लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश सबसे प्रमुख प्रदेश है. यहां 80 लोकसभा की सीटें हैं. पहले चरण की 8 सीटों मेरठ-हापुड़, बिजनौर, सहारनपुर, कैराना, मुज्जफरनगर, बागपत, गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में हो रहे मतदान में भाजपा सेना और राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाने में भले ही लगी है पर यहां राष्ट्रवाद पर जाति हावी हो रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां सभी 8 सीटों पर विजय मिली थी.

उत्तर प्रदेश के इस पश्चिमी इलाके में दलित-पिछड़े और मुसलिम सबसे जिताऊ फैक्टर माने जाते हैं. पिछले चुनाव में दंगों से परेशान जनता ने मोदी फैक्टर से प्रभावित होकर दलित-पिछड़े और सवर्ण ने मिलकर वोट किया. जिससे सभी 8 सीटें भाजपा को मिल गई. भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महत्व को स्वीकार करते हुये यहां से 3 सांसदों डाक्टर सत्यपाल सिंह, पूर्व सेनाप्रमुख वीके सिंह और डाक्टर महेश शर्मा को केन्द्र सरकार में मंत्री बना दिया.

पिछले 5 साल और खासकर 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिन्दू मुसलिम का तनाव बना रहा. भाजपा के नेता इसको हवा देते रहे. ऐसे में पश्चिम उत्तर प्रदेश की जिस जनता ने भाजपा को जाति और धर्म के बंधन को तोड़ कर वोट दिया था वह परेशान हो गई. गाय, एंटी रोमियों और दंगों को लेकर यहां राजनीति होती रही. जिसकी वजह से यहां के लोगों को लगा कि भाजपा भी विकास की बात करके दूसरे मुददे उठा रही है.

सहारनपुर में दलित सवर्ण झगडों में यहां जाति को फिर से मजबूती के साथ खडा कर दिया. अब चुनाव में यह जाति फैक्टर हावी हो गया है. ऐसे में भाजपा का राष्ट्रवाद वोट दिलाने में असफल हो रहा है. यहां देखने में त्रिकोणात्मक चुनाव हो रहे है पर असल में भाजपा को टक्कर देने के लिये सीधा संघर्ष हो रहा है. सपा-बसपा- लोकदल गठबंधन और कांग्रेस का मुकाबला सीधे भाजपा से हो रहा है. ऐसे में भाजपा पश्चिम के पहले चुनावी द्वार पर ही सबसे कडी टक्कर मिल रही है.

जिससे भाजपा का विरोध करने वालों को ताकत मिल रही है. उनको यह लगने लगा है कि अब फ्रैंडली लड़ाई से भाजपा को मात दी जा सकती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान का मुद्दा भी भाजपा के खिलाफ जा रहा है. ऐसे में भाजपा को यहां सबसे बड़ा नुकसान होता दिख रहा है.

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