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Charak Movie: चरक – फेयर औफ फेथ

Charak Movie: चरक को आयुर्वेद का आचार्य माना जाता है. उन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. मगर इसी शीर्षक से बनी सुदीप्तो सेन की पावरफुल कहानी ‘चरक: फेयर औफ फेथ’ को आयुर्वेद से कुछ लेनादेना नहीं है. यह फिल्म बंगाल की तांत्रिक प्रथाओं और नरबलि पर आधारित है.

हमारे देश में आज भी अंधविश्वास की जड़ें फैली हैं. इन अंधविश्वासों को फैलाने में पंडेपुंजारियों, तांत्रिकों और मौलवियों का बड़ा हाथ है. अकसर वे अंधविश्वासों के चक्रव्यूह में लोगों को फंसा कर अपनी जेबें भरते हैं. जादूटोने के नाम पर लोगों को गुमराह करते हैं, भूतप्रेत भगाने के नाम पर लोगों को उल्लू बनाते हैं और संतान सुख प्राप्त करने के लिए किसी दूसरे बच्चे की बलि दिलवाने तक में भी नहीं हिचकिचाते. यह सब वे मां काली और तथाकथित भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए करते हैं.

‘चरक’ में अंधविश्वासों की अति दिखाई गई है. यह फिल्म ग्रामीण भारत में अंधविश्वास, तांत्रिक प्रथाओं और बच्चों की बलि जैसे भयावह विषयों को उजागर करती है. आस्था और कट्टरता की महीन रेखा पर सवाल उठाती यह एक तनावपूर्ण थ्रिलर है. फिल्म में पारंपरिक चरक मेले में रची गई एक खतरनाक कहानी दिखाई गई है.

चरक मेला मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और दक्षिणी बंगलादेश में बंगाली कैलेंडर के चैत्र महीने के अंतिम दिन यानी चैत्र संक्रांति (अप्रैल के मध्य में) आयोजित किया जाता है. यह तथाकथित भगवान शिव के सम्मान में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक त्योहार है जिस में अंधविश्वासी श्रद्धालु उपवास रखते हैं और चरक के चारों ओर घूमते हैं.

फिल्म की कहानी नरबलि और बच्चों के लापता होने की घटनाओं को केंद्र में रखती है. ‘द केरल स्टोरी’ के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने ‘चरक’ के जरिए फिल्म निर्माण क्षेत्र में कदम रखा है. फिल्म मेले की आड़ में होने वाले अंधविश्वास को ले कर झकझोरती है. अकसर लोग हिंदी फिल्मों में दिखाए गए अंधविश्वासों से सबक नहीं लेते, उलटे, उसी तरह के अंधविश्वासों में खुद को लपेट लेते हैं.

कहानी चांदपुर में चरक मेले से 2 सप्ताह पहले शुरू होती है. विकास (सुब्रत दत्त) और सुकुमार (शशि भूषण) बचपन के दोस्त है. निसंतान सुकुमार और उस की पत्नी विकास के बेटे बिरसा (शरणदीप) से बहुत प्यार करते हैं. इस बार सुकुमार चरक मेले में बड़ा पुजारी बना है. उधर विकास से जुआं में हारा जगन उस से पैसे वापस मांगता है. विकास मना कर देता है. तब जगन उसे सबक सिखाने की ठान लेता है.

पुलिस इंस्पैक्टर सुभाष शर्मा (शफीकुर रहमान) और उस की पत्नी शेफाली (अंजलि पाटिल) शादी के 12 साल बाद भी निसंतान हैं. शेफाली पति से बच्चा गोद लेने को कहती है लेकिन सुभाष राजी नहीं होता. ऐसी मान्यता (अंधविश्वास) है कि निसंतान श्रद्धालु अगर अघोरियों के जरिए किसी बच्चे की बलि दे तो वह संतानसुख प्राप्त कर सकता है.

तभी निरसा और उस का दोस्त कानू (शौतक श्यामल) गायब हो जाते हैं. पुलिस उन की तलाश में जुटती है. एक चौंकाने वाला सच सामने आता है, अंधविश्वास के काले सच और नरबलि से जुड़ी भयावह हकीकत सब के सामने आती है.

फिल्म की यह कहानी दिखाती है कि कैसे पढ़ेलिखे लोग भी संतोषप्राप्ति या अन्य स्वार्थों के लिए रूढ़िवादी परंपराओं के आगे झुक जाते हैं. कहानी का क्लाइमैक्स दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि परंपरा की आड़ में नरबलि दी जा रही है. फिल्म का क्लाइमैक्स दर्शकों के आगे समाज की एक कड़वी सचाई को प्रस्तुत करता है.

निर्देशक ने एक संवेदनशील मुद्दा उठाया है. आगे क्या होगा, यह जानने के लिए दर्शक सीटों से बंधे से रहते हैं. सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है. फिल्म का निर्देशन बढिया है. लोकेशन भी अच्छी है. कई सीन देख कर डर भी लगता है. फिल्म के संवाद मजबूती देते हैं. विजुअल्स असली हैं, कलाकारों का मेकअप भी असली लगता है. म्यूजिक का सही इस्तेमाल हुआ है.

कहानी बीचबीच में उबाऊ सी हो जाती है लेकिन बाद में संभल जाती है. फिल्म को मनोरंजन के लिए न देखें. हां, बच्चों को साथ ले कर न जाएं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Charak Movie

जब खुली किताब

Hindi movie: विदेशों में वृद्धावस्था में तलाक आम होता जा रहा है. हालांकि पिछले 4 दशकों में युवा जोड़ों में यह दर कम हुई है मगर वृद्ध वयस्कों में यह दर बढ़ गई है. भारत में अभी ऐसे हालात नहीं पैदा हुए हैं. 65 वर्ष और उस से अधिक आयु के वयस्कों में अमेरिका में तलाक दर बढ़ रही है.

अध्ययनों से पता चलता है कि वृद्धावस्था में तलाक की यह प्रवृत्ति कई कारणों से हो रही है. लोगों की उम्र पहले से ज्यादा हो गई है और ज्यादा उम्र के जोड़े पहले की तुलना में असंतोषजक विवाह को बरदाश्त करने के लिए इच्छुक नहीं है. वहीं युवा देर से शादी कर रहे हैं और जीवनसाथी का चुनाव करते समय ज्यादा सतर्क हो गए हैं.

वृद्धावस्था में तलाक जीवनशैली में बदलाव और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है. अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की देखादेखी भारत में भी अब वृद्धावस्था में तलाक होने लगे लगे हैं, मगर वे अपेक्षाकृत कम हैं. वृद्धावस्था में तलाक लेने पर वित्तीय चुनौतियां ही सामने आती हैं, अकेलापन, अवसाद और चिंता हर वक्त घेरे रहती है. सामाजिक जीवन में बदलाव आता है, स्वास्थ्य की चिंता परेशान करने लगती है.

भारत में, खासकर बौलीवुड में, वृद्धावस्था में संबंधविच्छेद कर लेना आम बात है. मशहूर फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र ने तो हेमा मालिनी से विवाह करने के लिए अपना धर्म परिवर्तन करा लिया था. पंकज कपूर ने सुप्रिया पाठक के साथ दूसरी शादी की थी. इस शादी से उन के 2 बच्चे हैं, बेटी ऋचा कपूर और बेटा रोहन कपूर. शाहिद कपूर नीलिमा अजीम से पैदा हुआ उन का बेटा है. ऐसे बहुत से उदाहरण आप को बौलीवुड में मिल जाएंगे.

‘खुली किताब’ भी एक उम्रदराज कपल द्वारा शादी बचाने नहीं, बल्कि तलाक लेने के लिए आपस में लड़ने की कहानी पर बनी फिल्म है. यह फिल्म सौरभ शुक्ला के उसी नाम वाले थिएटर प्ले का अडौप्शन है जिसे उस ने खुद लिखा और खुद ही निर्देशित किया.

कहानी के केंद्र में गोपाल (पंकज कपूर) और अनुसूया (डिंपल कपाड़िया) है. अनुसूया 2 साल कोमा में रहने के बाद होश में आती है. एक दिन वह गोपाल को 50 साल पुराने एक सच के बारे में बताती है. यह बात उन के लंबे रिश्ते की नींव हिला देती है. गोपाल भीतर से टूट जाता है. उसे लगता है कि उस ने उम्रभर एक झूठ पर यह रिश्ता निभाया है. गुस्से में आ कर वह बूढ़ी उम्र में तलाक लेने का फैसला करता है.

गोपाल के जीवन में उथलपुथल शुरू हो जाती है. बच्चे उलझ जाते हैं. गोपाल वकील आर के नेगी (अपारशक्ति खुराना) से मिलता है. बातचीत में गोपाल के कई साल पुराने जख्म हरे होते हैं और अनुसूया का सच भी सामने आता है. तलाक से शुरू हुआ यह सफर आखिर में उन्हें एक नई समझ की ओर ले जाता है. वहां रिश्ता टूटने के बजाय एक अलग रूप में बदलने लगता है.
यह एक ईमानदार पारिवारिक कौमेडी है. रिश्तों की सच्चाई बताने वाली यह फिल्म धीमी गति की है. फिल्म की लंबाई कम है, 94 मिनट, यह अच्छी बात है. फिल्म की कहानी आम फिल्मों से हट कर है. फिल्म का निर्देशन अच्छा है. कहानी संवादों द्वारा आगे बढ़ती है. लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है. यह रफ्तार पूरे समय एक सी नहीं रहती. कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे हैं.
‘जब खुली किताब’ उम्रदराज रिश्तों की सच्चाइयों को बिना किसी दिखावे के दिखाती है. इस में कोई ड्रामा नहीं है. हर किसी को शायद पसंद भी न आए. सौरभ शुक्ला और डिंपल कपाड़िया के साथसाथ अपारशक्ति खुराना का काम भी बढ़िया है. फिल्म 75 वर्ष की उम्र में भी रिश्तों को नया मौका देने के विचार को खूबसूरती से पेश करती है. फिल्म दर्शकों को उन के परिवार के और नजदीक लाने में शायद सफल हो पाए. सिनेमेटोग्राफर की फोटोग्राफी बढ़िया है. Hindi movie

कपल फ्रैंडली

Romantic Movie: वैलेंटाइन के मौके पर रिलीज यह फिल्म कपल्स के लिए उपयुक्त है. यह फिल्म तेलुगू भाषा की रोमांटिक फिल्म है जिसे हिंदी में भी बनाया गया है. फ्रैंडली कपल वह होता है जो एकदूसरे को खुश रखे, चाहे वह शादीशुदा हो या कुंआरा या फिर प्रेमीप्रेमिका ही क्यों न हो. अगर एकदूसरे को खुश रखते हैं तो उन का आपसी रिश्ता मजबूत होता है और जीवन में खुशहाली व शांति आती है. एक फ्रैंडली कपल बनने के लिए एकदूसरे की तारीफ करें, एकदूसरे पर विश्वास करें, सम्मान करें और मतभेदों को भुला कर हंसे, खिलखिलाएं. इन आदतों को अपना कर आप अपने रिश्ते को सालोंसाल तक खुशहाल रख एकदूसरे के फ्रैंड बने रह सकते हैं, ऐसा मानना है इस फिल्म के निर्देशक चंद्रशेखर का, जो तेलुगू फिल्म के जानेमाने निर्देशक हैं.

‘कपल फ्रैंडली’ आधुनिक रोमांटिक ड्रामा फिल्म है. आधुनिक रिश्तों, संघर्षों और युवाओं के प्यार को संवेदनशीलता से दिखाते हुए यह फिल्म एक हलकीफुलकी प्रेम कहानी से शुरू होती है और बाद में भावनात्मक मोड़ ले लेती है. फिल्म रिलीज होते ही इस ने दर्शकों को दिल जीत लिया. अब इसे तमिल और कन्नड़ भाषाओं में भी रिलीज किया गया है.

