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Romantic Story In Hindi : सोशल डायरीज कैफे

Romantic Story In Hindi : सोशल डायरीज कैफे. जी हां, यही नाम था उस कैफे का. तकरीबन 8 वर्षों पहले वह ठेठ देहात से शहर के एक बड़े विश्वविद्यालय में पढऩे आया था, जहां उस की मुलाकात रूपाली से हुई थी. रूपाली ने इसी कैफे पर पहली दफा उसे मिलने के लिए बुलाया था.

इधर आप सोच रहे होंगे कि किसी कैफे का यह कैसा नाम- सोशल डायरीज कैफे. लेकिन वाकई में यह कैफे शहर में बहुत चर्चित जगह थी, खासकर युवाओं की लंबीलंबी गपशप के लिए. छात्रसंघ चुनावों में तो यहां युवाओं का जमघट लगता था. कई प्रेमी युगल घंटों यहां बैठेबैठे गुटरगुटर किया करते थे. इस दरमियान कैफे वाला समय की नजाकत को भांप कर पार्श्व में उसी अनुरूप संगीत की स्वरलहरियां छोडऩे लगता था. एक के बाद एक दिलकश नगमे…

बस, आप तो कैपुचिनो का और्डर दीजिए और उस के एकएक घूंट के साथ एकदूसरे की आंखों में आंखें डाल कर दबे होंठों से नगमे गुनगुनाते जाइए. कैपुचिनो के साथ यहां कईयों का प्रेम परवान चढ़ा, तो कईयों का धूमिल हुआ. उस समय यहां सोशल डिस्टेंसिंग और दो गज की दूरी की बाध्यता का प्रावधान भी नहीं था. बड़ा ही दिलचस्प माहौल था इस कैफे का.

कैफे का यह नाम कई बार भ्रम की स्थिति उत्पन्न करता था. उस दिन रूपाली ने उसे फोन पर कहा, ‘दीपक, तुम ठीक शाम 5 बजे सोशल डायरीज कैफे मुझ से मिलने आ जाना.’ इधर लडक़े तो वैसे भी लडक़ी से मिलने के नाम से ही हमेशा जल्दबाजी में रहते हैं. इसी उधेड़बुन में उस ने ठीक से सुना नहीं और सही समय पर वहां पहुंचने को ‘हां’ कर दी.

इस तरह किसी कैफे में लडक़ी से मुलाकात का उस का यह पहला अवसर था. यही सोचसोच कर उस के शरीर के रोमरोम में सिहरन पैदा हो रही थी.

वह ठहरा ठेठ देहात का. शहर में नयानया आया था. कैफे का नाम भी बाहर इंग्लिश में लिखा हुआ था- सोशल डायरीज कैफे – बड़ेबड़े, लाललाल अक्षरों में. ऊपर से ऐसे कांच लगा रखे थे जिन में अंदर से बाहर साफ देखा जा सकता था, लेकिन बाहर से अंदर कुछ नजर नहीं आता था. इधर दीपक के लिए इंग्लिश तो हिमालय की सब से ऊंची चोटी फतह करने के समान थी. वह गांव के सरकारी स्कूल से ‘थर्स्टी क्रो’ और ‘हंगरी फौक्स’ की कहानियां रटरट कर यहां तक पहुंचा था. लिहाजा, उस ने ‘डायरीज’ शब्द को ‘डेयरी’ पढ़ लिया. और वहां से आगे बढ़ गया.

वह कुछ देर तक रोड पर ही खाक छानता रहा. जब जगह नहीं मिली, तब उस ने रूपाली को फोन किया. ‘हेलो…’ वह आगे कुछ बोलता, इतने में वह बीच में ही बोल पड़ी. ‘व्हाट हेलो, 5 बजे का टाइम दिया था. तुम्हें वक्त की कोई कद्र ही नहीं है.’

‘तुम ने कौन सी जगह बताई थी? मिल नहीं रही है. मैं कब से रोड पर चक्कर काट रहा हूं.’ ‘सोशल डायरीज कैफे. कैफे के बाहर गुलमोहर और अमलतास के बड़ेबड़े पेड़ खड़े हैं. आंखें फाड़ कर देखो.’

‘तुम कैफे के बाहर खड़ी रहो, मैं ढूंढ रहा हूं.’

वह घूमताफिरता फिर वहीं आ पहुंचा, वहां लडक़ी बाहर खड़ी उस का इंतजार कर रही थी. जहां गुलमोहर भी महक रहा था और अमलतास अपने पीले फलों की छटा बिखेर रहा था. ‘ओह, मैं यहीं से हो कर तो गुजरा था. सोशल डेयरी..नहीं..डायरी..डायरीज कैफे.’ इस बार ‘डायरीज’ शब्द पर जोर देते हुए वह अपनी मोटरसाइकिल पर बैठेबैठे मन ही मन बुदबुदाया.

रूपाली को वहां खड़ा देख कर एक बार तो वह पानीपानी हुआ. फर्स्ट इंप्रैशन इज द लास्ट इंप्रैशन. लेकिन इस बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. एक तो वह सादगीभरा जीवन जीने वाला, दूसरा वह ठेठ देहात से आया हुआ. शहर के तौरतरीके समझने में वक्त तो लगता ही है. खैर, देर आए, दुरुस्त आए. उस के आने से पहले रूपाली एक प्लेट चाउमीन उड़ा चुकी थी. वह भी उस के पीछेपीछे कैफे में चला आया. बिलिंग काउंटर के ठीक सामने दीवार पर लगी मोनालिसा की पेंटिंग एक याद ताजा कर रही थी. कैफे के अंदर खरगोश के 2 सफेद बच्चे अठखेलियां कर रहे थे. पार्श्व में पाश्चात्य संगीत की मधुर धुन बज रही थी.

उन के वहां बैठते ही वेटर ने पीने का पानी टेबल पर रखा, फिर और्डर के लिए पूछा. रूपाली ने टेबल पर रखे मैन्यू कार्ड को दीपक की ओर बढ़ाया. उस ने कार्ड को वापस रूपाली की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘तुम्हें जो पसंद हो, मंगवा लो.’

‘कैपुचिनो चलेगी?’

उस ने यह नाम पहली दफा सुना था. लेकिन सोचा, अगर इस से पूछूंगा कि यह क्या चीज है तो मुझे बिलकुल गंवार ही समझेगी. बेहतर है, चुप ही रहूं. जो आएगा खापी लेंगे. उस ने कहा, ‘हां, क्यों नहीं चलेगी.’

रूपाली ने वेटर को 2 कैपुचिनो लाने के लिए कहा. फिर दीपक से मुखातिब हुई.

‘तुम ने आने में बहुत देर लगा दी?’ रूपाली ने पूछा.

‘देर कहां हुई मैडम जी. कब से आ गया, लेकिन इंग्लिश का लोचा हो गया था,’ वह दबे होंठों से बड़बड़ाया.

‘क्या? मन ही मन क्या बड़बड़ा रहे हो?’ रूपाली को थोड़ा अजीब सा लगा.

‘किसी काम से लेट हो गया था,’ उस ने जवाब दिया.

‘यू नो, तुम लड़कों की न, यही प्रौब्लम है. मैं समय की बहुत पाबंद हूं. आगे से तुम भी ध्यान रखना. अंडरस्टैंड?’

‘हां, ठीक है.’

‘फेसबुक पर हो तुम?’

‘किस पर?’ लडक़े को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या पूछ रही है.

‘फेसबुक…फेसबुक पर,’ रूपाली ने अपने एंड्रौएड मोबाइल में फेसबुक खोल कर उसे बताते हुए कहा. उस के पास साधारण सा मोबाइल था. ऊपर से फेसबुक से कभी वास्ता पड़ा नहीं था. उस ने ‘न’ में सिर हिला दिया. बात आगे बढ़ती, उस से पहले वेटर ने 2 कप कैपुचिनो के ला कर उन के सामने रख दिए. झागदार कौफी सामने देख कर दीपक के मुंह में पानी आ गया. ऐसी कौफी उस ने पहले कभी नहीं पी थी.

‘अरे वाह, कौफी. मैं बेवजह परेशान हो रहा था,’ वह मन ही मन सोचने लगा.

‘फ्यूचर का क्या प्लान है?’ रूपाली ने पूछा.

‘आगे चल कर एक बेहतरीन चित्रकार बनना चाहता हूं. ग्रेजुएशन में भी मेरा यही मुख्य विषय है.’

‘आर्टिस्ट…तुम्हें लगता है तुम आगे इस में बेहतर कर पाओगे?’

‘मेरा काम काम करना है और वह मैं कर रहा हूं. भविष्य के दरवाजे के अंदर क्या है, यह मैं अभी कैसे बता सकता हूं.’

‘तुम ने क्या सोचा है?’

‘आई वांट टू बिकम आईएएस. आफ्टर ग्रेजुएशन, आई विल गो टू दिल्ली टू प्रिपेयर फौर आईएएस.’

रूपाली ने अमेरिकी टोन में अपनी बात को इतना तेजी से बोला कि पूरा वाक्य दीपक के सिर के ऊपर से निकल गया. वह मोनालिसा की ओर देखने लगा. यहां आ कर वह 2 बातें तो सीख ही गया. पहली बात, यदि आप को शहरी लडक़ी से बातचीत करनी है, तो कम से कम थोड़ीबहुत इंग्लिश तो आनी ही चाहिए. वरना इज्जत तारतार होते देर नहीं लगती. दूसरी बात, शहर में इस तरह के और कौनकौन से कैफे हैं, जहां रूपाली मिलने को बुला सकती है, उन की भी एक लिस्ट बना लेनी चाहिए.

उस ने वहीं बैठेबैठे सोचा, हां, तैयारी करूंगा, और इंग्लिश जबान पर आ ही जाएगी. कोई भाषा सीखने में बुराई ही क्या है. जब उठो तब सवेरा. उस ने अगले ही दिन से इंग्लिश की कोचिंग करने का मानस बनाया.

उन की कौफी भी खत्म हो चुकी थी. दीपक ने काउंटर पर बैठे कैफे के मालिक उज्ज्वल भाई के पास जा कर बिल अदा किया. उज्ज्वल भाई के मिलनसार और सहृदय व्यक्तित्व के कारण हमारी भी साहित्यिक चर्चाएं यहां होती रहती थीं. मुसलसल होती रहती थीं. एकएक कप कैपुचिनो के साथ कईकई घंटे विमर्शों में गुजर जाते थे.

खैर, वे दोनों कैफे से बाहर निकल आए. बाहर गुलमोहर के पेड़ से रहरह कर वसंतदूत की मधुर आवाज आ रही थी. इधर दीपक के मन के किसी खाली कोने में पड़ी गीली मिट्टी के ऊपर प्रेम का दरख्त अपनी दस्तक दे रहा था.

आसमान पूरा बादलों से गिर आया था. बारिश की संभावना लग रही थी. रूपाली ने उस से विदा ली और वह भी अपने होस्टल चला आया. कुछ दीनों तक ऐसे ही चलता रहा. दीपक ने सुबह के वक्त इंग्लिश कोचिंग की क्लास भी जौइन कर ली. इधर विश्वविद्यालय के गलियारों में छात्रसघं चुनावों के मद्देनजर छात्र नेताओं में सियासी बाजार गरम होने लगा. लेकिन वह इन चुनावों की गतिविधयों से दूर अपनी इंग्लिश कोचिंग और कैनवास पर रंग बिखेरने में व्यस्त रहा.

छात्र नेताओं में आरोपप्रत्यारोप, सभाओं और भाषणों का दौर तेज होने लगा. छात्र शहर में जगहजगह मुफ्त के भोजन और थिएटर में फिल्में देखने का लुत्फ़ उठाने लगे. सोशल डायरी कैफे तो फास्ट फूड के लिए सब की पहली पसंद था. कहीं कोई हुड़दंग न हो जाए, इसलिए थानाधिकारी हनुवंत सिंह सिसोदिया अपनी टीम के साथ चुनाव में मुस्तैदी के साथ खडे रहे.

इस बार के चुनाव में प्रतीक शर्मा सब से प्रबल दावेदार था. उस के बोलने के लहजे से ही रूपाली उस की ओर आकर्षित होने लगी थी. आखिरकार, प्रतीक शर्मा की जीत हुई. इस के बाद रूपाली लगातार उस के साथ समय व्यतीत करने लगी थी. उस ने एकाएक दीपक से किनारा कर लिया था.

दीपक को भी इस बात की भनक लग गई थी. उस ने समय रहते रूपाली के मंसूबों को भांप लिया था. उस की नजर में एक इश्क जो मुकम्मल होना चाहिए था, वह अधूरा रह गया. लेकिन इस बात की उस ने तनिक भी परवा न की. वह अपनी राह पर आगे बढ़ गया. फिर उस ने कभी रूपाली की ओर मुड़ कर न देखा.

दीपक लगातार अपने सपने को सच करने में लगा रहा. आखिरकार, उस ने इंग्लिश पर विजय पाई और उस की आर्ट कला की तारीफ भी देशविदेश में होने लगी. इटली के फ्लोरेंस शहर की आर्ट गैलरी में उस की बनाई पेंटिंग ऊंचे दामों में बिकने लगीं. इधर रूपाली सालों तक प्रतीक के प्रेमजाल में फंसी रही. वहां उस ने प्रेम में धोखा खाया. जब बातें उड़ कर उस के घर तक पहुंची, तो उस के पिताजी ने उस की शादी करवा दी. आईएएस बनने का उस का सपना ख्वाब बन कर रह गया.

बाद के वषों में दीपक फ्लोरेंस के एक विश्वविद्यालय में आर्ट का प्रोफैसर बन गया. और उस ने वहीं इटालियन लडक़ी से शादी कर ली. आर्ट में छवि का कितना महत्त्व है, यह बात वह भलीभांति जानता है. कैफे में लगी मोनालिसा की पेंटिंग कई बार उस के मानस पटल पर उभरती है, लेकिन रूपाली की छवि उस के चेतन और अवचेतन मन में कहीं नजर नहीं आती. Romantic Story In Hindi 

लेखक : डा. एस डी वैष्णव

Hindi Love Stories : कैसा मोड़ है यह – माला और वल्लभ को कैसा एहसास हुआ

Hindi Love Stories : ‘‘अदालतसे गुजारिश है कि मेरी मुवक्किला को जल्दी न्याय मिले ताकि वह अपनी एक नई जिंदगी शुरू कर सके,’’ माला के वकील ने अपनी दलीलें पेश करने के बाद जज साहब से कहा. जज साहब ने मामले की गंभीरता को समझते हुए अगली तारीख दे दी. तलाक के मामलों में बहुत जल्दी फैसला लेना मुश्किल ही होता है, क्योंकि अदालत भी चाहती है कि तलाक न हो. यही वजह थी कि हमेशा की तरह आज भी अदालत में कोई फैसला नहीं हुआ. दोनों ही पक्षों के वकील अपनीअपनी दलीलें पेश करते रहे, पर जज साहब ने तो तारीख बढ़ाने का ही काम किया.

