. कई बार उस की नजरें प्रज्ञा की नजरों से मिलीं तो वह झेंप गया पर प्रज्ञा नहीं झेंपी. वह एकटक राजेश को देख रही थी. आमतौर पर सादे कपड़ों में रहने वाला राजेश आज जीन्स और बंद गले की टीशर्ट पहन कर आया था. उस के ऊपर कोट भी पहने हुए था. राजेश भी बहुत सुंदर लग रहा था.

प्रज्ञा और राजेश खाना खाने के बाद बहुत देर तक यों ही बैठे बातें करते रहे. वैसे तो प्रज्ञा का मन नहीं था कि राजेश अभी जाए, वैसे भी कल तो रविवार था यानी अवकाश का दिन. सो, कोई जल्दबाजी की जरूरत थी भी नहीं पर राजेश को इस बात का इल्म था कि प्रज्ञा अकेली रहती है, ऐसे में देररात तक उस के घर पर रुकना ठीक नहीं है.

इस डिनर के बाद राजेश और प्रज्ञा दोनों और नजदीक आ गए थे. वे शब्दों में भले ही न कह पाए हों पर उन के हावभाव बताने लगे थे कि वे एकदूसरे के प्यार में पड़ चुके हैं. राजेश ने कई बार प्रज्ञा से कहने की कोशिश तो की पर प्रज्ञा के सामने आते ही उस की जबान लड़खड़ा जाती. वह कुछ कह ही न पाता. प्रज्ञा जानती तो सबकुछ थी पर वह भी राजेश के ही कह देने का इंतजार कर रही थी.

राजेश और प्रज्ञा इस रविवार को दोपहर में लंच लेने साथ ही एक होटल में गए थे. राजेश ने ही उसे औफर किया था- ‘क्या है कि मैं तुम को घर पर तो खाना खिला नहीं सकता, सो चलें हम होटल में ही खाना खा लेते हैं.’

‘अच्छा, वैसे आप चाहें तो मैं घर पर भी खाना बना कर खिला सकती हूं.’

‘नहीं, खाना मुझे खिलाना है तो तुम क्यों बनाओगी?’

‘अच्छा, मेरे डिनर का कर्ज उतारना चाह रहे हो?’

‘कर्ज नहीं फर्ज. अरे, इस बहाने हम दोनों रिलैक्स हो कर बैठ तो सकते हैं, इसलिए.’

प्रज्ञा तैयार हो गई. उसे तो तैयार होना ही था. वह राजेश के साथ समय बिताने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी. वैसे भी, दिनरात राजेश के ही खयालों में डूबी रहती थी. अवकाश के दिन तो उस को एकएक पल काटना कठिन हो जाता था. वह फोन लगा लेती पर फोन पर ज्यादा देर तक बातें न करती. उसे लगता, मालूम नहीं राजेश कहीं डिस्टर्ब तो नहीं हो रहा है.

आज प्रज्ञा ने साड़ी पहनी थी और बालों का जूड़ा बना लिया था. जूड़े में एक गुलाब का फूल भी लगा लिया था. राजेश ने एक दिन बातों ही बातों में उस को बोला था, ‘प्रज्ञा, ये गुलाब है न, इसे ही हम प्रेम का प्रतीक मानते हैं. जानती हो, क्यों?’ उस ने कोई उत्तर नहीं दिया तो राजेश ने ही बोला था, ‘जैसे प्रेम कांटों की चुभन के साथ पल्लवित होता है न, ठीक वैसे ही गुलाब भी कांटों का कष्ट सहन कर अपनी मुसकराहट बिखेरता है. मुझे गुलाब केवल इसीलिए ही बहुत पसंद है.’ उस ने गमले में खिले गुलाब की पंखुडि़यों को सहलाते हुए बोला था.

प्रज्ञा ने कोई विशेष साजसज्जा नहीं की थी पर फिर भी वह बहुत सुंदर दिख रही थी. राजेश और प्रज्ञा साथ ही साथ कालोनी से निकले. प्रज्ञा का मन हो रहा था कि वह राजेश का हाथ अपने हाथों में ले ले पर वह ऐसा नहीं कर सकती थी. वैसे भी, राजेश उस से कुछ दूरी बना कर ही चल रहा था. वे औटो से होटल पहुंचे थे.

प्रज्ञा पहली बार राजेश के इतने करीब बैठी थी. यदि औटो की मजबूरी न होती तो राजेश अब भी उस के इतना करीब न बैठता. दोनों की सांसें एकदूसरे की सांसों से टकरा रही थीं. राजेश ने शायद पहले से ही केबिन बुक करा लिया था, इसलिए वे दोनों सीधे केबिन में जा कर बैठ गए थे. वेटर सूप का प्याला रख गया था. दोनों सूप की चुस्कियां ले रहे थे.

‘प्रज्ञा, तुम आज बहुत खूबसूरत लग रही हो.’

प्रज्ञा के चेहरे पर लाज की गरिमा दौड़ गई.उस की उंगलियां अपनी ही साड़ी के पल्लू के साथ खेलने लगी थीं. राजेश प्रज्ञा को एकटक देखे जा रहा था.

‘सौरी  प्रज्ञा.’

‘क्यों, क्या हुआ?’

‘मुझे शायद यह नहीं बोलना

था, सौरी.’

प्रज्ञा का चेहरा उतर गया, ‘क्यों?’

‘तुम्हारा मुख देख कर अंदाज लगाया कि तुम्हें मेरी यह बात अच्छी नहीं लगी.’

‘नहीं, नहीं. ऐसी कोई बात नहीं है.’ प्रज्ञा की नजरें राजेश के चेहरे पर जा कर टिक गईं.

‘अच्छा, तो तुम्हें अच्छा लगा मेरा

ऐसा कहना?’

‘जी.’ शर्म से लाल हो गई थी प्रज्ञा.

‘तो फिर मैं एक बात और पूछ ही लूं यदि तुम इजाजत दो तो?’

‘अरे, आप को इजाजत मांगने की क्या जरूरत है?’

‘कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें बगैर इजाजत के नहीं कहना चाहिए.’

‘अच्छा, यानी आप कोई गहरी बात कहना चाहते हैं?’

‘हां.’

‘तो फिर कहिए न, मैं बहुत

उत्सुक हूं.’

‘तुम मुझ से प्यार करती हो?’

प्रज्ञा अचंभित हो गई. उसे ऐसे प्रश्न की उम्मीद न थी. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या उत्तर दे.

उसे मौन देख कर राजेश के चेहरे पर पश्चात्ताप के भाव उभर आए.

‘सौरी, शायद मुझे यह प्रश्न नहीं करना था?’

प्रज्ञा अभी भी चुप ही थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या उत्तर दे. वह राजेश से प्यार करती थी, यह तो सच था. वह यह भी जानती थी कि राजेश भी उस से प्यार करता है परंतु न तो वह खुद भी यह कह पा रही थी और न ही राजेश ने कहा था. आज तो उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि होटल के केबिन में राजेश उस के सामने यह प्रस्ताव रख देगा. उस के चेहरे पर अचंभितमिश्रित प्रसन्नता हिलोरें मार रही थीं.

‘आप यह बारबार सौरी क्यों बोल रहे हैं?’

‘और क्या, जब तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं है तो इस का मतलब है कि मैं ने गलत प्रश्न कर दिया.’

‘अरे वाह, किसी को सोचने का मौका भी न दो,’ अब की बार प्रज्ञा के चेहरे पर अनोखी मुसकराहट छा गई थी.

‘यदि सामने वाले को उत्तर देने के लिए सोचना पड़े तो फिर प्रश्न बेकार ही है.’

राजेश गंभीर बना हुआ था. उसे वाकई लगने लगा था कि उस ने कुछ गलत प्रश्न कर दिया है.

प्रज्ञा उस के चेहरे पर आने जानेवाले भावों को पढ़ रही थी. एकाएक वह अपनी कुरसी से उठी. उस ने अपने जूड़े में जो गुलाब का फूल लगाया हुआ था उसे निकाल कर अपने हाथों में ले लिया. प्रज्ञा राजेश के सामने घुटने के बल बैठी थी, ‘आई लव यू, डियर.’ लाज के कारण उस के गालों पर लालिमा फैल चुकी थी.

सभी को राजेश और प्रज्ञा की लव स्टोरी के बारे में पता चल चुका था. दोनों ने छिपाने का प्रयास किया भी नहीं था. दोनों साथ औफिस जाते और साथ ही लौटते भी. अकसर प्रज्ञा राजेश के लिए भी खाने का डब्बा ले कर आती. उन के बीच प्रेम की गहराई बढ़ती जा रही थी. एकाएक प्रज्ञा को अपने घर से बुलावा आया था. पिताजी ने फोन पर ही बोला था कि वह तुरंत आ जाए. कारण उन्होंने नहीं बताया था.

प्रज्ञा का मन अनेक शंकाओं से ग्रसित हो चुका था. उस ने राजेश को केवल इतना ही बताया कि उसे तत्काल अपने घर जाना पड़ रहा है. इस से ज्यादा उसे भी नहीं मालूम था.

राजेश उसे स्टेशन तक छोड़ने आया.

‘यदि तुम कहो तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूं?’

‘नहीं. आप अच्छे से रहना. मैं वहां पहुंच कर आप को फोन लगाऊंगी.’

पर प्रज्ञा का फोन नहीं आया. एकदो दिन तक तो राजेश प्रतीक्षा करता रहा पर जब फोन नहीं आया तो उस ने ही फोन लगाने का प्रयास किया. प्रज्ञा का फोन बंद बता रहा था.

प्रज्ञा का कोई पता नहीं चला. एक लंबा समय व्यतीत हो चुका था. इस बीच राजेश प्रज्ञा के शहर भी हो कर आ चुका था पर वहां भी उस का कोई पता नहीं चला. राजेश हताश हो चुका था. उसे प्रज्ञा के साथ बिताए एकएक पल अपनी आंखों के सामने झलते दिखाई देते. राजेश का मन अब यहां नहीं लग रहा था. एक दिन उस ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया और अपने शहर चला गया. कुछ दिनों तक वह यों ही बेकाम सा पड़ा रहा, फिर उस ने एक प्राइवेट स्कूल में जाना शुरू कर दिया था यह सोच कर कि उस का मन तो लगे कैसे भी.

प्रज्ञा का आवेदनपत्र उस के सामने टेबल पर रखा हुआ था. इस आवेदनपत्र में उस की वही पुरानी फोटो लगी थी. वह अवाक सा उस फोटो को देख रहा था, अरे, प्रज्ञा, यह यहां है. ओह, मैं ने तो कहांकहां नहीं ढूंढ़ा इसे. उस की आंखों से आंसू बह निकले. उस ने घंटी बजा कर चपरासी को अंदर बुलाया, ‘यह आवेदन कौन ले कर आया है?’

‘एक मैडम ले कर आई थीं, सर.’

राजेश समझ गया कि प्रज्ञा ही आई होगी.

‘उन्हें अंदर बुलाओ.’

‘वे तो आवेदन दे कर चली गईं.’

‘ओह, अच्छा.’

राजेश के चेहरे पर निराशा के भाव उभर आए थे. वह आवेदन को बारबार पढ़ रहा था. उस के सामने प्रज्ञा का चेहरा जीवंत होता जा रहा था. उस ने कितना तो खोजा प्रज्ञा को पर मिली ही नहीं. उस ने अपने जीवन के इतने वर्ष प्रज्ञा की यादों के सहारे ही तो काटे हैं. काश, वह मेरे सामने होती तो मैं उसे बताता कि देखो प्रज्ञा, तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा ही रह गया.

उस ने आवेदन के नीचे लिखे फोन नंबर को देखा, क्या मैं फोन लगा लूं, राजेश के चेहरे पर असमंजस के भाव थे.

मोबाइल की घंटी कुछ देर तक यों ही बजती रही. राजेश का दिल बहुत तेज धड़क रहा था. उस का मन हुआ कि जब फोन रिसीव नहीं हो रहा है तो काट ही दूं पर तभी दूसरी ओर से आवाज गूंजी, ‘यस, कौन?’

प्रज्ञा की ही आवाज थी. इतनी मीठी आवाज भला किसी और की हो ही कैसे सकती है.

‘प्रज्ञा, तुम यों ही लगातार बोलते रहा करो. मुझे तुम्हारी आवाज बहुत कर्णप्रिय लगती है.’

‘अच्छा, मैं पागल हूं क्या कि मैं ही बोलती रहूं,’ कुछ देर चुप रहने के बाद वह ही बोली, ‘अच्छा, ओके. कहो तो गाना भी सुना दिया करूं.’

‘अरे हां, मैं यह तो भूल ही गया. जब तुम्हारी इतनी सुरीली आवाज है तो तुम गाना भी बहुत अच्छा गा सकती हो.’

‘आप को तो मेरी हर चीज अच्छी लगती है,’ उस के चेहरे पर शरारत के भाव उभर आते.

‘अरे, अब जब तुम हो ही इतनी अच्छी तो मैं क्यों बुरा कहने लगूं.’

‘हां, ठीक है. मान लिया.’

‘तो अब गाना भी सुना ही दो.’

प्रज्ञा धीरे से गाने की दो पंक्तियां सुना देती.

राजेश उस आवाज में खो सा जाता.

दूसरी ओर से फिर आवाज गूंजी, ‘कौन?’

राजेश सकपका गया. ‘मैं स्कूल से बोल रहा हूं. आप आवेदन दे कर गई थीं न.’

‘ओह, अच्छा.’

राजेश ने जानबूझ कर अपना नाम नहीं बताया था. उसे उम्मीद थी कि जैसे उस ने प्रज्ञा को आवाज से पहचान लिया है वैसे ही प्रज्ञा भी उसे आवाज से पहचान लेगी.

पर प्रज्ञा ने नहीं पहचाना.

‘जी बताएं, कोई कमी रह गई है क्या आवेदन में या निरस्त कर दिया गया है.’

‘नहीं, मैं ने यह बताने के लिए फोन किया कि आप का सलैक्शन हो गया है. आप कल से स्कूल आ सकती हैं.’ राजेश का मन निराशा से भरता जा रहा था.

‘आप राजेश सर बोल रहे हैं न?’

राजेश की उमंगें हिलोरें लेने लगीं. ‘जी, पर आप ने कैसे पहचाना?’

‘वह मैं आवेदन देने गई थी न, तब प्यून ने बताया था कि राजेश सर ही सलैक्शन करते हैं, इसलिए.’

‘ओह,’ राजेश फिर निराशा में डूब गया मतलब कि प्रज्ञा ने उसे उस की आवाज से नहीं पहचाना है.