‘कपल्स फ्रैंडली’ में चेन्नई में नाइक टैक्सी ड्राइवर के रूप में काम करने वाले एक संघर्षरत इंटीरियर डिजाइनर शिवा (संतोष सोमान) और एक महत्त्वाकांक्षी आई टी पेशेवर मित्रा (मानसा वाराणसी) की कहानी दिखाई गई है. शहर की कठिन जिंदगी में जब वे एकसाथ रहने लगते हैं तो उन का रिश्ता पहले फ्रैंडली, फिर प्यार में बदल जाता है. दोनों साथ रहने लगते हैं.

शिवा को अपने डिजाइन के काम में सफलता मिलने लगती है, वहीं मित्रा को अपने कैरियर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. एक बड़ा मोड़ उन के जीवन में उथलपुथल मचा देता है जिस से उन की गहन भावनात्मक सहनशक्ति की परीक्षा होती है. आखिरकार, फिल्म इस बात पर प्रकाश डालते हुए खत्म होती है कि वे कैसे परिपक्व होते हैं, सामाजिक मानदंडों का सामना करते हैं और प्रेम के लिए अपना रास्ता चुनते हैं जिस से यह फ्रैंडली कपल की कहानी बन जाती है. क्लाइमैक्स में उन्हें एहसास होता है कि एक फ्रैंडली कपल का जीवन केवल साथ रहने के बारे में नहीं बल्कि आपसी सम्मान और भावनात्मक विकास के बारे में भी हैं. आखिरकार, वे एकदूसरे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के बीच संतुलन बनाते हैं.

यह एक हलकीफुलकी प्रेम कहानी पर बनी फिल्म है. फिल्म को मुख्य रूप से युवाओं को ध्यान में रख कर बनाया गया है. कहानी प्यार और रिश्तों की पेचीदगियों को दिखाती है. प्रीति, जो मित्र की दोस्त है, को एक बहुत बड़े उम्र के व्यक्ति से प्यार करते दिखाया गया है.

सिनेमेटोग्राफर दिनेश पुरुषोत्तम ने बारिश से भीगी, कीचड़भरी गलियों और व्यस्त सड़कों व लोकप्रिय स्थलों के माध्यम से शहर को कैमरे में कैद किया है. अदित्य रविद्रन का संगीत मनमोहक है. संवाद बढ़िया हैं. शिवा को एक बचकाने युवक से एक जिम्मेदार व्यक्ति में परिवर्तित होते देखना अच्छा लगता है. दोनों कलाकारों की कैमिस्ट्री गजब की है. कपल फ्रैंडली की कहानी भले ही अनोखी न हो पर यह परिपक्व और आधुनिक है. फिल्म का निर्देशन अच्छा है. Romantic Movie

सूबेदार

Action Drama Movie: यह एक सैनिक के जीवन पर आधारित ऐक्शन ड्रामा फिल्म है. वर्ष 2023 में मराठी फिल्म ‘सुभेदार’ आई थी. यह ऐतिहासिक फिल्म तानाजी मालसारे के जीवन पर आधारित थी. 2018 में 962वें भारत-चीन युद्ध के नायक पर आधारित बायोपिक फिल्म ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह 2018 में रिलीज हो चुकी है.’

फौज से सेवानिवृत्त फौजियों को अकसर तेजी से बदलती दुनिया में नागरिक जीवन में ढलने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. अकसर वे स्थानीय भ्रष्टाचार और सिस्टम का शिकार बनते हैं. मजबूर हो कर उन्हें अपने परिवार की रक्षा के लिए सेना के अनुशासन और युद्ध कौशल पर भरोसा करना पड़ता है.

इस विषय पर 80-90 के दशक में कई फिल्में आ चुकी हैं. उस समय गरीबों के हकों के लिए लड़ने वाले और एक ही समय में 10-20 गुंडों को ढेर करने वाले हीरोज का बोलबाला था. दर्शकों को उस समय ऐसे एंग्रीयंगमैन वाले नायक खूब पसंद आए. अनिल कपूर इस तरह की भूमिकाएं 80 के दशक में निभाया करता था, इस फिल्म में रिटायर्ड फौजी के रोल में वह दोबारा से लौटा है और समाज में फैली बुराइयों से उसे लड़ता हुआ देखा जा सकता है.

कहानी रिटायर्ड आर्मी अफसर सूबेदार अर्जुन सिंह (अनिल कपूर) के इर्दगिर्द बुनी गई है, जो बरसों बाद मध्य प्रदेश के एक कसबे में अपनी बिखरी जिंदगी समेटने को लौटा है. श्यामा (राधिका मदान) कालेज गर्ल है और अपनी मां (खुशबू) की ऐक्सिडैंट में हुई मौत से सदमे में है. अर्जुन का दोस्त प्रभाकर (सौरव शुल्ला) उसे इलाके के दबंग सौफ्टी (फैसल मलिक) और प्रिंस (आदित्य रावल) के पास ले जाता है. ये दोनों रेत माफिया से जुड़े हैं. इस नैटवर्क की असली सरगना दीदी (मोना सिंह) जेल में बंद है और वहीं से अवैध कारोबार चलाती है.

अर्जुन इस अराजकता और सिस्टम की बदहाली से वाकिफ है. उधर श्यामा को भी कालेज में गुंडागर्दी का सामना करना पड़ता है. एक दिन बिगड़ैल प्रिंस अर्जुन की जिप्सी को नुकसान पहुंचाता है. यह अपमान अर्जुन को झकझोर देता है. वह रेत माफिया के इन दरिंदों के खिलाफ जंग छेड़ देता है. रेत माफिया श्यामा का अपहरण कर लेते हैं और अर्जुन के दोस्त प्रभाकर की हत्या कर देते हैं. मगर अर्जुन प्रिंस का खात्मा कर देता है. प्रिंस के मरने के बाद ही नकली दीदी का वर्चस्व भी खत्म हो जाता है. अर्जुन और उस की बेटी श्यामा के बीच का रिश्ता सुधर जाता है.

क्लाइमैक्स में नाना पाटेकर का एक सरप्राइज कैमियो है जो पूर्व सैनिकों की एक टीम के नेता के रूप में अर्जुन की मदद करता है.

अंत में फिल्म के सीक्वल बनने का इशारा कर दिया गया है. निर्देशक ने फिल्म में जम कर मसाले डाले हैं. फिल्म का मध्यांतर से पहले का भाग तेजतर्रार है, मध्यांतर के बाद कहानी निखर जाती है. छोटे कसबे की धूलधक्कड़ और बेतरतीब लाइफ को विश्वसनीय तरीके से दिखाया गया है.

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. ‘लल्ला…’ और ‘बलम सूबेदार…’ गाने अच्छे बन पड़े हैं. अनिल कपूर का काम बढ़िया है. खौफनाक प्रिंस की भूमिका में आदित्य रावल जंचा है. राधिका मदान का काम भी ठीकठाक है. मोना सिंह ने अपने किरदार के साथ न्याय नहीं किया है. Action Drama Movie

सैंसर बोर्ड की तानाशाही की शिकार बनी ‘द वौयस औफ हिंद रजब’

CBFC controversy: भारतीय सैंसर बोर्ड यानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड एक तरफ ‘धुरंधर द रिवेंज’ को वयस्क प्रमाणपत्र के साथ प्रदर्शन की इजाजत देता है जिस में एक किरदार दूसरे किरदार का सिर काट कर उस के सिर को फुटबौल बना कर खेलता है क्योंकि इस फिल्म के फिल्मकार आदित्य धर ने इस फिल्म में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2016 में लागू की गई ‘नोटबंदी’ को जायज और अतिआवश्यक बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी लेकिन दूसरी तरफ यही सैंसर बोर्ड 2025 में प्रमुख सिख मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर बनी फिल्म ‘पंजाब 95’ को बैन कर देता है.

हनी त्रेहान निर्देशित फिल्म ‘पंजाब 95’ में दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल और सुविंदर विक्की की अहम भूमिकाएं हैं. इस के बाद अक्टूबर 2025 में सैंसर बोर्ड ने संध्या सूरी लिखित व निर्देशित तथा यूनाइटेड किंगडम, भारत, जरमनी और फ्रांस के एक अंतर्राष्ट्रीय सहनिर्माण वाली फिल्म ‘संतोष’ को बैन कर देता है. फिल्म ‘संतोष’ 97वें औस्कर अवार्ड में नामित हुई थी. उत्तरी भारत के ग्रामीण परिवेश पर आधारित इस फिल्म में शाहना गोस्वामी एक विधवा की भूमिका में है जिसे अपने दिवंगत पति की पुलिस कौंस्टेबल की नौकरी विरासत में मिलती है और वह एक दलित किशोरी की हत्या व बलात्कार की जांच में शामिल हो जाती है. इस फिल्म का विश्व प्रीमियर मई 2025 में कान्स फिल्म फैस्टिवल में हुआ था.

अब 98वें औस्कर अवार्ड के लिए नामांकित ट्यूनीशिया व फ्रांस की कौथर बेन हानिया लिखित व निर्देशित फिल्म ‘द वौयस औफ द हिंद रजब’ के प्रदर्शन पर भारतीय सैंसर बोर्ड ने पाबंदी लगा दी है. जबकि, यह फिल्म अमेरिका, वेनिस, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई देशों में प्रदर्शित हो चुकी है. फिल्म का विश्व प्रीमियर 3 सितंबर, 2025 को 82वें वेनिस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के मुख्य प्रतियोगिता में हुआ, जहां इस ने ग्रैंड जूरी पुरस्कार और 6 अन्य समानांतर पुरस्कार जीते. इसे 10 सितंबर को ट्यूनीशिया में और 26 नवंबर को फ्रांस में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया. 98वें अकादमी पुरस्कारों में इसे ट्यूनीशियाई प्रविष्टि के रूप में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए नामांकित किया गया था. 83वें गोल्डन ग्लोब पुरस्कारों में इसे सर्वश्रेष्ठ गैरइंग्लिश भाषा फिल्म के लिए भी नामांकित किया गया था.

29 जनवरी, 2024 की बात है. रेड क्रिसेंट के स्वयंसेवकों को एक आपातकालीन फोन आता है और गाजा में गोलीबारी के बीच एक कार में फंसी 6 साल की बच्ची मदद की गुहार लगाती है. उसे फोन पर बनाए रखने की कोशिश करते हुए वे स्वयंसेवक एम्बुलैंस को उस के पास पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं. उस का नाम हिंद रजब था. यह अलग बात है कि बाद में उसी कार में हिंद रजब का मृत शरीर गोलियों से छलनी किया हुआ पाया गया था. यह महज संयोग ही है कि हिंद रजब की हत्या की इस कहानी पर 2024 में डच लघु फिल्म ‘क्लोज योर आइज हिंद’, जौर्डन की लघु फिल्म ‘हिंद अंडर सीज’ तथा कौथर बेन हानिया निर्देशित ट्यूनीशियन फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ के फिल्मांकन हुए और ये तीनों फिल्में 2025 में अलगअलग माह में रिलीज हुईं.

जी हां, इंटरनैशनल पुरस्कारों से पुरस्कृत ट्यूनीशियान फिल्मकार कौथर बेन हानिया लिखित व निर्देशित हृदय विदारक डौक्यूड्रामा फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ गाजा पट्टी पर इजराइल के आक्रमण के दौरान गाजा में इजराइली सेना की गोलाबारी के बीच हिंद रजब अपने परिवार के साथ एक कार में फंस गई थी. उस के परिवार के अन्य सदस्य मारे जा चुके थे और वह अकेली जीवित बची थी. हिंद रजब ने अपनी मदद के लिए रेड क्रिसेंट के आपातकालीन स्वयंसेवकों को फोन किया था. उसे बचाने के लिए भेजे गए 2 पैरामेडिक्स भी रास्ते में मारे गए और 12 दिनों बाद हिंद का शव गोलियों से छलनी उसी कार में मिला था.

