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गैर फिल्मी परिवार से आने वाले हर कलाकार को संघर्ष करना पड़ता है- जैद शेख

मॉडलिंग की दुनिया के सुपर स्टार और दीपानिता शर्मा व अनुष्का शर्मा जैसी एक्ट्रेसेस के साथ रैंप शो का हिस्सा रहे अभिनेता जैद शेख पिछले 15 वर्षों से लगातार काम करते जा रहे हैं. वह रितुपर्णा सेन गुप्ता के साथ बंगला फिल्म के अलावा हिंदी फिल्म ‘‘बी केअरफुल’’ में हीरो बनकर आए थे. उसके बाद से ‘विराम’ सहित कई फिल्में की. इन दिनों दुष्यंत प्रताप सिंह निर्देशित फिल्म ‘‘द हंड्रेड बक्स’’ को लेकर चर्चा में हैं, जो कि 21 फरवरी को रिलीज होने वाली है.

सवाल. बौलीवुड में अपने 15 साल के संघर्ष को किस रूप में देख रहे हैं?

मुझे लगता है कि यहां पर गैर फिल्मी परिवार से आने वाले हर कलाकार को संघर्ष करना ही पड़ता है. मेरे अंदर भी एक कमर्शियल फिल्म का हीरो बनने की क्वालिटी मौजूद हैं. अच्छा लुक है और अच्छी कद काठी है. मगर मेरा यहां कोई गॉड फादर नहीं रहा. मुझे सलाह देने वाला कोई नहीं था. इसके अलावा सब कुछ तकदीर की बात है. इसलिए मुझे किसी से कोई गिला शिकवा नहीं हैं. ईमानदारी से अपना काम करता जा रहा हूं. मेरी खुशकिस्मती यही है कि मुझे अच्छा काम करने का अवसर मिलता आया है. मैने बतौर हीरो रितुपर्णा सेन गुप्ता के साथ बंग्ला फिल्म की. हिंदी फिल्म ‘‘बी केयरफुल‘‘ में हीरो बनकर आया. नरेंद्र झा के साथ फिल्म ‘वीरम’ से शोहरत पायी. मेरी एक अति बेहतरीन फिल्म ‘‘सिक्स एट’’ पिछले कई वर्ष से रिलीज नहीं हो पा रही थी. अब सुना है कि यह फिल्म किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर वेब फिल्म के तौर पर रिलीज होने वाली है. इस फिल्म में मेरा एक गाना हैं, जिसने पांच मिलियन व्यूज पाए हैं.

सवाल. आपको लगता है कि वेब सीरीज/डिजिटल मीडिया के चलते आपके लिए नए रास्ते खुले हैं?

जी हां! इससे नए रास्ते तो खुलेंगे ही. पर मुझे दुख इस बात का है कि काश यह आज से दस बारह साल पहले शुरू हो गया होता. क्योंकि पहले मैंने जो स्ट्रगल देखा है, वह बहुत कठिन था. अब जो कलाकार आ रहे हैं, उन्हे तो संघर्ष के सही मायने ही नहीं पता. आज लघु फिल्में, वेब फिल्में और वेब सीरीज इतनी अधिक बन रही है कि हर किसी के पास काम है, अगर यही दस बारह वर्ष पहले होता, तो मुझे भी संघर्ष न करना पड़ता. पर सब वक्त वक्त की बात है. मगर मैं फीचर फिल्में भी लगातार कर रहा हूं. बतौर हीरो मेरी नई फिल्म ‘‘द हंड्रेड बक्स’’ आगामी 21 फरवरी को रिलीज होगी, जिसके निर्देशक दुष्यंत प्रताप सिंह हैं.

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सवाल. फिल्म ‘‘हंड्रेड बक्स’’ से जुड़ने के पीछे क्या सोच रही है?

सबसे पहले मुझे इस फिल्म की कहानी बहुत अच्छी लगी. यह एक वेश्या की एक रात की पूरी कहानी है. इसमें मेरा किरदार भी अहम है. फिल्म में शुरू से अंत तक मोहिनी नामक इस लड़की के साथ जो कुछ घटित होता हैं, उसमें उसे सभी नकारात्मक इंसान ही मिलते हैं. मगर फिल्म का हीरो यानी कि मेरा किरदार ही पूरी तरह से सकारात्मक है. यह लड़की मेरे किरदार से मिलकर खुश होती है कि पूरी रात हर जगह उसके साथ बहुत कुछ बुरा हुआ, पर सूरज निकलते निकलते कुछ तो अच्छा हुआ. उसके साथ होने वाली इस अच्छाई की वजह मेरा किरदार ही होता है. यह इतना बेहतरीन किरदार था कि मैं इसे करने से न नहीं कर सका.

ZAID-SHEIKH

सवाल. फिल्म के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

फिल्म ‘हंड्रेड बक्स’ में मैंने पीयूष का किरदार निभाया है, जो टूटे हुए दिल के चलते शराब में डूबा हुआ है. पीयूष को सच्चे प्यार की तलाश है. प्यार में धोखा खाने के बाद भी उसे प्यार की ही तलाश है. फिर रात के अंधेरे में उसे मोहिनी (कविता त्रिपाठी) मिलती है. लोगों को लगता तो यही है कि शायद यह भी कुछ बुरा ही करेगा, पर ऐसा होता नहीं है.

अब आप किस तरह के किरदार निभाना चाहते हैं?

मुझे सदैव अच्छी कहानियों का हिस्सा बनना है. मुझे सुपर हीरो तो नहीं बनना है,पर दबंग पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाना चाहता हूं. चुलबुल पांडे या सिंघम की तरह का नहीं, पर मैं ऐसा किरदार निभाना चाहता हूं, जो कि कमाल का हो. मैं सकारात्मक और नकारात्मक हर तरह के किरदार निभाना चाहता हूं.

भविष्य की योजना?

अभिनय के साथ ही अब निर्माण के क्षेत्र में कूद पड़ा हूं. अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू किया है. अभी मैंने खुद निर्माता की हैसियत से एक वेब सीरीज ‘‘द डेविल सिंस डिजायर’’ का निर्माण किया है. सोच रहा हूं कि वक्त के साथ-साथ खुद को थोड़ा सा मोड़ते हुए दूसरे क्षेत्र में भी काम करुं. इस तरह अब अपना प्रोडक्शन स्थापित कर रहा हूं. मेरी इस वेब सीरीज को कई ओटीटी प्लेटफार्म लेना चाहते हैं. इसके बाद कुछ दूसरी वेब सीरीज बनाने की भी योजना है.

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हवा का झोंका: भाग-1

यह विडंबना ही थी कि जो खुशियां श्वेता के हिस्से में आनी चाहिए थीं वे उस की छोटी बहन पल्लवी के दामन में चली गई थीं. श्वेता ने भी हालात से समझौता कर लिया था. लेकिन यह वक्त का कैसा फेर था कि पल्लवी की वजह से खुशियां एक बार फिर उसे मिल रही थीं?

छोटी बहन पल्लवी की मृत्यु का तार पाते ही मैं व्यग्र हो उठी. मन सैकड़ों प्रकार की आशंकाओं से भर उठा. तार झूठा तो नहीं, भला बिना किसी बीमारी के पूरी तरह स्वस्थ युवती की मृत्यु हो सकती है? ऐसा कैसे हो सकता है?

मैं कई बार उलटपलट कर तार के कागज को घूरती रही, उस पर छपे अक्षरों को पढ़ती रही, कहीं भी कुछ जाली नहीं था. मेरे तनमन में शीतलहर सी दौड़ती चली गई. पिछले महीने ही तो मैं दिल्ली जा कर पल्लवी, उस के पति तरुण व 3 महीने की प्यारी सी रुई के गोले जैसी बिटिया नूरी से मिल कर आई थी. तब कहां सोचा था, कुछ दिन बाद मुझे पल्लवी की मृत्यु की सूचना मिलेगी.

उस वक्त पल्लवी मुझे देख कर प्रसन्नता से खिल उठी थी. अपनी बिटिया को छाती से चिपकाए, वह सैकड़ों प्रकार की सुखद कल्पनाओं में डूबी रहती थी. उस के राहतभरे संतुष्ट चेहरे से सुखी दांपत्य जीवन का आभास मिलता था. फिर अचानक ऐसा क्या हादसा हो गया? कौन सी आकस्मिक बीमारी ने पल्लवी को छीन कर उस हरीभरी बगिया को उजाड़ डाला?

अपने कमरे में लगी पल्लवी की मुसकराती तसवीर को देख कर मैं देर तक आंसू बहाती रही. रात में दिल्ली के लिए कोई गाड़ी नहीं थी. रातभर रोती रही. सुबह छुट्टी का आवेदनपत्र छात्रावास की एक सहेली को पकड़ा कर व पहली गाड़ी पकड़ मैं रवाना हो गई.

उस के घर पहुंची तो बाहर सड़क तक जनसमूह फैला हुआ था. लोगों की भीड़ ने सफेद चादर से ढकी पल्लवी की लाश को घेर रखा था. भीड़ में खड़ी कई महिलाएं, जो किसी महिला संस्था की सदस्याएं प्रतीत होती थीं, पल्लवी के ससुराल वालों के खिलाफ नारे लगा रही थीं, गिरफ्तारी की मांग कर रही थीं. भीड़ के लोग भी ससुराल वालों के विरुद्ध बोल रहे थे.

मैं भीड़ को चीर कर अंदर पहुंची तो देखा अंदर मांपिताजी, भैयाभाभी सभी उपस्थित थे. सभी चीखचिल्ला कर पल्लवी के सासससुर व पति पर दोषारोपण कर रहे थे कि उन्होंने पल्लवी को दहेज के लालच में आग में जला कर मार डाला है.

मुझे देखते ही शोकविह्वल मां मुझ से लिपट कर रो पड़ीं. पिताजी पल्लवी की लाश की ओर व तरुण की ओर इशारा कर के गरज उठे, ‘‘देख लिया, इस नराधम ने मेरी फूल सी बेटी को कितनी बर्बरता से जला कर मारा है? क्या कमी थी मेरी बच्ची में? कौन सी कमी छोड़ी थी मैं ने दहेज देने में? रंगीन टीवी, फ्रिज, स्कूटर सभी कुछ तो दिया था.’’