‘आप कैसे हैं, राजेशजी?’ एक बार फिर राजेश का चेहरा खिल गया.

‘मैं ठीक हूं, आप कैसी हैं?’

‘आप! अरे, मैं ने कितने वर्ष पहले बोला था न कि मुझे आप नहीं कहा करें.’

राजेश का चेहरा खिल गया, ‘यानी आप ने मुझे पहचान लिया.’

‘क्यों नहीं. वह तो तब ही पहचान लिया था जब आप ने हैलो कहा था. हैलो कहने की आप की अपनी स्टाइल जो है. वैसे हैलो कोई और बोल ही नहीं सकता.’

‘ओह अच्छा. फिर बताया क्यों नहीं?’

‘मुझे लगा कि आप ने मुझे नहीं पहचाना है, इसलिए.’

‘अरे, तुम्हारी आवाज को मैं भला कैसे भूल सकता हूं, सौरी.’

‘अब यह सौरी क्यों?’

‘ऐसे ही.’

‘अच्छा, फिर ठीक है.’

‘क्या हम मिल सकते हैं, प्रज्ञा. ढेर सारी बातें करनी हैं.’

‘बात तो मुझे भी करनी है पर कल तो मिलेंगे ही न.’

‘ओके,’ राजेश को उस की बात यों काटे जाने पर दुख हुआ.

प्रज्ञा जानती थी कि राजेश को उस की बात काटा जाना अच्छा नहीं लगा होगा. वह तब भी झझंला पड़ता था, ‘यार, तुम मेरी बात को मान ही लिया करो वरना मुझे गुस्सा आ जाता है.’

वह मान भी लेती थी. उस ने राजेश की कोई बात कभी नहीं काटी थी. राजेश के कहने पर ही तो उस ने औफिस सूट पहन कर जाना छोड़ दिया था. उसे साड़ी में परेशानी होती थी पर साड़ी पहन कर ही औफिस जाती थी. आज तो उस ने जानबूझ कर ऐसा किया था. सच तो यह है कि वह राजेश पर बहुत नाराज थी. वह अपने पिता से विद्रोह कर जब उस से मिलने कंपनी पहुंची तो वहां पता चला कि जनाब कंपनी छोड़ कर भाग गए हैं. वह कहांकहां नहीं उसे ढूंढ़ती फिरी पर जनाब का पता ही नहीं चला.

पापा ने उसे तत्काल बुलाया था वो केवल इसलिए कि उन्होंने उस के लिए एक लड़का पसंद कर रखा था और वे चाहते थे कि उस के साथ उस की शादी तुरंत ही हो जाए. शायद उन को मेरे और राजेश के प्यार के बारे में पता चल गया था. उस ने भी अपने पापा को साफसाफ सबकुछ बता दिया था और कह दिया था कि वह विवाह तो राजेश के साथ ही करेगी. पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर था.

‘नहीं, तुम जानती नहीं हो वे दलित समुदाय से आता है.’

‘तो, वे भी इंसान ही तो होते हैं. और फिर, राजेश तो पढ़ालिखा है, अच्छी जौब कर रहा है, देखने में भी खूबसूरत है. सो, फिर क्या दिक्कत है?’

‘दिक्कत, अरे, समाज के लोग क्या कहेंगे. क्या हमारे समाज में लड़के नहीं हैं जो तुम गैरसमाज में शादी करना चाहती हो.’

‘देखो पापा, मुझे अपना जीवन गुजारना है तो मैं उस लड़के के साथ ही जीवन गुजारूंगी जिसे मैं पसंद करती हूं. इस में समाज कहां से बीच में आ गया?’

‘प्रज्ञा, तुम समझने की कोशिश करो. मुझे अपनी एक बेटी और ब्याहनी है. तुम इस तरह गलत आदमी से ब्याह कर लोगी तो समाज तो हमारे खिलाफ ही हो जाएगा न.’

‘बेकार की बातें हैं, पापा. समाज बहुत आगे निकल चुका है. आप भी अपनी सोच को बदल लो.’

‘नहीं, तुम को वहां ही शादी करनी होगी जहां मैं चाह रहा हूं.’

‘सौरी पापा. शादी तो मैं राजेश से ही करूंगी,’ प्रज्ञा ने दोटूक बोल दिया था.

प्रज्ञा की बातें सुनते ही पापा अस्वस्थ हो गए. उन्हें अस्पताल में एडमिट करना पड़ा. वह उन्हें यों अस्पताल में छोड़ कर तो आ नहीं सकती थी. सो उसे समय लग गया. उस ने राजेश को एकदो बार फोन लगाने का मन भी बनाया पर वह जानती थी कि राजेश को जैसे ही वह सारा कुछ बताएगी, वह दौड़ता हुआ वहां पहुंच जाएगा. पापा उसे देखेंगे तो उन की बीमारी और बढ़ जाएगी, यह सोच कर वह वक्त का इंतजार करती रही.

पापा नहीं बच सके. प्रज्ञा बहुत समय तक पापा की हुई अचानक मौत के सदमे में रही. उसे लग रहा था कि जैसे पापा को उस ने ही मार दिया हो. यदि वह उन के बताए रिश्ते को स्वीकार कर लेती तो आज पापा जिंदा होते पर वह दुखी ही रहती न. पापा का जीवन तो वैसे भी कम बचा था पर उस का तो पूरा ही जीवन सामने था. वह कैसे घुटघुट कर अपना जीवन काटती?

प्रज्ञा को पापा की मौत के सदमे से उबरने में समय लगा. इस बीच वह चाह कर भी राजेश से संपर्क नहीं कर पाई. एकदो बार प्रयास किया पर उस का फोन लगा ही नहीं. बहुत समय बाद प्रज्ञा वापस कंपनी पहुंची थी.

वह राजेश के गले से लग कर फूटफूट कर रोना चाहती थी पर राजेश नहीं मिला. कंपनी से केवल राजेश के शहर का ही पता ज्ञात हुआ था तो वह इस शहर में आ कर रहने लगी थी, यह सोच कर कि कभी तो राजेश से मुलाकात हो जाएगी. उसे नहीं मालूम था कि राजेश तो कभी का यहां आ चुका है. राजेश निकलता कहां था घर से कि वह कभी उस से टकराती. वह दूसरे स्कूल में पढ़ा कर अपना जीवनयापन कर रही थी. उस स्कूल के प्राचार्य ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह भनभना कर स्कूल से इस्तीफा दे आई.

जब वह इस स्कूल में आवेदन देने गई थी तो राजेश की नेमप्लेट को देख कर उसे शक अवश्य हुआ था कि वही राजेश है. ‘पर वह यहां क्यों होगा, इतना बड़ा अधिकारी था उस कंपनी में तो दूसरी कंपनी में तो और बड़ी पोस्ट पर होगा पर मन मान नहीं रहा था. जैसे ही उस ने फोन पर राजेश की आवाज सुनी, उस का चेहरा खिल उठा था, हालांकि उसे राजेश से बहुत सारी शिकायतें भी थीं.

उसे अपने हर प्रश्न के उत्तर चाहिए थे. जौइनिंग बाद में, पहले लड़ाई, फिर राजेश के गले से लग कर फूटफूट कर रोना चाहती थी वह पर जब वह स्कूल पहुंची तो राजेश स्कूल में नहीं मिला. किसी ने बताया था कि उस की तबीयत खराब है, वह किसी अस्पताल में भरती है.

अरे, कल तो अच्छे से बात कर रहे थे. फिर एकाएक क्या हो गया? उस के माथे पर चिंता के भाव आ गए थे. उस ने अस्पताल जा कर राजेश को देख आने के बारे में सोचा ही नहीं. जब राजेश स्वस्थ हो कर आ जाएंगे तब बात करेंगे.

स्कूल में ही पता चलता रहा कि राजेश की अस्वस्थता बढ़ती जा रही है.

आज जब वह स्कूल आई तो उसे पता चला कि राजेश की हालत बहुत खराब है. अब उस का मन किसी काम में नहीं लगा. वह स्कूल बीच में ही छोड़ कर अस्पताल की ओर दौड़ पड़ी. उस का दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था. वह लगभग दौड़ती हुई सी अस्पताल पहुंची थी. रिसैप्शन पर ही राजेश का कमरा पता किया और सीढि़यों से होती हुई उस के कमरे के सामने जा कर खड़ी हो गई.

कमरे का दरवाजा खोलते समय उसे कुछ असमंजस सा महसूस हुआ पर उसे तो हर हाल में राजेश को देखना ही था. सो, उस ने हौले से कमरे का दरवाजा खोल दिया और कमरे के अंदर दाखिल हो गई. राजेश के चेहरे पर औक्सीजन मास्क लगा था. नर्स उस के हाथों में बौटल लगा रही थी. एक बुजुर्ग औरत प्यार से उस के माथे को सहला रही थी. शायद राजेश की मां होंगी, उस ने अंदाजा लगाया. दरवाजा खुलने की आहट से सभी चौंक गए थे.

‘‘जी, मैं, प्रज्ञा.’’

नर्स के चेहरे पर उस का नाम सुनते ही अजीब से भाव आ गए, ‘‘अरे, आप ही प्रज्ञा हैं. देखिए, ये मरीज तो कब से आप का ही नाम पुकार रहे हैं.’’

बुजुर्ग महिला ने भी ममतामयी नजरों से प्रज्ञा की ओर देखा मानो उन्हें उम्मीद हो कि उन का बेटा जिसे पुकार रहा था वह आ गई है तो वह भी आंख खोल कर उठ खड़ा हो जाएगा.

प्रज्ञा ने बोझिल वातावरण को महसूस कर लिया था. उस की आंखों में भी आंसू झलझला आए. वह राजेश के नजदीक पहुंच गई और उस ने प्यार से राजेश को सहलाया. राजेश के शरीर में कुछ हलचल सी हुई. राजेश ने प्रज्ञा का हाथ अपने हाथों में जकड़ लिया. उस की सांस तेजतेज चलने लगी थी. नर्स घबरा गई थी. उस ने डाक्टर को आवाज लगाई. जब तक डाक्टर आते तब तक राजेश की सांसें थम चुकी थीं. कमरे में राजेश की मां और प्रज्ञा के रुदन की आवाजें गूंज रही थीं. Romantic Story in Hindi

Social Story in Hindi : ज्ञान का उजाला – उद्देश्यपूर्ण जीवन जी रहे व्यक्ति की कहानी

Social Story in Hindi : मिस्टर थौमस ने अपने पिताजी से जो सीख ली थी, उस के बाद संकल्प ले लिया था ज्ञान का दीपक जलाने का. उन के ज्ञान की रोशनी ने कितने ही घरों में उजाला कर दिया था.

मिस्टर थौमस की नींद रोज सुबह 5 बजे खुल जाती थी. बिस्तर में करवटें बदलतेबदलते साढ़े 5 बज जाते थे. साइड की टेबल पर रखे मोबाइल पर मैसेज की आवाजें उन को आकर्षित नहीं कर पाती थीं. वे सोचते थे न जाने लोग सुबहसुबह मोबाइल ले कर कैसे बैठते हैं घंटोंघंटों.

वे साढ़े 5 बजे बिस्तर छोड़ देते. हलके गरम पानी में नीबू निचोड़ कर पीते. फिर अपने बंगले के लौन में टहलने लगते. वे जानते थे गार्डन में अभी हैल्दी जूस वाला नहीं आया होगा, सुबह लगभग 7 बजे वह अपनी शौप खोलता है. ढेरों पौष्टिक जूस होते हैं- एलोवेरा, आंवला, नीम, लौकी वगैरहवगैरह, वे साढ़े 6 बजे गार्डन की तरफ निकल गए.

गार्डन में रोज की तरह चहलपहल थी. जूस पीने वालों की कतार थी. स्वास्थ्य के प्रति सजग है पब्लिक, सुखद है. चिडि़यों की आवाजें हवाओं में संगीत घोल रही थीं. ठंडीठंडी हवाएं शरीर को भली लग रही थीं. मिस्टर थौमस ने भी अपना पसंदीदा जूस पिया और गार्डन की एक बैंच पर बैठ गए.

महीनेभर पहले गार्डन में एक डौगी ने बच्चे दिए थे. छोटेछोटे पिल्ले घूम रहे थे. वाक करने वालों के पैरों से टकरातेटकराते बच रहे थे. कुछ लोग दूधबिस्कुट दे जाते थे. डौगी खुश थी अपने बच्चों के साथ. किसी बैंच के नीचे बैठ जाती तो बच्चे उस के ऊपर चढ़ जाते, उस को यहांवहां काटने लगते. डौगी शांति से बैठी बच्चों के प्यार को महसूस कर रही थी. मि. थौमस ने बैंच से उठ कर गार्डन में वाक करना शुरू किया.

वाक करतेकरते वे सोच रहे थे, कुतिया के बच्चे जब बड़े होंगे तो गार्डन के बाहर निकल जाएंगे. कुछ बच्चे तेज गाडि़यों, बाइक, कार के नीचे आ कर मर जाएंगे. कुछ जिंदा बचे रहेंगे. तभी उन की नजर गार्डन में बने कमरे में गई. वे जानते थे इस कमरे में वाचमैन रहता है जो गार्डन की चौकीदारी के साथ गार्डन का रखरखाव भी करता है. कमरे से बाहर चौकीदार के बच्चे खेल रहे थे. उस के 2 बच्चे थे, एक 9 वर्षीया लड़की और 12 वर्ष का लड़का.

लड़के के हाथ में मोबाइल था, जिसे ले कर पेड़ के नीचे बैठा था. लड़की खेलतीखेलती उस के पास मोबाइल देखने पहुंच जाती थी. मि. थौमस यह दृश्य लगभग रोज ही देखते थे. 12 वर्ष की नन्ही उम्र में मोबाइल की लत उन को बुरी लगती थी लेकिन वे चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाते थे. मन मसोस कर रह जाते थे. गार्डन में टहलने के बाद उन्होंने स्प्राउट लिया और टहलतेटहलते घर आ गए. कालोनी में कूड़े वाली गाड़ी दौड़ रही थी. चिरपरिचित धुन बजाती हुई. कुछ लोगों ने डस्टबिन घर के बाहर रखा था. गाड़ी से उतर कर सहायक कूड़ा उठा कर गाड़ी में डाल देता. गाड़ी आगे बढ़ जाती. मि. थौमस ने भी अपना डस्टबिन बाहर ही रखा था जिस में वे खुद ही कूड़ा डाल आए थे.