वल्लभ और माला दोनों उदास और खिन्न मन से अदालत से बाहर निकल आए, लेकिन बाहर निकलते वक्त उन्हें नेहा और भानू की घूरती नजरों का सामना करना पड़ा. उन दोनों की नफरत, क्रोध और धोखा देने के आक्रोश का सामना वे दोनों पिछले 5 सालों से कर रहे हैं और अब तो जैसे आदत ही हो गई है. वल्लभ उस नफरत और आक्रोश के साए में जीतेजीते टूट सा गया है. अफसोस और अपराधभाव उस के चेहरे के भावों से परिलक्षित होने लगे हैं. सच तो यह भी है कि अदालत के चक्कर काटतेकाटते वह थक गया है. हालत तो माला की भी कुछ ऐसी ही है, क्योंकि पिछले 5 सालों से वह भी अपनेपरायों सब की नफरत झेल रही है. यहां तक कि उस के बच्चे भी उस से दूर हो गए हैं. आखिर क्या मिला उन्हें इस तरह का कदम उठा कर?

‘‘चलो तुम्हें घर छोड़ देता हूं,’’ वल्लभ ने माला से कहा, तो थकी हुई आवाज में उस ने कहा, ‘‘मैं चली जाऊंगी, तुम्हें तो वैसे ही देर हो चुकी है.’’

‘‘बैठो,’’ वल्लभ ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा. फिर माला को उस के घर छोड़ कर जहां वह बतौर पेइंग गैस्ट रहती थी, वल्लभ औफिस की ओर चल दिया.

लंच टाइम हो चुका था. आज भी हाफ डे लगेगा. इस केस के चक्कर में हर महीने छुट्टियां या हाफ डे लेने पड़ते हैं. कितनी बार तो वह विदआउट पे भी हो चुका है. निजी कंपनियों में सरकारी नौकरी जैसे सुख नहीं हैं कि जब चाहे छुट्टी ले लो. यहां तो काम भी कस कर लेते हैं और समय देख कर काम करने वालों को तो पसंद ही नहीं किया जाता है. माला की तो इस वजह से 2 नौकरियां छूट चुकी थीं. अदालत में आतेजाते और वकील की फीस देतेदेते उन की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ गई थी. बेशक माला और वल्लभ एकदूसरे का पूरा साथ दे रहे थे और उन के बीच के प्यार में इन 5 सालों में कोई कमी भी नहीं आई थी, पर कहीं न कहीं दोनों को लगने लगा था कि ऐसा कदम उठा कर उन से कोई भूल हो गई है. उन्हें अभी भी अलग ही रहना पड़ रहा था. समाज, परिवार और दोस्तों, सब की नाराजगी सहते हुए वे जी रहे थे, सिर्फ इस आशा से कि एक दिन अदालत का फैसला उन के हक में हो जाएगा और वे दोनों साथसाथ रहने लगेंगे.

वल्लभ औफिस में भी सारा दिन तनाव में ही रहा. वह काम में मन ही नहीं लगा पा रहा था. ‘‘कोई बात बनी?’’ कुलीग रमन ने पूछा तो उस ने सिर हिला दिया, ‘‘माला के लिए भी कितना मुश्किल है न यह सब. लेकिन फिर भी वह तेरा साथ दे रही है. वह सचमुच तुझ से प्यार करती है यार वरना कब की भानू के पास चली जाती.’’

‘‘रमन तू सही कह रहा है. पर माला और मैं अब दोनों ही बहुत थक गए हैं. अब तो लगता है कि 5 साल पहले जैसे जिंदगी चल रही थी, वही ठीक थी. न माला मेरी जिंदगी में आती और न यह तूफान आता. 42 साल का हो गया हूं, पर अभी भी परिवार बनाने के लिए भाग रहा हूं. माला भी अब 40 की है. कभीकभी गिल्टी फील करता हूं कि मेरी वजह से उसे भानू को छोड़ना पड़ा,’’ वल्लभ भावुक हो उठा.

‘‘संभाल अपनेआप को यार. प्यार कोई सोचसमझ कर थोड़े ही करता है. वह तो बस हो जाता है. तू अपने आप को दोष मत दे. सब ठीक हो जाएगा,’’ रमन ने उसे तसल्ली तो दे दी. पर वह भी जानता था कि मामला इतनी आसानी से सुलझने वाला नहीं है.

‘‘कैसे ठीक हो जाएगा? अब तक तो तू समझ ही गया होगा कि नेहा मुझे कभी तलाक नहीं देगी और अदालत के चक्कर लगवाती रहेगी. वह उन लोगों में से है, जो न खुद चैन से जीते हैं और न दूसरों की जीने देते हैं.’’

वल्लभ को मायूस देख रमन ने उस का कंधा थपथपाया. हालांकि वह जानता था कि उस की तसल्ली भी उस के काम नहीं आएगी. औफिस से लौट कर अपने घर का दरवाजा खोल वल्लभ बिना लाइट जलाए ही सोफे पर पसर गया. शरीर और मन जब दोनों ही थक जाएं तो इंसान बिलकुल टूट जाता है. बीते पल उसे बारबार झकझोर रहे थे. 15 साल पहले उस की और नेहा की शादी हुई थी. उस समय वह नौकरी करता था. पर उस का वेतन इतना नहीं था कि नेहा के शाही खर्चों को वह उठा सके. उस के ऊपर छोटी बहन का भी दायित्व था और अपनी मां की भी वह सहायता करना चाहता था, क्योंकि पिता थे नहीं. नेहा को उस के घर के हालात पता थे, फिर भी उस के  मांबाप ने उस की उस से शादी की तो कुछ देखा ही होगा. पर नेहा बहुत गुस्सैल और कर्कश स्वभाव की थी. वह बातबात पर उस से लड़ने लगती और मां से भी बहस करने लगती. बहन को ताने देती कि उस की वजह से उसे अपनी छोटीछोटी खुशियों को भी दांव पर लगाना पड़ता है.

नेहा चाहती थी कि सारा दिन घूमे या शौपिंग करे. घर का काम करना तो उसे पसंद ही नहीं था. वल्लभ उसे समझाने की कोशिश करता तो वह मायके चली जाती और बहुत मिन्नतों के बाद वापस आती. रोजरोज की किचकिच से वह तंग आ गया था. शादी के 2 साल बाद जब उन का बेटा हुआ तो उसे लगा कि अब शायद नेहा सुधर जाएगी. पर वह तो वैसी लापरवाह बनी रही. मां या बहन को ही बेटे को संभालना पड़ता. बेटा बीमार होता तो भी उसे छोड़ सहेलियों के साथ पिक्चर देखने चली जाती. एक बार बेटे को निमोनिया हुआ और नेहा ने उसे ठंडे पानी से नहला दिया. नन्ही सी जान ठंड सह नहीं पाई और बुखार बिगड़ गया. 2 दिन बाद उस की मौत हो गई. कुछ दिन नेहा रोई, शांत बनी रही, पर फिर वापस अपने ढर्रे पर लौट आई.

परेशान वल्लभ ने घर में रहना ही कम कर दिया. मां बहन को ले कर गांव चली गई. नेहा कईकई दिनों तक खाना नहीं बनाती थी. घर गंदा पड़ा रहता, पर वह तो बस घूमने निकल जाती. वल्लभ उस समय इतना परेशान था कि वह घंटों पार्क में बैठा रहता. ‘‘क्यों आजकल घर में दिल नहीं लगता? क्या कोई और मिल गई है?’’ नेहा का कटाक्ष उसे आहत कर जाता. उस ने बहुत बार उसे प्यार से समझाना चाहा, पर वह अपनी मनमानी करती रही. मांबहन के जाने के बाद से जैसे वह और आजाद हो गई थी. वल्लभ का जिस बिल्डिंग में औफिस था, उसी की दूसरी मंजिल पर माला का औफिस था. लिफ्ट में आतेजाते उन की मुलाकातें हुईं और फिर बातें होने लगीं. धीरेधीरे एकदूसरे के प्रति उन का आकर्षण बढ़ने लगा. वल्लभ तो वैसे भी प्यार के लिए तरसरहा था और माला भी अपने वैवाहिक जीवन से दुखी थी. उस के पति भानू को शराब की लत थी और नशे में वह उसे मारता था. अपने दोनों बच्चों की खातिर वह उसे सह रही थी. धीरेधीरे वे दोनों कब एकदूसरे को चाहने लगे, उन्हें पता नहीं चला. दोनों ही अपनेअपने साथी से छुटकारा पा एक खुशहाल जीवन जीने के सपने देखने लगे. पर उस के लिए दोनों का तलाक लेना जरूरी था. नेहा तो अपने बच्चों को भी अपने साथ रखना चाहती थी, जिसे ले कर वल्लभ को कोई आपत्ति नहीं थी, क्योंकि वह खुद बच्चों के लिए तरस रहा था.

उन दोनों के रिश्ते के बारे में लोगों को पता चलते ही जैसे बम फूटा था. नेहा तो जैसे रणचंडी बन गई थी, ‘‘तुम चाहते होगे कि तुम्हें तलाक दे दूं ताकि तुम उस कलमुंही के साथ गुलछर्रे उड़ा सको. कभी नहीं. अब समझ आया कि मुझ से क्यों भागते रहते हो. मुझे छोड़ तुम दूसरी शादी करने का सपना देख रहे हो. सारी उम्र अदालत के चक्कर काटते रहना, पर मैं तुम्हें तलाक देने वाली नहीं.’’

माला के साथ तो भानू ने और भी बुरा व्यवहार किया, शर्म नहीं आई तुझे, किसी और के साथ मुंह काला करते हुए…’’ यह तो उस ने कहा ही इस के अलावा उस ने पासपड़ोस वालों के सामने क्याक्या नहीं कहा. उस के बाद वह उसे रोज ही मारने लगा. बच्चे कुछ समझ नहीं पा रहे थे, इसलिए सहमे से रहते. जब कभी माला से मिलने वल्लभ घर जाता तो बच्चे कहते, ‘‘मम्मी, ये अंकल हमारे घर क्यों आते हैं? हमें अच्छा नहीं लगता. हमारे स्कूल फैं्रड्स कहते हैं कि आप दूसरी शादी करने वाली हो. मम्मी, पापा जैसे भी हैं हमें उन्हीं के साथ रहना है.’’

फिर एक वक्त ऐसा आया जब भानू तो तलाक देने को तैयार हो गया. पर उस की शर्त थी कि वह उसे तलाक और बच्चों को कस्टडी तभी देगा जब वह उसे क्व20 लाख देगी. माला कहां से लाती इतनी बड़ी रकम. तब से यानी पिछले 5 सालों से माला और वल्लभ दोनों तलाक पाने के लिए लड़ रहे हैं, पर कोई फैसला ही नहीं हो पा रहा है. समय के साथसाथ पैसा भी खर्च हो रहा है और माला और वह साथसाथ नहीं रह सकते, इसलिए दोनों अलगअलग रह रहे हैं.मोबाइल बजा तो वल्लभ की तंद्रा भंग हुई. 9 बज गए थे. उस ने लाइट जलाई. फोन पर माला थी. ‘‘वल्लभ, मैं तो अदालत के चक्कर लगातेलगाते तंग आ गई हूं. भानू ने आज तो मुझे धमकी दी है कि जल्दी ही मैं ने उसे पैसे नहीं दिए तो वह बच्चों को ले कर कहीं दूर चला जाएगा. कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं,’’ कहते हुए माला रो रही थ, लेकिन आज वल्लभ के पास कुछ कहने के लिए शब्द ही नहीं थे. कैसे कहे वह कि माला सब ठीक हो जाएगा, तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे साथ हूं. कहां कुछ ठीक हो पा रहा है? ‘‘कल मिल कर बात करते हैं,’’ कह कर वल्लभ ने फोन काट दिया.

इन 5 सालों में उस के बालों की सफेदी चमकने लगी थी. काम में ध्यान नहीं लगा पाने के कारण प्रमोशन हर बार रुक जाता था. मां अलग नाराज थीं कि चाहे बीवी जैसी हो उस के साथ निभाना ही पड़ता है. इस चक्कर में बहन की शादी भी नहीं हो पा रही थी. सारे रिश्तेदारों ने उस से मुंह मोड़ लिया था. समाज से कट गया था वह पूरी तरह और औफिस में भी वह मजाक का पात्र बन गया था.

माला से प्यार करने की उसे इतनी बड़ी सजा मिलेगी उस ने कहां सोचा था. कहां तो उस ने सोचा था कि नेहा से तलाक ले कर माला के साथ एक खुशहाल जिंदगी बिताऊंगा, पर यहां तो सब उलटा हो गया था. इतनी मुसीबतें झेलने से तो अच्छा था कि वह कर्कशा बीवी के साथ ही जिंदगी गुजार लेता. उस का तो अब यह हाल है कि न माया मिली न राम. ‘‘आखिर हमें क्या मिला वल्लभ? माना कि भानू के साथ मैं कभी सुखद जीवन जीने की बात तो छोड़ो उस के सपने भी नहीं देख पाई, पर उस से अलग हो कर भी कहां सुखी हूं? मेरे बच्चे तक अब मुझ से मिलना नहीं चाहते हैं और तुम से भी दूर ही तो रहना पड़ रहा है. समाज मुझे ऐसे देखता है मानो पति को छोड़ मैं ने कोई बड़ा अपराध किया है. 40 साल की हो गई हूं और कुछ सालों में बुढ़ापा छा जाएगा, तब मेरा क्या होगा? दिनरात की भागदौड़ में कैरियर भी ठीक से बन नहीं पाया है और मेरे मांबाप तक ने मेरा साथ देने के लिए मना कर दिया है,’’ वल्लभ से मिलते ही जैसे माला के अंदर भरा गुबार बाहर निकल आया.

‘‘मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही है माला, पर अब कर भी क्या सकते हैं?’’ वल्लभ ने एक आह भरी.

‘‘जानते हो जिन के घर में मैं बतौर पेइंग गैस्ट रहती हूं, वे अकसर कहती हैं कि जैसे आप पेरैंट्स चूज नहीं कर सकते हो, वैसे ही पार्टनर के बारे में अपनी तरफ से कोई फैसला नहीं ले सकते हो. जिस से एक बार शादी हो जाए, वह जैसा है उसे वैसा ही ऐक्सैप्ट कर लो. यही प्रैक्टिकल ऐप्रोच मानी जाती है.’’

वल्लभ को लगा कि वे माला से ठीक ही कह रही थीं. आखिर माला और उसे शादी के बाद प्यार में पड़ कर क्या मिला? तलाक न जाने कब मिले और कोई गारंटी भी नहीं कि मिलेगा भी कि नहीं. एक हफ्ते बाद फिर उन के केस की सुनवाई हुई. नेहा अड़ी हुई थी कि वह तलाक नहीं देगी और भानू पैसे मांग रहा था. अदालत की सीढि़यां उतरते हुए माला और वल्लभ ने एकदूसरे को इस तरह देखा कि मानों पूछ रहे हों कि अब क्या करें? दोनों के पास इस का कोई उत्तर नहीं था पर शायद भीतर ही भीतर दोनों समझ गए थे कि तलाक लेने का उन का फैसला गलत था. शादीशुदा हो कर प्यार करना और उसे निभाना उतना आसान नहीं है, जितना कि उन्होंने सोचा था. दोनों चुपचाप एक बैंच पर जा कर बैठ गए. जिंदगी उन्हें जिस मोड़ पर ले आई थी वहां से लौटना क्या अब आसान होगा? थोड़ी देर बाद माला उठी और बिना कुछ कहे चल दी. हर बार की तरह वल्लभ ने उस से न घर तक छोड़ आने की बात कही और न ही उस ने कार में बैठते हुए अदालत की उन सीढि़यों को देखा, जिन पर चलतेचलते उन दोनों के पैर ही नहीं दिलोदिमाग भी थक गया था. Hindi Love Stories

Family Story : दो लाख – धर्म सिंह का चेहरा लाल क्यों पड़ गया ?

