Download App

डेटिंग : लाइफ में भरे रोमांच, आप भी आजमा कर देखें

आज की व्यस्त जिंदगी में प्यार की राह में कदम बढ़ाने से पहले लड़का और लड़की एकदूसरे के बारे में काफी कुछ जान लेना चाहते हैं. इस के लिए वे डेट पर जाने का प्लान करते हैं. वैसे भी कुछ मुलाकातें किसी भी प्यार भरे रिश्ते को पूरा करने के लिए बहुत जरूरी होती हैं. ये मुलाकातें ही तय करती हैं कि आप का फ्यूचर कैसा होगा.

फिल्म लाइफ इन मैट्रोका हीरो

इरफान खान और हीरोइन कोंकणा सेन प्लान कर के पहली डेट पर मिलते हैं. लेकिन पहली बार मिलने पर इरफान की नजर कोंकणा पर कम उस के कपड़ों और फीगर पर ज्यादा होती है. ऐसे में कोंकणा का मूड खराब हो जाता है और वह सोचने लगती है कि कैसा है यह? इस का तो मेरे कपड़े और फीगर पर ही ध्यान है. अत: कोंकणा सेन को डेट पसंद नहीं आती है.

ऐसे में अगर आप अपनी डेट को यादगार बनाना चाहती हैं, तो जानिए कुछ खास बातें जो न सिर्फ आप के प्यार को परवान चढ़ाएंगी वरन चंद मुलाकातों में ही नजदीकियां भी बढ़ जाएंगी.

क्यों जरूरी है डेटिंग

मनोचिकित्सक प्रांजलि मल्होत्रा बताती हैं, ‘‘किसी अपोजिट सैक्स से मिलने की जो खुशी होती है वह किसी भी व्यक्ति को रोमांच से भर देती है. डेटिंग ही व्यक्ति को अपने रूटीन काम से हटा कर लाइफ में स्पार्क देती है और इसी से अच्छी फीलिंग्स आने लगती हैं. आप खुद पर न सिर्फ पूरी तरह से ध्यान देने लगती हैं वरन अपने कपड़ों, बिहेवियर पर भी ध्यान देने लगती हैं. दरअसल, हम सब में एक सैक्सुअल ऐनर्जी होती है, जो मनमस्तिष्क में रोमांच भर देती है. जब किसी से मिलने की खुशी होती है, तो वह ऐसी फीलिंग देती है कि उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. उसे लगता है कि वह किसी के लिए इतना इंर्पोटैंट है या समाज में डिजायरेबल है. तभी कोई उस से मिलना चाहता है. डेटिंग हमें सोशल ऐटिकेट्स भी सिखाती हैं.’’

डेटिंग करें जम कर

डेटिंग चाहे पार्टनर चुनने की हो या फ्रैंडशिप की, डेटिंग जम कर करें. डेट पर जाना अपनेआप में एक दिलचस्प अनुभव होता है. इस के जरीए एकदूसरे को समझनेपरखने का मौका मिलता है.

फर्स्ट डेट

डेट पर जाना किसी बड़े टास्क से कम नहीं होता है. यह किसी भी लड़के या लड़की के लिए महत्त्वपूर्ण पल होता है. फिर जब बात हो पहली डेट पर जाने की तो यह और भी जरूरी हो जाता है कि आप अपनी फर्स्ट डेट को यादगार बनाएं. फर्स्ट डेट पर आप अपना इंप्रैशन ऐसा दें कि सामने वाला आप से दोबारा मिलने को बेताब हो उठे. इस के लिए इन बातों का ध्यान रखें:

– समय और स्थान का चुनाव पहले ही कर लें और अपने तय समय से पहले पहुंच जाएं.

– पहली बार डेटिंग पर जा रही हैं, तो ज्यादा भड़कीले कपड़े पहनने के बजाय सिंपलसोबर बन कर जाएं. मेकअप भी कम से कम करें.

– पहली बार मिलने पर अपने पार्टनर के लिए गिफ्ट ले जाना न भूलें और गिफ्ट ऐसा हो जो उसे पसंद आए.

– पहली डेट पर ज्यादा ऐक्साइटमैंट न दिखाएं. अपने बिहेवियर को कंट्रोल में रखें. उस में बनावटीपन न लाएं.

डेटिंग को सफल बनाएं ऐसे

ड्रैस का चुनाव: आप ऐसे कपड़ों का चुनाव करें, जिन में न सिर्फ आप की पर्सनैलिटी में निखार आए, बल्कि आप कंफर्टेबल भी महसूस कर सकें.

डेटिंग के लिए स्थान व समय: फर्स्ट

डेट के लिए किसी सार्वजनिक स्थान का चयन करें ताकि आप सहज और सुरक्षित महसूस करें. फर्स्ट डेट पर ज्यादा समय न बिताएं. संभव हो तो मील लंच पर ही मिलें. इस से आप का पार्टनर आप के टाइम की वैल्यू भी समझेगा. फर्स्ट डेट पर जो बिल आए उसे शेयर जरूर करें.

क्या न करें

– डेटिंग को सिर्फ टाइमपास या मौजमस्ती न समझें, बल्कि सामने वाले को जाननेसमझने का मौका दें.

– डेटिंग के दौरान फ्लर्टिंग न करें.

– डेटिंग के दौरान धूम्रपान व नशीले पदार्थों का सेवन न करें.

– फर्स्ट डेट में ही ज्यादा करीब जाने की कोशिश न करें.

– अगर पार्टनर की कोई बात पसंद नहीं आ रही है तो चुप रहें. किसी बात पर बहस न करें.

– फर्स्ट डेट में फिजिकल होने की कोशिश न करें.

– फर्स्ट डेट में खुद ही न बोलती जाएं, बल्कि उस की भी सुनें.

– डेटिंग को इंटरव्यू न बनाएं और हंसीमजाक भी सोचसमझ कर करें.

जब पार्टनर हो नापसंद

किसी से मिलने से पहले आप उस के बारे में पौजिटिव ही सोचते हैं. लेकिन मिलने के बाद असलियत पता चलती है कि उस का लुक बिहेवियर कैसा है. दूर से सभी अच्छे लगते हैं. यदि पार्टनर पसंद न आए तो इन बातों पर गौर फरमाएं:

– फर्स्ट डेट को इक्वल टु शादी न समझें. पसंद न आने पर सिर्फ फ्रैंडशिप भी रख सकती हैं.

– पसंद न आने पर उस के साथ ज्यादा टाइम स्पैंड न करें.

– फर्स्ट डेट पर पसंद न आने पर भी अपनी नापसंद उस पर जाहिर न होने दें.

– जब भी किसी से फर्स्ट डेट पर मिलें पहले से ही उस के बारे में जानकारी ले लें कि वह कैसा है, तब प्रौब्लम नहीं होगी.

डेटिंग को बनाएं रोमांचक

आप अपनी फर्स्ट डेटिंग को इस तरह रोमांचक बना सकती हैं:

लौंग ड्राइव: युवाओं में लौंग ड्राइव का बहुत क्रेज होता है. आप अपने पार्टनर को ऐसी जगह ले जाएं जहां आप दोनों लौंग ड्राइव का भरपूर मजा ले सकें.

मूवी या पार्क: डेटिंग के दौरान मूवी देखने जा सकते हैं. यदि मूवी देखना पसंद न हो तो पार्क में बैठ सकते हैं.

इन्ट्रैस्टिंग उपाय: डेटिंग को रोमांचक बनाने के लिए आप बोटिंग, फिशिंग या और भी इन्ट्रैस्टिंग साधन ढूंढ़ सकते हैं.

विंडो शौपिंग: मस्ती और फन के साथ विंडो शौपिंग या फिर हौट शौपिंग भी कर सकते हैं. इस से आप एकदूसरे की पसंदनापसंद को भी जान पाएंगे.

गैटटुगैदर: किसी को जाननेसमझने का सब से अच्छा औप्शन है गैटटुगैदर. आप अपने पार्टनर को अधिक कंफर्टेबल महसूस करवाने के लिए घर पर भी कुछ और फ्रैंड्स के साथ गैटटुगैदर कर सकते हैं. आप चाहें तो घर पर ही कैंडल लाइट डिनर भी कर सकते हैं.

चेहरे के अनुरूप ऐसे चुनें चश्मा और उसे बनाएं अपना स्टाइल स्टेटमैंट

सनग्लासेज का चुनाव कुछ लोग आंखों को धूप  से बचाने के लिए करते हैं, तो कुछ स्टाइल के लिए तो कुछ अपने कार्यस्थल के हिसाब से आंखों को सुरक्षित रखने के लिए करते हैं. मगर बहुत कम लोग अपने चेहरे के आकार को ध्यान में रख कर चश्मे का चुनाव करते हैं.

ज्यादातर लोग धूप के चश्मे का चुनाव दुकान में लगे शीशे में 2-3 चश्मे लगा कर खुद को देखने के बाद तुरंत कर लेते हैं. यानी उन के लिए सनग्लासेज का चुनाव एक तरह की त्वरित प्रक्रिया होती है. लेकिन यदि आप को अपने चेहरे के आकार के बारे में जानकारी हो तो आप अपने लिए बेहतर धूप के चश्मे का चुनाव कर सकते हैं. ऐसा चश्मा आप की उपस्थिति को और भी आकर्षक बना सकता है.

क्या आप का चेहरा छोटा या लंबा अथवा वर्गाकार है? क्या आप धूप का चश्मा खरीदते वक्त इस का ध्यान रखते हैं? आप अपने चेहरे के अनुसार किस तरह बेहतर सनग्लासेज का चुनाव करें, आइए जानते हैं:

धूप का चश्मा कैसा हो

आप अपने चेहरे के बारे में थोड़ी जानकारी ले उसी के अनुरूप चश्मे का चुनाव करें, तो यकीन मानिए इस से आप का आकर्षण और बढ़ जाएगा. ऐसा चश्मा आप के आकार के अनुरूप एक ठोस संतुलन प्रदान कर सकता है.

उदाहरण के लिए, एक युवती जिस का चेहरा गोल है, उसे ऐसे चश्मे का चुनाव करना चाहिए, जो चेहरे के गोलाकार हिस्से को ढकता हो, न कि वह चेहरे से बाहर निकला हो या फिर चेहरे के अंदर ही हो. वहीं दूसरी तरफ जिस युवती का चेहरा छोटा है वह बड़े आकार के चश्मे का प्रयोग बिलकुल न करे, क्योंकि इस से उस का पूरा चेहरा ढक सकता है. आमतौर पर ऐविएटर लंबे चेहरे वाले आकार पर अधिक आकर्षक लगते हैं. वर्गाकार या आयताकार सनग्लासेज उन पर सब से अच्छे लगते हैं जिन का चेहरा आनुपातिक हो.

गोलाकार चेहरा

यदि आप का चेहरा गोलाकार है तो आप के लिए सब से बेहतर विकल्प आयताकार फ्रेम के चश्मे का चुनाव करना होगा. गोलाकार चेहरे की लंबाई और चौड़ाई लगभग समान होती है, जिस से आयताकार चश्मा उन के चेहरे पर आसानी से फिट हो जाएगा और यह फबेगा भी खूब. इस के अलावा आयताकार फ्रेम के चश्मे के चुनाव का यह फायदा भी है कि इसे लगाने के बाद चेहरा और पतला दिखेगा, जिस से आप का आकर्षण और बढ़ जाएगा. अत: गोलाकार चेहरे वाले कोणीय फ्रेम का चयन करें, जो उन के आकर्षण को और बढ़ा देगा.

आयताकार चेहरा

ऐसे चेहरे वाले रिमलैस ऐविएटर फ्रेम का चुनाव करें. यह उन के लिए बेहतरीन फ्रेम है. यह लंबे चेहरे को छोटा और व्यापक भी दिखाता है. गोलाकार वौल फ्रेम के धूप के चश्मे भी इस तरह के चेहरे पर खूब फबते हैं. इस से उन का चेहरा और भी लंबा और आकर्षक दिखाई देगा.

चौकोर चेहरा

इस तरह के चेहरे के आकार वालों का जबड़ा बहुत मजबूत होता है. इन का माथा भी चौड़ा होता है. इन्हें गोलाकार या फिर अंडाकार फ्रेम के चश्मे का चुनाव करना चाहिए. यह चेहरे के आकार के उतारचढ़ाव को समाप्त कर चेहरे पर फबता भी खूब है.

दिल के आकार वाला

इन का माथा चौड़ा और जबड़ा पतला होता है. ऐसे आकार वालों को ऐसे सनग्लासेज का चुनाव करना चाहिए, जो इस आकार में फबें. ऐसे आकार वालों के लिए ऐसा चश्मा हो जिस का ऊपर का हिस्सा चौड़ा और नीचे का संकरा हो. दिल के आकार वाले लोगों के लिए कैट आई फ्रेम बहुत बढि़या है. इन्हें ऐविएटर खरीदने से बचना चाहिए, क्योंकि यह उन के चेहरे के आकार को बिगाड़ सकता है.

