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आईएएस में खास को चुनौती देते आम

UPSC : पिछले कुछ सालों की तरह इस साल भी यूपीएससी की परीक्षा में कुछ ऐसे युवा सिलैक्ट हुए हैं जिन की कामयाबी को महज प्रेरणादायक कहानी करार देते एक दायरे में समेटने की कोशिश की जा रही है. इन के चयन पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखा गया और न्यूज़ चैनल्स पर इन की कहानियां इन सुर्ख़ियों के साथ परोसी गईं कि किसान, चौकीदार और मजदूर परिवारों के बच्चे अभावों को मात दे कर अफसर बने.

जबकि यह दायरा बहुत बड़ा और अहम है. यह गरीबी और अभावों का दायरा है जिस के नीचे देश की कोई 80 फीसदी आबादी रहती है. गरीबी, धर्म के मुताबिक, भाग्य की देन है जिस का संबंध पूर्वजन्म में किए गए कर्मों, जो जाहिर है बुरे ही होते हैं, से है. अगलापिछला जन्म कुछ होता नहीं, इन युवाओं ने यह तो इसी जन्म में साबित कर दिया है कि मेहनत और ईमानदारी के साथसाथ शिक्षा से भाग्य न केवल बदला जा सकता है बल्कि बनाया भी जा सकता है. यूपीएससी के कड़े इम्तिहान में चुना जाना कोई हंसीखेल नहीं है जिस में आईएएस बन जाने का सपना लिए देशभर से औसतन 10 लाख उम्मीदवार हर साल शामिल होते हैं. लेकिन उन में से चुने महज 800 से 900 तक ही जाते हैं.

यही 800-900 स्टीलफ्रेम के ख़िताब से नवाजे जाते हैं जो देश की दशा और दिशा तय करते हैं. इस साल इस परीक्षा में 13.45 लाख उम्मीदवारों ने फौर्म भरे थे जिन में से चुने महज 958 गए. यानी, चुने जाने की दर .1 फीसदी से भी कम होती है.
पहले यह हक सिर्फ एलीट क्लास के युवाओं को हुआ करता था जो कमोबेश अब भी बरक़रार है लेकिन अब यह दबदबा टूटता सा नजर आ रहा है क्योंकि उस तबके के युवा भी आईएएस बनने लगे हैं जिन्हें यह ख्वाव देखने का भी हक नहीं था. सरकारी नौकरियों का आकर्षण कभी किसी सुबूत को मुहताज नहीं रहा और वह नौकरी अगर आईएस की हो तो बात सोने पे सुहागा वाली हो जाती है. इस में खासा पैसा और इज्जत है, स्थायित्व है, रसूख है, रुतबा है, अनापशनाप सहूलियतें हैं और बेशुमार अधिकार भी हैं.

ये रहे सुर्ख़ियों में
क्यों हर युवा का पहला सपना आईएएस बनने का होता है, इस का जवाब जानने से पहले इस साल सिलैक्ट हुए कुछ ऐसे युवाओं की जिंदगी पर नजर डालें जिन्होंने एलीट क्लास को चुनौती देने का रिवाज बरक़रार रखते यह मैसेज देने में भी कामयाबी हासिल कर ली है कि यह नौकरी अब किसी की बपौती नहीं रह गई है.

इस लिस्ट में शुमार नामों में एक अहम नाम राजस्थान के जोधपुर के भोपालगढ़ कसबे की अनीता देवड़ा का है जिस ने 644 बी रैंक हासिल की है. अनीता के पिता श्यामलाल देवड़ा पेशे से ऐसे किसान हैं जिन के गुजारे का जरिया थोड़ीमोड़ी जमीन के साथ मजदूरी भी होती है. उस की मां भी खेतिहर मजदूर हैं. अनीता की कामयाबी जिन कई मायनों में अहम है उन में से पहली यह है कि राजस्थान में लड़कियों को दसवींबारहवीं के बाद आगे पढ़ाने से परहेज किया जाता है. देहाती इलाकों में तो उन के जवान होते ही मांबाप शादी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं.

यूपीएससी की पढ़ाई कठिन होने के साथसाथ महंगी भी है जिस में बिना कोचिंग के बिरले ही सफल हो पाते हैं. इस बात का एहसास खासतौर से अनीता की मां को था, इसलिए उन्होंने एकएक पैसा जोड़ कर बेटी को दिल्ली कोचिंग के लिए भेजा. बहुत कम आमदनी वाले देवड़ा दंपती के लिए यह खर्च उठा पाना जोखिमभरा और निहायत ही मुश्किल काम था. लेकिन उन्होंने इसे किया और अनीता ने भी उन्हें निराश नहीं किया जिस ने 12वीं में ब्लौक लैवल पर टौप किया था. गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गई जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी से उस ने एमएससी की डिग्री ली.

अनीता की कामयाबी इस लिहाज से भी अहम है कि उस ने ओरल इंटरव्यू यानी पर्सनैलिटी टैस्ट में सब से ज्यादा नंबर 275 में से 220 हासिल किए जो लिखित में सब से ज्यादा नंबर और पहली रैंक हासिल करने वाले राजस्थान के ही रावतभाटा के डाक्टर अनुज भाटी से 16 नंबर ज्यादा हैं. अनीता के मुकाबले अनुज संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं.

उत्तर प्रदेश के संभल के इंद्रमोहन डुडेजा चंदौसी के एस एम कालेज गेट के सामने छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन की आमदनी और स्टेटस क्या होंगे. लेकिन अब उन के बेटे देव डुडेजा ने यूपीएससी के इम्तिहान में 327वीं रैंक हासिल कर एक झटके में सबकुछ बदल दिया है. अनीता की तरह देव ने भी दिल्ली जा कर पोस्ट ग्रेजुएशन किया और कोचिंग ली. हालांकि कामयाबी उसे भी तीसरी बार में मिली लेकिन उस ने इस मिथक को तोड़ दिया कि आईएएस बनने के लिए बहुत सी सहूलियतों, पैसों के ढेर और खासे स्थापित फैमिली बैकग्राउंड की जरूरत होती है.

इसी कड़ी में एक और उल्लेखनीय नाम उत्तर प्रदेश के ही शामली जिले के कांधला कसबे की आस्था जैन का है जिस ने इस बार 9वीं रैंक हासिल की है. आस्था इस से पहले 2024 में आईपीएस में सिलैक्ट हुई थी और हैदराबाद में ट्रेनिंग ले रही थी. इसी दौरान वह दोबारा यूपीएससी के इम्तिहान में शामिल हुई थी. आस्था के लिए भी इस से पहले सबकुछ आसान नहीं था लेकिन उस के हौसले बुलंद थे और दिलोदिमाग में कुछ कर गुजरने का जज्बा था. उस के पिता अजय जैन मामूली परचून की दुकान चलाते हैं.

आस्था ने 2019 के सीबीएसई के इंटरमीडिएट इम्तिहान में देशभर में चौथी रैंक हासिल की थी. इस के बाद उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अनीता और देव की तरह उस ने भी दिल्ली जा कर आगे की पढ़ाई की और कोचिंग ली. हालांकि इन दोनों के मुकाबले उस की आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर थी लेकिन इतनी नहीं कि वह मनपसंद खा और पहन सके, अपने शौक पूरे कर सके और इफरात से स्टडी मैटीरियल खरीद सके क्योंकि उसे एहसास था कि परिवार में 3 भाईबहन और भी हैं और पिता की सीमित आय में जैसेतैसे गुजारा हो पाता है. इस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस बार उस ने ईडब्ल्यूएस कोटे से परीक्षा दी थी जिसे ले कर विवाद भी उठ खड़े हुए.

उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर जिले से इस बार 2 युवाओं ने यूपीएससी क्रैक किया है. लेकिन दोनों की हैसियत में हर स्तर पर फर्क है सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और शैक्षणिक भी. 86वीं रैंक हासिल करने वाले पुरु दुबे के पिता संजय दुबे प्रोफैसर हैं तो 316वीं रैंक वाले विपिन देव के पिता राजाराम यादव चौकीदार हैं. जाहिर है, विपिन ने अभावों से जूझते हुए कामयाबी हासिल की. इत्तफाक की बात यह है कि इन दोनों को ही चौथी बार में सफलता मिली जिस से समझ आता है कि अभाव और सुविधाएं दोनों में प्रतिस्पर्धा तो होती है फिर भले ही वह मेहनत की हो.

कभी ये भी रहे थे सुर्ख़ियों में
यह लिस्ट बहुत लंबी नहीं है तो अब एकदम छोटी भी नहीं रह गई है. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस कोटे से इस बार 104 युवा सिलैक्ट हुए हैं. गरीब और अभावग्रस्त युवाओं की बड़े पैमाने पर चर्चा सब से पहले साल 2007 में हुई थी जब वाराणसी के गोविंद जायसवाल आईएएस बने थे. उन के पिता रिकशा चलाते थे और परिवार झोंपड़े में रहता था. स्ट्रीट लाइट में पढ़ाई कर आईएएस बनने वाले गोविंद ने 48वीं रैंक हासिल कर हरकिसी को चौंका दिया था.

लगभग यही कहानी मध्यप्रदेश के मुरैना के मनोज कुमार शर्मा की है जिन्होंने 2005 में यह इम्तिहान क्रैक किया था. उन के अभावों, संघर्षों और सफलता पर ‘12वीं फेल’ फिल्म भी बनी थी जो खासी चर्चाओं में रही थी. धीरेधीरे ऐसे आईएएस अफसरों की संख्या बढ़ने लगी जो एक तरह से मखमल में टाट के पैबंद के मानिंद थे.

2015 के बैच की टौपर टीना डाबी हों या 2010 के बैच के एम नागराजू या मणिपुर के एक गरीब किसान परिवार के आर्मस्ट्रांग पामे हों या फिर मुंबई के नाइट वाचमैन के बेटे सब्जी विक्रेता 2017 के बैच के अंसार शेख (जिन के नाम सब से कम उम्र में आईएस बन जाने का रिकौर्ड दर्ज है) हों या कि फिर केरल के तीरकमान बेचने वाले दिहाड़ी मजदूर 2016 के बैच के श्रीधन्या सुरेश हों- इन सभी और इन जैसे कईयों न अपना खुद का इतिहास तो गढ़ा लेकिन इतिहास बदल नहीं पाए और न ही ऐसा लग रहा कि आने वाले कल में तसवीर बहुत ज्यादा बदलेगी.

आईसीएस के थे जलवे
आईएएस यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज का नाम पहले आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विसेज हुआ करता था. जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने 1858 में शुरू किया था. मकसद था प्रशासन चलाने के लिए काबिल अफसरों को चुनना. दिलचस्प बात यह है कि इस की परीक्षा इंगलैंड में आयोजित होती थी. सो, जाहिर है कि परीक्षा देने के लिए ऊंची जाति वाले अमीर, संभ्रांत और अभिजात्य घरानों के युवा ही जा पाते थे वरना तो उस दौर में खासे मिडिल क्लासियों को भी दूर शहर जाने के पहले पैसों का जुगाड़ करना पड़ता था.

नाम में जरूर इंडियन जुड़ा था वरना आईसीएस में सिलैक्ट होने वाले अधिकतर युवा अंगरेज ही होते थे जो ठसके से भारत आ कर ऊंचे पदों पर विराज कर ठाट से राजकाज चलाया करते थे. इसलिए इस का नाम ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने स्टील फ्रेम औफ ब्रिटिश राज रख दिया था. यह भारत में ब्यूरोक्रेट्स की औपचारिक शुरुआत थी. इस स्टील फ्रेम की जिम्मेदारी ब्रिटिश हुकूमत की हिफाजत करना थी जिस के एवज में इन्हें राजाओं सरीखी जिंदगी जीने का मौका मिलता था.

रवींद्र नाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर पहले भरतीय थे जिन्होंने 1863 में आईसीएस की परीक्षा पास की और वे बौम्बे प्रैसीडैंसी के अहम प्रशासनिक पदों पर रहे. उन के बाद जितने भी भारतीय आईसीएस हुए उन में भद्र बंगाली ज्यादा थे जो अमीर होने के साथसाथ ऊंची जाति के भी थे, मसलन सुरेंद्र नाथ बनर्जी, रमेश चंद्र दत्त, सत्येंद्र प्रसन्ना सिन्हा सहित नेता जी के ख़िताब से नवाज दिए गए सुभाष चंद्र बोस जिन्हें किस बिना पर `नेताजी’ और ‘फ्रीडम फाइटर’ कहा जाता है, समझ से परे है क्योंकि अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा उन्होंने विदेशों में ऐशोआराम से गुजारा, देश के लिए कुछ नहीं कियाधरा.

आईसीएस के जलवों पर गौर करें तो आज के आईएएस उन के सामने कहीं नहीं ठहरते. उन्हें दर्जनों नौकरचाकर, कई एकड़ जमीन में फैला बंगला, घोडा और ड्राइवर सहित मोटर गाडी मिलती थी. उन के हुक्म कानून की तरह लागू होते थे. जिला कलैक्टर छोटामोटा राजा होता था जिस से आम लोग नहीं मिल सकते थे. ब्रिटिश क्लबों में दारूमुरगा पार्टियों के आदी होते जाते आईसीएस शिकार के भी शौक़ीन होते थे जिस पर कोई रोकटोक नहीं थी. सारे विभाग पुलिस, फारेस्ट, राजस्व और जुडिशियरी उन के अधीन होते थे. हर विभाग के अधिकारी उन का दरबार रिपोर्ट देने के बहाने आबाद करते थे. उन का एक अहम काम बेहद सख्ती और क्रूरता से टैक्स वसूली का होता था.

उन्हें सैलरी दी जाती थी, यह कहने के बजाय कहना यह ज्यादा बेहतर होगा कि इन पर पैसा लुटाया जाता था. चुने जाने के बाद आईसीएस, जिसे असिस्टैंट कलैक्टर की पोस्ट मिलती थी, को 700-800 रुपए महीना तनख्वाह मिलती थी जो आज के लगभग 10 लाख रुपए के बराबर होती है. प्रमोशन के साथसाथ यह पगार भी बढ़ती जाती थी. गवर्नर को 5 हजार रुपए मिलते थे जिन की कीमत आज 50 लाख रुपए के लगभग होती है.

कायम है प्रशासनिक वर्ण व्यवस्था
आजादी मिलते ही 1947 में आईसीएस का नाम बदल कर आईएएस कर दिया गया. इस से बहुत ज्यादा कुछ नहीं बदला सिवा इस के कि इस में देसी युवा सिलैक्ट होने लगे लेकिन वे भी संपन्न सवर्ण, मालदार और इज्जतदार घरानों के ही होते थे जिन्हें देसी या काले अंगरेज न कहने की कोई वजह नहीं. हैरानी की बात यह भी है कि उस वक्त देश में कोई एक हजार आईएएस अधिकारी थे जिन में से 500 के लगभग अंगरेज ही थे. मूलतया वे आईसीएस थे जिन में से ज्यादातर इंगलैंड लौट गए थे. बाकी जो देसी बचे वे उन्हीं की तर्ज पर ऐशोआराम की जिंदगी जीते सिस्टम का हिस्सा बन गए.

ब्रिटिश हुकूमत द्वारा बनाई गई सरकारी नौकरियों की यह अघोषित वर्ण व्यवस्था आज तक कायम है जिस के तहत आईएएस और दूसरे प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी ब्राह्मण होते हैं. इन के पास पैसा, नाम और अधिकार सब से ज्यादा होते हैं. द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी क्षत्रिय होते हैं जो आईएएस अफसरों की गणेशपरिक्रमा करने को मजबूर होते हैं. तृतीय श्रेणी यानी वैश्य वर्ण में आतेआते अधिकारी की जगह कर्मचारी शब्द जुड़ जाता है. इन में क्लर्क, टीचर, पटवारी वगैरह इफरात से होते हैं. ये मोक्ष यानी अपने कल्याण के लिए ब्राह्मणों के आशीर्वाद के मुहताज होते हैं. फोर्थ क्लास यानी चतुर्थ यानी शूद्र श्रेणी में ड्राइवर, सफाईकर्मी, चपरासी वगैरह आते हैं जो बेचारे जिंदगीभर दफ्तर में झाड़ूपोंछा करते फाइलों को एक से दूसरी टेबल तक पहुंचाते रहते हैं. इन्हें उक्त तीनों वर्णों के साहब लोग लतियाते रहते हैं.

आईएएस कई मानों में ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ होता है जिस के पास अधिकार तो अनापशनाप होते हैं लेकिन जवाबदेही कोई नहीं होती. एक हद तक ही वह नेताओं और मंत्रियों का मुहताज रहता है. लेकिन सीनियर यानी कमिश्नर और चीफ व प्रिंसिपल सैकेट्री हो जाने के बाद उस का ट्रांसफर भी बिना उस की सहमति से करना आसान नहीं होता.

अब तक ये देवताओं की श्रेणी में शुमार होने लगते हैं जो जानते हैं कि जनप्रतिनिधियों को तो एक मरतबा जनता चुनाव में धकिया सकती है. लेकिन संविधान के अनुच्छेद 308 से 311 इन्हें विशेष सुरक्षा देते हैं जिन के चलते इन का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. पहले तो कुछ आईएएस, मसलन 1991 के बैच के अशोक खेमका, 2010 बैच की दुर्गाशक्ति नागपाल, 2012 बैच के कन्नन गोपीनाथन और 2002 बैच के संजीव चतुर्वेदी सरकार और नेताओं से उलझ भी पड़ते थे लेकिन मोदी राज में यह रिवाज ही खत्म हो गया है.

आजादी के बाद आईएएस स्टील फ्रेम औफ इंडिया कहे जाने लगे थे. इन में से कुछ ने वाकई तुक के काम किए जो आज तक याद किए जाते हैं. इन में एक उल्लेखनीय नाम 1955 के बैच के टी एन शेषन का है. मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर उन का नाम और काम किसी सुबूत का मुहताज नहीं जिन की सख्ती के चलते चुनावी आचार संहिता सही मानो में लागू हुई थी और फर्जी वोटिंग व बूथ कैप्चरिंग बंद होने के साथसाथ नेताओं की लुभावनी घोषनाओं पर रोक लगी थी.

गुजरे कल की इन बातों का आज से ताल्लुक यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की हैसियत से 1988 के बैच के आईएएस ज्ञानेश कुमार खुलेआम इतनी मनमानी पर उतारू हो आए हैं कि उन से त्रस्त विपक्ष उन के खिलाफ महाभियोग ला रहा है. इस मुहिम में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसद शामिल हैं. एक दूसरे नाम से आज की पीढ़ी भी परिचित है, वह नाम मेट्रोमैन के ख़िताब से नवाजे गए ई श्रीधरन का है. 1960 के दशक के आईएएस पी एन हक्सर भी खासे चर्चित रहे थे जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सचिव रहते बैंकों के राष्ट्रीयकरण में अहम रोल निभाया था.

