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प्रिसाइडिंग औफिसर की डायरी: भाग-3

चुनाव सामग्री के गट्ठर खुले. उन्हें मिलान कर व्यवस्थित किया जाने लगा. सारे दस्तावेज असम की राजभाषा बंगला में थे. असम की 2 राजभाषाएं हैं, असमी और बंगला. मेरे सहयोगी उन्हें पढ़पढ़ कर बताते और मैं समझ कर या बिना समझे ही उन पर हस्ताक्षर करता जाता था. मुझे मालूम था कि चुनाव में अंतिम सत्य सिर्फ मतपेटी या बैलेटबौक्स हैं. उन को यदि सुरक्षित कर लिया जाए तो चुनाव की नैया पार है. चुनाव अधिकारी खतरे से बाहर है.

‘‘एक बार प्रिसाइडिंग औफिसर की डायरी भी तो समझ लीजिए,’’ मेरे सहयोगी ने कहा. वे जैसे मेरी मंशा भांप कर बोले थे, ‘‘वह भी महत्त्वपूर्ण है. सामान जमा करते वक्त वही पहले मांगते हैं.’’

मेरे सहयोगी शीघ्रतापूर्वक मुझे आवश्यक जानकारी देते हुए जरूरी कागजात भरने की खानापूरी कर रहे थे. देखतेदेखते 5 बज गए. शाम का धुंधलका बढ़ने लगा था और इसी के साथ सिहरन भी. ठंडी हवा बहने लगी थी. अंधेरा घिरते ही सरकारी मोमबत्ती जला दी गई थी, जिस की टिमटिमाती रोशनी में हम सभी कुछकुछ सहमे से बैठे थे कि कल क्या होगा.

‘कल सब ठीक होगा’ जैसा यह जवाब देते एक रियांग युवक इमरजैंसी लालटेन रख गया था, जिस के प्रकाश में मुझे कुछ और काम निबटाने का मौका मिल गया था. बाहर अलाव जलाया गया जिस के इर्दगिर्द सुरक्षा के जवानों के साथ कुछ स्थानीय लोग बैठे थे. आधेक घंटे के बाद अब वहां सिर्फ सुरक्षाकर्मी थे. लगभग 9 बजे भोजन आया. भोजन में वही था, स्थानीय चावल का भात, मछली और सब्जी. मगर इस बार की सब्जी स्वादिष्ठ बनी थी. भोजन परोसने और कराने में स्वाभाविक आत्मीयता का बोध था.

भोजन कर हम सभी सोने की तैयारी करने लगे. बाहर घुप अंधेरा पसरा था. कहीं कोई प्रकाश की किरण कौंधती, तो वह भी यहां साफ दिख जाती थी. आसमान सितारों से सजा हुआ, स्वच्छ और साफ. विद्यालय की बांस की बनी खपच्चियों वाली दीवारों से छनछन कर शीतल हवा अंदर आती थी. बाहर अलाव के इर्दगिर्द सुरक्षाकर्मी पहरा देते बैठे थे. तभी एक रियांग युवक आया और हमें ओढ़ने के लिए एकएक कंबल दे गया. हमारा एक सहयोगी फुसफुसा कर मुझ से बोला, ‘‘बत्ती बुझा कर आप भी सो जाइए, सर. उग्रपंथियों का इलाका है. दूरदूर तक प्रकाश जाता है.’’

मैं ने बत्ती बुझा कर मोमबत्ती जला दी और 4 बजे का अलार्म अपने मोबाइल में लगा कर लेट गया.

सुबह उठ कर मैं वहां से दूसरे प्राथमिक विद्यालय में जा कर चुनाव की व्यवस्था करने की तैयारी करने लगा. सामान पैक कर लगभग 6 बजे हम उस विद्यालय में पहुंचे, जहां हमें चुनाव कराना था. वहां विद्यालय का जो हाल देखा, तो मुझे रोना आ गया. बांस के लट्ठों को जोड़ कर बच्चों के लिए बैंच और डैस्क बने थे. टेबलकुरसी का पता नहीं. जमीन भी कच्ची, जैसे आज ही उस का प्लास्टर होना है. पूर्वोत्तर के घरों की दीवारें, दरवाजे और खिड़कियां बांस की चटाइयों से बनी होती हैं, सो यहां भी था. मगर ये तो ऐसी थीं कि कब भरभरा कर गिर पड़ें, कहा नहीं जा सकता. आधी छत फूस की थी और आधे पर करकट की चादरें थीं.

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‘‘इस से अच्छा तो पहले वाला विद्यालय था,’’ मैं बोला, ‘‘कम से कम वहां ढंग के कुरसीटेबल और बैंचडैस्क तो थे. यहां हम किसी तरह सामान जमा कर बैठ भी गए तो लिखेंगे कैसे?’’

स्थानीय लोगों में फुसफुसाहट हुई और देखतेदेखते कुछ कुरसीटेबल और बैंचडैस्क हाजिर हो गए.

मैं ने तत्काल एक तरफ अपने चारों सहयोगियों को व दूसरी तरफ उम्मीदवारों के एजेंटों को बिठाया. अब सभी अपनेअपने काम में लग गए थे. बाहर स्थानीय महिलापुरुषों की भीड़ लगनी शुरू हो चुकी थी. मुझे अंदाजा नहीं था कि इतनी भारी संख्या में महिलाएं भी आएंगी. मैं ने आग्रह किया कि बांस की ऐसी घेराबंदी हो कि महिला और पुरुष अलगअलग पंक्तिबद्ध हो जाएं, तो ठीक रहेगा. आननफानन बांस काट कर उन्हें बांस के पत्तों से बांध कर पार्टीशन तैयार कर दिया गया. हमारे देखतेदेखते महिला और पुरुष कतारबद्ध खड़े हो गए.

अब मैं बैलेटबौक्स की ओर मुड़ा, मेरे सहयोगी अनुभवी थे, सो एजेंटों की देखरेख में वह भी तैयार हो कर व्यवस्थित हो गए. इन व्यस्तताओं के बीच कब 7 बज गए, पता ही नहीं चला. हमारे एक सहयोगी ने बंगला में कहा, ‘‘आप चिंतित थे न. देखिए पहला वोट ठीक 7 बजे पड़ेगा.’’

पहले एजेंटों ने वोट डाला. फिर कतार सरकने लगी. बाहर मेले सा माहौल था. मैं अंदरबाहर दोनों तरफ के कार्यों को ‘प्रिसाइडिंग डायरी’ के निर्देशानुसार निरीक्षण कर रहा था. बाहर एक तरफ महिलाएं अपने बच्चों को साथ लिए कतार में खड़ी थीं. दूसरी तरफ पुरुष दुनियाजहान की बातें करते खड़े थे, जिस में आज का चुनाव प्रमुख था. एक उत्सुकता और जिज्ञासा थी कि आगे क्या होगा. उधर, असम बटालियन के जवान इस क्षेत्र की पूरी तरह घेराबंदी किए घूम रहे थे.

महात्मा गांधी का यह स्वप्न कि भारत का हर नागरिक देश से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े, इसलिए उन्होंने पंचायतराज की परिकल्पना की थी. उसी का फल है यह पंचायत चुनाव. स्थानीय लोगों के गजब के उत्साह को देखते हुए यह कहना कठिन नहीं था कि लोग भले ही अशिक्षित हों, बेवकूफ नहीं हैं. उन लोगों में से अधिकांश को देख ऐसा लग रहा था मानो वे पहली बार मतदान कर रहे हों. उन्हें ठीक से मुहर पकड़ कर मतपत्र पर मुहर लगाना भी नहीं आता था. जबकि इस का प्रशिक्षण

देने का काम चुनावप्रचारकों का होता है.

