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सोराइसिस की सही जानकारी है जरूरी

35 साल की पत्रकार और वकील अलका धूपकर जब सातवीं कक्षा में थी तब उसे सोराइसिस हुआ, लेकिन वह महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके में रहने की वजह से इस बीमारी का पता उसे देर से लगा.एक लड़की होकर सोराइसिस के साथ जीने का सामाजिक दबाव उसने झेला है. उसे लगातार सुनने पड़े कि उसकी शादी कैसे होगी? लेकिन उसकी इस मुश्किल घड़ी में उसके परिवार वालों ने काफी सहयोग दिया इससे उसे आगे बढ़ने में मुश्किल नहीं हुई.

अलका की तरह ही 29 वर्षीय रिंकी उपाध्याय भी सोराइसिस की मरीज है. उन्हें भी परिवार का काफी सहयोग मिला. वह अपने रोग को पहचानने और सही दवा को जानने के लिए उसने काफी शोध किया और आज फार्मा क्षेत्र में अपना कैरियर बना चुकी है.

इस बारें में त्वचारोग विशेषज्ञ डा. सतीश उदारे कहते है कि असल में सोराइसिस एक औटोइम्यून बीमारी है, जिसकी वजह से त्वचा पर खुजली होती है. त्वचा छिलके दार हो जाती है. उस पर लाल पैचेस हो जाते है. यह आम रैश की तरह ही होता है. सोराइसिस के होने की ख़ास वजह शरीर के इम्यून सिस्टम का कम हो जाना है. जिसके परिणामस्वरूप शरीर का इम्युन सिस्टम अपने ही स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगता है. इसकी वजह से त्वचा की नयी कोशिकाएं तेजी से बनने लगती है और यह रुखी होने लगती है, जिसपर सख्त पैच होने लगते है. यह कोई कौस्मेटिक या स्किन समस्या नहीं है, जैसा अक्सर इसे मान लिया जाता है. पूरी दुनिया में लगभग 12.5 करोड़ लोग इससे प्रभावित है. सही देखभाल और इलाज से इसे दूर किया जा सकता है. यह छूने से नहीं फैलता, लेकिन अनुवांशिकी हो सकती है. ये बीमारी अधिकतर डिप्रेशन में रहने वाले लोग या फिर किसी औपरेशन या बीमारी से अगर इम्यून सिस्टम कम हो जाती है. तब इसके होने के चांस होते है.

इसके आगे डा. सतीश कहते है कि सोराइसिस का बारें में लोगों में बहुत कम जानकारी है इसलिए ये जरुरी है कि इसके बारें में उनमें जानकारी हो जिससे इसका इलाज जल्द से जल्द हो सकें. ऐसे  मरीज को लोग अपने से दूर रखना चाहते है या फिर उनकी अवहेलना करते है. अधिकतर  मरीज मेरे पास परेशान और अवसादग्रस्त होकर आते है.जिससे उनके इलाज में समय लगता है. ऐसे में मैं उन्हें बताता हूं कि सोराइसिस को नियंत्रित और मैनेज किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह से इलाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक आन्तरिक समस्या है.

लक्षण

  • प्रभावित अंगों में खुजली होना,
  • त्वचा पर पपड़ी जैसी ऊपरी पर्त का जमा हो जाना,
  • शरीर में लाल धब्बे या चकत्ते का होना आदि है.

समय रहते अगर इसका इलाज नहीं किया गया, तो कई दूसरी बीमारियां भी सोराइसिस की वजह से हो सकती है जैसे,

  • सोरइटिक आर्थराइटिस एक तरह की उत्तेजक आर्थराइटिस है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता के कम होने की वजह से होती है, ये शरीर के दोनों भागों को प्रभावित कर सकता है, जो अधिकतर रेमोटोइड आर्थराइटिस की तरह ही होता है,
  • सोराइसिस की वजह से कार्डियोवेस्कुलर की बीमारी हो सकती है, क्योंकि इसमें ब्लड वेसेल में सूजन आ जाती है और आर्टरी में प्लाक जमा हो जाती है, जो खून को हार्ट को पहुंचने में बाधा पहुंचाती है, इससे हार्ट डिजीज और हार्ट अटैक के रिस्क बढ़ जाता है,
  • सोराइसिस के  मरीज अधिकतर डिप्रेशन के शिकार होते है, क्योंकि समाज में उन्हें अवहेलना मिलती रहती है, करीब 20 प्रतिशत सोराइसिस के मरीज कई प्रकार के डिप्रेशन में पाए गए,
  • सोराइसिस के  मरीज कई बार टाइप 2 डायबिटीज के शिकार हो जाते है, क्योंकि इस अवस्था में शरीर हारमोन इन्सुलिन का सही प्रयोग नहीं कर पाती, जिससे त्वचा की समस्या और अधिक बढ़ जाती है,
  • कुछ लोगों में सोराइसिस मोटापे को बढाती है, फैट सेल की वजह से सूजन बढ़ता है और सोराइसिस और अधिक बढ़ने के चांस होते है,

