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डिजिटल युग में खत्म होता बचपन

Digital Impact on Children :

डिजिटल युग में बचपन : आजादी, दबाव और दिशाहीनता

फरवरी में देश के अलगअलग शहरों में बच्चों से जुड़ी तीन ऐसी सनसनीखेज घटनाएं हुईं जिन्होंने न सिर्फ पेरैंटिंग पर सवालिया निशान जड़ दिया, बल्कि बढ़ती तकनीक, पैसा और बच्चों को मिलने वाली आजादी को कठघरे में खड़ा भी कर दिया है.

तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के साहिबाबाद में टीला मोड़ क्षेत्र की भारत सिटी सोसायटी में तीन नाबालिग बच्चियों- निशिका 16 साल, प्राची 14 साल, पाखी 12 साल ने रात के ढाई बजे बिल्डिंग की 9वीं मंजिल की बालकनी से एकसाथ छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली. तीनों बहनें एक कोरियन गेमिंग ऐप की आदी थीं. वे औनलाइन टास्कबेस्ड कोरियन लवर गेम खेलती थीं. पुलिस जांच में पता चला कि तीनों बहनों को कोरियाई गेम खेलने की लत थी और उन के परिजन तीनों को गेम खेलने से मना करते थे. इस से तीनों बहनें परिजनों से नाराज थीं. वे भावनात्मक तनाव में थीं और इसी के चलते उन्होंने ऐसा खौफनाक कदम उठाया.

ये तीनों बहनें कोरियन स्टार्स के प्रति भावनात्मक रूप से इतना समर्पित थीं कि उन के खिलाफ कुछ भलाबुरा सुनना उन्हें रास नहीं आता था. अपने पसंदीदा स्टार्स के रहनसहन से ले कर लाइफस्टाइल, पहनावा और हेयरस्टाइल भी तीनों ने कौपी किया था. यही नहीं, उन्होंने अपने नाम मारिया, एलिजा व सिंडी रख लिए थे. तीनों अपनी 3 साल की छोटी बहन देव्यांशी उर्फ देवु को भी कोरियन लवर बनाना चाहती थीं. इस बात को ले कर उन्हें मार भी पड़ी और 15 दिन पहले पिता ने उन का मोबाइल फोन छीन कर बेच दिया. इस से तीनों गुस्से और तनाव से भर गईं. आत्महत्या से पहले लिखा गया उन का 8 पेज का सुसाइड नोट कोरियन स्टार्स के प्रति इन नाबालिग लड़कियों की दीवानगी की इंतहा और पारिवारिक परिस्थितियों को बयां करता है. बेटियों ने लिखा, “सौरी पापा, हम गेम नहीं छोड़ सके. कोरियन गेम हमारी जिंदगी, हमारी जान है.”

बच्चियों के पिता चेतन का कहना है- वे 3 साल से गेम खेल रही थीं. आर्थिक तंगी के कारण 2 साल से इन का स्कूल छूटा हुआ था. वे ज्यादातर घर में अपने कमरे में रहती थीं और टीवी या मोबाइल देखती थीं. हमें अंदाजा नहीं था कि वे इस गेम में इतनी ज्यादा डूब चुकी हैं. वे मुझ से कहती थीं कि वे कोरिया जाना चाहती हैं.

चेतन कहते हैं, “मेरी बच्चियों के साथ बहुत बुरा हुआ. कोई भी मांबाप अपने बच्चों को मोबाइल गेम न खेलने दे. गेम में कौन सा टास्क दिया जा रहा है, इस का पता मांबाप को नहीं चलता. अगर मुझे पता होता कि किस तरह के टास्क दिए जा रहे हैं तो हम उन्हें गेम खेलने ही न देते.

चेतन कर्ज में डूबे हुए थे, इसलिए उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई पर ज्यादा जोर नहीं दिया और बारबार फेल होने पर उन का स्कूल छुड़वा दिया. वे प्लान कर रहे थे कि जब आर्थिक स्थिति सुधरेगी, तब दोबारा एडमिशन करवा देंगे.

कोविड के दौरान तीनों लड़कियां कईकई घंटे कोरियन म्यूजिक सुनती थीं. साथ ही, फिल्में, वैब सीरीज और वीडियो देखती रहती थीं. उन के नाजुक दिमाग पर कोरियन कल्चर का इतना असर हुआ कि वो खुद को भारतीय की जगह कोरियन मानने लगी थीं.

