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लेन-देन

लेखक- नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

मनोहर की चाय की गुमटी रेंगरेंग कर चल रही थी. घर का खर्च भी चलाना मुश्किल था. उसी में 5 लोगों का पेट पालना था.

अपने एक खास ग्राहक के कहने पर मनोहर ने गुमटी पर शराब के पाउच भी रखने शुरू कर दिए. 2-4 ग्राहकों को बता भी दिया. फिर क्या था. चाय के बहाने पाउचों की बिक्री बढ़ती चली गई.

थानेदार को यह बात पता चली, तो वह 2 हवलदारों को ले कर गुमटी

पर आ धमका और रोज के 4 सौ रुपए कमीशन मांगने लगा.

मनोहर हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, मैं रोज 4 सौ रुपए नहीं दे पाऊंगा. हां, हर महीने इतने रुपए थाने में पहुंचा दिया करूंगा.’’

‘‘तू मुझे 4 सौ रुपए की भीख देगा…’’ कह कर थानेदार ने उसे एक लात मारी और चिल्लाया, ‘‘खुलेआम दारू बेचता है और मुझे 4 सौ रुपए का थूक चाटने को कहता है.’’

मनोहर की पत्नी श्यामा ने दौड़ कर उसे उठाया और थानेदार से बोली, ‘‘हमें माफ कर दीजिए सरकार. हम दारू का धंधा ही छोड़ देंगे.’’

‘‘तू दारू का धंधा छोड़ देगी, तो हमारी आमदनी कैसे होगी? तू दारू बेचेगी और रुपए के साथ सजसंवर कर मेरे पास आएगी,’’ कहते हुए थानेदार ने एक आंख दबाई.

तभी मनोहर की 15, 13 और

9 साल की 3 बेटियां स्कूल से छुट्टी होने के बाद बस्ता टांगे वहां आ गईं.

मनोहर की बड़ी बेटी पायल, जो 9वीं जमात में पढ़ रही थी, को समझते देर न लगी. वह बोली, ‘‘पापा, मैं ने मना किया था न कि दारू मत बेचो. देखो, आज पुलिस आ ही गई. हमारी

इज्जत गई न…’’ कहतेकहते उस का गला भर आया.

‘‘ताजा गुलाब की तरह खिलीखिली है तेरी बेटी. आज रात इसे

मेरे क्वार्टर पर 10 पाउच के साथ भेज देना,’’ कहते हुए थानेदार की आंखों में गुलाबी रंगत छा गई.

‘‘नहीं साहब, मैं इसे नहीं भेजूंगा,’’ मनोहर बोला.

इतना सुनते ही थानेदार ने एक तमाचा मनोहर को रसीद कर दिया.

‘‘रात को 8 बजे तेरी बेटी थाने में पहुंच जानी चाहिए, नहीं तो समझ लेना कि कल मैं तेरा क्या हाल करूंगा,’’ कहते हुए उस ने दूसरा तमाचा उठाया, तभी एकाएक पायल बोली, ‘‘सर, मैं आने के लिए तैयार…’’

‘‘बेटी, यह तू क्या कह रही है?’’ यह सुन कर मनोहर के होश उड़ गए.

‘‘पापा, आप डरिए मत. सर, कल से मेरे इम्तिहान शुरू हैं. मैं अगले हफ्ते आऊंगी. आप कहेंगे, तो मैं अपनी 2-4 सहेलियों को भी साथ लाऊंगी. वे सब तो मुझ से भी ज्यादा खूबसूरत हैं.’’

थानेदार ने खुशी से झूमते हुए एक आंख दबाई, फिर वह मनोहर से बोला, ‘‘तेरी बेटी कितनी समझदार है.’’

इस के बाद थानेदार वहां से चला गया.

‘‘बेटी, तू ने उस नीच के साथ यह कैसा सौदा कर लिया? अपने साथ सहेलियों की भी जिंदगी बरबाद करेगी,’’ कहते हुए मां श्यामा बहुत डर गई थी.

‘‘आप लोग शांत रहिए. मुझे जैसा करना होगा, मैं करूंगी,’’ कह कर पायल बस्ता लिए घर चली गई.

पायल ने इस बारे में अपनी सहेलियों से बात की, तो वे सभी राजी हो गईं.

वादे के मुताबिक अगले हफ्ते ही पायल दारू और 4 सौ रुपए ले कर थाने पहुंच गई.

थानेदार ने पूछा, ‘‘तुम्हारी सहेलियां किधर हैं?’’

‘‘2-4 नहीं, बल्कि वे तो 8-10 हैं. वे सब टेकरी के पास हैं. किसी ने आप को इस थाने में इतनी सारी लड़कियों के साथ कुछ उलटासीधा करते देख लिया, तो आप की लुटिया ही डूब जाएगी, इसलिए मैं ने उन को यहां से कुछ दूर रखा है सर…’’ पायल थानेदार के कान में धीरे से फुसफुसाई, ‘‘हम कड़ैया गांव चलें. वहां पुराने बरगद के पास एक खंडहरनुमा मकान है. वहां ज्यादा ठीक रहेगा.’’

‘‘हाय पायल, मैं तो खुशी के मारे मर जाऊं,’’ कह कर थानेदार ने उस के गुलाबी गाल मसल दिए और बोला, ‘‘तू तो बड़ी होशियार है. चल, वहीं चलते हैं.’’

थानेदार एक हवलदार के भरोसे थाना छोड़ कर पायल के साथ अपनी जीप से कुछ दूरी पर टेकरी के पास गया.

वहां पायल की ही उम्र की 8-10 लड़कियों को जींसटौप में खड़ी देख थानेदार की लार टपकने लगी.

‘‘ऐसे गुलाब के फूलों के सामने ये रुपए क्या चीज हैं,’’ उस ने जेब से रुपए निकाल कर पायल को लौटा दिए, ‘‘हां, दारू तो मैं जरूर पीऊंगा.’’

पायल ने कहा, तो सारी लड़कियां जीप में बैठने लगीं, तभी 14-15 लड़के वहां आ धमके.

यह नजारा देख एक लड़के ने पायल को घूरते हुए पूछा, ‘‘पायल, तुम

सब थानेदार साहब के साथ कहां जा रही हो?’’

‘‘विशाल, हम कड़ैया गांव में ट्रेनिंग के लिए जा रहे हैं. आएदिन लड़कियों के साथ उलटीसीधी घटनाएं हो रही हैं, इसलिए थानेदार साहब ने कहा है कि वे हम सब को कराटे सिखाएंगे?’’

‘‘हांहां,’’ थानेदार झट से बोला, ताकि उस की चोरी पकड़ी न जाए.

‘‘पायल, आज तुम इस पीली ड्रैस में बहुत खूबसूरत दिख रही हो. मैं तुम्हारा फोटो खींच लूं?’’

‘‘हांहां, खींचो न.’’

विशाल ने पायल के साथ थानेदार और सारी लड़कियों के भी फोटो खींचे.

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थानेदार गाड़ी स्टार्ट कर पसीना पोंछते हुए बोला, ‘‘मैं तो डर ही गया था. अच्छा हुआ कि तुम ने ऐन मौके पर ट्रेनिंग की बात कह दी, नहीं तो मैं काम से गया था.’’

थानेदार के बगल में बैठी पायल और बाकी लड़कियां मुसकरा दीं.

कड़ैया गांव 10 किलोमीटर दूर था. थानेदार घूंटघूंट दारू पीते हुए आगे टंगे आईने में लड़कियों को देख मदहोश हुआ जा रहा था. वह बहुत तेज गाड़ी चला रहा था, ताकि जल्दी कड़ैया गांव पहुंचे.

‘‘सर… सर, गाड़ी रोकिए,’’ पायल इतराते हुए बोली.

