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मुद्दा: किसानों पर मुकदमे कब होंगे वापस

Writer- रोहित

मौजूदा सरकार देशद्रोह, यूएपीए, 144, एपिडैमिक एक्ट जैसे कानूनों का इस्तेमाल अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को दबाने के लिए कर रही है, जबकि, प्रजातंत्र में जनता सरकार को चुनती है और उसे सरकार की आलोचना करने का हक भी होता है.

किसानों को दिल्ली बौर्डर खाली किए एक महीने से ऊपर बीत चुका है.

19 नवंबर, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानून वापस लेते समय, बेमन ही सही, देश से माफी मांगी. दिल्ली बौर्डर पर एक साल से ऊपर चले इस आंदोलन में किसानों ने निर्णायक जीत हासिल की. एक तरफ जहां मीडिया, सरकार और आम शहरियों की नजर में किसान आंदोलन खत्म हुआ, वहीं, वासु कुकरेजा जैसे वकीलों, जो किसान आंदोलन को शुरू से अपनी सेवाएं देते रहे, के लिए आंदोलन का दूसरा पड़ाव शुरू हुआ.

सरिता पत्रिका से इस बात की चर्चा वकील वासु कुकरेजा तब कर रहे थे जब 3 जनवरी, 2022 को लखीमपुर खीरी कांड की जांच के लिए गठित की गई एसआईटी ने 5 हजार पन्नों की चार्जशीट लोकल कोर्ट में दाखिल की. एसआईटी की चार्जशीट में 14 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, जिस में आशीष मिश्रा उर्फ मोनू, अंकित दास, नंदन सिंह बिष्ट, सत्यम त्रिपाठी उर्फ सत्यप्रकाश, लतीफ उर्फ काले, शेखर भारती, सुमित जायसवाल, आशीष पांडेय, लवकुश, शिशुपाल, उल्लास कुमार त्रिवेदी उर्फ मोहित, रिंकू राणा, धर्मेंद्र कुमार बंजारा और वीरेंद्र शुक्ला को लखीमपुर हिंसा का मुख्य आरोपी बनाया गया है.

वासु इस बात से खुश थे कि चार्जशीट में केंद्रीय राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा टेनी को मुख्य आरोपी बनाया गया है, किंतु वे इस बात से आहत भी थे कि चार्जशीट में अजय मिश्रा का नाम नहीं रखा गया. उन का मानना था कि यूनियन मिनिस्टर का नाम न होने का कारण जांच टीम पर पड़ रहा केंद्रीय सरकार का दबाव हो सकता है. उन का कहना था कि जिस थार गाड़ी को किसानों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया गया वह अजय मिश्रा टेनी के नाम पर रजिस्टर्ड है. अजय मिश्रा शुरू से अपने बेटे को बचाने और गलत जानकारी देने की कोशिश करते रहे. उन का इस में पूरा रोल था. बावजूद इस के, उन का नाम चार्जशीट में नहीं रखा गया.

27 वर्षीय वकील वासु कुकरेजा दिल्ली स्थित तीस हजारी कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं और किसान आंदोलन में पहले दिन से अपनी भूमिका निभाते आए. वे बताते हैं कि वे उस टीम का हिस्सा रहे जिस ने लखीमपुर खीरी मामले में सब से पहले पीआईएल डाली थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कोग्निजैंस लिया और आशीष मिश्रा उर्फ मोनू मिश्रा को विभिन्न धाराओं में नामजद किया. वासु बताते हैं कि वे व उन की टीम एसआईटी की जांच रिपोर्ट पूरी पढ़ कर, कि किस आधार पर उन का नाम हटाया गया, अजय मिश्रा टेनी को भी नामजद किए जाने को ले कर ऐक्शन लेगी.

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किसान आंदोलन में वैसे तो हर तबके ने अपनीअपनी हिस्सेदारी निभाई है, पर कानून से जुड़े मोरचे पर वकीलों का काम भी सराहनीय रहा है. वासु बताते हैं, ‘‘पिछले वर्ष 26 जनवरी को किसान परेड के समय जो घटना घटी, उस के बाद किसानों पर सरकार तरहतरह के मुकदमे दायर कर उत्पीडि़त करने लगी. इसे देखते हुए

30 जनवरी को रकाब गंज में तकरीबन 1,500 वकीलों की मीटिंग हुई, जिस का बैनर था ‘वकील फौर फार्मर्स’. उस जगह पर वकील किसानों को कानूनी समर्थन के लिए एकत्रित हुए थे.’’

वासु बताते हैं, उन्हें गाजीपुर से टीम लीड करने को कहा गया था, जिस कारण उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से जुड़े मामले उन्हें देखने थे. वे कहते हैं, ‘‘मेरे साथ 15-20 वकीलों की टीम है जो रैगुलर बेसिस पर किसानों की मदद करती है.’’ वासु के पास इस समय किसान आंदोलन से जुड़े 1,500 मामले हैं, जिन में कुछ मामले प्राइमरी स्टेज पर वापस करवा लिए गए हैं.

जाहिर है, किसान आंदोलन के दौरान किसानों पर कई गंभीर मुकदमे दर्ज किए गए हैं. बौर्डर से प्रदर्शन वापस लेने से पहले किसानों की सब से बड़ी मांगों में से एक किसानों और किसान नेताओं पर सभी दर्ज मुकदमों को वापस लिए जाने को ले कर थी. सरकार के साथ आधीअधूरी बात में किसान उठ तो गए पर किसानों पर से यह मुकदमे अभी तक वापस नहीं लिए गए. इन में 302 के तहत दर्ज मुकदमे, 314 के तहत सरकारी संपत्ति को तोड़ने के, आर्कियोलौजी एक्ट के तहत और धारा 144 व एपिडैमिक एक्ट तोड़ने के ढेरों मुकदमे दर्ज हैं. वासु कहते हैं, ‘‘इन में से मेरे पास किसान आंदोलन से जुड़े एक हजार से ऊपर मामले तो सिर्फ 26 जनवरी से जुड़ी घटना को ले कर हैं. सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए जानबू?ा कर कानूनों का बेजा इस्तेमाल किया है.’’

वासु प्रदर्शन के दौरान दर्ज किए गए मुकदमों को वापस लिए जाने की मांग को जरूरी मानते हैं. वे मानते हैं कि किसी जनआंदोलन में सरकार द्वारा आंदोलन को कुचलने के लिए दर्ज किए गए मुकदमों की मांग उठनी भी जरूरी है और इसे वापस लिया जाना लोकतांत्रिक दृष्टि से भी जरूरी है. अगर मुकदमे वापस नहीं लिए जाते तो सरकार लंबे समय तक अपने विरोधियों को उत्पीडि़त कर सकती है या भविष्य में मैनिपुलेट कर सकती है.

वासु कहते हैं, ‘‘जब आंदोलन वापस होता है तब या तो वह कौंप्रोमाइज्ड मोड में होता है या सैकंड स्टेज में होता है. नौर्मल भाषा में देखिए, अगर मेरा अपने पड़ोसी से ?ागड़ा है और अगर हमारे बीच कौंप्रोमाइज होता है तो स्वाभाविक है कि जो मुकदमे हैं वे वापस होंगे ही. इसलिए जब सम?ाता हो गया तो सरकार को मुकदमे वापस लेने चाहिए. हम नहीं चाह रहे कि गलत मुकदमे वापस ले, जैसे टिकरी वाला हो या सिंघु वाला हो, लेकिन जो किसानों पर फुजूल डरानेधमकाने के लिए दर्ज किए गए हैं उन्हें तो वापस लिया जाए.’’

यह सच भी है, 26 जनवरी की घटना को ओहदेदार भाजपा नेताओं और अधिकारियों ने किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बताया. दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि गणतंत्र दिवस की घटना ‘प्री-प्लान’ और ‘अच्छी तरह से समन्वित योजना’ थी. यही कारण भी था कि किसानों और उन के नेताओं समेत पत्रकारों पर आपराधिक मामले दर्ज किए गए और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधानों व देशद्रोह से निबटने वाली आईपीसी की धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए.

वासु कहते हैं, ‘‘मौजूदा सरकार देशद्रोह यूएपीए जैसे कानूनों का इस्तेमाल अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को दबाने के लिए कर रही है. अगर मैं सरकार को चुनता हूं तो उस की आलोचना करना मेरा हक है. यह हक मु?ा से छीना नहीं जा सकता. वकील के तौर पर मु?ो लगता है यूएपीए जिस इरादे के लिए लाया गया था, उस का सही यूज न कर के सिर्फ डरानेधमकाने व आवाज बंद करने के लिए यूज किया जा रहा है.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘मेरे पिताजी बताते थे जब 84 दंगे हुए तब टाडा लगता था, जिसे बाद में हटा दिया गया. आज यही काम यूएपीए लगा कर किया जाता है. अगर आप सरकार के खिलाफ कहोगे, उस की आलोचना करोगे तो यूएपीए उस के पास है. यूपी, पंजाब में देखिए, कितने फैब्रिकेटेड केसेस हो रहे हैं. ताजा उदाहरण जगमीत सिंह का है. जगमीत सिंह फार्मर प्रोटैस्ट चेहरों में से एक थे. ये वही थे जिन्होंने वाटर कैनन अपने ऊपर ली थी. उन्हें अरैस्ट किया गया. फिर पुलिस रिमांड पर ले लिया गया.’’