सिमटा रहा एससी/एसटी का रोल
संविधान के लागू होते ही बी आर आंबेडकर की मंशा के मुताबिक आईएएस में भी एससी/एसटी आरक्षण लागू हो गया था. लेकिन जागरूकता और शिक्षा की कमी के चलते आरक्षित कोटे से इनेगिने दलित ही आईएस बन पाते थे. हालात आज भी वही हैं कि आरक्षित कोटे से बेहद कम आईएस हैं.
सरकार द्वारा संसद में बीती 12 फरवरी को दी गई जानकारी के मुताबिक वर्तमान में देश में 5,577 आईएएस अधिकारी हैं जिन में से एससी के महज 2.42 फीसदी यानी 135 और एसटी के उस से भी कम केवल 1.2 फीसदी यानी 67 ही हैं. ओबीसी के भी महज 245 आईएस हैं जो 4.39 फीसदी होते हैं.
अब अगर कोटे के सभी पद भरे हों तो एससी के 1,030, एसटी के 516 और ओबीसी के 1,850 के लगभग आईएस अधिकारी होने चाहिए. लेकिन नहीं हैं, तो इस का फर्क क्या पड़ रहा है, यह सवाल 29 जुलाई, 2024 को विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उठा कर देशभर में हलचल मचा दी थी.
बकौल राहुल गांधी, देश की आबादी का बड़ा हिस्सा लगभग 90 फीसदी इन्हीं वर्गों का है. सो, नीति निर्माण में उन की भागीदारी इतनी कम क्यों है कि केंद्रीय बजट बनाने वाली 20 शीर्ष अधिकारियों की टीम में एससी व एसटी का कोई अधिकारी ही नहीं था. ओबीसी वर्ग से भी नाममात्र को ही थे. इसी मुद्दे से देश में जातिगत जनगणना की बहस ने तूल पकड़ा था.

तो फिर ये क्या कर लेंगे
जब सबकुछ नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पसंद के चंद सवर्ण आईएएस अधिकारियों के हाथ में ही है और एससी, एसटी व ओबीसी के रोल समेट कर सरकार ने रख दिया है तो लगता है कि देश वापस आईसीएस के दौर में आ गया है जहां यह स्टील फ्रेम सरकार के इशारों पर नाचता थी. यह सवाल साल 2026 में सिलैक्ट हुए गरीब तबके के युवाओं के मद्देनजर मौजूं है कि उन्हें भी यही करना पड़ेगा. वैसे भी, इन अधिकारियों की प्राथमिकता अपनी और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की स्वाभाविक रूप से होगी.

यह कोई एतराज की भी बात नहीं क्योंकि उन्होंने अभाव देखे और भुगते हैं. सो, उन का फोकस अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर कुदरती तौर पर ज्यादा रहेगा. अनीता देवड़ा, देव डुडेजा, आस्था जैन और विपिन देव यादव जैसे नए आईएएस के दिलों में मुमकिन है देश के लिए कुछ करने का जज्बा हो क्योंकि इन्होंने सही मानों में आम लोगों की समस्याओं को बहुत नजदीक से देखा है. जाहिर है, ये लोग उन समस्याओं से नजात पा गए हैं, अब इन के पास वह सब होगा जिस का सपना इन्होंने देखा था, मसलन बड़ा सरकारी बंगला, लालबत्ती वाली कार, नौकरचाकर, झुके हुए सिर और इन सब से अहम पैसा.

लेकिन ऐसा लगता नहीं कि ये नए आईएएस देश के मौजूदा माहौल से नावाकिफ होंगे कि उन्हें धर्मगुरुओं के इशारो पर नाच रही सरकार के इशारों पर ही नाचना है, हमारी हैसियत अब कहने भर की ही रह गई है. सो, खामख्वाह हीरो बनने की जरूरत नहीं, सिर झुका कर अपने हिस्से में आया राजयोग भोगने में ही बेहतरी है.

ईरान-इजराइल संघर्ष – हथियारों की होड़ से वैश्विक संकट तक

Middle East war :  ईरान-इजराइल युद्ध वैश्विक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गया है. क्षेत्रीय शक्तियां हथियारों की होड़ में आगे बढ़ती रहीं, तो पश्चिम एशिया में अशांति और अस्थिरता गहराती चली जाएगी. युद्ध रोकने के कूटनीतिक प्रयास कहीं दिखाई नहीं दे रहे. हमले बढ़ेंगे तो उन का दायरा और बड़ा हो सकता है. यानी, युद्ध की जद में कई देश और आ जाएंगे.
ईरान अब ऐसे हथियारों से हमले कर रहा है जो आयरन डोम को फेल कर रहे हैं. क्लस्टर बम, जो एक मिसाइल के अंदर मौजूद सैकड़ों छोटेछोटे बम होते हैं, में हर बम में करीब 5 किलोग्राम तक विस्फोटक होता है. एक मिसाइल में लगभग 24 क्लस्टर बम होते हैं, यह संख्या 80 तक पहुंच सकती है. जब ऐसी मिसाइल से हमला किया जाता है तो यह 8 से 10 किलोमीटर के दायरे को कवर करती है. ईरान ने इन मिसाइलों का इस्तेमाल कर के अमेरिका और इजराइल के बेहद महंगे व विनाशक हथियारों की ऐसी हवा निकाली कि जिस की कल्पना भी इन दोनों देशों ने न की होगी.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान-इजराइल युद्ध को जितने हलके में ले कर इजराइल का साथ दिया था, अब यह उतना ही भयानक हो चुका है. ट्रंप ने सोचा था कि ईरान के सुप्रीम लीडर के साथ दोचार अन्य नेताओं का खात्मा कर के वे हफ्तेभर में ईरान को अपने कदमों में झुका लेंगे, खामेनेई की सत्ता पलट कर वहां अपनी किसी कठपुतली को बिठा देंगे, मगर इस जंग में अब खुद अमेरिका दो पाटों के बीच पिस रहा है.

अमेरिका और इजरायल का टूटा सपना
जारी जंग में ईरान की जिन मिसाइलों के खत्म होने का इंतजार अमेरिका कर रहा था, वो तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं, उलटे, इजराइल के इंटरसैप्टर जरूर खात्मे की कगार पर हैं, जिन से वो ईरानी मिसाइलों से अपना बचाव कर रहा था. इजराइल के पास पहले ही इंटरसैप्टर की संख्या कम थी क्योंकि पिछले साल ईरान के साथ हुए संघर्ष में इन का काफी इस्तेमाल हो चुका था. अब मौजूदा युद्ध में ईरान लगातार मिसाइल हमले कर रहा है, जिस से इजराइल की लंबी दूरी की रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव पड़ रहा है.
हैरानी तो यह है कि ईरान अब अपनी मिसाइलों में क्लस्टर म्यूनिशन भी जोड़ रहा है, जिस से निपटना इजराइल के लिए चुनौती साबित हो रहा है. क्लस्टर म्यूनिशन वह प्रणाली है जिस से एक मिसाइल से कई छोटेछोटे बम गिरते हैं, जिन्हें रोकना और मुश्किल हो रहा है. यह जंग कितनी लंबी चलेगी, फिलहाल कहना मुश्किल है क्योंकि अमेरिका और इजराइल मिल कर जिस ईरान को कब्जाने का सपना देख रहे थे उस के पास जमा हथियारों की तादाद ने इन दोनों देशों का गणित बिगाड़ दिया है.

ये हमले क्यों ज्यादा प्रभावशाली हैं
ईरान की मिलिट्री पावर और आक्रामक रवैये से यह तो साफ हो गया है कि ईरान ने बीते सालों में न केवल अपने डिफैंस सिस्टम को मजबूत किया है, बल्कि सस्ते मगर घातक हथियारों के उत्पादन में भी बढ़त हासिल कर ली है.
ईरान की युद्ध रणनीति अब पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं रही है. उस ने मिसाइल तकनीक, ड्रोन और प्रौक्सी नैटवर्क के माध्यम से एक मल्टीलैवल मिलिट्री स्ट्रक्चर खड़ा कर लिया है. उस के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रभाव पिछले साल की लड़ाई में भी देखा गया था. इस युद्ध में उस ने दुनिया को दिखा दिया है कि कम संसाधनों में भी उस ने जबरदस्त प्रभाव वाले हथियार विकसित करने की दिशा में बड़ी सफलता पाई है.
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि युद्ध में तबाही का आकलन केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि उन के रणनीतिक उपयोग, लक्ष्य चयन और मनोवैज्ञानिक प्रभाव से भी होता है. इस बार के युद्ध में ईरान इन तीनों पहलुओं में भी दक्षता दिखाता नजर आ रहा है. यही कारण है कि हमले ज्यादा प्रभावशाली हैं.
ईरान इस समय एक बड़ी रणनीति के तहत जंग लड़ रहा है. अमेरिका को धूल चटाने के लिए उस ने दुनियाभर के देशों में मौजूद तमाम अमेरिकी मिलिट्री अड्डों को गिनगिन कर निशाना बनाया और तबाह किया है. यही नहीं, अब वह उन तमाम देशों के तेल भंडारों को भी नष्ट करने की दिशा में बढ़ रहा है जो देश अमेरिका और इजराइल के मददगार हैं. ईरान ने अमेरिका का समर्थन कर रहे मिडिलईस्ट के देशों को धमकी दी है कि उस के निशाने पर सभी तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर हैं. इस के बाद मिडिलईस्ट में तेल और गैस प्रोडक्शन पर संकट मंडराने लगा है.

यूरोप और एशिया में गैस के लिए होड़
19 मार्च को ईरान ने कतर के लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) प्लांट पर हमला कर दुनिया में कुहराम सा मचा दिया. यानी, अब यह युद्ध औयल इंफ्रा अटैक में तबदील होता जा रहा है. कतर के जिस एलएनजी प्लांट पर हमला हुआ है वह दुनिया के सब से बड़े गैस निर्यात केंद्रों में से एक है. उस के बाद यूरोप में गैस की कीमतों में 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यूरोप एलएनजी पर ज्यादा निर्भर है और ईरान ने हमला कर पूरी सप्लाई चेन ब्लौक कर दी है.
ऐसे में अब यूरोप और एशिया में गैस के लिए होड़ बढ़ेगी. फिलहाल इन क्षेत्रों के तमाम प्लांट्स सुरक्षा के मद्देनजर बंद कर दिए गए हैं. आने वाले दिनों में तेल और गैस की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है. भारत के लिए भी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि भारत कतर से गैस आयात करता है जिस का सब से बड़ा प्लांट बंद होने से सप्लाई बाधित होगी. ऐसे में देश में कंप्रेस्ड नैचुरल गैस (सीएनजी) और पाइप्ड नैचुरल गैस (पीएनजी) महंगी हो सकती हैं. यही नहीं, बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है. यानी, आम आदमी तक महंगाई की मार बस पहुंचने ही वाली है.
गौरतलब है कि ईरान ने बहुत सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों से वार किए और अमेरिका व इजराइल ने उन ड्रोन्स को मारने के लिए अपनी महंगी मिसाइलों व डिफैंस सिस्टम का इस्तेमाल किया. इस से अमेरिका-इजराइल के लिए ईरान के सस्ते ड्रोन्स को मारना बहुत महंगा साबित हुआ. उन्होंने सोचा था कि ईरान थोड़ेबहुत हमले के बाद डर कर घुटनों पर आ जाएगा मगर ईरान ने तो इजराइल और मिडिलईस्ट के देशों में तमाम अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों पर ड्रोन्स की बारिश कर दी.
बताते चलें कि एस-400 दुनिया का एक सब से आधुनिक डिफैंस सिस्टम है और यह 400 किलोमीटर दूर के खतरों पर वार कर सकता है. इस डिफैंस सिस्टम को मुख्य रूप से फाइटर जेट्स और खतरनाक मिसाइलों को रोकने के लिए बनाया गया है. मगर एस-400 जैसे बेहद आधुनिक डिफैंस सिस्टम से हर हवाई खतरे पर वार करना समझदारी नहीं है. इस को औपरेट करने का खर्च बहुत ज्यादा है. एस-400 से एक बार मिसाइल दागने में 2.5 करोड़ से 16 करोड़ रुपए का खर्च आता है. यह इस सिस्मट में लगी तरहतरह की मिसाइलों के हिसाब से तय होता है. ऐसे में ड्रोन जैसे नन्हें एरियल खतरों को मारने के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल करना बेवकूफी है, जो इजराइल कर बैठा है.
ईरान जिस तरह से जंग में तबाही मचा रहा है, उस से यह प्रतीत होता है कि उस ने बहुत बड़ी तादाद में घातक हथियार बना लिए हैं. शायद रूस और चीन भी उस की अप्रत्यक्ष रूप में मदद कर रहे हैं. मगर हथियार सिर्फ खून बहा सकते हैं, शांति नहीं ला सकते. रूसयूक्रेन युद्ध ने दोनों देशों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है. उन्हें फिर से व्यवस्थित होने में दशकों का समय लगेगा. अगर अमेरिका बीच में न कूदता तो ईरान-इजराइल युद्ध इतना लंबा न खिंचता, तबाही इतने बड़े पैमाने पर न होती जिस के कारण दुनिया के तमाम देशों के आगे तेल और गैस का इतना बड़ा संकट खड़ा हो गया है. मगर अमेरिका की अदूरदर्शिता और हेठी ने अपने साथसाथ पूरी दुनिया को परेशानी में डाल दिया है.

यह धर्म युद्ध है
इस युद्ध को देख कर कुछ लोग यह तर्क देने लगे हैं कि वियतनाम और दक्षिण कोरिया भी युद्ध की आग से तप कर मजबूत और विकसित राष्ट्र बने. आर्थिक चमत्कार की मिसाल बने. ईरान भी आने वाले सालों में ताकतवर राष्ट्र के रूप में उभर सकता है, मगर यह सोच बिलकुल गलत है. दरअसल ईरान-इजराइलअमेरिका के बीच धर्म युद्ध चल रहा है. ऊपरी तौर पर भले यह मालूम पड़े कि लड़ाई अस्तित्व की, तेल की, भूमि हथियाने की है, मगर सच्चाई यह है कि यह युद्ध सिर्फ धर्म का है. इसलाम-यहूदी और ईसाइयत के बीच जंग है, जो सदियों से जारी है. और यह एक कड़वी सच्चाई है कि धर्म ने जिनजिन देशों में युद्ध करवाए, उन देशों के आम नागरिक कभी चैन और सुकून की जिंदगी नहीं जी पाए.
ईरान के मामले में वियतनाम और दक्षिण कोरिया का उदाहरण देना गलत सिद्ध होगा क्योंकि इन दोनों देशों में धर्म युद्ध नहीं लड़ा गया था. और युद्ध के बाद उन्होंने शांति, संस्थागत सुधार और वैश्विक सहयोग को अपनाया था. युद्ध के बाद जो नीतियां इन देशों में बनीं उन नीतियों ने उन्हें आगे बढ़ाया. वियतनाम ने दशकों तक आर्थिक सुधार, वैश्विक निवेश और राजनीतिक स्थिरता पर जोर दिया, जबकि दक्षिण कोरिया को अमेरिका का व्यापक समर्थन, तकनीकी निवेश और वैश्विक बाजारों तक खुली पहुंच मिली.
इस के विपरीत, ईरान की स्थिति जटिल है. इस के साथ ही ईरान इसलामिक राष्ट्र के रूप में अपनेआप को स्थापित करना चाहता है. उस की इस चाहत में ईरान की कुछ जनता उस के साथ है और कुछ उस के खिलाफ. बहुतेरी कुर्द औरतें हिजाब को उतार फेंकना चाहती हैं और पश्चिमी लिबास में आजाद घूमने की इच्छा रखती हैं. वहीं एक बड़ी संख्या उन औरतों की भी है जो जबरन हिजाब ओढ़ कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं या नौकरियां कर रही हैं. वे डाक्टर, इंजीनियर, नर्स, टीचर, लैक्चरर हैं.
बीते कुछ सालों से पश्चिमी मीडिया इस चीज को जोरशोर से उठा रहा है कि ईरान में महिलाओं के हक कुचले जाते हैं. ईरान ने अपने नागरिकों से खुल कर सांस लेने की आजादी छीन ली है. औरतें कैसे कपड़े पहनें, कैसे बाल बनाएं, कैसे चलें, किस के साथ आएंजाएं, सब इसलाम की नजर से तय हो रहा है. लगातार इस तरह की खबरों से ईरान के भीतर भी अविश्वास, घृणा, असहयोग और तनाव का माहौल बना है. धार्मिक प्रतिबंध ज्यादा होने लगें, तो उपद्रव में देर नहीं लगती है, ईरान को यह समझना होगा. जब किसी समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित होती है और शासन व्यवस्था धार्मिक नियंत्रण में होती है, तो वहां स्थायी विकास की संभावनाएं कमजोर पड़ जाती हैं. ऐसे वातावरण में युद्ध केवल अस्थिरता को और गहरा करता है.
अमेरिकीइजराइली हमले से ठीक पहले ईरान बुरी तरह ईरानी जनता के विद्रोह का सामना कर रहा था. अमेरिका और इजराइल ने उस विरोध की शक्ति छीन ली और ताकत फिर से कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं के हाथों में आ गई है.