थानेदार ने झट से ब्रेक मारा और पूछा, ‘‘यहां गाड़ी क्यों रुकवाई?’’

फिर उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. वह एकदम सुनसान जंगल था. दूरदूर तक बड़ेबड़े पेड़ दिखाई दे रहे थे. कड़ैया गांव अभी 4-5 किलोमीटर दूर था.

‘‘सर, आगे जाने से क्या फायदा? जो काम वहां हो सकता है, क्या वह यहां नहीं हो सकता?’’ पायल ने थानेदार की लाललाल आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘कितना मस्त मौसम है. हलकीहलकी धूप, ठंडीठंडी बहती हवा, घने पेड़, आप और हम सब तितलियां.’’

‘‘मुझ से ज्यादा तुम बेकरार हो,’’ थानेदार ने सीना फुला कर कहा, ‘‘चलो, यहीं उतरते हैं.’’

सभी जीप से उतर गए. थानेदार के साथ चिकनीचुपड़ी बातें करते हुए सारी लड़कियां आगे बढ़ रही थीं.

पायल थानेदार को एकएक पाउच दारू थमाते जा रही थी. वह पाउच के कोने को दांत से काट कर गटागट शराब पीता जा रहा था.

‘‘सर, अपने कपड़े उतार लीजिए,’’ जींस वाली एक लड़की ने इतना कह कर थानेदार के गाल सहला दिए.

लड़कियों के नशे में अंधे थानेदार ने रिवाल्वर उसे थमा कर अपनी खाकी वरदी खोल कर हवा में उछाल दी.

पायल ने उसे एक पेड़ के सहारे खड़ा कर दिया, ‘‘सर, आप कितने खूबसूरत हैं. काश, आप जैसे से मेरी शादी होती…’’ वह खूब मीठीमीठी बातें बोलती गई.

थानेदार के पूरे शरीर में रोमांच हो आया. लेकिन जब वह उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ा, तो उस के होश फाख्ता हो गए.

बाकी लड़कियों ने थानेदार को रस्सी से पेड़ के सहारे कस कर बांध दिया था.

खुद को पेड़ से बंधा पा कर थानेदार का दारू और लड़की का नशा काफूर हो गया, ‘‘अरे लड़कियो, यह क्या मजाक है. मुझे छोड़ो. प्यार का वक्त निकला जा रहा है,’’ सिर्फ अंडरवियर पहने थानेदार बोला.

सारी लड़कियां खिलखिला पड़ीं. एक लड़की ने कहा, ‘‘थानेदारजी, आप अकेले इतनी लड़कियों से कैसे प्यार करेंगे? आप तो बस इस पेड़ से बंधे इसे ही प्यार कीजिए. हम तो चले.’’

‘‘मुझे इस जंगल में छोड़ कर तुम सब जाओगी, तो पुलिस तुम लोगों को जिंदा नहीं छोड़ेगी.’’

‘‘हमें कुछ नहीं होगा…’’ पायल बोली, ‘‘बल्कि तुम्हारा पूरा पुलिस महकमा बदनाम हो जाएगा कि तुम ने 8-10 लड़कियों को ट्रेनिंग देने के नाम पर उन के साथ गलत हरकत की. इस बात को साबित करने के लिए विशाल के कैमरे में तुम्हारे और हम सभी लड़कियों के फोटो मौजूद हैं.’’

थानेदार ने हड़बड़ा कर नजरें घुमाईं.

एक लड़की मुसकराते हुए थानेदार के हर एंगल से खटाखट फोटो खींचे जा रही थी.

थानेदार अपना ही सिर खुद पेड़ पर मारने लगा, ‘‘अरे बाप रे, अब तो मेरी नौकरी गई…’’ फिर वह गरजा, ‘‘ऐ छोकरी, मेरे फोटो खींचना बंद कर.’’

पायल बोली, ‘‘थानेदार, तुम ने मुझ पर बुरी नजर डाली थी न, अब सब लेनदेन बराबर हो गया. मैं ने पापा को दारू बेचने से मना कर दिया और उन्होंने बेचनी भी बंद कर दी.

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‘‘मगर फिर भी तुम ने उन को या दूसरे ठेले, गुमटी और रेहड़ी वालों को परेशान किया या उन की बीवीबेटी या मांबहन पर बुरी नजर डाली, तो तुम्हारी हवा में लहराती वरदी वाली और ये सब तसवीरें हर अखबार में छप जाएंगी.’’

थानेदार की तो हालत खराब हो गई कि जिस पायल के चक्कर में वह पड़ा था, उस ने तो उसे घनचक्कर बना दिया.

थानेदार बोला, ‘‘मेरी मां, ऐसा गजब मत करना. मैं तुम्हारी हर बात मानूंगा. मेरी इज्जत बख्श दे. उलटे, मैं तुम्हें हर हफ्ते कमीशन दिया करूंगा, पर मेरा फोटो अखबार में मत छपवाना…’’

थानेदार को यों गिड़गिड़ाते हुए देख पायल के साथ आई सारी लड़कियां हंस पड़ीं और वहां से चली गईं.

सुल्तानपुर में पुलिस कस्टडी में मौत: क्लीन चिट देने के बाद जांच की बात

पुलिस कस्टडी में डेथ के मामले में कारोबारी सत्य प्रकाश शुक्ला की मौत के मामले में सुल्तानपुर की एसपी डौक्टर ख्याति गर्ग ने कहा कि सत्य प्रकाश शुक्ला के परिजनों की मांग पर मुकदमा कायम किया गया है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सत्य प्रकाश शुक्ला के बाहरी शरीर पर बाहरी चोट के निशान नहीं मिले. शरीर में जहर की संभावना को देखते हुए जांच के लिये विसरा सुरक्षित कर जांच के लिये भेज दिया गया है. घटना से उत्तर प्रदेश सरकार की किरकिरी होने लगी है. ऐसे में पुलिस अलग-अलग तरह के काम कर रही है.

सत्य प्रकाश शुक्ला को पुलिस 26 लाख की लूट के मामले में पूछताछ के लिये पीपरपुर थाने लाई थी. उसके साथ उसके दो बेटे भी थे. थाने में ही पूछताछ के बाद सत्य प्रकाश की तबियत खराब हो गई. जहां से उनको अस्पताल ले जाया गया. पीएससी डाक्टर की रिपोर्ट के अनुसार सत्यप्रकाश ने कोई जहरीली चीज खाई थी. सत्य प्रकाश शुक्ला के दोनो बेटों ने पुलिस द्वारा थर्ड डिग्री दिये जाने का आरोप लगाया.

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पुलिस हिरासत मौत की घटना से पूरे प्रदेश में हलचल मच गई. समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा ‘इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिये’. पुलिस कस्टडी में हत्या की घटना में बचाव में उतरी सुल्तानपुर की एसपी डाक्टर ख्याति गर्ग ने अपने वीडियो बयान में कहा कि ‘सत्य प्रकाश के शरीर पर कोई बाहरी चोट नही है.‘ इस बयान का मतलब यह था कि पुलिस ने थर्ड डिग्री नहीं दी है. ऐसे में पुलिस कस्टडी की बात गलत है.