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वर्ष 2010 से वर्ष 2020 तक कुल 816 राजद्रोह के मामलों में 10,938 भारतीयों को आरोपी बनाया गया है. इन में 65 फीसदी मामले मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान एनडीए सरकार के समय में दर्ज किए गए. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में साल 2015 में 30, 2016 में 35, 2017 में 51 और 2018 में 70 राजद्रोह के मामले दर्ज हुए. साल 2019 में देश में सब से अधिक राजद्रोह के 93 मामले दर्ज हुए और इन में 96 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन 96 में से 76 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई और 29 को बरी कर दिया गया. इन सभी आरोपियों में से केवल 2 को अदालत ने दोषी ठहराया. इसी तरह साल 2018 में जिन लोगों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया, उन में से 46 के खिलाफ चार्जशीट दायर हुई और उन में से भी केवल 2 लोगों को ही अदालत ने दोषी माना.

देखा जा सकता है कि प्रशासन अधिकतर समय गलत इरादतन इस तरह के मामले दर्ज करता है ताकि विरोध को दबाया जा सके. कन्हैया कुमार प्रकरण इस का बड़ा उदाहरण है जिस में दोष

5 वर्षों बाद भी साबित नहीं हो सका.

वासु कुकरेजा कहते हैं, ‘‘एमएसपी छोड़ो, अभी मुकदमे वापस नहीं हुए हैं. किसानों को फिर से क्राइम ब्रांच के पास नोटिस और समन आने लगे हैं. मुआवजा किसानों को नहीं मिला है. लखीमपुर के घायल किसानों को

10 लाख रुपए देने की बात थी जो अभी तक नहीं मिले हैं. सरकार देरी कर रही है. लखीमपुर के मुख्य विटनैस को सुरक्षा नहीं दी जा रही, सुप्रीम कोर्ट के और्डर को सरकार नहीं मान रही है. अब नोटिस फिर से भेजे जाने लगे हैं तो सम?िए लीगल लड़ाई लंबी चलने वाली है.’’

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वासु कुकरेजा अपने पेशे से मानवाधिकारों की आवाज उठाते रहते हैं. किसान आंदोलन से पहले वे हाथरस मामले में भी सक्रिय थे. उन्होंने हाथरस में भी सब से पहले पीडि़त परिवार की तरफ से पीआईएल दाखिल की थी. वे कहते हैं, ‘‘यह संविधान बचाने की लड़ाई है. संविधान बचेगा तो ही देश आगे चलेगा. संविधान नहीं तो देश नहीं. हमें मिल कर संविधान रूल को स्थापित करना है.’’

पोटैटो डिगर से आलू की खुदाई

हमारे देश के कई हिस्सों में आलू की खुदाई शुरू हो चुकी है. लेकिन इस बार भी आलू की बंपर पैदावार के चलते किसानों को आलू की सही कीमत नहीं मिल पा रही है. यही वजह है कि कुछ किसानों ने तो कुछ दिनों के लिए अपने खेत से आलू की खुदाई रोक दी है. उन्हें इंतजार है कि आलू का बाजार भाव कुछ ठीक हो तो खुदाई करें.

हालांकि आलू की अगेती खेती लेने वाले किसान अपने खेत में आलू की फसल लेने के तुरंत बाद गेहूं की बोआई कर देते हैं. अभी जो बाजार में आलू आ रहा?है, वह कच्चा होता है. उस का छिलका भी हलका रहता है, इसलिए इस में टिकाऊपन नहीं होता. इसे स्टोर कर के नहीं रखा जाता.

फरवरी महीने तक आलू पूरी तरह से तैयार होता है. इसे किसान बीज के लिए व आगे बेचने के लिए भी कोल्ड स्टोरेज में रखते हैं. इस के लिए किसान आलू की अलगअलग साइजों में छंटाई कर ग्रेडिंग कर के रखें, तो अच्छे दाम भी मिलते हैं और आगे के लिए स्टोर करने के लिए सुविधा रहती है.

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आलू की फसल आने के बाद उस के रखरखाव की भी खासा जरूरत होती है, क्योंकि आलू को खुला रखने पर उस में हरापन आ जाता है.

आलू की फसल तैयार होने के बाद आलू की खुदाई मजदूरों द्वारा और आलू खुदाई यंत्र (पोटैटो डिगर) से की जाती है. हाथ से खुदाई करने पर काफी आलू कट जाते हैं और मंडी में आलू की सही कीमत नहीं मिलती?है.

इसी काम को अगर आलू खोदने वाली मशीन से किया जाए, तो कम समय में आलू की खुदाई कर सकते हैं. मशीन के द्वारा आलू खुदाई करने पर आलू साफसुथरा भी निकलता है. उस के बाद आने वाली फसल की बोआई भी समय पर कर सकते हैं.

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आलू की फसल खुदाई करने लायक होने पर आलू के पौधों को ऊपर से काट दें या उस पर खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव कर दें, ताकि पौधों के पत्ते सूख जाएं और फसल की खुदाई ठीक से हो सके.

आलू खुदाई यंत्र

केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल द्वारा तैयार आलू खुदाई यंत्र एकसाथ 2 लाइनों की खुदाई करता?है. इस यंत्र में 2 तवेदार फाल लगे होते हैं, जो मिट्टी को काटते हैं. इस में नीचे एक जालीदार यंत्र भी लगा होता है, जो मिट्टी में घुस कर आलू को मिट्टी के अंदर से निकाल कर बाहर करता है. साथ ही, इस यंत्र पर एक बैड लगा होता?है, जिस पर जाल के घेरे से आलू निकल कर गिरते हैं. यह बैड लगातार हिलता रहता है. इस बैड के हिलने से मिट्टी के ढेले टूट कर गिरते रहते हैं और साफ आलू खेत में मिट्टी की सतह पर गिरते हुए निकलते हैं. इस के बाद मजदूरों की सहायता से आलुओं को बीन कर खेत में जगहजगह इकट्ठा कर लिया जाता है.

संस्थान द्वारा निर्मित पोटैटो डिगर को 35 हौर्सपावर के ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है. एक हेक्टेयर जमीन की आलू खुदाई में 3 घंटे का समय लगता है और 12 लिटर डीजल की खपत होती है.

इस यंत्र की अधिक जानकारी के लिए आप केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, नवी बाग, भोपाल से संपर्क कर सकते हैं या आप अपने नजदीकी कृषि विभाग से भी आलू खुदाई यंत्र के बारे में जानकारी ले सकते हैं.

महेश एग्रो का पोटैटो डिगर

महेश एग्रो वर्क्स के पोटैटो डिगर में 56 इंच और 42 इंच के बैड लगे होते हैं. 2 लाइनों में आलुओं की खुदाई होती है. 45 हौर्सपावर के ट्रैक्टर में आलू खुदाई यंत्र को जोड़ कर चलाया जा सकता है.

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प्रकाश पोटैटो डिगर

यह मशीन भी सभी प्रकार के आलू खुदाई के लिए उत्तम है. 35 हौर्सपावर या उस से अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टर के साथ इसे चलाया जाता है. मशीन में डबल जाल लगा होने के कारण आलू भी साफसुथरा निकलता है.

नवभारत इंडस्ट्रीज के प्रकाश ब्रांड के कृषि यंत्र आज भी खेती के?क्षेत्र में अच्छी पकड़ बना रहे हैं. आप भी अगर इन के यंत्र खरीदना चाहते?हैं, तो मोबाइल फोन नंबर 09897591803 पर बात कर सकते हैं.

इस के अलावा अनेक पोटैटो डिगर बाजार में मौजूद हैं. इस के लिए आप कृषि विभाग या अपने नजदीकी कृषि यंत्र निर्माता से पता कर सकते हैं.

तलाक की कानूनी त्रासदी

शादी के बाद पतिपत्नी के बीच यदि सब ठीक नहीं चल रहा, कोई विवाद खड़ा हो गया तो उन के आगे तलाक का विकल्प होता है, पर तलाक लेने गए दंपती को एड़ीचोटी घिसनी पड़ जाती है. इस दौरान उन्हें घुटघुट कर जीना पड़ता है. सवाल यह है कि जब तुरंत शादी की व्यवस्था है तो तुरंत तलाक की क्यों नहीं?

तलाक का यह मुकदमा एक पत्नी पूनम द्वारा 9 सितंबर, 2003 को दायर किया गया था, जिस का फैसला 30 सितंबर को हो पाया. यानी लगभग 18 साल मुकदमा चला, जबकि शादी तय होने में 18 दिन और होने में

18 घंटे भी नहीं लगे थे. वजह कोई भी हो, शादी के बाद अगर पतिपत्नी में पटरी न बैठे तो क्या तलाक के लिए इतना इंतजार करना या करवाया जाना न्याय कहा और माना जाना चाहिए? इस सवाल का जवाब हां में देना शायद ही कोई पसंद करे.

पूनम की शादी 9 जून, 2002 को सुरेंद्र कुमार से हुई थी. ठीक 20 दिनों बाद उस ने पति के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई कि दहेज की मांग पूरी न किए जाने पर उसे ससुराल में दाखिल होने की इजाजत ही नहीं दी गई थी. आईपीसी की धाराओं 498 ए (क्रूरता) और 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत मामला दर्ज हुआ. इस के बाद पूनम ने तलाक की याचिका ट्रायल कोर्ट में दायर कर दी.

