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रसेल, राहुल हों या गेल, पोलार्ड ने सारे किए फेल

भारत में लोकसभा चुनावी महापर्व में वोटिंग के पहले चरण से एक दिन पहले 10 अप्रैल को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में इंडियन प्रीमियर लीग के एक मैच में उत्सव मनाया गया. मैच था मुंबई इंडियंस और किंग्स इलेवन पंजाब के बीच. चोटिल होने की वजह से मुंबई इंडियंस के कप्तान रोहित शर्मा डगआउट में बैठे थे और टीम की कमान संभाली थी कायरन पोलार्ड ने.

टॉस जीत कर मुंबई के इस कार्यवाहक कप्तान ने पहले गेंदबाजी का फैसला किया, लेकिन जब सामने क्रिस गेल और केएल राहुल जैसे बल्लेबाज हों तो फिर आप का कोई भी फैसला चुटकियों में गलत साबित हो सकता है. इन दोनों ने धीमी शुरुआत के बाद लय पकड़ी और देखते ही देखते किंग्स इलेवन पंजाब की टीम ने पावर प्ले में बिना विकेट खोए 50 रन बना लिए थे.

उस के बाद भी ये दोनों कहां रुकने वाले थे. केएल राहुल ने आईपीएल का अपना पहला शतक जड़ा. उन्होंने 64 गेंद में 6 छक्कों और 6 चौकों की मदद से नाबाद 100 रन बनाए जबकि क्रिस गेल ने 63 रनों की तूफानी पारी खेली. ये रन बनाते हुए उन्होंने 36 गेंद की पारी में 7 छक्के और 3 चौके मारे थे. नतीजतन, किंग्स इलेवन पंजाब के 20 ओवरों में 4 विकेट पर 197 रन हो गए थे.

रोहित शर्मा टीम में न हों और टारगेट 200 के आसपास हो तो घरेलू मैदान पर भी जीतने के लिए अच्छीखासी मशक्कत करनी पड़ सकती है. इसी दबाव को झेल रही मुंबई इंडियंस की शुरुआत अच्छी नहीं रही. रोहित शर्मा के कोच दिनेश लाड के बेटे सिद्धेश लाड ने आईपीएल में अपने डेब्यू का आगाज अंकित राजपूत को छक्का और फिर चौका लगा कर किया, ज्यादा जोश में वे इस मौके को बड़ी पारी में नहीं बदल पाए. उन्होंने 13 गेंदों में 15 रन ही बनाए.

इस के बाद बल्लेबाज सूर्यकुमार यादव ने भी अंकित राजपूत को एक ओवर में 3 चौके लगा कर अच्छी शुरुआत की, लेकिन वे भी महज 21 रन बना कर चलते बने. तीसरे विकेट के रूप में क्विंटन डि कॉक आउट हुए. उन्होंने 23 गेंदों में 24 रन बनाए. इस के बाद ईशान किशन ने 7, हार्दिक पंड्या ने 19 और उन के भाई कुर्णाल पंड्या ने महज एक रन बनाया. तब तक मुंबई इंडियंस के 15.4 ओवरों में 6 विकेट पर 140 रन बन चुके थे. मतलब जीत के लिए 26 गेंदों पर 58 रन चाहिए थे.
कप्तान कायरन पोलार्ड ने हिम्मत नहीं हारी बल्कि अपनी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी से विरोधियों को धूल चटा दी. उन्होंने महज 31 गेंदों पर 10 छक्कों और 3 चौकों की मदद से 83 रन बटोरे और टीम को जीत की दहलीज पर ले गए.आखिरी ओवर में मुंबई इंडियंस को जीत के लिए 6 गेंदों में 15 रनों की जरूरत थी. अंकित राजपूत की पहली गेंद (जो नो बॉल थी) पर कायरान पोलार्ड ने छक्का लगाया. इस के बाद उन्होंने चौका जड़ दिया. हालांकि, ओवर की दूसरी लीगल गेंद पर वे डेविड मिलर के हाथों कैच आउट हो गए.
अब मुंबई इंडियंस को 4 गेंद पर 4 रनों की जरूरत थी.ओवर की तीसरी गेंद पर कोई रन नहीं बना और चौथी गेंद पर अल्जारी जोसफ ने एक रन लिया. ओवर की 5वीं गेंद पर राहुल चाहर ने एक रन लेते हुए जोसफ को स्ट्राइक दे दी. मैच की आखिरी सब से रोमांचक गेंद पर जोसफ ने 2 रन बना कर जीत मुंबई इंडियंस के नाम कर दी.

भाजपा की कमजोर कड़ी होगी अनुप्रिया पटेल

2012 के विधनसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में दो लगातार चुनाव जीत चुकी अनुप्रिया पटेल के लिये 2019 का चुनाव जीत कर हैट्रिक लाना सरल काम नहीं रह गया है- इस चुनाव में अपना दल दो हिस्सो में बंट चुका है और पूर्वांचल से ही अनुप्रिया की मां दूसरे पार्टी के साथ उनको चुनौती देने के लिये चुनाव मैदान में हैं. ऐसे में अनुप्रिया पटेल भाजपा के लिये मदद पहुंचाने के बजाय कमजोर कड़ी साबित हो सकती है-

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल खासकर वाराणसी,  भदोही,  मिर्जापुर,  जौनपुर,  इलाहाबाद और प्रतापगढ में अपना दल का प्रभाव कुर्मी बिरादरी में था- अपना दल के नेता सोनेलाल पटेल ने कुर्मी बिरादरी में अपनी मजबूत पकड पूरे उत्तर प्रदेश में बनाई थी- 2009 में सोनेलाल पटेल की मौत के बाद पार्टी की कमान बेटी अनुप्रिया पटेल ने संभाली- 2012 के विधनसभा चुनाव में वह वाराणसी की रोहनियां सीट से विधायक चुनी गई- अनुप्रिया पटेल ने लेडी श्रीराम कालेज से पढाई पूरी करने के बाद कानपुर से ,एमबीए किया. पिता की विरासत को संभालने वह राजनीति में आई- कानपुर में उनका घर है.

अपना दल से विधयक बनने के बाद अनुप्रिया पटेल ने राजनीति में सीढ़ी दर सीढ़ी सपफलता प्राप्त करती आई. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सहयोगी दल  में मिर्जापुर सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिला और वह सांसद बन गई. 2016 में मोदी सरकार में वह केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री बनी.

राजनीतिक सफलता हासिल करने के दौरान वह ‘अपना दल’ की चुनौतियों को संभाल नहीं पाई- इस दौरान अपना दल दो हिस्सों में बंट गया. अपना दल (सोनेलाल) के नाम से अनुप्रिया का गुट है जबकि दूसरा दल अपना दल (कृष्णा पटेल) के नाम से है- कृष्णा पटेल अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की पत्नी है- अपना दल (कृष्णा पटेल) गुट में कृष्णा पटेल और उनकी दूसरी बेटी पल्लवी पटेल है.

अपना दल पूर्वांचल की 4 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ रहा है- अनुप्रिया पटेल की अगुवाई वाले अपना दल (सोनेलाल) का तालमेल भाजपा से है. जिसकी तरपफ से अनुप्रिया खुद मिर्जापुर सीट से चुनाव लड़ रही है- इस गुट की दूसरी सीट रार्बट सीट है.