भैया बिफर उठे, ‘‘ये लोग दहेज के लालची हैं, ये दहेज में मोटरगाड़ी चाहते थे, हम लोग देने में असमर्थ थे. इसीलिए इन लोगों ने मेरी बहन को जला कर मार डाला, ताकि दूसरा विवाह कर के लाखों का दहेज फिर से पा सकें.’’

पहली बार मैं ने पिताजी व भैया के मुंह से तरुण व उस के मांबाप के लिए अशोभनीय शब्द सुने थे, मोटरगाड़ी के बारे में सुना था. कभी किसी ने तरुण को दहेज का लालची नहीं बतलाया था. सभी उन्मुक्त स्वर में उस के भले स्वभाव की प्रशंसा करते नहीं थकते थे.

भीड़ में तरुण भी था, जो लोगों की जलीकटी, आरोप, प्रत्यारोप, नफरत, आक्रोश बरदाश्त करता हुआ, आंसुओं में तरबतर निरीह चेहरा लिए मां के सान्निध्य को तरसती अपनी दुधमुंही बच्ची को चुप कराने, संभालने में लगा हुआ था.

उस के घबराए मांबाप लोगों के सामने अपनी सफाई पेश कर रहे थे कि उन को तरुण के अतिरिक्त अन्य कोई बेटा या बेटी नहीं है. वे खूब देखभाल कर अपनी पसंद की बहू घर में लाए थे. फिर वे अपनी प्यारी बहू को जला कर क्यों मारेंगे?

लेकिन उन की आवाज नक्कारखाने में तूती की भांति दब कर रह गई थी. उन की सुनने वाला कोई नहीं था. सभी उन्हें दोषी ठहराने के लिए कटिबद्ध थे.

आक्रोश से उबलते पिताजी व भैया ने मेरे आने से पूर्व ही थाने में तरुण व उस के मांबाप के खिलाफ दहेज कानून के अंतर्गत रपट लिखवा दी थी. पल्लवी की लाश का पोस्टमार्टम हो चुका था. मृत्यु का कारण, अत्यधिक जल जाना सिद्ध हो चुका था.

पुलिस वालों ने गिरफ्तारी से पूर्व तरुण व उस के मांबाप को पल्लवी की शवयात्रा में शामिल होने व शवदाह करने की अनुमति प्रदान कर दी थी.

लोग अरथी उठा कर बाहर ले जाने लगे तो तरुण शोकविह्वल हो कर पल्लवी की कोयला बन चुकी काया से लिपट कर फफकफफक कर रोने लगा. लोग व्यंग्य कसने लगे कि पुलिस, कानून व जनआक्रोश से बचने के लिए ही तरुण यह सब दिखावा कर रहा है, नहीं तो क्या दहेजलोभियों के सीनों में भी दिल हुआ करता है?

तरुण व उस के मातापिता से किसी को रत्तीभर सहानुभूति नहीं थी. पल्लवी का अंतिम संस्कार हो चुकने के बाद जब पुलिस वाले उन तीनों को गिरफ्तार कर के ले गए तभी लोगों का क्रोध शांत हो पाया.

इतनी बड़ी कोठी में मैं, मांपिताजी, भैयाभाभी व तरुण के पुराने बूढ़े नौकर के अतिरिक्त और कोई बाकी नहीं रहा. पल्लवी की ससुराल के दूर के रिश्तेदार भी पुलिस के पचड़े में पड़ने के डर से घबरा कर अपनेअपने घर चले गए.

मांपिताजी अपनी लाड़ली, दुलारी बेटी पल्लवी की असामयिक मृत्यु से कुछ इस प्रकार बौखलाए हुए थे कि तरुण व उस के मांबाप की गिरफ्तारी से भी उन के मन को शांति नहीं मिल पाई थी.

नींद किसी की आंखों में नहीं थी. सभी बैठक में सोफों पर बैठ कर परस्पर विचारविनिमय करने लगे कि तरुण व उस के मांबाप को कड़ी से कड़ी सजा किस प्रकार दिलवाई जाए. सभी तरुण को फांसी के फंदे पर लटका हुआ देखने को उतावले थे.

मैं पल्लवी की दुधमुंही बिटिया को छाती से चिपकाए न मालूम कहां, किस विचार में खोई हुई थी कि भैया के स्वर ने मुझे चौंका दिया, ‘‘श्वेता, तुम्हारे पास भी तो पल्लवी के पत्र आते होंगे. अपनी ससुराल में मिल रहे अत्याचारों के बारे में उस ने अवश्य लिखा होगा.’’

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मचलते अरमान

टीवी सीरियल देख कर हमारे मन में लड्डू फूटा कि एक दिन हमें भी हमारी बीवी अपने हाथों से दूल्हा बना कर सजाए. सारा दिन टीवी देखती है, शायद कुछ सीख ले ले. लेकिन मन के मचलते अरमान धरे के धरे रह गए…

एक दिन ऐसे ही आराम से बैठा टीवी चैनल बदल रहा था. एक  सीरियल में दिखाया गया कि हीरोइन के सिर में दर्द हो रहा है. पता चला कि उसे ट्यूमर है, वह मरने वाली है तो उस ने अपनी सहेली को बुला लिया अपने पति की शादी उस से करवाने के लिए. फिर चैनल बदला तो इस सीरियल में भी हीरोइन मरने वाली थी और मरने से पहले ही वह अपने पति की दूसरी शादी करवा रही थी. उस का पति फेरे ले रहा था और वह मरने के इंतजार में खड़ी थी. एक और सीरियल में हीरोइन ने पैसे ले कर अपने पति की शादी करवा दी. हर सीरियल कमोबेश यही कह रहा था.

मैं अलसाया पड़ा देख रहा था. आहें भर रहा था, कसक दबा रहा था. काश, ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी होता. कितने लकी हैं ये पति, इन की पत्नियां खुद मरने से पहले शादी करवा रही हैं, पति को दूल्हे के रूप में सजा रही हैं. ‘हाय,’ एक गहरी आह मेरे मुंह से निकली और मैं ने सुमि को आवाज लगाई, ‘‘सुमि, सुमि, यहां आओ, जल्दी.’’

सिर पकड़े सुमि आई. बोली, ‘‘क्या हुआ? क्यों चिल्ला रहे हो? क्या काम है? मेरे सिर में दर्द हो रहा है. बंद करो यह टीवी…’’

मेरे मन में एक लड्डू फूटा, ‘‘सच, इस का मतलब तुम्हें भी ब्रेन ट्यूमर है. तुम्हारी कोई सहेलीवहेली नहीं है कुंआरी जिसे तुम यहां बुला लो और मेरी शादी करवा दो.’’

दर्द से फटते सिर के समान सुमि भी फटी, ‘‘मेरे सिर्फ सिर में दर्द हो रहा है, मरी नहीं हूं अभी, मन में इतने लड्डू फोड़ने की जरूरत नहीं है. जरा से सिरदर्द में शादी की बात आ गई,

मर जाऊंगी तो तीसरा दिन भी नहीं लगाएंगे घर में दूसरी लाने में. सहेली, शादी, हुंह.’’

मैं थोड़ा निराश हुआ, ‘‘तो सारा दिन बैठ कर टीवी क्यों देखती रहती हो. अच्छी बातें तो उस से कुछ सीखीं नहीं, बीमारी और ले कर बैठ गईं. देखो, जरा देखो यह सीरियल. यह तो तुम्हारा फेवरेट है न, क्या सीखा तुम ने इस से?’’

सुमि भी भन्नाई, ‘‘नहीं देखना मुझे अभी टीवीवीवी और मेरा सिरदर्द टीवी देखने से नहीं आप के बकबक करने से हुआ है. बीवी का सिर दुख रहा है तो यह नहीं कि उस का थोड़ा सिर दबा दें, सहला दें, दवा दे दें. बस, अपनी दूसरी शादी के बाजे बजने लगे मन में.’’

मैं ने भी कहा, ‘‘हां, तो क्या गलत है, तुम्हें कुछ हो गया तो मेरी तो मुसीबत हो जाएगी न, कौन बनाएगा मेरे लिए खाना, कौन मेरे कपड़े धोएगा, कौन मेरा ध्यान रखेगा. इतना तो तुम्हें सोचना चाहिए न कि तुम्हारे बाद मुझे कोई तकलीफ न हो. तुम्हारा फर्ज नहीं बनता कि तुम पहले ही उस का इंतजाम कर जाओ.’’

सुमि बिफर गई, ‘‘हायहाय, कैसे आदमी से पाला पड़ा है. बीवी मर जाए, उस की चिंता नहीं. उस के मरने के बाद खुद को तकलीफ न हो, इस की अभी से चिंता हो रही है. पर आप चिंता मत करो न, अभी न मैं मरने वाली हूं और न पीछा छोड़ने वाली हूं. देखते रहो मेरे मरने की राह…’’

मैं मायूस हो गया, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि तुम टीवी में देखती क्या हो? उस से कुछ सीखती नहीं हो. देखो, सीरियल में एक हीरोइन को ब्रेन ट्यूमर हुआ. उस ने अपने मरने से पहले ही अपनी सहेली को बुला लिया ताकि उस का पति उस की सहेली से शादी कर सके. और तो और, वह शादी करना नहीं चाहता तो भी उस ने ऐसा इंतजाम किया कि वह उस की तरफ अट्रैक्ट हो, उस से शादी कर ले जबकि वह तो मरी भी नहीं थी. तुम नहीं कर सकतीं ऐसा कुछ?

‘‘यह तो छोड़ो एक और सीरियल में, जिस में पत्नी को हिटलर दिखाया है जिस को कैंसर होता है, वह मरने से पहले अपने पति की विधिविधान से शादी करवा कर मरी. देखो, इसे कहते हैं पतिप्रेम, पति का ध्यान रखना, पति की चिंता करना. तुम को है मेरा ध्यान, ऐसी चिंता? यह जो टीवी के सामने बैठ कर सारा दिन आंखें फोड़ती रहती हो न, उस के बजाय कुछ काम की बात सीखो ताकि सिर्फ बिजली का बिल ही न बढ़े, मेरा दिल भी बढ़ता रहे.’’