जांच

सोराइसिस की बीमारी कई प्रकार की होती है इसलिए इसकी जांच अधिक कठिन होती है, इसे कई बार देखकर या बायोप्सी कर पता किया जाता है, इसके अलावा लैब टेस्ट भी किया जाता है, अगर व्यक्ति मधुमेह या ब्लडप्रेशर का मरीज है, तो उसकी जांच अलग तरीके से की जाती है.

  • इलाज़

इस बीमारी का पूरी तरह से इलाज संभव नहीं होता , पर सही देखभाल और दवा से इसे मैनेज किया जा सकता है, जो निम्न है,

अगर यह खुजली करता है, लाल रंग के रेशेज है तो यह सोराइसिस हो सकता है, इसमें अधिकतर एस्टेरोइड दिया जाता है, जो डाक्टर के सलाह से ही लिया जाना चाहिए, ये घातक नहीं होता, इससे बीमारी कंट्रोल में आती है, लोकल एस्टोरायड क्रीम से भी इसे ठीक किया जाता है, इसमें लगातार रोगी को मौनिटर करते रहना पड़ता है,

अगर किसी के परिवार में सोराइसिस है, तो उस हिसाब से उसका इलाज किया जाता है, इसकी दवा अधिक महंगी नहीं होती,

अगर इसे देर से पता चला और सोराइसिस एडवांस स्टेज में है , तो इफेक्टिव बायोलोजिक्स दिया जा सकता है,

हालांकि सोराइसिस का प्रभाव व्यक्ति के कैरियर और निजी जीवन पर पड़ता है, इसलिए उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से भी मजबूत बनाने की जरुरत होती है, जिससे उनका इम्यून सिस्टम ठीक हो जाय, इसका प्रयास व्यक्ति को खुद ही करना पड़ता है. कई बार ये बीमारी इलाज़ करते-करते कुछ सालों बाद चला भी जाता है,

कुछ बातें हमेशा याद रखे, ताकि सोराइसिस कंट्रोल में रहे,

  • सर्दियों में ये बीमारी अधिक बढ़ती है, इसलिए हमेशा प्रभावित एरिया की मोयास्चराइज करें, जिससे काफी हद तक आराम मिलता है,
  • हमेशा माइल्ड साबुन का प्रयोग नहाने में करें,
  • परिवार में इस बीमारी की एक्सेप्टेंस होनी चाहिए, ताकि ये अधिक न बढे,
  • ये बीमारी पूरे विश्व में होता है, इसलिए कभी डिप्रेशन में न जायें,
  • नशे और ध्रूम्रपान से बचे,
  • लाइफस्टाइल बदलकर भी इस बीमारी को काबू में किया जा सकता है जिसमें योग, वर्कआउट और मैडिटेशन को शामिल करना जरूरी होता है.

इस बीमारी के  मरीज को खाने के कुछ चीजो से परहेज करने की जरुरत है, जो निम्न है,

वैसे तो व्यक्ति सबकुछ खा सकता है पर अधिक मिर्ची और तेलवाले फूड को अवायड करना जरुरी होता है, इसके अलावा आपको देखना पड़ता है कि कौन सा फूड आपके सोराइसिस को बढ़ा रहा है, उसे न खाएं, हमेशा बैलेंस्ड फूड लें और खाने में विटामिन ए युक्त भोजन अधिक खाएं.

हरी मिर्च का अचार

अचार की सामग्री:

– 1 किलो हरी मिर्च (धोकर पोंछ लें)

– 4 कप नींबू का रस

– 3/4 कप नमक

– 3/4 कप सौंफ (दरदरी पीसी हुई)

– 3/4 कप सरसों पाउडर

– 1/2 कप हल्दी

– 2 टेबल स्पून कलौंजी

– 1/4 मेथी दाना (भूनकर पीसी ​हुई)

– 1 बड़ा चम्मच हींग (भूनकर पीसी ​हुई)

– 1 कप वेजिटेबल औयल

हरी मिर्च का अचार बनाने की वि​धि

– सबसे पहले हरी मिर्च को लम्बाई में काट लें.

