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फिर वही शून्य : भाग 3

अलार्म की आवाज ने विचारों की शृंखला को तोड़ दिया. सारी रात सोचतेसोचते ही बीत गई थी. एक ठंडी सांस ले कर मैं उठ खड़ी हुई.

फिर 1 साल बाद ही भारत आना हुआ. इस बीच वीरां का विवाह भी हो चुका था. जब इस बात का पता चला तो मन में एक टीस सी उठी थी.

‘‘तुम्हारी पसंद का मूंग की दाल का हलवा बनाया है, वहां तो क्या खाती होगी तुम यह सब,’’ मम्मी मेरे आने से बहुत उत्साहित थीं.

‘‘वीरां कैसी है, मम्मी? वह अपने ससुराल में ठीक तो है न?’’

‘‘हां, वह भी आई है अभी मायके.’’

‘‘अच्छा, तो मैं जाऊंगी उस से मिलने,’’ मैं ने खुश हो कर कहा.

इस पर मम्मी कुछ खामोश हो गईं. फिर धीरे से बोलीं, ‘‘हम ने तुम से एक बात छिपाई थी. वीरां की शादी के कुछ दिन पहले ही समर रिहा किया गया था. उस का एक पांव बेकार हो चुका है. बैसाखियों के सहारे ही चल पाता है. अभी महीना भर पहले ही उस का भी विवाह हुआ है. तुम वहां जाओगी तो जाहिर है, अत्यंत असहज महसूस करोगी. बेहतर होगा किसी दिन वीरां को यहीं बुला लेना.’’

वज्रपात हुआ जैसे मुझ पर. नियति ने कैसा क्रूर मजाक किया था मेरे साथ. समर की रिहाई  हुई तो मेरी शादी के फौरन बाद. किस्मत के अलावा किसे दोष देती? समय मेरी मुट्ठी से रेत की तरह फिसल चुका था. अब हो भी क्या सकता था?

इसी उधेड़बुन में कई दिन निकल गए. पहले सोचा कि वीरां से बिना मिले ही वापस लौट जाऊंगी, लेकिन फिर लगा कि जो होना था, हो गया. उस के लिए, वीरां के साथ जो मेरा खूबसूरत रिश्ता था, उसे क्यों खत्म करूं? अजीब सी मनोदशा में मैं ने उस के घर का नंबर मिलाया.

‘‘हैलो,’’ दूसरी तरफ से वही आवाज सुनाई दी जिसे सुन कर मेरी धड़कनें बढ़ जाती थीं.

विधि की कैसी विडंबना थी कि जो मेरा सब से ज्यादा अपना था, आज वही पराया बन चुका था. मैं अपनी भावनाओं पर काबू न रख पाई. रुंधे गले से इतना ही बोल पाई, ‘‘मैं, सौम्या.’’

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‘‘कैसी हो तुम?’’ समर का स्वर भी भीगा हुआ था.

‘‘ठीक हूं, और आप?’’

‘‘मैं भी बस, ठीक ही हूं.’’

‘‘वो…मुझे वीरां से बात करनी थी.’’

‘‘अभी तो वह घर पर नहीं है.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर मैं रिसीवर रखने लगी कि समर बोल उठा, ‘‘रुको, सौम्या, मैं…मैं कुछ कहना चाहता हूं. जानता हूं कि मेरा अब कोई हक नहीं, लेकिन क्या आज एक बार और तुम मुझ से शाम को उसी काफी शाप पर मिलोगी, जहां मैं तुम्हें ले जाता था?’’

एक बार लगा कि कह दूं, हक तो तुम्हारा अब भी इतना है कि बुलाओगे तो सबकुछ छोड़ कर तुम्हारे पास आ जाऊंगी, लेकिन यह सच कहां था? अब दोनों के जीवन की दिशा बदल गई थी. अग्नि के समक्ष जिस मर्यादा का पालन करने का वचन दिया था उसे तो पूरा करना ही था.

‘‘अब किस हैसियत से मिलूं मैं आप से? हम दोनों शादीशुदा हैं और आप की नजरों का सामना करने का साहस नहीं है मुझ में. किसी और से शादी कर के मैं ने आप को धोखा दिया है. नहीं, आप की आंखों में अपने लिए घृणा और वितृष्णा का भाव नहीं देख सकती मैं.’’

‘‘फिर ऐसा धोखा तो मैं ने भी तुम्हें दिया है. सौम्या, जो कुछ भी हुआ, हालात के चलते. इस में किसी का भी दोष नहीं है. मैं तुम से कभी भी नफरत नहीं कर सकता. मेरे दिल पर जैसे बहुत बड़ा बोझ है. तुम से बात कर के खुद को हलका करना चाहता हूं बाकी जैसा तुम ठीक समझो.’’

मैं जानती थी कि मैं उसे इनकार नहीं कर सकती थी. ?एक बार तो मुझे उस से मिलना ही था. मैं ने समर से कह दिया कि मैं उस से 6 बजे मिलने आऊंगी.

शाम को मैं साढे़ 5 बजे ही काफी शाप पर पहुंच गई, लेकिन समर वहां पहले से ही मौजूद था. जब उस ने मेरी ओर देखा, तो उठ कर खड़ा हो गया. उफ, क्या हालत हो गई थी उस की. जेल में मिली यातनाओं ने कितना अशक्त कर दिया था उसे और उस का बायां पैर…बड़ी मुश्किल से बैसाखियों के सहारे खड़ा था वह. कभी सोचा भी न था कि उसे इन हालात में देखना पडे़गा.

हम दोनों की ही आंखों में नमी थी. बैरा काफी दे कर चला गया था.

‘‘वीरां कैसी है?’’ मैं ने ही शुरुआत की.

‘‘अच्छी है,’’ एक गहरी सांस ले कर समर बोला, ‘‘वह खुद को तुम्हारा गुनाहगार मानती है. कहती है कि अगर उस ने जोर न दिया होता तो शायद आज तुम मेरी…’’

मैं निगाह नीची किए चुपचाप बैठी रही.

‘‘गुनाहगार तो मैं भी हूं तुम्हारा,’’ वह कहता रहा, ‘‘तुम्हें सपने दिखा कर उन्हें पूरा न कर सका, लेकिन शायद यही हमारी किस्मत में था. पकड़े जाने पर मुझे भयंकर अमानवीय यातनाएं दी जातीं. अगर हिम्मत हार जाता, तो दम ही तोड़ देता, लेकिन तुम से मिलन की आस ही मुझे उन कठिन परिस्थितियों में हौसला देती. एक बार भागने की कोशिश भी की, लेकिन पकड़ा गया. फिर एक दिन सुना कि दोनों तरफ की सरकारों में संधि हो गई है जिस के तहत युद्धबंदियों को रिहा किया जाएगा.