इसके बाद भी लोगों को बात पर भरोसा नहीं हुआ तो एसपी सुल्तानपुर के ही आदेश पर ही अमेठी की एसओजी टीम और पीपरपुर पुलिस के खिलाफ हत्या व लूट की धाराओं में मुकदमा कायम किया गया. सवाल उठता है कि जब सत्य प्रकाश शुक्ला के शरीर पर बाहरी चोट के निशान ही नहीं मिले तो पुलिस दोषी कैसे होगी? जिस पुलिस को एसपी ने पहले ही क्लीन चिट दे दी उसके खिलाफ जांच का क्या मकसद है? एसपी के बयान से साफ है कि पुलिस ने यह मुकदमा केवल जनता के गुस्से और राजनीति नुकसान को रोकने के लिये कायम किया है

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1.33 करोड़ खर्च कर जले 6 लाख दीये

एक पुरानी कहावत है ‘9 की लकड़ी 90 खर्च‘ उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर यह कहावत पूरी तरह से फिट बैठती है. अयोध्या में ‘राम की पैडी’ पर दीपोत्सव मनाने के लिये उत्तर प्रदेश सरकार ने 5 लाख 50 हजार से अधिक के मिट्टी के दीये जलाने का लक्ष्य रखा था. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये सरकार ने ‘दीपोत्सव’ के बजट को बढाकर 1.33 करोड़ का कर दिया था. ऐसे में सरकार ही नहीं दूसरे तमाम संस्थान भी दीपोत्सव को सफल बनाने में कमर कस कर खड़े हो गये. जिसके फलस्वरूप 6 लाख से अधिक के दीये रोशन हो गये.

पिछले साल दीपोत्सव के बाद अगली सुबह दीयें पूरी अयोध्या में बिखरे पड़े थे. इस बार सरकार और अयोध्या नगर निगम ने कार्यक्रम खत्म होने के बाद ही कार्यक्रम स्थल से दीयों को समेटना शुरू कर दिया. इन दीयों को आधी रात सरयू नदी मे प्रवाहित कर दिया गया.

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‘दीपोत्सव’ को सफल बनाने के लिये उत्तर प्रदेश सरकार के बड़े अफसर कई दिनों से तैयारी कर रहे थे. 3 दिन के दीपोत्सव के समापन वाले दिन दीये जगमगाये गये थे. दीवाली के दिन शाम को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और मुख्य अतिथि के रूप मे फिजी गणराज्य की डिप्टी स्पीकर वीना भटनागर के साथ उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और केशव मौर्य भी मौजूद थे.

दीपोत्सव को ऐतिहासिक बनाने के लिये गिनीज बुक और वर्ल्ड रिकार्ड के लोगों ने उसे सबसे अधिक दीये जलाने का रिकार्ड दर्ज किया. राम और सीता को हेलीकाप्टर से सरयू के तट पर उतारा गया और तब मुख्यमंत्री ने उनकी आरती उतारी. पिछली बार सीता बनी मौडल के फोटो वायरल हो गये थे इस बार सीता बनी मौडल को लोगों से दूर रखा गया.

उत्तर प्रदेश के लिये राम मंदिर की राजनीति महत्वपूर्ण है. इसके लिये राम के नाम पर भव्य आयोजन जनता को लुभाने का काम करते है. भव्य आयोजन में कोई कमी ना रह जाये इस लिये बजट को बढ़ा कर 1.33 करोड़ कर दिया गया. बजट के बढ़ने से सरकारी विभागों और गैर सरकारी संस्थाओं की रूचि इसमें बढ़ गई. जिस प्रदेश में जनता रोजगार, नौकरी के लिये दरदर भटक रही हो वहां एक दीये जलाने के लिये 22 सौ रूपये खर्च कर रही है.

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सिंगल यूज प्लास्टिक को बंद करने के बाद सरकार ने कुल्हड़ और दीयें के प्रचार पर इस बहाने जोर भी दिया है. कुल्हड़ और मिट्टी के दीयें का प्रचार करते समय अपने देश की मिट्टी की बिगड़ती सेहत को ध्यान देने की जरूरत है. अगर पूरा देश मिट्टी के कुल्हड़ और दीयें का प्रयोग करने लगेगा तो इनको तैयार करने के लिये जितनी मिट्टी की जरूरत पड़ेगी वह नहीं है.

भोपाल में शुरू हुई भोजपुरी फिल्म की शूटिंग, चांदनी सिंह के साथ पहुंचे अरविंद अकेला

अपनी फिल्मों के जरिये  दर्शकों का खूब मनोरंजन करने वाली आदि शक्ति इंटरटेनमेंट की नयी फिल्म गुमराह की शूटिंग इन दिनों भोपाल में तेजी से चल रही है. इस भोजपुरी फिल्म में वर्सेलटाइल एक्टर अरविन्द अकेला कल्लू और यू-ट्यूब की सनसनी चांदनी सिंह के साथ द मोस्ट टैलेंटेड एक्ट्रेस पूनम दुबे तथा अयाज़ खान, बंधु खन्ना और संजय पांडे की मुख्य भूमिका है. इस फिल्म को निर्देशित कर रहे हैं रवि सिन्हा. फिल्म को संगीत दिया है श्याम आजाद ने जबकि कथा, पटकथा और संवाद तैयार किया है शाजिद शमसेद ने.

फिल्म को लेकर एक्साइटेड हैं चांदनी सिंह…

फिल्म गुमराह को लेकर पूरी टीम में शूटिंग के दौरान गजब का उत्साह दिखाई दे रहा है. फिल्म की नायिका चांदनी सिंह कहती हैं मैं पहली बार आदि शक्ति इंटरटेनमेंट की फिल्म कर रही हूं और दुर्गाप्रसाद मजूमदार सर का नाम मैनें काफी सुना है. एक अच्छे प्रोडक्शन हाऊस में काम करना सबका सपना होता और अगर आदि शक्ति इंटरटेनमेंट जैसा प्रोडक्शन हाउस और  रवि सिन्हा जी जैसे समझदार निर्देशक मिल जायें तो यह सोने पर सुहागा होता है.

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मैं काफी मेहनत कर रही हूं- पूनम दुबे

फिल्म की दूसरी नायिका पूनम दुबे का कहना है- इस फिल्म में मेरी भूमिका लीक से हटकर है और मैं अपनी भूमिका के लिये काफी मेहनत कर रही हूं. फिल्म के निर्देशक रवि सिन्हा कहते हैं यह फिल्म दूसरी भोजपुरी फिल्मों से काफी अलग है.

ऐसे की अरविंद अकेला कल्लू की तारीफ…

एक्टर अरविंद अकेला कल्लू के बारे में फिल्म के निर्माता दुर्गाप्रसाद मजूमदार कहते हैं अरविंद अकेला कल्लू में गजब का डेडिकेशन है. दुर्गाप्रसाद मजूमदार कहते हैं मैने दिनेशलाल यादव निरहुआ और खेशारी लाल यादव सबके साथ काम किया है मगर अरविंद अकेला कल्लू में काफी लगन है अपने काम के प्रति. वे बहुत दूर तक जायेंगे.

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एडिट बाय- निशा राय

‘‘कश्मीर में बहुत सी मानवीय कहानियां हैं’: प्रवीण मोरछले

मूलतया मध्य प्रदेश निवासी और ?यूनेस्को गांधी मैडल 2018  पुरस्कार विजेता व राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2018 के विजेता फिल्मकार प्रवीण मोरछले ने कैरियर की शुरुआत थिएटर से की थी. इस के बाद उन्होंने कई लघु फिल्में निर्देशित कीं. 2013 में बतौर लेखक व निर्देशक अपनी पहली फीचर फिल्म ‘बेयरफुट टू गोवा’ से उन्होंने इंटरनैशनल स्तर पर पर अपनी एक पहचान हासिल की. क्रिटिक्स ने उन्हें एक नई लहर के रूप में भारतीय सिनेमा के फिल्म निर्माता के रूप में देखा. वे अपने सरल, सूक्ष्म, काव्य सिनेमा के लिए जाने जाते हैं. उन की दूसरी फिल्म ‘वाकिंग विद द विंड’ को 2018 में 3 राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया. यह लद्दाखी भाषा की फिल्म थी.

