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अदालतों का निकम्मापन

गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट को अब हार कर यह एहसास हो गया है कि उस के बारबार के आदेशों के बावजूद निचली अदालतें छोटेछोटे मामलो में भी जमानत देने से कतराती हैं और पुलिस व सरकारी वकील की सिफारिश पर हर आरोपी को कुछ दिन जेल काटने को मजबूर कर ही देती हैं. निचली अदालतों के पास हर अभियुक्त को जमानत देने का पूरा अधिकार है यहां तक कि हत्या के अपराध में लाए गए आरोपी को भी. पर निचली पहली अदालत बिना दिमाग लगाए आरोपी को जेल में भेज देती है.

यह पुलिस के लिए बहुत ही लाभदायक फैसला होता है. हर प्राथमिकी पर किसी को गिरफ्तार करने का हक हर पुलिस इंस्पैक्टर को असीम पावर देता है. उन कानूनों में जहां अपराध पर जमानत का स्पष्ट उल्लेख है वहां भी निचली अदालत के जरिए आरोपी को 10-20 दिन तक जेल तो कटवा ही दी जाती है. निचली अदालतें इस अधिकार का दुरुपयोग इसलिए करती हैं ताकि अदालतों का दबदबा व खौफ बना रहे. वैसे भी निचली अदालतों के जजों के रहने, गाड़ी, आनेजाने की सुविधा, घरबाहर के काम पुलिस वाले ही कराते हैं और इसलिए जज उन के एहसानों में दबे होते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश निरर्थक होते हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब तक यह पता करना शुरू नहीं किया कि किन मजिस्ट्रेटों या कनिष्ठ न्यायाधीशों ने जमानत अकारण देने से इनकार किया. जब तक सुप्रीम कोर्ट नाम ले कर ऐसे न्यायाधीशों को फटकार नहीं लगाएगा, जजों का ‘माइंड सैट’ नहीं बदलने वाला जिस की बात सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय किशन कौल और एम एम सुंद्रेश की पीठ ने कही है. यह मानसिकता तब बदलेगी जब सुप्रीम कोर्ट वैसा ही फैसला लेगा जैसा उस ने मुंबई की हाईकोर्ट जज पुष्पा गनेडीवाला के मामले में लिया. जज पुष्प ने कई विवादास्पद निर्णय दिए थे, उसे सुप्रीम कोर्ट ने वापस जिला न्यायालय में भेज दिया.

सुप्रीम कोर्ट को किसी लौ कालेज को यह जांच करने पर लगाना चाहिए कि कितने मामलों में, जहां अभियुक्तों को जमानत भी नहीं मिली थी, ऊपरी अदालत ने या उसी अदालत ने निर्दोष माना. जब ये आंकड़े और तथ्य संबंधित मजिस्ट्रेटों और सब जजों के सामने पहुंचने शुरू होंगे तो न्याय व्यवस्था में सुधार होगा. गलती तब सुधारी जाती है जब गलती करने वाले को एहसास दिलाया जाए जैसे किसानों ने नरेंद्र मोदी को कृषि कानूनों के बारे में दिलाया.

जिंदगी की जंग: नीना का घर छोड़ने का फैसला सही था

‘‘अरे रामू घर की सफाई हुई या नहीं? जल्दी से चाय का पानी आंच पर चढ़ाओ.’’

सवेरे सवेरे अम्मां की आवाज से अचानक मेरी नींद खुली तो देखा वे नौकरों को अलगअलग निर्देश दे रही थीं. पूरे घर में हलचल मची थी. आज गरीबरथ से जया दीदी आने वाली हैं. जया दीदी हम बहनों से सब से बड़ी हैं. उन की शादी बहुत ही ऊंचे खानदान में हुई है. साथ में दोनों बच्चे व जीजाजी भी आ रहे हैं. अम्मां चाहती हैं कि इंतजाम में कोई कमी न हो.

तभी बाबूजी की आवाज आई, ‘‘अरे बैठक की चादर बदली कि नहीं? मेहमान आने ही वाले होंगे. सब कुछ साफसुथरा होना चाहिए. कभीकभी तो आ पाते हैं बेचारे. उन को छुट्टी ही कहां मिलती है.’’

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तभी अम्मां की नजर मुझ पर पड़ी, ‘‘अरे नीना, तू तो ऐसे ही बैठी है और यह क्या, मुन्नू तो एकदम गंदा है. चल उठ, नहाधो कर नए कपड़े पहन और हां, मुन्नू को भी ढंग से तैयार कर देना वरना मेहमान कहेंगे कि हम ने तुम्हें ठीक से नहीं रखा.’’

अम्मां की बातें सुन कर मन कसैला हो गया. मैं भी शादी के बाद जब 1-2 बार आई थी, तब घर का माहौल ऐसा ही रहता था. पहली बार जब मैं शादी के बाद मायके आई थी, तब सब कैसे खुश हुए थे. क्या खिलाएं, कहां बैठाएं. लग रहा था जैसे मैं कभी आऊंगी ही नहीं.

लेकिन कितने दिन ऐसा आदर सत्कार मुझे मिला. ससुराल जाते ही सब को मेरी बीमारी के बारे में पता चल गया. कुछ दिनों तक तो उन लोगों ने मुझे बरदाश्त किया, फिर बहाने से यहां ला कर बैठा गए. दरअसल, मुझे सफेद दाग की बीमारी थी, जिसे छिपा कर मेरी शादी की गई थी.

फिर घर की प्यारी बेटी, जो पिता की आंखों का तारा व मां के लिए नाज थी, के साथ शुरू हुआ एक नया अध्याय. जो पिता मेरा खुले दिल से इलाज करवाते थे, उन्हें अब मेरी जरूरी दवाएं भी बोझ लगने लगीं. मां को शर्म आने लगी कि पासपड़ोस वाले कहेंगे कि बेटी मायके में आ कर ही बस गई. भाईबहन भी कटाक्ष करने से बाज नहीं आते थे.

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अभी यह लड़ाई चल ही रही थी कि पति का बोया हुआ बीज आकार लेने लगा. खैर, जैसेतैसे मुन्नू का जन्म हुआ.

नाती के जन्म की जैसी खुशी होनी चाहिए, वैसी किसी में नहीं दिखी. बस एक कोरम पूरा किया गया.

धीरेधीरे मुन्नू 3 साल का हो गया. तब मैं ने भी ठान ली कि ऐसे बैठे रह कर ताने सुनने से अच्छा है कुछ काम किया जाए.

सिलाईकढ़ाई और पेंटिंग का शौक मुझे शुरू से ही था. शादी के पहले मैं ने सिलाई का कोर्स भी किया था. मैं अगलबगल की कुछ लड़कियों को सिलाई सिखाने लगी. उन को मेरा सिखाने का तरीका अच्छा लगा, तो वे और लड़कियां भी ले आईं. इस तरह मेरा सिलाई सैंटर चल निकला. ढेर सारी लड़कियां मुझ से सिलाई सीखने आने लगीं और इस से मेरी अच्छी कमाई होने लगी.

मुन्नू के 4 साल का होने पर मैं ने उसे पास के प्ले स्कूल में भरती करा दिया. अब मेरे पास समय भी काफी बचने लगा, जिस का सदुपयोग मैं अपने सिलाई सैंटर में किया करती थी. धीरेधीरे मेरा सैंटर एक मान्यता प्राप्त सैंटर हो गया. काम काफी बढ़ जाने के कारण मुझे 2 सहायक भी रखने पड़े. इस से मुझे अच्छी मदद मिलती थी.

अभी जिंदगी ने रफ्तार पकड़ी ही थी कि भैया की शादी हो गई. नई भाभी घर में आईं तो कुछ दिन तो सब कुछ ठीक रहा. मगर धीरेधीरे उन को मेरा वहां रहना नागवार गुजरने लगा.

मां अगर मुन्नू के लिए कुछ भी करतीं तो उन का पारा 7वें आसमान पर चढ़ जाता. शुरूशुरू में तो वे कुछ नहीं कहती थीं, लेकिन बाद में खुलेआम विरोध करने लगीं.

एक दिन तो हद ही हो गई. बाबूजी बाजार से मुन्नू के लिए खिलौने ले आए. उन्हें देखते ही भाभी एकदम फट पड़ीं. चिल्ला कर बोलीं, ‘‘बाबूजी, घर में अब यह सब फुजूलखर्ची बिलकुल भी नहीं चलेगी. इस महंगाई में घर चलाना ऐसे ही मुश्किल हो गया है, ऊपर से आप आए दिन मुन्नू पर फुजूलखर्ची करते रहते हैं.’’

हालांकि ऐसा नहीं था कि घर की माली हालत खराब थी. भैया कालेज में हिंदी के प्रोफैसर थे और बाबूजी को भी अच्छीखासी पैंशन मिलती थी. मुझे भाभी की बातें उतनी बुरी नहीं लगीं, जितना बुरा बाबूजी का चुप रहना लगा. बाबूजी का न बोलना मुझे भीतर तक भेद गया. मैं सोचने लगी क्या बाबूजी पुत्रप्रेम में इतने अंधे हो गए हैं कि बहू की बातों का विरोध तक नहीं कर सकते?

उन्हीं बाबूजी की तो मैं भी संतान थी. मेरा मन कचोट कर रह गया. क्या शादी के बाद लड़कियां इतनी पराई हो जाती हैं कि मांबाप पर भी उन का हक नहीं रहता? खैर जैसेतैसे मन को मना कर मैं फिर सामान्य हो गई. मुन्नू को स्कूल भेजना और मेरा सैंटर चलाना जारी रहा.

मेरा सिलाई सैंटर दिनबदिन मशहूर होता जा रहा था. अब आसपास के गांवों की लड़कियां और महिलाएं भी आने लगी थीं. मेरी कमाई अब अच्छी होने लगी थी, इसलिए मैं हर महीने कुछ रुपए मां के हाथ पर रख देती थी. शुरू में तो मां ने मना किया, परंतु मेरे यह कहने पर कि अगर मैं लड़का होती और कमाती रहती तो तुम पैसे लेतीं न, वे मान गई थीं. कुछ पैसे मैं भविष्य के लिए बैंक में भी जमा करा देती थी.

किसी तरह जिंदगी की गाड़ी चल रही थी. घर में भाभी की चिकचिक बदस्तूर जारी थी. मांपिताजी के पुत्रप्रेम से भाभी का दिमाग एकदम चढ़ गया था. अब तो वे अपनेआप को उस घर की मालकिन समझने लगी थीं. हालांकि मां का स्वास्थ्य बिलकुल ठीक था और वे घर का कामकाज भी करना चाहती थीं, लेकिन धीरेधीरे मां को उन्होंने एकदम बैठा दिया था.

उन्हें खाना बनाने का बहुत शौक था, खासकर बाबूजी को कुछ नया बना कर खिलाने का, जिसे वे बड़े चाव से खाते थे. लेकिन भाभी को यह सब फुजूलखर्ची लगती थी, इसलिए उन्होंने मां को धीरेधीरे रसोई से दूर कर दिया था.

मैं तो उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाती थी. मुझे देखते ही वे बेवजह अपने बच्चों को मारनेपीटने लगती थीं. एक दिन मैं दोपहर को सिलाई सैंटर से खाना खाने घर पहुंची तो बाहर बहुत धूप थी. सोचा था घर पहुंच कर आराम से खाना खाऊंगी.

हाथमुंह धो कर खाना ले कर बैठी ही थी कि भाभी ने भुनभुनाना शुरू कर दिया कि कितना आराम है. बैठेबैठाए आराम से खाना जो मिल जाता है. मुफ्त के खाने की लोगों को आदत लग गई है. अरे जितना खर्च इस में लगता है, उतने में तो हम 2 नौकर रख लें.

सुन कर हाथ का कौर हाथ में ही रह गया. लगा, जैसे खाना नहीं जहर खा रही हूं. फिर खाना बिलकुल नहीं खाया गया. हालांकि जितना बन पाता था, मैं सुबह किचन का काम कर के ही सिलाई सैंटर जाती थी. लेकिन भाभी को तो मुझ से बैर था, इसलिए हमेशा मुझ से ऐसी ही बातें बोलती रहती थीं. लेकिन उस दिन उन की बात मेरे दिल को चीर गई और मैं ने सोच लिया कि बस अब बहुत हो गया. अब और बरदाश्त नहीं करूंगी.

उसी क्षण मैं ने फैसला कर लिया कि अब इस घर में नहीं रहूंगी. कुछ दिन बाद

छोटे से 2 कमरों का घर तलाश कर मैं ने अम्मांबाबूजी के घर को छोड़ दिया. हालांकि घर छोड़ते समय मां ने हलका विरोध किया था, लेकिन कब तक मन को मार कर मैं जबरदस्ती इस घर में रहती.

नए घर में आने के बाद मैं नए उत्साह से अपने काम में जुट गई. अपने घर की याद तो बहुत आती थी. मगर फिर सोचती कैसा घर, जब वहां मेरी कोई कीमत ही नहीं. खैर मैं ने अपनेआप को पूरी तरह से अपने काम में रमा लिया.

सिलाई सैंटर में लड़कियों की भीड़ ज्यादा बढ़ गई तो सैंटर की एक शाखा और खोल ली. मुन्नू भी दिनोंदिन बड़ा हो रहा था और पढ़ाई में जुटा था. पढ़ने में वह काफी होशियार था. हमेशा अच्छे नंबरों से पास होता था.

दिन पंख लगा कर उड़ रहे थे. अम्मांबाबूजी का हालचाल फोन से पता चल जाता था. कभीकभार मुन्नू से मिलने के लिए वे आ भी जाते थे. अब मेरा काम बहुत बढ़ गया था.

मैं ने एक बुटीक भी खोल लिया था, जिसे हमारे सैंटर की लड़कियां और महिलाएं मिल कर चला रही थीं. मेरा बुटीक ऐसा चल निकला कि मुझे कपड़ों के निर्यात का भी और्डर मिलने लगा. मैं बहुत खुश थी कि मेरी वजह से कई महिलाओं को रोजगार मिला था.

अब मुन्नू भी एम.बी.ए. कर के मेरे आयातनिर्यात का काम देखने लगा था. उस के बारे में मुझे एक ही चिंता थी कि उस की शादी कर दूं.

एक दिन मेरे मायके की पड़ोसिन गीता आंटी मिलीं. कहने लगीं कि तुम को पता है, तुम्हारे मायके में क्या चल रहा है? मेरे इनकार करने पर उन्होंने बताया कि तुम्हारी भाभी तुम्हारे मांबाबूजी पर बहुत अत्याचार करती हैं. तुम्हारा भाई तो कुछ बोलता ही नहीं. अभी कल तुम्हारे बाबूजी मुझ से मिले थे. वे किसी वृद्धाश्रम का पता पूछ रहे थे. जब मैं ने पूछा कि वे वृद्धाश्रम क्यों जाना चाहते हैं, तो उन्होंने कहा कि मैं अब इस घर में एकदम नहीं रहना चाहता हूं. बहू का अत्याचार दिनबदिन बढ़ता ही जा रहा है.

सुन कर मैं रो पड़ी. ओह, मेरे अम्मांबाबूजी की यह हालत हो गई और मुझे पता भी नहीं चला. मेरा मन धिक्कार उठा.

यहां मेरी वजह से कई परिवार चल रहे थे और वहां मेरे अम्मांबाबूजी की यह हालत हो गई है. रात को ही मैं ने फैसला कर लिया, बहुत हुआ अब और नहीं. अम्मांबाबूजी को यहीं ले आऊंगी. अगले ही दिन गाड़ी ले कर मैं और मुन्नू उन को लाने के लिए घर गए. हमें देखते ही वे रोने लगे. हम ने उन्हें चुप कराया फिर साथ चलने को कहा.

अभी वे कुछ बोलते, उस से पहले ही वहां भाभी आ गईं और अपना वही अनर्गल प्रलाप करने लगीं. बाबूजी ने उन की तरफ देखा और शांति से बस इतना कहा, ‘‘हमें जाने दो बहू.’’

अम्मांबाबूजी गाड़ी में बैठ गए. मुझे लगा आज मैं हवा में उड़ रही हूं. आज मैं ने जिंदगी की जंग को जीत लिया था.

पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह: बलि का बकरा या महंगी पड़ी खादी से दोस्ती?