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युद्ध की भेंट चढ़ गए ईरान के प्रमुख नेता
अमेरिकाइजराइल और ईरान के बीच जारी जंग में ईरान के कई प्रमुख राजनीतिक और सैन्य हस्तियों की जानें गई हैं जिस के कारण शीर्ष नेतृत्व को गहरा झटका लगा है.
अयातुल्लाह अली खामेनेई : ईरान के सर्वोच्च नेता, जो 1989 से सत्ता में थे. 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में उन के परिसर पर हुए हवाई हमले में मारे गए. वे 86 वर्ष के थे. उन के 3 दशकों से अधिक के शासनकाल ने सुरक्षा तंत्र के माध्यम से सत्ता को मजबूत किया और ईरान के प्रभाव का विस्तार किया. उन के परमाणु कार्यक्रम के कारण उन्हें बारबार पश्चिम के साथ टकराव का सामना करना पड़ा.
अली लारीजानी : सुप्रीम नैशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव और एक प्रभावशाली रणनीतिकार, जिन्हें 17 मार्च, 2026 को एक इजराइली हवाई हमले में मार गिराया गया. वे 67 वर्ष के थे. उन के साथ उन के बेटे और एक डिप्टी भी मारे गए. वे सर्वोच्च नेता के करीबी सलाहकार थे और ईरान की सुरक्षा व विदेश नीति को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
अली शमखानी : खामेनेई के करीबी सलाहकार और पूर्व रक्षा मंत्री, इन की 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में किए गए एक हमले में मृत्यु हो गई. इस से पहले इजराइल और ईरान के बीच जून में हुए 12 दिवसीय युद्ध के दौरान इन के घर पर हुए हमले में वे बालबाल बचे थे.
मोहम्मद पाकपुर : ये ईरान की सब से शक्तिशाली सैन्य टुकड़ी इसलामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स (आईआरजीसी) के कमांडर-इन-चीफ थे जो 28 फरवरी, 2026 के हमले में मारे गए.
अजीज नसीरजादेह : ईरान के रक्षा मंत्री और वायुसेना के अनुभवी अधिकारी अजीज को 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में शीर्ष नेतृत्व पर हुए हमलों में मार दिया गया. उन्होंने सैन्य योजना और रक्षा नीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
गुलामरेजा सोलेमानी : ईरान के बासिज अर्धसैनिक बल के कमांडर 17 मार्च, 2026 के हमले में मारे गए. वे रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के वरिष्ठ अधिकारी और आतंरिक सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्ति थे.
इस्माइल खतीब : ईरान के खुफिया मंत्री की मौत 18 मार्च, 2026 को इजराइली हमले में हुई. एक कट्टरपंथी धर्मगुरु और राजनीतिज्ञ, जिन्होंने अगस्त 2021 में नागरिक खुफिया तंत्र का नेतृत्व करने से पहले अयातुल्लाह खामेनेई के कार्यालय में भी काम किया था.
अब्दोलरहीम मौसवी : ईरानी सशस्त्र बलों के चीफ औफ स्टाफ, जो 28 फरवरी, 2026 के हमलों में मारे गए.
अली मोहम्मद नैनी : ये आईआरजीसी के प्रवक्ता थे जिन्हें युद्ध के 21वें दिन अमेरिकीइजराइली हमले में मार दिया गया.
इन के अलावा, कई अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, सुरक्षा सलाहकार और परमाणु वैज्ञानिक भी इस संघर्ष के दौरान मारे गए हैं, जिस से ईरान का सुरक्षा ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ है. , Middle East war

chronic kidney disease: साइलैंट किलर है किडनी रोग

chronic kidney disease : रवि नागर के बड़े भाई नीरज नागर, जिन की आयु अभी 55 वर्ष थी, की कलाइयों के ऊपरी हिस्से में कुछ दिनों से सूजन और दर्द था. उन्होंने नौकर से चारपांच दिन तेलमालिश करवाई. उन को लगा कि ठंड की वजह से सूजन आ गई है. मगर मालिश से कोई खास फर्क नहीं पड़ा. इधर कुछ दिनों से यूरिन करने में भी कुछ परेशानी हो रही थी. यूरिन महसूस तो होता था मगर खुल कर होता नहीं था.
दिसंबर का महीना था. ठंड अधिक थी. लिहाजा, उन्होंने इन लक्षणों को ठंड के कारण उत्पन्न लक्षण समझा और डाक्टर के पास नहीं गए. एक दिन जब अचानक चक्कर आया तो उन की पत्नी ने उन्हें डाक्टर के पास जाने की सलाह दी. शाम को पतिपत्नी अपने फैमिली डाक्टर के पास गए. डाक्टर ने थोड़ी देर एग्जामिन किया और कुछ टैस्ट लिखे. दूसरे दिन जब टैस्ट रिपोर्ट आईं तो डाक्टर ने तुरंत हौस्पिटल में एडमिट होने के लिए कहा.

नीरज नागर के रक्त में क्रिएटिनिन की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ी हुई थी. यूरिया और पोटैशियम भी खतरनाक स्तर पर थे. हौस्पिटल में एक हफ्ते के अंदर 3 बार उन का डायलिसिस हुआ. उन की किडनी की कार्यक्षमता बिलकुल खत्म हो चुकी थी. वे मात्र 10 फीसद ही काम कर रही थीं. डायलिसिस के बाद भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. दो हफ्ते हौस्पिटल के आईसीयू वार्ड में रहे और वहीं उन का निधन हो गया.
नीरज नागर शरीर से हष्टपुष्ट थे. रोज सुबह मौर्निंग वाक के लिए जाते थे. शाम को दोस्तों के साथ बैडमिंटन कोर्ट में देखे जाते थे. वर्किंग थे. सेल्स टैक्स डिपार्टमैंट में अधिकारी थे. किडनी की समस्या ने दबेपांव कब उन के शरीर में प्रवेश किया, पता ही नहीं चला. हाथों में सूजन के तौर पर हलकेफुलके लक्षण भी तब दिखे जब किडनी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी. डाक्टर ट्रांसप्लांट के बारे में अभी सोच ही रहे थे कि उन्होंने देह त्याग दी.

किडनी क्या करती है

किडनी यानी गुर्दे शरीर के सब से महत्त्वपूर्ण अंगों में से एक है. मनुष्य के शरीर में सामान्यतया 2 किडनियां होती हैं, जो पेट के पीछे कमर के दोनों ओर होती हैं. किडनी का सब से महत्त्वपूर्ण काम खून को फिल्टर करना और शरीर के अंदर के रासायनिक संतुलन को बनाए रखना है. शरीर में बनने वाले विषैले पदार्थ (टौक्सिन) और अतिरिक्त पानी को किडनी खून से अलग करती है. यह अपशिष्ट पदार्थ को मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालती है.
एक स्वस्थ किडनी यह भी तय करती है कि शरीर में कितना पानी रखना है और कितना बाहर निकालना है. यदि शरीर में पानी ज्यादा है तो अधिक पेशाब बनता है और यदि पानी कम है तो किडनी पानी को बचाने की कोशिश करती है. जब किडनी काम करना बंद कर देती है तो शरीर में जगहजगह पानी जमा होने लगता है, जिस से सूजन आती है. वहीं, शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं और खून में इन की मात्रा बढ़ने से यह जहर का काम करने लगते हैं.

तेजी से बढ़ता किडनी रोग

भारत में किडनी की बीमारी बहुत तेजी से एक महामारी का रूप लेती जा रही है. इस की मुख्य वजह है अत्यधिक मात्रा में अनाज, सब्जी और फलों आदि में डाला जाने वाला पैस्टीसाइड व फलों को जल्दी पकाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रसायन. पैस्टीसाइड शरीर में प्रवेश कर के धीरेधीरे किडनी के फिल्टर (नेफ्रान) को नुकसान पहुंचाते हैं. इस से किडनी के काम करने की क्षमता कम होने लगती है.
ये रसायन सिर्फ अनाज, सब्जी, फल के उपभोक्ताओं के लिए ही खतरा नहीं बन रहे हैं बल्कि लंबे समय तक पैस्टीसाइड के संपर्क में रहने वाले किसानों में भी किडनी रोग का खतरा ज्यादा पाया जा रहा है. देश के कई कृषि क्षेत्रों में क्रौनिक किडनी डिजीज के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है. यह खतरनाक रसायन शरीर में औक्सीडेटिव स्ट्रैस और सूजन पैदा करते हैं, जिस से किडनी की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं.

पैस्टीसाइड का असर लिवर पर भी

किडनी के साथसाथ लिवर, जो कि शरीर का मुख्य डिटौक्स अंग है, पर भी इन जहरीले रसायनों का काफी बुरा असर पड़ रहा है. पैस्टीसाइड लिवर में जमा हो कर फैटी लिवर, लिवर डैमेज और लिवर सिरोसिस का खतरा बढ़ा रहे हैं. कुछ कीटनाशक लिवर की कोशिकाओं को सीधे नुकसान पहुंचाते हैं.
हमारे यहां खेती में कीटनाशकों का व्यापक उपयोग हो रहा है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में किडनी और लिवर रोगों की बढ़ती दर इस बात का प्रमाण हैं कि पैस्टीसाइड हमारे लिए कितना बड़ा ख़तरा बन चुका है.

हर 10 में एक भारतीय को किडनी की समस्या

दुनिया भर में करोड़ों लोग क्रौनिक किडनी डिजीज से पीड़ित हैं. भारत में भी इस के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अनुमान है कि भारत में हर 10 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी स्तर की किडनी की समस्या से जूझ रहा है. हर साल अस्पतालों में लाखों नए मरीज सामने आ रहे हैं. किडनी फेल होने पर लोगों को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है, जो कि बहुत महंगा प्रोसैस है और गांवदेहात के लोग तो इस इलाज का खर्च ही वहन नहीं कर सकते.

शहरी जीवनशैली भी बढ़ा रही है खतरा

शहरी क्षेत्रों में पैस्टीसाइड युक्त भोजन के अलावा किडनी फेल होने का सब से बड़ा कारण उच्च रक्तचाप भी है. मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली, दर्दनिवारक दवाओं का अधिक इस्तेमाल, धूम्रपान और शराब, प्रदूषण और खराब खानपान भी इस के लिए उत्तरदायी हैं.

देर से दिखाई देते बीमारी के लक्षण

किडनी की बीमारी की सब से बड़ी समस्या यह है कि इस के लक्षण देर से दिखाई देते हैं, जैसे हाथपैरों और चेहरे पर सूजन, बारबार पेशाब आना या कम आना, थकान और कमजोरी, भूख कम लगना और उलटी या जी मिचलाना. ये लक्षण तब दिखते हैं जब किडनी का 50–60 फीसदी तक नुकसान हो चुका होता है.

जब किडनी पूरी तरह फेल हो जाए

अगर किडनी पूरी तरह खराब हो जाए तो मरीज को डायलिसिस या ट्रांसप्लांट कराना पड़ता है. डायलिसिस सप्ताह में 2 से 3 बार कराना पड़ सकता है. किडनी ट्रांसप्लांट महंगा और जटिल इलाज है. इस वजह से यह बीमारी आर्थिक और सामाजिक बोझ भी बनती जा रही है.
किडनी ट्रांसप्लांट एक ऐसी सर्जरी है जिस में खराब या काम न करने वाली किडनी को हटा कर किसी स्वस्थ व्यक्ति की किडनी रोगी के शरीर में लगाई जाती है. यह एंडस्टेज किडनी फेलियर (जब किडनी 85–90 फीसदी से अधिक खराब हो जाए) के इलाज का सब से प्रभावी तरीका माना जाता है.

लालू प्रसाद यादव का उदाहरण

याद होगा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की किडनी खराब होने पर उन की बेटी रोहिणी आचार्य ने उन्हें अपनी एक किडनी दी थी. लालू प्रसाद यादव कई सालों से किडनी सहित कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे. डाक्टरों ने उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी. उन की बेटी रोहिणी आचार्य, जो सिंगापुर में रहती हैं, ने अपने पिता को अपनी एक किडनी दान करने का निर्णय लिया. 5 दिसंबर, 2022 को सिंगापुर के एक अस्पताल- माउंट एलिजाबेथ हौस्पिटल- में उन का सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया गया. यह बापबेटी के बीच भावनात्मक लगाव के कारण संभव हुआ.

डोनर की कमी सब से बड़ी समस्या

भारत में हर साल लाखों लोग किडनी फेलियर के शिकार होते हैं, लेकिन ट्रांसप्लांट का परसैंटेज बहुत कम है, क्योंकि डोनर की कमी है. अधिकांशतया परिवार के लोग भी अपनी किडनी अपने मरीज को देने में हिचकिचाते हैं. वर्ष 2023 में भारत में लगभग 13,642 किडनी ट्रांसप्लांट हुए, जबकि मरीजों की संख्या लाखों में थी.
किडनी ट्रांसप्लांट में किसी स्वस्थ व्यक्ति (डोनर) की एक किडनी ले कर मरीज के शरीर में लगाई जाती है. गौरतलब है कि हर इंसान दो किडनी के साथ पैदा होता है, मगर एक किडनी भी शरीर को सामान्य जीवन दे सकती है. इसलिए डोनर अपनी एक किडनी दे कर भी सामान्य जीवन जी सकता है. पर लोगों में डर है कि पता नहीं किडनी दान करने के बाद उन का अपना स्वास्थ्य खराब न हो जाए.

किडनी ट्रांसप्लांट के दो तरीके

किडनी ट्रांसप्लांट दो तरह से होता है. पहला, जीवित डोनर ट्रांसप्लांट, जिस में रोगी के मातापिता, भाईबहन, पतिपत्नी या करीबी रिश्तेदार अपनी एक किडनी दे कर रोगी की जान बचा सकते हैं. यह सब से सामान्य तरीका है. दूसरा है मृत डोनर ट्रांसप्लांट, जिस में किसी ब्रेन-डेड व्यक्ति की किडनी रोगी को मिल सकती है. यह जानकारी सरकार की आर्गन वेटिंग लिस्ट से मिलती है, कि किस ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजनों ने उस के अंग दान का निर्णय लिया है. पर देश में यह संख्या बहुत ही कम है क्योंकि लोगों में अंगदान के प्रति जागरूकता ही नहीं है.

दुनिया का पहला किडनी ट्रांसप्लांट

दुनिया का पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट 1954 में हुआ था. यह ट्रांसप्लांट डा. जोसेफ मरे और उन की टीम ने अमेरिका के ब्रिघम एंड वीमेन हौस्पिटल में किया था. इस के लिए उन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार भी मिला.

ट्रांसप्लांट की सफलता, खर्च और सावधानियां

अकसर लोग सोचते हैं कि नई किडनी पुरानी किडनी की जगह लगाई जाती है. बता दें कि आमतौर पर नई किडनी पेट के निचले हिस्से में लगाई जाती है और पुरानी किडनी को वहीं रहने दिया जाता है. मातापिता, भाईबहन या बच्चे जैसे करीबी रिश्तेदारों की किडनी सब से जल्दी मैच हो जाती है. इसलिए उन से ट्रांसप्लांट का सफल होना आसान होता है.
आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीज 5 से 10 साल तक आराम से जी सकते हैं. भारत में यह दर 50 से 80 प्रतिशत है. यदि मरीज दवाएं नियमित ले और डाक्टर की सलाह माने, तो ट्रांसप्लांट के बाद 20–30 साल तक भी सामान्य जीवन जी सकता है. कई लोग नौकरी, खेल और यात्रा भी करते हैं. हालांकि, कोई डाक्टर जीवन की गारंटी नहीं देता.

इलाज महंगा

भारत में आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट पर 10 से 20 लाख रुपए तक खर्च आता है और महीने की दवाएं 8 से 20 हजार रुपए तक की होती हैं. ये दवाएं जीवनभर लेनी पड़ती हैं.
भारत में करीब 600 निजी और सरकारी ट्रांसप्लांट सैंटर हैं. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली, एम्स नागपुर, पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ और एसजीपीजीआई लखनऊ में मुख्य रूप से लोग किडनी ट्रांसप्लांट के लिए एडमिट होते हैं. इस के अलावा, सरकारी मैडिकल कालेज तमिलनाडु और केरल आदि में भी ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध है. निजी अस्पतालों में अपोलो, मेदांता, फोर्टिस, मैक्स और मणिपाल हौस्पिटल में ट्रांसप्लांट होता है. इन अस्पतालों में ट्रांसप्लांट की सफलता दर काफी अच्छी मानी जाती है.
किडनी मिलने में कितना समय लगता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि यदि परिवार में डोनर है तो 1 से 3 महीने में ट्रांसप्लांट हो सकता है. यदि मृत डोनर से किडनी चाहिए तो वेटिंग लिस्ट में नाम दर्ज होता है और औसतन 3 से 5 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है.

ट्रांसप्लांट के बाद की सावधानी

किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को जीवनभर कुछ नियम मानने पड़ते हैं, जैसे रोज इम्यूनो सप्रेसिव दवाएं लेना, संक्रमण से बचाव रखना, नियमित ब्लड टैस्ट, संतुलित भोजन और शराब व धूम्रपान से परहेज रखना. हर सर्जरी की तरह किडनी ट्रांसप्लांट में भी जोखिम होता है. कभीकभी तो परिवार के सदस्य की किडनी भी शरीर अस्वीकार कर देता है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग साल में कम से कम एक बार ब्लडप्रैशर, ब्लडशुगर, क्रिएटिनिन और यूरिन की सामान्य जांच करवा लें, तो किडनी रोग को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है. शुरुआती अवस्था में ही पता चल जाए तो दवाओं, खानपान में सुधार और जीवनशैली में बदलाव से किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
किडनी को स्वस्थ रखने के लिए कुछ सरल उपाय भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं- पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी पीना, नमक और जंक फूड का कम सेवन, दर्द निवारक दवाओं का अनावश्यक प्रयोग न करना, धूम्रपान और शराब से दूरी, नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रित रखना, रक्तचाप और मधुमेह को नियंत्रण में रखना, फल और सब्जियों को अच्छी तरह धो कर ही खाना ताकि पैस्टीसाइड का असर कम हो सके.

जागरूकता बहुत जरूरी

लेकिन इन सभी जोखिमों और जटिलताओं के बावजूद एक बात स्पष्ट है कि किडनी रोग से लड़ाई का सब से बड़ा हथियार समय रहते जागरूकता और जांच है क्योंकि यह बीमारी अकसर धीरेधीरे और बिना शोर किए शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. यही वजह है कि डाक्टर इसे ‘साइलैंट किलर’ कहते हैं.
समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी बेहद जरूरी है. एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के अंग कई लोगों को जीवन दे सकते हैं. यदि लोग अंगदान के महत्त्व को समझें तो हजारों मरीजों को डायलिसिस की पीड़ा से मुक्ति मिल सकती है और उन्हें नया जीवन मिल सकता है.

नीरज नागर की कहानी एक चेतावनी

नीरज नागर की कहानी केवल एक व्यक्ति की दुखद मृत्यु की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है. यह हमें याद दिलाती है कि शरीर के छोटेछोटे संकेतों को नजरअंदाज करना कभीकभी जानलेवा साबित हो सकता है.
किडनी रोग वास्तव में साइलैंट किलर है जो धीरेधीरे शरीर को भीतर से कमजोर करता है और जब तक इस के स्पष्ट लक्षण सामने आते हैं, तब तक अकसर बहुत देर हो चुकी होती है. इसलिए जरूरी है कि हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें, समयसमय पर जांच करवाएं और अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से लें. दरअसल, स्वास्थ्य की रक्षा केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि जागरूकता, सावधानी और समय पर लिए गए छोटेछोटे निर्णयों से होती है.

Family Story in Hindi : हाय रे पर्यटन

Family Story in Hindi : सहेलियों पर अपना रोब झाड़ने के लिए मिसेज शर्मा ने किसी हिल स्टेशन  पर जाने की चेतावनी दे डाली. मैं, बेचारा अपनी जेब की तंगदिली का मारा हुआ, कभी पत्नी और बच्चों के उत्साह को देखता तो कभी पर्यटन के नाम पर शौपिंग करते हुए पैसों को धूंधूं उड़ते हुए.

आजकल पर्यटन पर खास जोर है. जिसे देखो वही कहीं न कहीं जा रहा है. कोई शिमला, कोई मनाली, कोई ऊटी. पत्नी भी कहां तक सब्र रखती, आखिर एक दिन कह ही दिया, ‘‘देखो, बहुत हो गया. इतने साल हो गए हमारी शादी को, आप कहीं नहीं ले जाते. ले दे कर पीहर और रिश्तेदारों के अलावा आप की डायरी में दूसरी कोई जगह ही नहीं है. अब तो किटी में भी लोग मुझ से पूछते हैं, ‘मिसेज शर्मा, आप कहां जा रही हो.’ अब मैं क्या जवाब दूं. मैं ने भी उन से कह दिया कि हम भी इस बार हिल स्टेशन जा रहे हैं.

‘‘इस बार आप पक्की तरह सुन ही लो. हमें इस बार किसी न किसी हिल स्टेशन पर जाना ही है, चाहे लोन ही क्यों न लेना पड़े. मेरी नाक का सवाल है,’’ यह कह कर वह कोपभवन में चली गईं.