क्रूरता और विश्वासघात वाली याचिका अदालत ने 1 जनवरी, 2006 को खारिज कर दी क्योंकि पीडि़ता के भाई ने ही उस के खिलाफ बयान दिया था. इस पर पीडि़ता ने एतराज दर्ज कराते हुए गुहार लगाई कि उस के गवाहों- दूसरे भाई सुभाष चंद्र और भाभी रानी देवी- की गवाही पर ध्यान नहीं दिया गया जिन के सामने उस का उत्पीड़न हुआ था, बल्कि उस भाई की गवाही पर भरोसा किया गया जो कि परिवार से अलग रहता है और अपने मांबाप से बात तक नहीं करता.

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इसे क्यों न्याय कहा जाए

ट्रायल कोर्ट के आदेश को पूनम ने चुनौती दी लेकिन हाईकोर्ट ने उस की अपील को खारिज कर दिया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहां जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एम एम सुंदरेश की बैंच ने फैसला दिया कि-

यदि पार्टियां (दोनों पक्ष) शुरू से ही विवाह के उद्देश्य साहचर्य को एकदूसरे के लिए पूरा नहीं कर पाई हैं और 19 वर्षों से अलग रह रही हैं तो हमारा विचार है कि यदि यह विवाह का अपूर्णीय टूटना नहीं है तो यह किस तरह की स्थिति है. इस शादी में शुरू से ही सब ठीक नहीं था और यह जोड़ा 19 साल से अधिक समय से अलग रह रहा है.

‘‘इस प्रकार हमारा विचार है कि विवाह के अपूर्णीय विघटन के कारण भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत पार्टियों के बीच विवाह को भंग करने वाली तलाक की एक डिक्री पारित की जानी चाहिए लेकिन हम यह स्पष्ट करते हैं कि अपीलकर्ता द्वारा अदालत के समक्ष जो पेश किया गया था उस को ध्यान में रखते हुए अपीलकर्ता अब से प्रतिवादी से किसी भी भरणपोषण या अन्य राशि का दावा नहीं करेगी.’’

इस फैसले को पढ़ कर और बारीकी से सोचने पर इसे न्याय कहने की कोई वजह सम?ा नहीं आती, लेकिन पुरुषप्रधान भारतीय समाज के आगे देश की सब से बड़ी अदालत कैसे नतमस्तक हो गई, यह जरूर साफसाफ दिख रहा है.

फैसले के पहले 23 सितंबर, 2021 को पूनम के वकील ने कोर्ट को बताया था कि वह आपसी सहमति से तलाक लेने पर सहमत हो गई है और पहले लगाए गए सभी आरोप वापस ले लिए जाएंगे और तो और, पूनम अब भरणपोषण का दावा भी दायर नहीं करेगी. तब कहीं जा कर सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद की याद आई जो उसे विशेष अधिकार देता है. जबकि, कान ट्रायल कोर्ट के उमेठे जाने चाहिए थे कि तलाक में बेवजह की देरी क्यों हुई.

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क्रूरता की शिकार पूनम को तलाक की डिक्री का कागज भी इन शर्तों पर मिला कि वह पति के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी और न ही भरणपोषण मांगेगी तो यह ‘न्याय’ न केवल उस की, बल्कि उन तमाम पूनमों की हार और उन के औरत योनि में जन्म लेने की सजा है जो अदालत में तलाक का मुकदमा लड़ रही हैं. यह फैसला औरतों के लिए कबीलाई मैसेज है कि वे तलाक के अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई न लड़ें और चुपचाप खामोशी से ज्यादतियां बरदाश्त करती रहें. यही आज भी औरत होने के माने हैं जो मर्दों के दबदबे वाली पंचायतों के दौर में हुआ करते थे.

का वर्षा जब कृषि सुखानी

पूनम ने 21 साल किन मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक यातना व प्रताड़ना में गुजारे होंगे, यह तो कोई भुक्तभोगी या अदालत की चौखट पर एडि़यां रगड़ रही कोई पूनम ही बता सकती है. न केवल महिलाएं बल्कि कभीकभी पुरुष भी जवान से अधेड़ और बूढ़े तक हो जाते हैं लेकिन कानूनन तलाक हासिल नहीं कर पाते. उन की हालत देख लगता है कि शादी कोई लड्डू नहीं बल्कि कोई गुनाह है जो उन से जानेअनजाने में हो गया है जिस की सजा वे तलाक कानूनों के चक्रव्यूह में फंस कर भुगत रहे हैं.

हमारे देश में आजकल शादियां चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर हो रही हैं लेकिन किसी कारणवश उन्हें पतिपत्नी तोड़ना चाहें यानी तलाक लेना चाहें तो कानूनी प्रक्रिया उन्हें छठी का दूध याद दिला देती है. ‘फसल सूख जाने के बाद बारिश होने से क्या फायदा’ वाली कहावत तलाक लेने वालों पर भी सटीक बैठती है.

अच्छी बात तो यह है कि खुद न्याय प्रक्रिया से जुड़े लोग भी इस खामी को बखूबी जानतेसम?ाते व कभीकभी मानते भी हैं. अब से लगभग 5 वर्षों पहले सुप्रीम कोर्ट के जज और राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस अरुण मिश्रा ने जयपुर में इंडियन लौ इंस्टिट्यूट की एक वर्कशौप में कहा था, ‘दुनिया में हर क्षेत्र में बदलाव आ रहा है लेकिन हमारी न्यायिक व्यवस्था नहीं बदल पा रही है. औनलाइन बिजनैस, इंटरनैट बैंकिंग, दुनियाभर की खबरें पलपल अपडेट हो रही हैं लेकिन परिवर्तन के इस दौर में अदालतों में मुकदमे वर्षों से लंबित हैं.’

अपने इस कथन को स्पष्ट करते उन्होंने अपनी ही अदालत में आए तलाक के एक मुकदमे का हवाला दिया था जिस में तलाक चाहने वाले पति की उम्र 77 और पत्नी की उम्र 73 साल हो गई थी. ये दोनों 40 साल से तलाक के लिए अदालतदरअदालत भटक रहे थे. इस कार्यशाला में कानून की दुनिया की देश की दिग्गज नामी हस्तियां शामिल हुई थीं, पर ऐसा लगता नहीं कि किसी को भी इस कथित खुलासे से कोई हैरानी हुई होगी या बूढ़े हो गए पतिपत्नी से किसी तरह की हमदर्दी पैदा हुई होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे मंजर हर कोई रोजरोज देखता है. जज अपनी अदालत में और वकील अपने चैंबर में हैरानपरेशान पतिपत्नियों को देखने के आदी हो चुके हैं.

तलाक जैसे संवेदनशील मसले पर देरी क्यों, इस का पूरा ठीकरा जस्टिस मिश्रा ने सीधे वकीलों के सिर फोड़ते कहा था कि मुकदमे को लंबित करने में सब से ज्यादा दोषी वकील हैं जो ज्यादा फीस ?ाटकने की गरज से पेशियों की तारीखें बढ़वाते रहते हैं. न्याय की आस में भटकते मुवक्किलों का भरोसा न्यायिक व्यवस्था से उठ जाता है.

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तलाक के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि वकील भी लौर्ड होते हैं जो खुद मध्यस्थता कर के तलाक चाहने वाले दंपती को 6 महीने में संबंधविच्छेद करा सकते हैं लेकिन उन्हें स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर देने के बजाय वकील तलाक के मुकदमे को और उल?ा देते हैं. वे मारपीट, यातनाएं देना, दहेजउत्पीड़न जैसे आरोप लगा कर सरलता से सुल?ा सकने वाले मामलों को जटिल और पेचीदा बना देते हैं.

अदालतें भी दूध की धुली नहीं

बात चूंकि एक जस्टिस ने कही थी, हालांकि वह आधी हकीकत आधे फसाने जैसी थी, फिर भी किसी वकील ने विरोध नहीं किया. विरोध किया भी तो भोपाल के एक पत्रकार योगेश तिवारी ने इस प्रतिनिधि से यह कहते कि तलाक के मुकदमों का फैसला निचली अदालतों से 3 और ज्यादा से ज्यादा 4 साल में हो ही जाता है.

हालांकि यह भी ज्यादा है लेकिन गाड़ी फंसती है ऊपरी अदालतों में जा कर, जहां जज साहिबान के पास तलाक के मारे पतिपत्नियों की फाइल देखने तक का वक्त नहीं होता. जो किसी एक पक्ष को स्टे और्डर लौलीपौप की तरह थमा देती हैं और मान लेती हैं कि न्याय हो गया. अब दूसरे पक्ष को, ‘कभी मिली फुरसत तो देखा जाएगा…’ वाले गाने की तर्ज पर जब वक्त मिलेगा तब सुनेंगे.

असल में खुद योगेश के तलाक का मुकदमा चल रहा है. निचली अदालत से तो 4 साल में तलाक की डिक्री मिल गई थी लेकिन पत्नी ने हाईकोर्ट जा कर स्टे और्डर ले लिया. 10 साल से योगेश जल्द सुनवाई की अर्जी लगा रहे हैं पर उन की फाइल बजाय ऊपर आने के, नीचे कहीं धंसती जा रही है.

14 साल से हैरानपरेशान योगेश अब सम?ा नहीं पा रहे कि क्या करें और कहां जाएं. आमतौर पर तलाक का मुकदमा लड़ रहे पतिपत्नी मीडिया के सामने अपना नाम व पहचान छिपाते हैं लेकिन योगेश इसे उजागर करते हैं क्योंकि यह उन की नहीं, बल्कि कानून की खामी है जिस से आम लोगों को परिचित होना जरूरी है.