Family Story : कर्नल धर्म सिंह जैसे ही अपने दफ्तर से निकले कि उन के ड्राइवर ने तेजी दिखाते हुए कार का दरवाजा खोला, पर कर्नल ने इशारे से ड्राइवर को अपने पास बुलाया और उसे बाजार से कुछ सामान लाने का आदेश दिया. फिर वे अपने घर की ओर पैदल ही चल पड़े. दफ्तर से घर का रास्ता मुश्किल से कुछ ही गज की दूरी पर था. पत्नी रजनी ने कर्नल धर्म सिंह को पहले ही मोबाइल फोन पर सूचना दे दी थी कि उन के गांव के रिश्ते के चाचा रघुवीर सिंह अपने बेटे ज्ञानेश के साथ उन से मिलने आए हैं.

कर्नल धर्म सिंह अपने गांव से आने वाले किसी भी शख्स की खूब आवभगत करते थे. गांव से उन का प्यार और मोह भंग नहीं हुआ था. रघुवीर चाचा से मिलते ही कर्नल धर्म सिंह ने उन के पैर छुए और चाचा ने भी उन्हें अपने गले से लगा लिया. ज्ञानेश ने भी पूरी इज्जत के साथ कर्नल धर्म सिंह के पैर छुए. बातचीत का दौर चला, फिर चाचा रघुवीर सिंह अपने मुद्दे पर आ गए. उन्होंने कहा, ‘‘बेटा धर्म सिंह, तुम्हारा यह छोटा भाई ज्ञानेश अगले हफ्ते मेरठ में लगने वाले सेना के भरती कैंप में जाने की तैयारी कर रहा है.’’ ‘‘चाचाजी, देश की सेवा से बढ़ कर तो कोई चीज हो ही नहीं सकती. ज्ञानेश जैसे हट्टेकट्टे नौजवानों के सेना में शामिल होने से सेना तो मजबूत होगी ही, हमारे गांव का नाम भी रोशन होगा,’’ कर्नल धर्म सिंह ने कहा.

‘‘बेटा, मैं इसीलिए तो तुम्हारे पास आया हूं कि तू इस की कुछ मदद कर दे.’’

‘‘चाचाजी, यह भी कोई कहने की बात है. ज्ञानेश मेरा छोटा भाई है. इस के कसरती बदन को देख कर ही लग रहा है कि यह सेना के लिए फिट है. रही बात लिखित इम्तिहान की तो इस के लिए मैं कुछ किताबें बता देता हूं, उन से पढ़ाई कर के यह अच्छी तैयारी कर ले.’’ यह सुन कर चाचा रघुवीर सिंह कुछ देर के लिए चुप हो गए, उन के चेहरे की रंगत भी हलकी पड़ गई. फिर कुछ सोच कर वे धीरे से बोले, ‘‘धर्म सिंह, तैयारी तो इस ने खूब कर रखी है. हकीकत तो यह है कि आजकल बिना लिएदिए कोई बात नहीं बनती.’’

‘‘चाचाजी, सेना की भरती में यह सबकुछ नहीं चलता है. हमारा सिस्टम भले ही कितना भी खराब क्यों न हो गया हो, हमारी सेना अभी भी साफसुथरी है. आखिर देश की हिफाजत का सवाल जो है.’’

कर्नल धर्म सिंह की यह बात सुन कर चाचा रघुवीर सिंह मुसकरा दिए और फिर बड़े यकीन से बोले, ‘‘धर्म सिंह, मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हें अभी सिस्टम की सही जानकारी नहीं है या फिर तुम अपनी सेना को पाकसाफ बताने की बहानेबाजी कर रहे हो.

‘‘आसपास के गांवों के 5 लोगों के नाम तो मैं यहां बैठे-बैठे बता सकता हूं, जिन्होंने अपने बेटों की भरती में 2-2 लाख रुपए खर्च किए हैं.’’ यह बात सुन कर धर्म सिंह दंग रह गए. वे जानते थे कि सेना की भरती में ऐसा कुछ नहीं होता है और भरती मुहिम के दौरान कोई ऐसा कर भी नहीं सकता है. सबकुछ बड़ी साफगोई और सेना के बड़े अफसरों की निगरानी में होता है. उन्होंने चाचा रघुवीर सिंह को सबकुछ समझाने की कोशिश की, लेकिन सब फेल. फिर चाचा रघुवीर सिंह ने जो कहा, वह किसी भी ईमानदार और देशभक्त सेनाधिकारी के लिए असहनीय था.

चाचा रघुवीर सिंह ने कहा, ‘‘बेटा धर्म सिंह, ऐसा लगता है कि तुम हमें बातों में उलझा रहे हो और हमारा काम नहीं करना चाहते. यह मत सोचो कि मैं यहां खाली हाथ आया हूं.’’

फिर चाचा रघुवीर सिंह ने अपनी अचकन में हाथ डाला और एकएक हजार रुपए के नोटों की 2 गड्डियां मेज पर रख दीं और कहा, ‘‘धर्म सिंह, गिन लो, पूरे 2 लाख रुपए हैं.’’

कर्नल धर्म सिंह का चेहरा नोटों की गड्डियों को देख कर लाल हो गया. अगर चाचा रघुवीर सिंह की जगह कोई और होता, तो उन्होंने उसे घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया होता या जेल में भिजवा दिया होता. कर्नल धर्म सिंह ने अपने गुस्से को शांत करने के लिए आधा गिलास पानी पीया, फिर यह सोचते हुए कि चाचाजी को समझाना बेकार है और चाचाजी के उन पर बहुत से एहसान हैं, इसलिए उन्होंने वे दोनों गड्डियां उठा कर अपने पास रख लीं. इस से चाचा रघुवीर सिंह तो खुश हो गए, लेकिन रजनी पसोपेश में पड़ गई. रजनी को समझ में नहीं आया कि उन का यह देशभक्त पति इतनी आसानी से बेईमान कैसे हो गया? क्या पैसे में इतनी ताकत होती है, जो कर्नल धर्म सिंह जैसे ईमानदारों का भी ईमान बिगाड़ दे?

जब कर्नल धर्म सिंह ने रजनी से दोनों गड्डियों को लौकर में रखने को कहा, तो वे उन पर बिगड़ गईं और बोलीं, ‘‘तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि मैं इन पैसों को हाथ भी लगाऊंगी? तुम ने अपना ईमान खो दिया तो क्या तुम उम्मीद करते हो कि सूबेदार की यह बेटी भी अपना ईमान खो देगी? लानत है तुम पर…’’ रजनी ने अपनी भड़ास निकालते हुए वह सबकुछ कह दिया, जो कहना नहीं चाहिए था. फिर कर्नल धर्म सिंह ने उन्हें कुछ ऐसा समझाया कि वे बुझे मन से उन गड्डियों को लौकर में रख आईं.

सेना में भरती का दिन आ गया. ज्ञानेश ने शारीरिक टैस्ट में अपना दमखम दिखाया और उस का आसानी से चुनाव हो गया. चाचा रघुवीर सिंह तो फूले नहीं समा रहे थे.

वे बारबार ज्ञानेश से कह रहे थे, ‘‘देखा बेटे, गड्डियों का असर. अब तू लिखित इम्तिहान में भी पास होगा.’’

कुछ दिनों बाद लिखित इम्तिहान हुआ. ज्ञानेश ने उस की भी खूब तैयारी की थी. कर्नल धर्म सिंह की बताई किताबों को उस ने खूब पढ़ा था. नतीजा वही रहा कि लिखित इम्तिहान में भी ज्ञानेश ने बाजी मार ली. चाचा रघुवीर सिंह का तो खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था. गांव में लड्डू बांटते समय वे 2 लाख रुपए वाली बात किसी को बताना नहीं भूलते थे. फिर उन्होंने कर्नल धर्म सिंह के लिए भी देशी घी के 2 किलो स्पैशल लड्डू तैयार कराए. अगले ही दिन वे ज्ञानेश को ले कर कर्नल धर्म सिंह की कोठी पर जा पहुंचे.

कर्नल धर्म सिंह ने पहले की तरह ही दोनों की आवभगत की. चाचा रघुवीर सिंह तो पूरे जोश में थे. उन से यह बताने से रुका नहीं जा रहा था कि 2 लाख रुपए की वजह से ही ज्ञानेश को यह कामयाबी मिली. उसी जोश में वे पूछ बैठे, ‘‘धर्म सिंह, पैसे कम तो नहीं पड़े? आखिर सब को हिस्सा देना पड़ता है न. तुम्हारे पल्ले भी कुछ पड़ा है कि नहीं?’’

कर्नल धर्म सिंह को यह बात करेले की तरह कड़वी तो लगी ही, नुकीले कांटे की तरह दिल में भी चुभी. लेकिन उन्होंने बड़े सब्र से कहा, ‘‘चाचाजी, मेरे पल्ले तो सबकुछ पड़ गया.’’

‘‘मतलब, तुम ने किसी को कुछ भी नहीं दिया. अकेले ही….’’

‘‘हां चाचाजी… और क्या करता? जरा एक मिनट रुको, मैं अभी आया.’’

कर्नल धर्म सिंह उठ कर दूसरे कमरे में चले गए. चाचा रघुवीर सिंह ने इतराते हुए कहा, ‘‘देखा ज्ञानेश, आज की दुनिया में लोग कैसे पैसे के लिए मरते हैं. धर्म सिंह उस दिन कैसी बड़ीबड़ी बातें कर रहा था, लेकिन देखो कैसे अकेले ही 2 लाख रुपए हड़प गया.’’ तभी कर्नल धर्म सिंह एकएक हजार की 2 गड्डियां ले कर कमरे में दाखिल हुए. उन के हाथों में नोटों की गड्डियां देख कर रघुवीर सिंह कुछ सोच में पड़ गए.

कर्नल धर्म सिंह ने दोनों गड्डियां उन के सामने रखते हुए कहा, ‘‘चाचाजी, ये रहे आप के 2 लाख रुपए.’’

‘‘हां, लेकिन इन का मैं क्या करूं? इन पर तो तुम्हारा हक है. तुम ने तो सारा काम कराया है.’’

‘‘हां चाचाजी, मैं ने कोई काम नहीं कराया है और न ही कोई सिफारिश की है. ज्ञानेश का काम अपनी काबिलीयत से हुआ है. हमारी सेना में ऐसा कुछ नहीं होता, जैसा कि आप लोग सोचते हैं.’’

‘‘तो फिर तुम ने उस दिन 2 लाख रुपए क्यों रख लिए थे?’’

‘‘आप के 2 लाख रुपए दलालों के चंगुल से बचाने के लिए. मगर उस दिन मैं 2 लाख रुपए सहित वापस भेज देता, आप किसी दलाल के चंगुल में जा कर फंसते, जैसे आप के वे लोग फंसे हैं, जिन की आप ने उस दिन चर्चा की थी.’’

‘‘मतलब उन के बेटों की भरती भी उन की अपनी मेहनत से हुई थी, लेनदेन से नहीं?’’

‘‘हां चाचाजी. उस दिन भी तो मैं आप को यही समझा रहा था, लेकिन आप की समझ में बात नहीं आ रही थी.

‘‘दलाल लोगों से पैसे ले लेते हैं, काम हो जाता है तो कह देते हैं, काम हम ने कराया है. अगर काम नहीं होता है, तो वे बड़ी मुश्किल से कुछ ही पैसा वापस करते हैं.’’

‘‘हां बेटा, रामरतन का काम न होने पर उस का बड़ी मुश्किल से आधा पैसा ही वापस किया था. दलाल कहते थे कि खिलानेपिलाने में आधा पैसा खर्च हो गया. उन्होंने तो पूरी कोशिश की थी, लेकिन काम नहीं बना, तो वे क्या करें.’’

‘‘चाचाजी, आप गांव के अपने आदमी थे, इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा, नहीं तो मुझे ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी. अब इन पैसों को आप अपनी अचकन में रख लो.’’ चाचाजी ने धीरे से दोनो गड्डियां उठा कर अचकन में रखीं. वे एक निगाह कर्नल धर्म सिंह को देखते और दूसरी निगाह खाली होते हुए चाय के प्याले में डालते. बस, अब उन्हें चाय खत्म होने और कर्नल धर्म सिंह से विदाई की इजाजत लेने का इंतजार था. Family Story 

Social Story In Hindi : गलतियां सभी से होती हैं

Social Story In Hindi : दुलहन के जोड़े में सजी रोली बेहद ही खूबसूरत और आकर्षक लग रही थी. वैसे तो रोली प्राकृतिक रूप से खूबसूरत थी, परंतु आज ब्यूटीपार्लर के ब्राइडल मेकअप ने उस के चेहरे पर चार चांद लगा दिया था, किंतु उस के कमनीय चेहरे पर आकुलता थी. उस की नजरें रिसेप्शन में आ रहे मेहमानों पर ही टिकी हुई थीं. उस की निगाहें बेसब्री से किसी के आने का इंतजार कर रही थीं.

रोली को इस प्रकार परेशान देख वीर उस के हाथों को थामते हुए बोला, “क्या बात है? आर यू ओके?”

रोली होंठों पर फीकी सी मुसकान लिए बोली, “यस… आई एम ओके, परंतु थोड़ी सी थकान लग रही है.”

ऐसा सुनते ही वीर ने कहा, “पार्टी तो काफी देर तक चलेगी. तुम चाहो तो कुछ देर रूम में रिलैक्स हो कर आ जाओ.”

वीर के ऐसा कहने पर रोली रूम में चली आई और फौरन मोबाइल फोन निकाल नंबर डायल करने लगी. फोन बजता रहा, लेकिन किसी ने नहीं उठाया.रोली दुखी हो कर वहीं सोफे पर पसर गई.

उसे डौली आंटी याद आने लगी. आज वह जो भी है, उन्हीं की वजह से है वरना वह तो इस महानगरी में गुमनामी की जिंदगी जीने की ओर अग्रसर थी. वो डौली आंटी ही थीं, जिन्होंने वक्त पर उस का हाथ थाम लिया और वह उस गर्त में जाने से बच ग‌ई.

आज उस का प्यार वीर उस के साथ है. यह भी डौली आंटी की ही देने है. पर, अब तक वे आई क्यों नहीं? उन्होंने तो वादा किया था कि वे अंकल के साथ उस की शादी में जरूर आएंगी.

यही सब सोचती हुई रोली वहां पहुंच गई. अपने परिवार वालों से जिद कर वह एक सफल इंटीरियर डिजाइनर बनने का इरादा मन में ठाने जब अपने छोटे से शहर जौनपुर से दिल्ली आई थी.

यहां दिल्ली यूनिवर्सिटी में आ कर उस ने जो देखा, उसे देख वह भौंचक्की सी रह गई. यहां सभी लड़केलड़कियां बिना किसी पाबंदी के उन्मुक्त बिंदास अंदाज में खुल कर जीता देख रोली खुशी से उछल पड़ी. ऐसा उस ने पहले कभी नहीं देखा था.यहां ना तो कोई किसी को रोकने वाला था और ना ही कोई टोकने वाला, जैसा चाहो वैसा जियो.

