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Family Story : मुझे यकीन है – वलीमा को किस बात का अफसोस हो रहा था ?

Family Story : पढ़ीलिखी गुलशन की शादी मसजिद के मुअज्जिन हबीब अली के बेटे परवेज अली से धूमधाम से हुई. लड़का कपड़े का कारोबार करता था. घर में जमीनजायदाद सबकुछ था. गुलशन ब्याह कर आई तो पहली रात ही उसे अपने मर्द की असलियत का पता चल गया. बादल गरजे जरूर, पर ठीक से बरस नहीं पाए और जमीन पानी की बूंदों के लिए तरसती रह गई. वलीमा के बाद गुलशन ससुराल दिल में मायूसी का दर्द ले कर लौटी. खानदानी घर की पढ़ीलिखी लड़की होने के बावजूद सीधीसादी गुलशन को एक ऐसे आदमी को सौंप दिया गया, जो सिर्फ चारापानी का इंतजाम तो करता, पर उस का इस्तेमाल नहीं कर पाता था.

गुलशन को एक हफ्ते बाद हबीब अली ससुराल ले कर आए. उस ने सोचा कि अब शायद जिंदगी में बहार आए, पर उस के अरमान अब भी अधूरे ही रहे. मौका पा कर एक रात को गुलशन ने अपने शौहर परवेज को छेड़ा, ‘‘आप अपना इलाज किसी अच्छे डाक्टर से क्यों नहीं कराते?’’

‘‘तुम चुपचाप सो जाओ. बहस न करो. समझी?’’ परवेज ने कहा.

गुलशन चुपचाप दूसरी तरफ मुंह कर के अपने अरमानों को दबा कर सो गई. समय बीतता गया. ससुराल से मायके आनेजाने का काम चलता रहा. इस बात को दोनों समझ रहे थे, पर कहते किसी से कुछ नहीं थे. दोनों परिवार उन्हें देखदेख कर खुश होते कि उन के बीच आज तक तूतूमैंमैं नहीं हुई है. इसी बीच एक ऐसी घटना घटी, जिस ने गुलशन की जिंदगी बदल दी. मसजिद में एक मौलाना आ कर रुके. उन की बातचीत से मुअज्जिन हबीब अली को ऐसा नशा छाया कि वे उन के मुरीद हो गए. झाड़फूंक व गंडेतावीज दे कर मौलाना ने तमाम लोगों का मन जीत लिया था. वे हबीब अली के घर के एक कमरे में रहने लगे.

‘‘बेटी, तुम्हारी शादी के 2 साल हो गए, पर मुझे दादा बनने का सुख नहीं मिला. कहो तो मौलाना से तावीज डलवा दूं, ताकि इस घर को एक औलाद मिल जाए?’’ हबीब अली ने अपनी बहू गुलशन से कहा. गुलशन समझदार थी. वह ससुर से उन के बेटे की कमी बताने में हिचक रही थी. चूंकि घर में ससुर, बेटे, बहू के सिवा कोई नहीं रहता था, इसलिए वह बोली, ‘‘बाद में देखेंगे अब्बूजी, अभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’ हबीब अली ने कुछ नहीं कहा.

मुअज्जिन हबीब अली के घर में रहते मौलाना को 2 महीने बीत गए, पर उन्होंने गुलशन को देखा तक नहीं था. उन के लिए सुबहशाम का खाना खुद हबीब अली लाते थे. दिनभर मौलाना मसजिद में इबादत करते. झाड़फूंक के लिए आने वालों को ले कर वे घर आते, जो मसजिद के करीब था. हबीब अली अपने बेटे परवेज के साथ दुकान में रहते थे. वे सिर्फ नमाज के वक्त घर या मसजिद आते थे. मौलाना की कमाई खूब हो रही थी. इसी बहाने हबीब अली के कपड़ों की बिक्री भी बढ़ गई थी. वे जीजान से मौलाना को चाहते थे और उन की बात नहीं टालते थे. एक दिन दोपहर के वक्त मौलाना घर आए और दरवाजे पर दस्तक दी.

‘‘जी, कौन है?’’ गुलशन ने अंदर से ही पूछा.

‘‘मैं मौलाना… पानी चाहिए.’’

‘‘जी, अभी लाई.’’

गुलशन पानी ले कर जैसे ही दरवाजा खोल कर बाहर निकली, गुलशन के जवां हुस्न को देख कर मौलाना के होश उड़ गए. लाजवाब हुस्न, हिरनी सी आंखें, सफेद संगमरमर सा जिस्म… मौलाना गुलशन को एकटक देखते रहे. वे पानी लेना भूल गए.

‘‘जी पानी,’’ गुलशन ने कहा.

‘‘लाइए,’’ मौलाना ने मुसकराते हुए कहा.

पानी ले कर मौलाना अपने कमरे में लौट आए, पर दिल गुलशन के कदमों में दे कर. इधर गुलशन के दिल में पहली बार किसी पराए मर्द ने दस्तक दी थी. मौलाना अब कोई न कोई बहाना बना कर गुलशन को आवाज दे कर बुलाने लगे. इधर गुलशन भी राह ताकती कि कब मौलाना उसे आवाज दें. एक दिन पानी देने के बहाने गुलशन का हाथ मौलाना के हाथ से टकरा गया, उस के बाद जिस्म में सनसनी सी फैल गई. मुहब्बत ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया था. ऊपरी मन से मौलाना ने कहा, ‘‘सुनो मियां हबीब, मैं कब तक तुम्हारा खाना मुफ्त में खाऊंगा. कल से मेरी जिम्मेदारी सब्जी लाने की. आखिर जैसा वह तुम्हारा बेटा, वैसा मेरा भी बेटा हुआ. उस की बहू मेरी बहू हुई. सोच कर कल तक बताओ, नहीं तो मैं दूसरी जगह जा कर रहूंगा.’’

मुअज्जिन हबीब अली ने सोचा कि अगर मौलाना चले गए, तो इस का असर उन की कमाई पर होगा. जो ग्राहक दुकान पर आ रहे हैं, वे नहीं आएंगे. उन को जो इज्जत मौलाना की वजह से मिल रही है, वह नहीं मिलेगी. इस समय पूरा गांव मौलाना के अंधविश्वास की गिरफ्त में था और वे जबरदस्ती तावीज, गंडे, अंगरेजी दवाओं को पीस कर उस में राख मिला कर इलाज कर रहे थे. हड्डियों को चुपचाप हाथों में रख कर भूतप्रेत निकालने का काम कर रहे थे. बापबेटे दोनों ने मौलाना से घर छोड़ कर न जाने की गुजारिश की. अब मौलाना दिखाऊ ‘बेटाबेटी’ कह कर मुअज्जिन हबीब अली का दिल जीतने की कोशिश करने लगे. नमाज के बाद घर लौटते हुए हबीब अली ने मौलाना से कहा, ‘‘जनाब, आप इसे अपना ही घर समझिए. आप की जैसी मरजी हो वैसे रहें. आज से आप घर पर ही खाना खाएंगे, मुझे गैर न समझें.’’ मौलाना के दिल की मुराद पूरी हो गई. अब वे ज्यादा वक्त घर पर गुजारने लगे. बाहर के मरीजों को जल्दी से तावीज दे कर भेज देते. इस काम में अब गुलशन भी चुपकेचुपके हाथ बंटाने लगी थी.

तकरीबन 6 महीने का समय बीत चुका था. गुलशन और मौलाना के बीच मुहब्बत ने जड़ें जमा ली थीं. एक दिन मौलाना ने सोचा कि आज अच्छा मौका है, गुलशन की चाहत का इम्तिहान ले लिया जाए और वे बिस्तर पर पेट दर्द का बहाना बना कर लेट गए. ‘‘मेरा आज पेट दर्द कर रहा है. बहुत तकलीफ हो रही है. तुम जरा सा गरम पानी से सेंक दो,’’ गुलशन के सामने कराहते हुए मौलाना ने कहा.

‘‘जी,’’ कह कर वह पानी गरम करने चली गई. थोड़ी देर बाद वह नजदीक बैठ कर मौलाना का पेट सेंकने लगी. मौलाना कभीकभी उस का हाथ पकड़ कर अपने पेट पर घुमाने लगे.

थोड़ा सा झिझक कर गुलशन मौलाना के पेट पर हाथ फिराने लगी. तभी मौलाना ने जोश में गुलशन का चुंबन ले कर अपने पास लिटा लिया. मौलाना के हाथ अब उस के नाजुक जिस्म के उस हिस्से को सहला रहे थे, जहां पर इनसान अपना सबकुछ भूल जाता है. आज बरसों बाद गुलशन को जवानी का वह मजा मिल रहा था, जिस के सपने उस ने संजो रखे थे. सांसों के तूफान से 2 जिस्म भड़की आग को शांत करने में लगे थे. जब तूफान शांत हुआ, तो गुलशन उठ कर अपने कमरे में पहुंच गई.

‘‘अब्बू, मुझे यकीन है कि मौलाना के तावीज से जरूर कामयाबी मिलेगी,’’ गुलशन ने अपने ससुर हबीब अली से कहा.

‘‘हां बेटी, मुझे भी यकीन है.’’

अब हबीब अली काफी मालदार हो गए थे. दिन काफी हंसीखुशी से गुजर रहे थे. तभी वक्त ने ऐसी करवट बदली कि मुअज्जिन हबीब अली की जिंदगी में अंधेरा छा गया. एक दिन हबीब अली अचानक किसी जरूरी काम से घर आए. दरवाजे पर दस्तक देने के काफी देर बाद गुलशन ने आ कर दरवाजा खोला और पीछे हट गई. उस का चेहरा घबराहट से लाल हो गया था. बदन में कंपकंपी आ गई थी. हबीब अली ने अंदर जा कर देखा, तो गुलशन के बिस्तर पर मौलाना सोने का बहाना बना कर चुपचाप मुंह ढक कर लेटे थे. यह देख कर हबीब अली के हाथपैर फूल गए, पर वे चुपचाप दुकान लौट आए.

‘‘अब क्या होगा? मुझे डर लग रहा है,’’ कहते हुए गुलशन मौलाना के सीने से लिपट गई.

‘‘कुछ नहीं होगा. हम आज ही रात में घर छोड़ कर नई दुनिया बसाने निकल जाएंगे. मैं शहर से गाड़ी का इंतजाम कर के आता हूं. तुम तैयार हो न?’’ ‘‘मैं तैयार हूं. जैसा आप मुनासिब समझें.’’ मौलाना चुपचाप शहर चले गए. मौलाना को न पा कर हबीब अली ने समझा कि उन के डर की वजह से वह भाग गया है.

सुबह हबीब अली के बेटे परवेज ने बताया, ‘‘अब्बू, गुलशन भी घर पर नहीं है. मैं ने तमाम जगह खोज लिया, पर कहीं उस का पता नहीं है. वह बक्सा भी नहीं है, जिस में गहने रखे हैं.’’ हबीब अली घबरा कर अपनी जिंदगी की कमाई और बहू गुलशन को खोजने में लग गए. पर गुलशन उन की पहुंच से काफी दूर जा चुकी थी, मौलाना के साथ अपना नया घर बसानFamily Story

Social Story : रिटायरमेंट – आत्मसम्मान के आड़ में रिश्तों को बौना समझते पिता की कहानी

Social Story : ‘‘तो पापा, कैसा लग रहा है आज? आप की गुलामी का आज अंतिम दिन है. कल से आप पिंजरे से आजाद पंछी की भांति आकाश में स्वच्छंद विचरण करने के लिए स्वतंत्र होंगे,’’ आरोह नाश्ते की मेज पर भी पिता को अखबार में डूबे देख कर बोला था.

‘‘कहां बेटे, जीवन भर पिंजरे में बंद रहे पंछी के पंखों में इतनी शक्ति कहां होती है कि वह स्वच्छंद विचरण करने की बात सोच सके,’’ अरविंद लाल मुसकरा दिए थे, ‘‘पिछले 35 साल से घर से सुबह खाने का डब्बा ले कर निकलने और शाम को लौटने की ऐसी आदत पड़ गई है कि ‘रिटायर’ शब्द से भी डर लगता है.’’

‘‘कोई बात नहीं पापा, एकदो दिन बाद आप अपने नए जीवन का आनंद लेने लगेंगे,’’ कह कर आरोह हंस दिया.

‘‘मैं तो नई नौकरी ढूंढ़ रहा हूं. कुछ जगहों पर साक्षात्कार भी दे चुका हूं. मुझे कोई पैंशन तो मिलेगी नहीं. नई नौकरी से हाथ में चार पैसे भी आएंगे और साथ ही समय भी कट जाएगा.’’

‘‘क्या कह रहे हैं, पापा, जीवन भर खटने के बाद क्या यह आप की नौकरी ढूंढ़ने की उम्र है. यह समय तो पोतेपोतियों के साथ खेलने और अपनी इच्छानुसार जीवन जीने का है,’’ आरोह ने बड़े लाड़ से कहा था.

‘‘मैं सब समझ गया बेटे, रिटायर होने के बाद तुम मुझे अपना सेवक बना कर रखना चाहते हो,’’ अरविंद लाल का स्वर अचानक तीखा हो गया था.

‘‘पापा, आप के लिए मैं ऐसा सोच भी कैसे सकता हूं.’’

‘‘बेटे, आज घरघर की यही कहानी है. बूढ़े मातापिता तो किसी गिनती में हैं ही नहीं. बच्चों को स्कूल से लाना ले जाना. सब्जीभाजी से ले कर सारी खरीदारी करना यही सब तो कर रहे हैं आजकल अधिकतर वृद्ध. सुबह की सैर के समय मेरे मित्र यही सब बताते हैं.’’

‘‘बताते होंगे, पर हर परिवार की परिस्थितियां अलगअलग होती हैं. आप को ऐसा कुछ करने की कतई जरूरत नहीं है. कल से आप अपनी इच्छा के मालिक होंगे. जब मन में आए सोइए, जब मन में आए उठिए, आप की दिनचर्या में कोई खलल नहीं डालेगा. मैं, यह आप को विश्वास दिलाता हूं. पर कृपया फिर से नई नौकरी ढूंढ़ने के चक्कर में मत पडि़ए,’’ आरोह ने विनती की.

अरविंदजी कोई उत्तर देते इस से पहले ही बहू मानिनी आ खड़ी हुई और अपने पति की ओर देख कर बोली, ‘‘चलें क्या? देर हो रही है.’’

‘‘हां, चलो, मुझे भी आज जल्दी पहुंचना है. अच्छा पापा, फिर शाम को मिलते हैं,’’ आरोह उठ खड़ा हुआ.

‘‘मानिनी, नाश्ता तो कर लो,’’ आरोह की मां वसुधाजी बोलीं.

‘‘मांजी, चाय पी ली है. नाश्ता अस्पताल पहुंच कर लूंगी. आज चारू को हलका बुखार था. परीक्षा थी इसलिए स्कूल गई है. रामदीन जल्दी ले आएगा. आप जरा संभाल लीजिएगा,’’ मानिनी जाते हुए बोली थी.

‘‘बहू, तुम चिंता मत करो. मैं हूं न. सब संभाल लूंगी,’’ वसुधाजी ने मानिनी को आश्वस्त किया.

‘‘चिंता करने की जरूरत भी कहां है, यहां स्थायी नौकरानी जो बैठी है दिन भर हुकम बजा लाने को,’’ अरविंद लाल कटु स्वर में बोले.

‘‘अपने घर के काम करने से कोई छोटा नहीं हो जाता पर यह बात आप की समझ से बाहर है. चलो, नहाधो कर तैयार हो जाओ. आज तो आफिस जाना है. कल से घर बैठ कर अपनी गाथा सुनाना.’’

‘‘मेरी समझ का तो छोड़ो अपनी समझ की बात करो. दिन भर घर में लगी रहती हो. मानिनी तो नाम की मां है. चारू और चिरायु को तो तुम्हीं ने पाल कर बड़ा किया है. सुधांशु की पत्नी इसी काम के लिए आया को 7 हजार रुपए देती है.’’

‘‘आप के विचार से आया और दादी में कोई अंतर नहीं होता. मैं ने तो आरोह और उस की दोनों बहनों को भी बड़ा किया है. तब तो आप ने यह प्रश्न कभी नहीं उठाया.’’

‘‘भैंस के आगे बीन बजाने का कोई लाभ नहीं है. मैं आगे तुम से कुछ भी नहीं कहूंगा, पर इतना साफ कहे देता हूं कि मैं अपने ही बेटे के घर पर घरेलू नौकर बन कर नहीं रहूंगा. मेरे लिए मेरा आत्मसम्मान सर्वोपरि है.’’

‘‘क्या कह रहे हो, कुछ तो सोचसमझ कर बोला करो. घर में नौकरचाकर क्या सोचेंगे…अच्छा हुआ कि आरोह, मानिनी और बच्चे घर पर नहीं हैं. नहीं तो ऐसी बेसिरपैर की बातें सुन कर न जाने क्या सोचते.’’

‘‘मैं किसी से नहीं डरता. और जो कुछ तुम से कह रहा हूं उन से भी कह सकता हूं,’’ अरविंद लाल शान से बोले.

‘‘क्यों अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने पर तुले हो. याद करो वह दिन जब हम पैसेपैसे को तरसते थे. तब एक दिन आप ने बड़ी शान से कहा था कि चाहे आप को कुछ भी करना पड़े आप आरोह को क्लर्की नहीं करने देंगे. उसे आप डाक्टर बनाएंगे.’’

‘‘हां, तो क्या बनाया नहीं उसे डाक्टर? उन दिनों हम ने कितनी तंगी में दिन गुजारे यह क्या तुम नहीं जानतीं?’’

‘‘जानती हूं. मैं सब जानती हूं. पर कई बार मातापिता लाख प्रयत्न करें तब भी संतान कुछ नहीं करती लेकिन अपना आरोह तो लाखों में एक है. अपने पैरों पर खड़े होते ही उस ने आप की जिम्मेदारियों का भार अपने कंधों पर ले लिया. नीना और निधि के विवाह में उस ने कर्ज ले कर आप की सहायता की वरना उन दोनों के लिए अच्छे घरवर जुटा पाना आप के वश की बात न थी,’’ वसुधाजी धाराप्रवाह बोले जा रही थीं.