आम लोगों के लिए एक पुरानी कहावत है कि पुलिस की दोस्ती भली न दुश्मनी. लेकिन इस के उलट पुलिस के लिए भी एक कहावत है कि पुलिस के लिए नेता की दोस्ती भली न दुश्मनी.

फरवरी 2020 में मुंबई पुलिस के आयुक्त बने आईपीएस परमबीर सिंह पर यह कहावत एकदम सटीक बैठती है. क्योंकि जिन नेताओं से दोस्ती कर के उन्होंने बड़ेबड़े कारनामों को अंजाम दे कर सुपरकौप बनने की शोहरत हासिल की थी. यूं कहें तो गलत न होगा कि परमबीर सिंह को महाराष्ट्र पुलिस का नायक कहा जाता था. लेकिन नेताओं की दोस्ती के कारण परमबीर सिंह पुलिस कमिश्नर बनने के कुछ समय बाद ही नायक से अचानक खलनायक बन गए.

परमबीर सिंह को उन के पद से हटा दिया गया और अचानक ऐसा विवाद शुरू हुआ कि मुंबई पुलिस के इस मुखिया को गिरफ्तार करने के लिए देश की सब से बड़ी एजेंसियां छापेमारी करने लगीं. जान बचाने के लिए उन्हें इधरउधर छिपना पड़ा और उन्हें भगोड़ा घोषित करने तक की नौबत आ गई.

वो तो गनीमत है कि देश में अभी लोगों को इंसाफ के लिए अदालतों पर भरोसा है. परमबीर सिंह को भी उसी अदालत की शरण में जाना पड़ा और कई महीनों की लुकाछिपी के बाद उन्हें न सिर्फ गिरफ्तारी से राहत मिल गई बल्कि उन के ऊपर लगा भगोड़े का ठप्पा भी हटा लिया गया.

लेकिन यह समझना काफी दिलचस्प होगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि मराठा प्रदेश की पुलिस का नायक कहा जाने वाला अफसर रातोंरात खलनायक बन गया? दरअसल, इस की कहानी जानने के लिए इस से पहले एक अहम घटनाक्रम की तह में जाना होगा.

दरअसल, हुआ यूं कि 25 फरवरी, 2021 को देश के सब से बड़े रईस मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया से कुछ दूरी पर खड़ी एक सिलवर कलर की स्कौर्पियो कार से 20 जिलेटिन छड़ें बरामद हुईं. लावारिस गाड़ी में विस्फोटक मिलने की खबर मिलते ही मुंबई पुलिस के बम निरोधक दस्ता, डौग स्क्वायड ने पड़ताल शुरू कर दी. उसी रात एटीएस को पता चला कि गाड़ी मनसुख हिरेन नाम के एक कारोबारी की है, जो 18 फरवरी को चोरी हो गई थी.

एटीएस के एपीआई सचिन वाजे ने हिरेन को अगले ही दिन पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया और दक्षिण मुंबई में पुलिस कमिश्नर के औफिस ले कर आ गया.

वाजे ने 3 दिन लगातार पूछताछ की और हिरेन के कई बयान दर्ज किए गए. अचानक 28 मार्च को आतंकी संगठन ‘जैश उल हिंद’ संगठन ने टेलीग्राम ऐप के जरिए इस घटना की जिम्मेदारी लेते हुए धमकी भरा संदेश दिया कि यह तो ट्रेलर है.

इस के बाद घटना ने संगीन रूप ले लिया. चूंकि मामला देश के सब से बड़े उद्योगपति से जुड़ा था. एंटीलिया के साथ अंबानी परिवार की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई. केस को मुंबई पुलिस से ले कर आतंकवादी घटनाओं की जांच करने वाली केंद्रीय जांच एजेंसी एनआईए को सौंप दिया.

मनसुख हिरेन की मौत से उलझी जांच

एनआईए ने तत्काल इस केस की कमान अपने हाथ में ले ली. लेकिन मुंबई पुलिस के उच्चाधिकारियों ने मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच की कई यूनिटों को भी काम पर लगा दिया. एनआईए और मुंबई क्राइम ब्रांच की टीमें घटनास्थल के सीसीटीवी खंगालने लगीं.

घटनास्थल पर सक्रिय सभी मोबाइल फोन के डंप डाटा को संकलित कर उन की कुंडलियां खंगालने का काम शुरू हो गया. जिस के बाद क्राइम ब्रांच के एक दूसरे एपीआई दया नायक की टीम को पता चला कि मनुसख हिरेन और इंसपेक्टर सचिन वाजे तो एकदूसरे को पहले से जानते हैं.

यह जानकारी जैसे ही पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह के पास पहुंची तो उन्होंने यह जांच एसीपी नितिन अल्कानुर को ट्रांसफर कर दी.

इसी दौरान मामले में एक नया ट्विस्ट यह आया कि 3 मार्च को मनसुख हिरेन ने उच्चाधिकारियों को एक पत्र लिख कर पुलिस द्वारा प्रताडि़त किए जाने की शिकायत की. पुलिस ने शिकायत की जांच के लिए जब मनसुख से संपर्क साधना चाहा तो वह लापता मिला.

एंटीलिया केस में उस समय नया मोड़ आ गया जब विस्फोटक लदी स्कौर्पियो के मालिक मनसुख हिरेन की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. 5 मार्च को मनसुख का शव ठाणे से बरामद किया गया.

शव मिलने के बाद इस मामले में गहरी साजिश की बात सामने आने लगी. मामले की जांच कर रही एनआईए और एटीएस दोनों ही सतर्क हो गईं. जांच में एनआईए को पता चला कि एंटीलिया केस का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, मुंबई पुलिस के इंसपेक्टर सचिन वाजे है.

दरअसल, एनआईए ने मनसुख के घर के बाहर से टैक्सी स्टैंड तक के जो सीसीटीवी फुटेज बरामद किए थे, उस के बाद एक ओला कार के ड्राइवर को हिरासत में लिया गया था. उस ने बताया कि मनसुख को छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस तक पहुंचाने के दौरान मनसुख के 5 फोन काल आई थीं.

ड्राइवर के मुताबिक मनसुख को काल करने वाले ने पहले उन्हें पुलिस मुख्यालय के सामने स्थित रूपम शोरूम के बाहर बुलाया और आखिरी फोन में उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के सिग्नल पर आने को कहा.

संदेह के दायरे में आते ही एनआईए ने सचिन वाजे को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद तो एकाएक कई परतें खुलने लगीं और हर रोज नए खुलासे होने लगे.

एनआईए को जांच में पता चला कि एंटीलिया यानी मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटक भरी कार पुलिस अधिकारी सचिन वाजे ने ही खड़ी की थी. उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के लिए कुरता पहना हुआ था. मुंह को गमछे से ढका था.

सीसीटीवी फुटेज के आधार पर एनआईए ने खुलासा करते हुए सचिन वाजे को मुकेश अंबानी के घर के बाहर ले जा कर सीन का रिक्रिएशन भी किया. इस दौरान वाजे के सिर पर साफा बांधा गया. डमी के तौर पर स्कौर्पियो और इनोवा को भी मौके पर लाया गया.

चूंकि मनसुख की मौत का मामला एंटीलिया केस की साजिश से जुड़ा था, इसलिए इस मामले की जांच भी एनआईए को सौंप दी गई. चूंकि इस मामले में एक गहरी साजिश की बू आ रही थी, इसलिए मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया.

बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सड़क से ले कर विधानसभा तक में सरकार पर निशाना साधते हुए गंभीर आरोपों की बौछार शुरू कर दी.

मामला इसलिए ज्यादा संगीन हो गया कि एनआईए को जांच में पता चला कि इंसपेक्टर ओहदे का सचिन वाजे ज्यादातर फाइवस्टार होटल ट्राइडेंट में रहा करता था, जिस की तलाशी ली गई तो वहां से ऐसे सबूत मिले जिस से पता चला कि सचिन वाजे वहां न सिर्फ रासलीलाएं रचाता था, बल्कि वहां बैठ कर वसूली का रैकेट भी चला रहा था.

सचिन वाजे की आलीशान जिंदगी का पता इसी बात से चलता है कि एनआईए ने उस सफेद रंग की नई मर्सिडीज कार को भी बरामद कर लिया, जिस में वाजे चलता था. ट्राइडेंट होटल में सचिन वाजे अकसर अपनी एक गर्लफ्रैंड मीना जार्ज के साथ आता था.

पुलिस ने जब उसे गिरफ्तार किया तो खुलासा हुआ कि सचिन वाजे और मीना जार्ज का जौइंट खाता और लौकर भी है. मीना से पूछताछ में कई नए राज खुले. उस ने बताया कि सचिन वाजे महाराष्ट्र सरकार के एक बड़े नेता के इशारे पर वसूली का बड़ा रैकेट चलाता था. वसूली के कलैक्शन में मीना सचिन वाजे की मदद करती थी.

मीना पैसे गिनने वाली मशीन ले कर घूमती थी और वो ट्राइडेंट होटल में वाजे से मिलने के लिए जाती रहती थी. सचिन वाजे की गर्लफ्रैंड मीना ने ही बैंक से गिरफ्तारी से 2 दिन पहले ही वाजे के साथ अपने संयुक्त खाते से 26 लाख रुपए निकाले थे.

एंटीलिया के पास सचिन वाजे ने ही खड़ी की थी विस्फोटक कार

पूछताछ में खुलासा हुआ कि मुकेश अंबानी के घर के बाहर गाड़ी से बरामद जिलेटिन की छड़ें सचिन वाजे ने खुद ही खरीदी थीं. जांच में पता चला कि बरामद की गई छडे़ं नागपुर की सोलर इंडस्ट्रीज कंपनी द्वारा बनाई गई थीं.

जांच के बाद यह सच भी सामने आ गया कि एंटीलिया के बाहर गाड़ी में जिलेटिन की छड़ें रख कर बाद में आतंकी संगठन की टेलीग्राम ऐप पर आईडी क्रिएट कर के सचिन वाजे ने ही फरजी कुबूलनामा किया था.

मनसुख हिरेन की मौत और एंटीलिया के बाहर विस्फोटक रखने की साजिश के तार पूरी तरह आपस में जुड़ चुके थे और सचिन वाजे इस साजिश का मास्टरमाइंड बन कर सामने आ चुका था.

एनआईए ने इस साजिश से जुडे़ एकएक आरोपी को गिरफ्तार करना शुरू किया तो पता चला कि मुंबई पुलिस के कई लोग सरकार के एक मंत्री के इशारे पर वसूली का एक बड़ा रैकेट चला रहे थे, जिस का मास्टरमाइंड सचिन वाजे था.

एंटीलिया केस और मनसुख मामले में सचिन वाझे के बाद मुंबई पुलिस के ही कई निवर्तमान अफसरों की गिरफ्तारियां हुईं, जिस के बाद कई तरह के सवाल खड़े हो गए.

सवाल यह भी उठा कि सचिन वाजे दागदार अतीत का पुलिस अफसर था और लंबे समय से वह पुलिस की सेवाओं से बरखास्त भी था. फिर क्यों उसे बहाल किया गया और क्यों उसे क्राइम ब्रांच की एक अहम यूनिट का इंचार्ज बना कर हाईप्रोफाइल मामलों की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई?

एनआईए के अधिकारी सचिन वाजे के अतीत को खंगालने के बाद सकते में आ गए. पता चला कि वाजे ने 1990 में बतौर सबइंसपेक्टर महाराष्ट्र पुलिस जौइन की थी. उस की पहली पोस्टिंग माओवाद से प्रभावित गढ़चिरौली इलाके में हुई.

करीब 2 साल बाद उसे ठाणे सिटी में भेज दिया गया. जल्द ही उस की पहचान आपराधिक मामलों के एक्सपर्ट की बन गई थी. इसलिए उसे क्राइम ब्रांच की स्पैशल स्क्वायड में शामिल कर दिया गया.

ये वही दौर था जब सचिन वाजे की पहचान एक एनकाउंटर स्पैशलिस्ट की बनी. वह मुंबई के एनकाउंटर स्पैशलिस्ट्स की उस तिकड़ी का हिस्सा बन गया, जिस में प्रदीप शर्मा और दया नायक का नाम भी है.

सन 2000 में सचिन वाजे का ट्रांसफर मुंबई पुलिस की पोवई यूनिट में क्राइम ब्रांच में कर दिया गया. यहीं पर वाजे और 3 अन्य पुलिसकर्मियों पर घाटकोपर ब्लास्ट केस में आरोपी ख्वाजा यूनुस की पुलिस कस्टडी में हत्या करने का आरोप लगा. पुलिस का कहना था यूनुस कस्टडी से भागा था.

हाईकोर्ट के आदेश पर सीआईडी ने जांच की और पाया कि यह कस्टोडियल डेथ थी. चार्जशीट दाखिल होने के बाद वाजे को सस्पेंड कर दिया गया. चारों पुलिसकर्मियों के खिलाफ ट्रायल अब तक लंबित है.

पुलिस की नौकरी छोड़ शिवसेना में शामिल हो गया था वाजे

सचिन वाजे ने नवंबर 2007 में पुलिस फोर्स से रिजाइन कर दिया. अगले साल वह शिवसेना में शामिल हो गया. 2010 में उस ने लाई भारी नाम की एक सोशल नेटवर्किंग साइट भी शुरू की.

वाजे ने एक ऐसा सौफ्टवेयर डेवलप किया, जिस से लोगों की फोन पर बातचीत सुनी जा सकती थी और उन के मैसेजेस एक्सेस किए जा सकते थे.

पुलिस फोर्स से बाहर रहने के दौरान वाजे ने 2 किताबें भी लिखीं. एक शीना बोरा मर्डर केस पर और दूसरी डेविड हैडली पर. हैडली लश्करएतैयबा का औपरेटिव था, जो 26/11 के हमलों में शामिल था.

पुलिस की नौकरी से बाहर रहने के दौरान सचिन वाजे अकसर कुछ न्यूज चैनलों पर एक एक्सपर्ट के रूप में दिखता था.

इस दौरान सचिन वाजे के शिवसेना से ले कर एनसीपी के बड़े नेताओं से इतने करीबी रिश्ते बन गए कि अचानक इतने साल तक नौकरी से बाहर रहने के बावजूद सचिन वाजे के निलंबन की फाइल दोबारा खोल दी गई और उसे जून 2020 में महाराष्ट्र पुलिस में बहाल कर दिया गया. वजह बताई गई कि कोविड-19 के चलते स्टाफ की कमी है.

लेकिन वाजे को जो जिम्मेदारियां दी गईं, उस से लगा नहीं कि उसे केवल जगह भरने के लिए फोर्स में लाया गया था. उसे मुंबई क्राइम ब्रांच में शामिल किया गया और क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट का इंचार्ज बना दिया गया. इस के बाद उस ने फेक सोशल मीडिया फालोअर्स वाले केस की जांच शुरू कर दी, जिस में रैपर बादशाह को तलब किया गया था.

किस के इशारे पर वाजे को दोबारा नौकरी दे कर सौंपी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी

वैसे तो वाजे काफी जूनियर अधिकारी था, लेकिन जल्द ही उसे मुंबई का हर अहम केस हैंडल करने दिया गया. चाहे वह टीवी रेटिंग्स में घोटाले का मामला हो या अन्वय नायक सुसाइड केस में अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी करना, वाजे हर हाईप्रोफाइल केस में फ्रंट पर दिखाई पड़ रहा था.

सचिन वाजे ने दिसंबर 2020 में स्पोर्ट्स कार डिजायनर दिलीप छाबडि़या को भी अरेस्ट किया. वह बौलीवुड एक्टर ऋतिक रोशन के फेक ईमेल केस की जांच भी कर रहा था.

जाहिर है कि मुंबई पुलिस के मुखिया होने के नाते परमबीर सिंह पर सवाल खडे़ होने ही थे कि उन्होंने एक दागी पुलिस अफसर को इतनी खुली छूट और मौके किस के कहने पर दिए.

भाजपा और फडणवीस ने पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह को निशाना बनाते हुए आरोप लगाने शुरू कर दिए कि उन्हीं के इशारे पर सचिन वाजे वसूली का रैकेट चला रहा था.

भले ही इन आरोपों में सच नहीं था, फिर भी परमबीर सिंह की विभाग का मुखिया होने के कारण भूमिका संदिग्ध होनी स्वाभाविक थी. लिहाजा परमबीर सिंह से एनआईए ने पूछताछ शुरू कर दी और उन के खिलाफ मीडिया ट्रायल होने लगा.