अंडाकार चेहरा

इस तरह के चेहरे के आकार पर हर तरह का धूप का चश्मा फबेगा, क्योंकि इस शेप में सभी चश्मे आसानी से फिट हो जाते हैं.

एक आयताकार फ्रेम, एक रैट्रो स्क्वेयर फ्रेम, ऐविएटर या फिर स्पोर्टी सनग्लास जो चाहें उस का चुनाव कर सकते हैं.

आजादी के बाद महिलाओं की सोच ही नहीं लुक भी हुआ बोल्ड

आज महिलाएं घर की देहरी पार कर ऊंचे से ऊंचे मुकाम तक पहुंच रही हैं. मिस वर्ल्ड का खिताब लेना हो या मिस यूनिवर्स का, कौरपोरेट वर्ल्ड में नाम कमाना हो या पुरुषप्रधान क्षेत्रों में उत्कृष्टता साबित करनी हो, महिलाएं सामाजिक बेडि़यों को तोड़ कर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही हैं.

उन की सोच बोल्ड हुई है और इस के साथ ही उन के लुक और व्यक्तित्व में भी निखार आया है. पहनावा हो या मेकअप बोल्डनैस और इंडिपैंडैंसी हर पहलू में नजर आती हैं.

चर्चा में रहना है पसंद

हाल ही में दंगल फेम फातिमा शेख अपने बोल्ड फोटो शूट की वजह से सुर्खियों में रहीं. फातिमा ने इंस्टाग्राम पर 2 बोल्ड फोटो साझा किए. इन में वे बीच पर स्विमसूट पहने नजर आ रही हैं.

आज महिलाएं इस तरह के बोल्ड लुक द्वारा चर्चा में आने से गुरेज नहीं करतीं, बल्कि ऐंजौय करती हैं. बोल्ड लुक का एक उदाहरण मलाइका अरोड़ा भी हैं, जो अकसर अपने फैशन और बोल्ड स्टेटमैंट के लिए चर्चा में बनी रहती हैं.

क्रिएटिविटी का फंडा

आजकल लड़कियां और महिलाएं फैशनेबल और बोल्ड दिखने के लिए अपना अलग स्टाइल बनाती हैं. स्टाइल से ही ऐटीट्यूड डैवलप होता है, जिसे लोग हमेशा याद रखते हैं.

श्री लाइफस्टाइल की जौइंट मैनेजिंग डाइरैक्टर शीतल कपूर कहती हैं, ‘‘आप ने कौन सी फैंसी ड्रैस पहनी है इस से लोगों को मतलब नहीं होता, आप ने उसे कैसे कैरी किया है यह बात माने रखती है. ड्रैस लोगों की नजरों में आए और उन्हें अच्छी लगे, फिर चाहे वह इंडियन हो या वैस्टर्न. कोशिश करें कुछ ऐसा स्टाइल बनाएं जो अलग भी हो, बोल्ड भी हो और आप पर जंचे भी.

‘‘उदाहरण के लिए साड़ी एक पारंपरिक परिधान है पर आज की लड़कियां बौलीवुड हस्तियों से प्रभावित हो कर उसे ग्लैमरस टच देने से नहीं चूकतीं. साड़ी के साथ मैडरिन कौलर ब्लाउज, हाल्टर नैक ब्लाउज, लोकट स्लीवलैस ब्लाउज और नैट स्लीव वाले ब्लाउज कैरी कर काफी बोल्ड और स्टाइलिश नजर आती हैं.’’

फैशन का असर हर उम्र पर

अब महिलाएं खुद पर उम्र का असर नहीं आने देतीं. आज के समय में फैशन में बदलाव का असर हर उम्र में दिखता है. मां, नानीदादी, बूआ वगैरह पहले साडि़यां या सलवारकमीज के अलावा कुछ नहीं पहनती थीं. अब वे भी उतनी ही मौडर्न दिखना चाहती हैं, जितनी कि उन की बेटी और बहू. अब वे भी जींस, ट्राउजर, टीशर्ट और शर्ट में खुद को कंफर्टेबल पाती हैं और हमेशा जवां दिखना चाहती हैं.

आत्मविश्वास के लिए बोल्ड मेकअप

गिनीज रिकौर्ड होल्डर मेकअप आर्टिस्ट इशिका तनेजा कहती हैं कि मेकअप इनसान की ऊपरी सुंदरता ही नहीं निखारता, बल्कि दुनिया के सामने खुद को प्रस्तुत करने का आत्मविश्वास भी पैदा करता है. मेकअप के जरीए सुंदर बन कर महिला के मन में फीलगुड फैक्टर और आत्मविश्वास कूटकूट कर भर जाता है. इस आत्मविश्वास के साथ वह जो भी काम करती है, उस में सफलता निश्चित हो जाती है.

इशिका कहती हैं कि बोल्ड मेकअप आप को भीड़ से अलग करता है. बोल्ड दिखने के लिए आजकल ब्लैक और ट्रांसपैरेंट शेड के मसकारे की जगह पिंक से ले कर ग्रीन और यलो शेड के कलरफुल मसकारे ट्राई किए जाने लगे हैं. ये कलरफुल शेड्स न केवल आप की आंखों को बड़ा और खूबसूरत बनाते हैं, बल्कि ब्लैक मसकारे के मुकाबले ज्यादा आकर्षक भी नजर आते हैं.

बोल्ड लुक में लिपस्टिक के डार्क शेड्स जैसे रैड और पिंक चेहरे को अट्रैक्टिव लुक ही नहीं देते, बल्कि डार्क कलर चेहरे को लंबे समय तक ऐनर्जेटिक भी रखते हैं.

इसी तरह आंखों का स्मोकी लुक बोल्ड मेकअप में पसंद किया जाता है. आईब्रोज को पूरी तरह से बढ़ा कर या बिना शेप के रखा जाता है या उन्हें बनवाया जाता है, तो पौइंटर्स न  दे कर स्ट्रेट रखा जाता है. नाखूनों को नया लुक देने के लिए नेल आर्ट का इस्तेमाल किया जाता है.

कौस्मैटिक सर्जरी से बोल्ड लुक

आज कौस्मैटिक सर्जरी ने यह कमाल कर दिखाया है कि लोग सिर्फ अपने चेहरे को ही नहीं वरन बौडी पार्ट्स को भी नया और बोल्ड लुक दे सकते हैं. बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी बौडी कंटूरिंग क्लीनिक खुल गए हैं. महिलाएं शिल्पा शेट्टी जैसे कर्व, कैटरीना कैफ जैसे आकर्षक होंठ या प्रियंका चोपड़ा जैसा सैक्सी लुक पाने और बोल्ड दिखने के लिए यहां लाखों रुपए खर्च करने से भी गुरेज नहीं करतीं.

बीएलके सैंटर फौर कौस्मैटिक ऐंड सर्जरी के डा. लोकेश कुमार बताते हैं कि कौस्मैटिक सर्जरी द्वारा कई तरह से आकर्षक और बोल्ड लुक पाया जा सकता है जैसे:

फेस लिफ्टिंग: फेस लिफ्टिंग 2 तरह से की जाती है. पहला है पारंपरिक पद्घति जिस में सर्जिकल प्रक्रिया द्वारा ढीली त्वचा और झुर्रियों को ठीक किया जाता है. यह पूरी तरहएक औपरेशन जैसा होता है और 2-3 दिन अस्पताल में रहना पड़ता है. सर्जरी के द्वारा मांसपेशियों और त्वचा को टाइट कर दिया जाता है.

वे महिलाएं जिन्हें झुर्रियां नहीं हैं, मगर त्वचा ढीली पड़ने से चेहरा लटक गया हो, उन्हें बिना सर्जरी के फेसलिफ्ट कराने की सलाह दी जाती है. इस में डर्मल फिलर के द्वारा वौल्यूम बढ़ा दिया जाता है, जिस से त्वचा टाइट दिखती है. दूसरा तरीका है, त्वचा में थ्रेड डाल कर उसे अंदर ही अंदर टाइट कर देना, जिस से चेहरा लिफ्ट हो जाता है.

ब्रैस्ट कंटुअर्स: कई महिलाएं अपने स्तनों के आकार से संतुष्ट नहीं होतीं. उम्र के साथ स्तनों का ढीला हो जाना भी एक मुख्य समस्या है. ब्रैस्ट ऐनलार्जमैंट और ब्रैस्ट औगमैंटेशन द्वारा इन्हें मनचाहा आकार दिया जा सकता है. ब्रैस्ट इनहांसमैंट में सिलिकौन इंप्लांट सब से अधिक चलन में है. इस का कोई साइड इफैक्ट नहीं होता.

लिप सर्जरी: यह सर्जरी 2 कारणों से की जाती है. एक तो जिन के होंठ पतले होते हैं उन के लिए इनहांसमैंट सर्जरी की जाती है. इस में  सर्जरी के द्वारा होठों में स्टफिंग कर के उन के आकार को बड़ा किया जाता है.

दूसरा, जिन के होंठ बड़े और मोटे होते हैं, उन के लिए लिप रिडक्शन सर्जरी की जाती है. सर्जरी के अलावा एक नौन सर्जिकल तरीका भी है जिस में फिलर्स के द्वारा होंठों के लुक में बदलाव लाया जाता है.

नोज शेपिंग: कुछ लोगों की नाक उन के चेहरे पर सूट नहीं करती. सर्जरी के द्वारा नाक के आकार में बदलाव लाया जाता है ताकि वह उन के चेहरे पर फबे. इस सर्जरी के लिए अस्पताल में भरती होना पड़ता है और रिकवर होने में कम से कम 2-3 सप्ताह का समय लगता है.

टैटूज: आज की लड़कियों में अपने लुक को कूल और बोल्ड दिखाने के लिए टैटूज वगैरह बनवाने का क्रेज है. कुछ लड़कियां अपने मातापिता या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम का टैटू बनवाती हैं, अपने बौयफ्रैंड के नाम पर टैटू बनवाने वाली लड़कियों की भी कमी नहीं.

2019 में धमाल मचाने आ रही हैं ये शानदार वेब सीरीज

साल 2018 बौलीवुड फैन्स के लिए शानदार रहा, लेकिन अब ट्रेंड बदल गया है. दर्शक बौलीवुड फिल्मों की तरह वेब सीरीज के बोल्ड और मसालेदार कंटेंट को भी उतना ही पसंद कर रहे हैं.

2018 में वेब सीरीज पर लव, सेक्स, धोखा, गाली-गलौज, ड्रामा, कौमेडी, मारधाड़ और एक्शन के नाम पर पूरा मसाला देखने को मिला. अब 2019 में भी ऐसा ही मसालेदार कंटेंट देखने के लिए तैयार हो जाइए.

सेक्रेड गेम्स 2, मिर्जापुर 2, गंदी बात 2, ब्रीथ-2, बाहुबली, फौरगौटन आर्मी, पंच बीट जैसी कई बड़ी वेब सीरीज रिलीज होने के लिए तैयार हैं.

बाहुबली का होगा फिर आगमन

एसएस राजामौली की फिल्म ‘बाहुबली’ ने बौक्स औफिस पर रिकौर्डतोड़ कमाई की. अब ये वेब सीरीज के रूप में भी धमाल मचाने के लिए तैयार है. इस वेब सीरीज का नाम ‘बाहुबली बिफोर द बिगनिंग’ है, जो आनंद नीलकांतन की किताब ‘द राइज औफ शिवगामी’ पर आधारित है.

यानी इसमें राजा अमरेंद्र बाहुबली के शासनकाल से पहले माहिष्मति साम्राज्य की सबसे शक्तिशाली रानी शिवगामी देवी और कटप्पा के जीवन की कहानी दिखाई जाएगी.

एक बार फिर होगी ‘गंदी बात’

साल 2018 में औल्ट बालाजी ‘गंदी बात’ के नाम से बेहद बोल्ड वेब सीरीज लेकर आया था. अच्छे रिस्पौंस के बाद अब इसका दूसरा पार्ट ‘गंदी बात-2’ भी जल्दी लौंच होने वाली है. लेकिन सच पूछिए तो ये ऐसी वेब सीरीज में शामिल हो गई है, जिन्हें अकेले बैठकर देखा जाए, तो बेहतर होगा.

पिछले साल ‘सेक्रेड गेम्स’ में नवाजुद्दीन सिद्दीकी और एक्ट्रेस राजश्री ने एंटरटेनमेंट का भरपूर तड़का लगाया था. पूरे साल ये वेब सीरीज काफी चर्चा में रही थी. दर्शकों के एंटरटेन के लिए इसका दूसरा पार्ट भी जल्द ही लौंच होने वाला है.