यह फिल्म इजराइली रक्षाबलों द्वारा 6 वर्षीया फिलिस्तीनी बच्ची हिंद रजब की हत्या के समय रेड क्रिसेंट की प्रतिक्रिया का चित्रण करती है. फिल्मकार ने 70 मिनट की अवधि वाली मौलिक औडियो रिकौर्डिंग का भी इस फिल्म में उपयोग किया है. इस में साजा किलानी, मोताज मलहीस, आमेर हलेहल और क्लारा खौरी ने अभिनय किया है. लेकिन भारत में इस फिल्म के रिलीज पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. फिल्म के भारतीय वितरक मनोज नंदवाना ने मीडिया को जो कुछ बताया, उस के अनुसार, सैंसर बोर्ड ने मौखिक रूप से फिल्म को प्रमाणपत्र देने से मना कर दिया है. कथित तौर पर बोर्ड का मानना है कि यह फिल्म ‘अत्यधिक संवेदनशील’ है और इस के प्रदर्शन से भारत और इजराइल के राजनयिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. सैंसर बोर्ड ने यह निर्णय उस वक्त लिया था जब फरवरी माह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल के दौरे पर थे. उस वक्त इस फिल्म को 6 मार्च को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज किया जाना था. इस फिल्म के वितरक मनोज नंदवानी ने सैंसर बोर्ड के इस कृत्य के खिलाफ फिलहाल कानूनी लड़ाई लड़ने से परहेज किया है क्योंकि उन के पास कोई लिखित आदेश नहीं है.

सैंसर बोर्ड की बात सुन कर लोगों को हंसी आ रही है. अहम सवाल यह है कि क्या एक 6 साल की बच्ची की त्रासदी भी अब ‘डिप्लोमैसी’ के तराजू पर तोली जाएगी? क्या कला को देशों के रिश्तों के चश्मे से देखना सही है? फिल्म की निर्देशक का कहना है कि, ‘यह फिल्म किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि युद्ध के खिलाफ है.’ निर्देशक कौथर बेन हानिया का मानना है कि यह महज एक फिल्म नहीं, बल्कि उन्होंने इसे ‘फौरेंसिक साक्ष्य’ की तरह पेश किया है. यों भी ट्यूनीशियाई फिल्मकार कौथर बेन हानिया अपनी फिल्मों में हकीकत और कल्पना के धुंधलेपन को दिखाने के लिए जानी जाती हैं.

भारतीय सैंसर बोर्ड के इस फैसले की चारों तरफ आलोचना हो रही है. भारत में फिल्म ‘संतोष’ की ही भांति इस फिल्म पर लगे ‘अघोषित प्रतिबंध’ ने ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर नई बहस छेड़ दी है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इसे ‘अपमानजनक’ करार दिया और कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का उपयोग अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. इसी के साथसाथ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के हनन के रूप में आलोचना की है. फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ न केवल एक सिनेमाई रचना है बल्कि एक वैश्विक मानवाधिकार मुद्दा बन चुकी है. अब लोग सैंसर बोर्ड पर एक खास राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं.

सैंसर बोर्ड के लिया धारा 5बी

सैंसर बोर्ड के पास एक ब्रह्मास्त्र है, गाइडलाइन की धारा 5बी, जो कहती है कि अगर कोई फिल्म ‘भारत की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा या विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के खिलाफ जाती है, तो उसे सर्टिफिकेट देने से मना किया जा सकता है.’ लेकिन कई जानकारों का मानना है कि यह नियम तब लागू होता है जब फिल्म किसी देश के खिलाफ जहर उगल रही हो या झूठ फैला रही हो. ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ तो एक 6 साल की बच्ची की सच्ची चीख है, जो रेड क्रिसेंट के रिकौर्ड्स में दर्ज है. क्या एक मासूम की मौत का सच दिखाना किसी देश का अपमान है? या फिर हमारी ‘डिप्लोमैसी’ इतनी कमजोर है कि एक फिल्म से टूट जाएगी? कितनी अजीब बात है कि धारा 5बी का उपयोग ‘मैत्रीपूर्ण संबंधों’ को बचाने के बजाय ‘असुविधाजनक सच’ को छिपाने के लिए किया जा रहा है. यदि एक औस्कर नौमिनेटेड फिल्म, जोकि अमेरिका सहित विश्व के तमाम देशों में रिलीज हो चुकी हो, वह भारत के सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पा रही. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय सिनेमा की आजादी को लकवा मार गया है.

सुप्रीम कोर्ट का कथन

सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि, “किसी फिल्म से तनाव हो सकता है, इस शंका के चलते अभिव्यक्ति की आजादी को नहीं दबाया जा सकता.’’

हौलीवुड मे तमाम फिल्मकार व कलाकार इस फिल्म के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. जी हां, ब्रैड पिट और जोकिन फीनिक्स जैसे हौलीवुड के दिग्गजों ने इस फिल्म को सिर्फ इसलिए सपोर्ट किया क्योंकि वह इस के ‘सिनेमाई साहस’ से प्रभावित थे. उन्होंने इसे ‘राजनीति से परे एक मानवीय त्रासदी’ की संज्ञा दी है. जोकिन फीनिक्स, जो खुद मानवाधिकारों के लिए मुखर रहते हैं, ने कहा कि, ‘यह फिल्म ‘इंसानियत के नाम पर एक जरूरी दस्तावेज है.’

इस मसले में अहम बात यह है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड लिखित में कुछ देने को तैयार नहीं है जिस के चलते फिल्म वितरक के पास अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प ही नहीं है. पर यह तय है कि भारतीय सिनेमाप्रेमी एक 6 साल की बच्ची की त्रासदी के सच को नहीं जान सकता. डबिंग नहीं बल्कि असली औडियो हिंद रजब और रेड क्रिसेंट की 70 मिनट की बातचीत की औडियो रिकौर्डिंग के कुछ संवादों से आप भी रूबरू होइए. जान लें कि फिल्म की निर्देशक कौथर बेन हानिया ने किसी अभिनेत्री से ‘हिंद रजब’ के संवादों की डबिंग नहीं कराई, बल्कि हिंद रजब की असली फोन रिकौर्डिंग्स का औडियो ही इस्तेमाल किया है. कुछ संवाद ये हैं-

हिंद रजब कहती है- चाचा, क्या आप मुझे लेने आ रहे हैं? मुझे बहुत डर लग रहा है.’’

औपरेटर जवाब देता है- हां बेटा, हम आ रहे हैं. बस, थोड़ा और रुक जाओ. क्या आप के पास कोई बड़ा है?

हिंद रजब (रोते हुए कहती है)- नहीं, सब सो गए हैं. उन के शरीर से खून निकल रहा है. चाचा, टैंक मेरे बहुत पास है, वह मुझे देख रहा है.

औपरेटर- डरो मत बेटा. बस, नीचे झुक जाओ.

हिंद रजब- मैं मम्मी को परेशान नहीं करना चाहती, इसलिए अपना खून हाथ से पोंछ रही हूं. क्या आप जल्दी आएंगे?

ये शब्द नहीं, एक मरती हुई मासूमियत की गवाही हैं

फिल्म की कहानी का सार

कौथर निर्देशित डौक्यूड्रामा फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ की दुखद कहानी 29 जनवरी, 2024 की घटना बयां करती है जब हिंद रजब गाजा पट्टी में इजराइली रक्षाबलों के टैंक हमले में अपने परिवार के सदस्यों के साथ मारी गई थी. कथित दोषियों की पहचान कर्नल/लैफ्टिनैंट कर्नल बेनी अहारोन (401वीं बख्तरबंद ब्रिगेड के कमांडर), लैफ्टिनैंट कर्नल डैनियल एला (52वीं बख्तरबंद बटालियन के कमांडर), मेजर शान ग्लास (वैम्पायर एम्पायर कंपनी के कमांडर) और टैंक चालक दल के सदस्य इटे कुकिएरकाफ के रूप में हुई. कार पर हुए हमले में उन के चाचा इयाद रजब, चाची हना अलआघा और 3 चचेरे भाई (रमी, डायना, रकन) की मौके पर ही मौत हो गई.

हिंद रजब बुरी तरह घायल हो गईं और फिलिस्तीनी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के बचाव दल से फोन पर संपर्क में रहीं. उन की चचेरी बहन लयान हमादेह भी कथित तौर पर आईडीएफ के टैंक हमले में मारी गईं, जिस में करीब 335 गोलियां लगीं. रेड क्रिसेंट के 2 स्वयंसेवक यूसुफ और अहमद उसे बचाने आए लेकिन इजराइली सैनिकों ने उन्हें भी मार डाला. हिंद रजब 3 घंटे तक फोन पर बात करती रही. 12 घंटे बाद उसी कार में हिंद रजब का गोलियों से छलनी मृत शरीर मिला. बाद में उसके चाचा ने आर्मेनिया और जरमनी में न्याय की गुहार लगाई थी, जिस के चलते इस दुखद घटना से पूरा विश्व वाकिफ हो सका.

निर्देशक ने लौटाई अवार्ड की ट्रौफी

निर्देशक कौथर बेन हानिया को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए. कौथर बेन हानिया को हक की लड़ाई लड़ना भी आता है. उन की बगावत तब दिखी जब उन्होंने बर्लिन फिल्म फैस्टिवल में ‘सिनेमा फौर पीस’ का अवार्ड लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा, ‘‘शांति कोई परफ्यूम नहीं है जिसे हिंसा पर छिड़क दिया जाए ताकि सत्ता सुरक्षित महसूस करे. न्याय के बिना शांति संभव नहीं है.’’ उन्होंने अवार्ड वहीं छोड़ दिया क्योंकि मंच पर एक इजराइली जनरल को भी सम्मानित किया जा रहा था.

सैंसर बोर्ड द्वारा फिल्म बैन किए जाने पर बेन हानिया उवाच

जब कौथर बेन हानिया को पता चला कि भारत में उन की फिल्म को ‘भारत-इजराइल संबंधों’ के बहाने रोका जा रहा है, तो उन्होंने तीखा तंज कसा. उन्होंने भारत के प्रति अपने प्रेम को याद करते हुए जो कुछ कहा वह हर सिनेमाप्रेमी को सोचने पर मजबूर कर देगा. कौथर बेन हानिया ने कहा है- ‘‘मैं भारत को प्यार करते हुए बड़ी हुई हूं. बौलीवुड मेरे बचपन का हिस्सा था. एक समय तो मैं खुद को भारतीय मूल का होने की कल्पना करती थी ताकि खास महसूस कर सकूं. लेकिन आज मेरा सवाल है, ‘क्या ‘दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र’ और ‘मध्यपूर्व के इकलौते लोकतंत्र’ के बीच का हनीमून इतना नाजुक है कि एक फिल्म उसे तोड़ सकती है?’’

कौन हैं कौथर बेन हानिया

सिदी बौज़िद में जन्मी कौथर बेन हानिया की शिक्षा ट्यूनीशिया के इकोले डेस आर्ट्स एट डू सिनेमा (ईडीएसी) और पेरिस में ला फेमिस और सोरबोन में हुई. उन्होंने 2002 से 2004 तक ट्यूनिस स्कूल औफ आर्ट्स एंड सिनेमा में अध्ययन किया. इस प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने कई लघु फिल्मों का निर्देशन किया, जिन में से एक, ला ब्रेचे, को काफी सराहना मिली. 2003 में उन्होंने यूरोमेड द्वारा वित्तपोषित एक फीचर फिल्म लेखन कार्यशाला में भी भाग लिया. 2004 में उन्होंने ला फेमिस में अपना प्रशिक्षण जारी रखा, पहले ग्रीष्मकालीन विश्वविद्यालय में और फिर 2004-2005 में.

2006 में उन्होंने मोहसेन बेन हानिया की लघु कहानी ले ज्यून होम एंड लश्एनफैंट एट ला क्वेश्चन से प्रेरित एक और लघु फिल्म, मोई, मा सोउर एट ला चोज का निर्देशन किया. इस के बाद उन्होंने 2007 तक अल जजीरा डौक्यूमैंट्री चैनल के लिए काम किया. फिर उन्होंने कई फीचर फिल्मों का निर्देशन किया, जिन्हें विभिन्न फिल्म समारोहों में पुरस्कार मिले. साथ ही, 2007-2008 में सोरबोन नोवेल विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की. उन की पहली फीचर फिल्म ‘ले चल्लात दे ट्यूनिस’ थी, जो 2014 में रिलीज हुई थी. यह एक व्यंग्यात्मक लहजे वाली सामाजिक व्यंग्य फिल्म थी, जिस में बाद की फिल्मों की तरह ही महिलाओं और पुरुषों के बीच संबंधों को दर्शाया गया था.