‘‘मैं बहुत खुश था कि अब तुम से आ कर मिलूंगा और हम नए सिरे से जीवन की शुरुआत करेंगे. जब यहां आ कर पता चला कि तुम्हारी शादी हो चुकी है, तो मेरी हताशा का कोई अंत न था. फिर वीरां भी शादी कर के चली गई. जेल में मिली यातनाओं ने मुझे अपंग कर दिया था. मैं ने खुद को गहन निराशा और अवसाद से घिरा पाया. मेरे व्यवहार में चिड़चिड़ापन आने लगा था. जराजरा सी बात पर क्रोध आता. अपना अस्तित्व बेमानी लगने लगा था.

‘‘उन्हीं दिनों नेहा से मुलाकात हुई. उस ने मुझे बहुत संबल दिया और जीवन को फिर एक सकारात्मक दिशा मिल गई. मेरा खोया आत्मविश्वास लौटने लगा था. मैं तुम्हें तो खो चुका था, अब उसे नहीं खोना चाहता था. तुम मेरे दिल के एक कोने में आज भी हो, मगर नेहा ही मेरे वर्तमान का सच है…’’

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मैं सोचने लगी कि एक पुरुष के लिए कितना आसान होता है अतीत को पीछे ढकेल कर जिं?दगी में आगे बढ़ जाना. फिर खुद पर ही शर्मिंदगी हुई. अगर समर मेरी याद में बैरागी बन कर रहता, तब खुश होती क्या मैं?

‘‘…बस, तुम्हारी फिक्र रहती थी, पर तुम अपने घरसंसार में सुखी हो, यह जान कर मैं सुकून से जी पाऊंगा,’’ समर कह रहा था.

‘‘मुझे खुशी है कि तुम्हें ऐसा साथी मिला है जिस के साथ तुम संतुष्ट हो,’’ मैं ने सहजता से कहने की कोशिश की, ‘‘दिल पर कोई बोझ मत रखो और वीरां से कहना, मुझ से आ कर मिले. अब चलती हूं, देर हो गई है,’’ बिना उस की तरफ देखे मैं उठ कर बाहर आ गई.

जिन भावनाओं को अंदर बड़ी मुश्किल से दबा रखा था, वे बाहर पूरी तीव्रता से उमड़ आईं. यह सोच कर ही कि अब दोबारा कभी समर से मुलाकात नहीं होगी, मेरा दिल बैठने लगा. अपने अंदर चल रहे इस तूफान से जद्दोजहद करती मैं तेज कदमों से चलती रही.

तभी पर्स में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. अनिरुद्ध का स्वर उभरा, ‘‘मैं तो अभी से तुम्हें मिस कर रहा हूं. कब वापस आओगी तुम?’’

‘‘जल्दी ही आ जाऊंगी.’’

‘‘बहुत अच्छा. सौम्या, वह बात कहो न.’’

‘‘कौन सी?’’

‘‘वही, जिसे सुनना मुझे अच्छा लगता है.’’

मैं ने एक दीर्घनिश्वास छोड़ कर कहा, ‘‘मैं आप से बहुत प्यार करती हूं,’’ जेहन में समर का चेहरा कौंधा और आंखों में कैद आंसू स्वतंत्र हो कर चेहरे पर ढुलक आए. जीवन में फिर वही शून्य उभर आया था.

पराली से प्रदूषण : जमीनी स्तर पर हो काम तभी फायदे में होगा किसान

हमारे देश की राजधानी दिल्ली व आसपास के इलाकों में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को लेकर खूब होहल्ला मचा. यह केवल इसी साल की बात नहीं है, पिछले कई सालों से धान की कटाई होने के बाद और इसे जलाने को ले कर प्रदेश की सरकारों में एकदूसरे पर आरोप लगाने का दौर चलता है और देश की अदालत को भी इस में अपना दखल देना पड़ता है. आखिरकार नतीजा भी कुछ खास नहीं निकलता और समय के साथ और मौसम में बदलाव होने पर यह मामला अपनेआप खत्म हो जाता है.

हां, इस प्रदूषित वातावरण के माहौल को ले कर राजनीतिक दलों में जरूर बन आती है, जो एकदूसरे पर कीचड़ उछालने का काम करते हैं और लेदे कर निशाना किसानों को बनाते हैं.

टैलीविजन चैनलों की आपस में होड़ लग जाती है कि कौन कितना बढ़ाचढ़ा कर हौआ पैदा करे. नतीजा मास्क बनाने वालों की पौबारह हो जाती है, जो औनेपौने दामों पर जनता को लूटती है. इस समस्या का समाधान अपनेअपने हिसाब से निकालने की नाकाम कोशिश करते हैं.

पराली प्रदूषण को ले कर देश की राजधानी दिल्ली में यातायात में औडईवन जैसे नियम लागू कर दिए जाते हैं, जिस में आम जनता जरूर परेशान होती है, पर नतीजा नहीं निकलता. भवन निर्माण जैसे कामों पर रोक लगा दी जाती है. इस का फायदा वे सरकारी कर्मचारी उठाते हैं, जो लोगों से अच्छीखासी रकम वसूलते हैं और चोरीछिपे यह काम भी चलता है.

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प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर भी रोक लगाई जाती है, लेकिन लेदे कर चोरीछिपे वह भी चलती है और जब कभी ऊपर से बड़े अधिकारियों का दबाव आता है तो बिचौलियों के माध्यम से फैक्टरी मालिकों को पहले ही आगाह कर दिया जाता है कि फलां दिन फलां समय अधिकारियों का दौरा है, इसलिए फैक्टरियां बंद रखें.

कहने का मतलब है कि सरकार का काम नियम बनाना है, लेकिन उस को अमलीजामा पहनाना सरकारी मुलाजिमों का काम है, इसलिए सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, चाहे वे आम आदमी हो या सरकारी मुलाजिम, सरकार हो या किसान, तभी इस तरह की समस्या का समाधान संभव है.

किसानों का कहना है कि धान की फसल कटाई और गेहूं बोआई के बीच का समय कम रहा है और सभी किसानों के पास ऐसे संसाधन नहीं हैं जो पराली को इतने कम समय में ठिकाने लगा सकें. ज्यादातर किसानों की पहुंच ऐसे कृषि यंत्रों या ऐसी तकनीक तक नहीं है, जो पराली नष्ट करने में काम आते हैं.