ऐसे ही मिर्जापुर और ब्रीथ वेब सीरीज की सफलता के बाद दोनों के सेकंड पार्ट एक बार फिर धमाल मचाने के लिए तैयार हैं. अमेजन प्राइम ने ‘मिर्जापुर’ के जरिए गैंग और क्राइम की कहानी को पर्दे पर उतारा था. ‘ब्रीथ’ के पहले पार्ट में आर माधवन एक पिता की भूमिका में नजर आए थे, लेकिन अब दूसरे पार्ट में माधवन की जगह अभिषेक बच्चन नजर आएंगे.

भारत की ऐतिहासिक जीत पर क्या बोल गए कोहली

सिडनी की बरसात ने औस्ट्रेलिया की और ज्यादा फजीहत होने से बचा लिया वरना जिस तरह से चौथे और आखिरी टैस्ट मैच में भारत के गेंदबाज अपने रंगढंग दिखा रहे थे उस से तो यह सीरीज भारत की झोली में 3-1 से आ जाती. लेकिन कुछ भी कहें इतिहास तो अब रचा जा चुका है.

सोमवार, 7 जनवरी को सिडनी टैस्ट मैच के 5वें दिन जब बरसात के चलते अंपायरों ने मैच खत्म करने का फैसला लिया तो इस के साथ ही भारत ने 4 टैस्ट मैचों की सीरीज पर 2-1 से कब्जा कर लिया. यह जीत इसलिए ऐतिहासिक कहलाई जाएगी क्योंकि साल 1947 से लगातार औस्ट्रेलिया का दौरा कर रही भारतीय टीम वहां आज तक कोई भी टैस्ट सीरीज नहीं जीत पाई थी.

सिडनी वाले आखिरी टैस्ट मैच की बात करें तो भारत ने अपनी पहली पारी में चेतेश्वर पुजारा और ऋषभ पंत के शतकों की मदद से 7 विकेट पर 622 रन बना कर पारी को घोषित कर दिया था. इस के बाद फिरकी गेंदबाज कुलदीप यादव के 5 विकेटों की बदौलत भारत ने औस्ट्रेलिया को उस की पहली पारी में 300 रनों पर समेट दिया था. नतीजतन, भारत ने 322 रनों की बढ़त के साथ औस्ट्रेलिया को फौलोआन दिया, लेकिन उस के बाद मौसम के बिगड़े मिजाज ने मेजबान टीम को इतनी राहत तो दिला ही दी कि यह मैच बिना किसी नतीजे का रहा. सिडनी में बारिश के चलते मैच के चौथे दिन के 2 सैशन और आखिरी दिन पूरी तरह बारिश की भेंट चढ़ गया.

इस सीरीज की शुरुआत 6 दिसंबर, 2018 से एडिलेड में हुई थी जहां भारत ने मेजबान टीम को 31 रनों से मात दी थी, जबकि इस सीरीज का दूसरा टैस्ट मैच पर्थ में खेला गया था. वहां औस्ट्रेलिया ने भारत को 146 रनों से हारते हुए सीरीज को 1-1 से बराबर कर दिया था. मेलबर्न में खेले गए तीसरे ‘बौक्सिंग डे’ टैस्ट मैच  में भारत ने एक बार फिर वापसी की और औस्ट्रेलिया को 137 रनों  से हरा कर सीरीज में 2-1 से बढ़त  हासिल कर ली. सिडनी मैच का नतीजा तो आप को पता ही है.

इस जीत पर भारत के कप्तान विराट कोहली ने कहा, ”सब से पहले मैं यह कहना चाहता हूं कि टीम का हिस्सा बनते हुए मुझे इस से ज्यादा खुशी कभी नहीं हुई. मैं ने यहीं पहली बार कप्तानी की थी और आज यहां हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं. मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि 4 साल बाद हम यहां टैस्ट सीरीज जीते हैं. मैं सिर्फ एक शब्द कहना चाहता हूं, ‘प्राउड’. इस टीम की कप्तानी करते हुए मुझे गर्व है और मैं खुद को खुशकिस्मत समझता हूं. खिलाड़ी अपने कप्तान को बेहतर दिखाते हैं…

‘यह मेरे कैरियर की सब से बड़ी उपलब्धि है. जब साल 2011 में हम वर्ल्ड कप जीते थे तो मैं टीम का सब से युवा सदस्य था. मैं ने सब को वहां भावुक होते देखा था. मुझे वहां वह अहसास नहीं हुआ. अब यहां 3 बार आने के बाद मैं कह सकता हूं यह सीरीज जीतना मेरे लिए कुछ अलग है. हम वह हासिल करने में कामयाब रहे हैं जिस पर गर्व कर सकते हैं.”

विराट कोहली ने इस मौके पर अपनी टीम के साथी खिलाड़ियों की खूब तारीफ की. उन्होंने खासतौर पर चेतेश्वर पुजारा की खूब तारीफ करते हुए कहा, ” मैं पुजारा का नाम खास लेना चाहूंगा. वे सीरीज मे शानदार खेले.”

वैसे, विराट कोहली थोड़े निराश भी दिखे और उन्होंने कहा भी कि वे यह सीरीज 2-1 की जगह 3-1 से जीतना चाहते थे पर बारिश और खराब रोशनी की वजह से ऐसा नहीं हो सका क्योंकि  मौसम पर किसी का बस नहीं चलता.

अगर इतिहास कि बात करें तो भारतीय टीम ने औस्ट्रेलिया में जा कर 13 बार टैस्ट मैच की सीरीज खेली है, जिस में से सिर्फ 3 बार ही 1980-81, 1985-86 और 2003-04 में वह अपनी सीरीज को ड्रा करने में कामयाब रही है. अब जा कर उसे यह शानदार जीत मिली है.

इन ऐप से दूर होकर भी रखें घर पर नजर

क्या आपको पता है कि अगर आप घर पर ना हो तो कुछ ऐप घर पर नजर रखने में आपकी मदद कर सकते हैं. चलिए आज हम आपको ऐसी ही कुछ ऐप और तकनीक के बारे में बताते हैं जिसका इस्तेमाल कर आप कहीं से भी अपने घर और घर में मौजूद लोगों की स्थिति का पता लगा सकते हैं. आप उनसे फेस टू फेस जुड़े रह सकते हैं. वो भी बिना फोन नंबर घुमाए.

हम आपको कुछ ऐसे ऐप सुझा रहे हैं, जो आपको सर्वेलाएंस सिस्टम पर मोटी रकम खर्च किए बिना घर और घरवालों से जोड़े रख सकते हैं. यानी, घर की सुरक्षा अब आपसे केवल एक टच दूर होगी-

प्रिजेंस (Presence)

प्रिजेंस एक वीडियो कैमरा ऐप है, जिसमें सर्वेलाएंस फीचर है. इसमें दोनों (आपके फोन और घर पर रखे फोन के बीच) से वीडियो-औडियो का आदान प्रदान हो सकता है. ऐप में कनेक्ट की गई दो डिवाइसेज में से एक मौनिटर और एक कैमरे का काम करती है. एक पुराना फोन लीजिए और उसे वाई-फाई की मदद से उसे लाइव स्ट्रीमिंग वीडियो डिवाइस बना दीजिए. अब ऐप को घर में रखी डिवाइस में एक्टिव रखें. यह ऐप, मोशन डिटेक्शन फीचर से भी लैस है, जिसमें किसी भी हरकत की जानकारी आप तक पहुंच जाएगी. इस तरह आप दूर बैठकर औडियो, वीडियो के सहारे घर व घरवालों से जुड़े रह सकते हैं. यह ऐप एंड्रायड व आईओएस, दोनों यूजर के लिए उपलब्ध है.

iCamSpy

जैसा कि नाम से आप अंदाजा लगा सकते हैं, इस ऐप की मदद से घर या किसी भी जगह पर नजर रखना संभव है. दो मोबाइल फोन इस्तेमाल करने के बजाय, इसमें एक मोबाइल और पीसी की जरूरत पड़ेगी. ऐप इंस्टाल कीजिए. पीसी पर iCamSpy.com के सहारे लौगिन कीजिए. फिर माइक्रोफोन व वेबकैम के जरिए आपका घर आपके मोबाइल फोन से जुड़ जाएगा. बता दें कि यह प्रिजेंस की तरह दो तरफा संवाद का फीचर नहीं देता. इसमें आप सिर्फ सर्वेलाएंस की सुविधा पाएंगे. हालांकि, इसमें मोशन डिटेक्शन फीचर है, जो आपको विपरीत समय पर अपडेट कर देगा.

Make old smartphone as Free Home Security Camera

आप अपने पुराने फोन को इस ऐप से जोड़कर घर व दुकान की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं. यानी, आपको महंगे सर्वेलाएंस पर पैसा खर्चने की जरूरत नहीं पड़ेगी. उच्च तकनीक की वीडियो स्ट्रीमिंग इस ऐप से संभव है. मोशन डिटेक्शन फीचर भी इसमें मौजूद है.

Salient Eye, Home Security Camera & Burglar Alarm

इस ऐप की मदद से भी किसी पुराने फोन को सर्वेलाएंस सिस्टम में बदला जा सकता है. आप किसी टैबलेट को भी ऐप सेटअप कर घर पर छोड़ सकते हैं. ऐप की खासियत है कि यह मोशन डिटेक्ट करने के साथ तस्वीरें भी रिकौर्ड कर लेता है. आपको ई-मेल के जरिए अलर्ट करता है.

Alfred

एल्फ्रेड एक एंड्रायड सिक्यौरिटी कैमरा ऐप है, जिससे दूर बैठे घर की सुरक्षा पर नजर रखना संभव है. जानकारों का मानना है कि इस ऐप का इंटरफेस ऐसा है कि यूजर साइन-अप और लौगिन में नहीं उलझता. इसके जरिए आप किसी स्मार्टफोन को सिक्यौरिटी कैमरे में स्विच कर सकते हैं. पुराने स्मार्टफोन का इससे बेहतर इस्तेमाल आप शायद ही कर पाएं.

समाज के क्रूर चेहरे से लड़ीं केतकी

‘औरतें तब गंजी होती हैं जब उन का पति मर जाता है. इस का तो पति जिंदा है, जरूर इस ने पाप किए होंगे, तभी भरी जवानी में गंजी हो गई है.’

‘अरे, एक तरफ हट जाओ, वह अपशकुनी आ रही है. सामने पड़ेगी तो न जानें क्या आफत आ जाए?’

‘एक किशोर दूसरे से, ‘वो देख रहे हो न, जो आंटी जा रही हैं, वो जल्दी ही मर जाएंगी. उन्होंने पाप किया है, इसलिए गंजी हो गई हैं.’

इन्हें फब्तियां तो नहीं कहना चाहिए मगर 40 वर्षीया केतकी जानी की जिंदगी में अचानक आए ये कमैंट फब्तियों से भी कहीं ज्यादा दिल को छलनी करने वाले थे. ये कमैंट ऐसी गालियां थीं, जिन्हें सुनते हुए वे हरपल मर रही थीं. सब से बड़ी बात तो यह भी कि 10 जनवरी, 1971 को अहमदाबाद के एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में जन्मी केतकी जानी को फब्तियों की शक्ल में ये जो गालियां मिल रही थीं, उस के लिए वे कुसूरवार बिलकुल नहीं थीं.

केतकी ने एमए, बीएड तक की पढ़ाई की थी. उन की अपने ही जैसे पढ़ेलिखे नितेश जानी से साल 1993 में शादी हो गई थी. एक साल बाद ही एक परी सी प्यारी बेटी भी उन की गोद में आ गई थी. जब वे जिंदगी में कुछ और बेहतर पाने के लिए 1997 में अहमदाबाद से पुणे आईं तो इस के अगले ही साल वे एक प्यारे से बेटे की भी मां बन गईं. इस तरह उन की दुनिया खुशियों से लबालब हो गई थी.

उन्हें महाराष्ट्र राज्य पाठयक्रम ब्यूरो में गुजराती भाषा विभाग में स्पैशल औफिसर की शानदार नौकरी भी मिल चुकी थी.

लेकिन उन की खुशियों से भरी जिंदगी में अचानक मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. आप भी मिलिए एलोपेशिया के खौफ को मात देने वाली केतकी जानी से.

आखिर ऐसा क्या हुआ, जिस ने आप की खुशियों की पटरी पर सरपट दौड़ रही जिंदगी की गाड़ी को पटरी से उतार दिया?