परमबीर सिंह की चिट्ठी से आया भूचाल

आरोपों के अंबार के बीच उद्धव ठाकरे की अघाड़ी सरकार को भी अपने बचाव के लिए परमबीर सिंह को पुलिस आयुक्त के पद से हटा कर उन्हें होम गार्ड डिपार्टमेंट का कमांडेंट जनरल बना दिया गया.

मुंबई पुलिस में अपने शानदार कामों के लिए मशहूर रहे परमबीर सिंह के लिए अपनी साख को बचाना जब मुश्किल हो गया तो उन्होंने वह सच उगल दिया, जिस ने पूरे महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल पैदा कर दिया.

मुंबई के पुलिस कमिश्नर पद से हटाए जाते ही आईपीएस औफिसर परमबीर सिंह ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को 8 पेज का एक ऐसा पत्र लिखा, जिस में उन्होंने अपनी 32 साल की नौकरी में अपनी ईमानदारी का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री से संवैधानिक मूल्यों का पालन करने का अनुरोध किया.

इस पत्र में देश के सब से अमीर शख्स और रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के बाहर हुई घटना का जिक्र भी किया.

परमबीर सिंह ने अपने ट्रांसफर को प्रशासनिक जरूरत बताने पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि वास्तव में उन का तबादला एंटीलिया के बाहर की घटना की जांच से जुड़ा है. इस पत्र में परमबीर सिंह ने महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख पर गंभीर आरोप लगाए.

उन्होंने पत्र में मुख्यमंत्री ठाकरे के साथ मार्च में हुई अपनी एक मुलाकात का हवाला देते हुए लिखा, ‘‘मैं ने उस मीटिंग में आप को बताया था कि आदरणीय होम मिनिस्टर कौन सी गड़बडि़यां कर रहे हैं एंटीलिया मामले में. इन गड़बडि़यों की जानकारी उपमुख्यमंत्री के अलावा एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और दूसरे सीनियर मंत्रियों को भी दी थी. कई मंत्रियों को देशमुख की कई हरकतों की जानकारी पहले से थी.’’

परमबीर सिंह ने लेटर में साफ लिखा कि मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट के इंसपेक्टर सचिन वाजे को पिछले कुछ महीनों में अनिल देशमुख ने कई बार सीधे अपने सरकारी आवास पर बुलाया था और बारबार कहा था कि उन के लिए पैसा जुटाने में वह मदद करें.

फरवरी की एक ऐसी ही मीटिंग का जिक्र करते हुए पत्र में परमबीर सिंह ने दावा किया कि उस दौरान देशमुख के पर्सनल सेक्रेटरी मिस्टर पालंदे सहित उन के स्टाफ के 2 लोग भी थे. तब देशमुख ने वाजे को हर महीने 100 करोड़ की वसूली का टारगेट दिया.

यह भी बताया कि टारगेट किस तरह पूरा होगा. देशमुख ने सचिन वाजे से कहा था कि मुंबई में लगभग 1750 बार, रेस्टोरेंट और दूसरी दुकानें हैं और अगर हर एक से 2-3 लाख रुपए भी लिए जाएं तो महीने के 40-50 करोड़ तो चुटकियों में आ जाएंगे. बाकी पैसा दूसरे जरियों से जुटाने की सलाह दी.

परमबीर सिंह ने दावा किया कि वाजे ने उसी दिन उन के औफिस में आ कर उन्हें इस की जानकारी दी. यह सब सुन कर परमबीर सिंह हैरान हो गए और सोचने लगे कि अब क्या किया जाए.

गृहमंत्री अनिल देशमुख करा रहे थे मोटी उगाही

कुछ ही दिनों बाद सोशल सर्विस ब्रांच के एसीपी संजय पाटिल को देशमुख ने अपने घर बुलाया. बातचीत होनी थी मुंबई में हुक्का पार्लरों के बारे में. इस मीटिंग में भी पालंदे और कुछ दूसरे अफसर थे. 2 दिनों बाद पाटिल के अलावा डीसीपी भुजबल को भी देशमुख ने बुलाया, लेकिन इस बार दोनों को केबिन के बाहर ही बैठाए रखा.

पालंदे बाहर आए, पाटिल को एक किनारे ले गए और कहा कि देशमुख साहब चाहते हैं कि 40-50 करोड़ रुपए वसूले जाएं उन बार, रेस्तरां और दूसरी दुकानों से. वाजे की तरह पाटिल ने भी परमबीर सिंह को इस की जानकारी दे दी. परमबीर सिंह की चिट्ठी के मुताबिक गृहमंत्री अनिल देशमुख पुलिस के कामकाज में लगातार दखल दे रहे थे और पुलिस कमिश्नर को बाईपास कर निचले अधिकारियों को सीधे निर्देश दे रहे थे.

इस सिलसिले में परमबीर सिंह ने दादरा एवं नगर हवेली के सांसद रहे मोहन डेलकर की मौत के मामले का हवाला भी दिया, जिन्हें 22 फरवरी को मुंबई के होटल सी ग्रीन में मरा पाया गया था. मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन ने खुदकुशी का मामला दर्ज किया. यहां पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला था, जिस में दादरा एवं नगर हवेली के सीनियर अफसरों पर उन्होंने आरोप लगाए थे.

परमबीर सिंह की चिट्ठी के मुताबिक यह मामला सामने आने के बाद से अनिल देशमुख पुलिस पर सुसाइड के लिए उकसाने का मामला मुंबई में ही दर्ज करने को कहने लगे थे, लेकिन खुदकुशी के लिए उकसाने की सारी कथित हरकतें चूंकि दादरा एवं नगर हवेली में हुई थीं, लिहाजा ऐसा मामला अगर दर्ज होना हो तो वहीं होना चाहिए और उस की जांच भी वहीं की पुलिस को करनी चाहिए थी.

लेकिन देशमुख कमिश्नर परमबीर सिंह पर लगातार दबाव डालते रहे और जब परमबीर सिंह ने साफ मना कर दिया तो वह सिंह से नाराज हो गए. क्योंकि खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला मुंबई में दर्ज होने पर जो राजनीतिक फायदा मिल सकता था, वह हाथ से जाता दिख रहा था.

आखिरकार देशमुख ने विधानसभा में 9 मार्च को ऐलान कर दिया कि डेलकर को खुदकुशी के लिए कथित तौर पर उकसाने की एफआईआर दर्ज की जाएगी और जांच के लिए एसआईटी बनाई जाएगी.

परमबीर सिंह ने ठाकरे को लिखे खत में साफ आरोप लगाया कि एक साल के भीतर होम मिनिस्टर देशमुख ने कई मौकों पर मुंबई पुलिस के निचले अफसरों को कमिश्नर को बाईपास के कर के अपने पास बुलाया और पुलिस जांच में किसी खास दिशा में बढ़ने का निर्देश दिया. ये तमाम हरकतें गैरकानूनी और असंवैधानिक थीं. परमबीर सिंह प्रोटोकाल से बंधे होने के कारण और तो कुछ नहीं कर सके, लेकिन वह देशमुख की कथित हरकतों के बारे में लगातार एनसीपी चीफ शरद पवार को जानकारी जरूर देते रहे.

ठाकरे को लिखे पत्र में परमबीर सिंह ने साफ कर दिया कि एंटीलिया से ले कर मनसुख मामले में और मुंबई शहर में पुलिस की वसूली के पीछे अनिल देशमुख की सीधी दखलंदाजी थी और वह उन के मातहत अफसरों को सीधे दिशानिर्देश देते थे. ऐसे में जो भी गड़बडि़यां हुईं, उन की वजहें कहीं और रहीं.

इस मामले में उन्हें गुनहगार मान कर तबादला करने का जो फैसला लिया गया, उस से साफ है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया गया ताकि असल में गड़बड़ी करने वालों से ध्यान हटाया जा सके.

ठाकरे को लिखे इस पत्र में परमबीर सिंह ने अनिल देशमुख और वाजे के काल रिकौर्ड्स की मांग करते हुए सच्चाई सामने लाने का भी अनुरोध किया था. परमबीर सिंह के सीएम उद्धव ठाकरे को लिखे पत्र की कौपी उन्होंने मीडिया में लीक कर दी, जिस के बाद महाराष्ट्र की सियासत में जबरदस्त उबाल आ गया.

एक राजनैतिक पार्टी और मीडिया के निशाने पर थे परमबीर सिंह

दिल्ली में मीडिया का एक वर्ग तथा केंद्र  की भाजपा सरकार के कुछ समर्थक वसूली कांड में शिवसेना से ले कर पुलिस की मिलीभगत के आरोप लगाने लगे. दरअसल इस की भी एक खास वजह थी.

मुंबई पुलिस ने कुछ समय पहले ही टीआरपी घोटाले में केंद्र सरकार के एक समर्थक न्यूज चैनल अर्णब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर के अर्णब समेत चैनल के कुछ अधिकारियों को गिरफ्तार किया था. तभी से मुंबई पुलिस खासकर परमबीर सिंह दिल्ली में राजनीति व मीडिया के एक गुट के निशाने पर थे.

सचिन वाजे की गिरफ्तारी और परमबीर की चिट्ठी का खुलासा होने के बाद इस गुट को महाराष्ट्र सरकार से ले कर मुंबई पुलिस पर निशाना साधने का मौका मिल गया.

परमबीर सिंह की चिट्ठी का असर यह हुआ कि राजनीतिक दबाव बढ़ने पर उद्धव ठाकरे को अनिल देशमुख को गृहमंत्री के पद से हटाना पड़ा और उन के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए न्यायमूर्ति चांदीवाल के अधीन एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन करना पड़ा.

पद से हटते ही ईडी ने सचिन वाजे के खिलाफ दर्ज मामले को आधार बना कर अनिल देशमुख के खिलाफ जांच शुरू कर दी. जांच की आंच परमबीर सिंह तक भी पहुंचनी शुरू हुई.

उन्हें पूछताछ का नोटिस दे दिया गया. परमबीर सिंह ने देशमुख के खिलाफ वसूली के आरोप लगा कर राजनीतिक तंत्र में फैले जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया था, उस में साफ था कि उन्हें फंसाने का काम जरूर किया जाएगा.

आशंका सही निकली और जुलाई में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह समेत 6 अन्य पुलिस अधिकारियों व 2 सिविलियन के खिलाफ एक बिल्डर की शिकायत पर मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में 15 करोड़ की रंगदारी मांगने के आरोप में एफआईआर दर्ज हो गई. मामले में 2 लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया.

परमबीर सिंह ने अपने खिलाफ हो रही साजिश को पहले ही भांप लिया था, उन्हें लगने लगा कि उन्हें बलि का बकरा बनाने के लिए और सारे आरोप उन पर डालने के लिए या तो उन की हत्या कराई जा सकती है या उन्हें किसी मामले में फंसाया जा सकता है.

इसलिए वह भूमिगत हो गए और खुद को सभी आरोपों से मुक्त कराने के लिए उन्होंने अपने वकीलों की मदद से अदालत की शरण लेनी शुरू कर दी.

इसी दौरान ईडी ने अनिल देशमुख को मनी लांड्रिंग केस में गिरफ्तार कर लिया. तेजी से हो रहे घटनाक्रम के बीच एंटीलिया केस व मनसुख हत्याकांड में गिरफ्तार सचिन वाजे ने जांच आयोग को दिए बयान में जब यह साफ कर दिया कि मुंबई पुलिस में वसूली करने का जो रैकेट चल रहा था, वह अनिल देशमुख के दबाव में चल रहा था.

इस का पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह से कोई लेनादेना नहीं था, उल्टा उन्होंने तो वाजे को सलाह दी थी कि भले ही मंत्री दबाव बनाएं लेकिन वह ऐसे किसी खेल में शामिल न हो तो बेहतर रहेगा.

सचिन वाजे का यही बयान परमबीर सिंह के बचाव का कवच बन गया और सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए, ईडी व मुंबई पुलिस को आदेश दिया कि वह परमबीर सिंह को गिरफ्तार न करें. साथ ही परमबीर सिंह को निर्देश दिया कि वह जांच आयोग के सामने पेश हो कर अपना बयान दर्ज कराएं.

परमबीर सिंह के खिलाफ भगोड़ा घोषित करने का नोटिस भी अदालत ने रद कर दिया. हालांकि परमबीर सिंह ने जांच आयोग के समक्ष और वसूली मामले की जांच कर रही मुंबई पुलिस की सीआईडी के समक्ष अपने बयान दर्ज करा दिए, साथ ही उन का सचिन वाजे से आमनासामना करा कर पूछताछ भी हो चुकी है.

लेकिन परमबीर सिंह ने सत्ता और सियासत का असली चेहरा बेनकाब कर के उस से टकराने का जो दुस्साहस किया था, उस में उन की चुनौतियां आसानी से कम होने वाली नहीं थीं, जिस के परिणामस्वरूप महाराष्ट्र सरकार ने 2 दिसंबर, 2021 को पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह को निलंबित कर दिया.

सरकार की तरफ से बयान दिया गया कि उन के खिलाफ अनियमितताओं और खामियों के लिए अनुशासनात्मक काररवाई की गई है. इन खामियों में ड्यूटी से अनधिकृत रूप से अनुपस्थिति को भी शामिल

बताया गया. दरअसल, परमबीर सिंह पिछले 6 महीने में महाराष्ट्र होमगार्ड प्रमुख नियुक्त किए जाने के बाद ड्यूटी पर पेश नहीं हुए थे, स्वास्थ्य के आधार पर उन्हें 29 अगस्त तक की छुट्टी दी गई थी, लेकिन उस के बाद भी वह ड्यूटी पर नहीं आए.

हालांकि परमबीर सिंह को अपनी ईमानदारी का प्रमाण देने के लिए अभी कई लड़ाइयां लड़नी हैं, लेकिन मुंबई पुलिस के नायक रहे इस आईपीएस के साथ हुए घटनाक्रम से एक बात साफ है कि खाकी को एक सीमा रेखा के बाद खादी से न तो दोस्ती करनी चाहिए न ही दुश्मनी. परमबीर सिंह का गुनाह शायद यही है कि उन्होंने इस सीमा रेखा को पार कर दिया.

परमबीर सिंह का विवादों से रहा है नाता

मुंबई पुलिस में एनकाउंटर स्पैशलिस्ट और सुपरकौप के नाम से चर्चित परमबीर सिंह जितने लोकप्रिय रहे, उतना ही उन का विवादों से भी नाता रहा है. उन के सब से विवादास्पद कार्यकालों में से एक एटीएस में उन का कार्यकाल था.

परमबीर सिंह पर भोपाल की वर्तमान सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ने गंभीर अत्याचार का आरोप लगाया था. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने आरोप लगाया था कि कथित ‘भगवा आतंकी मामले’ में उन की भूमिका जबरदस्ती कुबूल करने के लिए मुंबई एटीएस द्वारा उन पर काफी अत्याचार किया गया था.

मुंबई एटीएस के सदस्यों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए साध्वी प्रज्ञा ने खुलासा किया था कि परमबीर सिंह सहित एटीएस अधिकारियों ने उन्हें अवैध हिरासत में रखा था और 13 दिन तक उन्हें प्रताडि़त किया था. साध्वी प्रज्ञा ने आईपीएस खानविलकर, परमबीर सिंह और हेमंत करकरे पर आरोप लगाए थे.

फरवरी 2020 में मुंबई पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्ति से पहले वह भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के महानिदेशक थे. महाराष्ट्र एसीबी में भी परमबीर सिंह का कार्यकाल विवादास्पद रहा है. परमबीर सिंह ने साल 2019 के दिसंबर में सिंचाई परियोजनाओं में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजीत पवार को क्लीनचिट दे दी थी.

अजीत पवार 12 विदर्भ सिंचाई विकास निगम परियोजनाओं से जुड़े एक प्रकाशन में आरोपित थे, जिस की जांच एसीबी कर रही थी. मामले में क्लीनचिट पर बीजेपी ने गंभीर सवाल खड़े किए थे.

2008 में मुंबई में 26 नवंबर को हुए आतंकवादी हमले के तुरंत बाद हमले के दौरान लापरवाही के आरोप में परमबीर सिंह और 3 अन्य अतिरिक्त पुलिस कमिश्नरों के खिलाफ याचिका दायर की गई थी. एक जनहित याचिका में इन अधिकारियों के खिलाफ काररवाई करने की मांग की गई थी.