मंशा यह है कि रोग छिपाएंगे तो वह जड़ पकड़ेगा और एक मीडियाकर्मी की यह महती जिम्मेदारी है कि वह विसंगतियों को उजागर करे. इस बाबत उन्होंने कुछ दिनों पहले भोपाल में एक प्रैस कौन्फ्रैंस कर अपनी पीड़ा उजागर भी की थी.

बकौल योगेश, उन की शादी 30 साल की उम्र में हुई थी. 4 साल बाद क्रूरता के आधार पर उन के हक में तलाक हो गया. अब वे 44 साल के हो रहे हैं. उन के 86 साल के पिता को कैंसर, शुगर और हार्ट की गंभीर बीमारियां हैं. 76 वर्षीया मां अस्थमा की मरीज हैं. पेरैंट्स की सेवा करने वाले वे अकेले हैं. कुछ दिनों पहले उन का ऐक्सिडैंट हुआ तो वे घबरा उठे. उन्हें जीवनसाथी की जरूरत महसूस हुई लेकिन मामला हाईकोर्ट में अटका पड़ा था, इसलिए वे दूसरी शादी नहीं कर सकते थे. अपनी वैवाहिक स्थिति को ले कर वे असमंजस में हैं कि खुद को तलाकशुदा, विवाहित मानें या फिर अविवाहित.

हाईकोर्ट के चक्कर लगा कर थकहार चुके योगेश ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को औनलाइन पत्र लिख कर दूसरी शादी की इजाजत मांगी जो इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक नहीं मिली थी.

योगेश कहते हैं, ‘‘हाईकोर्ट में कभी तारीख बढ़ जाती थी तो कभी जज साहब बदल जाते थे पर इस में मेरा क्या दोष, यह बताने वाला कोई नहीं. क्या मु?ो हक नहीं कि मैं आम लोगों सरीखी जिंदगी जी सकूं. मेरी अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और दीगर दर्जनों किस्म की जरूरतें हैं लेकिन मैं 14 साल से एक ऐसी सजा भुगत रहा हूं जिसे किसी अदालत ने विधिवत नहीं सुनाया. मेरी जिंदगी और जवानी के ये सुनहरे साल कौन मु?ो लौटा पाएगा, इस का जवाब भी किसी सैमिनार या वर्कशौप में किसी जस्टिस द्वारा दिया जाना चाहिए.’’

जाहिर है, तलाक का मुकदमा लड़ रहे पतिपत्नी की हालत विचाराधीन कैदियों जैसी हो जाती है जिन के लिए पूरी दुनिया ही खुली जेल सी लगने लगती है.

विदिशा की 26 वर्षीया खुशबू सक्सेना (आग्रह पर बदला हुआ नाम) का तलाक का मुकदमा चलते 4 साल हो गए हैं. खुशबू ने एक मराठी युवक से लवमैरिज की थी. ज्यादा नहीं 3 महीने बाद ही उसे इस बात में कोई शक नहीं रह गया कि उस की मैरिड लाइफ की गाड़ी कुछ दूर चल कर पंचर हो गई है.

खुशबू को पुणे की एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करते एक सहकर्मी से प्यार हो गया था. शादी की बात घर में की तो मम्मीपापा ?ाट तैयार हो गए. उन्हें दामाद के दूसरे समुदाय या जाति से होने का कोई मलाल या एतराज नहीं था, इसलिए तुरंत धूमधाम से शादी हो गई. पति से विवाद के बाद तलाक के लिए वह अदालत गई तो साथ में सिर्फ पापा थे और अच्छी बात यह थी कि इन मुश्किल दिनों में भी बेटी को सपोर्ट कर रहे थे. और तो और, उन्होंने बेटी के लिए दूसरा लड़का ढूंढ़ना शुरू भी कर दिया था. खुशबू पापा का साथ मिलने से उत्साहित थी और उम्मीद करने लगी थी कि एक शादी का टूटना जिंदगी का खत्म होना नहीं होता.

अब 4 साल बाद उस के विचार बदल रहे हैं. तलाक के मुकदमे की पीड़ा भुगत रही खुशबू मासूमियत से पूछती है कि इतनी देर क्यों, शादी तो रातभर में हो गई थी तो तलाक एक पेशी में दिनभर में क्यों नहीं हो सकता. मैं ने वैवाहिक बंधन, जो जकड़न बन गया था, से मुक्ति चाही थी पर यहां तो कानूनी बंधनों से और बंध गई. एक नहीं, लाखों खुशबुएं और योगेश जाते तो नमाज माफ कराने के लिए हैं लेकिन उन के गले रोजे पड़ जाते हैं.

अपमान, तिरस्कार, अकेलापन, ज्यादा खर्च, अनिश्चितता, तनाव और ताने तो तलाक का मुकदमा लड़ने वालों के हिस्से में मुफ्त में एक के साथ 5 फ्री की तरह आते हैं, बाकी रहीसही कसर कानून और अदालतें पूरी कर देते हैं. बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि कुछ लोग ही हैं जो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जा पाते हैं क्योंकि उन के पास लड़ने के लिए पैसा होता है और जिन के पास नहीं होता वे मुंह छिपा कर अकेले गुजर कर रहे होते हैं. कहनेबताने की जरूरत नहीं कि युवतियों को क्याक्या नहीं करना पड़ता होगा.

तुरंत तलाक क्यों नहीं

इन तीनों मामलों में किरदार अलगअलग हैं लेकिन हालात वही हैं जो शायद यही कहते हैं कि यह तलाक नहीं आसां, एक कानून का दरिया है और डूब कर जाना है. पूनम के मामले में क्या गड़बड़ थी, असल में फैसला गवाहियों की बिना पर हुआ. जबकि होना यह चाहिए कि अदालत सिर्फ पतिपत्नी की बात सुने क्योंकि तलाक वे चाहते हैं. मुमकिन है कोई एक पक्ष ?ाठ बोले या गंभीर आरोप दूसरे पर लगाए, तो भी यह बात तो साबित हो ही जाती है कि दोनों अब साथसाथ नहीं रह सकते. लिहाजा, उन्हें वैवाहिक बंधन, जो उन के लिए घुटन बन गया था, से आजाद कर दिया जाए ताकि वे अपनी मरजी से जिंदगी जी सकें.

योगेश के मामले से कानून की एक खामी बिलकुल साफ स्पष्ट होती है कि हाईकोर्ट द्वारा स्थगन आदेश दिए जाने की है जो अव्यावहारिक और गैरजरूरी है क्योंकि तलाक निचली अदालत दे चुकी है. हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तलाक नहीं देते, वे सिर्फ निचली अदालत के फैसले की समीक्षा करते हैं. कोई भी तलाक गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि तमाम आरोपप्रत्यारोपों के बाद भी पतिपत्नी का साथ रहना संभव नहीं होता. तलाक के बाद अगर उन्हें कभी लगे कि वे साथ रह सकते हैं तो कोई उन्हें रोकता नहीं है और न ही दोबारा शादी करने से रोक सकता है.

तो फिर समीक्षा किस बात की और किस मुद्दे पर स्टे, उस पर भी मजाक यह कि दूसरे पक्ष को सालोंसाल सुना ही नहीं जा रहा. बस, हर पेशी पर अगली तारीख थमा दी जाती है. यह वकील की नहीं, बल्कि जज और कानून की खामी है. जब लोग शादी करने के लिए अदालत नहीं जाते तो तलाक के लिए जाने को क्यों बाध्य हैं, इस सवाल का जवाब कोई ढूंढ़ पाए तो लाखों दंपतियों को घुटन और तनाव से छुटकारा मिल जाएगा.

लेकिन कोई चाहे तब न, लगता ऐसा है कि हर किसी ने विवाह व्यवस्था को बनाए रखने का ठेका ले रखा है, जिस की लागत लाखोंकरोड़ों पतिपत्नियों का गिरवी रखा सुख है. बड़े फख्र से कहा जाता है कि भारत में तलाक दर सब से कम 1.3 फीसदी के लगभग है. यह कोई नहीं सोचता कि यह कम तलाक दर इसलिए है कि लोग अदालती घुटन से ज्यादा पारिवारिक घुटन में रहना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि तलाक बड़ी कठिनाइयों के बाद मिलता है और उस में सालोंसाल भी लग जाते हैं.

जो लोग अदालत गए, उन में से अधिकतर के अनुभव सामने हैं कि वे घर के रहे न घाट के तो फिर तलाक तुरंत क्यों नहीं? खुशबू के इस सवाल का दर्द हर किसी को सम?ाना होगा कि एक युवती जिंदादिली से जीना चाहती है लेकिन कानून उसे यह मौका नहीं दे रहा बल्कि 4 साल से उसे यह एहसास करा रहा है कि भारतीय और उस में भी हिंदू विवाह व्यवस्था एक मजबूत और पुख्ता संस्कार है जिस पर अमल न करने से परेशानियां और बढ़ती हैं.

धर्म और संस्कार भी जिम्मेदार

विवाह को धार्मिक संस्कार प्रचारित करने वाले धर्म के दुकानदार भी कानून के ठेकेदारों से उन्नीस नहीं हैं, जिन की मंशा किसी भी कीमत पर शादी को जोड़े रखने की होती है. शायद ही किसी धर्मगुरु ने समारोहों में यह कहा हो कि जब वैवाहिक जीवन दुष्कर हो जाए तो पतिपत्नी का तलाक ले लेना एक नई और बेहतर जिंदगी की तरफ पहला कदम होगा. उलटे, ये लोग प्रवचनों और धार्मिक उदाहरणों के जरिए महिलाओं पर दबाव बनाते हैं.