– अब सौंफ, नमक, हल्दी, सरसों, मेथी, हींग और कलौंजी को एक साथ मिला लें.

– अब एक कप में 1/4 नींबू के रस के साथ तेल भी मिला लें.

– अब हरी मिर्च में तैयार किया हुआ मिश्रण भरकर इन मिर्चों को एक जार में भर दीजिये.

– फिर इस पर बचा हुआ नींबू का रस डाल दें.

– इसे बनाने में 3 से 4 दिन का समय लगेगा.

– अब इसके बाद बचा हुआ तेल गर्म करके ठंडा करें

– 4 दिन बाद इसे जार मे डाल दें.

आप अचार को पूरी तरह तेल में डालकर रखें जिससे वह खराब न हो.

चना चिली रेसिपी

सामग्री:

– एक कप काबुली चना (रातभर भिगोया हुआ)

– तेल तलने के लिए

– मैदा (2 बड़े चम्मच)

– गरम मसाला(1 छोटा चम्मच)

– कौर्नफ्लोर(2 बड़े चम्मच)

– लाल मिर्च पाउडर (एक छोटा चम्मच)

– सोया सौस (2 छोटा चम्मच)

–  पानी (आवश्यकतानुसार)

– टोमैटो सौस (2 छोटा चम्मच)

– एक शिमला मिर्च (बड़े टुकड़ों में कटी)

– विनेगर (2 छोटा चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

– शक्कर (एक छोटा चम्मच)

– एक प्याज (बड़े टुकड़ों में कटा)

–  बारीक कटा हरा धनिया (2 बड़े चम्मच)

– एक छोटा टुकड़ा अदरक (टुकड़ों में कटी)

–  चिली सौस (3 छोटा चम्मच)

– लहसुन की कलियां(10-12)

– 3-4 हरी मिर्च (लंबी कटी हुई)

बनाने की विधि-

– सबसे पहले एक बर्तन में चना, मैदा, कौर्नफ्लोर, गरम मसाला, नमक, लाल मिर्च पाउडर डालकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें.

– अब चने के मिश्रण को आधे घंटे के लिए फ्रीज़र में रख दें जिससे कि यह पूरी तरह से सेट हो जाए.

– कुछ समय के बाद चने को फ्रीज़र से निकालें और मध्यम आंच में एक कड़ाही में तेल गर्म करने के लिए रखें.

– तेल के गर्म होते ही चने तलकर एक प्लेट में निकालकर रख लें.

– अब दोबारा कड़ाही में थोड़ा तेल डालकर गर्म करने के लिए रखें.

– तेल के गर्म होते ही लहसुन, प्याज और अदरक भूनें.

– प्याज के सुनहरा होते ही शिमला मिर्च डालकर एक मिनट तक भूनें.

– शिमला मिर्च के सौफ्ट होते ही सोया सौस, टोमैटो सौस, चिली सौस, चीनी और नमक डालकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें.

– आधा कप के बराबर पानी डालकर 2 मिनट तक उबालें.

– फिर चना, विनेगर और हरा धनिया डालकर अच्छे से मिक्स करें और आंच बंद कर दें

 लीजिए तैयार है आपका चना चिली.

सवर्णों को आरक्षण का लौलीपोप

चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल क्याक्या लौलीपोप फेंक सकते हैं, इस का एक और नमूना अगड़ी जातियों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के ऐलान के रूप में सामने आया है. लोकसभा चुनावों से 3 महीने पहले आए सरकार के इस फैसले को सवर्ण वोटों को खुश करने के रूप में देखा जा रहा ह. इस घोषणा को चुनावी लौलीपोप ही कहा जा सकता है.

हालांकि सवर्णों को आरक्षण के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित की गई है. इस में सालाना 8 लाख रुपए से कम वार्षिक आय, 5 एकड़ से कम जमीन का मापदंड रखा गया है.