‘‘तुम्हें तो पुत्रमोह ने अंधा बना दिया है. अपनी बहनों के प्रति उस का कुछ कर्तव्य था या नहीं? उन के विवाह में सहायता कर के उस ने अपने कर्तव्य का पालन किया है और कुछ नहीं. परिवार के सदस्य एकदूसरे के लिए इतना भी न करें तो एकसाथ रहने का अर्थ क्या है? आरोह ने जब इस कोठी को खरीदने की इच्छा जाहिर की थी तो हम चुपचाप अपना 2 कमरों का मकान बेच कर उस के साथ रहने आ गए थे.’’

‘‘वह भी तब जब उस ने आधी कोठी आप के नाम करवा दी थी.’’

‘‘वह सब मैं ने अपने लिए नहीं तुम्हारे लिए किया था. आजकल की संतान का क्या भरोसा. कब कह दे कि हमारे घर से बाहर निकल जाओ,’’ अरविंदजी अब अपनी अकड़ में थे.

‘‘समझ में नहीं आ रहा कि आप को कैसे समझऊं. पता नहीं इतनी कड़वाहट कहां से आ गई है आप के मन में.’’

‘‘कड़वाहट? यह कड़वाहट नहीं है आत्मसम्मान की लड़ाई है. माना तुम्हारा आरोह बहुत प्रसिद्ध डाक्टर हो गया है. दोनों पतिपत्नी मिल कर खूब पैसा कमा रहे हैं, पर वे मुझे नीचा दिखाएं या अपने रुतबे का रौब दिखाएं तो मैं यह सह नहीं पाऊंगा.’’

‘‘कौन आप को नीचा दिखा रहा है? पता नहीं आप ने अपने दिमाग में यह कैसी कुंठा पाल ली है और दिन भर न जाने क्याक्या सोचते रहते हैं,’’ वसुधा का स्वर अनचाहे भर्रा गया था.

‘‘चलो, बहस छोड़ो और मेरा सूट ले आओ. आज मेरा विदाई समारोह है. सूट पहन कर जाऊंगा.’’

अरविंद लाल तैयार हो कर दफ्तर चले गए. पर वसुधा को सोच में डूबा छोड़ गए. कुछ दिनों से अपने पति अरविंद लाल का हाल देख कर वसुधा का दिल बैठा जा रहा था. जितनी देर वे घर में रहते एक ही राग अलापते कि अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देंगे.

फूलमालाओं और उपहारों से लदे अरविंदजी को दफ्तर की गाड़ी छोड़ गई थी. उन के अफसरों ने भी उन की प्रशंसा के पुल बांध दिए थे.

घर आते ही उन्होंने चारू और चिरायु के गले में फूलमालाएं डाल दी थीं और प्रसन्नता से झमते हुए देर तक वसुधा को विदाई समारोह का हाल सुनाते रहे थे.

‘‘दादाजी, घूमने चलो न, आइसक्रीम खाएंगे,’’ उन्हें अच्छे मूड में देख कर बच्चे जिद करने लगे थे.

‘‘कहीं नहीं जाना है. चारू को बुखार है, वैसे भी आइसक्रीम खाने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है. फ्रिज में ढेरों आइसक्रीम पड़ी है,’’ वसुधाजी ने दोनों बच्चों को समझया था.

‘‘ठीक कहती हो,’’ अरविंदजी बोले, ‘‘बच्चो, कल घूमने चलेंगे. आज मैं बहुत थक गया हूं. वसुधा, एक प्याली चाय पिला दो फिर कुछ देर आराम करूंगा. कल नई पारी की शुरुआत जो करनी है.’’

वसुधा के मन में सैकड़ों प्रश्न बादल की तरह उमड़घुमड़ रहे थे कि वे किस दूसरी पारी की बात कर रहे हैं, कुछ पूछ कर फिर से वे घर की शांति को भंग नहीं करना चाहतीं. इसलिए चुपचाप चाय बना कर ले आईं.

अगले दिन अरविंदजी रोज की तरह तैयार हो कर घर से चले तो वसुधा स्वयं को रोक नहीं सकीं.

‘‘टोकना आवश्यक था? शुभ कार्य के लिए जा रहा था… अब तो काम शायद ही बने,’’ अरविंदजी झंझला गए थे.

‘‘मुझे लगा कि आज आप घर पर ही विश्राम करेंगे. आप 2 मिनट रुकिए अभी आप के लिए टिफिन तैयार करती हूं.’’

‘‘जाने दो, मैं फल आदि खा कर काम चला लूंगा. मुझे देर हो रही है,’’ अरविंदजी अपनी ही धुन में थे.

‘‘पापा कहां गए?’’ नाश्ते की मेज पर आरोह पूछ बैठा था.

‘‘वे तो रोज की तरह ही घर से निकल गए. कह रहे थे कि किसी आवश्यक कार्य से जाना है,’’ वसुधा ने बताया.

‘‘मां, आप उन्हें समझती क्यों नहीं कि उन्हें फिर से काम ढूंढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है. 35 वर्ष तक उन्होंने कार्य किया है. अब जब कुछ आराम करने का समय आया तो फिर से काम ढूंढ़ने निकल पड़े.’’

‘‘क्या कहूं, बेटे. मैं तो उन्हें समझसमझ कर थक गई हूं. सुबह की सैर पर साथ जाने वाले मित्रों ने इन के मन में यह बात अच्छी तरह बिठा दी है कि अब घर में उन को कोई नहीं पूछेगा. बातबात में यही कहते हैं कि अपने आत्मसम्मान पर आंच नहीं आने देंगे.’’

‘‘उन के आत्मसम्मान पर चोट करने का प्रश्न ही कहां है, मां. घर में आराम से रहें, अपनी इच्छानुसार जीवन जिएं.’’

‘‘इस विषय पर बहुत कहासुनी हो चुकी है. मैं ने तो अब किसी प्रकार की बहस न करने का निर्णय लिया है, पर मन ही मन मैं बुरी तरह डर गई हूं.’’

‘‘इस में डरने की क्या बात है, मां.’’

‘‘इसी तरह तनाव में रहे तो अपनी सेहत चौपट कर लेंगे,’’ वसुधाजी रो पड़ी थीं.

‘‘चिंता मत करो, मां, सेवानिवृत्ति के समय कई लोग इस तरह के तनाव के शिकार हो जाते हैं,’’ आरोह ने मां को समझया.

अरविंदजी दोपहर को घर आए तो देखा, आरोह खाने की मेज पर अपनी मां से कुछ बातें कर रहा था.

‘‘मांबेटे के बीच क्या कानाफूसी हो रही है? मेरे विरुद्ध कोई साजिश तो नहीं हो रही?’’ वे थके होने पर भी मुसकराए थे.

‘‘हो तो रही है, हम सब को आप से बड़ी शिकायत है,’’ आरोह मुसकराया था.

‘‘ऐसा क्या कर दिया मैं ने?’’

‘‘कल आप का विदाई समारोह था. आप सपरिवार आमंत्रित थे पर आप अकेले ही चले गए. मां तक को नहीं ले गए. हम से पूछा तक नहीं.’’

‘‘क्या कह रहे हो, आरोह? इन्हें सपरिवार बुलाया गया था?’’ वसुधा चौंकी थीं.

‘‘पूछ लो न, पापा सामने ही तो बैठे हैं. मुझे तो इन के सहकर्मी मनोज ने आज सुबह अस्पताल आने पर बताया.’’

‘‘इन्हें हमारी भावनाओं की चिंता ही कहां है,’’ वसुधा नाराज हो उठी थीं.

‘‘बात यह नहीं है. मुझे लगा आरोह और मानिनी इतने नामीगिरामी चिकित्सक हैं. वे मुझ जैसे मामूली क्लर्क के विदाई समारोह में क्यों आएंगे. वसुधा सदा पूजापाठ और चारू व चिरायु के साथ व्यस्त रहती है, इसीलिए मैं किसी से कुछ कहेसुने बिना अकेले ही चला गया था. यद्यपि हमारे यहां विदाई समारोह में सपरिवार जाने की परंपरा है,’’ अरविंदजी क्षमायाचनापूर्ण स्वर में बोले थे.

‘‘आप की समस्या यह है पापा कि आप सबकुछ अपने ही दृष्टिकोण से देखते हैं. खुद को बारबार साधारण क्लर्क कह कर आप केवल स्वयं को नहीं, मेरे पिता को अपमानित करते हैं जिन्होंने इसी नौकरी के बलबूते पर मेहनत और ईमानदारी से अपने परिवार का पालनपोषण किया. साथ ही आप उन हजारों लोगों का अपमान भी करते हैं जो इस तरह की नौकरियों से अपनी जीविका कमाते हैं.’’

आरोह का आरोप सुन कर कुछ क्षणों के लिए अरविंदजी ठगे से रह गए थे. कोई उन के बारे में इस तरह भी सोच सकता है यह उन के लिए एक नई बात थी. उन की आंखों से आंसू टपकने लगे.

‘‘क्या हुआ, पापा? आप रो क्यों रहे हैं?’’ तभी नीना और निधि आ खड़ी हुई थीं.

‘‘मैं क्या बताऊं, पापा से ही पूछ लो न,’’ आरोह हंसा था. पर अरविंदजी ने चटपट आंसू पोंछ लिए थे.

‘‘तुम दोनों कब आईं?’’ उन्होंने नीना और निधि से अचरज से पूछा था.

‘‘ये दोनों अकेली नहीं सपरिवार आई हैं, वह भी मेरे निमंत्रण पर. कल कुछ और अतिथि भी आ रहे हैं.’’

‘‘क्या कह रहे हो…मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है…कल कौन सा पर्व है?’’

‘‘कल हम अपने पापा के रिटायर होने का फंक्शन मना रहे हैं.’’

‘‘यह सब क्या है. हमारे परिवार में इस तरह के किसी आयोजन की कोई परंपरा नहीं है.’’

‘‘परंपराएं बदली भी जा सकती हैं. हम ने कल की पार्टी में आप के सभी सहकर्मियों को भी आमंत्रित किया है. नीनानिधि, इन के हाथोें से यह फाइल ले लो. पूछो आज दोपहर तक कहां भटकते रहे,’’ आरोह ने अरविंदजी की फाइल की ओर इशारा किया.

नीना ने पिता के हाथ से फाइल ले ली.

‘‘इस में तो डिगरियां और पापा का बायोडाटा है. यह क्या पापा? आप फिर से नौकरी ढूंढ़ रहे हैं?’’ नीना और निधि आश्चर्यचकित पास आ खड़ी हुई थीं.

‘‘चलो, चायनाश्ता लग गया है,’’ तभी मानिनी ने आ कर सब का ध्यान बटाया.

‘‘लाओ, यह फाइल मुझे दो. मैं इसे ताले में रखूंगा,’’ आरोह उठते हुए बोला.

‘‘चलो उठो, मुंहहाथ धो लो. सब चाय पर प्रतीक्षा कर रहे हैं,’’ वसुधाजी ने भरे गले से कहा.

‘‘इतना सब हो गया और तुम ने मुझे हवा भी नहीं लगने दी,’’ अरविंदजी ने उलाहना देते हुए पत्नी से कहा.

‘‘मुझे भी कहां पता था. मुझे तो कोई भी कुछ बताता ही नहीं. न तुम न तुम्हारे बच्चे. पर मेरे आत्मसम्मान की चिंता किसे है भला,’’ वसुधा नाटकीय अंदाज में बोली थीं.

अरविंद बाबू सोचते रह गए थे. वसुधा शायद ठीक ही कहती है. परिवार की धुरी है वह पर कभी किसी बात का रोना नहीं रोया. ये तो केवल वही थे जो आत्मसम्मान के नाम पर इतने आत्मकेंद्रित हो गए थे कि कोई दूसरा नजर ही नहीं आता था. न जाने मन में कैसी कुंठाएं पाल ली थीं उन्होंने.  Social Story

Zakir Khan : मेडिसिन स्क्वायर ग्राउंड पर एक किस्सागोई कामेडियन

Zakir Khan : जाकिर खान की कामेडी हर चीज को रोमेंटिसाइज करती है. जैसे स्ट्रगल, गरीबी, प्यार, बिछड़ना, परिवार या रिश्ते, जो उन्हें रियलिस्टिक कम बनाती हैं. वे उन्हीं चीजों पर कामेडी करते हैं जिस में वे सहज होते हैं या उन के सुनने वाले. बिना किसी होहल्ले और शोरशराबे के जाकिर कैसे बने भारत के नंबर वन कामेडियन, जानें?

17 अगस्त 2025 की रात. न्यूयौर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डन. एक ऐसा स्टेज जो पहले ‘द बीटल्स’, ‘लेजेंड्री मुक्काबाज मुहम्मद अली’, ‘माइकल जैक्सन’ और हौलीवुड सितारों के नाम रहा है. लेकिन इस बार कुछ अलग था. तेज रौशनी में, भीड़ के सामने, स्टेज के बीचोंबीच खड़ा था एक इंडियन स्टैंडअप कामेडियन, जो अपने देसी अंदाज और अपनी हिंदी भाषा में ठहाके बिखेर रहा था, नाम था जाकिर खान.

यह सिर्फ एक शो नहीं था. यह उस युवा का सपना था, जो कभी इंदौर की तंग गलियों में अपने दोस्तों के साथ मजाक कर, दिल की फीलिंग्स को शेर-ओ-शायरी में ढालते रहता था. उस रात, तालियों की गूंज और कैमरों की चमक में, जाकिर ने अपनी मांपिता को वीडियो कौल पर जो पल दिखाया, वो उस गर्व लिए था जो हर मांपिता अपने बच्चे में देखना चाहते हैं. यह वो पल था जब न केवल इंडियन स्टैंडअप को, बल्कि भारत की उस मिडिल क्लास कहानी को, जिस ने हमेशा सपने देखने की हिम्मत रखी, ग्लोबल स्टेज पर जगह मिल चुकी थी.

जाकिर खान की जिंदगी को ऐसे किसी एक रात से सीमित नहीं किया जा सकता. उन का पूरा सफर इंदौर की उन आम सी गलियों की खुशबू से ले कर अमेरिका की सब से महंगी स्ट्रीट में वहां के दर्शकों को हंसाने तक की कहानी बन गई.

जाकिर का जन्म 20 अगस्त 1987 को इंदौर में एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां गानेबजाने की विरासत थी. उन के पिता, उस्ताद मुरसलीन खान, खुद उस इलाके के एक जानेमाने संगीतकार थे और मां सैदुन्निसा साधारण मगर आर्ट को चाहते वाली महिला. जैसाकि जाकिर ने बताया, “म्यूजिक मेरे डीएनए में था, लेकिन लाइफ की रियल बीट्स कुछ और थीं.”

जाकिर ने बचपन में सितार सीखा, स्कूल फंक्शन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया, पर उन की इच्छा का सुर अलग थीं. हर भारतीय मिडिल क्लास लड़कों की तरह उन से भी घरवालों की ख्वाहिशें बड़ी थीं, इंजीनियर बनो, या कम से कम कोई सरकारी नौकरी पाओ. लेकिन जाकिर जल्दी ही समझ गए कि उन का संगीत और उन की दुनियादारी अलगअलग ट्रैक है. आर्ट की दुनिया में वो जा तो सही रहे हैं पर गली थोड़ी दूसरी है.

इंदौर में उन की पढ़ाई कदम दर कदम, कई बार संभलसंभल कर चलती रही. छोटे से स्कूल, फिर कालेज, हर जगह उन की पहचान ‘मजाकिया लड़का’ या ‘शायर’ के रूप में बनती रही. खासकर उन में एक कला थी किस्सागोई की. प्रगाड़ किस्साबाज, जो भाषा की मर्यादा और सटीक शब्दों को चुनता है. कहां हुक मारना है, कहां पंच यह कला दोस्ती यारी में शुरू होती गई.

कालेज की इंजीनियरिंग की किताबें बेमन से उलटते हुए जाकिर का दिल हमेशा शब्दों, किस्सों, और नईनई कहानियों में लगता था. जब जिंदगी ने कुछ और ट्राय करने का संकेत दिया, तो वह रेडियो प्रोड्यूसर बनने का ख्वाब ले कर दिल्ली और फिर जयपुर पहुंचे. लेकिन, ये भी कोई उजला रास्ता नहीं था. जयपुर में कभीकभी किराया देना भी मुश्किल हो जाता. मकान मालिक ने खुद आगे बढ़ कर एक बार कह दिया, “घर लौट जा बच्चे, पेट पालना मुश्किल है.” जाकिर इस वक्त को याद करते हुए कहते हैं, “स्ट्रगल वाले दिन, रियल कैरेक्टर बनाते हैं.” यहीं से उन की जिंदगी की गंभीरता और दिलफेंक जोक्स के बीच खेलने की आदत बनी.

दरअसल कई लोग उन के जोक्स पर सिर्फ हंसते नहीं हैं बल्कि उन के जोक्स की गहराई पर हंस के भावुक हो जाते हैं. जोक्स मिडिल क्लास यूथ को इतने रिलेटेबल लगते हैं की वे खुद को उस सिचुएशन से एसोसिएट करने लगते हैं.

दिल्ली में रहते हुए जाकिर कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहते थे. थिएटर, रेडियो, पत्रकारिता, कुछ भी मिले, कर डालो. वक्त गुजरा, कंटेंट राइटिंग में हाथ आजमाया, एचटी मीडिया में 4 साल तक कलम घिसी. यहां काम करते हुए उन्हें अपने आसपास के किरदार, उन की आदतें, भारत की सामाजिक जिंदगी और रिश्तों में छुपी कहानियों को पास से देखने का मौका मिला. यही सब उन के अंदर उतरता गया और बहुत धीरेधीरे उन की बनावट में तफ्तीश और गहराई जोड़ता गया.

कालेज टाइम के दोस्त विश्वास ने पहली बार जाकिर को ‘ओपन माइक’ के लिए मना लिया. जाकिर बताते हैं, “मेरा रूममेट विश्वास था, जिस ने कहा, ‘भाई, तेरे पास कमाल के जोक्स हैं, ओपन माइक पर जा कर देख.’ भीतर घबराहट थी. पहली बार कैफे के स्टेज पर गया, दिल झूम रहा था, पर जैसेजैसे हंसी मिलती रही, लगा यही तो मेरा रास्ता है.