पराली की खाद बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने अनेक तरीके बताए हैं. उस की जानकारी भी समय पर किसानों तक नहीं पहुंच पाती. इस दिशा में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा पराली से खाद बनाने के लिए वेस्ट डीकंपोजर व पूसा संस्थान, नई दिल्ली द्वारा कैप्सूल बनाए हैं, जिन में बहुत ज्यादा असरकारक बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो तय समय में पराली को सड़ा कर खाद बनाने का काम करते हैं.

एक किसान का कहना है कि सरकार केवल प्रचार ही करती है, समस्या के समाधान के लिए जमीनी स्तर पर काम नहीं किया जाता. अगर किसानों की समस्या का सही निदान किया जाए तो किसान पराली क्यों जलाएगा? पराली जलाने से खेत की मिट्टी तो हमारी भी खराब होती है, अनेक पैदावार में फायदा देने वाले तत्त्व भी नष्ट हो जाते हैं, लेकिन हम क्या करें, हमें अगली फसल भी तो लेनी होती है.

4 कैप्सूल से 1 एकड़ की पराली बनेगी खाद

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली के कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कैप्सूल तैयार किया है, जिस की कीमत महज 5 रुपए है. इस के 4 कैप्सूल ही एक एकड़ खेत की पराली को खाद बनाने में सक्षम है. इस के इस्तेमाल से पराली की खाद तो बनती ही है, इस के अलावा जमीन में नमी भी बनी रहती है. यह कैप्सूल जो एक तरफ तो पराली को सड़ा कर खाद बनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ खेत की मिट्टी को उपजाऊ भी बनाते हैं.

कैसे इस्तेमाल करें 

कृषि वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह के मुताबिक, सब से पहले हमें 150 ग्राम पुराना गुड़ लेना है. उसे पानी में उबालना है. उबालते समय उस में जो भी गंदगी आती है, उसे निकाल कर फेंक देना है. फिर उस घोल को ठंडा कर के लगभग 5 लिटर पानी में घोल देना है. इस में लगभग 50 ग्राम बेसन भी घोल कर मिला दें. इस के बाद इस में पूसा संस्थान से खरीदे गए 4 कैप्सूलों को खोल कर उसी घोल में मिला दें. इस काम के लिए बड़े आकार यानी चौड़ाई वाला प्लास्टिक या मिट्टी का बरतन लेना है.

अब इस घोल को हलके गरमाहट वाले किसी स्थान पर लगभग 5 दिनों के लिए रख दें. अगले दिन इस घोल की ऊपरी सतह पर एक परत जम जाएगी. इस परत को डंडे की मदद से उसी घोल में फिर मिला देना है. यह प्रक्रिया लगातार 5 दिनों तक करनी है. इस तरीके से आप का कंपोस्ट घोल तैयार हो जाएगा. यह 5 लिटर घोल लगभग 10 क्विंटल पराली को खाद बनाने के लिए काफी है.

अब इस तैयार घोल को आप खेत में फैली पराली पर छिड़क दें. फिर खेत में रोटावेटर चला दें. लगातार 20-25 दिनों में पराली की खाद बन जाएगी. इस के अलावा सिंचाई द्वारा भी इस घोल को पानी में डाल सकते हैं. यह घोल समान रूप से पानी में मिल कर पराली वाले खेतों में पहुंच जाए. 20-25 दिनों में ही पराली को खाद में बदल देते हैं.

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कृषि यंत्रों का होना जरूरी

इस काम में कृषि यंत्रों का होना बेहद जरूरी है जो पराली को खेत में मिला सके. इस दिशा में केंद्र सरकार ने कदम उठाया है और 600 करोड़ रुपए की धनराशि मुहैया कराई है, बाकी राशि राज्य सरकारों को वहन करनी है.

उन्नत किस्म के कृषि यंत्रों को किसानों तक पहुंचाने के लिए कस्टम हायरिंग सैंटर बनाए गए हैं, जिन्हें किसान समितियों द्वारा मिल कर चलाया जा रहा है. इस स्कीम के तहत 80 फीसदी अनुदान पर यह यंत्र किसानों की समितियों को मुहैया कराए जाते हैं, जिन्हें किसान अपनी खेती में तो इस्तेमाल करेंगे ही, बल्कि दूसरे किसानों के लिए भी यंत्र किराए पर दे सकेंगे. बदले में उन से तय किराया लेना होगा.

किसानों की पहुंच के लिए कस्टमर हायरिंग सैंटर को मोबाइल एप सीएचसी से जोड़ा गया है. इस एप के जरीए किसान इन यंत्रों का फायदा ले सकते हैं. एक कस्टमर हायरिंग सैंटर 50 किलोमीटर के दायरे में बनाया गया है, जहां से कोई भी छोटाबड़ा किसान अपने नजदीकी सैंटर में कृषि यंत्रों को किराए पर मंगा कर उन का इस्तेमाल कर सकता है.

पराली में काम आने वाले यंत्रों में मल्चर, एमबी प्लाऊ, रोटावेटर व सीडर है, जो पराली को काट कर मिट्टी में दबा देते हैं या अवशेषों को जमीन में दबा देते हैं. जीरो टिलेज या हैप्पी सीडर जैसे यंत्र से धान के कटने के बाद खेत में गेहूं की सीधे बोआई कर सकते हैं. हैप्पी सीडर यंत्र धान की पराली को छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर खेत में मिला देता है, जिस की खाद बन जाती है और साथ ही, गेहूं की बोआई भी करता है. इस तरीके से किसान के एकसाथ 2 काम हो जाते हैं.

  क्या कहते हैं कृषि मंत्री

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्या है औैर चिंता की बात है. सभी लोग इस मसले पर गंभीर हैं खासकर दिल्ली व एनसीआर में बुरे हालात बने हैं. इस सिलसिले में पराली प्रोसैस के लिए कृषि मंत्रालय ने एक स्कीम तैयार की है. इस के तहत किसानों को अनुदान पर ऐसे कृषि यंत्रों को उपलब्ध कराया जा रहा है, जो इस समस्या के समाधान का सहायक है.

 कृषि यंत्र पैडी स्ट्रा चौपर

हार्वेस्टर मशीनें धान की कटाईर् में खेत की सतह से लगभग 1 फुट की ऊंचाई पर करती हैं, बाकी फसल अवशेष खेत में खड़ा रह जाता है जो किसानों के लिए समस्या बन जाता है. इस के समाधान के लिए पैडी स्ट्रा चौपर यंत्र है जो खेत में खड़ी पराली को छोटेछोटे टुकड़ों में काट देता है. इस यंत्र को ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है. यंत्र की कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपए है.