Digital Impact on Children (2)
गाजियाबाद की 3 बहनों की एकसाथ आत्महत्या यह सोचने पर मजबूर करती है कि बच्चों को तकनीक की दुनिया में पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ देना सही नहीं है.

यह घटना कई स्तरों पर गहरी चेतावनी देती है. इसे सिर्फ ‘मोबाइल गेम’ या ‘कोरियन कल्चर’ के असर तक सीमित कर के समझना अधूरा होगा. यह एक जटिल पारिवारिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक त्रासदी का उदाहरण है. यह डिजिटल लत का खतरनाक रूप है जिस में बच्चे लगातार कईकई घंटे गेम/कंटैंट में डूबे रहते हैं, जिस के चलते नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, भावनात्मक अस्थिरता पैदा होती है. यही नहीं, वे आभासी दुनिया को वास्तविक जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण मानने लगते हैं. यह बताता है कि डिजिटल प्लेटफौर्म्स बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं, खासकर, जब उन का उपयोग अनियंत्रित और निगरानीरहित हो.

परिवार का अलगाव वाला माहौल

परिवार के सदस्यों के बीच संवाद की कमी, खासकर बच्चों से उन की इच्छा, जिज्ञासा, विचार आदि पर कोईबात न होना, भावनात्मक अलगाव की स्थिति पैदा करती है और उन के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करती है. इस से बच्चों में परिवार से नाराजगी, हताशा, ‘हमें कोई नहीं समझता’ जैसी भावना पैदा होती है. उन के लिए अपनी पहचान का संकट सामने आता है.

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो आज के डिजिटल युग में नाबालिगों में अवसाद, एंग्जायटी और आवेग बहुत तेजी से विकसित हो रहा है और इस की वजह है- हर वक्त सोशल मीडिया से जुड़े रहना, किताबों, अखबारों, पत्रिकाओं को न पढ़ना व समाज और देश में क्या हो रहा है, इस से अनभिज्ञ रहना, न सिर्फ बच्चे बल्कि मातापिता भी.

जिन घरों में अलमारियां किताबों से भरी हैं, परिवार के सदस्यों को पढ़नेलिखने का शौक है, वहां बच्चों में भी पढ़ने, सीखने, समझने और विचारों को व्यक्त करने क्षमता विकसित होती है. ऐसे घरों में तनाव, अवसाद, लड़ाईझगड़े, पलायनवादी विचार, जिद्द, क्षोभ जैसी नकारत्मक चीजें नहीं होतीं.

किशोरावस्था में रोलमौडल्स का प्रभाव सामान्य है, पर ये रोल मौडल्स वास्तविक होने चाहिए, न कि, इंटरनैट की दुनिया के आभासी. जब वास्तविक जीवन निराशाजनक लगे तो आभासी पहचान ज्यादा आकर्षक लगने लगती है. आज के समय में डिजिटल साक्षरता की जरूरत अवश्य है मगर मांबाप द्वारा इस पर नियंत्रण भी जरूरी है.

बच्चों से सिर्फ ‘मत खेलो’ कहना पर्याप्त नहीं है. उन्हें समझना, उन के साथ बैठना, सीमाएं तय करना भी जरूरी है. बच्चों के व्यवहार में बदलाव को गंभीर संकेत मानना चाहिए. डांट/मार के बजाय खुली बातचीत अधिक प्रभावी होती है. स्कूल और सामाजिक जुड़ाव बच्चों के लिए आवश्यक हैं. शिक्षा सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि यह पहचान, आत्मविश्वास और सामाजिक संतुलन भी देती है.

क्लास में गोलीकांड

9 फरवरी को पंजाब के तरनतारन जिले के उस्मा गांव में एक ला कालेज में दिल दहला देने वाली घटना हुई. एक ला स्टूडैंट ने अपने कालेज की छात्रा संदीप कौर के सिर में गोली मार कर उस की हत्या कर दी और उस के बाद उस ने वहीं अपने भी सिर से पिस्तौल सटाई व अपनी भी इहलीला समाप्त कर ली. पूरे कालेज सहित शहरभर में दहशत फैल गई. ऐसी घटनाएं अभी तक अमेरिका, कनाडा जैसे देशों से आती थीं कि स्टूडैंट्स स्कूलकालेज में असलहा ले कर आ गए और अंधाधुंध फायरिंग कर दी. मगर पंजाब में उसी तरह की घटना ने भारतीय बच्चों में बढ़ रहे गुस्से, तनाव, अपने ऊपर खो रहे नियंत्रण, भावुकता और अवसाद का मिलाजुला रूप सामने ला दिया है.