अब उन की तीसरी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ ने 6 माह के अंदर 5 इंटरनैशनल अवार्ड जीते हैं, जबकि 11 इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल्स में इंटरनैशनल कंपीटिशन का हिस्सा रही. इसराईल, कोरिया, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में फिल्म ने धूम मचाई है.

प्रवीण मोरछले से यह पूछने पर कि आप की पिछली फिल्म ‘वोकिंग विद द विंड’ को 3 राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा कुछ अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे. इस का आप के कैरियर व जिंदगी पर क्या असर हुआ? क्या अब आप की नई फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ को फायदा मिल रहा है? वे कहते हैं, ‘‘देखिए, राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मेरे पास निर्माताओं की कतार लग गई हो और सभी ने मुझ से कहा हो कि मेरे साथ फिल्में बनाना चाहते हैं. मगर राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर हमें गर्व का एहसास होता है कि हमारे देश ने हमारे काम को सराहा. लेकिन इस के चलते ऐसा कुछ नहीं हुआ कि कुछ बेहतरीन कहानीकारों ने मेरे सामने अपनी कहानी ला कर रख दी हो कि इस पर फिल्म बननी चाहिए. किसी ने मुझे पैसा ला कर नहीं दिया कि आप फिल्म बनाएं, धन हम लगाते हैं.

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‘‘पर मैं चुप नहीं बैठा. फिल्म ‘वाकिंग विद द विंड’ को 3 राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद मैं ने अपने पैसे लगा कर नई फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ का निर्माण किया है.’’

आमतौर पर माना जाता है कि जब किसी निर्देशक की फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाता है तो उस के लिए अपनी अगली फिल्म को भी सिनेमाघरों में पहुंचाना आसान हो जाता है. आप के अनुभव क्या हैं? इस प्रश्न पर प्रवीण जवाब देते हैं, ‘‘मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता. हालात जिस तरह से बदतर हुए हैं उस में अच्छी से अच्छी फिल्म को भी सिनेमाघर में ले आना टेढ़ी खीर हो गया है. आज की तारीख में सबकुछ गणित पर चल रहा है. अब सिनेमाघरों में फिल्म के पहुंचने के कई पैमाने हो गए हैं.

‘‘फिल्म में कलाकार कौन हैं, स्टार कलाकार हैं या नहीं, फिल्म कितने दिन सिनेमाघर में चल पाएगी, फिल्म कितनी कमाई करेगी और डिस्ट्रिब्यूटर को या सिनेमाघर के मालिक को कितना कमा कर देगी? इन सभी के आधार पर फिल्म रिलीज होती है. मेरी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ में सभी नए कलाकार हैं. कुछ तो नौन आर्टिस्ट हैं.

‘‘फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करने की दूसरी समस्या यह है कि दर्शकों को सिनेमा घर तक ले कर आना आसान काम नहीं है. इस की वजह यह है कि दर्शकों की सोच यह बन गई है कि यह छोटे बजट की फिल्म है अथवा पुरस्कृत फिल्म है, तो बहुत जल्दी टीवी पर या किसी सैटेलाइट चैनल या नैटफ्लिक्स और एमेजौन पर आएगी, तब देख लेंगे.’’

फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ क्या है? इस पर प्रवीण कहते हैं, ‘‘हमारी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ की कहानी कश्मीर की ‘हाफ विडो’ की है. यह शब्द बहुत दुख देने के साथ ही अच्छा भी नहीं लगता. कश्मीर में ‘हाफ विडो’ उन महिलाओं को कहा जाता है जिन महिलाओं के पति गायब हैं. कश्मीर में पिछले 40 वर्षों के दौरान तमाम औरतों के पति गायब होते रहे हैं जिन का कुछ पता नहीं चलता कि वे मर गए या जिंदा हैं. यदि जिंदा हैं, तो कहां हैं? उन की मृत्यु स्थापित नहीं हो पाती है. इस के चलते इन महिलाओं को विधवा नहीं माना जाता.

‘‘हमारी फिल्म की कहानी बहुत मार्मिक है. यह कहानी आसिया नामक एक ऐसी महिला की है जो अपने पति की मौत का प्रमाणपत्र लेने के लिए दरदर भटक रही है. हर किसी को पता है कि भारतीय कानून के अनुसार 7 साल तक किसी को भी मृत नहीं माना जाता. कश्मीर की औरतें अपने पति के गायब होने पर 7 साल तक दुख और जिल्लतभरी जिंदगी जीती हैं. यह एक गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली कहानी है. इसी के चलते पूरी दुनिया में इस फिल्म को बहुत सराहा गया.’’

यह कहानी आप के दिमाग में कैसे आई? थोड़ा विचारने पर प्रवीण उत्तर देते हुए कहते हैं, ‘‘2 साल पहले किसी अखबार में एक खबर पढ़ी थी जिस में ‘हाफ विडो’ का जिक्र था. मुझे बड़ा अजीब सा लगा. मैं ने अब तक विधवा, शादीशुदा या कुंआरी कन्या यही सब सुना था. मुझे पता ही नहीं था कि ‘हाफ विडो’ भी होता है. इस से मेरे मन में कुतूहल जागा. फिर मैं ने इंटरनैट वगैरह पर काफी रिसर्च की तो पता चला कि कश्मीर की औरतें किस तरह दर्दनाक जिंदगी जी रही हैं. 10 दिनों के अंदर मैं कश्मीर पहुंच गया. कई गांवों में गया. कुछ औरतों से बातचीत की. कुछ सरकारी अफसरों से दफ्तरों में जा कर बात की. कुछ डौक्युमैंट्स इकट्ठे किए. फिर वहां मौजूद कुछ किताबें पढ़ीं. उसी आधार पर मैं ने अपनी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ की पटकथा तैयार की.’’

प्रवीण से पूछने पर कि आप ने अपनी फिल्म में किस बात को प्रधानता दी है, तो वे कहते हैं, ‘‘मेरी आदत है कि मैं एक मुख्य किरदार के इर्दगिर्द कई दूसरे किरदार रचता हूं. इस में कुछ किरदार बहुत ही व्यंग्यप्रधान हैं, तो कुछ बहुत साधारण. इस के अलावा कहानी कश्मीर की है तो कश्मीर का पूरा माहौल है. मेरी फिल्में मेलोड्रामा नहीं होतीं. मैं कभी भी किसी भी मुद्दे पर जजमैंटल नहीं होता. बहुत ज्यादा कटाक्ष नहीं करता. मेरी कोशिश होती है कि मैं अपनी तरफ से सारे तथ्य सामने रख दूं, उस के बाद दर्शक खुद देख कर अपना निर्णय लें. मैं ने एक बहुत ही गंभीर फिल्म बनाई है जो लोगों को प्रभावित करेगी.’’

इस के बाद की क्या योजना है? इस पर वे कहते हैं, ‘‘मैं अपनी अगली फिल्म कश्मीर में ही बनाने वाला था. लेकिन अभी जो परिस्थितियां हैं, उस के हिसाब से वहां काम करना आसान नहीं है. तो मैं परिस्थितियों के सुधरने का इंतजार करूंगा.’’

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कश्मीर से आप को कुछ ज्यादा ही लगाव है? इस पर वे कुछ यों जवाब देते हैं, ‘‘जी हां, मुझे पहाड़ व प्रकृति से लगाव है. दूसरी बात यह है कि कश्मीर खूबसूरत भी बहुत है. वहां बहुत सारी मानवीय कहानियां भी हैं. मेरा मानना है कि जहां बहुत सारी तकलीफें होती हैं, परिस्थितियां सही नहीं होती हैं, वहां पर मानवीय कहानियां भी सब से ज्यादा निकलती हैं. अगर आप देखेंगे तो आज उस चीज के बल पर ही हम जिंदा हैं. मानवता की हमेशा जीत होती है. बहुत सारी चीजें हैं जिन को देख कर लगता है कि यह कहानी लोगों तक पहुंचनी चाहिए. ऐसी कहानियों की कश्मीर में भरमार है.’’