रोली भी अब आजाद पंछी की भांति आकाश में उड़ने को तैयार थी.

वहां जौनपुर में दादी, मम्मीपापा, चाचाचाची, ताऊ यहां तक कि उस का छोटा भाई भी उस पर बंदिशें लगाता. हर छोटीबड़ी बातों के लिए उसे अनुमति लेनी पड़ती, परंतु यहां ऐसा कुछ नहीं था.

यहां रोली स्वयं अपनी मरजी की मालकिन थी. वह वो सब कर सकती थी, जो उस का दिल चाहता.

दिल्ली में आने के पश्चात रोली अपना लक्ष्य भूल यहां के चकाचौंध में खो गई. वह तो अपनी रूम पार्टनर रागिनी के संग जिंदगी के मजे लूटने लगी.

रागिनी उस से एक साल ‌सीनियर थी और हर मामले में स्मार्ट, र‌ईस लड़कों को अपनी अदाओं से रिझाना, उन्हें फांसना और उन से पैसे खर्च कराना, ये सारे हुनर उसे बखूबी आते थे, लेकिन रोली इन सब बातों से बेखबर बस रागिनी के बोल्डनेस और उस के बिंदास जीने के अंदाज की कायल थी.

रोली बिना सोचेसमझे कालेज में दिखावा और खुद को मौडल बताने के चक्कर में पैसे खर्च करने लगी. उसे इस बात का भी खयाल ना रहा कि वह एक मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार से ताल्लुक रखती है, जहां पैसे हिसाब से खर्च किए जाते हैं.

अपने घर की सारी परिस्थितियों से भलीभांति अवगत होने के बावजूद रोली रागिनी के रंग में रंगने लगी. केवल अब तक वह सिगरेट और शराब से बची हुई थी, लेकिन रागिनी को बिंदास धुआं उड़ाते, कश लगाते और पी कर लहराते देख कभीकभी उस का भी मन करता, लेकिन ना जाने कौन सी बात उसे रोक लेती. इस बार पैसे खत्म होने पर जब उस ने घर पर मां को फोन किया, तो मां भरे कंठ से बोली, “रोली, देखो बेटा हम हर महीने तुम्हें जितने पैसे भेजते हैं, तुम उसी से खर्च चलाने की कोशिश करो अन्यथा तुम्हें यहां वापस आना पड़ेगा.”

मां और भी कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उन के कहने से पहले ही रोली ने फोन काट दिया. होस्टल के कमरे में आई, तो उस ने देखा कि रागिनी अपना सारा सामान समेट कर कहीं जाने की तैयारी में है. यह देख रोली बोली, “कहां जा रही हो?”

रागिनी हंसते हुए अपने दोनों हाथ रोली के कंधे पर टिकाती हुई बोली, “ऐश करने, मेरी जान.”

रोली आश्चर्य से रागिनी को देखने लगी, तभीरागनी धुआं उड़ाती हुई बोली, “नहीं समझी मेरी मोम की भोली गुड़िया, मैं सौरभ के पास जा रही हूं. अब हम दोनों साथ ही रहेंगे. उस के बाप के पास बहुत माल है. उसे उड़ाने के लिए कोई तो चाहिए ना, सो मैं जा रही हूं. वैसे भी सौरभ मुझ पर लट्टू है.”

यह सुनते ही रोली बोली, “लेकिन…”

रागिनी उसे बीच में ही टोकती हुई बोली, “लेकिन क्या…? माई स्विट हार्ट मुझे मालूम है कि मैं क्या कर रही हूं. मेरी मान तो तू भी होस्टल छोड़ करबकिसी पीजी में रहने चली जा, फिर बिंदास रहना अपने वीर के साथ, समय पर होस्टल लौटने का कोई लफड़ा नहीं, अच्छा चलती हूं… फिर मिलते हैं,” कहती हुई रागिनी झूमते हुए चली गई.

रागिनी के होस्टल से चले जाने के पश्चात रोली भी कुछ दिनों में होस्टल छोड़ पीजी में डौली आंटी के यहां आ गई.

यहां आने के बाद उसे पता चला कि यहां रहना इतना आसान नहीं है. लोग डौली आंटी के बारे में तरहतरह की बातें किया करते थे. कोई उन्हें खड़ूस, कोई पागल, तो कोई उन्हें सीसीटीवी कहता, क्योंकि उन की नजरों से कुछ भी छुपना नामुमकिन था. आसपड़ोस की महिलाएं तो उन से बात करने से भी कतरातीं, सब कहतीं कि न जाने कब ये सनबकी बुढ़िया किस बात पर सनक जाए.

डौली आंटी की टोकाटाकी की वजह से कोई ज्यादा दिनों तक यहां टिकता भी नहीं था, लेकिन रोली का अब यहां रहना मजबूरी था, क्योंकि वह होस्टल छोड़ चुकी थी और सब से बड़ी बात डौली आंटी पैसे भी कम ले रही थी, यहां से कालेज की दूरी भी ज्यादा नहीं थी, जिस की वजह से बस और रिकशा के पैसे भी बच रहे थे और साथ ही साथ डौली आंटी के हाथों में वो जादू था कि वह जो भी खाना बनाती स्वादिष्ठ और लजीज होता, उस में बिलकुल मां के हाथों का स्वाद होता.

सब ठीक था, लेकिन डौली आंटी की टोकाटाकी और जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप रोली को नागवार गुजरने लगा. वह वीर के साथ भी वैसे समय नहीं बिता पा रही थी, जैसा उस ने सोचा था.
जब उस ने वीर से इस बारे में बात की, तो वह कहने लगा, “आंटी स्ट्रिक्ट है तो क्या हुआ… वह तुम्हारा भला ही चाहती है. 1-2 साल में मेरा प्रमोशन हो जाएगा. कंपनी की ओर से मुझे फ्लेट भी मिल जाएगा और तुम्हारा ग्रेजुएशन भी पूरा हो जाएगा, फिर हम शादी कर साथ रहेंगे.”

वीर से यह सब सुन रोली स्तब्ध रह ग‌ई. वह तो उस से शादी करना ही नहीं चाहती. वह तो बस वीर को अपनी खूबसूरती और मोहपाश के झूठे जाल में केवल पैसों के लिए बांध रखी थी और वह भी रागिनी के कहने पर, लेकिन अब वीर उस से शादी की सोच रहा है. यह जान कर रोली विचलित हो ग‌ई.

अपसेट रोली घर पहुंची, तो उस ने देखा कि डौली आंटी और अंकल कहीं जाने की तैयारी में हैं. उसे देखते ही आंटी बोली, “रोली बेटा मैं और अंकल एक शादी में जा रहे हैं. कल रात तक लौटेंगे. तुम अपना और घर का खयाल रखना, रात को दरवाजा अच्छी तरह बंद कर लेना,” इतना कह कर वे दोनों चले गए.

परेशान रोली को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे. तभी रागिनी का फोन आया.

रोली उसे फोन पर सारी बातें बता कर इस समस्या से बाहर निकलने का हल पूछने लगी, तो रागनी ने कहा, “डोंट वरी डियर, आज रात मैं तेरे रूम पर आती हूं. दोनों पार्टी करते हैं और सोचते हैं कि क्या करना है.”

रोली नहीं चाहती थी कि रागिनी आए, लेकिन वह उसे मना ना कर सकी. रागिनी शराब, सिगरेट और दो चीज पिज्जा ले कर पहुंची.

ये सब देख कर रोली चिढ़ती हुई बोली, “तू ये सब क्या ले कर आई है? आंटी को पता चल गया, तो वह मुझे निकाल देगी.”

“चिल यार… किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. वैसे भी आंटी तो कल रात तक लौटेंगी?” कहती हुई रागिनी एक गिलास में शराब डालती हुई धुआं उड़ाने लगी.

रोली भी वीर की बातों से परेशान तो थी ही, वह भी सिगरेट सुलगा कर पीने लगी. तभी रागिनी अपने बैग से एक छोटी सी पुड़िया निकाल कर रोली को देती हुई बोली, “इसे ट्राई कर… ये जादू की पुड़िया है. इसे लेते ही तेरी सारी परेशानी उड़नछू हो जाएगी.”

यह सुन कर रोली पुड़िया खोल कर एक ही बार में ले ली. पुड़िया लेने के कुछ समय पश्चात वह बेहोश होने लगी. यह देख कर रागिनी उसे उसी हालत में छोड़ भाग गई.

जब रोली को होश आया, तो उस ने स्वयं को अस्पताल के बेड पर लेटा पाया, जहां एक ओर डौली आंटी डबडबाई आंखों से स्टूल पर बैठी थी और अंकल डाक्टर से कुछ बातें कर रहे थे.

रोली को होश में आया देख आंटी ने रोली का माथा चूम लिया. रोली घबराई हुई डौली आंटी की ओर देखने लगी, तभी आंटी रोली का हाथ अपने हाथों में लेती हुई बोली, “शादी में पहुंचने के बाद मैं ने रात को क‌ई दफे तुम्हें फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला, किसी अनहोनी के भय से हम उसी वक्त घर लौट आए. यहां आ कर देखा, तो बाहर का दरवाजा खुला था और तुम बेहोश पड़ी थी. पूरे कमरे में शराब की बोतल, सिगरेट और ड्रग्स के पैकेट पड़े थे. हम समझ गए कि आखिर माजरा क्या है.”

फिर आंटी लंबी सांस लेते हुए बोली, “तुम सब यह सोचते हो ना कि मैं इतनी खड़ूस, इतनी स्ट्रिक्ट क्यों हूं. मैं ऐसी इसलिए हूं, क्योंकि इसी ड्रग्स की वजह से मैं ने अपने एकलौते बेटे को खोया है…

“और मैं यह नहीं चाहती कि कोई भी मांबाप अपने बच्चे को इस वजह से खोए. मेरा बेटा भी तुम्हारी तरह आंखों में क‌ई सुनहरे सपने लिए बीई की पढ़ाई करने जालंधर गया था, लेकिन वहां जा कर वह बुरी संगत में पड़ ड्रग्स लेने लगा, क्योंकि वहां कोई रोकटोक करने वाला नहीं था और हर कोई बस यही सोचता था कि हमें क्या करना…?

“एक बार सप्ताहभर उस ने कोई फोन नहीं किया, हमारे फोन लगाने पर वह फोन भी नहीं उठा रहा था, तब हम परेशान हो कर उस के पास पहुंचे, तो पता चला कि वह ड्रग्स की ओवरडोज के कारण हफ्तेभर से अपने कमरे में बेहोश पड़ा है. उसे देखने वाला कोई नहीं था. हम उसे उसी हालत में यहां ले आए, लेकिन बचा ना सके.”

यह सब कहती हुई डौली आंटी फूटफूट कर रो पड़ी. रोली की आंखों के कोर में भी पानी आ गया.

आंटी ने आगे बताया कि तुम भी ड्रग्स के ओवरडोज की वजह से बेहोश पड़ी थी. आज पूरे 2 दिन बाद तुम्हें होश आया है.

यह सुन कर रोली की आंखें शर्म से झुक गईं. तभी आंटी बोली, “बेटी, गलतियां तो सभी से होती हैं, लेकिन उन गलतियों से सबक ले कर आगे बढ़ना ही जीवन है. अक्लमंदी और समझदारी इसी में है कि वक्त रहते उन्हें सुधार लिया जाए .”

फिर आंटी मुसकराती हुई बोली, “वीर एक अच्छा लड़का है. तुम्हें बहुत प्यार भी करता है और शायद तुम भी, वरना पिछले डेढ़ साल में रागिनी की तरह तुम भी क‌ई बौयफ्रेंड बदल चुकी होती.

“वीर तुम्हें क‌ई बार फोन कर चुका है, मैं ने उस से कहा है कि तुम हमारे साथ शादी में आई हो और अभी काम में व्यस्त हो.”

खटखट की आवाज से रोली वर्तमान में लौट आई. दरवाजा खोलते ही डौली आंटी और अंकल सामने खड़े थे. उन्हें देखते ही रोली आंटी से लिपट रो पड़ी, उसे शांत कराती हुई आंटी बोली, “रोते नहीं बेटा, अब तुम एक सफल इंटीरियर डिजाइनर हो. तुम सफलता के उस शिखर पर हो, जहां पहुंचने का सपना लिए तुम इस महानगरी में आई थीं. आज खुशी का दिन है,अब आंसू पोंछो और चलो वीर तुम्हारा पार्टी में इंतजार कर रहा है.” Social Story In Hindi 

Social Story : मर्यादा – मर्दों की फितरत जान कर फायदा उठाना स्वाति खूब जान गई थी

Social Story : रात के 12 बज रहे थे, लेकिन स्वाति की आंखों में नींद नहीं थी. वह करवटें बदल रही थी. उस की बगल में लेटा पति वरुण गहरी नींद में खर्राटे भर रहा था. स्वाति दिन भर की थकान के बाद भी सो नहीं पा रही थी. आज का घटनाक्रम बारबार उस की आंखों में घूम रहा था. आज ऐसा कुछ हुआ कि वह कांप कर रह गई. जिसे वह सिर्फ खेल समझती थी वह कितना गंभीर हो सकता है, उसे इस बात का भान नहीं था. वह मर्दों से हलकाफुलका मजाक और फ्लर्टिंग को सामान्य बात समझती थी. स्वाति अपनी फ्रैंड्स और रिश्तेदारों से कहती थी कि उस की मार्केट में इतनी जानपहचान है कि कोई भी सामान उसे स्पैशल डिस्काउंट पर मिलता है.

स्वाति फोन पर अपने मायके में भाभी से कहती कि आज मैं ने वैस्टर्न ड्रैस खरीदी. इतनी बढि़या और अच्छे डिजाइन में बहुत सस्ती मिल गई. मैं ने साड़ी बिलकुल नए कलर में खरीदी. 1000 की है पर मुझे सिर्फ 500 में मिल गई. डायमंड रिंग अपनी फ्रैंड से और्डर दे कर बनवाई. ऐसी रिंग 2 लाख से कम नहीं, परंतु मुझे 11/2 लाख में मिल गई. भाभी की नजरों में स्वाति की छवि बहुत ही समझदार और पारखी महिला के रूप में थी. वह जब भी कोई सामान खरीद कर भेजने को कहती, स्वाति खुशीखुशी भिजवा देती. पूरे परिवार में उस के नाम का डंका बजता था.

स्वाति आकर्षक नैननक्श वाली पढ़ीलिखी महिला थी. बचपन से ही उसे खरीदारी का बेहद शौक था. लाखों रुपए की खरीदारी इतने कम दाम और चुटकियों में करती कि हर कोई हैरान रह जाता. स्वाति का मायका मिडल क्लास फैमिली से था. 15 साल पहले एक बड़े उद्योगपति परिवार में उस की शादी हुई. शादी भले ही करोड़पति घर में हो गई, लेकिन संस्कार वही मिडल क्लास फैमिली वाले ही थे. 1-1 पैसे की कीमत वह जानती थी. घर खर्च में पैसा बचाना और उस पैसे से स्वयं के लिए खरीदारी करने में उसे बहुत मजा आता. पति से भी पैसे मारना स्वाति को अच्छा लगता था. अच्छे संस्कार, पढ़ीलिखी और समझदार स्वाति को एक बात बड़ी आसानी से समझ आ गई थी कि पुरुषों की कमजोरी क्या है. कैसे कम रेट पर खरीदारी करनी है. वह उस दुकान या शोरूम में ही खरीदारी करती जहां पुरुष मालिक होते. वह सेल्समैन से बात नहीं करती. सेल्समैन से वह कहती, ‘‘आप तो सामान दिखा दो, रेट मैं अपनेआप भैया से तय कर लूंगी.’’