सुमि भिनभिनाई, ‘‘अच्छा, मैं आप के लिए लड़की तलाश कर आप की शादी करवाऊं और फिर, आप की शादी में जूते छिपाऊं. पूरी घरवाली से आधी घरवाली मतलब साली बन जाऊं. सीरियल की हीरोइन बेवकूफ है तो मैं भी बेवकूफ बन जाऊं. अरे, जीतेजी तो छोड़ो, मैं तो मरने के बाद भी आप को दूसरी शादी नहीं करने दूंगी. इसी घर में घूमती रहूंगी. आप के आसपास. दूसरी शादी, माय फुट.’’

मैं ने कहा, ‘‘सच है न, चुड़ैल मरती थोड़ी है. तुम से मेरा कभी कोई सुख देखा गया है जो अब देख पाओगी. तुम तो यही चाहोगी कि मैं अकेला घिसटघिसट कर मर जाऊं और तुम ऊपर से मुझे इस तरह तड़पता मरता देख खुश होती रहो.’’

सुमि बोली, ‘‘ऊपर से नहीं, यहीं  से देखूंगी. अभी कह रहे थे न  कि टीवी से कुछ सीखती क्यों नहीं हो, तो सीख रही हूं न, अपने पति पर नजर रखना, उस पर अविश्वास करना, वरना आप आदमियों का क्या भरोसा कि कब घरवाली को छोड़ कर बाहरवाली को ले आएं. तब न बीवी का खयाल न बच्चों का. अभी मैं जिंदा हूं तो यह हाल है, मर जाऊंगी तो पता नहीं क्या करोगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘इसीलिए तो कह रहा हूं, तुम खुद ही शादी करवा जाओ न मरने से पहले ताकि तुम को भी पता रहे कि मैं ने क्या किया?’’

सुमि ने हाथ नचाए, ‘‘अच्छा, मान लो कि मैं ने आप की शादी करवा दी और मैं नहीं मरी तो? तो क्या करोगे?’’

मैं सोच में पड़ गया, ‘‘ओह, यह तो मैं ने सोचा ही नहीं,’’ मैं ने चोर नजरों से सुमि की तरफ देखा. जिस हिसाब से इस की सेहत बनी हुई है, मरनेवरने का तो इस का कोई इरादा दिखाई नहीं दे रहा. मैं ने कहा, ‘‘तो क्या हुआ, एक और सीरियल है न, जिस में पत्नी अपने पति को बेच कर उस की शादी करवाती है, फिर दोनों बहनों की तरह साथ में रहती हैं, तुम भी रहना ऐसे ही…’’

सुमि तड़क कर बोली, ‘‘उस ने अपने पति की शादी करवाने के लिए ढेर सारे पैसे लिए थे. आप को बेचूंगी तो खरीदेगा कौन? कोई फूटी कौड़ी भी नहीं देगा आप के लिए. यह तो मैं ही हूं जो निभाए जा रही हूं वरना टके का मोल नहीं है आप का. एक शादी से मन नहीं भरा, दूसरी शादी के लिए लड्डू फूट रहे हैं मन में. सारा दिन बैठ कर टीवी मैं नहीं देखती, आप देखते रहते हैं ये फुजूल सीरियल, और घर में फसाद करते रहते हैं. और भी बातें आती हैं टीवी में, वो देखो न.’’

मैं ने कहा, ‘‘और क्या देखूं जो देख रहा हूं, दिखा रहा हूं उस पर तो ध्यान नहीं दे रही, बातें बना रही हो…कुछ और देखो. पर मैं तुम से फिर कह रहा हूं, तुम मरो तो मरने से पहले मेरी शादी करवा देना.’’

सुमि खड़ी हो गई, ‘‘हां, ठीक है. मेरा तो अभी यमराज के साथ  जोड़ी बनाने का कोई मूड नहीं है. पर अब आप न वह सीरियल भी देखो जिस में ‘बालिका वधू’ के साथ ‘क्या हुआ तेरा वादा’ निभाने की बात करते हुए ‘पुनर्विवाह किए जा रहे हैं वह भी दोदो, तीनतीन बच्चे होने के बाद भी…और पुराना पति अपनी बीवी के होने वाले नए पति के साथ अपनी पुरानी पत्नी के खुश रहने की कामना कर रहा है. मैं भी अभी आप की शादी करवाती हूं पर आप भी वादा करो कि मेरी शादी में जरूर आओगे. मैं भी अकेली तो नहीं रहूंगी न, बोलो है मंजूर?’’

मैं चौंक गया, ‘‘अरे, यह क्या बात हुई. मुझे कोई पिक्चर नहीं बनानी है ‘मेरी बीवी की शादी’, ‘मेरी भी शादी में आना’, हुंह. मैं अभी मरने वाला नहीं हूं. फिर सोचा कि लोग क्या कहेंगे. ये सीरियल वाले भी न, न जाने क्याक्या बकवास दिखाते रहते हैं.’’

मैं ने टीवी बंद कर दिया. सुमि मन ही मन बोली, ‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे.’ पर प्रत्यक्षत: बोली, ‘‘अच्छा, अपनी बारी तो सब अच्छा, मेरी बारी तो बकवास. अब बंद करो यह ड्रामा और सिर दबाओ मेरा, चलो.’’

मैं ने भी लड्डू फोड़ने बंद किए. अपनी आह को दबाया, मायूस मन को समझाया और सुमि का सिर दबाने चल दिया. ये सीरियल वाले ऐसे सीरियल बनाते ही क्यों हैं जिन से मेरे जैसे बेबस आम आदमी के अरमान मचलने लगते हैं. बताइए जरा.

हवा का झोंका: भाग-3

भाभी के ऊंचे स्वर ने मुझे भी सहमा कर रख दिया. दूध को बोतल में डाल कर मैं शीघ्रता से निकल आई. मुझे मांपिताजी, भैयाभाभी किसी की बातों में दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए मैं नूरी को ले कर दूसरे कमरे की ओर बढ़ गई.

यह पल्लवी व तरुण का शयनकक्ष था, साफसुथरा, कीमती सजावट से भरपूर. बढि़या लकड़ी के बने हुए खूबसूरत, नक्काशीदार पलंग के गुदगुदे गद्दों व रेशमी चादर पर लेटते ही मन का रोआंरोआं मीठी सिहरन से भर उठा.

पल्लवी की अनिंद्य सुंदरता बीच में न आई होती तो शायद यह सब मेरा ही होता. पल्लवी से पहले तरुण मेरा ही तो होने वाला था.

मन 2 वर्ष का फासला पार कर अतीत में जा पहुंचा, जब तरुण से मेरे रिश्ते की बात चली थी.

तरुण के मांबाप मुझे देखने मेरे घर आए हुए थे. मेरे घर वालों ने मुझे ब्यूटीपार्लर में सजवा कर गुडि़या सी बना कर उन के सामने बैठा दिया था.

परंतु सौंदर्य प्रसाधनों की ढेरसारी लीपापोती व बिजली की चकाचौंध भी मेरे सांवले रंग को नहीं छिपा पाई थी.

श्वेता नाम होने से ही कोई दूध जैसा गोरा तो हो नहीं जाता. पता नहीं, क्या सोच कर मेरे घर वालों ने मेरा नाम श्वेता रखा था.

मेरा रंग मेरे नाम के बिलकुल विपरीत था. नयननक्श आकर्षक होने से क्या होता है? मेरे घर वालों को विश्वास था कि तरुण के मांबाप मेरी उच्च शिक्षा, गुणों, मधुर व्यवहार, शहद जैसी मीठी व सुरीली आवाज से प्रभावित हो कर मुझे अपने घर की बहू बना लेंगे.

लेकिन उन दोनों ने स्पष्ट इनकार कर दिया. मुझे देख कर कड़वा सा मुंह बना कर दोनों ने मेरे घर वालों को खूब लताड़ा, कहा, ‘नाहक ही अपने घर बुला कर तुम लोगों ने हमारा कीमती वक्त बरबाद किया, जबकि हम पहले ही कह चुके हैं कि हमें अपने इकलौते बेटे के लिए, गोरीचिट्टी लड़की चाहिए, कौए जैसे कालीकलूटी नहीं.’

अपमान का जहरीला घूंट जैसेतैसे निगल कर मैं अपराधी भाव से सिर झुका कर जाने के लिए उठ कर खड़ी हो गई. आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. जमीन में समा जाने को जी चाह रहा था.

तभी अपने कालेज की बैडमिंटन टीम के साथ खेल कर, उछलतीकूदती, हाथ में रैकेट नचाती हुई पल्लवी ने घर में प्रवेश किया तो तरुण के मांबाप उस की बेबाक चंचलता, चुस्तीफुर्ती, केसर घुला दूध जैसा रंग देख कर अवाक् रह गए.

तरुण की मां थोड़ी नम्र हो कर बोलीं, ‘हमें अपने घर की बहू बनाने के लिए जैसी लड़की की आवश्यकता है, वे गुण तुम्हारी इस छोटी बेटी में मौजूद हैं. चाहो तो रिश्ते के लिए हां कर दो. इस के लिए हमें दहेज की आवश्यकता भी नहीं है.’

अंधा क्या चाहे दो आंख. मेरे घर वाले बिना दहेज के मनचाहे रिश्ते को हाथ से निकालने वाले नहीं थे. मेरी भावनाओं की चिंता किए बगैर पल्लवी का विवाह तरुण के साथ संपन्न कर दिया गया.  मैं बगैर कोई शृंगार किए सादी साड़ी पहने हुए सूनी निगाहों से पल्लवी को दुलहन बनते देखती रही. वह विदा हो कर गई तो लगा, जैसे मेरा संपूर्ण अस्तित्व भी उस के साथ जा चुका है. घर में मन ही नहीं लग पाया.