पढ़नेलिखने में अपना समय देने के बजाय बच्चे अपराध के रास्ते पर बढ़ रहे हैं. इस के पीछे वजहें हैं- परिवार द्वारा बच्चों की अनदेखी, उन के साथ संवाद की कमी, उन को भरपूर पौकेट मनी और उस पौकेट मनी का गलत चीजों को खरीदने में इस्तेमाल होना आदि.

इस घटना के पीछे एकतरफा प्यार की दास्तान थी जहां गोली मारने वाले छात्र को छात्रा से प्यार था. मगर छात्रा ने उस से कहा कि उस की शादी तय हो गई है इसलिए अब वह उस से नहीं मिलेगी. इस बात ने छात्र को इतना उद्वेलित कर दिया कि वह असलहा ले कर क्लास में पहुंच गया और सभी स्टूडैंट्स के सामने उस ने संदीप कौर के सिर में गोली मार दी और अगले ही क्षण खुद को भी गोली से उड़ा लिया.

अब पुलिस जांच कर रही है कि छात्र वह पिस्टल कहां से लाया था? पुलिस यह भी चैक कर रही है कि कहीं उस के पिता के पास लाइसैंसी पिस्टल तो नहीं है? अगर ऐसा न हुआ तो फिर यह पिस्टल अवैध है जो और भी बड़े क्राइम की ओर इशारा करती है.

रईसजादे का सड़क पर आतंक

8 फरवरी को कानपुर में नशे में धुत एक रईसजादे शिवम मिश्रा ने अपनी 12 करोड़ रुपए की लेम्बोर्गिनी कार से 6 लोगों को रौंद डाला और थाने में बाकी घायलों से उस के बौडीगार्ड्स ने मारपीट की. पहले उस ने अपनी लग्जरी कार से एक बुलेट को जोरदार टक्कर मारी, जिस पर तीन लोग सवार थे. टक्कर मारने के बाद गाड़ी रोकने के बजाय शिवम मिश्रा ने मौके से भागने की कोशिश की, जिस से अन्य लोग भी उस की चपेट में आ गए. इस के बाद कार अनियंत्रित हो कर सीधे डिवाइडर में जा घुसी.

शिवम मिश्रा कानपुर के एक बड़े तंबाकू कारोबारी के के मिश्रा का बेटा है. पैसे का गरूर उस के सिर चढ़ कर बोलता है. इसी गरूर के चलते यह घटना हुई. इस घटना के बाद बजाय इस के कि वह अपना अपराध कुबूल करता, उस के रईस पिता ने अपने ड्राइवर को इस घटना का जिम्मेदार बता कर बेटे का बचाव करना चाहा. शिवम के पिता और वकील ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि गाड़ी ड्राइवर चला रहा था. मोहन नाम के व्यक्ति ने कोर्ट में एफिडेविट भी दिया कि वह गाड़ी चला रहा था. हालांकि पुलिस जांच, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट ने उस की बात नहीं मानी और 12 फरवरी को शिवम को पुलिस ने गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया.

फरवरी की ये तीनों घटनाएं- गाजियाबाद में तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या, पंजाब में कालेज परिसर में गोलीकांड, और उत्तर प्रदेश के कानपुर में रईसजादे की लापरवाह ड्राइविंग सिर्फ सनसनीखेज खबरें नहीं हैं; ये हमारे समय की बेचैन सामाजिक सच्चाइयों का आईना हैं. इन का दर्द अलगअलग है लेकिन इन के धागे कहीं न कहीं एकदूसरे से जुड़ते हैं. बदलती जीवनशैली, तकनीक का अनियंत्रित प्रभाव, पारिवारिक संवाद का क्षरण और जिम्मेदारी के स्थान पर सुविधा व दिखावे की संस्कृति ने बच्चों को जकड़ लिया है.