उन की 2017 की फिल्म ‘ब्यूटी एंड द डाग्स’ को 2017 कान फिल्म फैस्टिवल में ‘अनसर्टेन रिगार्ड’ श्रेणी के लिए चुना गया था. इसे 91वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए ट्यूनीशियाई प्रविष्टि के रूप में भी चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया. 2018 में फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फ्रांसीसीभाषी फिल्म के लिए ल्यूमियर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. 2020 में उन की फिल्म ‘द मैन हू सोल्ड हिज स्किन’ का विश्व प्रीमियर 77वें वेनिस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के ओरिजोंटी अनुभाग में हुआ था. इसे सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए ट्यूनीशियाई प्रविष्टि के रूप में भी चुना गया था और 93वें अकादमी पुरस्कारों में नामांकित किया गया था, जिस से यह औस्कर के लिए नामांकित होने वाली पहली ट्यूनीशियाई फिल्म बन गई.

2023 में उन की डौक्यूमैंट्री ‘फोर डौटर्स’ को कान फिल्म फैस्टिवल की मुख्य प्रतियोगिता के लिए चुना गया, जहां इस ने ‘लश्ओइल डीश्ओर’ और ‘फ्रांकोइस शैले पुरस्कार जीता. 49वें सीजर पुरस्कार समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ डौक्यूमैंट्री फिल्म का सीजर पुरस्कार मिला. फिल्म ने महिला सशक्तीकरण के लिए सिनेमा फौर पीस पुरस्कार जीता. इसे 96वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ डौक्यूमैंट्री फीचर के लिए भी नामांकित किया गया था. 2025 में उन के डौक्यूड्रामा ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ को 82वें वेनिस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में 23 मिनट तक स्टैंडिंग ओवेशन मिला, साथ ही, इस ने ग्रैंड जूरी पुरस्कार जीता. इस फिल्म को 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर के लिए भी नामांकित किया गया था. CBFC controversy

 

अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने ऊंचे वर्णों की लड़ाई 

Religious Conspiracy: कोई भी दावे से यह नहीं कह सकता कि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बटुकों का यौनशोषण किया है या नहीं. हकीकत हर कोई समझ रहा है कि इस के पीछे ब्राह्मणों की अपनी वर्णगत श्रेष्ठता की शाश्वत लड़ाई है. मुद्दत बात एक बार फिर शैव और वैष्णव मतों के मतभेद उजागर हुए हैं. कानूनी फैसला जो भी आए लेकिन इस विवाद ने सनातनी साधुसंतों के अहं और स्वार्थ फिर उधेड़ कर रख दिए हैं.

अविमुक्तेश्वरानंद अभिमन्यु की तरह घिर गए हैं. यह खेल कहां जा कर और कैसे खत्म होगा, इस का अंदाजा लगाना मुश्किल है. यह ड्रामा या कहानी, कुछ भी कह लें, शुरू से ही किसी मसालेदार हिंदी फिल्म से कम नहीं जिस में धार्मिक और राजनीतिक षड्यंत्रों सहित रहस्य, रोमांच, हिंसा, मारधाड़, खेमेबाजी, पुलिस, अदालत, कानून और सैक्स वगैरह सब ठुंसे हुए हैं. इस दिलचस्प कहानी को सिरे से समझने से पहले राजनीति को छोड़ उस से जुड़े एक प्रमुख किरदार, जिस के चलते कहानी में जान आई, की नाटकीय एंट्री और उस का रोल देखना मौजूं होगा.

यह पात्र आशुतोष ब्रह्मचारी उर्फ अश्विनी पांडेय है जो भगवा खेमे के चहेते वैष्णव संत रामभद्राचार्य का वैष्णव शिष्य है. उस पर बीते 8 मार्च को चलती ट्रेन में जानलेवा हमला हुआ था. उस दिन आशुतोष रीवा एक्सप्रेस ट्रेन से गाजियाबाद से प्रयागराज जा रहा था. सुबह कोई 5 बजे ट्रेन सिराथू रेलवे स्टेशन पहुंची तो एकाएक एक आदमी ने एसी कोच में आ कर उस पर उस्तरे से हमला कर दिया. हमले में आशुतोष की नाक पर चोट लगी. उस ने टौयलेट में जा कर अपनी जान बचाई.

बकौल आशुतोष पांडेय, हमलावर ने उसे जान से मारने की धमकी देते हुए यह भी कहा था कि नाक काट कर अपने गुरु के चरणों में चढ़ाऊंगा. घायल आशुतोष को प्रयागराज के काल्विन अस्पताल में भरती कराया गया जहां मरहमपट्टी के बाद उसे छुट्टी दे दी गई.

वह गुरु जिन के चरणों पर नाक चढ़ानी थी प्रसिद्द शंकराचार्य 56 वर्षीय अविमुक्तेश्वरानंद हैं जिन का असली नाम उमाशंकर उपाध्याय है. वे उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के गांव ब्राह्मणपुर के रहने वाले हैं. साल 1977 से ले कर 1982 तक गुजरात की सयाजीराव यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के बाद इधरउधर जहां से भी मिला, वे `ज्ञान` प्राप्त करते रहे. 1982 में वे काशी में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद के संपर्क में आए और 2006 में उन से दीक्षा ले ली. स्वरूपानंद ने उन का संन्यासी नाम अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती रख दिया. देखते ही देखते ही वे स्वरूपानंद के इतने चहेते हो गए कि 11 सितंबर, 2022 को स्वरूपानंद की मौत के बाद उन्हें ज्योतिर्मय पीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया गया जिस का आधार स्वरूपानंद की कथित वसीयत थी.

हमलावर के बारे में आशुतोष ने मीडिया को बताया, “जिस किसी ने भी मुझ पर हमला किया है वह अविमुक्तेश्वरानंद के कहने पर किया है और 21 लाख रुपए के इनाम के चक्कर में किया है जिस की घोषणा अविमुक्तेश्वरानंद ने कर रखी है. इन लोगों की योजना मेरी नाक काटने की है ताकि मैं गवाही देने कोर्ट तक न पहुंच पाऊं.” बातबात में वह आदतन अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ जहर उगलते उन्हें समाजवादी पार्टी का बताता रहा.

यौनशोषण है असल मामला

इधर अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य का खेमा यह आरोप लगाता रहा कि आशुतोष ने खुद पर ही हमला कराया है. साल 2024 में आशुतोष ब्रह्मचारी एक नामालूम, गुमनाम सा पात्र था. उस के पिता राजेंद्र पांडेय शामली जिले के कांधला के थे जो बस कंडक्टर थे. उस ने साल 2022 में रामभद्राचार्य से दीक्षा ली थी और महंत आशुतोष पांडेय बन गया.

इसी आशुतोष पांडेय की रिपोर्ट पर उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ यानी जोशी मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर 21 फरवरी को पौक्सो अदालत के न्यायाधीश विनोद कुमार चौरसिया ने प्रयागराज के झूंसी पुलिस स्टेशन को आदेश दिया था कि अविमुक्तेश्वरानंद और उस के एक शिष्य मुकुंदानंद गिरी सहित 3 अज्ञात लोगों पर 2 नाबालिगों के यौनशोषण के आरोप में पौक्सो एक्ट की धाराओं 5, 6, 3, 4 (2), 16 व 17 सहित बीएनएस की धारा 351 (3) के तहत एफआईआर दर्ज की जाए. जिस का फैसला अब स्वर्ग की नहीं, बल्कि जमीन की अदालत को करना है जिस ने बीती 27 फरवरी को अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तारी से 3 सप्ताह की छूट देते सस्पैंस और गहरा दिया.

न्यायाधीश ने अपने आदेश में लिखा था कि आरोपों से गंभीर और विशिष्ट यौन उत्पीड़न का पता चलता है. बच्चों पर यौन हमलों के अपराधों, की जांच करना राज्य का वैधानिक दायित्व है. इसलिए यह अदालत इस से संतुष्ट है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173 (4) के तहत पेश आवेदन स्वीकार किए जाने योग्य है.

आशुतोष पांडेय के अनुसार, प्रयागराज में हुए माघ मेले के दौरान दोनों पीड़ित बटुक उस के पास आए और अपने यौनशोषण की कहानी सुनाई, जिस में उन्होंने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर यौनशोषण का आरोप लगाया था. इस कहानी से आशुतोष `व्यथित‘ हो गया और प्रयागराज पुलिस से संपर्क किया लेकिन कोई रिस्पौंस उसे नहीं मिला.

जब पुलिस न सुने तो सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा कर सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत भी इंसाफ मांगा जा सकता है. आशुतोष ने पुलिस कार्रवाई के लिए पौक्सो अदालत का रुख किया. अदालत ने 21 फरवरी को फैसला सुनाया. इस से पहले अदालत ने अविमुक्तेश्वरानंद से भी जवाब मांगा था जो उन्होंने दे दिया था.

यह मामला मीडिया से लोगों तक पहुंचा तो लोग दोफाड़ हो गए. उन में से एक पक्ष कह रहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खासतौर से उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पंगा नहीं लेना चाहिए था. अपने बड़बोलेपन के चलते उन्होंने मुसीबत मोल ले ली, निकल गई सारी हेकड़ी एक झटके में. 27 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सुरेंद्र कुमार सिन्हा की बैंच ने अविमुक्तेश्वरानंद की अग्रिम जमानत की याचिका पर उन्हें अंतरिम राहत दे दी, यानी, अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.

शंकराचार्य हैं भी और नहीं भी

इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि संत समाज को 2022 की ज्योतिर्मठ पीठ की गददी  अविमुक्तेश्वरानंद को देने की बात रास नहीं आई थी. सब से पहले संन्यासी अखाड़े ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया. 21 सितंबर, 2022 को स्वामी वासुदेवानंद ने अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक रोकने के लिए याचिका दायर कर 16 अक्तूबर, 2022 को स्टे ले लिया. गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने भी सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे कर कहा था कि वे अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति से असहमत हैं. तब से यह कोई नहीं समझ पा रहा या तय कर पा रहा कि वे दरअसल शंकराचार्य हैं भी या नहीं. उसी समय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने भी इस नियुक्ति का विरोध करते कहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य के पद पर नियुक्ति में प्रक्रिया और नियमों का पालन नहीं हुआ.

शंकराचार्य की नियुक्ति असल में काल्पनिक स्वर्ग के काल्पनिक कैलाश पर्वत पर बैठे कोई शिव शंकर नहीं करते बल्कि उन से डायरैक्ट कनैक्ट होने का दावा करने वाले नीचे चारों मठों के चांदी के सिंहासनों पर बैठे हाड़मांस के जीवित मानव शंकराचार्य करते हैं. किसी भी एक मठ का शंकराचार्य बनने के लिए बाकी 3 मठों के शंकराचार्यों की सहमति जरूरी होती है. गुरुशिष्य परंपरा के तहत गुरु जिस को नौमिनेट कर जाए, गद्दी उस के ही हिस्से में आती है.

एक बात जो हर कोई बेहतर जानता है कि किसी भी पीठ का शंकराचार्य बनने के लिए सब से बड़ी और अहम योग्यता उम्मीदवार का ब्राह्मण होना है. किसी गैरब्राह्मण को शंकराचार्य बनने का हक नहीं. इस के बाद की योग्यताएं हैं- उम्मीदवार का दंडधारी संन्यासी होना, आजीवन ब्रह्मचारी और वैरागी होना, सभी प्रमुख हिंदू धर्मग्रंथों मसलन वेद, पुराण, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद भागवदगीता सहित अद्वैत वेदांत और शास्त्रार्थ में महारथ हासिल होना. ये व्यवस्थाएं 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य अपने रचे ग्रंथ महानुशासनम में कर गए हैं.