घर का दरवाजा राजेश खोल चुका था. घर की साफसफाई में लगा था. पूरे घर का झाड़ूपोंछा करने के बाद राजेश पौधों में पानी देगा, फिर लंच की तैयारी शुरू कर देगा. वह जानता था मि. थौमस नाश्ते में स्प्राउट लेते हैं. कभीकभी ब्रैडआमलेट, साथ में एक गिलास दूध.

जब तक राजेश साफसफाई करता मि. थौमस सुबह एकदो अखबार पढ़ लेते. जब तक अखबार न पढ़ लेते तब तक उन को चैन नहीं मिलता था. अधूरापन महसूस करते थे.

राजेश मि. थौमस के यहां 10 वर्षों से काम कर रहा था. वह घर के कोनेकोने से परिचित था. मिसेज थौमस की मौत इसी घर में हुई थी.

मि. थौमस को अपने घर से, अपनी पत्नी की यादों से लगाव था, इसलिए जब मि. थौमस का एकमात्र बेटा उन को साथ रखने की जिद कर रहा था तो उन्होंने दृढ़ता से मना कर दिया था. वे जीवन में सक्रिय रहना चाहते हैं. खाना, पीना, सोना और यों चले जाना उन को पसंद नहीं. जीवन की कुछ सार्थकता तो हो.

बेटा विलियम पापा के तर्क सुन कर चुप रह जाता लेकिन भोपाल से इंदौर की दूरी अधिक नहीं थी, इसलिए बेटा विलियम पत्नी मार्था, बच्चे मौरिस के साथ आता रहता. मि. थौमस भी भोपाल बेटे से मिलने जाते रहते, कुछ दिन रुकते, फिर वापस आ जाते.

मि. थौमस इंदौर के पास ही एक गांव में सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थे. उन्होंने वीआरएस ले लिया था. घर में कालोनी के बच्चों को फ्री ट्यूशन पढ़ाते थे. रोज शाम 5 बजे से देररात तक. उन की ट्यूशन और गाइडलाइन से बच्चे खुश थे, दूर कहीं ट्यूशन के लिए नहीं जाना पड़ता था. सुरक्षित भी थे वे सब.

‘‘साबजी, लंच में क्या बनेगा?’’

मि. थौमस लगभग चारों अखबार पढ़ चुके थे. उन्होंने राजेश की आवाज पर नजर उठाई, बोले, ‘‘देखो, जो तुम को ठीक लगे, फ्रिज में देख लो, कोई सब्जी हो तो वही बना लो.’’

‘‘फ्रिज में कोई सब्जी नहीं बची है, लानी होगी, साबजी,’’ राजेश बोला.

‘‘तो ठीक है, ये लो रुपए और सब्जी वगैरह खरीद लाओ,’’ कहते हुए 500 रुपए का नोट राजेश की तरफ बढ़ा दिया.

राजेश पैसे ले कर जाने लगा तो मि. थौमस ने आवाज दी, ‘रुको.’ राजेश रुक गया.

‘‘तुम्हारी बेटी की पढ़ाई कैसी चल रही है?’’ राजेश की बेटी 7वीं क्लास में थी.

‘‘साब, ठीक पढ़ रही है. किताबें और फीस तो आप दे ही देते हैं, मेहनत तो उसे ही करनी है,’’ कह कर राजेश जाने को तैयार हुआ.

‘‘तुम उस के खानेपीने का ध्यान रख रहे हो?’’ मि. थौमस ने सवाल किया.

‘‘जी साब, रोज सोने से पहले एक गिलास दूध भी देता हूं.’’

‘‘गुड,’’ मि. थौमस बोले, ‘‘बच्चा स्वस्थ होगा तो स्वस्थ मस्तिष्क से पढ़ाई करेगा. हमारे देश के बच्चे स्वस्थ रहेंगे तो शिक्षा अच्छे से ग्रहण करेंगे.’’

‘‘जी साब,’’ कहता हुआ राजेश बाहर चला गया.

तब तक मि. थौमस फ्रैश होने और नहाने चले गए थे.

राजेश ने बाजार से आ कर लंच की तैयारी शुरू कर दी थी. दोपहर बाद राजेश उन को शाम की चाय दे कर चला जाता है. मि. थौमस रात में डिनर हलकाफुलका करते थे, दलिया या खिचड़ी वगैरह. इसे वे बनाते थे बच्चों के ट्यूशन से जाने के बाद. मि. थौमस अपने इस रूटीन में बहुत खुश थे, संतुष्ट थे. लंच में पालकपनीर देख कर वे खुश हो गए थे. राजेश उन की पसंद का पूरा ध्यान रखता था. खाने से पहले ढेर सारा सलाद रख जाता था. गरमगरम चपाती उन को भाती थी.

लंच के समय वे सोचने लगे, बेटेबहू रोज केसरोल में रखा ठंडा खाना खाते हैं जबकि जौब करने की बहू को कोई जरूरत नहीं थी लेकिन आज की पीढ़ी यह सोचती है कि पढ़ाईलिखाई का उपयोग होना चाहिए, इसलिए जौब जरूरी है. अब क्या किया जा सकता है. सब बातें मनमुताबिक नहीं होतीं. मि. थौमस ने लंच खत्म किया. स्टडीरूम में आ गए किताबों पर नजर दौड़ाने. अब थोड़ा रैस्ट करेंगे, फिर बच्चे आ जाएंगे.

बिस्तर पर लेटते ही वे सोचने लगे, कल वाक करने जाएंगे, तब गार्डन में चौकीदार के बच्चों की पढ़ाई की जानकारी लेंगे. वे बच्चे स्कूल जाते भी हैं या नहीं. न जाने क्यों उन्हें नन्हे बच्चों को यों मोबाइल में लगे रहना अच्छा नहीं लगता लेकिन घर में भी यही माहौल हो तो बच्चे सीख ही जाते हैं. हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है, किताब होनी चाहिए थी. लेकिन मोबाइल है. ये सब सोचतेसोचते उन की आंख लग गई.

आंख तब खुली जब बच्चे ड्राइंगरूम में जम गए थे. उन्होंने देखा दोपहर के सवा 4 बज रहे थे. वे फ्रैश महसूस कर रहे थे दोपहर की झापकी के बाद.

मि. थौमस 12वीं तक के बच्चों की ट्यूशन लेते थे. सभी बच्चे पढ़ाई की कठिनाइयों को हल करते ही थे, साथ ही, अपनी छोटीछोटी समस्याओं को मि. थौमस से शेयर कर उन का हल पूछते थे.

मि. थौमस हिंदी और गणित पढ़ाते थे. प्रसिद्ध लेखकों की पुस्तकें उन के पास रहती थीं. ढेरों रंगबिरंगी कौमिक्स भी उन के संग्रह में थीं.

औनलाइन पुस्तकें पढ़ने के साथ वे बच्चों को पुस्तकें खरीदने पर भी जोर देते थे. जो बच्चे नहीं खरीद सकते उन को खरीद कर भी देते थे. उन को लेखकों से जुड़ी बातें भी बताया करते थे. इस सब से बच्चे उन से खुश रहते थे.

बच्चों के साथ दोपहर कब शाम में ढलने लगी, पता नहीं चला. राजेश सभी बच्चों के लिए ठंडाठंडा शरबत ले आया था, साथ में, मठरी और मि. थौमस के लिए चाय. बच्चों के जाने के बाद राजेश ने जाने की इजाजत मांगी.

‘‘ठीक है राजेश, जाओ, मैं बाहर लौन में बैठता हूं,’’ कह कर मि. थौमस उठ कर लौन में आ गए.

पौधों की हरियाली खामोश थी. हवाएं चल रही थीं. हवाओं में हलकी गरमी थी लेकिन भली लग रही थी, सुकून दे रही थी.

आसमान में तारों की लुकाछिपी शुरू हो गई थी.

मि. थौमस को कुछ याद आने लगा, उन के पिता सरकारी नौकरी में थे. तब की एक बात वे बेटे थौमस को बताया करते थे. थौमस के पिता भी शिक्षा पर जोर देते थे. वे बताया करते थे कि उन को सरकारी मकान मिला हुआ था. सरकारी क्वार्टर में बगीचे के लिए जगह अच्छीखासी थी. उस क्वार्टर में सभी सुविधाएं तो थीं लेकिन शौचालय पुराने ढंग के थे. बाद में बनने वाले मकानों में शौचालय नए ढंग के बनने शुरू हुए, फ्लश सिस्टम वाले.

पुराने ढंग के शौचालय में सफाईवाला मल इकट्ठा कर के ले जाता था छोटी गाड़ी में. फिर डब्बा धो कर वापस अपनी जगह पर रख देता. अंदर से शौचालय में परिवार का कोई सदस्य पानी डालता जिस से वह डब्बा धो कर वापस रख देता. यह रोज का काम था. वहां 25 मकान थे.

थौमस को सुन कर आश्चर्य होता, कैसे एक वर्ग हमारी गंदगी उठाता होगा. रोज की तरह आज भी वह मल इकट्ठा करने के लिए अपनी गाड़ी ले कर आया.  रोज की तरह पानी की बालटी से शौचालय धुलवाने के बाद थौमस के पिता ने उस से कहा, ‘तुम इस काम से फ्री हो जाओ, तब दोपहर में मुझा से मिलने आना.’

दोपहर में लगभग 2 बजे सफाईवाला घर के बाहर इंतजार कर रहा था.

‘आओ, अंदर आओ,’ थौमस के पिता ने कहा लेकिन वह अंदर नहीं आया, बाहर ही खड़ा रहा. तब उन्होंने उस के कंधे पर हाथ रखा, उसे अंदर बैठक में ले आए. उसे अपने सामने सोफे पर बिठाया. उस के मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी, संकोच में था.

‘आराम से बैठो, तुम्हारा नाम क्या है?’ उन्होंने पूछा

‘‘अजय, साबजी.’’

‘तुम पढ़ेलिखे हो, कहां तक पढ़ाई की है?’ थौमस के पिता ने सवाल किया.

‘8वीं क्लास तक पढ़ा हूं. उस के बाद स्कूल छुड़वा दिया था घरवालों ने.’

‘क्यों?’ थौमस के पिता ने सवाल किया.

‘बाबूजी की मौत हो गई थी. 2 छोटी बहनें थीं, उन की जिम्मेदारी भी आ गई थी.’

‘8वीं क्लास की मार्कशीट संभाल कर रखी है तुम ने?’

‘जी साब, वो संभाल कर रखी है,’ अजय बोला.

‘आगे पढ़ना चाहोगे?’

‘मैं क्या करूंगा पढ़ कर, घर कैसे चलेगा, कौन पढ़ाएगा?’

‘छोटी बहनें क्या करती हैं?’

‘पास के सरकारी स्कूल में पढ़ने जाती हैं. मैं बड़ा हूं उन से. मेरी जवाबदारी है उन का ध्यान रखूं,’ अजय हिम्मत कर के बोल गया.

‘ठीक है, ध्यान रखो लेकिन तुम पढ़ना चाहो तो मैं तुम्हें इसी फ्री टाइम में पढ़ा सकता हूं. दोपहर में रोज पढ़ाई करो.’

‘इस उम्र में?’ अजय बोला.

‘क्यों, क्या हुआ उम्र को, कितनी उम्र है तुम्हारी? छोटे हो तुम, इतने भी बड़े नहीं हो.’

‘19 साल का,’ अजय बोला, ‘6 साल पहले 8वीं की थी.’

‘तुम अपना काम भी जारी रखो, 11वीं की तैयारी करो. तुम प्राइवेट परीक्षा दोगे, फौर्म मै भरवा दूंगा, पढ़ाई भी करवा दूंगा.’

‘मैं फेल हो गया तो?’ अजय डर रहा था.

‘तो क्या, फेल हो गए तो दूसरी बार देना परीक्षा.’

‘ऐसा हो जाएगा,’ अजय की आंखों में खुशी की चमक थी.

‘बिलकुल होगा,’ थौमस के पिता हैरिस ने कहा था.

उसी साल उन्होंने 11वीं का फौर्म प्राइवेट भरवा दिया. रोज दोपहर को, कभी शाम को अपनी नौकरी के बाद अजय को पढ़ाने लगे थे वे.

अजय ने मेहनत की और दूसरे प्रयास में 11वीं की परीक्षा उर्त्तीण कर ली थी.

परिणाम निकलते ही अजय की मां अपनी 2 बच्चियों के साथ आ कर हैरिस के पैरों पर गिर गई थी. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे.

‘तुम्हारा बेटा 11वीं पास हो गया है. चिंता मत करो. भविष्य उज्ज्वल है.’

इस के बाद उन्होंने अजय को सरकारी योजना के तहत रोजगार के लिए ऋण दिलवाया आटाचक्की के लिए. अजय जिस गांव का रहने वाला था, वहां उस ने आटाचक्की डाली. इस काम में उन्होंने उस की पूरी मदद की. वे संतुष्ट थे. शिक्षा ने एक व्यक्ति का भविष्य संवारा. वह मिलने को आता रहता था.

मि. थौमस को यह बात याद आई तो उन्होंने भी मन में संकल्प लिया. घर पर तो शिक्षा देते ही हैं, कल सुबह गार्डन जा कर चौकीदार के बच्चों की शिक्षा की जानकारी लेंगे. उन्होंने टाइम देखा, रात के 9 बज रहे थे. वे घर के अंदर आ गए. एक गिलास दूध पी कर वे सो गए.

सुबह जब गार्डन पहुंचे तो रोज की तरह गार्डन में चहलपहल थी. ठंडी हवाएं शरीर को सुकून दे रही थीं. मि. थौमस ने रोज की तरह जूस पिया और गार्डन में बने चौकीदार के कमरे की तरफ बढ़ चले.

रोज की तरह आज भी उस के बच्चे बाहर खेल रहे थे. कमरे का दरवाजा खुला था. फिर भी उन्होंने दस्तक दी. चौकीदार ने दरवाजे से बाहर झांका, ‘‘जी, नमस्ते साब, क्या हुआ?’’ चौकीदार ने थौमस से सवाल किया.

‘‘हुआ कुछ नहीं, तुम बाहर आओ, बात करनी है,’’ मि. थौमस बोले.

‘‘कौन सी बात साबजी, कोई गलती हुई क्या?’’ चौकीदार ने हाथ जोड़ दिए.

‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं है. कोई गलती नहीं है. तुम बाहर आओ या मैं ही भीतर आ जाता हूं,’’ थौमस बोले. आप ठहरे बड़े लोग, गरीब के घर में कहां बैठेंगे, मैं आ जाता हूं.’’

‘‘ऐसा करते हैं मैं ही तुम्हारे कमरे में आ जाता हूं,’’ कहते हुए थौमस कमरे में अंदर चले गए.