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  20 रुपए में वेस्ट डीकंपोजर से खाद

20 रुपए में मिलने वाले इस वेस्ट डीकंपोजर को गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थित नैशनल सैंटर औफ आर्गेनिक फार्मिंग द्वारा तैयार किया गया है. इस के इस्तेमाल से लगभग 30 से 40 दिनों में यह पराली की खाद बना देता है.

यह वेस्ट डीकंपोजर पर्यावरण और किसान दोनों के लिए फायदेमंद है. खाद बनाने के साथसाथ खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और दीमक वगैरह में भी खेत का बचाव करता है और खेत में नमी बनाए रखता है.

इस का इस्तेमाल करने के लिए एक बडे़ प्लास्टिक के ड्रम में 200 लिटर पानी भर लें और इस में डीकंपोजर की डब्बी को खोल कर मिला दें. इसे किसी छायादार जगह पर रख लें. फिर 3 दिनों तक इस घोल को सुबहशाम रोज डंडे से मिला दिया करें. इस के बाद

11-12 दिनों तक इसे ऐसे ही छोड़ दें. यह घोल तैयार हो जाएगा औैर अच्छे नतीजों के लिए इस घोल को बनाते समय इस में गुड़ व बेसन भी मिला सकते हैं.

तैयार इस घोल को पहले की तरह ही पानी के जरीए खेत में पहुंचाना है, जो पराली को सड़ा कर खाद बना देगा.

प्रीवैडिंग इन्क्वायरी दोनों पक्षों के हित में

शादी के नाम से लड़केलड़की क्या, सभी के मन में लड्डू फूटने लगते हैं. और कहीं तय हो जाए तो समझिए दोनों पक्षों में लड्डू बंटना शुरू, जोरशोर से तैयारी में दनादन खर्च. क्यों न करें भई, शादी एक ही बार होती है, रोजरोज थोड़े ही. ठीक है, पर जरा रुक कर सोचिए तो सही, आजकल आएदिन बढ़ रहे तलाक, घरेलू हिंसा, ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर, धोखा, दहेज प्रताड़ना कहीं आप की भी खुशियों और खर्च पर पानी फेरने न आ जाएं. इसलिए, मन और खर्च पर थोड़ी लगाम कसें.

खर्च करना ही है तो उचित प्रीवैडिंग इन्क्वायरी पर करें तथा अपने पक्ष के बारे में सच्ची जानकारी के लिए दूसरे पक्ष का सहयोग करें. जिस से उस विवाह के सुखमय भविष्य की संभावनाएं बढ़ती ही जाएं.

पंडित, रीतिरिवाज, जन्मकुंडली मिलान से अधिक कुछ इन अधोलिखित बातों का ध्यान अवश्य रखें. संकोच न करें, बल्कि बिन चूके अवश्य ये प्रूफ लें और दें.

मैडिकल फिटनैस प्रूफ :  ब्लड गु्रप के साथ जानें लड़केलड़की के आंख, कान, हाथ, पैर सब सामान्य हैं या नहीं. सुनने की क्षमता, सही उच्चारण, स्पष्ट बोली का भी फिटनैस प्रूफ लें. हकलाहट या स को श और श को स तो नहीं बोलता या बोलती? पहले ही जान लें कि चाल भटकती तो नहीं. चश्मा लगा है तो कितने पावर का है. कोई बीमारी या वंशानुगत बीमारी, कोई मेजर औपरेशन, यदि हुआ है तो उस की जानकारी आप को भी होनी चाहिए. मानसिक संतुलन, सनक, फोबिया जान कर ही आगे बढ़ें.

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क्वालिफिकेशन या आईक्यू स्तर :  शिक्षा, प्रशिक्षा, योग्यता जांच कर ही रिश्ता पक्का करें. आईक्यू का मैच अवश्य बैठाएं. फर्जी डिगरी, सर्टिफिकेट को ले कर बाद में पछताना न पड़े. आजकल धोखे बहुत हो रहे हैं. जोड़े की खुशहाली के लिए दोनों के आईक्यू लैवल का मैच होना तो सब से जरूरी है, यह भूलें नहीं.

इनकम प्रूफ :  लड़कालड़की कितना कमाते हैं, आप को इस का इनकम प्रूफ अवश्य लेना चाहिए. सीधासादा सम झ कर लोगों की बातों के  झांसे में न आएं, न ही किसी लालच में. आखिर आप के बच्चों का भविष्य इस से जुड़ा है. कोई संकोच न करें, प्रूफ दें भी और लें भी.

हाउस ओनरशिप प्रूफ :  यदि मकान, दुकान, प्लौट की बातें बताई गई हैं तो सज्जन बने आंखें मूंदे यों ही न मान लें. इन का प्रूफ अवश्य लें ताकि बाद में इस को ले कर मलाल और  झगड़े की कोई संभावना न हो.

कैरेक्टर प्रूफ : कोई मुकदमा, जुर्माना, जेल, सजा, कर्ज, पूर्ववर्तमान कोई नाजायज/दत्तक संबंध तो नहीं? चालचलन सही होना बेहद जरूरी है, इसलिए पूरी जांचपड़ताल करें. शराब, जुआ, गुटका, तंबाकू, सिगरेट इत्यादि की बुरी लतें तो नहीं, यह जान लेना भी बहुत आवश्यक है जिस से बाद में कोई परेशानी न उठानी पड़े.

अन्य :  रीतिरिवाज, धर्मसंस्कार के कितने मानने वाले हैं, यह भी जान लें, ताकि बाद में किसी को कोई आपत्ति न हो. साफसफाई, नाक, कान, दांत में हर समय उंगली, मुंह पर डकारना, छींकना, असभ्य व्यवहार सब पर नजर रखें कि इन्हें नजरअंदाज किया जा सकेगा या नहीं. शिष्टता और व्यवहार कैसा है, यह भी अच्छी तरह सम झ लें. बाद में इन आदतों को बदलवाने की जद्दोजेहद में घर कलह से न भर जाए, इसलिए पहले से यह सब देखना, सम झ लेना जरूरी है.

क्या सोच खुली या संकीर्ण है? अकसर इस कारण भी रिश्तों में खटास भरती है. आत्मविश्वासी है या अंधविश्वासी? स्वभाव शक्की या गुस्सैल तो नहीं, यह भी जान लें वरना दोनों का वैचारिक मेल खाना दुष्कर है. लड़के और लड़की की जरूरतें, जिम्मेदारियां क्या और कितनी हैं? यह न हो कि बाद में पता चले कि अपने किन्हीं लोगों की जिम्मेदारी भी लड़के या लड़की के सिर है, तो यही फसाद की जड़ बन जाए. इसलिए, जो भी हो आप सभी को हर बात की सही जानकारी पहले ही होनी चाहिए. तभी आगे बढ़ें.