केन्द्र और प्रदेश सरकार में सहयोगी होने के बाद भी अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल अपने दल के विघटन को रोक नहीं पाई. इसके साथ ही साथ पूर्वांचल में कुर्मी वोटबैंक के बीच उनकी साख और जनाधर दोनो ही दो हिस्सों में बंट गया. अपना दल के लोग मानते हैं कि अनुप्रिया पटेल ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके केवल अपना स्वार्थ ही देखा. अनुप्रिया ने अपने पति आशिश कुमार सिंह को उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थापित भले ही किया पर वह अपनी पहचान बनाने में असफल रहे.

गूगल ने डूडल बना कर की वोटिंग की अपील

देशभर में पहले चरण का मतदान शुरू हो गया है. आज यानी 11 अप्रैल को देश के 20 राज्यों की 91 सीटों पर वोटिंग हो रही है. चुनावों में सभी दलों की नजरें युवा वोटरों पर होती है. इसी क्रम में नए वोटरों को जागरुक करने के लिए गूगल ने भी कदम उठाया है. गूगल अक्सर खास मौको पर डूडल लाता है. चूंकि आज से देश भर में आम चुनाव की शुरुआत हो गई है तो गूगल ने भी वोटरों को वोटिंग के लिए प्रोत्साहित करने के लिए एक खास डूडल लाया.

डूडल में क्या है खास

इस डूडल में गूगल की O  की जगह वोटिंग का निशान दिखाया है. इसपर क्लिक करने के पर वोटिंग संबंधित बहुत सी जानकारियां सामने आती हैं. इसमें कौन से लोग वोट कर सकते हैं, मतदान केंद्रों पर उन्हें क्या करना है, वोटिंग की पूरी प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी गई है.

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आज यहां हो रही है वोटिंग

आज पहले चरण के मतदान अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मेघालय, उत्तराखंड, मिजोरम, नागालैंड, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, सिक्किम, लक्षद्वीप तथा तेलंगाना की सभी सीटों पर वोटिंग हो रही है. इसके अलावा छत्तीसगढ़, जम्मू एवं कश्मीर, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल,  महाराष्ट्र, असम, बिहार, मणिपुर, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में भी कुछ लोकसभा सीटों पर मतदान हो रहे हैं. इसके साथ ही आंध्र प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम में विधानसभा चुनाव के लिए भी वोटिंग हो रही है.

 

राष्ट्रवाद पर भारी पड़ रही जाति

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश सबसे प्रमुख प्रदेश है. यहां 80 लोकसभा की सीटें हैं. पहले चरण की 8 सीटों मेरठ-हापुड़, बिजनौर, सहारनपुर, कैराना, मुज्जफरनगर, बागपत, गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में हो रहे मतदान में भाजपा सेना और राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाने में भले ही लगी है पर यहां राष्ट्रवाद पर जाति हावी हो रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां सभी 8 सीटों पर विजय मिली थी.

उत्तर प्रदेश के इस पश्चिमी इलाके में दलित-पिछड़े और मुसलिम सबसे जिताऊ फैक्टर माने जाते हैं. पिछले चुनाव में दंगों से परेशान जनता ने मोदी फैक्टर से प्रभावित होकर दलित-पिछड़े और सवर्ण ने मिलकर वोट किया. जिससे सभी 8 सीटें भाजपा को मिल गई. भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महत्व को स्वीकार करते हुये यहां से 3 सांसदों डाक्टर सत्यपाल सिंह, पूर्व सेनाप्रमुख वीके सिंह और डाक्टर महेश शर्मा को केन्द्र सरकार में मंत्री बना दिया.

पिछले 5 साल और खासकर 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिन्दू मुसलिम का तनाव बना रहा. भाजपा के नेता इसको हवा देते रहे. ऐसे में पश्चिम उत्तर प्रदेश की जिस जनता ने भाजपा को जाति और धर्म के बंधन को तोड़ कर वोट दिया था वह परेशान हो गई. गाय, एंटी रोमियों और दंगों को लेकर यहां राजनीति होती रही. जिसकी वजह से यहां के लोगों को लगा कि भाजपा भी विकास की बात करके दूसरे मुददे उठा रही है.

सहारनपुर में दलित सवर्ण झगडों में यहां जाति को फिर से मजबूती के साथ खडा कर दिया. अब चुनाव में यह जाति फैक्टर हावी हो गया है. ऐसे में भाजपा का राष्ट्रवाद वोट दिलाने में असफल हो रहा है. यहां देखने में त्रिकोणात्मक चुनाव हो रहे है पर असल में भाजपा को टक्कर देने के लिये सीधा संघर्ष हो रहा है. सपा-बसपा- लोकदल गठबंधन और कांग्रेस का मुकाबला सीधे भाजपा से हो रहा है. ऐसे में भाजपा पश्चिम के पहले चुनावी द्वार पर ही सबसे कडी टक्कर मिल रही है.

जिससे भाजपा का विरोध करने वालों को ताकत मिल रही है. उनको यह लगने लगा है कि अब फ्रैंडली लड़ाई से भाजपा को मात दी जा सकती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान का मुद्दा भी भाजपा के खिलाफ जा रहा है. ऐसे में भाजपा को यहां सबसे बड़ा नुकसान होता दिख रहा है.

ब्लैकबोर्ड वर्सेस व्हाइटबोर्ड : इंटरवल के बाद मूल मुद्दे से भटकी हुई फिल्म..

रेटिंग: ढाई स्टार

हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि शिक्षा पद्धति व शिक्षा व्यवस्था पर फिल्म बनाने वाले सभी फिल्मकार अब तक व्यावसायिकता के चक्कर में इस विषय के साथ न्याय करने में विफल होते रहे हैं. ताजातरीन फिल्म ‘‘ब्लैकबोर्ड वर्सेस व्हाइटबोर्ड’’ से इंटरवल तक अच्छी उम्मीदें जगाती है, मगर इंटरवल के बाद फिल्म मूल मुद्दे से भटक जाती है.