छोटा सा कमरा था. एक पलंग, थोड़ा सामान था. कमरे के एक कोने को किचन का रूप दिया गया था. थोड़ेबहुत बरतन थे. गैसचूल्हा नीचे रखा था. छोटा सा टीवी पलंग के पीछे टेबल पर रखा था. 2 कुरसियां थीं पलंग के सामने. मि. थौमस उसी कुरसी पर बैठ गए. कमरे में चौकीदार के अलावा कोई नहीं दिख रहा था. बच्चे बाहर गार्डन में खेल रहे थे.

‘‘जी साब,’’ चौकीदार हाथ जोड़े खड़ा था.

मि. थौमस ने उसे पास वाली कुरसी पर बिठाया.

चौकीदार डरतेडरते कुरसी पर बैठ गया.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ मि. थौमस ने पूछा.

‘‘सामू नाम है मेरा,’’ वह बोला.

‘‘सामू, एक बात बताओ तुम्हारे बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं या नहीं? घर में और कौनकौन है?’’

‘‘क्या गलती हो गई, साबजी,’’ सामू बोला.

‘‘भाई, कोई गलती नहीं हुई, तुम बताओगे तो आगे बोलूं,’’ मि. थौमस बोले.

‘‘साबजी, मैं और 2 बच्चे, बच्चों की मां. मेरे पिताजी गांव में रहते हैं,’’ सामू बोला.

‘‘बच्चों की मां नहीं दिख रही, वह कहां है?’’ मि. थौमस ने सवाल किया.

‘‘साबजी, वह गांव गई है. गांव में खेत थे, कोरोना के दौरान उन्हें बेचना पड़ा था गांव के सरपंच को. छोटा सा मकान है गांव में. पिताजी गांव में दूसरे किसानों के खेत में काम करते हैं. अनाज, सब्जी, फल मिल जाते हैं. वही लेने गई है.’’

‘‘कितने दिन से वहां है?’’ मि. थौमस ने पूछा.

‘‘साब, 2 दिन हुए हैं, शाम तक आ जाएगी,’’ सामू बोला.

‘‘बच्चे कहां पढ़ते हैं?’’ मि. थौमस ने पूछा.

‘‘साब, पास ही के सरकारी स्कूल में, बेटी चौथी कक्षा में, बेटा 7वीं में.’’

‘‘तुम ने बच्चे को मोबाइल क्यों दिया हुआ है, जब देखो गार्डन में मोबाइल ले कर बैठा रहता है,’’ मि. थौमस बोले.

‘‘साब, मैं ने जैसेतैसे रुपए इकट्ठे कर मोबाइल लिया था किस्तों में. जरूरी है मोबाइल.’’ सामू बोला.

मि. थौमस को हंसी आ गई. उन को हंसता देख सामू ने पूछा, ‘‘क्या हुआ साबजी?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ कहते हुए थौमस बोले, ‘‘बच्चों को बुलाओ.’’

‘‘जी साबजी,’ कहते हुए सामू कमरे से बाहर गया और बच्चों को अंदर ले आया और बच्चों से बोला, ‘‘चलो, साबजी के पैर छुओ.’’

बच्चे झाके ही थे, मि. थौमस ने बच्चों को उठा कर अपने पास बिठाया. उन्होंने बच्चों से कुछ हलकेफुलके सवाल किए. वे उन की पढाई से संतुष्ट नहीं थे. वे जानते थे प्राइमरी तक के बच्चों को अनुतीर्ण नहीं किया जाता है. लड़की का नाम मीरा और लड़के का नाम मयंक था.

‘‘देखो मयंक बेटा, मोबाइल इतना नहीं चलाना चाहिए, पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए.’’

मयंक कुछ नहीं बोला.

‘‘देखो सामू, दोनों बच्चों को मेरे पास पढ़ने के लिए भेजा करो.’’

‘‘साबजी, हम लोग महंगी फीस नहीं दे पाएंगे,’’ सामू बोला.

‘‘सामू, मैं कोई फीस नहीं लूंगा, फ्री में पढ़ेंगे तुम्हारे बच्चे.’’

‘‘साबजी, आप तो धन्य हैं,’’ कह कर सामू खुशी से रो पड़ा.

‘‘शिक्षा पर सब का अधिकार है. सब को पढ़ना चाहिए. शिक्षा जरूरी है. बच्चो, आज से तुम खाली समय में भी मोबाइल नहीं चलाओगे, ये किताब पढ़ोगे तुम,’’ कहते हुए अपने बैग में से कई रंगबिरंगी किताबें निकालीं और बच्चों के हाथ में पकड़ा दीं.

‘‘अरे वाह,’’ मयंक लगभग उछल पड़ा.

दोनों बच्चे रंगबिरंगी किताबों में उलझा गए.

मि. थौमस मुसकरा दिए.

‘‘साबजी, कब से भेजना शुरू करूं बच्चों को पढ़ने?’’ सामू की आवाज में खुशी थी.

‘‘आज से ही भेजना शुरू कर दो.’’

उसी दिन शाम को दोनों बच्चे मि. थौमस के घर पहुंच गए. दूसरे बच्चों को देख कर वे थोड़ा घबराए, फिर जल्दी ही घुलमिल गए.

ऐसे ही बरसोंबरस गुजरते रहे. मि. थौमस कभीकभी बच्चों को जीवन के अनुभव सिखाने के लिए बाहर भी ले जाते. कुल मिला कर मि. थौमस ने पढ़ाई को खूब रुचिकर बना दिया था. बच्चे बेहद खुश रहते थे.

मि. थौमस ने ज्ञान का जो प्रकाश फैलाया था उस से दूरदूर तक सुनहरी किरणें जगमगा रही थीं. मि. थौमस जब भी किसी गरीब बच्चे को देखते, उसे पढ़ने के लिए कहते. साथ ही, यह भी कहते कि बच्चों को स्कूल भेजना शुरू तो करो, बाकी जिम्मेदारी हमारी भी और सरकार की भी. तुम लोग सिर्फ एक दीपक जलाओ, धीरेधीरे हजारों दीपक जल उठेंगे.

आज मयंक कालेज पहुंच चुका था. सामू मिठाई लिए मि. थौमस के पास खड़ा था, ‘‘साब, आप ने हमारा जीवन बदल दिया,’’ कह कर सामू रो पड़ा था.

‘‘नहीं सामू, मेहनत तुम्हारे बच्चों ने की थी, मैं तो प्रतिनिधि हूं. रास्ता दिखाया है मैं ने बस,’’ मि. थौमस बोले.

मि. थौमस ने देखा- दूरदूर तक उजाला है, अंधकार मिटने लगा है. अब कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा. मि. थौमस अपने जीवन की सार्थकता देख सुकून महसूस कर रहे थे. Social Story in Hindi

Gender Double Standards : औरतों के लिए ही संस्कार क्यों, मर्दों के लिए क्यों नहीं?

Gender Double Standards : हमारा समाज लड़कियों की संपत्ति को ले कर सब से ज्यादा आपत्ति जताता है. हंसने, बोलने और घूमनेफिरने वाली लड़कियां हमेशा आंखों में चुभती हैं. ऐसे में लड़कियों के लिए क्या जरूरी है.

भारतीय समाज में संस्कारों की बातें बहुत होती हैं और इन संस्कारों की शिकार औरतें ही होती हैं. पति के पैर छूना, आरती उतारना, पति के लिए व्रत, तीज, सासससुर की सेवा करना, लिहाज करना, नजरों को नीची रखना इत्यादि.

ये सारे संस्कार औरतों के लिए ही बने होते हैं हालांकि मर्दों के भी कुछ संस्कार होते हैं, जैसे बड़ों की इज्जत करना, कुल की इज्जत की रखवाली करना वगैरहवगैरह. लड़के और लड़कियों को ये सारे संस्कार बचपन से सिखाए जाते हैं. ये स्किल नहीं हैं, कोरी मिलिट्री टाइप ड्रिल हैं जो पति के लिए कम पति के मांबाप के लिए डिजाइन की गई हैं.

संस्कारों के इन ढेरों आडंबरों के बीच जीने के लिए जो जरूरी बातें हैं उन्हें कोई नहीं बताता. वैवाहिक जीवन की जरूरी बातों का संबंध संस्कारों से नहीं, स्किल से है. क्या हैं जरूरी स्किल, आइए जानते हैं.

स्नेहा और पंकज की शादी तय हो चुकी थी. दोनों अभी तक मिले नहीं थे. स्नेहा के घरवालों ने पंकज से उस का रिश्ता तय कर दिया. सगाई वाले दिन दोनों ने एकदूसरे को देखा. आपस में नंबर एक्सचेंज हुए और दोनों फोन पर बातें करने लगे. कुछ ही दिनों में दोनों की शादी हो गई. स्नेहा विदा हो कर पंकज के घर आ गई.

सुहागरात से पहले पंकज की भाभी ने मुसकराते हुए स्नेहा के कान में कुछ टिप्स बताए और उसे एक कमरे में भेज दिया. स्नेहा समझ नहीं पा रही थी कि वह अब क्या करे, पलंग पर बैठ कर पंकज का इंतजार करे या पलंग पर लेट जाए?

भाभी ने या मां ने यह नहीं समझया कि विवाह की पहली रात क्या करना चाहिए क्या नहीं, खासतौर पर तब जब दोनों के बीच पहले सिर्फ औपचारिक सा संबंध रहा हो.

पंकज की भाभी ने दूध का गरम गिलास पंकज को देने के लिए कहा था लेकिन बगल की टेबल पर रखा दूध तो ठंडा हो चुका था. शादी के चक्कर में स्नेहा कई रातों से जगी हुई थी, इसलिए उसे तेज नींद आने लगी तो वह पलंग पर एक तरफ हो कर सो गई. देररात को पंकज दोस्तों, रिश्तेदारों से फुरसत पा कर आया तो उसे स्नेहा का सो जाना अच्छा नहीं लगा.

Gender Double Standards (2)
धर्म औरतों को पाखंडों में उलझाए रखना चाहता है. इस से न सिर्फ आधी आबादी की प्रोडक्टिविटी
बरबाद होती है बल्कि नस्लें भी धार्मिक पाखंडवाद का शिकार होती हैं.

यह उसे सिखाया ही नहीं गया था कि नई पत्नी थक भी सकती है. यह साधारण स्किल का मामला है पर कोई सिखाए तो न.

पंकज तो यह सोच कर कमरे में दाखिल हुआ था कि स्नेहा हाथ में दूध का गिलास ले कर उस का इंतजार कर रही होगी लेकिन यहां तो वह गहरी नींद में सोई हुई थी. पंकज स्नेहा की बगल में लेट गया और उस के शरीर पर हाथ फेरने लगा. पंकज के इस बिहेवियर से स्नेहा बुरी तरह चौंक कर उठ गई. पंकज कुछ समझता, इस से पहले ही स्नेहा तेज आवाज में रोने लगी. बगल के कमरे में पंकज की भाभी ने जब स्नेहा के चीखने और रोने की आवाज सुनी तो उस के दिल को तसल्ली मिली और मुसकराती हुई अपनी सास के कमरे की ओर बढ़ गई.

इधर, पंकज अपनी नईनवेली दुलहन के इस तरह रोने को समझ नहीं पा रहा था. थोड़ी देर उसे चुप कराने की कोशिश के बाद पंकज पलंग पर एक तरफ लेट गया. स्नेहा के व्यवहार से उस की सारी उमंगें धराशायी हो चुकी थीं और वह भी काफी थका हुआ था, इसलिए लेटते ही गहरी नींद आ गई.

पंकज को नींद में खर्राटे लेने की आदत थी जबकि स्नेहा को खर्राटों से नफरत थी. स्नेहा उठ कर रातभर पलंग के एक कोने में बैठी रही. इस तरह दोनों के लिए सुहाग की रात ट्रेजडी की रात बन चुकी थी.

Gender Double Standards : क्या इस मामले में दोनों के बीच संस्कारों की कमी थी? संस्कार सिर्फ यह सिखाते हैं कि वैवाहिक जीवन में औरतों को कैसे अपने पति और पति के परिवार वालों के लिए आज्ञाकारी बहू बन के रहना है लेकिन वैवाहिक जीवन में औरत को अपनी खुशी कैसे तय करनी है, ये बातें संस्कारों के दायरे में नहीं आतीं. मर्द के लिए औरतों के साथ व्यवहार और उस की खुशी को समझने की भावनाएं संस्कारों के दायरे से बाहर की बातें हैं. कैसे दूसरे का खयाल रखें? बिस्तर पर कैसे सोएं? एकदूसरे की छोटीबड़ी बातों पर कैसे रिऐक्ट करें?

ये सब तौरतरीके संस्कारों में नहीं आते. बैठने, उठने, चलने और सोने के भी एटिकेट्स होते हैं जो सुखी जीवन के लिए बेहद जरूरी होते हैं. यह संस्कार नहीं, स्किल का मामला होता है जो न तो स्कूलों में सिखाया जाता है और न ही परिवार से यह स्किल मिलती है.

Gender Double Standards : व्यावहारिक बनिए

कोई व्यक्ति ओला या उबर में जौब के लिए जौइन करता है तो उसे जौब से पहले ये एटिकेट्स सिखाए जाते हैं कि कस्टमर से कैसे बात करनी है. व्यवहार कैसा होना चाहिए. बैक मिरर में पीछे बैठी सवारी को नहीं देखना है. सवारी पीछे बैठी हो तो स्पीकर पर बात नहीं करनी है. गाना नहीं बजाना है. राइड खत्म होने के बाद सवारी को मुसकरा कर विदा करना है इत्यादि.

बैंक का गार्ड हो या रैस्टोरैंट का वेटर, सेल्समैन हो या मैनेजर, सभी को जौब से पहले लोगों से डील करने की स्किल सिखाई जाती है लेकिन 2 लोग जो साथ में जिंदगी गुजारने वाले हैं उन्हें बिना किसी स्किल के एक कमरे में बंद कर दिया जाता है. जहां से वे जैसेतैसे एकदूसरे को झेलने की शुरुआत करते हैं.

पंकज और स्नेहा को सैक्स करना सीखने की जरूरत नहीं थी लेकिन दोनों को एक कमरे में जिंदगी गुजारनी है, इसलिए कमरे के भीतर एकदूसरे की आदतों, पसंद और सोनेबैठने के तौरतरीकों को समझना व एडजस्ट करना सीखने की जरूरत है. स्नेहा को पलंग पर अकेले सोने की आदत थी लेकिन अब पंकज के साथ बैड शेयर करना पड़ रहा है तो उसे दिक्कत हो रही है लेकिन वह अपनी इस समस्या को पंकज से बता नहीं सकती.

