जूता है हिंदुस्तानी

सदियों से दलित और पिछड़े ब्राह्मणों के जूते खाते आ रहे हैं. एक बार फिर उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में ब्राह्मण के होते हुए एक गैरब्राह्मण ने सरकारी पैसा खा लिया तो खामखां बात का बतंगड़ बन गया जिस से याद आया कि वे भी क्या दिन थे जब दबेकुचले लोग बाभन देवता के जूते की मार भी भगवान का प्रसाद समझते श्रद्धा से ग्रहण कर लेते थे. धोखे से दौर अब लोकतंत्र का है, फिर भी ऊंची जाति वालों का जूता नीची जाति वालों पर सरेआम चल रहा है, तो इस कथित लोकतंत्र पर पुनर्विचार किया जाना जरूरी है.

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