मनुष्य के किडनी और लीवर जैसे अंग कई कारणों से खराब हो जाते हैं. ये ऐसे अंग हैं, जिन के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती.

संगीता मूलरूप से बांदा जिले के तिंदवारी कस्बे से सटे गांव बड़ी पिपराही की रहने वाली थी.

कानपुर शहर में वह अपने पति राजेश कश्यप के साथ साकेत नगर स्थित प्लास्टिक गोदाम में रहती थी. राजेश कश्यप इलैक्ट्रीशियन था. वह किदवई नगर में बिजली की एक दुकान में काम करता था. इस काम से होने वाली आय से वह परिवार का खर्च चलाता था.

राजेश कश्यप का एक दोस्त श्याम तिवारी उर्फ श्यामू था. पेशे से ड्राइवर श्यामू जूहीलाल कालोनी में रहता था. दोस्त होने की वजह से श्यामू का उस के घर आनाजाना बना रहता था. एक दिन श्याम तिवारी एक व्यक्ति के साथ उस के यहां आया. श्यामू ने उस का परिचय अपने दोस्त मोहित निगम के रूप में दिया और बताया, ‘‘यह नौबस्ता के हनुमंत विहार में रहता है. इस के घर पर बिजली का कुछ काम होना है, तुम कर देना.’’

राजेश कश्यप हंस कर बोला, ‘‘श्यामू भाई, मोहित तुम्हारा दोस्त तो मेरा भी दोस्त है. बिजली का जो भी काम होगा, मैं कर दूंगा.’’

राजेश ने उन दोनों की खातिरदारी की. इतना ही नहीं, राजेश की पत्नी संगीता ने उन्हें बिना खाना खाए नहीं जाने दिया. खाना खाने के बाद श्यामू और मोहित ने संगीता के बनाए खाने की बहुत तारीफ की. दूसरे दिन राजेश मोहित निगम के घर गया और बिजली का काम कर आया. इस के बाद मोहित का भी राजेश के यहां आनाजाना होने लगा.

एक दिन मोहित घर आया तो उस समय संगीता घर में अकेली थी. उस ने इधरउधर नजर दौड़ाई फिर बोला, ‘‘भाभी, आप खाना बहुत स्वादिष्ट बनाती हैं. आप की जो पाक कला है, इस से अच्छाखासा पैसा कमा सकती हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘भाभी, बड़े घरों में खाना पका कर. दिल्ली जैसे बड़े शहर में आप को आसानी से नौकरी मिल जाएगी और रहने के लिए आवास भी मिल जाएगा. आप जहां नौकरी करोगी, वहीं रहने और खानेपीने का बंदोबस्त हो जाएगा. इस से आप की पूरी तनख्वाह बच जाया करेगी.’’

‘‘पर वहां मेरी नौकरी लगवाएगा कौन?  मैं तो किसी को जानती तक नहीं हूं.’’ संगीता ने सवाल किया.

‘‘भाभी, मेरा एक दोस्त है जुनैद. उस की दिल्ली में बड़े घरानों में पहुंच है. वह आप की नौकरी आसानी से लगवा सकता है. बस आप नौकरी के लिए राजेश को तैयार करो.’’

इस के बाद श्याम, मोहित और संगीता ने राजेश पर दबाव डाला तो राजेश ने संगीता को नौकरी करने की इजाजत दे दी. फिर मोहित निगम ने राजेश व उस की पत्नी संगीता को जुनैद से मिलवाया. जुनैद ने संगीता को नौकरी दिलाने का भरोसा दिया.

25 नवंबर, 2018 को जुनैद संगीता व उस के पति राजेश को कानपुर से गाजियाबाद लाया और दोनों को एक होटल में ठहरा दिया. जुनैद खुद भी उसी होटल में रुका. दूसरे दिन जुनैद संगीता को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल ले गया और उस की कई छोटीबड़ी शारीरिक जांच करवाईं.

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इन जांचों से संगीता का माथा ठनका. उस ने जांच के संबंध में जुनैद से पूछा तो वह बोला, ‘‘भाभी, काम देने वाले बड़े लोग हैं. जांच करवा कर वह आश्वस्त होना चाहते हैं कि तुम शारीरिक रूप से फिट हो और तुम्हें कोई रोग नहीं है.’’ संगीता उस की बात से संतुष्ट हो गई.