स्नेहा को रात को जल्दी सोने की आदत है लेकिन पंकज की वजह से वह जल्दी नहीं सो पाती. पंकज को डेली रात को स्नेहा के साथ सैक्स करना है लेकिन सैक्स में स्नेहा की रुचि ज्यादा नहीं है. पंकज लाइट औन कर के सैक्स करना चाहता था लेकिन स्नेहा लाइट औफ कर देती है.

Gender Double Standards : एटिकेट्स सभी के लिए जरूरी

सुबह नहाने जाते वक्त पंकज अपने उतारे हुए कपड़े बाथरूम में रखने के बजाय बिस्तर पर ही छोड़ देता है जो स्नेहा को बिलकुल पसंद नहीं. इन बातों को ले कर दोनों के बीच हमेशा मनमुटाव बना रहता है.

अगर सड़क पर चलने के तौरतरीके हैं तो घर के भीतर रहने के भी तौरतरीके होने चाहिए जो संस्कारों, रीतिरिवाजों से नहीं मिलते, स्कूल से नहीं मिलते, परिवार नहीं सिखाते.

सुबह टौयलेट में जाने वाले कुछ मर्द फ्लश नहीं करते. यह काम घर की औरतें करती हैं जबकि इस में स्किल की बात यह है कि टौयलेट में जो जाए वह उसे पूरी तरह क्लीन कर के आए. लोग सार्वजनिक शौचालयों में गंदगी फैलाते हैं और उन्हें इस बात में कुछ भी गलत नहीं लगता. कुछ लोग चिप्स वगैरह खा कर घर के किसी कोने में रैपर फेंक देते हैं जबकि घर के हर कमरे में, बरामदे में छोटाबड़ा डस्टबिन जरूर होना चाहिए. यह स्किल की बात है.

अगर घर में एक बैड है और उस पर पतिपत्नी साथ सोते हैं तो रजाई एक क्यों? जरूरी नहीं कि दोनों के सोने के तौरतरीके एकजैसे हों? इसलिए दोनों की 2 अलगअलग रजाइयां क्यों नहीं हो सकतीं?

सोने, उठने, बैठने, बात करने के एटिकेट्स सीखने और सिखाने की जरूरत है. इन्हें घर में, स्कूल में बच्चों के अंदर स्किल की तरह डैवलप करना चाहिए. जापान के लोग अपने बच्चों को कभी डांटते नहीं बल्कि बड़ी गलती करने पर बच्चे को पिकनिक स्पौट पर ले जा कर समझते हैं. हमारे यहां पेरैंट्स खुद गलतियां करते हैं बच्चे भी वही सीखते हैं.

हर इंसान और हर घर अलग होता है लेकिन ये एटिकेट्स सभी के लिए समान रूप से जरूरी हैं. अगर उपरोक्त छोटीछोटी बातों को घर के बड़े सदस्य फौलो करने लग जाएं तो ये एटिकेट्स स्किल बन कर बच्चों के अंदर समाहित हो जाएंगे.

Gender Double Standards : घर में रहने के जरूरी एटिकेट्स क्या?

घर में मोबाइल पर वीडियो देखते वक्त स्पीकर औन न करें बल्कि इयरफोन का प्रयोग करें.

घर को साफ और व्यवस्थित रखें. अपने सामान को सही जगह पर रखें. घर के कामों में सभी का योगदान हो पत्नी ही न करे. जो कुछ भी इस्तेमाल करें, बाद में उसे सही जगह रखें.

परिवार के हर सदस्य की निजता का सम्मान करें. बिना अनुमति के किसी के निजी सामान को न छुएं या उस के कमरे में न जाएं.

घर में शोर कम करें, खासकर रात में, ताकि सभी को आराम मिले.

सोने और जागने का एक निश्चित समय बनाए रखें, ताकि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहे.

सोने के स्थान को शांत, साफ और आरामदायक रखें. याद रखें कि अगर घर पति का पहले से है तो उसे समझना होगा कि कौन सी चीज कौन कैसे रखेगा.

पतिपत्नी के बीच सोने की व्यवस्था में एकदूसरे की सुविधा और पसंद का ध्यान रखें.

जहां तक संभव हो, परिवार के साथ मिल कर खाना खाएं. यह आपसी बंधन को मजबूत करता है. यह न हो कि सास व बहू किचन में हैं और बाकी सब खा रहे हैं. पूरा खाना बना कर सब को साथ खाना चाहिए चाहे कुछ ठंडा हो. रिश्तों में गरमाहट रहेगी.

परिवार के सदस्य नई बहू की भावनाओं का ध्यान रखें और संवेदनशील विषयों पर सावधानी से बात करें.

एकदूसरे की भावनाओं, विचारों और स्वतंत्रता का सम्मान करें. विश्वास रिश्ते की नींव है.

अपनी भावनाओं, अपेक्षाओं और समस्याओं को खुल कर और शांति से साझ करें.

घर के कामों और जिम्मेदारियों को बांटें. एकदूसरे की पसंदनापसंद और जरूरतों का ध्यान रखें.

एकदूसरे के लिए समय निकालें, जैसे साथ में समय बिताना, बात करना या छोटीछोटी गतिविधियां करना.

अंतरंग संबंधों में एकदूसरे की सहमति और आराम का ध्यान रखें. भावनात्मक और शारीरिक नजदीकी में संतुलन बनाए रखें.

रोजमर्रा की बातचीत में पतिपत्नी एकदूसरे के लिए ‘प्लीज’, ‘थैंक यू’ और ‘सौरी’ जैसे शब्दों का उपयोग करें.

खाना बनाने वाले का सम्मान करें और भोजन के लिए आभार व्यक्त करें.

पत्नी की प्रशंसा और प्रोत्साहन का उपयोग करें.

सोने से पहले साफ कपड़े पहनें और बिस्तर को साफ रखें.

संभव हो तो बैड की चादर को प्रतिदिन साफ करें.

बहू की निजी बातों को सार्वजनिक रूप से या बिना अनुमति के साझ न करें. Gender Double Standards

Parenting Perspective : संतान बोझ या इन्वैस्टमैंट?

Parenting Perspective : वयस्क बेरोजगार बच्चे मातापिता के लिए एक परेशानी बने रहते हैं. यह वित्तीय तनाव, रिश्तों में खटास और भावनात्मक बोझ का कारण बन जाता है क्योंकि मातापिता अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करते हुए खुद को फंसा हुआ महसूस करते हैं.

27 वर्षीय साहिल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और अभी वह बेरोजगार है. उस का कहना है कि वह अपने पेरैंट्स के साथ रहता है, जो उसे शर्मनाक लगता है. वैसे, उस के पेरैंट्स कुछ बोलते नहीं हैं, पर उन के हावभाव से लगता है कि जैसे वह उन पर एक बोझ है. साहिल ट्यूशन पढ़ा कर इतना तो कमा लेता है कि जिस से वह अपना मोबाइल बिल और बाइक में पैट्रोल भरा सके.

साहिल चाहता है कि वह अपने पेरैंट्स की आर्थिक रूप से मदद कर सके और भविष्य में उन का सहारा बन सके. इस के लिए वह एक अच्छी जौब की तलाश में है लेकिन केवल इंजीनियरिंग की डिग्री से उसे कोई अच्छी जौब मिल नहीं रही है.

साहिल के एक दोस्त ने उसे सुझया कि क्यों न वह एमबीए (मास्टर औफ बिजनैस एडमिनिस्ट्रेशन) का कोर्स कर ले, फिर खुद उसे बड़ीबड़ी कंपनियों से जौब के औफर आने लगेंगे लेकिन साहिल के पास इतने पैसे नहीं हैं कि जिस से वह आगे की पढ़ाई कर सके. यह भी पता है उसे कि उस के पेरैंट्स अब उस पर एक रुपया भी खर्च नहीं करेंगे.

भारत में इंजीनियरों की समस्या गंभीर है. यहां हर साल लाखों छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री लेते हैं. उन में से एक बड़ा प्रतिशत नौकरी या इंटर्नशिप से वंचित रह जाता है. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2024 बैच के 83 फीसदी से अधिक इंजीनियरिंग स्नातकों को नौकरी या इंटर्नशिप नहीं मिली.

एक और केस है जहां 33 साल का मयूर अभी तक बेरोजगार बैठा है. उस ने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की है. वह कहता है कि उस ने काफी साल सरकारी नौकरी की तैयारी में गंवा दिए लेकिन उस का कहीं पर भी सलेक्शन नहीं हुआ और उम्र निकल गई. अब उस के पास एक ही रास्ता बचा है कि वह कोई बिजनैस कर ले लेकिन बिजनैस के लिए भी उसे पैसे चाहिए और उस के पेरैंट्स उस पर पैसे निवेश करने को तैयार नहीं हैं.

उस के पिता ताना मारते हैं कि ‘तुम्हारे साथ के सारे बच्चे सफल हो गए और तुम वहीं के वहीं पड़े हो. तुम्हें पढ़ाने में मैं ने लाखों रुपए खर्च कर दिए. सोचा था, भविष्य में कुछ अच्छा करेगा लेकिन तुम तो उलटे हम पर ही बोझ बन गए हो. शर्म भी नहीं आती तुम्हें मुफ्त की रोटियां तोड़ते हुए. अरे, क्यों शर्म आएगी, शर्म बेच जो खाई है. बिना मेहनत के सारी सुखसुविधाएं मिल ही रही हैं तो जरूरत ही क्या है कहीं नौकरी करने की. अब हम से कोई उम्मीद मत रखना, समझे.’

अपने पिता की बात पर मयूर आहत हो उठता. मन करता उस का, कहीं जा कर अपनी जान दे दे, लेकिन जान देना भी तो आसान नहीं. वह सोचता है अगर उस के पास एक जौब होती तो उस के पेरैंट्स उसे आलसी और बोझ न समझते. इधर पेरैंट्स सोच रहे हैं जल्द से जल्द यह इस घर से निकल जाए तो शांति मिले.

एक 66 वर्षीय रिटायर्ड शख्स अपने 29 साल के बेरोजगार बेटे को महीने के 12 हजार रुपए दे रहे हैं, ताकि वह अपने जीवनयापन के खर्चे पूरे कर सके. इन का बेरोजगार बेटा अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी की तलाश में है. अभी तक कोई नौकरी मिली नहीं है. पहले यह प्राइवेट सैक्टर में जौब करता था लेकिन कंपनी में छंटनी के दौरान उस की जौब चली गई. जौब न रहने के कारण उस की लिवइन पार्टनर उसे छोड़ कर चली गई. बेरोजगारी से जूझ रहा यह इंसान वापस अपने पिता के घर लौट आया और आर्थिक रूप से उन पर ही निर्भर है.

66 वर्षीय इन शख्स का कहना है कि कहां वे सोच रहे थे कि नौकरी से रिटायर्ड होने के बाद पत्नी के साथ आराम से अपनी जिंदगी गुजारेंगे लेकिन उन का सोचा हुआ कुछ भी न हुआ. पत्नी बीमारी से जूझ रही है जिस के इलाज में पैसा पानी की तरह बह रहा है और ऊपर से बेटे की आर्थिक जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है.

बेरोजगारी के चलते पेरैंट्स पर निर्भर

कई ऐसे मातापिता हैं जो अपने वयस्क बच्चों को किसी न किसी प्रकार की वित्तीय सहायता कर रहे हैं. कई मातापिताओं का कहना है कि उन के बच्चों की वित्तीय निर्भरता उन के स्वयं के वित्तीय दृष्टिकोण को धूमिल बना रही है. कई अभिभावकों का यह भी कहना है कि बेरोजगारी, स्वास्थ्य या नशे की समस्या के कारण उन के वयस्क बच्चे उन पर निर्भर हैं.

भारत में सरकारी आंकड़ों में रोजगारी दर में कुछ सुधार के संकेत तो मिले हैं लेकिन कितने ही बेरोजगार युवा अभी भी अपने मातापिता पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं. दुनिया काफी समय से खाली घोंसलों के सिंड्रोम को देख रही है.

Parenting Perspective (2)
बचपन में मातापिता हर कदम पर मार्गदर्शन करते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि उन का
आज का प्रयास कल संतान की सफलता बनेगा.

पहले बच्चे वयस्क होने के बाद अपने मातापिता का घर छोड़ देते थे. अब, वैश्विक स्तर पर इस का उलटा हो रहा है. जो बच्चे उच्च शिक्षा, नौकरी के अवसरों या अपनी शर्तों पर जीवन जीने के लिए घर छोड़ कर गए थे वे अपने मातापिता के पास वापस लौट रहे हैं क्योंकि वे मजबूर हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका की जनगणना के अनुसार करीब एकतिहाई युवा, जो 18-49 वर्ष के हैं, अपने पेरैंट्स के साथ रह रहे हैं.

जनसांख्यिकीविदों ने इस के लिए एक नया शब्द गढ़ा है, बूमरैंग बच्चे. बूमरैंग, क्योंकि वयस्कता की आजादी का पूरा आनंद लेने के लिए स्वतंत्र रूप से जीने की इच्छा अब पुनर्विचार के दौर से गुजर रही है. क्योंकि, आजादी का लाइसैंस कंधों पर आसानी से कहां मिलता है.

बेरोजगारी के चलते जिंदगी के तनाव और दबाव तो हैं ही, साथ ही, घर चलाने का टैंशन, घर का भाड़ा चुकाने आदि जैसे आर्थिक दबावों का भी टैंशन रहता है. इसलिए कई युवा अब आजादी की अपनी उड़ान को कुछ समय के लिए पेरैंट्स के पास फिर गिरवी रखना पसंद कर रहे हैं, जब तक कि वे खुद को स्थापित न कर लें या अपने मातापिता के संरक्षण से बाहर आने के लिए पर्याप्त बचत न कर लें. इस में वही समस्याएं आ रही हैं जो हमारे यहां संयुक्त परिवारों में ह?ैं. अमेरिका से यह लौटना पत्नियों के मांबाप के पास भी काफी बड़ी संख्या में हो रहा है. मांबाप का अपने बच्चों पर किया गया खर्च इस परिस्थिति में शून्य नजर आता है.

बेरोजगारी के कारण

भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या रोजगार के अवसरों को सीमित कर रही है. इस के अलावा औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्रों की धीमी गति से कम लोगों को रोजगार मिल पाता है. ज्ञान और कौशल के बीच अंतर के कारण कई शिक्षित युवा नौकरी पाने में असमर्थ हैं. इस के अलावा औटोमेशन और तकनीकी उन्नति ने कई क्षेत्रों में मानव श्रम की आवश्यकता को कम कर दिया है.