उत्तराखंड में ज्योतिर्मठ पीठ बद्रीधाम के निकट है. इस के पास करोड़ों की जमीन है और जमीन के मुक़दमे मानवनिर्मित अदालतों में चल रहे हैं. एक मुकदमा मंदसौर जिले की कृषिभूमि का है जो भानपुरा अदालत में चल रहा है. 1953 से ही इस पीठ का शंकराचार्य कौन हो, इस पर विवाद चल रहा है भारतीय संविधान द्वारा नियुक्त जजों की अदालत में.

शंकराचार्य बनने की मारामारी के कई मुकदमे अदालतों में चले हैं जिन में से ज्योतिर्मठ की तो माया ही अलग है. 1953 में इस पीठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती की मौत के बाद उन की वसीयत पर 2 गुट बन गए थे जिन में से एक खुद स्वरूपानंद का गुट था तो दूसरा शांतानंद का था. यह कानूनी विवाद अभी भी लंबित है और अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद उसी का विस्तार है. एतराज जताने वाले धर्मगुरुओं की एक दलील यह भी है कि स्वरूपानंद ने अपने जिंदा रहते कभी सार्वजनिक रूप से अपना कोई वारिस घोषित नहीं किया था और अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक एकतरफा था. यह विवाद लोग भूल चले थे या यों कहें कि किसी की दिलचस्पी इस में नहीं रह गई थी लेकिन बाल यौनशोषण कांड में जो गड़े मुर्दे उखड़े उन में से एक यह भी था.

वर्ण और गाय हैं फसाद की जड़

अब कहने को ही सही, अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य हैं और अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं जो अकसर भगवा गैंग के खिलाफ होती है. चूंकि वे खुद भी भगवाधारी हैं इसलिए इस बात पर हर किसी को स्वाभाविक हैरानी होती है कि आखिर इस धर्मयुद्ध, जो अब अदालत में है, की वजह क्या है. जब सभी का मकसद हिंदू राष्ट्र और मनु स्मृति वाली वर्णव्यवस्था थोपना ही है तो मुद्ददत से खेमेबाजी और जूतमपैजार क्यों. ऐसा इसलिए क्योंकि धार्मिक लीडरी भी उतनी ही महत्त्व की होती है जितनी राजनीतिक, बिजनैस की और माफिया गैंगों की. त्रेता युग में भी विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच मतभेद थे. यह पौराणिक ग्रंथों में भी बारबार दोहराया गया है. फौरीतौर पर विश्वामित्र ही वह ऋषि थे जिन्होंने बूढ़े दशरथ से राक्षसों के खात्मे के लिए उन के टीनएजर बेटों राम और लक्ष्मण को मांगा था और फिर उन का विवाह भी करा डाला था.

विश्वामित्र-वशिष्ठ विवाद की असल वजह उन के अपने अहंकार और स्वार्थ हुआ करते थे. विश्वामित्र और वशिष्ठ का मनमुटाव और दुश्मनी की पहली वजह वर्ण थी. हिंदू वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण का कर्तव्य वेद ज्ञान, यज्ञ, तंत्रमंत्र और तपस्या वगैरह कर राजा को निर्देश और आदेश देना होता था कि वे कैसे राजकाज चलाएं. क्षत्रियों के जिम्मे शासन करना, अपने राज्य सहित तथाकथित प्रजा की रक्षा करना और सजा देना वगैरह के काम हुआ करते थे. उत्पादन और निर्माण दोनों में इन दोनों महान जातियों का कोई लेनादेना था तो पौराणिक ग्रंथों में जिक्र नहीं है. वह काम तो वैश्य और शूद्र का था.

इन दोनों वर्णों की घोषित जिम्मेदारी यह थी कि वे इन दोनों ऊपर के श्रेष्ठ वर्णों की गुलामी ढोते रहें और कभी धर्म आधारित शासन के लिए चुनौती पेश न करें. तब भी आज की तरह ग्रंथों की कहानियों के अनुसार, अकसर यह सवाल सिर उठाता रहता था कि श्रेष्ठ कौन- ब्राह्मण या क्षत्रिय. लड़ाई या विवाद इस बात को ले कर भी होते थे कि श्रेष्ठता तपस्या वगैरह से मानी जाए या ताकत और हथियार चलाने की काबिलीयत से मानी जाए और इस से भी अहम मुद्दे की बात यह कि राजा धर्म के अधीन होता है या धर्म राजा के अधीन होता है. यानी, राजा को अपने मुताबिक नचाए कौन- ब्राह्मण या क्षत्रिय.

आज भी लोचा यही है. कहानी को सहूलियत से समझने से पहले यह समझ लें कि योगी आदित्यनाथ क्षत्रिय हैं जिन की तरफ से मोरचा रामभद्राचार्य ने संभाल रखा है. यानी, यह विवाद ब्राह्मण बनाम ब्राह्मण है क्योंकि अविमुक्तेश्वरानंद भी ब्राह्मण हैं. असल लड़ाई मतभेद और मनमुटाव इन्हीं दोनों के बीच है. बाकी सब तो आशुतोष ब्रह्मचारी सरीखे सहायक पात्र भर हैं लेकिन उन की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता.

विश्वामित्र क्षत्रिय थे और वशिष्ठ ब्राह्मण थे. अव्वल तो यह एक वाक्य ही मौजूदा कहानी को समझने के लिए काफी है लेकिन इतने भर से दिलचस्पी खत्म नहीं होती बल्कि और बढ़ती है. विश्वामित्र तो मूलतया राजा थे जैसे कि आमतौर पर क्षत्रिय हुआ करते थे. कान्यकुब्ज के विश्वामित्र के पिता गाधि वहां के राजा थे, उन के बाद परिवारवाद के तहत कौशिक को गद्दी मिली. एक दिन विश्वामित्र अपने राज्य से कुछ किलोमीटर दूर शिकार करने का अपना शौक पूरा करने अयोध्या की तरफ निकल पड़े. वहां उन्हें वशिष्ठ का आश्रम दिखा. वशिष्ठ तब के पहुंचे हुए ऋषि थे जो सीधे ब्रह्मा के मन से पैदा हुए माने जाते थे. यानी, `नौनबायोलौजिकल` थे. वे सप्त ऋषियों में से एक थे.

वशिष्ठ ने विश्वामित्र सहित उन के लावलश्कर की खूब आवाभगत की. उन्हें तरहतरह के जायकेदार व्यंजन खिलाए जिसे देख कर विश्वामित्र हैरान रह गए कि एक साधारण से आश्रम के ऋषि ने चंद घंटों में हजारों सैनिकों के खानेपीने का इंतजाम कैसे कर दिया. इस का राज पूछने पर वशिष्ठ ने बताया कि उन के पास एक चमत्कारीदिव्य किस्म की अनूठी गाय नंदिनी है जिस का एक नाम कामधेनु भी है. यह गाय मांगने पर सोना, चांदी, धन, दौलत अनाज कपड़े वगैरह सब मिनटों में दे देती है. इस तरह के चमत्कार की कहानियां हर धर्म की जड़ में हैं जिन से आम लोगों को भरमाया जाता है कि हमारे कहने पर भगवान तुम्हारे लिए चमत्कार कर देंगे.

अब भला कौन राजा होता जो अपने राज्य में ऐसी अदभुद और चमत्कारी गाय को नहीं ले जाना चाहता. यही इच्छा या लालच विश्वामित्र के मन भी आया. सो, उन्होंने वशिष्ठ से वह गाय मांगी. वशिष्ठ ने कौशिक से कहा कि यह गाय आश्रम और धर्म की संपत्ति है और किसी रस्सी और खूंटे से नहीं बल्कि मेरे तपोबल से बंधी है. आप इसे नहीं ले जा सकते. हुआ वही जिस का डर था. कौशिक ने अपनी और अपनी सेना की ताकत के दम पर गाय हथियाने की कोशिश की. लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ी क्योंकि खुद कामधेनु ने, कहानी के अनुसार, अपनी तपस्या के दम पर लाखों सैनिक पैदा कर दिए थे जिन्होंने क्षत्रिय कौशिक की सेना को खदेड़ दिया.

इस तरह ब्राह्मण जीत गया और क्षत्रिय हार गया. इस हार से बेइज्ज्त और व्यथित हुए कौशिक ने ब्राह्मणत्व को बतौर चुनौती लेते हुए विश्वामित्र बनने के लिए, ब्रह्मतेज हासिल करने के लिए बेसिरपैर की पौराणिक कहानी के अनुसार हजारोंलाखों वर्षों तक तपस्या की और बाद में ब्रह्मऋषि कहलाए. उन की घनघोर तपस्या से इंद्र का सिंहासन, जो हर कभी डोलने के लिए कुख्यात था, एक बार फिर डोल उठा था. इसलिए उस ने तपस्या भंग करने को स्वर्ग की मेनका नाम की अप्सरा पृथ्वी पर भेजी थी जिस ने विश्वामित्र  की तपस्या भंग कर भी दी थी और दोनों से शकुंतला नाम की एक बेटी हुई.

कौशिक फिर तपस्या करने लगे. तपस्या के दम यानी तपोबल से विश्वामित्र इतने सिद्ध हो गए थे कि उन्होंने राम और दशरथ के एक पूर्वज त्रिशंकु के लिए एक नया स्वर्ग ही बना कर उस के सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा पूरी कर दी थी. जबकि वशिष्ठ इस के खिलाफ थे कि कोई शरीर सहित स्वर्ग जाए. इन वजहों के चलते देवताओं, जो अधिकतर ब्राह्मण ही होते थे, ने उन्हें ब्रह्मर्षि की पदवी दे दी थी लेकिन वशिष्ठ ने इसे बहुत बाद में मान्यता दी थी.

इस कहानी को गढ़ने का मकसद भले ही नएपुराने लेखक, जिन्हें टीकाकार कहा जाता है, कहानी को सत्ता, धर्म और सामाजिक संतुलन का प्रतीक बताते रहें, लेकिन हकीकत में यह ब्राह्मण को क्षत्रिय से श्रेष्ठ साबित करने लिखी गई थी. लिखने वालों ने विश्वामित्र को ब्रह्मऋषि की उपाधि दे कर यह भी जता दिया कि क्षत्रिय भी कम नहीं जो अपनी पर उतारू हो आएं तो तपस्या कर, वेदपुराण पढ़ कर ब्राह्मणत्व को हासिल कर सकते हैं. साथ ही, राजा भी बने रह सकते हैं, जैसे कि योगी आदित्यनाथ हैं.

क्या यह उसी का दोहराव है

इस पौराणिक कहानी का अविमुक्तेश्वरानंद की मौजूदा हालत से मेल देखा जाए तो कहीं न कहीं फसाद में कामधेनु गाय और वर्ण दोनों हैं. अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे यौनशोषण के आरोपों का सच जब सामने आएगा तब आएगा लेकिन इन आरोपों के चलते घरघर यह चर्चा भी रही कि वे हिंदुत्व के मद्देनजर मुद्दे तो तुक के उठा रहे थे लेकिन अब फंसे हुए हैं और निरर्थक मुकदमों में उलझे हैं. अविमुक्तेश्वरानंद ने एक नहीं, बल्कि दर्जनों बार सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि नरेंद्र मोदी और भाजपा गौरक्षा के अपने वादे और दावे से मुकरते सनातन धर्म और सनातनियों से विश्वासघात व उन की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं.

इस से कटटर सनातनियों में अच्छा मैसेज नहीं जा रहा था और भगवा गैंग खुद को असहज भी महसूस कर रहा था. क्योंकि आरोप एक शंकराचार्य लगा रहा था. अविमुक्तेश्वरानंद की इन बातों का सार यह है कि जो नेता वोट के लिए गाय की पूजा करते हैं वही सरकार चलाने के दौरान डौलर के लालच में बीफ निर्यात को बढ़ावा देने का लाइसैंस देते हैं.

घुसपैठियों के भाजपा के प्रिय मुद्दे पर उन्होंने दोटूक कहा था कि सरकार इस पर नाकाम साबित हुई है. यह उस की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता है. ऐसा कोई मुद्दा या सरकार का फैसला नहीं है जिस पर अविमुक्तेश्वरानंद ने मोदी सरकार को बख्शा हो. वक्फ संशोधन बिल को शिगूफा बताते इसे उन्होंने मुसलिमों के लिए `सौगात ए मोदी` बताया था  जिस से हिंदू समाज को कोई लाभ नहीं है.