“असल संघर्ष तब समझ आया, जब कई बार चुटकुला मार के खुद को हंसाना आसान था, पर पूरी अनजान औडियंस को हंसाना असली ‘मास्टर’ बनने का इम्तहान था. कई बार मजाक नहीं चला तो दुत्कार मिलना, शुरू होते ही स्टेज छोड़ने की अपील, यही हर शुरूआती शिल्पी की हकीकत है. मगर जाकिर खुद कहते हैं, “घरवालों के सामने जोक मारना आसान था, पर अनजान औडियंस के साथ तालमेल बिठाना असली एक्सपर्ट बनाता है. असली आर्टिस्ट वही है, जो हर भीड़ में कहानी सुना दे.”

जैसेजैसे दिल्लीए के कामेडी सर्किट ने जाकिर को पहचाना, मुंबई की पगडंडियां उन का इंतजार करने लगीं. जाकिर मानते हैं, “मुंबई ने मेरी प्रायोरिटीज बदल दीं. फटे जूते, खाली जेब और भूख… ये अहसास कराते हैं कि सक्सेस मेहनत और जज्बे से मिलती है. हार मानना हमेशा औप्शन होता है, पर मैं ने खुद को दोबारा उठाया.”

मुंबई में उन्हें ‘औन एयर विथ एआईबी’, ‘द राइजिंग स्टार कामेडी’ जैसे शोज़ के लिए काम मिला, लिखने को मिला, नई टीमों के साथ मिक्सअप मिला, और धीरेधीरे उन्होंने एआईबी जैसी बड़ी कंपनियों के लिए भी स्क्रिप्टिंग, जोक राइटिंग वगैरह की. यह वही एआईबी है जिस ने भारत में कामेडी के नए ट्रैंड को शुरू किया. 4 साल की मेहनत के बाद जब 2012 में ‘कामेडी सेंट्रल’ का ‘इंडियाज बेस्ट स्टैंडअप कामेडियन’ टाइटल मिला, तो ज़िंदगी ने नया मोड़ लिया. यहीं से ‘सख्त लौंडा’ का कैरेक्टर पैदा हुआ. जाकिर का वो इमेज, जो हर इंडियन यूथ के व्हाट्सएप स्टेट्स पर छा गया. इस की लाइन हैं “जब भी किसी लड़की की दोस्ती बढ़ने लगे, मेरा दिल कहता है, ‘सख्त लौंडा हूं, पिघलूंगा नहीं.” उन के अधिकतर जेनजी यूथ को ले कर होते हैं, भाषा साहित्यिक होती है और उस में टोन मिलेनियल.

जाकिर का ‘सख्त लौंडा’ यूथ की उस जेनरेशन का चेहरा बना, जिसे खुल कर प्यार करने की तमीज़ नहीं आई. वह अपने पापा का दोस्त बन गया, पड़ोस की लड़की से कभी डर के बात करता है, तो कभी दोस्ती के नाम पर फ्रैंड जोन हो जाता है. वह आपकी हमारी ही तरह है, और शायद इसी लिए हर पंचलाइन खास बनती है.

‘हक़ से सिंगल’, ‘कक्षा ग्यारवी’, ‘तथास्तु’ इन सभी नेटफ्लिक्स और यूट्यूब स्पेशल्स ने जाकिर को इंडिया कामेडी सुपरस्टार बना दिया. हर शो सोल्ड आउट, लाखों व्यूज और हर पंचलाइन ट्रेंडिंग. इन के स्टैंडअप में स्कूल के दिनों की “कैमेस्ट्री टीचर”, कालेज की “कैंटीन वाली मैगी”, भाईबहन की झिकझिक, और मिडिल क्लास ड्रीम के हर एंगल को उन्होंने पंचफुल तरीके से डाला है.

पर जाकिर का स्टैंडअप वहां रुकता नहीं, वहां से आगे बढ़ता है, जहां कई कामेडियन अपने कंन्टेंट को छोड़ देते हैं. एक इंटरव्यू में वह कहते हैं, “सही और मनपसंद अलग चीजें हैं. जब तुम सही करते जाओ और मनपसंद छोड़ते जाओ, समझ जाओ बचपन मर गया है.” उन के हिसाब से, “बहुत कम मौके होते हैं जब तुम्हारे पापा कमजोर दिखते हैं. वो मौका मत गंवाना, अगर तुम्हें पापा का सहारा बनने का मौका मिले. उम्र भर याद रहेगा.” यह फीलिंग उन के सोशल ह्यूमर में बराबर रहती है, फैमिली की इंपोर्टेंस, मां के फोन कौल्स, पिता की डांट और छोटे भाईबहनों के सपनों का रंग.

वैलेंटाइन्स डे के मौके पर जब उन से सवाल किया गया, “उन्हें महिलाओं की इतनी अच्छी समझ कैसे?” तो उन की सादगी भरी मुसकान में जवाब था, “मैं अच्छा लिसनर हूं. दोस्तों के साथ कभी ‘लड़का लड़की’ वाली एनर्जी नहीं लाई. असली अपनापन संवाद में आता है. ओपोजिट अट्रेक्ट वाली बात भी आधीअधूरी है—असली कैमेस्ट्री और टाइमिंग पर होती है. गती में गती मिलना जरूरी हैं.”

उन्होंने औनलाइन डेटिंग के बढ़ते ट्रेंड पर भी गंभीर अंदाज में मुस्कान के साथ व्यंग्य किया, “लोग डेटिंग ऐप्स से जुड़ते हैं, पर असली चाहत तो यही है कि कहीं टकरा जाए, कोई असली याद बन जाए, इसीलिए पहली मुलाकात को इंपोर्टेंस दी जाती है.” दरअसल, जाकिर का यही नजरिया है. हर आधुनिक समस्या को, बचपन और भारतीयता की महक के साथ पेश करना.

हालांकि उन की कामेडी हर चीज को रोमेंटिसाइज करती है. जैसे स्ट्रगल, गरीबी, प्यार, बिछड़ना, परिवार, रिश्ते. जो उन्हें रीयलिस्टिक कम बनाती हैं. उन पर सवाल भी उठते रहे हैं कि वे उन्हीं चीजों पर कामेडी करते हैं जिस में वे सहज होते हैं या सुनने वाले. खासकर वे उस तबके के लिए कामेडी करते हैं जो संपन्न है. हार्ड हिटिंग स्टैंड वे नहीं लेते. कामेडी के इतने बड़े मुकाम पर पहुंच कर भी वे उन मूद्दों से अकसर बच निकल जाया करते हैं जो उन्हें सच में “सख्त लौंडा” बनाती हो. कई बार उन्हें कुनाल कामरा जैसे ब्लंट और बोल्ड स्पोकन कामेडी से तुलना की जाती है जहां वे हलके व नाजुक दिखाई पड़ते हैं.

इतना बड़ा नाम बनने के बावजूद, जाकिर खान अपनी पर्सनल लाइफ को प्राइवेट रखते आए हैं. 2018 में अपनी लोन्ग टाइम गर्लफ्रैंड से शादी की, पर पत्नी का नाम या उन की फैमिली लाइमलाइट से हमेशा बचाई रखी. अपने बचपन की बातों से जाकिर कभी हिचकते नहीं. उन की मां, बहनें, और बचपन की यादें अकसर उन की बातें, कविताएं, शायरी और स्टैंडअप में झलक जाती हैं. उन का एक मिसाल है, “मिडिल क्लास पेरेंट्स वैल्यू देते हैं, पैसे नहीं.” यही जाकिर की रनिंग थीम है. बचपन की कीमत, परिवार का महत्व, और मूल्यों पर कायम रहना.

पर्सनल लाइफ में जाकिर की छोटीछोटी खुशियां बेहद खास रही हैं. वह अपने पालतू बिल्ली ‘जोमेटो’ को बेहद चाहते हैं, कंवर्स शूज़ कलेक्ट करने का शौक रखते हैं, रास्ते में मिलने वाले स्ट्रीट फूड के दीवाने हैं, और अकसर खुद को बढ़िया मिमिकरी आर्टिस्ट बताते हुए बौलीवुड फिल्मों के संवाद स्टेज पर रीक्रिएट कर देते हैं.

कामेडी स्टेज की दुनिया उतनी आसान नहीं, जितनी बाहर से नजर आती है. नऐ कौमिक्स के लिए अल्हड़ क्राउड, ओपन माइक में बारबार रिजेक्शन, पैसे की तंगी, एक सही पंचलाइन की तलाश, ये जाकिर की जिंदगी के शुरुआती कुछ साल रहे.

17 अगस्त 2025 की रात जब न्यूयौर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में, उन की हिंदी कामेडी से हजारों लोगों ने तालियां बजाईं, ओवेशन दिया. ग्लोबल कामेडियन हसन मिन्हाज तक को ये कहना पड़ा, “जाकिर ने जो कर दिखाया, वो हिंदी कामेडी के लिए नया दरवाजा खोलता है.” Zakir Khan 

Narendra Modi : डिग्री नहीं दिखाएंगे

Narendra Modi : दिल्ली हाई कोर्ट ने 25 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक डिग्री जैसी व्यक्तिगत जानकारी को (बिना जनहित आधार के) सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इस के लिए आरटीआई एक्ट 2023 की धारा 8(1)(जे) का हवाला दिया.

मामले की शुरुआत हुई 2016 में जब सीआईसी ने 1978 में बीए पास करने वाले छात्रों के रिकौर्ड के जांच की अनुमति दी थी जिस में पीएम मोदी भी शामिल थे. सीआईसी को दिल्ली यूनिवर्सिटी ने कोर्ट में घसीटा और हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी के पक्ष में फैसला सुनाया, यह कहते हुए कि निजता का अधिकार प्राथमिकता रखता है और निजता पूर्ण जानकारी को ‘अजनबियों’ के लिए खुलासा नहीं किया जा सकता.

इतना ही नहीं गुजरात हाई कोर्ट ने 2023 में पीएम मोदी की एमए डिग्री की जानकारी मांगने पर अरविंद केजरीवाल पर 25,000 रुपए का जुर्माना लगाया था और सीआईसी के आदेश को खारिज कर दिया था, जिस में डिग्री सार्वजनिक करने को कहा गया था.

हैरानी की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री की डिग्री को जिस डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के जरिए दिखाने से रोका गया, वह अभी तक लागू ही नहीं हुआ है. अदालत ने प्रधानमंत्री की डिग्री को सार्वजनिक करने से इनकार करते हुए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट, 2023 का हवाला दिया वह कानून जो अभी तक अधिसूचित भी नहीं हुआ है. सोचिए, जो कानून लागू भी नहीं है, उस की परछाई भी इतनी ताकतवर हो गई कि पारदर्शिता की मांग दबा दी गई.

यह फैसला साफ चेतावनी है कि डीपीडीपी एक्ट आरटीआई की रीढ़ तोड़ने के लिए तैयार बैठा है. धारा 44(3) सीधे आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(जे) पर हमला करती है और ‘सभी व्यक्तिगत जानकारी’ को जनता की नज़रों से छिपा देती है. इस का मतलब है कि कोई भी सत्ताधारी अपने हर निजी तथ्य को निजी जानकारी कह कर बच निकल सकता है.

गजब का लोकतंत्र चल रहा है जहां देश के प्रधानमंत्री की डिग्री जानने का हक देश के नागरिकों को नहीं है.  Narendra Modi 

Hindi Love Stories : बेवफा – सरिता ने दीपक से शादी के लिए इंकार क्यों किया था ?

Hindi Love Stories : दीपक और सरिता की शादी होना लगभग तय ही था कि सरिता ने अचानक किसी और से शादी कर ली. 20 साल बाद जब दीपक की बहन रागिनी को इस के पीछे की सचाई का पता चला तो उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. क्या पता चला था उसे…‘‘मेरीतबीयत ठीक नहीं है रितु, मैं घर जा रही हूं. जाते समय चाबी पहुंचा देना…’’

यह आवाज तो जैसे जानीपहचानी है. एक बार तो मेरे मन में आया कि आंखों से गीली रुई हटा कर उसे देखूं. मगर तब तक दूर जाती सैंडलों की आहट से मैं समझ गईर् कि बोलने वाली जा चुकी है. उस की आवाज अभी भी मेरे कानों में गूंज रही थी, इसलिए मैं अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाई.

‘‘यही तो हैं इस ब्यूटीपार्लर की मालकिन सरिता राजवंश… ऊपर ही अपने पति के साथ रहती हैं. रुपएपैसों की कोई कमी नहीं है. बस खालीपन से बचने के लिए यह पार्लर चलाती हैं,’’ जितना पूछा उस से कहीं ज्यादा बता दिया रितु ने.

नाम सुनते ही मेरा रोमरोम जैसे झनझना उठा. चेहरे पर फेस पैक लगा था वरना अब तक न जाने कितने रंग आते और जाते. पिछले ही हफ्ते मेरे पति का तबादला यहां हुआ था. मैं घर में सामान अरेंज करतेकरते काफी थक गई थी. चेहरे की थकान मिटाने के लिए यहां फेशियल कराने आई थी. आश्चर्य कि यह पार्लर मेरी सब से प्यारी सहेली सरिता का था. विश्वास नहीं होता… मैडिकल की तैयारी करने वाली सरिता एक मामूली सा पार्लर चला रही है. लेकिन उस ने मुझे पहचाना क्यों नहीं या पहचान गई इसलिए यहां से चली गई? और भी न जाने कितने सवाल जिन के जवाब मैं पिछले 20 सालों से खोज रही हूं.

वे स्कूलकालेज के दिन… मैं, दीपक भैया और सरिता सब एकसाथ एक ही स्कूल में पढ़ते थे. हम पड़ोसी थे. दीपक भैया मुझ से 2 साल बड़े थे, लेकिन पता नहीं क्यों मां ने हम दोनों का नामांकन एक ही क्लास में करवाया था. दोनों परिवारों की एकजैसी हैसियत के कारण ही शायद हमारी दोस्ती बहुत निभती थी. सरिता के पिताजी एक दफ्तर में क्लर्क थे और मेरी मां एक स्कूल में अध्यापिका. मैं छोटी थी तभी पापा चल बसे थे. दीपक भैया और सरिता की बचपन की दोस्ती धीरेधीरे प्यार का रूप लेने लगी थी. दोनों के जवां दिलों में प्यार का अंकुर फूटने लगा था. मुझे आज भी याद है, रविवार की वह शाम जब दोनों परिवारों के सभी सदस्य मिल कर ‘कुछकुछ होता है’ फिल्म देखने गए थे. दीपक भैया ने गुजारिश की और मैं ने अपनी सीट उन से बदल ली ताकि वे सरिता की हथेलियों को अपने हाथों में ले कर इस संगीतमय और रोमांटिक वातावरण में अपने प्यार का इजहार कर सकें.

फिल्म खत्म होने के बाद सरिता की आंखों की चमक देख कर ही मैं समझ गई थी कि मेरी प्यारी सखी अब हमेशा के लिए मेरे घर में आने वाली है.

पापा की मौत के बाद मैं ने अपने जिस भाईर् को एक पिता की तरह गंभीरतापूर्वक जिम्मेदारियों को निभाते हुए देखा था आज उस के मन में अपनी जिंदगी के प्रति उत्साह एवं आत्मविश्वास देख कर मेरा मन सरिता के प्रति अंदर से झुक जाता था. शायद सरिता के निश्छल प्यार की ही ताकत थी कि पहली बार में ही भैया ने एमबीबीएस की परीक्षा पास कर ली. उस दिन सरिता इतनी खुश थी कि उसे अपने फेल होने का भी कोई गम नहीं था.

सबकुछ इतना अच्छा चल रहा था फिर अचानक एक दिन जब हम दोनों भाईबहन मौसी के घर गए हुए थे और 1 हफ्ते बाद लौटे तो पता चला कि सरिता ने दिल्ली के किसी अमीर आदमी से शादी कर ली है. उस के मम्मीपापा ने भी साफसाफ कुछ बताने से इनकार कर दिया.

फिर तो जैसे दीपक भैया के सारे सपने रेत के घरौंदे की तरह सागर में एकसार हो गए. जिन लहरों से कभी उन्होंने बेपनाह मुहब्बत की थी उन्हीं लहरों ने आज उन्हें गम के सागर में डुबो दिया. उस समय कितनी मुश्किल से मैं ने खुद और भैया को संभाला था यह मैं ही जानती हूं.

‘‘सैवन हंड्रेड हुए मैम,’’ रितु की आवाज सुन कर मैं अतीत से वर्तमान में आ गई. 1 घंटे का फेशियल कब पूरा हो गया पता ही नहीं चला. मैं ने पर्स से रुपए निकाल कर उसे दिए और फिर बाहर आ गई. मैं ने देखा कि बगल में ही ऊपर जाने वाली सीढि़यां थीं.

‘तो सरिता यहीं रहती है,’ सोच मेरे कदम स्वत: ही ऊपर की ओर बढ़ने लगे. सीढि़यों के खत्म होते ही दाहिनी ओर एक दरवाजा था. मैं ने कौलबैल बजाई. मेरे लिए 1-1 पल असहनीय हो रहा था. मैं अपने सारे सवालों के जवाब जानने के लिए उतावली हो रही थी. 20 वर्ष तो बीत गए, मगर ये 20 सैकंड नहीं कट रहे थे. अब तक मैं 4 बार बैल बजा चुकी थी. पुन: बैल बजाने के लिए हाथ उठाया ही था कि दरवाजा खुल गया. मेरे सामने एक अपाहिज, किंतु शानदार व्यक्तित्व का स्वामी व्हील चेयर पर बैठा था.

उस के चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक साफ झलक रही थी. मुझे देख कर एक क्षण के लिए वह अवाक रह गया. मगर अगले ही पल उस ने मुसकराते हुए मुझे अंदर आने को कहा. ऐसा लगा जैसे किसी पुराने मित्र ने मुझे पहचान लिया हो. मगर मेरी आंखें तो कुछ और ही खोज रही थीं.

‘‘सरिता तो अभी घर पर नहीं है. आप रागिनीजी हैं न?’’

उस व्यक्ति के मुंह से अपना नाम सुन कर मैं जैसे आसमान से गिरी… आवाज गले में ही अटक कर रह गई.