याचिका में आरोप लगाया गया था कि परमबीर सिंह जैसे अधिकारी तत्कालीन पुलिस कमिश्नर के आदेशों का पालन करने में विफल रहे थे. याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि अगर वरिष्ठ अधिकारियों ने आदेशों का पालन किया होता तो स्थिति को बहुत पहले ही नियंत्रण में लाया जा सकता था और कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी.

याचिकाओं में कहा गया था कि अगर अधिकारी ठीक से काम करते हैं तो 2 और आतंकवादी जिंदा पकड़े जा सकते थे.

याचिका में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर हसन गफूर के हवाले से कहा गया था कि इन अधिकारियों ने उन के आदेशों की अवहेलना की थी और मुंबई आतंकी हमले के दौरान अपनी ड्यूटी निभाने में विफल रहे थे.

इस के साथ ही याचिका में कहा गया था कि अधिकारियों ने आतंकवादियों से मुकाबला करने से इनकार कर दिया था और परेशानी वाले क्षेत्रों से दूर रह कर कंट्रोलरूम को गलत रिपोर्ट दी गई थी.

वह तब भी सुर्खियों में आए, जब दिवंगत बौलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के मामले में मुंबई पुलिस की जांच पर सवाल उठाया गया.

परमबीर सिंह को अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसी बड़ी व प्रसिद्ध बौलीवुड हस्तियों के साथ घनिष्ठ संबंधों के लिए भी जाना जाता है. एक तरफ जहां नितिन गडकरी जैसे शक्तिशाली भाजपा नेताओं के साथ पारिवारिक संबंध रहे हैं तो दूसरी तरफ राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार के भी करीबी हैं.  द्य

परमबीर सिंह बन गए महाराष्ट्र के सुपरकौप

परमबीर सिंह का जन्म 20 जून, 1962 को हरियाणा के फरीदाबाद स्थित पाओता मोहम्मदाबाद गांव के एक पंजाबी परिवार में हुआ था. उन के पिता होशियार सिंह जाति से गुर्जर हैं तथा हिमाचल प्रदेश में एक तहसीलदार थे और मां एक गृहिणी हैं. परमबीर सिंह के 2 भाईबहन भी हैं.

जन्म के कुछ समय बाद ही मां बच्चों को ले कर चंडीगढ़ आ गईं, क्योंकि हिमाचल में नौकरी कर रहे पिता को चंडीगढ़ आ कर परिवार से मिलने में सुविधा होती थी. इसीलिए परमबीर जन्म के बाद किशोरवय उम्र तक चंडीगढ़ में ही पलेबढ़े और वहीं पर उन की शुरुआती पढ़ाई हुई.

उन्होंने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा डीएवी इंटरनैशनल स्कूल, अमृतसर, पंजाब से पूरी की. उस के बाद उन्होंने चंडीगढ़ विश्वविद्यालय, पंजाब में दाखिला लिया, जहां से उन्होंने समाजशास्त्र से एमए किया.

बचपन से ही उन का झुकाव सिविल सेवा की ओर था. 1988 में उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास की और एक आईपीएस अधिकारी के रूप में महाराष्ट्र कैडर से पुलिस में शामिल हो गए. अपनी 32 साल की सेवा में उन्होंने महाराष्ट्र में अपराध को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

परमबीर सिंह की सविता सिंह एक वकील हैं, जो एलआईसी हाउसिंग फाइनैंस लिमिटेड नामक एक निजी कंपनी की निदेशक हैं. सविता सिंह 5 कंपनियों में डायरेक्टर हैं. हालांकि एलआईसी हाउसिंग ने पिछले साल जब टीआरपी मामले में परमबीर सिंह सुर्खियों में आए तो जबरदस्ती उन से बोर्ड से इस्तीफा दिलवा दिया था.

सविता सिंह एक बड़ी कारपोरेट प्लेयर हैं. सविता इंडिया बुल्स ग्रुप की 2 कंपनियों में भी डायरेक्टर हैं. वह एडवोकेट फर्म खेतान एंड कंपनी में पार्टनर हैं. सविता कौंप्लैक्स रियल एस्टेट ट्रांजैक्शन और विवादों के लिए अपने ग्राहकों को सलाह देती हैं.

वह ट्रस्ट डीड, रिलीज डीड और गिफ्ट डीड पर भी सलाह देती हैं. उन के ग्राहकों में ओनर, खरीदार, डेवलपर्स, कारपोरेट हाउसेज, घरेलू निवेशक और विदेशी निवेशक शामिल हैं.

सविता सिंह ने हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रैजुएट की डिग्री हासिल की है. इस के बाद उन्होंने मुंबई से ला में ग्रैजुएशन किया. वह 28 मार्च, 2018 को इंडिया बुल्स प्रौपर्टी की डायरेक्टर बनी थीं. यस ट्रस्टी में भी 17 अक्तूबर, 2017 को डायरेक्टर बनीं. वह इंडिया बुल्स असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी में भी डायरेक्टर हैं. सोरिल इंफ्रा में भी डायरेक्टर थीं.

सोरिल इंडिया बुल्स की ही कंपनी है. कहा जाता है कि वह खेतान से सालाना 2 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाती हैं.

परमबीर के इकलौते बेटे रोहन सिंह की शादी राधिका मेघे से हुई थी, जो नागपुर के एक बहुत बड़े बिजनैसमैन सागर मेघे की बेटी हैं. परमबीर सिंह के बेटे रोहन की शादी बेंगलुरु में बहुत ही धूमधाम से हुई थी. रोहन की पत्नी राधिका बीजेपी के कद्दावर नेता दत्ता मेघे की पोती हैं. दत्ता मेघे विदर्भ के अलगाव आंदोलन के सब से बड़ा चेहरा थे.

राधिका के पिता सागर मेघे नागपुर में बिजनैसमैन हैं. वह लोकसभा चुनाव भी लड़े थे, पर हार गए. उन के चाचा समीर मेघे विधायक हैं. कहा जाता है कि शादी का पूरा खर्च मेघे परिवार ने उठाया था. बाद में रोहन के परिवार ने मुंबई में रिसैप्शन दिया था.

परमबीर के एक भाई मनबीर सिंह भड़ाना हरियाणा के जानेमाने वकील तथा दूसरे हरियाणा प्रादेशिक सर्विस कमीशन के सब से युवा और सबसे लंबे अरसे तक सेवा करने वाले चेयरमैन रहे हैं. परमबीर सिंह की बेटी रैना विवाहित है और लंदन में एक कारपोरेट हाउस में नौकरी करती है.

1988 में अपने करियर की शुरुआत करने वाले परमबीर सिंह पुलिस सेवा की शुरुआत में जिला चंद्रपुर और जिला भंडारा के एसपी रह चुके हैं. वह मुंबई के कई जिलों में डीसीपी रह चुके हैं और हर तरह के अपराध पर उन की पैनी पकड़ रही है.

वह एटीएस में डीआईजी के पद का कार्यभार भी संभाल चुके हैं. महाराष्ट्र के ला ऐंड और्डर के एडिशनल डीजीपी का पद भी संभाल चुके हैं. उन्हें 90 के दशक में स्पैशल औपरेशन स्क्वायड यानी एसओएस का गठन करने के लिए भी जाना जाता है.

इस फोर्स ने अंडरवर्ल्ड और अपराधियों का जितना एनकाउंटर किया है, वह एक रिकौर्ड है. अंडरवर्ल्ड डौन के विरुद्ध एसओजी ने कई बड़े और सटीक औपरेशन किए. परमबीर सिंह को सख्त और तेजतर्रार औफिसर माना जाता है, जो किसी भी परिस्थिति को बखूबी हैंडल करना जानते हैं.

सितंबर 2017 में दाऊद इब्राहिम के भाई इकबाल कासकर की गिरफ्तारी के वक्त वह ठाणे के पुलिस कमिश्नर थे. इकबाल को बिल्डर से उगाही की धमकी के आरोप में ठाणे क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया था.

90 के दशक में मुंबई पुलिस ने जौइंट सीपी अरविंद इनामदार के निर्देशन में स्पैशल औपरेशन स्क्वायड बनाया था. परमबीर सिंह इस स्क्वायड के पहले डीसीपी थे. ठाणे के पुलिस कमिश्नर रहते हुए उन्होंने अपने कार्यकाल में एक हाईप्रोफाइल फरजी काल सेंटर रैकेट का परदाफाश भी किया था.

यह रैकेट अमेरिकी नागरिकों को अपने जाल में फंसाता था, जिस की वजह से एफबीआई की नजरों में था.

काल रैकेट आरोपी सागर का खुलासा भी परमबीर सिंह ने ही किया था. नवी मुंबई में हुए दंगों के दौरान वह खुद दंगाग्रस्त इलाकों में गए और सभी संप्रदाय के लोगों को समझाबुझा कर हिंसा को काबू में किया था.

अपने करियर में कई उपलब्धियां हासिल करने वाले परमबीर सिंह ने पुणे में अर्बन नक्सल नेटवर्क का भी खुलासा किया था.

परमबीर सिंह मुंबई के कई जोन्स के डीसीपी का पदभार संभाल चुके हैं. साथ ही मुंबई के वेस्टर्न रीजन जैसे हाईप्रोफाइल इलाके में उन्होंने एडिशनल कमिश्नर का पदभार भी संभाला.

वह महाराष्ट्र और मुंबई को क्राइम फ्री बनाने की दिशा में हमेशा सक्रिय रहे हैं. परमबीर सिंह कई पुरस्कार व पदकों से सम्मानित हो चुके हैं, जिन में मेधावी सेवा व विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पदक शामिल हैं.

‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’: क्या होने वाली है दयाबेन की एंट्री ?

सब टीवी के मशहूर टीवी सीरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा का एक वीडियो आजकल बहुत वायरल हो रहा है. इस वीडियो को देखकर दयाबेन के प्रशंसक यह कयास लगा रहे हैं कि शो में दयाबेन की एंट्री हो चुकी है, और उनके इंतजार की घड़ी अब ख़त्म हो गई है.

बता दें की दयाबेन यानी वीना वकानी ने यह शो को काफ़ी समय पहले अलविदा कह दिया था. लेकिन दर्शकों को उनकी वापसी का बेसब्री से इंतज़ार है,  इस वायरल वीडियो ने दर्शकों के दिल में यह आशा की किरण जगा दी है की उनकी दयाबेन जल्द ही सीरियल में एंट्री करेंगी और अपनी एक्टिंग से दर्शकों का फिर से मनोरंजन करेंगी.

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वीडियो में जेठालाल दयाबेन के ऊपर जमकर भड़क रहा है, इस वीडियो को देखकर दर्शक सोच रहें हैं, कि दया बेन की सीरियल में एंट्री हो चुकी है, लेकिन आप भी यह सोच रहें हैं तो बता दें कि यह सीरियल काफ़ी पुराना है और यह वायरल वीडियो भी उस टाइम का है जब दिशा वकानी तारक मेहता का उल्टा चश्मा में काम करती थी. वीडियो में बापूजी और जेठालाल भी दिखाई दे रहे हैं.

उमा नेगी

पर्यटन मानचित्र पर नई कहानी कह रहा नया उत्तर प्रदेश: सीएम योगी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि प्रकृति और परमात्मा की असीम कृपा वाले उत्तर प्रदेश की पर्यटन सम्भावनाओं के विकास पर पिछली सरकारों ने अपेक्षित ध्यान नहीं दिया. 2017 के पहले की यूपी में पर्यटन तो दूर कानून-व्यवस्था की बदहाली के चलते लोग औद्योगिक निवेश तक करना नहीं चाहते थे. लेकिन आज आज प्रदेश पर्यटन विकास की ढेर सारी संभावनाओं को समेटे हुए आगे बढ़ रहा है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि आजादी के बाद देश के पर्यटन के पोटेंशियल को अगर किसी ने समझा है तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. उनकी दूरदर्शी व सकारात्मक सोच के परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश पर्यटन विकास के मानचित्र पर आज एक नई कहानी कह रहा है.

मुख्यमंत्री योगी लखनऊ में अपने सरकारी आवास पर आयोजित कार्यक्रम में पर्यटन विकास से जुड़ीं ₹642 करोड़ की 488 परियोजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास कर रहे थे. कार्यक्रम में वर्चुअल माध्यम से केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जी. किशन रेड्डी और केंद्रीय राज्य मंत्री अजय भट्ट की भी उपस्थिति रही.

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2013 के प्रयागराज महाकुंभ में दुर्व्यवस्था, गंदगी, और भगदड़ की स्थिति रही. वहीं 2019 का प्रयागराज कुंभ “दिव्य और भव्य रहा. आज अयोध्या का दीपोत्सव, मथुरा का कृष्णोत्सव और रंगोत्सव और काशी की देव दीपावली पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही है. हमने शुक तीर्थ, नैमिष धाम, गोरखपुर, कौशाम्बी, संकिसा, लालापुर सहित हर क्षेत्र के विकास पर ध्यान दिया है.

यही नहीं, मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना के माध्यम से प्रदेश के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में किसी न किसी पर्यटन स्थल के व्यवस्थित विकास को आगे बढ़ाने का कार्य हुआ है. आज प्रदेश में 700 से अधिक पर्यटन स्थलों का सफलतापूर्वक विकास किया गया है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि हर वह स्थल जो हमारी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक पहचान और आस्था से जुड़े हैं, सबका सम्मान करते हुए हर स्थल के विकास का काम हो रहा है. रिलिजियस टूरिज्म के साथ-साथ इको टूरिज्म को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है. इन प्रयासों से युवाओं के लिए बड़ी संख्या में रोज़गार के अवसर भी सृजित हुए हैं. 191.04 करोड़ की 154 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण करते हुए उन्होंने आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष पर चौरीचौरा शताब्दी वर्ष, लखनऊ रेजीडेंसी में हुए ड्रोन और लाइट एंड साउंड शो, महाकवि निराला की भूमि के पर्यटन विकास, काकोरी और शाहजहांपुर में अमर शहीदों की यादें संजोने जैसी कोशिशों का भी जिक्र किया.

मंदिर हमारी आत्मा, यह नहीं तो हम निष्प्राण: रेड्डी

लोकार्पण-शिलान्यास के इस कार्यक्रम में वर्चुअली सहभाग करते हुए केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जी.किशन रेड्डी ने योगी सरकार द्वारा पर्यटन व संस्कृति संवर्धन के लिए किए गए प्रयासों को अभूतपूर्व बताया.

उन्होंने कहा कि योगी सरकार सांस्कृतिक विरासतों का उत्थान कर रही है. यह नए भारत की नई तस्वीर है. ब्रज क्षेत्र में विकास कार्यों का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह मंदिर हमारी आत्मा हैं. अगर इसे निकाल दिया जाए तो कुछ भी नहीं बचेगा. केंद्रीय मंत्री ने पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से सड़क, वायु, जल, मार्ग व रोपवे कनेक्टिविटी की तारीफ की और काशी में माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा की पुनर्स्थापना, रामायण सर्किट, बौद्ध सर्किट, कृष्ण सर्किट का उदाहरण देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में रामराज्य है. विशेष अवसर पर पर्यटन विभाग के वार्षिक कैलेंडर व उपलब्धियों पराधारित पुस्तिका का भी विमोचन किया गया.

सत्यकथा: ढाई महीने में मिली सजा ए मौत

राइटर- नंद किशोर गोयल

राजस्थान के हनुमानगढ़ का रहने वाला सुरेंद्र माडि़या एक तो कामचोर था, दूसरा नशेड़ी भी. दारू के नशे में वह सब कुछ भूल जाता था. उसे न अपनेपराए का जरा भी खयाल रहता था और न ही सामाजिक संस्कार और रिश्ते के प्रति मानमर्यादा. एक रात उस के लिए अनैतिकता का दलदल बन गई थी. जिस में गिरते ही वह धंसता चला गया.

बात 15 सितंबर, 2021 की है. उस दिन सुरेंद्र को मजदूरी में और दिन की तुलना में कुछ अधिक पैसे मिल गए थे, जिस से वह बेहद खुश हो गया था. इस खुशी में वह सीधे शराब के ठेके पर जा पहुंचा.

2 दिन से उसे तलब लगी हुई थी. उस ने सूखे कंठ को जी भर कर गीला करने की लालसा पूरी कर ली थी. फिर लड़खड़ाते कदमों से किसी तरह अपने मिट्टी और फूस पराली के बने कच्चे घर टपरे पर जा पहुंचा था. उस में वह अकेला ही रहता था.