और जब हिसाबकिताब की बारी आती, तो वह सेठ की आंखों में आंखें डाल कर कहती, ‘‘भैया सही रेट बताओ. आज की नहीं 10 सालों से आप की शौप पर आ रही हूं.’’

‘‘भाभी, आप को रेट गलत नहीं लगेगा, क्यों चिंता करती हैं?’’ सेठ कहता.

‘‘नहीं, इस बार ज्यादा लगा रहे हो. मुझे तो स्पैशल डिस्काउंट मिलता है, आप की शौप पर,’’ कहते हुए स्वाति काउंटर पर खड़े सेठ के हाथों को बातोंबातों में स्पर्श करती या फिर कहती, ‘‘भैया, आप तो मेरे देवर की तरह हो. देवरभाभी के बीच रुपएपैसे मत लाओ न.’’

अकसर दुकानदार स्वाति की मीठीमीठी बातों में आ कर उसे 10-20% तक स्पैशल डिस्काउंट दे देते थे. एक ज्वैलर से तो स्वाति ने जीजासाली का रिश्ता ही बना लिया था. ज्वैलरी आमतौर पर औरतों की कमजोरी होती है, स्वाति की भी कमजोरी थी. वह अकसर इस ज्वैलर के यहां पहुंच जाती. क्याक्या नई डिजाइनें आई हैं, देखने जाती तो कुछ न कुछ पसंद आ ही जाता. तब जीजासाली के बीच हंसीमजाक शुरू हो जाता.

स्वाति कहती, ‘‘साली आधी घरवाली होती है जीजाजी, इतने ही दूंगी.’’

ज्वैलर स्वाति का स्पर्शसुख पा कर निहाल हो जाता. उस के मन में स्पर्श को आगे बढ़ाने की प्लानिंग चलती रहती, पर स्वाति थी कि काबू में ही नहीं आती थी. सामान खरीदा और उड़न छू. उस दिन भतीजी की शादी के लिए सामान व ज्वैलरी खरीदने स्वाति ज्वैलर के यहां पहुंच गई. उसे भाभी ने बताया था कि क्याक्या खरीदना है.

स्वाति ने घर से निकलने से पहले ही ज्वैलर को फोन किया, ‘‘भतीजी की शादी के लिए ज्वैलरी खरीदने आ रही हूं. आप अच्छीअच्छी डिजाइनों का चयन करा कर रखना. मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं होगा.’’

‘‘आप आइए तो सही साली साहिबा. आप के लिए सब हाजिर है,’’ ज्वैलर ने कहा. ज्वैलरी की यह दुकान कोई बड़ा शोरूम नहीं था, लेकिन वह खुद अच्छा कारीगर था और और्डर पर ज्वैलरी तैयार करता था. शहर की एक कालोनी में उस की दुकान थी जहां कुछ खास लोगों को और्डर पर तैयार ज्वैलरी भी दिखा कर बेच देता था और और्डर देने वाले को कुछ दिन बाद सप्लाई दे देता. स्वाति की एक फ्रैंड रजनी ने उस ज्वैलर्स से उस की मुलाकात कराई थी. लेकिन रजनी कभी यह बात समझ नहीं पाई थी कि आखिर यह ज्वैलर स्वाति पर इतना मेहरबान क्यों रहता है. उसे नईनई डिजाइनें दिखाता है और अतिरिक्त डिस्काउंट भी देता है.

‘‘जीजाजी, कुछ और डिजाइनें दिखाओ. ये तो मैं ने पिछली बार देखी थीं,’’ स्वाति ने ज्वैलर की आंखों में झांकते हुए कहा.

स्वाति को ज्वैलर की आंखों में शरारत नजर आ रही थी. वह बारबार सहज होने की कोशिश कर रहा था. अपनी आदत के मुताबिक स्वाति ने बातोंबातों में ज्वैलर के हाथों पर इधरउधर स्पर्श किया. उस का यह स्पर्श ज्वैलर को बेचैन कर रहा था. उस ने भी स्वाति की हरकतें देख हौसला दिखाना शुरू कर दिया. वह भी बातोंबातों में स्वाति के हाथों पर स्पर्श करने लगा. यह स्पर्श स्वाति को कुछ बेचैन कर रहा था, लेकिन वह सहज रही. उसे कुछ देर की हरकतों से स्पैशल डिस्काउंट जो लेना था. स्वाति ने देखा कि आज दुकान पर सिर्फ एक लड़का ही हैल्पर के तौर पर काम कर रहा था बाकी स्टाफ न था. ज्वैलर ने उसे एक सूची थमाते हुए कहा कि यह सामान मार्केट से ले आओ. और जाने से पहले फ्रिज में रखे 2 कोल्ड ड्रिंक खोल कर दे जाओ.’’

‘‘आप और नई डिजाइनें दिखाइए न,’’ स्वाति ने कहा.

‘‘हां, अभी दिखाता हूं. कल ही आई हैं. आप के लिए ही रखी हुई हैं अलग से.’’

‘‘तो दिखाइए न,’’ स्वाति ने चहकते हुए कहा.

‘‘आप ऐसा करें अंदर वाले कैबिन में आ कर पसंद कर लें. अभी अंदर ही रखी हैं… लड़का भी जा चुका है तो…’’

स्वाति ने देखा लड़का सामान की सूची ले कर जा चुका था. अब दुकान पर सिर्फ ज्वैलर और स्वाति ही थे. स्वाति को एक पल के लिए डर लगा कि अकेली देख ज्वैलर कोई हरकत न कर दे. वह ऐसा कुछ चाहती भी नहीं थी. वह तो सिर्फ कुछ हलकीफुलकी अदाएं दिखा कर दुकानदारों से फायदा उठाती आई थी. आज भी ऐसा कुछ कर के ज्वैलर से स्पैशल डिस्काउंट लेने की फिराक में थी. उस की धड़कनें बढ़ रही थीं. वह चाहती थी कि जल्दी से जल्दी खरीदारी कर के निकल ले. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था कि क्या करे. वह अपनेआप को संभाल कर कैबिन में ज्वैलरी देखने घुस गई. उस ने अपने शब्दों में मिठास घोलते हुए कहा, ‘‘जीजाजी, आज कुछ सुस्त लग रहे हो क्या बात है?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं है.’’

‘‘कोई तो बात है, मुझ से छिपाओगे क्या?’’

‘‘आप नैकलैस देखिए, साथसाथ बातें करते हैं,’’ ज्वैलर ने कहा. स्वाति गजब की सुंदर लग रही थी. वह बनठन कर निकली थी. ज्वैलर के मन में हलचल थी जो उसे बेचैन कर रही थी. उस ने सोचा कि हिम्मत दिखाई जा सकती है. अत: उस ने स्वाति के हाथ को स्पर्श किया तो वह सहम गई. लेकिन उस ने सोचा कि अगर थोड़ा छू लिया तो उस से क्या फर्क पड़ेगा. स्वाति के रुख को देख ज्वैलर का हौसला बढ़ गया. उस ने स्वाति का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा. ज्वैलर की इस आकस्मिक हरकत से वह हड़बड़ा गई.

‘‘क्या कर रहे हो?’’ स्वाति ने हाथ छुड़ाते हुए कहा.

ज्वैलर ने अपनी हरकत जारी रखी. स्वाति घबरा गई. ज्वैलर की हिम्मत देख दंग रह गई वह. मर्दों की कमजोरी का फायदा उठाने की सोच उसे भारी पड़ती नजर आ रही थी. वह कैसे ज्वैलर के चंगुल से बचे, सोचने लगी. फिर उस ने हिम्मत दिखाई और ज्वैलर के गाल पर थप्पड़ों की बारिश कर दी. स्वाति क्रोध से कांप रही थी. उस का यह रूप देख ज्वैलर हड़बड़ा गया. इसी हड़बड़ी में वह जमीन पर गिर गया. स्वाति के लिए यही मौका था कैबिन से बाहर निकल भागने का. अत: वह फुरती दिखाते हुए तुरंत कैबिन से बाहर निकल अपनी कार में जा बैठी. फिर तुरंत कार स्टार्ट कर वहां से चल दी. उस के अंदर तूफान चल रहा था. उसे आत्मग्लानि हो रही थी. लंबे समय से स्वाति जिसे खेल समझती आ रही थी, वह कितना गंभीर हो सकता है, उस ने यह कभी सोचा भी नहीं था. Social Story

Family Story In Hindi : बीवी ओल्ड, बीवी न्यू, बीवी गोल्ड, बीवी…

Family Story In Hindi : ज्योंज्यों जिंदगी टैक्निक से टैक्निकल होती जा रही है, त्योंत्यों इधर खुशियों के रूपस्वरूपों के साथसाथ डर के भी रूपस्वरूप बदलते जा रहे हैं. तकनीकी के इस युग में अनजाने लोगों से उतना डर नहीं लगता, जितना अनजाने नंबर की कौल से लगता है.
खाली जनधन खाते के सिवाय और तो मेरे पास कुछ भी नहीं, मगर फिर भी क्या पता किसी की अनजानी कौल सुनने पर वह मेरा खाली जनधन खाता और खाली कर जाए. असल में मैं ने जनधन खाता इसलिए खुलवाया था कि कम से कम उस में रसाई गैस की सब्सिडी आया करेगी, पर मजे की बात, उस में रसोई गैस की सब्सिडी कभी नहीं आई.

हे मेरी तरह के घरेलू कुत्ते उर्फ शेरो, घर के बाहर विदेशों से आयातित शेरों की तरह दहाड़ने वाले शुद्ध स्वदेशी सियारो, मैं सब के खुदा को हाजिर मान कर बयान से न बदलने वाला बयान दे रहा हूं, जिस का सोशल मीडिया जो चाहे मतलब निकाल ले, मेरा कहने का वही मतलब होगा कि मैं उतना अपनी बीवी को अटेंड करने से नहीं डरता, जितना अनजानी कौल अटेंड करने से डरता हूं. मैं उतना अपने ईमानदार, मेरे लिए समर्पित दोस्तों को अटेंड करने से भी नहीं डरता, जितना अनजानी कौल अटेंड करने से डरता हूं. इसलिए, मैं केवल उन्हीं नंबरों से आई कौल स्वीकारता हूं, जो मेरी कौंटैक्ट लिस्ट में हों. मैं अपनी बीवी तक की उसी कौल को अटेंड करता हूं, जो मेरी कौंटैक्ट लिस्ट में हो.

कल पता नहीं किस का फोन आया. मैं ने काट दिया. फिर उसी नंबर से दोबारा फोन आया, तो कुछ गुस्से से मैं ने फिर काट दिया. बाद में जब उन्होंने पुराने नंबर से फोन कर बताया तो पता चला कि गधे, ये तो अपने खास दोस्त का नया अननोन नंबर है. नंबर बदलने की परंपरा में ये उन का पांचवा नया नंबर था. पता नहीं क्यों वे उतनी जल्दी नंबर बदलते हैं, जितनी जल्दी गिरगिट भी रंग नहीं बदलता. पता नहीं क्यों वे उतनी जल्दी नंबर बदलते हैं जितनी जल्दी सांप भी केंचुली नहीं बदलता. नंबर बदलना उन का शौक है या कुछ और, वे ही जानें. चौथे दिन नंबर बदलने के पीछे आगे का राज वे ही जाने.

‘यार, मैं तुझे बारबार फोन कर रहा हूं और तू बारबार फोन काट रहा है?’ उन्होंने बेकार का सा शिकवा मुझ से किया, पर मैं ने उसे परे धकेल दिया, ‘अनजान नंबर था इसलिए…’

‘यह भी मेरा नया नंबर है.’

‘बंधु, तुम ही कहो, अब तुम्हारे कितने नंबर कैसे किसकिस नाम से सेव करूं? जब तुम्हारा मन करे, तुम नंबर बदल लेते हो,’ मैं ने अपना मोबाइल खुजलाते हुए वाजिब सा सवाल उठाया तो वे मुझे शांत कराते हुए बोले, ‘देखो दोस्त, मोबाइल है तो हर चौथे दिन नया नंबर है. आज आदमी के पास अपने मोबाइल के नंबर बदलने की ही तो बस एक औप्शन बचा है, सो बेचारा ईजीली बदल देता है. वैसे, आज आदमी आदमी न रह कर एक मोबाइल नंबर हो कर रह गया है. सो, टेक इट इजी यार.

‘देखो दोस्त, रिश्तों का अर्थ तो बहुत पहले बदल चुका था. दीनईमान का अर्थ भी बहुत पहले का बदल चुका है. इनसायित का अर्थ भी बहुत पहले बदल चुका है. नीयत का अर्थ भी बहुत पहले बदल चुका है. आदमियत का अर्थ भी बहुत पहले बदल चुका है. सच बोलने वाली जीभ भी बहुत पहले बदल चुकी है. सच सुनने वाले कान भी बहुत पहले बदल चुके हैं. समाजोपयोगी सोचने वाला दिमाग भी बहुत पहले बदल चुका है. ऐसे में अब कम से कम आदमी से नित अपने मोबाइल का नंबर बदलने का हक तो मत छीनो दोस्त… रही बात मेरा नया नंबर सेव करने की, तो तुम मेरा नया नंबर भी उसी तरह से सेव कर लो, जैसे एक आदर्श पति अपनी बीवी के तीनतीन नंबर यों सेव कर सेफ रहता है- बीवी ओल्ड, बीवी न्यू, बीवी गोल्ड, बीवी…

‘मेरा नंबर भी तुम उसी तरह सेव कर लो, जैसे हर आदर्श पत्नी अपने पति का हर नया नंबर सेव करती है- हसबेंड पुराने, हसबेंड नए, हसबेंड औफिस, हसबेंड इमर्जेंसी, हसबेंड टेंपरेरी, हसबेंड परमानेंट या फिर बेटा अपने पापा का हर नया नंबर यों सेव करता है- पापा पुराने, पापा नए, पापा घर, पापा औफिस या फिर…,’ बंधु ने 2,000 रुपए वाले नोट सी नसीहत दी, तो मैं ने अपने मोबाइल से अपना सिर फोड़ लिया. वे पास होते तो उन का भी फोड़ देता.

थैंक गौड, सिर फूटा तो फूटा, पर मोबाइल सहीसलामत रहा. सिर का क्या, जख्म हुआ तो हुआ, खून बहा तो बहा, चार दिन बाद सब ठीक हो जाएगा. न भी हुआ तो कौन सा नासूर बन जाएगा. बन भी जाए तो बन जाए, पर जो मोबाइल को कुछ हो जाता तो??? Family Story In Hindi

Bollywood : सैयारा ने लौटाई खुशियां, पर अनुपम खेर और सिन्हा परिवार की डूबी लुटिया

Bollywood : बौलीवुड में 2025 की पहली छमाही एकदम सूखी गई. कई सिंगल थिएटरों ने तो बंद करने का ऐलान कर दिया था. बौलीवुड के कई फिल्मकार खुलेआम कहने लगे थे कि अब दर्शक सिनेमाघर जा कर फिल्म ही नहीं देखना चाहता.लेकिन जुलाई माह के तीसरे सप्ताह यानी कि 18 जुलाई को स्थितियां एकदम से बदल गई और यह कारनामा नए कलाकारों के अभिनय से सजी मोहित सूरी निर्देशित फिल्म ‘‘सैयारा’’ की वजह से ही संभव हो पाया.

