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Readers’ Problems : “जीजाजी का मजाकिया स्वभाव”, “मातापिता चाहते हैं…”, “पत्नी की भावनाएं”, “मैं जीवन से संतुष्ट नहीं”

Readers’ Problems :

मुझे जीजाजी का मजाकिया स्वभाव असहज कर देता है.
मैं 22 साल की हूं और अपनी बड़ी बहन के घर में कुछ महीनों से रह रही हूं. मेरे जीजाजी स्वभाव से बहुत बातूनी और मददगार हैं लेकिन कभीकभी उन के मजाक या बातचीत की शैली मुझे असहज कर देती है. मुझे डर लगता है कि अगर मैं कुछ कहूंगी तो बहन को बुरा लग सकता है या घर का माहौल खराब हो सकता है. मैं किसी पर गलत आरोप भी नहीं लगाना चाहती, लेकिन मन में बेचैनी रहती है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इस स्थिति को कैसे संभालूं?

मैं आप की परेशानी को पूरी संवेदनशीलता के साथ समझ रही हूं. परिवार में रहते हुए असहज महसूस करना बहुत मुश्किल होता है, खासकर जब रिश्ते नाजुक हों. सब से पहले, यह जरूरी है कि आप अपनी भावनाओं को गंभीरता से लें. आप का असहज होना अपनेआप में महत्त्वपूर्ण संकेत है. आप शुरुआत में शांति से अपनी व्यक्तिगत सीमाएं तय कर सकती हैं, जैसे बातचीत को औपचारिक रखना, अकेले समय से बचना और अपनी दिनचर्या स्पष्ट रखना.

अगर फिर भी बेचैनी बनी रहती है तो आप अपनी बहन से बहुत शांत और भरोसेमंद तरीके से अपनी भावना साझ कर सकती हैं- बिना आरोप लगाए, केवल यह बताते हुए कि आप थोड़ा असहज महसूस कर रही हैं. परिवार में शांति बनाए रखना जरूरी है, लेकिन आप की मानसिक सुरक्षा उस से भी ज्यादा जरूरी है. अपने मन की बात दबाना समाधान नहीं होता, सही समय और सही भाषा में कहना ही समझदारी है.

*

मातापिता चाहते हैं कि मैं अपने दोस्तों से दूरी बना लूं.
मैं 17 साल का हूं. मैं अपने दोस्तों के साथ रहना पसंद करता हूं. इस के कारण घर में बहुत तकरार होती है. मुझे समझ नहीं आता कि मैं दोनों को खुश कैसे रखूं?

मातापिता की चिंता और दोस्ती की स्वतंत्रता के बीच संतुलन ढूंढ़ना कठिन होता है. सब से पहले, मातापिता से शांति से बात करें और उन्हें समझाएं कि आप जिम्मेदारी के साथ दोस्तों के साथ समय बिताना चाहते हैं. साथ ही, दोस्तों को भी बताएं कि आप घर और पढ़ाई को महत्त्व देते हैं. धीरेधीरे यह संतुलन बनाना संभव है. अपनेआप पर दबाव न डालें, समय के साथ सब चीजें ठीक
हो जाएंगी.

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पति मेरी भावनाओं को कभी गंभीरता से नहीं लेते.
मेरी उम्र 34 साल है. मेरी शादी को 10 साल हो चुके हैं. पति न मुझे मारते हैं, न गाली देते हैं, न किसी और औरत के बारे में बात करते हैं. फिर भी मैं अंदर से खाली महसूस करती हूं. मैं रोती हूं तो वे कहते हैं, ‘‘तुम ज्यादा सोचती हो.’’ मैं परेशान होती हूं तो कहते हैं, ‘‘हर किसी की जिंदगी में दिक्कतें होती हैं.’’ धीरेधीरे मैं ने अपनी बातें कहना छोड़ दिया है. अब मैं हंसती भी हूं तो बनावटी लगती है. क्या यह भी एक तरह की समस्या है?

हां, यह एक बहुत गहरी समस्या है, सब से खतरनाक इसलिए क्योंकि इस में शोर नहीं होता. जब किसी इंसान की भावनाओं को बारबार नजरअंदाज किया जाता है तो वह बोलना बंद कर देता है. बाहर से वह ठीक दिखता है, लेकिन अंदर से अकेला पड़ जाता है.

आप के पति शायद यह नहीं समझते कि ज्यादा सोचना भी एक दर्द होता है. आप को फिर से अपनी आवाज ढूंढ़नी होगी. यह कहना सीखना होगा कि ‘मेरी भावनाएं भी वास्तविक हैं.’

अगर रिश्ते में आप की भावनाओं के लिए जगह नहीं है तो धीरेधीरे आप का अस्तित्व सिकुड़ने लगता है. यह स्थिति बदली जा सकती है, लेकिन चुप रह कर नहीं.

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मैं जीवन से संतुष्ट नहीं हूं. समझ नहीं आ रहा क्या करूं.
हर दिन खुद की दूसरों से तुलना करता हूं. मैं विवाहित हूं, मेरी उम्र 38 साल है. कैरियर में मुझे वह सफलता नहीं मिली जिस की मुझ से उम्मीद की जा रही थी. घर में कोई सीधे कुछ नहीं कहता, लेकिन मुझे महसूस होता है कि घरवाले निराश हैं. लगता है कि मैं एक असफल पति और पिता हूं.

आप जिस भावनात्मक दौर से गुजर रहे हैं वह आज के समय में कई जिम्मेदार पुरुषों की सच्चाई है. बस, फर्क इतना है कि ज्यादातर लोग इसे शब्द नहीं दे पाते. कैरियर की सफलता को हम ने पुरुषत्व, पति होने और पिता होने की कसौटी बना लिया है, जबकि सच यह है कि आप की कीमत सिर्फ आप की सैलरीस्लिप या पद से तय नहीं होती.

परिवार की चुप्पी अकसर निराशा से ज्यादा उन की अपनी चिंता और असमंजस का परिणाम होती है, न कि आप के प्रति कोई फैसला. दूसरों से तुलना करने की आदत धीरेधीरे आत्मविश्वास को खोखला कर देती है और आप अपनी उन कोशिशों को नजरअंदाज करने लगते हैं जो आप रोज कर रहे हैं- परिवार के लिए समय देना, जिम्मेदारियां निभाना, मुश्किल हालात में टिके रहना आदि. याद रखिए, असफलता कोई पहचान नहीं, एक पड़ाव है.

अगर आप ईमानदारी से प्रयास कर रहे हैं, सीख रहे हैं और अपने परिवार की परवाह करते हैं तो आप असफल पति या पिता नहीं हो सकते. खुद से कठोर सवाल पूछने से पहले खुद को यह स्वीकार करने का मौका दीजिए कि आप भी इंसान हैं और आप की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है.

-कंचन

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Readers’ Problems

Editorial : सरित प्रवाह – दबाव में एक्स

Editorial : एक्स ने माना है कि उस के प्लेटफौर्म को आजकल अवैध कंटैंट के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिन में बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने की फोटो तक शामिल हैं. एक्स अब इस तरह के कंटैंट को हटा देगा. एक्स का मतलब लोगों को उकसाने और उन्हें पकड़ कर रखना है और वह उन के अधिकारों, उन की इच्छाओं की या उन के चरित्र की चिंता कम करता है, अपने मुनाफे की ज्यादा. वह इसीलिए उन सरकारों से उल झना नहीं चाहता जो इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रही हैं.

सरकारें एक्स के इस फैसले से खुश ही होंगी क्योंकि पहले तो एक्स जैसे प्लेटफौर्मों ने समाचारपत्रों और पत्रिकाओं को नष्ट कर दिया जो सरकारों के लिए सिरदर्द थे क्योंकि वे सरकार की पोलपट्टी खोल सकते थे. एक्स अब, सरकार के कहे अनुसार, उन अकाउंटों को भी अवैध मान कर बंद कर देगा जो सरकार के खिलाफ बोलेंगे.

असल में इंटरनैट पर चल रहे सभी सोशल मीडिया प्लेटफौर्म या तो सरकारों का प्रचार कर रहे हैं या धर्म का. उन को सब से बड़ा समर्थन इन 2 से मिलता है. पैसा तो पौर्न या विज्ञापन देने वाली कंपनियों से मिल जाता है पर किसी भी देश में घुसने की इजाजत और लगातार बने रहने की इजाजत वहां की सरकार ही देती है.

इंटरनैट जनता के हकों के लिए न लड़ना चाहता है और न ही उस का वह मकसद है. उसे तो जो पैसा देगा, वह उस का गुलाम है. इंटरनैट ने चाहे लोगों की दूरियां समाप्त कर दी हों पर आज साफ दिख रहा है कि लोग पहले से ज्यादा अकेले हैं, कम संगठित हैं, गलतफहमियों के शिकार हैं और बहकाए जा रहे हैं. चाहे मामला सामान बेचने का हो, धर्म बेचने का हो या किसी देश के नेता को, इंटरनैट सदा ही उस के साथ रहता है जो ज्यादा पावरफुल है.

अमेरिका के सिलिकौन वैली में बैठे सौफ्टवेयर से एल्गोरिदम बनाने वालों का कोरा एक उद्देश्य है, मोटा पे पैकेज. वे भाड़े के सैनिक जैसे हैं जो किसी भी धर्म, देश, विद्रोही के लिए काम कर सकते हैं. एक्स, यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सऐप, लिंक्डइन, थ्रैड, इंस्टाग्राम पर आप को धर्मविरोधी, सरकारविरोधी कंटैंट भी मिल जाएगा पर जो वहां रहते हैं वे वहां के धर्म की, सरकार की, उद्योगों की, स्टौक मार्केट की वाहवाही करते मिलेंगे. गरीबों के रोने का, सरकारों के अत्याचारों का, अमीरीगरीबी की बढ़ती खाई का, तर्क का, तथ्य का कंटैंट तब तक दिखाई न देगा जब तक आप उन्हें ढूढेंगे नहीं.

अब ये सब प्लेटफौर्म देशों की सरकारों के आदेशों पर चलने लगे हैं. यह दुख की बात है कि दुनिया के अधिकांश देशों की जनता ने अपने हकों को मुफ्तखोरों के लालच में इन प्लेटफौर्मों के हाथों गिरवी रख दिया है. जनवरी के पहले सप्ताह में एक्स ने कहा है कि वह नरेंद्र मोदी की भारत सरकार की संस्था मैत्री का आदेश 72 घंटे में लागू कर देगा. यह जनता के हकों को उस माध्यम से कुचलना है जो घरघर पहुंच चुका है. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – ट्रंप का यूएसए

Editorial : अमेरिका की डेनमार्क से जुड़े ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की नीयत विश्व स्थायित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है. एक समय था जब छोटे देश या तो बड़े पड़ोसी देश की जीहुजूरी पर जिंदा रहते थे या फिर वे इतने बेकार के होते थे कि बड़े देश को उन से कोई लगाव नहीं होता था.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ (कस्टम ड्यूटियां) और बल के प्रयोग की धमकियां दी हैं. ग्रीनलैंड केवल 52,000 लोगों का एक स्वायत्त देश है जो लगभग 80 फीसदी बर्फ से ढका है. उस का फैलाव नक्शों में बहुत बड़ा दिखता है जबकि वह उतना नहीं है जितना दिखता है लेकिन फिर भी 21 लाख वर्गमील का है, भारत से लगभग आधा.

मर्केटर प्रोजैक्शन के नक्शों के कारण यह भारत से कई गुना ज्यादा बड़ा दिखता है. इस तरह के नक्शों में उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव के देश बड़े दिखते हैं और भूमध्यरेखा के देश अपनी सामान्य वर्गभूमि के बराबर होते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिमाग की यह खुराफात है जो वे ग्रीनलैंड को विवाद का मामला बना रहे हैं. अमेरिका की सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड कोई खतरा नहीं है.

फिलहाल डेनमार्क से जुड़े ग्रीनलैंड की अमेरिका को कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप कभी मैक्सिको, कभी कनाडा, कभी पनामा, कभी डिएगोग्रासियो और अब ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की ऐसे ही सोच रहे हैं.

अमेरिका हमेशा से ही गली का गुंडा बनता रहा है. हालांकि वहीं सब से ज्यादा स्वतंत्रताएं पनपीं और उसी के बल पर कितने ही देशों के तानाशाहों को गद्दी से हटाया जा चुका है. सोवियत संघ को ठिकाने लगाने और पूर्वी यूरोप के देशों को आजाद कराने के लिए अमेरिका ही आगे आया, पश्चिमी यूरोप के देश नहीं. हिटलर और जापान से द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका ने भरभर कर अपने सैनिक झोंके और पैसा भी दिया था.

आज अमेरिका दुनिया के स्वतंत्र देशों के लिए खतरा बन गया है जिस का सब से बड़ा कारण वहां धर्म से जुड़े कट्टरपंथी गोरों का गुट ‘मागा’ है जो ट्रंप का जबरदस्त भक्त है. यूरोप से झगड़ा मोल लेने की कीमत पर भी डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड के बारे में टस से मस नहीं हो रहे. अमेरिका दुनिया की शांति का रक्षक था लेकिन अब चर्च के प्रभाव के कारण दुनिया में विवाद पैदा करने वाली सब से बड़ी शक्ति बन गया है.

सत्ता पर धर्म जहां भी हावी हो जाएगा वहां न केवल विवाद खड़े हो जाएंगे, बल्कि व्यापार व उद्योगों का सफाया भी होने लगेगा. यूएसए अब उसी राह पर चल रहा है, गली का दादा अब गली का गुंडा बन रहा है. दुनिया के बाकी देश बस इंतजार कर सकते हैं कि कब यह गुंडा उन पर खंजर का वार कर दे. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – भाजपा ने ठाकरे को ठुकराया

Editorial : फूट डालो और राज करो का फार्मूला अपना कर आखिरकार भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र के शहरों की म्यूनिसिपैलिटियों पर से शिवसेना, जो बाल ठाकरे ने खड़ी की थी, को हटा ही दिया. यह तारीफ की बात है कि भारतीय जनता पार्टी पूरे 30 साल तक कोशिश करती रही कि वह किसी तरह बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे को अपनों से लड़ने के लिए तैयार कर सके और फिर सफल हो गई.