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खानदान, रिश्तेदार, रहनसहन तो आप देखते ही हैं, दोस्तसंगत, पड़ोसी, पतास्थान, बेसिक सुखसुविधा, हवापानी, पार्क, बाजार, स्कूल, दवा की दुकान, डाक्टरअस्पताल भी अवश्य देखें. अच्छी जांचपड़ताल करने के लिए एकदूसरे को संतोषप्रद समय दें. प्रीवैडिंग की अहमियत समझें और पूरी तसल्ली हो जाने पर ही शहनाई बजवाएं, लड्डू बांटें, बंटवाएं और हमें भी खिलाएं.

ऐसे बनाएं कोकोनट सूप

आज आपको कोकोनेट सूप की रेसिपी बताते हैं, जो बेहद ही टेस्टी है और बनाने में भी उतना आसान है. तो आइए जानते हैं, कोकोनेट सूप बनाने की रेसिपी.

सामग्री

– 2 बड़े चम्मच औलिव औयल

– थोड़ा सा प्याज बारीक कटा

– थोड़ा सा लहसुन का पेस्ट

– 1 कप मशरूम कटी

– 1 कप गाजर लंबे टुकड़ों में कटी

– 1 छोटा चम्मच अदरक का पेस्ट

– 1 छोटा चम्मच चीनी

– 1/2 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर

– थोड़ा सा नमक

– थोड़ा सा सोया सौस

– थोड़ा सा लैमन जेस्ट

– 3 कप वैजिटेबल स्टौक

– 2 केन कोकोनट मिल्क

– थोड़ी सी धनियापत्ती

– नीबू के टुकड़े सजाने के लिए स्वादानुसार नमक.

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बनाने की विधि

– एक बड़े बरतन में औलिव औयल ले कर उसे गरम करें.

– गरम होने पर उस में प्याज, लहसुन का पेस्ट व मशरूम डाल कर 5 मिनट तक चलाएं.

– फिर इस में बाकी बची सामग्री को अच्छे से मिक्स कर 15-20 मिनट तक पकने के लिए छोड़ दें.

– बीच में चलाना न छोड़ें.

– जब अच्छे से पक जाए तो नीबू के टुकड़ों से सजा कर सर्व करें.

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शिक्षकों की भर्ती : सच या ख्वाब

भारत में बेरोजगारी एक गंभीर समस्या बनी हुई है. देश में रोजगार की कमी होना ही बेरोजगारी की समस्या नहीं है, बल्कि युवाओं में असफलताओं और उम्मीदों में आशा की किरण न दिखाई देना भी समस्या है. यहां केवल शिक्षक व क्लर्क भरतियों की बात की जा रही है.

रक्षा मंत्रालय से संबद्ध संस्था, जिस के स्कूल चल रहे हैं, लाखों बेरोजगारों की उम्मीदों पर पानी फेर रही है.

आर्मी पब्लिक स्कूल की संस्था आर्मी वैलफेयर एजुकेशन सोसाइटी यानी (एडब्लूईएस) हर साल आवेदन आमंत्रित करती है, ‘शिक्षकों के लिए आर्मी स्कूल में शिक्षक बनने का सुनहरा मौका.’

सवाल है कि क्या वास्तव में शिक्षक नौकरी पाते हैं? क्या वे अपने सपनों को साकार कर पाते हैं? जवाब है, जी नहीं, यह संस्था पहले अनुबंध पर भरती की सीटें निकालती है, फिर स्थायी. लेकिन, क्या वास्तव में स्थायी भरती होती है?

देशभर में हर आर्मी क्षेत्र में एक स्कूल बना है जो कि आर्मी पब्लिक स्कूल के नाम से जाना जाता है. इन स्कूलों का सारा खर्च सरकार उठाती है. ये स्कूल ज्यादातर 12वीं कक्षा तक होते हैं. इन स्कूलों में हर कक्षा के कुछ सैक्शन होते हैं. बड़ी (हायर सैकंडरी) कक्षा में विज्ञान का भी विभाग होता है. कला संकाय में एक भी सैक्शन नहीं होता, अगर कहीं होता भी है तो सिर्फ एक सैक्शन होता है.

एडब्लूईएस का गठन 1983 में हुआ था. पूरे देश में 137 उच्चतर माध्यमिक व 249 प्राथमिक स्कूल हैं. 500 से भी कम शिक्षक वाले ये स्कूल शिक्षक भरती के लिए विज्ञापन निकालते हैं-‘आर्मी स्कूलों में निकली हजारों शिक्षकों की भरती’ यूट्यूब चैनलों, रोजगार समाचार व दैनिक अखबारों में यही छपता है.

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लाखों बेरोजगार शिक्षक आवेदन करते हैं. वे सपने संजोते हैं कि भारत के सैनिक बन कर देश की सेवा न कर सके तो क्या, शिक्षक बन कर भावी सैनिकों को ज्ञान तो देंगे. हर आवेदन के लिए शुल्क 1,500 रुपए होता है. चयन प्रक्रिया त्रिस्तरीय होती है. लिखित परीक्षा, साक्षात्कार और फिर व्यावहारिक परीक्षा होती है.

पूरी प्रक्रिया के 2 स्तरों को पूरा करने के लिए 2 माह लगते हैं. तीसरे स्तर तक पहुंचने में कितना समय लगेगा, कोई बता नहीं सकता क्योंकि यह संस्था नौकरी नहीं देती सिर्फ पैनल तैयार करती है. यह एक स्कोर कार्ड थमा देती है जोकि एक निश्चित अवधि तक ही मान्य होता है.

पूरी प्रक्रिया को सम झते हैं. पहले शिक्षक आवेदन करते हैं, फिर स्क्रीनिंग परीक्षा के बाद लिखित परीक्षा देते हैं. लिखित परीक्षा की कटऔफ लिस्ट तैयार होती है, जिस में ज्यादातर पास होते हैं, मैरिट में भी होते हैं. फिर इंतजार होता है साक्षात्कार का. यह प्रक्रिया तो लगता है शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाती है.

लिखित परीक्षा के 3 या 4 माह बाद स्कोरकार्ड अभ्यर्थी को सौंप दिया जाता है. अभ्यर्थी अपने पद के लिए चक्कर काटकाट कर थक जाता है इन औफिसों के. लेकिन उसे नौकरी नहीं मिलती.