‘‘मेरा नाम सुमित है. मांजी और दीपक कैसे हैं? आप का इस शहर में कैसे आना हुआ? आप की शादी तो मुंबई में होने वाली थी न?’’

सवाल तो मैं पूछने आई थी, मगर मुझे नहीं मालूम था कि मुझे ऐसे सवाल सुनने पड़ेंगे… तो क्या सरिता ने अपने पति को सबकुछ बता दिया है?

‘‘आप इतना सबकुछ मेरे बारे में…’’ मेरे हलक से आवाज ही नहीं निकल पा रही थी और फिर मैं बिना कुछ और कहे वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई.

तभी सामने दिखी वह तसवीर, जो हम ने अपने फेयरवैल वाले दिन खिंचवाई थी. मैं दीपक

भैया और सरिता… एक क्षण में मैं समझ गई कि मैं इस घर के लिए अपरिचित नहीं हूं. मगर यह नहीं समझ में आया कि ‘प्यार दोस्ती है,’ कहने वाली सरिता ने अपने प्यार और दोस्ती दोनों के साथ विश्वासघात क्यों किया? वादे को क्यों तोड़ा उस ने?

‘‘अभी 1 घंटा पहले ही सरिता ने आ कर मुझे बताया कि तुम उस के पार्लर में आई हो… वह समझ गईर् थी कि तुम यहां आओगी जरूर. तभी वह यहां से चली गई है.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं. आखिर वह कौन सा मुंह ले कर मेरा सामना कर पाएगी,’’ मेरे मन की कड़वाहट शब्दों में स्पष्ट घुल गई थी.

‘‘सरिता ने जैसा बताया था आप बिलकुल वैसी ही हैं. इतने वर्षों में न तो आप बदलीं और न ही आप की सहेली,’’ सुमित ने कहा तो मैं ने अपनी नजरें उस पर टिका दीं. आखिर कौन सी खूबी है इस में जिस के लिए सरिता ने दीपक भैया के प्यार को ठुकरा दिया?

‘‘सरिता तो आज भी 20 साल पुरानी उन्हीं गलियों में भटक रही है, जहां दीपक की यादें बसती हैं. हर दिन, हर पल वह उन्हीं यादों के सहारे जीती है. दुनिया के लिए तो वह मेरी सरिता है, मगर सही माने में वह आज भी दीपक की ही सरिता है.

‘‘मैं एक दुर्घटना में अपाहिज हो गया था. तब एक केयर टेकर के लिए दिया गया मेरा इश्तिहार पढ़ कर सरिता मेरे पास आई और मुझ से शादी करने की विनती करने लगी. अंधा क्या चाहे दो आंखें… बस मैं ने हां कर दी… सच कहूं तो सरिता जैसी केयरटेकर पा कर मैं धन्य हो गया… मेरे जीवन की खुशियां उस की ही देन हैं.’’

‘‘हमारे घर की खुशियों में आग लगा कर उस ने आप के जीवन में रोशन की है… चमक तो होगी ही,’’ पता नहीं क्यों मैं सीधेसीधे सरिता को बेवफा नहीं कह पा रही थी.

‘‘आप थोड़ा रुकिए मैं अभी आप की गलतफहमी दूर किए देता हूं,’’ कह कर सुमित अंदर से एक डायरी ले आए.

‘‘यह डायरी तो सरिता की है. भैया ने ही उसे उस के जन्मदिन पर उपहारस्वरूप दी थी,’’ कह मैं ने जैसे ही डायरी खोली मेरी नजर एक पत्र पर पड़ी. उस की लिखावट बिलकुल मेरी मां की लिखावट से मिलती थी. अरे, यह तो सचमुच मेरी मां का ही लिखा पत्र है जो उन्होंने सरिता के लिए लिखा था आज से 20 साल पहले-

‘‘सरिता बेटी,

‘‘मैं जानती हूं कि तुम दीपक से बेहद प्यार करती हो और रागिनी तुम्हारी प्यारी सहेली है. मेरी बहन ने दीपक की शादी के लिए एक लड़की देखी है. उस के मातापिता दीपक को बहुत अधिक दहेज दे रहे हैं. तुम तो जानती हो कि दीपक की डाक्टरी की पढ़ाई में मेरे सारे जेवर बिक गए हैं. ऐसे में रागिनी की शादी और दीपक के अच्छे भविष्य के लिए मुझे उस लड़की को ही घर की बहू बनाना पड़ेगा. दीपक तो मेरी बात मानेगा नहीं. ऐसे में उस का भविष्य और रागिनी की जिंदगी अब तुम्हारे हाथों में है. मैं जिंदगी भर तुम्हारा एहसान मानूंगी.

‘‘तुम्हारी मजबूर आंटी.’’

पत्र पढ़ते ही मैं सुबक उठी… ‘‘यह तुम ने क्या कर दिया सरिता? हमारी खुशियों के लिए अपनी जिंदगी में आग लगा ली? आखिर क्यों सरिता? क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं था? आज तुम से पूछे बिना मैं यहां से नहीं जाऊंगी. इतने वर्षों तक मैं और दीपक भैया तुम्हें बेवफा समझ कर तुम से नफरत करते रहे और तुम…’’

‘‘दीपक की नफरत ही तो उस के जीने का साधन है. एक ही क्षेत्र में रह कर शायद कहीं किसी मोड़ पर दीपक से मुलाकात न हो जाए, इसीलिए उस ने वह रास्ता ही छोड़ दिया. सरिता कभी नहीं चाहती थी कि तुम लोग उस की हकीकत जानो. इसलिए अगर तुम सच में सरिता को खुश देखना चाहती हो तो उस से बिना मिले ही चली जाओ वरना वह चैन से जी नहीं पाएगी…’’ सुमित ने कहा.

मुझे सुमित की बात सही लगी. मैं एक बार फिर दीपक भैया के प्रति सरिता के प्यार को देख कर नतमस्तक हो गई. सरिता ने तो प्यार और दोस्ती दोनों शब्दों को सार्थक कर दिया था. बस हम ही उसे नहीं समझ पाए.  Hindi Love Stories

Romantic Story In Hindi : चेहरे पर चेहरा – शादी के बाद क्या हुआ उसके साथ ?

Romantic Story In Hindi : मैं जब ब्याह कर आई तो उम्र के उस दौर में थी जहां लड़कियां सपनों की एक अनोखी दुनिया में खोई रहती हैं. पढ़ना लिखना, घूमना फिरना, हलके फुलके घरेलू काम कर देना, वह भी मां ज्यादा जोर दे कर कहतीं तो कर देती वरना मस्ती मारना, सहेलियों के साथ गपें मारना यही काम होता था मेरा.

मुझ से छोटी 2 बहनें थीं, इसलिए पापा को मेरी शादी की बहुत जल्दी थी. शादी के वक्त मेरी उम्र 19 और मेरे पति अमर की उम्र 24 के आसपास थी. छोटे से कसबे के 5 कमरों वाले घर में काफी चहलपहल रहती थी. सारा दिन घर की जिम्मेदारियां निभाते बीत जाता. छोटा देवर आशु बहुत ही शैतान था. घर में सब से छोटा होने के कारण सब के लाड़प्यार में एकदम जिद्दी बन गया था.

स्कूल से आते ही सारा सामान पूरे घर में फैला कर रख देता. कपड़े कहीं फेंकता, मोजे कहीं तो स्कूल बैग कहीं. अर्चना और शोभा से पहले वह घर आ जाता. आते ही फरमाइशों का दौर शुरू हो जाता. खाने में उसे कुछ भी पसंद नहीं आता, दाल, सब्जी, रायता, चावल सभी थाली में छोड़ रूठ कर सो जाता. पता नहीं कैसा खाना चाहता था वह.

मांजी भी उस की इन आदतों से काफी परेशान रहती थीं. मैं कहना चाहती थी कि आप ने ही उस की आदतों को बिगाड़ कर रखा है, पर कह नहीं पाती थी. मालूम था, मांजी नाराज हो जाएंगी. एक बार अमर ने कह दिया था तो कई दिनों तक घर का माहौल अशांत बना रहा था. आशु उन का बहुत ही दुलारा था.

अमर के बाद 2-2 साल के अंतर पर अर्चना और शोभा का जन्म हुआ था. मांजी को एक और बेटे की चाह थी ताकि अमर के साथ उस का भाईभाई का जोड़ा बन सके. ये बातें बाबूजी के मुंह से मांजी पर गुस्सा होने के समय जाहिर हो गई थीं. अमर और आशु में 14 साल का फासला था, दोनों में बिलकुल भी नहीं बनती थी.

अमर बहुत ही शांत स्वभाव के थे और आशु उग्र, मुंहफट व जिद्दी. मां बाबूजी से बराबर जबान लड़ाता, अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान नहीं देता था. आशु को बिगाड़ने में सब से बड़ा हाथ मांजी का ही था. घर में जो कुछ बनता, सभी को पसंद आता, कभीकभी की बात और है. मगर आशु की पसंद ही कुछ और होती. मांजी वैसे तो रसोई में  झांकती भी नहीं थीं पर आशु की पसंद का खाना रोज अलग से खुद बनातीं. इसीलिए उसे अपनी जिद मनवाने की आदत सी हो गई थी.

अमर की शादी जल्दी करवा दी गई क्योंकि अमर को बाबूजी का बिजनैस संभालना था. मांजी को भी बहू के रूप में एक सहयोगी की जरूरत महसूस होने लगी और ब्याह कर मैं इस घर में आ गई. उम्र का वह ऐसा दौर था जब थकान का नाम ही नहीं था. एक घरेलू लड़की की तरह पूरे घर का काम मैं ने संभाल लिया था. सभी की तारीफें सुन उत्साह में बस काम ही काम के बारे में सोचती रही. कभी अपनी खुशियों की तरफ ध्यान नहीं दिया. उसी का खमियाजा मु झे आज भुगतना पड़ रहा है.

मांजी कईकई महीने मेरे ऊपर सारा घर छोड़ बाहर अपने मायके या रिश्तेदारों के यहां रहतीं. अर्चना और शोभा के इम्तिहान भी शुरू हो गए थे पर वे अभी तक लौट कर नहीं आईं. कभी नानीजी बीमार तो कभी मामाजी के बेटे को खांसीजुकाम, अपनी जिम्मेदारियां छोड़ कर दूसरों का घर संभालना कहां की अक्लमंदी है?

बाबूजी बहुत गुस्सा रहते थे. उन को फोन पर ही काफीकुछ सुना डालते. पर मांजी को जब आना होगा तभी आएंगी. इस उम्र में भी मांजी महीनों मायके में गुजार आतीं. बच्चों को साथ ले कर जाना भी उन्हें पसंद नहीं था. पूरी आजादी से रहतीं, उन की घरगृहस्थी बढि़या चलती रहती.

मैं महीनों मायके जाने को तरसती रहती. मेरे जाने से घर में सभी को असुविधा हो जाती थी. किसी को भी महसूस नहीं होता कि मेरा भी इस घर, चूल्हेचौके से मन ऊब जाता होगा, यहां तक कि अमर भी मेरी भावनाओं को नहीं सम झते. जब भी मैं मायके जाने की बात करती, कोई न कोई बहाना बना मु झे रोक देते, कभी अर्चना, शोभा के एग्जाम, कभी आशु की कौन देखभाल करेगा, मांजी भी नहीं हैं. जब मांजी आ जातीं तो मां क्या सोचेंगी, अभीअभी कल ही तो मां आई हैं, कुछ दिन तो गुजरने दो, जैसे बहाने बनाने शुरू कर देते. मैं तड़प कर रह जाती पर कुछ कह नहीं पाती.

मईजून की छुट्टियों में भैया ने शिमला घूमने जाने का प्रोग्राम बनाया था. भैया ने मु झे भी अपने साथ ले जाने के लिए बाबूजी को फोन कर दिया.

15 दिनों का प्रोग्राम था. पता लगते ही घर में जैसे मातम छा गया. मांजी एकदम से उखड़ गईं, ‘‘अपना प्रोग्राम बता दिया, हमारे बारे में कुछ सोचा ही नहीं. मैं बुढि़या इतने दिनों तक अकेले कैसे पूरा घर संभालूंगी?’’ गुस्से से भर कर मु झ से कहने लगीं, ‘‘तू अपने भाई से बोल देना, इस तरह आनाजाना हम पसंद नहीं करते हैं. हमें जब सुविधा होगी तभी तो भेज पाएंगे.’’

‘‘तो आप मना कर दीजिए अगर आप का मन नहीं है तो,’’ मैं ने भी थोड़ा नाराजगी भरे स्वर में कह दिया.

‘‘कह तो ऐसे रही है जैसे हमारे मना करने से मान जाएगी. लगता है पहले ही भाईबहन की बात हो गई होगी,’’ मांजी ने तीखे स्वर में कहा.

‘‘किस का मन नहीं करता होगा मायके जाने का? यहां तो महीनों हो जाते हैं, अपनेआप तो कोई कभी कहता ही नहीं है. भैया कभी बुलाते हैं तो घर में तूफान खड़ा हो जाता है. घर में एक नौकरानी के चले जाने से सारा काम रुक जो जाता है वरना मु झ से इतना प्यार किसे है,’’ मैं भी गुस्से में कह गई.

अमर भी कहने लगे, ‘‘अच्छा तुम्हारे भैया का फोन आया, घर में तनाव फैल गया.’’

‘‘तो आप भी यही चाहते हैं कि कोई भी मु झे न बुलाए और न मैं इस घर से बाहर कदम रखूं. बंधुआ मजदूर जैसी पूरी जिंदगी इसी तरह दिनरात चूल्हेचौके में पिसती रहूं. मु झे भी चेंज की जरूरत हो सकती है यह कोई भी नहीं सोचता,’’ मेरी आंखों में आंसू आ गए.

मेरे आंसू देखते ही अमर मु झे सम झाने लगे, ‘‘तुम ने घर को बहुत अच्छी तरह से संभाल लिया है कि सभी को तुम से उम्मीदें हो गई हैं. तुम्हारे जाने के बाद न तो समय पर नाश्ता मिलेगा न रात को ढंग का डिनर. मां से कुछ कह भी नहीं सकता. हर समय नाराज सी रहती हैं. काम का लोड जो ज्यादा हो जाता है उन पर. तुम्हारे आने के बाद से वे किचन में कम ही जाती हैं.’’

‘‘सुबह बताना था कि हमारा क्या प्रोग्राम बना है, भैया लेने आएंगे या इधर से कोई मुझे छोड़ने जाएगा. कितनी बार कहा, सीधी ट्रेन है लखनऊ की, मैं चली जाऊंगी, वहां भैया लेने आ जाएंगे पर कोई जाने ही नहीं देता. कहीं अकेले आनाजाना सीख गई तो जल्दीजल्दी न जाने लगूं.’’

सुबह हिम्मत कर के बाबूजी के साथ जा कर अमर ने मांजी से बात की, ‘‘जाने भी दो मां, कुछ दिनों की ही तो बात है. अर्चना, शोभा हैं, कामवाली है, सब काम हो ही जाएगा. आप ज्यादा टैंशन मत लो.’’

अमर बहुत ही कम बोलते थे. बीवी की तरफ से बोलते देख मांजी को गुस्सा आ गया, ‘‘बड़ा आया बीवी की तरफदारी करने वाला. मैं ने क्या मना किया है. उस का प्रोग्राम पक्का है, कौन सा मेरे रोकने से रुकने वाली है. तु झे जाना हो तो तू भी चला जा, देखती हूं कौन सा काम यहां रुक जाएगा,’’ मांजी ने यह कह कर धीरे से कहा, ‘‘जोरू का गुलाम कहीं का.’’

धीरे से कहे गए इन शब्दों को अमर ने सुन लिया. उन का सारा मूड खराब हो गया. बिना नाश्ता किए ही घर से चले गए.

संडे की सुबह भैया ने फोन करने को कहा था. सभी लोग घर पर ही थे. भैया ने फोन किया. रिंग पर रिंग बजे जा रही थी पर कौन उठाए? आखिर बाबूजी ने फोन उठाया. मेरे और अमर के जाने का प्रोग्राम पक्का कर दिया और दिन भी बता दिया. मांजी का चेहरा देखने लायक था. बाबूजी इस घर के बड़े थे, आखिरी फैसला उन्हें ही सोचसम झ कर लेना था. जिद्दी पत्नी से वे ज्यादा उल झते नहीं थे ताकि घर की शांति बनी रहे.

मांजी बाबूजी पर काफी बिगड़ीं, पर बाबूजी चुपचाप रहे. सभी काम तो चलते रहे पर 2 दिनों तक घर का वातावरण काफी बो िझल रहा. जाने का सारा उत्साह ही खत्म हो गया था. सारा काम खत्म कर रात को मैं अपनी पैकिंग करने लगी. कम से कम 15-20 दिनों के लिए आराम की जिंदगी गुजार सकूंगी. भैया, सपना भाभी, छोटा भतीजा सभी बहुत ध्यान रखते थे मेरा. जितने दिन रहती, मेरी ही पसंद का खाना बनता था. भाभी बाजार जातीं तो पूछतीं, मु झे कुछ चाहिए तो नहीं? साड़ी, शाल जिस भी चीज पर मैं हाथ रख देती, मु झे जबरन दिलवा देतीं, पैसे भी नहीं लेतीं. मायके में मां के बाद भैयाभाभी ही तो रह जाएंगे जो मु झे पूरी इज्जत दे सकते थे. ससुराल के तनाव से कुछ दिनों के लिए राहत मिल जाती थी.

2 दिन की छुट्टी कर के अमर मु झे ले कर लखनऊ पहुंचे. स्टेशन पर भैया गाड़ी ले कर पहले से ही हम दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे. छोटा भतीजा अभिषेक भी साथ था, कितना लंबा हो गया था. कितने दिनों बाद देख रही थी उसे. आधे घंटे में हम लोग घर आ गए. मां और भाभी मेरे और अमर के स्वागत में लगी हुई थीं. पूरा घर साफसुथरा लग रहा था. फ्रैश हो कर हम सभी ने साथ बैठ कर नाश्ता किया.

‘‘कितना कमजोर कर दिया है हमारी ननदरानी को आप ने,’’ भाभी ने अमर से मजाक करते हुए कहा.