सवर्ण आरक्षण के पीछे भाजपा की असली मंशा वोट हथियाना है परे अभी कई सवाल है. सवर्णों को आरक्षण देने से क्या पहले से आरक्षित दलित, पिछड़ी जातियां नाराज हो कर भाजपा के खिलाफ नहीं जाएंगी? अगर अगड़ी जातियां इस लौलीपोप से भाजपा के पास आ भी गईं तो क्या वह उन के बूते चुनावी वैतरणी पार कर सकेगी?

दलित जातियां एट्रोसिटी के चलते भाजपा सरकार ने खासी नाराजगी जता चुकी थी और उन्होंने भारत बंद भी किया था. पिछले साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने एससी, एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए कहा था कि मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी. शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा भी दर्र्ज नहीं होगा. पहले एसपी स्तर का पुलिस अधिकारी मामले की जांच करेगा.

विरोध के चलते केंद्र सरकार इस के खिलाफ अगस्त में बिल ले कर आई. इस के जरिए पुराने कानून को बहार कर दिया गया लेकिन दलितों की नाराजगी दूर करने की कोशिश की गई तो उधर इस एक्ट से सवर्ण नाराज हो गए.

इस आरक्षण में भी पेंच है. सुप्रीम कोर्ट ने एमआर बालाजी बनाम स्टेट औफ मैसूर मामले में सितंबर 1962 में फैसला किया था कि किसी भी स्थिति में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. इस फैसले का आधार कोर्ट ने मेरिट को कुंठित न होने देना बताया था. तब से ले कर आज तक लगभग हर फैसले में यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने इंद्रा साहनी मामले में भी इसे बहाल रखा.

असल में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए की गई थी कि भारत में धार्मिक व्यवस्था के चलते गैरबराबरी वाला समाज है, जहां ऊंचनीच, छुआछूत के भेदभाव के चलते शैक्षिण और सामाजिक तौर पर समाज पिछड़ा रह गया. अनुच्छेद 15 और 16 सरकार को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह सामाजिक और शैक्षिक[न कि आर्थिक] रूप से पिछड़ वर्ग [न कि जाति]को आगे बढने के अवसर प्रदान करे. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के सामने जब यह मामला फिर जाएगा तो वह संविधान के इस तराजू पर इसे तोलेगा.

लिहाजा सदियों से निचले दबेकुचले वर्गों के शैक्षिक और सामाजिक उत्थान के लिए आरक्षण लागू किया गया था. मोदी सरकार का सवर्णों के लिए यह आरक्षण आर्थिक उत्थान के लिए है. संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात नहीं है इसलिए गैर बराबरी दूर करने की संविधान की असली मंशा के यह विपरीत है.

असली सवाल तो यह है कि नौकरियां हैं कहां? और फिर आरक्षित आबादी इतनी है कि गैर आरक्षितों के लिए वैसे ही स्थान अधिक हैं. संविधान में 50 प्रतिशत से अधिक का प्रावधान नहीं है और आरक्षित वर्ग में आने वाली आबादी लगभग 80 प्रतिशत है यानी बाकी बची सवर्ण जातियों के लिए शेष 50 प्रतिशत यानी आधी जगहें बची रह जाती हैं. आरक्षण को गणित कोई समझना नहीं चाहता. अब हर जाति, वर्ग अपने लिए आरक्षण चाह रहा है.

भाजपा ने इस प्रस्ताव से अपने परंपरागत अगड़ी जातियों के वोटरों को खुश करने की कोशिश की है जो एससी, एसएटी एक्ट पर अध्यादेश लाने को ले कर पार्टी से नाराज बताए जा रहे थे. इस का असर मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ विधानसभा चुनाव के नतीजों में भी देखने को मिला. ऐसे में अब भाजपा आरक्षण के दांव से आम चुनाव में अपने सवर्ण बहुल गढों को बचाना चाहती है.

दलित समरसता के नाम पर सियासी खिचड़ी

भारतीय जनता पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनावों में दलितों के वोट हथियाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं. भाजपा ने दिल्ली के रामलीला मैदान में भीम महासंगम विजय संकल्प और समरसता खिचड़ी बनाने का आयोजन किया गया.

पार्टी का दावा है कि देश में समरसता का संदेश देने के लिए 3 लाख घरों से एकएक मुट्ठी चावल और दाल इकट्ठा किया गया. कुल 5100 किलो वजन की खिचड़ी बनाई गई और दलितों को बांटी गई. आयोजन में भाजपा के कई बड़े नेता शामिल हुए. इन में पार्टी के दलित नेताओं में राष्ट्रीय संगठन महासचिव रामलाल, केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दुष्यंत कुमार गौतम के अलावा दूसरे केंद्रीय मंत्री विजय गोयल, महासचिन अरुण सिंह, सांसद डा. हर्षवर्द्घन, मीनाक्षी लेखी, प्रवेश वर्मा, मनोज तिवारी शामिल थे.