इसराईल और अमेरिका की संस्कृति और माहौल में काफी अंतर है. इन 2 विपरीत माहौल वाले देशों में भी आप की फिल्म को क्यों सराहा गया? इस सवाल पर प्रवीण कहते हैं, ‘‘इसराईल में हमारी फिल्म येरूशलम फिल्म फैस्टिवल में दिखाई गई. फ्रांस, जरमनी, बेल्जियम, ईरान और अमेरिका में भी फिल्म दिखाई गई. बेल्जियम में हमारी फिल्म को अवार्ड मिला. हमारी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ भारत की पहली फिल्म होगी जोकि बेल्जियम के सिनेमाघरों में रिलीज होगी. अमेरिका के सभी बड़ेबड़े फिल्म फैस्टिवल्स में यह दिखाई जा चुकी है.

‘‘देखिए, पूरे विश्व के लोगों की भावनाएं एकजैसी हैं. हमारा हंसना, हमारा रोना, हमारे दर्द, ये सारी भावनाएं एकजैसी हैं. फिर चाहे हम एशिया के हों या अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका से क्यों न हों. मानवीय दर्द व व्यथा की कथा पूरे विश्व के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती है. जब हम इंसानी संघर्ष की बात करते हैं तो हर कोई उस से रिलेट करता है. मेरी फिल्म की कहानी जमीन से जुड़ी होती है, बहुत ही जमीनी सचाई को बयां करती है. इसलिए वह ग्लोबली बहुत बड़ा असर डालती है. मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपनी फिल्म में संवाद कम रख कर दृश्य ज्यादा रखूं.’’

मगर पारिवारिक भावनाएं जितनी भारत, ईरान व इसराईल में गहरी हैं  उतनी अमेरिका में नहीं हैं? इस पर वे बताते हैं, ‘‘यदि आप गहराई से देखेंगे तो पता चलेगा कि यूरोप व अमेरिका जैसे देशों में इन दिनों वे फिल्में बहुत पसंद की जा रही हैं जिन में समाज या परिवार की बात की गई हो क्योंकि वहां लोग बहुत ज्यादा बिखर गए हैं, उन्हें अब परिवार की कमी अखर रही है. उदाहरण के लिए आप पिछले वर्ष की औस्कर विजेता फिल्म ‘रोमा’ को ही लें. इस में एक परिवार की कहानी है. परिवार के अंदर जो नौकरानी काम करती है, उस की कहानी है.’’

कश्मीर में शूटिंग के क्या अनुभव रहे? इस प्रश्न पर वे जवाब देते हुए कहते हैं, ‘‘वहां के लोग बहुत अच्छे हैं. कश्मीर के लोगों का खानपान, रहनसहन अच्छा है. वे हर किसी से दिल से मिलते हैं. कमाल के लोग हैं. वे सही मानो में कलाकार हैं. बेसिकली सूफियाना लोग हैं. सूफी आर्टिस्टिक नेचर के होते हैं. यदि आप को उन का दिल जीतना है तो उन को इज्जत देनी पड़ेगी. हमें तो उन्होंने बहुत अच्छे से ट्रीट किया.’’

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न आने दें मुस्कान में दरार

सर्दियों के  मौसम का आगाज हो चुका  है. इसके  साथ ही कुछ  राहत व कुछ परेशानी भी साथ ला रहा है. सर्दियों के शुरुआत  व अंत में हमें कुछ परेशानियों से गुजरना पड़ता है.न्ही में से एक है, होठों का फटना. हमारे शरीर के दूसरे हिस्सों की तुलना में होठ की त्वचा 10  गुना नाजुक व कोमल होती है. होठ हमारी खूबसूरती का अभिन्न हिस्सा है. लेकिन हमारी लापरवाही या मौसम की मार इन्हें  भद्दा  बना देती है.  लेकिन कुछ कारण और भी होते है, जो होठ फटने की वजह बनते हैं .जरूरी है कि हम इनकी देखभाल करें लेकिन इलाज जानने से पहले हमें यह पता होना चाहिये की समस्या किस कारण हो रही है.

कारण

शरीर में पानी की कमी

सर्दियों के मौसम में  हर कोई होठ फटने की समस्या से दो चार होता ही है . लेकिन शरीर में पानी की कमी हो तो हर मौसम में होंठ सूखे ही रहेंगे. क्योंकि शरीर में हुई पानी की कमी का असर होंठों पर भी पड़ता है और बाहर निकलने पर रूखापन और भी बढ़ जाता है. इसलिए शरीर में पानी की कमी नहीं होने दें. जरूरी है की दिन में कम से कम 8 गिलास पानी का सेवन करें.

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बोतल से पानी का सेवन

अगर आप सीधे बोतल से मुंह लगाकर पानी पीते है तो भी आपके होंठ फटने की समस्या बनी रहती है क्योंकि इससे आपके होठों को नमी नहीं मिल पाती जिस कारण आपके होठ फटने लगते हैं जरूरी है की गिलास से पानी पियें .

मुंह से सांस लेना

जब कभी हमें जुखाम  होता है तो हम नाक से सांस नहीं ले पाते जिस कारण हमें मुंह से सांस लेना पड़ता है और मुंह से सांस लेने से हवा हमारे होठों से गुजरती है. जिससे होठों की नमी खत्म हो जाती है और हमारे होंठ फटने लगते हैं लेकिन कुछ लोगों को यह आदत भी होती है की वो मुंह से सांस लेते हैं जिस कारण उनके होंठ हर मौसम में फटे ही रहते है. जो ना केवल होठों के लिए बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह है. क्योंकि सांस लेने की क्रिया  नाक से की जाती है न की मुंह से. जरूरी है कि समय पर अपनी आदत में बदलाव लाएं.

होठों पर जीभ घूमना

कुछ लोगों को आदत होती है अपने होठो नम रखने के लिए  जीभ घूमाते रहते हैं इसके आलावा होठों को चबाना, होठों की मर्त त्वचा को दांत  या हाथ से निकाल देना यह आपके होठों को बेहद नुकसान पहुंचाता है. आपके होंठ रूखे व बेजान हो जाते हैं.  इस तरह की आदतों को छोड़ने  से आप अपने होठों की समस्या से कुछ हद तक  छुटकारा पा सकते हैं.

उपाय

शहद और वैसलीन

होठों पर शहद लगाए व उसके ऊपर से वैसलीन लगाकर 10  मिनट तक ऐसे ही रहने दें. फिर टिश्यू पेपर से साफ कर लें. ऐसा करने से एक हफ्ते में ही आपको आराम मिल जायेगा.

शहद में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं और घाव को भरने का काम करते हैं.  वहीं, वैसलीन रूखी त्वचा या रूखे होंठों को नमी देकर उन्हें मुलायम बनाती है . इस नुस्खे से आपके होंठ मुलायम व स्वस्थ रहते हैं.

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गुलाब की पंखुड़ियां

आधा कप दूध  में 5 से 6 गुलाब की पंखड़ियों को मिलाकर 3 घंटे के लिए रख दें फिर उनको मिक्स करके अच्छे से पेस्ट बना लें . और 15 मिनट के लिये अपने होठों पर लगा लें फिर ठंडे पानी से धो दें.

दूध में गुलाब की पंखुड़ियों को डालकर दो से तीन घंटों के लिए छोड़ दें.फिर पंखुड़ियों को अच्छे तरह दूध में मिक्स करके पेस्ट बना लें.
अब इस पेस्ट को अपने होंठों पर लगाएं और 10 -15  मिनट तक लगा रहने दें.फिर ठंडे पानी से धो लें.