ओपन आई के सीईओ सैम औल्टमैन और वालमार्ट के सीईओ डग मैकमिलन ने हाल ही में खुल कर कहा कि एआई से काम करने के तरीके बदलेंगे और बहुत सारी नौकरियां प्रभावित होंगी. उन का यह भी कहना है कि एआई 2030 तक लगभग 30 से 40 फीसदी टास्क को औटोमेट कर सकता है. इस तरह से इन पेशों से जुड़ी नौकरियों का प्रभावित होना तय है.

वयस्क बेरोजगार बच्चों का अपने पेरैंट्स के घर रहना परिवार में तनाव का एक बड़ा कारण हो सकता है क्योंकि आप के और बच्चे के बीच सोच व व्यवहार का बड़ा अंतर होता है. सो, वयस्क बेरोजगार बच्चों का आज अपने मातापिता के साथ रहना किसी चुनौती से कम नहीं है.

अकसर यह देखा गया है कि जहां मातापिता उम्र हो जाने के बाद भी पैसे कमाने में ज्यादा मेहनत करते हैं वहां उन के बड़े बच्चे भी रिलैक्स हो जाते हैं अपनी जिंदगी में, यानी कि कम काम करते हैं. हालांकि पैसे कमाने के लिए जो मेहनत बुजुर्ग मातापिता कर रहे हैं, वह वयस्क बच्चे कर सकते हैं लेकिन करते नहीं या करना नहीं चाहते.

ऐसा तब होता है जब पेरैंट्स बच्चों के लिए बहुत ज्यादा मेहनत कर के पैसे कमाते हैं. यहां बच्चा अपने पेरैंट्स पर धीरेधीरे आश्रित होना सीख जाता है जिस से फिर बाद में उसे घर के सुरक्षित माहौल से बाहर निकलने और खुद अपना रास्ता बनाने में कठिनाई होती है. इस ढर्रे पर चलते रहने से वयस्क बच्चा हमेशा के लिए किशोर बना रहता है और पेरैंट्स उस की जिम्मेदारी का बोझ ढोते रहते हैं.

ऐसे वयस्क बेरोजगार बच्चे मातापिता के लिए एक परेशानी बने रहते हैं. यह वित्तीय तनाव, रिश्तों में खटास और भावनात्मक बोझ का कारण बन जाता है क्योंकि मातापिता अपने बच्चों की जरूरतें पूरी करते हुए खुद को फंसा हुआ महसूस करते हैं.

Parenting Perspective (3)
मेहनत करने वाला युवा ही मातापिता का सच्चा इन्वैस्टमैंट साबित होता है. उस का हर छोटा प्रयास मातापिता के विश्वास को नया जीवन और भविष्य की जमीन को मजबूत करता है.

पेरैंट्स के पैसों पर पलने की आदत

औक्सफोर्ड जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई करने के बावजूद 41 साल का फैज सिद्दीकी पिछले कई सालों से बेरोजगार चल रहा है और अब उस ने अपने मांबाप पर ही मुकदमा ठोक दिया है और डिमांड की है कि उस के मातापिता उसे ताउम्र आर्थिक रूप से मदद करते रहें, क्योंकि वह बेरोजगार है. अदालतें किस कानून में उस की मदद करेंगी, यह अभी अस्पष्ट है क्योंकि हर देश के कुछ ऐसे अनजाने से कानून होते हैं जिन का उपयोग ऐसे युवा कर लेते हैं.

फैज की मां 69 साल की हैं और उस के पिता 71 साल के हैं. वे अपने बेटे को हर हफ्ते 400 पाउंड यानी लगभग 40 हजार रुपए देते हैं. यानी, एक महीने में लगभग डेढ़ लाख रुपए की राशि वे अपने वृद्ध मातापिता से लेता है. इस के अलावा उस के बिलों का भुगतान भी उस के पेरैंट्स ही करते हैं. अब उन के बीच तनाव और झगड़े के चलते उस के पेरैंट्स उसे मदद करने से मना कर रहे हैं तो उस ने अपने मातापिता पर मुकदमा कर दिया है.

फैज का कहना है कि वह इस आर्थिक सपोर्ट का हकदार है और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो यह उस के मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा. 29 साल की सुप्रिया, बदला हुआ नाम, इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के घर में बैठी हुई है और अविवाहित है. उस ने एकदो जगह प्राइवेट जौब किए पर उसे मजा नहीं आया. सुप्रिया के पिता सरकारी नौकरी में हैं और 2 साल बाद रिटायर्ड हो जाएंगे. वे इस बात से चिंतित हैं कि बेटी बहुत ज्यादा खर्चीली है. आएदिन शौपिंग करती रहती है, बाहर से सामान और्डर करती रहती है.

Parenting Perspective (4)
आज के युवा की चुनौतियां पहले की पीढ़ियों से अलग हैं,
इसलिए कई बार वे कोशिश करने के बावजूद आगे नहीं बढ़ पाते.

बेटी का क्रैडिट कार्ड का काफी कर्ज है, जिसे उन्हें ही चुकाना है. वे चाहते हैं कि रिटायरमैंट के पहले किसी तरह बेटी की शादी हो जाए. लेकिन सुप्रिया शादी के नाम से ही भड़क जाती है, कहती है कि इतनी अच्छी आराम की जिंदगी चल रही है तो क्या जरूरत है उसे शादी के झंझटों में फंसने की.

सुप्रिया के मातापिता की चिंता सिर्फ बेटी की शादी या उस के बेहिसाब खर्चे को ले कर ही नहीं है बल्कि उस का दोस्तों के साथ देररात तक बाहर रहने, सिगरेट पीने, देर से सोने और उठने से भी है. कुछ बोलने या समझने पर वह उलटे अपने मातापिता पर ही चढ़ बैठती है और उन से लड़नेझगड़ने लगती है. घर में क्लेश न हो, इसलिए वे चुप रह जाते हैं. ऐसा कब तक चलेगा, यह सोच कर वे तनाव में जी रहे हैं.

निठल्लापन बनती समस्या

31 साल के प्रीतेश को उस के मातापिता ने लाखों रुपए खर्च कर बाहर पढ़ने के लिए भेजा था लेकिन वह अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ कर वापस आ गया. वहां उसे घर जैसा खाना और आराम नहीं मिल रहा था. बाद में किसी तरह से उसे ग्रेजुएशन करवाया गया ताकि भविष्य में उसे ढंग की कोई नौकरी मिल सके लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि उसे तो आराम और बिना मेहनत की जिंदगी गुजारना पसंद है.

निठल्ला, नकारा प्रीतेश घर में अपने बड़े शादीशुदा भाईबहनों से लड़ता रहता है. आवारा दोस्तों के साथ घूमताफिरता है, शराब पीता है और कुछ बोलने पर घर में तोड़फोड़ करने लगता है. उसे आईफोन और बाइक चाहिए लेकिन बंधीबंधाई तनख्वाह में कहां उसे महंगा फोन और बाइक खरीद दें. प्रीतेश के मातापिता को कोई राह नहीं दिख रही है कि वे क्या करें.

ऐसा भी नहीं है कि युवा बच्चे घर पर रह कर, घर के कामों में या बाहर से सामान खरीद कर लाने या फिर किसी तरह की कोई आर्थिक मदद पेरैंट्स की करते होंगे. अगर ऐसा होता तो फिर वे अकेले रह सकते थे.

बोझ बनते बच्चे

युवा बेरोजगार बच्चों के महंगे खर्चे उठाने में मातापिता असमर्थ होते हैं. इस के चलते आएदिन उन के बीच झगड़े और क्लेश होते हैं. ऐसे में कहीं न कहीं युवा बेरोजगार बच्चे मातापिता को बोझ लगने लगते हैं.

एक अभिभावक का कहना है कि उन का 28 साल का बेरोजगार बेटा उन के साथ ही रहता है और वह आर्थिक रूप से उन पर निर्भर है. उसे कुछ बोल भी नहीं सकते, क्योंकि अपने स्तर पर वह मेहनत कर रहा है लेकिन जौब नहीं मिल रही, जिस से वह भी तनाव में है.

कई वयस्क बच्चों को अपने मातापिता के साथ रहना अच्छा लग सकता है लेकिन कई वयस्क बच्चों को मजबूरी में अपने मातापिता के साथ रहना पड़ता है लेकिन पेरैंट्स यह सोचते हैं कि उन का बच्चा सुखसुविधा के चलते घर नहीं छोड़ना चाहता है.

कई मातापिता वयस्क बेरोजगार बच्चों पर पैसा लगाना बरबादी समझते हैं लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि बच्चों में निवेश कर के वे अपने भविष्य में निवेश कर रहे हैं. युवा बच्चों में निवेश करना आर्थिक रूप से भी सार्थक हो सकता है.

19 साल की यामिनी एक ग्रामीण इलाके में अपने मातापिता और 2 छोटे भाईबहन के साथ रहती है. यामिनी के पिता डाक विभाग में बहुत छोटे पद पर काम करते हैं और उसी कमाई से उन का परिवार चलता है. यामिनी ने पिछले साल ही एक सरकारी स्कूल से अच्छे नंबरों से 12वीं की परीक्षा पास की है. अब आगे की पढ़ाई वह कालेज जा कर करना चाहती है. दूसरी लड़कियों की तरह उस का भी सपना कुछ बड़ा बनने का है लेकिन उस के मातापिता कहते हैं कि उन के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे उसे शहर भेज कर कालेज की पढ़ाई करवा सकें और अब वे उस की शादी के बारे में सोच रहे हैं.

यह ऐसा तर्क है जो ज्यादातर मातापिता बेटियों के लिए बोलते हैं कि ‘बस बहुत हो चुकी पढ़ाईलिखाई, अब कुछ घर के कामकाज भी सीख लो, दूसरे घर जाना है तुम्हें.’

फ्यूचर इन्वैस्टमैंट जैसे बच्चे

यह भी सच है कि कुछ मातापिता अपने युवा बच्चों को बोझ नहीं बल्कि फ्यूचर इन्वैस्टमैंट के तौर पर देखते हैं. वे उन्हें अपने कर्तव्य का हिस्सा मानते हैं, खासकर जब वे युवा बच्चों को सहारा दे रहे होते हैं. वे बेरोजगारी को एक अस्थायी दौर मानते हैं. वे यह समझते हैं कि अभी उन के बच्चे एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं और एक दिन सब ठीक हो जाएगा. सो, वे नौकरी की तलाश करने में उन की मदद करते हैं, साथ में उन्हें भावनात्मक सहारा भी देते हैं ताकि वे टूट कर बिखर न जाएं.

कैरियर का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं और समाज में ‘लोग क्या कहेंगे’ का भय आज के युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है. ऐसे में अगर पेरैंट्स उसे सहारा नहीं देंगे तो वे और बिखर जाएंगे.

प्यू रिसर्च के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जनवरी 2024 तक 18 से 24 वर्ष की आयु 57 फीसदी अमेरिकी बच्चे अपने मातापिता के साथ रह रहे थे, जो 1960 के दशक में दर्ज की गई न्यूनतम 26 फीसदी की तुलना में दोगुने से भी अधिक है. ऐसे कई कारण हैं जिन की वजह से युवा बच्चे अपने पेरैंट्स का घर छोड़ नहीं पाते या कुछ समय के लिए वापस लौट पाते हैं, हालांकि मुख्य कारण आर्थिक ही होता है.

द न्यूयौर्क टाइम्स के हवाले से दैनिक भास्कर में छपी एक खबर के मुताबिक, मनोवैज्ञानिक लौरेंस स्टीनबर्ग कहते हैं कि ‘30 साल की उम्र तक सैटल न होने वाले बच्चों के पेरैंट्स को लगता है कि उन के बच्चे आलसी और उन पर बोझ हैं.’ आज के मानकों के हिसाब से वे सही भी हैं. आजकल के पेरैंट्स जितना सोच पा रहे हैं, संभवतया बच्चे उस से कहीं ज्यादा सोचते हैं. मनोवैज्ञानिक ने यह

भी कहा कि युवा होते बच्चों से ज्यादा उलझने से बचना चाहिए.

मातापिता को यह बात समझनी चाहिए कि युवा बच्चे अपने पेरैंट्स पर बोझ नहीं बल्कि फ्यूचर इन्वैस्टमैंट हैं, जो वे प्यार, समर्थन और भविष्य में देखभाल के रूप में लौटाते हैं. उन का लालनपालन, शिक्षा और कौशल विकास में किया गया निवेश व्यक्ति और समाज दोनों के लिए आर्थिक व सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण है.

युवा बच्चों पर किया गया हर खर्च शिक्षादीक्षा के रूप में लौंग टर्म इन्वैस्टमैंट है क्योंकि पिता की मेहनत से कमाए पैसों का सही उपयोग कर के वे भविष्य में कुछ अच्छा करते हैं और आर्थिक रूप से अपने पेरैंट्स का सपोर्ट भी करते हैं.

वैसे, कुछ युवा बच्चे अपने मातापिता के त्याग, मेहनत और संघर्ष को नहीं समझते और उन पर आर्थिक दबाव डालते हैं, उन की ऊर्जा और संसाधनों को खर्च करवाते हैं और लौटा कर कुछ दे नहीं रहे हैं. ऐसे युवा बच्चे मातापिता को बोझ लग सकते हैं.

भविष्य का निवेश क्यों हैं युवा बच्चे?

बच्चों का उचित विकास उन्हें कुशल नागरिक बनाता है, जो भविष्य में समाज और परिवार में योगदान करते हैं. बच्चों पर किया गया हर खर्च, भविष्य में मातापिता के सपनों और मूल्यों में वृद्धि करवाते हैं, जो किसी भी इन्वैस्टमैंट से कहीं बड़ा रिटर्न है. यानी, युवा बच्चों पर किया गया निवेश केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संपूर्ण भविष्य निर्माण होता है.

Parenting Perspective (5)
मातापिता जब संतान को जन्म देते हैं, उसी दिन से उस की सेहत, शिक्षा और भविष्य में निवेश करना शुरू कर देते हैं, यह निवेश कोई सौदा नहीं भरोसा होता है कि उन का बच्चा बड़ा हो कर खुद अपनी और उन की जिम्मेदारियां उठाएगा.

पेरैंट्स को अपने बच्चों को केवल बोझ या निवेश मानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आज के समय में उन्हें परिवार की पार्टनरशिप के रूप में देखना चाहिए. मातापिता उन का बचपन संवारते हैं और युवा हो कर वही अपनी मेहनत, सफलता और जिम्मेदारी से परिवार को आगे बढ़ाते हैं. सो, युवा बच्चे बोझ नहीं, बल्कि भविष्य का निवेश हैं, बशर्ते उन्हें सही दिशा और सपोर्ट मिले.