रैली में लाखों दलितों के आने का दावा किया गया था पर 5-6 हजार दलित ही मौजूद आए.

दलितों के प्रति नीतियों को ले कर पार्टी के अंदर एकराय नहीं है. पार्टी के दलित सांसद अंदर ही अंदर छटपटा रहे हैं. उत्तरप्रदेश के बहराइच से पार्टी सांसद सावित्री बाई फुले इस्तीफा दे चुकी हैं. सरकार के सहयोगी रामविलास पासवान और रामदास अठावले भाजपा और सरकार के प्रति समयसमय पर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं.

दिल्ली के एकमात्र दलित सांसद उदित राज भी पार्टी की रीतिनीतियों से खुश नहीं हैं. उन्होंने अपनी ही पार्टी द्वारा दलितों के लिए इस आयोजन को ले कर कोई खास रूचि नहीं दिखाई. वह आयोजन के मौके पर आए ही नहीं. हालांकि कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह रामलीला मैदान में आए और साफ कहा कि इस तरह के आयोजनों से पार्टी को कोई फायदा नहीं होगा.

उदित राज ने कहा कि वह इस आयोजन के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उन की सोच अलग है. ऐसे आयोजन से पार्टी को कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अब दलित बदल चुके हैं. वह 5-10 साल पहले वाले दलित नहीं हैं जिन्हें आसानी से बहलाफुसला कर वोट ले लिया जाता था. अब दलितों को खिचड़ी और खाने की नहीं, सम्मान और भागीदारी की भूख है. जो राजनीतिक दल उन की इस भूख को दूर करेगा, दलित उसी के साथ खड़े होेंगे.

पिछले समय से दलितों पर हमले और भेदभावपूर्ण रवैए के चलते दलित भाजपा व संघ से खासे नाराज चल रहे हैं. हैदराबाद में रोहित वेमुला आत्महत्या, सहारनपुर में दलितों की बस्ती में तोड़फोड़ और आगजनी, भीमा कोरेगांव में दलितों पर हमले जैसी कई घटनाओं और एससी, एसएटी एक्ट में ढील व आरक्षण खत्म करने की मंशा से देश भर का दलित सड़कों पर उतर कर अपनी नाराजगी जता चुका है.

हालांकि सरकार ने बाद में एससी, एसटी एक्ट में संशोधन कर दलितों की नाराजगी दूर करने की कोशिश की पर दलितों की नाराजगी खत्म नहीं हो पाई. पिछले दिनों तीन राज्यों में हुए चुनावों में भाजपा को मिली कड़ी शिकस्त के पीछे दलितों की बड़ी भूमिका रही.

भाजपा दलितों को खुश करने के लिए अब समरसता के नाम पर खिचड़ी बना कर उन्हें खिला रही है तो इस के पीछे मंशा दलितों के वोट हासिल करने की ही है पर इस से कुछ नहीं होगा. दलितों को लुभाने का ड्रामा लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस भ्ी करती रही थी. कांग्रेस नेता राहुल गांधी दलितों के घरों में जाते, खाना खाते, उन के यहां रुकते थे पर इस से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ.

दरअसल असली समस्या दलितों के प्रति पुरानी सामाजिक भेदभावपूर्ण, छुआछूत वाली सोच है. चाहे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ही दलितों का वास्तविक उत्थान नहीं चाहती. दोनों पार्टियां दलितों को महज वोट बैंक समझती है और उसी के मुताबिक उन्हें चुनावों के वक्त टुकड़ा फेंक कर बहलाने की कोशिशें करती हैं.

ज्यादा सोना हो सकता है जानलेवा

ठंड अपने चरम पर है. देश भर में इसका प्रकोप तेज है. ऐसे में लोग रजाई से निकलना नहीं चाहते. रजाई का वक्त लोगों के लिए सबसे अच्छा होता है. लोगों को लगता है कि पूरे दिन रजाई में छिपे रह कर वो खुद को बीमारियों और ठंड से बचा सकते हैं. जबकि ऐसा नहीं है. हाल ही में हुए एक शोध में ये बात सामने आई ज्यादा सोना सेहत के लिए कतरनाक हो सकता है. कई बार आपकी ये आदत जानलेवा भी हो सकती है.

यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट की माने तो 6 या 8 घंटे से ज्यादा समय तक सोने से दिल की बीमारी होने के साथ-साथ जल्दी मौत होने का खतरा भी बढ़ता है. स्टडी में ये भी बताया गया कि भरपूर नींद सेहत के लिए काफी जरूरी है. पर जरूरत से ज्यादा सोना सेहत के लिए हानिकारक भी है. ये हमारे सेहत को बुरी तरह से प्रभावित करता है. असल में ज्यादा नींद सेहत को बुरी तरह से प्रभावित करता है.

इस स्टडी को आय के आधार पर कई देशों के करीब 1.16 लाख लोगों के स्लीप डेटा की जांच की है. इसमें 4 अधिक आय वाले देश जैसे, कनाडा, कनाडा, स्वीडन, सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब इमायरेट्स, 12 मध्य आय के देश, जिनमें, अर्जेंटीना, ब्राजील, चिली, चीन, कोलंबिया, ईरान, मलेशिया, पैलेस्तीन, फिलीपींस, पोलैंड, साउथ अफ्रीका और तुर्की शामिल हैं. इसके अलावा स्टडी में 5 कम आय वाले देश- बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, तंजानिया और जिम्बाब्वे के लोगों को भी शामिल किया गया.

स्टडी में शामिल सभी देशों के लोगों से उनकी आर्थिक स्थिति, शराब, शारीरिक गतिविधियां, अन्य बीमारियों संबंधी सवाल पूछे. जिसके नतीजों में ये बात सामने आई कि जो लोग 8 घंटे से ज्यादा सोते हैं उनमें हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. साथ ही ऐसे लोगों में जल्दी मौत होने का खतरा भी 41 फीसदी तक बढ़ जाता है.

बच्चों में बढ़ रही किडनी की बीमारी, ये हैं लक्षण

हम सभी स्वस्थ रहना चाहते हैं. बाहरी शरीर का ध्यान तो हम रखते हैं पर अंदर की सफाई कैसे होती है इसका अंदाजा हमें नहीं होता. आपको बता दें कि शरीर के अंदर की सफाई किडनी यानि कि गुर्दा संभालता है. ये हमारे शरीर की विषाक्त और अनावश्यक गंदगी को निकाल कर हमें अंदर से स्वस्थ रखता है.

कई हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि किडनी की परेशानी कई रूपों में हमें प्रभावित करती है. जिसमें कई तरह के इलाज संबंधी विकार शामिल हैं. आपको बता दें कि बच्चों में होने वाले मुख्य किडनी संबंधी रोग हैं- नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम, वीयूआरए यूटीआई आदि हैं. इस खबर में इन रोगों के लक्षण हम आपको बताएंगे ताकि समय रहते बच्चों का ख्याल आप रख सकें.

बच्चों में किडनी के रोगों के ये हैं लक्षण

चेहरे में सूजन, भूख में कमी, मितली, उच्च रक्तचाप, पेशाब संबंधी शिकायतें, कमजोरी, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, पेशाब में झाग आना, खुजली और पैरों में ऐंठन.

इसके अलावा मंद विकास, छोटा कद और पैरों की हड्डियों का झुकना जैसी परेशानियां खराब किडनी वाले बच्चों में देखी जाती है.

किडनी की बीमारियों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम आम बीमारी है. पेशाब में प्रोटीन का जाना, रक्त में प्रोटीन की मात्रा में कमी, कोलेस्ट्रौल का उच्च स्तर और शरीर में सूजन इस बीमारी के लक्षण हैं.

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी के छन्नी जैसे छेदों के बड़े हो जाने के कारण अतिरिक्त पानी और सेहत के लिए जरूरी पदार्थों के साथ-साथ शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन भी पेशाब के साथ निकल जाता है, जिससे शरीर में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और शरीर में सूजन आने लगती है.

बादाम-पिस्ता और मेवे का हलवा

सामग्री :

– 125 ग्राम मावा

– 100 ग्राम बादाम गिरी

– 150 ग्राम सूखी मलाई

– 100 ग्राम पिस्ता

– 3-4 केसर लच्छे

– हरी इलायची पावडर (आधा चम्मच)

–  1 बड़ा चम्मच गुलाब जल

– 125 ग्राम शुद्ध घी

– 300 ग्राम शक्कर

बनाने की विधि :

– सबसे पहले 6-8 घंटे पूर्व बादाम पानी में भिगो दें.

– इसके बाद बादाम के छिलके उतार कर मिक्सी में पीस लें.

-अब पिस्ता भी रवेदार पीस लें.

– मावे को दबा कर छलनी से मोटा-मोटा छान लें और मलाई की पतली स्ट्रिप्स काट लें.

– कड़ाही में घी गरम कर बादाम को पानी सूख जाने तक भूनें.

– फिर पिस्ता डालकर तब तक सेकें, जब तक सिंकने की खुशबू न आए.

– अब इसमें मावा मिलाएं और थोड़ी देर और सेंक लें.

– मलाई डालकर 5 मिनट सेंकें.

– जब सिंकने की खुशबू आने लगे तब आंच से उतारें और केसर-इलायची व गुलाब जल मिला दें.

– शक्कर की 2 तार की चाशनी बना लें,  इसमें मिश्रण डालें और गरमा-गरम मेवे का हलवा परोसे.

मेथी पराठा, स्वाद में जायकेदार…

सर्दी के मौसम में मेथी की भरमार होती है, इसलिए इस मौसम में मेथी के पराठे प्रमुखता से बनाए जाते हैं. तो आइए जा‍नते हैं कैसे बनाएं जायकेदार मेथी के पराठे.

सामग्री:

– गेहूं का आटा (1 कप)

–  बेसन (1/4 कप)

– लाल मिर्च (1/4 छोटी चम्मच)

– हल्दी पाउडर  (1/4 छोटी चम्मच)

–  अजवायन  (1/4 छोटी चम्मच)

– अदरक (पिसा हुआ, स्वादनुसार)

– लहसुन  (पिसा हुआ, स्वादनुसार)

– नमक (स्वादनुसार)

बनाने की विधि ‍-

– गेहूं के आटे में बेसन और बारीक कटी हुई मैथी डाल सभी मसाले मिलाएं और आटा गूंथ लें.

– आटा गूंथते समय इसमें थोड़ा सा तेल भी डाल लें.

– अब इसकी लोईयां बनाकर पराठे बनाएं और तवे पर सेकें.

– दोनों तरफ हल्का सा सिकने पर तेल लगाएं और फिर से सेकें.

– सही तरीके से सिकने पर चटनी, अचार या सब्जी के साथ परोसें.

सैक्स : प्यार में छेड़छाड़ है बेहद जरूरी

प्रिया का कहना है कि उस का पति जिस्मानी रिश्ता बनाते समय बिलकुल भी छेड़छाड़ नहीं करता और न ही प्यार भरी बातें करता है. उसे तो बस अपनी तसल्ली से मतलब होता है. जब तन की आग बुझ जाती है, तो निढाल हो कर चुपचाप सो जाता है. वह बिन पानी की मछली की तरह तड़पती ही रह जाती है. कुछ इसी तरह राजेंद्र का कहना है, ‘‘जिस्मानी रिश्ता कायम करते वक्त मेरी पत्नी बिलकुल सुस्त पड़ जाती है. वह न तो इनकार करती है और न ही प्यार में पूरी तरह हिस्सेदार बनती है. न ही छेड़छाड़ होती है और न ही रूठनामनाना. नतीजतन, सैक्स में कोई मजा ही नहीं आता.’’

इसी तरह सरिता की भी शिकायत है कि उस का पति उस के कहने पर जिस्मानी रिश्ता तो कायम करता है, पर वह सुख नहीं दे पाता, जो चरम सीमा पर पहुंचाता हो. हालांकि वह अपनी मंजिल पर पहुंच जाता है, फिर भी सरिता को ऐसा लगता है, मानो वह अपनी मंजिल पर पहुंच कर भी नहीं पहुंची. सैक्स के दौरान वह इतनी जल्दबाजी करता है, मानो कोई ट्रेन पकड़नी हो. उसे यह भी खयाल नहीं रहता कि सोते समय और भी कई राहों से गुजरना पड़ता है. मसलन छेड़छाड़, चुंबन, सहलाना वगैरह. नतीजतन, सरिता सुख भोग कर भी प्यासी ही रह जाती है.