भाजपा ने असल में कृष्ण के संदेश, कर्म करते रहो, फल की चिंता न करो, का इस्तेमाल किया जबकि पौराणिक बुद्धि न रखने वाले मगर लड़नेमरने को तैयार बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे व बेटे उद्धव ठाकरे हमेशा चुनाव जीत कर तुरंत सत्ता पाने के लिए उतावले रहे. उन की फल को पाने की इच्छा के चलते शिवसेना में पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे में विवाद हुआ और फिर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे में.

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बचपन से विश्वामित्र का इंद्र का सिंहासन पाने के लिए वर्षों की तपस्या करने की कहानियां मन में बैठा रखी हैं और उन्होंने कभी मंत्री पद छोड़े, कभी मुख्यमंत्री पद छोड़े, कभी विभीषणों और सुग्रीवों को पटाया तो कभी अन्य को विरोधी खेमे में फिट किया.

भाजपा ने दूसरे राज्यों में भी ऐसा ही किया है पर महाराष्ट्र ऐसा उदाहरण है जहां परिवार के लोगों, एक ही मां के बेटों को आपस में लड़ाने की संस्कृति का 21वीं सदी में जम कर इस्तेमाल किया गया.

मुंबई म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन का बजट बहुत बड़ा है और जमीनों को ले कर उस के अधिकार अपार हैं. इस पर कब्जा शत्रुओं के नाश के लिए ब्रह्मास्त्र है. वैसे भी, जांच एजेंसियों के कारण भारतीय जनता पार्टी के पास पैसे की कमी नहीं है पर मुंबई म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन पर कब्जे का मतलब है मकानों के बनाने की अनुमति देने पर हर पार्षद की भरपूर कमाई.

दिल्ली में पिछले एक साल से दिल्ली नगरनिगम, दिल्ली विधानसभा और दिल्ली पर आधे अधिकारों से ज्यादा अधिकार रखने वाली केंद्र सरकार तीनों की हुकूमत भारतीय जनता पार्टी के पास है लेकिन कुछ फर्क पड़ा हो, ऐसा नहीं लगता.

महाराष्ट्र के नगर निकायों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा होने पर शहरियों को तो कतई फर्क नहीं पड़ेगा पर हर मंदिर में तेल की जगह घी के दीये जलने लगेंगे, हर मंदिर के दरवाजों पर डेढ़ करोड़ रुपए किलो वाला सोना मढ़ा जाने लगेगा.

उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, एकनाथ शिंदे, शरद पवार, अजित पवार ने साबित कर दिया कि भाजपा की राज करने के लिए लंबी तपस्या करना बेकार नहीं गया और अंतत: ठाकरे व पवार परिवार सड़कों पर आ गए हैं. राजा राम ने 14 साल का बनवास किया, पांडवों ने 13 साल के बनवास के बाद युद्ध किया तब जा कर सत्ता मिली. अगर हिंदू संस्कृति को वास्तव में कोई पूरी तरह अपना रहा है तो वह बेशक भारतीय जनता पार्टी है. स्वामी, शंकराचार्य, गुरु, महामंडलेश्वर आदि तो बेकार में हिंदूहिंदूहिंदू का नारा लगाते रहते हैं.

भारतीय जनता पार्टी को अब स्टालिन और ममता बनर्जी के घर में घुस कर उन के घरों या पार्टियों में विभाजन करना है, तभी चक्रवर्ती शासन स्थापित हो पाएगा. जनता को क्या मिलेगा, पता नहीं. Editorial

Reality of Life : जीवन सरिता – मुसकराइए यही जीवन है

Reality of Life : मुसकराने के लिए पैसे नहीं लगते, फिर भी लोग मुसकराते नहीं हैं, जबकि विदेशों में लोग भले ही एकदूसरे को नहीं जानते हैं, फिर भी वे मुसकरा कर एकदूसरे का अभिवादन करते हैं. हमारे यहां ऐसा कल्चर नहीं है, इसलिए मुसकराइए और दूसरों के होंठों पर भी मुसकराहट लाइए.

मैं रूस में 10 दिन बिताने के बाद वापस आया. लौटने के बाद दिल्ली से हैदराबाद की फ्लाइट में 3 घंटे का समय था. मैं ने अपनी आदत के अनुसार एयरपोर्ट पर टहलना शुरू कर दिया. जब हम एयरपोर्ट जैसी जगहों पर होते हैं तो हमारा ध्यान खुद ही अन्यत्र यात्रियों पर चला जाता है. मैं ने देखा, अधिकांश यात्री अपने मोबाइल या लैपटौप पर व्यस्त थे. मुझे देख कर उन्होंने सिर्फ क्षणभर अपनी नजर ऊपर करते हुए निहारा और फिर अपनेआप में व्यस्त हो गए.

आप शायद यह सोच रहे होंगे कि इस में गलत या असामान्य क्या है? जी हां, आप बिलकुल सही हैं. परंतु, मैं तो अभीअभी ही रूस से लौटा था, दोनों स्थानों के जनमानस व्यवहारों का तुलनात्मक विश्लेषण करना स्वाभाविक था.

रूस में मैं जिस भी व्यक्ति से मिला, उन सब का पहला अभिवादन उन की खुशनुमा मुसकराहट थी. मैं एक स्मृतिचिह्न खरीदने के लिए एक बड़ी दुकान में गया और लगभग एक घंटे तक सभी सामान देखने के बाद मुझे सभी सामान बहुत महंगे लगे, इसलिए मैं ने कुछ भी सामान नहीं खरीदा.

कुछ भी सामान न खरीद कर बाहर निकलने में स्वाभाविक रूप से मैं उस दुकानदार महिला से आंखें नहीं मिला पा रहा था लेकिन मेरे ऐसे व्यवहार के बाद भी वह महिला अपने काउंटर से निकल कर मुझे गेट तक छोड़ने आई और बहुत ही मुसकरा कर मुझ से ‘डू सुविदानिया’ कहा जिस का अर्थ था फिर मिलेंगे. कितना अच्छा लगा, कुछ न खरीद पाने के दुख का एहसास या कुछ न खरीदने की ग्लानि दोनों ही गायब हो गए.
मैं जिस भी किसी सार्वजानिक स्थान पर कुरसी या बैंच पर बैठा, हरेक बार साथ में बैठे हुए व्यक्ति ने मुसकरा कर मेरा अभिवादन किया. हमारी कोई पूर्व जानपहचान तो थी नहीं, फिर भी उन का यह व्यवहार अपनापन जताने जैसा अत्यंत सुखदायी था.

मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि यदि आप लिफ्ट का उपयोग कर रहे हैं और पहले से कोई व्यक्ति लिफ्ट में मौजूद है तो आप को देख कर जरूर मुसकराएगा, जिस का मतलब है कि वह व्यक्ति आप को लिफ्ट में अपने साथ सफर करने का स्वागत कर रहा है. ऐसे ही व्यवहार की वह आप से भी अपेक्षा करेगा.

छोटीछोटी बातें हैं लेकिन आप को बहुत सुकून देती हैं. मैं ने एहसास किया कि अरे, अब तो मैं हिंदुस्तान आ गया. सभी मेरे देश के हैं परंतु कोई मुड़ कर भी नहीं देख रहा है कि कौन साथ की सीट पर बैठ रहा है. और तो और, एयरक्राफ्ट में मेरे सहयात्री का मैं ने मुसकरा कर अभिवादन भी किया, फिर भी उन की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक न थी.

मैं मानता हूं कि ये सब विकसित और संपन्न देश हैं, जहां शायद सभी सुखसुविधाएं, संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं लेकिन इस का मतलब यह तो बिलकुल भी नहीं कि हम मुसकरा भी नहीं सकते. वास्तविकता में हमारे देश के लोग ज्यादा संतुष्ट हैं क्योंकि सादगी हमें विरासत में मिली है.

इस परिप्रेक्ष्य में मुझेअभिनेता राज कपूर पर फिल्माए गए गायक मुकेश के एक गाने की एक पंक्ति याद आ गई-

‘किसी की मुसकराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.’

आइए, आज से एक नया अभियान शुरू करें, जिस से भी मिलें चाहे वह परिचित हो या अपरिचित, मुसकराएं जरूर. जिस व्यक्ति से किसी कारणवश बातचीत बंद कर दी थी उस को भी देख कर मुसकराएं. फर्क देखिए हमारे खुद के व्यक्तित्व में और हमारे माहौल में भी.

आइए मुसकराएं, सकारात्मकता फैलाएं और अपने हिंदुस्तान को एक खुशनुमा जहां बनाएं. आगे बढि़ए और खुश रहिए. Reality of Life

Family Story in Hindi : बड़ी आपा – शमीम आपा के दिमाग पर पड़ा अंधविश्वास का परदा हट गया

Family Story in Hindi :

सरिता, 20 साल पहले, अप्रैल (प्रथम) 1985

असद भाई की मृत्यु के बाद शमीम आपा अंधविश्वासों के वशीभूत मजार पर जातीं और दुआएं मांगतीं. पर एक दिन सुरैया ने ऐसी तरकीब लड़ाई कि शमीम आपा के दिमाग पर पड़ा अंधविश्वास का परदा हट गया.

तार पर नजर पड़ते ही नसीम बौखला गया. उस का हृदय बड़ी तीव्रता से धड़का. लगा, हलक से बाहर आ जाएगा. किसी तरह उस ने अपनेआप को संभाला और तार ले कर घर के अंदर बढ़ गया.

घर में सुरैया और अम्मी ने खाने से निवृत्त हो कर अभी हाथ ही धोए थे कि नसीम के लटके मुंह को देख कर उस की अम्मी पूछ बैठीं, ‘‘क्या बात है, नसीम, दफ्तर नहीं गए?’’

‘‘अम्मी..’’ कहने के साथ ही नसीम की आंखें भीग गईं, ‘‘असद भाई कल सुबह दिन का दौरा पड़ने से चल बसे. यह तार आया है.’’

नसीम का इतना कहना था कि घर में कुहराम मच गया. उस की बीवी सुरैया और अम्मी बिलखबिलख कर रो पड़ीं. दुख तो नसीम को भी बहुत था, लेकिन किसी तरह उस ने अपनेआप को संभाला तथा सुरैया और अम्मी को जल्दी से तैयार होने को कह कर अपने दफ्तर को चल दिया.

दफ्तर से उस ने 3 दिन की छुट्टी ली और घर लौट आया. तब तक सुरैया और अम्मी तैयार हो चुकी थीं.

वह रिकशा ले आया और अम्मी तथा सुरैया को ले कर बस अड्डे को रवाना हो गया.

7 वर्ष पूर्व शमीम आपा की शादी असद भाई के साथ हुई थी. असद भाई अपने घर में सब से बड़े थे. घर का सारा बोझ उन्हीं के कंधों पर था. शमीम आपा को पा कर असद भाई अपने सारे गम भूल गए. शमीम आपा ने अपनी बुद्धिमानी से घर की सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी और घर की चिंता से उन्हें पूरी तरह मुक्त कर दिया था.

सीधे और सरल स्वभाव के असद भाई रोजे, नमाज के बड़े कायल थे. इस के अतिरिक्त सभी धार्मिक कार्यों में रुचि लेते थे. हर जुम्मेरात को मजार पर जाना, अगरबत्ती सुलगाना उन का पक्का नियम था. उन के उसी नियम के कारण शमीम आपा को भी उन के कार्यों में शामिल होना पड़ता था. धीरेधीरे यही आदत उन के जीवन का अंग बन गई थी.

यों तो असद भाई और शमीम आपा के जीवन में कोई अभाव नहीं था, लेकिन शादी के 7 वर्ष बीत जाने पर भी उन के कोई संतान पैदा नहीं हुई थी. इस के कारण कभीकभी वे बेहद दुखी हो जाते थे. इस का कारण हमेशा ही वह मियां, फकीरों को बताते थे. कहते थे, फलां फकीर या मियां उन से नाराज हैं. इसी कारण उन्हें औलाद का मुंह देखना नसीब नहीं हुआ है.

उधर उन के दोनों छोटे भाइयों के यहां 3-3 बच्चे थे. शमीम आपा ने जोर डाल कर डाक्टर को दिखाया था. डाक्टर से आधाअधूरा इलाज भी करवाया था. लेकिन लाभ होने से पहले ही छोड़ दिया गया, क्योंकि उन के अंदर भी यह अंधविश्वास बैठ गया था कि उन से कोई मियां नाराज हैं.

यही कारण था जब नसीम की शादी की बात आई तो उस की अम्मां ने पूरी होशियारी बरती थी. शमीम आपा तो सिर्फ मजहबी तालीम हासिल करने वाली लड़की को ही बहू बनाना चाहती थीं. लेकिन नसीम और उस की अम्मी की जिद के कारण ही सुरैया के साथ नसीम का निकाह हुआ था.

सुरैया इंटर तक शिक्षा प्राप्त सुलझे विचारों की लड़की थी. अपने छोटे से घर को उस ने आते ही व्यवस्थित कर लिया था.
अपनी इच्छा पूरी न होने के कारण बड़ी आपा नाराज हो कर अपनी ससुराल वापस लौट गई थीं तथा बहुत कोशिशों के बाद भी नसीम की शादी में शरीक नहीं हुई थीं.