उस के आगेपीछे कोई कहनेसुनने वाला नहीं था. कुछ साल पहले जब से उस के बड़े भाई ने आत्महत्या कर ली थी, तब से वह और भी बेफिक्र और अपनी मरजी का मालिक बन गया था.

हनुमानगढ़ जिलांतर्गत पीलीबंगा तहसील से करीब 20 किलोमीटर दूर गांव दुलमाना में मेघवाल समुदाय के सुरेंद्र को सभी मांडिया कह कर बुलाते थे. वहीं वह मवेशी पालने और उस की चरवाही करने वाली 60 वर्षीया एक विधवा भी अकेली रहती थी.

मांडिया के टपरे से आधे किलोमीटर पर वह भी उस जैसी ही कच्चे टपरे में रहती थी. वह उसे अच्छी तरह जानतीपहचानती थी. सुरेंद्र का आनाजाना उस के घर से हो कर ही होता था. खाली समय में उस के साथ बैठ कर गप्पें मारता रहता था. सुरेंद्र उन्हें सम्मान से चाची कह कर बुलाता था.

उस रोज सुरेंद्र ने इतनी अधिक दारू पी ली थी कि उसे घर लौटते हुए पता ही नहीं चला कि रात की शुरुआत हो चुकी है. एक राहगीर से पूछा, ‘‘भाई तेरे पास घड़ी है क्या? बता दो जरा कितना समय हुआ है? लगता है रात बहुत हो गई है मुझे घर जाना है.’’

‘‘अरे तू क्या करेगा समय जान कर नशेड़ी, कौन तुझे कोई गाड़ी पकड़नी है इस वक्त, अभी ज्यादा रात नहीं हुई है, 9 बजे हैं, 9…’’ सुरेंद्र की हालत देख कर राहगीर ने कमेंट किया. वह उसे पहचानता था.

‘‘मेरा घर आ गया क्या?’’ सुरेंद्र ने फिर पूछा.

‘‘जब तुझे अपना घर पहचानने का भी होश नहीं रहता, तब इतनी दारू क्यों पी लेते हो?’’ राहगीर उसे नसीहत देता हुआ आगे बढ़ गया.

सुरेंद्र अपने लड़खड़ाते कदमों से बुदबुदाने लगा, ‘‘लगता है मेरा घर आ गया, लेकिन यहां ढोरमवेशी किस ने बांध दिए? जरूर किसी की कारस्तानी होगी?’’

दरअसल, सुरेंद्र अभी वृद्धा के घर के पास ही पहुंचा था, जिसे अपना घर समझ बैठा था. उसी के मवेशी बाहर बंधे थे. बगैर आगापीछे ध्यान दिए वह सीधे बिना दरवाजे वाले उस टपरे में घुस गया.

अंदर चारपाई पर वृद्धा नींद में लेटी थी. दीए की धीमी रोशनी में उस की नजर औरत के अस्तव्यस्त कपड़ों पर गई. उस के भीतर वासना का हैवान जाग उठा. उस महिला को वह चाची कह कर बुलाता था, उस की चारपाई पर जा बैठा. कामुक नजरों से निहारने लगा. वह कच्ची नींद में थी. इसी बीच हलचल से वह जाग गई. जागते ही पूछ बैठी, ‘‘कौन है भाई?’’

‘‘अरे, धीरे बोल मैं हूं माडि़या’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘बेटा, इतनी रात गए क्यों

आया है, कोई बात है का?’’ वृद्धा ने सवाल किया.

‘‘भाभी, रात को अकेली औरत के पास कोई मर्द क्यों आता है…समझ जा.’’

सुरेंद्र का इतना कहना था कि विधवा गुस्से से बोल पड़ी. उस ने चारपाई पर नजदीक बैठे सुरेंद्र को धकेल दिया, ‘‘क्या बोला, भाभी? मैं तेरी भाभी लगती हूं? जरा भी लाजशर्म है या नहीं, तूने दारू पी रखी है. नशे में कुछ भी बक देगा. कुछ भी करेगा, अभी तुझे बताती हूं.’’ इसी के साथ विधवा गुस्से में तेजी से चारपाई से उठी. तुरंत चारपाई के नीचे से डंडा निकाल कर तान दिया.

सामने सिर पर डंडे और विधवा के तमतमाए चेहरे को देख कर सुरेंद्र का आधा नशा उतर चुका था. उस का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा था. बिफरती हुई बोली, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई रात को मेरे घर में घुसने की? ठहर, अभी मैं अपने देवर को फोन कर बुलाती हूं. वही तुम्हारी अच्छी तरह से मरम्मत करेगा.’’

गुस्से में दहाड़ती विधवा का विरोध देख कर सुरेंद्र की सिट्टीपिट्टटी गुम हो गई. जैसेतैसे कर वह विधवा के चंगुल से छूटा और वहां से भागने को हुआ. इस डर से कहीं विधवा अपने देवर को फोन न कर दे, चारपाई पर सिरहाने रखा उस का मोबाइल ही ले कर भाग गया.

मोबाइल ले कर भागता देख विधवा भी उस के पीछे दौड़ी, लेकिन जब तक सुरेंद्र ने अपने घर की ओर दौड़ लगा दी और अंधेरे में गुम हो गया था.

भागता हुआ सुरेंद्र अपने घर आ गया था. रात को खटका सुन कर उस की मां जाग गई. पिता बंसीलाल नींद में खर्राटे भर रहे थे. मां ने देर रात आने पर डांटा, तो उस ने बताया कि वह एक दोस्त के घर गया हुआ था. और फिर वह चारपाई पर जा कर पसर गया, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी.

एक तरफ विधवा का गुस्सा बारबार ध्यान में आ रहा था, दूसरी तरफ लेटी अवस्था में उस के अस्तव्यस्त कपड़े में झांकती देह का दृश्य झिलमिलाता हुआ एकदूसरे में गड्डमड्ड हो रहे थे. उस ने जैसे ही आंखें बंद कीं तो दिमाग में फिर वासना का कीड़ा कुलबुलाने लगा.

सोचने लगा, ‘‘…अगर थोड़ी सख्ती दिखाता तो शायद वह उस के कब्जे में आ जाती, आत्मसमर्पण कर देती.’’

इसी विचार से वह बिस्तर से उठा और फिर से विधवा के घर की ओर चल पड़ा. दूसरी तरफ विधवा अपना मोबाइल लेने के लिए बदहवास हालत में नजदीक रह रहे अपने देवर बनवारी मेघवाल के घर जा पहुंची.

भाभी की हालत देख कर बनवारी चौंका, ‘‘भाभी, इतनी रात गए क्यों आई हो?’’ विधवा ने सिलसिलेवार ढंग से सारा वाकया सुनाया. इसी के साथ उस ने बताया कि माडि़या उस का फोन ले कर भाग गया है.

बनवारी बोला, ‘‘भाभी, आप यहीं अपनी देवरानी के साथ सो जाओ. सुबह माडि़या की खबर लूंगा. मोबाइल भी उस से लूंगा.’’

‘‘ नहीं भैया, मेरे घर पशु बंधे हैं, इसलिए अपने घर पर ही जा कर सोऊंगी.’’ विधवा बोली.

थोड़ी देर में विधवा अपने घर आ गई. सुरेंद्र पहले से ही उस के घर में आ कर छिपा हुआ था. वह जैसे ही बिछावन पर लेटने को हुई, सुरेंद्र ने उसे दबोच लिया. महिला ने सुरेंद्र की पकड़ से बचने की कोशिश की, लेकिन उस की हवस का शिकार होने से नहीं बच पाई.

किसी तरह सुरेंद्र के कब्जे से मुक्त हुई. तब उस ने लात मार कर उसे जमीन पर गिरा दिया. सुरेंद्र ने पास पड़ी प्लास्टिक की रस्सी महिला के गले में डाल दी. विधवा अपना बचाव नहीं कर पाई, जबकि सुरेंद्र ने पूरी ताकत से रस्सी को खींच दिया. कुछ पल में ही महिला की मौत हो गई.

उस की मौत हो जाने के बाद सुरेंद्र ने उस के साथ जी भर कर दोबारा मनमानी भी की. किंतु जैसे ही उस पर से वासना का भूत शांत हुआ, वह डर गया.

कभी खुद को देखने लगा, तो कभी विधवा की लाश को इतना तो समझ ही गया था कि उस के द्वारा एक नहीं, बल्कि 2-2 गुनाह हो गए थे. डरा हुआ सुरेंद्र अपने बचाव के तरीके खोजने लगा.

वह सीधा अपने चाचा राजाराम के घर गया. उन्हें जगा कर उन के पांव पकड़ लिए. गिड़गिड़ाते हुए बचाने की गुहार करने लगा. उस के अपराध के बारे में सुन कर राजाराम भी सन्न रह गए. उन्होंने उसे संभालाते हुए भरोसा दिया, ‘‘बेटा, जो हुआ उसे खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन रात बहुत हो गई है, जा कर

तू सो जा. कल सुबह सारा मामला सुलटा दूंगा.’’

माडि़या वहां से अपने घर चला आया. राजाराम अपने 2 साथियों श्योपत और सहदेव को ले कर बनवारी के घर गए. उसे सारी बात बताई. सुबह होने पर बनवारी लाल मेघवाल गांव के कुछ लोगों के साथ पीलीबंगा पुलिस स्टेशन गया. उस ने सुरेंद्र के खिलाफ लिखित प्राथमिकी दर्ज करवा दी.

थानाप्रभारी इंद्रकुमार ने सुरेंद्र के खिलाफ भादंसं की धारा 302, 376, 450 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले को एसपी प्रीति जैन ने गंभीरता से लेते हुए इंद्रकुमार को ही जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया.

इंद्रकुमार ने कुछ घंटे बाद ही आरोपी सुरेंद्र को गांव दुलमाना से गिरफ्तार कर लिया. घटनास्थल से सबूत के तौर पर कदमों के निशान, रस्सी, वीर्य लगे वृद्धा के कपड़े, बालों के गुच्छे आदि इकट्ठा कर लिए. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

विभिन्न साक्ष्यों का डीएनए टेस्ट करवा कर आरोपी के साथ मेल भी करवा लिया गया. इस लंबी प्रक्रिया को पूरी करने में पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए 7 दिनों में केस की चार्जशीट तैयार कर अदालत में दाखिल कर दी.

हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय स्थित सत्र न्यायालय में 29 नवंबर, 2021 को काफी गहमागहमी थी. सब की निगाहें उस फैसले पर टिकी थीं, जिस के लिए साक्ष्यों और गवाहों से संबंधित दस्तावेज काफी कम समय में जुटा लिए गए थे.

लोगों को आश्चर्य इस बात को ले कर था कि रेप और हत्या के इस मामले का फैसला काफी कम समय में आने वाला है, जिसे मात्र 74 दिन पहले ही अदालत में दाखिल किया गया था.

सब कुछ समय से हो रहा था. पुलिस गाड़ी अभियुक्त सुरेंद्र उर्फ माडि़या को जिला जेल से ले कर अदालत पहुंच गई थी. वहां उसे अस्थाई अभियुक्त बैरक में बंद कर दिया था. पुलिस बरामदे में सुस्ताने लगी थी.

कुछ समय में ही जिला न्यायाधीश संजीव मागो अदालत पहुंच गए थे. वह अपने चैंबर से निकल कर न्याय की कुरसी पर जा बैठे थे. अदालत की काररवाई शुरू हो चुकी थी. पेशकार के कहने पर हरकारे ने सुरेंद्र बनाम स्टेट की आवाज लगा दी थी.

सब कुछ नियम से हो रहा था. अदालत के कठघरे में मुलजिम सुरेंद्र हाजिर हो चुका था. वह हाथ बांधे सिर झुकाए खड़ा था. न्यायाधीश ने अपने सामने रखे केस से संबंधित दस्तावेज उठाते हुए कहा, ‘‘काररवाई शुरू की जाए.’’

अभियुक्त पक्ष के वकील अलंकार सिंह से पहले लोक अभियोजक उग्रसेन नैन ने मामले पर रोशनी डालते हुए कहा—

योर औनर इस केस में पीडि़ता एक विधवा और गरीब औरत थी. उस की उम्र 60 साल के करीब थी. वह आजीविका के लिए मवेशी पालती थी. वह अपने घर में अकेली रहती थी.

घटना की रात को अभियुक्त सुरेंद्र जबरन उस के घर में घुस गया था. उस ने उस के साथ जोरजबरदस्ती की और उस के साथ रेप का प्रयास किया. जब उस ने विरोध किया, तब उस ने उसे रस्सी से गला घोंट कर मार डाला. उस के बाद उस ने विधवा वृद्धा के साथ मनमानी की.

उग्रसेन ने आगे कहा, अभियुक्त सुरेंद्र ने हत्या के साथसाथ अमानवीय कृत्य भी किया है. ऐसा व्यक्ति समाज के लिए भी गंभीर खतरा है. ऐसा व्यक्ति समाज में रहने के लायक नहीं है.

अत: हुजूर से दरख्वास्त है कि वर्तमान दंड व्यवस्था के अनुरूप आजीवन कारावास की सजा एक सामान्य नियम है. किंतु इस जघन्य मामले में अभियुक्त ने निर्मम तरीके से अपराध को अंजाम दिया है, वह एक दुर्लभ मामला बन गया है. इसलिए इस मामले को असाधारण की श्रेणी में रखते हुए मृत्युदंड दिया जाए.

इसी के साथ उन्होंने पुलिस द्वारा जुटाए गए सारे दस्तावेज न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत कर दिए.

लोक अभियोजक का इतना कहना था कि अदालत में सन्नाटा पसर गया. सब की निगाहें अब अभियुक्त के वकील की दलील और उस के अनुरूप न्यायाधीश के फैसले पर टिक गईं.

न्यायाधीश महोदय ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए बचाव पक्ष के वकील अलंकार सिंह को अपना तर्क रखने का मौका दिया, लेकिन वह अपना कोई पक्ष नहीं रख पाए.

हालांकि उन्होंने 14 अदालती उदाहरण दे कर सुरेंद्र को अपराध से मुक्त करने की अपील की.

उन्होंने अपने तर्क में सिर्फ इतना कहा कि उसे सुधरने का एक मौका दिया जाए. जबकि जिला अभियोजन पक्ष ने 47 पन्ने का दस्तावेजी साक्ष्य पेश किया था.

हालांकि घटना का कोई चश्मदीद नहीं था, पर बनवारी लाल और राजाराम ने सुरेंद्र को बचाने की कोशिश की. फिर भी सारे साक्ष्य सुरेंद्र के खिलाफ थे. यहां तक कि विधवा का मोबाइल फोन भी पुलिस ने सुरेंद्र के घर से बरामद कर लिया था.

इन सारे तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायाधीश ने अहम फैसला सुनाने से पहले इस तरह के मामले से संबंधित सजा के बारे में कुछ बातें भी बताईं. सुरेंद्र पर लगे सभी धाराओं का अलगअलग विश्लेषण करते हुए अंत में उन्होंने धारा 302 की भी पुष्टि कर दी.

इसी के साथ उसे रेप, हत्या, अप्राकृतिक कृत्य, मारपीट आदि के दंड के साथ सजाएमौत की साज सुना दी.

उल्लेखनीय है कि भारत में सजाएमौत के लिए फांसी दी जाती है. उसे तत्काल जिला जेल भेजे जाने से पहले उसे उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रपति से गुहार लगाने का अधिकार भी दे दिया.

इस फैसले पर प्रदेश के डीजीपी अजीत सिंह ने इस केस की तेज गति से जांच कर ठोस सबूत पेश करने वाले पुलिस जांच टीम की सराहना की.

प्यार नहीं पागलपन- भाग 4: लावण्य से मुलाकात के बाद अशोक के साथ क्या हुआ?

अशोक नैपकिन में हाथ पोंछते हुए अपनी जगह से उठा और मेजर विवेक के पास आ कर बोला, ‘‘सर, मैं आप की बेटी लावण्य से प्यार करता हूं. मैं इस से शादी करना चाहता हूं.’’