हमारे जैसे शादीशुदा लोग पत्नी के कोप से अच्छी तरह परिचित हैं. वे जानते हैं कि एक बार निर्णय लेने के बाद पत्नियों को कोई नहीं समझा सकता, सो मैं ने समझौतावादी नीति अपनाई और उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित किया. एकतरफा बातचीत के बाद मैं ने मान लिया कि इस बार शिमला जाना ही हमारी नियति है.

रेलवे टाइमटेबिल में से कुछ गाडि़यां नोट कर मैं रिजर्वेशन कराने रेलवे के आरक्षण कार्यालय पहुंचा. कार्यालय बिलकुल खाली पड़ा था. मैं मन ही मन खुश हो उठा कि चलो अच्छा हुआ, अभी 5 मिनट में रिजर्वेशन हो जाएगा.

चंद मिनटों में मेरा नंबर भी आ गया.

‘‘लाइए,’’ यह कहते हुए आरक्षण क्लर्क ने मेरा फार्म पकड़ा और उस पर अपनी पैनी नजर फिरा कर मुझे वापस पकड़ा दिया.

‘‘क्या हुआ?’’ मैं ने चौंक कर पूछा, ‘‘आप ने फार्म वापस क्यों दे दिया?’’

वह क्लर्क हंस कर बोला, ‘‘भाईसाहब, गाड़ी में नो रूम है यानी कि अब जगह नहीं है.’’

‘‘तो कोई बात नहीं, दूसरी गाड़ी में दे दीजिए.’’

‘‘इस समय इस ओर जाने वाली किसी भी गाड़ी में कोई जगह नहीं है.’’

‘‘कैसी बात करते हैं. सारे काउंटर खाली पड़े हैं और आप हैं कि…’’

‘‘ऐसा है, आप तैश मत खाइए. सारी गाडि़यां 2 महीने पहले ही बुक हो गई हैं. अब कहें तो जुलाई का दे दें.’’

एकाएक मुझे खयाल आया कि मैं भी कैसा बेवकूफ हूं. नहीं मिला तो अच्छा ही हुआ. अब कम से कम इस बहाने जाने से तो बचा जा सकता है.

मैं खुशीखुशी घर लौट आया और जैसे ही घर में प्रवेश किया तो यह देख कर हैरान रह गया कि वहां महल्ले की किटी कार्यकारिणी की सभी महिला पदाधिकारी अपने बच्चों सहित मौजूद थीं.

‘‘भाईसाहब, बधाई हो, आप ने शिमला का निर्णय ठीक ही लिया, पर लगे हाथ कुल्लूमनाली भी हो आइएगा,’’ मिसेज वर्मा बोलीं.

‘‘अरे, जब वहां जा रहे हैं तो कुल्लूमनाली को कैसे छोड़ देंगे,’’ श्रीमतीजी चहक कर बोलीं.

‘‘और भाईसाहब, रिजर्वेशन ए.सी. में ही करवाइएगा, नहीं तो आप पूरे रास्ते परेशान हो जाएंगे.’’

‘‘अरे भाभीजी, हमारे साहब के स्वभाव में तकलीफ उठाना तो बिलकुल नहीं है. हम ने तो ए.सी. में ही रिजर्वेशन करवाया है. इन्होंने तो होटल में भी ए.सी. रूम ही बुक करवाए हैं.’’

मुझे काटो तो खून नहीं. केवल स्टेटस सिंबल के लिए श्रीमतीजी झूठ पर झूठ बोलती जा रही थीं.

चायनाश्ते के दौर के बाद जब महिला ब्रिगेड विदा हुई तो मैं धम से सोफे पर पड़ गया.

उन्हें छोड़ कर वे अंदर आईं तो मेरा हाल देख कर घबरा गईं, ‘‘क्या हो गया, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न.’’

मैं ने श्रीमतीजी को रिजर्वेशन की असलियत बताई तो वह बिफर उठीं, ‘‘तुम कैसे आदमी हो, तुम से एक रिजर्वेशन नहीं हुआ. मैं नहीं जानती. मुझे इस बार शिमला जरूर जाना है. अब तो मेरी नाक का सवाल है,’’ कह कर वह अंदर चली गईं.

बेटी, मां की बात सुन कर मुसकराई, ‘‘देखो पापा, मम्मी की नाक का सवाल बहुत बड़ा होता है. इस सवाल में अच्छेअच्छों के कान भी कट जाते हैं. ऐसा करते हैं, गाड़ी कर के चलते हैं.’’

अब इस फैसले को मानने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था.

सीने पर पत्थर रख कर मैं गाड़ी की बात करने गया. गाड़ी का रेट सुन कर मेरे होश उड़ गए, पर क्या करता, श्रीमतीजी की नाक का सवाल सब से बड़ा था. मुझे लगा, जितने पैसे में घूम कर आ जाते, उतना तो गाड़ी ही खा जाएगी, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था.

देखतेदेखते वह दिन भी आ गया. सोसायटी की सभी महिलाएं विदा करने आईं. श्रीमतीजी फूली नहीं समा रही थीं. वह मेरी तरफ ऐसे देख रही थीं जैसे कह रही हों, देखो, मेरी इज्जत. हां, बात करतेकरते सभी महिलाएं अपने लिए शिमला से कुछ न कुछ लाने की फरमाइश कर रही थीं, जिसे श्रीमतीजी सहर्ष स्वीकार करती जा रही थीं. इन फरमाइशों की सूची सुन कर मेरा दिल घबराने लगा था.

अंतत: गाड़ी रवाना हुई तो श्रीमतीजी ने प्रधानमंत्री की तरह हाथ हिला कर सोसायटी वालों से विदा ली. थोड़ी देर में सूरज सिर पर आ गया. लू के थपेड़े चलने लगे. गाड़ी बुरी तरह तप रही थी. जहां हाथ लगाओ वहीं ऐसा लगता था जैसे गरम सलाख दाग दी गई हो. कुछ देर में पत्नी, फिर बेटी धराशायी हो गई.

बेटा मां से लड़ने लगा, ‘‘यह कौन सा हिल स्टेशन है? हम सहारा मरुस्थल में चल रहे हैं क्या?’’

श्रीमतीजी कराहती हुई बोलीं, ‘‘अरे बेटा, यह तेरे पापा की कंजूसी से ऐसा हुआ है. मैं ने तो ए.सी. गाड़ी लाने को कहा था.’’

जवाब में बेटा और बेटी अपने कलियुगी पिता को घूरने लगे. मैं क्या करता, मैं ने निगाहें नीचे कर लीं.

दवाइयां खाते, उलटियां करते जैसेतैसे कर के शिमला तक पहुंचे. शिमला तक का रास्ता आलोचनाओं में अच्छी तरह कटा. उन की आलोचनाओं का केंद्र मैं जो था.

शिमला पहुंच कर सब ने चैन की सांस ली. ड्राइवर ने सड़क के एक ओर गाड़ी लगा दी.

बेटा अचानक गाड़ी को रुकते देख बोला, ‘‘क्यों पापा, होटल आ गया?’’

‘‘हां, बेटा, तेरे पापा ने फाइव स्टार होटल बुक करा रखा है,’’ श्रीमतीजी व्यंग्य से बोलीं.

ड्राइवर भी हैरान रह गया, ‘‘क्या साहब, आप ने होटल भी बुक नहीं करवाया? सीजन का टाइम है. क्या पहली बार घूमने आए हो?’’

‘‘हां, भैया, पहली बार ही आए हैं. हमारी तकदीर में बारबार घूमने आना कहां लिखा है,’’ श्रीमतीजी लगातार वार पर वार कर रही थीं, ‘‘जा बेटा, उठ और होटल ढूंढ़, मेरे तो बस की नहीं है.’’

फिर बेटे और बेटी को ले कर गलीगली घूमने लगा. ज्यादातर होटल भरे हुए थे, हार कर एक बहुत महंगा होटल कर लिया. अब सब बहुत खुश थे.

उस दिन आराम किया. शाम को माल रोड घूमने निकले. मैं उन्हें बता रहा था, ‘‘देखो, रेलिंग के नीचे घाटी कितनी सुंदर लग रही है,’’ पर घाटी को निहारने के बाद अपना सिर घुमाया तो पाया मैं अकेला था. ये तीनों अलगअलग दुकानों में घुसे हुए थे.

थोड़ी देर बाद बेटी आई और हाथ पकड़ कर दुकान में ले गई, ‘‘देखो पापा, कितनी सुंदर ड्रेस है.’’

‘‘अच्छा भई, कितने की है?’’ लाचारी में मुझे पूछना पड़ा.

‘‘बस सर, सस्ती है. आप को डिस्काउंट में दे देंगे. मात्र 2 हजार रुपए.’’

मुझे मानो करंट लगा, ‘‘अरे भई, तुम तो दिन दहाड़े लूटते हो. यह डे्रस तो कोटा में 300-400 से ज्यादा की नहीं मिलती है.’’

दुकानदार ने डे्रस मेरे हाथ से छीन ली, ‘‘कोई दूसरी दुकान देखिए साहब, हमारा टाइम खराब मत कीजिए.’’

बेटी को भारी धक्का पहुंचा. बाहर निकलते ही वह रोने लगी, ‘‘आप भी बस पापा, कितना अपमान करवाते हैं.’’

तभी श्रीमतीजी भी बेटे के साथ आ गईं. बेटी को रोते देख उन्होंने मेरी जो क्लास ली कि मेरी जेब का अच्छाखासा पोस्टमार्टम हो गया.

दूसरे दिन कूफरी घूमने का प्रोग्राम बना. कूफरी में घोड़े वाले पीछे पड़ गए कि साहब, ऊपर पहाड़ी पर चलें. मुझे घुड़सवारी में कोई दिलचस्पी नहीं है और फिर रेट इतने कि मैं ने साफ मना कर दिया.

‘‘तुम ऊपर चले चलोगे तो बच्चों का मन बहल जाएगा. बच्चों का मन रखने के लिए क्या इतना भी नहीं कर सकते.’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं कर सकता,’’ मुझे पत्नी पर गुस्सा आ गया, ‘‘एक बार घर वालों का मन रखने के लिए घोड़ी पर चढ़ा था जिस का मजा आज तक भोग रहा हूं… अब और रिस्क नहीं ले सकता.’’

मेरे इस व्यंग्य को सुन कर श्रीमतीजी ने रौद्र रूप धारण कर लिया. फिर क्या था, मुझे सपरिवार घोड़े की सवारी करनी ही पड़ी. लेकिन जिस बात का डर था, वही हुआ. घोड़े पर से उतरते वक्त मैं संतुलन खो बैठा और धड़ाम से नीचे जा गिरा. मेरे पांव में मोच आ गई. मेरा उस दिन का सफर गाड़ी में बैठेबैठे ही पूरा हुआ. वे बाहर घूमतेफिरते, मजे करते रहे और मैं अंदर बैठाबैठा कुढ़ता रहा.

शाम को वहीं एक डाक्टर को दिखाया. उस ने कहा, ‘‘कोई चिंता की बात नहीं है. एकदो दिन आराम करोगे तो ठीक हो जाएगा.’’

दूसरे दिन सुबह मैं पलंग पर लेटा रहा. तीनों सदस्य अर्थात श्रीमतीजी, पुत्र व पुत्री तैयार होते रहे. थोड़ी देर बाद वे तीनों एकसाथ आ कर मेरे सामने बैठ गए.

मैं बोला, ‘‘कोई बात नहीं. चोट लग गई तो लग गई. तुम लोग परेशान मत हो. जा कर घूम आओ.’’

‘‘हम क्यों परेशान होंगे. हम तो पैसे के लिए बैठे हैं.’’

पैसे ले कर तीनों सुबह के निकले तो रात तक ही लौट कर आए. उन्होंने इतना सामान लाद रखा था कि बड़ी मुश्किल से उठा पा रहे थे.

धीरेधीरे उन्होंने एकएक सामान का रेट बताना शुरू किया तो मेरा दिल बैठ गया. मैं ने खर्च का हिसाब लगाया तो सिर्फ इतने ही रुपए बचे थे कि बस होटल का बिल चुका कर हम जैसेतैसे घर पहुंच सकें.

रात को बैठ कर सारी पैकिंग की गई. कुल्लूमनाली न जाने की बाबत अफसोस जाहिर किया गया और यह चिंता जतलाई गई कि अब श्रीमतीजी घर पहुंच कर कैसे मुंह दिखाएंगी.

दूसरे दिन उदासी भरे चेहरों को ले कर वे शिमला से रवाना हुए और साथ में मुझे लेना भी नहीं भूले.

कुछ घंटों बाद जब हमारी कार पहाड़ों को छोड़ कर मैदानों में पहुंची तो गरमी अपना विकराल रूप दिखाने लगी. लू के थपेड़े खाते हुए जब हम घर पहुंचे तो श्रीमतीजी के आगमन पर पूरा महल्ला इकट्ठा हो गया. श्रीमतीजी रास्ते की थकान भूल गईं.

वह बढ़ाचढ़ा कर शिमला का बखान सुनाने लगीं. सब लोग धैर्य से सुनते रहे. फिर समापन के समय वस्तुवितरण समारोह हुआ. श्रोताओं का धैर्य टूट गया. वे सामानों की आलोचना करने लगे.

‘‘अरे, मिसेज शर्मा, यह शाल थोड़ा आप हलका ले आई हैं.’’

‘‘हां, कपड़े भी ठीक नहीं आए. फुटपाथ से लेने में क्वालिटी हलकी आ ही जाती है.’’

‘‘मिसेज शर्मा, आप ने तो बस घूमने का नाम ही किया, कुल्लूमनाली हो कर आतीं तो कुछ बात भी थी.’’

थोड़ी देर बाद सब चले गए. घर की 3 सदस्यीय ज्यूरी के सामने मैं अपराधी बैठा था. अपराध सिद्ध करने के लिए महल्ले के सभी गवाह पर्याप्त थे.

मुझे दोषी माना गया और सजा दी गई कि अब क्रिसमस की छुट्टियों में गोवा घूमने चलेंगे, जिस का सब इंतजाम बेटा पहले से ही कर लेगा और मुझे सिर्फ एक काम करना होगा, एक भारी राशि का चेक साइन करना होगा ताकि सबकुछ अच्छी तरह से निबट सके. Family Story in Hindi

Social Story in Hindi : हरिराम

Social Story in Hindi :

शशांक अपने आफिस में काम कर रहा था कि चपरासी ने आ कर कहा, ‘‘साहब, आप को बनर्जी बाबू याद कर रहे हैं.’’

उत्पल बनर्जी कंपनी के निदेशक थे. पीठ पीछे उन्हें सभी बंगाली बाबू कह कर संबोधित करते थे. कंपनी विद्युत संयंत्रों की आपूर्ति, स्थापना और रखरखाव का काम करती थी. कंपनी के अलगअलग प्रांतों में विद्युत निगमों के साथ प्रोजेक्ट थे. शशांक इस कंपनी में मैनेजर था.

‘‘यस सर,’’ शशांक ने बनर्जी साहब के कमरे में जा कर कहा.

‘‘आओ शशांक,’’ इतना कह कर उन्होंने उसे बैठने का इशारा किया.

शशांक के दिमाग में खतरे की घंटी बज उठी. उसे लगा कि उस की हालत उस बकरे जैसी है जिसे पूरी तरह सजासंवार दिया गया है और बस, गर्दन काटने के लिए ले जाना बाकी है. शशांक ने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया और चुपचाप कुरसी पर बैठ गया.

‘‘तुम्हारा फरीदाबाद का प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है?’’

‘‘सर, बहुत अच्छा चल रहा है. निर्धारित समय पर काम हो रहा है और भुगतान भी ठीक समय से हो रहा है.’’

‘‘बहुत अच्छा है. मुझे तुम से यही उम्मीद थी, पर मैं तुम्हें ऐसा काम देना चाहता हूं जो सिर्फ तुम ही कर सकते हो.’’

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शशांक चुपचाप बैठा अपने निदेशक मि. बनर्जी को देखता रहा. उसे लगा कि बस, गर्दन पर तलवार गिरने वाली है.

‘‘शशांक, तुम्हें तो पता है कि लखनऊ वाले प्रोजेक्ट में कंपनी की बदनामी हो रही है. भुगतान बंद हो चुका है. हमें पैसा वापस करने का नोटिस भी मिल चुका है. मैं चाहता हूं कि तुम वह काम देखो.’’

‘‘लेकिन वह काम तो जतिन गांगुली देख रहे हैं,’’ शशांक ने कहा.

‘‘मैं ने फैसला किया है कि अब कंपनी के हित में लखनऊ का प्रोजेक्ट तुम देखोगे और जतिन गांगुली फरीदाबाद का प्रोजेक्ट संभालेगा.’’

शशांक की इच्छा हुई कि कह दे कि उस के साथ इसलिए ज्यादती हो रही है क्योंकि वह बंगाली नहीं है. उस ने सोचा कि कंपनी अध्यक्ष से जा कर मिले पर उसे याद आया कि कंपनी अध्यक्ष सेनगुप्ता साहब भी बंगाली हैं. वह भी बंगाली का ही साथ देंगे.

शशांक अपने केबिन में जाने से पहले अपनी सहकर्मी वंदना के केबिन पर रुका.

‘‘वंदना, चलो काफी पीते हैं. मुझे तुम से कुछ पर्सनल बात करनी है.’’

काफी पीतेपीते शशांक ने उसे सारी बात बता दी.

‘‘अगले 3 माह में प्रमोशन के लिए निर्णय लिए जाएंगे. यह मामला जतिन गांगुली के प्रमोशन का है. लखनऊ प्रोजेक्ट की जो उस ने हालत की है, उस से प्रमोशन तो दूर उसे कंपनी से निकाल देना चाहिए,’’ वंदना ने कहा.

‘‘क्या मैं सेनगुप्ता साहब से मिलूं?’’

‘‘नहीं, उस से फायदा नहीं होगा. तुम्हें लखनऊ जाना पडे़गा पर फरीदाबाद प्रोजेक्ट की फाइलों की सूची बना कर, आज की स्थिति की रिपोर्र्ट बना कर तुम जतिन गांगुली के दस्तखत ले लेना और उस की कापी सेनगुप्ता साहब को भेज देना. प्रोजेक्ट में गड़बड़ होने पर वे लोग तुम्हें दोष दे सकते हैं,’’ वंदना ने सुझाव दिया.

कुछ समय तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही.

‘‘शशांक, तुम से एक बात पूछना चाहती हूं. मुझे दोस्त समझ कर सचसच बताना,’’ वंदना बोली.

‘‘क्या बात है?’’

‘‘कहीं तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी सरिता के बीच तनाव तो नहीं?’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘पिछले हफ्ते तुम फरीदाबाद प्रोजेक्ट की मीटिंग में थे तब शाम को 8 बजे सरिता का फोन मेरे घर पर आया था. तुम्हारे बारे में पूछ रही थी.’’

शशांक को अपनी पत्नी पर क्रोध आ गया. पर उस ने कहा, ‘‘उस दिन मैं उसे बताना भूल गया था. इसलिए वह परेशान होगी.’’

‘‘शशांक, प्रोजेक्ट और प्रमोशन के बीच में अपने परिवार को मत भूलो,’’ वंदना ने गंभीरता से कहा.

‘‘आज कोई मीटिंग नहीं थी क्या? जल्दी आ गए,’’ सरिता ने शशांक के घर पहुंचने पर व्यंग्य भरे लहजे में पूछा.