मनोज की हालत तो सब से अलग  है. उस का कहना है, ‘‘मेरी पत्नी इतनी शरमीली है कि जिस्मानी रिश्ता ही नहीं बनाने देती. अगर मैं उस के संग जबरदस्ती करता हूं, तो वह नाराज हो जाती है. छेड़छाड़ करता हूं, तो तुनक जाती?है, मानो मैं कोई पराया मर्द हूं. समझाने पर वह कहती है कि अभी नहीं, इस के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी हुई है.’’ इसी तरह और भी अनगिनत पतिपत्नी हैं, जो एकदूसरे की दिली चाहत को बिलकुल नहीं समझते और न ही समझने की कोशिश करते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि शादीशुदा जिंदगी कच्चे धागे की तरह होती है. इस में जरा सी खरोंच लग जाए, तो वह पलभर में टूट सकती है.

पतिपत्नी में छेड़छाड़ तो बहुत जरूरी है, इस के बिना तो जिंदगी में कोई रस ही नहीं, इसलिए यह जरूरी है कि पति की छेड़छाड़ का जवाब पत्नी पूरे जोश से दे और पत्नी की छेड़छाड़ का जवाब पति भी दोगुने मजे से दे. इस से जिंदगी में हमेशा नएपन का एहसास होता है. अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने के दौरान या किसी दूसरे समय पर भी पति अपनी पत्नी को सहलाए और उस के जवाब में पत्नी पूरे जोश के साथ प्यार से पति के गालों को चूमते हुए अपने दांत गड़ा दे, तो उस मजे की कोई सीमा नहीं होती. पति तुरंत सैक्स सुख के सागर में डूबनेउतराने लगता है. इसी तरह पत्नी भी अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने से पहले या उस दौरान पति से छेड़छाड़ करते हुए उस के अंगों को सहला दे, तो कुदरती बात है कि पति जोश से भर उठेगा और उस के जोश की सीमा भी बढ़ जाएगी.

कभीकभी यह सवाल भी उठता है कि क्या जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए कायम किया जाता है? क्या दिमागी सुकून से उस का कोई लेनादेना नहीं होता? क्या जिस्मानी रिश्ते के दौरान छेड़छाड़ करना जरूरी है? क्या छेड़छाड़ सैक्स सुख में बढ़ोतरी करती है? क्या छेड़छाड़ से पतिपत्नी को सच्चा सुख मिलता है? इसी तरह और भी कई सवाल हैं, जो पतिपत्नी को बेचैन किए रहते हैं. जवाब यह है कि जिस्मानी रिश्तों के दौरान छेड़छाड़ व कुछ रोमांटिक बातें बहुत जरूरी हैं. इस के बिना तो सैक्स सुख का मजा बिलकुल अधूरा है. जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए ही नहीं, बल्कि दिमागी सुकून के लिए भी किया जाता है.

कुछ पति ऐसे होते हैं, जो पत्नी की मरजी की बिलकुल भी परवाह नहीं करते, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. पत्नी की चाहत का भी पूरा खयाल रखना चाहिए, नहीं तो आप की पत्नी जिंदगीभर तड़पती ही रह जाएगी. कुछ औरतें बिलकुल ही सुस्त होती हैं. वे पति को अपना जिस्म सौंप कर फर्ज अदायगी कर लेती हैं. उन्हें यह भी एहसास नहीं होता कि इस तरह वे अपने पति को अपने से दूर कर रही हैं. कुछ पति जिस्मानी रिश्ता तो कायम करते हैं और जल्दबाजी में अपनी मंजिल पर पहुंच भी जाते हैं, परंतु उन्हें इतना भी पता नहीं होता कि इस के पहले भी और कई काम होते हैं, जो उन के मजे को कई गुना बढ़ा सकते हैं.

कुछ औरतें शरमीली होती हैं. वे जिस्मानी रिश्तों से दूर तो होती ही हैं, छेड़छाड़ को भी बुरा मानती हैं. अब आप ही बताइए कि ऐसे हालात में क्या पत्नी पति से और पति पत्नी से खुश रह सकता है?

नहीं न… तो फिर ऐसे हालात ही क्यों पैदा किए जाएं, जिन से पतिपत्नी एकदूसरे से नाखुश रहें? इसलिए प्यार के सुनहरे पलों को छेड़छाड़, हंसीखुशी व रोमांटिक बातों में बिताइए, ताकि आने वाला कल आप के लिए और ज्यादा मजेदार बन जाए.

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