मेरे इस सवाल पर केतकी जानी एक पल में 7 साल पीछे लौट जाती हैं. कुछ याद करते ही उन के चेहरे पर एक अनकही पीड़ा उभर आती है. फिर कहना शुरू करती हैं, ‘‘यह साल 2011 की गरमी (शायद मई) का एक दिन था. मैं ऐसे ही अपनी कुरसी पर बैठी थी, जैसे अभी आप के सामने बैठी हूं. सिर में हलकी सी खुजली हुई और मैं खुजलाने लगी. तभी अचानक लगा कि जैसे मैं जहां खुजला रही हूं, सिर के उस हिस्से में बाल ही नहीं हैं. पहले मुझे लगा यह वहम है. लेकिन जब बारबार मैं ने सिर के उस हिस्से पर उंगलियां फिराईं, जिस हिस्से में लग रहा था, चिकनी त्वचा का एक चकत्ता है, तो यह नंगी त्वचा का लिबलिबा सा एहसास मुझे परेशान करने लगा. मैं ने अपनी एक सहकर्मी को बुलाया और कहा, ‘देखो, क्या मेरे सिर में इस जगह बाल नहीं हैं?’ सहकर्मी ने ध्यान से देखा और कहा, ‘अरे हां, यहां तो बाल बिलकुल हैं ही नहीं. ऐसा कैसे हो गया?’

फिर मैं अपनी उसी सहकर्मी के साथ एक डाक्टर के पास गई, उसे दिखाया. पहले दिन तो उस ने कुछ नहीं कहा, बस, दोचार बातें पूछीं. ढेर सारे आश्वासन और दवा दे दी यह कहते हुए कि उस से बाल वापस आ जाएंगे. साथ ही एक हफ्ते बाद फिर से आने को कहा. लेकिन मैं 2 दिनों बाद ही पहुंच गई क्योंकि सिर में बिना बालों वाला जो चकत्ता महज कुछ मिलीमीटर का था, वह 2 दिनों बाद ही अब अपने आकार से कई गुना ज्यादा हो गया था.

भयानक डर और दहशत की झुरझुरी तो नहाने के समय और सुबह सो कर जगने के समय होती, जब देखती कि मेरे सिर से बाल झड़ रहे हैं. सुबह जब सो कर जगती तो देखती कि तकिया बालों से भर गया है, लेकिन उस से भी कई गुना ज्यादा बाल तब दिखते, जब मैं नहाती. पूरा बाथरूम बालों से भर जाता.’’

क्या इस से आप को एहसास होने लगा कि आप बहुत तेजी से गंजी हो रही हैं? पूछने पर उन्होंने बताया, ‘‘हां, बेहद डरावना एहसास होने लगा था. अब हर पल एक ही बात दिलोदिमाग पर गूंजने लगी, अगर पूरी तरह से गंजी हो गई तो क्या होगा? कैसे अपने बच्चों का, पति का, ससुराल वालों का, मायके वालों का, दफ्तर का, दोस्तों का और रास्ते में चलतेफिरते आम लोगों का सामना करूंगी? यह सब सोच कर मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ती रहतीं.

‘‘डाक्टर ने जल्द ही बता दिया कि मैं ‘एलोपेशिया’ नामक बालों की दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त हूं, जिस का दुनिया में अभी तक कोई इलाज नहीं है. शायद इस हकीकत की वजह से ही अमेरिका और दूसरे देशों में एलोपेशिया के शिकार लोगों ने अपने समूह बना रखे हैं. उन के अपने क्लब हैं. उन की अपनी गतिविधियां हैं और सरकार व समाज के साथ बेहतर सहानुभूतिभरे संबंध हैं. इस वजह से विदेशों में एलोपेशिया के साथ जीना मुश्किल नहीं है. लेकिन भारत में बिलकुल उलटी स्थिति है.

‘‘यहां गंजी औरत (लोग यह जानने की कोशिश नहीं करते कि क्यों गंजी है और न ही यह कि यह कोई बीमारी भी है, जिस में गंजे होने वाले का अपना कोई वश नहीं है) तमाम सारे अपशकुनों का समुच्चय है.

‘‘और भी कई खौफ हैं सिर में बाल न होने के. शायद इसी वजह से मैं गिरते बालों और तेजी से होते गंजेपन के चलते सदमे में थी.

‘‘मगर सासुमां चूंकि जवानी के दिनों में ही विधवा हो गई थीं, जिस कारण उन्हें अपने सिर के बाल निकलवा कर गंजा होना पड़ा था, इसलिए वे गंजेपन व उस की भयावहता को बहुत अच्छे ढंग से जानती थीं. यही वजह थी कि उन्होंने हिचकते हुए मुझे कुछ हिदायतें देनी शुरू कीं, मसलन गंजी खोपड़ी के साथ किसी के सामने मत आ जाना. किसी के घर में अगर मंगलकार्य हो रहे हों तो वहां जाने से बचना. इस के अलावा और भी ऐसी तमाम हिदायतें जो भले मुझे सहूलियत के लिए दी जा रही थीं, लेकिन हर गुजरते पल के साथ वे मुझे छलनी कर रही थीं. हालांकि अभी मैं पूरी तरह से गंजी नहीं हुई थी लेकिन उन्हें पता नहीं क्यों लग रहा था. शायद मैं इसी दिशा में आगे बढ़ रही हूं. आप समझ सकते हैं यह कितना अपमानजनक और दहशतभरा था.’’

‘‘मैं ने एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, तीसरे के बाद चौथा. 6 महीने के भीतर कई डाक्टर बदल डाले. सभी डाक्टरों से कहा, किसी भी कीमत पर मुझे मेरे बाल चाहिए, क्योंकि मैं डायन होने का तमगा नहीं लेना चाहती थी. मैं अपशकुनी होने का अपमानजनक लांछन नहीं झेलना चाहती थी. इस के लिए मैं अपनी हैसियत से भी ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए तैयार थी. यही वजह है कि हर डाक्टर मुझे आश्वासन देता, अच्छीखासी फीस लेता, दवा के नाम पर स्टेराइड देता, जिस से तात्कालिक तौर पर कुछ बाल तो आते लेकिन जल्द ही वे फिर गिर जाते.

‘‘स्टेराइड ने मेरे शरीर में तमाम किस्म की परेशानियां पैदा करनी भी शुरू कर दीं. मेरा वजन 50 किलो से बढ़ कर 85 किलो हो गया. याददाश्त कमजोर हो गई. पूरी तरह से गंजी हो कर मैं दुनिया का सामना कैसे करूंगी? इस से तो बेहतर है कि मैं मर जाऊं. यही सब सोच कर मैं उन दिनों हर पल दहशत में रहती. बदहवासी मेरी स्थायी पहचान बनने लगी, जिस का नतीजा मेरे काम पर भी बहुत बुरा हुआ और जिंदगी के ऊपर भी अनिश्चिय की तलवार लटकने लगी. एक दिन तो मैं ने आत्महत्या करने का भी फैसला कर लिया. आत्महत्या करने के अंतिम पल तक पहुंच गई. लेकिन फिर अचानक यह सोच कर कि बच्चे मुझे इस हाल में देख कर क्या सोचेंगे, रुक गई.’’

आखिर यह खौफनाक हिस्टीरियाई अंदाज वाला व्यवहार क्यों? मेरे कहने पर उन्होंने कहा, ‘‘क्योंकि अब तक मैं गंजे होने की दहशत से परेशान हो चुकी थी. मैं यह सब इसलिए भी कर रही थी, क्योंकि मैं ने देखा है कि समाज में गंजी औरतों के साथ वर्तमान में किस तरह का सुलूक किया जाता है और कैसेकैसे भेदभाव होते रहे हैं. इस सब को ले कर बहुतकुछ पढ़ लिया था. यह जानकारी ही मेरी बदहवासी का बायस बन गई थी. मैं ने जैसेजैसे एलोपेशिया से पीडि़त तमाम महिलाओं की कहानियां पढ़ीं, वैसेवैसे मैं सिहरती गई.

‘‘दरअसल, हमारा समाज गंजी औरत को कभी नहीं स्वीकार करता, जबकि गंजे पुरुष सहजता से जिंदगी जीते रहते हैं. यह अकारण नहीं है कि हमारे इर्दगिर्द कोई औरत कभी गंजी नहीं दिखती, बशर्ते वह कोई साध्वी या मौडल न हो. हालांकि ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में गंजी औरतें होती ही नहीं, होती तो हैं, लेकिन समाज के भय से अपने को छिपाए रखती हैं. उन पर सामाजिक बदनामी का इतना बड़ा शिंकजा जकड़ा होता है कि वे या उन का घरपिरवार बाहरी लोगों को कभी जानने ही नहीं देता कि वे एलोपेशिया से ग्रस्त हैं या गंजी हैं.

‘‘मुझे पता चला कि गुजरात में मेरी जैसी ही एक महिला को उस के पति ने 40 सालों तक खेतों में एक कोठरी बनवा कर रखा, जिस के दरवाजे बंद रहते थे. वह हमेशा इसी बंद कोठरी में रहने को मजबूर होती थी. उसे हमेशा दरवाजे के नीचे से ही खाना दे दिया जाता था. इन जैसी कहानियों को जान कर मुझे लगता कि मैं क्यों जिंदा हूं?’’

फिर जिंदगी में यूटर्न कैसे आया? आप केतकी कैसे बनीं?, ‘‘यह बस एक दिन अचानक ही हो गया. जब मेरी बेटी पुण्यजा ने एक दिन कहा, ‘ममा, मैं भी अपना सिर मुंडवा लेती हूं. फिर हम दोनों साथसाथ मुंडे हुए सिर के साथ बाहर जाएंगे. 3 साल आप ने यह सोचने में गुजार दिए कि लोग क्या सोच रहे हैं? यह उन की परेशानी है. अब आप अपने बारे में सोचो. मां, आप गंजे होने में भी बहुत खूबसूरत लगती हो.’ बेटी के इस प्रोत्साहनभरे वाक्य ने कमाल कर दिया. उस के इन शब्दों ने बल ही नहीं दिया, बल्कि मेरी आंखें भी खोल दीं.

‘‘मैं ने उसी दिन फैसला कर लिया कि बहुत हो चुका डरना, बहुत हो चुका खौफ में, दहशत में जीना. मैं ने न जाने कितने जतन से अपने गंजेपन को छिपाने के लिए तमाम किस्म के जो स्कार्फ इकट्ठा किए थे, उन्हें फेंक दिया और अगले दिन बिना स्कार्फ के दफ्तर आ गई. सहकर्मी हैरान हुए. लेकिन कुछ ही मिनटों में मैं ने महसूस किया कि जैसे सदियों का छाती में रखा मेरा बोझ उतर गया. मैं ने काफी हलकापन महसूस किया.

‘‘अब मेरे दफ्तर में कोई आ रहा होता तो दौड़ कर मेरी सहायक मुझ से यह कहने नहीं आती कि मैं कैप पहन लूं या फिर स्कार्फ बांध लूं. मुझे काफी अच्छा लगने लगा कि मैं अपना सामना कर रही हूं. इस से मुझे काफी राहत मिली.’’

क्या लोगों की तरस पर अब तक विराम लग सका है और फिर यह गंजी खोपड़ी पर टैटू कब बनवाया व आप के जो कैटवाक की परीकथाओं जैसे किस्से हैं, उन का सिलसिला कब और कैसे शुरू हुआ? इस पर वे बताती हैं, ‘‘पूरी तरह से लोगों का मुझ पर तरस खाना बंद तो नहीं हुआ पर अब मेरे घरपरिवार और रिश्तेदारों को मुझे ले कर कोई शर्म नहीं आती. उलटे उन्हें मुझ पर गर्व है और मेरा परिवार मुझे बहादुर होने के अवार्ड से नवाजता है. जहां तक गंजी खोपड़ी में टैटू बनवाने का खयाल है, दरअसल, मैं हमेशा से टैटू बनवाना चाहती थी, लेकिन जब तक मैं गंजी नहीं हुई थी, मुझे शरीर में ऐसी कोई जगह ही नहीं मिल रही थी कि मैं वहां टैटू बनवा सकूं.

‘‘मैं ने सिर में ब्रह्मांड के चित्र जैसा टैटू बनवा लिया. लेकिन यह आसान नहीं था. टैटू बनाने वाले ने भी मुझे एक बार मना कर दिया. दरअसल, वह डर गया था. उस का कहना था बहुत दर्द होगा और संभव है कुछ कंपलीकेशंस भी पैदा हो जाएं. इसलिए मैं नहीं बनाऊंगा. लेकिन मैं जिद पर अड़ी रही और आखिरकार टैटू बनवा लिया.