आर्थिक दृष्टिकोण

आज बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, होस्टल, कैरियर ग्रूमिंग पर लाखों का खर्च आता है. इसे अगर ‘खर्च’ समझ जाए तो यह बोझ ही लगेगा लेकिन अगर इसे इन्वैस्टमैंट समझ जाए तो यह भविष्य में बच्चों की सफलता से कई गुना लौटा सकता है.

भावनात्मक दृष्टिकोण

जब बच्चे अपनी मेहनत से सफल होते हैं तब मातापिता को खुशी, गर्व और संतोष का अनुभव होता है और यह खुशी और संतोष किसी भी निवेश पर ब्याज से बड़ा होता है.  आज के समय में ज्यादातर युवा पढ़ाई और जौब के चलते विदेश चले जाते हैं और वहीं बस जाते हैं ऐसे में मातापिता को बच्चों को इन्वैस्टमैंट नहीं बल्कि खुद में आत्मनिर्भर बनने का अवसर मानना चाहिए.

भारतीय समाज में युवा बच्चों को परिवार का सुरक्षा कवच और बुढ़ापे का सहारा माना जाता है लेकिन बदलते समय के साथ ‘न्यूक्लियर फैमिली’ और ‘सैल्फ डिपैंडैंसी’ की सोच के कारण यह धारणा बदल रही है. कई मातापिता अब युवा बच्चों को ‘इमोशनल जौय’ मानते हैं, न कि बुढ़ापे की गारंटी.

मिडिल क्लास के बच्चों पर कब और कितना अनुमानित खर्च होता है?

आजकल बहुत से युगल जोड़े बच्चे पैदा नहीं करना चाह रहे क्योंकि उन्हें लगता है कि वे आर्थिक बोझ नहीं उठा पाएंगे. मोटेतौर पर बच्चों को पालने व बड़ा करने पर खर्च निम्न प्रकार के हो सकते हैं. हर जीवनशैली और पारिवारिक आय पर ये खर्च कमज्यादा हो सकते हैं. यह अनुमान मिडिल क्लास को ले कर लगाया गया है.

जन्म से पहले : गर्भावस्था के दौरान मां को कईर् बार डाक्टर के पास या अस्पताल जाना होता है. सब से बड़ा खर्च होता है प्रैग्नैंसी के दौरान दफ्तर से छुट्टी का और सहयोगियों से पिछड़ जाना.

डाक्टरों की फीस : 10 विजिट : 15,000 से 25,000 रुपए.

अल्ट्रासाउंड 2 बार : 5,000 रुपए.

एस्क्ट्रा दवाएं : 5,000 रुपए.

बेबीरूम बनवाना : 1 से 5 लाख रुपए तक जीवनशैली के अनुसार.

कार्यालय से अवकाश : कम से कम 2 माह का वेतन : 50 हजार से 3 लाख रुपए.

शावर पर खर्च : 50 हजार से 2 लाख रुपए.

जन्म के समय : अस्पताल में डिलीवरी : 1 से 4 लाख रुपए.

बेबी के कपड़े, डायपर-बेड, दवाएं 1 से 2 लाख रुपए.

वैक्सीनेशन : 20 हजार रुपए.

बेबी पार्टी : 1 लाख से 3 लाख रुपए.

एक्स्ट्रा हैल्प : 5 हजार से 20 हजार रुपए प्रतिमाह.

बेबी फूड : 50 हजार रुपए.

एक साल से प्री स्कूल तक

बेबी फूड : 20 हजार से 50 हजार रुपए.

मैटरनिटी लीव : 4 लाख से 10 लाख रुपए.

प्री स्कूल से रैगुलर स्कूल तक : (3 साल)

स्कूल फीस : 75 हजार से 3 लाख रुपए.

स्कूल बस/रिकशा : 50 हजार से 1 लाख रुपए.

कपड़े 25 हजार से 2 लाख रुपए.

घूमने जाने पर एक्स्ट्रा किराया : 15 हजार से 2 लाख रुपए.

रैगुलर स्कूल एडमिशन : प्राइमरी तक (5 साल)

फौर्म फीस (10 स्कूलों में) : 10 हजार रुपए.

एडमिशन फीस : 50 हजार से 3 लाख रुपए.

स्कूल फीस : 50 हजार से 3 लाख रुपए.

ड्रैस/किताबें/स्टेशनरी : 20 हजार से 30 हजार रुपए. पौकेटमनी : 50 हजार रुपए.

मिडिल से सैकंडरी तक : (7 साल यानी 84 माह)

स्कूल फीस (इंग्लिश मीडियम) : 3 लाख से 25 लाख रुपए.

स्कूल बस : 1.5 लाख से 5 लाख रुपए.

किताबें : 1 लाख रुपए.

स्टेशनरी/प्रोजैक्ट : 2 लाख रुपए.

स्कूल ट्रिप : 2 लाख रुपए.

पौकेटमनी : 1 लाख से 5 लाख रुपए.

सैकंडरी के बाद जो खर्च होता है उस का आकलन करना कठिन है क्योंकि वह लाखों में हर घर की हैसियत के अनुसार होता है.

पेरैंट्स की गलतियों के कारण बच्चों पर किया गया इन्वैस्टमैंट जाता है बेकार

इस लेख में कहा गया है कि युवाओं पर किया गया खर्च इन्वैस्टमैंट है लेकिन यह भी देखने में आ रहा है कि पेरैंट्स की खुद की गलतियों के कारण यह बेकार जा रहा है. कुछ संकेत देखिए जिन में इन्वैस्टमैंट ही गलत होता है.

जब स्कूली कक्षाओं में पिछड़ने वाले बच्चों के पेरैंट्स उन पर ट्यूशनों में इसलिए खर्च करना शुरू कर देते हैं कि इस से टीचर लालच में आ कर ज्यादा अंक दे देगा. ऐसे बच्चे जिम्मेदारी और नैतिकता दोनों का पाठ भूल जाते हैं.

जब पेरैंट्स पूजापाठी ज्यादा बने रहते हैं और बच्चों के सबकौंशियस अवचेतन मन में बैठा देते हैं कि भविष्य तो पिछले जन्मों के कर्मों का फल है या पूजापाठ का. ऐसे बच्चों पर किया गया खर्च बेकार ही जाता है.

जब पेरैंट्स उन्हें सिखाने, समझने या प्रकृति का आनंद लेने वाली यात्राओं की जगह तीर्थयात्राओं में धकेल देते हैं जहां से युवा होते बच्चे यह सीख कर आते हैं कि सफलता कर्मठता से नहीं बल्कि पूजापाठ से आती है.

जब पेरैंट्स एजुकेशन लोन ले कर युवाओं को वह पढ़ाई करवाने को भेज देते हैं जिस के वे योग्य नहीं हैं तो वे उन के भविष्य को काला कर देते हैं और इन्वैस्टमैंट को डुबो देते हैं.

जब बच्चों को मातापिता का आपसी विवाद, लड़ाईझगड़ा, तलाक देखना पड़े या मातापिता का अपने भाईबहनों से विवाद की बात डाइनिंग टेबल और ड्राइंगरूम में सुननी पड़े तो इन्वैस्टमैंट के बावजूद युवा विवादों में घिर जाते हैं.

जब पेरैंट्स उन बच्चों, जिन पर भारी इन्वैस्टमैंट किया गया है, के जीवनसाथी या जीवनशैली पर अपनी इच्छा, अपनी संकुचित रीतिरिवाजों वाली सोच थोपने लगते हैं तो परिणाम शून्य हो जाता है.

जब पेरैंट्स बच्चों को हमेशा बच्चा मानते हैं और उन्हें खुद अपने काम करने नहीं देते या उन के द्वारा किए गए काम में दोष निकालते हैं तो इन्वैस्टमैंट का कोई मतलब नहीं रह जाता.

जब पेरैंट्स केवल रैट रेस में बच्चों को अच्छे कपड़े दिलाते और लवप्यार में उन पर पैसा लुटाने में हिचकते नहीं हैं.

जब पेरैंट्स खुद टीवी और मोबाइल पर 24 घंटे लगे रहते हैं और बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे पढ़ें.

जब पेरैंट्स इन्वैस्टमैंट तो करते हैं पर भाइयों या भाईबहनों में स्पष्ट भेदभाव करने लगते हैं तो इन्वैस्टमैंट का लाभ नहीं मिलता. Parenting Perspective

Social Story in Hindi : बगावत एक अफसर की – जानिए आखिर क्या है पूरा माजरा

Social Story in Hindi : जनाब, आजकल हमारा मूड बड़ा उखड़ाउखड़ा रहता है. अब माना कि हमारी जरा सी तोंद निकल आई है या जरा पान के शौक में दीवार पर भूल से थूक ही दिया हो, तब भी किसी को क्या हक कि हमें पिछड़ा, 19वीं सदी का सरकारी बाबू कह कर हमारी तौहीन कर दे. खामखां हमारी इमेज तोंदवाले, मुच्छड़, पान से रंगे दांतों वाले, घड़ीघड़ी दांत खुरचते, खींसें निपोर कर हर काम में दांत से जीभ काटते किसी ढपोरशंखी सी बना दी गई है. भई, यह तो सरासर गलतबयानी है. अब हम अपने कामों या नाकामियों में काफी मौडर्न हो गए हैं, अपनी फितरत हम ने बड़ी स्मार्ट बना ली है और ढर्रों में भी हम ने मौडर्न जान फूंक दी है.

अब अमेरिका वाले डोनाल्ड ट्रंप को ही ले लीजिए, कुएं के अंदर का ट्रंप सूटबूट में कितना रोबीला गबरू जवान लगता है. देख कर कौन कहे कि साहब, जाति, प्रजाति व धर्म को ले कर जनाब इतने कूपमंडूक होंगे. उन्हें सिर्फ गोरे नजर आते हैं. भूरे, पीले, काले, दाढ़ी वाले, टोपी वाले दुश्मन हैं उन के लिए. फिर भी क्या अदा है, क्या रुतबा है, क्या स्टाइल है. स्टाइल और अदा के जलवे ने उन की ढपोरशंखी चुल्लूवाली मानसिकता को कैसा नायाब हीरो वाला ट्रंप सूट पहना कर खड़ा कर दिया है कि दुनिया को अच्छाखासा कंफ्यूजन हो रहा है कि महारथी की फितरत का विरोध करें या इंतजार ही कर लें कि और किनकिन बेहतरीन तरीकों से वे पिछड़ेपन को पेश कर सकते हैं.

भई, वे ठहरे अमेरिका वाले टं्रप, तो हम ठहरे भारत सरकार के सरकारी अफसर मुलाजिम, क्या हम कम हैं. सरकार यों ही इतना हमें नहीं देती. गाड़ी देती है, बंगला देती है, अर्दलीचपरासी देती है. और तो और, काम लेने को तरहतरह के नियमों के चाबुक भी देती है.

अब यह तो कोई बात नहीं हुई कि इतना ठाटबाट पा कर भी हम जरा अपने कौलर में ठसक न रखें. फिर अब यह न पूछ बैठना कि कोई कितनी पढ़ाई कर के सरकारी अफसर बने या कौन कितना खिलापिला कर रिश्तोंनातों की सुरंग से अंदर घुस आए-बराबरी की बात है. कोई कैसे भी घुसा, जब सिंहासन मिल गया तो योग्यता क्या माने रखेगी? सब बराबर. समान अधिकार. हां, गलती से भी अब कर्तव्य की बात न छेड़ना, मिस्टर.

हम कोई कम नहीं हैं काम करने में या कहिए कि करवाने में. काम लेने का हुनर न होता तो इतना बड़ा सिस्टम चलता कैसे. खुद ही देख लो, किस जमाने से इतना बड़ा सिस्टम इतना सिस्टमैटिक चल रहा है. सरकारें  बदल जाती हैं मगर सिस्टम के अंदर की दीमक ठीक अपने सिस्टम से उसी तरह काम पे लगी हैं.

लोग कहते हैं काम नहीं होता? कैसे काम नहीं होता. अगर हम अफसर हैं तो पूछो जरा ड्राइवर से- नहीं जाता वह बीवी की शौपिंग से ले कर बच्चे के स्कूल तक. पूछो अर्दली से-हुक्म की तामील न हो तो उस की क्या लानतमलामत होती है. चाय दे, पानी दे, ये ला, वो ला, दुकान जा, बैंक जा, दौड़दौड़दौड़, क्या दौड़ लगवाता हूं.

पूछो जरा चपरासी से, घर पर क्याक्या नहीं करता. घास छीलने से ले कर जूते पौलिश तक सबकुछ. हम तो क्या, हमारी बीवी और उस के रिश्तेदारों तक के हुक्म बजाने में वह उस्ताद हो गया है और वह भी हमारे दिए स्मार्टफोन के स्मार्ट तरीकों के सहारे. क्यों, कह लो हमें पिछड़ा, नकारा. हो गई न गुम सिट्टीपिट्टी.

अफसर ही क्यों, अगर हुए हमारे फाइलों वाले बाबू, तो जनाब अब भूल जाओ. पुरानी फाइलों वाले बाबू अब कहां. अब हम कागज की फाइल नहीं टरकाते साहब, अब तो कंप्यूटर पर फोल्डर और फाइल खिसकाते हैं. खींसें निपोर कर हाथ नहीं बढ़ाते. काम करवाना है तो दे दो चवन्नी.

अब हम इतने स्मार्ट तो हो ही गए हैं कि आप की स्मार्टनैस का हम बखूबी अंदाजा लगा सकें. काम करवाने के बहाने पैसे दिए नहीं, कि स्ंिटग ले कर हाजिर. ये नैट बैंकिंग और स्मार्टफोन किस दिन काम आएंगे. गहरे पानी में उतरने की कला के हम फनकार हुए हैं वर्षों की साधना के बाद. यों ही न समझना हमें. मोबाइल में उंगली चलाई कि सुदामा समझ गया कि मौडर्न किशन है. आंखों का पानी उतार कर पैर नहीं, इज्जत धो देगा, हे…हे!

अपना यह तरीका भी अब रहा नहीं कि ‘मोहन बाबू, इन की फाइल देख लीजिएगा’ कह कर आसामी को अगले टेबल तक सरकाएं और मोहन बाबू के हाथों की खुजली उन्हें जब तक अगली तारीख तक सरकाए, आसामी अपने गले चढ़ बैठे. अब तो उन की अर्जी को सीधे कंप्यूटर के फोल्डरों के तहखाने में डाल मंदमंद मुसकराते कह लो, ‘जी, जी, आप का केस प्रोसैस में डाल दिया है,’ हाथ मिलाया, भेदभरी निगाहें मिलाईं. अब घूमते रहो जब तक नैट ट्रांजैक्शन का फायदा हमें भी न मिल जाता. सारा लेनदेन तो कैशलैस करना जानते हैं. बीवी के भाई के अकाउंट में भी पैसा आता है और उस के भाई के भी. 5 प्रतिशत उस का 95 प्रतिशत हमारा.