क्यों नहीं मिलती नौकरी? दरअसल अभ्यर्थियों की संख्या स्कूलों के सैक्शनों से कई गुना ज्यादा होती है. दूसरा कारण, आर्मी में काम करने वाले कर्मचारियों के जानकारों या उन की विवाहितों या अविवाहिताओं को वहां नौकरी मिल जाना. तीसरा कारण, स्कूलों में सैक्शनों का अभाव है जिस के चलते शिक्षकों के द्वारा प्राप्त किए गए स्कोरकार्ड उन की फाइलों में ही रह जाते हैं. एक समय बाद अभ्यर्थियों की आयुसीमा खत्म हो जाती है और उन का ख्वाब पानी में बह जाता है.

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साफ है कि एडब्लूईएस का मकसद भरती प्रक्रिया के जरिए केवल पैसा कमाना है. सो, शिक्षकों की भरती के पीछे यह पूरी प्रक्रिया एक कालाबाजारी है. धन इकट्ठा करने का एक जरिया है. जबकि, शिक्षा तो यह सिखाती है कि भावनाओं को ठेस पहुंचा कर धन कमाना एक अपराध है.

कमलेश गुप्ता

सेहत के लिए फायदेमंद है हरी और पत्तेदार सब्जियां !

पत्तेदार हरी शाक-सब्जियां शरीर के उचित विकास एवं अच्छे स्वास्थ के लिए आवश्यक होती है,  क्योंकि इसमें सभी जरूरी पोषक तत्व उपस्थित होते हैं. हमारे देश में कई तरह की हरी सब्जियों को खाया जाता है, इनमे से कुछ हैं पालक, तोटाकुरा, गोंगुरा, मेथी, सहजन की पत्तियाँ और पुदिना आदि. रोज खानेवाले भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन एनीमिया को रोकने में सहायक होता है.  वह स्वास्थ के लिए लाभदायक भी होता है. तो आईये जानते है किस तरह पत्ते दार एवं हरी सब्जियां  हमारे जीवन में लाभदायक है .

* पत्तेवाली सब्जियां लौहयुक्त होती हैं. लौह की कमी से एनीमिया जैसी बीमारी हो सकती है, जो गर्भवती स्तनपान करानेवाली महिलाओं में आम है .

* हरी पत्तेदार सब्जियों में  कैल्शियम, बीटा कैरोटिन एवं विटामिन सी भी  काफी मात्रा में पाये जाते हैं.

* हमारे देश में  लगभग पांच वर्ष से कम आयुवाले 39,000 बच्चे हर वर्ष  विटामिन ए की कमी से अन्धेपन का शिकार हो जाते हैं.

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* हरी पत्तेदार सब्जियों में उपस्थित  कैरोटिन शरीर में विटामिन ए में परिवर्तित हो जाता है, जिससे अन्धेपन को रोका जा सकता है .

* हरी सब्जियों में विटामिन सी को बचाये रखने के लिए उन्हें ज्यादा देर तक पकाना अनुचित है, क्योंकि पोषक तत्व जो मसूड़े को शक्ति प्रदान करते हैं, अधिक पकाने से नष्ट हो जाते हैं.

* हरी सब्जियों में विटामिन बी कौम्पलेक्स भी पाया जाता है.

* हरी पत्तेदार सब्जियां प्रतिदिन वयस्क महिलाओं के लिए 100 ग्राम, वयस्क पुरुषों के लिए 40 ग्राम, स्कूल न जान वाले बालकों के लिए (4-6 वर्ष) 50 ग्राम और 10 वर्ष से अधिक उम्र वाले बालक-बालिकाओं के लिए 50 ग्राम प्रतिदिन आवश्यक है.

किन सब्जियों में क्या मिलता है !

* गोभी, आलू, बीन्स आदि शरीर के विविध भागों, तत्वों, मात्राओं को प्रभावित करते हैं.

* अदरक, धनिया, पुदीना, हरी मिर्च सब्जियों के तत्वों एवं स्वाद को बढ़ाने में मदद करते हैं.

*  लहसुन खून का थक्का जमने नहीं देता अतः हृदय रोग में लाभकारी है.

* करेला पेट के कृमि नष्ट करता है और रक्त शोधन कर, अग्नाशय को सक्रिय करता है.

* टमाटर शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ाता है और त्वचा निखारता है.

*नींबू शरीर के पाचक रसों को बढ़ाता है.

*पालक हड्डियों को कैल्शियम से सुदृढ़ करता है.

*भिंडी वीर्य में गाढ़ापन लाती है और शुक्राणु बढ़ाती है.

* लौकी शीघ्र पाचक, रक्तवर्द्धक है. यह शीतलता प्रदान करती है.

* खीरा रक्त कणों का शोधन कर शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ाता है.

* परवल शरीर को ऊर्जा देता है.

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*पत्तेदार सब्जी लौह तत्व से भरपूर होती है. अतः इन सबका उचित रूप से सलाद में प्रयोग करें या हल्की भाप पर थोड़ी देर पकाकर कम मसाले के साथ सेवन करें.

हल्दी फेशियल पैक से पाएं पार्लर जैसा निखार

आप हल्दी का इस्तेमाल खाने से लेकर कई सारे कामों में करती हैं. पर क्या आप जानती हैं कि  हल्दी आपके चेहरे के लिए नेचुरल फेस पैक का काम करती है. इससे चेहरे पर एक खास निखार  आती है. इसलिए कई सारे फेसपैक में हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है. और इससे नेचुरल निखार भी चेहरे पर आती है. हल्दी आपके चेहरे की चमक को बनाए रखने के लिए बहुत फायदेमंद होती है. तो चलिए देर किस बात कि आज आपको हल्दी फेशियल पैक बनाने की विधि  बताते हैं.

क्लिंजर तैयार करें-

इसके लिए आप 2 चम्मच कच्चा दूध लें और इसमें चुटकी भर हल्दी मिलाएं. और इससे आप अपना चेहरे की सफाई करें.

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स्क्रब तैयार करें-

थोड़ी सी हल्दी, 1 चम्मच सूजी, शहद और कुछ बूंदे कच्चे दूध की. आप चाहे तो दूध की जगह गुलाब जल का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इस स्क्रब को अपने चेहरे पर लगाकर हल्के हाथों से मसाज करें.

इसके बाद एक तौलिए को गर्म पानी में भिगोकर स्टीम दें और इसी तौलिए से अपना चेहरा साफ कर लें.

