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धर्मपत्नी महिमा: धर्मपत्नी भाग्यम पुरुष चरित्रम

किस्मत भी एक शोध का विषय हो सकता है,अब देखिए ! हमारे मुख्यमंत्री जी की धर्मपत्नी कितनी भाग्यशाली है. दरअसल धर्मपत्नी होती ही भाग्यशाली है. मंत्री जी की पत्नी, मंत्राणी जी, जिलाधीश की पत्नी, मैडम कलेक्टर, पुलिस कप्तान की धर्मपत्नी, मैडम एसपी!! हो जाती है. स्वयमेव. कुछ नहीं करना पड़ता.जहां पहुंच जाए सर आंखों पर बैठा लेते हैं. बड़ी पुरानी संस्कृत की उक्ति है पुरुष भाग्यम, स्त्री चरित्रंम… मुझे लगता है यह मसला बिल्कुल उलट होना चाहिए . इसे किसी धर्मपत्नी द्रोही में रचा होगा. मेरा वश चले तो इसे संसार में इस तरह प्रचालित कर दूं- धर्मपत्नी भाग्यम पुरुष चरित्रम…!

धर्मपत्नी की महिमा का गान अभी तक शास्त्रों में नहीं हुआ है. धर्मपत्नी होना बड़े ही गौरव का विषय है .पत्नी, स्त्री, मिसेज, नारी यह संज्ञाए धर्मपत्नी की महिमा और विराट स्वरूप के समक्ष तुच्छ है. वजन ही नहीं बनता. नारी जैसे ही धर्मपत्नी का अवतरण लेती है महाशक्तिशालिनी बन जाती है .उदाहरण, श्रीमती मुख्यमंत्री है . कल जब वो हमारे शहर आई तो मुख्यमंत्री के आभामंडल, सत्ता शासन के इंद्रजाल से माहौल खुशनुमा बन गया. शहर में एक ही चर्चा थी- मुख्यमंत्री जी की धर्मपत्नी आ रही है.

मैंने मित्र से कहा,- आज माहौल खुशगवार हो गया है.

जरूर आज शुभ दिन है .

उसने कहा- यार ! श्रीमती मुख्यमंत्री आ रही है, पता नहीं है क्या ?

मैंने कहा,- अच्छा ! तभी शहर की फिजा में क्रांतिकारी तब्दीली आई हुई है.

मित्र हंसने लगा, फिर बोला,- पता है, कितना खर्चा हो रहा है ?

मैं बोला, – मुख्यमंत्री जी की धर्मपत्नी है तो कार्यक्रम गरिमामय होगा . समारोह में एकाध लाख तो खर्च समर्थक कर ही डालेंगे. मित्र ने मेरी और कुछ इस तरह देखा जैसे मैं बीहड अंचल का तीर कमान और कोई लंगोटी धारी वनमानुष हूं. उसने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा- ‘मैडम ! के स्वागत में पलके बिछ गई हैं. अखबारों में विज्ञापन छपे हैं.

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यही आठ-दस लाख रुपए के होंगे .मै चोंका, मुंह फटा का फटा रह गया – आठ-दस लाख रुपए के विज्ञापन ! भला कौन छपवायेगा ? मैडम का कोई ओहदा तो है नहीं जो कोई टेंडर पास हो जाएगा. यह तो निरा पागलपन है. मित्र ने उंगली से इशारा कर कहा- देखो ! अखबार सामने पड़े हैं .स्वयं देख लो . हर अखबार मैडम के श्रीमुख और अभिनंदन से भरा पड़ा है.

मैंने असहाय दृष्टि से अखबारों को दूर से ही देख कर कहा- मैं नहीं देखूंगा .

मित्र ने मुस्कुरा कर कहा – क्यों आज घर से ही नहीं निकले क्या. शहर में इतने कार्यक्रम है कहीं शिरकत नहीं की . मैं स्वयं बुदबुदा रहा था- इतने विज्ञापन ? देखूगा तो हार्ट अटैक ना आ जाए .

मित्र ने सुनी अनसुनी कर कहा, – कार्यक्रम गरिमामय रहा. शासकीय विमान से मैडम आई …. भली स्त्री है. अच्छा समय दिया,नेताओं की जगह अब उनकी पत्नियों को ही कार्यक्रमों में बुलाना चाहिए ,एक तो समय पूरा देती हैं,सीधी सरल भावना व्यक्त कर सभी को प्रसन्न अलग कर देती हैं .जबकि नेता और मंत्री इतने पक गए हैं कि कार्यक्रम में ऐसा व्यवहार करने लगते हैं मानो गले में जंजीर पड़ी हो और बैल तुड़ाकर मां की ओर भागता चाहता है.

मैंने कहा – शासकीय प्लेन ? क्या मुख्यमंत्री जी की धर्मपत्नी हो गई, तो कोई मंत्री हो गई , जो शासकीय प्लेन मिल गया ? वह तो मुद्दा बन जाएगा. स्कैंडल हो जाएगा. मित्र के मुख मंडल पर तरस स्पष्ट दिख रहा था- तुम्हारी यही नकारात्मक सोच खुद तुम्हारी ही दुश्मन बनी हुई है. सदैव सकारात्मक दृष्टि रखिए. तुम्हारे आसपास के लोग बड़े बड़े अखबार के मालिक बन गए कि नहीं .

मैंने कहा,- मगर यार ! मैडम सी.एम. भला कैसे शासकीय विमान में आ सकती है.

देखो ! उनके साथ मंत्री भी थे.राजधानी में आला दर्जे के लोग बैठे हैं । सब नियम कानून जानते हैं .मैं ने राहत की सांस ली-ओफ… मैं बेवजह परेशान था . अच्छा ! विमान से उतरी तो क्या नजारा था…

अद्भुत ! हम लोग बड़ी देर तक इंतजार करते रहे .डेढ़ दो घंटे बाद आकाश को चीरता विशालकाय विमान प्रकट हुआ. हवाई पट्टी में खुशी की लहर दौड़ गई. आखिर प्लेन ठहरा, द्वार खुला. मैडम सीएम बाहर आई सबसे पहले कलेक्टर साहब फिर पुलिस कप्तान और फिर हम लोगों ने उनका आत्मीय स्वागत फूल मालाओं से किया. दोस्त ! सच कल का दिन अविस्मरणीय हो गया . मंत्री मिनिस्टर अफसर सभी के कार्यक्रम फ्लाफ हो गए मेरी दृष्टि में.

यह सारा कुछ धर्मपत्नी की महिमा है . गरीब की बीवी मोहल्ले की भौजी हो जाती है . मुख्यमंत्री, कलेक्टर, और उच्चअधिकारियों की धर्मपत्नी दीदी बन जाती है .राखी बंधवा लो… घर तक पहुंच बन गई फिर मंत्री जी और अधिकारी भला अपने मुंह बोले साले का काम करने से इंकार करेंगे.

फिर हंसने लगे- यह हुई न समझदारी की बात .इसीलिए आजकल धर्मपत्नी परिक्रमा का चलन शुरू हुआ है,तुम भी कुछ सीखो. मैं दीर्घ नि :श्वास लेकर उठ खड़ा हुआ.

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फरिश्ता : भाग 1

‘उफ… किस मुसीबत में फंस गया… इससे तो अच्छा मैं वहीं बंगले पर ही रुक जाता… एक तो अंधेरी रात, ऊपर से मूसलाधार बारिश… दूर-दूर तक रोशनी का अता-पता नहीं है…’ डौक्टर सूर्यकांत की झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी.

गांव के कच्चे और कीचड़ भरे रास्ते पर उसे अपनी कार को आगे बढ़ाना भारी पड़ रहा था. विधायक बाबू के फार्महाउस वाले बंगले से निकलते-निकलते उसे शाम हो गयी थी. आसमान पर घने काले बादल घिरने लगे थे. कभी भी बारिश हो सकती थी. विधायक बाबू ने कहा भी था कि रात यहीं रुक जाए, सुबह जाने में आसानी रहेगी… मगर उसकी अपनी जिद…

‘अरे… बस दो-तीन घंटे की तो बात है, शहर पहुंच कर कल के एक जरूरी ऑपरेशन की तैयारी भी करनी है. यहां रुक गया तो सुबह पहुंचने में देर हो जाएगी….’

विधायक बाबू के आग्र्रह को ठुकरा कर वह आखिरकार निकल ही पड़ा… और बस… थोड़ी ही देर में बारिश शुरू हो गयी. फिर जो बारिश ने जोर पकड़ा तो गांव की कच्ची सड़क जो बैलगाड़ियों के आवागमन के कारण जगह-जगह गड्ढों में तब्दील हो गयी थी, कार के लिए खतरनाक साबित होने लगी. विंडस्क्रीन के वाइपर भी पानी का हटा पाने में असमर्थ प्रतीत हो रहे थे. गड्ढे से बचते-बचाते कार हिचकोले खाती किसी तरह आगे बढ़ रही थी. मगर यह कोशिश भी बहुत देर तक चली नहीं. कार का बांया पहिया एक गहरे गड्ढे में धंस ही गया और कार धक्का खा कर रुक गयी.

‘अब लो… मरो इस बारिश में…’ वह बुरी तरह झुंझला उठा. अब तो वह विधायक बाबू के बंगले से भी इतनी दूर आ चुका था कि पैदल वापस लौटना संभव नहीं था और शहर की ओर जाने वाली पक्की सड़क अभी काफी दूर थी. आज ही उसे अपना रेनकोट भी भूलना था. उसने एक बार फिर कार स्टार्ट करने गड्ढे से बाहर खींचने की कोशिश की, मगर सब फिजूल….

मजबूर होकर एक हाथ में टार्च और दूसरे हाथ में अपना डौक्टरी किट लिए डौक्टर सूर्यकांत को कार से बाहर निकलना पड़ा. बाहर घना अंधेरा था. कच्ची सड़क पानी से भरी हुई थी. दूर-दूर तक कोई आदमी नजर नहीं आ रहा था. बारिश की तेज आवाज के बीच कहीं से सियार के रोने की आवाज बार-बार आ रही थी. कभी-कभी जोरदार बिजली की कड़क के साथ चारों ओर फैले खेत दिख जाते थे. टॉर्च की मध्यम रोशनी में वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा. गांव-देहातों में तो वैसे भी लोग दिन ढलते ही खा-पीकर सो जाते हैं.

अचानक बिजली की चमक में उसे दूर किसी झोंपड़ी के होने का अहसास हुआ. वो खेतों के बीच से होता हुआ अंदाजे से उसी दिशा में बढ़ने लगा. खेत की गीली मिट्टी में उसके पैर पिंडलियों तक सन चुके थे. कोई बीस मिनट चलने के बाद वह बमुश्किल उस झोंपड़ी तक पहुंच ही गया. लकड़ी के टूटे-फूटे दरवाजे की झिर्री से उसे रोशनी की महीन किरण निकलती दिखायी दे रही थी. उसने हौले से दरवाजा थपथपाया.

बादलों की तेज गर्जना और बिजली की कड़क में शायद अन्दर सोने वालों को उसकी दस्तक सुनायी नहीं पड़ी. उसने पुन: थपथपाया. झिर्री से आती रोशनी कुछ तेज हुई और कुछ क्षणों में लालटेन लिए मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटी एक 18-19 साल की लड़की ने दरवाजा खोल दिया. पीछे से किसी आदमी का बहुत मध्यम और पीड़ादायक स्वर भी उभरा…

‘कौन है बेटी…?’

‘शायद कोई मुसाफिर हैं बाबा…’ लड़की ने पीछे मुड़कर जवाब दिया और प्रश्नवाचक दृष्टि डौक्टर सूर्यकांत के चेहरे पर गड़ा दी.

‘मैं विधायक बाबू के बंगले से आ रहा था, अचानक गाड़ी खराब हो गयी है… क्या मैं…?’ डॉक्टर सूर्यकांत ने हकलाते हुए उससे निवेदन किया.

लड़की लालटेन लिए कुछ कदम पीछे हो गयी. अंदर से फिर वही स्वर उभरा…

‘अंदर ले आ बेटी… बाहर तो बड़ी भयानक बारिश हो रही है…’

‘हां, बाबा…’ उसने पलट कर जवाब दिया और डौक्टर सूर्यकांत की ओर मुखातिब होकर बोली, ‘आइये…’ वह स्वयं भीतर की ओर मुड़ गयी.

डौक्टर सूर्यकांत उसके पीछे-पीछे एक छोटे से कमरे में पहुंच गया. लड़की ने लालटेन की लौ तेज कर दी और दीवार पर लगे एक कुंडे में उसने लालटेन लटका दी. तेज हवा के झोंके से थरथराती लौ में डॉक्टर उस लड़की को देखता ही रह गया. वह बेहद खूबसूरत और मासूम थी. चिथड़ों में लिपटी बिल्कुल ऐसी लग रही थी जैसे गुदड़ी में लाल छिपा हो.

‘आप तो पूरे भीग गये हैं…’ उसने भोलेपन से कहा.

‘हां, देखिए न, आज ही मैं अपना रेनकोट लाना भूल गया….’

‘आप शहर से आये हैं…?’ उसने पूछा.

‘हां… विधायक बाबू को देखने आया था. वे हार्ट के मरीज हैं. जब भी तकलीफ बढ़ती है तो बुलवा भेजते हैं….’

‘तो क्या आप…?’ वह बेहद आश्चर्य से उसका चेहरा देखने लगी.

‘हां, मैं डॉक्टर हूं…’ लड़की के सवाल का आशय समझ कर डौक्टर सूर्यकांत ने जवाब दिया.