गांवों में प्राथमिक स्कूलों और प्राथमिक शक्षा व्यवस्था पर आघात करने वाली फिल्म ‘‘ब्लैकबोर्ड वर्सेस व्हाइट बोर्ड’’ की कहानी झारखंड के एक गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल की दुर्दशा की है. प्राथमिक स्कूल गांव के मुखिया गजराज प्रताप सिंह (अशोक समर्थ) के दादाजी द्वारा दान में दी गयी जमीन पर बना है. इसलिए स्कूल के दो कमरों में मुखिया अपनी गाय भैंस का भूसा भरते हैं. मुखिया ने अपना निजी स्कूल चला रखा है और उनका प्रयास रहता है कि बच्चे सरकारी प्राथमिक स्कूल की बजाय उनके स्कूल में पढ़ने जाएं. मुखिया की साली पुनीता( मधु रौय) ,मुखिया के स्कूल में पढ़ाने के साथ ही सरकारी प्राथमिक सकूल मे भी शिक्षक हैं, पर वह सिर्फ तनखाह लेने के लिए ही सरकारी प्राथमिक स्कूल में जाती है. प्राथमिक स्कूल के हेड मास्टर दीनानाथ(रघुवीर यादव) कुछ नहीं कर पाते हैं. वह मजबूर हैं. स्कूल में शिक्षक की कमी व स्कूल के कमरों पर मुखिया का कब्जा के चलते सभी बच्चे एक ही कक्षा में एक साथ बैठकर पढ़ते हैं. कुछ बच्चे तो सिर्फ मिडडे मील के लिए स्कूल आते हैं और मिडडे मील मिलते ही अपने घर चले जाते हैं. इतना ही नहीं मिड डे मील का चार माह से सरकार ने पैसा नही दिया है. स्कूल के शिक्षकों की तनखाह भी चार माह से नही मिली है. गांव की ही लड़की पिंकी (अभव्या शर्मा ) हाई स्कूल में पढ़ती है मगर गांव के दबंग उसे गांव से बाहर पढ़ने नहीं जाने देते इसलिए वह भी प्राथमिक स्कूल में ही बैठती है. एक दिन इस स्कूल में नए शिक्षक अमित (धर्मेंद्र सिंह) आते हैं. वह स्कूल की हालत देखकर विचलित होते हैं. पता चलता है कि उनकी अपनी एक अलग क हानी है. पढाई पूरी होने के बावजूद सही नौकरी न मिलने पर वह दुकान खोलकर पकौड़े व चाय बेचकर अच्छा पैसा कमा रहे थे पर उनकी शादी नहीं हो रही थी. इसलिए परिवार के दबाव में चाय पकोड़े की दुकान बंद कर शक्षक बन गए. हेड मास्टर दीनानाथ की सलाह पर वह उसी तरह से स्कूल के चलने देने के लिए राजी हो जाते हैं. पर तभी दिल्ली से एनआई समाचार चैनल की पत्रकार रश्मी (अलिस्मिता गोस्वामी) अपने कैमरामैन के साथ इस स्कूल पर स्टोरी तैयार करने आती है. अमित से उसकी बहस हो जाती है और अमित इस चुनौती को स्वीकार कर लेता है कि वह 15 दिन में इस स्कूल को एक आदर्श स्कूल बना देगा. फिर अमित,हेड मास्टर दीनानाथ,रश्मी व बच्चों के सहयोग से स्कूल की कायापलट हो जाती है. पुनीता को रोज स्कूल आना पड़ता है. इससे मुखिया का भाई हेमराज उर्फ हेमू (मनु कृष्णा) काफी नाराज हैं. पर विधायकी का चुनाव लड़ने जा रहे मुखिया अपने भाई को चुप रहने को कहते हैं. लेकिन जिस दिन रश्मी व उसके कैमरामैन वापस दिल्ली जा रहे होते हैं उस दिन हेमू, शिक्षक अमित को धमकाता है, जिसे छिपकर कैमरामैन अपने कैमरे में कैद कर लेता है. दिल्ली पहुंचते ही रश्मी अपने चैनल पर खबर चलाती है कि किस तरह एक शिक्षक ने स्कूल की कायापलट की और मुखिया के भाई हेमू ने उसे किस तरह धमकाया. चैनल पर खबर आते ही मुखिया की पार्टी उन्हे विधायकी की टिकट देने से मना कर देती है. तब मुखिया मारते हुए हेमू को पुलिस स्टेशन लाते हैं, पर अमित उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने से मना कर देते हैं. इस तरह मुखिया अपनी छवि सुधार कर पुनः विधायकी का चुनाव लड़ने की टिकट पा जाते हैं. उसके बाद हेमू अपने खास नौकर नथुनी की मदद से स्कूल के मिडडे मील में जहर मिलवा देते हैं और सारा आरोप स्कूल के शक्षक अमित पर लगता है. मामला अदालत पहुंचता है, जहां स्कूल की तरफ से वकील त्रिपाठी (अखिलेंद्र मिश्रा) और अमित की तरफ से रश्मी मुकदमा लड़ती है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते है. अंततः अदालत शिक्षक अमित को बाइज्जत बरी करती है और मुखिया गजराज सिंह, हेमू, पुनीता व नथुनी को दोषी मानते हुए इन पर नए सिरे से मुकदमा चलाने का आदेश देती है.

फिल्मकार व लेखक ने इस फिल्म में हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था जैसे अति ज्वलंत मुद्दे को उठाया, यदि लेखक व निर्देशक ने संवेदनशीलता के साथ इस फिल्म पर काम किया होता, तो यह एक बेहतरीन फिल्म बन जाती. मगर दुर्भाग्य की बात है कि पटकथा लेखक की अपनी कमजोरियों के चलते यह फिल्म इंटरवल के बाद मूल मुद्दे से भटक कर महज निजी दुश्मनी व बदले की कहानी बनकर रह जाती है. मूल मुद्दा गायब हो जाता है. लेखक के उपर अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा इस कदर हावी हो गए कि उन्होने अदालती दृष्यों और खासकर अखिलेंद्र मिश्रा के संवादों को इस कदर बढ़ाया कि पूरी फिल्म तहस नहस हो गयी. इतना ही नहीं लेखक की अपनी कमियों के ही चलते फिल्म बेवजह लंबी हो गयी है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी. इसके अलावा लेखक की कमियों के ही चलते अमित व रश्मी के बीच प्रेम कहानी भी ठीक से नहीं उभरती.

फिल्म में ब्लैकबोर्ड, सरकारी प्राथमिक स्कूल का प्रतीक और व्हाइटबोर्ड, निजी स्कूल का प्रतीक है. मगर फिल्मकार इस अंतर का भी ठीक से परदे पर नही ला सके,परिणामतः फिल्म का शीर्षक भी सार्थक नहीं होता.

फिल्म के कैमरामैन धर्मेंद्र सिसोदिया जरुर बधाई के पात्र हैं उन्होंने गांव के जीवन, प्राकृतिक खूबसूरती वगैरह को बहुत बेहतरीन तरीके से अपने कैमरे से कैद किया है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो फिल्मकार ने रघुवीर यादव की प्रतिभा को जाया किया है. अखिलेंद्र मिश्रा ने अपने आपको दोहराया है. वह 1995 में आए सीरियल ‘चंद्रकांता’ के अपने क्रूर सिंह के किरदार से आज तक खुद को मुक्त नहीं कर पाए हैं. फिल्म के नायक अमित के किरदार को निभाने वाले अभिनेता धर्मेंद्र सिंह को अभी काफी मेहनत करने की जरुरत है. यदि वह सफलता के पायदान पर पहुंचना चाहते हैं,तो उन्हे अपने अभिनय में निखार लाना होगा.

दो घंटे 14 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘ब्लैकबोर्ड वर्सेस व्हाइट बोर्ड’’ का निर्माण नुपुर श्रीवास्तव, गिरीष तिवारी और आषुतोष रतन ने किया है. फिल्म के निर्देशक तरूण बिस्ट, निर्देशक गिरीष तिवारी, संगीतकार जयंत अंजान,कैमरामैन धर्मेंद्र सिसोदिया तथा फिल्म के कलाकार हैं- रघुबीर यादव, धर्मेंद्र सिंह, अलिस्मिता गोस्वामी, अशोक समर्थ,  अखिलेंद्र मिश्रा, पंकज झा व अन्य.

समर ड्रिंक: लौकी जूस

आप गरमी के मौसम में लौकी जूस को नियमित रूप से पीती हैं तो यह आपके शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है. यह जूस हेल्दी होने के साथ-साथ टेस्टी भी है. और बनाने में भी बेहद आसान है तो चलिए जानते हैं लौकी जूस की रेसिपी.

सामग्री

– लौकी (1 मीडियम साइज की)

– पुदीना  (10 से 12 पत्ते)

– काला नमक ( स्वादानुसार)

– चीनी (2 चम्मच)

– अदरक (1 छोटा टुकड़ा)

– नींबू (1)

लाजवाब है बेसन कप, तो आज शाम यही ट्राई करें

बनाने की विधि

– इसके लिए आप एक लौकी और अदरक लें और उसे अच्छे से धो लें.