मगर उस वक्त यह काम हमारेअसम बटालियन के सहयोगी सैनिक सहृदयतापूर्वक कर रहे थे. वे उन्हें बताते कि कैसे मुहर पकड़ना है और कैसे मनवांछित निशान पर मुहर लगानी है. बाहर लकड़ी के चूल्हों पर चढ़ी देगची में पानी उबल रहा था. चायपत्ती, चीनी डाल कर लाल चाय तैयार कर उन्हें बिना छाने ही बांस के चोंगों में भर कर मतदाताओं को सर्व की जा रही थी. हमें भी बांस के चोंगों में चाय मिली. यह दौर कई बार चला. उधर, विद्यालय के विशाल खेल मैदान में युवा फुटबाल का खेल खेल रहे थे. इस से अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि सबकुछ ठीकठाक चलेगा. लोग भी यहांवहां झुंड में बैठे बातचीत में मशगूल थे. पहाड़ों से उतर कर लोग मतदान केंद्रों की तरफ चले आ रहे थे.

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प्रिसाइडिंग औफिसर की डायरी: भाग-2

‘‘हां, पोर्टर तो मिलेंगे मगर प्रति पोर्टर 200 रुपए देने होंगे.’’

मरता क्या न करता. मैं इस के लिए तैयार था, तभी एक जवान ने सूचित किया कि हमारे सैक्टर औफिस ने 3 पोर्टरों को हमारी मदद के लिए भेजा है.’’

हमारी जान में जान आई. पोर्टर सरकारी चुनाव सामग्री के साथ हमारे बैग को भी बहंगियों में बांधने लगे थे. अब हम कूच के लिए तैयार थे. सबइंस्पैक्टर के इशारे पर हम गांव की पगडंडियों पर बड़ेबड़े डग भरते उस के पीछे चल दिए. पोर्टरों को न जाने पंख लगे थे कि पहिए. वे लगातार आगे बढ़ते जाते थे और हम पीछे छूट जाते थे. इन सब को नियंत्रित और संयमित करने का काम सबइंस्पैक्टर कर रहा था. ग्रामीण हमें अजीब निगाहों से देख रहे थे.

गांव का रास्ता पीछे छूटा. अब छोटेबड़े टीले आने आरंभ हो गए थे. सामने मिजोरम के भूरेकाले पहाड़ों की शृंखलाएं दिख रही थीं, जिन पर धूप पसरी हुई थी. अब हम पहाड़ों की चढ़ाई वाली पगडंडियों पर चल रहे थे.

मिजोरम की मनोरम पहाडि़यों से निकल कर दक्षिण असम की ओर बहने वाली काटाखाल नदी का विशालकाय पाट हमारे सामने था. उस पर बांस का बना पुल था, जिसे पार कर हमें आगे बढ़ना था. काफी संभल कर उस पुल पर पांव धरते हम आगे बढ़े. प्राणों का मोह मनुष्य को संभल कर चलना सिखा देता है. सो, हम संभल कर चल रहे थे.

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असम बटालियन का एक जवान मेरे साथ मेरे बराबर ही चल रहा था. मैं जिस स्थान से आया था, वहां वह कुछ समय तक रह चुका था और वह अच्छी हिंदी भी बोल रहा था. कभीकभार अपने मोबाइल पर हिंदी फिल्मों के गीत भी बजा रहा था. पहाड़ी रास्तों पर हमारे फोन के सिग्नल कभी उभरते, कभी गायब हो जाते.

इन पहाड़ों पर बंगलादेश, त्रिपुरा और मिजोरम से विस्थापित रियांग जनजाति के लोगों को बसाया गया है, यह मैं ने सुना था.

रास्ते में एक बड़ा सा पहाड़ी नाला मिला. नाम है, ‘बैगन नाला’. एक विशालकाय वृक्ष को काट कर, उस नाले पर गिरा कर पुल बना दिया गया है. इस के किनारे कुछ स्थानीय लोग स्नान कर रहे थे.

‘‘ये लोग यहां स्नान वगैरह कर अपने कपड़े भी धो लेते हैं,’’ सबइंस्पैक्टर बोला, ‘‘ऊपर पहाड़ पर पानी की घोर समस्या है. हम लोग भी यहां थोड़ी देर रुक कर पानी पी लेते हैं.’’

फ्रिज के पानी के समान शीतल और साफ पानी था. हम ने पानी पिया और बोतलों में भी भर लिया. इस के बाद आगे बढ़ चले. जंगलपहाड़ के बीच इक्केदुक्के बांस के घर मिलते. उन के साथ होते गाय, सूअर और मुरगियों के दड़बे. एक घर के सामने के बेर के पेड़ पर एक जवान ने डंडा फेंका तो भरभरा कर पके बेर गिरने लगे. बेरों को चुन कर उस ने अपनी जेबों में भर लिया था.

इन जवानों के कंधे पर मशीनगनें और एसएलआर टंगे थे. छाती पर बुलेटप्रूफ था और कमर में थीं बुलेट से लैस बैरेल. इन्हीं के बीच एक रियांग गृहस्वामिनी से मांगे गए थोड़े नमक के साथ बेर खाते जवान साथ चल रहे थे. धूप तेज हो चुकी थी. हम खाली हाथ थे, फिर भी पसीने से लथपथ थे और रास्ता था कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था. हम घिसटते हुए आगे बढ़ते जाते थे.

लगभग 4 घंटे की यात्रा कर हम उस रियांग बस्ती में प्रविष्ट हुए जहां हमें पहुंचना था. वहां पहुंच कर एवरेस्ट चोटी फतह करने जैसा एहसास हुआ. मगर अभी तो बस शुरुआत थी. पड़ाव डालने वाले प्राथमिक विद्यालय तक पहुंचने के लिए हमें एक और पहाड़ की चोटी पर चढ़ना था. वहां पहुंच कर हम ने वहां पड़ी बैंच और डैस्कों को जोड़ कर चौकी तैयार की और उस पर चादर बिछा कर लुढ़क पड़े. थोड़ी देर बाद तामचीनी के प्यालों में भर कर चाय और बिस्कुट ले कर एक रियांग लड़की आ गई. एकदम साधारण सी वेशभूषा, मगर पर्वतीय लावण्य उस में से फूट पड़ता था.

ऐसे कठिन समय में जब जो भी मिलता है, वह अमृत समान लगता है. चाय पी कर हमें ताजगी का एहसास हुआ.

पैर मनमन भर के हो रहे थे. मैं यों ही लेट गया. तब तक कुछ रियांग लोग इकट्ठा हो गए थे. सबइंस्पैक्टर उन से बंगला में बात कर रहा था. उन लोगों की बातचीत से आभास हुआ कि उधर कितनी घोर अशिक्षा है. वे अपनी रियांग भाषा को छोड़ बंगला, हिंदी, अंगरेजी कुछ नहीं जानते. बस, कुछ लोग हैं, जो मिजोरम की राजधानी आइजोल या हैलाकांदी या शिल्चर गए होंगे और इसलिए वे बंगला, हिंदी या अंगरेजी जानते हैं. वैसे रियांग युवकों का हिंदी उच्चारण एकदम साफ और स्पष्ट था और वे धाराप्रवाह हिंदी बोल भी लेते थे. सबइंस्पैक्टर के निर्देशानुसार उन्होंने शीघ्रतापूर्वक विद्यालय के पीछे एक अस्थायी शौचालय और बाथरूम बना दिए थे. प्लास्टिक के एक ड्रम में पानी भरा गया था और अब हमारे सहयोगी हाथमुंह धो रहे थे.

‘‘यहां पानी की बहुत दिक्कत है,’’ एक रियांग युवक बता रहा था, ‘‘कृपया हिसाब से ही पानी का उपयोग करें.’’

मन मार कर सभी को थोड़े पानी से ही हाथमुंह धो कर संतोष करना पड़ा.

लगभग 2 बजे भोजन हाजिर था. स्थानीय चावल का भात, मसूर की दाल, नीचे घाटी में बनी पोखर की मछली और आलू की सब्जी थी. चूंकि स्थानीय लोग तेलमसाले का उपयोग नहीं के बराबर करते हैं, खाना फीका था. मगर भूख का स्वाद से कोई संबंध नहीं होता. सो, सहजतापूर्वक हम भोजन कर रहे थे, क्योंकि भोजन के साथ नमक और मिर्च भी तो थे. मेरे साथी आपस में बात कर रहे थे, ‘‘अभी पूरे 24 घंटे बाकी हैं.’’

गांव में बिजली पहुंचने का सवाल नहीं है. फिर मोबाइल चार्ज कैसे होते हैं. एकाध घर में सोलर एनर्जी का सैट लगा है. उसी से चीन निर्मित टौर्च, मोबाइल आदि चार्ज होते हैं. नहीं तो फिर रामनाथपुर में चार्ज किए जाते हैं. मगर वहीं कौन सी बिजली हरदम उपलब्ध रहती है. असम बटालियन कैंप में भी सोलर एनर्जी सैट है. मगर पचासेक लोगों के मोबाइल, टौर्च आदि कितनी मुश्किल से चार्ज होते होंगे.

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‘‘काम बहुत है,’’ मेरे सहयोगी बता रहे थे, ‘‘कुछ अभी काम कर लें, तो आसानी रहेगी. आप को सारे बैलेटपेपर पर साइन भी करने हैं. काफी कठिन काम है.’’

‘‘हो जाएगा,’’ मैं बेतकल्लुफ हो कर बोला, ‘‘अभी बहुत समय है.’’

‘‘यहां बिजली नहीं है. रात में अंधेरे में कैसे काम कर पाएंगे.’’

‘‘ठीक है.’’

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प्रिसाइडिंग औफिसर की डायरी: भाग-1

इतवार को जब असम के जिला हैलाकांदी प्रशासन से फोन आया कि उसी दिन मुझे जिला मुख्यालय के प्रशासनिक भवन में पहुंचना है तो उसी वक्त मुझे आभास हो गया था कि किसी दुर्गम स्थल पर चुनाव करने के लिए मेरा चुनाव किया गया है. मंगलवार के चुनाव के लिए मुझे एक दिन पहले यानी सोमवार को सुबह जाना था. मगर यहां तो मुझे 2 दिन पहले ही बुलाया जा रहा था. लिहाजा, आवश्यक सामान ले कर हैलाकांदी पहुंचा.जिला मुख्यालय कार्यालय में मुझ जैसे कई और भी लोग थे, जिन्हें दुर्गम स्थान में चुनावकार्य के लिए पहले पहुंचना था. उन्हें आवश्यक सामग्री और सूचनाएं उपलब्ध कराई जा रही थीं. मेरी टीम में कुल 4 जन थे, जिन में से 2 आ चुके थे और 2 का आना बाकी था. वे कब आएंगे, पता नहीं था. खैर, उन में से एक 4 बजे शाम को प्रकट हुआ, दूसरा 7 बजे रात में आया, जबकि सभी को दोपहर से ही उपस्थित रहने की सूचना लगातार दी जा रही थी. चूंकि वे स्थानीय थे, उन्हें शायद चुनाव का रंगढंग पता था, शायद इसलिए उन्हें हड़बड़ी न थी.

दक्षिण असम में स्थित हैलाकांदी शहर में होटलों के पौबारह थे. उन होटलों में बना कुछ भी खाद्य सामान देखतेदेखते खत्म हो जाता था. आखिर चुनाव का मौसम जो था. खैर, एक होटल में कुछ खा कर डिनर का सुख लिया. सामने एक बस तैयार खड़ी थी, जिस में हम सभी को चुनाव सामग्री के साथ सवार होना

था. 9 बजे बस चली. हैलाकांदी के बाद लाला, फिर कतलीचेरा और फिर रामनाथपुर कसबा. चारों तरफ घुप अंधेरा. उस अंधेरे को चीरती हमारी बस सड़क पर भागती जा रही थी.

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हम सभी अपने और सरकारी सामान के साथ चुप बैठे थे. मानो हमें कहीं जिबह के लिए ले जाया जा रहा हो. 2 घंटे की यात्रा के बाद 11 बजे रात में हम रामनाथपुर पहुंचे. वहां सड़क पर कुछ गाडि़यां खड़ी थीं. हर भारतीय कसबे के समान यहां भी बत्ती गुल थी. घने अंधेरे के बीच सब के चेहरे पर यही सवाल, अब क्या होगा, और कि अब हम क्या करें? हमें कहां, कैसे और क्यों जाना है? यह बताने वाला कोई न था.

आपस में पूछताछ करने पर पता चला कि यहां के स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में हमारे ठहरने की व्यवस्था है और हमें गाइड करने के लिए एक सबइंस्पैक्टर है. हम उस की गाड़ी के पास गए. लेकिन वह अपनी टाटा सूमो में बैठेबैठे अपना बखान करता रहा कि वह कितनी बड़ी तोप है, और कि पूरा रामनाथपुर उस के घुटनों के नीचे है. हमें इस में कोई दिलचस्पी नहीं थी. हम वहां की टूटीफूटी, धूलभरी सड़क पर आधे घंटे खड़े रहे, तभी एक मरियल सा आदमी टौर्च जलाए प्रकट हुआ और हमें अपने पीछे आने का संकेत दे कर तेज गति

से एक पगडंडी की ओर बढ़ चला. ‘महाजनो येत: गत: सा पन्था:’ के अनुसार हम सभी उस का अनुसरण करने लगे. हम लोग 3 दिशाओं की ओर जाने वाले 3 पार्टी के सदस्य थे, सो हिम्मत थी कि हम फिलहाल एक समूह में हैं.

लगभग 100 मीटर की दूरी तय करने के बाद एक मकान की ओर इंगित कर मार्गदर्शक अंधेरे में गुम हो गया.

हिंदुस्तान के लगभग सभी सरकारी प्राथमिक विद्यालयों और पैसेंजर ट्रेनों में कोई खास फर्क नहीं होता. भवन ठीकठाक था, मतलब पक्का था. टौर्च की रोशनी के बीच मोमबत्ती जलाई गई. अनुभवी लोगों ने अपने अनुभव के अनुसार तुरंत बैंच व डैस्क जोड़ कर चौकी तैयार कर अपना बिछावन डाल लिया.

इस लूट में जो महरूम रह गए उन्होंने जमीन में ही अपने बिछावन बिछा लिए. बिस्तर क्या था, एक चादर बिछाई, बैग सिरहाने लगाया और साथ लाया कंबल ओढ़ लिया कि 4-5 घंटे की ही तो बात है. वैसे भी थकान और नींद बिस्तर का हाल नहीं पूछती. शायद प्रशासन को इस की अच्छी जानकारी है. मैं ने भी जमीन पर अपना बिस्तर जमाया. आखिर भारतवर्ष में साधुसंन्यासी और बाबा लोग तो जमीन पर ही धूनी रमाते हैं, फिर हम क्यों नहीं.

लगभग 6 बजे नींद खुली तो सुबह की उजास फैल चुकी थी. कुछ लोग उठ कर अपनेअपने ढंग से नित्यक्रिया से निवृत्त हो रहे थे. विद्यालय से थोड़ी दूर एक विधवा की झोंपड़ी थी, जिस में वह अपने 4 छोटेछोेटे बच्चों के साथ रह रही थी. वहीं एक कुआंनुमा गड्ढा था, जिस में से कुछ स्थानीय लोग पानी भर रहे थे. वहीं से हमारे लिए भी बालटियों में भर कर पानी आया था. डेढ़ दर्जन लोग अपनी नित्यक्रियाएं इसी से निबटाते रहे. मरता क्या न करता, सो सभी निबट भी रहे थे. कुछ साथी पानी में भिगो कर चूड़ा खाने में लगे थे. उस महिला से चाय के लिए अनुरोध किया गया तो वह तुरंत चूल्हा जलाने में जुट गई. अपने टूटेफूटे बरतनों में जहां तक संभव हुआ, उस ने चाय और सस्ते बिस्कुटों का एक पैकेट परोस दिया. हम ने जैसेतैसे उसे ग्रहण किया और उसे पैसे दिए. मैं ने साथ लाए बिस्कुट और नमकीन के कुछ पैकेट उस के बच्चों के बीच बांट दिए.

मेरे एक साथी को गैस और सिरदर्द की दवा लेनी थी, तो मैं भी उस के साथ हो लिया कि शायद उधर दुकान में कुछ खाने को मिल जाए. वहीं एक दुकान में पूरीसब्जी खा ली. सुबह से ही एक आदमी हमारे पीछे लगा था और बेसिरपैर की बकबक किए जा रहा था. चुनाव के वक्त यह कोई अनहोनी बात नहीं कि जरूरतमंद को मूड बनाने का अवसर न मिले और इस समय तो वह संसार का सब से समर्थ व्यक्ति बना बैठा हमें समझा रहा था कि हमें चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह हमारे साथ है और वह सबकुछ ठीक कर देगा. हम लोगों के साथ उस ने भी जम कर नाश्ता किया. जब दुकानदार ने 70 रुपए का मौखिक बिल पेश किया, तो मेरे मुंह से सहसा निकला कि मैं किसी ऐरेगैरे के बिल के पैसे क्यों दूं.

तभी एक व्यक्ति सूचना ले कर पहुंचा कि पुलिस मुझे शीघ्र आगे चलने के लिए बुला रही है. ऐसे में बहस करना उचित न समझ जब तक मैं अपना बटुआ निकालता, किसी व्यक्ति ने पैसों का भुगतान कर दिया था. मुझे यह काफी नागवार लगा कि कोई अपरिचित मेरे बिलों का भुगतान करे. पता नहीं वह कौन हो, कोई सरकारी आदमी या किसी राजनीतिक दल का सदस्य भी हो सकता है, जो बाद में मुझ से फायदा लेना चाहे.

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चुनाव के नाम पर करोड़ों के वारेन्यारे होते हैं, यह मैं ने सुनापढ़ा था और अब मैं भी उस में भागीदार हो रहा था. खैर, जल्दी से मैं वापस आश्रयस्थल पर आया. वहां असम बटालियन के दर्जनभर जवान हमारे साथ चलने को तैयार बैठे थे. उन का सबइंस्पैक्टर अभिवादन करने के बाद बोला, ‘‘यहां से ज्यादा दूर नहीं है. बस, 15-20 किलोमीटर पैदल का रास्ता है. तकलीफ की कोई बात नहीं है. हम आप के साथ हैं.’’

यह सुनते ही हमारे हाथपांव फूल गए. जंगलपहाड़ में सामान के साथ

15-20 किलोमीटर पैदल चलना मामूली बात है क्या? मैं अतिरिक्त विनम्रता दिखाते हुए बोला, ‘‘अब चलना तो है ही लेकिन यदि कोई भारवाहक मिल जाता तो ठीक रहता.’’

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जिनके टूटे दिल के तार, कैसे जोड़ेगा उन्हें भाग्य?

कुछ लोग प्यार के नाम पर जिंदगी गुजार देते हैं, कुछ के लिए प्यार सिर्फ एक खेल होता है, जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें ना कभी प्यार मिलता है और ना ही उन्हें प्यार की तलाश होती है. जब ऐसी तीन जिंदगियों की डोर एक-दूसरे से जुड़ी हो और भाग्य उन्हें एक मोड़ पर ले आए तो उठने वाले तूफान को कोई नहीं रोक सकता. ऐसी ही जिंदगियों से जुड़ी कहानी लेकर आया है कलर्स, अपने नए शो ‘पवित्र भाग्य’ में.

तीन जिंदगियों को जोड़ती एक कहानी

एक तरफ है प्रनति, जो मुंबई में रहने वाले एक मिडिल क्लास परिवार की लड़की है, जिसे 8 साल पहले रेयांश नाम के एक लड़के से प्यार हो जाता है और वो उसके साथ जिंदगी जीना चाहती है. दूसरी तरफ है रेयांश, जिसके लिए प्यार का रिश्ता सिर्फ एक बोझ है और वो ऐसी जिम्मेदारी से भागता है. यही कारण था कि जब रेयांश को पता चला कि प्रनति की कोख में उसका प्यार पल रहा है तो वो उसे अकेला छोड़कर चला गया.  ऐसी मुश्किल घड़ी में किस्मत ने भी प्रनति का साथ नहीं दिया और वो अपना बच्चा खो बैठी.

 

 

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नई जिंदगी की शुरूआत कर रही है प्रनति

आज जब सालों बाद प्रनति अपने दोस्त के साथ नए जीवन की शुरूआत करने का फैसला ले रही है, उसी समय भाग्य का एक नया खेल शुरू होने जा रहा है. जिस बच्ची को उसने खो दिया था, वो अब तक अनाथालय में पल बढ़ रही थी, जिसका नाम है जुगनू. मां-बाप के प्यार से महरूम जुगनू, स्वाभाव से एक तेज-तर्रार बच्ची है, जो बड़े-बड़े लोगों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दे. वो किसी बंधन में नहीं, बल्कि खुलकर जीना चाहती है.

क्या होगा जब इन तीनों को भाग्य एक मोड़ पर ले आएगा? क्या अपनी बेटी की सच्चाई जानकर प्रनति, अपने अतीत से फिर नज़र मिलाएगी? क्या रेयांश को कभी अपनी गलती का एहसास होगा? क्या जुगनू परिवार के मायने समझ पाएगी? जुदा दिलों को, कैसे जोड़ेगा उनका भाग्य? जानने के लिए देखिए, पवित्र भाग्य, सोमवार से शुक्रवार, रात 10 बजे सिर्फ कलर्स पर.

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यारो, शूल चुभाओ कोई बेवकूफ आया है

लेखक- रामविलास जांगिड़

कर्ज ले कर महंगी शादी करना बहुत भारी समझदारी है. चमकदार बड़ेबड़े टैंट और एक दिन के लिए बरात में ढेरों गाडि़यां लहराना गजब का साहस है. डीजे, ढोल, बैंड, ताशा आदि बजाने से ही आती है असली बरबादी… नहींनहीं, शादी का मजा. शादी वाले एक दिन शेरवानी, ताज और बैंडबाजे के साथ घोड़ी पर बैठ कर नकली राजा बनने के लिए बाद के कई बरसों तक खच्चर बन कर काम करते रहना कोई बुरा सौदा नहीं है, श्रीमान.

दिखावटी दुनिया के सामने एक से बढ़ कर एक दिखावे करना बहुत जरूरी है. घोड़ी पर बैठे एक गधे के लिए बहारों को फूल बरसाने के धंधे में लगाना जरूरी होता है. ओखली में सिर देने के लिए ही शादी के लिए हां कर के बैंड बजाए जाते हैं, ताकि शादीबाज जीव अंतिम बार हंस सके. शादी का सीजन चल रहा है. कई खच्चर गधों में बदल रहे हैं. ‘बहारो फूल बरसाओ’ वाला राष्ट्रीय शादी सौंग धमाल मचा रहा है.

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बरात की 2 लड़कियां आपस में बातें कर रही थीं. सोना- आओ डियर सामने वाले मार्केट चलें. मोना- चलो डियर. बट शुक्र मनाओ कि मैं इस बार फेल जरूर हो जाऊं. सोना- डियर, तू फेल क्यों होना चाहती है? मोना – पापा ने कहा कि पास हो गई तो स्कूटी दिलाऊंगा और फेल हो गई तो शादी कर दूंगा. तुझे तो पता है न, कि मुझे स्कूटी के बजाय पूरी बस ही चाहिए, वह भी भरपूर दहेज व उसे ढोने वाले जंतु के साथ.

सच है. शादी के सीजन की इस मंडी में कई जंतु बिकाऊ हैं. आज मेरे यार की शादी है के बदले पूरे संसार को शादी के झमेले में डालना बहुत जोरदार है. दोस्त लोग दुश्मनी निभाने के लिए अपनेअपने दोस्तों की शादी करवाने के जतन करते हैं. दोस्त लोग बेगानी शादी में अब्दुल्ला बन दीवाने होते हैं क्योंकि वे दूसरों के दुखों से बहुत खुश होते हैं, इसलिए ही वे नागिन डांस पर नाग बन कर झूमते हैं.

इस दिखावेभरी दुनिया में स्वार्थ की तीखी हवाओं के बीच विवाह एक ऐसा गठबंधन है जिस में 2 जंतु मिल कर उन समस्याओं को सुलझाने का जीवनभर प्रयास करते हैं, जो समस्या न पहले कभी थी, न बाद में कभी होती है. शादी शास्त्री कहते हैं कि जो हंसा, उस का घर बसा. पर शादी के बाद जिस का भी घर बसा, उस से पूछो कि बाद में वह फिर कब हंसा? शास्त्रों ने यह भी कहा, पत्नी को कुछ समझाने से ज्यादा अच्छा रहेगा किसी भी सीमेंटेड दीवार से सिर फोड़ लें. पत्नी से पंगा लेने से बेहतर होगा किसी बैल से सामना कर लें.

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पतिपत्नी के सामाजिक खेल में गलती ऐसी चीज है जो हमेशा पति की ही होती है और भविष्य में भी होती रहेगी. गलत नाम की चीज पत्नी की कभी भी नहीं हो सकती. जब तूफानी बारिश हो, आधी रात के वक्त चारों ओर कुत्ते भूंक रहे हों, बिजलियां चमक रही हों, लाइटें लप?ापायमान हों और कोई आदमी किसी दुकान से पिज्जा लेने जा रहा हो तो उसे शादीशुदा ही मानना चाहिए. शादी के लिए हां करने का मतलब होता है स्वेच्छा से जेल जाने की तैयारी करना. चलूं, बाहर शादी का बैंड बज रहा है. देख लूं, आज फिर किस की शामत आई है.

यारो, यह शूल चुभाओ, फिर कोई बेवकूफ आया है.

Coronavirus: कोरोना वायरस को लेकर सलमान खान ने फैंस को दिया ये मैसेज

चाइना से शुरू हुआ कोरोनावायरस (Coronavirus) अब तक कई जानें ले चुका है और अब ये बीमारी इंडिया तक पहुंच गई है. लोगों में इसे लेकर काफी दहशत है. हालांकि, सरकार अपनी तरफ से लोगों का डर कम करने की कोशिश कर रही हैं. साथ ही इस बीमारी से निबटने का पूरा इंतजाम भी किया गया है. इसी बीच बॉलीवुड के दबंग खान सलमान ने भी अपने फैंस को कोरोना वायरस को लेकर एक स्पेशल मैसेज दिया है.

सलमान खान ने कही ये बात…

सलमान खान ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर जिम में बैठे हुए एक फोटो शेयर की हैं और फैंस से इस वायरस को लेकर रिक्वेस्ट भी की है. सलमान खान (Salman Khan) ने इंस्टाग्राम पर लिखा है “नमस्कार… हमारी सभ्यता में नमस्ते और सलाम है! जब कोरोनावायरस खत्म हो जाए तब हाथ मिलाओ और गले लगो…बीइंग स्ट्रोंग इंडिया.”

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फैंस ने की जमकर तारीफ…

सलमान के इस पोस्ट को देखने के बाद सोशल मीडिया पर उनके फैंस जमकर तारीफ करते हुए उन्हें थैंक्यू कह रहे हैं.

फिल्मों की बात करें तो सलमान खान इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म ‘राधे: योर मोस्ट वांटेड भाई’ (Radhe: Your Most Wanted Bhai) की शूटिंग में बिजी हैं. इस फिल्म में सलमान दिशा पटानी के साथ रोमांस करते नजर आएंगे.

प्रभुदेवा (Prabhu Deva) के डायरेक्शन में बन रही इस फिल्म में दोनों स्टार्स के अलावा रणदीप हुड्डा (Randeep Hooda), जैकी श्रॉफ (Jackie Shroff) और गौतम गुलाटी (Gautam Gulati) जैसे कई कलाकार मुख्य भूमिका में दिखाई देंगे. फिल्म इसी साल ईद के खास मौके यानि 22 मई के दिन सिनेमाघरों में दस्तक देगी.

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बता दें कि सलमान खान आखिरी बार फिल्म ‘दबंग 3’ (Dabangg 3) में दिखाई दिए थे. पूरे देश हो रहे एनआरसी और सीएए के प्रोटेस्ट के चलते यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई.

झारखंड में केजरीवाल की राह पर हेमंत सोरेन: बजट में मुफ्त बिजली, मोहल्ला क्लीनिक का प्रावधान

कुछ दिनों पहले ही दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए हैं. इन चुनावों में आप पार्टी ने एक बार फिर सरकार बना ली है. आप को 70 में से 62 सीटें मिली है. इस बार का दिल्ली चुनाव कई मायनों से खास रहा. पहला तो देशभर में सीएए का विरोध चल रहा था. दिल्ली के शाहीन बाग में लोग धरना दे रहे थे. देशभर में शाहीन बाग का मॉडल खूब प्रचलित हुआ और देश के कई शहरों में इसी के तर्ज पर धरने देने लगे.

दूसरा कारण था कि आप पार्टी ने दिल्ली की जनता को 200 यूनिट फ्री बिजली और पानी मुफ्त कर दिया. इतना ही नहीं चुनाव आते-आते महिलाओं के लिए फ्री डीटीसी सर्विस भी दे दी. अब राजनीति में अरविंद को विकल्प की तरह देखा जाने लगा. झारखंड में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला.

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झारखंड के वित्तमंत्री रामेश्वर उरांव ने मंगलवार को विपक्ष के हंगामे के बीच विधनसभा में वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए राज्य का बजट पेश किया. 86 हजार 370 करोड़ रुपये के बजट में 13,054.06 करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय और 73,315.94 करोड़ रुपये का राजस्व व्यय रखा गया है. नए वित्तीय वर्ष में आठ प्रतिशत विकास दर प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है. वित्तमंत्री उरांव ने बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया है. दिल्ली की तर्ज पर 100 यूनिट बिजली खपत करने वालों को बिजली मुफ्त में देने का प्रावधान भी बजट में किया गया है. साथ ही राष्ट्रीय राजधानी की तरह ही राज्य में 100 मोहल्ला क्लीनिक खोलने का प्रस्ताव बटज में दिया गया है.

बजट में 57 लाख परिवारों को अनुदानित दर पर खाद्यान, लुंगी और धोती मुहैया कराने का सरकार ने प्रावधान किया है. इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनवाने वालों को अतिरिक्त 50 हजार रुपये राज्य सरकार मुहैया कराएगी. बजट में 50 साल से ऊपर के सभी लोगों, सभी विधवाओं को राशन उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है.

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बजट को लोक लुभावन बनाने के लिए सरकार ने बजट में एक विशेष छात्रवृत्ति योजना शुरू करने का प्रावधान किया है. इसके लिए अलग से बजट में 30 करोड़ रुपये रखे गए हैं. इसी तरह मध्याह्न् भोजन बनाने वाले रसोइयों के मानदेय में 500 रुपये की वृद्धि की गई है. अब 1500 की जगह उन्हें 2000 रुपये का मानदेय मिलेगा.

बजट में किसानों के कर्ज माफ करने की भी घोषणा की गई है. बजट भाषण में वित्तमंत्री ने कहा है कि किसानों के कर्ज माफ होंगे. पहले चरण में 50 हजार रुपये तक के कृषि ऋण माफ किए जाएंगे. जिला स्कूलों को उच्चस्तरीय विद्यालय के रूप में विकसित करने का भी प्रावधान बजट में किया गया है. इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए विशेष योजना चलाने की योजना बनाई गई है.

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“कामयाब” फिल्म रिव्यू – चरित्र कलाकार का दर्द बयां करती फिल्म

रेटिंग : ढाई स्टार

निर्माता : मनीष मुंद्रा, गौरव वर्मा और गौरी खान

निर्देशक : हार्दिक मेहता

कलाकार : संजय मिश्रा, दीपक डोबरियाल, सारिका सिंह, ईशा तलवार, अवतार गिल, बीरबल, लिलिपुट, मनमौजी व अन्य

अवधि : दो घंटे

सिनेमा में आाए बदलाव के बावजूद बौलीवुड में आज भी हीरो, हीरोइन और विलेन की कल्पना ही मायने रखती है. बौलीवुड में हर सुविधा इन्हे ही मिलती है, जबकि बौलीवुड में चरित्र कलाकार उसी तरह से उपयोगी और आवश्यक हैं, जिस तरह से हर सब्जी में आलू उपयोगी होता है. बौलीवुड फिल्मों की कहानियां चरित्र या सह चरित्र कलाकारों के बिना आगे नही बढ़ सकती. मगर सैकड़ों फिल्में करने के बाद भी चरित्र कलाकारों को मान सम्मान नहीं मिलता. फिल्मकार हार्दिक मेहता ऐसे ही कलाकार की कहानी और उनकी त्रासदी को पेश करने वाली फिल्म ‘‘कामयाब’’ लेकर आए हैं.

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कहानीः

अस्सी और नब्बे के दशक में चरित्र कलाकार सुधीर उर्फ शेरा (संजय मिश्रा) का अपना एक दौर था. अस्सी व नब्बे के दशक में सुधीर तकरीबन हर दूसरी फिल्म में जरुरी माने जाते थे. लेकिन आज वह फिल्मों की चमक-दमक ही नहीं अपनी बेटी, दामाद और नाती से दूर अपने दोस्त और दो पैग के साथ अकेला रहते हैं. अपने जमाने में सुधीर की एक फिल्म का संवाद “बस इंजौइंग लाइफ, और कोई औप्शन थोड़ी है?” इतना लोकप्रिय हुआ था कि अब उस पर सोशल मीडिया पर संदेश बन गए हैं. यानी कि सुधीर अभी भी लोगों के दिलो दिमाग में है. मगर कलाकार के तौर लोग उनका नाम नहीं जानते.

एक दिन एक टीवी पत्रकार द्वारा सह चरित्र कलाकार रहे सुधीर का इंटरव्यू लेने से. यह पत्रकार सुधीर याद दिलाती है कि वह अब तक 499 फिल्में कर चुके हैं. उसके बाद सुधीर को धुन चढ़ जाती है कि अगर एक फिल्म में और काम कर कर ले तो 500 का आंकड़ा पार कर रेकौर्ड बना सकता है. इसके बाद सुधीर अपने पुराने शागिर्द और वर्तमान में कास्टिंग डायरेक्टर बन चुके गुलाटी (दीपक डोबरियाल) से मिलते हैं. सुधीर को अवतार गिल जैसे सक्रिय वरिष्ठ अभिनेताओं के साथ औडीशन देने और कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है. गुलाटी उन्हे पॉंचसौंवीं फिल्म में बेहतरीन किरदार दिलाने का वादा करता है और साथ ही वह फिल्म इंडस्ट्री की उन कड़वी सच्चाइयों से भी वाकिफ कराता है. गुलाटी के प्रयास से सुधीर को अपने करियर की पांच सौंवी फिल्म मिल जाती है. मगर नए युग के माहौल के साथ खुद को ढालने में असमर्थ 499 फिल्म कर चुके सुधीर चिंतिंत हो जाते हैं और शूटिंग के दौरान घबरा जाते हैं. युनिट के सदस्यों के क्रोध का सामना करने में मजबूर और असमर्थ सुधीर का पांच सौंवी फिल्म करने का सपना चकनाचूर हो जाता है.

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लेखन व निर्देशनः

फिल्मकार हार्दिक मेहता ने इस फिल्म में उन कलाकारों के अस्तित्व के दर्द को बयां किया है, जिन्हे लोग उनके नाम की बजाय सह चरित्र कलाकार के रूप में ही जानते हैं. हार्दिक मेहता की यह फिल्म वर्तमान समय की फिल्म उद्योग की स्थिति का सटीक चित्रण करती है.और एक कलाकार की अस्वीकृति की दर्दनाक वास्तविकता को सामने लाती है. फिल्मकार की यह खूबी है कि उन्होने दर्द को बयां करने के लिए मेलोड्रामैटिक नहीं एक जज्बाती और यथार्थपरक फिल्म लेकर आए हैं. फिल्मकार ने कलाकार के जीवन का चित्रण करते हुए दिखाया है कि किस तरह कलाकार अपने अभिनय के नशे में परिवार को उपेक्षित कर देते हैं और फिर कैसे उसे तिरस्कार का सामना करना पड़ता है. मगर पटकथा कमजोर है. फिल्मकार व पटकथा की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह समय के साथ सिनेमा में आए बदलाव को चित्रित नहीं कर पाए. मसलन-बजट, डिजिटलाइजेशन, व्यावसायिकता आदि. इंटरवल के बाद निर्देशक के हाथ से फिसल जाती है.

इतना ही नही सिनेमा में आए बदलाव के बावजूद सत्तर, अस्सी व नब्बे के दशक की ही तरह आज भी वरिष्ठ चरित्र कलाकारों की तुलना में फिल्म के सेट पर हीरो को अधिक सम्मान दिया जाता है. आज भी हीरो के लिए पांच सितारा होटल से भोजन आता है, जबकि चरित्र कलाकारों को सेट का खाना खाने के लिए कहा जाता है. हीरो के लिए वैनिटी वैन होती है, मगर चरित्र अभिनेता के लिए नहीं. आज भी हीरो या हीरोईन के लिए एक स्पौट ब्वाय छाता लेकर खड़ा रहता है, जबकि चरित्र अभिनेता को कोई सुविधा नही मिलती. इन सब बातों पर यह फिल्म कुछ नही कहती. फिल्म के कुछ संवाद काफी यथार्थवादी हैं.

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अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, सुधीर के किरदार में संजय मिश्रा ने लाजवाब परफार्म किया है. इस फिल्म से संजय मिश्रा ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह एक अति समर्थ कलाकार हैं. कास्टिंग डायरेक्टर गुलाटी के छोटे किरदार में दीपक डोबरियाल अपनी छाप छोड़ने में सफल रहते हैं. सुधीर की बेटी की भावना के किरदार में सारिका सिंह और संघर्षरत अभिनेत्री के किरदार ईशा तलवार ने सहज अभिनय किया है.

डर से नहीं अक्ल से रूकेगी नकल…

यूपी में 3 मार्च 2020 को हाईस्कूल बोर्ड की परीक्षाएं खत्म हो गई और तीन दिन बाद यानी 6 मार्च 2020 को 12वीं की परीक्षाएं भी खत्म हो जाएंगी. हालांकि अभी तक अंतिम रूप से बोर्ड या शिक्षा विभाग द्वारा यह आंकड़ा जारी नहीं किया गया कि इस साल कुल कितने छात्र नकल करते पकड़े गये हैं. लेकिन हर दिन की आई अलग अलग संख्याओं को जोड़ें तो जो लमसम आंकड़ा बनता है, वह कोई 6,000 से ज्यादा छात्रों का नकल करते किसी न किसी रूप में पकड़े जाने का आंकड़ा बनता है.

यह आंकड़ा यूं तो दूसरे सालों को देखते हुए काफी कम लगता है लेकिन हमें इस आंकड़े में करीब 8,000 उन छात्रों को भी जोड़ देना चाहिए, जो तैयारी न होने या परीक्षाओं में नकल करने पर पकड़े जाने के डर से परीक्षाओं में ही नहीं बैठे.

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एक तरह से देखें तो कहा जा सकता है कि नकल रोकने की सख्ती के चलते इस साल दूसरे सालों के मुकाबले बहुत कम छात्रों ने नकल करने की कोशिश की या ऐसा करते हुए पकड़े गये. लेकिन अगर इसे इस नजरिये से देखें कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ परीक्षाओं के पहले कहा था और परीक्षाओं में बकायदा व्यवस्था की थी कि नकल करने वालों को इस साल सिर्फ शिक्षा विभाग के फ्लाइंग स्क्वायड के जरिये ही नहीं पकड़ा जायेगा बल्कि 18 फरवरी 2020 से शुरु हुईं बोर्ड परीक्षाओं में नकल करने वालों को पकड़ने के लिए खुफियातंत्र की भी मदद ली जायेगी.

इसके बाद भी अगर हजारों की तादाद में छात्र नकल करते पकड़े गये और उससे ज्यादा पकड़े जाने के डर से परीक्षाओं में बैठे ही नहीं तो कहा जा सकता है कि नकल न कर पाने के डर से रातोंरात छात्रों में कोई ईमानदारी नहीं आ गई, हां, इससे उनमें दहशत जरूर पैदा हुई.

उत्तर प्रदेश सरकार इस साल जिलाधिकारियों की देखरेख में पुलिस प्रशासन और जिला विद्यालय निरीक्षकों के जरिये बोर्ड परीक्षाओं को शून्य नकलवाली बनाने की कोशिश की थी, लेकिन कोशिश सफल नहीं रही.

सवाल है आखिर छात्र शासन प्रशासन के किसी भी कोशिश के बावजूद नकल करने की कोशिश क्यों करते हैं? वास्तव में हमें यह समझना होगा कि नकल किस तरह की समस्या है? दरअसल नकल महज परीक्षार्थियों की चतुराई या उनकी उदंडता भर नहीं है, नकल का अपना एक सामाजिक मूल्य है.

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समाज के आईने में नकल को बेईमानी और चरित्रहीनता की नजर से ही देखा जाता है, जो गलत भी नहीं है. लेकिन इस सबके बावजूद नकल को लेकर एक व्यवहारिक सच्चाई यह भी है कि सार्वजनिक तौरपर भले शायद ही कोई हो जो नकल के पक्ष में अपनी राय जताये. लेकिन अगर मौका मिले और विश्वास हो कि पकड़े नहीं जायेंगे तो शायद ही ऐसा कोई हो जो नकल न करे.

दरसअल नकल एक सहज मानवीय प्रवृत्ति है; क्योंकि नकल में यह लालच छिपा होता है कि बिना जरूरी मेहनत किये भी इसके जरिये योग्यता का सर्टिफिकेट हासिल हो सकता है. यही कारण है कि नकल सिर्फ भारत भर की समस्या नहीं है बल्कि आधुनिक परीक्षा प्रणाली जहां पर भी लागू की गई, उन सब जगहों में एक ऐसा दौर जरूर आया है, जब नकल परीक्षाओं का सिरदर्द साबित हुई है.

मौजूदा आधुनिक परीक्षा प्रणाली चीन में ईसा के पश्चात सन 605 में शुरु हुई. यह प्रणाली शुरुआत में कई शताब्दियों तक चीन में न सिर्फ खूब फूली-फली बल्कि इसने अपने आकर्षण से पूरी दुनिया को अपनी ओर खींचा. आज पूरी दुनिया में चीन में विकसित यही परीक्षा प्रणाली अलग अलग रूप और तरीकों से लागू है.

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गौरतलब है कि ईसा पश्चात सन 605 में शुरु हुई यह आधुनिक परीक्षा प्रणाली सन 1300 में चीन में खत्म कर दी गई. इसे चीन के शुई साम्राज्य ने खत्म कर दिया. इसके पीछे कारण सिर्फ और सिर्फ नकल की बहुत बड़ी समस्या का पैदा हो जाना था. चीन की तरह ब्रिटेन ने भी इस आधुनिक परीक्षा प्रणाली को अपने यहां सिविल सेवा के अधिकारियों को चयन करने के लिए सन 1806 में लागू किया. लेकिन करीब 100 सालों बाद वहां पर भी यह करीब करीब बंद कर दी गई या इसका पूरी तरह से ढांचा बदल दिया गया.

ब्रिटेन में भी इसका कारण नकल की समस्या का पैदा हो जाना ही था. साल 2016 में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक इंग्लैंड के कुछ छात्र नकल करने की कोशिश अब भी करते हैं, लेकिन इन छात्रों की संख्या महज 2 से 5 फीसदी होती है. हालांकि यह तथ्य निष्कर्ष के रूप में सामने नहीं आया, लेकिन कुछ शिक्षाशात्रियों द्वारा दबी जुबान यह भी कहा जाता है कि ब्रिटेन में नकल की आदत एशियाई छात्रों के चलते ही है, हालांकि यह बात सही नहीं है.

इंग्लैंड की तरह अमरीका में भी एक दशक पहले तक मिडिल और हाईस्कूल के छात्र नकल करने की कोशिश करते थे, लेकिन अब वहां नकल की कोशिश करीब करीब समाप्त हो गई है. तमाम अफ्रीकी देशों में भी जहां पर आधुनिक ढांचे की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था है, वहां भी नकल एक समस्या रही है. लेकिन दुनिया के भले किसी भी देश में नकल की समस्या बहुत बड़ा सच रही हो, लेकिन आज की तारीख में दुनिया के ज्यादातर देशों में नकल का वह तौर तरीका जो छात्रों द्वारा भारत में अपनाया जाता है, दुनिया के किसी और देश में नहीं अपनाया जाता. जबकि भारत में नकल आज भी एक बड़ी समस्या है. हालांकि इसका भूगोल बड़ा मजेदार है. क्योंकि पूरे देश में नकल एक जैसी समस्या नहीं है. हिंदुस्तान में नकल करीब 70 फीसदी तक अकेले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार की समस्या है. इसे अगर और नजदीक से देखें तो नकल की 90 प्रतिशत तक समस्या उत्तर भारत की है.

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हालांकि इस तथ्य की विश्वसनीयता संदिग्ध है. विशेषज्ञों का मानना है कि यूं तो नकल पूरे देश की समस्या है, लेकिन उत्तर भारत के छात्र पश्चिम और दक्षिण भारत के छात्रों जितने नकल करने में शातिर या दक्ष नहीं हैं. कहने का मतलब यह है कि अगर उत्तर भारत में नकल करने वाले छात्रों के आंकड़े पश्चिम या दक्षिण भारत की तुलना में बड़े हैं, तो इसका एक कारण उत्तर भारत के नकलची छात्रों का पश्चिम और दक्षिण भारत के नकलची छात्रों जितना स्मार्ट न होना भी है.

बहरहाल एक मोटा अनुमान यह है कि हिंदुस्तान में हर साल करीब 4 लाख छात्र बोर्ड की परीक्षाओं में नकल करते पकड़े जाते हैं. ये उन छात्रों की संख्या है जिन्हें नकल के आरोप में दबोचा जाता है और अंत तक किसी भी वजह से छोड़ा नहीं जाता. जबकि बड़ी तादाद पर ऐसे छात्र भी होते हैं जिन्हें नकल के लिए पकड़े जाने के बाद भी किसी न किसी वजह से छोड़ दिया जाता है. इस तरह अगर देखें तो सच्चाई यह है कि नकल करने के आरोप में जितने छात्र पकड़े जाते हैं, वास्तव में उससे कहीं ज्यादा होते हैं.

सवाल है यह समस्या तमाम प्रचार माध्यमों और जागरूकता के बावजूद भी दिन पर दिन और बड़ी क्यों होती जा रही है? आखिर गुरुजनों के प्रवचनों, अखबारों के विज्ञापन और समाज के सम्मानित लोगों द्वारा नकल की, की गई आलोचना के बाद भी नकल रूकती क्यों नहीं? यह आखिर लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती ही क्यों जा रही है? इसका कारण महज छात्रों का चरित्रहीन या गैरईमानदार होना भर नहीं है बल्कि नकल की लत न छूटने के पीछे एक बड़ा कारण हमारी मौजूदा परीक्षा प्रणाली भी है.

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वास्तव में हिंदुस्तान में नकल की जो समस्या नासूर जैसी बन चुकी है, उसका बड़ा कारण परीक्षकों द्वारा कल्पनाशील प्रश्नपत्र न बना पाने की समस्या है. हमारे परीक्षक ऐसे प्रश्नपत्र बनाते हैं जिनका शब्दशः जवाब न केवल पढ़ाई जाने वाली किताबों में मौजूद होता है बल्कि अध्यपाकों द्वारा जो सवाल जवाब अभ्यास पुस्तिकाओं में कराये जाते हैं उनमें भी परीक्षा के प्रश्नों का सटीक जवाब मौजूद होता है. इसलिए छात्रों के पास यह सुविधा होती है कि वे अपनी किताबें और उत्तर पुस्तिकाओं में लिखे जवाबों को परीक्षा की कॉपी में हूबहू उतार दें. इस सुविधा के चलते ही सबसे ज्यादा नकल की संभावना बनी रहती है और वह होती भी है.

कहने का मतलब यह कि हिंदुस्तान में छात्रों द्वारा बड़े पैमाने पर नकल किये जाने का एक बड़ा कारण यह है कि हमारे परीक्षक उनसे ऐसे कल्पनाशील सवाल नहीं पूछ पाते, जिनका जवाब पढ़ाया या बताया तो गया हो, लेकिन परीक्षा में उसे शब्दशः लिखने की जरूरत न हो. अगर हमारे परीक्षक ऐसे सवाल बनाने में कामयाब हो जाएं जिनका जवाब छात्रों को पढ़ाया तो गया हो लेकिन वह उनकी अभ्यास पुस्तिकाओं में शब्दशः लिखा न हो. ऐसे में छात्रों के लिए नकल करने की सुविधा ही नहीं बचेगी क्योंकि किताबों से या उत्तर पुस्तिकाओं वे हूबहू जवाब उतारते है, तो यह गलत होगा.

Holi 2020: औरेंज पील फेस पैक से चमकाएं अपनी त्वचा

संतरा और उससे बना पील फेस पैक चेहरे के लिए बेहद ही फायदेमंद होता है. यह आपके चेहरे को दमकाने, मुंहासे और उनके दाग धब्‍बे को दूर करने के साथ ही चेहरे पर निखार लाने का काम करता है. अगर आपको भी रंगो के त्यौहार में निखरी त्वचा पाने की चाह है तो इस खबर पर एक नजर डरूर डाल लें.

औरेंज पील पाउडर

इसे बनाने के लिये संतरे का छिलका धूप में सुखा दें और बाद में उसको मिक्‍सी में ब्‍लेंड कर के पाउडर बना लें. अब आप जब चाहे तब इस औरेंज पील पाउडर का उपयोग अपने चेहरे को सुंदर बनाने में कर सकती हैं. तो आइये जानते हैं कि औरेंज पील फेस पैक कैसे बनाया जाता है.

औरेंज पील और चंदन पाउडर

सूखा हुआ संतरे का छिलका ले कर उसमें रोज वाटर और चंदन पाउडर मिला कर पेस्‍ट बनाएं. इसे अपने चेहरे और गर्दन पर लगाएं और जब यह सूख जाए तब चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. इससे एक्‍ने और दाग धब्‍बे दूर होते हैं.

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औरेंज पील और नींबू

संतरे के छिलके को मिक्‍सी में डालकर पेस्‍ट बना लें, फिर उसमें 1 चम्‍मच शहद और 1 चम्‍मच नींबू का रस मिलाएं. इस पेस्‍ट को चेहरे पर 25 मिनट तक लगा रहने दें और बाद में ठंडे पानी से धो लें. इससे चेहरा कोमल और बच्‍चों की त्‍वचा की तरह मुलायम हो जाएगा.

औरेंज पील और हल्‍दी

औरेंज पील में हल्‍दी और शहद मिलाइये. इस पेस्‍ट को चेहरे पर 30 मिनट तक लगा रहने के बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लीजिये. इस पैक को लगाने से चेहरा गोरा हो जाता है और सभी दाग धब्‍बे मिट जाते हैं.

औरेंज पील और दही

संतरे के छिलके को 1 चम्‍मच दही के साथ मिक्‍सी में पीस लें. अपने चेहरे को गरम पानी से धोएं और इस पैक को 20 मिनट तक लगाएं रखने के बाद ठंडे पानी से धो लें. इससे बंद पोर्स खुलते हैं और डेड सेल्‍स और गंदगी साफ होती है.

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