फिर घर वालों के तीव्र प्रतिरोध के बावजूद मैं ने कानपुर के एक पब्लिक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली और छात्रावास के एक कमरे में रहने लगी.

मां पिताजी के पत्र आते. लिखते रहते, ‘हम तुम्हारे लिए लड़का देख रहे हैं. बेटी का विवाह किए बगैर मर जाएंगे तो छाती पर पड़ा बोझ हमें मरने के बाद भी चैन नहीं लेने देगा.’

परंतु मेरी दिलचस्पी अब विवाह में नहीं रह गई थी. फिर मेरे जैसी कालीकलूटी लड़की को अच्छा लड़का मिलता भी कहां से?

‘‘क्या सो गईं, दीदी?’’ भाभी के स्वर ने मुझे चौंकाया तो मैं ने खयालों की दुनिया से निकल कर आंखें खोल दीं.

‘‘वे सब तो बैठक में ही सोफों पर पसर कर सोने लगे, मैं तुम्हारे पास चली आई, यहां आराम तो मिलेगा,’’ भाभी ने सिरहाने की ओर रखा तकिया अपनी ओर घसीटा.

भाभी बतलाती रहीं, ‘‘सब ने योजना तैयार कर ली है कि अगर हम पल्लवी की मौत को सुबूतों के अभाव में हत्या सिद्ध नहीं कर पाए तो आत्महत्या अवश्य सिद्ध कर देंगे. फिर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाले सासससुर और पति के लिए कठोर सजा अवश्य मिल जाएगी.’’

मैं दुखी मन से देर तक सोचती रही, ‘मांपिताजी, भैयाभाभी नाहक ही लोगों के मन में अपनी धाक जमाने के लिए निर्दोष तरुण और उस के मांबाप को अपराधी सिद्ध करने में लगे हुए हैं.’

फिर मन की बात पचा न पाने के कारण मैं सुबह नाश्ते की मेज पर कह ही बैठी, ‘‘आप लोग पल्लवी की मौत को साधारण दुर्घटना मान कर खामोश हो कर क्यों नहीं बैठ जाते. अकारण बतंगड़ बना कर मामले को उलझा क्यों रहे हैं?’’

सब हैरानी से मेरा मुंह ताकते रह गए. भैया की आंखों में क्रोध उतर आया, ‘‘तुम्हारा मतलब है, हम कायरों की भांति मुंह छिपा कर भाग जाएं. तुम्हारे मन में अपनी बहन के प्रति क्या जरा सी भी हमदर्दी नहीं है? अगर इसे दुर्घटना भी मान लिया जाए तो सोचने की बात है कि नौकरों से भरेपूरे संपन्न घर में यह जानलेवा दुर्घटना कैसे हो गई? क्या इस दुर्घटना के लिए तरुण व उस के मातापिता दोषी नहीं हैं? बहू की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की तो थी.’’

लज्जित हो कर मैं चुप बैठ गई. अपनी बहन पल्लवी को मैं कम थोड़े ही चाहती थी पर क्रोध से उमड़ते घर वालों को मैं किस प्रकार समझा सकती थी. उन की नजरों में निर्दोष तरुण व उस के निर्दोष मांबाप को सजा दिलवाना ही पल्लवी के प्रति सच्ची सहानुभूति व आत्मीयता थी.

मुझे अपने ऊपर हैरानी थी. मैं तरुण व इस घर के प्रति मोह से क्यों बंधती जा रही हूं? मेरे मन में तरुण व इस घर के प्रति आत्मीयता क्यों पनप रही है? क्या इसीलिए कि यह सब कभी मेरा होने वाला था?

मेरे मन में तरुण के वे शब्द भी घूम रहे थे जो वह जानेअनजाने में जबतब कह बैठा था. मेरे अविवाहित रह जाने व एकाकीपन के लिए वह खुद को जिम्मेदार समझ कर पश्चात्तापभरे स्वर में कह बैठता था, ‘क्या गोरा रंग ही सबकुछ हुआ करता है? मेरे मांबाप ने तुम्हें ठुकरा कर तुम्हारे साथ जो अन्याय किया है उस के लिए मैं दोषी हूं. काश, मैं हिम्मत से काम लेता.’

‘अब रहने दो तरुण, कहने से कोई लाभ नहीं. तुम पल्लवी के हो, सिर्फ पल्लवी के.’ मैं सिहर कर कह बैठती और तरुण के शब्द अंदर ही अंदर घुट कर रह जाते. उस की आंखों से झांकती आत्मीयता मेरा हृदय चीर देती. एकांत मिलते ही मैं फूटफूट कर रो उठती. तब मेरे मन के कोने में पल्लवी के प्रति ईर्ष्या के भाव जाग जाते. सोचने लगती,

‘काश, मैं तरुण को उस से छीन लेने में सफल हो पाती.’

इसी मानसिक अशांति, ईर्ष्या व ऊहापोह से बचने के लिए मैं पल्लवी से दूर, बहुत दूर होती चली गई थी. मैं तरुण से भी बचने के प्रयास करती.

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दोगला: भाग-3

मदन के जवाब से खुश हो कर शास्त्री ने अगले ग्राहक की ओर रुख करते हुए पूछा, ‘‘बताओ शिवपाल, कब्ज से राहत तो मिली?’’

‘‘महाराज, अब क्या बताऊं. नई मुसीबत आन पड़ी है. पथरी के दर्द से व्याकुल हुआ जा रहा हूं. इस से मुक्ति दिला दीजिए.’’

शास्त्री के चेहरे पर मुक्तिदाता के भाव उभरे.

‘‘वैसे संदेह था ही मुझे, ठीक है, अब 3 चम्मच तुलसी का रस हर रोज लेता रह. हां, तुम बताओ बाबूराम, मठिया से फुरसत पा कर आज तुम यहां आ ही गए आखिर. बताओ, क्या हुआ?’’

‘‘महाराज, बवासीर से तिलमिला रहा हूं. और जानता हूं आप जैसे ज्ञानी ही इस का सही तोड़ बता सकते हैं.’’

‘‘अरे, तुम बवासीर की बात करते हो. हमारे ग्रंथों में हर पीड़ा का समाधान छिपा हुआ है. तो बाबूराम, तुम ऐसा करो, आम के सूखे पत्ते मसल कर चिलम में भर कर पीते रहो. बवासीर धुएं में न उड़ जाए तो कहना.’’

शास्त्री के पीछे बैठा वीरेन मजे ले कर यह सुन रहा था. अब पथप्रदर्शक का स्वांग भरता हुआ शास्त्री वहां उपस्थित सभी से कहने लगा, ‘‘अरे भई, आप समाज के कर्ताधर्ता हो. शरीर की तंदुरुस्ती का खयाल आप सभी को रखना ही होगा. एक रामबाण उपाय जो मैं नित्य बताता रहता हूं, उस का सार आप लोग भी सुन लो. इस अमृत की खोज हमारे योगियों ने बहुत पहले ही कर ली थी. जिसे ‘शिवांबु कल्प विधि’ कहा गया है.’’

फिर एकाएक आवाज को रहस्यमयी बना कर शास्त्री नीचे स्वर में बोला, ‘‘भोर में जाग कर पूर्व दिशा की ओर मुख कर के शिवांबु का पान कीजिए यानी स्वमूत्र पीजिए. तत्पश्चात सूर्यनारायण को नमस्कार. देखिए, आप के ज्ञातअज्ञात सब रोग दूर भाग जाएंगे.’’

‘‘परंतु महाराज, क्या ऐसा करने से शरीर की अशुद्धि नहीं होती?’’ किसी ने दबे स्वर में शंका प्रकट की.

अब भांग का पूरा लोटा गटकने के बाद, शास्त्री जोरदार डकार ले कर तनिक मुसकराया, फिर दार्शनिक अंदाज में बोला, ‘‘कैसी अशुद्धि? प्राचीन योग विद्या ‘डामर तंत्र’ में ‘शिवांबु कल्प विधि’ की महत्ता को स्पष्ट निरूपित किया गया है. तुम यहां बैठे इन पंडितों से ही पूछ लो, जो पीढि़यों से इस का लाभ उठाते आ रहे हैं. तुम इन के मुखमंडल का तेज तो देखो. और यही क्यों, हमारे महात्मा, नेताओं तक ने इस को स्वीकार किया है.’’

इस दौरान गोपाल वहां आ कर आदर से खड़ा हो गया था. शास्त्री की बात समाप्त होने पर उस ने कहा, ‘‘महाराज, दूबेजी के घर से उन का नौकर आया है. उन्होंने अपने बेटे के यज्ञोपवीत संस्कार के लिए ‘पंचगव्य’ मंगवाया है.’’

शास्त्री को जैसे कुछ याद हो आया, ‘‘हांहां, मुझे दूबेजी ने न्योता दिया है. तू गोशाला से ला कर दे दे उसे.’’

गोपाल के जाने के बाद कुछ पल रुक कर शास्त्री बीच में छोड़ी अपनी बात आगे बढ़ाता बोला, ‘‘…तो मैं कह रहा था आप, ‘अमरोली’ का मूल्य समझें. अपना स्वास्थ्य रक्षण करिए. मैं और क्या कहूं, आप को अधिक जानकारी मेरे लिखे ग्रंथ को पढ़ कर मिल ही जाएगी.’’

कहता हुआ शास्त्री जब पीछे पलटा तो उस की नजर वहां बैठे वीरेन पर पड़ी. पहले वह सकपकाया, फिर तुरंत संभलता हुआ बोला, ‘‘अरे इंजीनियर साहब, आप यहां कैसे? किस रोग ने जकड़ लिया आप को? कहो तो कोई टोटका बता दूं. सुवर्ण भस्म या कुछ…’’

वीरेन चौकी से उठा और शरारती मुसकराहट के साथ बोला, ‘‘नहीं, शास्त्रीजी. भस्म, शिलाजीत तो मुफ्तखोरों के चोंचले हैं. मैं तो यह बताने आया था कि मंदिर की जलनिकासी के लिए नई लाइन बिछा कर हमें अलग से चैंबर बनाना होगा. इस के लिए मंदिर में खुदाई करनी होगी. हमें ट्रस्ट की लिखित सहमति चाहिए.’’