शशांक के मन में क्रोध भरा हुआ था. वह बिना जवाब दिए अपने कमरे में चला गया.

‘‘मुझे लखनऊ वाले प्रोजेक्ट पर काम दिया गया है. कल ही मैं 1 सप्ताह के लिए लखनऊ जा रहा  हूं,’’ उस     ने रात को खाना खाते हुए सरिता से कहा.

‘‘अकेले जा रहे हो? क्या तुम्हारी प्यारी दोस्त वंदना नहीं जा रही है?’’

शशांक को लगा कि उस के संयम की सीमा पार हो चुकी है और वह अभी सरिता के गाल पर तमाचा लगा देगा. पर वह आग्नेय नेत्रों से सरिता को देख कर आधा खाना खा कर ही उठ गया.

दूसरे दिन लखनऊ पहुंच कर शशांक कंपनी के अतिथिगृह में ठहरा, जहां उस की  मुलाकात अतिथिगृह के प्रभारी हरिराम से हुई.

‘‘नमस्ते साहब,’’ हरिराम ने हाथ जोड़ कर कहा.

शशांक ने अनुमान लगाया कि हरिराम की उम्र करीब 50-55 की होगी. हट्टाकट्टा शरीर पर साफ कुरता- पायजामा, ठीक  से संवारे गए सफेद बाल, दाढ़ीमूंछ साफ, करीब 5 फुट 8 इंच ऊंचाई लिए हरिराम आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक लग रहा था.

कमरे में जा कर शशांक ने लखनऊ पहुंचने पर सरिता को फोन किया.

रात को खाना खातेखाते शशांक ने हरिराम से उस के बारे में पूछा.

‘‘साहब, मेरे पिता इस अतिथिगृह में थे. मैं बचपन से उन की सहायता करता था. बीच में 10 साल के लिए मुंबई गया था, एक कारखाने में काम करने. पिता की अचानक मृत्यु हो गई. मां अकेली थीं, इसलिए मुंबई छोड़ कर लखनऊ आना पड़ा. पिछले 10 साल से इसी अतिथिगृह में आप सब की सेवा कर रहा हूं.’’

‘‘तुम्हारे परिवार में कौनकौन हैं?’’

‘‘बस, मैं अकेला हूं,’’ कह कर वह दूसरे कमरे में चला गया. शायद वह इस बारे में बात नहीं करना चाहता था.

दूसरे दिन शशांक प्रोेजेक्ट आफिस गया तो उसे चारों ओर से अपनी कंपनी की आलोचना ही सुनने को मिली. उत्तर प्रदेश विद्युत निगम के अधिकारियों ने एक ही बात की रट लगाई कि पैसा वापस करो और दफा हो जाओ यहां से. उस की कंपनी के ज्यादातर कर्मचारी नदारद थे.

लज्जित शशांक गुस्से से भरा शाम को अतिथिगृह वापस लौटा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि स्थिति से कैसे निबटा जाए. उसे कुछ समय के लिए सब से विरक्ति सी हुई. उस का मन किया कि कंपनी को त्यागपत्र भेज कर, दूर पहाड़ों में चला जाए.

खाना खा कर वह टहलने के लिए निकल पड़ा. 1 घंटे के बाद वापस आ कर सोने की तैयारी करने लगा. एकाएक उसे खयाल आया कि उस का पर्स जिस में करीब 5 हजार रुपए थे, गायब है. उस ने अपनी पैंट की जेब, बाथरूम आदि में ढूंढ़ा पर पर्स नहीं मिला.

उस ने सोचा कि कहीं यह करामात हरिराम ने तो नहीं कर दिखाई.

शशांक ने हरिराम को बुला कर बहुत डांटा, धमकाया और पर्स वापस करने के लिए कहा.

हरिराम चुपचाप खड़ा रहा. उस की आंखों में आंसू आ गए. वह कुछ नहीं बोला.

‘‘मैं तुम्हें सुबह तक का समय देता हूं. यदि तुम ने मेरा पर्स वापस नहीं किया तो मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

शशांक रात को अपने कमरे में बैठा काफी देर तक सोचता रहा कि इस नई समस्या से कैसे निबटा जाए. सोने के लिए लेटा तो उसे तकिया टेढ़ामेढ़ा लगा. तकिया उठाया तो उस के नीचे पर्र्स था. शशांक को याद आया कि उस ने इस डर से पर्स तकिए के नीचे छिपा दिया था कि कहीं हरिराम उसे चुरा न ले.

शशांक को खुद पर शर्म महसूस हुई. वह हरिराम के कमरे में गया और उसे अपने कमरे में बुला कर लाया. शशांक ने हरिराम को बताया कि वह किस परेशानी में यहां आया था. किस तरह वह क्षेत्रवाद, भाषावाद का शिकार हो रहा है. इसी परेशानी में उस से यह अपराध हो गया, जिस के लिए वह शर्मिंदा है.

‘‘साहब, यह बडे़ दुख की बात है कि हम पहले हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बंगाली, मराठी आदि हैं और बाद में भारतीय. इस सोच ने हमारे देश की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा डाली हुई है.’’

शशांक को किसी हिंदू से बाबरी मसजिद के बारे में यह विचार सुन कर आश्चर्य हुआ. उसे लगा कि उस के सामने एक सच्चा भारतीय खड़ा है.

‘‘पर क्या किया जा सकता है, हरिराम?’’ उस के मुंह से निकला.

‘‘क्या आप कर्म पर विश्वास करते हैं?’’

‘‘हां, बिलकुल.’’

‘‘आप यह क्यों नहीं सोचते कि इस लखनऊ वाले प्रोजेक्ट ने आप को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने का अवसर दिया है? उत्तर प्रदेश विद्युत निगम के अधिकारी हमारी कंपनी के शत्रु नहीं हैं. आप को उन की समस्याओं का समाधान करना चाहिए.’’

‘‘हरिराम, तुम ठीक कहते हो. अब रात बहुत हो गई है, थोड़ा सो लेते हैं.’’

अगले दिन शशांक ने अपनी कंपनी के कर्मचारियों से मिल कर भविष्य की कार्यप्रणाली तय की. इस के बाद उस ने उत्तर प्रदेश विद्युत निगम के अध्यक्ष से मिल कर 3 महीने का समय मांग लिया और उन्हें यह आश्वासन भी दिया कि वह लखनऊ से बाहर नहीं जाएगा.

शशांक सुबह नाश्ते के बाद प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रवाना हो जाता था और रात को काफी देर के बाद वापस आता था. इस से कंपनी के कर्मचारियों में नई जान आ गई.

एक दिन शशांक रात को आया तो अतिथिगृह में ताला लगा था. वह पास के बगीचे में टहलने के लिए चला गया. वहीं उसे हरिराम अकेले एक बैंच पर सिर झुकाए बैठा मिल गया.

‘‘हरिराम, तुम यहां क्या कर रहे हो?’’

हरिराम ने उसे देखा और फिर यह कहते हुए कि आओ, शशांक बाबू, बैठो, उस ने शशांक का हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा दिया.

शशांक ने हरिराम के मुंह से शराब की गंध महसूस की.

‘‘जानते हो यह कौन है?’’ हरिराम ने शशांक को एक तसवीर दिखाते हुए कहा.

शशांक ने देखा, तसवीर में एक महिला, 4-5 साल के बच्चे के साथ थी.

‘‘यह सीता है, मेरी पत्नी और यह रमेश है, मेरा बेटा. मैं मुंबई में काम करता था. अपनी सीता पर शक करता था. रोज उसे पीटता था. वह बेचारी कब तक जुल्म सहती. एक दिन मुझे छोड़ कर बेटे के साथ कहीं चली गई,’’ कह कर हरिराम ने सिर झुका लिया.

‘‘तुम ने उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘बहुत ढूंढ़ा, बहुत खोजा पर कहीं पता नहीं चला. आज आप की मेमसाहब का फोन आया था. परिवार के बिना जिंदगी गुजारना बहुत कठिन है साहब. इस का दर्द मैं जानता हूं,’’ कह कर वह फूटफूट कर रोने लगा.

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के समय हरिराम ने संकोच के साथ कहा, ‘‘साहब, कल नशे में कुछ गुस्ताखी हो गई हो तो माफ कीजिएगा.’’

दिन भर शशांक, हरिराम और अपनी जिंदगी के बारे में सोचता रहा. उस का और सरिता का कालिज का 3 साल तक प्यार, एक परिवार का सपना, विवाह, उस का काम में व्यस्त होना, कंपनी में प्रमोशन के लिए भागदौड़, सरिता की शिकायतें, अहं का टकराव फिर लड़ाई, उस का तंग आ कर सरिता पर हाथ उठाना, सरिता की आत्महत्या की धमकी, हमेशा एक तनाव भरी जिंदगी जीना.

‘नहीं, हमारी पे्रम कहानी का यह अंत नहीं होना चाहिए,’ शशांक के अंतर्मन से यह आवाज निकली और शाम को उस ने सरिता को फोन किया.

‘‘हेलो,’’ फोन सरिता ने उठाया था.

‘‘हेलो, क्या कर रही हो?’’ शशांक ने नम्र स्वर में पूछा.

‘‘यों ही बैठी हूं.’’

‘‘सरिता, मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं. मैं यहां लखनऊ में तुम्हारे बिना बहुत अकेला महसूस कर रहा हूं.’’

एक क्षण को सरिता के मन में आया कि बोले वंदना को बुला लो, पर दूसरे क्षण उस का अपनेआप पर नियंत्रण न रहा और वह फूटफूट कर रो पड़ी.

शशांक की आंखों में भी आंसू आ गए.

‘‘सरु, क्या तुम यहां आ सकती हो?’’

‘‘मैं कल ही पहुंच रही हूं, शशांक,’’ सरिता ने रोतेरोते कहा.

शशांक दूसरे दिन शाम को कमरे में दाखिल हुआ तो सरिता उस का इंतजार कर रही थी.

‘‘शशांक, मुझे माफ कर दो.’’

शशांक ने सरिता को गले से लगा लिया.

‘‘गलती मेरी ज्यादा है. मैं काम के जनून में तुम्हें नजरअंदाज करने लगा था. मैं ने तुम्हें बहुत दुख दिया है न सरू ?’’

रात को खाना खाने के बाद हरिराम ने सरिता से कहा, ‘‘मेमसाहब, आप के आने से साहब बहुत खुश हैं. इन्होंने आज 2 रोटियां ज्यादा खाई हैं,’’ फिर उस ने शशांक से कहा, ‘‘साहब, कल छुट्टी है. आप मेमसाहब को बड़ा इमामबाड़ा, बारादरी, गोमती नदी का किनारा आदि जगह घुमा कर लाइए. हां, शाम को अमीनाबाद से इन के लिए चिकन की साड़ी खरीदना मत भूलिएगा.’’

दूसरे दिन इमामबाड़ा की भूलभुलैया में दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर रास्ता खोजते रहे. शशांक और सरिता को लगा कि उन के कालिज के दिन लौट आए हैं.

शाम को गोमती के किनारे बने पार्क में बैठेबैठे सरिता ने शशांक के कंधे पर सिर रख दिया और आंखें बंद कर लीं.

‘‘सरू, तुम्हें पता है, मुझ में आए इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है…इस का जिम्मेदार हरिराम है,’’ उस ने सरिता के बालों को सहलाते हुए उस शाम की घटना बता दी.

शशांक दूसरे दिन प्रोजेक्ट पर पहुंचा तो वह खुद को बहुत हलका महसूस कर रहा था. उस ने पाया कि उस में कुछ कर दिखाने की इच्छाशक्ति पहले से दोगुनी हो गई है.

इधर सरिता ने हरिराम के कमरे में जा कर कहा, ‘‘काका, आप के कारण मेरी खोई हुई गृहस्थी, मेरा परिवार मुझे वापस मिला है. मैं आप की जिंदगी भर ऋणी रहूंगी. मैं अब आप को काका कह कर बुलाऊंगी.’’

हरिराम ने भावुक हो कर सरिता के सिर पर हाथ फेरा.

‘‘काका, अब मैं यहीं रहूंगी और खाना मैं बनाऊंगी आप आराम करना.’’

‘‘नहीं बिटिया, मेरा काम मत छीनो. हां, अपनेआप को व्यस्त रखो और कुछ नया करना सीखो.’’

सरिता ने चित्रकला सीखनी शुरू कर दी. शशांक के प्रयासों से लखनऊ प्रोजेक्ट में पहले धीमी और फिर तेज प्रगति होने लगी. उत्तर प्रदेश विद्युत निगम ने कंपनी को भुगतान शुरू कर दिया. यही नहीं, उस प्रोजेक्ट के विस्तार का काम भी उस की कंपनी को मिल गया.

1 माह के बाद सरिता ने हरिराम से कहा, ‘‘काका, आप के कारण मुझे अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है. मैं दिल्ली में बिलकुल खाली रहती थी. इस कारण मेरा दिमाग गलत विचारों का कारखाना बन गया था. बजाय शशांक की परेशानी समझने के मैं अपने पति पर शक करने लगी थी.’’

हरिराम के लाख मना करने पर भी सरिता ने उस का एक बड़ा चित्र बनाया.

इधर दिल्ली में कंपनी अध्यक्ष      मि. सेनगुप्ता के सामने निदेशक मि. उत्पल बनर्जी पसीनापसीना हो रहे थे.

‘‘मि. बनर्जी, आप को पता है कि हरियाणा विद्युत निगम ने कंपनी को फरीदाबाद प्रोजेक्ट के लिए कोर्ट का नोटिस भेजा है?’’

‘‘सर, शशांक बहुत गड़बड़ कर के गया है. उस ने कोई कागज न गांगुली को और न मुझे दिया है. बिना कागज के तो….’’

‘‘मि. बनर्जी, आप मुझे क्या बेवकूफ समझते हैं?’’

‘‘नहीं सर, आप तो…’’

‘‘मि. बनर्जी, सारी गड़बड़ आप के दिमाग में है. आप आदमी का मूल्यांकन उस के काम से नहीं बल्कि उस के बंगाली होने या न होने से करते हैं.’’

‘‘मेरे पास उन फाइलों और रिपोर्टों की पूरी सूची है जो शशांक, जतिन गांगुली को दे कर गया है.’’

‘‘यस सर.’’

‘‘आप और गांगुली 1 सप्ताह के अंदर फरीदाबाद वाले प्रोजेक्ट को रास्ते पर लाइए या अपना त्यागपत्र दीजिए.’’

‘‘सर, 1 सप्ताह में…’’

‘‘आप जा सकते हैं.’’

1 सप्ताह के बाद मि. उत्पल बनर्जी और मि. गांगुली कंपनी से निकाले जा चुके थे. मि. सेनगुप्ता ने शशांक को फोन कर के कंपनी की इज्जत की खातिर फरीदाबाद प्रोजेक्ट का अतिरिक्त भार लेने को कहा.

‘‘हरिराम, तुम ने ठीक कहा था. ईमानदारी और मेहनत से काम करने पर हर व्यक्ति की प्रतिभा का मूल्यांकन होता है,’’ शशांक दिल्ली के लिए विदा लेते समय बोला.

‘‘काका, आप की बहुत याद आएगी,’’ सरिता बोली.

1 माह बाद फरीदाबाद प्रोजेक्ट भी ठीक हो गया और शशांक को दोहरा प्रमोशन दे कर कंपनी का जनरल मैनेजर बना दिया गया. उस ने हरिराम को अपने प्रमोशन की खबर देने के लिए फोन किया तो पता चला कि हरिराम नौकरी छोड़ कर कहीं चला गया है.

शाम को शशांक ने हरिराम के बारे में सरिता को बताया तो वह गंभीर हो गई, फिर बोली, ‘‘हरिराम काका शायद अपने बिछुड़े  परिवार की तलाश में गए होंगे या शांति की तलाश में.’’

आज 3 साल बाद शशांक कंपनी में निदेशक है. सरिता ने चित्रकला का स्कूल खोला है. उन की बैठक में हरिराम का सरिता द्वारा बनाया हुआ चित्र लगा है.

Social Story in Hindi

Social Story in Hindi : गुरु की शिक्षा

Social Story in Hindi :

कहते हैं, ‘घर आया मेहमान, भगवान समान’ पर अब वह बात कहां. हां, हमारे यहां कोई आए, तो हम तो उसे तब तक न छोड़ें जब तक वह खुद न जाने को चाहे.’’

यह सुन कर सुमति ने पद्मा की ओर देखा तो पद्मा कसमसा कर रह गई.

‘‘अच्छा बहू, इस बार आश्रम आना. तू ने तो देख रखा है, कैसा अच्छा वातावरण है. सत्संग सुनेगी तो तेरे भी दिमाग में गुरु के कुछ वचन पड़ेंगे, क्यों जी?’’

‘‘हां जी,’’ मामाजी का जवाब था.

बड़ी मामी को विदा करने के बाद सब हलकेफुलके हो कर घर लौटे. घर आ कर समीर ने पूछा, ‘‘क्यों मां, कब का टिकट कटा दूं?’’

‘‘कहां का?’’ पद्मा ने पूछा.

‘‘वहीं, तुम्हारे आश्रम का. बड़ी मामी न्योता जो दे गई हैं.’’

‘‘न बाबा, मैं तो भर पाई उस गुरु से और उस की शिष्या से. कान पकड़ लेना, जो दोबारा उन का जिक्र भी करूं. शिष्या ऐसी तो गुरु के कहने ही क्या. सच, आज तक मैं ऊपरी आवरण देखती रही. सुनीसुनाई बातों को ही सचाई माना. परंतु सच्ची शिक्षा है, अपने अच्छे काम. ये पोंगापंथी बातें नहीं.’’

‘‘सच कह रही हो, मां?’’ आश्चर्यचकित समीर ने पूछा.

‘‘और नहीं तो क्या, क्यों जी?’’

और समवेत स्वर सुनाई दिया, ‘‘हां जी.’’

Social Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : हम तैयार हैं आतंकियों – ऐसे सुलझेगी आतंकवाद की समस्या

Satirical Story In Hindi : आतंकवाद से निबटने के उपायों की बिगड़ती स्थिति की बेहद जरूरी समीक्षा के लिए नियमित मीटिंग न हो सकने पर एक इमरजेंसी मीटिंग हुई, जिस में राजनीतिक, मीडिया, चिकित्सा, धार्मिक, सामाजिक व सरकारी आदि सभी तरह के नुमाइंदे शामिल हुए. भारतीय परंपरा के मुताबिक सब से पहले अध्यक्ष का चुनाव किया गया. कोई पंगा न हो इसलिए सरकारी नुमाइंदे को ही सब की सहमति से अध्यक्ष चुना गया. इस से वह प्रसन्नचित्त भी हो गए. मीटिंग शुरू हुई.