भगवा गैंग की इमेज बिगड़ रही थी लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद को रोका कैसे जाए, यह किसी हिंदूवादी को समझ नहीं आ रहा था. हालांकि, इस से भाजपा के वोटों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा था.

मोदी ने किया मैनेज

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपनी बातों और बयानों का कोई असर न होते देख भाजपा की तरफ झुकने लगे थे जो पहले से झुकेझुकाए रामभद्राचार्य जैसे वैष्णव संतों को रास नहीं आ रहा था. क्योंकि राममंदिर की प्रतिष्ठा के मद्देनजर शैव संप्रदाय के मानने वाले शंकराचार्य भी सक्रिय हो उठे थे. 22 जनवरी, 2024 की प्राणप्रतिष्ठा के ठीक एक दिन पहले 21 जनवरी, 2024 को अविमुक्तेश्वरानंद ने मीडिया के सामने जम कर नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी तो हर कोई हैरान रह गया था कि अब यह क्या नया नाटक है जो शंकराचार्य कल तक मोदी की छीछालेदार करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे वे उन की शान में कसीदे क्यों गढ़ रहे हैं.

इस दिन अविमुक्तेश्वरानंद का कहना था कि सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से हिंदुओं का स्वाभिमान जाग गया है. यह छोटी बात नहीं है. हम ने कई बार कहा है कि हम मोदीविरोधी नहीं बल्कि मोदी के प्रशंसक हैं.

असल में इस विरोधाभास की वजह शैव और वैष्णवों की सदियों पुरानी लड़ाई और मतभेद भी थे जो सदियों पहले ही खत्म भी हो चुके थे, लेकिन कहने को ही हुए थे, राममंदिर प्राणप्रतिष्ठा के दौरान दोनों ही संप्रदायों के मठाधीश चाह रहे थे कि राजा उन्हें पूछे और पूजे, दूसरे को नहीं. जो सनातनी यह प्रचार करते फिरते हैं कि इन दोनों संप्रदायों के बीच अब कोई मतभेद नहीं हैं उन्हें अविमुक्तेश्वरानंद के इस बयान पर गौर जरूर करना चाहिए, `अगर राममंदिर रामानंद संप्रदाय का है तो इसे उन्हें सौंप देना चाहिए. चारों पीठों के शंकराचार्यों को इस से कोई रागद्वेष नहीं है. लेकिन शास्त्रसम्मत विधि का पालन किए बिना मूर्ति स्थापित किया जाना सनातनी जनता के लिए उचित नहीं है.`

दोफाड़ संत समाज

चारों पीठों के शंकराचार्यों का `राग द्वेष` खुल कर 22 जनवरी, 2024 को ही सामने आ गया था जब शादी के नाराज फूफाओं की तरह इन में से एक भी प्राणप्रतिष्ठा समारोह में उपस्थित नहीं हुआ था. इस पर जम कर वादविवाद और आरोपप्रत्यारोप संतों के बीच हुए थे. शास्त्र विधि और धर्म सम्मत न होने के शंकराचार्यों के आरोपों पर श्री रामजन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट ने दोटूक कह दिया था कि सबकुछ धर्मसम्मत है. यानी, ये शंकराचार्य सनातन धर्म के विधिविधान वगैरह नहीं जानते.

इस फूट और बैर का अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे ताजे गंभीर आरोपों से बड़ा और अहम कनैक्शन यह है कि आशुतोष ब्रह्मचारी वैष्णव संप्रदाय के संत रामभद्राचार्य का शिष्य है और इस मसले पर संत समाज ही दोफाड़ हो गया है. एक खेमा अविमुक्तेश्वरानंद को साजिश का शिकार मानता है तो दूसरा उन्हें नसीहत, जो असल में धौंस है. इन में रामभद्राचार्य का नाम अहम है जो राममंदिर की प्राणप्रतिष्ठा के बाद से ही अविमुक्तेश्वरानंद पर हमलावर रहे हैं.

विवाद माघ मेले का

इस साल का प्रयागराज का माघ मेला बेहद विवादित रहा था क्योंकि मोनी अमावस्या पर अविमुक्तेश्वरानंद की रथयात्रा को प्रशासन ने इजाजत नहीं दी थी जिस पर वे इतना भड़के थे कि 11 दिन के अनशन पर ही बैठ गए थे. उन का आरोप था कि पालकी शोभायात्रा प्रशासन ने जानबूझ कर रोकी है और उन के शिष्यों के साथ पुलिस ने मारपीट भी की है. बकौल अविमुक्तेश्वरानंद, ऐसा इतिहास में पहली बार हो रहा है कि शंकराचार्य को स्नान नहीं करने दिया जा रहा. देखते ही देखते यह मेला तमाशे में तबदील हो गया था. अविमुक्तेश्वरानंद को उम्मीद थी कि योगी आदित्यनाथ उन के विरोध के आगे घुटने टेक देंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सो, वे और खीझ उठे. इस मुद्दे पर आगलगाऊ और भड़काऊ न्यूज चैनल्स ने खूब वक्त दिया था. एनडीटीवी ने तो 22 जनवरी को एक लाइव डिबेट ही इस विषय पर प्रसारित कर दी थी जिस में रामभद्राचार्य और अविमुक्तेश्वरानंद आमनेसामने थे. इस बहस में दोनों जम कर एकदूसरे पर बरसे थे.

इस के पहले प्रशासन इस कोशिश में लगा रहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद मान जाएं लेकिन जब नहीं माने तो उन्हें यह नोटिस थमा दिया कि आप शंकराचार्य हैं ही कब, लिहाजा इस पदनाम का इस्तेमाल न करें. जैसा कि ऊपर बताया गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने न होने का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. अब लड़ाई सीधेसीधे लोकतांत्रिक दौर के वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच सिमट कर रह गई थी जिस में क्षत्रिय शासक को एक दिग्गज वैष्णव संत, जो उन्हें अपना छोटा भाई मानता है, का सहयोग और आशीर्वाद मिल गया था. इस बेमतलब की बहस की परिणति आशुतोष पांडेय द्वारा लगाए गए यौनशोषण के आरोप की शक्ल में ड्रामाई अंदाज में हुई. ये दोनों भी एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप मढ़ते रहे.

अविमुक्तेश्वरानंद इसे राजनीतिक साजिश करार देते यह कहते रहे कि यह एपस्टीन फाइल्स से जनता का ध्यान भटकाने की साजिश है. वे अपने बचाव में वकीलों सरीखी दलीलें देते रहे और आशुतोष पांडेय उन्हें पापी वगैरह कहता रहा. पीड़ित बटुकों का इंटरव्यू एक न्यूज चैनल आजतक ने प्रसारित कर दिया जिस में पीड़ित बच्चों ने खुल कर अविमुक्तेश्वरानंद और उन के शिष्यों पर यौनशोषण के आरोप लगाए. सो, हंगामा और भी बढ़ गया.

गौरतलब है कि एक वक्त में सनातनियों के धार्मिक संत करपात्री महाराज ने गौरक्षा को ले कर देशव्यापी आंदोलन छेड़ा था और देशभर के साधुसंतों का संसद तक पैदल मार्च भी करवा दिया था. 7 नवंबर, 1966 को लाखों लोगों ने संसद का घेराव किया था तब पुलिस लाठीचार्ज और गोलीबारी में लगभग 8 लोग मारे गए थे. हिंदूवादियों ने इस का जिम्मेदार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ठहराया था जिन की इमेज सनातन विरोधी बना दी गई थी. लेकिन 70 के दशक में जिस धर्मगुरु ने इंदिरा गांधी को सहारा दिया था वे स्वरूपानंद थे. वे उन धर्मगुरुओं में से थे जिन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल का खुला समर्थन किया था. तब से उन पर कांग्रेसी शंकराचार्य होने का ठप्पा लग गया था क्योंकि उन के नेहरूगांधी परिवार सहित कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं से घनिष्ठ संबंध थे.

दरअसल, भाजपा को उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी का डर अकसर सताता रहता है. हालांकि, इस के कोई तात्कालिक माने नहीं हैं. दीर्घकालिक क्या होंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा. लेकिन यह सनातनी ब्राह्मण – ब्राह्मण विवाद आसानी से थमेगा, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं क्योंकि इन दोनों ही धर्मगुरुओं की अपनी ठसक है, जिद है, अहं और अहंकार हैं जो त्रेतायुग से ही चले आ रहे हैं. लेकिन अब लोकतंत्र के चलते सब की डोर बहुसंख्यक वैश्यों और शूद्रों यानी पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के हाथ में है जिन के 80 फीसदी वोट तय करते हैं कि दिल्ली और लखनऊ की कुरसी पर कौन बैठेगा. इन दोनों वर्णों ने अगर पहले की तरह यह ठान लिया कि इन में से ही क्यों कोई बैठे, हम में से क्यों नहीं, तो तसवीर कुछ और होगी. Religious Conspiracy

 

औब्सेसिव पेरैंटिंग क्यों है खास

क्या है औब्सेसिव पेरैंटिंग (Obsessive Parenting)
औब्सेसिव पेरैंटिंग वह शैली है जिस में मातापिता बच्चे की पढ़ाई, गतिविधियों और भविष्य को ले कर अत्यधिक चिंतित रहते हैं. वे बच्चे के जीवन में हर स्तर पर गहरी सहभागिता निभाते हैं और उस से पूर्णता की अपेक्षा रखते हैं. इसी कारण इसे हैलिकौप्टर पेरैंटिंग भी कहा जाता है.

औब्सेसिव पेरैंटिंग के सकारात्मक प्रभाव
इस पेरैंटिंग शैली से बच्चों में अनुशासन, समयप्रबंधन और लक्ष्य के प्रति स्पष्टता विकसित होती है. निरंतर अभ्यास और मेहनत की आदत बच्चों में आत्मविश्वास जगाती है. मातापिता की सक्रिय भूमिका कई बार बच्चों को भटकने से रोकती है और उन की क्षमताओं को निखारने में सहायक बनती है.

नकारात्मक पक्ष की संभावनाएं
जब यह सजगता अत्यधिक नियंत्रण में बदल जाती है तो बच्चे की स्वतंत्रता बाधित होने लगती है. इस से निर्णयक्षमता और आत्मविश्वास में कमी आ सकती है. परफैक्शन की निरंतर अपेक्षा मानसिक दबाव बढ़ाती है, जिस से एंग्जायटी, डिप्रैशन तथा सामाजिक व भावनात्मक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं.

संतुलन क्यों है आवश्यक
पेरैंटिंग कब प्रेरणा बनती है और कब बोझ, इस अंतर को समझना आवश्यक है. मातापिता को बच्चों की रुचि पहचान कर मार्गदर्शक और सहायक की भूमिका निभानी चाहिए, न कि अपनी इच्छाएं थोपनी चाहिए. अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बच्चे को आत्मनिर्भर बनाता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, संतुलित मार्गदर्शन से बच्चों में आत्मनियंत्रण, जिम्मेदारी और आत्मविश्वास विकसित होता है. परवरिश का उद्देश्य केवल सफलता नहीं, बल्कि मानसिक रूप से मजबूत और खुशहाल व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए. सही दृष्टिकोण के साथ अपनाई गई औब्सेसिव पेरैंटिंग प्रेरणा बनती है वरना यह बच्चे को मानसिक रूप से पीड़ादायक भी बना सकती है. इसलिए आप बच्चे को सहीगलत में खुद फर्क समझना सिखाएं, बच्चे की काबिलीयत को समझें और उसे प्रोत्साहित करें, न कि अपनी इच्छाओं को उस पर थोपें.