ये तीनों घटनाएं बदलते सामाजिकडिजिटल परिवेश का गंभीर संकेत हैं. किताबों और ज्ञानवर्धक पत्रिकाओं से दूर होते बच्चे, बढ़ती डिजिटल लत, असफलता का डर, रिश्तों का तनाव, ये सब मिल कर बच्चों में अवसाद, आवेग और निराशा को तेज कर रहे हैं. गाजियाबाद की सामूहिक आत्महत्या और तरनतारन की हत्याआत्महत्या दोनों में क्षणिक भावनात्मक उथलपुथल बच्चों की जिंदगी के लिए घातक साबित हुई. तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या बताती है कि किस तरह आज के बच्चे पहचान के संकट से गुजरते हुए आभासी दुनिया- मोबाइल गेम, सोशल मीडिया में डूब रहे हैं जो उन्हें वास्तविक जीवन से अधिक आकर्षक लगने लगती है.

Digital Impact on Children (1)
आज कई ऐसे गेम्स और ऐप्स मौजूद हैं जो बच्चों के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं. कुछ गेम्स में हिंसा, प्रतिस्पर्धा और दबाव इतना अधिक होता है कि बच्चे मानसिक रूप से प्रभावित होने लगते हैं.

बच्चे औनलाइन अनेक लोगों से ‘कनैक्टेड’ हैं, पर परिवार से भावनात्मक रूप से दूर हो चुके हैं. मातापिता अकसर नहीं जानते कि बच्चे मोबाइल फोन पर क्या देख रहे हैं और क्या खेल रहे हैं.

डिजिटल दुनिया की गिरफ्त

गाजियाबाद की त्रासदी हमें डिजिटल लत के उस अंधेरे कोने में झांकने को मजबूर करती है जहां आभासी पहचान वास्तविक जीवन पर भारी पड़ने लगती है. किशोर मन स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु और प्रभावग्राही होता है. जब परिवार, स्कूल और समाज मिल कर संतुलित मार्गदर्शन नहीं दे पाते, तब इंटरनैट, गेम्स और एल्गोरिदम ‘रोल मौडल’ बन बैठते हैं. समस्या तकनीक नहीं, उस का अनियंत्रित और निगरानीरहित उपयोग है. ‘मत खेलो’ का आदेश, बिना समझ और संवाद के, अकसर प्रतिरोध को जन्म देता है. डिजिटल साक्षरता, समयसीमा और भावनात्मक सहारा ये तीनों साथसाथ चलें, तभी समाधान संभव है.

गुस्सा, असुरक्षा और हथियार

पंजाब के कालेज की घटना बढ़ते आवेग, अस्वीकृति को सहने की घटती क्षमता और हथियारों तक बच्चों की पहुंच पर गंभीर प्रश्न उठाती है. एकतरफा भावनाएं, सामाजिक दबाव और मानसिक असंतुलन जब साथ आते हैं, तो परिणाम भयावह होते हैं. शिक्षा संस्थान केवल डिग्री देने के केंद्र नहीं, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता, संघर्षप्रबंधन और परामर्श के सुरक्षित स्थल भी होने चाहिए. साथ ही, हथियारों की वैधअवैध उपलब्धता पर सख्त निगरानी राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है.

पैसा, शक्ति और जवाबदेही

कानपुर की घटना उस मानसिकता को उजागर करती है जहां संपन्नता, प्रभाव और ‘बच निकलने’ की उम्मीद कानून व नैतिकता पर भारी पड़ती दिखती है. यह केवल एक व्यक्ति की चूक नहीं, बल्कि सामाजिक व पारिवारिक संदेश का संकट है. हम बच्चों को सुविधा तो दे रहे हैं पर जिम्मेदारी और संवेदनशीलता सिखाने में चूक रहे हैं. जिम्मेदारी और संवेदनशीलता आपसी संवाद से और अच्छी किताबें व पत्रिकाएं पढ़ने से विकसित होती है. इस के साथ, कानून का निष्पक्ष और दृढ़ता से सब पर बराबर लागू होना, ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा सकता है.

तीनों घटनाओं का साझा सबक है- परिवार में संवाद की अपरिहार्यता. डर, डांट और दंड से अधिक असरदार है खुली बातचीत, भरोसा और सहभागिता. बच्चों के व्यवहार में बदलाव, जैसे अत्यधिक एकांत में रहने लगना, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, पढ़ाई से दूरी आदि सब संकेत हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. ‘समय नहीं है’ का तर्क आज सब से महंगा साबित हो रहा है.

स्कूल और कालेज केवल अकादमिक मंच नहीं, सामाजिक संतुलन और आत्मपहचान के आधार भी हैं. लाइब्रेरी में समय बिताना बच्चों के दिमागी संतुलन और सही विकास के लिए बहुत जरूरी है. जब आर्थिक या अन्य कारणों से बच्चे शिक्षा और साथियों से कटते हैं, तो वे वैकल्पिक और कभीकभी जोखिमभरी दुनियाओं में आश्रय खोजने लगते हैं. यह परिवार और समाज दोनों के लिए चेतावनी है.