‘‘जहां तक मेरी मौडलिंग के किस्सों का सवाल है, उस की शुरुआत तो एक खुराफात से हुई. दरअसल, सोशल मीडिया में एक विज्ञापन आया था, ‘मिसेज इंडिया वर्ल्डवाइड प्रतियोगिता.’ उस में भाग लेने वाले प्रतियोगियों को अपने बालों के रंगों का विवरण देना था कि उन के बाल कैसे हैं, काले, भूरे, गहरे भूरे, हलके काले वगैरहवगैरह. मुझे शरारत सूझी. मैं ने भी फौर्म भरा और बालों के रंगों के विवरण की जगह लिख दिया ‘नो हेयर.’ मुझे लगा था, मेरा यह सच उन्हें मेरे बारे में सोचने के लिए भी मजबूर नहीं करेगा, लेकिन मैं तब हैरान हो गई जब मुझे प्रतियोगिता में शामिल होने के पहले चरण के लिए मुंबई बुलाया गया.

‘‘7 नवंबर, 2016 को मुंबई में प्रतियोगिता का पहला राउंड हुआ. मैं ने कैटवाक किया. सवालजवाब के राउंड से भी गुजरी. मैं ने पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा, ‘मैं यहां एक अलग उद्देश्य ले कर आई हूं. मैं दूसरे लोगों से अलग नहीं हूं. मेरा दिल भी आम लोगों की तरह ही ध?ड़कता है. लेकिन जब मेरे गंजे होने की वजह से, जिस का कारण मैं नहीं हूं, लोगों की कुतूहलभरी नजरें मेरे अंदर धंसती हैं, तो मैं बहुत हताश होती हूं. मैं ने इसीलिए इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है कि दुनिया को बता सकूं कि मैं भी सब के जैसी हूं. यह प्रतियोगिता मेरे लिए हारजीत नहीं, बल्कि मेरे जैसी तमाम महिलाओं में जीवन को ले कर जिजीविषा जगाने का मंच है.

‘‘मैं चाहती हूं गंजेपन के चलते निराशा के दलदल में फंस कर कोई महिला अपनी जान न गंवाए. इस प्रतियोगिता में हिस्सेदारी करने का मेरा मकसद उन में यही आशा जगाना है कि हम भी दूसरों की तरह कुछ भी कर सकते हैं. मेरे इस जवाब के आधार पर मुझे ‘मिसेज इंसपिरेशन कैटेगरी’ की विजेता चुना गया. मैं ने 32 प्रतियोगियों को पछाड़ कर सफलता पाई.

‘‘इस प्रतियोगिता के मंच पर मुझे असली अवार्ड तो तब मिला जब जीनत अमान ने मुझे गले लगा कर कहा, ‘भले ही खिताब किसी को मिले, मेरे लिए तो तुम ही विजेता हो. फिल्म इंडस्ट्री में बहुत लोग ऐसे हैं जिन के सिर में कम बाल हैं या जो पूरी तरह से गंजे हैं, लेकिन वे कभी एक पल को भी बिना विग के बाहर नहीं निकलते. तुम बहादुर लेडी हो.’ सचमुच मेरे लिए यह बड़ा अवार्ड था, इस के बाद तो मुझे दर्जनों ऐसी प्रतिस्पर्धाओं में बुलाया गया और हर जगह मैं कोई न कोई अवार्ड ले कर लौटी.

‘‘अभी हाल ही में मुझे मिसेज कौन्फिडैंट का खिताब मिला जिस ने एक बार फिर खुशी दी है.’’

आम चुनाव 2019 सीरीज (पार्ट-1) : जनता जाने सरकार का लेखाजोखा

एक पुरानी मिसाल है कि जब अपनी गलती या आलोचना का तार्किक जवाब न सूझे तो प्रश्नकर्ता के सवाल में व्याकरण की अशुद्धियां ढूंढ़ना शुरू कर दो. इस शातिर तरीके से बात गोलमोल हो जाएगी और आप जवाब देने से भी बच जाएंगे.

कुछ इसी आशय के साथ केंद्र सरकार भी 5 राज्यों के हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों से भले ही हताश होती नजर आई, लेकिन हार की जिम्मेदारी लेने के बजाय आरोपप्रत्यारोप का खेल खेलने लगी. किसी भी भाजपाई ने खुल कर हार नहीं स्वीकारी. जब भाजपा केंद्र में आई थी और सालों बाद उत्तर प्रदेश सरीखे राज्य जीत रही थी तब जीत का सारा श्रेय नरेंद्र मोदी ले रहे थे, पर अब हार का ठीकरा सीएम कैंडिडेट्स पर फोड़ा जा रहा है.

अपनी नाकामी छिपाने के लिए राहुल को पप्पू बताने वाली भाजपा को शायद अब राहुल गांधी के बढ़ते कद का अंदाजा हो गया है, लेकिन बात वहीं की वहीं है कि इन चुनावों में मिली हार राहुल की जीत है तो मोदी ब्रैंड की हार भी है. लेकिन केंद्र सरकार को जब उस के चुनाव से पहले किए गए वादों की याद दिलाई जाती है तो वह विपक्ष के बिखराव, राहुल गांधी का मजाक, उन की जाति, धर्म व देश पर सवाल, हिंदुत्व कार्ड और कोरी योजनाओं का ढोल पीट कर असली मुद्दे और जवाब से मुंह चुराने लगती है.

लेकिन ‘पब्लिक सब जानती है’ की तर्ज पर 5 राज्यों में हुए चुनावों में जनता ने साफ संकेत दे दिया है कि वह मंदिरमसजिद व चायपकौड़े जैसी बातों में नहीं आएगी, बल्कि अपने वोटों के जरिए जवाब देगी. सो, उस ने दिया भी. अब बारी लोकसभा चुनाव की है.

केंद्र सरकार अपना कार्यकाल लगभग पूरा कर चुकी है और आगामी लोकसभा चुनाव नजदीक हैं. लिहाजा, इस बात पर विमर्श जरूरी है कि जनता ने सरकार से क्या अपेक्षाएं की थीं और उन्हें असल में मिला क्या. अफसोस यह है कि केंद्र सरकार के टालू रवैए के चलते इस पर कभी पड़ताल हो ही नहीं पाती.

‘सरकार का लेखाजोखा’ शृंखला में हम इसी बात की पड़ताल करेंगे कि साढ़े 4 साल से भी ज्यादा समय में केंद्र सरकार ने जनता के लिए अलगअलग मोरचों पर क्या किया, क्या नहीं.

सीरीज के इस भाग में रोजगार, आर्थिक,  अपराध, महिला सुरक्षा, कानूनव्यवस्था और स्वच्छ भारत पर बात होगी.

रोजगार पर हाहाकार क्यों

22 नवंबर, 2013 को आगरा में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि यदि हमारी पार्टी यानी भाजपा सत्ता में आती है तो प्रतिवर्ष 2 करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाएगा. नरेंद्र मोदी ने उस दौरान मनमोहन सरकार पर ‘जौबलैस ग्रोथ’ का ताना भी जड़ा था, लेकिन अब चूंकि साढ़े 4 साल से ज्यादा हो गए हैं केंद्र में उन्हें, तो इस बात की पड़ताल जरूरी है कि उन्होंने रोजगार के मोरचे पर कौन से तीर मारे हैं.

श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भी अप्रैल 2018 आतेआते भारत दुनिया में सर्वाधिक बेरोजगारों का देश बन चुका है. भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली निजी एजेंसी सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन यानी सीएमआईई की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश में पिछले एक साल में बेरोजगारी दर 70 प्रतिशत बढ़ चुकी है. भारतीय रिजर्व बैंक भी अपने एक अध्ययन में कम रोजगार पैदा होने की बात मान चुका है.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ की मानें तो 2014 में देश में बेरोजगारी की दर 3.41 फीसदी थी जो अगले 3 सालों यानी 2015, 2016 और 2017 में बढ़ कर 3.49, 3.51 और 3.52 फीसदी हो गई, जबकि सीएमआईई के बेरोजगारी संबंधी आंकड़े आईएलओ से करीब एक फीसदी ज्यादा हैं.

सीएमआईई यह भी कहती है कि अप्रैल 2018 में देश में 5.86 फीसदी बेरोजगारी थी. विशेषज्ञों का कहना है कि निर्माण क्षेत्र ही सब से ज्यादा नौकरियां पैदा करने में सक्षम है. लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद इस क्षेत्र की गतिविधियां धीमी हो गई हैं.

युवाओं को रोजगार दिलाने के कोरे एजेंडे के साथ मोदी सरकार सत्ता में आई लेकिन रोजगार के मोरचे पर ज्यादातर सैक्टर्स में मोदी सरकार के तमाम दावे हवा हो गए हैं. हाल यह है कि रेलवे सुरक्षाबल में करीब 10 हजार खाली पदों के लिए तकरीबन एक करोड़ आवेदन आ चुके हैं. अब रेलवे रिक्रूटमैंट बोर्ड इस बात को ले कर सकते में है कि इतने बड़े स्तर पर वह परीक्षा कैसे आयोजित कराए.

दरअसल, मोदी सरकार रोजगार सृजन के ‘कमजोर आंकड़ों’ को ढकने का काम करती आई है. देश के करीब 34 करोड़ युवा बेहतर रोजगार की तलाश में हैं.

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री कहते हैं कि किसी स्नातक युवक को गाय पाल कर उस का दूध बेच कर कुछ कमाना चाहिए तो प्रधानमंत्री खुद पकौड़े बेचने को रोजगार का नाम देते हैं.

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसी भी अच्छी अर्थव्यवस्था में 4 फीसदी से ज्यादा बेरोजगारी ठीक नहीं होती. इस लिहाज से तो मनमोहन सरकार ही बेहतर थी जब गांवदेहात में मनरेगा में लोगों को रोजगार मिलता था. इस सरकार की तरह वह युवाओं के हाथ बेरोजगारी, धार्मिक झंडे और संस्कृति व धर्म की रक्षा के नाम पर लाठी नहीं पकड़ाती थी.

देश में बेरोजगारी के जो आंकड़े पेश किए जाते हैं वे उन के होते हैं जो रोजगार कार्यालय में अपना नाम दर्ज करा चुके होते हैं. इन की संख्या वास्तविक से बहुत कम होती है, क्योंकि कम पढ़े, छोटा काम करने, मजदूरी करने वाले न कभी उन कार्यालयों से रोजगार पाते हैं न ही कोईर् सूचना तक उन्हें मिलती है.

वित्तीय हाल है बेहाल

देश की आर्थिक हालत कुछ हमारे वित्तमंत्री सरीखी बीमार है. जैसे अरुण जेटली अस्पताल में बैठ कर वित्त मंत्रालय को भगवान भरोसे छोड़े हुए हैं वैसे ही देश की इकोनौमी भी भगवान भरोसे है. सूचना के अधिकार के तहत भारतीय रिजर्व बैंक से मांगी गई एक जानकारी के मुताबिक, साल 2014-15 से 2017-18 के बीच देश के अलगअलग बैंकों से 19 हजार से ज्यादा धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं जिन में 90 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला हुआ है. अप्रैल 2017 से मार्च 2018 के बीच बैंक धोखाधड़ी के 5,152 मामले दर्ज हुए हैं, जिन में 28,459 करोड़ रुपए शामिल हैं. इस से पहले साल 2016-17 में 5,076 बैंक घोटाले हुए जिन में 23,933 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी हुई.

नोटबंदी के बाद आज तक न तो रिजर्व बैंक ने बताया है और न ही कहीं से यह आंकड़ा मिला है कि नोटबंदी से सरकार को कितना फायदा हुआ है. हां, घाटा जरूर हुआ. जनता सड़कों पर भटकी, छोटे व लघु उद्योगों की हालत खराब हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में यही राग अलापते थे कि उन की पार्टी जब सत्ता में आएगी तो विदेशों में जमा भारतीयों का कालाधन वापस लाएगी और यह रकम इतनी अधिक होगी कि सरकार हर व्यक्ति के खाते में 15-15 लाख रुपए जमा कराएगी. कहां गए वे 15 लाख रुपए.

जनता मानो महंगाई की सुनामी में फंसी हुई है. प्रतिदिन के हिसाब से पैट्रोलडीजल के दाम बढ़ते हैं. डौलर के मुकाबले रुपया बुरी तरह नीचे गिरता चला गया है. एक डौलर की कीमत

74 रुपए हो गई है, जो अब कच्चे तेल के दाम कम होने पर सुधरा है, देश की आर्थिक स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है. आर्थिक मोरचे पर इतनी बदहाली है कि बैंकों व बाजारों में रुपए डूब रहे हैं. शेयर बाजार के सैंसेक्स व निफ्टी में भारी गिरावट आई है. महंगाई, जीडीपी और वित्तीय घाटे के मोरचे पर सरकार पूरी तरह से फेल नजर आती है. सरकार के कुछ करीबी पूंजीपतियों का हाल छोड़ कर मझोले और छोटे कामधंधे करने वालों का काम ठप हो गया है. कुकिंग गैस सिलैंडर पिछले 7 महीनों में 231 रुपए महंगा हो कर 931 रुपए का हो गया है, जबकि अप्रैल 2018 में ही 700 रुपए का था. उधर, सरकार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का ढोल पीटती रहती है. क्या गरीब 931 रुपए का सिलैंडर खरीद सकता है?