 

5 राज्यों में विधानसभा चुनाव-व्यक्तिपूजा से लोकतंत्र का मुकाबला

State Elections: पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं. 9 अप्रैल से 29 अप्रैल के बीच मतदान होगा और 4 मई को मतगणना है. इन चुनावों में मुकाबले में एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए मतदाताओं से वोट मांग रहे हैं तो दूसरी तरफ विपक्षी दल अलगअलग रणनीति बना कर मुकाबला कर रहे हैं. भाजपा के पास न केवल चुनाव लड़ने के साधन अधिक हैं बल्कि केंद्र सरकार में होने का मनोवैज्ञानिक लाभ भी उस के पास है.

प्रधानमंत्री के अंगूठे के नीचे काम करते चुनाव आयोग और दूसरी केंद्रीय संस्थाओं पर केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम करने के आरोप विपक्षी दल लगातार लगा रहे हैं. एसआईआर इस में एक प्रमुख मुद्दा है जिस के जरिए ऊपर से तो वोटर लिस्ट में सुधार की बात की जा रही है जबकि इस आड़ में विपक्षियों के समर्थक वोटरों के नाम वोटरलिस्ट से हटाए जा रहे हैं, ऐसा आरोप विपक्षी दल लगा रहे हैं.
5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी का भारीभरकम अमला है. व्यक्तिपूजा के नाम पर प्रधानमंत्री का चेहरा है. प्रधानमंत्री जब चुनावप्रचार करने जाते हैं तो उन के साथ भारीभरकम अमला चलता है. जिस का खर्च प्रतियात्रा 3 से 5 करोड़ रुपए के बीच आता है. यहां एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का अपनी पार्टी के लिए चुनावप्रचार करना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है.

देश का संविधान आम नागरिक और किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति को एकजैसा अधिकार देता है. ऐसे में भाजपा का सदस्य होने के नाते प्रधानमंत्री को चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचार करने का अधिकार देता है. यहां इस बात को ले कर एक शर्त रखी गई है. इस के अनुसार प्रधानमंत्री अपने पद और ताकत का इस्तेमाल कर के चुनावप्रचार करेंगे तो यह बात नियम के अनुसार नहीं है. चुनावप्रचार में प्रधानमंत्री सरकारी संपत्ति का प्रयोग नहीं कर सकते. इस का मतलब यह है कि सरकारी खर्च पर प्रचार नहीं होगा, लेकिन, ऐसा हो नहीं रहा.

चुनाव के दौरान सरकार नई योजनाओं की घोषणा, नए प्रोजैक्ट या पैसे की घोषणा नहीं कर सकती. सरकारी कार्यक्रमों में चुनावप्रचार नहीं कर सकते. सरकारी नियमकानूनों के उलट हर चुनाव में चुनाव की इस व्यवस्था का अनादर होता है. इस से पहले भी महाराष्ट्र, बिहार और हरियाणा विधानसभा चुनाव के ठीक पहले केंद्र सरकार ने कई योजनाओं के जरिए वोटरों को पैसा भेजा था जिस का सीधा असर चुनावों पर पड़ा.
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा में यही होगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता. भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का सहारा ले कर चुनावप्रचार करेगी.

लोकसभा चुनाव के पहले बदल दिया था नियम
2024 के लोकसभा चुनाव के पहले जनता को यह अधिकार था कि वह चुनाव संचालन नियम 1961 के नियम 93(2) (अ) के तहत चुनाव से संबंधित अन्य सभी कागजात सार्वजनिक रूप से दिखाने की मांग कर सकती थी. मोदी सरकार ने इस में बदलाव कर दिया. इस बदलाव से चुनावी नियमों के अलगअलग प्रावधानों के तहत केवल चुनावी पत्र (जैसे नामांकन पत्र आदि) ही सार्वजनिक जांच के लिए खुले रहेंगे.
उम्मीदवारों के लिए फौर्म 17-सी जैसे दस्तावेज उपलब्ध रहेंगे लेकिन चुनाव से संबंधित इलैक्ट्रौनिक रिकौर्ड और सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं रहेंगे. इस के पक्ष में सरकार ने यह बहाना बनाया कि मतदान केंद्र के अंदर सीसीटीवी फुटेज के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियम में संशोधन किया गया है. सीसीटीवी फुटेज साझा करने से विशेष रूप से जम्मूकश्मीर, नक्सल प्रभावित जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जहां गोपनीयता महत्त्वपूर्ण है. मतदाताओं की जान भी जोखिम में पड़ सकती है.

इस नियम में संशोधन से पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 9 दिसंबर, 2023 को चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह वकील महमूद प्राचा को हरियाणा विधानसभा चुनाव से संबंधित आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए. महमूद प्राचा ने हरियाणा विधानसभा चुनाव से संबंधित वीडियोग्राफी, सीसीटीवी फुटेज और फौर्म 17-सी की प्रतियां उपलब्ध कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि रिटर्निंग औफिसर के लिए जारी हैंडबुक में यह प्रावधान है कि उम्मीदवार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आवेदन किए जाने पर ऐसी वीडियोग्राफी उपलब्ध कराई जानी चाहिए.

याचिका का विरोध करते हुए चुनाव आयोग के वकील ने कोर्ट में कहा था कि प्राचा न तो हरियाणा के निवासी हैं और न ही उन्होंने किसी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा है. ऐसे में उन की मांग सही नहीं है. प्राचा की तरफ से कहा गया था कि चुनाव संचालन नियम 1961 के मुताबिक, उम्मीदवार और दूसरे व्यक्ति के बीच यह अंतर है कि उम्मीदवार को दस्तावेज निशुल्क दिए जाते हैं जबकि किसी अन्य व्यक्ति को इस के लिए एक निर्धारित शुल्क देना होगा. प्राचा के वकील ने कहा था कि वो निर्धारित शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार और इच्छुक हैं.

इस मामले में जस्टिस विनोद एस भारद्वाज ने कहा था कि चुनाव आयोग 6 सप्ताह के भीतर आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए. इस आदेश के 2 हफ्ते के भीतर केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग की सिफारिश को लागू कर दिया. जिस से मतदान के वीडियो देने की कानूनी शर्त खत्म हो जाए. इस संशोधन के बाद चुनाव आयोग की कार्यशैली पर एक और सवाल खड़ा हो गया. हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि याचिकाकर्ता को संबंधित डेटा दे दीजिए और इस आदेश के कुछ दिनों बाद कानून में यह संशोधन किया गया.

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भी चुनाव आयोग आरोपों और विवादों के केंद्र में था. तब चुनाव आयोग पर मतदान संबंधी आंकड़ों को देरी से जारी करने का आरोप लगा था. एक विवाद वोटिंग प्रतिशत को ले कर भी था. लोकसभा चुनाव में कुल वोटों की संख्या के बजाय वोटिंग प्रतिशत जारी किया गया. इस के अलावा ईवीएम और पोस्टल बैलेट से जुड़े सवाल भी लगातार उठते रहते हैं. चुनाव आयोग के ऐसे फैसलों से उस के प्रति लोगों का भरोसा कम हो रहा है.
चुनाव आयोग को रिप्रैजेंटेशन औफ पीपल एक्ट के तहत काम करना चाहिए लेकिन कई मौके ऐसे आए जब वो इस के तहत काम करते हुए नहीं दिखा. जब सीसीटीवी फुटेज है और चुनाव आयोग ने उसे जारी नहीं किया तो स्वाभाविक है कि लोगों के मन में संदेह पैदा हुआ. लोगों ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल जरूर उठाने शुरू कर दिए.

5 राज्यों के विधान सभा चुनाव
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में टीएससी यानी तृणमूल कांग्रेस की सरकार है. ममता बनर्जी वहां मुख्यमंत्री हैं. वहां मुख्य मुकाबला भाजपा और टीएमसी के बीच है. वहां विधानसभा की 294 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 215 और भाजपा को 77 सीटें मिली थी. ममता बनर्जी लगातार 3 बार से मुख्यमंत्री हैं. असम में भाजपा के हिमंत सरमा मुख्यमंत्री है. वहां विधानसभा की 126 सीटें हैं. 2021 के चुनाव में भाजपा को 60 सीटें मिली थीं. मुख्य विपक्षी कांग्रेस को वहां 29 सीटें ही मिली थीं. भाजपा के हिमंत सरमा लगातार दो बार से चुनाव जीत रहे हैं.

केरल में एलडीएफ की सरकार है. वहां के मुख्यमंत्री पी विजयन है. वहां का मुख्य मुकाबला कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ से है. मुख्यमंत्री पी विजयन लगातार 2 बार से मुख्यमंत्री हैं. भाजपा वहां तीसरे नंबर की पार्टी के रूप में है. भाजपा को वहां खाता खोलना बाकी है. केरल में कुल 140 सीटे हैं. 2021 के चुनाव में एलडीएफ को 99 और यूडीएफ को 41 सीटें मिली थीं.
तमिलनाडु में 8 दलों की अगुआई वाले द्रमुक पार्टी के नेता एम के स्टालिन मुख्यमंत्री हैं. वहां मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक है. भाजपा वहां भी केवल तमाशाई ही है. केरल में विधानसभा की 234 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक को 159 सीटें मिली थीं और अन्नाद्रमुक को 75 सीटें ही मिली थीं. चुनाव के समय दलबदल के जरिए एम के स्टालिन वापस सत्ता में आना चाहते हैं. इस चुनाव में अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कशगम यानी टीवीके तीसरी ताकत बन कर उभरी है. भाजपा अभिनेता विजय के साथ गठबंधन कर के कुछ उलटफेर करना चाहती है.

30 विधानसभा सीटों वाली पुडुचेरी में 2021 के विधानसभा चुनाव में एनडीए और कांग्रेस के बीच मुकाबला है. पिछले चुनाव में एनडीए को 16 सीटें मिली थी. एन रंगास्वामी मुख्यमंत्री बने थे. कांग्रेस के गठबंधन यूडीएफ को 9 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में कांग्रेस इस राज्य को जीतने का प्रयास करेगी. 5 राज्यों के चुनाव में सब से अधिक दिलचस्पी पश्चिम बंगाल और असम को ले कर है. कांग्रेस और भाजपा का आमनेसामने मुकाबला असम और पुडुचेरी में ही है. पश्चिम बंगाल में भाजपा और टीएमसी मुकाबले में हैं. भाजपा दक्षिण भारत के राज्यों में अपना खाता खोलने का प्रयास करेगी.
भाजपा के पास नरेंद्र मोदी का ही प्रमुख चेहरा है, जिन के जरिए वह चुनाव जीतना चाहती है. केंद्र सरकार अपनी योजनाओं के जरिए प्रदेश की जनता को प्रभावित करना चाहती है. यहीं से चुनाव का मुकाबला बराबरी का नहीं रह जाता. लैवल प्लेइंग फील्ड न होने से लोकतंत्र खतरे में पड़ रहा है, जिस का असर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता ही है.

युवाओं को भा रहीं बड़ी उम्र की महिलाएं

Youth Trend : लड़कियां कैरियर बनाने के चक्कर में देरी से शादी कर रही हैं. इस वजह से 35-40 वर्ष की कुंआरी लड़कियों की तादाद बढ़ी है. वहीं, युवाओं का उम्र में बड़ी महिलाओं की ओर आकर्षण एक ट्रैंड बनता जा रहा है. यह ट्रैंड सिर्फ बौलीवुड या हौलीवुड की फिल्मों तक सीमित नहीं है बल्कि आम जीवन में भी देखा जा रहा है. सवाल यह है कि आखिर क्यों युवाओं को अपने से उम्र में बड़ी महिलाएं भा रही हैं?

पुराने समय में उम्र के फासले मायने नहीं रखते थे. 10-12 साल की लड़की अपने से काफी बड़े उम्र के मर्द से ब्याह दी जाती थी. यह परंपरा सभी धर्मों में मौजूद थी. लड़का किसी भी उम्र का हो, लड़की उम्र में उस से छोटी होनी चाहिए. समाज की इस मानसिकता के कारण लड़कियां समझदार होने से पहले ही पत्नी, मां, भाभी, बहू, ननद या सौतन बन जाती थीं. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 लागू होने के बाद मर्दों के लिए एक से ज्यादा शादी और लड़कियों की कम उम्र में शादी यानी बाल विवाह पर रोक लगी. हालांकि, आज भी भारत के ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं मौजूद हैं जिन का खमियाजा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है.