इन घटनाओं को अलगअलग ‘केस’ मान कर भूल जाना हमारे लिए आसान है लेकिन यह खतरा दिनप्रतिदिन बढ़ रहा है. फरवरी की ये खबरें हमें झकझोरती हैं कि आधुनिकता की दौड़ में कहीं हम मूल्यों, संवाद और संतुलन को पीछे तो नहीं छोड़ रहे हैं. सवाल तकनीक, प्रेम या पैसे का नहीं है, सवाल यह है कि उन के साथ हमारी समझ, मर्यादा और जवाबदेही कितनी है. अगर यह आत्ममंथन अब भी न हुआ तो अगली सनसनी शायद और अधिक भयावह होगी.

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Romantic Story In Hindi : मजाक – खुशबू तो ऐसा ख्वाब थी जिस के लिए क्या कहें

Romantic Story In Hindi : दिल्ली से बैंगलुरु का सफर लंबा तो था ही, लेकिन जयंत की बेसब्री भी हद पार कर रही थी. 3 साल बाद खुशबू से मिलने का वक्त जो नजदीक आ रहा था. मुहब्बत में अगर कामयाबी मिल जाए तो इनसान को दुनिया जीत लेने का अहसास होने लगता है.

ट्रेन सरपट भाग रही थी लेकिन जयंत को उस की रफ्तार बैलगाड़ी सी धीमी लग रही थी. रात के 9 बज रहे थे. उस ने एक पत्रिका निकाल कर अपना ध्यान उस में बांटना चाहा लेकिन बेजान काले हर्फ और कागज खुशबू की कल्पना की क्या बराबरी करते?

खुशबू तो ऐसा ख्वाब थी, जिसे पूरा करने में जयंत ने खुद को झोंक दिया था. उस की हर शर्त, हर हिदायत को आज उस ने पूरा कर दिया था. अब फैसला खुशबू का था.

जयंत ने मोबाइल फोन निकाला. खुशबू का नंबर डायल किया लेकिन फिर अचानक फोन काट दिया. उसे याद आया कि खुशबू ने यही तो कहा था, ‘जब सच में कुछ बन जाओ तब मुहब्बत को पाने की बात करना. उस से पहले नहीं. मैं तब तक तुम्हारा इंतजार करूंगी.’

मोबाइल फोन वापस जेब के हवाले कर जयंत अपनी बर्थ पर लेट गया. सुख के इन लमहों को वह खुशबू की यादों में जीना चाहता था.

5 साल पहले जब जयंत दिल्ली आया था तो वह कुछ बनने के सपने साथ लाया था लेकिन दिल्ली की फिजाओं में उसे खुशबू क्या मिली, जिंदगी की दशा और दिशा ही बदल गई.

जयंत ने मुखर्जी नगर, दिल्ली के एक नामी इंस्टीट्यूट में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए दाखिला लिया तो वहां पढ़ाने वाली मैडम खुशबू का जादू पहली नजर में ही प्यार में बदल गया.

भरापूरा बदन और बेहद खूबसूरत. झील सी आंखें. घुंघराले लंबे बाल. बदन का हर अंग ऐसा कि सामने वाला देखता ही रह जाए.

जयंत ने खुशबू से बातचीत शुरू करने की कोशिश की. क्लास में वह अकसर मुश्किल सवाल रखता पर खुशबू की सब्जैक्ट पर गजब की पकड़ थी. जयंत उसे कभी अटका नहीं पाया. लेकिन उस में भी बहुत खूबियां थीं इसलिए खुशबू उसे स्पैशल समझने लगी.

उस दिन क्लास जल्दी खत्म हो गई. खुशबू ने जयंत को रुकने का इशारा किया. थोड़ी देर बाद वे दोनों एक कौफी हाउस में थे और वहां कहीअनकही बहुत सी बातें हो गईं. नजदीकियां बढ़ने लगीं तो समय पंख लगा कर उड़ने लगा.

एक दिन मौका देख कर जयंत ने खुशबू को प्रपोज भी कर दिया, लेकिन खुशबू ने वैसा जवाब नहीं दिया जैसी जयंत को उम्मीद थी.

खुशबू की बहन की शादी थी. उस ने जयंत को न्योता दिया तो जयंत भला ऐसा मौका क्यों छोड़ता? काफी अच्छा आयोजन था लेकिन जयंत को इस सब में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी.

दकियानूसी रस्में रातभर चलने वाली थीं, इसलिए जयंत मेहमानों के रुकने वाले हाल में जा कर सो गया. लोगों की आवाजें वहां भी आ रही थीं. सब बाहर मंडप में थे.

रात में अचानक किसी की छुअन की गरमाहट से जयंत की नींद खुली. हाल की लाइट बंद थी, लेकिन अपनी चादर में लड़की की छुअन वह अंधेरे में भी पहचान गया था.

खुशबू इस तरह उस के साथ… ऐसा सोचना भी मुश्किल था. लेकिन अपने प्यार को इतना करीब पा कर कौन मर्द अपनेआप पर कंट्रोल रख सकता है?

चंद लमहों में वे दोनों एकदूसरे में समा जाने को बेताब होने लगे. खुशबू के चुंबनों ने जयंत को मदहोश कर दिया. अपने करीब खुशबू को पा कर उसे जैसे जन्नत मिल गई.

तूफान थमा तो खुशबू वापस शादी की रस्मों में शामिल हो गई और जयंत उस की खुशबू में डूबा रहा.

कुछ दिन बाद ऐसा ही एक और वाकिआ हुआ. तेज बारिश थी. मंडी हाउस से गुजरते समय जयंत ने खुशबू को रोड पर खड़ा पाया.

जयंत ने फौरन उस के नजदीक पहुंच कर अपनी मोटरसाइकिल रोकी. दोनों उस पर सवार हो इंडिया गेट की ओर निकल गए.

खुशबू को रोमांचक जिंदगी पसंद थी इसलिए वह इस मौके का लुत्फ उठाना चाहती थी. बारिश का मजा रोमांच में बदल रहा था. प्यार में सराबोर वे घंटों सड़कों पर घूमते रहे.

जयंत और खुशबू की कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती रही कि तभी अचानक इस कहानी में एक मोड़ आया. खुशबू ने जयंत को ग्रैंड होटल में बुलाया. डिनर की यह पार्टी अब तक की सब पार्टियों से अलग थी. खुशबू की खूबसूरती आज जानलेवा महसूस हो रही थी.

‘आज तुम्हारे लिए स्पैशल ट्रीट जयंत,’ मुसकरा कर खुशबू ने कहा.

‘किस खुशी में?’ जयंत ने पूछा.

‘मुझे नई नौकरी मिल गई… बैंगलुरु में असिस्टैंट प्रोफैसर की.’

जयंत का दिल टूट गया था. खुशबू को सरकारी नौकरी मिल गई थी, इस का मतलब उस की जुदाई भी था.

जयंत ने दुखी लहजे में खुशबू को उस की जुदाई का दर्द कह सुनाया.

खुशबू ने मुसकराते हुए कहा, ‘वादा करो तुम पहले कंपीटिशन पास करोगे, नौकरी मिलने के बाद ही मुझ से मिलने आओगे… उस से पहले नहीं… न मुझे फोन करोगे और न ही चैट…

‘मैं तुम्हारी टीचर रही हूं इसलिए मुझे यह गिफ्ट दोगे. फिर हम शादी करेंगे… एक नई जिंदगी… एक नई प्रेम कहानी… मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.

‘3 साल का समय… बस, तुम्हारी यादों के सहारे निकालूंगी.’

अचानक से सबकुछ खत्म हो गया. धीरेधीरे समय बीतने लगा. जयंत ने अपना वादा तोड़ खुशबू को फोन भी किए लेकिन उस ने मीठी झिड़की से उसे पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा.

जयंत को भी यह बात चुभ गई. अब पूरा समय वह अपनी पढ़ाई पर देने लगा. प्यार में बड़ी ताकत होती है इसलिए मुहब्बत की कशिश इनसान से कोई भी काम करा लेती है.

जयंत को भारतीय सर्वेक्षण विभाग में अच्छी नौकरी मिल गई. अब खुशबू को पाने में कोई रुकावट नहीं बची थी. जयंत ने अपना वादा पूरा कर लिया था.

अचानक ट्रेन रुकी तो जयंत की नींद खुली. सुबह होने को थी. बैंगलुरु अभी दूर था. जयंत दोबारा आंखें मूंदे हसीन सपनों में खो गया.