‘‘पूरे किचन की मालिक तो ये ही हैं, अब डाइटिंग करें तो कोई क्या कर सकता है. हमें तो जो कुछ भी बना कर दे देती हैं, शरीफ पतियों की तरह चुपचाप खा लेते हैं,’’ अमर ने भी मजाक में जवाब दिया.

सभी के ठहाकों से घर गूंज उठा. अमर के घर में ऐसा वातावरण कहां मिलता था. हर वक्त सहमासहमा सा माहौल, बाबूजी भी बहुत नापतोल कर बोलते. मांजी के तेजतर्रार स्वभाव के कारण अकसर घर में बिना बात के क्लेश हो जाता था. अर्चना, शोभा जरूर अपने कालेज के किस्से सुनातीं तो थोड़ा हंसीमजाक हो जाता था, वे भी मां के सामने कुछ नहीं सुनातीं, पता नहीं कौन सी बात का वे क्या मतलब निकालने लगें? अभिषेक के टैस्ट चल रहे थे, इसलिए वह हमारे साथ नहीं जा रहा था. अमर को सुबह भैया स्टेशन छोड़ने निकल गए, हमें भी रात को निकलना था.

एक हफ्ता खूब मौजमस्ती से गुजार कर हम लोग लौट आए. भाभी ने जी खोल कर शिमला में शौपिंग की. सभी के लिए कुछ न कुछ उपहार ले कर आई थीं. मैं ने भी मांजी और बाबूजी के लिए शाल, अर्चना और शोभा के लिए आर्टिफिशियल इयर रिंग, आशु और अमर के लिए भी उपहार लिए थे. अब पता नहीं सब को पसंद आते हैं या नहीं? ज्यादा कीमती गिफ्ट खरीदने की गुंजाइश भी नहीं थी.

घूमने के बाद घर पहुंच कर थकान बहुत महसूस हो रही थी. हम सभी डिनर ले कर जल्दी ही सो गए. रविवार था इसलिए भैया, भाभी, अभिषेक देर तक सो रहे थे. मैं ने और मां ने साथ बैठ कर चाय पी.

कल मां से कोई बात भी नहीं हो पाई. थकान बहुत हो रही थी. मां ने प्यार से अपने पास बैठाया. कहने लगीं, ‘‘तेरी ससुराल में सब ठीक चल रहा है? अमर तेरा ध्यान तो रखते हैं न?’’ मेरे सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘तु झ से एक बात कहनी थी, बेटी. बुरा मत मानना. इस टूर पर तु झे ले जाने का सपना का बिलकुल मन नहीं था. दोनों में खूब बहस हुई, कह रही थी, शादी के बाद ऐसा चांस पड़ा है कि हम अकेले जाएं कहीं. आप ने बिना मु झ से पूछे दीदी का प्रोग्राम बना डाला. मेरे कान में जब बात पड़ गई तो मैं ने तु झे बताना जरूरी सम झा.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो, मां?’’ मैं बहुत हैरान थी, ‘‘भाभी ने तो हर समय मेरा बहुत ध्यान रखा, कहीं से भी नहीं लगा कि वे मु झे नहीं ले जाना चाहतीं थी अपने साथ.’’

‘‘विजय को पता है कि तू कहीं घूमने नहीं जा पाती, फिर अभिषेक भी नहीं जा रहा था, इसलिए उस ने सोचा कि उसी बजट में तेरा घूमना हो जाएगा. पर बहू को अच्छा नहीं लगा. तु झे बुरा तो लग रहा होगा पर आगे से इस बात का खयाल रखना. पहले नहीं बताया वरना घूमने का तेरा सारा मूड ही चौपट हो जाता,’’ मां कह रही थीं.

आंखें बंद कर मैं सोफे पर चुपचाप लेट गई. मां मेरी मनोदशा सम झती थीं, मु झे अकेला छोड़ वे अपने दैनिक काम निबटाने में लग गईं. यह दुनिया भी कितनी अजीब है, यहां हर इंसान एक चेहरे पर दूसरा चेहरा लगा कर घूम रहा है. भाभी ने एक अच्छी भाभी का रोल बखूबी निभाया. अगर मां ने नहीं बताया होता तो…पर मां ने सही समय देख मु झे सही राह दिखा दी ताकि उन के न रहने के बाद भी मेरा मायके में पूरा सम्मान बना रहे.

भैया तो मेरे अपने हैं पर भाभी तो और भी अच्छी हैं जिन्होंने इच्छा न होते हुए भी पूरे टूर पर यह एहसास भी नहीं होने दिया कि वे मु झे नहीं लाना चाहती थीं. मु झे अमर और उन के घर वालों से ये बातें छिपानी होंगी, कितनी मुसीबतों के बाद वहां से निकलना हो पाया था. पता होता तो प्रोग्राम बनाती ही नहीं. अब जो हुआ सो हुआ. सब की तरह मुझे अपने चेहरे पर एक और चेहरा लगाना होगा, मुसकराता, हंसता हुआ चेहरा जो बयां कर रहा हो कि मेरा यह सफर बहुत ही यादगार रहा है. अमर को भी यही बताऊंगी कि ये दिन बहुत ही हंसीखुशी से बीते, यानी चेहरे पर चेहरा.  Romantic Story In Hindi

Social Story : चिकित्सा – ज्योतिषी की बात को झुण्लाती एक मनोवैज्ञानिक की कहानी

Social Story : मैं कालेज से आ कर कपड़े भी नहीं उतार पाया था कि पत्नी ने सूचना दी, ‘‘सोमेश्वरजी को दिल का दौरा पड़ा है. घंटाभर पहले उन की पत्नी का मैसेज आया था.’’ सोमेश्वरजी मेरे घनिष्ठ मित्र हैं. मेरी और उन की अवस्था में 30 वर्ष का अंतर है. पर इस से हम लोगों की मैत्री में कभी बाधा नहीं पड़ी. व्यवसाय भी हम दोनों का भिन्न है. मैं अध्यापक हूं और वे आरएमपी डाक्टर. मैं इस नगर में आया, उस के 2 मास पश्चात ही मेरा उन से परिचय हो गया था. इस नगर का पानी मेरे अनुकूल नहीं था. मुझे भयानक पेचिश हुई. चिकित्सक उसे ठीक करने में विफल रहे. सभी ने एक ही सलाह दी, ‘चाय पियो या प्याज खाओ. तभी यहां का पानी अनुकूल आएगा.’ मैं दोनों में से एक भी काम नहीं कर सकता, इसलिए मैं ने यहां से जाने का निर्णय कर लिया.

तभी किसी ने मुझे सोमेश्वरजी के पास जाने की सलाह दी. सोमेश्वरजी की पहली ही गोली से मुझे फायदा होने लगा. यदि यह कहूं कि मैं इस नगर में सोमेश्वरजी की कृपा से ही हूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. यदि वे न होते तो मैं यहां से अवश्य चला गया होता. सोमेश्वरजी से मेरा परिचय घनिष्ठता में बदला और शीघ्र ही घनिष्ठता ने मित्रता का रूप ले लिया. इस बात से लगभग सारा नगर परिचित है कि जब मैं यहां होता हूं तो 4 बजे से 5 बजे तक सोमेश्वरजी के क्लीनिक पर अवश्य बैठता हूं. उस समय मेरा घर में मिलना असंभव होता है, इसलिए वहां से निराश हो कर लोग मुझे सोमेश्वरजी की दुकान पर ही खोजते हैं. इतनी घनिष्ठता होने के कारण सोमेश्वरजी के अस्वस्थ होने की बात से मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था. वैसे सोमेश्वरजी का अस्वस्थ होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. वे 70 साल की अवस्था में इतना अधिक परिश्रम करते थे कि उन्हें दिल का दौरा न पड़ना ही विचित्र बात जान पड़ती थी.

मैं ने उलटासीधा खाना खाया और सोमेश्वरजी के अस्पताल की ओर चल पड़ा. सोमेश्वरजी कमरे में लेटे हुए थे. कमरे के बाहर बहुत से लोग बैठे थे. डाक्टर ने उन के पास लोगों को जाने से मना कर दिया था. दरवाजे के बाहर उन की पत्नी के साथ दोनों पुत्रवधुएं चुपचाप आंसू बहा रही थीं. वातावरण अत्यंत शांत एवं करुण बना हुआ था. मेरे पहुंचते ही सोमेश्वरजी के बड़े लड़के ने मुझे प्रणाम किया और धीरे से किवाड़ खोल कर मुझे कमरे में ले गया. मैं एक कुरसी पर बैठ गया. मैं सोमेश्वरजी को देख रहा था और सोमेश्वरजी मुझे. डाक्टर ने उन्हें पूरा विश्राम करने की सलाह दी थी. उन्हें बोलने और उठनेबैठने की मनाही थी.

सोमेश्वरजी कुछ कहना चाह रहे थे, पर मैं ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. सहसा उन की दोनों आंखों से आंसुओं की बूंदें निकल पड़ीं, जो उन के मानसिक ताप की साक्षी थीं. मैं ने सोमेश्वरजी के समीप बैठ कर उन्हें समझाया, ‘‘आप निराश क्यों होते हैं? आप अवश्य ठीक हो जाएंगे. वैसे भी आप को घबराना नहीं चाहिए. आप अपने सभी उत्तरदायित्व पूरे कर चुके हैं.’’ मेरी बात का सोमेश्वरजी पर विशेष प्रभाव नहीं हुआ. तभी सूचना मिली कि डाक्टर साहब उन्हें देखने आए हैं. मैं कमरे से बाहर आ गया. डाक्टर साहब मेरे परिचित थे. उन्होंने कमरे में घुसने से पहले मुझे नमस्ते की. मैं कुछ पूछता, इस से पहले ही वे सोमेश्वरजी के कमरे में प्रवेश कर गए. डाक्टर साहब कुछ देर बाद बाहर निकले. उन के चेहरे पर असंतोष के भाव थे. मैं उन्हें भीड़ से एक ओर ले गया. सोमेश्वरजी का बड़ा लड़का भी मेरे साथ था. मैं ने डाक्टर साहब से पूछा, ‘‘कहिए डाक्टर साहब, मेरे मित्र के स्वास्थ्य में कुछ सुधार है?’’

डाक्टर साहब ने विवशता दिखाते हुए उत्तर दिया, ‘‘मैं ने बढि़या से बढि़या दवा दी है. दवा अपना काम कर रही है पर उतना नहीं जितना करना चाहिए.’’

‘‘दवा पूरा प्रभाव क्यों नहीं कर रही, उन्हें आप की इच्छा के अनुसार लाभ क्यों नहीं हो रहा?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

डाक्टर साहब कुछ देर तक सोचते रहे. उन के चेहरे पर अनिश्चितता के भाव छाए रहे. सहसा कुछ निश्चय सा कर के वे कहने लगे, ‘‘इन के मन में जीवन के प्रति आशा और उमंग बिलकुल नहीं है. ये समझ बैठे हैं कि इन की मृत्यु निश्चित है. इन के मन में निराशा समाई हुई है. जब तक ये मन से जीवन की अभिलाषा नहीं करेंगे तब तक दवा पूरा लाभ नहीं कर सकती. इन्हें जीवन के प्रति आशावान बनना पड़ेगा अन्यथा ये चल बसेंगे. अगर इन्होंने 4 दिन काट लिए तो इन के बचने की संभावना बढ़ जाएगी.’’

‘‘आप ने इन्हें जीवन के प्रति आशावान बनाने का प्रयत्न नहीं किया?’’ मैं ने डाक्टर साहब से अगला प्रश्न किया.

‘‘मैं केवल समझा सकता हूं, इन्हें तसल्ली दे सकता हूं. मैं ने इन्हें कई बार बताया है कि आप मरेंगे नहीं, आप अवश्य ठीक हो जाएंगे. पर इन के ऊपर कोई असर नहीं होता,’’ डाक्टर साहब ने उदासीनतापूर्वक उत्तर दिया. मेरे मुख पर हलकी सी मुसकराहट दौड़ गई. मैं ने डाक्टर साहब को विश्वास दिलाते हुए कहा, ‘‘आप इन्हें दवा दीजिए. इन के मन में जीवित रहने वाली भावना जगाने का प्रबंध मैं कर दूंगा.’’ पर उन के चेहरे से ऐसा लगा जैसे वे न तो मेरी बात समझे हैं और न ही मेरी बात पर उन्हें विश्वास हो रहा है. उन्हें शायद दूसरा मरीज देखने जाना था, इसलिए बात अधिक न बढ़ा कर चले गए. मैं सोमेश्वरजी की कमजोरी जानता था. वे अंधविश्वास में ज्यादा भरोसा करते थे. वे ज्योतिषियों पर बहुत विश्वास करते थे. मुझे शंका हुई कि अवश्य किसी ज्योतिषी ने उन की मृत्यु की भविष्यवाणी कर दी है, इसीलिए वह अपने जीवन की समाप्ति का विश्वास कर के मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

सोमेश्वरजी के क्लीनिक पर एक लड़का नौकर था, जो दवाएं उठाउठा कर देता था. सोमेश्वरजी कुरसी पर बैठे रहते थे. वे जिस दवा का नाम लेते थे, लड़का उसी की शीशी अलमारी से निकाल कर सोमेश्वरजी के सामने रख देता था. काम हो जाने पर शीशी को अलमारी में रखना भी उसी का काम था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या, कुछ दिन पहले डाक्टर साहब के पास कोई ज्योतिषी आया था?’’

‘‘आया था. डाक्टर साहब ने अपनी जन्मपत्री भी उसे दिखाई थी,’’ लड़के ने उत्तर दिया.

मैं ने लड़के से अगला प्रश्न किया, ‘‘तुम्हें ध्यान है कि उस ने डाक्टर साहब को क्या बातें बताई थीं?’’

लड़का याद करता हुआ बोला, ‘‘बातें तो उस ने बहुत सी बताई थीं, पर मुझे तो एक ही बात याद है. उस ने कहा था कि आप की मृत्यु शीघ्र ही होने वाली है.’’ मैं ने जो अनुमान किया था वह सत्य निकला. डाक्टर साहब का बड़ा लड़का घबरा कर मुझ से पूछने लगा, ‘‘अब क्या होगा, शास्त्रीजी? लगता है, पिताजी अब नहीं रहेंगे. उस ज्योतिषी की बात इन के मन में बैठ गई है.’’ मैं ने सोमेश्वरजी के बड़े लड़के को आश्वासन दिया और सोचने लगा, विष को विष ही काटता है. कांटे से ही कांटा निकाला जा सकता है. यदि कोई ज्योतिषी विश्वास दिलाए तो सोमेश्वरजी जीवन के प्रति आशावान बन सकते हैं. पहले तो मैं ने सोचा कि उसी ज्योतिषी को बुला कर लाया जाए और उस से कहलवा दिया जाए कि उस ने जो कुछ बताया था, वह झूठ था. तभी मुझे ध्यान आया कि अब डाक्टर साहब उस की बात पर विश्वास नहीं करेंगे. वे समझ जाएंगे कि इस ने पहले तो ठीक बात बताई थी, अब वह किसी के कहने पर झूठ बोल रहा है. मैं ने किसी अन्य ज्योतिषी को बुला कर सोमेश्वरजी को जीवन की आशा दिलाने की बात सोची. पर कुछ देर में यह विचार भी मुझे लचर जान पड़ा. यह आवश्यक नहीं है कि वे एक ज्योतिषी के कहने से दूसरे की बात झूठ मान लें.

इसी समय मेरा ध्यान हस्तरेखा देख कर भविष्य बताने वालों की ओर चला गया. समीप ही ग्वालियर है. वहां अकसर हस्तरेखा विशेषज्ञ आते रहते हैं. उन के विज्ञापन समाचारपत्रों में निकलते हैं. मैं ने ग्वालियर से निकलने वाला एक दैनिक पत्र उठा कर देखा. उस में एक इसी प्रकार का विज्ञापन निकला था. मैं ने तुरंत मोबाइल से ग्वालियर फोन किया और उन्हें सारी स्थिति समझाई.

वे कहने लगे, ‘‘यह तो असत्य भाषण है. मुझ से यह नहीं हो सकेगा.’’

मैं ने उन्हें लालच देते हुए बताया, ‘‘मैं आप को 5 हजार रुपए दे सकता हूं. आप को आनेजाने में विशेष समय नहीं लगेगा. वहां तो केवल 10 मिनट का काम है. आप को केवल 2 बातें कहनी हैं. एक तो हस्तरेखा विज्ञान को ज्योतिष से श्रेष्ठ सिद्ध करना है, दूसरे, सोमेश्वरजी के कई वर्ष जीवित रहने की बात कहनी है.

‘‘रही झूठ बोलने की बात. यदि आप ने कभी भी झूठ नहीं बोला हो तो आज भी मत बोलिए. यह भी तो संभव है कि सोमेश्वरजी के हाथ की रेखाएं अभी उन के जीवित रहने का संकेत कर रही हों. वैसे भी किसी इंसान से जीवनरक्षा के लिए मन रखने वाली बात कह दी जाए तो मैं कुछ बुरा नहीं समझता.’’ लगता था हस्तरेखा विशेषज्ञ महोदय 2-5 हजार रुपए का लालच नहीं छोड़ सके. वे मेरे साथ चले आए. मैं उन्हें सोमेश्वरजी के कमरे में ले गया तो मेरे सिखाए अनुसार उन के बड़े लड़के ने हस्तरेखा विशेषज्ञ की ओर संकेत कर के पूछा, ‘‘शास्त्रीजी, ये सज्जन कौन हैं? मैं ने इन्हें पहले कभी नहीं देखा.’’

मैं ने उत्तर दिया, ‘‘तुम इन्हें देखते कहां से, ये यहां के रहने वाले नहीं हैं. ये प्रसिद्ध हस्तरेखा विशेषज्ञ हैं जो ग्वालियर के गूजरी महल में ठहरे हैं. यहां तहसीलदार साहब के घर आए थे. वहां से मैं इन्हें ले आया हूं सोमेश्वरजी का हाथ दिखाने.’’ हस्तरेखा विशेषज्ञ को अपने सामने बैठा जान कर सोमेश्वरजी अपना भविष्य जानने की अभिलाषा न रोक सके. उन्होंने अपना दायां हाथ धीरे से आगे बढ़ा दिया. मैं ने सोमेश्वरजी के विषय में जो कुछ बताया था, उसी के आधार पर हस्तरेखा विशेषज्ञ ने उन का भूतकाल इस प्रकार ठीकठीक बता दिया, जैसे खुली हुई किताब पढ़ रहे हों. उन बातों से सोमेश्वरजी पर उन का पूरा विश्वास जम गया.