जुलाई माह के तीसरे सप्ताह यानी कि 18 जुलाई को एक साथ तीन फिल्में रिलीज की गई.पहली अनुपम खेर की फिल्म ‘तनवी द ग्रेट’,दूसरी षत्रुघ्न सिन्हा के बेटे कुष सिन्हा व बेटी सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म ‘निकिता रॉय’ तथा तीसरी मोहित सूरी की फिल्म ‘सैयारा’.

18 जुलाई को पहली फिल्म रहस्य व रोमांच से भरपूर ‘निकिता रॉय’ रिलीज हुई थी,जिसके निर्माता व निर्देषक अपने समय के मषहूर अभिनेता व पूर्व सांसद षत्रुघ्न सिन्हा के बेटे कुष सिन्हा हैं.फिल्म में काफी की बहन सोनाक्षी सिन्हा के साथ अर्जुन रामपाल व परेष रावल की मुख्य भूमिका है.इस फिल्म के लिए कुष सिन्हा व सोनाक्षी सिन्हा ने कोई फीस नहीं ली. 25 करोड़ रूपए की लागत में बनी यह फिल्म पूरे 7 दिन में केवल एक करोड़ रूपए ही एकत्र कर सकी.

दूसरी फिल्म अनुपम खेर की ‘‘तनवी द ग्रेट’ रिलीज हुई. 23 साल बाद इस फिल्म के निर्देशन से अभिनेता अनुपम खेर ने निर्देशन में वापसी की, जो कि बुरी तरह से असफल रही. फिल्म का निर्माण अनुपम खेर ने सरकारी संस्थान ‘राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम’ के सहयोग से किया है. तनवी के मुख्य किरदार में नवोदित अभिनेत्री सुभंगी दत्त को उन्होंने ब्रेक दिया.

फिल्म को ओटिज्म की शिकार लड़की की कहानी के रूप में प्रचारित किया गया. जो कि ओटिज्म से ग्रसित होने के बावजूद आर्मी में भर्ती हो कर सियाचीन ग्लेशियर की सब से उंची चोटी पर जा कर तिरंगे झंडे को सलामी देना चाहती है. अफसोस इस फिल्म में ओटिज्म और आर्मी को छोड़ की बाकी सारी बातें हैं.

इस फिल्म ने पूरे सप्ताह भर में बौक्स औफिस पर केवल एक करोड़ 90 लाख रूपए ही एकत्र किए. अनुपम खेर अपनी इस फिल्म का बजट बताने को तैयार नहीं हैं. पर वह रोना रो रहे हैं कि उन्होंने 10 लोगों से पैसे ले कर इस फिल्म को बनाया था और अब वह बुरी तरह से नुकसान में आ गए हैं.

18 जुलाई को ही ‘यशराज फिल्म्स’ निर्मित तथा मोहित सूरी निर्देशित फिल्म ‘सैयारा’ रिलीज हुई, जो कि 2004 की सफल कोरियन फिल्म ‘‘ए मोमेंट टू बी रिमेम्बर्ड’’ पर आधारित है. रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘सैयारा’ में दो नवोदित कलाकारों अहान पांडे और अनीत पड्डा की जोड़ी है. अहान पांडे नेपोकिड हैं. उन के चाचा चंकी पांडे मशहूर अभिनेता हैं जबकि उन की कजिन अनन्या पांडे भी अभिनेत्री हैं.

अहान पांडे के पिता चिक्की पांडे फिल्म जगत व उद्योग जगत की हस्ती हैं. उन का प्रोडक्शन हाउस व इवेंट कंपनी है. शाहरुख खान को स्ट्रगल के दिनों में चिक्की पांडे ने ही मदद की थी. 60 करोड़ रूपए के बजट में बनी फिल्म ‘सैयारा’ ने एक सप्ताह के अंदर 172 करोड़ रूपए बौक्स औफिस पर एकत्र कर कई रिकार्ड बना डाले.

‘सैयारा’ के बौक्स औफिस पर आए तूफान के चलते कई बंद होने जा रहे थिएटरों को जीवन दान मिल गया. फिलहाल फिल्म ब्लौकबस्टर हो गई है.

फिल्म ‘सैयारा’ के लिए यशराज फिल्म्स की पीआर टीम ने बहुत अलग तरह से काम किया. अब तक फिल्म के दोनों कलाकारों से मीडिया को नहीं मिलवाया गया. जब फिल्म की एडवांस बुकिंग शुरू हुई तो उस के दूसरे दिन से पीआर टीम ने बहुत बड़े स्तर पर सोशल मीडिया के हर प्लेटफौर्म पर प्रचारित किया कि एडवांस बुकिंग में सारे रिकार्ड टूट गए.

सलमान खान व महेश बाबू सहित सहित आधे से ज्यादा फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने फिल्म व अहान पांडे की तारीफों के पुल बांधते हुए कमेंट जारी किए. पहले दिन यानी कि ओपनिंग डे इस फिल्म ने 22 करोड़ रूपए से अधिक कमाए. तब चर्चा हुई कि अहान पांडे के पिता चिक्की पांडे ने अपनी पहुंच का फायदा उठा कर कौरपोरेट बुकिंग कर रहे हैं और चिक्की पांडे ने खुद कई करोड़ रूपए की टिकटें खरीद लीं.

इस तरह के आरोपों का चिक्की पांडे या यशराज फिल्म्स की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया. पर सोशल मीडिया पर कई तरह के वीडियो पोस्ट करवाए गए. यह सब देख कर फिल्म ‘कांटे’ सहित कई सफलतम फिल्मों के निर्माता निर्देशक संजय गुप्ता सहित कई फिल्मकारों ने ‘सैयारा’ की पीआर टीम के खिलाफ जम कर बयानबाजी की ओर इसे पीआर टीम का बहुत गलत रवैया करार दिया.

हम ने मुंबई व मुंबई से बाहर कुछ सिनेमाघर मालिकों से बात की तो उस से यह बात साफ होती है कि कौरपारेट बुकिंग या चिक्की पांडे ने कुछ टिकटें खरीदी होंगी, पर जिस तरह बौक्स औफिस कलेक्शन है, उस से यह नहीं कहा जा सकता कि फिल्म असफल है.

फिल्म ‘सैयारा’ ब्लौकबस्टर हो चुकी है. यशराज फिल्म्स ने ‘सैयारा’ को जुलाई के चौथे सप्ताह भी थिएटरों में लगाए रखने का निर्णय किया है. कुछ लोग मान रहे हैं कि यशराज फिल्म्स इस तरह अपनी 14 अगस्त को रिलीज होने वाली बड़े बजट की फिल्म ‘वार 2’ के लिए मैदान तैयार कर रही है. कुछ भी हो पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनीत पड्डा और अहान पांडे बेहतरीन कलाकार हैं. इन दोनों कलाकारों ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है. लेखन में कमी रही और अलमाइजर की बीमारी का जिस तरह से असंवेदनशील तरीके से फिल्म में उपयोग किया गया, वह गलत है.

एक बात यह तय है कि चिक्की पांडे अपने बेटे अहान पांडे को सुपरस्टार बनाने के लिए पीआर पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं. इस का नुकसान यह हो सकता है कि कहीं अहान पांडे भी कुमार गौरव की तरह ‘वन फिल्म वंडर’ न बन कर रह जाएं. इसलिए अब इन्हें अपनी पीआर स्ट्रेटजी में बदलाव करना चाहिए.

Indira Gandhi : इंदिरा का ‘राष्ट्रीय हित’ आपातकाल ‘ट्रंप के शासन में आंदोलन पर अमेरिकी’

Indira Gandhi : 25-26 जून, 1975 की रात को भारत में आपातकाल की घोषणा हुई थी. रेडियो पर आपातकाल की घोषणा 26 जून, 1975 को सुबह इंदिरा गांधी ने औल इंडिया रेडियो पर सुबह के प्रसारण में देश को संबोधित करते हुए कहा, “राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा कर दी है. इस में घबराने की कोई बात नहीं है.”

यह उन का सब से प्रसिद्ध बयान था, जिस का उद्देश्य जनता को आश्वस्त करना था कि आपातकाल सामान्य नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि देश की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए है.

अपने रेडियो संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा कि देश में ‘गहरी साजिश’ रची जा रही थी, जिस का उद्देश्य उन की सरकार को अस्थिर करना और देश को अराजकता की ओर धकेलना था. उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग ‘प्रगतिशील कदमों’ (जैसे गरीबों और महिलाओं के लिए उन के सुधार) का विरोध कर रहे थे. इंदिरा गांधी ने आपातकाल को आंतरिक अशांति के आधार पर लागू किया, उसे ‘राष्ट्रीय हित’ में बताया. इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने राजनारायण की चुनावी याचिका के मद्देनजर रद्द कर दिया था.

इंदिरा गांधी का पूरा भाषण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. उन के भाषण का मुख्य उद्देश्य जनता को शांत रखना और आपातकाल को आवश्यक कदम के रूप में प्रस्तुत करना था. हालांकि, बाद में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘जब मैं ने आपातकाल लगाया, एक कुत्ता भी नहीं भूंका.’ यह उन के इस विश्वास को दर्शाता है कि जनता ने शुरू में इस का विरोध नहीं किया.

अमेरिका आज डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आपातकाल जैसी स्थिति से जूझ रहा है और वहां लोकतंत्र समर्थक भारत के जयप्रकाश नारायण जैसा आंदोलन कर रहे हैं.

Hindi Love Stories : नाम की केंचुली

Hindi Love Stories : होटल सिटी पैलेस के रेस्तरां से बाहर निकलते समय पीहू की चाल जरूर धीमी थी मगर उस के कदमों में आत्मविश्वास की कमी नहीं थी. चेहरे पर उदासी की एक परत जरूर थी लेकिन पीहू ने उसे अपने मन के भीतर पांव नहीं पसारने दिया.

घर आ कर बिस्तर पर लेटी तो अखिल के साथ अपने रिश्ते को अंतिम विदाई देती उस की आंखें छलछला आईं.

पूरे 5 साल का साथ था उन का. ब्रेकअप तो खलेगा ही लेकिन इसे ब्रेकअप कहना शायद इस रिश्ते का अपमान होगा. इसे टूटा हुआ तो तब कहा जाता जब इस रिश्ते को जबरदस्ती बांधा जाता.

अखिल के साथ उस के बंधन में तो जबरदस्ती वाली कोई बात ही नहीं थी. यह तो दोनों का अपनी मरजी से एकदूसरे का हाथ थामना था जिसे अनुकूल न लगने पर उस ने बहुत हौले से छुड़ा लिया था, अखिल को भावी जीवन की शुभकामनाएं देते हुए.

पीहू और अखिल कालेज के पहले साल से ही अच्छे दोस्त थे. आखिरी बरस में आतेआते दोस्ती ने प्रेम का चोला पहन लिया. लेकिन यह प्रेम किस्सेकहानियों या फिल्मों वाले प्रेम की तरह अंधा नहीं बल्कि समय के साथ परिपक्व और समझदार होता गया था. यहां चांदतारे तोड़ कर चुनरी में टांकने जैसी हवाई बातें नहीं होती थीं, यहां तो अपने पांवों पर खड़ा हो कर साथ चलने के सपने देखे जा रहे थे.

कालेज खत्म होने के बाद पीहू और अखिल दोनों ही जौब की तलाश में जुट गए ताकि जल्द से जल्द अपने सपनों को हकीकत में ढाल सकें. हालांकि अखिल का अपना पारिवारिक व्यवसाय था लेकिन वह खुद को जमाने की कसौटी पर परखना चाहता था इसलिए एक बार कोई स्वतंत्र नौकरी करना चाहता था जो उसे विरासत में नहीं बल्कि खुद अपनी मेहनत से मिली हो.

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए दोनों दिल्ली आ गए. एक ही कोचिंग में साथसाथ तैयारी करने और घर के अनुशासन से दूर रहने के बावजूद दोनों ने अपनी परिधि तय कर रखी थी. जब भी अकेले में कोई एक बहकने लगता तो दूसरा उसे संभाल लेता. कई जोड़ियों को लिवइन में रहते देख कर उन का मन अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटका.

“यार जब हम ने शादी करना तय कर ही लिया है तो अभी क्यों नहीं? सिर्फ एक बार…” कई बार उतावला पुरुष मन हठ पर उतर आता.

“शादी के बाद यही सब तो करना है. एक बार कैरियर बन जाए बस. फिर तो सदा साथ ही रहना है…” संयमी स्त्री उस के बढ़े हाथ हंस कर परे सरका देती. वहीं कभी जब सधे हुए नाजुक कदम अरमानों की ढलान पर फिसलने लगते तो दृढ़ मजबूत बांहें उन्हें सहारा दे कर थाम लेती और गर्त में गिरने से बचा लेती.

आज ऊपर तो कल नीचे, कोलंबस झूले से रिश्ते में दोनों झूल रहे थे. इसी बीच पीहू की बैंक में नौकरी लग गई और उस ने दिल्ली छोड़ दिया.

हालांकि दोनों फोन के माध्यम से बराबर जुड़े हुए थे लेकिन अब अखिल के लिए दिल्ली में अकेले रह कर परीक्षा की तैयारी करना जरा मुश्किल हो गया था. मन उड़ कर बारबार पीहू के पास पहुंच जाता लेकिन फिर भी वह खुद को एक मौका देने का मानस बनाए हुए वहां टिका रहा.

2 साल मेहनत करने के बाद भी अखिल का कहीं चयन नहीं हुआ तो वह वापस आ कर अपने परिवार के पुश्तैनी बिजनैस में हाथ बंटाने लगा. भागदौड़ खत्म हुई, स्थायित्व आ गया. जिंदगी एक तय रास्ते पर चलने लगी.

जैसाकि आम मध्यवर्गीय परिवारों में होता है, बच्चों के जीवन में स्थिरता आते ही घर में उन के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश शुरू हो जाती है. अखिल के घर में भी उस की शादी की बात चलने लगी. उधर पीहू के लिए भी लड़के की तलाश जोरशोर से जारी थी. जहां अखिल के परिवार की प्राथमिकता घरेलू लड़की थी, वहीं पीहू के घर वाले उस के लिए कोई बैंकर ही चाहते थे ताकि दोनों में आसानी से निभ जाए.

अखिल संयुक्त परिवार में तीसरी पीढ़ी का सब से बड़ा बेटा है. उस के द्वारा उठाया गया कोई भी अच्छाबुरा कदम भावी पीढ़ी के लिए लकीर बन सकता है. पारंपरिक मारवाड़ी परिवार होने के कारण अखिल के घर में बड़ों की बात पत्थर की लकीर मानी जाती है. दादा ने जो कह दिया वही फाइनल होता है. इस के बाद पापा या चाचा की एक नहीं चलने वाली. दूसरी तरफ पीहू का परिवार इस मामले में जरा तरक्कीपसंद है. उन्हें पीहू की पसंद पर कोई ऐतराज नहीं था बशर्ते कि उस का चयन व्यावहारिक हो.