टे्रन जब बैंगलुरु पहुंची, तब तक शाम हो चुकी थी. जयंत ने खुशबू को फोन मिलाया लेकिन फोन किसी अनजान ने उठाया. वह नंबर खुशबू का नहीं था. उस का नंबर अब बदल चुका था. दूसरे दिन वह मालूम करता हुआ खुशबू के कालेज पहुंचा.

लाल गुलाब और खुशबू के लिए गिफ्ट से भरे बैग जयंत के हाथों में लदे थे. वैसे भी जयंत को खुशबू को उपहार देने में बड़ा सुकून मिलता था. अपनी पौकेटमनी बचाबचा कर वह उस के लिए छोटेछोटे गिफ्ट लाता था जिन्हें पा कर खुशबू बहुत खुश होती थी.

खुशी से लबरेज जयंत कालेज गया. खुशबू के रूम में पहुंचा तो जयंत को देख वह उछल पड़ी. मिठाई का डब्बा आगे कर जयंत ने उसे खुशखबरी सुनाई.

खुशबू ने एक टुकड़ा मुंह में रखा और जयंत को शुभकामनाएं दीं.

जयंत में सब्र कहां था. उस ने आगे बढ़ उस का हाथ थामा और चुंबन रसीद कर दिया.

‘‘प्लीज जयंत… यह सब नहीं… प्लीज रुक जाओ,’’ अचानक खुशबू ने सख्त लहजे में जयंत को टोकते हुए रोका.

‘‘लेकिन यार, अब तो मैं ने अपना वादा पूरा कर दिया… तुम से मेरी शादी…’’ निराश जयंत ने पूछा.

‘‘सौरी जयंत… प्लीज… मैं ने शादी कर ली है. अब वे सब बातें तुम भूल जाओ..’’

‘‘क्या? भूल जाऊं… मतलब?’’ जयंत उसे घूरते हुए बोला.

‘‘हां, मुझे भूलना होगा,’’ मुसकराते हुए खुशबू बोली, ‘‘वे सब मजाक की बातें थीं… 3 साल पहले कही गई

बातें… क्या अब इतने दिन बाद… तुम्हें तो मुझ से भी अच्छी लड़कियां मिलेंगी…’’ मुसकराते हुए खुशबू बोली.

जयंत उलटे पैर लौट पड़ा. लाल गुलाब उस के भारी कदमों के नीचे कुचल रहे थे. मजाक की बातें शायद

3 साल में खत्म हो जाती हैं… माने खो देती हैं… जयंत समझने की नाकाम कोशिश करने लगा. Romantic Story In Hindi

सरित प्रवाह – धूमिल होती सोनेचांदी की चमक

Editorial : सोनेचांदी के भावों में उतारचढ़ाव बच्चों के सीसौ की तरह हो रहा है. पक्का है कि इस खेल में काफी लोग अपना सबकुछ गंवा बैठेंगे. सोने के दाम इसलिए बढ़ने लगे क्योंकि दुनिया की लगभग सभी सरकारों के रिजर्व बैंकों ने अमेरिकी सरकार के बौंड्स की जगह सोना खरीदना शुरू कर दिया. चांदी के दाम इसलिए बढ़े क्योंकि सोलर पौवर में इस का बड़ा इस्तेमाल होने लगा है.

इन दोनों के अलावा कई और धातुएं हैं जिन के दाम बेतहाशा बढ़े पर वे औद्योगिक इस्तेमाल की हैं और उन का आम लोगों से लेनादेना नहीं. सदियों से सोनाचांदी घरों में रखा और पहना जाता रहा है और इस के दाम बढ़ने से जहां जिस के पास कुछ सोनाचांदी है वह खुश रहता है जबकि जिस की खरीदने की इच्छा होती है वह परेशान हो उठता है.

असली चक्कर में वे पड़े हैं जिन्होंने बढ़ते दामों के लालच में महंगे दामों पर सोना और चांदी खरीद लिया था. अब इन दोनों धातुओं के दाम धड़ास से गिर गए. महंगी कीमत पर खरीदने वालों के बाद उन को ज्यादा नुकसान हुआ जो इन धातुओं की सट्टाबाजारी में लगे थे.