चेहरे की मसाज करने के लिए दही लें, इसमें थोड़ी सी हल्दी, बादाम की तेल की कुछ बूंदे डालें. आप चाहे तो बादाम तेल की जगह जैतून का तेल भी ले सकते हैं. और इन तीनों को मिलाकर चेहरे की मसाज करें. 3 से 4 मीनट मसाज करने के बाद नार्मल पानी से चेहरे को धो लें.

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फेस मास्क  तैयार करें-

इसे बनाने के लिए आधा चम्मच बेसन लें, इसमें हल्दी, शहद और बिल्कुल थोड़ा सा दूध डालें. इन सभी चीजों को अच्छे से मिला लें. अब इस पैक को अपने चेहरे पर लगाकर 15 मिनट के लिए छोड़ दें. 15 मिनट के बाद आप अपने चेहरे को पानी से धो लें.

पानी से धोने के बाद चेहरे पर टोनर लगाएं. इसके बाद आप जो भी क्रीम आप लगाते हैं वो लगाती हैं, वो अपने चेहरे पर लगाएं.

edited by- Saloni

लाली : भाग 3

श्रोताओं में शास्त्रीय संगीत के जानेमाने संगीतकार पंडित मदनमोहन शास्त्री भी थे. दूसरों की तरह वह भी लाली की आवाज से बेहद प्रभावित थे. उन्होंने लाली को बुलाया और कहने लगे, ‘बेटी, तुम्हारे कंठ में बेहद मिठास है पर तुम अभी सुर में थोड़ी कच्ची हो. मैं तुम्हें संगीत की विधिवत शिक्षा दूंगा.’

लाली मारे खुशी के कुछ बोल नहीं पाई. बस, स्वीकृति में सिर हिला दिया.

लाली की संगीत की शिक्षा शुरू हो गई. पंडितजी लाली के गाने से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लाली को गोद ले लिया और वह लाली से लालिमा शास्त्री बन गई. पंडितजी के इस फैसले के कारण लाली पंडितजी के घर में ही रहने लगी और नियति ने रोशन के एकमात्र सहारे को भी उस से छीन लिया.

अब रोशन को लाली से मिलने के लिए पंडितजी की इजाजत लेनी पड़ती और पंडितजी को बिलकुल भी पसंद नहीं था कि कोई फुटपाथ का आदमी रोज उन के घर आए पर लाली की इच्छा का खयाल रखते हुए वह कुछ देर के लिए इजाजत दे देते. धीरेधीरे लाली की लोकप्रियता बढ़ने लगी और घटने लगा रोशन को दिया जाने वाला समय. रोशन इस अचानक आए बदलाव को समझ नहीं पा रहा था. वह लालिमा शास्त्री के सामने खुद को छोटा पाने लगा था.

एक दिन उस ने एक निर्णय लिया और लाली से मिलने उस के घर चला गया.

‘लाली, मेरा यहां मन नहीं लग रहा. चलो, वापस गांव चलते हैं,’ रोशन ने लाली क ी ओर देखते हुए कहा.

‘क्यों, क्या हुआ? मन क्यों नहीं लग रहा तेरा,’ लाली ने सोचते हुए कहा, ‘लगता है, मैं तुझ से मिल नहीं पा रही हूं, इसी कारण मन नहीं लग रहा तेरा.’

‘नहीं…सच तो यह है कि पंडितजी यही चाहते हैं कि मैं तुझ से न मिलूं और मुझे लगता है कि शायद तू भी यही चाहती है. तुझे लगता है कि मैं तेरे संगीत की शिक्षा में रुकावट हूं,’ रोशन ने गुस्से में कहा.

‘अरे, नहीं, यह बात नहीं है. रियाज और बाकी काम होने के कारण मैं तुम से मिल नहीं पाती,’ लाली ने समझाने की कोशिश की.

लेकिन रोशन समझने को तैयार कहां था, ‘सचाई यह नहीं है लाली. सच तो यह है कि पंडितजी की तरह तू भी नहीं चाहती कि गंदी बस्ती का कोई आदमी आ कर तुझ से मिले. तू बदल गई है लाली, तू अब लालिमा शास्त्री जो बन गई है,’ रोशन ने कटाक्ष किया.

‘सच तो यह है रोशन कि तू मेरी सफलता से जलने लगा है. तू पहले भी मुझ से जलता था जब मैं टे्रन में तुझ से ज्यादा पैसे लाती थी. सच तो यह है, तू नहीं चाहता कि मैं तुझ से आगे रहूं. मैं नहीं जा रही गांव, तुझे जाना है तो जा,’ लाली के होंठों से लड़खड़ाती आवाज निकली.

रोशन आगे कुछ नहीं बोल पाया. बस, उस की आंखें भर आईं. जिस की सफलता के लिए उस ने अपने शरीर को जला दिया आज उसी ने अपनी सफलता से जलने का आरोप उस पर लगाया था. ‘खुश रहना, मैं जा रहा हूं,’ यह कह कर रोशन कमरे से बाहर निकल आया.

रोशन गांव तो चला गया पर गांव में पुलिस 1 साल से उस की तलाश कर रही थी. आश्रम वालों ने उस के खिलाफ नाबालिग लड़की को भगाने की रिपोर्ट लिखा दी थी. गांव पहुंचते ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया और कोर्ट ने उसे 1 साल की सजा सुनाई.

इधर 1 साल में लालिमा शास्त्री ने लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों को छुआ. उस के चाहने वालों की संख्या रोज बढ़ती जा रही थी और साथ ही बढ़ रहा था अकेलापन. रोशन के लौट आने की कामना वह रोज करती थी.

जेल से छूटने के बाद रोशन खुद को लाली से और भी दूर पाने लगा. उस की हालत उस बच्चे की तरह थी जो ऊंचाई में रखे खिलौने को देख तो सकता है मगर उस तक पहुंच नहीं सकता.

उस ने बारूद के कारखाने में फिर से काम करना शुरू कर दिया. वह सारा दिन काम करता और शाम को चौराहे पर पीपल के पेड़ के नीचे निर्जीव सा बैठा रहता. जब भी अखबार में लाली के बारे में छपता वह हर आनेजाने वाले को पढ़ कर सुनाता और फिर अपने और लाली के किस्से सुनाना शुरू कर देता. सभी उसे पागल समझने लगे थे.

रोशन ने कई बार मुंबई जाने के बारे में सोचा लेकिन बस, एक जिद ने उसे रोक रखा था कि जब लाली को उस की जरूरत नहीं है तो उसे भी नहीं है. कारखाने में काम करने के कारण उस की तबीयत और भी खराब होने लगी थी. खांसतेखांसते मुंह से खून आ जाता. उस ने अपनी इस जर्जर काया के साथ 4 साल और गुजार दिए थे.