परिवार की परिपाटी से भलीभांति परिचित अखिल घर वालों के सामने अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, उधर पीहू इस मामले में एकदम शांत थी. वह अखिल की पहल की प्रतीक्षा कर रही थी. उस ने ना तो अखिल पर शादी करने का कोई दबाव बनाया और ना ही अपनी असहमति जताई.

“पीहू मैं बहुत परेशान हूं यार. क्या करूं समझ में नहीं आ रहा. घर वाले चाहते हैं कि मेरी शादी किसी सजातीय मारवाड़ी खानदान की लड़की से हो यानी यह शादी सिर्फ 2 लोगों का नहीं बल्कि 2 व्यापारिक घरानों का मिलन हो ताकि यह संबंध दोनों परिवारों के बिजनैस को भी आगे बढ़ाए, लेकिन तुम तो जानती हो ना मैं ने तो तुम्हारे साथ के सपने देखे हैं. तुम्हीं बताओ, मैं कैसे अपने दादाजी को राजी करूं?” एक दिन अखिल ने कहा.

“इतनी हिम्मत तो तुम्हें जुटानी ही होगी अखिल. यदि आज हिम्मत नहीं करोगे तो सोच लो, बाद में पछताना ना पड़े,” पीहू ने गंभीर हो कर कहा.

“तो क्या तुम कुछ नहीं करोगी?” अखिल ने आश्चर्य से पूछा.

“तुम्हारे परिवार के मामले में मैं क्या कर सकती हूं? मैं अपनेआप में साफ हूं और जानती हूं कि मुझे तुम से शादी करनी है. इस के लिए मेरे घर वाले भी राजी हो जाएंगे लेकिन पहले तुम तो अपने घर वालों को राजी करो. लेकिन एक बात ध्यान रहे अखिल, मैं जैसी हूं मुझे इसी रूप में स्वीकार करना होगा. मुझ से मेरी पहचान छीनने की कोशिश मत करना. ना अभी, ना बाद में,” पीहू ने अपना फैसला सुनाया तो अखिल सोच में पड़ गया.

आधुनिक और आत्मनिर्भर पीहू की छवि उस के दादाजी की पसंद से एकदम विपरीत है. वैसे भी उन के परिवार में आजतक कोई विजातीय बहू या दामाद नहीं आए. उन्हें पीहू के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा.

अखिल अपनी चाची से थोड़ा खुला हुआ था. उस ने उन से बात की. पहले तो चाची ने अखिल को ही समझाने का प्रयास किया लेकिन जब वह नहीं माना तो उन्होंने अखिल के चाचा से उस की पसंद का जिक्र किया. जैसाकि अंदेशा था, सुनते ही वे उखड़ गए.

“दिमाग खराब हो गया क्या लड़के का? अपने समाज में लड़कियों का अकाल पड़ गया क्या? अरे मैं तो उसे दिल्ली भेजने की उस की जिद पूरी करने के फैसले के ही खिलाफ था. फिर सोचा था जवानी की जिद है, सालदो साल में उतर जाएगी लेकिन यहां तो एक जिद के साथ दूसरी जिद भी साथ उठा लाया. एक तो बिजनैस में 2 साल पिछड़ गया, दूसरा यह प्रेम का चक्कर… समझाओ उसे कि नौकरी करने वाली लड़कियां हमारे यहां नहीं चल सकतीं,” चाचा ने अखिल को दिल्ली भेजने के बड़े भाई के फैसले का गुस्सा चाची पर उतारा.

लेकिन अखिल ने हौसला बनाए रखा. पिता को राजी करने का उस का प्रयास जारी रहा. इधर वह पीहू को भी जौब छोड़ने के लिए राजी कर रहा था ताकि कम से कम लड़की के घरेलू होने की शर्त तो पूरी हो सके. अखिल का प्रस्ताव पीहू के जरा भी गले नहीं उतरता था.

“तुम मुझे क्यों समझा रहे हो अखिल? मैं अपनी नौकरी जारी रखूंगी, बस इतना ही तो चाह रही हूं. देखो, समझने की जरूरत तुम्हें है. तुम्हारे सामने 2 विकल्प हैं. एक तुम्हारे परिवार की परंपरा और दूसरा तुम्हारा प्यार यानी मैं और मैं भी बिना अपनी पहचान खोए. जानते हो ना कि जब हमें 2 में से किसी 1 विकल्प का चुनाव करना होता है तो फैसला बहुत सोचसमझ कर करना पड़ता है. तुम तय करो कि तुम्हें क्या चाहिए,” पीहू ने दृढ़ता से कहा.

एक तरह से उस ने अपना निर्णय अखिल के सामने साफ कर दिया.
बुझा हुआ अखिल एक बार फिर से अपने घर वालों को मनाने में जुट गया. इस बार उस ने दादाजी को चुना.

कहते हैं कि मूल से प्यारा सूद होता है. दादाजी पोते के आग्रह पर पिघल गए. थोड़ी नानुकुर के बाद उन्होंने विजातीय पीहू के साथ उस का गठजोड़ करने के लिए हरी झंडी दिखा दी. अपनी कुछ शर्तों के साथ वे पीहू के परिवार से मिलने को तैयार भी हो गए.

अखिल इसे अपनी जीत समझते हुए खुशी से उछलने लगा. उस ने फोन पर पीहू को यह खुशखबरी दी और आगे की प्लानिंग करने के लिए उसे उसी होटल सिटी पैलेस में मिलने के लिए बुलाया जहां वे अकसर मिला करते थे. हालांकि पीहू अभी भी थोड़ी आशंकित थी.

“तुम ने उन्हें बता तो दिया ना कि मैं शादी के बाद जौब नहीं छोडूंगी?” पीहू ने अखिल को एक बार फिर से आगाह किया.

“जौबजौब… यह कैसी जिद पकड़ कर बैठी हो तुम? अरे हमारे परिवार को कहां कोई कमी है जो अपनी बहूबेटियों से नौकरी करवाएंगे…” पीहू की बात सुनते ही अखिल बिफर गया.

पीहू की आशंका सही साबित हुई. उस ने अखिल की तरफ अविश्वास से देखा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उस ने पीहू का हाथ कस कर पकड़ लिए और अपने स्वर को भरसक मुलायम किया.

“हमारे यहां बहुएं सिर्फ हुक्म चलाती हैं, हुक्म बजाती नहीं,” कहते हुए अखिल ने प्यार से पीहू के गाल खींच दिए. पीहू ने उस के हाथ झटक दिए.

“हमारे समाज में बहुओं के नखरे तब तक ही उठाए जाते हैं जब तक वे सिर पर पल्लू डाले, आंखें नीची किए सजीधजी गुड़िया सी घर में पायल बजाती घूमती रहें.”

“मुझ से यह उम्मीद मत रखना,” पीहू ने कहा.

“अरे यार गजब करती हो. एक बार शादी तो हो जाने दो फिर कर लेना अपने मन की. मैं बात करूंगा ना अपने घर वालों से,” अखिल ने उसे मनाने की कोशिश की.

“मेरे लिए भी यही बात तुम ने अपने घर में कही होगी कि एक बार शादी हो जाने दो, फिर छुड़वा देंगे नौकरी. मैं बात करूंगा ना पीहू से. है ना?”अखिल की आंखों में झांक कर पीहू ने उस की नकल उतारते हुए कहा.

बात सच ही थी. उस ने अपने दादाजी को यही कह कर पीहू से शादी करने के लिए राजी किया था. अखिल के पास पीहू के सवालों का कोई जवाब नहीं था. वह नजरें चुराने लगा.

“अच्छा बताओ, मेरी मां का नाम क्या है?” पीहू के अचानक दागे गए इस सवाल से अखिल अचकचा गया. उस ने इनकार में अपने कंधे उचका दिए.

“नहीं पता ना? पता होगा भी कैसे क्योंकि लोग उन्हें उन के नाम से जानते ही नहीं. वे बाहर के लोगों के लिए मिसेज सक्सेना और रिश्तेदारों के लिए पीहू की मम्मी हैं. और सिर्फ वे ही क्यों, ऐसी न जानें कितनी ही औरतें हैं जो अपना असली नाम भूल ही गई होंगी. वे या तो मिसेज अलांफलां या फिर गुड्डू, पप्पू की मम्मी के नाम से पहचानी जाती हैं. मैं ने देखा है अपने आसपास. अपने घर में भी. बहुत बुरा लगता है,” कहती हुई पीहू आवेश में आ गई.

“लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत जरूरी है. मैं तुम्हें प्यार करती हूं लेकिन सिर्फ इसी वजह से तुम्हारे घर में शोपीस बन कर नहीं रह सकती. तुम तो मेरे संघर्ष के साथी हो. सब जानते हो. मैं ने कितनी मुश्किल से अपनी पहचान बनाई है. इतनी मेहनत से हासिल इस मुकाम को मैं घूंघट की ओट में नहीं छिपा सकती. अपने नाम की पहचान को ऐशोआराम के लालच की आग में नहीं झोंक सकती,” पीहू ने अखिल का चेहरा पढ़ते हुए कहा.

“इस का मतलब तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी पहचान मुझ से अधिक जरूरी है. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा नाम मेरे नाम से जुड़ कर पहचाना जाए, हमारे नाम एक हो जाएं? जरा सोचो, पीहू अखिल लखोटिया… आहा… सोच कर ही कितना अच्छा लग रहा है,” अखिल के स्वर में अभी भी एक उम्मीद शेष थी.

“नहीं, मैं नहीं चाहती कि मेरी पहचान तुम्हारे नाम की केंचुली में छिप जाए. पीहू अखिल सक्सेना या पीहू सक्सेना लखोटिया जैसा कुछ बन कर इतराने की बजाय मैं सिर्फ पीहू सक्सेना कहलाना अधिक पसंद करूंगी. सक्सेना ना भी हो तो भी चलेगा. मैं तो सिर्फ पीहू बन कर भी खुश रहूंगी. बल्कि मैं तो कहती हूं कि दुनिया की हर लड़की के लिए उस की अपनी पहचान बहुत जरूरी है,” पीहू ने भावुक होते हुए अखिल का हाथ थाम लिया.

“यानी तुम्हारी ना समझूं? हमारे सपनों का क्या होगा पीहू?” अखिल रुआंसा हो गया.

“हमारे सपने जुड़े हुए जरूर थे लेकिन उस के बावजूद भी वे स्वतंत्र थे, एकदूसरे से अलग थे. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम मेरे लिए अपने परिवार से बगावत करो, लेकिन माफ करना, मैं अपनी पहचान नहीं खो सकती. इसे तुम मेरा आखिरी फैसला ही समझो,” पीहू ने अपना आत्मविश्वास से भरा फैसला सुना दिया और स्नेह से अखिल का कंधा थपथपाती हुई उठ खड़ी हुई.

पीहू नहीं जानती थी कि वह अपने इस निर्णय को कितनी सहजता से स्वीकार कर पाएगी लेकिन यह भी तो आखिरी सच है कि हमारे हरेक कठोर निर्णय के समय मन के तराजू में एक तरफ निर्णय और दूसरी तरफ उस की कीमत रखी होती है.

आज भी पीहू के मन की तुला पर एक तरफ उस की निज पहचान थी तो दूसरी तरफ उस का प्रेम और सुविधाओं से भरा भविष्य. पीहू ने प्रेम की जगह अपनी पहचान को चुना. वह अखिल के नाम की केंचुली पहनने से इनकार कर अपने गढ़े हुए रास्ते पर बढ़ गई.

अखिल नम आंखों से उस आत्मविश्वास की मूरत को जाते हुए देख रहा था. Hindi Love Stories 

Social Story : ग्राम विकास प्राधिकरण

Social Story : लखीमपुरखीरी, उत्तर प्रदेश के गांव डिहुआकलां में जश्न का माहौल था. बेरोजगारों के चेहरे खिले हुए थे. बूढे़ मांबाप की आंखों में आशा के दीए जगमगा उठे थे. दरअसल, 2 दिन पहले भारत सरकार के ग्राम विकास मंत्रालय की तरफ से प्रधानजी को एक पत्र मिला था. उसे पढ़ते ही पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गईर् थी. पत्र में लिखा था,

‘प्रिय प्रधानजी,

‘जयहिंद.

‘आप को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि भारत सरकार की योजनाओं का लाभ सीधे ग्रामवासियों को मिल सके, इसलिए सरकार ने ग्राम विकास प्राधिकरण का गठन किया है. यह प्राधिकरण ग्रामवासियों के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करेगा. प्राधिकरण का कार्य संचालित करने के लिए प्रत्येक ग्रामसभा में एक ग्राम विकास केंद्र की स्थापना की जाएगी. प्रत्येक केंद्र में 2 स्वास्थ्य सेवक, 2 स्वास्थ्य सेविकाएं, 2 स्वच्छता मित्र, 2 किसान मित्र और 2 जल संरक्षण सेवकों की तैनाती की जाएगी. इन में सभी पदों पर नियुक्तियां उसी ग्रामसभा के योग्य उम्मीदवारों की की जाएंगी. इन पदों पर चयन के लिए 3 सदस्यीय साक्षातकार समिति का गठन किया जाएगा, जिस में भारत सरकार के 2 अधिकारियों के साथसाथ संबंधित ग्रामप्रधान भी नामित किए जाएंगे.

‘इस पत्र के साथ संलग्न फौर्म भर कर इच्छुक उम्मीदवारों के प्रार्थनापत्र 15 दिन के भीतर रजिस्टर्ड डाक से प्राधिकरण के कार्यालय में भिजवाने की कृपा करें. सभी उम्मीदवारों को 500 रुपए का परीक्षा शुल्क देना होगा जोकि भारतीय स्टेट बैंक के खाता संख्या में जमा कर उस की रसीद प्रार्थनापत्र के साथ भेजनी अनिवार्य है. ‘कृपया इस पत्र का अपनी ग्रामसभा में व्यापक प्रचारप्रसार करें.

‘धन्यवाद.

‘सचिव, ग्राम विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली.’

रमेश, कामता, राकेश, संगीता, सुमन और देवदत्त ने तो दूसरे ही दिन फौर्म भर कर बैंक में पैसे जमा कर दिए थे बाकी लोगों में जल्द से जल्द पैसा जमा करने की होड़ मची हुई थी. अपने ही गांव में केंद्र सरकार की नौकरी मिल जाए, इस से अच्छी बात और कोई हो ही नहीं सकती थी. ऐसा ही पत्र सभी ग्राम प्रधानों को प्राप्त हुआ था, क्योंकि चयन समिति में ग्राम प्रधानों को भी रखा गया था, इसलिए उन सब की इज्जत अचानक ही बढ़ गई थी. उन के दरवाजे पर दिन भर गांव वालों की भीड़ जमा रहती. सभी को उम्मीद थी कि प्रधानजी उन के  बच्चों को नौकरी जरूर दिलवा देंगे.

डिहुआकलां के प्रधान मोहनजी का बेटा विकास लखनऊ के एक इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था. कालेज में 3 दिन की छुट्टी थी तो वह अचानक गांव पहुंच गया. लोगों की भीड़ उस समय मोहनजी को घेरे हुए थी. ‘‘पिताजी, इतनी भीड़ क्यों जमा है? क्या कोई चुनाव होने वाले हैं?’’ विकास ने प्रधानजी के पैर छूते हुए पूछा.