पिछले 2 वर्षों से उन्होंने अपने मायके की सूरत भी नहीं देखी थी. सुरैया की सूरत से भी वह नफरत करती थीं. अपने भाई और अम्मी को सामने देख कर शमीम आपा के धैर्य का बांध टूट गया. वह उन से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ीं. किसी तरह अम्मी ने समझाया, ‘‘बेटी, सब्र से काम लो. जो होना था सो हो गया. अब रोने से असद तो वापस आ नहीं सकता.’’

शमीम आपा की आंखें रोने के कारण सूज गई थीं. कई बार गम से वह बेहोश हो जाती थीं. सुरैया साए की भांति उन के साथ रहती थी. वह उन्हें दिलासा देती रहती. तीसरे दिन नसीम सुरैया को ले कर लौट आया था. अम्मी शमीम आपा के पास ही रुक गई थीं. अभी उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. नसीम चाहता था शमीम आपा को अपने साथ घर ले जाए. लेकिन अभी इद्धत (40 दिन तक घर से बाहर न निकलना) होना बाकी था.

घर पहुंचते ही नसीम गहरी सोच में डूब गया था. असद भाई की असमय मृत्यु ने उसे विचलित कर दिया था. उसे मालूम था, असद भाई की मृत्यु के बाद उन के भाई शमीम आपा को अपने साथ रखने से रहे. फिर वह स्वयं भी शमीम आपा को उन लोगों की मेहरबानी पर नहीं छोड़ना चाहता था.

उसे उदास और खोया देख कर सुरैया पूछ बैठी, ‘‘आप कुछ परेशान लगते हैं. मुझे बताइए, आखिर बात क्या है?’’

‘‘आपा के बारे में सोच रहा था, सुरैया,’’ नसीम बोला, ‘‘भरी जवानी में वह विधवा हो गई हैं. शादी का सुख भी उन्हें न मिल सका.’’

‘‘हां, आप ठीक कहते हैं,’’ सुरैया ने एक गहरी सांस ली. फिर बोली, ‘‘लेकिन आप अधिक परेशान न हों. शमीम आपा को हम अपने साथ ही रखेंगे.’’

‘‘सुरैया,’’ नसीम ने आश्चर्य से कहा, ‘‘तुम्हें तो मालूम है, आपा तुम्हें पसंद नहीं करतीं.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं कोशिश करूंगी तो आपा मुझे पसंद करने लगेंगी.’’ सुरैया मुसकराई.

नसीम प्रसन्नता से सुरैया को देखता रह गया. उसे विश्वास हो गया, सुरैया शमीम आपा को जीने का सलीका सिखा देगी. एक बोझ सा उस ने अपने ऊपर से उतरता हुआ महसूस किया.

सवा महीने बाद शमीम आपा अम्मी के साथ अपने भाई के पास आ गईं. सुरैया ने उन्हें हाथोंहाथ लिया. उसे अपनी ननद से पूरी हमदर्दी थी. अब शमीम आपा हमेशा खामोश, उदास, परेशान सी रहती थीं. उन के होंठों की हंसी जैसे हमेशा के लिए मुरझा गई थी. सुरैया हमेशा उन का दिल बहलाने की कोशिश करती रहती थी.

एक दिन अचानक रात को चीखपुकार सुन कर नसीम और सुरैया की आंख खुल गई. कमरे से बाहर आ कर उन्होंने देखा तो चौंक पड़े. शमीम आपा अपने कमरे में बिस्तर पर पड़ी गहरीगहरी सांसें ले रही थीं. उन की आंखें बुरी तरह सुर्ख हो रही थीं. उन के पास ही घबराई हुई अम्मी खड़ी थीं.

‘‘क्या हुआ, अम्मी? क्या बात है?’’ नसीम ने पूछा.

‘‘सोतेसोते अचानक चीखने लगी, ‘अरे, मुझे बचाओ…मार डालेंगे…मार डालेंगे.’’ अम्मी ने बताया.

नसीम की समझ में कुछ नहीं आया. उस ने शमीम आपा से कुछ पूछना चाहा लेकिन वह कुछ भी बताने में असमर्थ थीं. उस रात फिर घर के किसी भी व्यक्ति को एक पल भी नींद नहीं आई.

सुबह को जब शमीम आपा की तबीयत कुछ ठीक दिखाई दी तो नसीम ने पूछा, ‘‘रात क्या हुआ था, आपा?’’

आपा ने एक गहरी सांस ली और बोली, ‘‘भैया, रात स्वप्न में तुम्हारे दूल्हा भाई मेरा गला दबा रहे थे. कह रहे थे, ‘तू सब मियां, फकीरों को भूल गई. किसी भी मजार पर नहीं जाती. हर जुम्मेरात को मजार पर नहीं जाएगी तो मैं तेरा जीना हराम कर दूंगा.’’’

नसीम ने एक गहरी सांस ली. वह समझ गया, ये सब बीती बातें हैं. इसी कारण उन्हें यह सब स्वप्न में दिखाई दिया.

अगली जुम्मेरात आने से पहले ही एक रात को शमीम आपा फिर चीख पड़ीं. पूरी रात वह रोती रहीं. नसीम और सुरैया ने किसी तरह उन्हें चुप कराया.

दिन निकला तो वह बोलीं, ‘‘मैं अब हर जुम्मेरात को मजार पर जाया करूंगी, नहीं तो वह मुझे जान से मार देंगे.’’

नसीम ने उन्हें इजाजत दे दी. उस ने अपने मन में सोचा, 2-4 बार मजार पर जाएंगी और इन के दिमाग से भ्रम निकल जाएगा तो वह आपा को समझा देगा. वह इन बातों को बिलकुल पसंद नहीं करता था. अंधविश्वास से उसे बुरी तरह चिढ़ थी.

अब आपा ने हर जुम्मेरात को मजार पर जाना शुरू कर दिया था. हर जुम्मेरात को आपा अच्छेअच्छे पकवान बनातीं और मजार पर जा कर नियाज दिलातीं.न

सीम चुपचाप खामोशी से सब कुछ देखता रहता. लेकिन 15 दिन में ही जब उस का वेतन इन खर्चों में समाप्त हो गया तो उसे अपने पैरों तले की जमीन खिसकती हुई सी प्रतीत हुई.

उस ने आपा को समझाना चाहा तो आपा भड़क उठीं. सारे दिन वह रोती रहीं. आपा का रोना अम्मी से न देखा गया तो वह भी नसीम को बुराभला कहने लगीं.

नसीम का परेशानी से बुरा हाल था. लेकिन वह किसी तरह सब्र कर रहा था. किसी तरह उस ने आपा को समझाया, ‘‘आपाजान, आप ही सोचो, एक मामूली सा क्लर्क हूं. मैं कोई बड़ा आदमी तो हूं नहीं, जो इस तरह से खर्च सहन करूं. लेकिन फिर भी आप थोड़ा सोचसमझ कर खर्च करें तो अच्छा होगा.’’

शमीम आपा पर उस के समझाने का इतना असर अवश्य हुआ कि खर्च में उन्होंने कुछ कमी कर दी, लेकिन मजार पर जाना कम नहीं किया.
नसीम इधर बेहद परेशान रहने लगा था. उस का बचत किया हुआ पैसा धीरेधीरे समाप्त होता जा रहा था. उधर सुरैया अपने पहले बच्चे को जन्म देने वाली थी. उसे अस्पताल में भरती कराना था, जिस के लिए रुपयों की आवश्यकता थी.

मानसिक परेशानियों के कारण एक दिन उस की साइकिल स्रद्ध स्कूटर से टक्कर होतेहोते बची. वह तो संयोग की बात थी कि उस की साइकिल स्कूटर की टक्कर खा कर स्कूटर के आगे आ कर गिरने के स्थान पर विपरीत दिशा में गिरी जिस के कारण नसीम के हाथपैर में मामूली सी ही चोटें आईं.

सुरैया तो बेहद घबरा गई थी. शमीम आपा ने सुना तो बोलीं, ‘‘भैया, यह सब बुजुर्गों की बेअदबी के कारण हुआ है. तुम उन की अवमानना जो कर रहे थे.’’

‘‘ऐसी बातें तो मत करो, आपा,’’ सुरैया चीख पड़ी थी, ‘‘अपने ही भाई का बुरा चाहती हो? खुदा न करे उन्हें कुछ हो.’’

सुरैया की बातें सुन कर शमीम आपा रोने लगीं, ‘‘मैं तो हूं ही बुरी. मैं तो अपने भाई का बुरा ही चाहती हूं.’’

बड़ी मुश्किल से अम्मी और नसीम ने आपा को चुप कराया.

सुरैया नसीम की परेशानी को समझ गई थी. उस ने मन ही मन शमीम आपा को सही राह पर लाने की सोच ली. कई दिन तक वह योजनाएं बनाती रही. एक दिन उस के दिमाग में एक तरकीब आ ही गई.

उस रात को जब सब सो रहे थे तो अचानक सुरैया चीख पड़ी, ‘‘अरे बचाओ, मुझे भाई मार डालेंगे. अरे मेरा गला दबा रहे हैं.’’

घबरा कर शमीम आपा और अम्मी सुरैया के कमरे में पहुंचीं तो देखा सुरैया बुरी तरह चीख रही है. उस के बाल बिखरे हुए थे. वह किसी तरह संभल नहीं रही थी, हालांकि नसीम उसे बिस्तर पर बैठाने की कोशिश कर रहा था.

अचानक नसीम का बंधन ढीला पड़ गया तो सुरैया चीखती हुई शमीम आपा की ओर बढ़ी, ‘‘मैं तुझे जान से मार दूंगा,’’ अब वह पुरुषों की भाषा में बोलने लगी थी, ‘‘अरे, खापी कर मोटी भैंस हो रही है. तुझ से एक दिन यह भी न हुआ कि पांचों वक्त की नमाज पढ़े, रमजान रखे.’’

शमीम आपा का चेहरा भय से पीला पड़ गया था. वह हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘आगे से मैं ऐसा ही करूंगी, जैसा आप कहते हैं.’’

‘‘करेगी कैसे नहीं,’’ सुरैया चीखी, ‘‘मैं तेरा जीना हराम कर दूंगा. और सुन, अब तुझे मजार पर जाने की कोई आवश्यकता नहीं. तेरे मजार पर जाने से बेपरदगी होती है जो मुझे स्वीकार नहीं.’’

किसी तरह अम्मी और नसीम ने सुरैया को काबू में किया. पूरी रात वह चीखतीचिल्लाती रही. कभी हंसने लगती तो कभी रोने लगती.

दिन निकलने पर बड़ी मुश्किल से सुरैया सो सकी. दोपहर बाद वह सो कर उठी. उस दिन घर का सारा कार्य शमीम आपा को करना पड़ा. सो कर उठने के बाद सुरैया पहले की तरह ही सामान्य थी. उस से अम्मी ने पूछा, ‘‘रात तुझे क्या हो गया था?’’

लेकिन उस ने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. वह बोली, ‘‘मैं तो आराम से सोती रही हूं.’’

इस से शमीम आपा और अम्मी को विश्वास हो गया कि रात सुरैया पर असद भाई की रूह का असर था. उस दिन से शमीम आपा बेहद घबराईघबराई सी रहने लगीं. उन्होंने 10 दिन से पांचों वक्त की नमाज पढ़नी शुरू कर दी. एक दिन सुरैया ने चाहा कि वह उन्हें मजार पर ले जाए, लेकिन आपा इतनी बुरी तरह डरी हुई थीं कि उन्होंने मजार पर जाने से इनकार कर दिया.

इस तरह पूरे 6 महीने गुजर गए. इस बीच सुरैया ने एक सुंदर से शिशु को जन्म दिया. शमीम आपा में इस बीच काफी परिवर्तन आ गया था. अब वह पहले के समान उदास और परेशान नहीं रहती थीं. अब उन के चेहरे पर हमेशा मुसकराहट सी रहती थी. मजार आदि पर जाना वह बिलकुल भूल गई थीं.

एक दिन नसीम दफ्तर से लौटा तो सुरैया बोली, ‘‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेंगे आप?’’

‘‘हां, बोलो, क्या बात है?’’ नसीम ने कहा.

‘‘मैं ने सोचा है कि शमीम आपा का घर बस जाए तो अच्छा होगा.’’

‘‘क्या कह रही हो, सुरैया?’’ नसीम चौंक पड़ा, ‘‘जमाना क्या कहेगा? लोग कहेंगे एक विधवा बहन का बोझ भी नहीं उठाया जा सकता.’’
‘‘हमें लोगों से कुछ लेनादेना नहीं है. हमें आपा की खुशियां देखनी हैं. औरत मर्द के बिना अधूरी है,’’ सुरैया बोली.

सुरैया की बात सुन कर नसीम गहरी सोच में डूब गया. काफी सोचनेसमझने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सुरैया की बात सही है. उस ने उसी दिन से आपा के लिए शौहर की तलाश शुरू कर दी.

शीघ्र ही उसे लतीफ मियां जैसे नेक और शरीफ व्यक्ति का पता मिल गया. लतीफ मियां एक स्कूल में अध्यापक थे. उन की पत्नी का कई वर्ष पूर्व देहांत हो गया था. एक छोटी सी बच्ची थी. नसीम ने तुरंत रिश्ता पक्का कर दिया. पहले तो शमीम आपा ने थोड़ा इनकार किया, लेकिन फिर निकाह के लिए राजी हो गईं.

ईद के महीने में नसीम ने शमीम आपा और लतीफ मियां का निकाह कर दिया. जब शमीम आपा की विदाई का समय आया तो सुरैया उन के गले लग गई और बोली, ‘‘आपाजान, मैं आप को किसी धोखे में रखना नहीं चाहती. उस रात जब मुझ पर असर हुआ था, वह सब एक नाटक था. सिर्फ आप का अंधविश्वास समाप्त करने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा. मुझे उम्मीद है, मेरी इस गलती को आप माफ कर देंगी.’’