सभी अपनीअपनी की गई तैयारी बताने के लिए अच्छे ढंग से तैयार हो कर आए थे. सूचना युग में सब से पहली बारी मीडिया की आई. मीडिया की तरफ से एक चैनल वाला और एक अखबार वाला था. चैनल वाले ने सूचित किया कि मुझे मेरे चैनल वालों ने नया अति आधुनिक तकनीक वाला कैमरा खरीद कर दिया है क्योंकि मेरा पुराना कैमरा बीचबीच में पंगा करता था. अब हम आतंकवादियों के कारनामों व उस के परिणामों को निर्बाध रूप से कवर कर के दिखाएंगे. मैं ने अपने सूचना सूत्रों को भी कस दिया है जहां भी कोई आतंकी हादसा होगा, मेरे मोबाइल पर इस का फास्ट मैसेज आएगा और मैं सीधा घटनास्थल की तरफ रुख करूंगा. मैं ने अपनी बाइक की टंकी पावर पेट्रोल से फुल कर ली है, इमरजेंसी में खाने के लिए मनपसंद एनर्जी बिस्कुट, केक, डिं्रक्स आदि रख ली हैं. मैं पूरी तरह से तैयार हूं.

अखबार वाले ने कहा, ‘‘हम इन टीवी वालों से कतई पीछे नहीं रहेंगे. जो ये दिखाएंगे हम उसी घटना को नए अंदाज में, अधिक प्रभावशाली व तकनीकी दक्षता के साथ फोटो को कलर व बढि़या कागज पर छापेंगे और खबरों को अधिक विश्वसनीय व खोजी बनाएंगे.’’

चिकित्सा विभाग के बीमार से लग रहे नुमाइंदे ने अपनी खांसी को जबरन काबू करते हुए, लगभग यह दिखाते हुए कि खांसी नहीं हो रही, कहा, ‘‘यों तो हमारे पास हमेशा की तरह ज्यादा उपकरण व सुविधाएं नहीं हैं क्योंकि हम ने जो दवाइयां, इंजेक्शन व अन्य सामान मंगवाया था वह बजट की कमी के कारण अभी तक पहुंचा नहीं है पर हम ने दवाइयां व उपकरण बनाने वाली कंपनियों से सीधा संपर्क कर लिया है. वे हमारे इस मानवीय प्रयास को प्रायोजित करने के लिए एकदम तैयार हैं. वे दवाइयां, इंजेक्शन व अन्य सामान देंगी जिस के एवज में आतंकवादी प्रभावित क्षेत्रों में हमें उन के बैनर लगा कर उन्हें सहयोग करना होगा जिस के लिए हमारे विभाग ने कमर कस ली है. चाहे कुछ भी हो जाए हम पीछे नहीं हटेंगे व अपने उद्देश्य में सफल रहेंगे.

‘‘विभाग बिलकुल तैयार है. हम ने इस कार्यक्रम में शहर के सफल एनजीओ व अन्य सामाजिक संस्थाओं को भी हाथ बटाने को कहा है.’’

शहर की सामाजिक संस्थाओं के 1 नहीं 3 प्रतिनिधि वहां पर थे. उन्होंने एक सम्मिलित स्वर से, चिकित्सा विभाग के नुमाइंदे को बीच में ही रोक कर कहा, ‘‘हमारा के्रडिट क्यों हथिया रहे हो भाई, हम ने तो हमेशा की तरह खुद ही मुफ्त आफर दिया है. आप को हम ससम्मान सूचित कर देना चाहते हैं कि आतंकवादी घटना वाले इलाकों में लोगों की सेवा करने के लिए हम प्रसिद्ध हैं. कितने ही प्रमाण एवं प्रशंसापत्र हमारे पास सुरक्षित हैं.’’

दूसरा बोला, ‘‘यह देखिए, बड़ेबड़े अखबारों की कटिंग्स जिस में छपी फोटो व खबरों से पता चलता है कि हम ने कितनी समाजसेवा की है. हमारा गु्रप तैयार रहेगा. बस, हमें सूचित कर दीजिएगा और यदि वहां पहुंचने के लिए गाड़ी उपलब्ध करवा देंगे तो और अच्छा होगा. हम आप के आभारी होंगे. इस सहयोग के लिए हम आप को प्रशंसापत्र भी दिलवाएंगे, किसी वीआईपी के करकमलों द्वारा एक बढि़या कार्यक्रम में जिस में खानपान भी होगा.’’

धार्मिक नुमाइंदे को ऐसा लगा जैसे उसे चुप रखा जा रहा है. उस ने मानो पुलिस की बारकेड तोड़ कर बात की, ‘‘हम धर्म की बात कर रहे हैं, हमारी सुनिए, हमारी सुनिए.’’ धर्म का मामला था, सब चुप हो गए. वह कहने लगे, ‘‘हम सभी धर्मावलंबियों ने मिल कर हमेशा मानवता की सेवा की है, जहांजहां धार्मिक फसाद हुए, हम ने जा कर सभी वर्गों की मदद की है. उन के लिए स्वादिष्ठ भोजन के लंगर लगाए हैं. मुसीबत में फंसी मानवता के लिए धार्मिक व आध्यात्मिक रास्ता खोजने के दर्जनों ईमानदार प्रयास किए हैं. प्रार्थना सभाएं आयोजित की हैं, टीवी पर इन का लाइव कवरेज भी कराया है, आप सभी ने देखा होगा. हमारे प्रयासों से आतंक प्रभावित क्षेत्र के लोगों को कठिन स्थिति में संभलने का आत्मबल मिला है. सब को भरपूर दान देने का अवसर भी हम ने दिया है. हमारा मानना है कि सभी धर्म दान लेने में बराबर के अधिकारी हैं.’’

सरकारी नुमाइंदे को लगा कि मीटिंग लंबी हो रही है, समय हमेशा की तरह कम व कीमती है और सभी को अपनेअपने घर सुरक्षित पहुंचना है, अत: सभी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘दोस्तो, मैं आप सब का इतनी सक्रियता से सोचने व जरूरी प्रबंध करने यानी आतंकवाद से कुशलता से निबटने के लिए तैयार रहने की प्रवृत्ति को धन्यवाद करता हूं. माफ करें, पुलिस के प्रतिनिधि टै्रफिक जाम में फंस जाने के कारण मीटिंग में नहीं आ सके, उन्होंने मोबाइल से सूचित किया है कि उन के सभी इंतजामात बिलकुल पुख्ता हैं. मैं सरकार की ओर से आप को सच्चा आश्वासन दिलाता हूं कि इस बार आतंकवाद से प्रभावितों को मुआवजा दिलाने में देर नहीं की जाएगी.’’

मीटिंग काजू, बादाम, बिस्कुट, चाय के साथ संपन्न हुई. रिकार्ड रखने के लिए फोटो भी खिंचे और प्रेस रिलीज भी जारी की गई जिस के आधार पर अगले रोज खबर भी छपी जिस की हैडलाइन थी, ‘आतंकवाद से निबटने के लिए सब तैयार.’ Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : बेटा बकना सीख रहा है

Satirical Story In Hindi : बेटा शब्द भी बड़े कमाल का शब्द होता है दोस्तो. मांबाप किसी को ले कर चिंतित रहें या न रहें, पर इस शब्द को ले कर बड़े चिंतित रहते हैं. इस के होने से ले कर इस के बाप बन जाने के बाद तक भी. या कहें मांबाप जब तक यहां से प्रस्थान नहीं कर जाते.

इतिहास उठा कर देख लीजिए. दशरथ से ले कर धृतराष्ट्र तक, धृतराष्ट्र से ले कर अपने दोस्त तक, बेचारे सब बाप अपने बेटों को ले कर परेशान ही रहे. सारी उम्र कट गई उन की अपने बेटों को स्थापित करतेकरते. इस चक्कर में कई बेचारे बाप बेटों को स्थापित करतेकरते खुद विस्थापित हो गए. उस के बाद भी किसी बाप ने आज तक उन विस्थापित बापों से कोई सीख नहीं ली.

काल बदले, युग बदले, पर बेटों को ले कर मांबापों की चिंता कम होने के बजाय और भी बढ़ी ही है, बल्कि आज तो यह हाल है कि मांबाप अपने बेटों को ले कर कुछ अधिक ही चिंतित दिखते हैं. जब देखो अपना वर्तमान छोड़, बस, उन के भविष्य के बारे में डूबे दिखते हैं.

इसी चिंता में डूबे हुए एक अदद बेटे के बाप मेरे पास आए. आते ही अपना दुख कम करने के लिए अपना दुखड़ा सुनाने लगे, ‘यार, बहुत कोशिश कर ली. बेटा है कि लिखनापढ़ना तो सीखा ही नहीं, बोलना भी नहीं सीख रहा. इतना बड़ा हो गया. अब तुम ही कुछ बताओ कि बेटे को कैसे बोलना सिखाऊं? कम से कम बोलना सीख जाता तो…’

मामला पेचीदा था. बेटे का भी और बाप का भी. मैं ने चुटकी लेते कहा, तो तुम्हें और क्या चाहिए मेरे दोस्त. ऐसे बेटे आज की तारीख में कम लोगों को ही मिलते हैं वरना आज के बेटे तो पैदा होते ही बाप को कहने लग जाते हैं कि कैसे बाप हो तुम भी? क्या है तुम्हारे घर में? अगर मेरा ऐसे ही वैलकम करना था तो क्यों बुलाया मुझे अपने घर में? भले ही बाप ने 10 बेटियों के बाद 11वीं बार में इसे बुलाया होे.

‘ऐसा करो, उसे चिडि़यों के साथ रखो. चिडि़यों के साथ रहने पर वह खुद बोलना सीख जाएगा,’ मैं ने उन्हें और्गेनिक फार्मूला सुझाया तो वे बोले, ‘चिडि़यां अब दिखती ही कहां हैं मेरे दोस्त. सारे जतनकर हार गया. उसे

2 किलो सुहागा चटा चुका हूं. चिडि़यों को ढूंढ़ढूंढ़, उन की मिन्नतें कर अपने घर के आंगन में बुला उन के साथ भी रखा. पर उस की जबान न खुली. तुम्हारे सामने ही यह सच कह  रहा हूं. वह, बस, बोलना सीख जाए, इस के लिए उसे कुत्तों के साथ भी रखा, भेडि़यों के साथ भी रखा. और तो और, उसे सियारों के साथ भी रखा. समय जाने किसकिस के साथ नहीं रखा, पर सोच कर बोलना तो दूर, बिन सोचे हुए भी बोलना नहीं सीखा तो नहीं सीखा. अब तुम ही कहो इस का क्या करूं? बस, दिनरात एक यही चिंता घुन की तरह खाए जा रही है.’

इतना कह कर उन्होंने मेरे सिर में अपना हाथ दिया तो मुझे पता चल गया कि वे हद से अधिक परेशान हैं, सो, उन का हाथ उन के सिर में दे कुछ देर तक मैं गंभीर समस्या पर अपने सिर को अपने हाथ का सहारा दे सोचता रहा. सोचने से क्या नहीं हो जाता. और आज का दौर तो केवल और केवल सोचने का है. काम करने का नहीं. इसीलिए सोचने वाले चांदी कूट रहे हैं और मेहनत करने वाले छाती पीट रहे हैं.

‘यार, एक आइडिया है?’ मैं ने कहा तो हर बाप की तरह वे भी उछले. उन्हें लगा कि उन के बेटे की नैया पार लगे या न लगे, पर उन की नैया जरूर पार लगने वाली है. कई बार भ्रम में जीने का भी अलग ही मजा होता है.

‘कहो,’ कह वे मेरा मुंह ताकने लगे कि आगे मेरा मुंह क्या उगलता है. भले ही आज तक उस ने निगला ही निगला हो.

‘मेरे एक दोस्त नेता हैं. ऐसा कमाल बकते हैं, ऐसा बकते हैं कि बड़ेबड़ों की बोलती बंद करवा देते हैं. हाय, कुल मिला कर क्या गजब का बकते हैं. क्या वाहियात बकते हैं. जब वे बकने लगते हैं तो सब बस उन का मुंह देखते रह जाते हैं. वे जब बकने लगते हैं तो इतना बकते हैं कि उन्हें चुप करवाने के लिए उन के आगे नाक रगड़नी पड़ती है कि बंधु, बहुत बक लिए. सेहत के लिए अब चुप भी हो जाओ, प्लीज. तुम्हें कल फिर बकना है. वे रोटीपानी के बिना रह सकते हैं पर बके बिना नहीं.’

‘मतलब?’ वे चौंके.

‘उन की शागिर्दी में तुम्हारे बेटे को छोड़ देते हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि उन के पास रह वह जरूर बकना…मेरा मतलब है कि बोलना सीख जाएगा.’

‘पर उन से बात कौन करेगा?’ यह कह कर वे मायूस से हुए तो मैं ने कहा, ‘वह तो मैं कर लूंगा.’

अगले दिन हम दोस्त के बेटे व दोस्त को ले कर उन के घर पहुंच गए. उस वक्त भी वे बक तो नहीं, पर बड़बड़ा जरूर रहे थे. उन्होंने हमें देखते ही बड़बड़ाना छोड़, बकना शुरू किया तो मैं ने उन के आगे हाथ जोड़ कर कहा, ‘नेताजी, आप के पास एक शिष्य को लाया हूं. इसे स्वीकार कीजिए.’

‘क्या करना है इस का?’ वे सिर से टोपी उठाते हुए बोले.

‘सर, यह बोलता बहुत कम है. या कि बोलता ही नहीं. अगर बोलता भी है तो तुतला कर बोलता है, 30 का होने के बाद भी,’ दोस्त ने हाथ जोड़े स्थिति स्पष्ट की.

‘तो?’ वे उन के बेटे को निरखतेपरखते गंभीर हुए.

‘इसे बोलना कम, बकना सिखा दो. ये आप के तहेदिल से आभारी रहेंगे,’ कह मैं ने उन के बेटे के हाथों से तुरंत उन के चरणों में बतौर ऐडमिशन 4 श्रीफल

और 4 धोतीकुरते रखवाए, तो वे उस की ओर देखते बोले, ‘ठीक है, पट्ठे को ऐसा बकना सिखाएंगे कि…ठीक समय पर आए हो. चुनाव के दिन हैं. बकते तो हम अकसर हरदम ही रहते हैं पर चुनाव के दिनों में तो बकना बहुत ही जरूरी होता है.

‘जो जितना बके वह उतना ही बड़ा नेता. चुनाव के दिन वैधानिक रूप से हमारे बकने के दिन होते हैं और जनता के पकने के. छोड़ जाओ पट्ठे को. इस को ऐसा बोलना कम बकना सिखाएंगे कि महीने के बाद ही बड़ेबड़ों कि बोलती बंद न कर दे तो हमारा शार्गिद नहीं. देशदुनिया को भी पता चल जाएगा कि पट्ठा किस का शार्गिद है,’ कह उन्होंने उन के बेटे की पीठ पर हाथ रखा.

महीने बाद दोस्त घर आए तो बेहद खुश. पहली बार किसी बाप को खुश देखा तो अपने को भरापूरा महसूस किया. आते ही गले लगे. गले भी ऐसे लगे कि मेरी पीठ में दर्द हो गया. पहली बार किसी खुश बाप से पाला पड़ा था. बड़ी मुश्किल से उन की भुजाओं के बंधन से अपने को जैसेतैसे मुक्त कराया तो वे पगलाए से बोले, ‘बधाई हो यार, बेटा बोलना सीख गया,’ कह उन्होंने एकसाथ कई लड्डू मेरे मुंह में ठूंसे. तो मैं ने उन से निवेदन किया, ‘यार, मरा तो नहीं जा रहा हूं. एकएक कर जितने खिलाने हैं खिला. पर मेरी सांस तो न रोक. तुम मुझे अपनी खुशी में शामिल करते हुए मुझे लड्डू खिला रहे हो या ऊपर पहुंचाना चाहते हो?’

‘सौरी यार,’ वे पागलपन से पूरे नहीं, पर जरा पीछे हटे और अबनौर्मल से कुछ नौर्मल होते बोले, ‘यार, कमाल का गुरु दिया तुम ने मेरे बेटे को. कल शाम को घर आया था घंटेभर को बेटा, पर 2 घंटे तक वह बिना ब्रेक के ऐसा बोलता रहा, ऐसा बोलता रहा कि…मैं तो बस उस का मुंह ही देखता रह गया. लगा ही नहीं कि वह मेरा वही बेटा है. वही मेरा बेटा है जो कल तक तुतलाता था,’ कह उन्होंने फिर मेरे मुंह में 4 लड्डू एकसाथ जबरदस्ती ठूंसने की कोशिश की तो मैं ने उन्हें सचेत करते कहा, ‘बंधु, एकएक प्लीज. मुझे खुशी है कि कम से कम तुम्हारा बेटा बोलना सीख रहा है. अब वह दिन दूर नहीं जब वह इतना बोलेगा, इतना बोलेगा कि…’

‘पर वह बकवास ही अधिक कर रहा था,’ एक बाप की तरह वे फिर चिंतित हुए. ये बाप भी न, अपने बेटों से कभी प्रसन्न होते ही नहीं. अपने बच्चों को ले कर इन की किस्मत में सातों दिन चौबीसों घंटे चिंता में ही रहना बदा होता है, शायद. सो, मैं ने उन्हें चिंता से उबारने की कोशिश करते कहा, ‘बंधु, सच पूछो तो सार्थक कहने को हमारे पास कुछ होता ही नहीं. हमें सार्थक कहना हो तो दो शब्दों से आगे कुछ कह ही न पाएं. तभी तो सब, बस, बकने को बोले जा रहे हैं.’

‘सच?’

‘हां, मेरे दोस्त,’ मैं ने कहा तो मुझे लगा कि वे मेरे कहने से संतुष्ट हो गए. उन्होंने बचे हुए लड्डुओं का डब्बा वहीं टेबल पर रखा और तालियां बजाते, पता नहीं क्या गाते अपने घर की ओर निकल लिए. Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : मौन – जब दो जवां और अजनबी दिल मिले

Romantic Story in Hindi : सर्द मौसम था, हड्डियों को कंपकंपा देने वाली ठंड. शुक्र था औफिस का काम कल ही निबट गया था. दिल्ली से उस का मसूरी आना सार्थक हो गया था. बौस निश्चित ही उस से खुश हो जाएंगे. श्रीनिवास खुद को काफी हलका महसूस कर रहा था. मातापिता की वह इकलौती संतान थी. उस के अलावा 2 छोटी बहनें थीं. पिता नौकरी से रिटायर्ड थे. बेटा होने के नाते घर की जिम्मेदारी उसे ही निभानी थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी रहा है. मल्टीनैशनल कंपनी में उसे जौब पढ़ाई खत्म करते ही मिल गई थी. आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक तो वह था ही, बोलने में भी उस का जवाब नहीं था. लोग जल्दी ही उस से प्रभावित हो जाते थे. कई लड़कियों ने उस से दोस्ती करने की कोशिश की लेकिन अभी वह इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता था.

श्रीनिवास ने सोचा था मसूरी में उसे 2 दिन लग जाएंगे, लेकिन यहां तो एक दिन में ही काम निबट गया. क्यों न कल मसूरी घूमा जाए. श्रीनिवास मजे से गरम कंबल में सो गया. अगले दिन वह मसूरी के माल रोड पर खड़ा था. लेकिन पता चला आज वहां टैक्सी व बसों की हड़ताल है.

‘ओफ, इस हड़ताल को भी आज ही होना था,’ श्रीनिवास अभी सोच में पड़ा ही था कि एक टैक्सी वाला उस के पास आ कानों में फुसफुसाया, ‘साहब, कहां जाना है.’ ‘अरे भाई, मसूरी घूमना था लेकिन इस हड़ताल को भी आज होना था.’

‘कोई दिक्कत नहीं साहब, अपनी टैक्सी है न. इस हड़ताल के चक्कर में अपनी वाट लग जाती है. सरजी, हम आप को घुमाने ले चलते हैं लेकिन आप को एक मैडम के साथ टैक्सी शेयर करनी होगी. वे भी मसूरी घूमना चाहती हैं. आप को कोई दिक्कत तो नहीं,’ ड्राइवर बोला. ‘कोई चारा भी तो नहीं. चलो, कहां है टैक्सी.’

ड्राइवर ने दूर खड़ी टैक्सी के पास खड़ी लड़की की ओर इशारा किया. श्रीनिवास ड्राइवर के साथ चल पड़ा.

‘हैलो, मैं श्रीनिवास, दिल्ली से.’ ‘हैलो, मैं मनामी, लखनऊ से.’

‘मैडम, आज मसूरी में हम 2 अनजानों को टैक्सी शेयर करना है. आप कंफर्टेबल तो रहेंगी न.’ ‘अ…ह थोड़ा अनकंफर्टेबल लग तो रहा है पर इट्स ओके.’

इतने छोटे से परिचय के साथ गाड़ी में बैठते ही ड्राइवर ने बताया, ‘सर, मसूरी से लगभग 30 किलोमीटर दूर टिहरी जाने वाली रोड पर शांत और खूबसूरत जगह धनौल्टी है. आज सुबह से ही वहां बर्फबारी हो रही है. क्या आप लोग वहां जा कर बर्फ का मजा लेना चाहेंगे?’ मैं ने एक प्रश्नवाचक निगाह मनामी पर डाली तो उस की भी निगाह मेरी तरफ ही थी. दोनों की मौन स्वीकृति से ही मैं ने ड्राइवर को धनौल्टी चलने को हां कह दिया.

गूगल से ही थोड़ाबहुत मसूरी और धनौल्टी  के बारे में जाना था. आज प्रत्यक्षरूप से देखने का पहली बार मौका मिला है. मन बहुत ही कुतूहल से भरा था. खूबसूरत कटावदार पहाड़ी रास्ते पर हमारी टैक्सी दौड़ रही थी. एकएक पहाड़ की चढ़ाई वाला रास्ता बहुत ही रोमांचकारी लग रहा था. बगल में बैठी मनामी को ले कर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे. मन हो रहा था कि पूछूं कि यहां किस सिलसिले में आई हो, अकेली क्यों हो. लेकिन किसी अनजान लड़की से एकदम से यह सब पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

मनामी की गहरी, बड़ीबड़ी आंखें उसे और भी खूबसूरत बना रही थीं. न चाहते हुए भी मेरी नजरें बारबार उस की तरफ उठ जातीं. मैं और मनामी बीचबीच में थोड़ा बातें करते हुए मसूरी के अनुपम सौंदर्य को निहार रहे थे. हमारी गाड़ी कब एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुंच गई, पता ही नहीं चल रहा था. कभीकभी जब गाड़ी को हलका सा ब्रेक लगता और हम लोगों की नजरें खिड़की से नीचे जातीं तो गहरी खाई देख कर दोनों की सांसें थम जातीं. लगता कि जरा सी चूक हुई तो बस काम तमाम हो जाएगा.

जिंदगी में आदमी भले कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न हो पर नीचे देख कर गिरने का जो डर होता है, उस का पहली बार एहसास हो रहा था. ‘अरे भई, ड्राइवर साहब, धीरे… जरा संभल कर,’ मनामी मौन तोड़ते हुए बोली.

‘मैडम, आप परेशान मत होइए. गाड़ी पर पूरा कंट्रोल है मेरा. अच्छा सरजी, यहां थोड़ी देर के लिए गाड़ी रोकता हूं. यहां से चारों तरफ का काफी सुंदर दृश्य दिखता है.’ बचपन में पढ़ते थे कि मसूरी पहाड़ों की रानी कहलाती है. आज वास्तविकता देखने का मौका मिला.

गाड़ी से बाहर निकलते ही हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास हुआ. चारों तरफ से धुएं जैसे उड़ते हुए कोहरे को देखने से लग रहा था मानो हम बादलों के बीच खड़े हो कर आंखमिचौली खेल रहे होें. दूरबीन से चारों तरफ नजर दौड़ाई तो सोचने लगे कहां थे हम और कहां पहुंच गए.

अभी तक शांत सी रहने वाली मनामी धीरे से बोल उठी, ‘इस ठंड में यदि एक कप चाय मिल जाती तो अच्छा रहता.’ ‘चलिए, पास में ही एक चाय का स्टौल दिख रहा है, वहीं चाय पी जाए,’ मैं मनामी से बोला.

हाथ में गरम दस्ताने पहनने के बावजूद चाय के प्याले की थोड़ी सी गरमाहट भी काफी सुकून दे रही थी. मसूरी के अप्रतिम सौंदर्य को अपनेअपने कैमरों में कैद करते हुए जैसे ही हमारी गाड़ी धनौल्टी के नजदीक पहुंचने लगी वैसे ही हमारी बर्फबारी देखने की आकुलता बढ़ने लगी. चारों तरफ देवदार के ऊंचेऊंचे पेड़ दिखने लगे थे जो बर्फ से आच्छादित थे. पहाड़ों पर ऐसा लगता था जैसे किसी ने सफेद चादर ओढ़ा दी हो. पहाड़ एकदम सफेद लग रहे थे.

पहाड़ों की ढलान पर काफी फिसलन होने लगी थी. बर्फ गिरने की वजह से कुछ भी साफसाफ नहीं दिखाई दे रहा था. कुछ ही देर में ऐसा लगने लगा मानो सारे पहाड़ों को प्रकृति ने सफेद रंग से रंग दिया हो. देवदार के वृक्षों के ऊपर बर्फ जमी पड़ी थी, जो मोतियों की तरह अप्रतिम आभा बिखेर रही थी. गाड़ी से नीचे उतर कर मैं और मनामी भी गिरती हुई बर्फ का भरपूर आनंद ले रहे थे. आसपास अन्य पर्यटकों को भी बर्फ में खेलतेकूदते देख बड़ा मजा आ रहा था.

‘सर, आज यहां से वापस लौटना मुमकिन नहीं होगा. आप लोगों को यहीं किसी गैस्टहाउस में रुकना पड़ेगा,’ टैक्सी ड्राइवर ने हमें सलाह दी. ‘चलो, यह भी अच्छा है. यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को और अच्छी तरह से एंजौय करेंगे,’ ऐसा सोच कर मैं और मनामी गैस्टहाउस बुक करने चल दिए.

‘सर, गैस्टहाउस में इस वक्त एक ही कमरा खाली है. अचानक बर्फबारी हो जाने से यात्रियों की संख्या बढ़ गई है. आप दोनों को एक ही रूम शेयर करना पड़ेगा,’ ड्राइवर ने कहा. ‘क्या? रूम शेयर?’ दोनों की निगाहें प्रश्नभरी हो कर एकदूसरे पर टिक गईं. कोई और रास्ता न होने से फिर मौन स्वीकृति के साथ अपना सामान गैस्टहाउस के उस रूम में रखने के लिए कह दिया.

गैस्टहाउस का वह कमरा खासा बड़ा था. डबलबैड लगा हुआ था. इसे मेरे संस्कार कह लो या अंदर का डर. मैं ने मनामी से कहा, ‘ऐसा करते हैं, बैड अलगअलग कर बीच में टेबल लगा लेते हैं.’ मनामी ने भी अपनी मौन सहमति दे दी.

हम दोनों अपनेअपने बैड पर बैठे थे. नींद न मेरी आंखों में थी न मनामी की. मनामी के अभी तक के साथ से मेरी उस से बात करने की हिम्मत बढ़ गई थी. अब रहा नहीं जा रहा था, बोल पड़ा, ‘तुम यहां मसूरी क्या करने आई हो.’

मनामी भी शायद अब तक मुझ से सहज हो गई थी. बोली, ‘मैं दिल्ली में रहती हूं.’ ‘अच्छा, दिल्ली में कहां?’

‘सरोजनी नगर.’ ‘अरे, वाट ए कोइनस्टिडैंट. मैं आईएनए में रहता हूं.’

‘मैं ने हाल ही में पढ़ाई कंप्लीट की है. 2 और छोटी बहनें हैं. पापा रहे नहीं. मम्मी के कंधों पर ही हम बहनों का भार है. सोचती थी जैसे ही पढ़ाई पूरी हो जाएगी, मम्मी का भार कम करने की कोशिश करूंगी, लेकिन लगता है अभी वह वक्त नहीं आया. ‘दिल्ली में जौब के लिए इंटरव्यू दिया था. उन्होंने सैकंड इंटरव्यू के लिए मुझे मसूरी भेजा है. वैसे तो मेरा सिलैक्शन हो गया है, लेकिन कंपनी के टर्म्स ऐंड कंडीशंस मुझे ठीक नहीं लग रहीं. समझ नहीं आ रहा क्या करूं?’

‘इस में इतना घबराने या सोचने की क्या बात है. जौब पसंद नहीं आ रही तो मत करो. तुम्हारे अंदर काबिलीयत है तो जौब दूसरी जगह मिल ही जाएगी. वैसे, मेरी कंपनी में अभी न्यू वैकैंसी निकली हैं. तुम कहो तो तुम्हारे लिए कोशिश करूं.’ ‘सच, मैं अपना सीवी तुम्हें मेल कर दूंगी.’

‘शायद, वक्त ने हमें मिलाया इसलिए हो कि मैं तुम्हारे काम आ सकूं,’ श्रीनिवास के मुंह से अचानक निकल गया. मनामी ने एक नजर श्रीकांत की तरफ फेरी, फिर मुसकरा कर निगाहें झुका लीं. श्रीनिवास का मन हुआ कि ठंड से कंपकंपाते हुए मनामी के हाथों को अपने हाथों में ले ले लेकिन मनामी कुछ गलत न समझ ले, यह सोच रुक गया. फिर कुछ सोचता हुआ कमरे से बाहर चला गया.

सर्दभरी रात. बाहर गैस्टहाउस की छत पर गिरते बर्फ से टपकते पानी की आवाज अभी भी आ रही है. मनामी ठंड से सिहर रही थी कि तभी कौफी का मग बढ़ाते हुए श्रीनिवास ने कहा, ‘यह लीजिए, थोड़ी गरम व कड़क कौफी.’

तभी दोनों के हाथों का पहला हलका सा स्पर्श हुआ तो पूरा शरीर सिहर उठा. एक बार फिर दोनों की नजरें टकरा गईं. पूरे सफर के बाद अभी पहली बार पूरी तरह से मनामी की तरफ देखा तो देखता ही रह गया. कब मैं ने मनामी के होंठों पर चुंबन रख दिया, पता ही नहीं चला. फिर मौन स्वीकृति से थोड़ी देर में ही दोनों एकदूसरे की आगोश में समा गए. सांसों की गरमाहट से बाहर की ठंड से राहत महसूस होने लगी. इस बीच मैं और मनामी एकदूसरे को पूरी तरह कब समर्पित हो गए, पता ही नहीं चला. शरीर की कंपकपाहट अब कम हो चुकी थी. दोनों के शरीर थक चुके थे पर गरमाहट बरकरार थी.

रात कब गुजर गई, पता ही नहीं चला. सुबहसुबह जब बाहर पेड़ों, पत्तों पर जमी बर्फ छनछन कर गिरने लगी तो ऐसा लगा मानो पूरे जंगल में किसी ने तराना छेड़ दिया हो. इसी तराने की हलकी आवाज से दोनों जागे तो मन में एक अतिरिक्त आनंद और शरीर में नई ऊर्जा आ चुकी थी. मन में न कोई अपराधबोध, न कुछ जानने की चाह. बस, एक मौन के साथ फिर मैं और मनामी साथसाथ चल दिए. Romantic Story in Hindi

AR Rahman Controversy : संकीर्णता का शिकार – ए. आर. रहमान

AR Rahman Controversy : संगीत या कला को धर्म, भाषा व देश की सरहदों में बांटा नहीं जा सकता. संगीत को धर्म के चश्मे से भी नहीं देखा जाना चाहिए. कटु सत्य यह है कि संगीत का कोई धर्म नहीं होता. इस के बावजूद एक कलाकार की पहचान उस के सुरों की बनिस्बत उस के मजहब से होने का सीधा अर्थ यही होता है कि समाज की वैचारिक सेहत ठीक नहीं है.

भारत को वैश्विक पटल तक पहुंचाने वाले ए आर रहमान ने औस्कर की दहलीज पर खड़े हो कर दुनिया को ‘इलाही’ की इबादत और भारत की विरासत का संगम दिखाया, जो आज एक अजीबोगरीब घेरेबंदी का शिकार है.

हाल ही में बीबीसी एशियन नैटवर्क के लिए पाकिस्तानी ब्रिटिश पत्रकार हारून रशीद को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बदलते मिजाज और बढ़ते ‘कम्युनल’ गैप पर एक कलाकार की पीड़ा व्यक्त की, जिस की वजह से उन्हें कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, यह बहुत ही ज्यादा चिंताजनक बात है. दिलीप कुमार से अल्लाह रक्खा रहमान बनने का उन का सफर केवल एक नाम बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि एक रूहानी तलाश और भारतीय संगीत को वैश्विक बनाने का वह जनून है जिसे आज सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जा रहा है. खुद ए आर रहमान संगीत को धर्म से जोड़ कर नहीं देखते. वे कई बार कह चुके हैं- ‘‘संगीत का कोई धर्म नहीं होता. संगीत केवल आत्मा को छूने वाली एक भाषा है. जब मैं संगीत बनाता हूं तो मैं किसी विशेष समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए बनाता हूं.’’

पेश हैं यहां बीबीसी को दिए उन के इंटरव्यू के कुछ अंशः

जब बीबीसी के पत्रकार ने ए आर रहमान से सवाल किया कि उन्हें पिछले 8-10 साल से बौलीवुड में काम क्यों नहीं मिल रहा है तो रहमान ने बिना किसी लागलपेट के साफसाफ कह दिया कि पिछले लगभग 8 सालों से उन्हें बौलीवुड (हिंदी फिल्म इंडस्ट्री) में काम मिलना कम हो गया है. इसके लिए ए आर रहमान ने फिल्म इंडस्ट्री में हुए ‘पावर शिफ्ट’ को दोष दिया, जहां अब गैररचनात्मक लोगों के हाथों में निर्णय लेने की शक्ति है. उन्होंने संकेत दिया कि यह एक ‘सांप्रदायिक चीज भी हो सकती है’ लेकिन ऐसा रहमान ने सीधेतौर पर नहीं कहा लेकिन फुसफसाहट के रूप में उन के सामने यह चीज आई या यों कहें कि उन से कहलवा दिया गया.

फिल्म ‘छावा’ पर टिप्पणी

ए आर रहमान ने विक्की कौशल अभिनीत सफलतम ऐतिहासिक फिल्म ‘छावा’ में संगीत दिया है. लेकिन इंटरव्यू के दौरान इस फिल्म को उन्होंने एक ‘विभाजनकारी फिल्म’ की संज्ञा दे दी, जिस ने बौक्स औफिस पर कथित तौर पर विभाजनकारी भावनाओं को भुनाया. हालांकि, फिल्म का मुख्य संदेश ‘बहादुरी’ था. उन्होंने फिल्म में कुछ धार्मिक वाक्यांशों (जैसे ‘सुभानअल्लाह’ और अल्हम्दुलिल्लाह) के उपयोग पर भी आपत्ति जताई. इसे ‘क्लीशे’ और ‘क्रिंज’ कहा. फिल्म ‘छावा’ पर ए आर रहमान को बेवजह तूल दिया गया.

एक कलाकार की राय ‘आलोचना’ हो सकती है, ‘नफरत’ नहीं. जिस तरह से एक फिल्म समीक्षक को फिल्म पसंद या नापसंद करने का हक है, वही हक एक संगीतकार को भी है. इसे सांप्रदायिक रंग देना असल में चर्चा को भटकाना है. दूसरी बात हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक कलाकार जब सच बोलता है तो वह समाज का आईना होता है. इसे ‘सांप्रदायिक कार्ड’ कहना गलत है. जब वे कहते हैं कि ‘काम न मिलना एक सांप्रदायिक चीज भी हो सकती है’, तो वे अपनी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि उस सिस्टम की ओर इशारा कर रहे होते हैं जहां रचनात्मकता से ज्यादा विचारधारा को महत्त्व दिया जा रहा है.

प्रतिक्रिया और विवाद

इस इंटरव्यू के वायरल होते ही सोशल मीडिया और फिल्म जगत में मिलीजुली प्रतिक्रियाएं नजर आईं. कुछ लोगों ने उन के दावों को खारिज कर दिया. गीतकार जावेद अख्तर ने सांप्रदायिक मुद्दे से इनकार किया. अभिनेत्री कंगना रनौत ने रहमान पर ही पक्षपाती होने का आरोप लगाया. गायक शान ने कहा कि संगीत में सांप्रदायिक या अल्पसंख्यक पहलू नहीं होता, यह योग्यता पर निर्भर करता है. हमें याद रखना होगा कि सोनू निगम ने कुछ साल पहले मसजिद से सुबहसुबह होने वाली अजान को ले कर काफीकुछ कहा था और वे विवाद के केंद्र में आ गए थे. तब से सोनू निगम ज्यादातर समय दुबई में ही बिताते हैं.

       सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठाया गया कि जब ए आर रहमान के संगीत से सजी ‘रोजा’, ‘बौम्बे’, ‘ताल’ हिट हो रही थीं तब उन्होंने कभी ऐसे मुद्दे क्यों नहीं उठाए. भजन सम्राट अनूप जलोटा ने तो ए आर रहमान को सलाह दी कि उन्हें फिर से मुसलिम धर्म छोड़ कर हिंदू धर्म अपना लेना चहिए.

इस विवाद के बीच कुछ फिल्म समीक्षकों के साथ ही गीतकार वरुण ग्रोवर ने उन के समर्थन में अपनी बात रखी. वरुण ग्रोवर ने रहमान के समर्थन में ट्वीट किया, ‘एक विनम्र राय के लिए उन्हें निशाना बनाया गया और स्पष्टीकरण देने पर मजबूर किया गया, जो खुद में विभाजनकारी मानसिकता का प्रमाण है.’ कई लोगों ने तर्क दिया कि पिछले एक दशक में बौलीवुड दक्षिणपंथी या बहुसंख्यकवादी विमर्शों की ओर झुक गया है, जिस से अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है.

विवाद को शांत करने के लिए रहमान ने जारी किया बयान :

आखिरकार विवाद को शांत करने के लिए ए आर रहमान ने एक वीडियो बयान जारी कर स्पष्ट किया कि उन के शब्दों को गलत समझा गया. उन्होंने कहा, ‘भारत मेरी प्रेरणा, मेरा शिक्षक और मेरा घर है.’ उन का उद्देश्य कभी किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था.