शहरों और कसबों में हालात कुछ हद तक बदल चुके हैं. लड़कियां पढ़ रही हैं, जौब कर रही हैं और सब से बड़ी बात यह कि वे अपनी मरजी से शादी कर रही हैं. वो जमाना बीत गया जब 15 साल में लड़की के हाथ पीले करने का रिवाज था. आज शहरों में 25 से 30 साल तक की लड़कियां कुआंरी हैं वह भी अपनी मरजी से.

गीता और निखिल दोनों भारतीय इंफ्लुएंसर हैं. यह कपल 2025 में इंस्टाग्राम रील्स पर वायरल हुआ. गीता अपने प्रेमी निखिल से उम्र में काफी बड़ी है. मर्द बड़ा हो तो ठीक, औरत बड़ी हो तो प्रौब्लम क्यों? दोनों ने सोसाइटी के इसी डबल स्टैंडडर्स को चुनौती दी है. गीता और निखिल की ये बातें टिकटौक और इंस्टाग्राम पर ट्रैंड हुईं. वे ‘एज गैप कपल औफ इंडिया’ के नाम से फेमस हैं और गूगल पर मोस्ट सर्च्ड हैं.

निक जोन्स और प्रियंका चोपड़ा की उम्र का अंतर कुछ भी नहीं है. हाल में 25 से 30 साल के युवा और बड़ी उम्र की महिलाओं के बीच अफेयर या शादियों की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं. इन में चेर और अलेक्जेंडर ऐसी वाइरल जोड़ी बन गई जिस में उम्र का फर्क 40 साल का है. चेर 79 साल की हैं तो अलेक्जेंडर 39 साल के हैं.
कृति सेनन और कबीर बहिया में उम्र का फर्क 9 साल है. कृति 35 साल की हैं तो कबीर 26 साल के. बौलीवुड ऐक्ट्रैस कृति सेनन की 2025 में यूके बेस्ड बिजनैसमैन कबीर बहिया के साथ डेटिंग की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं. यह बौलीवुड में ओल्डर वुमन यंगर मैन का ताजा केस है.
वर्ष 2024 में ट्विटर पर एक स्टोरी वायरल हुई जिस में 66 साल की एक महिला ने 40 साल के अपने पति को छोड़ कर 27 साल के युवक से रिलेशनशिप शुरू की. इस पोस्ट को हजारों लाइक्स और कमैंट्स मिले और यह सोशल मीडिया पर ‘एज गैप लव’ का खूबसूरत उदाहरण बन गया. यह आम लोगों का केस है जो ग्लोबल ट्रैंड बन गया.

भारत में भी बदल रहा नजरिया
भारत में मर्द हमेशा ही औरतों से धन, रुतबा और उम्र में बड़ा होता है, यह पुरुषवादी समाज की सांस्कृतिक विरासत है ताकि औरतें हमेशा दब कर रहें. अब जबकि औरतों को आजादी मिलनी शुरू हुई है, पितृसत्ता की परंपराएं टूट रही हैं. बड़ी उम्र की औरतों से इश्क या शादी का ट्रैंड नया है, जो बढ़ रहा है. शहर के मिलेनियल्स और जेनजी वाली दोनों पीढ़ियां पिछली टिपिकल पीढ़ियों से काफी अलग हैं. ये पीढ़ियां परंपराओं की परवा नहीं करतीं.
ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में सोशल मीडिया ने दुनियाभर के युवाओं को नया कल्चर दिया है. इस नए कल्चर में पुरानी तहजीबें दम तोड़ रही हैं. बड़ी उम्र की महिलाएं इकोनौमिकली ज्यादा स्वतंत्र होती हैं, इस से नौजवान लड़कों को बराबरी का एहसास मिलता है. बड़ी उम्र की औरतें अब सिर्फ घरेलू नहीं बल्कि कैरियरओरिएंटेड हैं, यह बात युवाओं को प्रेरित करती है.
नौजवान लड़के कैरियर की शुरुआत में होते हैं जहां वे कई तरह की इनसिक्योरिटी से जूझते हैं. बड़ी उम्र की औरतें कैरियर के मामले में सैटल्ड होती हैं. इस से युवाओं को कान्फिडैंस मिलता है. एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसी जोड़ियां ज्यादा सफल होती हैं क्योंकि 10- 15 साल बड़ी होने के कारण औरतें रिश्तों को ले कर ज्यादा ईमानदार और गंभीर होती हैं. ऐसे रिश्तों की सफलता में आर्थिक स्वतंत्रता भी एक बड़ा फैक्टर है. बड़ी उम्र की औरतें अपने से कम उम्र के साथी को बिना दबाव के बढ़ने का मौका देती हैं. ऐसे रिश्तों में दोनों के बीच बेहतर संवाद होता है. जलन या मनमुटाव की नौबत नहीं आती और एकदूजे के प्रति सम्मान बना रहता है.

‘एज गैप रिलेशनशिप’ के पीछे का मनोविज्ञान
मनोविज्ञान के अनुसार नौजवान लड़कों का उम्र में बड़ी औरतों की ओर झुकाव होने के कई कारण हैं. जवान होती लड़कियों की तुलना में बड़ी उम्र की औरतें जीवन के उतारचढ़ावों से गुजर चुकी होती हैं. नौजवन लड़के ऐसी औरतों को पसंद करते हैं जो कम ड्रामा वाली होती हैं और रिश्तों में समझदारी से काम लेती हैं.
फ्रायड के ओडिपस कौम्पलैक्स थ्योरी के अनुसार, कुछ नौजवानों को मां जैसी सिक्योरिटी और ममता की फीलिंग्स आकर्षित करती है जो उन्हें बड़ी उम्र की औरतों में नजर आती है. इस के अलावा, बड़ी उम्र की औरतें सैक्स के मामले में ज्यादा अनुभवी होती हैं, यह बात भी युवाओं के अट्रैक्शन की बड़ी वजह है. यह आकर्षण सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी होता है. बड़ी उम्र की औरतें समस्याओं को बेहतर तरीके से सुलझा सकती हैं.
न्यूयौर्क प्रैस्बिटेरियन हौस्पिटल में एसोसिएट प्रोफैसर डा. गेल साल्ट्ज ऐसे रिश्तों की साइकोलौजी के बारे में सोशल मीडिया के जरिए लोगों से खुल कर बात करती हैं. उम्र के फासले वाले रिश्तों पर वो कहती हैं, “उम्र के अंतर से प्यार में कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन कई बार बच्चों की चाहत के मामले में ऐसे रिश्ते मुश्किल का सामना करते हैं. नौजवान लड़कों को बड़ी उम्र की औरतों के साथ इमोशनल बौन्डिंग तो मजबूत होती है लेकिन दोनों को कई बार व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.”
डा. रामानी दूर्वासूला, जिन के यूट्यूब पर लाखों सब्सक्राइबर्स हैं, रिलेशनशिप डायनैमिक्स पर अकसर बातें करती हैं. एज गैप अट्रैक्शन पर वे कहती हैं कि रिलेशनशिप्स में एज गैप्स अकसर इमोशनल मैच्योरिटी के साथ चलते हैं.
आकाश हैल्थकेयर की एसोसिएट कंसल्टैंट, साइकियाट्री, डा. पवित्रा शंकर कहती हैं, “यह कोई हैरानी की बात नहीं बल्कि एक बेहद सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है. इस अट्रैक्शन का सब से बड़ा कारण महिलाओं की इमोशनल मैच्योरिटी और उन के जीवन का गहरा अनुभव होता है. बड़ी उम्र की महिलाएं अकसर कौन्फिडैंस से भरी होती हैं और जीवन को ले कर उन की सोच बेहद साफ होती है. वे रिश्तों को बहुत ही प्रैक्टिकल नजरिए से संभालती हैं. महिलाओं की यही समझदारी युवा पुरुषों को रिश्ते में स्थिरता और एक बेहतर समझ का एहसास दिलाती है.”

ऐसे रिश्तों का भविष्य क्या
भारत में शादी के मामले में लड़की से लड़का औसतन 5 साल बड़ा होता है लेकिन जहां लड़की लड़के से 5-10 साल ज्यादा बड़ी होती है, वैसे रिश्ते परिवार और समाज एक्सैप्ट नहीं कर पाते. फिर भी, हालिया ट्रैंड्स को देखें तो जेनब्लैंड रिलेशनशिप्स यानी जिन में एज गैप ज्यादा होता है, ऐसे रिश्तों को 80 प्रतिशत से ज्यादा युवा अब पुरानी सोच मानते हैं. कई केसेज में ये रिश्ते लंबे चलते हैं खासकर अगर दोनों पार्टनर मैच्योर हों.
एक अध्ययन के अनुसार, 10 साल से ज्यादा एज गैप वाली महिलाएं अपने रिश्तों में ज्यादा सैटिसफाई और कमिटैड महसूस करती हैं क्योंकि वहां पावर बैलेंस बराबर होता है. 33 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि फैमिली और फ्रैंड्स के जजमैंट ऐसे रिश्तों को मुश्किल बना देते हैं. अगर बच्चे चाहिए तो फर्टिलिटी इश्यू भी एक बड़ी समस्या होती है क्योंकि बड़ी उम्र की महिलाओं में प्रैग्नैंसी रिस्क ज्यादा होता है. अगर एज गैप बहुत बड़ा हो तो हैल्थ इश्यू या लाइफस्टेज डिफरैंस से ब्रेकअप का रिस्क बढ़ जाता है. भारत में जहां मैरिज कल्चर आज भी स्ट्रौंग है, ये रिश्ते 74 फीसदी मामलों में समय के साथ कमजोर पड़ने लगते हैं.

मेनोपौज के बाद भी क्या ये रिश्ते कायम रहते हैं
आमतौर पर 45 से 55 साल के बीच औरतों का मेनोपौज हो जाता है. इस से रिश्तों में फिजिकल और इमोशनल बदलाव आना स्वाभाविक होता है. 50 साल की किसी महिला का पार्टनर अगर उस से 5 साल छोटा यानी 45 वर्ष का है तो वह औरत के मेनोपौज के बाद अकेलापन महसूस करने लगता है.
50 वर्ष की उम्र में औरतों की सैक्स डिजायर कम होने लगती है तो 45 की उम्र के मर्दों में सैक्स की चाहत प्रबल ही रहती है. दोनों के बीच कितनी भी अंडरस्टैंडिंग क्यों न हो, बात जब फिजिकल रिश्तों में कमजोरी की हो तो दोनों के बीच के रिश्तों में दरारें पड़नी आम बात होती है. मेनोपौज के साथ ही मूड स्विंग्स, हौट फ्लशेस और सैक्शुअल डिजायर में कमी आनी शुरू हो जाती है और इस का असर रिश्तों पर पड़ता है.
हालांकि, एक हालिया स्टडी में पाया गया कि अगर पार्टनर 7 से 10 साल छोटा हो तो औरत के मेनोपौज सिम्पटम्स 54 प्रतिशत तक कम होते हैं और सैक्शुअल फंक्शनिंग अराउजल और डिजायर 84 प्रतिशत तक बेहतर रहते हैं. कई मामलों में जवान पार्टनर की एनर्जी और इमोशनल सपोर्ट से औरत ज्यादा ऐक्टिव और संतुष्ट रहती है लेकिन यह संतुष्टि और डिजायर उम्र के साथ कमजोर पड़ने लगता है.
मेनोपौज से इंटिमेसी फीकी पड़ जाती है. वैजाइनल ड्राइनैस और लो लिबीडो की समस्या बढ़ने लगती है. कुल मिला कर बात यह है कि मेनोपौज के बाद दोनों के बीच कितना भी अच्छा कम्युनिकेशन, इमोशनल इक्विटी और म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग हो, रिश्ते पहले जैसे नहीं रह पाते. सो, ऐसे रिश्ते शुरुआत में तो काफी खूबसूरत लगते हैं लेकिन ये ताउम्र की बौन्डिंग बन जाएं, जरूरी नहीं.

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