– अब आप इसके छोटे छोटे टुकड़े करके इन सब को मिक्सी के जार में डालकर पीस लें.

– अब आपके पास गाढ़ा सा पेस्ट बन जाता है.

– अब आप इसे बड़ी छलनी में छान लीजिये.

– पानी डाल डाल कर आपको इसका पूरा रस बना लेना है

– अंत में थोड़ा सा बुरादा बचेगा उसे आप फेंक दीजिये.

– अब आप इसमें नींबू का रस, काला नमक और चीनी मिलायें और फिर कुछ बर्फ के टुकड़े डालें.

– अब आपकी लौकी की जूस तैयार है.

काफी मिल्‍क शेक बनाने की आसान रेसिपी

गरमी के मौसम में निखरी त्वचा पाने के लिए बेहद फायदेमंद है ये पैक

गरमी के मौसम आते ही आपके चेहरे के चमक खोने लगते हैं. इसलिए इस मौसम में त्वचा में नमी बनाए रखना और उसका पोषण बेहद जरूरी है. आज हम आपको घर पर बने फेस पैक के बारे में बताएंगे जिससे आप इस पैक का इस्तेमाल कर अपने चेहरे की निखार बरकरार रख सकती हैं.

  • आप त्वचा में निखार लाने के लिए खीरा, बादाम और शहद से बना पैक भी लगा सकती हैं. खीरे का ओवरनाइट फेसपैक बनाने के लिए सबसे पहले मिक्सर के इस्तेमाल से खीरे का रस निकाल लें, अब इसमें गुलाब जल और ग्लिसरीन समान मात्रा में मिलाएं. पेस्ट को न ज्यादा पतला बनाएं न ज्यादा गाढ़ा बनाएं और अब इसे रात में सोने जाने से पहले लगा लीजिए. सुबह में चेहरे को साफ पानी से धुल ले और थपथपाकर सुखा लें. कुछ दिनों में आपको अपने चेहरे के रंग में काफी बदलाव नजर आएगा.-
  • टमाटर का गूदा और रस त्वचा पर से टैनिंग हटाने में काफी मददगार होता है. यह त्वचा को कोमल, चमकदार बनाने के साथ ही रंग साफ भी करता है. इसे बालों पर भी लगाया जा सकता है, जिससे बालों में चमक आती है और तेज धूप में सुरक्षा प्रदान करता है.

आपकी खूबसूरती को बढ़ाएंगे ये 5 ग्रीन टी प्रौडक्ट्स

  • खीरे का पैक, टमाटर का रस, हल्दी, बेसन, दही और नींबू के रस से बना फेसपैक आपकी त्वचा में निखार और चमक बनाए रखने के लिए सबसे उपयुक्त है.
  • तरबूज फेशियल, खीरा फेशियल, स्ट्राबेरी फेशियल और आलू का इस्तेमाल कर फेशियल किया जा सकता है. ये चीजें आपके चेहरे को ताजगी का अहसास देगी और त्वचा को रिजूविनेट करेंगी. इससे गर्मी के मौसम त्वचा को ठंडक महसूस होगा.
  • त्वचा को हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाए रखने का यह सही समय है, क्योंकि तेज धूप से टैनिंग, दाग-धब्बे पड़ने और झुर्रियां पड़ने जैसी समस्या हो सकती है.
  • एक नींबू को दो हिस्सों में काट लें. आधे हिस्से को सीधे त्वचा पर गोल-गोल घुमाते हुए मलें. ऐसा कम से कम पांच मिनट करें, उसके बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें. नींबू का रस विटामिन-सी से भरपूर होता है, जो त्वचा का रंग हल्का करता है. हल्दी और दही का पेस्ट इस्तेमाल करना भी कारगर होगा.

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पहलवानी के नाम पर दहशतगर्दी

सत्तर के दशक की बात है. जगह थी उत्तर प्रदेश का जिला खुर्जा. वहां के सब्जी बेचने वाले एक परिवार के 2 भाई गूंगा पहलवान और अनवर लंगड़ा काम की तलाश में दिल्ली आए थे. दोनों अंगूठाछाप थे, इसलिए उन्होंने दिल्ली की आजादपुर मंडी में सब्जी बेचने का पुश्तैनी धंधा शुरू किया. बाद में उन्होंने यही काम दिल्ली के दरियागंज इलाके में जमा लिया. काम तो जम गया, लेकिन उन की मंजिल कुछ और ही थी. ऐसी मंजिल जिस तक जुर्म की काली राह से ही पहुंचा जा सकता था.

हालांकि यह साफतौर पर नहीं कहा जा सकता कि वे इस स्याह रास्ते पर पहली बार कब चले थे. पर 14 अक्तूबर, 1986 में जब एक सब्जी बेचने वाले ने ही जबरन वसूली की शिकायत पुलिस से की तो पता चला कि वे दोनों पहले से ही जबरन वसूली के गोरखधंधे में उतर चुके थे.

बताया जाता है कि गूंगा पहलवान और अनवर लंगड़ा जब दरियागंज छोड़ कर ओखला गए थे, तभी उन्होंने प्रोटैक्शन मनी के नाम पर ओखला सब्जीमंडी में गैरकानूनी उगाही का धंधा शुरू कर दिया था. गूंगा पहलवान का असली नाम मोहम्मद उमर था. उस पर 13 और उस के भाई अनवर पर 15 पुलिस केस दर्ज होने की बात सामने आई है.

जुर्म का यह पौधा देखते ही देखते बड़ा पेड़ बन गया. एकएक कर के इन दोनों भाइयों के परिवार वाले भी इस धंधे में हिस्सेदार बनते गए. 23 सदस्यों वाले इस परिवार में 13 सदस्यों पर करीब सवा सौ आपराधिक मामले दर्ज हैं.

भारत भूमि युगे युगे

गैरकानूनी उगाही का धंधा अब उन का फैमिली बिजनैस बन चुका था. 55 साल के गूंगा पहलवान और 52 साल के अनवर लंगड़ा ने 5 साल पहले इस कारोबार से रिटायरमैंट ले लिया है. उन के रिटायरमैंट के बाद उन के 9 बेटों ने इस धंधे की कमान अपने हाथों में ले ली. 2 नाबालिग बेटे भी जुर्म की राह पर चल चुके हैं.

पुलिस से पता चला कि उमर और अनवर पहले स्थानीय स्तर पर पहलवानी करते थे. तब उन के बेटे बौडी बिल्डिंग करते थे. अपने गठीले बदन से वे लोगों पर रौब जमाने लगे थे. 21 जुलाई, 2017 की रात 2 बजे गूंगा पहलवान के बेटे राशिद ने ओखला सब्जीमंडी में सब्जी बेचने वाले नरेश चंद से उगाही मांगी थी. नरेश ने जब उसे पैसे नहीं दिए तो राशिद ने कांच की बोतल नरेश के सिर पर मारी, जिस से उस का सिर फट गया था.

नरेश की शिकायत पर अमर कालोनी पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया. काफी कोशिश के बाद भी जब राशिद नहीं मिला तो पुलिस ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया.

इसी बीच 5 जनवरी, 2018 को राशिद ओखला मंडी आया तो उस ने वहीं पर 3 सब्जी बेचने वालों धर्मेंद्र, रणवीर सिंह और कपिल से चाकू के बल पर लूटपाट की. वारदात कर के वह फरार हो गया.