कितनी अजीब बात है कि ए आर रहमान जैसे वैश्विक आइकन, जिन्होंने भारत का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया, उन्हें आज अपनी वफादारी या ‘सांप्रदायिक सोच’ पर स्पष्टीकरण देने के लिए वीडियो जारी करना पड़ रहा है. बीबीसी एशियन को दिए गए उन के इंटरव्यू पर विवाद पैदा करने से पहले हर इंसान को सोचना चाहिए था कि जब एक कलाकार अपनी असुरक्षा व्यक्त करता है, तो उसे ‘विक्टिम कार्ड’ के बजाय एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए.

पर विवाद खत्म हो गया हो, ऐसा नहीं लगता. इन दिनों ए आर रहमान नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘रामायण’ को संगीत से संवार रहे हैं जोकि अब दक्षिणपंथियों को रास नहीं आ रहा है. ये लोग मांग कर रहे है कि हिंदू भावनाओं को कथित तौर पर आहत करने वाले व्यक्ति को फिल्म ‘रामायण’ से बाहर का रास्ता दिखया जाए वरना फिल्म ‘रामायण’ को ही बैन किया जाए.

आलोचना व विवादों को ले कर ए आर रहमान अतीत में साफ शब्दों में कह चुके हैं- ‘मेरा मकसद विवाद पैदा करना नहीं, बल्कि लोगों के दिलों को जोड़ना है. कभीकभी मेरी खामोशी को कमजोरी समझा जाता है, लेकिन मेरा संगीत ही मेरा सब से बड़ा जवाब है.’

AR Rahman Controversy (1)
जावेद अख्तर ने कई बार कहा है कि आज के कई फिल्मी गीतों में शब्दों की गहराई कम और संगीत पर अधिक जोर दिया जाने लगा है, इस बात को लोगों ने अप्रत्यक्ष रूप से रहमान की शैली से जोड़ कर देखा.

संघर्षपूर्ण बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

भजन सम्राट अनूप जलोटा ने कहा है कि ए आर रहमान को फिर से अपना धर्म बदल कर हिंदू कर लेना चाहिए. क्या भजन सम्राट अनूप जलोटा को इस तरह की बात करनी चाहिए थी. यह बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन पहले हम जानते हैं कि यह धर्म परिवर्तन का मसला है क्या.

हकीकत यह है कि ए आर रहमान का जन्म उस वक्त के तमिल व मलयालम फिल्मों के मशहूर संगीतकार व हिंदू धर्मावलंबी आर के शेखर के घर में हुआ था. उन के पिता ने उन का नाम दिलीप कुमार रखा था. जब वे 9 साल के थे तभी उन के पिता का निधन हो गया था. घर चलाने के लिए उन की मां, कस्तूरी (बाद में करीमा बेगम), ने उन के पिता के संगीत वाद्ययंत्रों को किराए पर देना शुरू कर दिया. परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि उन के पास स्कूल की पढ़ाई छोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. वे घंटों रिकौर्डिंग स्टूडियो में ‘कीबोर्ड’ बजाते थे ताकि घर में चूल्हा जल सके. यह संघर्ष उन के संगीत में दिखने वाली गहराई और संवेदनशीलता का आधार बना.

धर्म परिवर्तन और रूहानियत

संघर्ष करते हुए जीवन में कई तरह के उतारचढ़ाव का सामना करते हुए वे 25 साल की उम्र में पहुंच गए. 25 साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां के प्रभाव में इसलाम अपनाया. रहमान का मानना है कि इस बदलाव ने उन्हें शांति और अनुशासन दिया.

रहमान का इसलाम की ओर झुकाव किसी दबाव में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक खोज का परिणाम था. वास्तव में 1980 के दशक के उत्तरार्ध की बात है. उन की बहन गंभीर रूप से बीमार हो गई थी. तब उन की मां की मुलाकात एक सूफीसंत कादरी शेख इत्तियातुल शाह से हुई थी. उस वक्त उन के परिवार से जुड़े लोगों का मानना था कि उन की प्रार्थनाओं से ही उन की बहन ठीक हुईं. आखिरकार, 1989 में जब दिलीप कुमार की उम्र 25 साल थी तब उन्होंने अपने पूरे परिवार के साथ इसलाम धर्म को अपनाया और एक ज्योतिषी की सलाह पर ‘अब्दुल रहमान’ और ‘अब्दुल रहीम’ में से ‘रहमान’ नाम चुना. उन के संगीत में जो ठहराव और रूहानियत है, वे उसे अपनी इसी नई पहचान और प्रार्थना (नमाज) का अनुशासन मानते हैं. इसलाम अपनाने के तुरंत बाद ए आर रहमान ने मद्रास, अब चेन्नई, में अपना खुद का स्टूडियो ‘पंचतत्व रिकौर्ड इन’  शुरू किया, जो आज एशिया के सब से उन्नत स्टूडियो में से एक है. ‘पंचतत्व’ हिंदू धर्म का ही शब्द है.

इस तरह देखा जाए तो ए आर रहमान की निजी जिंदगी का सफर अनेकता में एकता का प्रतीक है. एक व्यक्ति जिस ने अभावों को देखा, धर्मों के मिलन को जिया और अपनी कला से दुनिया को जोड़ा, उस पर सांप्रदायिकता का ठप्पा लगाना क्या उन की पूरी जीवनयात्रा का अपमान नहीं है?

संगीत कार के रूप में विज्ञापन की दुनिया से शुरुआत

यों तो उन का फिल्मी कैकरियर फिल्म ‘रोजा’ से शुरू हुआ था लेकिन फिल्मी कैरियर से पहले उन्होंने 300 से अधिक विज्ञापन फिल्मों को संगीत से संवारा था जिस में प्रसिद्ध ‘टाइटन वाच’ की धुन का भी समावेश है.

ए आर रहमान का संगीत सफर केवल फिल्मों या किसी भाषा मात्र तक सीमित नहीं रहा, उन्होंने भारतीय संगीत को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दी. ए आर रहमान ने सब से पहले 1992 में मणिरत्नम की फिल्म ‘रोजा’ के लिए संगीत निर्देशन किया था. इस फिल्म के संगीत ने रातोंरात भारतीय फिल्म संगीत की परिभाषा बदल दी. उन्होंने पारंपरिक भारतीय धुनों को ‘रेगे’, ‘जंगल रिदम’ और वेस्टर्न आर्केस्ट्रा के साथ जोड़ा, जिसे उस वक्त ‘टाइम’ मैगजीन ने दुनिया के टौप 10 साउंडट्रैक्स में शामिल किया था.

भारतीय संगीत में रिकौर्डिंग की तकनीक को बदलने का श्रेय भी रहमान को ही जाता है. फिल्म ‘रोजा’ में जो ‘क्रिस्टल क्लियर’ आवाज थी, उस ने भारत में साउंड इंजीनियरिंग के मायने बदल दिए. उन्होंने लाइव वाद्ययंत्रों के साथसाथ सिंथेसाइजर और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का ऐसा तालमेल बैठाया जो उस समय भारत के लिए बिलकुल नया था. तभी तो उन्होंने अपनी पहली ही फिल्म के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ संगीतकार’ का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत कर अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा लिया.

ए आर रहमान से पहले, संगीत बड़े स्टूडियो और भारीभरकम साजोसामान तक सीमित था. रहमान ने होम स्टूडियो और डिजिटल प्रोग्रामिंग की क्रांति ला कर छोटे शहरों के प्रतिभाशाली संगीतकारों के लिए रास्ता खोला. वे केवल एक संगीतकार नहीं, बल्कि एक ‘विशाल तकनीकी बदलाव’ के जनक हैं.

भारतीय सिनेमा के इतिहास में रहमान पहले ऐसे संगीतकार हैं जिन्होंने भाषाई सीमाओं को कभी स्वीकार नहीं किया. ए आर रहमान से पहले दक्षिण भारतीय संगीतकारों को ‘क्षेत्रीय’ कहा जाता था. रहमान ने साबित किया कि अगर धुन में दम हो, तो चेन्नई में बना संगीत कश्मीर की गलियों में भी उसी शिद्दत से सुना जाएगा. यह भारत की सांस्कृतिक अखंडता का एक बड़ा उदाहरण है.

शास्त्रीय और आधुनिक का द्वंद्व

अकसर शास्त्रीय संगीत के जानकार उन्हें ‘मशीनी संगीत’ बनाने वाला कहते थे. लेकिन रहमान ने ‘लगान’ और ‘स्वदेश’ जैसी फिल्मों में शास्त्रीय रागों का ऐसा आधुनिक उपयोग किया कि नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ गई. उन का योगदान संगीत को ‘म्यूजियम’ से निकाल कर ‘मल्टीप्लैक्स’ तक पहुंचाने का है.

ए आर रहमान ने हर तरह की फिल्मों को अपने संगीत से संवारा फिर चाहे वह देशभक्ति वाली फिल्म हो, रोमांटिक हो या सूफीवादी हो. इतना ही नहीं, ‘बौम्बे’, ‘रोजा’ और ‘दिल से’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने मानवीय रिश्तों को राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ संगीतबद्ध किया. उन के अलबम ‘वंदे मातरम’ ने देश में देशभक्ति व राष्ट्वाद की एक नई लहर पैदा की. 1997 का देशभक्तिपूर्ण गीत ‘मां तुझे सलाम…’ (वंदे मातरम) ने आधुनिक भारत को अपनी नई ‘सांस्कृतिक पहचान’ दी और हर घर में गूंजा.

ए आर रहमान के अब तक के पूरे कैरियर पर गौर किया जाए तो एक बात साफ तौर पर उभर कर आती है कि रहमान का संगीत कभी भी एक धर्म तक सीमित नहीं रहा. ‘ताल’, ‘रंगीला’, ‘लगान’ और ‘स्वदेश’ जैसी फिल्मों में उन्होंने लोक संगीत और आधुनिक ध्वनि का ऐसा मिश्रण किया जो हर वर्ग को पसंद आया. अगर उन्होंने ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा’ जैसा सूफी कलाम दिया, तो उन्होंने आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ में ‘ओ पालनहारे…’ गवाया. इतना ही नहीं, ए आर रहमान ने फिल्म ‘लगान’ के गानों की रिकौर्डिग में मशहूर वीणावादक विश्वमोहन भट्ट की सेवाएं लीं. 2001 में फिल्म ‘लगान’ का ए आर रहमान द्वारा तैयार किया गया गीत ‘ओ पालनहारे…’ भगवान कृष्ण को समर्पित यह प्रार्थना आज भी मंदिरों और घरों में भक्ति के प्रतीक के रूप में सुनी जाती है तो उन्होंने सूफी (इसलाम) गीत ‘कुन फया कुन’ दिया.

कहने का अर्थ यह कि ए आर रहमान ने ‘कुन फया कुन’ बनाने के लिए जिस दिल का इस्तेमाल किया, उसी दिल से ‘ओ पालनहारे’ की रचना की. एक सच्चा कलाकार कभी अपनी कला को सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखता.

ए आर रहमान से जब भी उन की सफलता पर सवाल किया गया, उन्होंने हमेशा कहा- ‘‘आसफलता केवल एक मंजिल नहीं है, यह एक सफर है जो शुद्धता और अनुशासन से तय होती है. मेरा धर्म मुझे वही अनुशासन और विनम्रता सिखाता है.’’

जावेद अख्तर ने कहा है कि पश्चिम यानी कि हौलीवुड में काम करने के कारण शायद वे बौलीवुड में समय कम दे रहे होंगे. तो, यह भी सच हो सकता है. उन्होंने ‘127 आवर्स’, ‘एलिजाबेथ’, ‘द गोल्डन एज’ और ‘पीपल लाइक अस’ जैसी अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों के लिए भी संगीत दिया है.

रहमान केवल संगीतकार नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली गायक भी हैं. उन की आवाज में एक खास किस्म की मासूमियत और गहराई होती है. रहमान द्वारा स्वरबद्ध गीत मसलन, ‘वंदे मातरम…’, ‘लुका छिपी…’, ‘तेरे बिना…’ लोगों के दिलों के बेहद करीब हैं. रहमान के गानों की लगभग 15 करोड़ प्रतियां दुनियाभर में बिकी हैं. वे दक्षिण और उत्तर भारत के बीच के भाषाई अंतर को संगीत के जरिए पाटने वाले पहले बड़े कलाकार माने जाते हैं.

सूफी संगीत का उदय

ए आर रहमान उन संगीतकारों में से हैं जिन्होंने बौलीवुड में सूफी संगीत को मुख्यधारा में शामिल किया. ‘जोधा अकबर’ का सूफी गीत ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा…’ और ‘रौकस्टार’ का ‘कुन फया कुन…’ सिर्फ गाने नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव हैं जो उन की धार्मिक पहचान और कला के संगम को दर्शाते हैं.

कई पुरस्कारों से सम्मानित ए आर रहमान केवल एक संगीतकार या गायक ही नहीं, बल्कि एक मानवीय चेतना वाले वैश्विक नागरिक हैं.

पुरस्कारों का वैश्विक इतिहास

ए आर रहमान ने भारतीय संगीत को उस मंच पर पहुंचाया जहां पहले कोई नहीं पहुंचा पाया था. उन के पुरस्कार केवल उन की प्रतिभा का नहीं, बल्कि उन की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है. 2009 में फिल्म ‘स्लमडौग मिलेनियर’ के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ मूल स्कोर और सर्वश्रेष्ठ मूल गीत (‘जय हो) के लिए दो औस्कर जीत कर इतिहास रचा था. औस्कर अर्वाड लेते हुए ए आर रहमान ने कहा था- ‘मेरे पास जीवन में हमेशा 2 विकल्प थे-प्यार और नफरत. मैं ने प्यार को चुना और आज मैं यहां हूं.’

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ए आर रहमान दक्षिण और उत्तर भारत के बीच के भाषाई अंतर को संगीत के जरिए पाटने
वाले पहले बड़े कलाकार माने जाते हैं.

2010 में दुनिया के सब से प्रतिष्ठित संगीत पुरस्कार ग्रैमी में भी 2 ट्राफियां जीतीं. वे पहले भारतीय संगीतकार हैं जिन्होंने एक ही वर्ष में गोल्डन ग्लोब और बाफ्टा जैसे सम्मान अपने नाम किए. इतना ही नहीं, भारत सरकार ने उन्हें 6 बार सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया है. कला के क्षेत्र में उन के योगदान के लिए उन्हें 2010 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाजा गया.

सामाजिक कार्य और परोपकार

दक्षिण के तमाम कलाकारों की ही तरह ए आर रहमान की पहचान उन की खामोशी और परोपकार से भी जुड़ी है. वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज सेवा में लगाते हैं.

       उन्होंने ‘ए आर रहमान फाउंडेशन’ की स्थापना कर रखी है, जिस से वंचित बच्चों को संगीत और शिक्षा के जरिए सशक्त बनाया जा सके. चेन्नई में ‘के एम म्यूजिक कंजर्वेटरी’ नामक संस्थान है, जो संगीत की शिक्षा के लिए समर्पित है. यहां आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी संगीत की विश्वस्तरीय ट्रेनिंग दी जाती है.

उन्होंने यूनेस्को के साथ ‘ग्लोबल एंबेसडर’ के रूप में काम किया है और गरीबी उन्मूलन के लिए ‘ग्लोबल पावर्टी प्रोजैक्ट’ जैसे अभियानों से जुड़े रहे हैं. 2018 में जब केरल में बाढ़ आई थी तब उन्होंने अपने अमेरिका दौरे के शो से हुई कमाई का एक करोड़ रुपया राहत कोष में दिया था.

ए आर रहमान के इन परोपकार के कार्यों का जिक्र करने का एक मात्र मकसद यह है कि जिस इंसान ने जीवनभर केवल संगीत के जरिए शांति का संदेश दिया और अपनी विरासत को समाज की भलाई के लिए समर्पित कर दिया, उसे आज संकीर्ण विचारधारा के चश्मे से देखना भारतीय कला जगत के लिए एक दुखद स्थिति है. शांति और नफरत के मुद्दे पर ए आर रहमान कई बार कह चुके हैं- ‘पूरी दुनिया नफरत और हिंसा से जूझ रही है. मेरे लिए संगीत ही वह एकमात्र औजार है जिस से मैं दुनिया में थोड़ी शांति और प्यार वापस ला सकता हूं.’’

आखिरकार ए आर रहमान केवल एक संगीतकार नहीं, बल्कि एक पुल जैसे हैं जिन्होंने दक्षिण को उत्तर से और भारत को विश्व से जोड़ा. अगर आज वे असुरक्षित महसूस करते हैं या इंडस्ट्री में बढ़ती दूरियों की ओर इशारा करते हैं, तो यह उन का ‘मजहब’ नहीं, बल्कि उन की ‘कला’ आवाज दे रही है. एक ऐसे कलाकार को, जिस ने देश को 2 औस्कर और अनगिनत गर्व के क्षण दिए, उसे उस की धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाना हमारी सामूहिक हार है. ‘रामायण’ जैसे महाकाव्य में उन का जुड़ना इस बात का प्रमाण है कि वे भारतीय संस्कृति के उतने ही बड़े पैरोकार हैं जितने कई और. समय आ गया है कि हम ए आर रहमान को ‘अल्लाह’ और ‘ईश्वर’ के बीच बांटने की बनिस्बत उन के उस ‘सुर’ को सुनें, प्रधानता दें जो मानवता और शांति की बात करता है. क्योंकि रहमान जैसे फनकार रोज पैदा नहीं होते. वहीं, आज के नफरत के शोर में उन की खामोशी और सुरों का साथ देना ही सच्ची कलासाधना होगी.

ए आर रहमान के खिलाफ हालिया शोर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम एक समाज के रूप में अपनी महानतम उपलब्धियों को केवल इसलिए खंडित करने पर उतारू हैं क्योंकि वे हमारी संकीर्ण वैचारिक सांचों में फिट नहीं बैठतीं? रहमान का ‘कम्युनल’ होना तो दूर, उन का पूरा जीवन ही ‘सांस्कृतिक समावेश’  का एक जीवंत उदाहरण रहा है.

रहमान का बीबीसी इंटरव्यू किसी के खिलाफ ‘युद्धघोष’ नहीं था, बल्कि एक संवेदनशील कलाकार की वह ‘आह’ थी जो इंडस्ट्री में बढ़ते ध्रुवीकरण को महसूस कर रही है. हमें यह समझना होगा कि औस्कर की चमक रहमान के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए थी. यदि हम अपने नायकों को उन की पहचान की वजह से असुरक्षित महसूस करवाएंगे तो हम आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देंगे कि योग्यता से ज्यादा विचारधारा मायने रखती है जोकि गलत है.

रहमान जैसे फनकार मजहब की सीमाओं से बहुत ऊपर उस शून्य में रहते हैं जहां केवल सुरों का वास होता है. उन के संगीत पर सांप्रदायिकता का रंग चढ़ाना वैसा ही है जैसे सूरज की रोशनी को धर्मों में बांटने की कोशिश करना. समय है कि हम शोर को पीछे छोड़ें और रहमान के उस ‘मौन’ को सुनें, जो हमेशा से शांति और प्रेम की इबादत करता आया है.

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