‘‘भाभी, तुम ने गलती कहां की थी?’’ शमीम आपा बोलीं, ‘‘तुम ने जो कुछ भी किया मेरे भले के लिए किया. अगर तुम ऐसा न करतीं तो मैं आज भी उन्हीं अंधविश्वासों से लिपटी होती.’’

सुरैया मुसकरा पड़ी. अम्मी और सुरैया ने हंस कर बड़ी आपा को विदा कर दिया.

शमीम आपा का निकाह हुए 2 वर्ष बीत गए थे. आपा अपने जीवन से हर तरह से संतुष्ट थीं. लतीफ मियां ने उन्हें कभी कोई शिकायत का अवसर नहीं दिया था. जब भी आपा का दिल घबराता था वह अपनी अम्मी और भाभी से मिलने उन के घर आ जाती थीं. आपा को सुखी देख कर नसीम और अम्मी को बेहद प्रसन्नता होती. सुरैया तो शमीम आपा को देख कर फूल के समान खिल जाती थी.

एक दिन नसीम दफ्तर से लौटा तो बेहद प्रसन्न था. आते ही अपनी अम्मी और सुरैया से बोला, ‘‘अम्मीजान, एक खुशखबरी, शमीम आपा के घर चांद सा बेटा आया है.’’

‘‘सच,’’ दोनों ने आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ पूछा.

‘‘हां, अम्मीजान,’’ नसीम बोला, ‘‘आज लतीफ भाई दफ्तर में आए थे और मुझे यह खबर दे गए.’’

उसी समय तीनों तैयार हो कर शमीम आपा को बधाई देने उन के घर जा पहुंचे.

सुरैया अधिक देर अपने कुतूहल को न छिपा सकी. पूछ ही बैठी, ‘‘आपाजान, आप तो कहती थीं आप से मियां नाराज हैं, इसी कारण आप को संतान नहीं होती. लेकिन यहां आ कर तो सब उलटा ही हो गया. क्या मियां आप से खुश हो गए?’’

नजदीक ही बैठे लतीफ मियां ने सुरैया की बात पर एक ठहाका लगाया और बोले, ‘‘सुरैया, यह सब इन के अंधविश्वास का कारण था. असद मियां को एक लंबे इलाज की आवश्यकता थी. लेकिन वह अपने अंधविश्वास के कारण यह सब नहीं कर सके. उन्हें विश्वास था वह नियाज दिलवा कर, मजारों पर जा कर अपने लिए संतान मांग लेंगे. लेकिन क्या मजारों से भी संतानें मिली हैं?’’

उन्होंने शमीम आपा की तरफ देखा तो उन्होंने शरमा कर मुंह दूसरी ओर कर लिया.

Family Story in Hindi

Family Story in Hindi : अपराधबोध – “बुराई कर बुरा होगा”, अंजु के साथ क्या हुआ?

Family Story in Hindi : जेठजेठानी के ऐशोआराम से जलीभुनी अंजु ने ईर्ष्यावश निन्नी की शादी तुड़वा कर मानो जीत हासिल कर ली हो. लेकिन उस के परिवार में ऐसा क्या हुआ जिस ने अंजु को उन का ऋणी बना दिया…

अपने मकान के दूसरे हिस्से में भारी हलचल देख कर अंजु हैरानी में पड़ गई थी कि इतने लोगों का आनाजाना क्यों हो रहा है. जेठजी कहीं बीमार तो नहीं पड़ गए या फिर जेठानी गुसलखाने में फिसल कर गिर तो नहीं गईं.
जेठानी की नौकरानी जैसे ही दरवाजे से बाहर निकली, अंजु ने इशारे से उसे अपनी तरफ बुला लिया.
चूंकि देवरानी और जेठानी में मनमुटाव चल रहा था इसलिए जेठानी के नौकर इस ओर आते हुए डरते थे.
अंजु ने चाय का गिलास नौकरानी को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘थोड़ी देर बैठ कर कमर सीधी कर ले.’’
चाय से भरा गिलास देख कर नौकरानी खुश हो उठी, फिर उस ने अंजु को बहुत कुछ जानकारी दे दी और यह कह कर उठ गई कि मिठाई लाने में देरी हुई तो घर में डांट पड़ जाएगी.
यह जान कर अंजु के दिल पर सांप लोटने लगा कि जेठानी की बेटी निन्नी का रिश्ता अमेरिका प्रवासी इंजीनियर लड़के से पक्का होने जा रहा है.
जेठानी का बेटा डाक्टर बन गया. डाक्टर बहू घर में आ गई.
अब तो निन्नी को भी अमेरिका में नौकरी करने वाला इंजीनियर पति मिलगया.
ईर्ष्या से जलीभुनी अंजु पति और पुत्र दोनों को भड़काने लगी, ‘‘जेठजेठानी तो शुरू से ही हमारे दुश्मन रहे हैं. इन लोगों ने हमें दिया ही क्या है. ससुरजी की छोड़ी हुई 600 गज की कोठी में से यह 100 गज में बना टूटाफूटा नौकर के रहने लायक मकान हमें दे दिया.’’
हरीश भी भाई से चिढ़ा हुआ था. वह भी मन की भड़ास निकालने लगा, ‘‘भाभी यह भी तो ताने देती कहती हैं कि भैया ने अपनी कमाई से हमें दुकान खुलवाई, मेरी बीमारी पर भी खर्चा किया.’’
‘‘दुकान में कुछ माल होता तब तो दुकान चलती, खाली बैठे मक्खी तो नहीं मारते,’’ बेटे ने भी आक्रोश उगला.
अंजु के दिल में यह बात नश्तर बन कर चुभती रहती कि रहन- सहन के मामले में हम लोग तो जेठानी के नौकरों के बराबर भी नहीं हैं.
जेठजेठानी से जलन की भावना रखने वाली अंजु कभी यह नहीं सोचती थी कि उस का पति व्यापार करने के तौरतरीके नहीं जानता. मामूली बीमारी में भी दुकान छोड़ कर घर में पड़ा रहता है.
बच्चे इंटर से आगे नहीं बढ़ पाए. दोनों बेटियों का रंग काला और शक्लसूरत भी साधारण थी. न शक्ल न अक्ल और न दहेज की चाशनी में पगी सुघड़ता, संपन्नता तो अच्छे रिश्ते कहां से मिलें.
अंजु को सारा दोष जेठजेठानी का ही नजर आता, अपना नहीं.
थोड़ी देर में जेठानी की नौकरानी बुलाने आ गई. अंजु को बुरा लगा कि जेठानी खुद क्यों नहीं आईं. नौकरानी को भेज कर बुलाने की बला टाल दी. इसीलिए दोटूक शब्दों में कह दिया कि यहां से कोई नहीं जाएगा.
कुछ देर बाद जेठ ने खुद उन के घर आ कर आने का निमंत्रण दिया तो अंजु को मन मार कर हां कहनी पड़ी.
जेठानी के शानदार ड्राइंगरूम में मखमली सोफों पर बैठे लड़के वालों को देख कर अंजु के दिल पर फिर से सांप लोट गया.
लड़का तो पूरा अंगरेज लग रहा है, विदेशी खानपान और रहनसहन अपना-कर खुद भी विदेशी जैसा बन गया है.
लड़के के पिता की उंगलियों में चमकती हीरे की अंगूठियां व मां के गले में पड़ी मोटी सोने की जंजीर अंजु के दिल पर छुरियां चलाए जा रही थी.
एकाएक जेठानी के स्वर ने अंजु को यथार्थ में ला पटका. वह लड़के वालों से उन लोगों का परिचय करा रहे थे.
लड़के वालों ने उन की तरफ हाथ जोड़ दिए तो अंजु के परिवार को भी उन का अभिवादन करना पड़ा.
जेठजी कितने चतुर हैं. लड़के वालों से अपनी असलियत छिपा ली, यह जाहिर नहीं होने दिया कि दोनों परिवारों के बीच में बोलचाल भी बंद है. माना कि जेठजी के मन में अब भी अपने छोटे भाई के प्रति स्नेह का भाव छिपा हुआ है पर उन की पत्नी, बेटा और बेटी तो दुश्मनी निभाते हैं.
भोजन के बाद लड़के वालों ने निन्नी की गोद भराई कर के विवाह की पहली रस्म संपन्न कर दी.
लड़के की मां ने कहा कि मेरा बेटा विशुद्ध भारतीय है. वर्षों विदेश में रह कर भी इस के विचार नहीं बदले. यह पूरी तरह भारतीय पत्नी चाहता था. इसे लंबी चोटी वाली व सीधे पल्लू वाली निन्नी बहुत पसंद आई है और अब हम लोग शीघ्र शादी करना चाहते हैं.
अंजु को अपने घर लौट कर भी शांति नहीं मिली.
निन्नी ने छलकपट कर के इतना अच्छा लड़का साधारण विवाह के रूप में हथिया लिया. इस चालबाजी में जेठानी की भूमिका भी रही होगी. उसी ने निन्नी को सिखापढ़ा कर लंबी चोटी व सीधा पल्लू कराया होगा.
अंजु के घर में कई दिन तक यही चर्चा चलती रही कि जीन्सशर्ट पहन कर कंधों तक कटे बालों को झुलाती हुई डिस्को में कमर मटकाती निन्नी विशुद्ध भारतीय कहां से बन गई.
एक शाम अंजु अपनी बेटी के साथ बाजार में खरीदारी कर रही थी तभी किसी ने उस के बराबर से पुकारा, ‘‘आप निन्नी की चाची हैं न.’’
अंजु ने निन्नी की होने वाली सास को पहचान लिया और नमस्कार किया. लड़का भी साथ था. वह साडि़यों केडब्बों को कार की डिग्गी में रखवा रहा था.
‘‘आप हमारे घर चलिए न, पास मेंहै.’’
अंजु उन लोगों का आग्रह ठुकरा नहीं पाई. थोड़ी नानुकुर के बाद वह और उस की बेटी दोनों कार में बैठ गईं.
लड़के की मां बहुत खुश थी. उत्साह भरे स्वर में रास्ते भर अंजु को वह बतातीरहीं कि उन्होंने निन्नी के लिए किस प्रकारके आभूषण व साडि़यों की खरीदारी की है.
लड़के वालों की भव्य कोठी व कई नौकरों को देख अंजु फिर ईर्ष्या से जलने लगी. उस की बेटी के नसीब में तो कोई सर्वेंट क्वार्टर वाला लड़का ही लिखा होगा.
अंजु अपने मन के भाव को छिपा नहीं पाई. लड़के की मां से अपनापन दिखाती हुई बोली, ‘‘बहनजी, कभीकभी आंखों देखी बात भी झूठी पड़ जाती है.’’
‘‘क्या मतलब?’’
अंजु ने जो जहर उगलना शुरू किया तो उगलती ही चली गई. कहतेकहते थक जाती तो उस की बेटी कहना शुरू कर देती.
लड़के की मां सन्न बैठी थी, ‘‘क्या कह रही हो बहन, निन्नी के कई लड़कों से चक्कर चल रहे हैं. वह लड़कों के साथ होटलों में जाती है, शराब पीती है, रात भर घर से बाहर रहती है.’’
‘‘अब क्या बताऊं बहनजी, आप ठहरीं सीधीसच्ची. आप से झूठ क्या बोलना. निन्नी के दुर्गुणों के कारण पहले भी उस का एक जगह से रिश्ता टूट चुका है.’’
अंजु की बातों को सुन कर लड़के की मां भड़क उठी, ‘‘ऐसी बिगड़ी हुई लड़की से हम अपने बेटे का विवाह नहीं करेंगे. हमारे लिए लड़कियों की कमी नहीं है. सैकड़ों रिश्ते तैयार रखे हैं.’’
अंजु का मन प्रसन्न हो उठा. वह यही तो चाहती थी कि निन्नी का रिश्ता टूट जाए.
लोहा गरम देख कर अंजु ने फिर से चोट की, ‘‘बहनजी, आप मेरी मानें तो मैं आप को एक अच्छे संस्कार वाली लड़की दिखाती हूं, लड़की इतनी सीधी कि बिलकुल गाय जैसी, जिधर कहोगे उधर चलेगी.’’
‘‘हमें तो बहन सिर्फ अच्छी लड़की चाहिए, पैसे की हमारे पास कमी नहीं है.’’
लड़के की मां अगले दिन लड़की देखने के लिए तैयार हो गईं.
एक तीर से दो निशाने लग रहे थे. निन्नी का रिश्ता भी टूट गया और अपनी गरीब बहन की बेटी के लिए अच्छा घरपरिवार भी मिल गया.
अंजु ने उसी समय अपनी बहन को फोन कर के उन लोगों को बेटी सहित अपने घर में बुला लिया.
फिर बहन की बेटी को ब्यूटीपार्लर में सजाधजा कर उस ने खुद लड़के वालों के घर ले जा कर उसे दिखाया पर लड़के को लड़की पसंद नहीं आई.
अंजु अपना सा मुंह ले कर वापस लौट आई.
फिर भी अंजु का मन संतुष्ट था कि उस के घर शहनाई न बजी तो जेठानी के घर ही कौन सी बज गई.
निन्नी का रिश्ता टूटने की खुशी भी तो कम नहीं थी.