‘‘ हां, चुनाव तो होने वाले हैं, लेकिन इस बार राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक चुनाव होने वाले हैं,’’ प्रधानजी ने हंसते हुए कहा.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बेटा, तुम इतना पढ़लिख कर गांव से बाहर कहीं दूर नौकरी करने चले जाओगे, लेकिन सरकार तुम्हारे कई साथियों को गांव में ही नौकरी देने जा रही है. इस से गांव और पूरे समाज का भरपूर विकास होगा,’’ प्रधानजी ने कहा और पूरी बात बताई. विकास को यह सब आश्चर्यजनक लगा. उन ने कहा, ‘‘पिताजी केंद्र सरकार की योजनाएं किसी एक प्रदेश में नहीं बल्कि पूरे देश में लागू होती हैं. पूरे देश में लाखों ग्रामसभाएं होंगी, अगर हर गांव के लोगों को नौकरी दी गई तो यह प्राधिकरण देश का सब से बड़ा संगठन बन जाएगा.’’

‘‘देश की 70% आबादी गांवों में रहती है. यदि  गांव का विकास करना है तो इस के लिए सब से बड़ा संगठन बनाना ही होगा. खुशी की बात है कि पहली बार यह बात सरकार की समझ में आईर् है.  ‘‘मैं तो किसी की सिफारिश नहीं सुनूंगा और अपने गांव के सब से योग्य उम्मीदवार को ही नौकरी दूंगा. देखना, उस के बाद गांव का विकास कितनी तेजी से होता है,’’ प्रधानजी ने कहा. ‘‘पिताजी, यह इतना आसान नहीं, जितना आप समझ रहे हैं,’’ विकास ने पिताजी से कहा. ‘‘तुम्हारी तो हर मामले में शक करने की आदत है. यह लो भारत सरकार का पत्र. खुद पढ़ लो,’’ प्रधानजी ने अपनी जेब से ग्राम विकास सचिव का पत्र निकाल कर विकास की ओर बढ़ाया. उन के चेहरे पर खिन्नता के भाव दिखाई दे रहे थे.

विकास ने उस पत्र को कई बार पढा़, लेकिन उस में उसे कोई कमी नजर नहीं आई. पत्र बाकायदा ग्राम विकास मंत्रालय के लैटरहैड पर लिखा गया था और सचिव के हस्ताक्षर के नीचे मुहर भी लगी हुई थी. पत्र पर प्राधिकरण के साउथ ब्लौक, नई दिल्ली का पता भी दिया हुआ था.

विकास को मालूम था कि केंद्र सरकार के ज्यादातर मंत्रालय साउथ ब्लौक में ही हैं. पत्र को देख कर शक की कोई गुंजाइश नहीं थी. फिर भी क्यों उसे किसी गड़बड़ी का आभास हो रहा था. कुछ सोच कर उस ने मोबाइल से लैटरहैड पर दिए गए फोन नंबर पर फोन किया. ‘‘हैलो, ग्राम विकास मंत्रालय प्लीज,’’ उधर से आवाज सुनाई पड़ी. ‘‘सर, क्या आप के मंत्रालय द्वारा किसी ग्राम विकास प्राधिकरण का गठन किया गया है?’’ विकास ने पूछा.

‘‘जी हां, प्रधानमंत्री की यह एक महत्त्वाकांक्षी योजना है. इस के संचालन के लिए प्रत्येक ग्रामसभा में कर्मचारियों की भरती भी शुरू हो गई है,’’ उधर से महत्त्वाकांक्षी आवाज सुनाई पड़ी. यह सुन कर विकास ने फोन काट दिया. प्रधानजी को भी उन की बातचीत सुनाई पड़ गई थी. उन्होंने विकास के कंधों को थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेटा, केवल हमारे गांव में ही नहीं, बल्कि सभी ग्रामसभाओं में भरती हो रही है. बेकार में परेशान मत हो. थक गए होगे, अंदर चल कर नाश्तापानी करो. मुझे थोड़ी देर लग जाएगी.’’ विकास ने पल भर के लिए कुछ सोचा फिर बोला, ‘‘पिताजी, क्या मैं इस पत्र का एक फोटो खींच सकता हूं?’’

‘‘एक नहीं जितने मरजी फोटो खींचो,’’ प्रधानजी हंस पड़े.

विकास ने अपने स्मार्टफोन से उस पत्र का फोटो खींचा और उसे प्रधानजी को वापस कर दिया. वह घर पहुंचा तो मां उसे देखते ही खुशी से भर उठीं. उस का माथा चूम कर उन्होंने उसे जी भर कर आशीर्वाद दिया, फिर उस के लिए नाश्ता लगाने लगीं.

नाश्ता कर विकास अपने दोस्तों से मिलने चल दिया. सभी इन नौकरियों पर ही चर्चा कर रहे थे. वे सब इस के लिए काफी उत्साहित थे. सभी को विकास के पिता की ईमानदारी पर पूर्ण भरोसा था. ‘‘यार, मुझे तो कुछ गड़बड़ लग रही है. इस तरह एकसाथ लाखों की संख्या में भरतियां कैसे की जा सकती हैं.  इस के अलावा चयन समिति में ग्रामप्रधानों को रखने का क्या औचित्य है. क्या सरकार को मालूम नहीं है कि बहुत से प्रधान तो अशिक्षित हैं. वे साक्षात्कार कैसे ले सकते हैं?’’ विकास ने चिंता प्रकट की. ‘‘इस में भला गड़बड़ी क्या हो सकती है? नौकरी के बदले में कोई घूस तो मांगी नहीं जा रही है,’’ हेमंत बोला, ‘‘सरकार, सीधे गांव वालों से जुड़ना चाहती है, इसलिए वह गांवगांव में भरती करवा रही है.’’

‘‘गांव वालों के बारे में सब से अधिक जानकारी ग्रामप्रधान को ही होती है. इसीलिए सरकार ने चयन समिति में उन्हें रखा है. रही बात उन के अशिक्षित होने की तो सबकुछ प्रधान के हाथ में थोड़े होगा. उन की सहायता के लिए समिति में 20 सरकारी अधिकारी भी तो होंगे,’’ देवीदत्त ने समझाया. विकास के पास उन की बातों का कोई जवाब नहीं था, इसलिए वह चुप हो गया. किंतु उस के चेहरे पर छाई चिंता की रेखाओं को देख कामता ने कहा, ‘‘यार, हम तो कम पढ़ेलिखे लोग हैं, कंप्यूटर और इंटरनैट के बारे में ज्यादा नहीं जानते. मगर सुना है कि इंटरनैट पर सभी सरकारी कार्यालयों के बारे में जानकारी होती है. तुम तो इंजीनियरिंग पढ़ रहे हो, इंटरनैट चला लेते होगे. उस पर जा कर पता क्यों नहीं लगा लेते हो?’’

‘‘अरे, यह बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं थी,’’ विकास के  चेहरे का तनाव तुरंत कम हो गया. उस ने अपने मोबाइल पर गूगल ओपन कर ग्राम विकास प्राधिकरण सर्च किया. अगले ही पल मोबाइल की स्क्रीन पर ‘ग्राम विकास प्राधिकरण’ की साइट खुल गई. उस पर एक तरफ भारत सरकार का लोगो अशोक स्तंभ बना था तो दूसरी तरफ ग्राम विकास मंत्री का फोटो लगा था. साइट पर सभी जरूरी सूचनाओं के साथ ग्रामसभा स्तर पर हो रही भरतियों का भी पूरा विवरण अंकित था.

अब तो शक की कोई गुंजाइश नहीं बची थी. सबकुछ सरकार की तरफ से ही हो रहा था. विकास के दोस्तों ने भी उसे समझाया कि वह बेकार में ज्यादा सोच कर परेशान न हो. दोस्तों के साथ घूमनेफिरने के बाद विकास घर लौट आया. उस रात उसे नींद नहीं आई. उस का मन यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि सरकार अचानक इस तरह इतने बड़े स्तर पर भरती कर सकती है. उसे लग रहा था कि जरूर इस के पीछे कोई बड़ा खेल है. सुबह जब वह उठा तो अचानक उस के दिमाग में एक योजना कौंध उठी और वह औफिस खुलने का इंतजार करने लगा. करीब 11 बजे उस ने एक बार फिर पत्र में लिखे नंबर पर फोन किया.

‘‘हैलो, ग्राम विकास मंत्रालय, प्लीज,’’ उधर से शिष्टता भरी आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘सर, आप के  मंत्रालय के ‘ग्राम विकास प्राधिकरण’ हेतु जो भरती चल रही हैं, उस के लिए मैं ने आवेदन किया है, लेकिन….’’ विकास ने जानबूझ कर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

‘‘लेकिन क्या?’’ उधर से पूछा गया.

‘‘हमारा ग्राम प्रधान बहुत बेईमान है. अपने आदमियों की भरती करने के लिए 1-1 लाख रुपए वसूल रहा है. हमारे और दोस्तों के घर वालों ने उसे वोट नहीं दिया था इसलिए वह हम लोगों को किसी भी कीमत पर भरती नहीं करेगा,’’ इतना कह कर विकास पल भर के लिए रुका फिर बोला,‘‘सर, हम 10 दोस्त हैं. आप हमारी भरती करवा दीजिए. हम लोग मिल कर 12 लाख रुपए देने के लिए तैयार हैं.’’ यह सुन कर उधर चंद पलों की चुप्पी छाई रही. फिर आवाज आई, ‘‘प्लीज एक मिनट होल्ड करिए. मैं अपने रिक्रूटमैंट अफसर से आप की बात करवा रहा हूं.’’

थोड़ी देर बाद उधर से किसी दूसरे आदमी की आवाज आई, ‘‘हैलो, मैं रिक्रूटमैंट अफसर बोल रहा हूं. बताइए क्या समस्या है?’’ ‘‘सर, पूरे देश में कई रिक्रूटमैंट अफसर बनाए गए होंगे. हमारे गांव की चयन समिति के जो अफसर हैं हमारी उन से बात करवाइए,’’ विकास ने कहा. ‘‘हूं, आप ठीक कह रहे हैं,’’ उधर पल भर की चुप्पी के बाद फिर आवाज आई. आप अपने गांव, तहसील, जिले और प्रदेश का नाम बताइए. मैं कंप्यूटर पर चैक कर के संबंधित अधिकारी से आप की बात करवाता हूं.

‘‘जी, मैं गांव डिहुआकलां, तहसील धौरहराकलां, जिला लखीमपुरखीरी, उत्तर प्रदेश से बोल रहा हूं,’’ विकास ने बताया.

उधर से थोड़ी देर तक कंप्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियां चलने की आवाज आती रही फिर एक मृदु आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘हैलो, मैं आपके क्षेत्र का रिक्रूटमैंट अफसर बोल रहा हूं. बताइए मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’ विकास ने उस से बात दोहराई. फिर बोला, ‘‘आप जिस बैंक अकाउंट में कहेंगे हम लोग उस में 25%  पैसा एडवांस में जमा करवा देंगे बाकी काम हो जाने के बाद मिल जाएगा.  मगर इस बात की गांरटी होनी चाहिए कि प्रधानजी के किसी आदमी की नियुक्ति नहीं होगी. सारी नियुक्तियां हम 10 लोगों की ही होनी चाहिए.’’

‘‘उस की चिंता आप न करें. सारी भरतियां आप लोगों की ही होंगी, लेकिन 25% नहीं एडवांस में 50% देना होगा,’’ पवन कुमार साहब ने कहा.‘‘ओके,’’ विकास ने हामी भरी. ‘‘ तो फिर हमारे बैंक अकाउंट का नंबर नोट करिए. उस में 6 लाख रुपए जमा करने के बाद सभी 10 लोगों के नाम हमें नोट करा देना.’’ ‘‘सर, इतने पैसे जमा करने के लिए हमें 2-3 दिन का समय दे दीजिए.’’ विकास ने अनुरोध किया.

‘‘ठीक है,’’ रमेश साहब ने सहमति दी. फिर बोले, ‘‘लेकिन 3 दिन से ज्यादा का समय नहीं मिलेगा, क्योंकि दूसरे आदमी भी हम से संपर्क कर रहे हैं.’’ विकास ने 3 दिन में रुपए जमा करने की हामी भरने के बाद फोन काट दिया. उस के बाद सीधे अपने पिता के पास पहुंचा. उस ने सारी बातचीत रिकौर्ड कर ली थी. रिकौर्डिंग सुन उन का चेहरा गंभीर हो गया. कुछ सोचने के बाद वे बोले,‘‘ बेटा, तुम ने यह तो साबित कर दिया है कि यह सारा गोरखधंधा फर्जी है, लेकिन इस से किसी को क्या फायदा होने वाला है?’’ ‘‘पिताजी, पूरे देश में लाखों बेरोजगार फौर्म भरने के लिए 5-5 सौ रुपए जमा करेंगे, इस से ही करोड़ोअरबों रुपए आ जाएंगे. इस के अलावा बहुत से अयोग्य लोग नौकरी पाने के लिए लाखों रुपए की रिश्वत देने के लिए भी तैयार हो जाएंगे, उस से जो कमाई होगी वह अलग. इस सब के पीछे कोई बहुत बड़ा गैंग काम कर रहा है, जिस ने इंटरनैट पर प्राधिकरण की फर्जी साइट तक बना रखी है. इन का जल्द से जल्द भंडाफोड़ करना जरूरी है वरना ये लोग लाखों बेरोजगारों को ठग लेंगे,’’ विकास ने कहा.

‘‘तुम सही कह रहे हो. यह किसी बहुत बड़े गिरोह का काम लगता है. जिलाधिकारी महोदय से हमारी जानपहचान है. हम सीधे उन के पास चलते हैं. वही कुछ करेंगे,’’ प्रधानजी ने कहा. दोनों मोटरसाइकिल से जिलाधीश से मिलने चल दिए. जिलाधीश ने रिकौर्डिंग सुनने के बाद विकास की पीठ थपथपाई, फिर बोले, ‘‘बेटा, तुम ने देश के बेरोजगारों को बहुत बड़ी धोखाधड़ी से बचा लिया है. मुझे तुम पर गर्व है. मैं सरकार से तुम्हें पुरस्कार देने की सिफारिश करूंगा.’’ इतना कह कर उन्होंने तुरंत दिल्ली फोन कर ग्राम विकास मंत्रालय और गृहमंत्रालय के अधिकारियों से बात की. वहां से भी स्पष्ट हो गया कि यह वैबसाइट पूरी तरह फर्जी है. गृहमंत्रालय के निर्देश पर बैंक ने उस अकाउंट में जमा रकम को जब्त कर लिया. जिन लोगों ने वह अकाउंट खुलवाया था उन के पते पर छापा मार कर पुलिस ने देर रात तक पूरे गिरोह को गिरफ्तार कर लिया. वे लोग पहले भी अलगअलग प्रदेशों में भरती के विज्ञापन निकाल कर बेरोजगारों को ठग चुके थे. इस बार उन्होंने पूरे देश में एकसाथ लाखों लोगों को ठगने की योजना बनाई थी, लेकिन विकास की बुद्घिमानी से वे पकड़े गए. Social Story

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