मेजर विवेक एकटक अशोक को ताकने लगे. एकदो पल बीते. लावण्य अपना कौर हाथ में लिए बैठी रह गई थी. सभी एकदम खामोश रह गए थे. मेजर ने छूटते ही कहा, ‘‘आई लाइक दैट. यानी तुम मेरी बेटी से विवाह के लिए अनुमति मांग रहे

हो अशोक?’’

‘‘जी सर, अनुमति और आशीर्वाद.’’

‘‘और यदि मैं इनकार कर दूं, तो…’’

‘‘तो, तो सर,’’ अशोक हड़बड़ाया. उस की सम  झ में यह नहीं आया कि यह मजाक हो रहा है या सीरियस बात चल रही है.

‘‘बोलो, बोलो. चुप क्यों हो गए.’’

‘‘सर, इस का जवाब लंबा है.’’

‘‘पर बोलो.’’

‘‘सर, आप लावण्य की इच्छा नहीं जानेंगे? यदि उस ने हां कर दिया, तब भी आप इनकार कर देंगे?’’

‘‘इस तरह की तमाम घटनाएं सामने आई हैं.’’

‘‘तब तो सर मु  झे   झगड़ा करना पड़ेगा.’’

‘‘निश्चित.’’

‘‘जी सर,’’ अशोक बोला.

मेजर विवेक ने अशोक का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘तुम्हें पता है, मेरी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही घटा था. यू नो विद्या.’’

मेजर विवेक के इतना कहते ही लावण्य का थाली में रखा हाथ वैसा ही रखा रहा. जया भी गरम रोटी लिए खड़ी रह गई.

अशोक ने दोनों के रिऐक्शन को गौर से देखा. वहां किसी नाटक की भांति गंभीर सीन जैसा माहौल बन गया था. मम्मी का नाम आते ही लावण्य के चेहरे पर भय स्पष्ट   झलक रहा था.

अशोक सभी को बारीबारी से देख रहा था. मेजर विवेक ने कहा, ‘‘विद्या को मैं बचपन से ही चाहता था. मैट्रिक तक हम दोनों साथसाथ पढ़े थे. उस ने मु  झ से कहा था कि वह शादी सिर्फ सेना के अफसर से ही करेगी. फिर उस के लिए मैं सेना में अफसर हो गया.

‘‘जानते हो, मेरा पहला सैन्य मिशन क्या था? मैं छुट्टी ले कर सीधे दिल्ली आया. स्टेशन से उतर कर सीधे विद्या के घर पहुंचा.

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‘‘मैं उस समय पूरी वरदी में था. सीधे जा कर विद्या के पिताजी के सामने खड़ा हो गया. उस के पिता भले आदमी थे. विद्या के दोनों भाई रणजीत और अजित मु  झे ताक रहे थे. उस के पिता कुछ कह नहीं सके. मैं ने अंत में कहा, ‘‘आप सोचविचार कर जवाब दीजिएगा. विद्या से भी पूछ लीजिएगा. शादी की मु  झे जल्दी नहीं है. लेकिन मैं शादी विद्या से ही करूंगा.’’

‘‘मु  झे विद्या से पूछना तो पड़ेगा ही,’’ थोड़ा घबरा कर उस के पिता बोले थे.

‘‘औफकोर्स. और हां, यदि उस ने हां कर दी तो मैं पूरी फौज ले कर उस से शादी करने आऊंगा. आऊंगा यह निश्चित है,’’ इतना कह कर मेजर साहब खूब हंसे थे.

‘‘सर, मेरे पास फौज तो नहीं है, पर मैं भी आऊंगा जरूर, अकेला,’’ अशोक ने कहा, तो मेजर साहब ने उस की पीठ थपथपाई.

‘‘तो सर, आप की तरफ से हां है?’’ अशोक ने पूछा परंतु उसे तुरंत लगा कि उस ने यह गलत सवाल कर दिया है.

‘‘मैं तो इस मामले में स्वतंत्र विचारों वाला हूं. विद्या भी मेरे जैसी है परंतु उस से पूछना तो पड़ेगा ही न. उसे लावण्य की शादी करने, फिर नानी बनने का बहुत शौक है. जया, जरा विद्या को बुलाओ तो.’’

‘‘डैडी, अब आप खाना खा लीजिए.’’

‘‘पहले तुम विद्या को तो बुलाओ. लगता है, आज मांबेटी में फिर   झगड़ा हुआ है? इसीलिए आज वह खाने की टेबल पर भी नहीं आई.

लावण्य, मैं ने तुम्हें कितनी बार सम  झाया है कि तुम अपनी मम्मी से   झगड़ा मत किया करो,’’ फिर वे अशोक से मुखातिब होते हुए बोले, ‘‘लगता है, तुम ने आज ही विद्या से शादी के बारे में पूछा है.’’

अशोक भला क्या जवाब देता. वह चुपचाप मेजर विवेक का मुंह ताकता रहा. मेजर विवेक आगे बोले, ‘‘तुम ने क्या पूछा था? तुम्हें सीधे उस से बात नहीं करनी चाहिए थी अशोक. वह तो अपनी बेटी की भी शादी सेना के ही अफसर से करना चाहती है पर ऐसा नहीं होगा. तुम चिंता मत करो, मैं उस से बात करूंगा.’’

‘‘डैडी, आप खाना खाइए न.’’

‘‘लेकिन, मैं विद्या से बात करना चाहता हूं. मु  झे पता तो चले कि वह कैसी है?’’ कह कर मेजर विवेक खड़े हो गए. हाथ धोए बगैर ही वे ‘विद्या… नाऊ कम औन… विद्या…’ आवाज देते हुए बैडरूम की ओर चल पड़े.

लावण्य ने जल्दी से नैपकिन से हाथ पोंछे और मेजर साहब के पीछेपीछे भागी. अब तक मेजर विवेक अपने बैडरूम के दरवाजे पर पहुंच गए थे. वे दरवाजे पर ही खड़े हो कर कहने लगे, ‘‘विद्या कम औन… गेटअप… तुम भी बहुत जिद्दी हो. तुम अशोक से बात तो करो.’’

‘‘डैडी,’’ लावण्य मेजर विवेक के पीछे से बोली, ‘‘डैडी, शी इज नो मोर. डैडी, वे तो कब की मर चुकी हैं.’’

‘‘ह्वाट? विद्या मर गई है? लावण्य, तू यह क्या कह रही है? वह तो सो रही है. बेटा, मम्मी से   झगड़ा कर के ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए.’’

‘‘डैडी, प्लीज डैडी. वे कहां सोई हैं. यह देखो न. यहां है कोई भला?’’ तकियाचद्दर फेंकते हुए लावण्य ने कहा, ‘‘यहां कहां हैं विद्या? डैडी, आप सम  झते क्यों नहीं? अचानक आप को यह क्या हो जाता है? आप कब तक ऐसा करते रहेंगे? डैडी, मम्मी मर गई हैं. वे हम लोगों को हमेशा के लिए छोड़ कर चली गई हैं, हमेशा के लिए,’’ इतना कहतेकहते लावण्य रो पड़ी. अशोक भी पीछेपीछे वहां पहुंच गया था और जया भी.

मेजर स्तब्ध खड़े थे. वे फुसफुसाते हुए बोले, ‘‘बेटा, वह मरी नहीं है. तुम्हारा दिमाग ठीक नहीं है. वह देखो न सोई है. अभीअभी सोई है. मैं ने उसे देखा है.’’

‘‘तो फिर वे कहां गईं डैडी,’’ लावण्य बोली, ‘‘आप ही बताइए न, वे कहां गईं?’’ इतना कह कर लावण्य ने जोरजोर से रोते हुए अपने डैडी के कंधे पर सिर रख दिया. फिर धीरेधीरे चलते हुए वह मेजर विवेक को कमरे से बाहर ले आई. उस के बाद उन्हें सीढि़यों के पास छोड़ कर अपने कमरे की ओर भागी. मेजर विवेक शून्य में ताकते वहीं खड़े रहे. अशोक भी चुपचाप वहीं खड़ा था. मेजर ने कुछ कहना चाहा, पर कह न सके. धीरेधीरे चलते हुए वे डाइनिंग टेबल के पास आ कर खड़े हो गए. अशोक खुद को बड़ी विकट परिस्थिति में फंसा हुआ महसूस कर रहा था. उस की सम  झ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

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‘‘आप जाइए भैया,’’ जया ने अशोक के नजदीक आ कर कहा, ‘‘लावण्य अब नीचे नहीं आएगी.’’

फिर बुदबुदाते हुए वह रसोई की ओर चली गई.

उस रात अशोक बिलकुल नहीं सो सका. अगले दिन सुबह होते ही वह लावण्य

के यहां पहुंच गया. तब तक लावण्य सो ही

रही थी.

मेजर विवेक लौन में थे. सबकुछ नौर्मल लग रहा था. लावण्य सो रही थी, इसलिए वह उस से बिना मिले ही लौट गया था. फिर 2 दिन बाद ही अशोक लावण्य के यहां जा सका था. इस बीच उस ने फोन भी नहीं किया. अशोक से मिलने पर लावण्य बोली, ‘‘आई एम सौरी अशोक.’’

‘‘डैडी सचमुच अस्वस्थ हैं लावण्य.’’

‘‘परंतु, उन की बीमारी का कोई निदान नहीं है,’’ लावण्य गंभीरता से बोली.

‘‘डाक्टर… मेरे कहने का मतलब, उन के दोस्त डाक्टर संजय क्या कहते हैं?’’

‘‘वे भी बड़े असमंजस में हैं. डैडी की मैमोरी अचानक लुप्त हो जाती है. फिर एकाएक उन्हें मम्मी की प्रेजैंस का खयाल आता है. रोजाना दिन में 1-2 बार तो वे मम्मी को पुकार ही लेते हैं. अब तो उन्हें सम  झाने के हमारे पास बहाने भी खत्म हो गए हैं.’’

‘‘हमें कुछ तो करना ही होगा,’’

अशोक बोला.

‘‘मैं सारे प्रयत्न कर चुकी हूं. वे अचानक ऐसा व्यवहार करने लगते हैं कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि वे ऐसा करते होंगे. कभीकभी तो मु  झे भी लगता है कि मम्मी सचमुच घर में घूम रही हैं… दरअसल, वे डैडी को इतना प्यार करती थीं कि अपने प्यार के बीच वे मु  झे भी नहीं सहन कर सकती थीं. सी वांटेड टु पजेस हिम… पजेस हिम फौर गुड,’’ लावण्य बोली.

दिल्ली दंगे और आरोपियों को सजा

उम्मीद तो नहीं थी कि 2020 की फरवरी में उत्तरी दिल्ली में कराए गए मुसलिमों के खिलाफ दंगों, आगजनी और हत्याओं पर किसी हिंदू को भी सजा मिलेगी पर पहली कोर्ट ने एक दिनेश यादव को गुनाहगार मान ही लिया है. वह एक घर जलाने का अपराधी माना गया है जिस में 73 साल की मुसलिम औरत जल कर मर गई.

पुलिस और गवाहों की मिलीभगत से कई दशकों से सत्ता में बैठी पार्टी के गुर्गों के लिए कुकर्मों पर सजा कम ही मिल पाती है. 1984 के दंगों में 2-4 को सजा मिली, मेरठ के ङ्क्षहदूमुसलिम दंगों में नहीं मिली, 2002 के गुजरात के दंगों में नहीं मिली और उत्तरी दिल्ली के दंगों में बीसियों मुसलिम आज भी गिरफ्तार है. पर हिंदू दंगाई आजाद है और एकदो को पहली अदालत ने सजा दी है और शायद ऊंची अदालतों तक यह भी खत्म हो जाएगी.

हमारी क्रिमीनल कानून व्यवस्था ही ऐसी है कि गुनाहगारों को अगर सजा देती है तो अदालत में मामला जाने से पहले दे दो, जमानत न दो. इस चक्कर में गुनाहगाहर और बेगुनाह दोनों फंस जाते हैं. 200-300 की हिंदूओं की भीड़ में से केवल एक को अपराधी मान कर न्याय का कचूमर निकाला गया है. इस भीड़ ने मकानों पर हमला किया, लूटा और फिर वहां दुबके छिपे लोगों के साथ मकान को बिना डरे आग लगा दी और फैसला अभी झोल लिए हुए है कि वह अपराधी भीड़ का हिस्सा था और भीड़ के लूट व हत्या की. यह फैसला ऐसा है जो अपील में बदला जाए तो बड़ी बात नहीं.

आज भी इस इलाके में डर का माहौल यह है कि भीड़ में चेहरे पहचानने वाले केवल पुलिस वाले गवाह है, आम आदमी नहीं. जो मरे उन के रिश्तेदार भी चुप हैं. क्योंकि वे जानते हैं कि इस तरह के दंगों में किसी को सजा न देने का पुरानी परंपरा है और इक्केदुक्के मामलों में सजा पहली अदालत ने दे भी दी तो बाद में छूट जाएंगे.

हिंदूमुसलिम दंगों या हिंदू सिख दंगों में खुलेआम हत्याएं हुर्ई और लूट व आगजनी हुई पर गिरफ्तार मुट्ठीभर लोग हुए और वे भी एकएक कर के छूट गए. हां उन में से कुछ को लंबे समय अदालतों के चक्कर काटने पड़े जो अपनेआप में किसी सजा से कम नहीं है. पर यह तो लाखों बेगुनाहों को करना होता जिन्हें जैसेतैसे पुलिस के हां करने पर जमानत मिल ही जाती है.

धर्म किसी को सुधारता है, आदमी बनाता है, सच बोलना सिखाता है, अच्छे काम करने का रास्ता दिखाता है, गलत कामों से रोकता है, यह सब ख्याली पुलाव है और धाॢमक दंगे इसकी पोल खोलते हैं. आज नहीं हमेशा से, भारत में ही नहीं दुनिया भर में, औरत, जमीन और पैसे पर नहीं धर्म पर ज्यादा मारकाट हुई है और मारने और लूटनेवालों के हमेशा अपने धर्म से धर्म की रक्षा करने की वाहवाई मिली है. हर धाॢमक नेता के पीछ कोई बड़ा अपराध या बड़ा अपराधी है. फिर भी लोगों को कहा जाता है कि धर्म के सहारे ही समाज टिका है.

उत्तरी दिल्ली के कई मामलों में फैसले आने हैं पर वे कुछ अच्छा फैसला देंगे या आरोप पैदा करेंगे, इस का भरोसा कम है. अदालत तो वही देखेंगी न जो दिखाया जाएगा.

सच्चाई: आखिर क्यों मां नहीं बनना चाहती थी सिमरन?

पड़ोस में आते ही अशोक दंपती ने 9 वर्षीय सपना को अपने 5 वर्षीय बेटे सचिन की दीदी बना दिया था. ‘‘तुम सचिन की बड़ी दीदी हो. इसलिए तुम्हीं इस की आसपास के बच्चों से दोस्ती कराना और स्कूल में भी इस का ध्यान रखा करना.’’ सपना को भी गोलमटोल सचिन अच्छा लगा था. उस की मम्मी तो यह कह कर कि गिरा देगी, छोटे भाई को गोद में भी नहीं उठाने देती थीं. समय बीतता रहा. दोनों परिवारों में और बच्चे भी आ गए. मगर सपना और सचिन का स्नेह एकदूसरे के प्रति वैसा ही रहा. सचिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मणिपाल चला गया. सपना को अपने ही शहर में मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया था. फिर एक सहपाठी से शादी के बाद वह स्थानीय अस्पताल में काम करने लगी थी. हालांकि सचिन के पापा का वहां से तबादला हो चुका था. फिर भी वह मौका मिलते ही सपना से मिलने आ जाता था. सऊदी अरब में नौकरी पर जाने के बाद भी उस ने फोन और ईमेल द्वारा संपर्क बनाए रखा. इसी बीच सपना और उस के पति सलिल को भी विदेश जाने का मौका मिल गया. जब वे लौट कर आए तो सचिन भी सऊदी अरब से लौट कर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहा था.

‘‘बहुत दिन लगा दिए लौटने में दीदी? मैं तो यहां इस आस से आया था कि यहां आप अपनी मिल जाएंगी. मम्मीपापा तो जबलपुर में ही बस गए हैं और आप भी यहां से चली गईं. इतने साल सऊदी अरब में अकेला रहा और फिर यहां भी कोई अपना नहीं. बेजार हो गया हूं अकेलेपन से,’’ सचिन ने शिकायत की. ‘‘कुंआरों की तो साथिन ही बेजारी है साले साहब,’’ सलिल हंसा, ‘‘ढलती जवानी में अकेलेपन का स्थायी इलाज शादी है.’’