आप हर रोज इसे एक या दो बार लगाएं . यह हमें सूरज की किरणों से बचता है.क्योंकि गुलाब की पंखुड़ियों में मौजूद एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण त्वचा को धूप से होने वाले नुकसान से बचाव करने में मदद करता हैं . इतना ही नहीं, रोज एसेंशियल औयल भी त्वचा को स्वस्थ बनाने में फायदेमंद साबित होता है.

चीनी और जैतून

चीनी को जैतून के तेल और शहद के साथ मिलाएं, चीनी को घोलने न दें . और स्क्रब की तरह अपने होंठों पर लगाएं. स्क्रब करने के बाद गुनगुने पानी से इसे धो लें.ऐसा हफ्ते मई ३ बार करें.

चीनी एक  बेहतरीन एक्सफोलिएट है  जो आपके फटे होंठों को ठीक करने में मदद करेगी. इससे स्क्रब करने से होंठ एक्सफोलिएट होंगे और रूखी व परतदार त्वचा से छुटकारा मिलेगा.

शहद से  त्वचा नर्म और मुलायम रहती है  वहीं औलिव औयल में मौजूद एंटीइन्फ्लेमेटरी और एंटी-कैंसर गुण होता है जो की हमीं स्किन कैंसर से भी बचता है.

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ऐसे बनाएं एग फ्राइड राइस

अंडों के पोषण से भरपूर यह डिश बनाने में भी काफी आसान है. इस डिश को आप किटी पार्टी या फिर छोटे गेट टू गेदर के दौरान सर्व कर सकती हैं.

सामग्री

2 कप चावल

2 मध्यम आकार के प्याज

2 छोटे आकार के शिमला मिर्च

2 हरी मिर्च

4 चम्मच सोया सौस

3 चम्मच रिफाइंड औयल

8 अंडे

2 गाजर

आधा चम्मच काली मिर्च पाउडर

2 चम्मच टमाटर प्यूरी

4 चुटकी नमक

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गार्निश के लिए

उबले अंडे

बारीक कटी धनिया

बनाने की विधि

एक बड़े बर्तन में दो कप चावल ले लें. चावल को अच्छी तरह धो लें. चावल धोने के बाद इसे उबालकर पका लें और किनारे रख दें.

सारी सब्जियों को धोकर अच्छी तरह काट लें. हर सब्जी को बारीक और एक आकार में काटें.

अब एक पैन लेकर उसमें तेल गर्म करें. अब इसमें बारीक कटी प्याज को डालकर हल्का भूरा होने तक भूनें. जब प्याज का रंग बदल जाए तो इसमें बाकी सब्जियां डालकर अच्छी तरह मिला लें.

3-4 मिनट बाद इसमें हरी मिर्च का पेस्ट मिला दें. 1-2 मिनट बाद टमाटर की प्यूरी, नमक, सोया सॉस मिला लें. आंच तेज ही रखें.

अब पैन में अंडा फोड़ें और उसे हिलाते रहें. इसी समय इसमें बटर मिला लें. अब इसमें पके हुए चावल मिला लें. सारी चीजों को अच्छी तरह मिला लें.

इसे धनिया की पत्ती और उबले हुए अंडे के साथ सजाकर सर्व करें.

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बेटी को जरूर बताएं पीरियड्स से जुड़े ये 8 टिप्स

ज्यादातर मांएं पीरियड्स के बारे में बेटी से खुल कर बात नहीं करतीं. यही कारण है कि इस दौरान किशोरियां हाइजीन के महत्त्व पर ध्यान नहीं देतीं और कई परेशानियों का शिकार हो जाती हैं.

माहवारी को ले कर जागरूकता का न होना भी इन परेशानियों की बड़ी वजह है. पेश हैं, कुछ टिप्स जो हर मां को अपनी किशोर बेटी को बतानी चाहिए ताकि वह पीरियड्स के दौरान होने वाली परेशानियों से निबट सकें:

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  1. कपड़े को कहें न: आज भी हमारे देश में जागरूकता की कमी के चलते माहवारी के दौरान युवतियां कपड़े का इस्तेमाल करती हैं. ऐसा करना उन्हें गंभीर बीमारियों का शिकार बना देता है. कपड़े का इस्तेमाल करने से होने वाली बीमारियों के प्रति अपनी बेटी को जागरूक बनाना हर मां का कर्तव्य है. बेटी को सैनिटरी पैड के फायदे बताएं और उसे अवगत कराएं कि इस के इस्तेमाल से वह बीमारियों से तो दूर रहेगी ही, साथ ही उन दिनों में भी खुल कर जी सकेगी.

2. कब बदलें पैड: हर मां अपनी बेटी को यह जरूर बताए कि आमतौर पर हर 6 घंटे में सैनिटरी पैड बदलना चाहिए. इस के अलावा अपनी जरूरत के अनुसार भी सैनिटरी पैड बदलना चाहिए. हैवी फ्लो के दौरान आप को बारबार पैड बदलना पड़ता है, लेकिन अगर फ्लो कम है तो बारबार बदलने की जरूरत नहीं होती. फिर भी हर 4 से 6 घंटे में सैनिटरी पैड बदलती रहे ताकि इन्फैक्शन से सुरक्षित रह सके.

3. गुप्तांगों की नियमित सफाई: पीरियड्स के दौरान गुप्तांगों के आसपास की त्वचा में खून समा जाता है, जो संक्रमण का कारण बन सकता है. इसलिए गुप्तांगों को नियमित रूप से धो कर साफ करने की सलाह दें. इस से वैजाइना से दुर्गंध भी नहीं आएगी.

4. इन का इस्तेमाल न करें: वैजाइना में अपनेआप को साफ रखने का नैचुरल सिस्टम होता है, जो अच्छे और बुरे बैक्टीरिया का संतुलन बनाए रखता है. साबुन योनि में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को नष्ट कर सकता है. इसलिए इस का इस्तेमाल न करने की सलाह दें.

5. धोने का सही तरीका: बेटी को बताएं कि गुप्तांगों को साफ करने के लिए योनि से गुदा की ओर साफ करे यानी आगे से पीछे की ओर. उलटी दिशा में कभी न धोए. उलटी दिशा में धोने से गुदा में मौजूद बैक्टीरिया योनि में जा सकते हैं और संक्रमण का कारण बन सकते हैं.

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6. सैनिटरी पैड का डिस्पोजल: इस्तेमाल किए गए पैड को सही तरीके से और सही जगह फेंकने को कहें, क्योंकि यह संक्रमण का कारण बन सकता है. पैड को फ्लश न करें, क्योंकि इस से टौयलेट ब्लौक हो सकता है. नैपकिन फेंकने के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोना भी जरूरी है.

7. रैश से कैसे बचें: पीरियड्स में हैवी फ्लो के दौरान पैड से रैश होने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है. ऐसा आमतौर पर तब होता है जब पैड लंबे समय तक गीला रहे और त्वचा से रगड़ खाता रहे. इसलिए बेटी को बताएं कि नियमित रूप से पैड चेंज करे. अगर रैश हो जाए तो नहाने के बाद और सोने से पहले ऐंटीसैप्टिक औइंटमैंट लगाए. इस से रैश ठीक हो जाएगा. अगर औइंटमैंट लगाने के बाद भी रैश ठीक न हो तो उसे डाक्टर के पास ले जाएं.