एक दिन निन्नी रोती हुई उस के घर आई, ‘‘चाची, तुम ने उन लोगों से ऐसा क्या कह दिया कि उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया.’’
अंजु पहले तो सुन्न जैसी खड़ी रही, फिर आंखें तरेर कर निन्नी की बात को नकारती हुई बोली, ‘‘तुम्हारा रिश्ता टूट गया, इस का आरोप तुम मेरे ऊपर क्यों लगा रही हो. तुम्हारे पास क्या सुबूत है कि मैं ने उन लोगों से तुम्हारी बातें लगाई हैं.’’
‘‘लेकिन वे लोग तो तुम्हारा ही नाम ले रहे हैं.’’
‘‘मैं भला उन लोगों को क्या जानूं,’’ अंजु निन्नी को लताड़ती हुई बोली, ‘‘तुम दोनों मांबेटी हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो, रिश्ता टूटने का आरोप मेरे सिर पर मढ़ कर मुझे बदनाम कर रही हो. यह भी तो हो सकता है कि तुम्हारी किसी गलती के कारण ही रिश्ता टूटा हो.’’
‘‘गलती… कैसी गलती? मेरी बेटी ने आज तक निगाहें उठा कर किसी की तरफ नहीं देखा तो कोई हरकत या गलती भला क्यों करेगी?’’ दीवार की आड़ में खड़ी जेठानी भी बाहर निकल आई थीं.
जेठानी की खूंखार नजरों से घबरा कर अंजु ने अपना दरवाजा बंद कर लिया.
इस घटना को ले कर दोनों घरों में तनाव की अधिकता बढ़ गई थी. फिर जेठजी ने अपनी पत्नी को समझा कर मामला रफादफा कराया.

एक रात अंजु का बेटा दफ्तर से घर लौटा तो उस के पास 500 और 1 हजार रुपए के नएनए नोट देख कर पूरा परिवार हैरान रह गया.
अंजु ने जल्दी से घर का दरवाजा बंद कर लिया और धीमी आवाज में रुपयों के बारे में पूछने लगी.
बेटे ने भी धीमी आवाज में बताया कि आज सेठजी अपना पर्स दुकान में ही भूल गए थे.
हरीश को बेटे की करतूत नागवार लगी, ‘‘तू ने सेठजी का पर्स घर में ला कर अच्छा नहीं किया. उन्हें याद आएगा तो वे तेरे ही ऊपर शक करेंगे. तू इन रुपयों को अभी उन्हें वापस कर आ.’’
आंखें तरेर कर अंजु ने पति से कहा, ‘‘तुम सचमुच के राजा हरिश्चंद्र हो तो बने रहो. हमें सीख देने की जरूरत नहीं है.’’
मांबेटा दोनों देर रात तक रुपयों को देखदेख कर खुश होते रहे और रंगीन टेलीविजन खरीदने के मनसूबे बनाते रहे.
सुबह किसी ने घर का दरवाजा जोरों से खटखटाया.
अंजु ने दरवाजा खोलने से पहले खिड़की से बाहर देखा तो उस की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. बेटे की दुकान का मालिक कई लोगों के साथ खड़ा था.
अंजु घबरा कर पति को जगाने लगी, ‘‘देखो तो, यह कौन लोग हैं?’’
बाहर खड़े लोग देरी होते देख कर चिल्लाने लगे थे, ‘‘दरवाजा खोलते क्यों नहीं? मुंह छिपा कर इस तरह कब तक बैठे रहोगे. हम दरवाजा तोड़ डालेंगे.’’
शोर सुन कर जेठजेठानी का पूरा परिवार बाहर निकल आया. उन को बाहर खड़ा देख कर अंजु का भी परिवार बाहर निकल आया.
‘‘आप लोग इस प्रकार से हंगामा क्यों मचा रहे हैं?’’ हरीश ने साहस कर के प्रश्न किया.
‘‘तुम्हारा लड़का दुकान से रुपए चुरा कर ले आया है,’’ मालिक क्रोध से आगबबूला हो कर बोला.
‘‘सेठजी, आप को कोई गलत- फहमी हुई है. मेरा बेटा ऐसा नहीं है. इस ने कोई रुपए नहीं चुराए हैं,’’ अंजु घबराहट से कांप रही थी.
‘‘हम तुम्हारे घर की तलाशी लेंगे अभी दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा,’’ सारे लोग जबरदस्ती घर में घुसने लगे.
तभी जेठजी अंजु के घर के दरवाजे में अड़ कर खड़े हो गए, ‘‘तुम लोग अंदर नहीं जा सकते, हमारी इज्जत का सवालहै.’’
‘‘हमारे रुपए…’’
‘‘हम लोग चोर नहीं हैं, हमारे खानदान में किसी ने चोरी नहीं की.’’
‘‘यह लड़का चोर है.’’
‘‘आप लोगों के पास क्या सुबूत है कि इस ने चोरी की?’’ जेठजी की कड़क आवाज के सामने सभी निरुत्तर रह गए थे.
तभी जेठजी का डाक्टर बेटा सामने आ गया, उस के हाथों में नोटों की गड्डियां थीं. आक्रोश से बोला, ‘‘बोलो, कितने रुपए थे आप के. जितने थे इस में से ले जाओ.’’
वे लोग चुपचाप वापस लौट गए.
जेठजी व उन के बेटे के प्रति अंजु कृतज्ञता के भार से दब गई थी. अगर जेठजी साहस नहीं दिखाते तो आज उन सब की इज्जत सरे बाजार नीलाम हो जाती.
अंजु रोने लगी. लालच में अंधी हो कर वह कितनी बड़ी गलती कर बैठी थी. उस ने वे सारे रुपए निकाल कर बेटे के मुंह पर दे मारे, ‘‘ले, दफा हो यहां से, चोरी करेगा तो इस घर में नहीं रह पाएगा. मालिक को रुपए लौटा कर माफी मांग कर आ नहीं तो मैं तुझे घर में नहीं घुसने दूंगी,’’ फिर वह जेठजेठानी के पैरों पर गिर कर बोली, ‘‘आप लोगों ने आज हमारी इज्जत बचा ली.’’
‘‘तुम लोगों की इज्जत हमारी इज्जत है. खून तो एक ही है, आपस में मनमुटाव होना अलग बात है पर बाहर वाले आ कर तुम्हें नीचा दिखाएं तो हम कैसे देख सकते हैं,’’ जेठजी ने कहा.

अंजु शरम से पानीपानी हो रही थी. जेठजी के मन में अब भी उन लोगों के प्रति अपनापन है और एक वह है कि…उस ने जेठजी के प्रति कितना बड़ा अपराध कर डाला. उफ, क्या वह अपनेआप को कभी माफ कर सकेगी.
अंजु मन ही मन घुलती रहती. निन्नी का कुम्हलाया हुआ चेहरा उसे अंदर तक कचोटता रहता.
निन्नी छोटी थी तो उस का आंचल थामे पूरे घर में घूमती फिरती. मां से अधिक वह चाची से हिलीमिली रहती.
अपने बच्चे हो गए तब भी अंजु निन्नी को अपनी गोद में बैठा कर खिलातीपिलाती रहती. और अब ईर्ष्या की आग में जल कर उस ने अपनी उसी प्यारी सी निन्नी की भावनाओं का गला घोंट दिया था.
एक दिन अंजु के मन में छिपा अपराधबोध, सहनशक्ति से बाहर हो गया तो वह निन्नी को पकड़ कर अपने घर में ले आई, उस पर अपनापन जताती हुई बोली, ‘‘खानापीना क्यों बंद कर दिया पगली, क्या हालत बना डाली अपनी. लड़कों की कमी है क्या…’’
निन्नी उस की गोद में गिर कर बच्चों की भांति फूटफूट कर रो पड़ी, ‘‘चाची, मुझे माफ कर दो, मैं उस दिन आप से बहुत कुछ गलत बोल गई थी, उन लोगों की बातों पर विश्वास कर के मैं ने आप को गलत समझ लिया, मैं जानती हूं कि आप मुझे बहुत प्यार करती हैं.’’
‘‘हां, बेटी मैं तुझे बहुत प्यार करती हूं, पर मुझ से भी गलती हो सकती है. इनसान हूं न, फरिश्ता थोड़े ही हूं,’’ अंजु की आंखों से आंसू बहने लगे थे, ‘‘पता नहीं इनसानों को क्या हो जाता है जो कभी अपने होते हैं वे पराए लगने लगते हैं पर तू चिंता मत कर, मैं तेरे लिए उस विदेशी इंजीनियर से भी अच्छा लड़का ढूंढ़ निकालूंगी. बस, तू खुश रहा कर, वैसे ही जैसे बचपन में रहती थी. मैं तुझे अपने हाथों से दुलहन बना कर तैयार करूंगी, ससुराल भेजूंगी, मेरी अच्छी निन्नी, तू अब भी वही बचपन वाली गुडि़या लगती है.’’
जेठानी छत पर खड़ी हो कर देवरानी की बातें सुन रही थी.
अंजु के शब्दों ने उस के अंदर जादू जैसा काम किया. नीचे उतर कर पति से बोली, ‘‘झगड़ा तो हम बड़ों के बीच चल रहा है, बच्चे क्यों पिसें. तुम अंजु के बेटे की कहीं अच्छी सी नौकरी लगवा दो न.’’
‘‘तुम ठीक कहती हो.’’
‘‘अंजु की लड़कियां पूरे दिन घर में खाली बैठी रहती हैं. एक बिजली से चलने वाली सिलाई मशीन ला कर उन्हें दे दो. मांबेटियां सिलाई कर के कुछ आर्थिक लाभ उठा लेंगी.’’
‘‘ठीक है, जैसा तुम कहती हो वैसा ही करेंगे. इन लोगों का और है ही कौन.’’
अंजु ने निन्नी पर प्यार जताया तो जेठानी के मन में भी उस के बच्चों के प्रति ममता का दरिया उमड़ पड़ा था. Family Story in Hindi

Throat Cancer : गले का कैंसर, कारण और इलाज

Throat Cancer : भारत में गले का कैंसर पैर पसार रहा है. लोग हलकी सी खराश या दर्द समझ कर इसे  नजरअंदाज करते जाते हैं, जो बाद में कैंसर की शक्ल ले लेता है. पर समय रहते यदि इस पर ध्यान दिया जाए तो इस का इलाज भी संभव है.

गले का कैंसर सिर और गले के कैंसर (एचएनसी) समूह में आता है. यह भारत में स्वास्थ्य की एक बड़ी समस्या है, जो तेजी से बढ़ती जा रही है. नैशनल लाइब्रेरी औफ मैडिसिन के अनुसार सिर और गले के कैंसर पुरुषों की प्रति 1 लाख आबादी में 25.9 लोगों में तथा महिलाओं की प्रति 1 लाख आबादी में 8 लोगों में पाए गए, यानी पुरुषों के कैंसर के लगभग 26 प्रतिशत मामलों तथा महिलाओं के कैंसर के लगभग 8 प्रतिशत मामलों में ये कैंसर पाए गए. भारत में लगभग 33 पुरुषों में से 1 पुरुष को तथा 107 महिलाओं में से लगभग 1 महिला को यह कैंसर होने का जोखिम पाया गया.

भारत में सिर और गले के कैंसर के हर साल लगभग 2 लाख मामले सामने आते हैं. यह कैंसर सब से आम रूप से पाए जाने वाले कैंसरों में से एक है, जिस की वजह से कैंसर के कुल मामलों में लगभग 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाती है.

पश्चिमी देशों के मुकाबले यह आंकड़ा काफी बड़ा है. बीते सालों के साथ इन मामलों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है, इसलिए लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाया जाना बहुत जरूरी हो गया है, ताकि इस कैंसर की समय पर पहचान कर के लोगों की जान बचाने में मदद मिले.

गले के कैंसर के बारे में जानिए

गले का कैंसर आमतौर से एपिथीलियल लाइनिंग में शुरू होता है. इस स्थिति को स्क्वैमस सैल कार्सिनोमा कहा जाता है. यह ओरोफैरिंक्स (टौंसिल्स), हाइपोफैरिंक्स (गले का निचला हिस्सा) और लैरिंक्स में फैलता है. शुरुआत में इस के कोई लक्षण प्रकट नहीं होते हैं, जिस के कारण निदान में अकसर देर हो जाती है. हालांकि इस के लक्षण गले की आम समस्याओं की तरह ही होते हैं, पर यह जानना बहुत जरूरी है कि गले में दर्द होने पर डाक्टर को कब दिखाना जरूरी हो जाता है. तुरंत निदान होने पर इलाज के नतीजे बेहतर मिलते हैं और मरीजों की जान बच जाती है.

गले की समस्याओं पर नजर रखें

अगर सामान्य इलाज करने के बाद भी खराब गला 2 से 3 हफ्ते तक ठीक न हो तो इस की तुरंत जांच करानी चाहिए. गले में दर्द आमतौर से संक्रमण या सूजन के कारण हो सकता है लेकिन अगर समय के साथ लक्षणों में सुधार न हो रहा हो तो यह किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है. गले का कैंसर शुरुआती चरण में धीरेधीरे बढ़ता है.

शुरुआत में न तो गले में ज्यादा दर्द होता है और न ही कोई अन्य स्पष्ट लक्षण दिखाई देता है. इस के लक्षण मामूली होते हैं और बहुत धीरेधीरे बढ़ते हैं, जिस के कारण ये आसानी से नजरंदाज हो जाते हैं.

गले के कैंसर का अगर समय पर निदान हो जाए तो इलाज कम आक्रमणशील होता है. पर यह कैंसर चुपचाप बढ़ते हुए गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है. अगर यह आसपास के टिश्यू या लिम्फ नोड्स तक फैल जाए तो इलाज और अधिक मुश्किल हो जाता है.

शुरुआती चरण में गले के कैंसर का इलाज बिना किसी अधिक चीरफाड़ के सामान्य विधि द्वारा किया जा सकता है. पर अगर कैंसर एडवांस्ड स्टेज में पहुंच चुका है तो बड़ी चीरफाड़ करने की जरूरत पड़ती है.

लक्षण, जो दिखने पर सावधान हो जाएं

अगर इन के कोई भी लक्षण 2 से 3 हफ्ते से अधिक समय तक बने रहें तो तुरंत डाक्टर के पास जाएं :

लगातार खांसी या गले में दर्द.

आवाज में बदलाव या भारीपन.

निगलने में कठिनाई या दर्द.

गले में कुछ फंसा हुआ महसूस होना.