राशिद की गिरफ्तारी के लिए एसीपी जगदीश यादव ने थानाप्रभारी उदयवीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में एसआई आरएस डागर को शामिल किया गया. 21 जनवरी, 2018 को टीम को मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि आरोपी राशिद श्रीनिवासपुरी के एक फिटनैस जिम में आने वाला है.

पुलिस टीम वहां पहले ही मुस्तैद हो गई. जैसे ही राशिद वहां पहुंचा, उसे दबोच लिया गया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने वारदात को अंजाम देने की बात स्वीकार कर ली.

10 अक्तूबर, 2016 की देर रात पुलिस को सूचना मिली कि कुछ बदमाश सब्जीमंडी के कारोबारियों से जबरदस्ती उगाही कर रहे हैं. जब तक पुलिस वहां पहुंची, तब तक बदमाश फरार हो गए. बाद में पता चला कि जो बदमाश भागे थे, वह और कोई नहीं अनवर लंगड़ा और उस के 3 बेटे सलमान, शाहरुख और इमरान थे.

पुलिस ने तलाश जारी रखी और अनवर लंगड़ा के तीनों बेटों को अलगअलग इलाकों से गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अनवर हाथ नहीं आया. इस के बावजूद पुलिस ने उस की तलाश जारी रखी और 5 दिसंबर, 2016 को उसे ओखला रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तार कर लिया.

अपने जुर्मों को छिपाने के लिए मोहम्मद उमर और अनवर लंगड़ा ने दिखावे के लिए ओखला की होलसेल मार्केट में 2 दुकानें खरीद रखी हैं. वहां के लोग बताते हैं कि उमर खुद को उस मार्केट का चेयरमैन बताता है. इन पहलवान भाइयों और इन के परिवार वालों से श्रीनिवासपुरी क्षेत्र के लोग आंतकित रहते थे. और तो और क्षेत्र में अगर कहीं लड़ाईझगड़ा हो जाता तो उमर या अनवर के बेटों में से किसी न किसी की संलिप्तता जरूर निकलती थी.

श्रीनिवासपुरी रैजीडैंट वेलफेयर एसोसिएशन ने भी कई बार थाने में इन लोगों के खिलाफ शिकायत की थी. पुलिस ने अनवर के अनवर लंगड़ा बनने के बारे में बताया कि सन 1990 में जब वह तिहाड़ जेल में बंद था, तब एक बार उस ने वहां से भागने की कोशिश की थी. मजबूरी में पुलिस को उस पर फायरिंग करनी पड़ी, जिस से एक गोली उस के दाएं पैर में लग गई थी. तब से अनवर के नाम के साथ लंगड़ा जुड़ गया.

इस ‘क्रिमिनल फैमिली’ की एक और खास बात यह है कि इस के ज्यादातर सदस्य पढ़ेलिखे नहीं हैं. उमर और अनवर के कुल 19 बच्चे हैं, जिन में से कोई 5वीं फेल है तो कोई तीसरी फेल. 9 बच्चे तो बिलकुल अनपढ़ हैं.

नजफगढ़ से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर दिल्ली देहात का एक गांव है ढिचाऊं कलां. इस गांव में रामनिवास उर्फ रामी पहलवान रहता था. उस के पास खेती की अच्छी जमीन थी. उस का एक पहलवान भतीजा था कृष्ण. कृष्ण का उन दिनों गांव कराला के रहने वाले जयबीर कराला से झगड़ा चल रहा था. जयबीर कराला पड़ोसी गांव मितराऊं के रहने वाले बलराज का गहरा दोस्त था.

एक दिन मौका पा कर कृष्ण पहलवान ने अपने साथियों के साथ मिल कर जयबीर कराला की हत्या कर दी. इस के बदले में सन 2002 में रामनिवास उर्फ रामी पहलवान और उस के दोस्त रोहताश की हत्या कर दी गई.

स्मार्ट घड़ी पहन कर परेशान हुए सफाई कर्मचारी

कृष्ण पहलवान को शक था कि उस के चाचा की हत्या में उन के पड़ोसी सूरज प्रधान का हाथ है. बताया जाता है कि सूरज पुलिस का मुखबिर था. कृष्ण पहलवान इस हत्या का बदला लेने के लिए मौका तलाशने लगा.

बलराज के एक चाचा थे, जिन की शादी नहीं हुई थी. उन की ढांसा रोड पर तकरीबन 15 बीघा जमीन थी. उस जमीन को उन्हीं के गांव का बलवान फौजी जोता करता था. जब बलराज के चाचा की मौत हो गई तो उस के पिता सूरत सिंह ने बलवान फौजी से वह जमीन खाली करने के लिए कहा.

तब तक जमीन का वह टुकड़ा बेशकीमती हो चुका था. बलवान फौजी उस जमीन को छोड़ना नहीं चाहता था. उस ने मौके का फायदा उठाने का फैसला किया और मदद के लिए वह बलराज के दुश्मन कृष्ण पहलवान के पास पहुंच गया.

किसी तरह यह बात बलराज को पता चल गई. बलराज ने इस बारे में अपने पहलवान भाई अनूप को बताया. फिर एक योजना के तहत सन 1997 में अनूप पहलवान और उस के दोस्त संपूरण ने बलवान फौजी और उस के साले अनिल को घेर लिया. वे दोनों गांव ढिचाऊं कलां जा रहे थे. तभी उन लोगों ने इन सालेबहनोई पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं. इस हमले में अनिल की मौत हो गई, जबकि बलवान फौजी को गंभीर चोटें आईं. लेकिन वह बच गया.

इस वारदात ने बलवान फौजी के जवान बेटे कपिल को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया. वह कृष्ण पहलवान के साथ ही काम करने लगा. इस के बाद 3 अप्रैल, 1998 को गांव ककरोला में बलराज को घेर कर ढेर कर दिया गया.

बलराज के मरने के बाद गैंग की कमान बलराज के भाई अनूप पहलवान ने संभाल ली. 12 जुलाई, 1998 को अनूप पहलवान ने मौका देख कर कपिल के पिता बलवान फौजी और कृष्ण पहलवान के रिश्तेदार और दोस्तों समेत 6 लोगों का कत्ल कर दिया.

उस समय कपिल जेल में बंद था. 13 सितंबर, 1999 को वह जेल से बाहर आया. उसी दिन अनूप गैंग ने कपिल के भाई कुलदीप उर्फ गुल्लू की हत्या कर दी. कपिल ने भी उसी दिन इस हत्या का बदला ले लिया और उस ने अनूप के भतीजे यशपाल को मार गिराया. इस के बाद वह फरार हो गया.

इतनी हत्याएं होने के बाद भी कृष्ण पहलवान का अपने चाचा रामनिवास उर्फ रामी पहलवान की हत्या का बदला पूरा नहीं हुआ था. 20 फरवरी, 2002 को ढिचाऊं कलां से एक बारात सोनीपत के जगमेंद्र सिंह के यहां गई थी, उन की बेटी पिंकी की शादी थी.

बारात दुलहन के घर की तरफ जा ही रही थी कि एक खबर के बाद गाजेबाजे बंद कराने पड़ गए. वजह, जनवासे के पास ही 3 लाशें पड़ी थीं. वे लाशें सूरज प्रधान, उस के बेटे सुखबीर और दिचाऊं कलां के ही नारायण सिंह की थीं. यह वही सूरज प्रधान था, जिस के बारे में कृष्ण पहलवान को पुलिस का मुखबिर होने का शक था.