एक दिन वह चौराहे पर बैठा था, कुछ नौजवान उस के पास आए, एक ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘अब तेरा क्या होगा पगले, लालिमा शास्त्री की तो शादी हो रही है. हमें यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर तेरे रहते वह किसी और से शादी कैसे कर सकती है,’ यह कह कर उस ने अखबार उस की ओर बढ़ा दिया और सभी हंसने लगे.

अखबार देखते ही उस के होश उड़ गए. उस में लाली की शादी की खबर छपी थी. 2 दिन बाद ही उस की शादी थी. अंत में उस ने फैसला किया कि वह मुंबई जाएगा.

वह फिर मुंबई आ गया. वहां 12 साल में कुछ भी तो नहीं बदला था सिवा कुछ बहुमंजिली इमारतों के. आज ही लाली की शादी थी. वह सीधे पंडितजी के बंगले में गया. पूरे बंगले को दुलहन की तरह सजाया गया था. सभी को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी. सामने जा कर देखा तो पंडितजी को प्रवेशद्वार पर अतिथियों का स्वागत करते पाया.

‘पंडितजी,’ आवाज सुन कर पंडितजी आवाज की दिशा में मुड़े तो पागल की वेशभूषा में एक व्यक्ति को खड़ा पाया.

‘पंडितजी, पहचाना मुझे, मैं रोशन… लाली का दोस्त.’

पंडितजी उसे अवाक् देखते रहे, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था वह क्या करें. पिछले 5-6 साल के अथक प्रयास के बाद वह लाली को शादी के लिए मना पाए थे. लाली ने रोशन के लौटने की उम्मीद में इतने साल गुजारे थे लेकिन जब पंडितजी को शादी के लिए न कहना मुश्किल होने लगा तो अंत में उस ने हां कर दी थी.

‘पंडितजी, मैं लाली से मिलना चाहता हूं,’ इस आवाज ने पंडितजी को झकझोरा. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, अगर रोशन से मिल कर लालिमा ने शादी से मना कर दिया तो? और पिता होने के नाते वह अपनी बेटी का हाथ किसी पागल जैसे दिखने वाले आदमी को कैसे दे सकते हैं. इसी कशमकश में उन्होंने कहा.

‘लालिमा तुम से मिलना नहीं चाहती, तुम्हारे ही कारण वह पिछले 5-6 साल से दुख में रही है, अब और दुख मत दो उसे, चले जाओ.’

‘बस, एक बार पंडितजी, बस एक बार…मैं फिर चला जाऊंगा,’ रोशन ने गिड़गिड़ाते हुए पंडितजी के पैर पकड़ लिए.

पंडितजी ने हृदय को कठोर करते हुए कहा, ‘नहीं, रोशन. तुम जाते हो या दरबान को बुलाऊं,’ यह सुन कर रोशन बोझिल मन से उठा और थोड़ी दूर जा कर बंगले की चारदीवारी के सहारे बैठ गया. पंडितजी उसे वहां से हटने के लिए नहीं कह पाए. वह रोशन की हालत को समझ रहे थे लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी.

रोशन की जब आंख खुली तो उस ने लाली को दुलहन के लिबास में सामने पाया. उसे लगा जैसे वह सपना देख रहा हो. आसपास देखा तो खुद को अस्पताल के बिस्तर में पाया. उस ने पिछली रात की बात को याद करने की कोशिश की तो उसे याद आया उस की छाती में काफी तेज दर्द था, 1-2 बार खून की उलटी भी हुई थी…उस के बाद उसे कुछ भी याद नहीं था. शायद उस के बाद उस ने होश खो दिया था. पंडितजी को जब पता चला तो उन्होंने उसे अस्पताल में भरती करा दिया था.

लाली ने रोशन के शरीर में हलचल महसूस की तो खुश हो कर रोशन के चेहरे को छू कर कहा, ‘‘रोशन…’’ और फिर वह रोने लगी.

‘‘अरे, पगली रोती क्यों है, मैं बिलकुल ठीक हूं. अभी देख मेरा पूरा चेहरा लाल है,’’ खून से सने अपने चेहरे को सामने दीवार पर लगे आईने में देखते हुए उस ने कहा, ‘‘अच्छा है, तू देख नहीं सकती नहीं तो आज मेरे लाल रंग को देख कर तू मुझ से ही शादी करती.’’

यह सुन कर लाली और जोर से रोने लगी.

‘‘मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं तुझे दुलहन के रूप में देखूं, आज मेरी यह इच्छा भी पूरी हो गई,’’ अब रोशन की आंखों में भी आंसू थे.

‘‘रोशन, तू ने बहुत देर कर दी…’’ बस, इतना ही बोल पाई लाली.

इस के बाद रोशन भी कुछ नहीं बोल पाया. बस, आंसू भरी निगाहों से दुलहन के लिबास में बैठी, रोती लाली को देखता रहा.

आंखों में सफेद पट्टी बांधे लाली अस्पताल के एक अंधेरे कक्ष में बैठी थी. रोशन को गुजरे 12 दिन हो गए थे. जातेजाते रोशन लाली को अपनी आंखें दान में दे गया था. आज लाली की आंखों की पट्टी खुलने वाली थी, लेकिन वह खुश नहीं थी, क्योंकि उस के जीवन में रोशनी भरने वाला रोशन अब नहीं था. डाक्टर साहब ने धीरेधीरे पट्टी खोलना शुरू कर दिया था.

‘‘अब आप धीरेधीरे आंखें खोलें,’’ डाक्टर ने कहा.

लाली ने जब आंखें खोलीं तो सामने पंडितजी को देखा. पंडितजी काफी खुश थे. वह लाली को खिड़की के पास ले गए और बोले, ‘‘लालिमा, यह देखो इंद्रधनुष, प्रकृति की सब से सुंदर रचना.’’

लाली को इंद्रधनुष शब्द सुनते ही रोशन की इंद्रधनुष के बारे में कही बातें याद आ गईं. उस ने ऊपर आसमान की तरफ देखा तो रंगबिरंगी आकृति आसमान में लटकी देखी, और सब से सुंदर रंग ‘लाल’ को पहचानते देर नहीं लगी उसे. आखिर वह इंद्रधनुष रोशन की आंखों से ही तो देख रही थी.

उस की आंखों से 2 बूंद आंसू की निकल पड़ीं.

‘‘पिताजी, उस ने बहुत देर कर दी आने में,’’ यह कह कर लालिमा ने पंडितजी के कंधे पर सिर रख दिया और आंखों का बांध टूट गया

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