पिछले साल मार्च में पैट्रोलियम मंत्री धर्मेंद प्रधान ने लोकसभा में बताया था कि 1 अप्रैल, 2014 को मोदी सरकार से पहले पैट्रोल पर ऐक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपए और डीजल पर 3.56 रुपए थी. महज 2 साल में सरकार ने ऐक्साइज टैक्स में 126 फीसदी का इजाफा किया, जिस से ऐक्साइज ड्यूटी बढ़ कर 21.48 रुपए हो गई. मार्च 2016 तक डीजल पर 4 बार ऐक्साइज ड्यूटी में बढ़ोतरी की गई, जिस से 3.56 से बढ़ कर टैक्स 17.33 रुपए हो गया.

इस दौरान मोदी सरकार ने 144 फीसदी ज्यादा कमाई की यानी इस से सरकार को जितना ज्यादा फायदा हुआ, जनता को उतना ही नुकसान उठाना पड़ा. ऐसी आर्थिक अराजकता इस से पहले

कभी नहीं देखी गई, हालात किसी से छिपे नहीं हैं. रिजर्व बैंक के इमरजैंसी फंड पर डाका डालने का विचार हो रहा है, बैंक दिवालिया हैं, जीएसटी से 28 प्रतिशत तक टैक्स वसूला जा रहा है और केंद्र सरकार कहती है कि देश का आर्थिक मोरचे पर विकास हो रहा है.

अपराध, महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था

‘बहुत हुआ नारी पर वार, अब की बार मोदी सरकार’, कुछ इसी जुमले के साथ भाजपा ने महिलाओं को सुरक्षा देने का वादा कर उन से वोट ठगे थे, लेकिन हालिया सर्वे के मुताबिक, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध कम करने के वादे पर मोदी सरकार बुरी तरह विफल रही है, क्योंकि 66 फीसदी लोग मानते हैं कि केंद्र सरकार के कार्यकाल के दौरान महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध नहीं घटे हैं जबकि 28 फीसदी लोगों का मानना है कि सरकार ने अपराध पर सख्त कदम उठाया है.

एक और रिपोर्ट ने दुनियाभर का ध्यान भारत की ओर खींचा, जिस में कहा गया कि दुनिया में भारत महिलाओं के लिए सब से खतरनाक देश है. इस लिस्ट में भारत की जगह अफगानिस्तान और पाकिस्तान से भी बदतर दिखाई गई थी. यह रपट थौमसन रायटर्स फाउंडेशन की थी.

रिपोर्ट में कहा गया कि महिला हत्या दर के मामले में भारत दुनियाभर में सब से ऊपर है. इस में घरेलू काम के लिए मानव तस्करी, जबरन शादी और बंधक बना कर यौनशोषण के लिहाज से भी भारत को खतरनाक करार दिया गया है.

उधर, नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े भी केंद्र सरकार की पोल खोलते नजर आ रहे हैं. एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में महिलाओं के साथ रेप के 38,947 मामले सामने आए, मतलब हर रोज औसतन 107 महिलाएं रेप का शिकार हुईं, जबकि 2014 में यह औसत 90 के करीब था. देश में हर रोज 290 बच्चे ट्रैफिकिंग, जबरन मजदूरी, बाल विवाह, यौनशोषण जैसे अपराधों के शिकार होते हैं. देश में 12 साल की उम्र से कम वाले बच्चों के साथ मर्डर, किडनैपिंग जैसी घटनाएं काफी अधिक मात्रा में होती हैं.

भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 का लोकसभा चुनाव जिन मुद्दों पर लड़ा, उन में महिला सुरक्षा एक अहम मुद्दा था, लेकिन हाल यह है कि 660 से घट कर सिर्फ 36 ‘रेप क्राइसिस इंटरवैंशन सैंटर बनते हैं, निर्भया फंड (1,000 करोड़ रुपए) के पैसों के इस्तेमाल की योजना नहीं बनी, कठुआ गैंगरेप और उन्नाव रेप की घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है, सरकार की ओर से आने वाले भड़काऊ बयानों से अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाएं घबरा जाती हैं और आंकड़े तो चुगली कर ही रहे हैं.

मैला है स्वच्छ भारत अभियान

केंद्र सरकार ने साल 2019 तक पूरे भारत को स्वच्छ भारत अभियान के तहत स्वच्छ करने का टारगेट रखा है. बाकायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी के जन्मदिन (2 अक्तूबर, 2014) के मौके पर इस महत्त्वाकांक्षी योजना की शुरुआत कर पहले से ही साफ सड़कों पर झाड़ू लगाने की फोटोबाजी भी की थी. उन के साथ कई बड़े नेता और सैलिब्रिटीज भी थे, लेकिन सवाल वही है कि क्या देश साफ हुआ? आइए, पड़ताल करते हैं :

गौरतलब है कि इस अभियान में 3 अहम बातें थीं. लोगों को निजी और सामुदायिक शौचालय की सुविधा देना, सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर साफ करना और नमामि गंगे योजना के तहत गंगा की सफाई करना. साथ ही, मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह खत्म करने का भी लक्ष्य रखा गया था.

लेकिन सरकारी वैबसाइट में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत अब तक 2,57,259 गांवों के खुले में शौच से मुक्त होने का दावा किया गया है, जबकि यह टारगेट का महज 43 फीसदी है. हालांकि सरकारी वैबसाइट के मुताबिक, इन में से अभी तक सिर्फ 1,58,957 गांवों का ही आंकड़ा प्रमाणित हो पाया है.

दिक्कत यह भी है कि ये आंकड़े कितने प्रमाणित हैं, कहा नहीं जा सकता, क्योंकि देश की सड़कें और शौचालय जो तसवीर पेश करते हैं वहां सिर्फ इस अभियान के धुंधले पोस्टर और चारों और सड़ांध मारती गंदगी ही दिखती है.

नैशनल सैंपल सर्वे और्गनाइजेशन यानी एनएसएसओ के सर्वे के मुताबिक, देश की आधी से ज्यादा ग्रामीण आबादी यानी 55.4 फीसदी खुले में शौच करती है, जबकि शहरी इलाकों में 8.9 फीसदी लोग ही खुले में शौच करते हैं. आज भी भारत में करीब 62.6 करोड़ आबादी खुले में शौच करती है. आंकड़ों के मुताबिक, अभी भी देश में 62 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन के पास शौचालय नहीं हैं. सैंटर फौर पौलिसी रिसर्च की स्टडी के मुताबिक, साल 2012 में 88 लाख शौचालय बेकार पड़े थे. उन में से 99 फीसदी अब भी ठीक नहीं कराए गए हैं. जाहिर है ये काम इस अभियान के तहत होने थे लेकिन हो न सके.

एक और रिसर्च की मानें तो भारत में 1,57,478 टन कचरा हर रोज इकट्ठा होता है लेकिन सिर्फ 25.2 फीसदी के निबटारे (ट्रीटमैंट ऐंड मैनेजमैंट) के लिए ही प्रबंध हैं. बाकी आप और हम सड़कों पर सड़ता देख ही लेते हैं. दिल्ली के गाजीपुर में हुआ हादसा इसी लापरवाही का दुष्परिणाम है.

मार्च में राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार के मंत्री थावरचंद गहलोत ने बताया था कि देश में 26 लाख ऐसे शौचालय हैं जहां पानी नहीं है. ऐसे में हाथ से मैला ढोना भारत में प्रतिबंधित काम होने के बावजूद इन जगहों पर हाथ से मैला ढोने का निकृष्ठ काम होता है. सफाई कर्मचारी आंदोलन के सर्वे के मुताबिक, 1993 से अब तक 1,370 सीवरकर्मियों की मौत हो चुकी है, जबकि 2017 में मार्च से 15 मई के बीच ही ऐसे 40 कर्मचारी मारे गए. इन के लिए न तो कोई बीमा योजना है और न ही काम के दौरान उन्हें सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं.

प्रधानमंत्री ने काफी उत्सुकता के साथ नमामि गंगे प्रोजैक्ट को लौंच किया और 20 हजार करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया. लक्ष्य 5 साल का रखा गया, लेकिन जल संसाधन मंत्रालय के डेटा की मानें तो नमामि गंगे प्रोजैक्ट में काफी धीमी गति से काम हुआ है. आज भी गंगा गटर सरीखी है.

कुल मिला कर आलम यह है कि स्वच्छता मिशन पखवाड़ा के तहत सारा काम केवल सैल्फी खिंचवाने तक सीमित रहता है. देशभर के शहरों में सार्वजनिक स्थानों, पार्कों, गलियों, महल्लों में ही नहीं, अस्पतालों व सरकारी विभागों के बाहर गंदगी के ढेर दिखाई देते हैं. जगहजगह लगा कूड़ाकरकट का अंबार जहां इस अभियान को मुंह चिढ़ा रहा है वहीं तरहतरह की बीमारियों को भी आमंत्रण दे रहा है.

फिर भी केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के इश्तिहार देश को गंदगीमुक्त मानते हैं और जनता से भी कहते हैं कि आप भी यही मानो.

आखिर में…

सचाई यह है कि भाजपा के पास वर्ष 2019 के आम चुनाव के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, मोदी की वैश्विक और हिंदुत्वादी छवि पेश करने के अलावा.

इस शृंखला के अगले हिस्सों में और भी कई मुद्दों की पड़ताल होगी, लेकिन इतना तो तय है कि केंद्र सरकार में कई मोरचों पर सरकारी विफलता, भ्रष्टाचार और वित्त मंत्रालय की अक्षमता, किसानों की समस्याएं, राफेल सौदे की चोट, संवैधानिक मूल्य और धर्मनिरपेक्षता पर चोट, इतिहास से छेड़छाड़ जैसे कई कारकों ने हमें कई साल पीछे ढकेल दिया है.

सांप्रदायिकता, कट्टरता इस कदर बढ़ी है कि लोग सरेआम गौमांस के नाम पर हत्याएं कर रहे हैं. नरेंद्र दाभोलकर, गौरी लंकेश और मौब लिंचिंग की घटनाएं केंद्र सरकार में बढ़ते अतिवाद का उदाहरण हैं.

अब केंद्र सरकार, कांग्रेस शासित दौर की आड़ में यह नहीं कह सकती कि देश का विकास उस की वजह से रुका है. जाहिर है, जनता को यह पता चल गया था कि पिछली सरकार काम नहीं कर रही थी, इसीलिए तो मौजूदा सरकार बहुमत में आई. अब जब जनता ने आप को मौका दिया है तो भी आप अपनी कमजोरी, अकर्मण्यता और विफलता को पिछली सरकार के मत्थे मढ़ेंगे, तो याद रहे आप का भी वही हश्र होना तय है जो पिछली सरकार का हुआ था.

जीवन सरिता : लोकप्रिय होने के 3 मूलमंत्र

कमल ने सोहन को आते देखा तो रास्ता बदल लिया. तब दिलीप ने पूछा, ‘‘उसे देख कर तू ने रास्ता क्यों बदल लिया?’’

कमल ने जवाब दिया, ‘‘वह आते ही मैंमैं करने लग जाता है. उस की मैंमैं सुन कर मेरा सिरदर्द करने लगता है. वह दूसरों की बातें सुनता ही नहीं है. सदा मैंमैं करता रहता है.’’

यह सुनकर दिलीप हंसने लगा, ‘‘तू ऐसा क्यों बोल रहा है?’’

कमल ने कहा, ‘‘अरे यार, जब भी देखो तब वह कहता रहता, मैं ने यह किया, मैं ने वह किया. यानी वह मैंमैं का गुणगान ही करता रहता है. कभी हमारी बातें सुनने का प्रयास नहीं करता.’’

हंसते हुए दिलीप बोला, ‘‘यानी, तू मैंमैं की बकरी से दूर भागने का प्रयास कर रहा है.’’

‘‘हां यार, तूने ठीक समझा.’’

ऐसा कमल के साथ ही नहीं, सभी के साथ होता है. मानवमात्र की चाह है कि लोग उसी के बारे में बात करें. यही उस की मूलभूत कमजोरी होती है. कोई नहीं चाहता कि दूसरे के बारे में बातें की जाएं. यदि आप लोकप्रिय होना चाहते हैं तो पहला मूलमंत्र यह अपना लें कि सदा दूसरों के बारे में ही बात करेंगे.