इस के बाद साल 2003 में अनूप पहलवान रोहतक कोर्ट में एक मुकदमे के सिलसिले में पेश होने आया था. पुलिस सिक्योरिटी के बीच कृष्ण पहलवान गैंग के एक शार्पशूटर महावीर डौन ने अनूप पर गोलियां दाग दीं और उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

अनूप पहलवान की हत्या के बाद तकरीबन 10 साल तक इस गैंगवार में शांति का माहौल रहा. इस बीच कृष्ण पहलवान का भाई भरत सिंह राजनीति में आ चुका था. वह सन 2008 में विधायक बन गया था, लेकिन बाद में 2013 का चुनाव वह हार गया.

29 मार्च, 2015 को भरत सिंह की हत्या कर दी गई. इस से पहले सन 2012 में भी उस पर हमला किया गया था, पर तब वह बच गया था. बाद में पता चला कि यह हत्या उसी के गांव के रहने वाले उदयवीर उर्फ काले ने कराई थी. उदयवीर सूरज प्रधान का बेटा है. उस ने अपने पिता, भाई और चाचा की हत्या का बदला लिया था.

देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अपने शारीरिक दम पर, आसान शब्दों में कहें तो ‘पहलवान‘ कहलवा कर जुर्म की दुनिया में कदम रख देते हैं और कभी कभी तो वे इतने बड़े गैंग बना लेते हैं कि अपने इलाके में डर का पर्याय बन जाते हैं.

2-4 आपराधिक वारदातों को अंजाम देने के बाद ऐसे लोग शस्त्र लाइसैंस ले लेते हैं, ताकि इन का रौब बरकरार रहे. न जाने कितने पहलवाननुमा लोग हथियार लिए धड़ल्ले से घूमते देखे जा सकते हैं. इस तरह के लोग ही शादीब्याह में गोलियां चला कर हादसों को न्यौता देते हैं. रोडरेज में भी ऐसे ही लोग गोलियां चलाते हैं.

हथियार और उसे चलाने की हिम्मत ऐसे लोगों को दूसरे बड़े अपराध करने को उकसाती है. जल्दी अमीर बनने की चाहत भी ऐसे लोगों को अपराध करने का बढ़ावा देती है.

इस मसले पर मशहूर पहलवान चंदगीराम के बेटे पहलवान जगदीश कालीरमन, जो खुद मेरठ उत्तर प्रदेश के डीएसपी पद पर कार्यरत हैं और देश के नामचीन पहलवान और कोच हैं, ने बताया, ‘‘हमारे समाज के पहलवानों को ले कर अपनी अलग धारणा बनी हुई है. कोई भी हट्टाकट आदमी अगर ट्रैक सूट पहन लेता है तो लोग उसे पहलवान कहने लगते हैं. भले ही वह किसी भी खेल कुश्ती, जूडो, कबड्डी, बौडीबिल्डिंग आदि से जुड़ा हो या न जुड़ा हो.

‘‘जबकि खिलाड़ी बेहद अनुशासित होते हैं. वे अपने खेल, उस की प्रैक्टिस और अपने बेहतर भविष्य के लिए समाज तक से कट जाते हैं. फिर वे जुर्म की राह पर कैसे जा सकते हैं?

‘‘जुर्म से जुड़े ऐसे अपराधियों की अगर उपलब्धियों की बात की जाए तो वे न के बराबर मिलती हैं. हां, कई बार बेरोजगारी या दूसरी वजहों से खिलाड़ी भी अपराध की राह पकड़ लेते हैं, लेकिन उन का प्रतिशत बहुत कम होता है और ऐसे ही लोगों की वजह से ‘पहलवान’ शब्द के साथसाथ पहलवानों की इमेज भी खराब होती है.’’

‘अर्जुन अवार्ड’ विजेता पहलवान कोच कृपाशंकर बिश्नोई के मुताबिक, ‘‘अपराधियों ने पहलवान शब्द का मतलब ही बदल दिया है. बहुत से अपराधी पहलवानों ने कुश्ती तो छोडि़ए, किसी भी खेल में भारत की बड़े स्तर  पर नुमाइंदगी तक नहीं की होती है. वे तो लोकल अपराधी होते हैं. मैं ने तो खुद लोगों से कह दिया है कि आप मुझे ‘पहलवान’ संबोधन से न बुलाया करें. मेरा मानना है कि पहलवान शब्द का इस्तेमाल चैंपियन कुश्ती खिलाड़ी के लिए किया जाना चाहिए, गुंडेबदमाशों या तानाशाह लोगों के लिए नहीं.’’

बहुत बार ऐसा भी होता है कि बिल्डर या प्रौपर्टी डीलर वगैरह अपने पैसे की उगाही के लिए छुटभैये पहलवानों से मदद मांगते हैं ताकि डराधमका कर लोगों से वसूली कर सकें. जब उन में इस तरह पैसा छीनने की आदत पनपने लगती है तो धीरेधीरे वे अपना गैंग बना लेते हैं.

इस तरह के लोग खेल और समाज दोनों के लिए खतरा हैं. पुलिस को इन के खिलाफ कड़ी से कड़ी काररवाई करनी चाहिए ताकि ‘पहलवान’ शब्द की गरिमा बनी रहे.

तलाक समाधान नहीं

बदलना होगा शहरों के पुराने इलाकों को

दिल्ली जैसे कितने ही शहरों में होलसेल मार्केटें शहर की रिहायशी बस्तियों व घने बाजारों के बीचोंबीच हैं और धीरेधीरे आसपास के मकानों में भी घुस रही हैं. इन संकरी गलियों में न चलने की जगह है, न ठेलों की और न ही सैकड़ों मजदूरों के लिए, जो दुकानों का माल सप्लाई करने आते हैं. ये चल रही हैं क्योंकि रेल से आनेजाने में सुविधा है. दिल्ली के चावड़ीबाजार, सदरबाजार, पहाड़गंज, खारीबावली के इलाके ऐसे ही हैं.

इन इलाकों में रहने वालों के लिए मुसीबतें ही हैं. सदियों नहीं तो दशकों से रह रहे लोगों की जिंदगियां उन के बिना कुसूर के खराब हो रही हैं. उन्हें अपने पुश्तैनी मकान छोड़ कर भागना पड़ रहा है. कई फिल्मों ने इन इलाकों की घरेलू, व्यापारी, धार्मिक जिंदगी को पेश किया है पर रोमांटिक माहौल तो यहां असलियत से काफी दूर है. यहां की बदबू, भीड़, बिखराव, लटके तार जानलेवा हैं. जिन बस्तियों ने पुश्तों को शरण दी है वे अब खतरा बन गई हैं.

राजनीति में महिलाएं आज भी हाशिए पर

हर नई सरकार यहां सफाई का वादा करती है पर न व्यापारी, न उन के ग्राहक और न ही यहां रहने वाले लोग किसी ठोस प्लान पर सहमत हो पा रहे हैं. घरों में व्यापारिक काम न हो इस पर सुप्रीम कोर्ट कानून के अनुसार सख्त हो रहा है और इसीलिए बहुतों को मजबूर किया जा रहा है कि अपनी बसी बसाई दुकानों से 30-40 किलोमीटर दूर जाएं. इस पर भारी गुस्सा है और अडि़यल रवैया अपनाया जा रहा है. व्यापारियों को लगता है कि नई जगह उन्हें फिर से नई साख बनानी पड़ेगी, क्योंकि वहां उन की दुकान की पहचान खो जाएगी. यह सच है पर शहर की मजबूरी है.

शहरों के पुराने इलाकों को बदलना तो होगा. दिल्ली, भोपाल, आगरा, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसे शहरों के पुराने इलाकों को तो म्यूजियम ही बनना पड़ेगा. वे धरोहरों के हिस्से हैं, आज के धंधों के नहीं. यूरोप के ज्यादातर शहरों के ऐसे इलाके केवल पर्यटकों के लिए बन गए हैं. पुराने मकानों में होटल बन गए हैं, हवेलियां म्यूजियम बना दी गई हैं. दुकानों में पर्यटकों का सामान बिकता है या रेस्तरां हैं. लोग सैर करने और पुराने माहौल में एक बार फिर जीने के लिए आते हैं.

व्यापारियों को नए जमाने के साथ तो चलना ही होगा. पुरानी सोच से चिपके रहने का अर्थ है खुद पुराना बना रहना. अगली पीढि़यों को इन्हीं इलाकों में रखना है तो इन का ढांचा वैसा ही रख कर इन्हें नया रंग देना जरूरी है.

सावधान, आप बेचे जा रहे हैं

सबला का जवाब

अनजान शहर और उस पर घिरती शाम. रीना का मन घबराने लगा था. वह सोच रही थी, ‘आज के जमाने में पति के साथ होना भी कौन सी सिक्योरिटी की गारंटी है. अभी हाल ही में हनीमून पर आई एक नईनवेली दुलहन को उस के पति के सामने ही खींच कर…’

‘‘मुकेश, तुम्हें मैं ने बोला था न कि या तो जल्दी लौटने की कोशिश करेंगे या पहले से कोई रुकने की जगह तय कर लेंगे… तुम ने दोनों में से एक भी काम नहीं किया…’’ रीना ने अपने पति मुकेश से शिकायती लहजे में कहा.

‘‘अरे डार्लिंग, चिंता मत करो…’’ मुकेश अपनी दुकान के लिए खरीदे गए माल का हिसाब मिलातेमिलाते बोला, ‘‘यहां ज्यादा देर हुई तो राजन के यहां रुक जाएंगे. पिछली बार याद है कितना गुस्सा कर रहा था वह कि मेरा घर होते हुए भी होटल में क्यों रुके?’’

राजन मुकेश का दोस्त था. अकसर उन के घर आताजाता रहता था, लेकिन चूंकि रीना अपने घरपरिवार में ही खुश रहने वाली औरत थी, सो उसे जल्दी किसी से घुलनामिलना पसंद नहीं था.

‘‘अरे, तुम पागल हो क्या…’’ रीना झल्ला गई, ‘‘राजन कौन है तुम्हारा? चाचा, मामा, नाना… मैं ने पहले भी कहा है कि किसी के भी घर यों ही नहीं रुकना चाहिए…’’

‘‘फिर होटल का खर्च लगेगा. माल लेने आते हैं यहां, घूमने थोड़े ही,’’ मुकेश ने उसे समझाने की गरज से कहा.

रीना चिढ़ कर यह कहते हुए चुप हो गई, ‘‘जो मन में आए, करो.’’

आखिर वही हुआ जो रीना नहीं चाहती थी. सारा सामान लेतेलेते शाम के 7 बज गए. वापस लौटना भी खतरे से खाली नहीं था. हाईवे का सुनसान रास्ता और इतने सारे सामान के साथ रीना जैसी खूबसूरत जवान बीवी.

मुकेश ने डरतेडरते पूछा, ‘‘चलो न, बस रातभर की तो बात हैं.’’

रीना ने चुपचाप कुछ सामान उठा लिया मानो अनिच्छा से सहमति दे रही हो. मुकेश उस के साथ राजन के घर पहुंचा जो वहां से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर ही था.

राजन उन दोनों को देखते ही खिल उठा, ‘‘अरेअरे भाभीजी, आइएआइए… इस बार तू ने समझदारी की है मुकेश.’’

रीना को यों किसी के घर जाना बिलकुल पसंद नहीं था. वह सकुचाते हुए सोफे पर बैठ गई और घर पर ननद को फोन लगाया. अपने 5 साल के नटखट बेटे की चिंता सताना स्वाभाविक था.

‘‘टिंकू ज्यादा तंग तो नहीं कर रहा है न पायल?’’ रीना ने पूछा.

‘नहीं भाभी, टीवी देख रहा है…’ रीना की ननद पायल ने फोन पर बताया.

‘‘अच्छा सुनो… फ्रिज में दाल है, गरम कर लेना…’’ वह उसे जरूरी निर्देश देने लगी. तब तक मुकेश बाथरूम से फ्रैश हो कर आ चुका था. रीना ने फोन काट दिया.

‘‘फ्रैश हो लो तुम भी…’’ मुकेश धीरे से बोला, ‘‘इंतजाम सही है. साफसुथरा है सब…’’

रीना हिचकते हुए उठी. देखा कि राजन किचन में जुटा था. उस की अच्छीखासी सरकारी नौकरी थी लेकिन उस ने शादी नहीं की थी, सो सब काम वह खुद ही करता था. खाना खाने के बाद उस ने उन्हें उन का कमरा दिखाया.

‘‘चलिए भाभी, गुड नाइट…’’ कहता हुआ राजन बाहर जातेजाते अचानक मुड़ा और बोला, ‘‘मैं यह पूछना तो भूल ही गया कि मेरी कुकिंग कैसी लगी?’’

‘‘जी अच्छी थी. खाना अच्छा बना लेते हैं आप,’’ रीना ने मुसकरा कर जवाब दिया.

राजन चला गया. उस के जाते ही मुकेश ने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ कर रीना से लिपटने लगा.

‘‘अरेअरे, क्या कर रहे हो… वह भी दूसरे के घर में,’’ रीना उस की इस हरकत पर असहज हो गई.

‘‘2 मिनट में कर लूंगा, तुम लेटो तो…’’ मुकेश ने अपने होंठ उस के चेहरे पर रगड़ने शुरू कर दिए.

‘‘बाबा, यह हमारा बैडरूम नहीं है…’’ रीना उस के हाथ अपने सीने से हटाने की नाकाम कोशिश करते हुए बोली, लेकिन न जाने आज मुकेश पर क्या धुन सवार थी. उस ने उसे बिस्तर पर दबा ही दिया.

रीना इंतजार कर रही थी कि जल्दी यह सब खत्म हो लेकिन आज मुकेश में गजब का बल आया हुआ था. सामने लगी घड़ी में रीना बीतते मिनटों को हैरत से गिन रही थी.

‘‘क्या हो गया है जी तुम को…’’ अनियमित सांसों के बीच वह किसी तरह बोल पाई लेकिन मुकेश सुने तब न. हार कर रीना भी सहयोग करने पर मजबूर हो गई. काफी देर बाद दोनों अगलबगल निढाल पड़े सुस्ता रहे थे.

‘‘कपड़े तुम्हारे… जल्दी पहनो…’’ अपने अंदरूनी कपड़ों को खोजती पसीने से तरबतर रीना ने मुकेश के ऊपर उस की टीशर्ट रखते हुए कहा. आज उसे भी भरपूर संतुष्टि मिली थी लेकिन चादर के हाल पर बहुत शर्म भी आने लगी कि सुबह राजन देख कर क्या सोचेगा. लेकिन मुकेश इन सब बातों से बेपरवाह खर्राटे लेने में मगन था.

भोर के तकरीबन 4 बजे रीना की आंख लगी, जिस से उठने में देर हो गई.

7 बजे राजन दरवाजा खटखटाने लगा. रीना ने मुकेश को चिकोटी काट कर जगाया.

‘‘राजन दरवाजे पर है…’’ मुकेश के उठते ही वह फुसफुसा कर बोली.

मुकेश ने दरवाजा खोला.

‘‘चल, हाथमुंह धो कर फ्रैश हो ले. मैं नाश्ता बनाने जा रहा हूं,’’ राजन ने मुकेश से कहा और साथ लाया अखबार रीना को दे कर चला गया.

नाश्ता करते ही रीना ने तुरंत सामान बांध लिया. बिसकुट और साबुन के कुछ पैकेट जबरदस्ती राजन को थमा कर वे दोनों वहां से चल पड़े.

कुछ हफ्तों बाद एक दिन जब रीना नहा रही थी, उसी समय डोरबैल बज उठी. मुकेश दुकान गया हुआ था और पायल अपने होस्टल जा चुकी थी. घर में बस रीना और टिंकू ही थे.

रीना ने जल्दीजल्दी साड़ी बांधी और दरवाजा खोला तो देखा कि सामने राजन खड़ा था.

‘‘ओह राजन भैया…’’ रीना ने उस का औपचारिक स्वागत करते हुए उसे अंदर बुलाया.

‘‘मुकेश तो दुकान के लिए निकल चुका होगा?’’ राजन ने इधरउधर देख कर पूछा.

‘‘हां, इस समय तो वे दुकान पर ही होते हैं…’’ रीना बोली, ‘‘बैठिए, मैं चाय बनाती हूं,’’ कह कर रीना जल्दी से किचन में चली गई. टिंकू अपने कमरे में खेल रहा था.

चाय पीतेपीते रीना को कुछ ठीक महसूस नहीं हो रहा था. उसे लग रहा था कि राजन की नजर उस की कमर पर… लेकिन वह इन खयालों को झटक दे रही थी. हां, उस ने पल्लू को करीने से कर लिया था.

‘‘रुकिए, मैं मुकेश को फोन करती हूं…’’ ऐसा बोल कर वह उठने को हुई कि राजन ने हाथ पकड़ कर जरबदस्ती रीना को बिठा लिया.

‘‘अरे बैठिए न भाभी… वह तो आ ही जाएगा.’’

रीना को उस का हाथ पकड़ना बिलकुल अच्छा नहीं लगा. जल्दी से हाथ खींच कर छुड़ाया और बेटे को बुलाने लगी जिस से एकांत मिटे, ‘‘टिंकूटिंकू… देखो अंकल आए हैं,’’ मगर उस के आने से पहले ही राजन बोल उठा, ‘‘भाभी, मुझे आप को कुछ दिखाना है.’’

‘‘क्या दिखाना है?’’ रीना को कुछ समझ नहीं आया. राजन ने अपने मोबाइल फोन पर कोई वीडियो प्ले कर उसे थमा दिया. मोबाइल पर चलती पोर्न फिल्म देख कर रीना गुस्से और बेइज्जती से भर उठी.

‘‘यह क्या बेहूदगी है…’’ रीना ने चिल्ला कर मोबाइल राजन पर फेंकते हुए कहा, ‘‘निकलो अभी के अभी यहां से, उस दिन बहुत शरीफ होने का ढोंग कर रहा था राक्षस…’’

लेकिन राजन एकदम शांत बैठा रहा. उस ने मोबाइल फोन दोबारा उस की ओर घुमाया, ‘‘जरा, इस फिल्म की हीरोइन को तो देख लो भाभीजान…’’

उस वीडियो की लड़की का चेहरा देखते ही रीना को तो जैसे चक्कर आने लगे. वीडियो में वह और मुकेश थे. वह समझ गई कि राजन ने उसी रात यह वीडियो बनाया था जब वे लोग उस के यहां रुके थे.

‘‘मैं ने ही मुकेश के खाने में वह मर्दानगी की दवा मिलाई थी जिस से वह आप को खुश कर दे और मैं वीडियो बना सकूं…’’ राजन बेशर्मी से हंसता हुआ बोला, ‘‘हाहाहा, वह बेचारा अनजाने में ही हीरो बन गया.’’

रीना बेइज्जती के मारे वहीं फूटफूट कर रो पड़ी. चिडि़या जाल में फंसी समझ कर राजन ने उस के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘भाभी, आप की आंखें प्यार में डूबी अच्छी लगती हैं, रोती नहीं. चलिए बिस्तर पर, एक फिल्म मेरे साथ भी बना ही लीजिए, मुकेश से भी ज्यादा मस्त कर दूंगा आप को…

‘‘मेरी कमाई भी उस से तिगुनी है और मुकेश को हमारे बारे में कुछ पता भी नहीं चलेगा,’’ राजन ने बेशर्मी से कहा.

रीना को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उस दिन का उतना सभ्य राजन आज इतने गंदे तरीके से उस से बातें कर रहा है. वह शेरनी की तरह उठी और उसे धक्का दे कर दूर धकेल दिया. वह सोफे के पास जा गिरा लेकिन खुद पर काबू रखता हुआ गुर्राया, ‘‘रीना, मैं तुझे मसल कर रहूंगा और ज्यादा नानुकर की न तो तेरी यह फिल्म जाएगी वैबसाइट पर… जब से तुझे देखा है, तुझ को ही सोचसोच कर सपने देखता हूं, मुझे आज मना मत कर.’’

राजन फिर से उठा और रीना को अपनी बांहों में भर लिया. रीना ने अपने सिर का जोरदार प्रहार राजन की नाक पर किया. वह दर्द से बिलबिलाता हुआ नीचे बैठ गया. नाक से खून आने लगा था.

रीना ने उस पर लातमुक्कों की बरसात कर दी. वह खुद को बचाने के लिए इधर से उधर हो रहा था. शोर सुन कर टिंकू भी वहां आ चुका था और वैसा सीन देख कर घबरा कर रो रहा था.

आंसुओं को पोंछते हुए रीना दहाड़ी, ‘‘पति को धोखा देने के लिए सिखा रहा है मुझे. वैबसाइट पर डालेगा मेरा वीडियो? हैवान, जा कर डाल दे, कौन क्या कर लेगा मेरा? इस में मैं अपने पति के साथ हूं कोई गलत काम नहीं कर रही. अखबार वाले मेरा नाम छिपा लेंगे, टैलीविजन वाले तेरा चेहरा वायरल कर देंगे और पुलिस चुटकी में इस वीडियो को डिलीट करवा देगी… जेल में तू सड़ेगा, मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला.’’

राजन किसी तरह से संभलता हुआ वहां से भागने की कोशिश करने लगा, पर रीना के हाथ में पास रखा पेपरवेट आ चुका था. उस ने मारमार कर राजन की खोपड़ी से भी खून निकाल दिया. वह बेहोश हो कर लुढ़क गया.

रीना ने मुकेश को फोन कर दिया. वह पुलिस को साथ लिए ही घर आया. राजन के इस रूप पर मुकेश को भी भरोसा नहीं हो रहा था.

पुलिस की जीप में बैठते राजन के कानों में रीना की गुर्राहट पिघले सीसे की तरह घुस रही थी, ‘‘इस सबला का जवाब याद रखना दरिंदे…’’

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