‘‘सलिल का कहना ठीक है सचिन. तूने अब तक शादी क्यों नहीं की?’’ सपना ने पूछा.

‘‘सऊदी अरब में और फिर यहां अकेले रहते हुए शादी कैसे करता दीदी? खैर, अब आप आ गई हैं तो लगता है शादी हो ही जाएगी.’’

‘‘लगने वाली क्या बात है, शादी तो अब होनी ही चाहिए… और यहां अकेले का क्या मतलब हुआ? शादी जबलपुर में करवा कर यहां आ कर रिसैप्शन दे देता किसी होटल में.’’

‘‘जबलपुर वाले मेरी उम्र की वजह से न अपनी पसंद का रिश्ता ढूंढ़ पा रहे हैं और न ही मेरी पसंद को पसंद कर रहे हैं,’’ सचिन ने हताश स्वर में कहा, ‘‘अब आप समझा सको तो मम्मीपापा को समझाओ या फिर स्वयं ही बड़ी बहन की तरह यह जिम्मेदारी निभा दो.’’ ‘‘मगर चाचीचाचाजी को ऐतराज क्यों है? तेरी पसंद विजातीय या पहले से शादीशुदा बालबच्चों वाली है?’’ सपना ने पूछा.

‘‘नहीं दीदी, स्वजातीय और अविवाहित है और उसे भविष्य में भी संतान नहीं चाहिए. यही बात मम्मीपापा को मंजूर नहीं है.’’

‘‘मगर उसे संतान क्यों नहीं चाहिए और अभी तक वह अविवाहित क्यों है?’’ सपना ने शंकित स्वर में पूछा. ‘‘क्योंकि सिमरन इकलौती संतान है. उस ने पढ़ाई पूरी की ही थी कि पिता को कैंसर हो गया और फिर मां को लकवा. बहुत इलाज के बाद भी दोनों को ही बचा नहीं सकी. मेरे साथ ही पढ़ती थी मणिपाल में और अब काम भी करती है. मुझ से शादी तो करना चाहती है, लेकिन अपनी संतान न होने वाली शर्त के साथ.’’

‘‘मगर उस की यह शर्त या जिद क्यों है?’’

‘‘यह मैं ने नहीं पूछा न पूछूंगा. वह बताना तो चाहती थी, मगर मुझे उस के अतीत में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो उसे सुखद भविष्य देना चाहता हूं. उस ने मुझे बताया था कि मातापिता के इलाज के लिए पैसा कमाने के लिए उस ने बहुत मेहनत की, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया, जिस के लिए कभी किसी से या स्वयं से लज्जित होना पड़े. शर्त की कोई अनैतिक वजह नहीं है और वैसे भी दीदी प्यार का यह मतलब यह तो नहीं है कि उस में आप की प्राइवेसी ही न रहे? मेरे बच्चे होने न होने से मम्मीपापा को क्या फर्क पड़ता है? जतिन और श्रेया ने बना तो दिया है उन्हें दादादादी और नानानानी. फूलफल तो रही है उन की वंशबेल,’’ फिर कुछ हिचकते हुए बोला, ‘‘और फिर गोद लेने या सैरोगेसी का विकल्प तो है ही.’’

‘‘इस विषय में बात की सिमरन से?’’ सलिल ने पूछा. ‘‘उसी ने यह सुझाव दिया था कि अगर घर वालों को तुम्हारा ही बच्चा चाहिए तो सैरोगेसी द्वारा दिलवा दो, मुझे ऐतराज नहीं होगा. इस के बावजूद मम्मीपापा नहीं मान रहे. आप कुछ करिए न,’’ सचिन ने कहा, ‘‘आप जानती हैं दीदी, प्यार अंधा होता है और खासकर बड़ी उम्र का प्यार पहला ही नहीं अंतिम भी होता है.’’

‘‘सिमरन का भी पहला प्यार ही है?’’ सपना ने पूछा. सचिन ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हां दीदी, पसंद तो हम एकदूसरे को पहली नजर से ही करने लगे थे पर संयम और शालीनता से. सोचा था पढ़ाई खत्म करने के बाद सब को बताएंगे, लेकिन उस से पहले ही उस के पापा बीमार हो गए और सिमरन ने मुझ से संपर्क तक रखने से इनकार कर दिया. मगर यहां रहते हुए तो यह मुमकिन नहीं था. अत: मैं सऊदी अरब चला गया. एक दोस्त से सिमरन के मातापिता के न रहने की खबर सुन कर उसी की कंपनी में नौकरी लगने के बाद ही वापस आया हूं.’’ ‘‘ऐसी बात है तो फिर तो तुम्हारी मदद करनी ही होगी साले साहब. जब तक अपना नर्सिंगहोम नहीं खुलता तब तक तुम्हारे पास समय है सपना. उस समय का सदुपयोग तुम सचिन की शादी करवाने में करो,’’ सलिल ने कहा.

‘‘ठीक है, आज फोन पर बात करूंगी चाचीजी से और जरूरत पड़ी तो जबलपुर भी चली जाऊंगी, लेकिन उस से पहले सचिन मुझे सिमरन से तो मिलवा,’’ सपना ने कहा. ‘‘आज तो देर हो गई है, कल ले चलूंगा आप को उस के घर. मगर उस से पहले आप मम्मी से बात कर लेना,’’ कह कर सचिन चला गया. सपना ने अशोक दंपती को फोन किया. ‘‘कमाल है सपना, तुझे डाक्टर हो कर भी इस रिश्ते से ऐतराज नहीं है?  तुझे नहीं लगता ऐसी शर्त रखने वाली लड़की जरूर किसी मानसिक या शारीरिक रोग से ग्रस्त होगी?’’ चाची के इस प्रश्न से सपना सकते में आ गई.

‘‘हो सकता है चाची…कल मैं उस से मिल कर पता लगाने की कोशिश करती हूं,’’ उस ने खिसियाए स्वर में कह कर फोन रख दिया.

‘‘हम ने तो इस संभावना के बारे में सोचा ही नहीं था,’’ सब सुनने के बाद सलिल ने कहा. ‘‘अगर ऐसा कुछ है तो हम उस का इलाज करवा सकते हैं. आजकल कोई रोग असाध्य नहीं है, लेकिन अभी यह सब सचिन को मत बताना वरना अपने मम्मीपापा से और भी ज्यादा चिढ़ जाएगा.’’

‘‘उन का ऐतराज भी सही है सलिल, किसी व्याधि या पूर्वाग्रस्त लड़की से कौन अभिभावक अपने बेटे का विवाह करना चाहेगा? बगैर सचिन या सिमरन को कुछ बताए हमें बड़ी होशियारी से असलियत का पता लगाना होगा,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के घर जाने के बजाय उस से पहले कहीं मिलना बेहतर रहेगा. ऐसा करो तुम कल लंचब्रेक में सचिन के औफिस चली जाओ. कह देना किसी काम से इधर आई थी, सोचा लंच तुम्हारे साथ कर लूं. वैसे तो वह स्वयं ही सिमरन को बुलाएगा और अगर न बुलाए तो तुम आग्रह कर के बुलवा लेना,’’ सलिल ने सुझाव दिया. अगले दिन सपना सचिन के औफिस में पहुंची ही थी कि सचिन लिफ्ट से एक लंबी, सांवली मगर आकर्षक युवती के साथ निकलता दिखाई दिया.

‘‘अरे दीदी, आप यहां? खैरियत तो है?’’ सचिन ने चौंक कर पूछा.

‘‘सब ठीक है, इस तरफ किसी काम से आई थी. अत: मिलने चली आई. कहीं जा रहे हो क्या?’’

‘‘सिमरन को लंच पर ले जा रहा था. शाम का प्रोग्राम बनाने के लिए…आप भी हमारे साथ लंच के लिए चलिए न दीदी,’’ सचिन बोला.

‘‘चलो, लेकिन किसी अच्छी जगह यानी जहां बैठ कर इतमीनान से बात कर सकें.’’

‘‘तब तो बराबर वाली बिल्डिंग की ‘अंगीठी’ का फैमिलीरूम ठीक रहेगा,’’ सिमरन बोली. चंद ही मिनट में वे बढि़या रेस्तरां पहुंच गए. ‘बहुत बढि़या आइडिया है यहां आने का सिमरन. पार्किंग और आनेजाने में व्यर्थ होने वाला समय बच गया,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के सुझाव हमेशा बढि़या और सटीक होते हैं दीदी.’’

‘‘फिर तो इसे जल्दी से परिवार में लाना पड़ेगा सब का थिंक टैंक बनाने के लिए.’’ सचिन ने मुसकरा कर सिमरन की ओर देखा. सपना को लगा कि मुसकराहट के साथ ही सिमरन के चेहरे पर एक उदासी की लहर भी उभरी जिसे छिपाने के लिए उस ने बात बदल कर सपना से उस के विदेश प्रवास के बारे में पूछना शुरू कर दिया. ‘‘मेरा विदेश वृतांत तो खत्म हुआ, अब तुम अपने बारे में बताओ सिमरन.’’ ‘‘मेरे बारे में तो जो भी बताने लायक है वह सचिन ने बता ही दिया होगा दीदी. वैसे भी कुछ खास नहीं है बताने को. सचिन की सहपाठिन थी, अब सहकर्मी हूं और नेहरू नगर में रहती हूं.’’

‘‘अपने पापा के शौक से बनाए घर में जो लाख परेशानियां आने के बावजूद इस ने बेचा नहीं,’’ सचिन ने जोड़ा, ‘‘अकेली रहती है वहां.’’

‘‘डर नहीं लगता?’’

‘‘नहीं दीदी, डर तो अपना साथी है,’’ सिमरन हंसी. ‘‘आई सी…इस ने तेरे बचपन के नाम डरपोक को छोटा कर दिया है सचिन.’’ सिमरन खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘‘नहीं दीदी, इस ने बताया ही नहीं कि इस का नाम डरपोक था. किस से डरता था यह दीदी?’’ ‘‘बताने की क्या जरूरत है जब रातदिन इस के साथ रहोगी तो अपनेआप ही पता चल जाएगा,’’ सपना हंसी. ‘‘रातदिन साथ रहने की संभावना तो बहुत कम है, मैं मम्मीजी की भावनाओं को आहत कर के सचिन से शादी नहीं कर सकती,’’ सिमरन की आंखों में उदासी, मगर स्वर में दृढ़ता थी. सपना ने घड़ी देखी फिर बोली, ‘‘अभी न तो समय है और न ही सही जगह जहां इस विषय पर बहस कर सकें. जब तक मेरा नर्सिंगहोम तैयार नहीं हो जाता, मैं तो फुरसत में ही हूं, तुम्हारे पास जब समय हो तो बताना. तब इतमीनान से इस विषय पर चर्चा करेंगे और कोई हल ढूंढ़ेंगे.’’

‘‘आज शाम को आप और जीजाजी चल रहे हैं न इस के घर?’’ सचिन ने पूछा.

‘‘अभी यहां से मैं नर्सिंगहोम जाऊंगी यह देखने कि काम कैसा चल रहा है, फिर घर जा कर दोबारा बाहर जाने की हिम्मत नहीं होगी और फिर आज मिल तो लिए ही हैं.’’

‘‘आप मिली हैं न, जीजाजी से भी तो मिलवाना है इसे,’’ सचिन बोला, ‘‘आप घर पर ही आराम करिए, मैं सिमरन को ले कर वहीं आ जाऊंगा.’’

‘‘इस से अच्छा और क्या होगा, जरूर आओ,’’ सपना मुसकराई, ‘‘खाना हमारे साथ ही खाना.’’ शाम को सचिन और सिमरन आ गए. सलिल की चुटकियों से शीघ्र ही वातावरण अनौपचारिक हो गया. जब किसी काम से सपना किचन में गई तो सचिन उस के पीछेपीछे आया.

‘‘आप ने मम्मी से बात की दीदी?’’

‘‘हां, हालचाल पूछ लिया सब का.’’

‘‘बस हालचाल ही पूछा? जो बात करनी थी वह नहीं की? आप को हो क्या गया है दीदी?’’ सचिन ने झल्ला कर पूछा. ‘‘तजरबा, सही समय पर सही बात करने का. सिमरन कहीं भागी नहीं जा रही है, शादी करेगी तो तेरे से ही. जहां इतने साल सब्र किया है थोड़ा और कर ले.’’ ‘‘इस के सिवा और कर भी क्या सकता हूं,’’ सचिन ने उसांस ले कर कहा. इस के बाद सपना ने सिमरन से और भी आत्मीयता से बातचीत शुरू कर दी. यह सुन कर कि सचिन औफिस के काम से मुंबई जा रहा है, सपना उस शाम सिमरन के घर चली गई. उस का घर बहुत ही सुंदर था. लगता था बनवाने वाले ने बहुत ही शौक से बनवाया था. ‘‘बहुत अच्छा किया तुम ने यह घर न बेच कर सिमरन. जाहिर है, शादी के बाद भी यहीं रहना चाहोगी. सचिन तैयार है इस के लिए?’’ ‘‘सचिन तो बगैर किसी शर्त के मेरी हर बात मानने को तैयार है, लेकिन मैं बगैर उस के मम्मीपापा की रजामंदी के शादी नहीं कर सकती. मांबाप से उन के बेटे को विमुख कभी नहीं करूंगी. प्रेम तो विवेकहीन और अव्यावहारिक होता है दीदी. उस के लिए सचिन को अपनों को नहीं छोड़ने दूंगी.’’

‘‘यह तो बहुत ही अच्छी बात है सिमरन. चाचाचाचीजी यानी सचिन के मम्मीपापा भी बहुत अच्छे हैं. अगर उन्हें ठीक से समझाया जाए यानी तुम्हारी शर्त का कारण बताया जाए तो वे भी सहर्ष मान जाएंगे. लेकिन सचिन ने उन्हें कारण बताया ही नहीं है.’’ ‘‘बताता तो तब न जब उसे खुद मालूम होता. मैं ने उसे कई बार बताने की कोशिश की, लेकिन वह सुनना ही नहीं चाहता. कहता है कि जब मेरे साथ हो तो भविष्य के सुनहरे सपने देखो, अतीत की बात मत करो. मुझे भी अतीत याद रखने का कोई शौक नहीं है दीदी, मगर अतीत से या जीवन से जुड़े कुछ तथ्य ऐसे भी होते हैं जिन्हें चाह कर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, उन के साथ जीना मजबूरी होती है.’’ ‘‘अगर चाहो तो उस मजबूरी को मुझ से बांट सकती हो सिमरन,’’ सपना ने धीरे से कहा. ‘‘मैं भी यही सोच रही थी दीदी,’’ सिमरन ने जैसे राहत की सांस ली, ‘‘अकसर देर से जाने और बारबार छुट्टी लेने के कारण न नौकरी पर ध्यान दे पा रही थी न पापा के इलाज पर, अत: मैं नौकरी छोड़ कर पापा को इलाज के लिए मुंबई ले गई थी. वहां पैसा कमाने के लिए वैक्यूम क्लीनर बेचने से ले कर अस्पताल की कैंटीन, साफसफाई और बेबी सिटिंग तक के सभी काम लिए. फिर मम्मीपापा के ऐतराज के बावजूद पैसा कमाने के लिए 2 बार सैरोगेट मदर बनी. तब तो मैं ने एक मशीन की भांति बच्चों को जन्म दे कर पैसे देने वालों को पकड़ा दिया था, लेकिन अब सोचती हूं कि जब मेरे अपने बच्चे होंगे तो उन्हें पालते हुए मुझे जरूर उन बच्चों की याद आ सकती है, जिन्हें मैं ने अजनबियों पर छोड़ दिया था. हो सकता है कि विचलित या व्यथित भी हो जाऊं और ऐसा होना सचिन और उस के बच्चे के प्रति अन्याय होगा. अत: इस से बेहतर है कि यह स्थिति ही न आने दूं यानी बच्चा ही पैदा न करूं. वैसे भी मेरी उम्र अब इस के उपयुक्त नहीं है. आप चाहें तो यह सब सचिन और उस के परिवार को बता सकती हैं. उन की कोई भी प्रतिक्रिया मुझे स्वीकार होगी.’’