राजेश्य कश्यप को जुनैद ने एक तरह से कैद कर लिया था. वह उसे होटल के कमरे से बाहर नहीं जाने देता था. तीसरे दिन जुनैद, संगीता को आधार कार्ड में नाम बदलवाने के लिए एक दुकान पर ले गया. वहां उस ने आधार में संगीता का नाम सकीना करा दिया. नाम बदलने को ले कर संगीता का दुकान पर ही झगड़ा होने लगा.

तब जुनैद ने संगीता को समझाया कि दरअसल नौकरी देने वाला मुसलिम परिवार है. वह किसी मुसलिम औरत को ही नौकरी पर रखना चाहता है, इसलिए नाम बदलवाया है. संगीता ने इस बात पर विरोध जताया और कहा कि वह धर्म बदल कर नौकरी नहीं करना चाहती. उसे नौकरी नहीं चाहिए, वह वापस कानपुर जाना चाहती है. वहां से संगीता जुनैद के साथ होटल में अपने कमरे पर पहुंच गई.

उसी रात संगीता ने जुनैद को फोन पर बतियाते सुना तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह किसी से किडनी के बारे में बात कर रहा था. इस से संगीता समझ गई कि वह मानव अंग तस्कर गिरोह के जाल में फंस गई है. उस ने यह बात अपने पति राजेश को बताई तो वह भी घबरा गया. इस के बाद संगीता ने वापस कानपुर जाने का फैसला कर लिया.

डरीसहमी संगीता ने किसी तरह जुनैद के बैग से अपना असली व फरजी आधार कार्ड तथा अन्य कागजात निकाल कर अपने पास रख लिए. फिर 28 नवंबर, 2018 की शाम को वह अपने पति राजेश के साथ वापस कानपुर लौट आई.

एक महीने तक जुनैद ने संगीता से संपर्क नहीं किया. उस के बाद जुनैद ने संगीता से कहा कि वह अपनी किडनी ट्रांसप्लांट करा ले तो उस के एवज में उसे 5 लाख रुपए मिल जाएंगे. लेकिन संगीता रुपयों के लालच में नहीं आई, उस ने साफ मना कर दिया.

संगीता ने मना किया तो जुनैद ने फोन पर उस से कहा, ‘‘अस्पताल की जांच और होटल का खर्च 50 हजार रुपया बना है. यह रुपया देना पड़ेगा.’’

संगीता के पास रुपया कहां था. इसलिए उस ने कह दिया कि वह रुपए नहीं दे सकती. इस के बाद जुनैद तथा उस के साथी करन व राजकुमार उर्फ राजू संगीता को धमकी देने लगे कि या तो किडनी ट्रांसप्लांट करा लो या फिर रुपया दो. वरना तुम्हें या तुम्हारे पति को जान गंवानी पड़ सकती है. तुम घर से भले ही न निकलो, लेकिन तुम्हारा पति तो घर से निकलता है.

संगिता जुनैद व उस के साथियों की धमकी से डर गई. अब वह रातदिन परेशान रहने लगी. आखिर उस ने इस धमकी की बाबत पति राजेश से विचारविमर्श किया. दोनों ने फैसला किया कि इस तरह डर कर कब तक रहा जाएगा. लिहाजा उन्होंने धमकी देने वालों के विरुद्ध थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने का फैसला लिया.

पहली फरवरी, 2019 को संगीता अपने पति राजेश कुमार कश्यप के साथ थाना बर्रा जा पहुंची. थाने पर उस समय थानाप्रभारी अतुल कुमार श्रीवास्तव मौजूद थे. संगीता ने उन्हें आपबीती सुनाई. थानाप्रभारी समझ गए कि मामला गंभीर है इसलिए संगीता की तहरीर पर उन्होंने जुनैद, मोहित निगम, श्याम तिवारी उर्फ श्यामू, राजकुमार राव उर्फ राजू तथा करन के विरुद्ध ह्यूमन आर्गन ट्रांसप्लांटेशन एक्ट 1994 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी अतुल कुमार श्रीवास्तव ने एसपी (साउथ) रवीना त्यागी को इस की जानकारी दे दी. एसपी रवीना त्यागी ने संगीता को बुला कर उस से विस्तृत जानकारी हासिल की. संगीता की जानकारी से उन्हें लगा कि कोई बड़ा गिरोह है, जो मानव अंगों का अवैध कारोबार कर रहा है.

एसआई विशेष कुमार ने एजेंट की तलाश शुरू की तो पनकी निवासी राजेश से उन का संपर्क हो गया. उन्होंने खुद को किडनी डोनर बता कर बात की तो राजेश उन के झांसे में आ गया. राजेश किडनी डोनर एजेंट था और सीनियर सदस्य गौरव मिश्रा के लिए काम करता था.

विशेष कुमार राजेश से मिले और पैसों की बेहद जरूरत बताई. विशेष कुमार ने किडनी बेचने के लिए 5 लाख रुपए मांगे लेकिन सौदा 3 लाख में तय हो गया.

9 फरवरी को एजेंट राजेश दरोगा विशेष कुमार को दिल्ली ले गया और पहाड़गंज के एक होटल में ठहराया. दरोगा के साथ 2 पुलिसकर्मी अमित चौहान व कमल भी थे. विशेष कुमार को एजेंट ने एक दिन के लिए होटल में ठहराया और इस दौरान अन्य साथियों की मदद से तैयारियां पूरी कर लीं.

11 फरवरी को दिल्ली के पहाड़गंज स्थित डा. लाल पैथ लैब्स से उन की प्राथमिक जांच यानी ब्लड गु्रप, लीवर ऐंड किडनी पैनल, सीरम, सीबीसी आदि की जांच कराईं. इस की रिपोर्ट मिलने पर एजेंट राजेश ने फोटो खींच कर गौरव मिश्रा को भेजी.

गौरव मिश्रा ने विशेष कुमार को मिलने के लिए एजेंट के साथ साकेत मैट्रो स्टेशन बुलाया. वहां सभी ने एक घंटे तक इंतजार किया लेकिन गौरव नहीं आया. गौरव शातिर था. उस ने स्टेशन पहुंच कर सामने आने के बजाय दरोगा विशेष कुमार व एजेंट के क्रियाकलाप देखे.

उस के बाद गौरव ने राजेश को फोन कर मुलाकात और अन्य काररवाई आगे बढ़ाने की बात की. इस के बाद एजेंट व दरोगा विशेष कुमार अपने सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ कानपुर वापस आ गए. विशेष कुमार ने इस औपरेशन की जानकारी एसपी रवीना त्यागी को दे दी.

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16 फरवरी, 2019 को गौरव मिश्रा व राजकुमार राव उर्फ राजू पैसे के लेनदेन के अलावा मोटीवेशन के लिए कानपुर आए. दोनों राजेश के माध्यम से दरोगा विशेष कुमार से मिले. तभी विशेष कुमार ने अपना असली रूप दिखाते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया.

एसपी रवीना त्यागी ने थाना नौबस्ता पहुंच कर पूछताछ की तो दोनों टूट गए. उन्होंने कानपुर क्षेत्र में सक्रिय गिरोह के अन्य सदस्यों के नाम बता दिए. इस के बाद रवीना त्यागी ने नौबस्ता, बर्रा व गोविंद नगर थाना पुलिस को सतर्क कर दबिश के लिए 2 और टीमें बनाईं.

इन टीमों ने ताबड़तोड़ छापे मार कर गिरोह के 4 अन्य सदस्यों को नीलम गेस्टहाउस, बर्रा से गिरफ्तार कर लिया. सभी को थाना बर्रा लाया गया. गिरोह के पास से पुलिस टीम को दरजनों फरजी कागजात बरामद हुए.

पुलिस ने गिरोह के सरगना सहित 6 सदस्यों को तो पकड़ लिया था. लेकिन नामजद आरोपी श्याम तिवारी उर्फ श्यामू, मोहित निगम, जुनैद तथा करन अभी पकड़ में नहीं आए थे. पुलिस टीम उन्हें पकड़ने के लिए छापेमारी कर रही थी. सूचना मिलने पर एसपी (साउथ) थाना बर्रा पहुंचीं और पकड़े गए गिरोह के सदस्यों से पूछताछ की.

पुलिस ने जिन आरोपियों को पकड़ा था, उन में टी. राजकुमार राव उर्फ राजू गिरोह का सरगना था. वह कोलकाता के राजाराट थाना अंतर्गत शिपतला का रहने वाला था. गौरव मिश्रा उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के मैगलगंज शिवपुरी का रहने वाला था.

शैलेश सक्सेना दिल्ली के जैतपुर एक्सटेंशन पार्ट-1 का निवासी था. सबूर अहमद लखनऊ के प्रेम नगर का रहने वाला था. शमशाद अली लखनऊ के गली साधड़ा विक्टोरिया चौक का निवासी था. विक्की सिंह कानपुर के पनकी गंगागंज भाग-2 में रहता था.

गिरोह के पास से पुलिस को 3 खाली पासबुक, डीएम, एडीएम, एसडीएम, थाना, बैंक व अस्पतालों की फरजी मोहरें, विवाह प्रमाण पत्र की फरजी मोहरें, 9 एटीएम कार्ड, 14 आधार कार्ड, 8 निर्वाचन पहचान पत्र, 5 पैन कार्ड, कई मार्कशीट, 8 स्मार्टफोन, मरीज और डोनर के साथ ही उन लोगों के परिजनों के फरजी शपथ पत्र, पीएसआरआई (पुष्पावती सिंघानिया रिसर्च इंस्टीट्यूट) से संबंधित मरीज व डोनर से जुड़े गोपनीय दस्तावेज बरामद हुए. इन सभी को पुलिस ने जांच हेतु काररवाई में शामिल कर लिया.

पकड़े गए गिरोह के सदस्यों ने बताया कि गिरोह के हर सदस्य का काम अलगअलग बंटा हुआ था. गिरोह का सरगना टी. राजकुमार उर्फ राजू डोनर मरीज को अस्पताल ले जा कर कोऔर्डिनेटर से मुलाकात कराता था, जबकि गौरव मिश्रा डोनर व मरीज को तैयार कर उन की मुलाकात गिरोह के सरगना टी. राजकुमार राव से कराता था.

शैलेश सक्सेना डोनर व मरीज से मिल कर फरजी दस्तावेज तैयार कराता था. सबूर अहमद लखनऊ से डोनर व मरीज को तैयार कर गौरव व टी. राजकुमार राव के पास ले जाता था. इन लोगों ने अपनेअपने क्षेत्र में दरजनों एजेंट बना रखे थे, जो झुग्गीझोपडि़यों, शराब के ठेकों व मलिन बस्तियों में पैसों का लालच दे कर डोनर खोजते थे.

गिरफ्तार आरोपियों ने कुछ डोनरों की भी जानकारी दी थी. पुलिस ने ऐसे 4 किडनी डोनरों शोएब, वरदान चंद, अजय व ऋषभ को हिरासत में लिया. इन डोनरों ने अभियुक्तों की पहचान की तथा अपने छले जाने की भी व्यथा बताई. पुलिस ने इन डोनरों की कांशीराम ट्रामा सैंटर में जांच कराई तो किडनी निकाले जाने की पुष्टि हुई. इन को पुलिस ने अपना सरकारी गवाह बना लिया.

चूंकि पकड़े गए गिरोह के सदस्यों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थाना बर्रा पुलिस ने गौरव मिश्रा, टी. राजकुमार राव, विक्की सिंह, शैलेश सक्सेना, शमशाद अली तथा सबूर अहमद के खिलाफ ह्यूमन आर्गन ट्रांसप्लांटेशन एक्ट 1994 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

चूंकि इन आरोपियों के पास से पुलिस को फरजी दस्तावेज भी बरामद हुए थे, इसलिए इन के खिलाफ एक अन्य मुकदमा भादंवि की धारा 420, 467, 468, 471 के तहत भी दर्ज किया.

किडनी व लीवर ट्रांसप्लांट गैंग के सदस्यों के पकड़े जाने की खबर जब एसएसपी अनंत देव को लगी तो उन्होंने इसे बेहद गंभीरता से लिया.

उच्चस्तरीय जांच के लिए उन्होंने स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम का गठन किया. इस टीम में सीओ (गोविंद नगर) आर.के. चतुर्वेदी, सीओ (अनवरगंज) शफीफुर्रहमान, थानाप्रभारी (बर्रा) अतुल कुमार श्रीवास्तव, क्राइम ब्रांच प्रभारी गंगा सिंह, सर्विलांस प्रभारी अजय अवस्थी, थानाप्रभारी (नौबस्ता) समर बहादुर सिंह के अलावा एक दरजन तेजतर्रार सबइंसपेक्टर व सिपाहियों को शामिल किया गया. इस टीम को एसपी (साउथ) रवीना त्यागी के निर्देशन में काम करना था.

एसआईटी ने किडनी, लीवर ट्रांसप्लांट गिरोह के पकड़े गए सदस्यों से पूछताछ की तो चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. पूछताछ से पता चला कि गिरोह का जाल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक फैला है.

गिरोह के सदस्य मरीज से किडनी का सौदा 20 से 25 लाख में तय करते थे, जबकि डोनर को मात्र 3 से 5 लाख देते थे. उस में भी ये लोग घपला कर लेते थे. ये लोग झुग्गीझोपडि़यों, मजदूर वर्ग, शराब के ठेकों, ढाबों आदि पर डोनरों की तलाश करते थे.

गिरोह के मुखिया टी. राजकुमार राव उर्फ राजू ने बताया कि वह दिल्ली के 3 बड़े अस्पतालों के संपर्क में रहता था. वहां के कुछ लोगों से उसे काम की जानकारियां मिलती रहती थीं. इस के बाद वह आगे की तैयारी करता था.

टी. राजकुमार राव ने यह भी बताया कि वह दिल्ली के एक बड़े डाक्टर के संपर्क में रहता था. वह दिल्ली में कहां रहता है, इस का उसे पता नहीं था, लेकिन मानव अंगों का सौदा करने वाले इस डाक्टर का जाल नेपाल, टर्की और श्रीलंका तक फैला था.

विदेशों में वह मरीज से किडनी का सौदा 70 लाख से 1 करोड़ रुपए में तय करता है. जरूरत पड़ने पर वह उसे बाजार, रेस्टोरेंट, मौल या फिर मैट्रो स्टेशन पर बुलाता था. महंगी कार रखना उस का शौक है. डोनर की काउंसलिंग वह स्वयं करता था. डोनर को विदेश भेजने की सारी व्यवस्था भी वही करता था.

आरोपी शैलेश सक्सेना तथा गौरव मिश्रा ने भी जांच टीम को अहम जानकारियां दीं. शैलेश सक्सेना फरजी कागजात तैयार कराता था. यह काम वह दिल्ली के मयूर विहार के रहने वाले संजय पांडेय व उस के सहयोगी आसिम की मदद से करता था. शैलेश सक्सेना ने एक पद्मविभूषित डाक्टर का नाम भी बताया, जो इस रैकेट से जुड़ा था.

जांचपड़ताल से पता चला कि किडनी और लीवर ट्रांसप्लांट के नियम काफी सख्त हैं. नियम के मुताबिक 2 स्थितियों में किडनी ट्रांसप्लांट की जा सकती है. पहली स्थिति खून का रिश्ता. अगर बेटा, मांबाप और बहन में से कोई किसी को किडनी डोनेट करता है तो सब से पहले रिसीवर और डोनर का डीएनए और एचएलए मिलान कराया जाता है.

इस के बाद अस्पताल डायरेक्टर समेत 20 सदस्यीय डाक्टरों की टीम डोनर से राजी होने के बाद पूछताछ करती है. पूरी संतुष्टि के बाद किडनी ट्रांसप्लांट की जाती है.

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दूसरी स्थिति रिश्तेदार से रिश्तेदार के लिए लागू होती है. इस में भी डोनर तथा रिसीवर का डीएनए और एचएलए मिलान कराया जाता है. अस्पताल की 20 सदस्यीय टीम के साथ डीएम की संतुष्टि के बाद ही किडनी ट्रांसप्लांट हो सकती है.

लेकिन किडनी रैकेट के लोग इन सारे नियमों को धता बता कर अस्पताल के कोऔर्डिनेटरों की मदद से किडनी ट्रांसप्लांट करा देते थे. दरअसल गिरोह के सदस्य डोनर को फरजी दस्तावेज के आधार पर रिसीवर के परिवार का सदस्य (बेटा, भाई, मां, बाप, बहन) बताते थे.

इस के बाद किसी बड़े अस्पताल में डोनर का मैडिकल होता था. वहां डीएनए मिलान के लिए जांच रिपोर्ट बदल दी जाती थी. डोनर की जगह रिसीवर के परिजन की रिपोर्ट कमेटी के पास जाती थी, जिस से सब सही पाया जाता था.

जांच से यह बात भी सामने आई कि पकड़े गए सभी आरोपियों ने पहले खुद किडनी डोनेट की थी, उस के बाद वे गिरोह के सदस्य बने थे. एसआईटी ने रिपोर्टकर्ता से भी पूछताछ की तथा कुछ की शिनाख्त भी कराई. आरोपियों ने एसआईटी के समक्ष कुछ ऐसे नामों का भी खुलासा किया जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में उन की मदद करते थे. पुलिस टीम ने ऐसे 16 आरोपियों की लिस्ट तैयार की.

इन में कानपुर निवासी श्याम तिवारी, श्याम दूबे उर्फ भूरा (खाडेपुर योगेंद्र विहार), मोहित निगम (हनुमंत विहार, नौबस्ता), संजय पाल (कर्रही चौराहा नौबस्ता), जुनैद (पुलिस लाइंस लखनऊ), राजा व रामू पांडेय, आनंद (लखनऊ), सिप्पू राय (आजमगढ़), करन (चंडीगढ़), संजय पांडेय और आसिम सिकंदर वगैरह शामिल थे.

एसआईटी की पूछताछ के बाद बर्रा थानाप्रभारी अतुल कुमार श्रीवास्तव ने पकड़े गए आरोपी टी. राजकुमार राव उर्फ राजू, गौरव मिश्रा, शैलेश सक्सेना, सबूर अहमद, शमशाद अली तथा विक्की सिंह को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

किडनी कांड की गहनता से जांच कर रही एसआईटी की लिस्ट में दिल्ली के कई नाम शामिल थे. इन सभी से पूछताछ करने के लिए टीम ने दिल्ली में डेरा डाल दिया. यहां टीम ने कुछ डाक्टरों और उन के सहयोगियों से कई राउंड पूछताछ की तथा अस्पतालों के रिकौर्ड खंगाले, जिन में ये कार्यरत थे.

टीम ने अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले डोनर व मरीजों से भी पूछताछ की तथा उन के बयान दर्ज किए. टीम ने कई नामचीन डाक्टरों से भी पूछताछ की. पुलिस टीम ने अस्पताल की 13 फाइलों का निरीक्षण किया तथा 26 लोगों के बयान दर्ज किए.

टीम ने दिल्ली के मयूर विहार निवासी संजय पांडेय व उस के सहयोगी आसिम सिकंदर को पकड़ने के लिए जाल बिछाया लेकिन वे पकड़ में नहीं आ सके. ये दोनों गिरोह के लिए फरजी कागजात तैयार करते थे. पुलिस की पकड़ में न आने पर टीम ने उस का दुकान पर छापा मार कर दरजनों फरजी कागजात बरामद किए, जहां फरजी कागजात तैयार किए जाते थे.

दिल्ली में पुलिस टीम कई दिनों तक डेरा डाले रही लेकिन कोई आरोपी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा, तब पुलिस टीम वापस कानपुर लौट आई. दरअसल पुलिस अपनी फजीहत नहीं कराना चाहती थी क्योंकि गिरफ्तारी बड़े लोगों की होनी थी.

पुलिस अधिकारी चाहते थे कि जिन बड़े लोगों के इस केस में नाम आ रहे हैं, पुलिस पहले उन के खिलाफ मजबूत सबूत हासिल कर ले ताकि कोर्ट में किसी तरह से केस कमजोर न पड़े.

दिल्ली से लौटने के बाद एसआईटी ने कानपुर, लखनऊ व आजमगढ़ के आरोपियों को पकड़ने के लिए शिकंजा कसा और ताबड़तोड़ छापे मार कर लखनऊ से राजू पांडेय तथा कानपुर से श्याम तिवारी व राजा को पकड़ लिया.

श्याम तिवारी को उस के घर जूहीलाल कालोनी से तथा राजा को किदवई नगर चौराहे से पकड़ा गया. श्याम तिवारी ने ही इस केस की वादी संगीता को अपने दोस्त मोहित निगम व जुनैद को मिलवाया था. पूछताछ के बाद तीनों को कानपुर कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

किडनी रैकेट का सरगना टी. राजकुमार राव उर्फ राजू मूलरूप से आंध्र प्रदेश का रहने वाला है, लेकिन वह कोलकाता शहर में थाना राजाराट के अंतर्गत शिपतला में रहता था. वह पढ़ालिखा तथा तेज दिमाग था. हिंदी, अंगरेजी तथा बांग्ला भाषा पर उस की अच्छी पकड़ थी. उस ने अपना कैरियर मैडिकल में एमआर बन कर शुरू किया था, लेकिन यह काम उसे पसंद नहीं आया.

इस के बाद वह दिल्ली आ गया. यहां उस ने रेडीमेड कपड़ों का व्यवसाय शुरू किया, लेकिन अनुभव न होने के कारण उसे व्यापार में घाटा हो गया. रकम डूब जाने से वह परेशान रहने लगा.

इसी दौरान उस की मुलाकात किडनी रैकेट के एक सदस्य से हो गई. उस के मार्फत टी. राजकुमार राव ने चेन्नै के अस्पताल में 80 हजार रुपए में अपनी किडनी बेच दी. किडनी उस ने बोकारो की शालिनी उर्फ ज्योति को डोनेट की थी. यह बात सन 2006 की है.

इस के बाद वह खुद भी किडनी और लीवर का दलाल बन गया. धीरेधीरे उस ने अपना जाल कई राज्यों में फैला लिया. शातिर दिमाग टी. राजकुमार राव गूगल पर सर्च कर यह पता लगाता था कि देश के किन अस्पतालों में किडनी व लीवर का प्रत्योरोपण होता है. इस के बाद वह मरीज व डोनर की तलाश करता था. डोनर बिचौलियों की मदद से मिल जाते थे.

लखीमपुर खीरी का गौरव मिश्रा, लखनऊ का जुनैद, कानपुर का सत्यप्रकाश उर्फ आशू, संजय पाल, मोहित निगम, श्याम तिवारी उर्फ श्यामू, भूरा आदि उस के सक्रिय सदस्य थे, जो उसे डोनर मुहैया कराते थे. सन 2016 में अपोलो किडनी कांड में भी वह पकड़ा गया था, जमानत मिलने के बाद वह फिर से इसी धंधे में सक्रिय हो गया.

टी. राजकुमार राव का दाहिना हाथ गौरव मिश्रा साधारण परिवार से है. उस के पिता बृजकिशोर मिश्रा किसान हैं. गौरव शादीशुदा हैं. उस की 2 बेटियां हैं. वह गांव में मातापिता से अलग रहता था. गौरव की संदिग्ध गतिविधियों के चलते उस के मातापिता ने उसे अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया था.

गौरव मिश्रा लखनऊ मैडिकल कालेज में नौकरी करता था. नौकरी के दौरान वह अंग प्रत्यारोपण गिरोह के संपर्क में आ गया था. वह पहले डोनर प्रोवाइड करता था. पूरा कारोबार समझने के बाद उस ने बड़े अस्पतालों में पैठ बनाई, जिस के बाद वह डोनर और मरीज को कोऔर्डिनेटर से मिलाने का काम करने लगा.

उस ने दिल्ली में भी अस्थाई निवास बना लिया था. सन 2006 में वह अपोलो किडनी रैकेट में भी पकड़ा गया था. जमानत मिलने पर उस ने नौकरी छोड़ दी और टी. राजकुमार राव के साथ जुड़ गया था. वह डोनर व मरीज के परिजनों के फरजी कागजात बनवाता था. यह काम वह संजय पांडेय व आसिम सिकंदर के सहयोग से करता था.

लखनऊ निवासी सबूर अहमद व शमशाद अली पहले खून बेचने के काले धंधे से जुड़े थे. बाद में वे जुनैद व गौरव के संपर्क में आ गए. दोनों किडनी डोनर की तलाश में रहने लगे.

ये दोनों डोनर को वे जुनैद के संपर्क में लाते थे. जुनैद उन्हें दिल्ली ले जा कर गौरव से मिलवाता था. सबूर अहमद स्वयं भी अपनी किडनी डोनेट कर चुका था. उस ने बिहार के नागेंद्र यादव का सगा भाई सोनू यादव बन कर किडनी डोनेट की थी.

पनकी गंगागंज निवासी विक्की सिंह ने सन 2014 में अपनी किडनी 4 लाख रुपए में डोनेट की थी. उस के बाद वह गिरोह का सक्रिय सदस्य बन गया था. विक्की सिंह डोनर तलाशने के बाद उसे जुनैद को सौंप देता था. जुनैद डोनर को गौरव के पास ले जाता था.

जुनैद, गौरव मिश्रा का विश्वासपात्र सदस्य था. वह मूलरूप से हमीरपुर का रहने वाला था. उस के पिता शोएब लखनऊ में एचसीपी थे और वह पुलिस लाइंस में रहते थे. जुनैद ने अपना ठिकाना लखनऊ व कानपुर में बना रखा था.

सन 2015 में किडनी कांड में उसे जालंधर सिटी थाने की पुलिस ने पकड़ा था. जमानत पर आने के बाद उस ने तेजी से डोनर तलाशे. जुनैद का कानपुर में अच्छा नेटवर्क था.

कानपुर में उस के श्याम तिवारी, मोहित निगम, संजय पाल, श्याम सिंह जैसे दरजनों लोग थे, जो उस के लिए काम करते थे. श्यामू और मोहित निगम की मार्फत ही जुनैद संगीता को गाजियाबाद ले गया था.

सरकारी गवाह बने कुछ किडनी डोनरों ने भी अपनी दर्दभरी व्यथा बताई. लखनऊ के सदर बाजार निवासी वरदान चंद ने बताया कि उस की बेटी पीहू के दिल में छेद था और जन्म से एक वौल्व भी नहीं था.

तबीयत खराब रहने के चलते उसे एम्स में भरती कराया गया तो डाक्टरों ने औपरेशन कर छेद बंद करने तथा वौल्व डालने का खर्च ढाई लाख बताया. इलाज की रकम जुटाने के लिए उस ने सबूर अहमद से चर्चा की तो उस ने किडनी डोनेट करने का सुझाव दिया.

सबूर अहमद किडनी रैकेट से जुड़ा था. मजबूर वरदान चंद बेटी की जिंदगी बचाने को राजी हो गया. सौदा 4 लाख रुपए में तय हुआ, लेकिन उसे 2 लाख 30 हजार ही दिए गए.

इस के बाद वरदान चंद ने मधुकर गोयल को उस का फूफा बन कर किडनी डोनेट कर दी. लेकिन अस्पताल में ही गिरोह के सदस्यों ने उस के सारे पैसे पार कर दिए.

इलाज के लिए उसे कर्ज लेना पड़ा. फिर भी वह बेटी को बचा नहीं पाया. कर्ज का रुपया वापस करने के लिए उस ने पत्नी तनु की किडनी बेचने का फैसला किया. सभी तैयारियां हो चुकी थीं, लेकिन उस के पहले ही भांडा फूट गया.

लखनऊ का ही रहने वाला 18 वर्षीय शोएब होटल में काम करता था, सबूर अहमद वहां खाना खाने आता था. आर्थिक मदद का भरोसा दिला कर सबूर ने दिसंबर 2018 में उस की किडनी बुलंदशहर के 65 वर्षीय मरीज अनिल अग्रवाल को डोनेट करा दी.

इस के लिए अनिल के भतीजे संस्कार अग्रवाल के नाम से फरजी कागजात तैयार कराए गए. सौदा 4 लाख रुपए में तय हुआ था, लेकिन दिए गए 2 लाख 40 हजार.

बहरहाल, एसआईटी कथा संकलन तक जुनैद, मोहित निगम, संजय पाल, श्याम दूबे उर्फ भूरे (सभी कानपुर) दिल्ली निवासी संजय पांडेय, आसिम सिकंदर तथा चंडीगढ़ निवासी करन को गिरफ्तार नहीं कर सकी.

यह तो समय ही बताएगा कि पुलिस इन्हें गिरफ्तार कर पाएगी या ये कोर्ट में सरेंडर करेंगे. दूसरी बात यह भी देखनी है कि एसआईटी अस्पतालों के कोऔर्डिनेटर्स व संदेह के घेरे में आए कुछ अन्य डाक्टरों को गिरफ्तार करने की हिम्मत जुटा भी पाती है या नहीं.

(कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां)

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