गरदन में सूजन या गांठ जिस में दर्द न हो रहा हो.

बिना वजह वजन घटना.

कान में संक्रमण हुए बिना एक तरफ के कान में दर्द.

थूकने पर या लार में खून आना.

सांस लेने में तकलीफ या सांस लेते समय आवाज आना.

संभावित जोखिम और कारण

गले का कैंसर कई कारणों से बढ़ रहा है.

तंबाकू सेवन : सिगरेट, बीड़ी जैसे धूम्रपान या किसी भी तरह की स्मोकलैस तंबाकू के सेवन से गले के कैंसर का जोखिम बढ़ता है. तंबाकू धीरेधीरे गले की अंदरूनी परत को खराब कर देता है और सैल्स में जैनेटिक म्यूटेशन पैदा करता है.

मदिरा सेवन : शराब का सेवन तंबाकू के साथ किया जाए तो यह उस के हानिकारक प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है.

ह्यूमन पैपिलोमा वायरस एचपीवी  के कारण होने वाले कैंसर: खासकर ओरोफैरिंक्स कैंसर लगातार बढ़ रहे हैं. यह कैंसर आमतौर से युवा आबादी को होता है. इस कैंसर का अगर तुरंत निदान हो जाए तो इलाज बहुत कारगर होता है.

लंबे समय तक जलन : खराब ओरल हाइजीन, खराब फिटिंग के डैंचर, क्रोनिक रिफ्लक्स, और हानिकारक कैमिकल्स के संपर्क में लंबे समय तक रहने पर म्यूकोसल डैमेज की समस्या हो सकती है.

आहार और ओरल हैल्थ : खराब डाइट, फल और सब्जियों के कम सेवन और खराब ओरल हाइजीन से गले के कैंसर का जोखिम बढ़ता है.

क्यों जरूरी है समय पर निदान

गले के कैंसर का निदान शुरुआती स्टेज में हो जाए तो उस का इलाज ज्यादा कारगर होता है. इलाज में चीरफाड़ कम होती है, जिस से बोलने, निगलने और जीवन पर असर भी कम होता है. शुरुआती स्टेज के कैंसर का इलाज अकसर कम सर्जरी या फोकस्ड रेडिएशन से हो जाता है, जिस से मरीज अपनी दिनचर्या जल्दी शुरू कर पाते हैं और लंबे समय तक कम दिक्कत के स्वस्थ जीवन से जीते हैं लेकिन अगर कैंसर का निदान तब हो, जब वह एडवांस्ड स्टेज में पहुंच चुका हो तो उस के इलाज के लिए कीमोथैरेपी और रेडिएशन के साथ बड़ी सर्जरी करनी पड़ती है. रिहैबिलिटेशन में लंबा समय लगता है.

Throat Cancer (2)
गले की किसी भी समस्या को हलके में न लें. अगर समस्या बनी हुई है तो तुरंत डाक्टर को दिखाएं. समय रहते कैंसर का निदान हो सकता है.

इलाज जितना एडवांस्ड स्टेज में होगा, स्थायी विकलांगता, जीवन में दिक्कतों और मृत्यु होने का खतरा भी उतना ही अधिक होगा.

गले के कैंसर के इलाज में हुई प्रगति

गले के कैंसर का इलाज बीमारी के स्टेज, ट्यूमर की जगह, मरीज की सेहत और बोलने एवं निगलने में होने वाली दिक्कतों पर निर्भर होता है. आज, मैडिकल टैक्नोलौजी में हुई प्रगति ने गले के कैंसर का ज्यादा सटीक इलाज संभव बना दिया है, जिस से मरीज को एक बेहतर जीवन प्राप्त होता है.

Throat Cancer (1)
आज के मौडर्न जमाने में कैंसर का निदान पहले के मुकाबले थोड़ा आसान हो गया है. इसे ठीक करने के लिए कई तरह की सर्जरियां की जाती हैं.

ट्रांसओरल रोबोटिक सर्जरी (टीओआरएस) : टीओआरएस में सर्जन रोबोटिक भुजाओं और हाईडेफिनिशन 3डी विजन की मदद से गले का ट्यूमर काट कर मुंह से बाहर निकालते हैं.

यह प्रक्रिया अत्यधिक सटीक होती है, स्वस्थ टिश्यूज को कम से कम क्षति पहुंचती है, बोलने और निगलने की बेहतर क्षमता प्राप्त होती है, बाहरी चीरे कम लगते हैं और मरीज को अस्पताल में कम रुकना पड़ता है. इस प्रक्रिया में बहुत तेज रिकवरी होती है.

ट्रांसओरल लेजर माइक्रो सर्जरी (टीएलएम) : यह एक न्यूनतम इन्वेसिव तकनीक है. इस में एक माइक्रोस्कोप की मदद से हाईपावर्ड लेजर बीम कैंसर ट्यूमर पर डाली जाती है. यह काफी सटीक होती है और आसपास के टिश्यू को नुकसान पहुंचाए बिना ही कैंसर के ट्यूमर को काट कर बाहर निकाल देती है.

यह लैरिंक्स और फैरिंक्स के शुरुआती कैंसर के लिए बहुत प्रभावशाली सर्जरी है, जो बेहतरीन नतीजे प्रदान करती है.

इमेज गाइडेड और नैविगेशन असिस्टेड सर्जरी : आधुनिक सर्जिकल नैविगेशन सिस्टम रियलटाइम इमेजिंग की मदद से सर्जन को ट्यूमर और महत्त्वपूर्ण संरचनाओं का सही पता लगाने में मदद करते हैं, जिस से सर्जरी ज्यादा सटीक होती है और जटिलताओं का जोखिम कम होता है.

टारगेटेड थेरैपी : टारगेटेड थैरेपी में कैंसर को बढ़ाने और फैलाने वाले मौलिक्यूल्स को ब्लौक कर दिया जाता है. इस से कुछ मरीजों को अधिक फोकस्ड इलाज मिलता है, जिस के साइड इफैक्ट पारंपरिक कीमोथैरेपी के मुकाबले कम होते हैं.

रेडिएशन थेरैपी : रेडिएशन थैरेपी में कैंसर सैल्स को खत्म करने के लिए हाई एनर्जी बीम का इस्तेमाल किया जाता है. इस में आईएमआरटी (इंटैंसिटी- मौड्यूलेटेड रेडिएशन थेरैपी) और आईजीआरटी (इमेज गाइडेड रेडिएशन थैरेपी) जैसी आधुनिक तकनीकों से ट्यूमर को सटीक निशाना बनाया जाता है, ताकि आसपास के स्वस्थ टिश्यू को नुकसान न पहुंचे और इस के साइड इफैक्ट्स कम हों.

रोबोटिक सर्जरी के साथ शुरू हुआ सटीकता का एक नया युग रोबोटिक सर्जरी ने सिर और गले के कैंसर के इलाज को बहुत कारगर बना दिया है. ये कैंसर शरीर के अंदर बहुत जटिल और संकरी जगहों पर पनपते हैं, जो बोलने, निगलने और सांस लेने के लिए जरूरी अंगों से घिरी होती हैं.

रोबोट असिस्टेड तकनीकों ने सर्जन को बाहरी चीरा लगाए बिना मुंह से होते हुए गले के अंदर स्थित ट्यूमर तक पहुंचने में समर्थ बना दिया है. रोबोटिक भुजाएं अधिक फ्लैक्सिबिलिटी और हाई डेफिनिशन 3डी विज्युअलाइजेशन के साथ महत्त्वपूर्ण नसों और मांसपेशियों को बचाते हुए ट्यूमर को काट कर बाहर निकाल देती हैं.

भारत में रोबोटिक सर्जरी का उपयोग बढ़ रहा है, जिस से सर्जरी में मरीजों को खून का नुकसान कम हुआ है, जटिलताओं में कमी आई है, रिकवरी में तेजी आई है, तथा सर्जरी के बाद मरीजों की बोलने और निगलने की क्षमता बचाने में मदद मिली है. इस प्रक्रिया ने गले के कैंसर के मरीजों को एक बेहतर जीवन प्रदान किया है.

गला खराब होने का मतलब यह नहीं कि यह कोई गंभीर समस्या है, पर अगर यह समय के साथ ठीक न हो तो सावधान हो जाना चाहिए. आवाज हमेशा बैठे रहने, निगलने में परेशानी होने, बिना वजह वजन घटने और गले की ग्रंथियों में सूजन होने पर तुरंत डाक्टर को दिखाएं और ऐसी गंभीर बीमारी से बचें.

अगर इलाज शुरुआती स्टेज में शुरू हो जाए तो दिक्कतें कम आती हैं और मरीज जल्दी ठीक होते हैं. उन की बोलने और निगलने की क्षमता भी बनी रहती है. शुरुआती लक्षणों को पहचान कर मामूली बीमारी को गंभीर और जानलेवा होने से रोका जा सकता है.

(लेखक मणिपाल अस्पताल, दिल्ली में वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ हैं.)

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Religious Hypocrisy : धर्म के बिना इंसान अनैतिक नहीं होता बल्कि धर्म की दुकानदारी को समझता है

Religious Hypocrisy : ‘‘दुनिया के कानून का डर इंसान के अंदर की हैवानियत खत्म नहीं कर सकता, यह धर्म से ही मुमकिन है.’’ धर्मवादियों की यह बात बहुत ही दिलचस्प है लेकिन क्या यह तर्क सही है? इस के लिए धर्म के पाप और पुण्य की व्याख्या को समझना होगा. यह भी देखना होगा कि धर्म के बताए अच्छे और बुरे कर्म कौनकौन से हैं जिन पर इनाम या सजा मिलेगी.

धर्मों की नैतिकता के माने क्या हैं? सभी धर्मों में अच्छे कर्मों की फिलौसफी अलगअलग है. नमाज पढ़ना इसलाम के अनुसार अच्छा कर्म है, इस में दूसरों के लिए क्या नैतिकता है? इसलाम के अनुसार सब से उत्कृष्ट कर्म है ईमान लाना यानी इसलाम के 5 अरकानों पर विश्वास करना तब ही आप अल्लाह के रिवार्ड के हकदार होंगे वरना नहीं.

अब जो भी आदमी इसलाम की इस फिलौसफी को नहीं मानता वह अल्लाह के रिवार्ड का हकदार नहीं है. इस का अर्थ यह है कि वह गुनाहगार है और ऐसे किसी भी आदमी, जो इसलाम पर यकीन नहीं रखता, के लिए जन्नत हराम है और जिस आदमी पर जन्नत हराम है, मतलब वह दोजख में ही जाएगा.

इसलाम के अनुसार आप कितना ही अच्छा काम करें अगर आप मुसलमान नहीं हैं तो सब व्यर्थ है. आप को अल्लाह का रिवार्ड चाहिए तो मुसलमान होना पड़ेगा. अब बताइए कि इसलाम की फिलौसफी में नैतिकता या मानवता वाली कौन सी बात है? यह सिर्फ धार्मिक दुकानदारी का मामला है. कबाड़ी की दुकान में भी कुछ चीजें काम की मिल जाती हैं. नैतिकता की कुछ चीजें दिखा कर धर्म अपने भक्तों को बरगलाता है कि इस दुकान का ही माल बढि़या है.

ईसाइयत के अनुसार, जीसस ईश्वर के पुत्र हैं. यदि आप इस बात पर यकीन रखते हैं तभी आप यहोवा के रिवार्ड की उम्मीद कर सकते हैं वरना आप गुनाहगार हैं और आप का पकौड़ा बनाने के लिए जहन्नुम में तेल से खौलती कढ़ाही तैयार है. जीसस यहोवा के पुत्र हैं. वे सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन फिर से जीवित हो उठे थे.

आखिरी दिन सभी इंसानों का हिसाब होगा. जो भी व्यक्ति ईसाइयत के इन ढकोसलों पर ईमान नहीं रखता वह पापी है. चाहे वह दुनिया में कितना भी अच्छा काम कर ले कोई फायदा नहीं वह तो तला ही जाएगा. जहन्नुम की आग से बचना हो तो चर्च को पैसे दें और स्वर्ग (यदि कहीं है तो) में सीट बुक करें.

हिंदू धर्म वर्णव्यवस्था पर आधारित है. इस में 4 वर्ण हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. चारों वर्णों के कर्म अलगअलग हैं. गीता के अनुसार, आप को इस जन्म के अच्छे कर्मों का फल अगले जन्म में मिलता है. ब्राह्मण के लिए उस का कर्म है ज्ञान देना और दक्षिणा प्राप्त करना. क्षत्रिय के लिए उस का धर्म है ब्राह्मण के बनाए नियमों का पालन करना और दान देना. वैश्य का कर्तव्य है व्यापार व खेतीबाड़ी करना और शूद्र का धर्म है ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना.

तुलसीदास कहते हैं, ‘पूजहिं विप्र सकल गुण हीना, शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा.’ बताइए गीता की इस फिलौसफी में नैतिकता क्या है? एक वर्ग को दान मिलता रहे. एक वर्ग दूसरों से लूट कर दान देता रहे और बाकी के निचले वर्ग अपने से ऊपर वालों की सेवाएं करते रहें, इस में क्या महानता है?

धर्म हमें कैसे नैतिक बना सकता है?

इंसानों को नैतिक बनाए रखने के लिए धर्मों का बनाया पाप और पुण्य का कौन्सैप्ट आज के वैज्ञानिक युग में अपनी प्रासंगिकता पूरी तरह खो चुका है. जो लोग रिवार्ड के लिए अच्छा काम कर सकते हैं वे लोग पैसों के लिए बुरा काम भी कर सकते हैं.

Religious Hypocrisy (1)
जाति या धर्म का भेदभाव किए बिना आप की कोशिश से किसी के चेहरे पर मुसकान आ जाए तो यह आप की इंसानियत है. धर्म अपनी दीवारों से बाहर ऐसी खुशी के खिलाफ होते हैं.