अपनी वैवाहिक जिंदगी को सुखमय बनाए रखने के लिए महिलाओं को तरहतरह के व्रत रखने और गौरीशंकर, रामसीता के उदाहरण दिए जाते हैं जिन का सार यह कि मनचाहा पति और सुखद दांपत्य मुफ्त में नहीं मिल जाते. इस के लिए पत्नी को ही त्याग करना पड़ता है. जबकि, पति चाहे तो बिना किसी ठोस वजह या गलती के पत्नी का त्याग कर दे. यह उस का हक है. इस हक को तोड़ा था ‘हिंदू कोड बिल’ ने, जो पहली दफा 11 अप्रैल, 1947 को संविधान सभा के %

Winter 2022: इन 3 तरीकों से बनाएंगे दलिया तो नहीं होंगे बोर

दलिया वेजिटेबल खिचड़ी पोषक तत्वों से भरपूर है. इसमें गाजर और गोभी का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिससे इसकी नूट्रिशनल, विटामिन और फाइबर की मात्रा और भी बढ़ गई है. तो चलिए जानते हैं, दालिया की  3 रेसिपी.

  1. रोस्टेड दलिया सलाद

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सामग्री

– दही (1 कप)

– दलिया (1 कप भुना हुआ)

– स्टीम वैजिटेबल्स (बींस, गाजर, स्वीट कौर्न, ब्रोकली, शकरकंदी 1 कप)

– प्याज (1 कटा हुआ)

– टमाटर (1 कटी हुई)

– हरीमिर्च (1 कटी हुई)

– उबले मटर (1/2 कप)

– धनियापत्ती कटी (1 बड़ा चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

बनाने की विधि

– दलिए में 1/2 कप पानी डाल कर प्रैशर कुक कर लें.

– एक बरतन में उबला दलिया, स्टीम वैजिटेबल्स, मटर, हरीमिर्च, प्याज, टमाटर, दही व नमक मिलाएं.

– धनियापत्ती डाल कर परोसें.

2.  दलिया वेजिटेबल खिचड़ी

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सामग्री

दलिया (1/2 कप)

मूंगदाल (1/2 कप)

मिक्स वेजिटेबल्स (1 कप, टुकड़ों में कटा हुआ गाजर, गोभी, फ्रेंच बीन्स, मटर)

कालीमिर्च (3)

लौंग (3)

दाल​चीनी स्टिक (1)

तेजपत्ता (1)

जीरा (कम मात्रा में)

प्याज (1/4 कप)

लाल​ मिर्च पाउडर (2 टी स्पून)

जीरा पाउडर (1 टी स्पून)

धनिया पाउडर (2 टी स्पून)

हल्दी पाउडर (एक चुटकी)

तेल (1 टी स्पून)

नमक (स्वादानुसार)

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बनाने की वि​धि

दलिये को 6 से 8 घंटे के लिए भिगो दें, फिर इसका पानी निकालकर अलग कर लें.

एक प्रेशर कुकर में तेल डालकर गरम करें, इसमें कालीमिर्च, लौंग, दालचीनी, तेजपत्ता और जीरा डालकर चटकने दें.

इसमें प्याज और इसे हल्की नरम होने दें.

इसमें सब्जियां डालकर 2 से 3 मिनट के लिए भूनें.

इसमें दलिया, मूंग दाल, लाल मिर्च पाउडर, जीरा पाउडर, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर और नमक डालकर अच्छी तरह मिला लें.

1/2 कप पानी डाले, अच्छे से मिलाकर इसमें उबाल आने दें.

खिचड़ी को प्रेशर कुकर में 10 मिनट के लिए पकने दें.

और इसे गर्मागर्म सर्व करें.

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3. जानें, कैसे बनाएं मीठा दलिया

daliya

सामग्री :

– गेंहू का दलिया (01 कप)

– दूध ( 01 कप)

– शक्कर (02 बड़े चम्मच)

– मक्खन/घी (02 छोटे चम्मच)

– हरी इलायची (02 नग)

दलिया बनाने की विधि :

– सबसे पहले दलिया को बीन लें और उसकी गंदगी आदि साफ कर लें.

– इसके बाद गैस पर कुकर गरम करें.

– गर्म होने पर उसमें मक्खन डालें.

– जब मक्खन पिघल जाये, उसमें इलायची डालें और हलका सा चला लें.

– इसके बाद कुकर में दलिया डाल दें और चलाते हुए हल्का रंग बदलने तक भून लें.

– दलिया भुन जाने पर कुकर में दूध, दलिया का 3 गुना पानी (1 कप दलिया होने पर 3 कप पानी) और शक्कर डाल दें और कुकर का ढ़क्कन बंद करके धीमी आंच पर पकायें.

– दलिया को लगभग 3 मिनट तक पकने दें, इसके बाद गैस बंद कर दें और कुकर की गैस अपने आप      निकलने दें.

लीजिये, अब आपकी स्वादिष्ट दलिया तैयार है.

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Satyakatha: जीजा के प्यार में खूनी बनी साली

सौजन्य: सत्यकथा

खंडवा थाने की रामनगर चौकी के प्रभारी एसआई सुभाष नावडे, को 29 जून, 2021 की सुबह 9
बजे किसी ने सूचना दी कि चीराखदान तालाब में एक लाश तैर रही है. यह लाश तालाब के पास खेलते हुए बच्चों ने देखी थी. सूचना मिलने के बाद चौकी इंचार्ज सुभाष नावड़े ने सूचना टीआई बी.एल. मंडलोई को दे दी और वह टीम के साथ उस तालाब के पास पहुंच गए, जहां लाश पड़ी होने की खबर मिली थी.

पुलिस ने सब से पहले लाश को पानी से बाहर निकलवाया. वह लाश चादर के साथ चटाई में लिपटी थी. थोड़ी देर में खंडवा थाने के टीआई बी.एल. मंडलोई वहां पहुंच गए. वह अर्द्धनग्न लाश किसी युवक की थी. पुलिस उस लाश की जांच करने में जुट गई. उस के सिर, गले और हाथ पर धारदार हथियार के निशान थे. तब तक आसपास भीड़ भी लग चुकी थी. संयोग से भीड़ में से एक व्यक्ति ने लाश की पहचान संजय बामने उर्फ संजू के रूप में की.कुछ समय में वहां रोती हुई पहुंची महिला ने पुलिस को बताया कि लाश उस के पति की है और उस का नाम शबाना है.

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बरामद लाश को देख कर इतना तो साफ हो गया था कि उस की हत्या कर तालाब में फेंकी गई थी. उस का घर नजदीक के माता चौक पर मल्टी में बताया गया. इस की सूचना मिलते ही मृतक का भाई और परिवार के अन्य सदस्य भी वहां पहुंच गए. उन्होंने ही बताया कि शबाना संजय की ब्याहता पत्नी नहीं है, बल्कि वह उस के साथ पिछले 2 सालों से लिव इन में रह रही थी. उन्होंने हत्या का सीधा आरोप शबाना पर ही मढ़ दिया. घर वालों से शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

एसपी (खंडवा) ललित गठरे ने इस केस का खुलासा करने के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. टीम में टीआई बी.एल. मंडलोई, एसआई राजेंद्र सोलंकी, चौकी इंचार्ज (रामनगर) सुभाष नावड़े, परिणीता बेलेकर, एएसआई रमेश मोरे, हिफाजत अली, हैड कांस्टेबल ललित कैथवास, पंकज सोलंकी, कांस्टेबल ब्रजपाल चंदेल, आकाश जादौन, लक्ष्मी चौहान, निकता तिवारी आदि को शामिल किया.

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आगे की जांच के लिए पुलिस मल्टी पहुंची, जहां मृतक संजय शबाना के साथ रहता था. टीआई मंडलोई ने उस के घर का बारीकी से मुआयना किया, वहां उन्हें खून के कुछ धब्बे मिले. उन में कुछ धब्बे मिटाने के भी निशान थे. वहीं शबाना की 13 वर्षीया बेटी मिली. वह काफी घबराई हुई थी. कुछ पड़ोसी भी मौजूद थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि शबाना और संजय के बीच अकसर झगड़ा होता रहता था. संजय खूब शराब पीता था, शराब के नशे में शबाना के साथ वह मारपीट किया करता था.

इस के अलावा घर में शबाना के बहनोई हाकिम का भी आनाजाना था. यह बात संजय को पसंद नहीं थी. हाकिम के जाने के बाद संजय शबाना पर बेहद नाराज होता था.इस जानकारी के आधार पर ही सीएसपी ललित गठरे ने शबाना और उस के बहनोई हाकिम को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. पूछताछ के दौरान दोनों ने घुमाफिरा कर जवाब दिए. उन की बातों से पुलिस ने अंदाजा लगा लिया कि यह दोनों बहुत कुछ छिपा रहे हैं और हत्या की जानकारी देने से बचना चाहते हैं.