8. एक ही तरह का सैनिटरी प्रोडक्ट इस्तेमाल करें: जिन किशोरियों को हैवी फ्लो होता है, वे एकसाथ 2 पैड्स या 1 पैड के साथ टैंपोन इस्तेमाल करती हैं या कभीकभी सैनिटरी पैड के साथ कपड़ा भी इस्तेमाल करती हैं यानी कि ऐसा करने से उन्हें लंबे समय तक पैड बदलने की जरूरत नहीं पड़ती. ऐसे में बेटी को बताएं कि एक समय में एक ही प्रोडक्ट इस्तेमाल करे. जब एकसाथ

2 प्रोडक्ट्स इस्तेमाल किए जाते हैं तो जाहिर है इन्हें बदला नहीं जाता, जिस कारण इन्फैक्शन की संभावना बढ़ जाती है.

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मेरा संसार : भाग 2

लेखक: अमिताभ श्रीवास्तव

गरमी से राहत पाने का इकलौता साधन कूलर खराब हो चुका है जिसे ठीक करना है, अखबार की रद्दी बेचनी है, दूध वाले का हिसाब करना है, ज्योति कह कर गई थी. रोमी का रिजल्ट भी लाना है और इन सब से भारी काम खाना बनाना है, और बर्तन भी मांजना है. घर की सफाई पिछले 2 दिनों से नहीं हुई है तो मकडि़यों ने भी अपने जाले बुनने का काम शुरू कर दिया है.

उफ…बहुत सा काम है…, ज्योति रोज कैसे सबकुछ करती होगी और यदि एक दिन भी वह आराम से बैठती है तो मेरी आवाज बुलंद हो जाती है…मानो मैं सफाईपसंद इनसान हूं…कैसा पड़ा है घर? चिल्ला उठता हूं.

ज्योति न केवल घर संभालती है, बल्कि रोमी के साथसाथ मुझे भी संभालती है. यह मैं आज महसूस कर रहा हूं, जब अलमारी में तमाम कपडे़ बगैर धुले ठुसे पडे़ हैं. रोज सोचता हूं, पानी आएगा तो धो डालूंगा. मगर आलस…पानी भी कहां भर पाता हूं, अकेला हूं तो सिर्फ एक घड़ा पीने का पानी और हाथपैर, नहाधो लेने के लिए एक बालटी पानी काफी है.

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ज्योति आएगी तभी सलीकेदार होगी जिंदगी, यही लगता है. तब तक फक्कड़ की तरह… मजबूरी जो होती है. सचमुच ज्योति कितना सारा काम करती है, बावजूद उस के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं देखी. यहां तक कि कभी उस ने मुझ से शिकायत भी नहीं की. ऊपर से जब मैं दफ्तर से लौटता हूं तो थका हुआ मान कर मेरे पैर दबाने लगती है. मानो दफ्तर जा कर मैं कोई नाहर मार कर लौटता हूं. दफ्तर और घर के दरम्यान मेरे ज्यादा घंटे दफ्तर में गुजरते हैं. न ज्योति का खयाल रख पाता हूं, न रोमी का. दायित्वों के नाम पर महज पैसा कमा कर देने के कुछ और तो करता ही नहीं.

फोन की घंटी घनघनाई तो मेरा ध्यान भंग हुआ.

‘‘हैलो…? हां ज्योति…कैसी हो?…रोमी कैसी है?…मैं…मैं तो ठीक हूं…बस बैठा तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था. अकेले मन नहीं लगता यार…’’

कुछ देर बात करने के बाद जब ज्योति ने फोन रखा तो फिर मेरा दिमाग दौड़ने लगा. ज्योति को सिर्फ मेरी चिंता है जबकि मैं उसे ले कर कभी इतना गंभीर नहीं हो पाया. कितना प्रेम करती है वह मुझ से…सच तो यह है कि प्रेम शरणागति का पर्याय है. बस देते रहना उस का धर्म है.

ज्योति अपने लिए कभी कुछ मांगती नहीं…उसे तो मैं, रोमी और हम से जुडे़ तमाम लोगों की फिक्र रहती है. वह कहती भी तो है कि यदि तुम सुखी हो तो मेरा जीवन सुखी है. मैं तुम्हारे सुख, प्रसन्नता के बीच कैसे रोड़ा बन सकती हूं? उफ, मैं ने कभी क्यों नहीं इतना गंभीर हो कर सोचा? आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है? इसलिए कि मैं अकेला हूं?

रचना…फिर उस की याद…लड़ाई… गुस्सा…स्वार्थ…सिर्फ स्वयं के बारे में सोचनाविचारना….बावजूद मैं उसे प्रेम करता हूं? यही एक सत्य है. वह मुझे समझ नहीं पाई. मेरे प्रेम को, मेरे त्याग को, मेरे विचारों को. कितना नजरअंदाज करता हूं रचना को ले कर अपने इस छोटे से परिवार को? …ज्योति को, रोमी को, अपनी जिंदगी को.

बिजली गुल हो गई तो पंखा चलतेचलते अचानक रुक गया. गरमी को भगाने और मुझे राहत देने के लिए जो पंखा इस तपन से संघर्ष कर रहा था वह भी हार कर थम गया. मैं समझता हूं, सुखी होने के लिए बिजली की तरह निरंतर प्रेम प्रवाहित होते रहना चाहिए, यदि कहीं व्यवधान होता है या प्रवाह रुकता है तो इसी तरह तपना पड़ता है, इंतजार करना होता है बिजली का, प्रेम प्रवाह का.

घड़ी पर निगाहें डालीं तो पता चला कि दिन के साढे़ 3 बज रहे हैं और मैं यहां इसी तरह पिछले 2 घंटों से बैठा हूं. आदमी के पास कोई काम नहीं होता है तो दिमाग चौकड़ी भर दौड़ता है. थमने का नाम ही नहीं लेता. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जहां दिमाग केंद्रित हो कर रस लेने लगता है, चाहे वह सुख हो या दुख. अपनी तरह का अध्ययन होता है, किसी प्रसंग की चीरफाड़ होती है और निष्कर्ष निकालने की उधेड़बुन. किंतु निष्कर्ष कभी निकलता नहीं क्योंकि परिस्थितियां व्यक्ति को पुन: धरातल पर ला पटकती हैं और वर्तमान का नजारा उस कल्पना लोक को किनारे कर देता है. फिर जब भी उस विचार का कोना पकड़ सोचने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है तो नईनई बातें, नएनए शोध होने लगते हैं. तब का निष्कर्ष बदल कर नया रूप धरने लगता है.

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सोचा, डायरी लिखने बैठ जाऊं. डायरी निकाली तो रचना के लिखे कुछ पत्र उस में से गिरे. ये पत्र और आज का उस का व्यवहार, दोनों में जमीनआसमान का फर्क है. पत्रों में लिखी बातें, उन में दर्शाया गया प्रेम, उस के आज के व्यवहार से कतई मेल नहीं खाते. जिस प्रेम की बातें वह किया करती है, आज उसी के जरिए अपना सुख प्राप्त करने का यत्न करती है. उस के लिए पे्रेम के माने हैं कि मैं उस की हरेक बातों को स्वीकार करूं. जिस प्रकार वह सोचती है उसी प्रकार व्यवहार करूं, उस को हमेशा मानता रहूं, कभी दुख न पहुंचाऊं, यही उस का फंडा है.

शायद यही सच है : भाग 1

बैंक से निकलते हुए भारती ने घड़ी पर निगाह डाली तो 6 बजे से अधिक का समय हो चुका था. यद्यपि उस के तमाम सहयोगी कर्मचारी 5 बजे से ही घर जाने की तैयारी में जुट जाते हैं, पर भारती को घर जाने की कोई जल्दी नहीं रहती. उस अकेले के लिए तो जैसे बैंक वैसे घर. एक अकेली जीव है तो किस के लिए भाग कर घर जाए. बैंक में तो फिर भी मन काम में लगा रहता है लेकिन तनहा घर में सोने व दीवारों को देखने के अलावा वह और क्या करेगी.