सुपारी ले कर किसी का मर्डर करने वाले भी तो यही करते हैं. लालच में किए या करवाए जाने वाले काम में कहीं कोई नैतिकता नहीं होती. अगर आप किसी डर की वजह से बुरा काम नहीं करते, इस का अर्थ है कि यदि डर न हो तो जरूर आप बुरा काम करेंगे. इस में भी नैतिकता वाली कोई बात नहीं है. इस फिलौसफी के आधार पर तो आप पूरी तरह भ्रष्ट साबित होते हैं. यदि आप का व्यक्तित्व रिवार्ड या सजा के हिसाब से तय होता है तो इस का अर्थ यह है कि आप का अपना कोई कैरेक्टर है ही नहीं.

धर्मों की नैतिकता असल में मुल्ला, मौलवियों, पादरियों और पुरोहितों के स्वार्थों पर आधारित है. इस में इंसानियत वाली कोई बात नहीं. दानदक्षिणा के नाम पर मंदिरों की दानपेटियों को भरने में कौन सी नैतिकता है? चंदे और जकात के पैसों से मजारों, मसजिदों या मदरसों को आलीशान बनाने से मानवता का क्या कल्याण होता है?

धर्मों की नैतिकता पूरी तरह पुरोहितों की धार्मिक व्यावसायिकता से जुड़ा हुआ मामला होता है. इस से आम जनता का नहीं बल्कि धर्म के ठेकेदारों का हित पूरा होता है, इसलिए हर धर्म अपनी तथाकथित नैतिकता का ढिंढोरा पीटता है.

असल में नैतिकता या मानवता का संबंध धर्म से है ही नहीं. धर्म किसी को नैतिक बनाने की गारंटी कभी दे ही नहीं सकता बल्कि धर्म केवल भक्त ही पैदा कर सकता है और भक्त के लिए अच्छा कर्म उस के धर्म की परिधि तक ही सिमटा होता है. ऐसे व्यक्ति से मानवता या नैतिकता की उम्मीद करना भी व्यर्थ है. ऐसा आदमी अपने धर्म की रक्षा के लिए दूसरे की जान लेने से पीछे नहीं हटेगा क्योंकि मजहब की हिफाजत उस के लिए अच्छा कर्म है. नैतिकता या मानवता का कौन्सैप्ट तो सार्वभौमिक होता है और इस के लिए किसी भी धर्म की जरूरत नहीं होती है.

किसी भूखे को खाना खिला देना मानवता है. किसी को संकट से बचा लेना मानवता है और यह मानवीय गुण इस बात पर निर्भर है कि आप कितने संवेदनशील हैं. आप की संवेदनाएं ही आप को प्रेम, भाईचारा, सहयोग और ईमानदारी के लिए प्रेरित करती हैं और आप की इन संवेदनाओं का आप के धर्म से दूरदूर तक कोई संबंध ही नहीं है. ये मानवीय गुण हैं जो सभी में होते हैं.

Religious Hypocrisy (2)
एकदूसरे की मदद करना मनुष्य तब से जानता है जब घटती पर कोई धर्म नहीं था. मनुष्य में सामाजिकता का गुण लाखों वर्षों से मौजूद रहा है.

धर्म है तो अनैतिकता क्यों?

एक बेटे ने अपनी मां को ही हवस का शिकार बना लिया. मां चीखती रही और बेटा उस की अस्मत को नोंचता रहा. 4 सितंबर, 2024 को पंजाब केसरी में छपी इस खबर के मुताबिक राजस्थान के बूंदी जिले में एक व्यक्ति को अपनी मां से दुष्कर्म करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. पुलिस के अनुसार, यह घटना उस समय हुई जब 28 वर्षीय आरोपी अपनी 52 वर्षीया मां के साथ गांव में अपने घर लौट रहा था. इस घटना में आरोपी को अगले जन्म में सूअर बनने का डर क्यों नहीं रोक पाया?

17 मई, 2025 को द न्यूज पोस्ट में प्रकाशित खबर के अनुसार, एक पिता ने दोस्त के साथ मिल कर नाबालिग बेटी का दुष्कर्म किया. रांची की इस खबर में एक बाप अपनी नाबालिग बेटी के साथ गलत काम करता है और अपने दोस्तों को भी अपनी बेटी शेयर करता है. इन दोनों घटनाओं में अपराधियों को उन का धर्म या ईश्वरीय सजा का डर क्यों नहीं रोक पाया?

इंसानियत के लिए किसी धर्म की जरूरत नहीं

इंसान के अंदर छिपी नैतिकता या इंसानियत को बाहर निकलने के लिए किसी भी रिवार्ड की जरूरत नहीं है और खुदा का खौफ या दोजख का डर इंसान के अंदर छिपी हैवानियत को कभी खत्म भी नहीं कर सकता.

इंसान आज भी धर्म के नाम पर कत्लेआम कर रहा है. हैवान बना हुआ है. इस खूबसूरत दुनिया को धर्म और धर्म पर आधारित पाखंडवादी व्यवस्था ने ही बरबाद किया हुआ है. आतंकवाद, बम धमाके और मौबलिंचिंग की घटनाएं वही लोग अंजाम देते हैं जिन की संवेदनाओं को धर्म ने मार दिया है. ये सब अमानवीय घटनाएं धार्मिक इंसान ही करता है. ऐसे तमाम आतंकवादी और जातिवादी लोग नास्तिक नहीं होते.

धर्मों के बनाए सभी नियमों को उन धर्मों के ही 99 प्रतिशत लोग फौलो नहीं करते और तब इतना बुरा हाल है. धर्मों के बताए या बनाए अच्छे व बुरे कर्मों के कौन्सैप्ट पर यदि 10 प्रतिशत लोग भी चलने लग गए तो समझिए पूरी दुनिया को नरक बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.

एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म के प्रति किए गए अत्याचारों से इतिहास के पन्ने रंगे हुए हैं. इन अच्छे कर्मों के दौरान जो लोग मारे गए उन्हें इस का रिवार्ड मिला कि नहीं, यह आज तक कोई बताने नहीं आया. दूसरे धर्मों के प्रति नफरत की बात छोडि़ए, एक ही धर्म के लोगों ने अपने ही मजहबी भाइयों के प्रति हैवानियत की हदें पार की हैं. इजराइल और गाजा में धर्म के नाम पर हजारों मारे गए हैं. जिन्होंने मारा क्या वे नैतिकता के पुतले हैं क्योंकि उन्होंने अपने धर्म की रक्षा की?

Religious Hypocrisy (3)
सामूहिक चेतना चीटियों में भी होती है. निर्माण के लिए एकजुटता का गुण सीखने के लिए पीटियों को किसी धर्म की जरूरत नहीं पड़ती.

पिछले 1,400 वर्षों में शिया और सुन्नियों ने एकदूसरे को काटा और आज भी दोनों एकदूसरे को खुदा के पास भेजने पर उतावले हैं. क्या यही है उन के अच्छे कर्मों की व्याख्या? ईरान, इजराइल, रूस, यूक्रेन धर्म को मानने वाले देश हैं पर इन में आज नैतिकता कहीं भी दिख नहीं रही.

संत रविदास, ज्योतिबा फुले, राहुल सांस्कृत्यान, राधामोहन गोकुलजी, मुंशी प्रेमचंद, सुरेंद्र कुमार शर्मा, संतराम बीए, ललई सिंह, रामस्वरूप वर्मा, महाराज सिंह भारती और रामास्वामी पेरियार जैसे सैकड़ों महापुरुषों ने हिंदू धर्म के तथाकथित अच्छे कर्मों की बहुत ही तार्किक व्याख्या की है. इस धर्म के बारे में डा. अंबेडकर ने लिखा कि ‘यह धर्म नहीं है बल्कि गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र है.’

परमेश्वर की दया का राग आलापने वाले ईसाइयों ने अपने ही लोगों के प्रति दया और करुणा को ताक पर रख दिया था. 1853 में बैतलहम के चर्च की पवित्र चाबी को हासिल करने की खातिर ईसाइयों के तीनों संप्रदाय आपस में लड़ मरे. ढाई साल तक चले इस खूनी जंग में तकरीबन 10 लाख ईसाइयों को ईसाइयों ने ही मौत के घाट उतार डाला. ईसाइयत के लिए जो लोग मरे उन्हें कौन सा रिवार्ड मिला या जिन्होंने कत्ल किया उन्हें कौन सी सजा मिली?

नैतिकता कहां से आती है?

मानवता, करुणा, न्याय, प्रेम, सहयोग और नैतिकता आदि सब हमारी अपनी समझ, परवरिश और कुछ हद तक हमारे जीन्स पर आधारित होता है. साथ ही क्रूरता, बेईमानी और आपराधिक मनोवृत्ति भी हमारी परवरिश, समझ और हमारे जीन्स पर ही आधारित हैं.

इंसान के अंदर अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के जीन्स मौजूद होते हैं और पारिवारिक परिवेश, देश, काल और परिस्थिति ये सभी कारक मिल कर एक इंसान के वजूद को तैयार करते हैं.

इस का अर्थ यह नहीं कि हमारे पिता एक अच्छे इंसान हों तो हम भी अच्छे ही होंगे या वे बुरे हों तो हम भी बुरे ही होंगे. एक डाकू का बच्चा एक अच्छा प्रोफैसर साबित हो सकता है और एक प्रोफैसर का लड़का चोर हो सकता है. यह भी जरूरी नहीं कि जो चोर है उस के अंदर नैतिकता, मानवता नहीं होगी और यह भी जरूरी नहीं कि जो प्रोफैसर या डाक्टर है वह भ्रष्ट नहीं होगा. एक चोर भी संवेदनशील हो सकता है और एक डाक्टर भी क्रूर हो सकता है.

आज की दुनिया को धर्म और उस की फिलौसफी की कोई जरूरत नहीं है. आज शिक्षा, जागरूकता, ज्ञान, मनोविज्ञान, न्याय व्यवस्था और वैज्ञानिकता से इंसान के अंदर की नैतिकता को निखारा जा सकता है और उस के अंदर की हैवानियत को नियंत्रित किया जा सकता है.

क्या बच्चों और जानवरों में संवेदनाएं होती हैं?

यूट्यूब पर एक वीडियो है जिस में एक बच्चे की छोटी सी साइकिल से एक मुरगी का बच्चा घायल हो गया. वह छोटा बच्चा मुरगी के बच्चे को ले कर सीधे हौस्पिटल पहुंचा और डाक्टर से उसे ठीक करने के लिए निवेदन करने लगा. एक छोटा सा बच्चा किस रिवार्ड को पाने के लिए लालायित था या कौन से धर्मग्रंथ को पढ़ कर उस ने ऐसा किया?

इस मासूम बच्चे ने तो धर्म की किसी किताब को नहीं पढ़ा. इसे जन्नत और दोजख का भी इल्म नहीं. फिर इस ने ऐसा क्यों किया? वह बच्चा चाहता तो उस चूजे को वहीं छोड़ कर भाग सकता था. बच्चा था, उसे कौन टोकता और इंसानों की इस भीड़ में न जाने कितने इंसान रोज कुचले जाते हैं. एक मामूली सा चूजा कुचला भी जाता तो इस से किसी को क्या फर्क पड़ता?

उस बच्चे ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उस में संवेदनाएं थीं और संवेदनाएं मानव के लाखों वर्षों के सामाजिक विकास में इवौल्व हुई हैं. इन मानवीय संवेदनाओं के लिए किसी भी धर्म की जरूरत नहीं पड़ती और न ही इस के लिए किसी रिवार्ड की जरूरत होती है. इसी तरह जो लोग गलत काम करते हैं उन्हें किसी ईश्वर, खुदा या भगवान का डर कभी नहीं रोक सकता.

यूट्यूब पर एक और वीडियो में एक कुत्ता नजर आता है जो पानी में डूबते हुए खरगोश की जान बचा लेता है. यह कुत्ता कौन से धर्म को मानता है? इस कुत्ते को कौन सी जन्नत चाहिए? अगर वह उस डूबते हुए खरगोश को नहीं बचाता तो उसे कोई टोकता भी नहीं क्योंकि वह तो कुत्ता है न? फिर उस ने ऐसा क्यों किया?

यूट्यूब के एक और वीडियो में दिखता है कि किनारे पर रेत में फंसे एक कछुए के बच्चे को एक कौआ अपनी चोंच में उठा कर समुद्र में डाल देता है जिस से कछुए के बच्चे की जान बच जाती है. कौन से रिवार्ड को पाने के लिए इन जानवरों ने ऐसा किया? इन के पास कौन सी आसमानी किताब थी? क्या इन्होंने जन्नत के लालच में ऐसा किया?

मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना

दुनिया का सब से बड़ा झठ यह नहीं है कि ‘ईश्वर है’ बल्कि एक और झठ है जो इस झठ से भी ज्यादा प्रचलित है और वह है ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ यह इतना बड़ा झठ है जिस के टक्कर का दूसरा कोई झठ नहीं और आश्चर्य की बात है कि इस झठ पर लगभग सभी धर्मों की एकता है. इन धर्मों के बीच चाहे जितना भी सिरफुटौवल हो लेकिन अपने झठ को बचाने की खातिर सब एक हो जाते हैं.

इंसानियत, नैतिकता, करुणा, प्रेम और सहयोग की भावना हर इंसान में छिपी होती है. जरूरत है उस मानवीय गुण को बाहर निकालने की. तभी हम मनुष्य कहलाने के हकदार साबित हो सकते हैं. इस के लिए हमें किसी रिवार्ड की जरूरत नहीं है. एक बेहतर सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में आप का योगदान ही तय करेगा कि आप कितने नैतिक हैं. आज के बदलते दौर में नैतिकता और मानवता की सर्वोच्च पहचान यही हो सकती है कि आप में कितनी संवेदनाएं मौजूद हैं.