मैं ने हस्तरेखा विशेषज्ञ से सोमेश्वरजी की आयु के विषय में पूछा तो उन्होंने सीधे हाथ की चारों उंगलियों को एकएक कर के हथेली पर मोड़ा और आत्मविश्वास के साथ कहने लगे, ‘‘इन की आयु 80 वर्ष है. इस से पहले इन की मृत्यु नहीं हो सकती.’’ सोमेश्वरजी चुप नहीं रह सके और धीरे से बोले, ‘‘मगर कुछ दिन पहले एक ज्योतिषी ने मेरी जन्मपत्री देख कर बताया था कि मैं 1 महीने से अधिक नहीं जी सकता. मुझे मारकेश लग चुका है.’’

हस्तरेखा विशेषज्ञ यह बात सुन कर जोश से भर गए और आत्मविश्वास के साथ कहने लगे, ‘‘जन्मपत्री और हस्तरेखाओं का अंतर आप समझ लेंगे तो मेरी बात ही आप को ठीक लगेगी. जन्मपत्री जन्मकाल के आधार पर बनाई जाती है. गांव के लोग बच्चे के जन्म का समय ठीक नहीं बता पाते, क्योंकि वहां सभी परिवारों में घडि़यां नहीं होतीं. यदि घड़ी हो तब भी समय में थोड़ाबहुत अंतर पड़ जाता है, क्योंकि अधिकांश घडि़यां थोड़ीबहुत आगेपीछे रहती हैं. ज्योतिष के 2 अंग हैं, गणित और फलित. गणित के आधार पर ज्योतिषी फलित के रूप में भविष्यवाणियां करते हैं. जन्मकाल ठीक ज्ञात न होने से गणित में अंतर पड़ जाता है और जन्मपत्री की घटनाएं सही नहीं बैठ पातीं. हस्तरेखाओं के विषय में ऐसी कोई बात नहीं है, उन्हें कभी भी देखा जा सकता है.’’ हस्तरेखा विशेषज्ञ की लंबीचौड़ी बातें सुन कर सोमेश्वरजी ज्योतिष की अपेक्षा हस्तरेखा विज्ञान को श्रेष्ठ समझने लगे हैं, ऐसा उन के चेहरे से लग रहा था. शीघ्र ही सोमेश्वरजी के मुख पर फिर शंका की भावना जगी और वे धीरे से बोले, ‘‘आप की बात ठीक होगी पर मुझे तो ऐसा लगता है कि मेरा अंतिम समय आ गया है.’’

सोमेश्वरजी की बात सुनते ही हस्तरेखा विशेषज्ञ की घनी भौंहें तन गईं. वह आत्मविश्वासपूर्वक बोले, ‘‘अधिक बात तो मैं नहीं कहता, पर आप के जीवन के प्रति मैं शर्त लगा सकता हूं. अभी तो आप को चारों धामों की तीर्थयात्रा करनी है. अगर 80 वर्ष से पहले आप की मृत्यु हो जाए तो मैं हस्तरेखा देखने का काम छोड़ दूंगा.’’ सोमेश्वरजी को हस्तरेखा विशेषज्ञ पर पक्का विश्वास हो गया. उन के चेहरे की उदासी मिट गई और वहां आशा का प्रकाश झलकने लगा. हस्तरेखा विशेषज्ञ बाहर निकले तो मैं ने सफल अभिनय के लिए उन की प्रशंसा की तथा 5100 रुपए दिए. 100 रुपए अभिनय का इनाम था. धीरेधीरे सोमेश्वरजी की दशा सुधरने लगी. अगले दिन डाक्टर साहब उन्हें देख कर बाहर निकले तो कहने लगे, ‘‘इन की हालत में जमीनआसमान का अंतर है. आप ने कमाल कर दिया है?’’

मैं ने डाक्टर साहब को सब बातें बताईं तो वे चकित रह गए. जब सोमेश्वरजी पूरी तरह से ठीक हो गए तो मैं ने उन्हें सारी बातें बता दीं. उस के बाद से सोमेश्वरजी ने ज्योतिष वगैरह में न सिर्फ विश्वास करना छोड़ दिया बल्कि दूसरे लोगों को भी इस तरह की फुजूल बातों पर विश्वास न करने की हिदायत देने लगे. इस बात को 8 वर्ष हो गए हैं. सोमेश्वरजी अपना काम पहले के समान ही परिश्रम और लगन के साथ कर रहे हैं. Social Story

Family Story In Hindi : मेरा घर – क्या मां काव्या को उसके बर्थ डे का गिफ्ट दे पाई ?

Family Story In Hindi : स्पीच के बाद कुछ लोगों से मिलने के उपरांत स्मिता ने जैसे ही प्लेट उठाई, पीछे से एक धीमी, चिर परिचित आवाज आई, जिसे वह वर्षों पहले भूल चुकी थी-‘‘हैलो स्मिता ‘‘.

यह सुनते ही स्मिता चैंक कर मुड़ी, तो सामने रुद्र था. वह बोला, ‘‘कैसी हो स्मिता? अब तो घर लौट आओ, प्लीज…‘‘

रुद्र को इतने सालों बाद अपने सामने देख स्मिता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो, उस के जख्म फिर हरे हो गए और वह समारोह बीच में ही छोड़ वहां से निकल गई. सारे रास्ते वह विचारों में खोई रही. इतने सालों बाद रुद्र का इस प्रकार उस के समक्ष आना और घर वापस चलने को कहना, उस का मन कंपित हो उठा.   

समारोह में सम्मिलित सभी गणमान्य और प्रतिष्ठित लोगों के बीच केवल एक ही नाम की चर्चा थी और वह नाम था स्मिता, जो एक बिजनेस टायकून और ‘‘फैशन… द रिवौल्यूशन‘‘ कंपनी की मालकिन थी. हर कोई उसे देखने और सुनने को आतुर था, क्योंकि आज का यह समारोह स्मिता को सम्मानित करने के लिए आयोजित किया गया था. आज स्मिता को बिजनेस वुमन औफ द ईयर से सम्मानित किया जाना था. सभी की निगाहें स्मिता पर ही टिकी हुई थी.

स्मिता के सशक्त और भावपूर्ण उद्बोधन के पश्चात भोज का भी प्रावधान रखा गया था, जब रुद्र उसे मिला था.

घर पहुंचते ही वह सीधे अपने कमरे में जा, सारी बत्तियां बुझा आरामकुरसी पर बैठ कर झूलने लगी. वह रुद्र और अपने जीवन के उन पन्नों को पलटने लगी, जिन पन्नों को वह अपने जीवनरूपी किताब से हमेशा के लिए फाड़ कर फेंक देना चाहती थी, पर वह ऐसा कर न सकी, क्योंकि इस अध्याय से उसे काव्या जैसे अनमोल मोती की प्राप्ति भी हुई थी, जिस की रोशनी आज भी उस के जीवन को जगमगा रही है.

‘‘स्मिता, तुम अपनी यह कंपनी ‘‘फैशन….द रिवौल्यूशन‘‘ बंद क्यों नहीं कर देती? क्या जरूरत है तुम्हें अपनी यह छोटी सी कंपनी चलाने की‘? जब मेरा खुद का इतना बड़ा बिजनेस है.’’

‘‘नहीं रुद्र, नहीं, यह कंपनी मेरा सपना है, इसे मैं ने अपनी कड़ी मेहनत से खड़ा किया है और फिर मैं इसे शादी के पहले से रन कर रही हूं और उस वक्त तो तुम्हें इस बात से कोई एतराज भी नहीं था, फिर आज ऐसा क्या हुआ कि तुम मुझे कंपनी बंद करने को कह रहे हो और फिर मैं घर पर बैठ कर करूंगी क्या…?‘‘

‘‘क्या मतलब… करूंगी क्या?’’

‘‘इतनी सारी औरतें घर पर बैठ कर क्या करती हैं? अपना घर संभालती हैं, पूजापाठ करती हैं, किटी पार्टी करती हैं, तुम भी वही करो,‘‘ रुद्र ने गुस्से से कहा.

स्मिता घर पर किसी तरह का कोई झगड़ा नहीं चाहती थी, इसलिए वह शांत भाव से बोली, ‘‘रुद्र, मैं फैशन डिजाइनिंग में बीई हूं. मुझे ये पूजापाठ, सत्संग में कोई दिलचस्पी नहीं है और मैं जब घर बहुत अच्छी तरह से संभाल रही हूं, तो फिर मैं अपनी कंपनी क्यों बंद करूं.’’

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र का गुस्सा ज्वालमुखी की तरह फूट पड़ा और चीखते हूए कहने लगा, ‘‘तुम इस दुनिया की कोई पहली फैशन डिजाइनिंग में बीई या पढ़ीलिखी औरत नहीं हो, मां को देखो, वे अपने समय की ग्रेजुएट हैं, लेकिन उन्होंने अपना सारा जीवन इस चारदीवारी में पूजापाठ और सत्संग में गुजारा है. कभी इस तरह के प्रपंच में वे नहीं पड़ी हैं और न ही तुम्हारी तरह पापा के संग बातबात पर तर्क करती थीं, ऐसी होती है आदर्श नारी, तुम्हारी तरह बदजबान नहीं,’’ ऐसा कहता हुआ रुद्र चला गया.

स्मिता जड़वत सी खड़ी रही. उस की जबान पर यह बात आ कर ठहर गई कि मां ग्रेजुएट नहीं पोस्ट ग्रेजुएट हैं और वह भी संगीत विश्वविद्यालय से, लेकिन मां ने शादी के बाद गाना तो दूर वह अपने दिल के जज्बात भी कभी किसी से बयां नहीं कर पाई, क्योंकि हमारा घर, हमारा समाज, पुरूष प्रधान है, जहां एक स्त्री को अपने मन के भावों को व्यक्त करने का कोई अधिकार नहीं, तभी मां ने स्मिता के कंधे पर धीरे से अपना हाथ रखा, तो वह मां के गले लग बिफर कर रो पड़ी.

रिश्तों में विभाजन की सीलन और गंध बढ़ती जा रही थी, रोज रुद्र कोई न कोई बहाने बना कर घर को कुरुक्षेत्र बनाने पर आमादा रहता. स्मिता घर और अपने बिखर रहे रिश्ते को समेटने का असफल प्रयास करने लगी.

अचानक कुछ समय बाद रुद्र में आ रहे परिवर्तन से स्मिता चकित थी. उसे ऐसा महसूस होने लगा कि रुद्र एकाएक उस के प्रति केयरिंग और कुछ बहुत ज्यादा ही कन्सर्न रहने लगा है, जिस का कारण उस की समझ से परे था.

सहसा एक दिन रुद्र स्मिता को अपनी बाहों के घेरे में लेते हुए कहने लगा, ‘‘स्मिता, मैं चाहता हूं कि अब हमें 2 से 3 हो जाना चाहिए. अब परिवार को बढ़ाने का समय आ गया है.’’

यह सुन स्मिता हैरान रह गई, अपनेआप को रुद्र से अलग करती हुई बोली, ‘‘रुद्र, इतनी जल्दी क्या है? शादी को अभी केवल सालभर ही तो हुआ है. अभी तो मुझे अपनी कंपनी को विस्तार देने का समय है और मुझे यह मौका भी मिल रहा है. मैं अभी 1-2 साल बच्चे के लिए तैयार नहीं हूं.‘‘

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र स्मिता पर बरस पड़ा. रोजरोज के क्लेश से बचने और अपना घर बचाने के लिए स्मिता ने हार मान ली. परिवार बढ़ाने के लिए वह राजी हो गई और फिर काव्या जैसी परी स्मिता की गोद में आ गई, जिस से स्मिता की जिम्मेदारी में बढ़ोतरी के साथ उस की दुनिया खुशियों से भी भर गई.

लेकिन रुद्र के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया, बल्कि अब वह बारबार काव्या और उस की देखभाल को ले कर स्मिता से झगड़ता, उसे अपनी कंपनी बंद करने को कहता, और स्वयं काव्या की जिम्मेदारी संभालने से पीछे हट जाता.

मां यदि कुछ कहतीं या स्मिता का पक्ष लेतीं तो वह मां को भी झिड़क देता. यह देख मां चुप हो जातीं. स्मिता अब समझ चुकी थी क्यों रुद्र को परिवार बढ़ाने की जल्दी थी? असल में वह मातृत्व की आड़ में स्मिता की प्रगति पर अंकुश लगाना चाहता था.

स्मिता घर, परिवार और बेटी काव्या के उत्तरदायित्व के साथ ही साथ  बिजनेस भी बखूबी संभाल रही थी. व्यापारी वर्ग में स्मिता अपनी पहचान और एक विशेष स्थान बनाने में कामयाब होने लगी थी, जो रुद्र और उस के पुरुषत्व को नागवार गुजरने लगा और एक दिन रुद्र बेवजह अपना फ्रस्ट्रेशन, अपनी नाकामयाबी पर अपने पुरुषत्व और अहम का रंग चढ़ा स्मिता से कहने लगा, ‘‘अगर तुम्हें कुछ करने का इतना ही शौक है तो छोटीमोटी कोई टाइमपास 9 से 5 बजे वाला जाब क्यों नहीं कर लेती? क्या जरूरत है इस कंपनी को चलाने की. और सुनो, कंपनी का नाम ‘‘द रिवौल्यूशन’’ रखने से कोई रिवौल्यूशन नहीं होने वाला समझी…

‘‘ये मेरा घर है और यदि तुम्हें इस घर में रहना है तो मेरे अनुसार रहना होगा, वरना इस घर से निकल जाओ.’’

यह सुनते ही स्मिता के सब्र का बांध टूट गया और उस ने आज रुद्र को समझाने की कोई कोशिश नहीं की. उस ने केवल इतना कहा, ‘‘यदि यह घर सिर्फ तुम्हारा है और मुझे इस घर में रहने के लिए कठपुतली की तरह तुम्हारे इशारों पर नाचना होगा तो बेहतर है कि मैं अभी इसी वक्त यह घर छोड़ दूं,’’ इतना कह कर स्मिता ने काव्या के संग उस रात घर छोड़ दिया और मां भी स्मिता के साथ हो लीं.

सारी रात स्मिता अतीत की काली स्याही में डूबी रही. दरवाजे पर हुई आहट से वह यथार्थ में लौटी.

‘‘मैडम, आप की कौफी…‘‘ स्मिता की मेड ने कहा.

‘‘हूं…. यहां रख दो. काव्या और मां जाग गए?‘‘ स्मिता ने अपनी मेड से पूछा. पूरी रात जागने की वजह से स्मिता की आंखें लाल और स्वर में थोड़ा भारीपन था.

मेड ने बड़े अदब से दोनों हाथों को बांधे और सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, मांजी को काफी समय हो चुका जागे. उन के स्टूडेंट्स भी आ गए हैं और मांजी संगीत की क्लास ले रही हैं, और काव्या बेबी सो रही है.‘‘

‘‘ठीक है, तुम जाओ,‘‘ कह कर स्मिता अपनी कौफी खत्म कर काव्या के कमरे में जा कर वहां सो रही काव्या के सिर और बालों में अपनी उंगलियां फेरती और उस के माथे को चूमती हुई बोली, ‘‘हैप्पी बर्थ डे टू माई डियर स्वीट हार्ट. आज मेरी डौल को उस के एटिन्थ बर्थ डे पर क्या चाहिए.‘‘

काव्या स्मिता से लिपटती हुई बोली, ‘‘मम्मा… मुझे मेरी कंप्लीट फैमिली चाहिए. मैं चाहती हूं कि पापा भी हमारे साथ रहें.‘‘

तभी स्मिता का फोन बजा. फोन रुद्र का था. स्मिता के फोन रिसीव करते ही रुद्र बोला, ‘‘आई एम सौरीस्मिता, मैं बहुत अकेला हो गया हूं. तुम सब प्लीज घर लौट आओ.‘‘

स्मिता ने सौम्य भाव से कहा, ‘‘रुद्र, मैं तुम्हें माफ कर सकती हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है कि मैं तुम्हारे घर आ कर नहीं रहूंगी, तुम्हें मेरे घर आ कर हम सब के साथ रहना होगा.‘‘

रुद्र खुशीखुशी मान गया और कहने लगा, ‘‘तुम सब के चले जाने के बाद ही मुझे यह एहसास हुआ कि ईंटपत्थरों से बनी इस चारदीवारी में मेरा घर नहीं हैं, जहां तुम सब हो, जहां मेरा पूरा परिवार रहता है, वही मेरा घर है.  Family Story In Hindi 

Social Story In Hindi : मखमली दंश

Social Story In Hindi : आज फिर बसंती बुआ का मन रहरह कर घबरा रहा था. कमरे की छोटी सी खिड़की से वह आसमान की ओर नजरें टिकाए खड़ी थी. बिजली कौंध रही थी. जैसे ही बादलों की गरजती आवाज धरती से टकराती तो उन के कलेजे को चीर जाती. किसी अनहोनी का डर उन्हें अंदर तक हिला देता. अपने सपनों का गांव उन्हें किसी भूतिया गांव सरीखा लगता.

पलभर में बूढ़ी आंखें बहुत दूर तक पहुंच जातीं. क्या कुछ नहीं था उन के जीवन में…पिताजी भले ही खेतीबाड़ी करने वाले अनपढ़ इंसान थे, लेकिन व्यावहारिक बुद्धि में पढ़ेलिखों से ज्यादा विवेकशील और समझदार. बचपन में नहीं पढ़ सके तो क्या, समय के साथसाथ कानूनी मसलों में भी विशेषज्ञता हासिल कर ली थी उन्होंने. और जहां गांव की लड़कियों की शादी 15-16 साल में कर दी जाती, वहां उन्होंने अपनी बेटी बसंती की शादी 21 साल होने के बाद ही की.