सोनाचांदी हो या शेयर या जमीन, अंधीदौड़ में सभी लोग पैसा कमाना चाहते हैं. यह बहुतकुछ धर्म की पढ़ाई पट्टी है कि पैसा या जीने का सामान तो ऊपर से भगवान की कृपा से मिलता है और उस के लिए सही समय पर पूजापाठ करना चाहिए. सभी धर्मों की किताबों में ऐसी घटनाओं की बनावटी कहानियां ठूंसी गई हैं जिन में लगातार भक्ति में लगे कुछ लोगों को बैठेबिठाए अपार संपत्ति मिल गई.

गनीमत यह है कि धर्मों की जकड़न के बावजूद मानव ने अपने जीने के लिए मेहनत करनी नहीं छोड़ी है. किसानों ने खेती की, जुलाहों ने कपड़ा बुना, मिस्त्रियों ने मकान-शहर बनाए, घरों में औरतों ने सुरक्षा दी. उन्होंने अचानक ऊपर से टपक कर कुछ आने का इंतजार नहीं किया. आज अगर हम एक नए युग में जी रहे हैं तो इसीलिए कि कुछ ने अचानक सोनेचांदी का ढेर मिल जाने की जगह चीजों के निर्माण में नई सोच लगाई, मेहनत की, तरहतरह के उपयोग किए.

सफलता तो मेहनत में है, नई चीज बचाने में है. सोनेचांदी की चमक में अंधे न हों, अपने हाथों पर विश्वास करें. Editorial

सरित प्रवाह – दिल्ली में एआई समिट

Editorial : दिल्ली में बड़े धूमधड़ाके से एआई समिट का आयोजन किया गया. चर्चा में जो बातें ज्यादा रहीं वे थीं अव्यवस्था, चोरियां, विदेशी सामान पर देशी बिल्ला लगा कर दर्शाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से समिट में लगे स्टौलों को पूरे 3 घंटे बंद कर देना.

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मुंबई के मैरीन ड्राइव पर जौगिंग करने के लिए बिना ताम?ाम के निकल सकते हैं जबकि प्रधानमंत्री मोदी अपनी जनता से भयभीत हैं, उन्होंने अपनी विजिट के दौरान स्टौल लगाने के लिए आने वालों को भी हटवा दिया. केवल कैमरे के सामने आने वाले स्टौल लगाने वाले ही आने दिए गए.

असल में वैज्ञानिकता तार्किकता से आती है और जो देश गले तक पाखंडों में डूबा हो, जहां सरकार राम मंदिर के विकास और नए संसद भवन के उद्घाटन तक पर भगवाधारी अनपढ़ स्वामियों के जमावड़े पर ज्यादा भरोसा करती हो वहां विज्ञान केवल टोकन बन कर रह जाएगा.

भारत में तर्क की कोई गुंजाइश नहीं है. संसद की बहसों में देख लें. आज 2026 में सांसदों में जब बहस होती है तो वर्तमान तथ्य और तर्कों की जगह सत्ता पक्ष केवल नेहरू, इंदिरा, राजीव के नाम लेते दिखते हैं और कुतर्क का इस्तेमाल कर के दूसरों को बोलने से रोकते हैं. संसद भवन कैमरों, रिमोट माइकों से लदा पड़ा है लेकिन इन सब का उपयोग केवल विपक्ष का मुंह बंद करने के लिए हो रहा है.

नई दिल्ली स्थित भारतीय मंडपम जहां एआई समिट हुई, वहां चारों ओर बुरी तरह अफरातफरी मची रही. एआई तो क्या, आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक लाइटें तक सुव्यवस्थित नहीं थीं. मंडपम में बिछे कारपेट मुड़ रहे थे, तार बिखरे हुए थे, स्टौलों के पार्टीशन खंभे गिर रहे थे. कहीं से ऐसा नहीं लग रहा था कि यह एक विकसित देश की जमीन पर टैक्नोलौजी के आज के नए अवतार एआई यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस को जज्ब कर लिया गया है.

असल में आज भी भारतीय लोग पहाड़ों, कंदराओं और गुफाओं में रहने वाली सोच में रह रहे हैं जहां गाय को औक्सीजन देने वाली और गौमूत्र को दवा मान लिया जाता है. ऐसा देश न तो एआई को कभी सही ढंग से इस्तेमाल कर पाएगा और न अपने को उन देशों की श्रेणी में ला सकता है जो एआई के बलबूते पर ज्ञान की नई सीमाएं तय कर रहे हैं.

हम अभी भी 15वीं सदी में रह रहे हैं, तुलसी के कथन में, यहां वही होता है जो रामजी चाहते हैं, एआई नहीं. Editorial

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