पार्किंग से भारती ने अपनी कार बाहर निकाली और घर की ओर चल दी. वही रास्ते, वही सड़कें, वही पेड़, कहीं कोई बदलाव नहीं, कोई रोमांच नहीं. एक बंधे बंधाए ढर्रे पर जीवन की गाड़ी जैसे रेंग रही है. सुस्त चाल से घर पहुंच कर वह सोफे पर निढाल सी जा पड़ी. अकसर ऐसा ही होता है, खाली घर जैसे उसे खाने को दौड़ता है. एक टीस सी उठती है, काश, कोई तो होता जो घर लौटने पर उस से बतियाता, उस के सुखदुख का भागीदार होता.

यद्यपि भारती अतीत की गलियों में भटकना नहीं चाहती, मन पर कठोरता से अंकुश लगाने की कोशिश करती रहती है लेकिन कभीकभी मन चंचल बच्चे सा मचल उठता है. आज भी भारती ने सोफे पर पड़ेपड़े आंखें बंद कीं तो उस का मन नियंत्रण में नहीं रहा. पलों में ही लंबीलंबी छलांगें लगा कर मन ने उस के अतीत को सामने ला खड़ा किया.

उन दिनों वह बी. काम. अंतिम वर्ष की छात्रा थी. कुदरत ने उसे आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान किया था. ऊंची कद- काठी, गोरे रंग पर तीखे नाकनक्श, लंबे घने काले बाल जिन्हें चोटी के रूप में गूंध देती तो वह नागिन का रूप ले लेती.

उसे बनसंवर कर रहने का भी बेहद शौक था. जब भी वह परिधान के साथ मेल खाते टौप्स, चूडि़यां पहन पर्स लटकाए कालिज आती तो उस की सहेलियां उसे छेड़ते हुए कहतीं, ‘वाह, आज तो गजब ढा रही हो. रास्ते में कितनों को घायल कर के आई हो?’

वह भी बड़ी शोख अदा के साथ कहती, ‘तुम ने देखा नहीं, अभीअभी बेहोश लड़कों से भरी एम्बुलेंस यहां से गुजर कर अस्पताल की ओर गई है. वे सभी मुझे देख कर ही तो बेहोश हुए थे.’ फिर जोरदार ठहाके लगते.

पढ़ाई में भी वह अव्वल थी. उस की दिली इच्छा थी कि पढ़लिख कर वह बड़ा अफसर बने. इस के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी भी उस ने शुरू कर दी, लेकिन मांबाप उस की शादी कर के जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे. जब उस ने आगे पढ़ने की बहुत जिद की तो वे इस शर्त पर तैयार हुए कि जब तक कोई अच्छा मनपसंद लड़का नहीं मिल जाता वह पढ़ाई करेगी, लेकिन जैसे ही उपयुक्त वर मिल गया उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी.

एम. काम. का पहला सत्र शुरू हो गया था. वह पढ़ाई में व्यस्त हो गई थी और मांबाप उस के लिए लड़का ढूंढ़ने में. 2 भाइयों के बीच इकलौती बहन होने के कारण भारती मांबाप की लाड़ली भी थी और भाइयों की दुलारी भी. अपनी सुंदरता का गुमान तो उसे था ही, इसलिए जब पहली बार मांबाप ने उस के लिए लड़का देखा और बात चलाई तो उस का फोटो देखते ही वह बिदक कर बोली, ‘इसे आप लोगों ने पसंद किया है? इस की लटकी सूरत देख कर तो लगता है कहीं से दोचार जूते खा कर आया हो. मुझे नहीं करनी इस से शादी.’

मांबाप ने बहुतेरा समझाया कि लड़का पढ़ालिखा अफसर है, लेकिन भारती ने साफ मना कर दिया.

अगली बार उन्होंने भारती को न तो लड़के की फोटो दिखाई और न परिचय- पत्र. सीधेसीधे लड़के व उस के मातापिता को होटल में मुलाकात का समय दे दिया. इस बार भारती और चिढ़ गई, ‘जिस के बारे में मुझे कुछ जानकारी नहीं है, न उस की फोटो देखी है, उस के सामने अपनी प्रदर्शनी करने चली जाऊं?’

मांबाप ने समझाया, ‘देखो बेटी, हमें इन के बारे में संतोषप्रद जानकारी प्राप्त हुई है. तुम जो भी पूछना चाहो पूछ सकती हो. आखिर शादी तो तुम्हें ही करनी है. तुम्हारी तसल्ली के बाद ही बात आगे बढ़ेगी. तुम बेकार तनाव क्यों ले रही हो, कोई जबरदस्ती तो है नहीं,’ तब जा कर वह कुछ सामान्य हुई.

बातचीत केदौरान भारती ने लड़के के घर वालों से स्पष्ट कह दिया कि वह शादी के बाद घर बैठने वाली लड़कियों में से नहीं है. उस का कैरियर माने रखता है. वह महत्त्वाकांक्षी है और शादी के बाद भी वह नौकरी करेगी.

लड़के की मां ने साफ कह दिया, ‘बेटा, हमें तो घर संभालने वाली पढ़ीलिखी बहू चाहिए. अगर तुम 8-10 घंटे की नौकरी करोगी, सारा दिन घर के बाहर रहोगी तो हमें ऐसी बहू का क्या फायदा?’

बात खत्म हो गई पर घर आ कर मां ने भारती को फटकारा, ‘यह सब अभी से कहने की क्या जरूरत थी? शादी के बाद भी तो ये बातें की जा सकती थीं.’

इस पर तुनक कर भारती बोली थी, ‘अच्छा हुआ, अभी खुली बात हो गई. देखा नहीं आप ने, लड़के की मां को घर संभालने वाली, घर का काम करने वाली बहू नहीं नौकरानी चाहिए. इतना पढ़लिख कर भी रोटीदाल बनाओ, बच्चे पैदा करो, उन के पोतड़े धोओ और घर के कामों में जिंदगी बरबाद कर दो.’

कुछ समय गुजरने के बाद एक दिन मां ने भारती को विश्वास में लेते हुए कहा, ‘बेटा, हम देख रहे हैं कि हमारे पसंद किए लड़के तुम्हारी कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे. अगर तुम ने अपनी तरफ से किसी को पसंद कर के रखा है तो हमें बता दो. तुम्हारी खुशी में ही हम सब की खुशी है.’

‘मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं है,’ भारती बोली थी, ‘अगर होगी तो आप को जरूर बताऊंगी.’

लेकिन असलियत यह थी कि पिछले कुछ समय से अपने सहपाठी हिमेश के साथ भारती का प्रेमप्रसंग चल रहा था. भारती उसे अच्छी तरह से परख कर ही कोई फैसला लेना चाहती थी. वह जानती थी कि प्रेमी और पति में काफी फर्क होता है. उस ने सोच रखा था, हिमेश अगर उस की कसौटी पर खरा उतरेगा तभी वह अंतिम निर्णय लेगी और मां को इस बारे में बताएगी. 2 बहनों के बीच अकेला भाई होने के कारण हिमेश के मांबाप की सभी आशाएं उसी पर टिकी थीं.

छुट्टी का दिन था. भारती तथा हिमेश ने आज घूमने तथा किसी अच्छे से होटल में खाना खाने का प्रोग्राम बनाया. सिद्धार्थ पार्क के एक कोने में प्रेमालाप करते हुए हिमेश व भारती अपने भविष्य के रंगीन सपने बुनते रहे. तभी भारती ने कहा, ‘हिमेश, मैं बैंक की प्रतियोगिता परीक्षा में बैठ रही हूं. तैयारी शुरू कर दी है. तुम्हारी क्या योजना है भविष्य की?’

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