‘‘भई देखिए, जगह पवित्र है. तनिक यह बात स्मरण रख कर काम कीजिए.’’

शास्त्री के उकसाते तानों को वीरेन अपनी उसी मुसकराहट से धराशायी करता बोला, ‘‘आप चिंता कर के अपना मन मलिन न कीजिए. हम पूरा खयाल रखेंगे.’’

‘‘हांहां, अवश्य खयाल रखेंगे, इसलिए तो आप को रखा गया है.’’

वीरेन को निर्विकार देख कर शास्त्री भीतर से और खीज उठा. वह ऐंठ कर जनेऊ में अंगूठा फेरता हुआ वहां बैठे लोगों से बोला, ‘‘देखिए, जन्म और कर्म का चक्कर. हमारे इंजीनियर साहब ओहदा तो पा गए बेचारे पर कर्म…इस अवसर पर बस इतना ही कह सकते हैं, कर्म करते रहिए बिना फल की अपेक्षा किए.’’

वीरेन स्वाभिमानी आभा प्रकट करता बोला, ‘‘जन्मजन्मांतर के काल्पनिक चक्कर को तो मैं नहीं मानता. लेकिन हां, इतना छाती ठोंक कर कह सकता हूं कि मैं मासूमों को गुमराह कर के लूटता नहीं. न ही हर जाति का अलग भगवान पैदा कर के भिक्षा मांगता हूं. अच्छा, मुझे आज्ञा दीजिए. समाज का उपयोगी व्यक्ति हूं. अधिक समय बरबाद नहीं कर सकता,’’ कह कर वीरेन वहां से चला गया.

शास्त्री सिर से पांव तक विषैले दंश का अनुभव करता रह गया.

वार्षिक उत्सव की जोरदार तैयारी से क्षेत्र की रौनक बढ़ती जा रही थी. मुख्य मंदिर के साथ ही अन्य मंदिरों की लिपाईपुताई हो रही थी. उन्हें फूलों, बल्बों की मालाओं से सजाया जा रहा

था. दूरदूर से आए छोटेबड़े व्यापारी अपनेअपने ठिकानों पर जम रहे थे. वीरेन ने अपने दल के सहयोग से समय से पहले ही अपना काम पूरा कर लिया था.

यज्ञ, मंत्रपाठ से उत्सव प्रारंभ हुआ. लोग दूरदूर से इस में हिस्सा लेने आए थे, जिन में कुछ विदेशी सैलानी भी शामिल थे. नियोजित कार्यक्रम के तहत मेहतर बस्ती में सुदर्शन महाराज के मंदिर की नींव रखी गई. इधर भक्तों के मनमस्तिष्क में हर तरह की असुरक्षा व भय को बिठाने का काम पंडेपुजारी खूब चतुराई से कर रहे थे, जिन का समाधान कराने के लिए लोग मंदिरों में खूब दानदक्षिणा, अभिषेक आदि करने के लिए उमड़ रहे थे. इस से मंदिरमालिकों में हमेशा की तरह खुशी का उबाल आया हुआ था.

आज महाप्रसाद के बाद रात्रि में धर्माचार्य केशवानंद का प्रवचन होने वाला था. उस से पूर्व उन्हीं के हाथों गोवर्धन शास्त्री द्वारा लिखी पुस्तक का विमोचन भी होना था. नगरपालिका की ओर से वीरेन और उस के कुलीग वहां उपस्थित थे.

महाप्रसाद के लिए भक्तगण पंक्ति लगा रहे थे. शास्त्री व अन्य सहधर्मी लोग मंच पर रात्रि प्रवचन की तैयारी में व्यस्त थे. तभी छुगनू और उस के साथियों को पंक्ति में बैठने के लिए प्रयत्नशील देख, एक बौने पंडित ने शास्त्री से चुगली की, ‘‘शास्त्रीजी, अभी ब्राह्मण भोज पूरा नहीं हुआ. उस से पहले कोई और कैसे प्रसाद ग्रहण कर सकता है.’’

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दोगला: भाग-2

छुगनू जानता था, अगर वीरेन को मालूम हुआ कि वह किसी धार्मिक उत्सव में शिरकत करने गया था तो वह उसे ढेर सारे उपदेश देने लगेगा. इसलिए उस ने बात बदलते हुए कहा, ‘‘अभी महाराज के शौचालय और गोशाला की सफाई कर लूं तो आज का काम भी पूरा हो जाएगा. फिर घर जा कर आराम ही करना है मुझे.’’

‘‘अरे, पर यह तो निजी काम है. इसे आप क्यों करोगे?’’

‘‘नहींनहीं, भैया, ऐसा नहीं कहते. अब जो इनकार किया तो अगले जनम में सूअर बन कर गंदगी में मुंह मारना पड़ेगा और बामनसेवा करने से हमें भगवानजी का आशीष भी तो मिलेगा.’’

‘‘अगर पीढि़यों से भगवान का आशीष ही मिल रहा है, तो कहिए हमारी इस हालत में सुधार क्यों नहीं होता? छुगनू भैया, कब समझ पाओगे आप लोग सचाई. आखिर कब तक इस बेसिरपैर के डर को ढोते रहोगे. खैर, बताइए, आप की लड़की रोजाना स्कूल तो जा रही है न?’’

‘‘हांहां, भैया. अब वह एक दिन भी नहीं चूकती. आप ने उसे जाने क्या मंतर पढ़ाया है. कहती है, ‘मैं भी वीरेन भैया जैसी ही बनूंगी.’ ’’

‘‘जरूर बनना चाहिए उसे, बल्कि देखना, वह मुझ से भी बड़ी अफसर बनेगी एक दिन. अच्छा तो मैं चलता हूं,’’ कहता हुआ वीरेन वहां से जाने लगा तो छुगनू ने उसे संकोच से रोका.

‘‘वीरेन भैया, रुकिए. महाराज कह रहे थे, उन के शौचालय से निकासी नहीं हो रही. शायद लाइन भर गई है.’’

‘‘हां, औफिस में उन की अर्जी पहुंच चुकी है. मैं साइट पर ही जा रहा हूं, देख लूंगा. आप कोई फिक्र न करो.’’

मंदिर की सामने वाली साइट पर मजदूर डे्रनेज लाइन बिछाने का काम कर रहे थे. इंजीनियर वीरेन की देखरेख में यह काम चल रहा था. वीरेन अपने मातहत को सामने रखे लैपटौप के जरिए बारीकियों से निर्देश देता हुआ काम समझा रहा था. तभी आसपास के अन्य मंदिरों में पूजा कर के लौट रहा गोवर्धन शास्त्री वहां आ कर कुछ दूरी पर रुक गया. आनेजाने वाले लोग उसे कठपुतलियों की तरह प्रणाम कर रहे थे. अपने श्वेत वस्त्र संभालता हुआ शास्त्री वीरेन का ध्यान आकर्षित करने के लिए गला खंखार कर बोला, ‘‘इंजीनियर साहब, मेरे शौचालय में नरकासुर उछाल मारमार कर सांस लेना दूभर कर रहा है. जान सकता हूं, हमें इस नरकपीड़ा से मुक्ति कब मिलेगी?’’

शास्त्री की सनक से वीरेन भलीभांति परिचित था. उस ने भी उसी लहजे में कहा, ‘‘अब शास्त्रीजी, मैं तो आप के अवतारों जैसी कुशल तकनीक जानता नहीं, जो आप के द्वारा जन्मे इस नरकासुर का चुटकियों में संहार कर दूं. आप देख ही रहे हो, हम उसी काम में जुटे हुए हैं. बहरहाल, लगता है आप की डे्रनेज लाइन बदलनी होगी. इस के लिए मुझे वहां आ कर पहले स्थिति की जांच करनी पड़ेगी. कुछ देर बाद मंदिर आ कर मैं यह कर लूंगा. आप विश्वास रखिए.’’

वीरेन के उत्तर से आहत शास्त्री ने पलटवार करने का पैतरा लिया ही था कि तभी एक बौखलाया सा युवक पास आ कर शास्त्री को यंत्रवत प्रणाम कर कहने लगा, ‘‘रामराम शास्त्रीजी, बाबूजी को रात फिर दमे का दौरा पड़ गया. आप से दवा लाने को कहा है और यह दक्षिणा भी दी है.’’

‘‘तेरे बाबूजी ने मेरे बताए परहेज में अवश्य कोताही की होगी. परंतु चिंता की कोई बात नहीं, हम हैं न. अब ऐसा कर, 1 गुंजा जौखार चूरन या अभ्रक भस्म शहद में चटा दे. मंदिर जा कर गोपाल से यह सब लेता जा और उस से कहना, हम राममंदिर से लौट कर बैठक में आएंगे. उधर, उत्सव कमेटी के लोग आए होंगे. रोगी हों तो उन्हें भी रुकने को कहना.’’

उस युवक के चले जाने के बाद शास्त्री वीरेन की खबर लेता, उसी समय मैले से भरा हुआ छोटा ठेला ले जाता हुआ छुगनू वहां से गुजरा. उस ठेले से रिसता मल का पानी छुगनू के हाथपैर को छू रहा था. यह देख कर शास्त्री अपनी धोती समेटता हुआ, घृणा दर्शाता चेहरा बना कर वहां से परे हट गया.

‘‘शिवशिवशिव…, तड़के आ कर यह सब करने में क्या दिक्कत होती है? प्रारब्ध का ऐसा घिनौना प्रदर्शन करने से क्या मिलता है?’’

‘‘माफ कीजिए शास्त्रीजी. लेकिन आप कुछ ज्यादा ही धर्मपरायणता दिखा रहे हैं. एक तो वह बेचारा इस कुप्रथा को बिना शिकायत करे आप ही की गंदगी ढो रहा है. उस पर आप सहानुभूति दिखाने के, उस का उपकार मानने के बजाय उलटे उसे ही दोषी ठहरा रहे हो.’’

वीरेन की इस प्रतिक्रिया से शास्त्री के मुख पर धूर्त मुसकान प्रकट हुई.

‘‘अरे हां, क्षमा तो आप मुझे कीजिए इंजीनियर साहब. मैं तो भूल ही गया था. परंतु आप में और उस में देखिए तो कितना अंतर है. आरक्षण की नैया में आप तो पार लग गए. परंतु वह बेचारा लगातार धंसा ही जा रहा है.’’

‘‘ठीक कहा, शास्त्रीजी. स्वार्थी धर्म और निष्फल कर्मकांड की पैदावार है यह दलदल. यदि सचाई से बेखबर इस के मातापिता इस बात को समझ लेते तो बेशक वह भी थोपे हुए वर्णाश्रम की सड़ांध से बाहर निकल गया होता.’’

वीरेन के शब्दबाण शास्त्री के अहं को गहराई तक बींध गए.

वीरेन को इंजीनियर का पद आसानी से नहीं मिला था. नगरपालिका में चतुर्थ श्रेणी पद से ही उस ने अपनी शुरुआत की थी. लेकिन काम के साथसाथ वह एक उदात्त लक्ष्य को स्मरण रख आगे की पढ़ाई भी करता था. कड़ी मेहनत पर उस की निष्ठा थी, इसीलिए एक दिन उस ने अपना वांछित लक्ष्य भी पा लिया. कल तक जो उस के अस्तित्व को नकारते थे, आज उन्हें उस की मौजूदगी का खयाल रखना पड़ता था.

शास्त्री अपने घर के या कहना चाहिए मंदिर के बरामदे में दरबार लगाए हुए था. वहां उत्सव कमेटी के सदस्यों के अलावा कुछ बीमार भी बैठे हुए थे. अपनी बातें छौंकने में शास्त्री इतना डूबा हुआ था कि उसे पता ही नहीं चला कि वीरेन उस के पीठ पीछे कब से आ कर खड़ा है. शास्त्री अपनी धुन में खोया बोले जा रहा था, ‘‘…और इस तरह हमारी परंपराएं ही हमें बदल देती हैं. संस्कृति हमारी पहचान है. अब तो आप सभी धर्मवीर, दानवीर समझ ही गए होंगे. इस वर्ष का उत्सव हमें और अधिक गौरवपूर्ण उल्लास से मनाना है.’’

अब शास्त्री ने थोड़ा विराम लिया और पास रखे लोटे से मसालाभांग पीने के बाद कपड़े से अपना मुंह साफ किया. फिर सामने बैठे हुए मदन से उत्साह में पूछा, ‘‘तो मदन सेठ, सुदर्शन महाराज का मंदिर बनाने के लिए अपने बांधवों से मशवरा कर लिया?’’

‘‘जी महाराज. सब को इस बात की खुशी है कि अब उन के अपने भगवान का भी अलग से मंदिर होगा.’’

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दोगला: भाग-1

मंदिर के मुख्य पुरोहित गोवर्धन शास्त्री का काम अपनी स्वरचित कथाओं से धर्मभीरु लोगों को सम्मोहित करना और उन्हें स्वार्थी धर्म के दलदल में धकेलना था. ऐसे में वार्षिक उत्सव के अवसर पर वीरेन ने ऐसा क्या आक्रामक वक्तव्य दिया जिस से गोवर्धन शास्त्री स्वयं को शर्मिंदा महसूस करने लगा?

भोर का शांत वातावरण गाय के रंभाने व पक्षियों के कूजन से सुहावना लग रहा था. पुरातन मंदिर के विस्तृत घेरे में बाईं तरफ गोवर्धन शास्त्री का कई कमरों वाला पुश्तैनी मकान है. मकान के पीछे वाले बगीचे में गोवर्धन शास्त्री ने पूर्व की ओर मुख कर, चांदी के पात्र से कुछ पीने के बाद सूर्य की उभरती लाली को नमन किया, तभी खामोशी को तोड़ती सपसप की आवाज से वह एकदम से चौकन्ना हो गया. इस आकस्मिक ध्वनि को वह सकपकाई नजर से इधरउधर तलाशने लगा. तब उसे झुरमुट के पीछे छुगनू की बलिष्ठ देह दिखाई दी. वह झाड़ू से सफाई कर रहा था. चोर कदमों से उस के निकट जा कर, शास्त्री ने आशंकित स्वर में भौंहें सिकोड़ कर पूछा, ‘‘अरे छुगनू, झाडि़यों के पीछे से क्या देख रहा था?’’

शास्त्री के दाएं कान पर टिके जनेऊ और तोंद पर छलक आई कुछ पीली बूंदों को छुगनू ने देखा, और दबी मुसकान में कहा, ‘‘कुछ नहीं महाराज, मैं तो सफाई कर रहा था.’’

‘‘बता तो सही, तू इतनी सुबह कैसे आ धमका. पिछले 2-3 दिनों से तो तू गायब ही था.’’

छुगनू की बढ़ी हुई दाढ़ी में उभरे गाल अधिक फूल गए. उस ने उत्साह से बताया, ‘‘महाराज, संगरिया की मेहतर बस्ती में सुदर्शन महाराज का बड़ा मंदिर बनाया गया है. मुझे भी न्योता था, सो मैं वहीं गया था.’’

छुगनू की बात सुन कर शास्त्री के मस्तिष्क में तुरंत एक विचार कौंधा और उस ने कहा, ‘‘अरे पगले, दूसरों की दहलीज पर माथा रगड़ने से बेहतर अपनी ही चौखट को पूजनीय क्यों नहीं बनाते.’’

छुगनू की समझ में बात नहीं आई तो शास्त्री ने खुल कर कहा, ‘‘मेरा मतलब है, तुम भी अपना वैसा ही मंदिर क्यों नहीं बनाते.’’

‘‘अपना मंदिर, बात तो चोखी है, महाराज. पर धन और दूसरी कई बातों का इंतजाम कहां से होगा?’’

‘‘तुम लोगों के पास धन की कमी तो है नहीं. और अपने भगवान पर अगर सच्ची श्रद्धा हो तो सब काम अपनेआप ही होते चले जाएंगे.’’

‘‘महाराज, आप का आशीर्वाद रहा तो यह हो सकता है.’’

अपना काम साधने के बाद लाड़ से डपटने का अभिनय करता हुआ शास्त्री बोला, ‘‘अब तू तो ठहरा सरकार का जमाई. जब चाहे काम पर आ सकता है, छुट्टी ले सकता है. चाहे 2 दिन से यहां शौचालय और गोशाला बद से भी बदतर क्यों न हो गए हों. उसे क्या हम लोग साफ करेंगे? और सुन, अपने इंजीनियर भाईसाहब से शौचालय में आई गंदगी की बाढ़ के बारे में जरा याद से कहना.’’

छुगनू को उस का काम बता कर मंत्रोच्चार करता हुआ शास्त्री अपने मकान के भीतर आ गया और अपने सेवक को पुकार लगाई, ‘‘अरे गोपाल, मेरे स्नान का पानी लगा दे.’’

इसी बीच मंदिर के आंगन से किसी ने चिंतित स्वर में शास्त्री को पुकारा, ‘‘शास्त्रीजी, जल्दी से आ कर मेरे बच्चे को बचा लीजिए.’’

शास्त्री ने कुपित हो कर आवाज की तरफ देखा और झिड़की देता हुआ बाहर आया, ‘‘कौन है ये ससुरा जो सुबहसवेरे ही आ पहुंचा.’’

लेकिन बाहर आ कर आगंतुक को देखते ही सहसा अपने स्वर में शहद घोलता शास्त्री बोला, ‘‘अरे मदन सेठ, आप. इतनी सुबह कष्ट क्यों किया? किसी की तबीयत ठीक नहीं है क्या? मेरे स्नानध्यान के बाद किसी छोकरे को ही भेज देते.’’

‘‘क्या बताऊं शास्त्रीजी, मेरे बच्चे को रात से दस्त हो रहे हैं. इसी परेशानी में पूरी रात कटी है. जल्दी से कोई उपाय बताइए. लल्ला कुम्हलाया जा रहा है.’’

तुरंत चेहरे पर ममत्व के भाव ला कर शास्त्री बोला, ‘‘सेठजी, लहसुन की एक पिसी हुई फांक एक कटोरी छाछ में घोल कर उस में थोड़ी हींग और सोंठ डाल कर बच्चे को दे दीजिए, आराम आ जाएगा.’’

‘‘जी, शास्त्रीजी, आप का बड़ा आभारी हूं,’’ कह कर मदन सेठ ने हड़बड़ी में झुक कर प्रणाम किया और जाने लगा. तब शास्त्री ने उसे टोका, ‘‘सेठजी, जाने से पहले गोपाल के पास दक्षिणा तो देते जाइए. आप से एक और जरूरी बात कहनी है मुझे. छुगनू कह रहा था कि संगरिया की मेहतर बस्ती में आप के भगवान का नया मंदिर बनाया गया है. जरा सोचिए, मदन सेठ, आप के समाज ने सूद के धंधे में आप को कितना कुछ दिया. अब आप को भी समाज का कर्ज चुकाना चाहिए और धार्मिककार्य में मदद करने से सारे कर्ज जल्द चुकाए जा सकते हैं.’’

अपने मतलब की बात मदन सेठ के गले उतारने के लिए शास्त्री कोशिश कर रहा था.

‘‘हमारे मंदिर का वार्षिक उत्सव निकट ही है. उस में हिस्सा लेने के लिए धर्माचार्य केशवानंदजी आ रहे हैं. उन्हीं के हाथों से आप की मेहतर बस्ती में सुदर्शन महाराज के मंदिर का शिलान्यास करा देंगे. मंदिर बन जाने के बाद उस के पुजारी की व्यवस्था हम पर रही. तो देखिए, आया मौका न गंवाइए. अपने लोगों को इस बारे में मना कर तैयारियां शुरू कर दीजिए और अपना परलोक सुधारिए,’’ कह कर रोबदार ढंग से शास्त्री भीतर चला गया. मदन सेठ कुछ देर तक इस बारे में सोचता खड़ा रहा.

गोवर्धन शास्त्री मंदिर का मुख्य पुरोहित था. धर्मकर्म से संबंधित कुछ पुस्तकें लिखने के अलावा, वह क्षेत्र के सामान्य मरीजों को झाड़पत्ते के नुस्खे भी देता था. ऐसा नहीं था कि वहां डाक्टरों की कमी थी पर शास्त्री ने कुछ धर्मभीरु लोगों को अपनी बढ़ाचढ़ा कर लिखी कथाओं से सम्मोहित कर के, अपने अधकचरे इलाज पर आस्था रखने के लिए बाध्य कर रखा था. इस आततायी करतूत पर किसी के द्वारा प्रतिवाद करने का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि धर्मसभाओं में उस का रोब था.

अपना सरकारी काम करते हुए छुगनू बुरी तरह थक चुका था. पिछले 2 दिनों का उस का काम बाकी था. उसी को निबटाते हुए अब उस का बदन कसक रहा था. वह थकावट से राहत पाने के लिए एक जगह बैठा ही था कि उसे किसी ने आवाज दी, ‘‘छुगनू भैया, क्या हुआ, किस परेशानी में हो?’’

नगरपालिका के जूनियर इंजीनियर वीरेन को अपने पास आता देख छुगनू सहज दिखने की चेष्टा करने लगा.

‘‘कुछ नहीं, वीरेन भैया. 2 दिन मैं काम पर नहीं था न, इसलिए आज काम कुछ ज्यादा पड़ गया. सोचा कुछ देर सांस ले लूं.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ था?’’

‘‘संगरिया गया था.’’

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दोगला: भाग-4

छुगनू को देखते ही शास्त्री का उपद्रवी मस्तिष्क हरकत में आ गया, ‘‘क्या कहूं गोस्वामीजी, ये इंजीनियर वीरेन के सिरचढ़ाए लोग हैं. अब देखिए, इस ततैये का घमंड कैसे उतारता हूं. आप लोग इस का आनंद अवश्य लें,’’ यह कह कर वीरेन को सुनाई दे, इतने अंतर पर खड़ा हो कर शास्त्री ऊंची आवाज में बोला, ‘‘अरे गोपाल, उधर जा कर उन से कहो वे अलग पंक्ति बना कर बैठें. स्नानशुद्धि के बिना मंदिर में आना भी पाप है. जब उन का अपना मंदिर बन जाएगा तब वे जैसा चाहे व्यवहार करें, कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

वीरेन ने देखा छुगनू और उस के साथियों को अलग से पंक्ति लगाने के लिए कहा जा रहा है. उस से यह सब सहा न गया तो उस ने शास्त्री से कठोर स्वर में पूछा, ‘‘शास्त्रीजी, यह क्या तरीका है? किसी को इस तरह अपमानित करते हैं?’’

शास्त्री, जो इसी अवसर की ताक में था, विषैली मुसकान बिखेरता हुआ बोला, ‘‘वीरेनजी, अपनी भावनाओं को इस तरह ढीला न छोडि़ए. यहां सरकारी नहीं धर्मनीति चलती है. शुचिता का खयाल हमें रखना ही पड़ता है.’’

इस बात की पुष्टि के लिए एक और पंडित तुरंत आगे आया, ‘‘और नहीं तो क्या. ब्राह्मणों से पहले कोई और कैसे मुंह जूठा कर सकता है.’’

‘‘क्या यह आप के भगवान का फरमान है?’’ वीरेन ने क्रुद्ध हो कर कहा, तो शास्त्री जनेऊ में अंगूठा फेरता और चेहरे को अति गर्व से खौफनाक बनाता बोला, ‘‘इस धरती पर तो ब्राह्मण ही देवता समझा जाता है. अब भले ही कुछ कूढ़मग्ज लोग न मानते हों परंतु इस से धर्म की कोई हानि नहीं होती.’’

‘‘दरअसल, शास्त्रीजी, आप लोग जिसे धर्म बताते हैं वही शुद्ध अधर्म है,’’ कह कर वीरेन परे चला गया. शास्त्री व उस के सहयोगी अपनेआप को अग्निकुंड में खड़ा महसूस कर रहे थे.

सजेधजे मंच पर विराजमान धर्माचार्य केशवानंद का व्याख्यान सुनने के लिए पंडाल में भारी संख्या में लोग बैठे थे. धर्माचार्य के साथ ही अन्य जानेमाने लोग उपस्थित थे. प्रवचन शुरू होने से पहले गोवर्धन शास्त्री द्वारा लिखी ‘शिवांबु कल्प विधि’ नामक पुस्तक का विमोचन धर्माचार्य के हाथों हुआ. उन के द्वारा इस पुस्तक के समर्थन में चाशनी से लबरेज शब्द कहने के उपरांत, अन्य लोगों ने अपने कथन में कंठ सूखने तक गोवर्धन शास्त्री के गुणगान गाए.

अंत में गोवर्धन शास्त्री ने अपनी पुस्तक की उपयोगिता विस्तार से बताई. फिर उपस्थित हजारों लोगों के सामने वीरेन को उकसाने के इरादे से कहा, ‘‘अभी सुधीजनों ने मेरे बारे में बताया कि मैं पुरोहिताई के साथ रोगी, पीडि़तों की सेवा भी करता हूं. मैं समझता हूं भगवान इन्हीं पीडि़तों में बसते हैं. तो मैं ईश्वर की सेवा करता हूं. मेरा लिखा यह गं्रथ उसी सेवा का एक अंग तथा हमारे प्राचीन गं्रथों का अनुसरण मात्र है.

‘‘मैं कर्मयोग में आस्था रखता हूं. इसी की एक कड़ी मेहतर बस्ती के लिए सुदर्शन महाराज के मंदिर का संकल्प है. पूजापाठ करना व रोगियों को पीड़ा से मुक्त करना मेरा कर्म है. अपनी तरह का एक ऐसा ही कर्मयोगी हमारे बीच उपस्थित है. नगरपालिका के इंजीनियर वीरेन अगर न होते तो हमारे शौचालय व गटर कभी साफ न रहते. मैं चाहता हूं आज उन का भी सत्कार हो.’’

इस आकस्मिक आक्रमण के लिए वीरेन तैयार नहीं था. लेकिन सभी के द्वारा आग्रह करने पर उसे अनिच्छा से मंच पर जा कर फूलमालाएं स्वीकार करनी पड़ीं. इस पर भी शास्त्री चुप न बैठा. वीरेन को असमंजस में फांसने के इरादे से उसे अपनी ओर से दो शब्द कहने के लिए धूर्त आत्मीयता से आग्रह किया. लेकिन अब माइक थामते हुए वीरेन के चेहरे पर विद्युत गति से विजयी मुसकान विकसित हो रही थी :

‘‘धर्मकर्म की बातें जानने और समझने वालों के बीच मैं भला क्या कह पाऊंगा. मैं केवल तकनीकी बातों की ही चर्चा कर सकता हूं. महाकर्मयोगी गोवर्धन शास्त्रीजी ने अभीअभी शुचिता का हवाला देते हुए कुछ सफाईकर्मियों को भोजनपंक्ति से बहिष्कृत कर के अपने कर्मयोग का अच्छा परिचय दिया है. हर जाति के लिए अलग भगवान का निर्माण और जातिपांति की पहचान बनाए रखना भी अच्छा कर्मयोग है. सोचिए, अगर हम सफाई की तकनीक न अपनाते तो आज हैजा, कौलेरा जैसी बीमारियों के शिकार होते. शुचिता का महत्त्व अवश्य है लेकिन कईकई महीनों तक मंदिर के आसपास बिखरा निर्माल्य हटाया ही नहीं जाता. आने वाले भक्तों को पहले इन मलबों से उठती दुर्गंध से दोचार होना पड़ता है. एक तरफ शास्त्रीजी आयुर्वेद का खूब बखान करते हैं लेकिन जब खुद बीमार होते हैं तो बड़े शहर जा कर स्पैशलिस्ट डाक्टरों से इलाज करवाते हैं. इसलिए मुझे तकनीकी संदेह है. शास्त्रीजी अपनी किताब में लिखते हैं कि स्वमूत्र पीने से सेहत ठीकठाक रहती है जबकि मुझ जैसे तकनीकी व्यक्ति की दृष्टि में यह भी एक घृणित कार्य ही है.’’

वीरेन के इस अनसोचे और आक्रामक वक्तव्य को सुन कर पूरा पंडाल आपस में खुसुरफुसुर करने लगा. शास्त्री व अन्य पंडितों के चेहरे फक पड़ गए. वीरेन की साफगोई वाकई साफ है, इस का साक्षात्कार शास्त्री को असमय हुआ. उस ने समय के गांभीर्य को हड़बड़ा कर समझते हुए, वीरेन की बातों का उत्तर देना उचित समझा और उठ कर उदार चेहरा बनाते हुए फिर माइक थाम लिया.

‘‘मैं समझता हूं ऐसा सोचने में इंजीनियर साहब का कोई दोष नहीं, क्योंकि इन पर पश्चिमी विचारों का प्रभाव है. स्पष्ट है इन्हें अपने धर्म और संस्कृति की ठीक से पहचान नहीं है. परंतु ऐसे लोग न घर के रहते हैं न घाट के. इसलिए इन्हें मालूम नहीं कि ‘शिवांबु कल्प विधि’ पर पश्चिम के आर्मस्ट्रांग, बार्टन जैसे कई लेखकों ने पुस्तकें लिखी हैं. बल्कि आज वैज्ञानिकों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि भोर के शिवांबु में विटामिन, प्रोटीन, एंजाइम, यूरिकएसिड, प्रोस्टाग्लेडीन और हाल ही में खोजा गया हारमोन मेलाटोनिन होता है, जिसे फ्रैंच दार्शनिक रेने देकार्त ने ‘आत्मा का आसन’ कहा है. इस की महिमा के बारे में जितना कहा जाए,

कम ही है. जब पश्चिम देश ही हमारी शरण में हैं तो उन का अंधानुकरण करने वालों को यूरोपैथी में क्या शंका होनी चाहिए.’’