इतना सुनते ही वह लड़की तेजी से अंदर की ओर भाग गयी. डौक्टर सूर्यकांत को अचम्भा हुआ. वह अपना गीला रूमाल निचोड़ता हुआ आगे बढ़ा तो उसे भीतर के कमरे से किसी के सिसकने की आवाज आयी. उसने आगे बढ़कर अधखुले किवाड़ से अंदर झांका. वह लड़की एक पलंग के पायताने बैठी सिसक रही थी. पलंग पर एक जीर्णशीर्ण वृद्ध पड़ा था, जिसकी सांसें काफी तेज चल रही थीं. अपनी उखड़ी हुई सांसों के साथ वह कह रहा था…

‘चिन्ता न कर बेटा… मैं ठीक हो जाऊंगा… तू तो नाहक इतना परेशान होती है… चुप हो जा…’

डौक्टर को वृद्ध की हालत काफी गंभीर लगी. वह किवाड़ लांघते हुए अंदर पहुंच गया.

‘क्या इनकी तबियत…?’

लड़की ने आंसुओं में डूबा चेहरा उठाया और आंसू पोंछते हुए उठ खड़ी हुई.

‘डौक्टर साहब, ये मेरे बाबा हैं… इनके सिवा मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है… इन्हें बचा लीहिए…’ वह रोते-रोते उसके कदमों पर झुक गयी.

डौक्टर सूर्यकांत उसकी कातर मांग से भीतर तक सिहर गया. उसने हाथ बढ़ा कर उसे ऊपर उठाया. वह बुरी तरह फफक रही थी.

‘परेशान मत हो… अब मैं आ गया हूं… मैं देखता हूं… तुम जाओ, बाहर से मेरा बैग उठा लाओ.’

वह दौड़ती हुई कमरे के बाहर चली गयी. डॉक्टर सूर्यकांत ने वृद्ध की नब्ज देखी.

‘अरे बेटा… मेरी तो अब उम्र हो चली है… (खों-खों)… मेरे प्राण तो बस इस बच्ची में अटके हैं…’

‘आपको यह रोग कब से है?’ उसने वृद्ध से पूछा.

‘अब तो तीन साल हो गये… पहले तो सिर्फ खांसी आती थी… गांव के वैद्य से दवा ली, कोई फर्क नहीं पड़ा. अब तो बुखार बना ही रहता है… कई बार खून की उल्टियां भी हो चुकी हैं…’

वो पीछे बैग लिये खड़ी थी. डौक्टर सूर्यकांत ने बैग लिया और आला निकाल कर वृद्ध की छाती जांचने लगा.

‘कोई ऐलोपैथिक दवा लेते हैं?’ उसने वृद्ध से पूछा.

‘अरे बेटा… यहां दो रोटी बड़ी मुश्किल से जुट पाती है… दवा-दारू तो बस सपना है गरीबों का…’

‘अभी भी देर नहीं हुई है… सही दवाएं और अच्छी खुराक मिले तो आप फिर से भले-चंगे हो जाएंगे…’ डौक्टर ने उनका हाथ थपथपाते हुए कहा.

बूढ़े के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान खिंच आयी. उसने अपनी बेटी की ओर देखा.

‘देख बेटी… कैसे दिलासा दे रहे हैैं… अरे, डौक्टर साहब, ये रोग तो अब मेरी जान लेकर जाएगा.’

‘आपकी इसी सोच ने शायद आपको ज्यादा बीमार बना दिया है. ऐसा नहीं है कि टीबी ठीक नहीं हो सकती. यह बीमारी तो जड़ से ठीक हो जाती है, बशर्ते आप समय पर दवाएं और अच्छी खुराक लेते रहें.’

‘मगर बेटा…’ बूढ़ा शायद उसे अपनी गरीबी का अहसास कराना चाहता था.

‘मगर-वगर कुछ नहीं… अब मैं आ गया हूं… मैं आपका इलाज करूंगा… मैं लगभग हर हफ्ते विधायक बाबू को देखने इधर आता हूं… लौटते में आपको भी देखता जाऊंगा….’

‘मगर आपकी फीस…?’

डौक्टर हंसा, ‘मेरी फीस बस इतनी है कि अब आप निराशावादी बातें न करके खुश रहने की कोशिश करेंगे… क्यों ठीक है न?’ उसने पीछे मुड़ कर लड़की के चेहरे की ओर देखा.

उसकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू झिलमिला रहे थे. डौक्टर सूर्यकांत ने बैग से एक इंजेक्शन निकाल कर वृद्ध को लगाया.

‘कल मैं किसी के हाथ दवाएं भिजवा दूंगा… आपका नाम…?’

‘मेरा नाम काशीनाथ है बेटा… विधायक बाबू के स्कूल में ही पहले मास्टर था. जबसे यह रोग लगा है, काम-धंधा भी छूट गया. ये मेरी बेटी पूनम है. मां तो इसकी बचपन में ही स्वर्ग सिधार गयी… किसी तरह पालपोस कर बड़ा किया… अब इसी में जान अटकी है… बस, किसी तरह इसके हाथ पीले हो जाएं, तो चैन से मर सकूंगा….’ वृद्ध की आवाज भरभराने लगी.

‘सब ठीक हो जाएगा… पहले आप अच्छे तो हो जाइये…’ डौक्टर ने फिर सांत्वना दी.

‘देख बेटा, डौक्टर साहब भीग कर आये हैं, जा जरा गुड़ की चाय ही बना ले… और अगर कुछ रोटी पड़ी हो तो…’ वृद्ध ने अपनी बेटी की ओर देखकर कहा.

‘जी बाबा…’ वह कहते हुए तेजी से रसोई की ओर चली गयी.

(धारावाहिक के अगले भाग में पढ़िये कि गरीब के घर पर अचानक फरिश्ते की तरह प्रकट होने वाले डौक्टर सूर्यकांत ने ऐसा क्या किया कि पूनम फूट-फूट कर रो पड़ी)

अंधविश्वास डोसा किंग का

डोसा किंग के नाम से मशहूर हुए राजगोपाल की कहानी बेहद दिलचस्प है. उन की कहानी से प्रेरणा भी मिलती है और सबक भी. प्रेरणा यह कि अगर आप ठान लें कि आप को जिंदगी में कुछ कर गुजरना है और इस के लिए जीजान से जुट जाएं तो कोई आप को रोक नहीं सकता. और सबक यह मिलता है कि अगर आप पंडे, पुजारियों, तांत्रिकों और ज्योतिषियों के जाल में उलझ गए तो उस से कोई आप को निकाल नहीं सकता, फिर आप उसी में छटपटा कर दम तोड़ने को मजबूर हो जाते हैं.

देश में ऐसे लोगों की भरमार है जो कामयाब तो होते हैं अपनी बुद्धि, मेहनत और लगन के चलते लेकिन इस का श्रेय देते हैं धर्म और उस के पाखंडों को क्योंकि उन के दिलोदिमाग में यह बात गहरे तक बैठी होती है कि आदमी तो निमित्त मात्र है, देता तो ऊपरवाला है और इस के लिए उस के नीचे बैठे दलालों की खुशामद करना जरूरी है.

हर किसी की ख्वाहिश अपार दौलत और शोहरत हासिल करना होती है.

उसे पूरा करने के लोगों के तौरतरीके अलगअलग होते हैं. लेकिन अधिकतर मामलों में वे भगवान से शुरू हो कर भगवान पर ही आ कर खत्म हो जाते हैं. धर्मग्रंथों में चमत्कारी किस्सेकहानियों की भरमार है जिन्हें देख लगता है कि अमीर बनने के लिए मेहनत की नहीं, बल्कि तांत्रिकों, पंडों, पुजारियों और ज्योतिषियों की ज्यादा जरूरत है, जो तरहतरह के उपाय बता कर यह सपना पूरा करा सकते हैं.

अंधविश्वासों के चक्कर में खुद का हो न हो लेकिन इन दुकानदारों का जरूर फायदा होता है जो कई बार अपने यजमान यानी क्लाइंट को ऐसी जगह ले जा कर छोड़ने से भी बाज नहीं आते जहां से हरेक रास्ता बरबादी की तरफ जाता है.

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एक प्रेरणा एक सबक

पी राजगोपाल का जन्म साल 1947 में चेन्नई के नजदीक एक गांव पुन्नैयदी, जिस का नाम अब पुननई नगर है, में हुआ था. राजगोपाल के पिता किसान थे और प्याज की खेती करते थे. पर इस से 9 सदस्यों वाले परिवार को पेटभर खाना पूरी तरह नहीं मिल पाता था.

राजगोपाल महत्त्वाकांक्षी थे और मेहनती भी. लिहाजा, पैसा कमाने की गरज से वे स्कूली पढ़ाई छोड़ कर चेन्नई आ गए. यहां उन्होंने अपने गुजारे के लिए होटलों में क्लीनर का काम शुरू किया. यानी कपप्लेट धोने लगे, झूठे बरतन उठा कर, टेबलें साफ करने लगे. थोड़ा पैसा इकट्ठा हुआ तो उन्होंने किराने की एक छोटी सी दुकान अशोक नगर इलाके में खोल ली, जो चल निकली. फिर उन्होंने उसे डिपार्टमैंटल स्टोर की शक्ल दे दी.

मगर राजगोपाल इतने से संतुष्ट नहीं हुए. एक ज्योतिषी, जो अकसर उन की दुकान पर आता रहता था, की सलाह पर उन्होंने बंद होता एक रैस्टोरैंट खरीद लिया. अब तक व्यवसाय के बहुत से गुर सीख चुके राजगोपाल को समझ आ गया था कि ग्राहक पैसे देता है तो एवज में अच्छा खाना भी चाहता है. अपने रैस्टोरैंट में उन्होंने साफसफाई पर खास ध्यान दिया और अच्छे तेलमसालों का इस्तेमाल करना शुरू किया.

तब उन्होंने एक रुपए में भरपेट भोजन का फंडा चलाया था, जो शुरुआती दौर में तो उन्हें महंगा पड़ा लेकिन जल्द ही घाटे की जगह फायदा होने लगा. इस की कई वजहें थीं, मसलन साफसुथरा रैस्टोरैंट, स्वच्छता और कर्मचारियों के साथ दोस्ताना व्यवहार. जायकेदार खाना और लजीज डोसा तो वे परोसते ही थे.

70 के दशक में न केवल चेन्नई बल्कि पूरे दक्षिण भारत में छुआछूत चरम पर था. तब 4 वर्षों  बाद राजगोपाल ने केवल ब्राह्मणों के लिए एक शाकाहारी भोजनालय की शुरुआत की. यह भी चल निकला तो उन्होंने चेन्नई के केके नगर में सवर्णा भवन के नाम से पहला रैस्टोरैंट खोला.

उन दिनों पैसा कमाने के लिए राजगोपाल हाड़तोड़ मेहनत कर रहे थे. इसलिए उन्हें कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा. सवर्णा सफाई और गुणवत्ता का पर्याय माना जाने लगा. देखते ही देखते उन्होंने सवर्णा भवन की एक लंबीचौड़ी शृंखला खड़ी कर दी. चेन्नई में जिस किसी का मन घर से बाहर खाना खाने का होता था तो उस की पहली पसंद सवर्णा ही होती थी.

ज्यादा पैसा कमाने का जनून

राजगोपाल के लिए अब पैसों से ज्यादा अहम व्यवसाय को विस्तार देना हो चला था. वे एक जनून में जी रहे थे कि कैसे भी हो और भी ज्यादा पैसा कमाना है. लेकिन एक गलती वे हर बार कर रहे थे कि बिना अपने ज्योतिषी की सलाह के वे कुछ नहीं करते थे. सवर्णा के चेन्नई में 20 आउटलेट खुले और सभी खूब चलने लगे.

उन के रैस्टोरैंट का डोसा इतना मशहूर हो गया कि इस की धमक दिल्ली होते हुए विदेशों तक जा पहुंची. साल 2000 में राजगोपाल ने दुबई में अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय रैस्टोरैंट शुरू किया. इस की सफलता के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया सहित 23 देशों में सवर्णा भवन कामयाबी के झंडे गाड़ने लगा. इन में खाड़ी के सभी प्रमुख देश शामिल हैं.

बचपन और किशोरावस्था में कौड़ीकौड़ी को मुहताज रहे राजगोपाल अब करोड़ोंअरबों में खेलने लगे. साल 2018 आतेआते उन का कारोबार 300 करोड़ रुपयों से भी ज्यादा का हो गया था.

जाने क्यों राजगोपाल यह मानने को कभी तैयार नहीं हुए कि अरबों की बादशाहत उन्होंने अपने दम पर खड़ी की है. उलटे, इस का श्रेय वे अपने ज्योतिषी और भगवान मुरुगा को देते थे. देश, विदेश के सभी सवर्णा भवनों के काउंटर्स और होटलों में उन के ज्योतिषी और मुरुगा की भव्य तसवीरें जरूर होती थीं. ज्योतिषी की सलाह पर ही वे मंदिरों में दिल खोल कर दान देते थे और, और पैसा आने की वजह भी इसी दानपुण्य को मानने लगे थे.

इस में कोई शक नहीं कि वे अपने कर्मचारियों का पूरा खयाल रखते थे और उन्हें बाजार से ज्यादा पगार व सहूलियतें देते थे. चिकित्सा सुविधा, बच्चों की पढ़ाई और शादी के लिए अलग से पैसे देने के अलावा कर्मचारियों को घर बनाने को भी पैसा या किराया वे देते थे. चूंकि खुद गरीबी भुगत चुके थे, इसलिए अपने कर्मचारियों का खास खयाल उन्होंने रखा. कोई भी छोटाबड़ा कर्मचारी उन से सीधे मिल कर अपनी बात कह सकता था. इसी खूबी के चलते सवर्णा भवन के कर्मचारी उन्हें अन्नाची यानी बड़ा भाई कहते थे और पूरी ईमानदारी व मेहनत के साथ काम करते थे.

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हवस, अंधविश्वास और ज्योतिषी

राजगोपाल व्यवसाय में तो लगातार कामयाब हो रहे थे लेकिन उन का पारिवारिक जीवन सफल नहीं हो पाया. उन्होंने 2 शादियां कीं, लेकिन दोनों ही पत्नियों से उन की पटरी नहीं बैठी.