मैं छोड़, आप कहना शुरू करें

पहला मूलमंत्र ही है कि सदा के लिए मैं कहना छोड़ दें. इस की जगह आप कहना शुरू कर दें. मैं ने यह किया है. इस की जगह यह कहें कि आप ने बहुत बढि़या काम किया है. पहली आदत यह अपना कर देखिए. लोग आप के दीवाने हो जाएंगे. जिस तरह लोहे को चुंबक अपनी ओर आकर्षित कर लेता है, आप द्वारा इस आदत को अपनाते ही लोग आप के प्रति आकर्षित होना शुरू हो जाएंगे. जबतब लोग आप के पास आने को तरसेंगे.

बस, आप को लोगों और उन के काम में सकारात्मक रुचि लेनी है. यह पता लगाना है कि उन में क्या अच्छी आदत है. वे कौन सा काम अच्छा करते हैं. कौन सी चीज उन में सब से अच्छी है. वे कपड़े किस तरह के पहनते हैं. इन में से कोई भी अच्छाई हो, उस पर गौर करें. फिर जब भी मौका मिले, कह दें, ‘भाई रमेश, मैं आप का मुरीद हो गया. आप यह बताइए कि आप अपनी अलमारी को इतने करीने से सजा कर किस तरह रखते हैं या फिर कहिए, ‘गीताजी, आप बहुत सुंदर लग रही हैं. आप ने मेकअप बहुत शानदार कर रखा है. उस पर फिरोजी रंग की साड़ी बहुत अच्छी लग रही है. इस संयोजन ने आप की सुंदरता में चारचांद लगा दिए हैं. आप यह बताइए कि इतने सुंदर बाल किस तरह बनाती हैं. इन बालों में चमक लाने के लिए आप क्याक्या करती हैं.’ ऐसा कुछ कह कर देखिए. सामने वाला खुल कर आप से बातें करने लगेगा.

कामयाबी पर हम कहें

अब दूसरा मंत्र है हम कहने का. कोई भी काम हो, चाहे वह आप की वजह से हुआ हो. यदि आप किसी भी टीम का हिस्सा हों, और आप की मेहनत से वह टीम सफल हुई हो, तब भी सब के सामने पूरे जोश के साथ यह कहें कि यह जो कामयाबी मिली है यह हम सब की मेहनत का नतीजा है. यदि एक भी व्यक्ति अपनी पूरी ताकत लगा कर काम नहीं करता तो यह काम सफल नहीं होता. इस सफलता का श्रेय हम सब को जाता है.

फिर इस हम का असर देखिए. यह हम शब्द आप की टीम में नई जान डाल देगा. फिर पहले मंत्र को अपना कर हरेक व्यक्ति की किसी न किसी विशेषता का बखान करते हुए उस की कामयाबी की गाथा में उस गुण का बखान कीजिए. आप ने तेजी से काम किया. इन्होंने उतनी ही तेजी से आप को सहयोग किया.

यदि ये तेजी से माल नहीं पहुंचाते तो वह माल समय पर तैयार नहीं होता. इन का मैनेजमैंट बहुत बढि़या है. इन्होंने दिनरात एक कर के इस काम को अंजाम तक पहुंचाया है. यानी पूरी टीम को इस का श्रेय दीजिए. फिर देखिए, आप का यह मूलमंत्र किस तरह काम करता है.

नुकसान पर खुद को आगे करें

तीसरा मूलमंत्र यह है कि जब भी कोई नुकसान हो तो अपनेआप को आगे कर लीजिए. कहिए कि यह काम मेरी इस गलती के कारण ठीक ढंग से नहीं हो पाया. यदि मैं गलती नहीं करता या ठीक वक्त पर यह निर्णय ले लेता तो यह काम पूरा हो जाता. इस से 2 बातें होंगी. पहली, आप की टीम में हीनभावना नहीं आएगी. वह अपनी गलती मन ही मन मान कर दोहरे उत्साह से काम करने को तैयार हो जाएगी. दूसरी, टीम के सभी सदस्यों में आत्मविश्वास बना रहेगा.

हर व्यक्ति यह महसूस करेगा कि आप उन की गलती अपने सिर ले रहे हैं, जबकि वास्तविक गलती उन की है. ऐसे में वे आप पर गर्व करने लगेंगे. उन का विश्वास आप के प्रति दृढ़ हो जाएगा. वे महसूस करने लगेंगे कि यदि गलती हो जाती है तो आप उन्हें कभी प्रताडि़त नहीं करेंगे. तब वे दूने उत्साह से काम करने लगेंगे.

वे हर बात में आप से सलाह, मार्गदर्शन व प्रेरणा प्राप्त करेंगे. इस से उन की आप में रुचि बढ़ जाएगी. यह पहले मूलमंत्र का पूरक हिस्सा है. उस में आप ने दूसरों में रुचि लेना शुरू किया था. इस के उलट, आप ने दूसरों की गलती को अपना बता कर उन में विश्वास जागृत किया था. इस से उन में आप के प्रति आस्था व दृढ़ विश्वास बढ़ जाएगा. तब वे आप को छोड़ कर जाने के बारे में कभी नहीं सोचेंगे.

ये 3 मूलमंत्र हैं जिन्हें अपना कर आप अपने साथियों में लोकप्रिय हो कर अपना काम बढि़या ढंग से पूरा कर सकते हैं. अपने को लोकप्रिय होने के लिए आप को ये 3 मूलमंत्र याद रखने हैं. ये 3 मूलमंत्र ही हैं जो हर सफल व्यक्ति अपना कर अपने जीवन में लोकप्रिय होता है.

मंजिल (भाग-10) : कैसे बढ़ता चला गया सुहास का रोमांच

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है और कुछ ही महीने बाद पुरवासुहास का भी विवाह हो जाता है. पुरवा महसूस कर रही थी कि सुहास का ध्यान समाजसेवा में अधिक रहता है. वह दूसरों की मदद के लिए दुकान पर भी ध्यान न देता.

पुरवा अब निरंतर सुहास को उस की जिम्मेदारी का एहसास कराने की कोशिश करती. शीघ्र ही वह दिन भी आता है जब पुरवा को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है. सुहास पापा बनने के सुखद एहसास से झूम उठता है.

थोड़े दिनों बाद पुरवा को पता चलता है कि सुहास पुराना कारोबार खत्म कर कंप्यूटर का कार्य आरंभ करना चाहता है तो वह हैरान हो जाती है और बेचैनी से सुहास के घर लौटने की प्रतीक्षा करने लगती है. लेकिन वह बेला भाभी के पति सागर को अस्पताल ले जाने के कारण रात देर से घर आता है, पुरवा की तबीयत खराब होने पर अस्पताल में भरती कराया जाता है. उस का हालचाल पूछने बेला घर आती है तो पुरवा उस से थोड़ी तीखी बात करती है, तब सुहास पुरवा पर बिगड़ता है. सुहास से नाराज पुरवा अपने मातापिता के साथ मायके चली जाती है. सुहास के व्यवहार को ले कर वह विचारमंथन करती है.

आखिरकार एक दिन सुहास पुरवा को मनाने ससुराल पहुंच जाता है. पुरवा वापस जाने की शर्त रखती है कि वह घर के गैराज में बुटीक खोलेगी और इस काम में वह उस की मदद करेगा. बुटीक की शुरुआत करने में  सुहास से ज्यादा रजनीबाला पुरवा की मदद करती है. बुटीक निर्माण जोरशोर से शुरू हो जाता है. एक दिन सागर और बेला आते हैं और बताते हैं कि सुहास ने राजनीति ज्वाइन कर ली है, सुन कर सब चौंक जाते हैं.

सुहास घर आता है तब मां राजनीति ज्वाइन करने की बात को ले कर उस से नाराज होती है. लेकिन सुहास सब को समझाता है, पुरवा भी यह सोच कर संतोष कर लेती है शायद सुहास इसी क्षेत्र में सफल हो जाए.

पुरवा के ‘पुरवाई बुटीक’ का उद्घाटन होता है. सुहास वक्त पर नहीं पहुंचता लेकिन देर से आने की माफी मांगते हुए बुटीक के लिए एक बड़ा आर्डर ले कर आता है तो सभी खुश हो जाते हैं.

राजनीति के कार्य क्षेत्र में सुहास का रोमांच बढ़ता जा रहा था. उधर वह दिन भी आता है जब पुरवा प्रसव के लिए अस्पताल में भरती होती है. उसी वक्त पार्टी के नेता भाईजी को चुनावी सरगर्मियों के चलते दूसरे पार्टी के साथ हुई झड़प में गोली लग जाने के कारण सुहास को उन्हें देखने जाना पड़ता है. वापस जब लौटता है तो एक बच्ची का पिता बनने की खुशखबरी मिलती है.

अब आगे…

पुरवा नन्ही बच्ची के साथ एकदम नई दुनिया में जीने लगी थी.

सुहास देर से आता तो बच्ची को प्यार करने के बहाने कहता,

‘‘देखो गुडि़या, तुम्हारा पापा बहुत जल्दी राजनेता बन जाएगा और तब तुम अपने पापा पर बहुत गर्व कर सकोगी.’’

पुरवा समझती थी कि यह बात उसे ही सुनाई गई है अत: मुसकरा देती थी. एक दिन भाईजी के स्वास्थ्य का हाल पूछते हुए पुरवा उदास हो गई. कुछ सोच कर बोली, ‘‘सुहास, एक बात का सचसच उत्तर दोगे?’’

‘‘पूछो,’’ सुहास पलंग पर बिना कपड़े बदले ही लेट गया था.

‘‘क्या सचमुच तुम ने राजनीति ही अपनी मंजिल निश्चित कर ली है?’’ पुरवा उत्सुकता से उस की तरफ देख रही थी.

‘‘यह कैसा सवाल कर रही हो, पुरू?’’ सुहास आश्चर्य से उस की ओर देखते हुए उठ कर बैठ गया.

‘‘पता नहीं कैसा है यह प्रश्न, पर तुम्हारे भाईजी का हाल देख कर मन हिल गया है,’’ पुरवा ने दुख से कहा. यह सच था कि भाईजी को जहां एक दिन में छुट्टी मिलनी थी वहां कई दिन रुकना पड़ गया था. यहां तक कि चुनाव के दिन भी वह अस्पताल में ही थे. पुरवा को 2 दिन बाद ही छुट्टी मिल गई थी और चुनाव वाले दिन सुहास सारा दिन बाहर ही रहा था. पुरवा की बात सुन कर सुहास ने कहा, ‘‘मेरी पुरवा, इतनी कमजोर कब से हो गई है?’’ सुहास ने प्यार से उस के गाल सहला दिए और कहा, ‘‘तुम नहीं जानतीं पुरवा कि तुम ने मुझे कितना बड़ा वरदान दिया है. एक तो यह मासूम सी गुडि़या और दूसरा यह कि तुम ने यह राह दिखा कर मुझ से मेरी पहचान करवा दी है.’’

पुरवा ने मुसकराने की चेष्टा की. बोली, ‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ समय बाद इस क्षेत्र से भी तुम्हारा मन ऊब जाए.’’

‘‘नहीं, पुरू, अब ऐसा नहीं होगा. इस क्षेत्र में आने के बाद मुझे भी ऐसा ही लगने लगा है कि यही मेरी मंजिल है.’’

चुनाव के परिणाम की प्रतीक्षा करते सुहास ने कहा, ‘‘भले ही मैं अभी निर्वाचित न हो सकूं, पर मेरे उत्साह में अब तुम कभी भी कोई कमी नहीं देखोगी.’’

उसी दिन सुहास ने बताया कि भाईजी अब घर पहुंच गए हैं. यह भी बताया कि भाईजी को अस्पताल में अधिक दिन इसलिए रोका गया था क्योंकि उन्हें खतरा बहुत बढ़ गया था. पुरवा ने उदासी से कहा, ‘‘यही डर तो मुझे सहमा रहा है सुहास. इस क्षेत्र में अब जान पर भी बन सकती है,’’ सुहास कुछ देर उसे देखता रहा फिर हंस दिया और हंसते हुए ही बोला, ‘‘जान पर तो कहीं भी बन सकती है पगली. यह डर अपने मन से निकाल दो और अब इस का नाम रखने की चिंता करो.’’

‘‘वह तो मां बहुत जल्दी कोई उत्सव करने वाली हैं और तभी नामकरण भी होगा.’’

‘‘लेकिन तब तक हम इसे कुछ तो कहेंगे,’’ सुहास ने सोचते हुए अचानक कहा.

‘‘हम इसे ‘झंकार’ कहेंगे क्योंकि ये हमारे प्यार के सप्त स्वरों की झंकार है,’’ पुरवा प्यार से बेटी के सर पर हाथ फेरते हुए मुसकरा दी.