वे देशभक्ति से ओतप्रोत व्यक्ति थे इसलिए 24 साल का युवा सेना में लांस नायक हरिवीर उन्हें अपनी बेटी बसंती के लिए पसंद आ गया था. भले ही उस का घर टिहरी में था, जो समय की नजाकत को समझते हुए उस वक्त चमोली जिले से काफी दूर लगता था क्योंकि आवाजाही के साधन कम थे. आज की तरह हर घर में वाहन कहां थे, सड़कों का जाल भी आज की तरह नहीं बिछा हुआ था. बसंती की जवानी के दिनों में तो एक संकरी सङक हुआ करती थी, जिस के एक तरफ ऊंचेऊंचे पहाड़ और दूसरी तरफ नदी बहती थी. इक्कादुक्का बसें होती थीं लेकिन बहुत ही संभल कर चलना होता था. जरा सी चूक हुई तो नदी में समा जाने का डर रहता था.

बसंती की मां उसे इतनी दूर भेजने को तैयार नहीं थीं. उन का सोचना था कि आसपास के किसी गांव में ही बेटी को ब्याह दिया जाय ताकि समयसमय पर मिलती रहेंगी पर पिता दूरदर्शी थे. हालांकि प्रदेश की राजधानी तब लखनऊ थी लेकिन देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार सरीखे शहर तब भी उन्नत और सुविधा संपन्न ही थे और टिहरी से देहरादून की दूरी बहुत अधिक नहीं.

बसंती शादी के बाद ससुराल चली गई. लगभग 18 महीने हुए थे. वह 3-4 महीने की गर्भवती थी. तभी टिहरी में भागीरथी और तेलंगाना नदी के संगम पर बांध का निर्माण शुरू हो गया था. बहुत सारे गांवों के डूब क्षेत्र में आने का डर था इसलिए वक्त की नजाकत को देखते हुए लोगों को विस्थापित करने का काम शुरू कर दिया गया था. हालांकि गांव के लोगों ने इस परियोजना के विरोध में अहिंसात्मक आंदोलन चलाया लेकिन आम लोगों की एक न चली. बांध का निर्माण होना तय था. यह परियोजना का आखिरी चरण में था.

यों विचार तो आजादी पाने के 15 साल बाद ही शासन के मन में आ गया था. बस, योजना को पंख नहीं लग पा रहे थे. मंजूरी में कोई न कोई व्यवधान आ ही जा रहा था. वर्षों लग गए थे लोगों को समझाने, मनाने, डराने और अपनी जड़ों से तोड़ कर अलहदा बसाने में. आखिरकार, पुराने शहर की कोख से एक नए शहर का जन्म हुआ पर इस प्रक्रिया में पुराना शहर झील में समा कर अपने अस्तित्व को खो बैठा था.

बसंती के सासससुर भी आखिरी समय तक डटे रहे. लेकिन आखिरकार उन के लिए हटना जरूरी हो गया था. गर्भावस्था के आखिरी समय में बसंती बूढ़े सासससुर के साथ कहां जाती? पति उस वक्त सिक्किम में पोस्टेड थे. बसंती बुआ के पिताजी ऐसे समय में संकटमोचन बन कर आए. गांव में उन के 2 घर थे. दुश्वारी के इन पलों में उन्होंने अपनी बेटी को ही नहीं बल्कि उस के बूढ़े सासससुर को भी अपने घर में आश्रय देने का निश्चय किया क्योंकि कुछ लोगों को वहीं शहर के दूसरे छोर में तो कुछ लोगों को देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार के आसपास जमीन आवंटिन की जा रही थी. हमेशा गांव में रहे बसंती बुआ के सासससुर ने वहां जाने से बिलकुल मना कर दिया था. वे आखिरी समय तक अड़े रहे.

आंदोलन अपनी जगह था पर कंपनी ने निर्माण कार्य शुरू कर दिया था. पानी भरना और झील का बनना जारी था. कई मकान जबरन खाली करवा दिए गए और कई लोगों ने खुद ही डर से खाली कर दिए. धीरेधीरे कई गांव डूब क्षेत्र में आ गए और पुरानी टिहरी का घंटाघर भी इस की भेंट चढ़ गया। विस्थापित लोगों को आननफानन में धनराशि दी गई ताकि वे सुरक्षित जगहों में अपने मकानों का निर्माण कर सकें।

बसंती के पिताजी टिहरी पहुंच गए थे. उन्होंने बसंती के ससुर से विनती की कि अपनी बहू की खातिर वे लोग उन के साथ चमोली चलें. ऐसी हालत में यहां रहना खतरे से खाली नहीं. लेकिन सामाजिक रस्मोंरिवाज को ध्यान में रखते हुए शायद बसंती के ससुर ऐसा करने के लिए राजी नहीं थे. ‘समाज क्या कहेगा’ वाली बात सब से पहले सामने आ रही थी. लोग भी तो कहते न कि बहू को मायके जा कर रहना पड़ रहा है.

बसंती के पिता अपने समधी की इस कश्मकश को समझ रहे थे,”कुछ मत सोचो ठाकुर साहब, यह परिस्थिति की मांग है. सबकुछ ठीक हो जाने पर आप अपने घर लौट जाएंगे. अभी नया घर बनने में काफी समय लगेगा. जाड़ों का मौसम आ रहा है. कहां रहेगी बसंती नवजात के साथ?”

अपनी बेटी की फिक्र करना हर मातापिता के लिए जायज है और बसंती के ससुर ने इस बात का बुरा भी नहीं माना,”आप से एक विनती करता हूं, राणाजी कि बसंती को कुछ समय के लिए आप अपने साथ ले जाएं. आप सही कह रहे हैं कि यहां पर इस के और नवजात के लिए बहुत मुश्किल हो जाएगी. हम लोग अपना कुछ न कुछ इंतजाम देख लेंगे और फिर सब कुछ सामान्य होने पर बसंती को लेने मैं खुद आ जाऊंगा.”

काफी आग्रह करने के बावजूद भी बसंती के ससुर उस के पिता के साथ चलने को तैयार नहीं हुए. आखिर थकहार कर राणाजी बसंती को ले कर अपने गांव वापस लौट आए. बसंती की सास ने देहरादून में आवंटित जमीन में मकान बनवा कर रहने से बिलकुल ही इनकार कर दिया. पैसा बड़े बेटे के अकाउंट में ट्रांसफर करवा दिया था. लोगों ने समझाया भी कि बड़ा शहर है, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं भी सबकुछ वहां पर हैं पर वह टस से मस नहीं हुए।

नगर के ऊंचाई वाले क्षेत्र में नया टिहरी बस कर तैयार हो रहा था. उन्होंने अपने किसी करीबी रिश्तेदार के मकान में ही 2 कमरे किराए पर ले कर वहीं समय गुजारने की ठान ली. बसंती की सास रोज टकटकी लगा कर खिड़की से झील के पानी को देखती, जहां उस का घर समाधिस्थ हो गया था. झील में अब इक्कादुक्का नावें तैरतीं दिखाई देतीं. 24 सौ मेगावाट की जल विद्युत परियोजना के निर्माण के लिए बनाए गए इस डैम में लगभग 40 गांव डूब गए थे और 80 के लगभग गांव आंशिक रूप से प्रभावित हुए थे.

इधर बसंती के पिता के गांव में कामचलाऊ सबकुछ था. खेती, अनाज, कुछ जानवर जिस के बल पर यहां के गांव आबाद थे वरना तो पलायन की मार ने दूरदराज के गांवों को अपनी चपेट में ले लिया था. लेकिन स्वास्थ्य सुविधा नहीं के बराबर थी. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की मदद से तय समय पर बसंती ने एक बेटे को जन्म दिया. 2-3 दिन पहले उस के पति हरिवीर भी 1 महीने की छुट्टी ले कर आ गए थे.

समय का कुचक्र ऐसा चला कि गंगोत्री यात्रा के दौरान एक दुर्घटना में कई दूसरे श्रद्धालुओं के साथसाथ बसंती के सासससुर भी मारे गए. ससुराल की तरफ से बसंती अनाथ हो गई. प्रेम रखने वाले सासससुर ही नहीं रहे तो क्या करती, पलट कर कभी टिहरी की तरफ नहीं गई. वहां न घर, न कोई परिवार का सदस्य. कुछ सालों में पुत्री और पुत्र के रूप में 2 संतानें और हुईं. ये तीनों ही अपने नाना के घर में ही पल कर बड़े हुए.
बसंती के जेठ रिटायर हो कर शहर से गांव आ गए थे और उन्होंने आवंटित भूमि में मकान बना लिया. ऐसा करते समय बसंती के पति से राय लेनी जरूरी नहीं समझी और और न ही उन को हिस्सेदार बनाने की कोई पहल की. हरिवीर भी सोचते रहे कि बड़ा भाई है, जब जरूरत होगी हमारा हिस्सा दे देगा. बसंती मायके में ही रह गई. 45 साल की उम्र में उस के पति भी सेना से रिटायर हो कर आ गए थे.

आवंटित भूमि में 2 कमरे बनाने की चाह रखते हुए बड़े भाई से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. फिर वे भी चमोली जिले में ही चले आए. 3 बच्चों में से 2 ऋषिकेश और दिल्ली में छोटीछोटी नौकरी करते थे जबकि बेटी का ससुराल पौड़ी श्रीनगर के पास ही कीर्ति नगर में था.

युवा बसंती अब बूढ़ी हो चली थी. गांवभर की बसंती बुआ थी वह. बुआ ने अपनी तमाम उम्र इसी गांव में काट दी थी. पिता का घर छोड़ कर अब उन्होंने इसी गांव में कुछ दूरी पर अपना छप्पर डाल लिया था.

बसंती बुआ के पिता अपने दामाद हरिवीर को बताते, “पहले तिब्बत से व्योपार होता था. धीरेधीरे सब खत्म हो गया। विकास की होड़ ने नदी, नाले, पहाड़ किसी को भी नहीं बख्शा.”

जहां तक नजर पड़ती, मखमली हरियाली और हरेभरे पर्वतों के बीच से कलकल बहते झरनों का कदमकदम पर आत्मसात होता. पर्यटक मंत्रमुग्ध थे. मैदानी क्षेत्रों में इन दिनों गरमी भी तो बहुत बढ़ गई थी. आजकल पैसे की कमी तो नहीं सब के पास अपने वाहन हैं. नहीं तो 20-25 सीटर टूरिस्ट बस भी तो है. 2-4 परिवार मिलजुल कर इन्हें बुक करा कर निकल पड़ते हैं पहाड़ की शांत व सुंदर वादियों की ओर।

टूरिस्ट सीजन चल रहा था. सालभर यही 2-4 महीने कमाई के होते. वरना तो सन्नाटा पसरी रहती इस पूरे इलाके में. बर्फबारी होने के दौरान लोग सुरक्षित जगहों में चले जाते थे. पूरे जिले में चल रहा तमाम अनियंत्रित निर्माण कार्य संवेदनशील लोगों के माथे पर बल लाने के लिए काफी था. बसंती बुआ के पिता यह सब देखदेख कर हैरानपरेशान होते लेकिन उन की कौन सुनता. हर किसी को स्टे होम या होटल बना कर इनकम बढ़ाने का सुरूर चढ़ गया था. लोगों ने अपने घरों को थोड़ा विस्तार दे कर उसी में होमस्टे खोल दिए थे. कुछ निर्माण तो गुपचुप तरीके से बिना किसी अनुमति के भी किए गए थे. पर्यटकों की भरमार तात्कालिक लाभ जरूर प्रदान करती. जिस के पास कुछ नहीं, वह भी मक्के को उबाल कर या भून कर चटपटा नमक लगा कर पर्यटकों को देता तो अच्छीखासी कमाई कर लेता पर दीर्घकाल के लिए यह अभिशाप ही कहा जा सकता है.

दुखी मन ले कर बसंती बुआ के पिताजी भी 2 साल पहले गुजर गए. मां अकेली रह गई थीं. बसंती बुआ और अगलबगल में रहने वाले रिश्तेदार ही देखभाल करते. बसंती बुआ ने अपने साथ आ कर रहने को कहा लेकिन बूढी मां को यह मंजूर नहीं था. पति की यादें जो बसी थीं इस घर में. बूढ़ी धीरेधीरे अपने दिनप्रतिदिन के काम खुद ही किया करती.

कच्ची युवावस्था की पहाड़ियां. सड़क निर्माण के लिए पेड़ों का कटान. मिट्टी का बहना लाजिमी है. रेलवे लाइन के लिए सुरंगों को खोदना. धरती अंदर ही अंदर कुपित थी. यह आक्रोश साल दर साल कौलेस्ट्रौल की तरह धरती की धमनियों में परत बना रहा था.

हाल के वर्षों की तरह इस बार भी बरसात ने रौद्र रूप दिखाया. इलाके में 2 बार बादल फटने की घटनाएं हो चुकी थीं. बसंती बुआ के मायके के दोनों मकान बहुत जर्जर हो चुके थे. उस के पति ने कई बार उन से कह दिया था कि उस घर में अकेली बूढ़ी मां का रहना खतरे से खाली नहीं है.

“बसंती, अपनी मांजी से हमारे साथ आ कर रहने को कहो.”

“पूरी उम्र मां ने उस घर में गुजार दी. अब कहां आएगी हमारे साथ? मैं ने कई बार कहा, सुनती ही नहीं,” बुआ ने उदास हो कर बोली.

जगहजगह बहुत नुकसान हुआ था. पुल धाराशाई, रास्ते बंद, सवारियां बह गईं. खेती उजड़ गई, खानेपीने के लाले पड़ गए. बसंती बुआ का दिल्ली वाला बेटा हफ्ताभर छुट्टी ले कर आया था पर यहीं फंसा रह गया. नेटवर्क जीरो. औफिस के काम में अड़चन आ रही थी पर जाने के रास्ते बंद थे.

उस दिन सुबह से ही रुकरुक कर बारिश हो रही थी. शाम ढलते ही बारिश ने मूसलाधार रुख अख्तियार कर लिया था. बिजली सप्लाई या तो रोक दी गई होगी या कुछ खराबी आ गई थी. दूरदूर तक पहाड़ियों में अंधेरा पसर गया था.

रात के लगभग 12 बज रहे थे. नींद सभी की आंखों से कोसों दूर थी, उसे बुलाने भर की नाकाम कोशिश हो रही थी. तभी अचानक इतनी जोर की आवाज आई कि सभी लोग अचकचा कर उठ गए. मोबाइल फोन लगभग डिस्चार्ज होने के कगार पर था. बसंती बुआ के पति ने अपने सिरहाने रखा टौर्च उठा कर जलाया जिस की रोशनी भी मरियल सी हो रही थी. शायद बैटरी कमजोर हो गई थी. लालटेन का ही एकमात्र सहारा था अब.

किसी अनहोनी की आंशका दूरदूर तक फैले सांयसांय करते अंधेरे ने पहले ही दे दी थी. बसंती बुआ के हाथ में लालटेन थी, उन के पति ने टौर्च थामा था और बेटा मोबाइल ले कर लकड़ी के क्षतविक्षत हो चुके खोखले दरवाजे को खोलते हुए बाहर पहुंचते हैं. लालटेन, टौर्च और मोबाइल तीनों की रोशनी मिल कर भी घुप्प अंधेरे का सामना करने में नाकाफी साबित हो रही थी. तीनों बसंती बुआ की मां के घर की तरफ बढ़े जो बमुश्किल डेढ़ से 2 सौ मीटर की दूरी पर घुमावदार मोड़ पर था. अचानक सब से आगे चल रहे बुआ के बेटे संदीप का पैर टकराया और वह मुंह के बल गिर कर गीली और पथरीली मिट्टी में लोटपोट हो गया. किसी तरह खुद को संभाल कर उठा और मां और पिताजी को सावधानी से चलने की हिदायत देते हुए नानी के घर की तरफ बढ़ा. नानी के घर में जानवरों के रहने का गुठियार ध्वस्त हो गया था. आगे बढ़ कर कुछ करने की स्थिति नहीं बन पा रही थी. वे तीनों निरीह बन कर देखने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे.

घर का मुख्यद्वार भी मलबे के ढेर में दबा था. संदीप कुछ नंबरों पर फोन मिलाया लेकिन बात नहीं हो पाई. लाचारी और हताशा दिलोदिमाग पर हावी हो रही थी लेकिन यह अवसर हताशा को उखाड़ फेंक कर साहस दिखाने का था.

बसंती बुआ आवाज लगाने की कोशिश करती है,”मां.. मांजी…” उन का गला चोक हो गया था और आवाज गले में ही धंसी जा रही थी.

संदीप ने हिम्मत कर के जोर से पुकारा,” नानी, कहां हो? हिम्मत रखना. हम यहीं पर हैं. अभी आप तक पहुंचते हैं.”

प्रतिउत्तर में कोई स्वर नहीं उभरा. तभी बसंती बुआ को किसी जानवर के मिमियाने की आवाज सुनाई दी. उन के इशारा करने पर संदीप उस ओर बढ़ा. किसी तरह मिट्टी के ढेर को हटाता आगे बढ़ा. एक नन्हीं सी बकरी सांसों के लिए लड़ रही थी. संदीप ने उसे बाहर निकाला. पशुधन के साथसाथ मुख्य चिंता नानी की थी. कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. आपातकाल में सब से बड़ा सहायक मोबाइल फोन भी इस वक्त खुद असहाय नजर आ रहा था.

धुंधलका सा वातावरण हो चुका था. झीने आवरण में लिपटा अंधेरा इस बात की तसदीक कर रहा था कि इसे चीर कर उजाला जल्द ही हाजिर होगा. पर मन के अंधेरों का क्या? उम्मीदों के दीए रातभर थरथरा कर अब बुझने लगे थे. इस नाउम्मीदी के बीच अपनी मां के बचे होने की उम्मीद बसंती बुआ को अभी भी थी. यही जीवन का फलसफा है शायद.
संदीप ने पुलिस के नंबर पर फोन मिलाया. जल्द पहुंचने का आश्वासन मिला. भूस्खलन की जानकारी टीम को दूसरे सूत्रों से पहले ही हो चुकी थी. आसपास के दूसरे एरिया में भी भारी तबाही मची थी. आसपास के 2-3 गांव तबाह हो गए थे. बीएसएफ, बीआरओ, सेना की भी मदद ली जा रही थी. जवानों ने जान जोखिम में डाल कर काररवाई शुरू कर दी थी. अंतिम सांसें गिनती हुई बसंती बुआ की मां मानो उन्हीं के इंतजार में थी. मिट्टी में सनी शुष्क आंखों से उसे निहारने लगी. अस्पताल ले जाने की कोशिशों के बीच ही दम तोड़ दिया. बसंती बुआ की आंखों से आंसू का एक कतरा भी नहीं बहा.

रोशनी बढ़ने के साथ ही स्थिति स्पष्ट होती जा रही थी. हर तरफ बरबादी का मंजर था. यह पहाड़ इतना निर्दयी भी हो सकता है क्या? पिछले कुछ सालों में बद्रीनाथ जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बहुत अधिक बढ़ोत्तरी हुई थी जिस की वजह से अंधाधुंध रेल के डिब्बों जैसे छोटेछोटे भवन दरकती, भुरभुरी कच्ची पहाड़ियों में होमस्टे, होटल की शक्ल ले चुके थे. बसंती बुआ के पिता ने इस अवैध और अवैज्ञानिक निर्माण का बहुत विरोध किया था. संबंधित पुलिस अधिकारी और जिला न्यायालय तक वह इस शिकायत को ले गए थे पर जीत पूंजीवाद की ही हुई. सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़तेलड़ते एक दिन वह जिंदगी की लड़ाई हार गए थे और आज यह भवन आपदा की चपेट में आ कर धराशाई हो गया था.

बसंती बुआ ने गांव को डूबतेउभरते देखा था. कभी टिहरी गांव भी डूबा था. लोग दुखी थे, उदास थे. उन के आंसुओं के खारे पानी के बल पर टिहरी झील बन गई थी. फिर तो धीरेधीरे आंसू भी सूख गए. इधरउधर विस्थापित होने पर जड़ों से बिछड़ने का दुख बच्चों और युवाओं को तो ज्यादा नहीं पर बुजुर्गों को दंश दे गया था.

आज फिर इस तबाही के बाद बुआ अब गांव में नहीं रहना चाहती थीं. बेटे से ताऊजी को फोन कर इस बाबत बताने को कहा कि वे लोग भी अब देहरादून ही जा कर रहना चाहते हैं.

ताऊ का दोटूक जवाब था,” जब मकान बनाने के लिए पैसे और मेहनत की जरूरत थी, उस वक्त गांव का प्रेम उमड़ रहा था, अब सबकुछ बनाबनाया तैयार है तो तुम्हें पच नहीं रहा।”

बस फिर क्या था? बेटा बोला, “कुछ समय और इंतजार करो. मैं ने गुड़गांव में जो फ्लैट बुक किया था, उस का पजेशन शायद अब मिलने की उम्मीद है. फिर वहीं चल कर रहोगे आप दोनों.”

पाईपाई जुटा कर, कुछ पैसे पिता से ले कर कई सालों से फ्लैट बुक करा कर, पैसे फंसा कर वह भी कोरी उम्मीद में जी रहा था. शायद उम्मीद ही जिंदगी का सिलसिला है वरना जीना ही दुश्वार हो जाए. उसे दिल्ली जाना ही था. नौकरी में इतनी छुट्टी कहां?

छप्पर तले रह गए थे 2 बुजुर्ग अकेले. मखमली वादियां कभीकभी जीवन का सब से गहरा घाव दे जाती हैं. एक ऐसा दंश जिसे इंसान ताउम्र नहीं भूल पाता. पीढ़ियां रोती हैं, मातम मनाती हैं लेकिन अपनी भोग विलासितापूर्ण जीवनशैली को बदलने के लिए भी तैयार नहीं. यही तो विडंबना है.

केदारनाथ त्रासदी की याद दिलाते हुए एक गांव फिर दफन हो चुका था. आपदा में जान गंवाने वालों का सामूहिक दाहसंस्कार कर दिया गया था. मलबे के भीतर जिंदगी की खोज अंधेरा होने की वजह से बंद कर दी गई थी. कुछ बची हुई या अधमरी जानों की चीखपुकार भी अब बंद हो चुकी थी. वादी में सन्नाटा पसरा था.

रोज शाम ढले बसंती बुआ और उन के पति धरती की गोद में बैठ कर सामने पहाड़ियों को ताकते रहते थे. यही अब उन के माईबाप थे. वातावरण में वीरानी छाई थी. न बूढ़ों की डांटफटकार थी, न बच्चों का शोरगुल, न युवाओं का जोश. वक्त के थपेड़ों की चोट खाखा कर कठोर हो गए झुर्रियां पड़े उन गालों में जब कभी आंसुओं की नमी तैरा करती तो शुष्क पहाड़ियों की तलहटी पर ग्लेशियरों के पिघलने से नमी का एहसास दिलातीं.  Social Story In Hindi 

Family Story : मझली – एक पिता के मन को छू देने वाली कहानी

Family Story : ठाकुर साहब के यहां मैं छोटी के बाद आई थी, लेकिन मझली मैं ही कहलाई. ठाकुर साहब के पास 20 गांवों की मालगुजारी थी. महलनुमा बड़ी हवेली के बीच में दालान और आगे ठाकुर साहब की बैठक थी. हवेली के दरवाजों पर चौबीसों घंटे लठैत रहते थे. हां, तो बड़ी ही ठाकुर साहब के सब से करीब थीं. जब ठाकुर साहब कहीं जाते, तब वे घोड़े पर कोड़ा लिए बराबरी से चलतीं. उन में दयाधरम नहीं था. पूरे गांवों पर उन की पकड़ थी. कहां से कितना पैसा आना है, किस के ऊपर कितना पैसा बकाया है, इस का पूरा हिसाब उन के पास था.

ठाकुर साहब 65 साल के आसपास हो चले थे और बड़ी 60 के करीब थीं. ठाकुर साहब को बस एक ही गम था कि उन के कोई औलाद नहीं थी. इसी के चलते उन्होंने पहले छोटी से शादी की थी और 5 साल बाद अब मुझ से. छोटी को राजकाज से कोई मतलब नहीं था. दिनभर ऐशोआराम की जिंदगी गुजारना उस की आदत थी. वह 40 के आसपास हो चली थी, लेकिन उस के आने के बाद भी ठाकुर साहब का गम कम नहीं हुआ था. कहते हैं कि उम्मीद पर दुनिया टिकी है, इसीलिए ठाकुर साहब ने मुझ से ब्याह रचाया था. मेरी उम्र यही कोई 20-22 साल के आसपास चल रही थी. मैं गरीब परिवार से थी. एक बार धूमरी गांव में जब ठाकुर साहब आए थे, तब मैं बच्चों को इकट्ठा कर के पढ़ा रही थी. ठाकुर साहब ने मेरे इस काम की तारीफ की थी और वे मेरी खूबसूरती के दीवाने हो गए थे. और न जाने क्यों उन के दिल में आया कि शायद मेरी वजह से उन के घर में औलाद की खुशियां आ जाएंगी.

मेरी मां तो इस ब्याह के लिए तैयार नहीं थीं, लेकिन पिताजी की सोच थी कि इतने बड़े घर से रिश्ता जुड़ना इज्जत की बात है. खैर, बहुत शानोशौकत के साथ ठाकुर साहब से मेरा ब्याह हुआ. जैसा कि दूसरी जगह होता है, सौतन आने पर पुरानी औरतें जलन करती हैं, लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं था. बड़ी ने ही मेरी नजर उतारी थी और छोटी मुझे ठाकुर साहब के कमरे तक ले गई थी. मेरे लिए शादीब्याह की बातें एक सपने जैसी थीं, क्योंकि गरीब घर की लड़की की इज्जत से गांव में खेलने वाले तो बहुत थे, पर इज्जत देने वाले नहीं थे, इसलिए जब ठाकुर साहब के यहां से रिश्ते की बात आई, तब मैं ने भी नानुकर नहीं की. अब बड़ी और छोटी के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए आपसी तनातनी वाली कोई बात भी नहीं थी.

हां, तो मैं बता रही थी कि बड़ी ही ठाकुर साहब के साथ गांवगांव जाती थीं और वसूली करती थीं. ऐसे ही एक बार वे रंभाड़ी गांव गईं. वहां सब किसानों ने तो अपने कर्ज का हिस्सा ठाकुर साहब को भेंट कर दिया था, लेकिन सिर्फ रमुआ ही ऐसा था, जो खाली हाथ था. वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘ठाकुरजी… ओले गिरने से फसल बरबाद हो गई. पिछले दिनों मेरे मांबाप भी गुजर गए. अब इस साल आप कर्ज माफ कर दें, तो अगले साल पूरा चुकता कर दूंगा.’’ लेकिन बड़ी कहां मानने वाली थीं. उन्होंने लठैतों से कहा, ‘‘बांध लो इसे. इस की सजा हवेली में तय होगी.’’

मैं जब ठाकुर साहब के यहां आई, तब पहलेपहल तो किसी बात पर अपनी सलाह नहीं दी थी, लेकिन ठाकुर साहब चाहते थे कि मैं भी इस हवेली से जुड़ूं और जिम्मेदारी उठाऊं. धीरेधीरे मैं हवेली में रचबस गई और वक्तजरूरत पर सलाह देने के साथसाथ हवेली के कामकाज में हिस्सा लेने लगी. रात हो चली थी कि तभी हवेली में हलचल हुई. पता करने पर मालूम हुआ कि ठाकुर साहब आ गए हैं. बड़ी ने अपना कोड़ा हवा में लहराया, तब मुझे एहसास हुआ कि आज भी किसी पर जुल्म ढहाया जाना है. अब मैं भी झरोखे में आ कर बैठ गई. रमुआ को रस्सियों से बांध कर आंगन में डाल दिया गया था. अब बड़ी ठाकुर साहब के इशारे का इंतजार कर रही थी कि उस पर कोड़े बरसाना शुरू करे. मैं ने अपनी नौकरानी से उस को मारने की वजह पूछी, तब उस ने बताया, ‘‘मझली ठकुराइन, यहां तो यह सब होता ही रहता है. अरे, कोई बकाया पैसा नहीं दिया होगा.’’ रमुआ थरथर कांप रहा था.

तभी मैं ने उस नौकरानी से ठाकुर साहब के पास खबर भिजवाई कि मैं उन से मिलना चाहती हूं और मैं झरोखे के पीछे चली गई.

तभी वहां ठाकुर साहब आए और उन्होंने मेरी तरफ देखा

मैं ने कहा, ‘‘ठाकुर साहब, यह रमुआ मुझे ईमानदार और मेहनती लगता है, इसलिए इसे यहीं पटक देते हैं. पड़ा रहेगा. हवेली, खेतखलिहान के काम तो करेगा ही, यह मजबूत लठैत भी है.’’ ठाकुर साहब को मेरी सलाह पसंद आई, लेकिन दूसरों पर अपना खौफ बनाए रखने के लिए उन्होंने रमुआ को 10 कोड़े की सजा देते हुए हवेली के पिछवाड़े की कोठरी में डलवा दिया. एक दिन मैं ने नौकरानी से रमुआ को बुलवाया. हवेली में कोई भी मर्द औरतों से आमनेसामने बात नहीं कर सकता था, इसलिए बात करने के लिए बीच में परदा डाला जाता था. रमुआ ने परदे के दूसरी तरफ आ कर सिर झुका कर कहा, ‘‘मझली ठकुराइनजी आदेश…’’ झीने परदे में से मैं ने रमुआ को एक निगाह देखा. लंबा कद, गठा हुआ बदन. सांवले रंग पर पसीने की बूंदें एक अजीब सी कशिश पैदा कर रही थीं. उसे देखते ही मेरे तन की उमंगें और मन की तरंगें उछाल मारने लगीं.

मैं ने रमुआ पर रोब गांठते हुए कहा, ‘‘तो तू है रमुआ. अब क्या हवेली में बैठेबैठे ही खाएगा, यहां मुफ्त में कुछ नहीं मिलता है… समझा?’’

यह सुन कर रमुआ घबरा गया और बोला, ‘‘आदेश, मझली ठाकुराइन.’’

मैं ने कहा, ‘‘इधर आ… यह जो ठाकुरजी की बैठक है, उस के ऊपर मयान (पुराने मकानों में छत इन पर बनाई जाती थी) में हाथ से झलने वाला पंखा लगा है. उस की डोरी निकल गई है. जरा उसे अच्छी तरह से बांध दे.’’ मैं अब भी परदे के पीछे नौकरानी के साथ खड़ी थी. रमुआ बंदर की तरह दीवार पर चढ़ कर मयान तक पहुंच गया और उस ने पंखे की सभी डोरियां बांध दीं. इस के बाद बैठक को साफ कर अच्छी तरह जमा दिया. दोपहर को ठाकुर साहब ने बैठक का इंतजाम देखा, तो उन्हें बहुत अच्छा लगा. जब उन्होंने इस बारे में नौकरानी से पूछा, तब उस ने मेरा नाम बताया. ठाकुर साहब की निगाह में मेरी इमेज अच्छी बनती जा रही थी.

एक दिन मैं ने ठाकुर साहब से कहा, ‘‘इस रमुआ को हवेली की हिफाजत के लिए रख लेते हैं और कहीं जाते समय मैं भी अपनी हिफाजत के लिए नौकरानी के साथ इसे भी रख लिया करूंगी.’’ ठाकुर साहब ने मेरी बात मान ली और मेरी हिफाजत की जिम्मेदारी रमुआ के ऊपर सौंप दी. हवेली से कुछ ही दूरी पर खेत था. खेत में मकान बना था, जिस से हवेली का कोई आदमी वहां जाए, तो उसे कोई परेशानी न हो. एक दिन मैं ने नौकरानी को बैलगाड़ी लगाने के लिए कहा. बैलगाड़ी के चारों डंडों पर चादर बांध दी गई थी, जिस से बाहर के किसी मर्द की निगाह हवेली की औरतों पर नहीं पडे़. चूंकि बड़ी अब 60 के पार हो चुकी थीं, इसलिए ये सब बंदिशें उन पर तो नहीं थीं, छोटी पर कम और मेरे ऊपर सब से ज्यादा थीं.

खैर, हवेली के दरवाजे से बैलगाड़ी तक दोनों तरफ परदे लगा दिए गए और मैं उन परदों के बीच से हो कर बैलगाड़ी में बैठ गई और रमुआ बैलगाड़ी पर लाठी रख कर हांकने लगा. खेत पर जा कर मैं ने रमुआ को मेड़ बांधने और पानी की ढाल ठीक करने के लिए कहा. थोड़ी देर में काली घटाएं उमड़घुमड़ कर बरसने लगीं. रमुआ अभी भी खेत पर काम कर रहा था. नौकरानी को मैं ने ऊपर के कमरे में भेज दिया और कहा, ‘‘जब चलेंगे, तब बुला लूंगी,’’ और बाहर से कुंडी लगा दी. बरसात तेज हो गई थी और रमुआ छपरे में खड़ा हो कर पानी से बच रहा था. मैं ने रमुआ को अंदर आने के लिए कहा, तभी जोर से बिजली कड़की और ऐसा लगा कि वह मकान पर ही गिर रही है. मैं ने डरते हुए रमुआ को जोर से जकड़ लिया. उस समय मैं रमुआ के लिए औरत और रमुआ मेरे लिए मर्द था.

थोड़ी देर में बरसात थम गई. मेरा मन सुख से भर गया था. रमुआ मुझ से आंखें नहीं मिला पा रहा था. मैं ने उसे फिर से खेत पर भेज दिया और ऊपर के कमरे में नौकरानी, जो अभी भी सो रही थी, को झिड़क कर उठाते हुए कहा, ‘‘क्या रात यहीं गुजारने का इरादा है?’’ नौकरानी हड़बड़ा कर उठी और बैलगाड़ी लगवाई. वापस हवेली में आ कर मैं ने रमुआ को दालान में बुलवाया और बड़ी से कोड़ा ले कर रमुआ पर एक ही सांस में 10-20 कोड़े बरसा दिए. मेरे इस बरताव की किसी को उम्मीद नहीं थी, लेकिन ठाकुर साहब और बड़ी खुश हो रहे थे कि मझली भी अब हवेली के रंगढंग में रचबस रही है. और उधर रमुआ अब भी यह नहीं समझ पाया कि आखिर मझली ठकुराइन ने उस पर कोड़े क्यों बरसाए?

पहली बात तो यह कि रमुआ को मैं ने एहसास दिलाया कि जो खेत पर हुआ है, उस के लिए उसे चुप रहना है, वरना… दूसरी, ठाकुर साहब और नौकरानी को यह एहसास दिलाना कि मुझे रमुआ से कोई लगाव नहीं है. तीसरी यह कि अगर हवेली में मेरे से वारिस आता है, तो उस के हक के लिए मैं कोडे़ भी बरसा सकती हूं. इस के बाद मैं ने ठाकुर साहब को रात मेरे कमरे में गुजारने की गुजारिश इतनी अदाओं के साथ की कि वे मना नहीं कर सके. मैं खुद नहीं समझ पा रही थी कि यह औरतों वाला तिरिया चरित्तर मुझ में कहां से आ गया, जिस के बल पर मैं अपने इरादे पूरे कर रही थी.

अगले दिन मैं पहले की तरह सामान्य थी. नौकरानी से रमुआ को बुला कर हवेली की साफसफाई कराई. वह अभी भी डरा और सहमा हुआ था. समय अपनी रफ्तार से गुजर रहा था. आज ठाकुर साहब की खुशियों का पारावार नहीं था. हवेली दुलहन की तरह सजी हुई थी. दावतों, कव्वाली और नाचगानों का दौर चल रहा था. कब रात होती, कब सुबह, मालूम नहीं पड़ता. जो पैसा अब तक हवेली की तिजोरियों में पड़ा था, खुशियां मनाने में खर्च हो रहा था, जगहजगह लंगर चल रहे थे, दानधर्म चल रहा था और हो भी क्यों नहीं, ठाकुर साहब का वारिस जो आ गया था. बड़ी और छोटी भी औरत थीं और इतने दिनों तक हवेली को वारिस नहीं देने की वजह वे जानती थीं, लेकिन इस के बावजूद वे यह समझ नहीं पा रही थीं कि मझली ने यह कारनामा कैसे कर दिया?  Family Story

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