पंडाल और मंच भारी तनाव में आ गए थे. वीरेन ने दोबारा माइक पर अधिकार जमाते हुए दृढ़ता से अपनी अंतिम बात कह दी, ‘‘महानुभावो, शास्त्रीजी से मैं यह नहीं कहता कि आप की यह विधि या तकनीक अनुचित है, मेरा आक्षेप दोहरेपन को ले कर है. जैसे एक तरफ हिंदू एकता का प्रचारप्रसार करना तो दूसरी तरफ हर जाति को एक अलग भगवान दे कर उन की पहचान बनी रहे, इस का खास खयाल रखना. दूसरी बात, बाहरी अंगों की सहायता से समाज की गंदगी को साफ करने वाले, हमें स्वस्थ जीवन प्रदान

करने वाले सफाईकर्मी आप की नजरों में घृणित और शूद्र हैं जबकि यदि कामोत्तेजना के अंतरंग प्रयोगों की चर्चा न भी करें, फिर भी धार्मिक संस्कारों के अवसर पर ‘पंचगव्य’ के नाम पर गोबर और गोमूत्र का श्रद्धाभाव से सेवन किया जाता है. इस पर आप स्वास्थ्य रक्षण के नाम पर स्वयं का मूत्र पीने की पुरजोर वकालत भी करते हो. तो अब आप लोग ही बताइए, तकनीकी नजरिए से घिनौना क्या है, मल को साफ करना या मल का सेवन करना?’’

देर तक जब कहीं से भी इस दोहरे मानदंड का उत्तर नहीं मिला तब सब से हाथ जोड़ कर विदा लेते हुए वीरेन भारमुक्त हो कर मंच से उतर कर चला गया. इस तकनीकी नजरिए से छिन्नभिन्न हो चुके धर्माचार्य केशवानंद ने अपनी खराब सेहत का बहाना बता कर वहां से पहले ही पलायन कर लिया था. फिर अपने धर्मशास्त्रियों को वीरेन के सामने निरुत्तर देख कर धीरेधीरे अन्य लोग भी वहां से जाने लगे. विदेशी सैलानियों के मुख पर मौलिक सामग्री मिलने का समाधान था. इधर, मंच पर विपरीत बुद्धि गोवर्धन शास्त्री और उस के कुछ चेले अपनेआप को शर्मिंदा महसूस कर रहे थे और उन्हें लग रहा था कि जैसे सारी सृष्टि उन पर अट्टहास कर रही है.

लालबत्ती वाली गाड़ी

शर्माजी अपनी लालबत्ती लगी गाड़ी का इस्तेमाल दुनियाभर में रोब जमाने के लिए करते. लेकिन जब सरकारी हंटर ने उन से यह सुविधा छीनी तो लालबत्ती के मारे बेचारे ऐंबुलैंस की शरण में जा पहुंचे. क्यों? अरे भई, लालबत्ती का बुखार जो ठहरा.

‘‘शर्माजी, जब से आप की गाड़ी से लालबत्ती हटा दी गई है, आप तो नजरें ही नहीं मिलाते, शर्म से पानीपानी क्यों हुए जा रहे हैं?’’ मेरे इस प्रश्न पर वे बोले, ‘‘सक्सेनाजी, आप को क्या पता लालबत्ती वाली गाड़ी के जलवे. लालबत्ती वाली गाड़ी स्टेटस सिंबल होती है. यह स्टेटस को अपग्रेड ही नहीं करती बल्कि गाड़ी रखने वाले के कौन्फिडैंस को भी बढ़ाती है. नगरपालिका के स्कूल से वर्षों पहले 5वीं फेल हुए चेहरे का विश्वास भी इन गाडि़यों से उतरने के बाद बढ़ा हुआ नजर आता है. श्याम रंग भी श्वेत प्रतीत होता है. उन में शर्म भाव नहीं रहता, बल्कि विश्वास भाव की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है. स्टेटस हो या न हो, स्टैंडर्ड में तो चारचांद लगा ही देती है लालबत्ती वाली गाड़ी.

बिना स्टेटस वाले लोगों के लिए तो सोने के पत्रक (वरक, आवरण) का काम करती है लालबत्ती वाली गाड़ी. कभी भी, कहीं भी और किसी भी सड़क की रैडलाइट जंप कर सकती है लालबत्ती वाली गाड़ी, उस का चालान नहीं होता. लालबत्ती वाली गाडि़यों को दिल्ली के इंडिया गेट तक पर दूर से ही देख कर ट्रैफिक पुलिस वाले अन्य वाहनों को रोक कर राजपथ पर पहले गुजरने देते हैं और सलाम अलग से ठोकते हैं. जिस के पास लालबत्ती वाली गाड़ी नहीं होती उस के पास कितना भी बैंक बैलेंस, कई लक्जरी गाडि़यां क्यों न हों, सब बेकार. अब तो आप समझ ही गए होंगे कि आम से खास बनने के लिए कितनी जरूरी होती है लालबत्ती वाली गाड़ी.’’

मैं ने फिर से निसंकोच हो कर उन से कहा, ‘‘जनाब, आप तो जानते ही हैं कि अपने देश में कितने लोग ऐसे हैं जो अधिकृत न होने के बावजूद अपनी गाडि़यों पर लालबत्ती लगा लेते हैं. ऐसे में जो मुहिम चलाई जा रही है उस के तहत जज, सैक्रेटरी, होम सैक्रेटरी, विधायक, मेयर और सुपरिंटैंडैंट का ट्रैफिक पुलिस ने पिछले दिनों अवैध लालबत्ती के इस्तेमाल पर किसी को नहीं बख्शा. इस संबंध में देशभर में एक जागरूकता अभियान भी चलाया गया कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति, लोकसभा के अध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश और संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों व राज्यों के उन के समकक्षों के लिए ही लालबत्ती वाली गाड़ी की व्यवस्था की गई है. इसे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों तक सीमित किया गया है मगर आप तो फिर भी नहीं माने, अब आ गए लपेटे में और हट गई आप की गाड़ी की लालबत्ती तो इस में शर्म की क्या बात है?’’

वे बोले, ‘‘देखिए, आप को पता है न कि अध्यक्ष तो मैं भी हूं. यह बात अलग है कि मैं लोकसभा अध्यक्ष नहीं हूं मगर लोक सोसायटी की प्रबंध समिति का अध्यक्ष तो हूं ही न? लोकसभा में भी सभाएं होती हैं और हमारी सोसायटी में भी रैजिडैंट वैलफेयर को ले कर सभाएं होती हैं. जनता का ध्यान उधर भी रखा जाता है और इधर भी. उधर नेता रखते हैं, इधर प्रबंध समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष. तो फिर मुझे भी अपनी गाड़ी पर लालबत्ती लगाने का हक तो मिलना ही चाहिए न?’’

मैं ने कहा, ‘‘शर्माजी, देशभर में लालबत्ती वाली गाडि़यों के अंधाधुंध दुरुपयोग पर चिंता जताई जा रही है, चैकिंग की जा रही है, उन्हें हटाया जा रहा है. ऐसे में यदि आप को लालबत्ती वाली गाड़ी से इतना ही प्रेम हो गया है कि इस के वियोग में आप के आंसू थम ही नहीं रहे तो अपनी रैजिडैंट वैलफेयर सोसायटी की प्रबंध समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दीजिए और किसी पांचसितारा अस्पताल की ऐंबुलैंस के ड्राइवर बन जाइए. जब आप की लालबत्ती वाली गाड़ी यानी ऐंबुलैंस सड़कों पर से गुजरेगी तो फिर आप को लोग सजगता के साथ पहले गुजरने का स्थान दे देंगे. यहां पर आप को किऊंकिऊं की आवाज वाले सायरन बजाने की छूट भी मिलेगी. परिणामस्वरूप, आप को सड़कों पर सायरन बजाने के लाभों के बारे में अतिरिक्त ज्ञान हो जाएगा, जो हो सकता है लालबत्ती वाली निजी गाड़ी के लाल बल्ब से ज्यादा हो.

‘‘आप तो समाजसेवी हैं, अपनी सोसायटी में भी समाजसेवा करते हैं और वहां पर भी करते रहेंगे. इसलिए आप को बिलकुल भी फर्क नहीं पड़ना चाहिए. हां, यह जरूर है कि वहां पर सभाएं जरूर नहीं हुआ करेंगी. लेकिन सुना है कि पांचसितारा अस्पतालों के ड्राइवरों को अस्पताल की प्रबंध समिति की तरफ से बेहतर ड्रैस और कैंटीन में खाना मुफ्त में मिलता है. ड्राइवरों को रोगी के तीमारदार की तरफ से कभीकभी टिप भी मिल जाती है.

‘‘ऐंबुलैंस में रखे हुए औक्सीजन के सिलैंडर आप के भी काम आ सकते हैं. अस्पताल के स्टोरकीपर से यदि सैटिंग हो जाए तो इन्हें बाजार में बेच कर मुनाफा कमा सकते हैं. कुल मिला कर, लाभ ही लाभ है, सोसायटी की प्रबंध समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे कर किसी भी लालबत्ती वाली सायरनयुक्त एंबुलैंस का ड्राइवर बनने में.’’

शर्माजी बोले, ‘‘सक्सेनाजी, आप तो कमाल की सोच रखते हैं. पहले क्यों नहीं बताया. मैं तो खामखां परेशान हो रहा था अपनी निजी गाड़ी की लालबत्ती हटाए जाने पर. आज ही रैजिडैंट वैलफेयर सोसायटी की प्रबंध समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे कर किसी अस्पताल में ऐंबुलैंस का ड्राइवर बनने का जुगाड़ लगाता हूं ताकि मेरा लालबत्ती वाली गाड़ी का सामाजिक रुतबा फिर से मुझे वापस मिल सके.’’

शर्माजी की बात सुन कर मुझे समझ आ गया कि आजकल रोब जमाने के लिए प्रतिष्ठित पद नहीं बल्कि लालबत्ती वाली गाड़ी जरूर होनी चाहिए क्योंकि इस देश के अधिकांश लोग स्टेटस और स्टैंडर्ड के फर्क को जानते ही नहीं, और न ही जालसाजी के कामों से बाज आना चाहते हैं.

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