‘‘ठीक है सिमरन, मैं मौका देख कर सब से बात करूंगी,’’ सपना ने सिमरन को आश्वासन दिया. सिमरन ने जो कहा था उसे नकारा नहीं जा सकता था. उस की भावनाओं का खयाल रखना जरूरी था. सचिन के साथ तो खैर कोई समस्या नहीं थी, उसे तो सिमरन हर हाल में ही स्वीकार थी, लेकिन उस के घर वालों से आज की सचाई यानी सैरोगेट मदर बन चुकी बहू को स्वीकार करवाना आसान नहीं था. उन लोगों को तो सिमरन की बड़ी उम्र बच्चे पैदा करने के उपयुक्त नहीं है कि दलील दे कर समझाना होगा. सचिन के प्यार के लिए इतने से कपट का सहारा लेना तो बनता ही है.

मुद्दा: सिविल सोसाइटी को कुचलने की मंशा

सरदार वल्लभभाई पटेल नैशनल पुलिस एकैडमी, हैदराबाद में वर्ष 2020 बैच के दीक्षांत परेड समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने प्रशिक्षु पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘सिविल सोसाइटी चौथी पीढ़ी के युद्ध का औजार है. आईपीएस अधिकारियों को देखना होगा कि इस के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा पैदा न हो.’’

डोभाल ने कहा, ‘‘अब युद्ध का नया मोरचा, जिसे आप युद्ध की चौथी पीढ़ी कहते हैं, सिविल सोसाइटी है. युद्ध अब अपने राजनीतिक या सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने के प्रभावी उपाय नहीं रह गए हैं. उन के नतीजों को ले कर अनिश्चितता की स्थिति बन गई है. लेकिन सिविल सोसाइटी को राष्ट्र के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए परास्त और दुष्प्रेरित किया जा सकता है. उस में फूट डाली जा सकती है, उसे बहलाया जा सकता है और आप यह देखने के लिए हैं कि वे पूरी तरह सुरक्षित रहें.’’

जिस दिन जम्मूकश्मीर पुलिस ने एक युवक की हत्या करने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल से सवाल पूछने के लिए एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को गिरफ्तार किया, वह वही दिन था जब अजीत डोभाल ने प्रशिक्षु पुलिस अधिकारियों से कहा कि नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी ‘युद्ध का चौथा मोरचा’ है. यानी उन्होंने सिविल सोसाइटी को देश के दुश्मन के रूप में रेखांकित करते हुए प्रशिक्षुओं के दिलों में देश के सजग नागरिकों के प्रति एक गांठ डाल दी, अपरोक्ष रूप से यह कहने की कोशिश की कि सत्ता से सवाल पूछने वाला देश का दुश्मन है.

गौरतलब है कि भारत में नागरिक समाज ने हमेशा लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम किया है, चाहे उन की जाति, पंथ, लिंग, समुदाय, जगह या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो. अगर यह नागरिक समाज न होता तो सूचना के अधिकार या रोजगार गारंटी या शिक्षा के बुनियादी अधिकार जैसे कानूनों का बनना कठिन होता. विकास के तर्क के मुकाबले आदिवासियों के पारंपरिक अधिकार या पर्यावरण के संरक्षण के प्रश्न भी इसी नागरिक समाज ने ही उठाए.

नागरिक समाज हमेशा सरकार की उन नीतियों या सरकार के उन कार्यों का विरोध करता रहा है जिन्हें आम लोगों के हित के खिलाफ माना जाता है. सिविल सोसाइटी के अंतर्गत तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं, छात्रों और वकीलों के समूह, ग्रामीण आंदोलनकारी, गैरसरकारी संगठन, मजदूर संघ, देसी समूह, परमार्थ संगठन, आस्था आधारित संगठन, पेशेवर संघ और तमाम तरह के प्रतिष्ठान आते हैं तो क्या ये सब देश के दुश्मन हैं?

तो क्या महात्मा गांधी के तमाम आंदोलन अजीत डोभाल द्वारा तय की गई परिभाषा के तहत देशद्रोह माने जाएं? भारतीय नागरिक समाज ने स्वतंत्रता के बाद सरकार के खिलाफ सब से मजबूत प्रतिरोध की मिसाल उस वक्त पेश की जब इंदिरा गांधी ने जून 1975 में आपातकाल की घोषणा की थी. यह प्रतिरोध भी शांतिपूर्ण था और इस में कोई हिंसा या विद्रोह शामिल नहीं था. क्या वह देश के लिए खतरा था? क्या उसे देशद्रोह करार दिया गया था? अगर देशभर का किसान सरकार द्वारा लाए गए 3 कृषि कानूनों के खिलाफ सड़क पर आंदोलनरत रहा तो क्या इसे देश के लिए खतरा मान लिया जाए?

हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना ने दिल्ली की नैशनल लौ यूनिवर्सिटी के 8वें दीक्षांत समारोह में कानून स्नातकों को संबोधित करते हुए कहा कि आप आत्मकेंद्रित नहीं रह सकते. देश की विचार प्रक्रिया पर संकीर्ण और पक्षपातपूर्ण मुद्दों को हावी न होने दें. आखिरकार यह हमारे लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र की प्रगति को नुकसान पहुंचाएगा.

श्री रमन्ना ने कहा, ‘‘छात्रों की समाज के प्रति एक विशेष जिम्मेदारी है और वे सार्वजनिक बहस व सामाजिक, आर्थिक वास्तविकताओं से अलगथलग नहीं रह सकते. छात्र भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का चेहरा रहे हैं. उन्होंने ऐसे मुद्दों को उठाया है जिन्होंने राजनीतिक दलों को उन को अपनाने के लिए प्रेरित किया. लेकिन पिछले कुछ दशकों में छात्र समुदाय से कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया है.’’

राजनीतिक जानकारों की मानें तो केंद्र की सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तानाशाह शासक बनने की चाह रखते हैं. वे अपनी सत्ता और शासन के प्रति लोगों से पूर्ण वफादारी चाहते हैं और दूसरों की राय या परेशानियों से उन्हें कोई मतलब नहीं है. एनएसए अजीत डोभाल या हैलिकौप्टर हादसे में शिकार हुए चीफ औफ डिफैंस स्टाफ विपिन रावत जैसे मोदी के खास लोगों के समयसमय पर दिए गए वक्तव्य इसी मंशा को पूरी करने की राह तैयार करते रहे हैं.

लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं

गौरतलब है कि पुलिस अकादमी से निकलने वाले प्रशिक्षुओं का मन कच्चे घड़े की तरह होता है. उस पर कुछ भी उकेरा जा सकता है. खासतौर से अगर सलाह अजीत डोभाल जैसे उन की अपनी सेवा के सफलतम अधिकारी के मुख से निकल रही हो तो उन में से अधिकांश के लिए यह किसी वेदवाक्य से कम नहीं होगा. सौ के लगभग ये अधिकारी अगले 5-6 वर्षों के भीतर देश के अलगअलग हिस्सों में पुलिस का मध्य नेतृत्व संभाल रहे होंगे और अगर तब उन्हें यह वक्तव्य याद आया कि राज्य के प्रभावी नैरेटिव के विपक्ष में खड़े दिखते नागरिक समाज के लोग देश की सुरक्षा के लिए खतरा होते हैं तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उन के प्रति उस पुलिस अधिकारी का आचरण कैसा होगा.

उन्हें यह सम?ाना मुश्किल होगा कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए बड़े बांधों या आणविक संयंत्रों का विरोध करने वाले नागरिक देश के शत्रु नहीं हैं. उन्हें यह विश्वास दिलाने में भी आप को काफी प्रयास करना पड़ेगा कि घरेलू हिंसा के खिलाफ बातें करने वाले लोग भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के किसी वृहत्तर अंतराष्ट्रीय एजेंडे के अंग नहीं हैं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि बीजेपी सरकार द्वारा चलाई जा रही वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना है और सरकार इसे हर हाल में पूरा करना चाहती है. यह चीन की तरह भारतीय लोकतंत्र को एकदलीय शासन में बदलने की चाह है.

2014 से लोकतांत्रिक संस्थाओं का कमजोर होना, खुफिया विभाग का बजट 700 करोड़ रुपए कर दिया जाना जो 2012 में 17 करोड़ रुपए ही था और विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं आदि की जासूसी करने के लिए पैगासस टैक्नोलौजी का इस्तेमाल किया जाना आदि सब घटनाएं भारत के लोकतंत्र को एक तानाशाही शासन की ओर अग्रसर होने का संकेत देती हैं. यही कारण है कि पुलिस प्रबंधन के शीर्ष आईपीएस अधिकारियों को नागरिक समाज के खिलाफ किया जा रहा है. अगर ऐसा हुआ तो यह भारतीय लोकतंत्र के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा और सरकार की नीतियों और कार्यों के विरुद्ध किसी भी सामूहिक विरोध को विभाजनकारी व गैरकानूनी माना जाएगा और पुलिस के पास इसे पूरी ताकत से दबाने का लाइसैंस होगा. इस के परिणाम भयावह होंगे.

पिछले 7 वर्षों में देश में जो कुछ हुआ है, अगर उस पर गौर किया जाए तो हम पाएंगे कि कैसे असहमति या विरोध को दबाने के लिए सभी कानूनों का खुलेआम उल्लंघन किया गया है. वर्तमान में दलितों, मुसलमानों और अन्य कमजोर समूहों के खिलाफ नफरत व हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ सरकार द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई.

मुसलिम युवकों, विशेष रूप से विश्वविद्यालय के लड़कों और लड़कियों पर दिल्ली दंगों के संबंध में देशद्रोह और आतंकवाद की धाराओं में केस दर्ज किए गए ताकि मुसलमानों में भय और आतंक पैदा किया जा सके. मुसलिम विद्यार्थियों का यही वर्ग राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा सरकार की नीतियों का विरोध करने वाला सब से बड़ा समूह है.

आंगनबाड़ी से ले कर सरकारी डाक्टरों, शिक्षकों और विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के आंदोलन पर भी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया. सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध पर ध्यान नहीं दिया. किसानों द्वारा की जा रही

3 कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर एक वर्ष के लंबे अरसे तक कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि उन्हें कुचला गया और जब आगामी यूपी चुनाव में नुकसान होता दिखाई दिया तो अब ये कानून वापस ले लिए. इस के अलावा, सरकार ने भीमा कोरेगांव मामले में विश्वविद्यालयों के वामपंथी ?ाकाव वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी मामला दर्ज किया था.

मुसलमानों और दलितों के बाद उच्च जाति के उन हिंदुओं और मीडियाकर्मियों व मीडिया संस्थानों को भी निशाना बनाया जा रहा है जो सरकार की योजना में बाधा बन रहे हैं. इस सब से पता चलता है कि देश किस ओर जा रहा है.

सरकार की मानसिकता

अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायपालिका से ‘फाइव स्टार एक्टिविस्ट्स’ से सावधान रहने को कहा. उन के इस बयान ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति उन की मानसिकता को उजागर किया था. उन के इस भाषण के बाद एमनेस्टी इंटरनैशनल और ग्रीनपीस के खिलाफ कार्रवाई की गई थी. इस के बाद वामपंथी नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपमानित करने के लिए ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का भी आविष्कार किया गया था. सरकार ने गैरसरकारी संगठनों की मानवाधिकार संबंधी उन की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए उन को मिलने वाले फंड में कमी लाने को एफसीआरए नियमों में संशोधन भी किया.

यह मानसिकता ही त्रिपुरा पुलिस को हाल में राज्य में हुए मुसलिमविरोधी हिंसा पर फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट तैयार करने वाले वकीलों पर आतंकवाद के आरोप लगाने की ओर ले जाती है. यही मानसिकता उन वकीलों पर राजद्रोह जैसे गंभीर आपराधिक आरोप लगाती है जिन्होंने यह रिपोर्टिंग की थी कि 26 जनवरी को दिल्ली में हुए किसानों के प्रदर्शनों के दौरान जान गंवाने वाले किसानों को वास्तव में गोली मारी गई थी.

विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत 1947 से एक जीवंत लोकतंत्र रहा है और लोगों ने हमेशा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने के लिए किया है. ऐसे में अगर चीन की तरह भारत में भी लोकतंत्र को निरंकुश या एकदलीय शासन में बदलने के लिए कोई प्रयास किया गया तो इस का बड़े स्तर पर विरोध निश्चित है.

सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी

और ‘पीपुल फर्स्ट’ के अध्यक्ष एम जी देवासहायम, जो भारतीय सेना को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं, अजीत डोभाल के वक्तव्य पर कहते हैं, ‘‘अजीत डोभाल के बयान से ऐसा लगता है कि वे भारत को अभी भी औपनिवेशिक राजशाही मानते हैं, जहां लोगों को प्रजा माना जाता है कि वह एक लोकतंत्र नहीं है, जहां लोगों को नागरिक माना जाता है. डोभाल के लिए लोग नहीं, बल्कि राज्यतंत्र सर्वोपरि है, जबकि हमारा संविधान इन शब्दों से शुरू होता है- ‘हम भारत के लोग…’ और इस में लोकतंत्र को एक ऐसे समाज के रूप में परिभाषित किया गया है जिस में नागरिक संप्रभु है और वही राज्यसत्ता का मालिक है.’’

एम जी देवासहायम आगे कहते हैं, प्रजा और नागरिक में भारी अंतर है. प्रजा वह है जो किसी सम्राट या सरकार की सत्ता के मातहत होती है. जबकि नागरिक को एक स्वतंत्र व्यक्ति के अधिकार और विशेषाधिकार हासिल होते हैं. सरकार के आदेश का पालन करना प्रजा का फर्ज है, जबकि नागरिक को यह अधिकार हासिल है कि वह राज्यसत्ता को आदेश दे क्योंकि वे ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर के सरकार का गठन करते हैं. सार यह कि लोकतंत्र मूलतया ‘जनता की सत्ता’ है न कि राज्यतंत्र की सत्ता.

‘‘सिविल सोसाइटी की वास्तविक परिभाषा में भारत की पूरी जनता शामिल मानी जाएगी जिसे संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के तहत मौलिक अधिकारों का दावा करने का संवैधानिक विशेषाधिकार हासिल है, सिवा सेना में शामिल लोगों के, जिन के संवैधानिक अधिकार सीमित हैं. सरकार को कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर करने वाले लाखों आंदोलनकारी किसान भी सिविल सोसाइटी का हिस्सा हैं. ऐसे में अजीत डोभाल युवा पुलिस अधिकारियों से यह कैसे कह सकते हैं कि वे ‘हम, भारत के लोग’ को दुश्मन मानें और उन के खिलाफ युद्ध करें?’’

‘द शिलौंग टाइम्स’ की संपादक पैट्रिशिया मुखीम लिखती हैं, ‘‘एनएसए की नजर में केवल उन्हीं की अहमियत है जो भारतीय राज्यतंत्र के वफादारों के रूप में वर्तमान सरकार का खुला समर्थन करते हैं, जो हर पल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उन के नंबर दो अमित शाह का गुणगान करते रहते हैं, जो अपने सोशल मीडिया नैटवर्क का इस्तेमाल सरकार के आलोचकों की निरंतर निंदा में करते रहते हैं.’’

वे आगे लिखती हैं, ‘‘शिलौंग वी केयर’ नामक ?ांडे के नीचे इकट्ठा हुए विविध लोगों का समूह शायद पहला ऐसा संगठन है जो मेघालय में उग्रवाद के खिलाफ शुरू से लड़ रहा है. मेघालय में उग्रवादियों को भगाने में सिविल सोसाइटी समूह अग्रिम मोरचे पर रहे हैं. अजीत डोभाल के लिए बेहतर होगा कि वे भारत के मुख्य इलाकों को ही नहीं, बल्कि आंतरिक इलाकों के माहौल को भी सम?ाने की कोशिश करें और देश की विशद विविधताओं के मद्देनजर उसी के मुताबिक अपने सिद्धांत गढ़ें.’’

देश के नागरिकों के विशाल तबकों और सामाजिक कार्यों से जुड़े कार्यकर्ताओं को ‘युद्ध का नया मोरचा’ मानना और सिविल सोसाइटी के खिलाफ युद्ध को चौथी पीढ़ी के युद्ध के बराबर बताना उन दुविधाओं को बुलावा देना है

जो अल्पकालिक राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाती हैं. डोभाल साहब, यह नहीं चलेगा. भारत की अवधारणा आप की आधीअधूरी कल्पना से कहीं ज्यादा बड़ी है.

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