साल 2001 में राजगोपाल ने तीसरी शादी करने का फैसला ले लिया. इस की सलाह भी उन्हें उन के ज्योतिषी ने ही दी थी. बात बड़ी अंधविश्वासी और बेहूदी है कि ज्योतिषी ने शर्त यह रखी थी कि अगर वे दुनिया का सब से अमीर आदमी बनने का अपना सपना पूरा करना चाहते हैं तो उन्हें तीसरी शादी जीवाज्योति से करनी पड़ेगी.

जीवाज्योति उन के एक आउटलेट के एक सहायक मैनेजर की बेटी थी जो अपने बड़े भाई के गणित के टीचर, जिस का नाम प्रिंस शांताकुमार था, से प्यार करती थी. वह गई थी इस अन्नाची के पास पैसों की मदद मांगने जिस से वह और शांताकुमार अपनी ट्रैवल एजेंसी शुरू कर सकें. जैसे ही राजगोपाल ने 20 वर्षीया खूबसूरत कमसिन जीवाज्योति को देखा, तो वे उस पर लट्टू हो गए. उन के ज्योतिषी ने इस अधेड़ की वासना को भांपते कैसे भी हो उस से ही शादी करने की सलाह दे डाली. ज्योतिषी की सलाह पर ही वे सफेद कपड़े पहनने लगे थे और माथे पर चंदन का बड़ा टीका लगाने लगे थे.

राजगोपाल ने जीवाज्योति की मदद तो की लेकिन उस के सामने शादी की भी पेशकश कर डाली. तब राजगोपाल की उम्र 53 वर्ष थी और वे देखने में हट्टेकट्टे भी लगते थे. जीवाज्योति की जगह कोई भी लड़की होती तो तय है इस कामयाब अरबपति से शादी करने की बाबत हां कहने में एक सैकंड भी न लगाती, लेकिन, वह चूंकि शांताकुमार से प्यार करती थी, और दोनों शादी का भी फैसला कर चुके थे, इसलिए उस ने विनम्रतापूर्वक न कह दिया.

इस न को वासना की आग में जल रहे राजगोपाल बरदाश्त नहीं कर पाए और हाथ धो कर जीवाज्योति के पीछे पड़ गए. ज्योतिषी की सलाह पर उन्होंने जीवाज्योति पर काला जादू भी कराया और व्यक्तिगत स्तर पर नएनए प्रेमी की तरह उसे लुभाने के लिए गहने और महंगेमहंगे तोहफे भी भेजने लगे. लेकिन साम, दाम, दंड और भेद चारों काम नहीं आए तो राजगोपाल ने जीवाज्योति से शादी करने का एक खतरनाक फैसला न केवल ले लिया, बल्कि उस पर अमल भी कर डाला.

उस वक्त जीवाज्योति और शांताकुमार शादी कर चुके थे. राजगोपाल की हालत ‘डर’ फिल्म के शाहरुख खान की तरह हो गई थी जो पूरी फिल्म में नायिका जूही चावला को तरहतरह से डराता रहता है.

27 अक्तूबर, 2001 को राजगोपाल ने अपने कुछ विश्वसनीय कर्मचारियों की मदद से जीवाज्योति और शांताकुमार को अगवा कर डाला. फिर 31 अक्तूबर को शांताकुमार की लाश कोडैकनाल स्थित टाइगर सैल के जंगल में मिली. विधवा हो गई जीवाज्योति ने अपने पति की हत्या का जिम्मेदार राजगोपाल को ठहराते कानूनी कार्यवाही शुरू की तो साल 2004 में चेन्नई की एक निचली अदालत ने उन्हें और उन के 8 सहयोगियों को 10 साल की सजा सुना दी.

राजगोपाल अब तक ज्योतिषी के प्रताप और पैसों व अपने रसूख के गरूर में थे, लेकिन सजा का फैसला सुनते ही उन के पैरोंतले जमीन खिसक गई. उन्होंंने मद्रास हाईकोर्ट में अपील की. लेकिन हुआ उलटा. 2009 में हाईकोर्ट ने उन की 10 साल की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया.

हालांकि इस दौरान सवर्णा भवन की आमदनी और कारोबार पर कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन सुप्रीम कोर्ट गए राजगोपाल को उस वक्त करारा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने भी उन की सजा बरकरार रखते उन्हें इसी साल मार्च में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया.

बीती 7 जुलाई को राजगोपाल स्टै्रचर पर सुप्रीम कोर्ट यह आस लिए पहुंचे थे कि शायद सुप्रीम कोर्ट रहम खा कर उन्हें जमानत और मुहलत दे दे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. आखिरकार, 18 जुलाई को चेन्नई में ही उन की मौत हो गई. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन के बेटे सरवनन की यह अपील मान ली थी कि उस के पिता को सरकारी अस्पताल के बजाय प्र्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने की इजाजत दी जाए.

खुली ज्योतिष की पोल

पी राजगोपाल की जिंदगी की कहानी वाकई फिल्मों सरीखी है जिस में एक गरीब किसान का बेटा शहर आया और अपनी मेहनत के दम पर अरबपति बन गया. वह कू्रर नहीं था लेकिन जिस ज्योतिष और ज्योतिषी को वह अपनी सफलता का श्रेय देता रहा आखिरकार उन्होंने ही उसे मौत के मुंह में धकेल दिया.

क्यों उन के ज्योतिषी ने उन्हें यह नहीं बताया कि उन के हाथों हत्या जैसा जघन्य अपराध होगा और वे जेल भी जाएंगे? क्यों ज्योतिषी उन्हें यह नहीं बता पाया कि जीवाज्योति से उन की शादी नहीं हो पाएगी फिर भले ही लाख जादूटोना वे कर लें? और क्यों किसी ज्योतिषी ने उन्हें यह भी नहीं बताया कि उन की पहली दोनों शादियां असफल होंगी?

राजगोपाल वासना से ज्यादा अंधविश्वास का शिकार थे. इस का भी फायदा उठाने में उन के ज्योतिषी ने कोई चूक नहीं की और जीवाज्योति के प्रति उन की वासना भड़का कर खूब पैसा ऐंठा. जिंदगीभर राजगोपाल अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा ज्योतिषी की सलाह पर दान करते रहे. मुमकिन है इस में भी ज्योतिषी का मंदिरों के पंडों और प्रबंधन से कमीशन बंधा रहा हो.

ये वही ज्योतिषी हैं जो इस जन्म के साथ अगले और पिछले जन्मों के बारे में बताने का भी दावा करते हैं. इन त्रिकालदर्शियों का राज पूरे देश में है. इन की गिरफ्त में झुग्गीझोंपड़ी वालों से ले कर देश के रईस घराने तक हैं. राजगोपाल इन के बिछाए जाल से खुद को बचा कर नहीं रख पाए तो यह एक सबक है कि ज्योतिष में कोई दम या सचाई होती तो उन्हें हत्या न करनी पड़ती, मुकदमा नहीं लड़ना पड़ता और जेल भी नहीं जाना पड़ता.

दान की गई अपार राशि अगर राजगोपाल अपने व्यवसाय विस्तार में लगाते तो तय है देश के रईसों में भी शुमार हो सकते थे. लेकिन ज्योतिष और अंधविश्वासों के मकड़जाल में फंसे वे जिंदगीभर छटपटाते रहे और कभी उन्हें सुकून नहीं मिला.

उन के ज्योतिषी का कुछ बिगड़ेगा, ऐसा लग नहीं रहा, क्योंकि किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जा रहा कि उन्होंने तमाम काम उसी की सलाह पर किए, इसलिए उसे भी सहअभियुक्त बनाया जाए, ताकि कानूनीतौर पर भी ज्योतिष का पाखंड उजागर हो सके. लेकिन जब हर कोई आंख बंद कर ज्योतिषियों पर भरोसा करता है तो तय है अंधविश्वास और ग्रहनक्षत्रों का बाजार फलताफूलता रहेगा और कहीं कोई नया पी राजगोपाल इन धूर्त, चालाक और पाखंडियों का शिकार बन रहा होगा.

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यहां संजय दत्त अभिनीत चर्चित फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ का वह अंतिम दृश्य उल्लेखनीय है जिस में ज्योतिषी बने सौरभ शुक्ला पर संजय दत्त रिवौल्वर तान कर पूछता है कि बता, अगले पल तेरा क्या होने वाला है. इस पर सौरभ शुक्ला मान लेता है, उस का यजमान कुलभूषण खरबंदा और फिल्म के तमाम किरदारों सहित दर्शक भी मान लेते हैं कि ज्योतिष बकवास है.

लेकिन, क्या आम लोग इस सच को स्वीकारने की हिम्मत दिखाएंगे?

मुखबिर

शहर भर में यह अफवाह फैल गई कि मुखबिरों को मौत के घाट उतारा जा रहा है. हालांकि पिछले 50 सालों से घाटी में हत्या की एक भी वारदात सुनने में नहीं आई थी पर अब आएदिन 5-10 आदमी गोलियों के शिकार हो रहे थे.

हर व्यक्ति के चेहरे पर आतंक और भय के चलते मुर्दनी छाई हुई थी. अपनेआप पर विश्वास करना कठिन हो रहा था. हर कोई अपनेआप से प्रश्न पूछता:

‘कहीं मुखबिरों की सूची में मेरा नाम तो नहीं? किसी पुलिस वाले से मेरी जानपहचान तो नहीं? या फिर मुझे किसी सिपाही से बातें करते हुए किसी ने देखा तो नहीं?’

उस की चिंता बढ़ जाती.

‘मेरे राजनीतिक संबंधों के बारे में किसी को पता तो नहीं?’ यह सोचसोच कर दिल की धड़कनें और भी तेज हो जातीं.

‘किसी उग्रवादी से मेरी दुश्मनी तो नहीं?’ यह सोच कर कइयों का रक्तचाप बढ़ने लगता और वे अगले दिन आंख खुलते ही स्थानीय अखबारों के दफ्तर में जा कर विज्ञापन के माध्यम से स्पष्ट करते कि वे किसी राजनीतिक पार्टी से संबंधित नहीं हैं और न ही सूचनाओं के आदान- प्रदान से उन का कोई लेनादेना है. इन सब कोशिशों के बावजूद उन्हें मानसिक संतोष हासिल नहीं होता था. सारे वातावरण में बेचैनी और अस्थिरता फैली हुई थी.

मौत इतनी भयानक नहीं होती जितनी उस की आहट.

हर कोई मौत के इस जाल से बच निकलने के रास्ते तलाश रहा था.

किसी का माफीनामा प्रकाशित करवाना, किसी का अपनी सफाई में बयान छपवाना तो चल ही रहा था मगर कुछ तो घाटी छोड़ कर ही जा चुके थे.

नीलकंठ ने ऐसा कुछ भी नहीं किया. उन्होंने अपने जीवन के 65 साल संतोष और संयम से व्यतीत किए थे. विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वे अपनी ही धुन में जिए जा रहे थे.

नीलकंठ का पुराना सा मकान था जिस की दीवारें मिट्टी से लिपीपुती थीं और मकान हब्बाकदल में झेलम नदी के किनारे स्थित था.

सारे नगर में हब्बाकदल ही एक ऐसी जगह थी जहां मुरगे की पहली बांग के साथ ही जिंदगी चहक उठती. इधर मंदिरों की घंटियां बजतीं और उधर मसजिदों से अजानें गूंजतीं. पुल के दोनों ओर जहांतहां खोमचे वालों की कतारें लग जातीं. चीखतेचिल्लाते सब्जी बेचने वाले, मछली बेचने वाले और मोलभाव करते हुए खरीदार.

एक ओर नानबाइयों के चंगेरों (चंगेरनान रखने का विशेष प्रकार का बरतन) से सोंधीसोंधी खुशबू उठती और दूसरी तरफ हलवाई के कड़ाहों से दूध की महक. फिर दिन भर घोड़ों की टापों की आवाजें, साइकिल की ट्रिनट्रिन और आटोरिकशा की गड़गड़ाहट से पूरा माहौल गरम रहता.

यह कोलाहल आधी रात तक भी थमने का नाम नहीं लेता. स्कूल और कालेज टाइम पर इस स्थान की रौनक ही कुछ और होती. सफेद कुरते और सलवार से सुसज्जित अप्सराओं के झुंड के झुंड और उन का पीछा करते हुए छैलछबीले नौजवान हर पल छेड़छाड़ की ताक में लगे रहते. मौका मिला नहीं कि उन्होंने फब्तियां कसनी शुरू कीं और आगे चलती हुई लड़कियों के चेहरों पर पसीने की बूंदें उभर आतीं.

आज नीलकंठ न जाने क्यों गहरी सोच में डूबे हुए थे. उन की बूढ़ी पत्नी अरुंधती ने हुक्के में नल का ताजा पानी भर दिया था. नीलकंठ ने चिलम में तंबाकू डाला और फिर अपनी कांगड़ी (गरमी पाने के लिए छोटी सी अंगीठी) में से 2-3 अंगारे निकाल कर उस पर रख दिए. उन के मुंह से धुएं के बादल छूटने लगे और वे शीघ्र ही विचारमग्न हो गए.

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अपने विवाह के दिन नीलकंठ को केवल पुल पार करने की जरूरत पड़ी थी. अरुंधती का मकान दरिया के उस पार था. खिड़की से वे अपनी होने वाली पत्नी का मकान साफतौर पर देख सकते थे. दोनों मकानों के बीच झेलम नदी अपनी चिरपरिचित आवाज से बहती चली जा रही थी.

छोटेमोटे घरेलू काम निबटा कर अरुंधती भी पास ही आ कर बैठ गई.

‘‘समय कैसे बीतता चला जाता है, मालूम भी नहीं होता. देखतेदेखते हमारे विवाह को 45 साल बीत गए,’’ नीलकंठ अरुंधती के चेहरे के उतारचढ़ाव को देखते हुए बोले.

‘‘आप को तो मजाक सूझ रहा है. भला आज विवाह की याद कैसे आ गई?’’ अरुंधती को आश्चर्य हुआ.

‘‘बस, यों ही. तुम्हें याद है आज कौन सी तारीख है?’’

‘‘इस उम्र में तारीख कौन याद रखता है जी. मुझे तो अपना वजूद भी गत साल के कैलेंडर सा लगता है, जो दीवार पर इसलिए टंगा रहता है क्योंकि उस पर किसी की तसवीर होती है जबकि वर्ष बीतते ही कैलेंडर कागज के टुकड़े से ज्यादा महत्त्व नहीं रखता. आप को नहीं लगता कि हम ऐसे ही कागजी कैलेंडर बन कर रह गए हैं?’’

‘‘तुम सच कह रही हो, अरु. हम भी दीवार पर टंगे हुए उन फटेपुराने कैलेंडरों की भांति अपने अंत की ही प्रतीक्षा तो कर रहे हैं.’’

दुबलीपतली अरुंधती को याद आया कि उस ने हीटर पर कहवा चढ़ा रखा है. शायद अब तक उबल गया होगा. वह सोचने लगी और दीवार का सहारा ले कर उठ खड़ी हुई. फिर 2 खासू (कांसे के प्याले) और उबलती चाय की केतली उठा कर ले आई. नीलकंठ ने हुक्के की नली जमीन पर रख दी और अपने हाथ से खासू पकड़ लिया. अरुंधती ने खासू में गरम चाय उड़ेल दी.

‘‘अरु, याद है जब शादी से पहले मैं अपनी छत पर चढ़ कर तुम्हें घंटों निहारता रहता था.’’

‘‘आज आप को क्या हो गया है. कैसी बहकीबहकी बातें कर रहे हैं आप,’’ पति को टोक कर अरुंधती स्वयं भी यौवन की उस भूलभुलैया में खो गई.

आयु में अरुंधती अपने पति से केवल 5 साल छोटी थी मगर पिछले 10 साल से गठिया ने आ दबोचा था. इसी कारण उस के हाथों की उंगलियों में टेढ़ापन आ चुका था और सूजन भी पैदा हो गई थी. जाड़े में हालत बद से बदतर हो जाती. उठनेबैठने में भी तकलीफ होती मगर लाचार थी. आखिर घर का काम कौन करता.

‘‘बहुत दिनों से मेरी दाहिनी आंख फड़क रही है. मालूम नहीं कौन सी मुसीबत आने वाली है?’’ अरुंधती ने चटाई से घास का एक तिनका तोड़ा फिर उसे जीभ से छुआ कर अपनी दाहिनी आंख पर इस विश्वास के साथ चिपका दिया कि आंख का फड़कना शीघ्र बंद हो जाएगा.

‘‘अरे अरु, बेकार में परेशान हो रही हो. होनी तो हो कर ही रहेगी,’’ नीलकंठ के स्वर में उदासी थी.

अरुंधती ने इस से पहले कभी अपने पति को इतना चिंतित नहीं देखा था. बारबार पूछने के बावजूद उसे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला. वह मन ही मन कुढ़ती रही. बहुत दिनों से वह महसूस कर रही थी कि नीलकंठ शाम होते ही अपने मकान की खिड़कियां और दरवाजे बंद कर लेते हैं और बारबार इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे ठीक तरह से बंद हो गए हैं या नहीं. कभीकभी उठ कर खिड़की के परदों को सावधानी से हटाते और बाहर हो रही हलचल की टोह लेते. वहां फौजी गाडि़यों और जीपों की आवाजाही या फिर गश्ती दस्तों की पदचाप के अलावा और कुछ भी सुनाई न देता.

‘‘आप इतना क्यों घबरा रहे हैं? सब ठीक हो जाएगा,’’ अरुंधती अपने पति को ढाढ़स बंधाने का प्रयत्न करती.

‘‘मैं घबरा नहीं रहा हूं मगर अरु, तुम्हें नहीं मालूम, हालात बहुत बिगड़ चुके हैं. हर जगह मौत का तांडव हो रहा है.’’

अरुंधती को अपनी जवानी के वे दिन याद आए जब कश्मीर की वादी पर कबायलियों ने आक्रमण किया था. उस समय वह सिर्फ 18 साल की थी. आएदिन  लूटपाट, हिंसा और बलात्कार की दिल दहला देने वाली घटनाएं घट रही थीं.

एक दिन श्रीनगर शहर में सूचना मिली कि कबायलियों ने बारामुला में हजारों निहत्थे मासूम लोगों को मौत के घाट उतार दिया है. स्थानीय कानवेंट में घुस कर उन्होंने ईसाई औरतों को अपनी वासना का शिकार बनाया और अब वे श्रीनगर की ओर चले आ रहे हैं.

शहर की महिलाओं, खासकर लड़कियों ने निश्चय कर लिया कि अपनी इज्जत खोने से बेहतर है कि बिजली की नंगी तारों से लटक कर जान दी जाए. मगर नियति का खेल देखिए, ठीक उसी दिन सारे नगर में बिजली गुल हो गई और मौत उन की पहुंच से बहुत दूर चली गई.

फिर एक दिन सूचना मिली कि भारतीय फौज ने कबायली आक्रमण- कारियों को खदेड़ दिया और वे दुम दबा कर भाग गए. सभी ने चैन की सांस ली. अरुंधती ने उन दिनों काफी साहस और धैर्य से काम लिया था. इस पर वह आज भी गर्व करती है. वह बातबात पर अपनी हिम्मत का दम भरती थी मगर अब फिर वैसा ही समय आ गया था, वह अपने पति को ढाढ़स बंधाते हुए बोली, ‘‘घबराने से कोई लाभ नहीं जी. जैसेतैसे झेल लेंगे इस दौर को भी. आप दिल छोटा न करें.’’

नीलकंठ ने अपनी पत्नी का साहसपूर्ण उत्तर सुन कर चैन की सांस ली. परंतु दूसरे ही पल उन्हें अपनी पत्नी के भोलेपन और सादगी पर दया आई. वे प्रतिदिन सुबह उठ कर समाचारपत्रों की एकएक पंक्ति चाट लेते. पत्रपत्रिकाएं ही ऐसा माध्यम थीं जो बाहर की दुनिया से उन का संपर्क जोड़े रखती थीं. अखबारों के पन्ने दिल दहलाने वाले समाचारों से रंगे रहते. दोनों पिंजरे में परकटे पक्षियों की भांति छटपटाते रहते.

‘‘यह सब आप ही का कियाधरा है. वीरू ने कितनी बार अमेरिका बुलाया. हर बार आप ने मना कर दिया. जाने ऐसा कौन सा सरेस लगा है जिस ने आप को इस जगह से चिपकाए रखा है. माना उस की पत्नी अमेरिकन है तो क्या हुआ. हमें उस से क्या लेनादेना है. आखिर घर से निकाल तो न देती. किसी कोने में हम भी पड़े रहते,’’ अरुंधती ने अपने दिल की भड़ास निकाल दी.

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‘‘प्रश्न वीरू की पत्नी का नहीं. तुम नहीं समझोगी. इस उम्र में इतनी दूर जा कर रहने से दिल घबराता है. सारी उम्र बनिहाल से आगे कभी कदम भी न रखा, अब इस बुढ़ापे में समुद्र के उस पार कहां जाएं. क्या मालूम कैसा देश होगा? कैसे लोग होंगे? वहां का रहनसहन कैसा होगा? वहां मौत आई तो जाने कैसा क्रियाकर्म होगा? यहां अपनी धरती की धूल ही मिल जाए तो सौभाग्य की बात है…और फिर तुम सारा दोष मुझ पर ही क्यों मढ़ रही हो. तुम्हारी भी तो जाने की इच्छा न थी.’’

‘‘अच्छा जी, वीरू और अमेरिका की बात छोड़ो. काकी ने मुंबई भी तो बुलाया था. आप ने तो उस को भी मना कर दिया. कहा, बेटी के घर का खाना गोमांस के बराबर होता है. भूल गए क्या?’’

‘‘अरे, तुम नहीं समझोगी. अगर उन्हें वास्तव में हम से प्यार होता तो आ कर हमें ले जाते. हम मना थोड़े ही करते.’’

‘‘वे बेचारे तो दोनों आने को तैयार थे पर आप से डरते हैं. आप की बात तो पत्थर की लकीर होती है. आप ने तो अपने पत्रों में साफ तौर पर मना कर दिया था.’’

उधर वीरू और काकी दोनों अपनेअपने परिवार की देखरेख में जुट गए थे और यहां बुड्ढा और बुढि़या कैलेंडर की तारीख गिनते हुए जीवन का एकएक पल बिता रहे थे.

‘‘आज श्रावण कृष्ण पक्ष की 7 तारीख है. वीरू के बेटे का जन्मदिन है. उठ कर पीले चावल बना लो,’’ नीलकंठ ने अपनी पत्नी को आदेश दिया.

‘‘आज जन्माष्टमी है. काकी की बेटी आज के दिन ही पैदा हुई थी. उसे तार भेज दिया या नहीं?’’ अरुंधती ने पति को याद दिलाया.

दोनों को वीरू, काकी और उन के बच्चों की याद बहुत सताती थी. कई दिन से कोई सूचना भी तो नहीं मिली थी.

बुढ़ापा और उस पर यह दूरी कितनी कष्टप्रद होती है. आंखें तरस जाती हैं बच्चों को देखने के लिए और वे समझते हैं कि इस में हमारा स्वार्थ है.

‘‘कल सुबह बेटे को पत्र लिखना. कह देना कि हमें टिकट भेज दो. हम आने के लिए तैयार हैं,’’ अरुंधती ने आदेशात्मक स्वर में कहा.

‘‘मैं भी यही सोच रहा हूं. काकी से भी टेलीफोन पर बात कर के देख लूंगा. कुछ दिन मुंबई में रहेंगे और फिर वहीं से वीरू के पास अमेरिका चले जाएंगे.’’

‘‘जैसा उचित समझो, अब रात हो गई है, सो जाओ,’’ अरुंधती ने नाइट लैंप जला कर ट्यूबलाइट बुझा दी.

नीलकंठ की बेचैनी बरकरार थी. वे फिर उठ खड़े हुए. सभी दरवाजों और खिड़कियों का निरीक्षण किया. जब तक उन्हें यह तसल्ली न हुई कि कहीं से कोई खतरा नहीं है तब तक वे कमरे में इधर- उधर टहलते रहे.

फिर उन्होंने अपनी सुलगती कांगड़ी अरुंधती को थमा दी और स्वयं अपने बिस्तर में घुस गए.

नींद आंखों से कोसों दूर थी. वे करवटें बदलते रहे. इतने में बाहर दरवाजे पर दस्तक हुई. दोनों कांप उठे. सिमटे सिमटाए वे अपने बिस्तरों में दुबक गए. उन्होंने अपनी सांसों के उतारचढ़ाव को भी रोक लिया.

तभी धड़ाम से मुख्य दरवाजे के टूटने की आवाज आई. फिर कमरे के दरवाजे पर किसी ने जोर से लात मारी. दरवाजा भड़ाक की आवाज के साथ खुल गया. 2 नौजवान मुंह पर काले मफलर बांधे हाथों में स्टेनगन लिए कमरे में घुस गए. उन्होंने आव देखा न ताव, अंधाधुंध कई फायर किए. मगर उस से पहले ही दोनों आत्माएं डर और भय के कारण नश्वर शरीर से मुक्त हो चुकी थीं. बहते हुए खून से दोनों बिस्तर लहूलुहान हो गए.

हथियारबंद नौजवान मुड़े और अपने पीछे सन्नाटा छोड़ कर वापस चले गए. दूसरे दिन स्थानीय समाचारपत्रों में सुर्खियां बन कर यह समाचार इस तरह प्रकाशित हुआ :

‘हब्बाकदल में मुजाहिदों ने नीलकंठ और अरुंधती नाम के 2 मुखबिरों को हलाक कर दिया. उग्रवादियों को उन पर संदेह था कि वे फौज की गुप्तचर एजेंसी के लिए काम कर रहे थे.’

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पेरिस: सपनों का शहर

फ्रांस के उत्तर में सीन नदी के तट पर बसा है कल्पनाओं का शहर –पेरिस. फ्रांस की राजधानी पेरिस को ‘रोशनी का शहर’ और ‘फैशन की राजधानी’ भी कहा जाता है. 105.4 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस शहर की जनसंख्या 22 लाख है. पूरा पेरिस 20 भागों में बंटा है, जिन्हें अरौंडिसमैंट कहते हैं. 6,100 गलियों, 1,124 बार और 1,784 बेकरियों वाले इस शहर के बनने की कहानी बड़ी रोचक है. वर्ष 1852 तक यह आम शहर जैसा ही था. उसी वर्ष नेपोलियन बोनापार्ट का भतीजा लुई नेपोलियन तृतीय राजा बना और उस ने बड़े ही जोरशोर से शहर का नवीनीकरण करना शुरू किया. बैरन हौसमैन नामक इंजीनियर को उस ने यह जिम्मेदारी सौंपी.

हौसमैन ने न सिर्फ सौंदर्यीकरण का काम किया, बल्कि शहर को अभिजात्य वर्ग में ला खड़ा करने की भी पुरजोर कोशिश की. शहर में जितनी गरीब लोगों की बस्तियां थीं, उन्हें उजाड़ कर जनता को जबरदस्ती शहर के बाहरी हिस्सों में भेज दिया गया और फिर चौड़ी खूबसूरत सड़कों, बड़ेबड़े खुले ब्लौक्स और महंगे बाजारों तथा सुंदर घरों का निर्माण किया गया. हरियाली की कमी न हो, इस का पूरा ध्यान रखा गया. 17 साल तक यह सारा काम चलता रहा और जनता हौसमैन को कोसती, गालियां देती रही. गरीब तो गरीब, अमीरों ने भी उस का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

1870 तक जो पेरिस बन कर तैयार हुआ, उस ने सब की आंखें चौंधिया दीं. और कुछ ही समय में यह शहर पूरे यूरोप के गर्व का कारण बन गया. आज पूरे संसार में पेरिस की जो छवि है, उस का मुख्य श्रेय हौसमैन को ही जाता है.

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दर्शनीय स्थल

घूमने के लिहाज से वैसे तो पूरे पेरिस शहर में कहीं भी चले जाइए, हर जगह खूबसूरती बिखरी मिलेगी, फिर भी कुछ जगहें ऐसी हैं जिन्हें देखे बिना पेरिसयात्रा अधूरी ही कहलाएगी.

एफिल टावर

फ्रांस की क्रांति की एक शताब्दी पूरी होने का जश्न मनाने के लिए 1889 में पेरिस में एक वर्ल्ड फेयर का आयोजन किया जा रहा था. इस के मुख्यद्वार के रूप में एक बड़ा और भव्य टावर बनाने का प्लान बनाया गया, जिसे बाद में तोड़ दिया जाना था. जिस कंपनी ने इस का निर्माण किया, उस के मुख्य इंजीनियर एलैक्जैंडर गुस्ताव एफिल के नाम पर इस का नाम एफिल टावर रखा गया. लोहे के जालदार काम से बनी इस संरचना की ऊंचाई 1,063 फुट है, जिस में 3 लैवल हैं और 1,665 सीढि़यां हैं. हर लैवल पर जाने के लिए अलगअलग लिफ्ट की व्यवस्था है. पहली 2 मंजिलों पर रैस्टोरैंट आदि की भी सुविधा है. हर मंजिल से पूरे शहर का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है. जैसा कि पहले से तय था, वर्ष 1909 में इसे नष्ट करने के बारे में सोचा गया, लेकिन तब तक यह जनता और सरकार, सब के दिलों में घर कर चुका था, इसलिए इसे एक बड़े रेडियो एंटीना की तरह प्रयोग करने का निश्चय किया गया. आज यह टावर पेरिस की पहचान और शान है.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब हिटलर पेरिस में घुसा तो लोगों ने एफिल टावर की लिफ्ट के केबल काट दिए, ताकि हिटलर उन के शहर की इस शान पर चढ़ न सके. हिटलर कुछ सीढि़यां चढ़ा, लेकिन फिर हार मान कर लौट गया.आज यहां पूरे संसार से हर साल 60-70 लाख लोग आते हैं. रात के समय जब पूरे टावर पर लगी 20 हजार लाइटें जगमगाने लगती हैं तब तो इस की शोभा देखते ही बनती है. इस से जुड़ा एक मजेदार तथ्य है कि मैटल से बना होने के कारण इस की लंबाई सूर्य की गरमी से प्रभावित होती है और मौसम के अनुसार 15 सैंटीमीटर तक घटतीबढ़ती रहती है.

डिज्नीलैंड पार्क

वाल डिज्नी के पात्रों और फिल्मों की थीम पर बना यह विशाल और भव्य पार्क शहर के मध्य भाग से 32 किलोमीटर पूर्व में स्थित है. 4,800 एकड़ में फैला यह पार्क 1992 में शुरू हुआ. वर्ष 2002 में इसी के साथ डिज्नी स्टूडियोज का निर्माण किया गया. इन दोनों पार्कों में कुल मिला कर 57 झूले, राइड्स आदि हैं. इन के अलावा यहां रंगबिरंगी परेड, लेजर शो और तरहतरह की अन्य गतिविधियां भी होती रहती हैं. पूरे डिज्नी पार्क को

5 भागों–मेन स्ट्रीट यूएसए, फैंटेसीलैंड, एडवैंचरलैंड, फ्रंटियरलैंड और डिस्कवरीलैंड में बांटा गया है. एक भाग से दूसरे तक जाने के लिए पैदल चलने के अलावा ट्रेन से जाने की भी सुविधा है. एलिस इन वंडरलैंड, पाइरेट्स, स्नोवाइट, पीटर पैन, टौय स्टोरी आदि की थीम पर बने झूले आप को एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं. स्लीपिंग ब्यूटी का महल तो इतना सुंदर है कि देखने वाला मानो सचमुच स्वप्नलोक में ही विचरण करने लगता है. 7 रिजौर्ट, 6 होटल, कई रैस्टोरैंट, शौपिंग सैंटर और एक गोल्फ कोर्स वाले इस थीम पार्क में हर साल एक से डेढ़ करोड़ लोग आते हैं.

आर्क औफ ट्रायम्फ

फ्रांस की क्रांति और अन्य युद्धों में मारे गए शहीदों की याद में आर्क औफ ट्रायम्फ नामक गेट बनाया गया है. रोमन वास्तुकला पर आधारित इस गेट को 1806 में जीन कैलग्रिन ने डिजाइन किया था. कुछ युद्धों और शहीदों के नाम इस की दीवारों पर खुदे हुए हैं. नीचे एक चैंबर बना है, जिस में ‘अनजाने सैनिक का मकबरा’ है, जो पहले विश्वयुद्ध में मारे गए सैनिकों को समर्पित है.

नौत्रे डेम कैथेड्रल

यह एक रोमन कैथोलिक चर्च है, जो फ्रैंच गोथिक शैली में बना है. पूरी दुनिया के कुछ अत्यंत मशहूर चर्चों में से यह एक है. यहां जीसस क्राइस्ट के क्रौस का एक छोटा हिस्सा क्राउन औफ थौर्न तथा उन के कुछ अन्य स्मृतिचिह्न भी रखे गए हैं. नेपोलियन बोनापार्ट के राज्याभिषेक के अलावा अन्य कई बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं का यह चर्च गवाह रहा है. यहां कुल 10 बड़ेबड़े घंटे हैं, जिन में से सब से बड़ा 13 टन से भी ज्यादा भारी है और उस का नाम इमैन्युअल है.

लुव्र म्यूजियम

यह संसार के सब से बड़े म्यूजियमों में से एक है. शहर के पश्चिमी भाग में सीन नदी के दाहिने तट पर स्थित यह इमारत लगभग 60,600 वर्ग मीटर में फैली है. 12वीं शताब्दी में फिलिप द्वितीय ने इस का निर्माण एक किले के रूप में करवाया था. कई राजाओं ने इसे अपना निवास बनाया. अनेक स्वरूप और नाम बदलते हुए 10 अगस्त, 1793 को पहली बार 537 पेंटिंग्स और 184 कलाकृतियों के साथ इसे म्यूजियम का रूप दिया गया. आज इस का इतना विस्तार हो चुका है कि अगर आप यहां की हरेक कलाकृति को सिर्फ 4 सैकंड देख कर ही आगे बढ़ जाएं तो आप को पूरा म्यूजियम देखने के लिए 3 महीने का समय चाहिए.

मोनालिसा, वर्जिन औफ द रौक्स तथा हम्मूरावी की आचारसंहिता जैसी अनेक विश्वप्रसिद्ध कृतियां यहां प्रदर्शित हैं, जिन्हें देखने के लिए विश्व के कोनेकोने से यहां लोग आते हैं. इस के सामने कांच का एक विशाल पिरामिड बना है जो इस की सुंदरता में चारचांद लगा देता है.

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सैंट चैपल चर्च

पेरिस में स्थित सैंट चैपल चर्च एक मध्ययुगीन चर्च है, जो 13वीं शताब्दी में बना. गोथिक शैली में बना यह चर्च अपनी स्टेन ग्लास पेंटिंग के काम के लिए प्रसिद्ध है.

लैस इनवैलिड्स

कुछ म्यूजियमों और दूसरी इमारतों का एक समूह है लैस इनवैलिड्स. यह फ्रांस के सैनिक इतिहास को दर्शाता है. इसे 17वीं सदी में लुई चौदहवें ने युद्ध में घायल सैनिकों के इलाज और बूढ़े व अपाहिज सैनिकों व उन के परिवारों को आश्रय देने के लिए बनवाया था. यहां उन का खानापीना, इलाज और रहने का इंतजाम मुफ्त में किया जाता था. नेपोलियन ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया. नेपोलियन तथा उस के परिवार के अनेक सदस्यों तथा फौज के कई मार्शलों की कब्रें भी यहीं पर हैं.

कौनकौर्ड स्क्वायर

फ्रांस की क्रांति जब हुई, उस वक्त वहां लुई सोलहवें का शासन था. उस की पत्नी मैरी एंटोनियट से जनता घृणा करती थी क्योंकि एक तो वह आस्ट्रिया के राजपरिवार की बेटी थी, दूसरे, अत्यंत फुजूलखर्ची, घमंडी और कुछ हद तक बेवकूफ थी. जनता के पास रोटी बनाने के लिए आटा भी नहीं था और वह करोड़ों रुपए अपनी विलासिता पर खर्च करती रहती थी. जब उसे यह बताया गया कि उस के राज्य में लोगों के पास खाने के लिए रोटी नहीं है और वे भूखों मर रहे हैं, तो उस का जवाब था, ‘‘उन्हें मरने की क्या जरूरत है? अगर उन के पास रोटी नहीं है, तो वे केक क्यों नहीं खा लेते?’’ पहले से ही गुस्साई जनता और भड़क गई और लुई, मैरी व उस के पूरे परिवार को पकड़ कर मार दिया गया. जिस स्थान पर उन के सिर काटे गए वह कौनकौर्ड स्क्वायर के नाम से प्रसिद्ध है. पेरिस आने वाला हर पर्यटक इस स्थान को देखने के लिए जरूर आता है.

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पाकिस्तानी पीएम इमरान खान के गले की फांस बनीं दूसरी पत्नी रेहम खान

रेहम खान ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को ले कर जो तीखा खुलासा किया है, चौंकाने वाला है. भारत में धारा 370 व 35 A के हटाए जाने को ले कर एक तरफ पाकिस्तान बौखलाया सा घूम रहा है और अपना बचाव भी ठीक से नहीं कर पा रहा है, वहीं भारत के प्रधानमंत्री ने जिस दमखम से इस मुद्दे पर एक्शन लिया है, वो काबिलेतारीफ है.

10 महीने ही चली शादी…

रेहम खान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की दूसरी पत्नी हैं, वहीं रेहम की भी यह दूसरी शादी थी. रेहम के 3 बच्चे हैं, जो उन के पहले पति के हैं. तीनों ही बच्चे अपने पिता के साथ रहते हैं. उन की पहली शादी एजाजुर रेहमान से साल 1992 में हुई थी, जो साल 2006 तक चली थी. फिर 6 जनवरी, 2015 को उन्होंने इमरान खान से दूसरी शादी की थी.

रेहम का जन्म 3 अप्रैल, 1973 को लीबिया में हुआ था. उन्होंने शुरुआती पढ़ाई पेशावर से की. इस के बाद इंग्लैंड से ऊंची तालीम हासिल की. पेशे से रेहम खान ब्रिटिश पत्रकार हैं. साथ ही, वे लेखक और फिल्म निर्माता भी हैं. इमरान खान संग उन की शादी 10 महीने चली और साल 2015 में दोनों का तलाक हो गया.

जुलाई, 2018 में पाकिस्तान में रेहम खान की किताब (आत्मकथा) सामने आई. यह किताब छपने से पहले ही पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई. इस आत्मकथा में उन्होंने कई खुलासे किए थे.

 

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Islamabad Book Fair. Ub sub perho gey. Now you know I never exaggerated. Only wrote the truth.

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रेहम का खुलासा- इमरान खान गे हैं

एक खुलासा उन्होंने यह भी किया था कि इमरान खान गे हैं. इतना ही नहीं, वे इमरान खान को पाकिस्तानी सेना की कठपुतली भी बता चुकी हैं. साथ ही, उन्होंने अपनी किताब में इमरान खान के 5 नाजायज बच्चे होने का दावा किया है. वहीं दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान घडिय़ाली आंसू बहा रहा है. लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पूर्व पत्नी रेहम खान का कहना है कि इमरान खान ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ एक गोपनीय डील की है. उन्होंने ये डील भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुश करने के लिए की है. यही वजह है कि वे अपनी बात मजबूती से नहीं रख पा रहे हैं.

कश्मीर का सौदा हो गया है- रेहम

एक इंटरव्यू में रेहम खान ने कहा कि मैं कहना चाहती हूं कि कश्मीर का सौदा हो गया है. ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ ये हमें शुरू से ही सिखाया गया है. 5 अगस्त को जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने का ऐलान किया था, उन की टीम के एक सदस्य ने उन्हें फोन कर के कहा था, ”मैम, आपने जो कहा था, सही हो रहा है. मैं ने तब उस से कहा था कि प्रार्थना करो कि यह सच न हो.”

रेहम खान ने उस टीम सदस्य से फोन पर बोला कि मैं ने तुम से पिछले साल अगस्त में ही क्या कहा था? कश्मीर पर क्या सौदा होगा? मोदी ने वो किया जो उन्हें करना चाहिए था. उन्हें (मोदी को) धारा 370 खत्म करने के लिए जनादेश मिला और उन्होंने वो किया. लेकिन आप के प्रधानमंत्री इमरान खान ने क्या किया?  इस मुद्दे पर उन्हें एक नीतिगत फैसला लेना चाहिए था, उन्होंने कहा, मैं जानता था कि वह (मोदी) ऐसा करने जा रहे हैं. ये तो हम सब भी जानते थे कि वे (मोदी) ऐसा करने जा रहे हैं.

 

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Missing home sweet home. #Mylove #Myland #MyPakistan #Mypeople. #prayers? Always #Pushtuna

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मोदी पर ये बोली रेहम खान…

मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में भी कश्मीर मुद्दे पर अपनी राय रखी थी. जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व 35A खत्म करना भाजपा के चुनावी एजेंडे में शामिल रहा है. लोकसभा चुनाव 2019 के घोषणापत्र में भी भाजपा ने इस बात का जिक्र प्रमुखता से किया.

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने से पहले घाटी में जब सुरक्षा सख्त की जा रही थी, तब भी वहां के नेताओं ने आशंका जताई थी. ऐसे में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का यह बयान कि उन्हें इस फैसले के बारे में पहले से पता था, वास्तव में हास्यास्पद है.

इस खुलासे से पाकिस्तानी चेहरों पर कुछ तो बल पड़े ही होंगे. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान चुप हैं, पर अवाम चुप नहीं है. वह खुल कर इस का विरोध कर रही है. ‘कश्मीर हमारा है’ के नारे को बुलंद कर रही है. इस मुद्दे पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अपनी पूर्व पत्नी रेहम खान पर क्या कठोर कार्यवाही कर पाएंगे, इस में संदेह है.

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13 साल बाद बौलीवुड में वापसी करने जा रही हैं शिल्पा शेट्टी

कलाकार हमेशा फिल्म के सेट पर कैमरे के सामने रहने पर ही आनंद का अहसास करता है. मगर कई वजहों से ऐसा संभव नहीं हो पाता. जब कलाकार कैमरे के सामने नहीं रहता यानी कि लंबे समय के लिए किन्हीं वजहों से अभिनय से दूरी बना लेता है, तो भी उसका मन बार बार अभिनय में वापसी करते हुए कैमरे के सामने जाने का करता है. ऐसा ही कुछ शिल्पा शेट्टी के साथ भी होता रहा है. शिल्पा शेट्टी ने 2007 में प्रदर्शित अनिल शर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘अपने’’ के बाद से अभिनय से दूरी बनाई हुई थीं. इन 13 वर्षों के दौरान वह कभी खाली नहीं बैठी.

वह अपने योगा के वीडियो सहित कई दूसरे तरह के काम लगातार कर रही थीं. मगर फिल्म के सेट पर कैमरे के सामने जाने की जो खुशी होती है,  उसकी कमी उन्हें लगातार परेशान करती रही है.

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तभी तो जब पूरे तेरह वर्षों के बाद वह 20 अगस्त को ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क इंडिया’ के बैनर तले सब्बीर खान निर्देशित फिल्म ‘‘निकम्मा’’ के सेट पर अवनी के किरदार को अपने अभिनय से संवारने के लिए पहुंची, तो शिल्पा शेट्टी अपनी खुशी का इजहार करने के लिए तुरंत सोशल मीडिया का सहारा लिया. उन्होंने फिल्म ‘‘निकम्मा’’ के क्लैप बोर्ड व फिल्म के निर्देशक शब्बीर खान, अभिनेता अभिमन्यू दसानी के साथ तस्वीरें खिंचवाकर इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हुए लिखा -‘‘सेट पर वापस आ गयी… निकम्मा के साथ अवनी के किरदार में मैं बयां नहीं कर सकती कि मैंने इसे कितना ‘मिस’ किया. अभिमन्यू और मैं  काफी मजा करने वाले हैं… शब्बीर मैं तुम्हे पसंद करती हूं, भले ही तुम क्लैप से अपना पेट छिपाने की कोशिश कर रहे हो..

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जी हां! शिल्पा शेट्टी पूरे तेरह वर्षों के अंतराल के बाद शब्बीर खान निर्देशित फिल्म ‘‘निकम्मा’’ से अभिनय में वापसी कर रही हैं. इस फिल्म में उनके साथ अभिमन्यू दसानी और ‘यूट्यूब सनसनी शिरले सेतिया हैं. यह रोमांटिक कौमेडी फिल्म 2020 में सिनेमाघरों में पहुंचेगी.

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भारत प्रेम बौलीवुड में खींच लाया: अहमद मसी वली

एक तरफ बौलीवुड के कुछ कलाकार हौलीवुड और विदशों में सिनेमा का हिस्सा बनकर अपनी ग्लोबल ईमेज बनाने के लिए मशक्कत कर रहे हैं, तो दूसरी हौलीवुड और पश्चिमी देशों के कलाकार व फिल्मकारों को भारत की संस्कृति और बौलीवुड अपनी तरफ आकर्षित कर रही है. अब तो विश्व के कई देशों के कलाकार बौलीवुड में अपना करियर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे ही कलाकारों में से एक हैं- मूलतः अफगानिस्तानी, मगर कनाडा में पले बढ़े अभिनेता अहमद मसी वली. अहमद मसी वली चार वर्ष से मुंबई में है. अब तक टीवी के रियालिटी शो के अलावा फिल्म ‘‘कलंक’ में एक छोटे किरदार में नजर आ चुके हैं. तो वहीं अब ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘जी 5’’ की गोल्डी बहल निर्देशित वेब सीरीज ‘‘रिजेक्ट’’ का वह हिस्सा हैं.

आप खुद को अफगानिस्तानी मानते हैं या …?

मेरे माता पिता अफगानिस्तान के रहने वाले हैं. पर वह लंबे समय से कनाडा में बसे हुए हैं. मेरा जन्म कनाडा में ही हुआ. वहां हिंदी फिल्में देखते देखते मेरे अंदर भारत आकर काम करने का पैशन जागा. सच कहूं तो मैं खुद को भारतीय समझता हूं. मुझे मंबईं आकर कभी नहीं लगा कि मैं बाहरी हूं. पिछले चार साल से मुंबई में रहने का मेरा जो अनुभव है, उससे मुझे यही समझ में आया कि मेरे लिए भारत और मुंबई शहर से बेहतर कोई दूसरी जगह हो नहीं सकती.

भारत आने का मकसद भारतीय लोगों से परिचित होना और भारत के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने था.फिर आपके दिमाग में अभिनेता बनने की बात कब आयी?

शायद मैं बताना भूल गया कनाडा में रहते हुए नाटकों में अभिनय करता रहा हूं. मैं मुंबई आने से पहले कनाडा में थिएटर किया करता था. मैं थिएटर करने के लिए गुयाना जाता था, जहां पर ज्यादातर भारतीय रहते हैं. यूं तो यह वेस्टइंडीज का हिस्सा है. जहां तक मेरी जानकारी है, वेस्टइंडीज में ज्यादातर भारतीय हैं, जो कई दशक पहले मजदूरी करने के लिए वेस्ट इंडीज चले गए थे. वहां पर भारतीय होते हुए भी अब वह हिंदी की बजाय अंग्रेजी बोलते हैं. उनकी हिंदी नाटकों में रुचि है. वहां पर हिंदी नाटकों में काम करते हुए मुझे अहसास हुआ कि यदि मुझे अभिनय करना है, तो मुझे भारत जाकर वहां के लोग, वहां की भाषा और वहां के परिवेश में खुद ढालना पड़ेगा. क्रिमिनल लौ में उच्चशिक्षा हासिल करने के बाद मैंने मुंबई आने का निर्णय लिया.

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मुंबई आने के बाद संघर्ष करना पड़ा?

यदि मैं अपने पिता के कहने पर चलता तो ज्यादा संघर्ष न करना पड़ता. मेरे पापा ने पैसे व क्रेडिट कार्ड देकर भेजा था. पर मैंने सोच लिया था कि मैं अपना मुकाम संघर्ष करते हुए बनाऊंगा. क्योंकि जब मैं समस्याओं से गुजर लूंगा, तभी मेरे अंदर एक भूख पैदा होगी. आप यकीन नहीं करेंगे पर मुंबई पहुंचते ही होटल में एसी कमरा लेकर रहने की बजाय दो दिन विद्या विहार के इस्कौन मंदिर में रहा. क्योंकि मैं किराए का मकान तलाश रहा था. यहां आकर पता चला कि सिंगल इंसान को किराए का मकान भी नहीं मिलता. बड़ी मुश्किल से मेरी समस्या हल हुई. पर मैं अपनी संघर्ष की यात्रा से खुश हूं. मजे ले रहा हूं.

पिछले चार साल से मुंबई में हूं. मैंने सबसे पहले अनुपम खेर के एक्टिंग इंस्टीट्यूट एक्टर्स प्रिपेअर्स से एक्टिंग का कोर्स किया. मेरे अभिनय करियर की शुरुआत विज्ञापन फिल्मों से हुई. मैंने अब तक 20-25 विज्ञापन फिल्में की हैं. मैंने एक रियालिटी शो ‘इंडियन सुपरस्टार’ भी किया. इसके अलावा मैंने फिल्म ‘कलंक’ में इमरान अली का छोटा सा किरदार निभाया. अब मैंने गोल्डी बहल के निर्देशन में वेब सीरीज ‘‘रिजेक्ट’’ में मेन लीड की है, जो कि ‘जी 5’ पर है.

आपने फिल्म‘ ‘कलंक’’ में एक छोटा सा किरदार क्या सोचकर निभाया?

सच कहूं तो मेरे लिए किरदार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण लोगों से रिश्ता बनाना है. इंडियन सुपरस्टार के सेट पर करण जौहर से मेरी मुलाकात हुई. वह मुझे बहुत बेहतरीन इंसान लगे. मुझे लगा कि मुझे उनके साथ काम करना चाहिए. उनसे बहुत कुछ सीखने के लिए उनके साथ काम करना जरुरी है. एक दिन करण जौहर ने मुझे बुलाकर कहा कि क्या मैं फिल्म ‘कलंक’ में इमरान अली का छोटा सा किरदार निभाना पसंद करूंगा. मैंने हामी भर दी. मुझे पता था कि पूरी फिल्में सिर्फ दो-तीन दृश्य व दो-तीन संवाद है.

वेब सीरीज ‘‘रिजेक्ट’’ को लेकर क्या कहेंगे?

इस वेब सीरीज में वर्तमान समय की युवा पीढ़ी की मानसिकता व उनकी समस्याओं का चित्रण है. इस वेब सीरीज में हर किरदार किसी न किसी बात को लेकर खुद को रिजेक्ट पाता है. फिर वह उससे उबर कर किस तरह विजेता बनता है, उसकी कहानी है.

‘‘रिजेक्ट’’के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

मैंने इसमें एक मुख्यमंत्री के बेटे आरव का किरदार निभाया है, जो कि सिंगापुर के इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है. वह संगीत का शौकीन है. पर हालात कुछ ऐसे होते हैं कि उसमें एपीसोड दर एपीसोड कई बदलाव आते हैं. अंततः एक डार्क किरदार बन जाता है. आरव एक ऐसा किरदार है, जिसे मुझे एक ही साथ कई किरदार कई लेयर निभाने का मौका मिला. ऐसा बहुत कम कलाकारों के साथ होता है.

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जब आप वेब सीरीज ‘रिजेक्ट’ कर रहे थे, तो कभी आपको अपनी जिंदगी की कोई घटना याद आई?

आरव संगीत से जुड़ा हुआ है और मैं भी बचपन से संगीत से जुड़ा हुआ रहा हूं. संगीत मेरी जिंदगी में अति महत्वपूर्ण स्थान रखता है. संगीत तो युनिवर्सल भाषा है, जहां धर्म, जाति,  क्षेत्रीयता व भाषा मायने नहीं रखती. केवल धुन पसंद आनी चाहिए. इसलिए मैं खुद को आरव से जुड़ा हुआ पाता हूं.

जब कोई रिजेक्ट होता है, तो उसके जो परिणाम होते हैं, उन पर यह वेब सीरीज कुछ कहती है?

जी हां! आप पूरे विश्व किसी भी कलाकार को देख लें, सभी ने अपनी जिंदगी में कभी ना कभी रिजेक्शन झेला है. कई कलाकारों ने तो बहुत तगड़ा रिजेक्शन झेला है. इसी के चलते वह इतनी ऊंचाई पर पहुंच पाए हैं. इस रिजेक्शन के ही चलते उनके अंदर की आग, उनके अंदर का गुस्सा, उनके अभिनय में अलग तरह से उभर कर आता है.उनके किरदारों में वह नजर आता है.यही वजह की उन्होंने अपनी जिंदगी से भी कहीं बड़ा काम किया है. आपको पता होगा कि जब शाहरुख खान मुंबई आए थे, तब तक उनके माता पिता का देहांत हो चुका था. तो उनकी अपनी यात्रा रही है. वह भी अपनी जिंदगी में कई बार असफल हुए हैं. असफलता के बाद सुपरस्टार बने हैं. इन सभी लोगों ने अपने अंदर रिजेक्शन को सकारात्मक रूप से उभारा है. रिजेक्शन के बाद लोग किस तरह मजबूत व ताकतवर बन जाते हैं, इसकी भी इस वेब सीरीज में कथा है.

अब आप फिल्म व वेब सीरीज में से किसे प्राथमिकता देंगे?

देखिए, वेब सीरीज व फिल्म दोनों मीडियम काफी अलग नही है. फिल्म दो से तीन घंटे की अवधि की होती हैं. जबकि बीस से चालिस मिनट के छह से दस एपीसोड की वेब सीरीज होती हैं. वेब सीरीज मोबाइल पर आसानी से देख सकते हैं. फिल्म को सिनेमाघर में जाकर देखने में ही मजा आता है. ज्यादातर लोगों के पास थिएटर जाने का समय नही होता, वह अपनी सुविधा से मोबाइल पर डिजिटल प्लेटफार्म के वेब सीरीज देखते हैं. ओटीटी प्लेटफार्म पर करोड़ों करोड़ों रुपए खर्च कर वेब सीरीज बन रही हैं. मेरे लिए वेब सीरीज करना या फिल्म करना एक जैसा है. पर टीवी नहीं करना है. क्योंकि टीवी का कौंसेप्ट एकदम अलग है.

लेकिन फिल्म की जो लोकप्रियता होती है, वह वेब सीरीज से कभी नहीं मिल सकती?

फिल्म से पौपुलारिटी इसलिए मिलती है, क्योंकि वह बड़ी स्क्रीन पर आता है. लोग अपने दिमाग में एक राय बनाकर रखते हैं कि अगर थिएटर में आया, तो अच्छा ही होगा.

आपने फिल्म ‘‘कलंक’’ की है. क्या इसे आप मोबाइल पर देखते हुए इंज्वाय कर सकते हैं?

जी नहीं.. पर आप कहां ज्यादा इंज्वाय करते हैं, उससे ज्यादा जरूरी यह है कि आपके लिए सुविधाजनक क्या है.

मैं आपसे कलाकार के तौर पर पूछ रहा हूं?

एक कलाकार के तौर पर में बड़े पर्दे पर काम करना चाहूंगा. अगर मिल जाए तो बहुत बड़ी बात है.

फिल्मों में अभिनय के अलावा भी कुछ करना चाहेंगे?

जी हां!. करना तो बहुत कुछ है. मुझे निर्देशन का भी शौक है. मेरे सभी करीबी दोस्त, जानते हैं कि मेरे पास कैमरे से संबंधित सारे अत्याधुनिक उपकरण हैं. मसलन-सिनेमैटिक कैमरा, लेंसेस, पोस्ट प्रोडक्शन टूल्स वगैरह.. सब कुछ है. फिल्म बनाने के लिए जो होना चाहिए, वह सब कुछ मेरे पास है.

तो क्या घर में बैठकर कोई लघु फिल्म बनाई है?

जी हां! अभी मैंने एक शार्ट फिल्म ‘बिन कुछ कहे’ बनाई है, जो कि मैंने यूट्यूब पर रिलीज किया है. तो मुझे डायरेक्शन में भी शौक है. पर अभिनय को महत्व देता हूं. मुझे कैमरे के पीछे का ज्ञान हासिल करते रहने की आदत है. जब भी मेरा शौट नहीं होता है, मैं मोनीटर पर बैठ जाता था.

कोई नई फिल्म मिली?

अभी दो वेब सीरीज के औफर आए हैं. एक गोल्डी सर का ही है. एक वेब सीरीज मैंने रिजेक्ट की है, क्योंकि मुझे लगा कि अभी इसे करना मेरे करियर के लिए सही नहीं है. औफर आते रहते हैं, पर हमें सोचना कि हमें क्या करना है.

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तलाक: सामाजिक कलंक या एक नई शुरुआत

समीक्षा ने शादी के सालभर बाद ही अपने पति से तलाक ले लिया. अब वो खुश है और अपने फैसले से संतुष्ट भी है. उसका मानना है कि जिस रिश्ते से उसे सुख और शांति नहीं मिल रही थी, उस रिश्ते को बोझ बनाकर ढोने से क्या फायदा था? खैर, अब वो अपने मायके में है और नौकरी भी कर रही है. हाल ही में एक विवाह समारोह में मैं उससे मिली.  हम दोनों की एक कॉमन फ्रेंड की शादी थी और हम दोनों को ही उसकी शादी में जरूर से जाना था.

वहां जब मैंने उससे पूछा कि वो अपनी साल भर पुरानी शादी के टूटने के बारे में लोगों को क्या कहेगी, तो उसने बहुत आत्मविश्वास से कहा – ‘जिन्दगी मेरी है, और तलाक इसका अंत नहीं है.’
सुनकर अच्छा लगा कि बाकियों की तरह वो खुद को घर में बंद कर के जीना नहीं छोड़ना चाहती हैं.

‘तलाक’ शब्द शादीशुदा जिन्दगी के ऊपर लगा एक ऐसा दाग होता है जिसे तलाक लेने वाला भूलना भी चाहे तो समाज उसे भूलने नहीं देता है. लोगों के तरह-तरह के सवाल आपके फैसले पर और आप पर जलते अंगारों की तरह पड़ते रहते हैं.
‘अब क्या करोगी?’, ‘शादी जैसी भी हो तोड़नी नहीं चाहिए थी’, ‘लड़की हो, अकेले कैसे गुजारा करोगी?’ जैसे तमाम सवाल तलाकशुदा को जीने नहीं देते.

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हमारे समाज में शादी को एक टैबू की तरह प्रयोग में लाया जाता हैं. खासतौर पर जब बात लड़कियों की हो, तब विवाह अपेक्षाकृत जरूरी माना गया हैं. शादी को जरूरी इसलिए मानते हैं क्योंकि हर इंसान को एक साथी की जरूरत होती हैं. जो मानसिक तौर पर, भावात्मक रूप से, आर्थिक स्थिति में और कठिन परिस्थितियों में उसके साथ खड़ा रह सके. समाज शादी को इसलिए ज्यादा अहमियत देता है ताकि बेटियों को एक सम्मानजनक और ठोस जीवन जीने की सुविधा मिल सके. लेकिन जब यही शादी लड़कियों के लिए जी का जंजाल बन जाए तो इस शादी के बंधन से वो बाहर निकलना ही उचित समझती हैं. यह अफसोस की बात है कि शादी टूटने के पीछे लड़कियां दोषी हों या निर्दोष हों, समाज के लोग उसे साधारण नजरों से देखना बंद कर देते हैं. ऐसा लगता है जैसे वो इंसान नहीं एलियन हो गई हों. एक तरफ जहां लड़की अपनी टूटी हुई शादी का दंश झेल रही होती है, वहीं दूसरी तरफ लोगों के सवालों की बौछार उसके मनोबल को तोड़ने का काम करते हैं.

मैं और समीक्षा जब शादी में पहुंची तो उसे भी कई जानने वालों के ऐसे ही सवालों का सामना करना पड़ा. पहले तो वो उन सब से बचने और छुपने की कोशिश करती रही, लेकिन बाद में उसने सभी को यह कहकर चुप करा दिया कि वो अपने तलाक लेने के फैसले से खुश है, और उसे अब नई शुरुआत करनी है.
कह तो दिया उसने ये सब से, लेकिन अंदर ही अंदर लोगों की सवालिया नजरें उसे चुभ रही थीं. फिर भी वो खुश थी. उसकी मन:स्थिति कुछ ऐसी थी जो उसे एक तरफ परेशान कर रही थी, तो दूसरी तरफ हिम्मत और हौसला भी दे रही थी.

ऐसी मन:स्थिति में बहुत-सी युवतीयां हैं. कुछ अपने फैसले से खुश हैं, तो कुछ के लिए तलाक जीवनभर की परेशानी है. आर्थिक रूप से कमजोर और किसी दूसरे पर निर्भर महिलाओं के लिए निश्चित ही तलाकशुदा जीवन आसान नहीं होता, लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम और कामकाजी महिलाएं जो अपने करियर को ज्यादा महत्व देती हैं, बंधनों में जकड़े रहने, बेवजह की रोकटोक से मुक्त होने के लिए या अन्य पारिवारिक कारणों से तलाक की राह पकड़ना ही ठीक समझती हैं. अपने साथ होने वाले अत्याचार को चुपचाप सहते रहने के बजाए उनका मुकाबला करने और अत्याचारी को मुंहतोड़ जवाब देने का साहस करने वाली ऐसी महिलाओं को यदि समाज हतोत्साहित करने के बजाए उनकी हौसलाअफ्जाई करे तो ऐसी महिलाएं अपने करियर में नया मुकाम हासिल कर सकती हैं. तलाक लेना कोई पाप नहीं नहीं है. हिंसा, अन्याय, क्रूरता का विरोध करके उससे मुक्त होने का रास्ता है. इसके बाद जिन्दगी खत्म नहीं हो जाती, बल्कि नये रास्ते तलाश कर बेहतर मुकाम हासिल कर सकती है.

बेहतर निर्णय

तलाक लेना एक मुश्किल फैसला हैं. चाहे वो मर्द हो या औरत. लेकिन शादी के बंधन में जिन्दगी जब घुटने लग जाए तो ये बेहतर हैं कि उसे तोड़कर बाहर आ जाया जाए. एक लड़की जब तलाक का फैसला लेती है तो वो उसके लिए बेहद चुनौतीभरा वक्त होता हैं. मां-बाप, रिश्तेदार, समाज सबको किनारे कर सिर्फ खुद के बारे में सोचना हिम्मत वाली बात होती हैं. इसलिए जब वो ये निर्णय लेती है, तो उसे पता होता है कि ये बेहद महत्वपूर्ण निर्णय है, जो उसके अच्छे भविष्य के लिए बेहतर साबित हो सकता है.

आगे भी है जिन्दगी

पति से अलग हो जाना, जीवन का सबसे दुखद क्षण है और इसके बाद एक लड़की की जिन्दगी दुबारा पटरी पर नहीं आ सकती है, ऐसी सोच रखना गलत है. मेरी  सहेली की सोच है कि अपनी शादी खत्म हो जाने के बाद उसके जीवन का कोई मतलब नहीं रह गया, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं. वो खुश है. अपने भविष्य को एक दिशा दे रही है. अपने सपनों और महत्वकांक्षाओं को पूरा करने में जुट गई है. वो एक नए सिरे से खुद को आगे बढ़ाना चाहती है. उसका मानना है कि जो औरतें नौकरीपेशा नहीं हैं, उन्हें भी तलाक के बाद या पति से अलग हो जाने पर जिन्दगी को बोझ नहीं समझना चाहिए. कोशिश करनी चाहिए नई शुरुआत करने की.

नहीं चहिए सहानुभूति

अकेली औरत को या तो लोग बुरी नजर से देखते हैं या फिर सहानुभूति की नजर से. लेकिन ये फालतू की सहानुभूति किसी को नहीं चाहिए होती है. जरूरी है कि उसके फैसले को सम्मान मिले. तलाकशुदा औरतें या पति से अलग हुई महिलाओं को लोगों की झूठी सहानुभूति नहीं, उनके फैसलें के प्रति सम्मान की भावना चाहिए ताकि उसकी आगे की जिन्दगी आसान हो सके.

मैं ही क्यों गलत? 

अक्सर देखा जाता है कि शादी निभाने की जिम्मेदारी लड़कियों पर ही डाल दी जाती हैं. शादी अच्छी चल रही हो या बुरी, उससे ही अपनी शादी बचाने और आगे बढ़ाने की उम्मीद परिवार और समाज करता है. किशोरावस्था से ही लड़कियों को सिखाया जाता है कि पति का घर ही उनका असली घर है और उसे हर हाल में शादी निभानी है. यह उसका धर्म है. ऐसे में जब शादी टूटने की बात आती है तो लड़कियों को ही दोषी ठहराया जाता है. जबकि लोग ये भूल जाते हैं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती है.

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जी सकते हैं अकेले

पितृसत्तात्मक समाज में औरतों को हमेशा से ही मर्दों के सहारे का आदि बना कर रखा गया है. पहले पिता, फिर भाई, फिर पति और फिर बेटे के रूप में उसे किसी न किसी पर आश्रित रहना ही सिखाया गया है. इनके बिना उसके जीवन को कठिन और संघर्षभरा बताया जाता रहा है. ऐसे में जब कोई लड़की अपने पति से अलग होती है, तो बचपन से उसके मन में बिठायी गयी बात उस पर हावी हो जाती है कि अब उसका सहारा छूट गया. यदि यह भाव ज्यादा हावी हो गया तो समस्या गंभीर हो जाती है.  ऐसे में खुद को ये हौसला देना की वो शादी टूटने के बाद भी बिना किसी साथी के अकेले अपनी जिन्दगी जी सकती हैं, एक लड़की की मानसिक संबलता को दर्शाता है और यदि इसमें उसका परिवार, उसके दोस्त और नाते-रिश्तेदार भी सकारात्मक भूमिका निभाएं तो उसके लिए जिन्दगी बहुत आसान हो सकती है.

क्या कहता है तलाक का कानून 

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 (बी) और स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 28 के तहत जो पति-पत्नी विवाह के बाद कम से कम एक साल से अलग रह रहें हों, वे पारिवारिक न्यायालय में तलाक की अर्जी दे सकते हैं. हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 (बी) के अंतर्गत पति-पत्नी की शादी जिस जगह पर हुई हो या दोनों पहली  बार जिस जगह पर एक साथ रहें हों अथवा आखिरी बार जहां एक साथ रहें हों, वहां के पारिवारिक न्यायालय में पहले मोशन यानी तलाक की अर्जी दे सकते हैं.

पहले मोशन यानी तलाक की अर्जी के 6 महीने बाद ही दूसरा मोशन यानी तलाक की आगे की प्रक्रिया शुरू होती है. लेकिन नए नियम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से आपसी सहमति वाले तलाक के मामले में  6 महीने के इंतजार को खत्म कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि देश की तमाम फैमिली कोर्ट आपसी सहमति से तलाक के आवेदन में हिन्दू मैरिज एक्ट की धारा 13 (बी) को अनिवार्य ना मानें और अगर जरूरी लगे तो कोर्ट फौरन तलाक का आदेश दे सकते हैं.

किन आधारों पर ले सकते हैं तलाक

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 10 के अनुसार, विवाह के पश्चात पति -पत्नी आपसी सहमति अथवा एक तरफा  इच्छा से अधिनियम के नियमों के अधीन रहकर विवाह के बंधन से बाहर निकल सकते हैं.

इन नियमों के अंतर्गत संबंध-विच्छेद अथवा अलगाव के लिए कई प्रकार के आधारों को शामिल किया गया है, जो निम्नलिखित हैं –

1. अगर पति ने 2 वर्षो तक अपनी पत्नी को अपने साथ ना रखा हों या साथ रखने से इनकार किया हों .
2. अगर आपको मानसिक अथवा शारीरिक प्रताड़ना दी जाती हो, दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता हो, गालियां, धमकी या फिर शारीरिक चोट पहुंचाई जाती हो.
3. अगर आपके साथी को एक वर्ष से अधिक तक कोई लाइलाज बीमारी जैसे कुष्ठरोग हों.
4. अगर आपकी जानकारी या मर्जी के बिना किसी ऐसे व्यक्ति से आपका विवाह कराया गया हो जो दिमागी तौर पर बीमार हो.
5. अगर आपके साथी को यौन संक्रमण रोग हो, जिससे आपके गर्भ या आपके स्वास्थ्य के ऊपर असर पड़ सकता है.
6. अगर आपका साथी आपके रहते हुए दूसरा विवाह कर ले.
7. अगर आपका साथी संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो या संतान उत्पन्न करने की इच्छा नहीं रखता हो.
8. अगर आपका साथ आपकी इच्छा के विरुद्ध जाकर आपके साथ शारीरिक संबंध या अप्राकृतिक संबंध बनाने की कोशिश करता हो.

इन सब के अलावा अगर आपके साथी ने धर्म-परिवर्तन किया हो या संन्यास धारण कर लिया हो, तब भी आप तलाक की मांग कर सकते हैं.

किन-किन हस्तियों ने लिया तलाक

बौलीवुड में तो तलाक लेने का एक चलन सा है. कई मशहूर और सफल अभिनेत्रियों ने अपनी पसंद की शादियों को तोड़ा और अपने जीवन में किसी अन्य के साथी के साथ आगे बढ़ गयीं.

छैयां-छैयां फेम मलाइका अरोड़ा ने अरबाज खान से शादी के 18 साल बाद तलाक ले लिया. दिल तो पागल है, राजा हिंदुस्तानी जैसी कई सुपरहिट फिल्में देने वाली अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने अपने पति संजय कपूर के ऊपर घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए और फिर आपसी सहमति से अपनी 11 साल चली शादी से छुटकारा पा लिया. रितिक रौशन की पत्नी सुजैन खान हों या फिर सैफ अली खान की पत्नी अमृता सिंह हों, दोनों ने ही अपनी शादियों से बाहर निकल कर नई जिंदगी दुबारा शुरू की. निर्माता अनुराग कश्यप और अभिनेत्री कल्कि कोचलिन दो साल लिव-इन में रहने के बाद शादी के बंधन में बंधे और फिर एकदूसरे से अलग हो गए. ऐसे अनेकानेक उदाहरणों से बॉलीवुड भरा पड़ा है. तलाक जैसी चीज बौलीवुड में आम चलन बन गया है.

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कसौटी

मां  के फोन वैसे तो संक्षिप्त ही होते थे पर इतना महत्त्वपूर्ण समाचार भी वह सिर्फ 2 मिनट में बता देंगी, मेरी कल्पना से परे ही था.

‘‘शुचिता की शादी तय हो गई है. 15 दिन बाद का मुहूर्त निकला है, तुम सब लोगों को आना है,’’ बस, इतना कह कर वह फोन रखने लगी थीं.

‘‘अरे, मां, कब रिश्ता तय किया है, कौन लोग हैं, कहां के हैं, लड़का क्या करता है?’’ मैं ने एकसाथ कई प्रश्न पूछ डाले थे.

‘‘सब ठीकठाक ही है, अब आ कर देख लेना.’’

मां और बातें करने के मूड में नहीं थीं और मैं कुछ और कहती तब तक उन्होंने फोन रख दिया था.

लो, यह भी कोई बात हुई. अरे, शुचिता मेरी सगी छोटी बहन है, इतना सब जानने का हक तो मेरा बनता ही है कि कहां शादी तय हो रही है, कैसे लोग हैं. अरे, शुचि की जिंदगी का एक अहम फैसला होने जा रहा है और मुझे खबर तक नहीं. ठीक है, मां का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं रहता है, फिर शुचिता की शादी को ले कर पिछले कई सालों से परेशान हो रही हैं. पिताजी के असमय निधन से और अकेली पड़ गई हैं. भाई कोई है नहीं, हम 3 बहनें ही हैं. मैं, नमिता और शुचिता. मेरी और नमिता की शादी हुए काफी अरसा हो गया है पर पता नहीं क्यों शुचिता का हर बार रिश्ता तय होतेहोते रह जाता था. शायद इसीलिए मां इतनी शीघ्रता से यह काम निबटाना चाह रही हों.

जो भी हो, बात तो मां को पूरी बतानी थी. शाम को मैं ने फिर शुचिता से ही बात करनी चाही थी पर वह तो शुरू से वैसे भी मितभाषी ही रही है. अभी भी हां-हूं ही करती रही.

‘‘दीदी, मां ने बता तो दिया होगा सबकुछ…’’ स्वर भी उस का तटस्थ ही था.

‘‘अरे, पर तू तो पूरी बात बता न, तेरे स्वर में भी कोई खास उत्साह नहीं दिख रहा है,’’ मैं तो अब झल्ला ही पड़ी थी.

‘‘उत्साह क्या, सब ठीक ही है. मां इतने दिन से परेशान थीं, मैं स्वयं भी अब उन पर बोझ बन कर उन की परेशानी और नहीं बढ़ाना चाहती. अब यह रिश्ता तो जैसे एक तरह से अपनेआप ही तय हो गया है, तो अच्छा ही होगा,’’ शुचिता ने भी जैसेतैसे बात समाप्त ही कर दी थी.

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राजीव तो अपने काम में इतने व्यस्त थे कि उन को छुट्टी मिलनी मुश्किल थी. मेरा और बच्चों का रिजर्वेशन करवा दिया. मैं चाह रही थी कि 4-5 दिन पहले पहुंचूं पर मैं और नमिता दोनों ही रिजर्वेशन के कारण ठीक शादी वाले दिन ही पहुंच पाए थे.

मेरी तरह नमिता भी उतनी ही उत्सुक थी यह जानने के लिए कि शुचि का रिश्ता कहां तय हुआ और इतनी जल्दी कैसे सब तय हो गया पर जो कुछ जानकारी मिली उस ने तो जैसे हमारे उत्साह पर पानी ही फेर दिया था.

जौनपुर का कोई संयुक्त परिवार था. छोटामोटा बिजनेस था. लड़का भी वही पुश्तैनी काम संभाल रहा था. उन लोगों की कोई मांग नहीं थी. लड़के की बूआ खुद आ कर शुचिता को पसंद कर गई थीं और शगुन की अंगूठी व साड़ी भी दे गई थीं.

‘‘मां,’’ मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘जब इतने समय से रिश्ते देख रहे हैं तो और देख लेते. आप को जल्दी क्या थी. ऐसी क्या शुचि बोझ बन गई थी? अब जौनपुर जैसा छोटा सा पुराना शहर, पुराने रीतिरिवाज के लोग, संयुक्त परिवार, शुचि कैसे निभेगी उस घर में.’’

‘‘सब निभ जाएगी,’’ मां बोलीं, ‘‘अब मेरे इस बूढ़े शरीर में इतनी ताकत नहीं बची है कि घरघर रिश्ता ढूंढ़ती रहूं. इतने बरस तो हो गए, कहीं जन्मपत्री नहीं मिलती, कहीं दहेज का चक्कर… और तुम दोनों जो इतनी मीनमेख निकाल रही हो, खुद क्यों नहीं ढूंढ़ दिया कोई अच्छा घरबार अपनी बहन के लिए.’’

मां ने तो एक तरह से मुझे और नमिता दोनों को ही डपट दिया था.

यह सच भी था, हम दोनों बहनें अपनेअपने परिवार में इतनी व्यस्त हो गई थीं कि जितने प्रयास करने चाहिए थे, चाह कर भी नहीं कर पाए.

खैर, सीधेसादे समारोह के साथ शुचिता ब्याह दी गई.

मैं और नमिता दोनों कुछ दिन मां के पास रुक गए थे पर हम रोज ही यह सोचते कि पता नहीं कैसे हमारी यह भोलीभाली बहन उस संयुक्त परिवार में निभेगी. हम लोग ऐसे परिवारों में कभी रहे नहीं. न ही हमें घरेलू काम करने की अधिक आदत थी. पिताजी थे तब काफी नौकरचाकर थे और अभी भी मां ने 2 काम वाली बाई लगा रखी थीं और खाना भी उन्हीं से बनवा लेती थीं.

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फिर शुचि का तो स्वभाव भी सरल सा है. तेजतर्रार सास, ननदें, जेठानी सब मिल कर दबा लेंगी उसे.

जब चचेरा भाई रवि विदा कराने गया तब हम लोग यही सोच कर आशंकित थे कि पता नहीं शुचि आ कर क्या हालचाल सुनाए. पर उस समय तो उस की सास ने विदा भी नहीं किया. रवि से यह कह कर कि महीने भर बाद भेजेंगी, अभी किसी बच्चे का जन्मदिन है, उसे भेज दिया था.

उधर रवि कहता जा रहा था, ‘‘दीदी, शुचि दीदी को आप ने कैसे घर में भेज दिया, वह घर क्या उन के लायक है. छोटा सा पुराने जमाने का मकान, उस में इतने सारे लोग…अब आजकल कौन बहुओं से घूंघट निकलवाता है, पर शुचि दीदी से इतना परदा करवाया कि मेरे सामने ही मुश्किल से आ पाईं.

‘‘ऊपर से सास, ननदें सब तेजतर्रार. सास ने तो एक तरह से मुझे ही झिड़क दिया कि बहू से घर का कामकाज तो होता नहीं है, इतना नाजुक बना कर रख दिया है लड़की को कि वह चार जनों का खाना तक नहीं बना सकती, पर गलती तो इस की मां की है जो कुछ सिखाया नहीं. अब हम लोग सिखाएंगे.

‘‘सच दीदी, इतनी रोबीली सास तो मैं ने पहली बार देखी.’’

रवि कहता जा रहा है और मेरा कलेजा बैठता जा रहा था कि इतने सीधेसादे ढंग से शादी की है, कहीं लालची लोग हुए तो दहेज के कारण मेरी बहन को प्रताडि़त न करें. वैसे भी दहेज को ले कर इतने किस्से तो आएदिन होते रहते हैं.

शुचि से मिलना भी नहीं हो पाया. मां से भी इस बारे में अधिक बात नहीं कर पाई. वैसे भी हृदय रोग की मरीज हैं वे.

शुचि से फोन पर कभीकभार बात होती तो जैसा उस का स्वभाव था हांहूं में ही उत्तर देती.

बीच में दशहरे की छुट्टियों में फिर मां के पास जाना हुआ था. सोचा कि शायद शुचि भी आए तो उस से भी मिलना हो जाएगा पर मां ने बताया कि शुचि की सास बीमार हैं…वह आ नहीं पाएगी.

‘‘मां, इतने लोग तो हैं उस घर में फिर शुचि तो नईनवेली बहू है, क्या अब वही बची है सास की सेवा को, जो चार दिन को भी नहीं आ सकती,’’ मैं कहे बिना नहीं रह पाई थी. मुझे पता था कि उस की ननदें, जेठानी सब इतनी तेज हैं तो शुचि दब कर रह गई होगी.

उधर मां कहे जा रही थीं, ‘‘सास का इलाज होना था तो पैसे की जरूरत पड़ी. शुचि ने अपने कंगन उतार कर सास के हाथ पर धर दिए…सास तो गद्गद हो गईं.’’

मैं ने माथे पर हाथ मारा. हद हो गई बेवकूफी की भी. अरे, छोटीमोटी बीमारी का तो इलाज यों ही हो जाता है फिर पुश्तैनी व्यापार है, इतने लोग हैं घर में… और सास की चतुराई देखो, जो थोड़ा- बहुत जेवर शुचि मायके से ले कर गई है उस पर भी नजरें गड़ी हैं.

उधर मां कहती जा रही थीं, ‘‘अच्छा है उस घर में रचबस गई है शुचि…’’

मां भी आजकल पता नहीं किस लोक में विचरण करने लगी हैं. सारी व्यावहारिकता भूल गई हैं. शुचि के पास कुछ गहनों के अलावा और है ही क्या.

मेरा तो मन ही उचट गया था. घर आ कर भी मूड उखड़ाउखड़ा ही रहा. राजीव से यह सब कहा तो उन का तो वही चिरपरिचित उत्तर था.

‘‘तुम क्यों परेशान हो रही हो. सब का अपनाअपना भाग्य है. अब शुचि के भाग्य में जौनपुर के ये लोग ही थे तो इस में तुम क्या कर सकती हो और मां से क्या उम्मीद करती हो? उन्होंने तो जैसे भी हो अपना दायित्व पूरा कर दिया.’’

फोन पर पता चला कि शुचि बीमार है, पेट में पथरी है और आपरेशन होगा. दूसरी कोई शिकायत हो सकती है तो पहले सारे टेस्ट होंगे, बनारस के एक अस्पताल में भरती है.

‘‘तुम लोग देख आना, मेरा तो जाना हो नहीं पाएगा,’’ मां ने खबर दी थी.

नमिता भी छुट्टी ले कर आ गई थी. वहीं अस्पताल के पास उस ने एक होटल में कमरा बुक करा लिया था.

‘‘रीता, मैं तो 2 दिन से ज्यादा रुक नहीं पाऊंगी, बड़ी मुश्किल से आफिस से छुट्टी मिली है,’’ उस ने मिलते ही कहा था.

‘‘मैं भी कहां रुक पाऊंगी, छोटू के इम्तहान चल रहे हैं, नौकर भी आजकल बाहर गया हुआ है. बस, दिन में ही शुचि के पास बैठ लेंगे, रात को तो जगना भी मुश्किल है मेरे लिए,’’ मैं ने भी अपनी परेशानी गिना दी थी.

सवाल यह था कि यहां रुक कर शुचि की देखभाल कौन करेगा? कम से कम 10 दिन तो उसे अस्पताल में ही रहना होगा. अभी तो सारे टेस्ट होने हैं.

हम दोनों शुचि को देखने जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि उस की दोनों ननदें आई हुई हैं. बूढ़ी सास भी उसे संभालने आ गई हैं और उन लोगों ने काटेज वार्ड के पास ही कमरा ले लिया था.

दबंग सास बड़े प्यार से शुचि के सिर पर हाथ फेर रही थीं.

‘‘फिक्र मत कर बेटी, तू जल्दी ठीक हो जाएगी, मैं हूं न तेरे पास. तेरी दोनों ननदें भी अपनी ससुराल से आ गई हैं. सब बारीबारी से तेरे पास सो जाया करेंगे. तू अकेली थोड़े ही है.’’

उधर शुचि के पति चम्मच से उसे सूप पिला रहे थे, एक ननद मुंह पोंछने का नैपकिन लिए खड़ी थी.

‘‘दीदी, कैसी हो?’’ शुचि ने हमें देख कर पूछा था. मुझे लगा कि इतनी बीमारी के बाद भी शुचि के चेहरे पर एक चमक है. शायद घरपरिवार का इतना अपनत्व पा कर वह अपनी बीमारी भूल गई है.

पर पता नहीं क्यों मेरे और नमिता के सिर कुछ झुक गए थे. कई बार इनसानों को समझने में कितनी भूल कर देते हैं हम.

मैं ऐसा ही कुछ सोच रही थी.

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