आज हमें वर्षों पुरानी उन सभी घेराबंदियों को तोड़ देना चाहिए जो हमें इंसान बनने से रोकती हैं, जो दूसरे के दर्द को समझने में रुकावटें पैदा करती हैं. आज हमें उन सभी दीवारों को उखाड़ फेंकना चाहिए जो हमें हैवान बनाती हैं. आज इंसान बनने के लिए उन सभी रेखाओं का मिट जाना जरूरी है जो हमें हिंसक भेड़ों की भीड़ बनाती हैं. जिस दिन ये बंदिशें खत्म होंगी उसी दिन यह संपूर्ण धरती हमारी मां होगी, देश हमारा घर होगा, मानवता हमारा धर्म बन जाएगा और तब, दुनिया में केवल दो ही जातियां होंगी- सिर्फ मर्द और औरत.

करुणा, प्रेम, समर्पण, सहयोग और मानवता पर आधारित उस नई सामाजिक व्यवस्था में किसी को नैतिक होने के लिए या अच्छा कर्म करने के लिए किसी खुदा के रिवार्ड की जरूरत नहीं होगी.

धर्म का अर्थ अगर आप किसी तत्त्व के गुण या स्वभाव से करते हैं तब तो यह बिलकुल प्राकृतिक चीज है जिसे छोड़ना या अपनाना दोनों ही बातें बेकार हैं. जल का गुण है कि वह गीला ही करेगा. अग्नि का गुण है कि वह जलाएगी. कुत्ते का गुण है कि वह मांस खाएगा. मदिरा का गुण है कि वह बहका देगा. उल्लू और चमगादड़ का गुण है कि वह निशाचर प्राणी है. इंसान का गुण है कि वह एक सामाजिक प्राणी है.

अगर मनुष्य के धर्म का तात्पर्य उस के इस नैचुरल गुण से है तब इस को छोड़ने या अपनाने की बात ही गलत है. लेकिन ईश्वर पर आधारित धर्म को अपनाने से कोई बेहतर इंसान नहीं बनता और ऐसे धर्म को छोड़ने से मनुष्य पशुतुल्य नहीं होता बल्कि यह तो मानसिक विकारों की वह स्थिति है जो हमें विरासत में मिलती है जिसे हम धर्म समझ कर गधे की तरह ढोते चले जाते हैं. इस हिसाब से इसे लादे रहने वाला पशुतुल्य हुआ न?

इन मानसिक विकारों के बोझ को उतार फेंकने वाला ही मनुष्य कहलाने का हक रखता है न कि इसे अंधभक्तों की तरह ढोने वाला. ज्यादातर धार्मिक देशों में इंसान जानवरों से भी बदतर स्थिति में हैं. इस के उलट, जिन देशों में धार्मिकता की मानसिक बीमारी जितनी कम है वहां के लोग उतने ही ज्यादा खुशहाल हैं. Religious Hypocrisy

Satirical Story In Hindi : देश डिजिटल, समाधान औफलाइन – काम प्रोसैस में है भई

Satirical Story In Hindi : लोकतंत्र अब जनता की आवाज से नहीं, उस की शिकायतों की गिनती से पहचाना जाने लगा है. समस्याएं जस की तस हैं, बस उन के लिए बनाए गए पोर्टल बदल गए हैं. सिस्टम मुसकरा कर भरोसा दिलाता है कि सबकुछ औनलाइन हो चुका है, बस, समाधान अभी लाइन में है.

राजनजी सुबहसुबह अखबार ले कर बैठते हैं तो सुर्खियां ही उन का रक्तचाप बढ़ाने के लिए काफी होती हैं. अखबार में एक तरफ प्रधानमंत्री शिकायत निवारण पोर्टल पर जनता के भरोसे की बात छपी होती है तो दूसरी तरफ लिखा होता है कि देश में शिकायतों के निस्तारण का नया रिकौर्ड बना है. राजनजी को यह पढ़ कर अपने ही पेट में अपच की गैस  हो जाती है पर अफसोस, उन के घर में कुकिंग गैस लाइन नहीं है.

कहानी शुरू होती है मंगल कालोनी से, जिस के चारों तरफ कुकिंग गैस पाइपलाइन का जाल बिछा है, बस, बीच के टुकडे़ यानी राजनजी की मंगल कालोनी अछूती रह गई है. ऐसा नहीं कि सरकार ने काम नहीं किया, उस ने बहुतकुछ किया. उस ने बजट पास किया, घोषणा की, उद्घाटन करवाया, बैनर भी  लगवाए लेकिन पाइपलाइन की कृपा वहीं जा कर रुक गई जहां कालोनी के प्रभावशाली बिल्डर  का ‘प्रभाव’ शुरू होता है.

बिल्डर का तर्क सीधा है, वे चाहते  हैं कि इतनी सारे गैस कनैक्शन एकसाथ उपलब्ध करवाने के एवज में गैस कंपनी बिना रसीद ‘सुविधा शुल्क’ प्रदान करे. उन की मांग पूरी न करने तक पाइपलाइन कालोनी की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकती. यह उन का ‘प्राइवेट कस्टम चैकपोस्ट’ है, जिसे न तो पुलिस रोक सकती है, न प्रशासन और न ही कोई समाधान पोर्टल.

राजनजी ने जब बहुत होहल्ला मचाया तो महल्ले वालों ने सलाह दी कि प्रधानमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर दो. राजनजी ने बड़े उत्साह से ऐसा किया. साइट खुलने में 5 मिनट लगे, शिकायत दर्ज करने में 15. शिकायत दर्ज करने के बाद एक सुंदर संदेश आया, ‘‘आप की शिकायत दर्ज हो गई है. समाधान शीघ्र किया जाएगा.’’ यह ‘शीघ्र’ शब्द हिंदी प्रशासन का सब से दीर्घकालीन वादा होता है. राजनजी मित्रों में अपना कौलर पकड़ संभावित शीघ्र समाधान की चर्चा करते, जब खाली होते, पोर्टल लौगिन कर प्रगति देखते.

15 दिनों बाद एक मेल आया. उत्सुकता से राजनजी ने पढ़ा- ‘जैसे ही आप की सोसाइटी में गैस लाइन डाली जाएगी, प्रायोरिटी पर कनैक्शन दिया जाएगा.’ राजनजी को लगा मानो किसी ने उन्हें समझ दिया हो कि जैसे ही बच्चे को पढ़ाना सिखा देंगे, उसे स्कूल में एडमिशन दे दिया जाएगा.

उत्तर पढ़ कर राजनजी को एहसास हुआ कि शिकायत पोर्टल का उद्देश्य समस्या का समाधान नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता का समाधान करना है, उसे तसल्ली दी जाती है ताकि वह फिर कभी शिकायत न करे. यह डिजिटल युग का नया चमत्कार है. वास्तविक समाधान नहीं, समाधान का डिजिटल डेटा औनलाइन दिया जाता है. बस, संतोष यह है कि वह लौगिन ही नहीं हो पाता.

राजनजी की व्यथा केवल गैस तक सीमित नहीं रही. उन्होंने बिजली का बिल देखा तो पाया कि सरकार निजी कंपनियों से बिजली खरीद रही है. उन्होंने विधानसभा में अपने विधायक से सवाल करवाया कि ‘सरकार निजी कंपनियों से बिजली कितनी और किस दर पर खरीद रही है?’ विधान सभा के पटल पर उत्तर आया, ‘सरकार बिजली नहीं खरीदती है.’ उत्तर तकनीक के घेरे में सही था, बिजली तो बिजली कंपनी खरीदती है.

राजनजी ने सोचा, वाह, अब ब्यूरोक्रेसी समझ आई. बारिश भी सरकार नहीं करवाती, बादल करवाते हैं. अगली बार कोई  पूछे कि ‘जनता को राहत कब मिलेगी?’ तो शायद उत्तर होगा, ‘सरकार राहत नहीं देती, राहत विभाग देता है.’

लोकतंत्र के इन ‘उत्तरदायी उत्तरों’ ने राजनजी की बुद्धि को उजाला ही नहीं, बिजली भी दे दी. उन्हें लगा कि सवाल पूछना ही असली मूर्खता है क्योंकि शासन में प्रश्न पूछने वाले को ‘समझने’ की परंपरा है, संतोष देने की नहीं.

राजनजी का बेटा, जो कंप्यूटर इंजीनियर है, बोला, ‘‘पापा, इन शिकायत पोर्टलों का मकसद असल में डेटा इकट्ठा करना है, समाधान नहीं.’’

राजनजी बोले, ‘‘मतलब?’’

बेटा बोला, ‘‘मतलब, सरकार को पता रहता है कि जनता किस बात से परेशान है, ताकि अगली बार घोषणा उसी विषय पर की जा सके.’’

राजनजी मुसकराए, ‘‘तो जनता के दुख ही अगले चुनाव का घोषणापत्र बनते हैं.’’

एक दिन टीवी पर खबर चली- ‘शिकायत निवारण पोर्टल पर 99 प्रतिशत शिकायतें निस्तारित.’

राजनजी ने सोचा, शायद उन के महल्ले में भी पाइपलाइन बिछ गई होगी. वे बाहर निकले तो देखा, बिल्डर अपने गेट पर नई कार ले कर खड़े हैं और मजदूर पुरानी मिट्टी उसी जगह पर डाल रहे हैं जहां गैस पाइपलाइन जानी थी.

कुछ दिनों बाद नगरनिगम की हैल्पलाइन पर कौल किया गया. कौल सैंटर की मीठी आवाज आई, ‘आप की कौल बहुत महत्त्वपूर्ण है, कृपया प्रतीक्षा करें.’ प्रतीक्षा करतेकरते राजनजी का फोन गरम हो गया, लेकिन दूसरी तरफ से कोई ठंडी हवा नहीं आई. फिर औटोमैटिक संदेश आया, ‘आप की कौल हमारे लिए बहुमूल्य है.’ राजनजी ने कहा, ‘‘तो फिर इसे बेच दो, मुझे गैस का कनैक्शन दिला दो.’’

धीरेधीरे उन्हें लगा कि शिकायतें भी अब सरकारी प्रोजैक्ट हैं. पहले योजनाएं शुरू होती थीं, अब शिकायतें शुरू होती हैं. एक पोर्टल से दूसरी हैल्पलाइन, हैल्पलाइन से नियंत्रण कक्ष, नियंत्रण कक्ष से संबंधित विभाग और फिर वहीं लौट कर वहीं पीडि़त नागरिक के पास.

राजनजी के मित्र शर्माजी बोले, ‘‘भाई, अब सरकार ने जनसुनवाई को भी औनलाइन कर दिया है.’’

राजनजी बोले, ‘‘सही कहा, अब जनता भुगतती है और सरकार औनलाइन रहती है.’’

विधानसभा में प्रश्न पूछने वाले विधायक भी अब इस व्यवस्था से संतुष्ट हैं क्योंकि उत्तर न मिले तो भी ‘उत्तर प्राप्त’ लिखा जाता है. यह लोकतंत्र की वह स्थिति है जिस में प्रश्न का अस्तित्व बना रहता है, उत्तर का नहीं.

मंगल कालोनी में हर घर में गैस सिलिंडर से खाना बन रहा है, सिवा राजनजी के घर के. वे आजकल इंडक्शन पर खाना बनाते हैं और इसे आधुनिकता कहते हैं. जब भी कोई पूछता है कि ‘‘गैस कनैक्शन क्यों नहीं लिया?’’ तो वे हंस कर कहते हैं, ‘‘सरकार ने कहा है कि मुझे अन इंटरप्टेड कुकिंग गैस लाइन डाली जाने पर प्रायोरिटी मिलेगी, बस, अभी लाइन पड़नी बाकी है.’’

यह अभी भारतीय प्रशासन का वह कालखंड है जिस में आज का काम कल होता है और कल का काम फाइल में होता है.

राजनजी ने हाल ही में पोर्टल पर अपनी खुशी दर्ज करने की कोशिश की, ताकि देखें कि वह भी निस्तारित होती है या नहीं. सिस्टम ने जवाब दिया, ‘‘आप की खुशी दर्ज हो गई है, जब आप के क्षेत्र में हर्ष की लहर बहेगी, उसे प्रायोरिटी पर साझ किया जाएगा.’’

अब राजनजी समझ चुके हैं कि शिकायत पोर्टल दरअसल डिजिटल गोदरेज अलमारी है, जिस में जनता अपनी तकलीफें जमा करती जाती है और सरकार ताले पर चमकती रहती है.

लोकतंत्र का असली सौंदर्य यही है कि हर समस्या के लिए एक हैल्पलाइन है और हर हैल्पलाइन के लिए एक नया नंबर. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले अफसर कहते थे, ‘‘देखते हैं,’’ अब सिस्टम कहता है, ‘‘प्रोसैस में है.’’

राजनजी आजकल अपने महल्ले के बच्चों को यही सिखाते हैं कि अगर किसी चीज का समाधान चाहिए तो उसे शिकायत के रूप में मत डालो, बल्कि घोषणा के रूप में कर डालो, शायद,  तभी सरकार उस पर कुछ व्यावहारिक कार्रवाई करेगी.

शिकायतें अब डैमोक्रेसी की प्रगति का प्रतीक बन गई हैं. जितनी ज्यादा शिकायतें, उतना ज्यादा लोकतंत्र. बस समाधान, वही अब भी लंबित है  जैसे राजनजी की गैस लाइन, जैसे जनता की उम्मीदें, जैसे हर नागरिक की वह पुरानी आदत कि वह अब भी कुछ ठीक होने की आशा करता है.

राजनजी मुसकराते हैं, इंडक्शन पर चाय रखते हैं, और बुदबुदाते हैं- ‘देश डिजिटल हो गया है, बस, समाधान अभी भी औफलाइन हैं.’ Satirical Story In Hindi

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