और तो और, किसी डिपार्टमैंट में काम निकलवाना है, अपनी सैटिंग वहां भी मौडर्न तरीके से फिक्स रहती है. संबंधित विभाग में बैठे व्यक्ति की पूरी कुंडली निकलवाता हूं ठीक मंदिरों के तकनीकी जानकार पंडों की तरह. किस का कौन सा भाई किस के दामाद का कौन सा भतीजा है ताकि कब किस के खाला के भतीजे के चाचा का काम मैं ने या मेरे विभाग ने किया था, वह पता लगे. फिर इस बदौलत मैं उस से काम निकलवाने का हक बीपीएल कार्डधारक के हक की तरह अनायास ही पा सकूं.

अब यह न सोचिएगा कि ये सब फलांफलां जगह पर चप्पल घिसते हुए फलांफलां आदमी से पूछपूछ कर मैं ने जानकारी जुटाई. नहीं जी, अब हम इतने पिछड़े नहीं रहे, अब तो हम मौडर्न तरीके से पिछड़ रहे हैं. सौ तरीके के ऐप्स डाउनलोड कर रखें हैं, हजार तरह के कौन्टैक्ट बना रखे हैं. काम से बचना हो, जवाब न देना हो, काम का झांसा दे कर फर्जीवाड़ा करना हो, सरकारी पैसे की हेराफेरी करनी हो.

भई, अब हमें पान की दुकान पर मुवक्किल को आते देख मुंह घुमा कर पीक थूकने के बहाने पहचान छिपा कर भागने की जरूरत नहीं पड़ती. सीधी उंगलियों से टेढ़ा काम हम आसानी से निबटा जाते हैं. मौडर्न तरीका, मौडर्न डिवाइस. नंबर ब्लौक, नौट सीन – हो गया काम तमाम. ढूंढ़ते रह जाओगे, समझे क्या… Social Story in Hindi

Family Story in Hindi : ओल्ड इज गोल्ड – कैसे निकला आलोक और रश्मि की समस्या का समाधान ?

Family Story in Hindi :

‘‘आज का अखबार कहां है?’’ किशोरीलाल ने पत्नी रमा से पूछा.

‘‘अभी देती हूं.’’

‘‘अरे, आज तो इतवार है न, वो साहित्य वाला पेज कहां है?’’

‘‘ये रहा,’’ रमा ने सोफे के नीचे से मुड़ातुड़ा सा अखबार निकाल कर किशोरीलाल की तरफ बढ़ाया.

‘‘इसे तुम ने छिपा कर क्यों रखा था?’’

‘‘अरे, इस में आज एक कहानी आई है, बड़ी अजीब सी. कहीं हमारे बच्चे न पढ़ लें, इसलिए छिपा लिया था. लगता है आजकल के लेखक जरा ज्यादा ही आगे की सोचने लगे हैं.’’

‘‘अच्छा, ऐसा क्या लिख दिया है लेखक ने जो इतना कोस रही हो नए लेखकों को?’’ किशोरीलाल की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.

‘‘लिखा है कि अगर मांबाप सैरसपाटे में बाधा बनें तो उन्हें अस्पताल में भरती करवा देना चाहिए चैकअप के बहाने.’’

‘‘अच्छा, जरा देखूं तो,’’ कहते हुए वे अखबार के संडे स्पैशल पेज में प्रकाशित युवा लेखिका की कहानी ‘स्थायी समाधान’ पढ़ने लगे.

कहानी के अनुसार नायक अपने बुजुर्ग पिता को ले कर परेशान था कि उन की सप्ताहभर की ऐसी व्यवस्था कहां की जाए जहां उन्हें खानेपीने की कोई दिक्कत न हो और उन के स्वास्थ्य का भी पूरा खयाल रखा जा सके क्योंकि उसे अपने परिवार सहित अपनी ससुराल में होने वाली शादी में जाना है.

तब उस का दोस्त उसे समाधान बताता है कि वह अपने पिता को शहर में नए खुले होटल जैसे अस्पताल में चैकअप के बहाने भरती करवा दे क्योंकि  वहां भरती होने वालों की सारी जिम्मेदारी डाक्टरों और वहां के स्टाफ की होती है, खानेपीने से ले कर जांच और रिपोर्ट्स तक की. नायक को दोस्त का यह सुझाव बहुत पसंद आता है.

एक ही बार में किशोरीलाल पूरी कहानी पढ़ गए. रमा इस दौरान उन के चेहरे पर आतेजाते भावों को पढ़ रही थीं. चेहरे पर प्रशंसा के भावों के साथ जब उन्होंने अखबार समेटा तो रमा को आश्चर्य हुआ.

‘‘बिलकुल सही और व्यावहारिक समाधान सुझाया है लेखिका ने,’’ किशोरीलाल ने कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया दी.

‘‘क्या खाक सही सुझाया है? अरे, ऐसे भी कोई करता है अपने वृद्ध पिता के साथ?’’

‘‘तो तुम ही बताओ, ऐसे में उसे क्या करना चाहिए था?’’ रमा को तुरंत कोई जवाब नहीं सूझा तो वे ही बोले, ‘‘अच्छा, तुम जाओ एक कप चाय और पिला दो, आज इतवार है.’’

रिटायर्ड किशोरीलाल अपने परिवार के साथ एक सुखी जीवन जी रहे हैं. परिवार में पत्नी के अलावा बेटा आलोक और बहू रश्मि तथा किशोर पोती आयुषी है. बेटाबहू दोनों ही नौकरीपेशा हैं और पोती अभीअभी कालेज में गई है.

नौकरीपेशा होने के बावजूद बहू उन का बहुत खयाल रखती है और अपने सासससुर को पूरा मानसम्मान देती है. उन्हें भी बहू से कोई शिकायत नहीं है. पत्नी रमा रसोई में बहू की हर संभव सहायता करती हैं. दिन में उन्हें और पोती को गरमागरम खाना परोसती हैं और शाम को बहू के घर लौटने से पहले रात के खाने की काफीकुछ तैयारी कर के रखती हैं.

वे खुद भी बाहर के छोटेमोटे काम जैसे फलसब्जीदूध लाना, पानीबिजली के बिल भरवाना आदि कर देते हैं. कुल मिला कर संतुष्ट हैं अपने पारिवारिक जीवन से.

किशोरीलाल को साहित्य से बड़ा प्रेम है. रोज 2 घंटे नियम से अच्छी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ना उन की दिनचर्या में शामिल है. रविवार को कालेज, औफिस में छुट्टी होने के कारण घर में सब देर तक सोते हैं, इसलिए किशोरीलाल और रमा आराम से बाहर बालकनी में बैठ कर सुबह की ताजा हवा का आनंद लेते हुए देर तक अखबार पढ़ते हैं, समाचारों पर चर्चा करते हैं और चाय की चुस्कियां लेते हैं.

कभीकभी किसी न्यूज को ले कर दोनों के विचार नहीं मिलते तो यह चर्चा बहस में तबदील हो जाती है. तब किशोरीलाल को ही हथियार डालने पड़ते हैं पत्नी के आगे.

रमा चाय बनाने जा रही थीं कि बेटे ने आवाज लगाई, ‘‘मां, चाय हमारे लिए भी बना लेना.’’

बहू भी उठ कर आ गई, सब गपशप करते हुए चाय पी रहे थे. मगर रमा अपने बेटेबहू का चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थीं. वे पढ़ना चाह रही थीं उस चेहरे को, जो इस चेहरे के पीछे छिपा था. मगर सफल नहीं हो सकीं क्योंकि उन्हें वहां छलकपट जैसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया.

‘‘दादी, पता है, इस साल हम शिमला घूमने जाएंगे,’’ आयुषी ने दादी की गोद में सिर रखते हुए बताया.

‘‘अच्छा, लेकिन हमें तो किसी ने बताया ही नहीं.’’

‘‘अरे, अभी फाइनल कहां हुआ है? वो मम्मी की सहेली हैं न संगीता आंटी, वो जा रही हैं अपने परिवार के साथ. उन्होंने ही मम्मी को भी साथ चलने के लिए कहा है.’’

‘‘फिर, क्या कहा तेरी मम्मी ने?’’ रमा के दिमाग में फिर से सुबह वाली कहानी घूम गई.

‘‘कुछ नहीं, सोच कर बताएंगी, ऐसा कहा. दादी, प्लीज, हम जाएं क्या?’’ आयुषी ने उन के गले में बांहें डालते हुए कहा.

‘‘मैं ने कब मना किया?’’

‘‘वो मम्मी ने तो हां कर दी थी मगर पापा कह रहे थे कि आप लोगों का ध्यान कौन रखेगा. आप को अकेले छोड़ कर कैसे जा सकते हैं.’’

तभी फोन की घंटी बजी और आयुषी बात अधूरी ही छोड़ कर फोन अटैंड करनी चली गई. रमा को बेटे पर प्यार उमड़ आया, सोच कर अच्छा लगा कि उन का बेटा कहानी वाले बेटे की तरह नहीं है.

कई दिन हो गए मगर घर में फिर ऐसी कोई चर्चा न सुन कर उन्हें लगा कि शायद बात ठंडे बस्ते में चली गई है. मगर एक रात सोने से पहले किशोरीलाल ने फिर जैसे सांप को पिटारे से बाहर निकाल दिया.

‘‘बच्चे शिमला घूमने जाना चाहते हैं,’’ उन्होंने पत्नी से कहा.

‘‘तो, परेशानी क्या है?’’

‘‘वो हमें ले कर चिंतित हैं कि हमारा खयाल कौन रखेगा?’’

‘‘हमें क्या हुआ है? अच्छेभले तो हैं. हम अपना खयाल खुद रख सकते हैं.’’

‘‘सो तो है मगर कई बार तुम्हें अचानक अस्थमा का दौरा पड़ जाता है, उसी की फिक्र है उन्हें. ऐसे में मैं अकेले कैसे संभाल पाऊंगा.’’

‘‘इतनी ही फिक्र है तो न जाएं, कोईर् जरूरी है क्या शिमला घूमना.’’

‘‘कैसी बातें करती हो? यह कोई हल नहीं है समस्या का. भूल गईं, हम दोनों भी कितना घूमते थे. आलोक को कहां ले जाते थे हर जगह, मांबाबूजी के पास ही छोड़ जाते थे अकसर. अब इन का भी तो मन करता होगा अकेले कहीं कुछ दिन साथ बिताने का.’’

‘‘सुनो, एक काम करते हैं. कुछ दिनों के लिए तुम्हारी बहन के यहां चलते हैं. कईर् बार बुला चुकी हैं वो. इस बहाने हमारा भी कुछ चेंज हो जाएगा,’’ किशोरीलाल ने समस्या के समाधान की दिशा में सोचते हुए सुझाव दिया.

‘‘नहीं, इस उम्र में मुझे किसी के भी घर जाना पसंद नहीं.’’

‘‘वो तुम्हारी अपनी बहन है.’’

‘‘फिर भी, हर घर के अपने नियमकायदे होते हैं और वहां रहने वालों को उन का पालन करना ही होता है. सबकुछ उन्हीं के हिसाब से करो, बंध जाते हैं कहीं भी जा कर. अपना घर अपना ही होता है. जहां चाहो छींको, जहां मरजी खांसो. जब चाहो सोओ, जब मन करे उठो,’’ रमा ने पति का प्रस्ताव सिरे से नकार दिया.

किशोरीलाल अपनी जवानी के दिन याद करने लगे. हर साल गरमी में उन के 3-4 दोस्त परिवार सहित हिल स्टेशन पर घूमने जाने का प्रोग्राम बना लेते थे. आलोक तब छोटा था. वे उसे कभी उस के दादादादी और कभी नानानानी के पास छोड़ कर जाते थे क्योंकि छोटे बच्चे पहाड़ों पर पैदल नहीं चल सकते और उन्हें गोद में ले कर वे खुद नहीं चल सकते.

ऐसे में मातापिता और बच्चे दोनों ही मौजमस्ती नहीं कर पाते. साथ ही, बच्चों के बीमार होने का भी डर रहता था. अपनी समस्या का उन्हें यही सटीक समाधान सूझता था कि आलोक को दादी या नानी के पास छोड़ दिया जाए. रमा भी शायद यही सबकुछ सोच रही थीं.

‘‘आलोक, तुम लोगों का क्या प्रोग्राम है शिमला का?’’ रमा ने पूछा तो आलोक और रश्मि चौंक कर एकदूसरे की तरफ देखने लगे. किशोरीलाल अखबार पढ़तेपढ़ते मन ही मन मुसकरा दिए.

‘‘वो शायद कैंसिल करना पड़ेगा,’’ आलोक ने रश्मि की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’

‘‘आप दोनों अकेले रह जाएंगे और आयुषी के कालेज की तरफ से भी इस बार समरकैंप में बच्चों को शिमला ही ले जा रहे हैं ट्रैकिंग के लिए, तो वह भी हमारे साथ नहीं जाएगी. फिर हम दोनों अकेले जा कर क्या करेंगे.’’

‘‘अरे, यह तो और भी अच्छा हुआ, कहते हैं न कि किसी काम को करने की दिशा में अगर सोचने लगो तो रास्ता अपनेआप नजर आने लगता है.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि अगर आयुषी तुम्हारे साथ नहीं जा रही तो हम तीनों यहां आराम से रहेंगे. घर मैं संभाल लूंगी और बाहर तुम्हारे पापा, और अगर हमारे बूते से बाहर का कुछ हुआ, तो ये हमारी पोती है न, नई पौध, जरूरत पड़ने पर यह पीढ़ी सब संभाल लेती है-घर भी और बाहर भी. और जब आयुषी समरकैंप में जाएगी तब तक तुम दोनों आ ही जाओगे.’’

‘‘अरे हां, एक रास्ता यह भी तो है. हमारे दिमाग के घोड़े तो यहां तक दौड़े ही नहीं,’’ आलोक ने खुश होते हुए कहा.

‘‘इसीलिए तो कहते हैं ओल्ड इज गोल्ड,’’ रमा ने कनखियों से अपने पति की तरफ देखते हुए कहा तो घर में एक सम्मिलित हंसी गूंज उठी. Family Story in Hindi

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