पुलिस ने जब उन के साथ थोड़ी सख्ती की और संजय के घर से बरामद सामान दिखाए तो वे दोनों टूट गए. फिर उन्होंने राज की सारी बातें बता दीं. उस में जीजासाली के बीच प्रेम कहानी का खुलासा हुआ. साथ ही उन की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किए गए ब्लेड, खून लगा सिलबट्टा और खून सने कपड़े बरामद कर लिए. शबाना और हाकिम की प्रेम कहानी के साथ शबाना और संजय के लिवइन रिलेशन की जो कहानी सामने आई वह इस प्रकार है—

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कहानी की शुरुआत शबाना, उस की 32 वर्षीया बड़ी बहन जायरा और 46 वर्षीय हाकिम से होती है. बात तब की है, जब शबाना महज 16 साल की थी. वह खुद से करीब दोगुने उम्र के हाकिम से इश्क कर बैठी थी.
उन की मोहब्बत पर उम्र के अंतर का कोई असर नहीं था. दोनों एकदूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे.
शबाना हाकिम को अपना सब कुछ सौंप चुकी थी.

वे निकाह भी करना चाहते थे, लेकिन जब इस की जानकारी उस के परिवार को हुई तब उन्होंने उम्र के अंतर को देखते हुए उस की बड़ी बहन जायरा का विवाह हाकिम से कर दिया. उस के बाद हाकिम शबाना का प्रेमी से जीजा बन गया. हाकिम खूबसूरत जायरा को पा कर बेहद खुश हुआ, लेकिन उस के लिए शबाना को दिल से निकलना मुश्किल हो रहा था.

जायरा जीजासाली के प्रेम संबंध को जानती थी, फिर भी उस ने हाकिम के साथ निकाह इसलिए कर लिया था कि उस की छोटी बहन शबाना ने उस से वादा किया था कि वह उस की खुशी के लिए अपने इश्क को दफन कर देगी. वह उन की जिंदगी से दूर चली जाएगी. दूसरी तरफ जायरा ने हाकिम पर ऐसी लगाम लगाई कि वह चाह कर भी शबाना से नहीं मिल पाता था.

जल्द ही शबाना का भी एक युवक के साथ निकाह हो गया, उस के बाद शबाना अपने वादे के मुताबिक जायरा और हाकिम की जिंदगी से दूर चली गई. उस की अपनी अलग गृहस्थी और दुनिया बस गई थी.
10 सालों के दौरान शबाना 3 बच्चों की मां भी बन गई. हालांकि शबाना अपने शौहर के व्यवहार से दुखी रहती थी, कारण शौहर को उस के निकाह से पहले के प्रेम संबंध की आधीअधूरी जानकारी हो चुकी थी.
वह बारबार उस को अतीत के प्रेम को ले कर ताने देता था. जब भी किसी घरेलू मसले पर विवाद होता, तब बहस के दौरान कई बार उस ने गुस्से में कह दिया था कि वह अपने प्रेमी हाकिम के पास ही चली जाए.

पति की यह बात शबाना को न केवल चुभ जाती थी, बल्कि इस से उस की पुरानी मोहब्बत की यादें भी ताजा हो जाती थीं. वह एकदम से तिलमिला जाती थी. बारबार की इस चिकचिक से उस ने एक दिन शौहर से अलग रहने का निर्णय ले लिया और अपनी 10 साल की बेटी के साथ अलग रहने लगी. 2 बच्चे उस ने शौहर के पास ही छोड़ दिए.किशोरावस्था से ही इश्क का स्वाद ले चुकी शबाना के लिए किसी नए प्रेमी की तलाश करना मुश्किल नहीं था. जल्द ही उसे संजय बामने नाम का युवक मिल ही गया.
संजय उम्र में छोटा था तो क्या हुआ वह उस की भावना को समझता था और उस के सेक्स की भूख भी मिटाता था.

जल्द ही संजय भी खुद से बड़ी उम्र की प्रेमिका को जीजान से प्यार करने लगा. अपना घरबार छोड़ कर बगैर शादी किए हुए शबाना के साथ रामनगर मल्टी में किराए के मकान में रहने लगा था.कुछ समय तक संजय और शबाना के बीच लिवइन की मधुरता बनी रही, लेकिन उन के रिश्ते में खटास तब आ गई जब शबाना का पूर्व प्रेमी यानी उस का जीजा हाकिम उस की जिंदगी में वापस आ गया.दरअसल, हाकिम ने जायरा से निकाह करना इसलिए स्वीकार कर लिया था, क्योंकि तब उसे लगा था कि शबाना उस से पहले की तरह ही मिलतीजुलती रहेगी. लेकिन ऐसा नहीं होने पर हाकिम उस की याद में बेचैन हो गया. जब उसे शबाना के अकेली रहने के बारे में मालूम हुआ, तब उस ने उस से मिलने की योजना बना ली.

हालांकि शबाना और हाकिम के मिलने की राह में जायरा रोड़ा बनी हुई थी. बावजूद इस के लंबे समय बाद जब हाकिम अपनी साली और पुरानी प्रेमिका शबाना से मिलने उस के पास गया तब उस ने उसे बाहों में भर लिया. उस ने हाकिम की खूब आवाभगत की. उस की खिदमतगारी में कोई कोर कसर नहीं रहने दी. उन का अधूरा मोहब्बतनामा फिर से लिखा जाने लगा. लेकिन इस की जानकारी भी संजय को जल्द हो गई.

शबाना अब 2-2 प्रेमियों के साथ लिव इन में रह रही थी. लेकिन लंबे समय तक इस तरह रहना आसान नहीं था. संजय ही शबाना के घरेलू खर्च और उस की बेटी के पालनपोषण का जिम्मा उठाए हुए था.
संजय को यह बात पता चल गई थी कि शबाना के पास उस का जीजा हाकिम भी आता है. इसलिए उस ने शबाना से साफसाफ कह दिया कि अपने घर में किसी दूसरे मर्द को वह नहीं देखना चाहता. इस पर शबाना ने रिश्ते की बात कह कर कुछ समय तक संजय को बहला दिया. फिर भी संजय ने हिदायत दी कि उस के नाजुक रिश्ते में किसी की भी दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए. यदि ऐसा होता रहा तो वह हरगिज बरदाश्त नहीं करेगा.

संजय की सख्ती और फरमानों को ले कर शबाना उस से नाराज रहने लगी. संजय की एक बुरी आदत शराब पीने की भी थी. शबाना उसे हमेशा कहती थी कि वह घर में शराब न पीए. उस की बड़ी हो रही बेटी भी साथ में रहती है. उस पर बुरा असर पड़ेगा.जब से संजय और शबाना के बीच हाकिम को ले कर मतभेद उभरे थे, तब से संजय के शराब पीने की आदत बढ़ गई थी. बाहर तो पीता ही था, रात में भी घर आ कर भी बोतल खोल लेता था.

एक दिन तो संजय ने हद ही कर दी. शराब पी कर आया और आते ही शबाना का गुस्सा उस की बेटी पर निकालने लगा. उसे बुरी तरह से डांटनेफटकारने लगा. उस के पकाए खाने में कमियां निकालने लगा.
जब शबाना ने इस का विरोध किया और कहा कि वह ऐसा न करे, तब संजय ने उस पर हाथ उठा दिया. उस रोज संजय ने मांबेटी दोनों की शराब के नशे में पिटाई कर दी.इस मारपीट में शबाना की बेटी के सिर में चोट भी आ गई और शबान भी जख्मी हो गई. गनीमत यह रही कि घर में डिटौल रखी थी, जिस से अपने और बेटी की चोटों के खून को बंद करने में सफल रही.

सुबह होने पर संजय ने उन से रात की मारपिटाई को ले कर माफी मांग ली और अच्छी तरह से मरहमपट्टी के लिए पैसे दे कर चला गया. साथ में हिदायत भी दी कि इस बारे में किसी को भी न बताए.2 दिनों तक तो घर में शांति बनी रही, लेकिन तीसरे दिन संजय फिर शबाना से दिन में ही उलझ गया. पड़ोसियों ने आ कर उसे समझाया तब गुस्से में चला गया. उसी रोज हाकिम भी शबाना से मिलने आया. शबाना और उस की बेटी ने रोरो कर संजय की ज्यादती उस से बयां की.हाकिम यह सुन कर सन्न रह गया. उस ने शबाना को आस्वस्त किया कि वह इस का समाधान जल्द निकालेगा. इतना कह कर वह वहां से चला गया, लेकिन उस के मन में साजिश की योजना बन रही थी.

उसी के अनुसार 28 जून, 2021 की तारीख मुकर्रर की गई. कैसे योजना को अंजाम देना है, इस बारे में शबाना से बात कर ली. फिर 22 तारीख की आधी रात को शबाना ने हाकिम को फोन कर के अपने घर बुला लिया. हाकिम बताए समय पर आ गया. फिर उस ने गहरी नींद में सो रहे संजय के सिर पर मसाला पीसने वाला सिलबट्टा दे मारा. सिलबट्टे के हमले से संजय बेहोश हो गया. फिर हाकिम और शबाना ने मिल कर उस के गले को सर्जिकल ब्लेड से काट डाला. वह ब्लेड हाकिम अपने साथ ले कर आया था.
संजय की हत्या के बाद सुबह के 4 बजे हाकिम ने संजय की लाश पहले अच्छी तरह चादर में लपेटी फिर चटाई में बांध कर पास के चीराखदान तालाब में फेंक आया.

घर पर शबाना ने घर में बिखरे खून के धब्बे साफ किए. अगले रोज 29 जून, 2021 को पुलिस ने तालाब से संजय की लाश बरामद कर ली.इस हत्याकांड की जांच पूरी होने के बाद हाकिम और शबाना पर हत्या एवं सबूत मिटाने की धाराएं लगा कर फाइल तैयार कर ली गई. जांचकर्ता पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया, वहां से उन्हें अपराध का दोष साबित होने तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

लिंग परिवर्तन का बढ़ता प्रचलन

किसी के मौलिक हकों का चीरहरण न करना और किसी की किसी भी तरह की गुलामी बरदाश्त न करना स्वतंत्रता है. हम अपना जीवन किसी के हाथों गिरवी न रख कर उसे अपने ढंग से जीने के लिए स्वतंत्र हैं. इस सच को नैसर्गिक नियम भी स्वीकार करते हैं और संवैधानिक प्रावधान भी. लिंग परिवर्तन के मामले विदेशों में तो होते ही रहे हैं पर अब देश में भी लिंग परिवर्तन होने लगे हैं. भले ही समाज ऐसे लोगों को हेयदृष्टि से देखे पर ये अपनेआप में संतुष्ट रहते हैं. ऐसा ही एक मामला हाल ही में देखने को मिला. जी हां, इंडियन एयरफोर्स के एक अधिकारी से प्यार करने वाले 21 वर्षीय युवक विधान बरुआ को मुंबई उच्च न्यायालय ने सैक्स चेंज करवा कर युवती बनने की इजाजत दे दी. अब वह स्वैच्छिक वैवाहिक जीवन जी सकेगा. ऐसे लोग, जो खुद को उस लिंग का नहीं पाते, जिस के वे हैं, तो उम्र भर अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर रहते हैं. वे समाज के ठेकेदारों के कारण खुद का सच सार्वजनिक करने का साहस नहीं कर पाते. लेकिन अब लोगों ने साहस दिखाना शुरू किया है.

17 अप्रैल, 2012 को बरुआ को अपनी सर्जरी करवानी थी, लेकिन पारिवारिक विरोध के चलते वे सर्जरी नहीं करा पाए. अगर इस तरह के अन्य मामलों पर नजर डालें, तो परिवार वालों की ओर से ट्रांसजैंडर को जायदाद से बेदखल करने की भी धमकियां दी जाती हैं, लेकिन ऐक्सपर्ट्स की मानें, तो पुरुष से महिला बनने पर ट्रांसजैंडर को मिलने वाली पारिवारिक प्रौपर्टी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि उस ने अपना सैक्स चेंज कर लिया है, क्योंकि पुरुष और महिला में ऐसा कोई फर्क नहीं है. हालांकि अगर परिवार वाले चाहें, तो उसे उस प्रौपर्टी से बेदखल कर सकते हैं, ऐसा करने का उन्हें राइट है.

‘रोज’ बना देश की पहली पब्लिक फिगर

रोज वेंकटेश देश की पहली ट्रांसजैंडर टीवी होस्ट हैं. उन्हें देश की पहली पब्लिक फिगर माना जाता है. रोज ने अपना सैक्स चेंज करने के लिए सर्जरी कराई. 30 वर्षीय रोज ने बैंकौक में सैक्स रीसाइन्मैंट सर्जरी कराई. रोज के सैक्स चेंज करने के क्रेज का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी सर्जरी की तारीख को फर्स्ट बर्थडे के रूप में सैलिब्रेट किया.

सरेंडर करता समाज

प्लास्टिक सर्जनों के मुताबिक उन के पास अब साल में 4-5 केस सैक्स चेंज के आ रहे हैं, जबकि कुछ साल पहले तक ऐसा एक भी केस नहीं आता था. भारत में कुछ ऐसे मामले सुर्खियों में रहे हैं और समाज ने भी कुछ खास रिऐक्ट नहीं किया. साउथ में तो बाकायदा एक ऐसा शख्स टीवी शो भी होस्ट कर रहा है. पिछले दिनों मिस यूनिवर्स फाउंडेशन ने कनाडा के एक मेल से फीमेल बनी ब्यूटी क्वीन को मिस यूनिवर्स कंपीटिशन में हिस्सा लेने की इजाजत दी थी. वहीं इंगलैंड में भी एक ट्रांसजैंडर मिस इंगलैंड के ताज के काफी करीब पहुंच गया था.

सैक्स चेंज दिमागी फुतूर नहीं

भले ही समाज सैक्स चेंज कराने को दिमागी फुतूर मानता हो, लेकिन ऐक्सपर्ट्स का मानना है कि यह जैंडर आइडैंटिटी डिसऔर्डर है. प्लास्टिक सर्जनों के अनुसार सैक्स चेंज दिमागी फुतूर नहीं, बल्कि एक मैडिकल प्रौब्लम है. कई रिसर्च में साबित हो चुका है कि यह जेनेटिक और यूरोलौजिकल प्रौब्लम है, जिस के कारण कई बार पेशैंट डिप्रैशन में भी चला जाता है. जो खुद को अपने मौजूदा जैंडर के अपोजिट फील करता है, सब से पहले मनोचिकित्सक उस की काउंसिलिंग करता है. उस की फैमिली, फ्रैंड्स और औफिस में भी उस के बारे में लोगों से बात की जाती है. सैकंड स्टेज में हारमोन स्पैशलिस्ट बौडी एलाइनमैंट के लिए पेशैंट को उस की चौइस के जैंडर के हिसाब से हारमोन देना शुरू करता है. सबकुछ ठीक होने पर प्लास्टिक सर्जन सर्जरी करता है. मेल टू फीमेल सैक्स चेंज करने के लिए 2 और फीमेल टू मेल सर्जरी करने के लिए 3 सर्जरी करानी पड़ती हैं.

एक रिसर्च की मानें तो नौर्मल कंडीशन में नौर्मल के मुकाबले ट्रांसजैंडर्स के मरने की आशंका पांचगुना ज्यादा होती है.

खुशहाल जिंदगी जीते हैं

साइबर वर्ल्ड में ऐसे लोगों का बाकायदा एक ग्रुप है. यहां वे अपने अनुभव शेयर करते हैं. सैक्स चेंज ऐसी सर्जरी है, जिस के बाद पुरानी चीजें वापस नहीं पाई जा सकतीं. ऐसे में सैक्स चेंज कराने वालों को वर्षों तक काउंसिलिंग की जरूरत होती है. ऐक्सपर्ट्स के मुताबिक इस के कुछ साइड इफैक्ट्स भी हो सकते हैं. मनोचिकित्सक डा. समीर पारिख कहते हैं, ‘‘अगर कोई इंसान अपना सैक्स चेंज करना चाहता है, तो उस से पहले उस की प्रौपर काउंसिलिंग की जाती है. आमतौर पर ऐसे लोग खुशहाल जिंदगी जीते हैं.’’

कोई अपना -भाग 1: मधु ने शालीनी से मुंह क्यों मोड़ा

स्थानांतरण के बाद जब हम नई जगह आए तो पिछली भूलीभटकी कई बातें अकसर याद आतीं. कुछ दिन तो नए घर में व्यवस्थित होने में ही लग गए और कुछ दिन पड़ोसियों से जानपहचान करने में. धीरेधीरे कई नए चेहरे सामने चले आए, जिन से हमें एक नया संबंध स्थापित करना था.

मेरे पति बैंक में प्रबंधक हैं, जिस वजह से उन का पाला अधिकतर व्यापारियों से ही पड़ता. अभी महीना भर ही हुआ था कि एक शाम हमारे घर में एक युवा दंपती आए और इतने स्नेह से मिले, मानो बहुत पुरानी जानपहचान हो.

‘‘नई जगह पर दिल लग गया न, भाभीजी? हम ने तो कई बार सुनीलजी से कहा कि आप को ले कर हमारे घर आएं. आप आइए न कभी, हमारे साथ भी थोड़ा सा समय गुजारिए.’’ युवती की आवाज में बेहद मिठास थी, जो कि मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही थी. इतने प्यार से ‘भाभीभाभी’ की रट तो कभी मेरे देवर ने भी नहीं लगाई थी.

मेरे पति अभी बैंक से आए नहीं थे, सो मुझे ही औपचारिकता निभानी पड़ रही थी. नई जगह थी, सो, सतर्कता भी आवश्यक थी. शायद? उन्होंने मेरे चेहरे की असमंजसता पढ़ ली थी.

युवक बोला, ‘‘मुझे सुनीलजी से कुछ विचारविमर्श करना था. बैंक में तो समय नहीं होता न उन के पास, इसलिए सोचा, घर पर ही क्यों न मिल लें. इसी बहाने आप के दर्शन भी हो जाएंगे.’’

‘‘ओह,’’ उन का आशय समझते ही मेरे चेहरे पर अनायास ही एक बनावटी मुसकान चली आई.

शीतल पेय लेने जब मैं भीतर जाने लगी तो वह युवती भी साथ ही चली आई, ‘‘मैं आप की मदद करूं?’’ मेरे चेहरे पर खीझ उभर आई कि अपना काम हो तो लोग किस सीमा तक झुक जाते हैं.

लगभग 4 साल पहले जब नएनए लुधियाना गए थे, तब भी ऐसा ही हुआ था. मधु कैसे घुसी चली आई थी हमारी जिंदगी में. दोनों पतिपत्नी कितने प्यार से मिले थे. मधु के पति केशव ने कहा था, ‘भाभीजी, आप आइए न हमारे घर. मधु आप से मिल कर बहुत खुश होगी.’

‘जी, जरूर आएंगे,’ मैं कितनी खुश हुई थी, कोई अपना सा लगने वाला जो मिला था. परिवार सहित पहले वे लोग हमारे घर आए और उस के बाद हम उन के घर गए. मधु मुझ से जल्दी ही घुलमिल गई थी जैसे पुरानी दोस्ती हो.

‘ये साहब आप को कैसे जानते हैं?’ मैं ने पति से पूछा.

‘हमारे बैंक की ही एक पार्टी है. अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए बेचारा दौड़धूप कर रहा है. बड़ी फैक्टरी खोलने का विचार है,’ पति ने लापरवाही से टाल दिया था, मानो उन्हें मेरा प्रश्न बेतुका सा लगा हो.

Bigg Boss 15: Tejasswi और शमिता में हुई कैट फाइट! फूटा राकेश बापट का गुस्सा

बिग बॉस 15 (Bigg Boss 15) का फिनाले एपिसोड आज यानी शनिवार और रविवार को दिखाया जाएगा. ऐसे में फैंस को शो के ग्रैंड फिनाले एपिसोड का बेसब्री से इंतजार है. फिनाले में एक से बढकर एक परफॉर्मेंस देखने को मिलेगा. शो में एक्स कंटेस्टेंट भी आएंगे. जिससे फैंस को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिलेगा.

शो का प्रोमो सामने आया है. इस प्रोमो में आप देख सकते हैं कि कंटेस्टेंट के करीबी लोग भी दिखाई दे रहे हैं.  और वे अपनों के साथ हो रहे बुरे बर्ताव को लेकर घर में चर्चा कर रहे हैं. राकेश बापट भी शमिता शेट्टी के लिए आए हैं और उनकी साइड लेते हुए नजर आ रहे हैं.

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प्रोमो में आप देख सकते हैं कि कैसे राकेश बापट तेजस्वी प्रकाश की क्लास लगा देते हैं. ये सब जानते हैं कि कैसे शमिता और तेजस्वी के बीच कैट फाइट होती है. राकेश तेजस्वी से कहते है कि वो ये बात क्यों नहीं समझती शमिता करण में इंट्रेस्टेड नही हैं.

 

राकेश ने ये भी कहा कि वो जब टीवी पर ये चीज देखते हैं तो उन्हें वो तोड़ने का मन करता हैं क्योंकि तेजस्वी शमिता को जिस तरह से ट्रीट करती हैं, उससे उन्हें बहुत गुस्सा आता है. राकेश ने तेजस्वी से ये भी कहा कि वो भी जब शमिता टास्क के दौरान करण की पीठ पर बैठी थीं और तेजस्वी ने उन्हें धक्का मार दिया था.

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तेजस्वी राकेश को समझाती हैं, वो कहती है कि शमिता ने जो किया वो उसके बदले का रिएक्शन था. लेकिन राकेश का गुस्सा कम नहीं होता है.

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Anupamaa: मालविका को होगा वनराज से प्यार! अनुज-अनुपमा के रिश्ते में आएगी दरार?

रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) और सुधांशु पांड (Sudhanshu Pandey)  स्टारर शो ‘अनुपमा’ (Anupama) में हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिलने रहा है. जिससे फैंस फुल एंटरटेनमेंट कर रहे हैं. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अनुपमा वनराज के इरादे को समझ जाती है कि वह मालविका के करीब जाने की कोशिश कर रहा है. वह वनराज को मालविका से दूर रहने की धमकी भी देती है. लेकिन वनराज मालविका को अपने जाल में फंसाने की साजिश रच रहा है. शो के आने वाले एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में आप देखेंगे कि मालविका अनुज से वनराज की परेशानी को लेकर बात करेगी. वह कहेगी कि वनराज काम पर फोकस नहीं कर पा रही इसकी वजह है ऑफिस में काव्या है. इस बात को सुनकर अनुज परेशान होता है. लेकिन अनुपमा उसे संभाल लेती है.

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शो में ये भी दिखाया जाएगा कि अनुज की डायरी से एक लेमिनेटेड गुलाब जमीन पर गिरता है. इसे अनुपमा को दिखाते हुए वह कहता है कि यही वह फूल है जो 26 साल पहले वह अनुपमा को देना चाहता था.

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तो दूसरी तरफ मालविका और अनुपमा बात करेंगे. मालविका काफी खुश दिखाई देगी. रिपोर्ट के अनुसार मालविका अनुपमा को बताएगी कि वह वनराज को पसंद करती है. वह बताएगी कि अब वनराज उसके लिए काफी स्पेशल है. इस बात को सुनकर अनुपमा को झटका लगेगा.

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वहीं अनुज उन दोनों की बातें सुन लेगा. अनुज गुस्से में बौखला उठेगा. वह अनुपमा से नाराज होगा.  वह कहेगा कि अगर वह छिपकर उनकी बातें नहीं सुनता तो अनुपमा उसे कभी सच नहीं बताती. शो में अब ये देखना होगा कि अनुपमा मालविका को वनराज के गलत इरादों से कैसे बचाती है.

पौराणिक सोच

रामायण और महाभारत ही नहीं, दूसरे पुराण उन घटनाओं से भरे हैं जिन में देवताओं और देवता सरीखे पात्रों ने युद्ध के समय तक दलबदल कराए हैं. विभीषण को रावण के राज जानने के लिए तोड़ा गया और बाद में उसे लंका का लंकाधिपति बना दिया गया. समुद्र मंथन में जम कर धोखेबाजी की गई. महाभारत में कृष्ण ने 2 नावों में पैर रखा और अपनी सेना ताऊ के बेटों को दे दी और खुद चचेरे भाइयों के सलाहकार बन गए. इन कहानियों को सुनसुन कर ही हमारे देश की राजनीति में हर समय दलबदल व भूचाल के झटके आते रहते हैं.

राजनीतिक फैसलों पर मतभेद होने पर पार्टी को छोडऩा माना जा सकता है पर जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर ममता बनर्जी के खेमे में खुलेआम सेंध लगाई थी वह किसी भी तरह नैतिक नहीं कहा जा सकता. जनता ने इस का उत्तर तो दे दिया पर भाजपा नेता इस बुरी तरह अपनी सांस्कृतिक धरोहर के गुलाम हैं कि वे नैतिकता के मापदंड समझते ही नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश के चुनावों में उन्हें पूरा विश्वास था कि जांच एजेंसियों का साथ ले कर वे विपक्ष को खोखला कर देंगे पर वे भूल गए कि जनता नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई, बेरोजगारी और कोविड के मिसमैनेजमैंट से इस बुरी तरह परेशान है कि भाजपा के ही कुछ बड़े नेता, मंत्री भी छोड़ क़र दूसरी पार्टी में जा रहे हैं. उन पर आरोप लगाया कि उन्हें लालच दिया जा रहा है, गलत है क्योंकि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के पास न पैसा बचा है, न पुलिस पौवर है.

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उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी की जीत को असल में  पौराणिक व्यवस्था की जीत मान लिया गया है और मंदिरों, दानदक्षिणा, पाखंड, अंधविश्वास पर चलने वाले निखट्टुओं की छोटी पर प्रभावशाली फौज ने इसे कर्ई हजार साल बाद अपने कल्पित काल की पुनर्स्थापना मान लिया. पौराणिक काल में तो अहल्या और सीता को निर्दोष होते हुए दंड मिला था और एकलव्य को बेबात में अंगूठा कटवाना पड़ा था पर आज संवैधानिक कवच के कारण औरतें, पिछड़े और दलित पौराणिक दूतों के गुलाम नहीं हैं. उन का ब्रेनवाश हुआ है पर वे यह भी जानते हैं कि भूखे पेट वे धर्मकर्म नहीं कर सकते.

पिछली व निचली जातियां भारतीय जनता पार्टी से कितनी नाराज हैं, इस की झलक पश्चिम बंगाल या चंडीगढ़ के निकाय चुनावों में ही नहीं, किसान आंदोलन में भी मिली जिस में भाजपा पौराणिक तरीके अपना कर भी फूट नहीं डाल सकी और आख़िरकार कृषि कानून वापस लेने पड़े. इस स्थिति में भाजपा के पिछड़ी जातियों के नेताओं को कोई पर्याय दिख रहा है तो वे उस ओर भाग रहे हैं. इस में आश्चर्य नहीं क्योंकि वर्षों तक भाजपा में रह कर वे ब्राह्मïण समकक्ष नहीं बन पाए. उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिस की आशा में वे सब का साथ सब का विकास का नारा देने वाली पार्टी में आए थे.

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एक देश के विकास के लिए जन्म से तय जाति पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. देश का निर्माण हर नागरिक के डोर से होता है. देश की बड़ी जनसंख्या को पराया या दुश्मन मान कर देश का विभाजन किया जा सकता है, उस में सुख व समृद्धि नहीं लाई जा सकती. बंगलादेश इस का उदाहरण है जहां 80 प्रतिशत लोगों एक सोच के हैं और वे बाकी 20 फीसदी के साथ बैरभाव नहीं रखते. एक बोली बोल रहे हैं, एक पहल रख रहे हैं और लगभग तानाशाह शासन के बावजूद सब को खासी आजादी दे रहे हैं. भारत और पाकिस्तान इस के उलट हैं और इस का ये दोनों खमियाजा भुगत रहे हैं.

ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी के पौराणिक मंसूबों पर भारी प्रहार किया था और उत्तर प्रदेश के मंत्री पद छोड़ जाने वाले इसे और ज्यादा तीखा दे रहे हैं. पौराणिक सोच शासन का हिस्सा न बने, घरों तक सीमित रहे, फिलहाल तो यही मैसेज मिल रहा है.

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