पशु विशेषज्ञ अक्सर जंगल में किसी जानवर को छोड़ते वक्त या जंगली जानवरों का इलाज करने के बाद उनके गले में एक कैमरायुक्त पट्टा बांध देते हैं ताकि उनको हर वक्त मौनीटर किया जा सके. वे कहां हैं, किस हाल में हैं इसका पता लगाने के लिए पशु विशेषज्ञ इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल करते हैं. मगर अब ऐसी ही एक तकनीक लखनऊ नगर निगम के कर्मचारियों के लिए बड़ा सिरदर्द बन गयी है. सरकार ने उनके गले में पट्टा तो नहीं बांधा है, मगर उन्हें एक स्मार्ट घड़ी पहनने को दी है.

नगर निगम ने ठेके पर लगाये जाने वाले सफाई कर्मचारियों को दुरुस्त करने के लिए एक स्मार्ट घड़ी का इस्तेमाल करना अनिवार्य कर दिया है. अब हर सफाई कर्मचारी को स्मार्ट घड़ी ड्यूटी के वक्त अपनी कलाई पर बांधकर रखनी होगी. इस स्मार्ट घड़ी ने जहां उनकी मुसीबत बढ़ा दी है, वहीं इसके इस्तेमाल से नगर निगम में सालों से चली आ रही पैसों की बंदरबांट और घोटालों का खुलासा भी हुआ है. नगर निगम को हर साल करीब 30 करोड़ रुपये की चपत लग रही थी.

एक अप्रैल से नगर निगम की ओर से यह नई व्यवस्था लागू कर दी गयी है. अब सारे कर्मचारियों को ड्यूटी पर आते ही ये घड़ी कलाई पर बांधनी होती है जिससे उनकी अटेंडेंस, नौकरी करने की जगह और कितनी देर तक काम किया यह तमाम बातें पता चलती हैं. अगर कोई कर्मचारी ड्यूटी पर नहीं आया है या फिर अपने क्षेत्र से बाहर है तो यह स्मार्ट घड़ी इसकी भी जानकारी देती है. इस नई व्यवस्था से नगर निगम के कर्मचारियों में हडकम्प मचा हुआ है क्योंकि अभी तक ज्यादातर सफाई कर्मचारी निगम में हाजिरी लगाने के बाद गायब हो जाते थे. सड़कें गन्दगी से पटी रहती थीं और सफाई कर्मचारी का कुछ अता-पता नहीं होता था. अब स्मार्ट घड़ी के जरिये इन नकारा कर्मचारियों पर नकेल कसी जाएगी. वहीं स्मार्ट घड़ी से यह भी पता चला है कि सरकारी वेतन पाने वाले लगभग आधे कर्मचारी असल में हैं ही नहीं.

पहले चरण में ही पता चल गया है कि निगम में दर्ज करीब 50 प्रतिशत कर्मचारी काम करने आते ही नहीं हैं. या यूं कहे कि 50 प्रतिशत कर्मचारी जिनकी तनख्वाह निगम देता है वो नौकरी में असल में हैं ही नहीं. निगम में सफाई के लिए ठेके पर एजेंसी कर्मचारी रखती है और उनकी एवज में नगर निगम उन्हें कर्मचारियों का वेतन भुगतान करता है. नगर निगम ऐसा फर्जीवाड़ा करने वाले कर्मचारियों और ठेका पाने वाली एजेंसी के खिलाफ अब कार्रवाई करेगा.

दरअसल, नगर निगम में सफाई कर्मचारियों की सप्लाई का ठेका पाने वाले लोगों में राजनेता और रसूखदार लोगों की फर्म्स है. जो निगम से ठेके तो उठा लेते हैं मगर क्षेत्र में सफाई कर्मियों को नहीं भेजते. उनका दबदबा ऐसा कि पूछने की हिम्मत न जनता को थी, न निगम के अधिकारियों को. लिहाजा ये घोटाला सालों से चल रहा है और किसी अधिकारी ने इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. उनका कहना था कि सबूत ही नहीं हैं, मगर अब स्मार्ट घड़ी के आ जाने से लोगों की पोल खुलनी शुरू हो गयी है. हर तरफ अफरा तफरी का माहौल है.

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