बहुत दिनों बाद पुरवा ने अपनी बुटीक पुरवाई में कदम रखा था. उसे देख कर सभी खड़े हो गए.

‘‘आप कैसी हैं मैडम?’’ कंचन ने पूछा. कंचन ने टेलरिंग का कोर्स किया था और उस के सिले हुए कपड़े बुटीक की शान बढ़ा रहे थे.

‘‘मां बता रही थीं कि तुम्हारे सिले कपड़ों की धूम मचने लगी है,’’ पुरवा ने उसे उत्साहित करते हुए कहा.

कंचन ने मुसकरा कर अपनी प्रशंसा सुनी. पुरवा ने फिर तसलीम और मास्टर वरुण से भी बात की. वरुण प्रौढ़ टेलर मास्टर थे और बुटीक की बहुत सी जिम्मेदारियां मां ने उन्हें सौंप रखी थीं. तसलीम ने डिजाइनिंग का कोर्स किया था और उस के हाथ की सफाई की मां बहुत प्रशंसा करती थीं.

पुरवा जाने लगी तो तसलीम ने कहा, ‘‘अब तो मैडम, आप कभीकभी आया करेंगी?’’

‘‘हां तसलीम, यह पुरवाई तो मेरा सपना था. मुझे तो आना ही है.’’

पुरवा वापस पलटी तो देखा मां खड़ी थीं. पुरवा ने उन के चरण स्पर्श करते हुए कहा, ‘‘मां, आप ने तो मेरी कल्पना को अपनी आंखों में उतार लिया हो जैसे. बिल्कुल वैसा ही सजाया है, सबकुछ.’’

‘‘यह तो पता नहीं बेटा, पर यह मैं जान गई हूं कि तुम ने मुझे भी जीने का एक अनोखा मकसद दे दिया है.’’

बहुत दिनों बाद पुरवा ने सुहास की दुकान की भी खबर ली थी. वहां के कर्मचारी ने बहुत उत्साह से बताया कि काम बहुत अच्छा चल रहा है. यह भी बताया कि सुहास सर दिन में रोज कुछ घंटे यहां व्यतीत करते हैं.

उस सुबह धूप खूब चमकीली और ठंडी बयार लिए हुए थी. लान में पड़ी कुर्सियों पर पुरवा और मां बैठ कर चाय पी रही थीं. थोड़ी देर में सुहास के पापा भी वहीं आ कर बैठ गए. चाय का प्याला थामते हुए बोले, ‘‘सुहास अभी सो रहा है क्या?’’

‘‘नहीं, वह तो घर पर ही नहीं हैं,’’ पुरवा ने कहा, ‘‘मेरे उठने से पहले ही जाने कहां चले गए हैं.’’

‘‘ये लड़का भी कमाल है,’’ मां ने प्लेट से बिस्कुट उठाते हुए कहा, ‘‘अभी कल रात तो इतनी देर से अपने भाईजी की जीत के जश्न की पार्टी से लौटा, अब सुबहसुबह फिर गायब है.’’

पापा ने जैसे चौंक कर कहा, ‘‘अरे, आज सुहास का चुनावी परिणाम भी तो पता चलने वाला है.’’

‘‘कहीं वहीं तो नहीं पहुंच गया है,’’ मां ने उत्सुकता से कहा.

पुरवा ऐसे अवसरों पर सदा ही अंतर्द्वंद्व में डूब जाती थी. मां ने उस की तरफ देख कर कहा, ‘‘तुम इन सब बातों को सोच कर परेशान मत हो. अपना और झंकार का ध्यान रखो.’’

‘‘नहीं, मम्मा, मैं इस बात को ले कर परेशान नहीं हूं कि सुहास का चुनाव परिणाम क्या आएगा. बस यही चिंता होती है कि सुहास कहीं मन लगा कर ठहरेंगे या फिर वही पलायन की प्रवृत्ति अपनाएंगे.’’

‘‘इतना सोचो मत बेटा,’’ पापा ने कहा.

‘‘मुझे लगता है अब सुहास में ठहराव आ रहा है,’’ पुरवा पापा से बोली.

एक घंटे बाद सुहास का फोन आया.

‘‘कहां हो सुहास?’’ पुरवा ने पूछा.

‘‘मैं अस्पताल में हूं, पुरू…’’

‘‘अरे, पर क्यों?’’ पुरवा उसे बीच में ही रोक कर घबराहट में बोली.

‘‘परेशान मत हो. हमारे पार्टी आफिस के चौकीदार नारायण का जवान बेटा बहुत बीमार है. उसी के चेकअप के सिलसिले में आकाश ने सुबहसुबह बुलाया था.’’

‘‘क्या कहते हैं डाक्टर?’’ पुरवा ने पूछा.

‘‘अभी तो एक्सरे वगैरह हुआ है. पता तो बाद में चलेगा,’’ सुहास की आवाज में थकान थी.

‘‘कब तक आओगे?’’ पुरवा ने पूछा. उसी समय झंकार रोने लगी थी. पुरवा ने उसे गोद में उठा लिया. उधर से सुहास ने कहा, ‘‘क्यों रो रही है?’’

‘‘शायद भूखी है,’’ पुरवा उसे थपकते हुए बात करने लगी.

‘‘सुनो पुरवा, मैं ने यह बताने के लिए फोन किया था कि मैं ने जल्दी में तुम्हारे पर्स से 2-3 हजार रुपए निकाल लिए थे.’’

‘‘अच्छा किया, सुहास. अपना कार्य पूरा कर के आना. कुछ चायवाय वहीं पर ले लेना.’’

सुहास का फोन पा कर पुरवा आश्वस्त हो गई थी. कभीकभी सुहास को ले कर उस का मन दुविधा में अभी भी घिर जाता है. लेकिन ऐसे विचारों को वह आजकल जल्दी ही झटक देती है. उस का मन बारबार कहता है कि सुहास अब सचमुच जीवन के महत्त्व को समझने लगा है. शायद अब वह अपनी सही दिशा निर्धारित कर के एक नई पहचान बना सकेगा.

सुहास के निर्वाचन का परिणाम भी आना था. पुरवा उस विषय में बात करना चाहती थी पर सुहास ने अधिक बात नहीं की. संभवत: परिणाम से पहले ही घबरा रहा है. यही सोच कर पुरवा मुसकरा दी. अब वह नियम से कुछ समय अपने बुटीक में भी बैठने लगी थी. मन में तो उस के भी उथलपुथल थी कि देखें क्या होता है? दोपहर ढली और शाम हो गई पर सुहास की कोई खबर नहीं थी. मांपापा और पुरवा बहुत परेशान थे. सुहास चुनाव हार गया था. क्या इसीलिए घर वापस नहीं आया था. पापा बारबार कह रहे थे, ‘‘यह सब है ही बकवास. सीधासादा अपना एक काम तो संभलता नहीं है, राजनीति का शौक चढ़ा है.’’

‘‘पापा, आप ही इतनी जल्दी हथियार डाल देंगे तो सुहास तो वैसे ही बहुत जल्दी निराश हो जाते हैं,’’ पुरवा ने समझाना चाहा.

बहुत से परिचितों के फोन आ रहे थे कि हारजीत तो लगी रहती है, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए.

रात 10 बजे सुहास ने घर में प्रवेश किया. मां ने देखते ही कहा, ‘‘कहां चले गए थे, सुहास? न कोई फोन न तुम्हारा अतापता.’’

‘‘बस, मम्मा, काम था बहुत जरूरी,’’ उस ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और कमरे में चला गया. पुरवा ने देखा तो बोली, ‘‘बहुत थके से लग रहे हो. क्या बात है?’’

‘‘भाईजी के यहां चला गया था. वहीं देर हो गई,’’ सुहास अधिक कुछ कहने से बचता हुआ कपड़े बदलने लगा.

‘‘ठीक है. खाने पर सब इंतजार कर रहे हैं. जल्दी से फ्रेश हो लो.’’

कपड़े बदल कर हाथमुंह धो कर सुहास थोड़ा तरोताजा सा लगा. बाल काढ़ते हुए पुरवा से बोला, ‘‘क्या बात है, कोई मेरी हार की चर्चा नहीं कर रहा है.’’

‘‘चर्चा करने या न करने से क्या होता है. हारजीत तो जीवन का एक हिस्सा है, सुहास,’’ पुरवा ने मुसकरा कर कहा.

‘‘हां पुरवा, यह मत सोचना कि मैं हार से घबरा कर मुंह छिपाता फिर रहा था,’’ सुहास ने अपने शब्दों पर जोर दे कर कहा, ‘‘आज नहीं तो कल मैं जीत कर भी दिखाऊंगा, और शायद सीधा लोकसभा की सीट जीत कर दिखाऊं.’’

‘‘तुम्हारा उत्साह देख कर अच्छा लगा, सुहास,’’ पुरवा के चेहरे पर सचमुच एक नई चमक थी, शायद यह सोच कर कि सुहास बहुत शीघ्र निराश हो जाने के अंधेरे से बाहर निकल रहा है. सुहास ने निकट आ कर पुरवा के गालों पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘जीतने के लिए पहले मुझे अपनी पहचान बनानी होगी और उसी का शुभारंभ मैं ने आज कर दिया है.’’

सुहास ने बड़ी तन्मयता से बताया कि उस ने समाज सेवा का व्रत भी उठा लिया है, उस के लिए कई संस्थाओं से आज मिलता रहा. सारा दिन इसी सब में निकल गया पर सुहास ने यह छिपा लिया कि उस ने एड्स पीडि़त लोगों की सेवा का भी व्रत ले लिया है.

‘‘तुम तो जानती हो पुरू, कि मैं किसी को कष्ट में देख कर स्वयं को रोक नहीं पाता हूं,’’ उस ने कहा.

‘‘जानती हूं, सुहास. तुम्हारी इसी भावना ने तो मुझे तुम्हारी निकटता दी थी.’’

‘‘तो पुरवा, आज मैं तुम से भी एक वादा चाहता हूं,’’ सुहास की आंखों में अनोखी चमक थी.

पुरवा को लगा कहीं यह चमक अब जल्दीजल्दी बहुत कुछ पा लेने की चाहत तो नहीं है. बोली, ‘‘कैसा वादा?’’

सुहास ने एक पल सोच कर कहा, ‘‘देखो पुरवा, तुम्हारी हर इच्छा को अब मैं अपनी इच्छा बना कर दिखाऊंगा. एक कुशल व्यापारी, एक अच्छा राजनेता, जो अपने लिए नहीं, देश के लिए समर्पित हो.’’

‘‘फिर समस्या क्या है?’’ पुरवा ने पूछा.

‘‘नहीं, समस्या नहीं, मेरी कमजोरी समझ लो,’’ सुहास कहते हुए हिचक रहा था पर साहस जुटा कर कह ही दिया, ‘‘अगर तुम्हें पता चले कि कुछ ऐसी जगहों पर भी मैं सेवा के लिए कभीकभी जाता हूं जिन से लोग प्राय: दूरदूर रहना पसंद करते हैं तो तुम कभी नाराज नहीं होगी.’’

पुरवा ने हतप्रभ आंखों से उसे देखा. सोच में पड़ गई कि सुहास का संकेत कैसे लोगों से है. सुहास ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुम नाराज हो जाती हो तो मेरा साहस चुकने लगता है. तुम्हारे प्रोत्साहन से ही मैं किसी भी दिशा में सफलता पाने में अपनेआप को सक्षम समझने लगा हूं.’’

‘‘मुझे मालूम है, सुहास. यह भी सच है कि कई बार मैं तुम्हारी ऐसी बातों के लिए नाराज हुई हूं पर इसलिए नहीं कि मुझे तुम्हारी सेवाभावना से चिढ़ है, बल्कि….’’

‘‘हां पुरू,’’ सुहास ने बीच में ही टोक दिया, ‘‘बल्कि इसलिए तुम नाराज हो जाती रही हो कि मैं अपनी जिम्मेदारियां ताक पर रख कर दूसरों के दुख दूर करने दौड़ता रहा हूं.’’

‘‘हां, सुहास.’’

‘‘लेकिन अब मैं जीवन की सचाई को भली प्रकार समझ गया हूं पुरू,’’ सुहास ने उसे प्यार से अपनी बांहों में भर लिया और कहा, ‘‘तुम से वादा करता हूं कि तुम्हारा हर स्वप्न मैं पूरा करूंगा. एक सफल व्यापारी, एक सच्चा राजनेता और अच्छा पति और पिता भी.’’

पुरवा भी प्यार से मुसकरा दी और बोली, ‘‘हां, मुझे पूरा विश्वास था कि मेरा सुहास हमेशा इस तरह जीवन से बेखबर नहीं रह पाएगा. एक न एक दिन वह अपनी मंजिल पा ही जाएगा.’’               -क्रमश:

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें