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मान मर्दन

अपर्णा को मानसी ने अपने भाई अविनाश के लिए पसंद किया था. शादी के बाद उस के ब्रेन ट्यूमर की खबर ने सब को चौंका दिया. परंतु सकुशल आपरेशन के पश्चात उस के स्वस्थ होने पर भी मानसी के मन में उस के प्रति नफरत का बीज पनपने लगा लेकिन अपर्णा ने कुछ ऐसा किया कि पत्थर दिल मानसी सहित पूरे परिवार का दिल जीत लिया…

कुत्ता जोरजोर से भौंक रहा था. बाहर गली में चौकीदार के जूतों की चपरचपर और लाठी की ठकठक की आवाज से स्पष्ट था कि अभी सुबह नहीं हुई थी.

एक नजर स्वप्निल पर डाली. गहरी नींद में भी उन के चेहरे पर पसीने की 2-4 बूंदें उभर आई थीं. पूरा दिन दौड़भाग करने के बाद रात 12 बजे तो लौटे थे. मुझ से तो किसी प्रकार की सहानुभूति या अपनत्व की अपेक्षा नहीं करते ये लोग. किंतु आज मेरे मन को एक पल के लिए भी चैन नहीं था. मां और अपर्णा का रुग्ण चेहरा बारबार मेरी आंखों के आगे घूम जाता था. क्या मनोस्थिति होगी पापा और भैया की? डाक्टरों ने बताया था कि यदि आज की रात निकल गई तो दोनों खतरे से बाहर होंगी, वरना…

मां परिवार की केंद्र हैं तो अपर्णा परिधि. यदि दोनों में से किसी को भी कुछ हो गया तो पूरा परिवार बिखर जाएगा. किस तरह जोड़ लिया था मां ने बहू को अपने साथ. बहू नहीं बेटी थी वह उस घर की. घर का कोई भी काम, कोई भी सलाह उस के बिना अधूरी थी.

लेकिन इतना सब देने के बाद मां को बदले में क्या मिला? तीमारदारी? मैं ने कई बार अपर्णा को तिरस्कृत करने के लिए मां से कहा भी था, ‘बहुएं दानदहेज के साथ डिगरियां लाती हैं लेकिन तुम्हारी बहू तो अपने साथ मेडिकल रिपोर्ट, एमआरआई और एक्सरे रिपोर्ट से भरी फाइलें लाई है.’

यह सुनते ही मां हंस देतीं, ‘संस्कारों की अनमोल धरोहर भी तो लाई है अपने साथ.’

मां कमरा छोड़ कर चली जातीं. जाहिर था, उन्हें अपर्णा के प्रति मेरे द्वारा कहे गए कठोर शब्दों से दुख पहुंचता था पर मैं भी क्या करती? मन था कि लाख प्रयासों के बाद भी नियंत्रित नहीं होता था.

सुबह के 5 बजे थे. कुछ देर पहले ही स्वप्निल अस्पताल के लिए निकल चुके थे. फोन की घंटी बज रही थी. कहीं कोई अप्रिय समाचार न हो? कांपते मन से फोन का चोंगा उठाया. पापा थे, बोले, ‘रुक्मिणी की तबीयत ठीक है लेकिन बहू की हालत चिंताजनक है.’

मन आत्मग्लानि से भर उठा. क्यों पापा और भैया के कहने पर मैं लौट आई? इस समय तो भैया और उन दोनों को सहानुभूति की आवश्यकता होगी. स्वप्निल भी तो बिना कुछ कहे चले गए. एक बार कहते तो मैं भी चली जाती उन के साथ. कुछ पल ठहर कर मैं कम से कम उन का मनोबल तो बढ़ा सकती थी. लेकिन उन्हें क्या पता, अपर्णा के प्रति मेरे मन में अब किसी प्रकार का मलाल नहीं.

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अपर्णा से मेरा परिचय बोट्सवाना में हुआ था. उन दिनों मैं स्वप्निल के साथ एक ‘असाइनमेंट’ पर बोट्सवाना आई थी. चारों तरफ हरियाली, पेड़पौधे और वादियां और उन के बीच बसी वह छोटी सी कालोनी. कुल मिला कर वहां 10-12 ही घर थे और एक घर से दूसरे घर का फासला इतना कम था कि मौकेबेमौके आसानी से लोग एकदूसरे के यहां आतेजाते थे. यों तो अन्य परिवार भी थे वहां पर अपर्णा के परिवार से कुछ ही दिनों में हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी. उस के पिता स्वप्निल की कंपनी में ही वरिष्ठ पद पर थे. दूसरे, वह हमारी ही तरह ब्राह्मण थे और लखनऊ के मूल निवासी भी. रीतिरिवाज और बोलचाल में समानता होने की वजह से कुछ ही दिनों में हमारी दोस्ती घनिष्ठता में बदल गई और हम हर दिन मिलने लगे.

कभी घर पर, कभी क्लब में. बातचीत का सिलसिला इधर- उधर की बातों  से घूमता फिरता लखनऊ की नफासत नजा- कत, खानपान या फिर चौड़ीसंकरी गलियों से होता हुआ एकदूसरे के रीतिरिवाजों और तीजत्योहारों के मनाने के ढंग पर अटक जाता.

मुझे गोरी, लंबी, छरहरी, काली आंखों और घने बालों वाली अपर्णा का व्यक्तित्व हर समय आकर्षित करता था. वह जितनी सुंदर थी उतनी ही मेधावी भी. लगभग हर विषय पर अपने विचार खुल कर व्यक्त कर सकती थी. कालिज के बाद वह अकसर मेरे घर आ जाती और किसी न किसी विषय पर  बहस छेड़ देती.

अपर्णा की मां भी एक शिष्ट, व्यावहारिक और सुलझी हुई महिला थीं. 2 बहुओं की सास और 4 पोतेपोतियों की दादी होने के बाद भी उन के व्यवहार में बचपना ही झलकता था. उम्र में वह मुझ से काफी बड़ी थीं, फिर भी उन का सान्निध्य मुझे भला लगता था.

एक शाम मैं उन के घर गई तो मुझे ऐसा लगा जैसे वह मेरी ही बाट जोह रही हों. मुझे पास बिठा कर बोलीं, ‘मानसी, अपर्णा तेरी हर बात मानती है. तू ही इसे समझा. ब्याह की बात करो तो रोनाधोना शुरू हो जाता है इस का.’

‘मुझे ब्याह नहीं करना है,’ उस की आंखें सूजी हुई थीं. ऐसा लगा जैसे रो कर आई हो.

‘क्यों? ब्याह तो सभी लड़कियां करती हैं,’ जवानी की दहलीज पर खड़ी सुनहरे, रुपहले सपनों को देखने की उम्र में अपर्णा का वह वाक्य मुझे अचरज में डाल गया था.

‘कब तक बिठा कर रखूंगी तुझे? जब तक मांबाप हैं तब तक ठीक, उस के बाद भाईभौजाई नहीं पूछेंगे.’

‘मुझे किसी का सहारा नहीं चाहिए, पढ़ीलिखी हूं, नौकरी कर के अपनी देखभाल स्वयं कर लूंगी.’

‘औरत को जीने के लिए किसी का तो अवलंबन चाहिए. ब्याह, परिवार और बच्चे इन्हीं सब में उलझ कर तो स्त्री का जीवन सार्थक बनता है.’

‘और अगर ब्याह के बाद भी यही एकाकीपन हाथ आया तो?’ अपर्णा के शब्दों में छिपी निराशा देख मन विचलित हो उठा था. शायद हर दिन तलाक, टूटन और बिखराव की खबरें पढ़तेपढ़ते उस ने सफल, सुखद, वैवाहिक जीवन की उम्मीद ही छोड़ दी थी.

‘ऐसा कुछ नहीं होगा,’ मैं ने दृढ़ता से कहा तो वह मेरा चेहरा देखने लगी.

‘अपर्णा के लिए मेरी नजर में एक रिश्ता है. अगर आप चाहें तो…’

‘हांहां क्यों नहीं,’ अपर्णा की मां ने अति उत्साह से मेरी बात बीच में ही काट दी.

‘मैं अपने भाई अविनाश के लिए, अपर्णा का हाथ आप से मांग रही हूं. वहां आप की अपर्णा को बहू नहीं बेटी का प्यार मिलेगा.’

किसी विशेष परिचय के मुहताज नहीं थे अविनाश भैया. दिल्ली आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने लंदन से एम.बी.ए. किया था. भारत लौट कर जब से उन्होंने पापा की फैक्टरी संभाली, मेरे मन में भाभी की इच्छा प्रबल हो उठी थी. जब भी मां से भैया के ब्याह की बात करती तो वह हंस कर टाल जातीं.

‘पहले तुझे ब्याहेंगे, फिर बहू आएगी इस घर में.’

‘कुछ दिन मैं भी तो भाभी के  साथ हंसबोल लूं.’

‘दूर थोड़े ही भेजेंगे तुझे. इसी शहर में ब्याहेंगे. जब मरजी हो चली आना और भाभी के साथ रह कर हंसबोल लेना,’ मां ने कहा था.

धूमधाम से ब्याह दी गई थी मैं लखनऊ में ही. स्वप्निल साफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर थे. सासससुर, देवरानीजेठानी का परिवार था मेरा. मां से अकसर फोन पर बात होती रहती थी. मेरा जब जी चाहता, स्वप्निल मुझे मम्मीपापा से मिलवाने ले जाते. मां, मेरी पसंद के  पकवान पकातीं लाड़ जतातीं. भैया और पापा मेरे इर्दगिर्द ही घूमते रहते. मन खुशियों से भरा रहता था. लेकिन ज्यादा दिन नहीं चल पाया यह सब. 2 माह बाद ही स्वप्निल को बोट्सवाना का प्रोजेक्ट मिला और हम दोनों यहां चले आए.

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अपर्णा की मां से स्वीकृति पाते ही मैं ने लखनऊ फोन मिला कर मां से बात की. अपर्णा के विषय में सारी जानकारी दे कर मैं ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘मां, लड़की स्वभाव से सुशील और सुंदर है और सब से बड़ी बात, एम.बी.ए. भी है. भैया और पापा को बिजनेस में भी मदद करेगी.’

‘विदेश में पलीबढ़ी लड़की हमारे यहां तारतम्य बिठा पाएगी? हमारे और वहां के रहनसहन और तौरतरीकों में बहुत अंतर है,’ मां को चिंता ने घेर लिया था.

‘आप नहीं जानतीं अपर्णा

का स्वभाव. वह बेहद सरल और सादगीपसंद है. हमारे परिवार के लिए सुशील बहू और भैया के लिए आदर्श पत्नी साबित होगी वह. उन के और हमारे परिवार के वातावरण में कोई अंतर थोड़े ही है.’

‘विवाह संबंधों में पूरे परिवार का लेखाजोखा लिया जाता है,’ मां ने कहा था.

‘भारद्वाज साहब हमारी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. पिछले 20 वर्षों से बोट्सवाना में हैं. अगले वर्ष रिटायर होने वाले हैं. 2 बेटे, 2 बहुएं, बच्चे सब लखनऊ में ही हैं. हजरतगंज के पास 500 गज की कोठी है.’

मां इस जानकारी से संतुष्ट हो गई थीं. कंप्यूटर के इस युग में फोटो का आदानप्रदान कुछ ही घंटों में हो गया था. शीघ्र ही संबंध को स्वीकृति दे दी गई. प्रोजेक्ट समाप्त होते ही मैं स्वप्निल के साथ लखनऊ पहुंच गई थी. मम्मीपापा का विश्वास देखते ही बनता था. बारबार कहते, हमारे घर लक्ष्मी आ रही है. एकएक दिन यहां पर सब के लिए एक युग के समान प्रतीत हो रहा था. आकांक्षाएं, उम्मीदें आसमान छू रही थीं. कब वह दिन आए और मम्मीपापा बहू का मुंह देखें.

भैया की जिज्ञासा उन की बातों से स्पष्ट थी. प्रत्यक्षत: कुछ नहीं पूछते थे पर जब भी अपर्णा का प्रसंग छिड़ता, उन की आंखों में चमक उभर आती. बारबार कहते, ‘जाओ, बाजार से खरीदारी कर के आओ.’

अपर्णा के गोरे रंग पर क्या फबेगा, यह सोच कर साडि़यां ली जातीं. हीरेमोती के सेट लेते हुए मुझे भी कीमती साड़ी व जड़ाऊ सेट पापा ने दिलवाया था.

ब्याह से ठीक एक माह पूर्व भारद्वाज परिवार ने लखनऊ पहुंचने की सूचना दी थी. हवाई अड्डे पहुंचने से पहले मां का फोन आया. बोलीं, ‘मैं, अपनी बहू को पहचानूंगी कैसे?’

‘हवाई जहाज से जो सब से सुंदर लड़की उतरेगी, समझ लेना वही तुम्हारी बहू है.’

अपर्णा और उस के परिवारजनों से मिल कर मां धन्य हो उठी थीं. ब्याह की काफी तैयारियां तो पहले ही हो चुकी थीं. रहीसही कसर अपर्णा के परिजनों से मिल कर पूरी हो गई.

घर लौट कर मैं ने भैया को टटोला था, ‘कैसी लगी हमारी अपर्णा?’

चेहरे पर गंभीरता का मुखौटा ओढ़ कर उन्होंने शांत भाव से सहमति प्रदान की तो हम सब संतुष्ट हो गए थे.

ब्याह धूमधाम से हुआ. भारद्वाज दंपती ने बरात का स्वागत और दानदहेज देने में कोई कसर नहीं रखी. हीरेमोती कुंदन के सैट, कलर टीवी, वाशिंग मशीन और इंपोर्टेड फर्नीचर दे कर उन्होंने पूरा घर भर दिया था. मम्मीपापा की साध पूरी हुई, मुझे प्यारी भाभी मिली और भैया को स्नेहमयी पत्नी.

ब्याह से अगले दिन नए जोड़े ने हनीमून के लिए गोवा प्रस्थान किया तो मां बिखरा घर समेटने में जुट गई थीं. मैं भी मां की सहायता के लिए कुछ दिन वहीं ठहर गई थी.

पूरा घर व्यवस्थित कर के मां निश्ंिचत हुईं तो दरवाजे की घंटी बजी. पापा घर पर ही थे. दरवाजा स्वप्निल ने ही खोला था. भैया दरवाजे पर थे. पीछे अपर्णा खड़ी थी.

नवब्याहता जोड़े को यों अचानक वापस आया देख कर सभी हैरान रह गए थे.

कहीं झगड़ा तो नहीं हो गया, यह सोच मां चिंतित हो उठी थीं.

अपर्णा कमरे में अपना बैग खोलने में व्यस्त हो गई और भैया हमारे पास ही टेबल पर बैठ गए. मां ने जिज्ञासा व्यक्त की, ‘यों अचानक कैसे लौट आए? तुम लोग तो 15 दिन बाद आने वाले थे.’

‘मां, अपर्णा की तबीयत अचानक खराब हो गई थी. सिरदर्द और उलटियां शुरू हो गईं, इसीलिए लौटना पड़ा.’

पहाड़ी क्षेत्रों में चढ़ाई उतरनेचढ़ने से अकसर उलटियां हो जाती हैं. यही सोच कर मां ने कहा, ‘तो किसी डाक्टर से मशविरा कर के दवा दिलवा देते.’

‘कहा था मैं ने, पर अपर्णा नहीं मानी. बोली घर चलना है,’ भैया अब भी चिंतित थे.

हमेशा हंसनेखिलखिलाने वाली अपर्णा का चेहरा बेहद फीका और बेजान सा दिखा था उस पल.

‘चलो, कोई बात नहीं. अगली बार किसी और जगह हो आना,’ कह कर मां ने मीटिंग बर्खास्त कर दी थी.

यों घर में काम करने के लिए नौकरचाकर थे पर चौके का काम मां ही संभालती थीं. अपर्णा ने अगले दिन से ही उन्हें इस कार्यभार से मुक्त कर दिया. सब की पसंद का भोजन पकाने और खिलाने में उसे विशिष्ट आनंद की अनुभूति होती थी. कोई भी काम, अपने हाथ में ले कर, जब तक दौड़भाग कर पूरी तन्मयता से संपूर्ण नहीं करती, उसे चैन नहीं मिलता था.

एक दिन मां अपर्णा को अपने पास बुला कर बोलीं, ‘तुम ने एम.बी.ए. किया है. यों घरगृहस्थी के कामों में उलझ कर तो तुम्हारी सारी शिक्षा व्यर्थ चली जाएगी. तुम्हें घर से बाहर निकल कर कुछ करना चाहिए.’

‘पर घर का कामकाज…’ अपर्णा मां के इस अचानक आए प्रस्ताव से घबरा गई थी.

‘वह तो पहले भी होता था और आगे भी होता रहेगा. अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करो, बेटी,’ मां की मुसकराहट और विश्वास उसे धीरे से सहला गया था.

अगले ही दिन पापा और भैया के साथ जा कर फैक्टरी का वित्तीय कार्यभार उस ने अपने जिम्मे ले लिया था.

पूरी तन्मयता के साथ काम करने लगी थी अपर्णा. परिणाम अच्छे घोषित हुए. मुनाफे में वृद्धि हुई. हर किसी की प्रशंसा की पात्र बनी अपर्णा कभीकभी खुशी के उन लम्हों में भी बेहद उदास हो जाती. उस की यों असमय चुप्पी का कारण कई बार हम ने जानने का प्रयास भी किया पर वह कभी किसी से कुछ कहती नहीं थी.

कुछ ही दिन बीते थे. उसे फिर से भयानक दर्द हुआ. इस बार दर्द की तीव्रता पहले से भी ज्यादा थी. चेहरा काला पड़ गया था. होंठ टेढ़े हो गए थे.

पापा और मां सोच रहे थे उस की यह दशा तनाव की वजह से है, पर मैं उस के स्वास्थ्य को ले कर बेहद चिंतित थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि अपर्णा इस घर में खुश नहीं? अपर्णा का ब्याह मैं ने ही करवाया था. ‘अगर उसे किसी बात से परेशानी है तो उस का समाधान भी मैं ही करूंगी,’ मैं ने सोचा.

इसी निश्चय के साथ मैं उस के कमरे में चली गई. अपर्णा आरामकुरसी पर बैठी कुछ सोच रही थी. मैं ने पूछा, ‘अपर्णा, कहां खोई हो? कुछ कहोगी नहीं?’ मेरे अंदर समुद्रमंथन जैसी हलचल मची हुई थी.

वह आंखें नीचे किए फर्श को निहार रही थी.

‘तुम्हें सिरदर्द क्यों हो रहा है? किसी चीज की कमी है या तुम किसी बात से असंतुष्ट हो? मुझे बताओ, शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं.’

अजगर की तरह पसरा सन्नाटा जैसे अंधियारे को लील रहा था. निराशा के पल में प्यार का स्नेहिल स्पर्श और आश्वासन पाते ही उस की आंखों में आंसू छलक उठे.

‘यह सिरदर्द नया नहीं पुराना है. मुझे बे्रन ट्यूमर है.’

‘क्या… ब्रेन ट्यूमर?’ मेरे पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई थी.

‘चाची ये सब जानती थीं?’ मेरे अंतर्मन की पीड़ा पके फोडे़ सी लहकने लगी थी.

‘हां, उन दिनों मैं एम.बी.ए. फाइनल में थी, जब मुझे पहली बार सिरदर्द उठा. मां ने मुझे दर्द निवारक गोली दी और नियमित रूप से बादाम का दूध देने लगीं. सभी सोच रहे थे कि यह सिरदर्द कमजोरी और तनाव की वजह से है. आंखों का भी टेस्ट हुआ. सबकुछ सामान्य निकला. उस के बाद जब दर्द फिर हुआ तो पापा मुझे विशेषज्ञ के पास ले गए. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मुझे ब्रेन ट्यूमर है, जिस का एकमात्र इलाज आपरेशन ही है. एक दिन पापा ने एक मशहूर डाक्टर से मेरे आपरेशन की बात की. अपाइंटमेंट भी ले लिया, पर मां नहीं मानी थीं. बोलीं, ‘ब्याह योग्य बेटी के दिमाग की चीड़फाड़ करवाएंगे? अपर्णा को कुछ हो गया तो रिश्ता करना मुश्किल हो जाएगा.’ इस पर पापाजी बोले थे, ‘तुम्हें इस के रिश्ते की चिंता है. मैं तो उस के स्वास्थ्य को ले कर परेशान हूं. इसे कुछ हो गया तो मैं जीतेजी मर जाऊंगा.’

अपर्णा की बीमारी के बारे में धीरेधीरे सब को पता चल गया.

पापा संज्ञाशून्य से हो गए थे. भैया गंभीरता का मुखौटा ओढ़े कभी पत्नी को निहारते और कभी हम सब को. अपनी जीवनसंगिनी को इस रूप में देख कर उन की आकांक्षाओं पर तुषारापात हुआ था. मां गश खा कर गिर पड़ी थीं.

भैया दौड़ कर डाक्टर को बुला लाए थे. पूरी जांच के बाद पता चला, उन्हें हलका हार्टअटैक हुआ है. अचानक रक्तचाप इतना बढ़ गया कि उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती कराना पड़ा था.

जिस दिन उन्हें थोड़ा स्वास्थ्य लाभ हुआ मैं घर लौट आई थी. इतना रोई कि  शायद दीवारें भी पसीज गई होंगी.

मैं सोच रही थी कि कितने प्रसन्न और सुखी थे मेरे पीहर के लोग. मगर अब मेरे भाई का जीवन अंधकारमय हो गया है. अब तो पूरे परिवार का जीवन ही दुख से भर गया है. मूकदर्शिका सी बनी, परिवार की खुशियों को लुटते देख रही थी मैं. अपने भाई की खुशियों को आग में जलता देख कर कौन सी बहन का दिल रो नहीं पड़ेगा. अपर्णा के रोग का एक ही इलाज था आपरेशन. सफल हुआ तो ठीक, नहीं तो अपर्णा अपंग भी हो सकती है. फिर मेरे भैया उस अपंग पत्नी के साथ कैसे जीएंगे? उम्र भर अपर्णा की सेवा में ही जुटे रहेंगे. अब क्या मां के दिन हैं सेवा करने के? पर जो कुछ भी था उस सब के लिए मैं खुद को दोषी मान रही थी.

पहली बार मेरे मन के एक चोर कोने में विचार आया. यदि इस पूरे परिदृश्य से अपर्णा को ही हटा दिया जाए तो सब सही हो जाएगा. आजकल तो लोग बातबेबात तलाक ले लेते हैं और दूसरा ब्याह भी कर लेते हैं, अगर भैया भी ऐसा ही करें तो?

उस दिन मैं मां के कमरे में न जा कर सीधे भैया के कमरे में चली गई थी. भैया अकेले कमरे में बैठे गजलें सुन रहे थे. अपर्णा मां को जूस पिला रही थी. दोनों को अनदेखा कर के मैं भैया के पास जा कर तीखे स्वर में बोली, ‘क्या आप गलत गाड़ी में सिर्र्फ इसलिए सवार रहेंगे कि पहले आप गलती से उस पर चढ़ गए थे और अब सामान समेटने और नया टिकट कटवाने के झंझट से डर रहे हैं?’

भैया शायद मेरा आशय समझ नहीं पाए थे. मैं ने दोबारा कहा, ‘अब भी वक्त है. अपर्णा से तलाक ले लीजिए और दोबारा शादी कर लीजिए.’

कुछ देर तक चुप्पी छाई रही.

‘भैया, विश्वास कीजिए. अपर्णा की मां के छल को मैं समझ नहीं पाई, वरना वह कभी मेरी भाभी नहीं बनती.’

‘कारण जाने बिना तुम भी परिणाम तक पहुंच गईं,’ वह फीकी हंसी हंस दिए,  ‘अपर्णा बहुत अच्छी है. सच बात तो यह है कि वह ब्याह करना ही नहीं चाहती थी पर मां के आगे उस की चली नहीं.’

‘झूठ की बुनियाद पर क्या इमारत खड़ी हो सकती है?’ मेरा मन अब भी अशांत था.

‘झूठ उस ने नहीं, उस की मां ने बोला था, वैसे उन का निर्णय भी गलत  कहां था? हर मां की तरह उस की मां के मन में भी अपनी बेटी को सुखी गृहस्थ जीवन देने की कामना रही होगी. तुम्हारे ब्याह के समय भी मां कितनी चिंतित थीं.’

भैया पुन: बोले, ‘अपर्णा की मां की दशा भी कुछ वैसी ही रही होगी. मानसी, कितना अजीब है हमारे समाज का चलन. बेटी की इच्छाअनिच्छा जाने बिना ब्याह की चिंता शुरू हो जाती है. अधिकांश विवाह लड़की की अनुमति के बिना होते हैं. अपर्णा ने भी विरोध किया था पर उस की एक नहीं चली और अब अपर्णा मेरी पत्नी है. उस का हर सुखदुख मेरा है.’

मैं विस्मित सी अपने भाई का चेहरा निहारती रह गई.

उस दिन के बाद मैं ने उस चौखट पर कदम नहीं रखा. स्वप्निल ने कई बार समझाया, ‘रिश्ते, संयोगवश बनते हैं. तुम्हारे भैया का ब्याह अपर्णा के साथ ही होना लिखा था. इस संबंध में व्यर्थ की चिंता करने से क्या लाभ? जरा सोचो, यही बीमारी उसे ब्याह के बाद होती तब क्या करतीं? और फिर यह रोग, असाध्य नहीं है.’

मैं चिढ़ कर जवाब देती, ‘तब की बात और थी. देखभाल कर कोई मक्खी निगलता है क्या?’

मां अकसर फोन पर अपर्णा की तबीयत के विषय में बताती रहती थीं. एक दिन बोलीं, ‘कल अपर्णा फिर बेहोश हो गई थी. उस की तबीयत देख कर घबराहट होती है. डाक्टरों ने जल्द आपरेशन करवाने की सलाह दी है.’

‘भेज दो उसे मायके. जिस तरह उन लोगों ने हमारे साथ खेल खेला है तुम भी चालाकी से काम लो,’ क्रोध से मेरी कनपटियां बजने लगीं.

‘उन्होंने तो हवाई जहाज की टिकटें भेजी हैं पर अपर्णा खुद ही नहीं जाना चाहती. सच पूछो तो मेरा भी मोह पड़ गया है इस बच्ची में,’ मां ने कहा था.

‘तो, करती रहो सेवा.’

मां निरुत्तर हो जातीं. उन्हें कुछ कहने का मौका ही मैं कब देती थी.

मुझे बारबार मम्मीपापा और भैया पर क्रोध आ रहा था. इस नए युग में एक बीमार बहू के प्रति इतनी आत्मीयता और सहृदयता दिखाने की क्या जरूरत थी.

मेरे मनोभावों से बेखबर स्वप्निल ने मुझे आगाह किया, ‘मानसी, कल अपर्णा को अस्पताल में भरती किया जा रहा है. वैलूर से एक विशेषज्ञ सीमाराम अस्पताल आ रहे हैं. वह आपरेशन करेंगे.’

मैं ने एक बार भी पलट कर उस का हाल नहीं पूछा, बल्कि पीहर फोन ही नहीं किया. अपर्णा के प्रति मेरे मन में छिपा तिरस्कार स्वप्निल बखूबी पहचान रहे थे. एक दिन बुरी तरह झल्लाए मुझ पर, ‘हद होती है रूखे व्यवहार की. एक व्यक्ति जीवनमरण के बीच झूल रहा है और तुम्हारे विचार इतने ओछे हैं कि तुम उस का चेहरा भी देखना नहीं चाहतीं.’

स्वप्निल का मन रखने के लिए मैं एक बार अस्पताल हो आई थी. नाक में आक्सीजन, मुंह में नली, एक बांह में ग्लूकोज, दूसरी बांह में दवाओं की नलिकाएं लगी थीं. मां का सेवाभाव, पापा का दुलार और भैया की आत्मीयता देखते ही बनती थी. एक पल के लिए मुझे तरस भी आया पर अगले ही पल वह भाव घृणा में बदल गया, ‘कितना अच्छा हो अगर अपर्णा की आपरेशन टेबल पर ही मृत्यु हो जाए. कम से कम भैया को तो छुटकारा मिलेगा इस रोगिणी पत्नी से.’

पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था. कुछ ही दिनों में वह बिलकुल ठीक हो गई. अब वह भैया के साथ गाड़ी में बैठ कर दफ्तर भी जाने लगी थी. पापा अब वृद्ध हो गए थे. वह फैक्टरी कम ही जाते थे. भैया बाहर आर्डर लेने जाते तो अपर्णा घर और फैक्टरी अच्छी तरह संभाल लेती थी. मां को अब भी अस्वस्थता घेरे रहती. बहू से कई बार उन्होंने कहा भी कि एक बार बोट्सवाना घूम आओ पर वह हर बार यही कहती, ‘एक बार आप अच्छी तरह से ठीक हो जाएं, तभी जाऊंगी.’

एक सुबह वह मेरे घर आई. मेरी बिटिया को तेज बुखार था. डाक्टर ने टायफायड बताया था. मैं पूरी रात जाग कर उस के माथे पर बर्फ की पट्टियां रखती रही थी. एक ओर बिटिया की तबीयत को ले कर मैं बुरी तरह तनावग्रस्त थी, दूसरी ओर थकावट की वजह से बुरा हाल था मेरा. उस ने चौके में जा कर पूरा नाश्ता तैयार किया. फिर दोपहर की दालसब्जी तैयार कर के हमारे पास आ कर बैठी तो स्वप्निल दफ्तर की कुछ उलझनें ले कर बैठ गए. अपर्णा चुपचाप सुनती रही. फिर भैया के साथ मिल कर उस ने बहुत मशविरे दिए. उस के सुझावों से स्वप्निल को काफी लाभ हुआ था.

मां का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता जा रहा था. बैठेबैठे सांस फूलने लगती, थकावट महसूस होती, छाती में दर्द उठता. मुझे ये खबरें स्वप्निल से मिलती रहती थीं. वह अकसर मम्मीपापा से मिलने मेरे घर जाया करते थे.

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उस दिन रविवार था. स्वप्निल समय से पहले ही तैयार हो गए थे.

‘कहीं बाहर जा रहे हो?’ नाश्ते की प्लेट डाइनिंग टेबल पर रखते हुए मैं ने पूछा.

‘नहीं,’ उन्होंने रूखे स्वर में उत्तर दिया. फिर चौके में जा कर उन्होंने दूध गरम कर के थरमस में उडे़ला और 4 डबलरोटी के स्लाइस पर मक्खन लगा कर पैक करने लगे. मैं ने अपना प्रश्न फिर दोहराया, ‘कहीं जा रहे हो?’

‘हां, अस्पताल.’

‘क्यों, अब कौन बीमार है? कहीं अपर्णा, फिर तो अस्पताल नहीं चली गई?’ मेरे स्वर की कड़वाहट छिपी नहीं थी.

‘तुम, इतनी कठोर और अहंकारी हो, मैं नहीं जानता था.’

मैं अवाक् उन का चेहरा निहारने लगी.

‘कम से कम, इनसानियत के नाते ही मां का हाल पूछ लेतीं?’

‘क्या हुआ मां को?’ मैं बुरी तरह चौंक उठी थी.

‘2 दिन से अस्पताल में हैं.’

‘क्या तुम जानते थे?’

‘हां.’

‘तो फिर बताया क्यों नहीं?’

‘इसलिए क्योंकि तुम्हारे जैसी पत्थरदिल औरत कभी पसीज ही नहीं सकती. एक इनसान अगर बुरा है तो बुरा है, अच्छा तो वह हो ही नहीं सकता. एक ग्रंथि पाल ली तुम ने अपर्णा के विरुद्ध और इतनी दुश्मनी पाल ली कि मायके से नाता ही तोड़ लिया. कम से कम बूढ़े मातापिता की तो खबर ली होती. जानती हो, तुम्हारी मां का आपरेशन हुआ है और उन्हें खून की जरूरत थी. वह खून अपर्णा ने दिया है. अपर्णा की दशा चिंताजनक बता रहे हैं डाक्टर,’ इतना कह कर स्वप्निल बाहर निकल गए.

कितना गिरा हुआ समझ रही थी मैं खुद को उस पल? बीमार, कमजोर, पराए घर की बेटी, मां की सेवा करती रही, स्नेह बरसाती रही और मैं उन की अपनी बेटी बेखबर बैठी रही.

आज अपने खून का एक कतरा दे कर भी मां की जान बचा सकूं तो खुद को धन्य समझूं, यह सोचती हुई मैं अस्पताल पहुंची. बाहर कोरिडोर में भैया और पापा खड़े थे. स्वप्निल डाक्टरों से परामर्श कर रहे थे. मुझे देखते ही भैया फूटफूट कर रो पड़े.

‘मां कैसी हैं?’ मैं ने उन्हें धीरज बंधा कर आत्मीयता से पूछा.

‘खतरे से बाहर हैं.’

‘और अपर्णा?’ पहली बार मुझे अपर्णा के प्रति चिंतित देख कर सभी के चेहरों पर ताज्जुब मगर संतुष्टि के भाव मुखर हो उठे थे.

‘रक्तचाप गिर गया है बेहोश है,’ पापा अब भी चिंतित थे.

‘उसे क्यों खून देने दिया? ब्लड बैंक से ले लेते.’

‘कहा तो था पर अपर्णा नहीं मानी. बोली, जब उस का खून मैच कर रहा है तो ब्लड बैंक से खून ले कर बीमारियों का खतरा क्यों मोल लिया जाए?’ सभी सन्नाटे में थे. भैया निढाल से बैंच पर बैठे थे. मैं देख रही थी इन लोगों का अपर्णा के साथ बंधन अटूट है. वह वास्तव में इस घर की बहू नहीं बेटी है. मेरा मन उस के प्रति सहानुभूति से भर गया था….

बाहर किसी शोर से अचानक मेरे विचारों का सिलसिला टूटा. जल्दीजल्दी तैयार हो कर मैं अकेली ही अस्पताल पहुंची.

उसी समय डाक्टर ने बाहर आ कर  बताया, ‘‘अपर्णा स्वस्थ है. आप लोग उस से मिल सकते हैं.’’

सब के चेहरे पर संतुष्टि के भाव तिर आए थे. अगर अपर्णा को कुछ हो जाता तो कोई भी खुद को माफ नहीं कर पाता. सब से ज्यादा मैं खुद को दोषी समझती.

भाग कर मैं अपर्णा के बिस्तर पर पहुंच गई और उस के माथे पर चुंबनों की बौछार लगा दी. सभी अचरज से मुझे देख रहे थे. शायद किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरे हृदय के इर्दगिर्द उगा खरपतवार यों एकाएक कैसे छंट गया. आंसुओं से विगलित तीव्र वेदना की धार मुख से निकली, ‘‘अपर्णा, तुम ने मां को जीवनदान दिया है.’’

‘‘नहीं दीदी, जीवनदान तो आप सब ने मुझे दिया है. मैं ने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया है.’’

मेरी आंखों की कोर से ढुलके आंसू कब अपर्णा के आंसुओं से मिल गए, मैं नहीं जानती.

छत्तीसगढ़ में मोहन मरकाम बनें कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी  के आलाकमान ने विधायक मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष का ‘ताज’ पहना दिया है . प्रदेश में इस बहुप्रतीक्षित नियुक्ति का लंबा इंतजार खत्म हो गया है . मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नए सदर मोहन मरकाम को बधाई दे दी है . कांग्रेस में गांव से लेकर राजधानी तक मोहन मरकाम को प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष बनने पर खुशी व्यक्त की जा रही है. बधाई का तांता लगा हुआ है . जैसा कि हमेशा होता है… अभी भी वही नाटक चल रहा है वही चापलूसी, वही जर्रा नवाजी वही आंखें बंद करके आलाकमान के आदेश का पालन.

कुछ प्रश्न हैं, जिनका जवाब शायद, न तो कांग्रेस के सुप्रीम नेता राहुल गांधी के पास है, न ही छत्तीसगढ़ प्रदेश के सत्ता के मुखिया भूपेश बघेल और पूर्व नेता प्रतिपक्ष व वर्तमान में नंबर दो की हैसियत रखने वाले टी. एस. सिंहदेव के पास . यह सवाल है तो जवाब भी आने चाहिए . मोहन मरकाम की नियुक्ति के सकारात्मक नकारात्मक प्रभाव से आपको अवगत कराया जाए उससे पूर्व यह प्रश्न जानना आपके लिए आवश्यक है ताकि छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी राजनीति से आप कुछ समझ सकें….. और राहुल गांधी के इस्तीफे के एक बड़े राष्ट्रीय प्रश्न को भी आप समझ जाए, आपमें इसका माद्दा पैदा हो .

 प्रश्न राहुल गांधी से…

23 मई को जैसे ही लोकसभा समर के परिणाम आए और कांग्रेस का एक तरह से सूपड़ा साफ हो गया. तब कांग्रेस मे सनाका खींच गया . मन में उठते प्रश्नों को दबाकर श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी व उनके कांग्रेस परिवार ने नरेंद्र मोदी को बधाई दी और जनादेश स्वीकार किया . चंद दिनों बाद राहुल गांधी ने इस्तीफे की बात कही और इस्तीफे पर अड़ गए . कहा-“नहीं मैं इस्तीफा दे कर रहूंगा.”

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी हतप्रभ रह गई क्योंकि ऐसा तो होता रहता है. लोकतंत्र में कोई जीतता है कोई हारता है . मगर राहुल गांधी ने मानो तड़प कर यह स्वीकार किया कि कांग्रेस की यह हालत इसलिए है कि उनका नेतृत्व उनका, आभामंडल कहीं चूक गया है . प्रियंका गांधी का बड़ा आसरा था मगर वह भी चमत्कार नहीं दिखा पाईं.

ऐसे में राहुल गांधी का इस्तीफा एक क्रांतिकारी कदम था . मगर उसमें पुन: एक माह का समय दिया जाना ? यह कांग्रेस को कमजोर बनाता है इस्तीफा तो इस्तीफा फिर काहे का मान मनौव्वल . राहुल गांधी डटे हुए हैं . एक माह व्यतीत हो चुका है अशोक गहलोत का नाम चर्चा में है . सवाल है,  कांग्रेस में चुनाव क्यों नहीं कराया जाता… पार्टी संगठन में, पूर्व में 2 वर्षों में चुनाव का नाटक होता था. श्रीमती सोनिया गांधी ने उसे 5 वर्षों का करा दिया .कांग्रेस संविधान बदल दिया गया, कांग्रेस अब इसीलिए मरणासन्न है.इधर छत्तीसगढ़ सहित सभी प्रदेशों में संगठन में फेरबदल की जा रही है.

प्रश्न यही है, जब आपको राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं रहना है फिर आप प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति क्यों कर रहे हैं ?

कोई सशक्त चेहरा नहीं मिला आपको…

राहुल गांधी ने  छत्तीसगढ़ कांग्रेस के दो विधायकों का इंटरव्यू लिया. वे थे मनोज मंडावी व मोहन मरकाम . दोनों बस्तर अंचल से विधायक हैं . मजे की बात यह कि दोनों विधायकों को प्रदेश की सत्ता के संरक्षण में राहुल गांधी से मिलवाया गया . प्रदेश में कांग्रेस के एक से एक सशक्त और प्रखर नेता है चाहे वह विधायक, सांसद हो या न हो ऐसी फेहरिस्त को छोड़कर कांग्रेस ने आदिवासी कार्ड खेला है और सहज सरल स्वभाव के मोहन मरकाम जो कोडांगांव से विधायक है को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का सदर बना दिया गया .

प्रश्न है छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बड़े चेहरे सत्ता सुख भोगने के लिए सत्ता के घोड़े  पर चढ़ गए हैं अब पार्टी को कौन संभाले ?

डां. चरणदास महंत, रवींद्र चौबे, टी.एस. सिंहदेव जैसे बड़े नाम 15 वर्षों के वनवास के बाद सत्ता सुंदरी का सुख भोगना चाहते हैं . यह ऐसे लोग हैं जिन्हें प्रदेश का हर एक कार्यकर्ता जानता है यह ऐसी हस्तियां हैं जिनकी प्रदेश की राजनीति पर पकड़ है अच्छा दखल है . मगर प्रदेश अध्यक्ष पद अब इन्हे छोटा प्रतीत होने लगा है जिस संगठन के बूते आज कांग्रेस सत्ता में आई है,उस संगठन की उपेक्षा कर ऐसे शख्स को अध्यक्षी का ताज पहनाया गया है जो संपूर्ण छत्तीसगढ़ से वाफिक ही नहीं है .

सत्ता संगठन में टकराव कारण है

दरअसल सहज सरल और ऐसे शख्स को अध्यक्ष बनाना, जो नया नवेला हो, यह सत्ता की चाहत होती है और राहुल गांधी इस चक्रव्यूह में फंस गए . अविभाजित मध्य प्रदेश के दरमियान ख्याल करें तो दिग्गज हस्तियां पार्टी का प्रमुख चेहरा होती थी जिससे प्रदेश में सरगर्मी का संचार होता था और पार्टी जनता जनार्दन की नब्ज पर हाथ रखती थी. अब भूपेश के राज में संगठन की नब्ज पर सत्ता का हाथ होगा . परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति कमजोर होगी . और यह सब जान समझ कर किया जा रहा है अगरचे किसी तेजतर्रार शख्स को सदर बना दिया जाए तो सत्ता संगठन में तलवारें निकल आती है प्रदेश अध्यक्ष मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लगता है इस कारण संगठन की भ्रूण हत्या छत्तीसगढ़ में मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष बना की गयी है. जो शख्स  बस्तर से लेकर सरगुजा तक जनता और कार्यकर्ताओं से वाफिक ही नहीं है उसे अध्यक्ष बनाने का और क्या मतलब है यानी इसका लाभ आगे भाजपा को भरपूर मिलेगा .

दिग्गजों की अनदेखी क्यों

ठीक है छत्तीसगढ़ में आपको 68 विधायकों का भारी बहुमत मिल गया है तो क्या यह आपके व्यक्तित्व का चमत्कार है ! राजनीतिक पंडितों के अनुसार यह सामूहिक नेतृत्व का कमाल है और उसके आगे डाक्टर रमन के 15 वर्षों की एन्टीइन्कमबेसी का. ऐसे में छत्तीसगढ़ के बड़े दिग्गजों की अनदेखी अच्छी बात नहीं है .

मोतीलाल वोरा एक बड़े चेहरे हैं . बड़ा कद है . उसके बाद सत्यनारायण शर्मा हैं जो चार दशकों से कांग्रेस की राजनीति के क्षत्रप है. अमितेश शुक्ल हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल के सुपुत्र हैं .अरुण वोरा हैं धनेंद्र साहू संगठन में देखें तो शैलेश नितिन त्रिवेदी रमेश वल्याणी किरणमयी नायक भाजपा से कांग्रेस में  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की भतीजी करुणा शुक्ला है.ऐसी शख्सियतों को छोड़कर जिनकी मुट्ठी में प्रदेश है,जाने पहचाने चेहरे हैं किसी नये शख्स को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपना. यह जग जाहिर करता है कि यह पार्टी के हित में कतई कतई  नहीं है .

कौन है मोहन मरकाम

सरकारी नौकरी छोड़कर 2008 में मोहन मरकाम ने पहला चुनाव लड़ा और विजयी हुए . बंगाल टाइगर कहे जाने वाले महेंद्र कर्मा ने उन्हें राजनीति में लाकर आगे बढ़ाया 2013 में विधायक बने और पुनः 2018 में विजयी हुए . बखत इतना परिचय होने के पश्चात सिर्फ राजनीतिक समीकरणों, आदिवासी कार्ड के नाम पर आप प्रदेश के अध्यक्ष मनोनीत हुए हैं. देखिए आगे आगे होता है क्या.एक कहावत है आदमी को ठंडे दूध को फूंक मार मार कर नहीं पीना चाहिए मगर कांग्रेस अब यही करने लगी है.

शाहरुख खान ने बेटी सुहाना के लिए इस अंदाज में जाहिर की खुशी

शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान ग्रेजुएट हो गई हैं. जाहिर सी बात है शाहरूख अपनी बेटी के लिए बेहद खुश होंगे. जब भी शाहरुख से उनके बच्चों के बारे में सवाल किया गया है तो उनका बस यही कहना है कि वो अपने बच्चों को उनके मनचाहा काम करने देंगे लेकिन सबसे पहले उन्हें पढ़ाई पूरी करनी होगी.

शाहरूख ने अपनी यह खुशी सोशल मीडिया के जरिए जाहिर की है. उन्होंने सोशल मीडिया पर दो बेहद खास तस्वीरें शेयर की हैं. पहली तस्वीर में शाहरुख खान पत्नी गौरी खान और बेटी सुहाना के साथ नजर आ रहे हैं.

 

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इस तस्वीर को शेयर करते हुए शाहरुख खान ने कैप्शन में लिखा, ”4 साल बीत गए…आर्डिंगली से ग्रैजुएट हो गई. आखिरी पिज्जा, आखिरी ट्रेन की सवारी और असली दुनिया में पहला कदम..स्कूल खत्म हो गया लेकिन सीखना अभी बंद नहीं हुआ.” आपको बता दें कि आर्डिंगली इंग्लैड में हैं. वहीं से सुहाना ने अपनी ग्रैजुएशन पूरी की है.

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शाहरुख ने सुहाना के साथ एक और तस्वीर शेयर की है. ये एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर है. इसके कैप्शन में शाहरुख खान ने लिखा, ‘स्कूल का आखिरी दिन. आगे अपनी जिंदगी में नए अनुभव और रंग जोड़ने के लिए.

वन डे जस्टिस डिलिवर

कलाकार- ईशा गुप्ता, मुरारी शर्मा, जरीना वहाब, राजेश शर्मा, जाकिर हुसेन, दीपशिखा नागपाल, परीक्षत साहनी, अनंत महादेवन व अन्य.

निर्देशक व निर्माता- अशोक कुमार नंदा

बौलीवुड में कानून, अदालत व सिस्टम पर सवाल उठाने वाली फिल्म बनती रही हैं, मगर अब तक किसी भी फिल्मकार ने अपनी फिल्म में इस बात का चित्रण ही किया कि यदि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश किसी निर्दोष को सजा दें और मुलजिम को बरी कर दें, तब क्या होगा? मगर फिल्मकार अशोक कुमार नंदा ने अपनी फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’ में इसी बात को रेखांकित करते हुए अदालती कार्यप्रणाली और सिस्टम पर कई सवाल खड़े किए हैं. इस फिल्म में उच्च न्यायालय के जज को एक मां अपने बेटे के हत्यारों को बरी करने वाले जज को अदालत में ही थप्पड़ मारती है, जज को गलती का अहसास होता है, पर उस वक्त वह कानून के दायरे में बंधा होता है. मगर न्यायाधीश के पद से अवकाशग्रहण करते ही वही जज उन चारों आरोपियों को अपने रीके से सजा देता है, जिन्हें उसने बेगुनाह बताकर बरी किया था.

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फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस’’ के निर्देशक व निर्माता अशोक कुमार नंदा किसी परिचय के मोहताज नहीं है. मूलतः उड़ीसा निवासी और पंद्रह साल तक अमरीका में साफ्टवेअर इंजीनियर के रूप में नौकरी कर चुके अशोक कुमार नंदा बताते हैं- ‘‘मैंने वहां पर रहते हुए सबसे पहले एक अफगान इंडो फिल्म ‘फासयर डांस’ का निर्देशन किया. यह फिल्म अफगानी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का मिश्रण थी. युद्ध की पृष्ठभूमि में अमरकी जिंदगी जी रहा एक अफगानी युवक किस तरह तालिबानी बनने निकलता है, उसकी कहानी है. एक यथार्थत जिंदगी की कहानी थी. यह कहानी जिस इंसान पर बनी थी, उसका भाई इस फिल्म का निर्माता था. मैंने इसका निर्देशन किया था. इस फिल्म को आस्कर अवार्ड के लिए नोमीनेट भी किया गया. उसके बाद मैंने हिंदी फिल्म ‘हम तुम और मैं’ का निर्देशन किया. इस फिल्म में कृष्णा अभिषेक हीरो थे. उसके बाद मैं फिर अमरीका चला गया. मैंने फिल्म बनाने के लिए किसी से आर्थिक मदद नही ली. मैं जो कमा रहा था, वही फिल्म निर्माण में लगा रहा था. तीन साल बाद 2012 में वापस आया और मैंने फिल्म ‘रिवाज’ बनायी, जिसे कई नेशनल व इंटरनेशनल अवार्ड मिले. तब मुझे लगा कि मुझे यही काम करना चाहिए. और मैंने अमरीका जाकर नौकरी छोड़ी. अपनी कंपनी दूसरे इंसान को बेचकर 2014 में हमेशा के लिए मुंबई आ गया. 2016 में मुझे एक कहानी मिली, जिस पर मैंने फिल्म बनायी ‘‘ वन डे जस्टिस डिलिवर’’ बनायी है.’’

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झारखंड की वास्तविक लोकेशन व रांची हाई कोर्ट में फिल्मायी गयी. फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस’’अदालती कार्यशैली के खिलाफ रिवोल्यूशन लाने की बात करती है. फिल्मकार अशोक नंदा कहते हैं- ‘‘सिस्टम से जुड़े लेागों से गलती हो सकती है, पर सिस्टम को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आम लोगों का सिस्टम पर विश्वास बना रहे. आम लेागों का यह विश्वास रहे कि हां मुझे यहां न्याय मिलेगा. आम इंसान को पता होना चाहिए कि गरीब होते हुए भी उसे न्याय मिलेगा. सरकार फिर से अध्ययन कर कानून /संविधान संशोधन करना चाहेगी. सरकार ऐसा संविधान संशोधन करें कि हर जज की जवाबदेही तय हो सके. यदि जज तय समय में किसी मुकदमे पर निर्णय न दें, तो उसे हटाया जाए. कानून ऐसा हो कि गवाह को गुमराह न किया जा सके. भ्रष्टाचार पर लगाम हो. कानून खरीदा न जा सके.’’

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वह आगे कहते हैं-‘‘एक गरीब आदमी को जब न्याय की तलाश होती है, तो वह इस बात पर गौर नहीं करता कि उसे न्याय किस तरह मिल रहा है. उसके लिए तो वह इंसान भगवान होता है, जो उसे न्याय दिलवा दें. न्याय पाने वाले इंसान न्याय के तरीकों पर गौर नही करता. यदि कोई इंसान कानून को हाथ में लेकर भी किसी को न्याय दिलाता है, तो न्याय पाने के लिए वह सही इंसान है.’’

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भारत व अमरीका की न्यायप्रणाली की बात करते हुए अशोक नंदा कहते हैं- ‘‘मैंने अमरीका और भारत की न्याय व्यवस्था को बहुत बारीकी से देखा व समझा है. अमरीका में यदि सिस्टम/जज की गलती से किसी निर्दोष को सजा हो जाती है.10-20 साल बाद जब उसकी सजा पूरी होती है और पता चलता है कि वह निर्दोष था, उसे गलती से सजा मिली, तो भारत में इसकी भरपायी नही होती. इस निर्दोष इंसान की पूरी जिंदगी बर्बाद हो चुकी होती है. लेकिन अमरीका का सिस्टम ऐसा है कि ऐसे हालात में वहां की सरकार उस निर्दोष व्यक्ति को 3 से 4 लाख डौलर का मुआवजा देती है. यानी कि इतना मुआवजा देती हैं जितना वह पिछले 20 साल में ना कमा सकता. यानी कि अमरीकन सिस्टम से गलती हो तो वह भरपायी करता है, पर भारत में ऐसा नही है.’’

फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस’’ में जज की भूमिका में अनुपम खेर हैं.

सुकून भरे पल बिताने के लिए करें इन जगहों की सैर

जिंदगी की भाग-दौड़ में आराम के लिए एक रात काफी नहीं है. घर से औफिस, औफिस से घर. ज्यादातर लोगों की आधी जिंदगी इसी में गुजर जाती है. ऐसे में कई बार मन करता है कि वक्त को कुछ देर के लिए थामकर जिंदगी का मजा लिया जाए.

आइए, हम आपको बताते हैं, ऐसी जगहों के बारे में जहां आप काम से छुट्टी लेकर अपना मूड फ्रेश कर सकती हैं. ये जगह सुकून के साथ-साथ बहुत कम समय में आपका मूड भी फ्रेश कर देंगी, जिससे आप वापस काम पर लौट सकते हैं और वो भी दोगुनी उर्जा के साथ.

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कसौल

हिमाचल प्रदेश में मौजूद सबसे खूबसूरत जगह कसौल ऐसी परफेक्ट जगह है जहां आपको सुकून मिलेगा. यहां मौजूद पार्वती नदी, मनिकरण गुरुद्वारा, खीर गंगा तक पैदल जाना और यहां की स्थानीय बाजार आपके लिए बेस्ट हैं, अगर खाने की शौकीन हैं तो यहां इजराइली फूड में कई वेराइटी मिल जाएंगी, वो भी कम दामों में. यह जगह ऐसी है जहां सब कुछ आपके बजट में होगा.

दार्जिलिंग

हरियाली से भरपूर पश्चिम बंगाल की सबसे खूबसूरत प्राकृति से जुड़ाव के लिए यह जगह बेस्ट है. यहां का टाइगर हिल्स, हिमालय, चाय के बगान, मीरिक लेक,  हिमालयन रेलवे की सवारी और ढेर सारा खाना आपका मूड फ्रेश कर देगा.

पुडुचेरी

पेराडाइज बीच, औरोविल्ले बीच, अरविदों आश्रम, पार्क स्मारक, अरिकमेडु, आनंद रंगा पिल्लई महल, विल्लन्नूर और कई सारे फूड पौइंट. इसके अलावा पुडुचेरी के ब्रिटिश काल में बने घरों और इंफ्राटक्चर भी आपको बहुत पसंद आएंगे. अगर आपको नाइट लाइफ एंजौय करनी है, तो यहां नाइट पब्स मिल जाएंगे, जहां आपको बीयर के साथ खास तरह के स्नैक्स मिलेगे.

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मैकलोडगंज

हिमाचल में बसी एक जन्नत जैसी जगह है. जहां पर जाकर आपको लगेगा कि आप यहां पहले क्यों नहीं आईं. मैकलोडगंज में भागसू वौटरफौल, तिब्बतियन म्यूजियम, कालचक्र मंदिर, सनसेट प्वाइंट जैसी कई बेहतरीन जगहों पर घूमकर आपका दिन बन जाएगा. आप जब वापस काम पर लौटेंगी तो तरोताजा होकर लौटेंगी.

मसूरी

पहाड़ों की रानी मसूरी जहां घूमकर आपका मन यहां और रुकने का करेगा. वीकेंड पर आप मसूरी घूमने का प्लान बना सकती हैं. सितम्बर से दिसम्बर मसूरी किसी जन्नत से कम नहीं लगती. यहां आप गनहिल, म्युनिसिपल गार्डन, तिब्बती मंदिर, चाइल्डर्स लौज,  कैम्पटी फौल, नाग देवता मंदिर, मसूरी झील, जौर्ज एवरेस्ट हाउस, ज्वालाजी मंदिर घूम सकती हैं.

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48 साल बाद मिले एमी बैटल के भाई-बहन

जौर्जिया की रहने वाली एमी बैटल की उम्र 48 साल है और उस के बच्चे भी काफी बड़े हो गए हैं. अपना भरापूरा परिवार होने के बावजूद एमी के मन में एक जिज्ञासा बनी रहती थी कि उस के मूल मातापिता और उन का परिवार कैसा होगा.

दरअसल, एमी की इस जिज्ञासा की वजह यह थी कि वह भले ही लाड़प्यार में पली थी, लेकिन उस के पालक मातापिता ने उसे तब गोद लिया था, जब वह महज 5 महीने की थी. जब से एमी ने इस बात को जाना था, तभी से उस के मन में अपने मूल मातापिता और उन के परिवार के बारे में जानने की इच्छा बनी हुई थी. उन से कभी तो मुलाकात होगी, यह सोचते हुए कई दशक बीत गए. इस के लिए उस ने कई बार कोशिश भी की.

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एक दिन एमी ने इस बारे में अपनी बड़ी बेटी से चर्चा की तो उस ने बताया कि वह एक ऐसी एजेंसी के बारे में जानती है जो लोगों को उन के मूल परिवारों से मिलाने में मदद करती है. एमी ने जब इस एजेंसी से संपर्क किया तो नतीजा देख कर वह भौंचक रह गई. एजेंसी ने उसे स्टीव नाम के एक शख्स से मिलवाया, जो एमी का सगा भाई था.

अपने उस भाई से बातोंबातों में एमी को पता चला कि वे लोग 22 भाईबहन थे. इन में 11 उन की मां की तरफ से थे और 11 पिता की तरफ से. स्टीव एमी का छोटा भाई था, जिस से बात करना उसे बहुत अच्छा लगा. उसे यह जान कर जितनी खुशी हुई, उतना ही ताज्जुब भी हुआ कि उस के 21 भाईबहन और हैं.

उन सब की उम्र 46 से 65 साल के बीच थी. एमी अब तक अपने 20 भाईबहनों से मिल चुकी है. उस ने फैसला किया है कि अपने बच्चों के साथ अपने मूल परिवार से मिलेगी और उन के साथ कुछ दिन गुजारेगी. यह आश्चर्य की बात है कि एमी ने अपने मूल परिवार से मिलने के लिए 48 साल इंतजार किया.

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आदर्श जन्मस्थली

हमारी पीढ़ी के 99 प्रतिशत लोगों ने घर के पिछवाडे़ वाले कमरे में दाई की मदद से पृथ्वी पर कदम रखा था जबकि हमारे 99 प्रतिशत बच्चे अस्पताल में आपरेशन के दौरान आंखें खोलते हैं. इस प्रकार ये बच्चे चाकूछुरी चलाने की तालीम जन्म से सीख कर आते हैं. खून से उन्हें डर नहीं लगता. हमारी महिला डाक्टर निडर रहने के संस्कार इन में जन्म से ही डाल देती हैं.

अस्पतालों में जन्म होने से राष्ट्र कई भावी समस्याओं से निश्चित रूप से मुक्ति पा लेता है. यहां पर एक ही स्थान पर महापुरुषों के अलावा चोर, उचक्के, डाकू, तस्कर आदि कोई भी जन्म ले सकता है. ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्र, महापुरुषों के जन्मस्थान के स्मारक बनाने के झंझट से बच जाता है, देश में जन्मभूमि संबंधी विवाद भी उत्पन्न नहीं होंगे, क्योंकि एक ही स्थान पर हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई कोई भी व्यक्ति जन्म ले सकता है.

हमारे यहां जन्मपत्रिका का बहुत महत्त्व है. पहले बच्चा भगवान भरोसे कभी भी पैदा हो जाता था और उस का भविष्य भगवान के सहारे रहता था पर इस क्षेत्र में भी अब कुछ विद्वानों ने टांग घुसेड़ने की कोशिश की है. हमारे नगर के एक दूरदर्शी चिकित्सक जोडे़ ने समाज की इस समस्या को पहचाना और आदर्श जन्मस्थली का नया प्रयोग किया.

आदर्श जन्मस्थली में प्रसव जागरूकता और आधुनिकता का प्रतीक हो गया. मेरी बहू का प्रसवकाल समीप था. मैं बहू का प्रसव सरकारी अस्पताल में कराने के पक्ष में था पर श्रीमतीजी ने अल्टीमेटम दे दिया, ‘‘बच्चा आदर्श जन्मस्थली में ही पैदा होगा. हमें इस परिवार की ‘मास्टर’ पैदा करने की परंपरा को तोड़ना है.’’

हमेशा की तरह हम ने आत्मसमर्पण कर दिया और सपरिवार आदर्श जन्मस्थली की ओर प्रस्थान किया.

‘‘स्वागत है, श्रीमान. मैं आप की क्या सेवा कर सकती हूं?’’ स्वागत कक्ष में बैठी सुंदरी ने मुसकराते हुए पूछा.

सुंदरी की मुसकान कान के रास्ते दिल में उतर गई. ‘सेवा’ शब्द भी अपना प्रभाव दिखाने लगा. मैं ने भी जवाब में मुसकराने की कोशिश की. मेरी यह नितांत व्यक्तिगत गतिविधि श्रीमतीजी की खोजी निगाहों से बच नहीं सकी. उन की पैनी नजर ने मेरी प्राकृतिक प्रवृत्ति की तेरहवीं कर दी.

‘‘जी, डाक्टर को दिखाना है,’’ मैं अचकचा कर बोला.

‘‘किसे, आप को…’’ कह कर वह हंसते हुए बोली, ‘‘सर, यह मैटरनिटी होम है.’’

चोट गहरी थी, मैं कसमसा कर रह गया. श्रीमतीजी भी मेरी नादानी पर हंस पड़ीं और मेरा बचाव करते हुए बोलीं, ‘‘हटो जी, मैडम, इन को नहीं, बहू को दिखाना है.’’

‘‘अच्छा, अच्छा, किस डाक्टर ने भेजा है?’’ उस ने पूछा.

‘‘डा. गायकवाड़ ने यहां रैफर किया था,’’ मैं ने कहा.

‘‘अच्छा, पेशेंट का नाम बताइए, 21 नंबर में डा. सक्सेना से मिल लीजिए,’’ वह फाइल बना कर बहू को देते हुए गंभीर स्वर में बोली, ‘‘फाइव हंड्रेड.’’

बहू ने लड़के को, लड़के ने मां को और मां ने मुझे सवालिया नजरों से देखा.

मैं ने जेब से 500 रुपए निकाल कर अनमने भाव से उसे दिए.

‘‘थैंक्यू सर,’’ वह मुसकराते हुए बोली. अब गंभीर होने की मेरी बारी थी.

हम सब सहमे हुए आगे बढ़े. हम ने डा. सक्सेना की नेमप्लेट वाले दरवाजे पर हाथ रखा ही था कि एक आवाज खटाक से गूंजी, ‘‘नंबर से… वहां बैठिए,’’ स्टूल पर बैठे आदमी ने हमें घूरा.

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हम ने मुसकराने का प्रयास किया और सामने रखी बैंच पर बैठ गए. पहले से बैठे लोगों ने राहत की सांस ली. मैं सोच रहा था कि हमारे यहां के डाक्टर चिकित्सा शास्त्र के साथसाथ मनोविज्ञान का भी अध्ययन जरूर करते होंगे. पैसे वसूलने के लिए खूबसूरत युवती और डाक्टर के रूम के बाहर चिंपांजी टाइप आदमी. लटके और झटके का जानलेवा तालमेल.

तभी जेहन में एक पुराना किस्सा उभर आया. एक महिला के पेट का आपरेशन करते समय चिकित्सक महोदय अपनी घड़ी उस के पेट के अंदर भूल गए. आपरेशन के कुछ महीने बाद उस महिला ने एक पुत्र को जन्म दिया तो पुत्र घड़ी लिए हुए पैदा हुआ. खास बात यह थी कि घड़ी अब भी सही समय बता रही थी. आगे चल कर यह लड़का सफल घड़ीसाज बना. आज भी वह डाक्टर साहब की घड़ी बिना पैसा लिए मरम्मत करता है. इसे कहते हैं गलती करो और मजे करो.

विचार मन में आ रहे थे, जा रहे थे, तभी बेटे की आवाज ने ध्यान भंग किया, ‘‘पापा, अपना नंबर.’’

हम सब ने राहत की सांस ली. चलो, आज नंबर आ ही गया. हम उसी ठसक के साथ आगे बढे़, जैसे बराती सीना तान कर बढ़ते हैं.

चेंबर में चश्मा पहने मोटी सी महिला ने सवालिया नजरों से हमें देखा और कहा, ‘‘एक मरीज के साथ एक ही अटेंडेंट अलाउ है, आप 3 कैसे आ गए?’’

‘‘सौरी, मैडम…’’ हम से जवाब देते न बना.

‘‘ठीक है. आइंदा से ध्यान रखिए,’’ कह कर वह फाइल देखने लगी.

‘‘देखिए, आप कहां डिलीवरी चाहेंगे?’’ डाक्टर ने मुसकराते हुए एक सूची पकड़ाते हुए कहा, ‘‘यह कमरा नंबर 1, यहां प्रदेश के 2 मुख्यमंत्री पैदा हो चुके हैं. यह पैकेज 1 लाख रुपए का है. कमरा नंबर 10, यहां कई नेता पैदा हुए हैं, पैकेज 42 हजार रुपए. कमरा नंबर 4, फिल्मी कलाकार, पैकेज 50 हजार रुपए.’’

और हम लोग मंत्रमुग्ध हो कर सुन रहे थे.

‘‘कमरा नंबर 11, ब्यूरोक्रेट्स, पैकेज 40 हजार रुपए. कमरा नंबर 2, इंजीनियर, डाक्टर, पैकेज 25 हजार रुपए.’’

‘‘क्यों जी, 11 नंबर ठीक रहेगा? इंजीनियर और डाक्टर की तो अब इज्जत नहीं रही,’’ सूची लंबी थी, सरसरी नजर डालते हुए श्रीमतीजी ने फैसला सुनाया.

‘‘देखिए, निर्णय आप का है. बच्चा एक ही बार पैदा होता है. हम तो सुविधा देते हैं.’’

‘‘पर, डाक्टर, कमरों की सुविधाओं में कोई अंतर है क्या?’’ मैं ने जिज्ञासा जाहिर की.

‘‘देखिए, पैसे सुविधाओं के नहीं स्थान के  हैं, दादाजी,’’ उस ने मेरी दुखती रग को छुआ. डाक्टर साहिबा ने स्वयं खिजाब लगा कर अपने बाल काले कर रखे थे और मुझे दादाजी कह कर अपनी उम्र कम बताने का प्रयास कर रही थीं.

‘‘नहीं, डाक्टर, मैं पूछ रहा था, आदमी भी कहीं पैदा होता है?’’

‘‘क्या बेहूदा सवाल पूछ रहे हैं आप. यह सरकारी अस्पताल नहीं है,’’ डाक्टर ने मुझे खा जाने वाली निगाहों से घूरते हुए कहा.

मैं सहम कर चुप हो गया. पत्नी ने मुझे समझाने की नजर से देखा. बहू के चेहरे पर मेरे नादानी भरे प्रश्न के कारण मुसकराहट तैर गई.

‘‘जी, डाक्टर, पापा पुरानी पीढ़ी के हैं, आगे बताइए,’’ बातचीत की कमान अब बेटे ने थाम ली.

‘‘यदि आप खास मुहूर्त में बच्चा चाहते हैं तो कमरा नंबर शून्य में बैठे पंडितजी से संपर्क करें. पैकेज के पैसे रिसेप्शन में जमा करा दें,’’ डाक्टर ने घंटी बजाई और कहा, ‘‘नेक्स्ट.’’

‘‘थैंक्यू, डाक्टर,’’ कहते हुए हम ससम्मान कमरे से बाहर आ गए. मेरे विरोध को नकारते हुए सभी कमरा नंबर शून्य की ओर बढ़ चले.

‘‘आइए, महोदय, कितनी शुभ घड़ी में आप ने प्रवेश किया है, अवश्य होनहार बच्चा होगा,’’ तख्त पर बैठे पंडितजी ने पंचांग पलटते हुए पूछा, ‘‘आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’

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‘‘बच्चे के लिए कोई अच्छा मुहूर्त बताइए, पंडितजी,’’ श्रीमतीजी हाथ जोड़ते हुए बोलीं.

‘‘अवश्य, बहनजी. कितना समय शेष है?’’ पंडितजी ने प्रश्न किया.

‘‘लगभग 5 दिन,’’ श्रीमतीजी ने जवाब दिया.

‘‘घोर अनर्थ, बच्चे के जन्म के समय ज्येष्ठा के मूल होंगे, जो घर के ज्येष्ठ व्यक्ति के लिए कष्टकर होंगे,’’ पंडितजी मेरी ओर देखते हुए बोले.

‘‘क्या कष्ट होगा, भुगत लूंगा,’’ मैं आशय समझते हुए बोला.

‘‘शांत वत्स, शांत. विश्वास करना सीखो, यजमान. गत माह यहां ज्येष्ठा नक्षत्र में एक बालक ने जन्म लिया. मेरी सलाह नहीं मानी, आप जैसे नादान थे. यहां बालक ने जन्म लिया, वहां बालक के दादाजी बाथरूम में फिसल गए. कमर की हड्डी टूट गई. अब बिस्तर पर पड़े हैं. मेरा जीवन इसी में व्यतीत हुआ है. यदि मेरी भविष्यवाणी मिथ्या साबित हो जाए तो मैं गणना करना छोड़ दूं,’’ पंडितजी ने अपना रूप दिखलाया.

‘‘नहीं पंडितजी, नहीं, इन की बात का बुरा न मानें. यह तो सठिया गए हैं. आप कुछ उपाय कीजिए न,’’ श्रीमतीजी ने आग्रह किया.

‘‘बहनजी, आप जैसी महिलाओं के कारण ही धरती पर धर्म बचा है. आप के लिए कुछ करना ही होगा,’’ पंडितजी पंचांग पलटते हुए गंभीर स्वर में बोले, ‘‘आज से चौथे दिन प्रात: 6 से 7 के बीच अच्छा मुहूर्त है. इस के लिए मुझे विशेष अनुष्ठान करने होंगे. चिकित्सक को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे, लगभग 10 हजार का व्यय आएगा…’’ पंडितजी स्थिति स्पष्ट करते हुए बोले.

‘‘इस से कुछ कम,’’ श्रीमतीजी शरमाते हुए बोलीं.

‘‘नहीं, बहनजी, धर्म के कामों में हाथ न सिकोड़ें, धन क्या है, हाथ का मैल है. आताजाता रहता है. बालक ने अच्छे समय में जन्म लिया तो ईश्वर छप्पर फाड़ कर देगा. यदि खराब समय में पैदा हुआ तो घर का धन भी चला जाएगा. बहनजी, अधिक विचार मत कीजिए, शीघ्र निर्णय लीजिए,’’ पंडितजी ने समझाते हुए कहा.

‘‘ठीक है, पंडितजी, शेष ग्रह कैसे रहेंगे?’’ श्रीमतीजी ने पूछा.

‘‘3 ग्रह उच्च के रहेंगे, बच्चा राजयोग में होगा. हां, इस कार्य के लिए 5 हजार रुपए स्वागतकक्ष में अग्रिम जमा करा दीजिए, अगला यजमान प्रतीक्षा कर रहा है,’’ पंडितजी ने निर्देश दिए.

‘‘ठीक है, आप की कृपा बनी रहे. बहू, पंडितजी से आशीर्वाद तो ले लो,’’ श्रीमतीजी ने बहू से कहा.

‘‘सौभाग्यवती हो, यशस्वी पुत्र की मां बनो. हां, स्वागतकक्ष में राशि जमा कराना न भूलें,’’ पंडितजी ने आशीर्वाद दिया.

मेरे अलावा सभी ने प्रसन्नता के साथ आदर्श जन्मस्थली से विदाई ली. मेरे मस्तिष्क को एक प्रश्न अभी भी परेशान कर रहा था, सभी कार्य संपन्न हो गए, धन एवं समय दोनों व्यय हुए, सभी प्रसन्न हैं, पर बहू की डाक्टरी जांच अभी तक नहीं हुई थी.

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महिला शराबियों का टापू…

हर वर्ष 26 जून को ‘अन्तर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस ‘ मनाया जाता है. नशीली वस्तुओं जी बी एवं मदिरापान निवारण के लिए ‘सयुंक्त राष्ट्र महासंघ’ ने 7 दिसंबर 1987 को यह पारित किया था. और तब से हर साल लोगों को नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जाता है.

छत्तीसगढ़ में शराब सेवन आजकल महिलाओं में भी अधिक रुप से देखने को मिल रहा है . सामान्यतः लोग यह सोचते हैं कि महिलायें आखिर शराब सेवन कैसे कर सकती हैं. वे तो एक सशक्त गृहिणी एवं कार्यों में लीन रहती हैं. परिवार, बच्चे, रिश्तेदार और घर सम्भालने में व्यस्त रहती हैं. किन्तु इस  सोंच को कुछ विकृत मानसिकता पीछे छोड़ रही हैं. पुरुष से बराबरी और कदम से कदम मिलाकर चलने का अर्थ महिलायें कुछ अन्य ही अर्थ से लगा रही हैं.

छत्तीसगढ़ के लगभग सभी 27 जिलों में महिलाओं एवं युवतियों  में शराब का सेवन अधिकतर रुप से किया जा रहा है. छत्तीसगढ़ राज्य  इसमें कताई पीछे नहीं है. यहां हर 2 घर के बाद तीसरे घर में परिवार की कम से कम 1 महिला या युवती शराब का सेवन कर रही है.

महिलाओं में शराब की बढ़ते प्रचलन के कारण व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में तनाव उत्पन्न हो रहा है. दाम्पत्य जीवन में प्रेम, उल्लास, उत्साह और आपसी तालमेल में कमी हो रही है जिसके कारण परस्पर विरोध और विवाद का वातावरण विद्यमान हो रहा है. अनेक  दम्पतियों के बीच मतभेद इतने बढ़ गये कि तलाक तक हो चुके हैं.

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बहुत सी महिलायें शराब को फैशन या समान्य शौक समझकर पी रही हैं. समाज में शिष्टाचार एवं आवभगत का साधन मानकर नशा कर रही है और अन्य को भी ऐसा करने पर विवश कर रही हैं. जबकि शराब महिलाओं की सेहत पर विशेषतः दिमाग पर ज्यादा दुष्प्रभाव डाल रहा है. शराबी महिलायें अपने आसपास के माहौल से अधिक मतलब नही रखती हैं. सदा अपने ख्यालों में ही रहते हैं. ऐसी महिलायें अपने समाज और परिवार से दूर होती जा रही हैं तथा कई प्रकार के दुर्घटनाओं एवं अनाचार का भी शिकार हो रही हैं. शराब सेवन कर रही आज की  महिलाओं को इस लत एवं कुकृत्य से मुक्त के लिए परिवार व स्वजनों को उसकी मनोस्थिती समझ कर उनका उचित उपचार करना चाहिए ताकि वे परस्पर प्रेम, सहयोग, अपनापन और विश्वास पाकर मय रुपी भंवर से निकल सकें.

आदिवासी अंचल में शराब की बिक्री में छूट

यहां यह बताना भी लाजमी होगा कि छत्तीसगढ़ प्रदेश में बहुतायत रूप से आदिवासी समुदाय का रहवास है एवं छत्तीसगढ़ में पांचवी अनुसूची लागू है. जिसका परिणाम यह है कि स्थिति एवं जीवन की आचार व्यवहार को ध्यान में रखकर आदिवासी समुदाय को शराब के संदर्भ में छूट मिली हुई है. नियम कहता है कि आदिवासी परिवार प्रतिदिन स्वयं के उपयोग के लिए 10 12 लीटर शराब का विनिर्माण कर सकता है, इसका परिणाम यह हुआ है कि छत्तीसगढ़ के जिला रायगढ़ कोरबा अंबिकापुर बस्तर में घर-घर शराब बन रहा है और यह काम विशेष रूप से महिलाएं करती हैं. और यही कारण है कि शराब का सेवन भी महिलाएं कर रही हैं इन्हें विधिवत रोका नहीं जा सकता. मगर इसके लिए जागरूकता अभियान चलाया जा सकता है यह भी सच है कि बहुतेरे आदिवासी शराब से दूर हैं. जिनमें एक नाम पूर्व जिला मंत्री आदिवासी छात्र नेता ननकीराम कंवर एवं बोध राम कंवर का भी है जो कि शराब का कतई सेवन नहीं करते एवं जागरूकता अभियान में भागीदारी करते रहते हैं. सामाजिक संस्थाओं एवं सरकार का यह दायित्व है कि शराब की बुरी लत से बचाने के लिए कुछ नियम बनाया जाए एवं उनका प्रचार-प्रसार हो ताकि महिलाएं मद्यपान से बचें और स्वस्थ जीवन यापन कर सकें.

सामाजिक अपराधों की जड़ बन चुका है शराब

छत्तीसगढ़ प्रदेश में शराब की बहुतायत बिक्री के परिणाम स्वरूप यहां आए दिन जघन्य अपराध घटित हो रहे हैं. हत्या बलात्कार अनाचार शोषण यह निरंतर अखबारों में सुर्खियां प्राप्त करता है इनके पीछे विश्लेषण करें तो मिलता है कि इन अपराधों की जड़ में शराब है. महिलाएं शराब का सेवन करती हैं और खुद गाहे-बगाहे इसका शिकार होते जा रही है. ऐसी एक घटना विगत दिनों जिला मुंगेली के ग्राम देवरी में घटित हुई जहां पति पत्नी दोनों ने शराब का सेवन किया और रात्रि भोजन में चावल का भात नहीं बनाए जाने के प्रश्न पर पति ने पत्नी की हत्या कारित कर दी.

ऐसा ही प्रसंग बिलासपुर जिला के पेंड्रा विकासखंड के ग्राम कुसमी में घटित हुआ जहां पति ने पत्नी की हत्या इसलिए कर दी कि वह लगातार शराब पीकर उसे हलाकान किए रहती थी.

नगरीय महिलाएं बहुत आगे निकल चुकी हैं

हमारा यह प्रसंग अधूरा जाएगा अगर हम शहरी महिलाओं के गतिविधियों पर निगाह नहीं डालते. यह सच सुबह का सामने आ चुका है कि नगर की महिलाएं शिक्षित होने के बावजूद मद्यपान की और बहुत आगे बढ़ चुकी हैं अक्सर शराब के कारण शहरी क्षेत्र में भी अपराध की घटनाएं सुर्खियों में होती हैं. विगत दिनों राजधानी रायपुर के एक विशेष टाउनशिप में एक घर में महिलाओं का जमावड़ा और शराब पार्टी के बाद हंगामा तत्पश्चात मामला पुलिस तक पहुंचा यह सारा घटनाक्रम बताता है कि राजधानी रायपुर हो या अन्य नगर महिलाओं में शराब का चलन बढ़ता चला जा रहा है और छोटी बड़ी पार्टियों में शराब का खुलकर सेवन जारी है. इस संपूर्ण घटनाक्रम में जहां महिलाएं शराब की ओर आगे बढ़ रही हैं उनमें पुरुष भी कदम से कदम मिलाकर साथ दे रहा है. यह प्रारंभिक चरण में तो बड़ा आकर्षक होता है. आगे जाकर परिवार और समाज के लिए घातक ही सिद्ध होता है यह बार-बार अपराध घटित होने के बाद लोगों को समझ में आता है मगर शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

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संस्कारधनी कहे जाने वाले बिलासपुर शहर में महिलाओं की किटी पार्टी में शराब का सेवन एवं नृत्य गान खबर चर्चा में रही है. यह घटनाक्रम आगे चलकर के कब अपराध में बदल जाएगा कौन कह सकता है, जरूरत है मद्यपान को रोकने की… अगर महिलाओं में यह बढ़ता चला गया तो इसका सीधा असर परिवार पर पड़ेगा और आने वाले नौनिहाल इसे सीधे प्रभावित होंगे अब यह हमारे आपके हाथों में है कि हम जागरूक हो और इस बुराई से तौबा करें.

बच्चों का अपना कोना…

दोपहर स्कूल से लौटने के बाद से ही नन्ही रुचि घर से गायब थी. मां परेशान. हर कमरे में देखा. पासपड़ोस में पूछा पर रुचि का कहीं पता न चला. कुछ ही देर बाद रुचि की सहेली की मम्मी भी आईं.

उन की मेधा भी कहीं दिख नहीं रही थी. दोनों महिलाएं अभी सोच ही रही थीं कि क्या किया जाए तभी उन्हें ड्राइंगरूम में धीरेधीरे खुसरपुसर की आवाज आई. जा कर देखा तो ड्राइंगरूम के दरवाजे और शोकेस के बीच बने कोने में दोनों बच्चियां बैठी हंसबोल रही थीं. दोनों अपने में इतनी खोई हुई थीं कि जब मम्मी ने दरवाजा हटाया तो दोनों चौंक गईं. फिर साथ ही बोल पड़ीं, ‘‘अं, मम्मी, जाओ न. यह हमारा घर है.’’

इस प्रकार के दृश्य हम अपने घरों में या अपने आसपास आम देखते हैं. बच्चे घर के किसी कोने में, पलंग या मेज के नीचे, सीढि़यों के नीचे या बगीचे में झाडि़यों, गमलों के पीछे खेलते हैं. यह बच्चों का अपना स्थान है. अपने हक की जगह जिस के लिए आजकल अंगरेजी में ‘स्पेस’ शब्द प्रयोग में आता है. ‘स्पेस’ का अर्थ है कोई भी खाली स्थान, पर आज के ग्लोबलाइजेशन के युग में यह एक बहुअर्थक शब्द बन गया है.

अपना कोई कोना ढूंढ़ना और वहां अपने मित्रों या सहेलियों के संग ‘घरघर’ का खेल रचना एक बहुत पुराना खेल है. इस पर अनुसंधान हो रहे हैं और इन के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डाला जा रहा है, जिस से यह साबित होता है कि बच्चों के यह खेल, जो लोकविधा या लोकपरंपरा का एक अंग हैं, निरर्थक नहीं हैं. यह खेल बच्चों के भावी जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं.

वैसे ‘घरघर’ खेलना प्राय: लड़कियों का खेल है. लगभग 3 वर्ष से 7-8 वर्ष तक की बालिकाएं ये खेल रचाती हैं. छोटे भाई 5-6 वर्ष तक तो बहनों के साथ इस में शामिल होते हैं पर शीघ्र ही बाहरी दुनिया का आकर्षण उन्हें ‘लड़कों’ के खेल सिखाता है और क्रिकेट, गुल्लीडंडा वगैरह की ओर वे मुड़ जाते हैं जबकि लड़कियां अपने ‘निजी कोने’ में संतुष्ट रहती हैं. यहां वह अपनी दुनिया बसाती हैं. ‘घर’ बसता है, खाना पकता है, मातापिता या अड़ोसियोंपड़ोसियों की बातचीत नाटकीय ढंग से वार्तालाप में आती है. गुड्डेगुडि़या का विवाह होता है और एक सुंदर, छोटा सा संसार तैयार हो जाता है. ज्यादातर लड़कियों के इन खेलों में आपसी झगड़ा नहीं होता जबकि बाहर मैदान में लड़के क्रिकेट के खेल में ‘आउट’ होने या न होने को ले कर लड़ रहे होते हैं.

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अपने खेल में मशगूल, दीनदुनिया से बेखबर इन बालिकाओं को चुपचाप देखते रहना बहुत रोचक लगता है. फूलपत्ते ला कर सब्जियां बनती हैं, गुडि़या को नहला कर क्रीमपाउडर लगाया जाता है, लंच तैयार कर के गुडि़या के पिता को दफ्तर भेजा जाता है और फिर पड़ोस की किसी ‘बहनजी’ या ‘चाचीजी’ से घरगृहस्थी संबंधी वार्तालाप चलता है. बीचबीच में खिल- खिलाहट भी होती है.

इस प्रकार के खेल लगभग विश्वभर में प्रचलित हैं. उन के लिए छोटेछोटे बरतन बाजार में मिलते हैं. यहां तक कि अमेरिकन संस्कृति की प्रतीक ‘बार्बी डौल’ के लिए अलमारियां, कपडे़, बरतनों के सेट, फ्रिज, गैस का चूल्हा और आजकल तो नन्हे से माइक्रोवेव ओवन भी उपलब्ध हैं. लड़कियों के इन खेलों में कई बार बडे़ भी शामिल होते हैं और खासकर मां या दादीनानी उन्हें खाना पकाना (झूठमूठ) आदि सिखाती भी हैं.

क्या इन खेलों का कुछ महत्त्व है? फिर, क्या बच्चों को इस प्रकार अपना ‘कोना’, अपना ‘स्पेस’ देना उचित है?

बच्चा जब अपना कोना ढूंढ़ता है तो वह अपनी एक निजी दुनिया तैयार करता है. यहां सबकुछ उस की मरजी के अनुसार चलता है और वह स्वतंत्रता अनुभव करता है. यह स्वतंत्रता उस के शारीरिक, मानसिक और संवेदनात्मक विकास के लिए आवश्यक है. वैसे बालक या बालिका को खेलनेकूदने का अवसर स्कूल में मिलता है और घर आ कर भी मिलता है पर अधिकतर खेलकूद की गतिविधियां पूर्व आयोजित होती हैं और बड़ों की देखरेख में होती हैं. यहां हर निर्णय, खेल का संचालन आदि बच्चा स्वयं करता है.

इस समय उन की कल्पनाशक्ति चरम सीमा पर होती है जो आगे चल कर उन्हें रचनात्मक और सृजनात्मक बनाती है. नोबेल पुरस्कार प्राप्त अंगरेजी के लेखक विलियम गोल्ंिडग अपने कई लेखों में लिखते हैं कि बचपन में एक पेड़ की 2 टहनियों के बीच दुबक कर बैठना उन्हें बहुत सुरक्षित लगता था.

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कई बार भोलेपन में बच्चे अकेलेपन का गलत उपयोग भी कर सकते हैं. पंकज झा के उपन्यास ‘द ब्लू बेडस्प्रेड’ में भाईबहन इसी प्रकार चादर के भीतर अपनी ‘स्पेस’ बना कर बचपन में खेलते हैं जो बाद में अनुचित संबंध में बदलते हैं. बच्चों को बिना वजह डराएं, धमकाएं नहीं पर उन्हें बाहरी खेलों के प्रति भी आकर्षित करें. बच्चों को अपना कोना अवश्य चुनने दें पर ध्यान रखें कि स्थान सुरक्षित हो.

डा. उषा मनोहर       

इस एक्ट्रेस के फैन हैं आयुष्मान खुराना

आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘आर्टिकल 15’ आज यानि 28 जून को रिलीज होने वाली है. इस फिल्म का विषय काफी चर्चा में है. पर इसी बीच आयुष्मान ने खुलासा किया कि वे किस बौलीवुड एक्ट्रेस के फैन है. आयुष्मान खुराना ने बताया कि वें भूमि पेडनेकर के फैन हैं. जिनके साथ वे अब तक दो फिल्मों में काम कर चुके हैं.

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आपको बता दें, आयुष्मान ‘शुभ मंगल सावधान’ और ‘दम लगा के हईशा’ में भूमि संग काम कर चुके हैं. दरअसल ‘बीएफएफ विद वोग- सीजन 3’ में आयुष्मान ने इस बात का खुलासा किया. जब एक्ट्रेस नेहा धूपिया ने आयुष्मान से फेवरेट एक्ट्रेस को लेकर सवाल पूछा. नेहा धूपिया ने आयुष्मान से सवाल किया कि अब तक की सबसे बड़ी डीवा कौन हैं, जिनके साथ आपने काम किया हैं. इसके जवाब में आयुष्मान ने भूमि पेडनेकर का नाम लिया.

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आयुष्मान ने कहा कि अपनी पहली फिल्म में ही भूमि एक डीवा थीं. उन्होंने आगे कहा, वजन कम करने के साथ उनमें डीवा के सारे गुण हैं. बता दें कि आयुष्मान ‘गुलाबो सिताबो’ और ‘ड्रीम गर्ल’ में भी नजर आने वाले हैं.

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