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इधर-उधर: भाग 3

Writer- Rajesh Kumar Ranga

आकाश ने जेब से पैसे निकाले और भुट्टे वाली बुजुर्ग महिला के हाथ में थमा दिए. उस की नजर उमड़ते बादलों पर ही थी. प्रश्नवाचक दृष्टि से उस ने तनु की ओर देखा और दोनों बाहर निकल गए. टैक्सी लेने की तमाम कोशिशें नाकामयाब होने के बाद दोनों स्टेशन की ओर पैदल ही निकल पड़े. रास्ते में आकाश ने ड्राइवर को फोन कर के कामा होटल से गाड़ी ले कर स्टेशन आने को कह दिया.

घर पहुंचतेपहुंचते रात हो चुकी थी. आकाश और उस के परिवार वालों ने इजाजत

मांगी. उन के जाते ही जयनाथजी कुछ कहने के लिए मानो तैयार ही थे, ‘‘कितने पैसे वाले लोग हैं, मगर कोई मिजाज नहीं, कोई घमंड नहीं, हम जैसे मध्यवर्ग वालों की लड़की लेना चाहते हैं. कोई दहेज की मांग नहीं, यहां तक कि…’’

‘‘तो मुझे क्या करना चाहिए अंबर कि बजाय आकाश को पसंद कर लेना चाहिए, क्योंकि आकाश करोड़पति है, उस के मातापिता घमंडी नहीं हैं. वे धरातल से जुड़े हैं और सब से बड़ी बात कि उन्हें हम, हमारा परिवार, हमारी सादगी पसंद है. अपनी पसंद मैं भाभी को सुबह ही बता चुकी हूं, आकाश से मिलने के बाद उस में कोई तबदीली नहीं आई है…’’

‘‘ठीक है इस बारे में हम बाकी बातें कल करेंगे…’’ जयनाथजी ने लगभग पीछा छुड़ाते हुए कहा.

रात के करीब 2 बजे तनु ने भाभी को फोन मिलाया, ‘‘भाभी मुझे आप से मिलना है. भैया तो बाहर गए हैं. जाहिर है आप भी जग रही होंगी, मुझे अंबर के बारे में कुछ बातें करनी हैं, मैं आ जाऊं?’’

‘‘तनु मैं गहरी नींद में हूं… हम सुबह मिलें?’’

‘‘मैं तो आप के दरवाजे पर ही हूं… गेट खोलेंगी या खिड़की से आना पड़ेगा?’’

अगले ही पल तनु अंदर थी. बातों का सिलसिला शुरू करते हुए भाभी ने तनु से पूछा, ‘‘तुम मुझे अपना फैसला सुना चुकी हो. अब इतनी रात मेरी नींद क्यों खराब कर रही हो?’’

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‘‘भाभी, अंबर को फोन कर के कहना है कि मैं उस से शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘क्या?’’ भाभी को लगा कि वह अभी भी नींद में ही है.

पलक झपकते ही तनु ने अंबर को फोन लगा दिया, ‘‘हैलो अंबर मैं तनु बोल रही हूं… मैं इधरउधर की बात करने के बजाय सीधा मुद्दे पर आना चाहती हूं…’’

‘‘ठीक है… जल्दी बता दो मैं इधर हूं या उधर…’’

‘‘इधरउधर की छोड़ो और सुनो सौरी यार मैं तुम से शादी नहीं कर सकती…’’

‘‘ठीक है मगर इतनी रात को क्यों बता रही हो… सुबह तक…’’

‘‘सुबह तक मेरा दिमाग बदल गया तो? तुम चीज ही ऐसी हो कि तुम्हें मना करना बहुत मुश्किल है…’’

‘‘अच्छा औल द बैस्ट, अब सो जाओ और मुझे भी सोने दो, किसी उधर वाले से शादी तय हो जाए तो जगह, तारीख वगैरह बता देना मैं आ जाऊंगा, मुफ्त का खा कर चला जाऊंगा…’’

‘‘मुफ्ती साहब, गिफ्ट लाना पड़ेगा. शादी में खाली लिफाफे देने का रिवाज दिल्ली में होगा, मुंबई में नहीं…’’

‘‘ठीक है 2-4 फूल ले आऊंगा. अब मुझे सोने दो… सुबह मेरी फ्लाइट है…’’

भाभी बिलकुल सकते में थी, ‘‘ये सब क्या है तनु? तुम तो अंबर पर फिदा हो गई थी… क्या आकाश का पैसा तुम्हें आकर्षित कर गया? क्या उस की बड़ी गाड़ी अंबर की मोटरसाइकिल से आगे निकल गई?’’

‘‘भाभी अंबर पर फिदा होना स्वाभाविक है. ऐसे लड़के के साथ घूमनाफिरना,

मजे करना, अच्छा लगेगा मगर शादी एक ऐसा बंधन है, जिस में एक गंभीर, संजीदा इंसान चाहिए न कि कालेज से निकला हुआ एक हीरोनुमा लड़का.

‘‘हम घर से बाहर निकले तो आकाश ने पूरे शिद्दत से ट्रैफिक के सारे नियमों का पालन किया, मेरे लाख कहने के बावजूद उस ने गाड़ी नो ऐंट्री में नहीं घुमाई, अपने देश के बारे में उस के विचार सकारात्मक थे. उसे देश से कोई शिकायत न थी, रेस्तरां में वेटर से इज्जत से बात की न कि उसे वेटर कह कर आवाज दी, मुफ्त का खाने के बजाय उस ने पैसे देने में अपनी खुद्दारी समझ.

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‘‘बड़ी गाड़ी छोड़ कर लोकल ट्रेन में जाने में उसे कोई परहेज नहीं, नारियल पानी पी कर उस ने नारियल एक ओर उछाला नहीं, बल्कि डस्टबिन की तलाश की, भुट्टे वाली माई को उस ने जब मुट्ठीभर पैसे दिए तो उस का सारा ध्यान इस पर था कि मैं कहीं देख न लूं.

‘‘इतने पैसे उस भुट्टे वाली ने एकसाथ कभी नहीं देखे होंगे… इतने संवेदनशील व्यक्तित्व के मालिक के सामने मैं एक प्यारे से हीरो को चुन कर जीवनसाथी बनाऊं? इतनी बेवकूफ मैं लगती जरूर हूं, मगर हूं नहीं.’’

भाभी सिर पर हाथ रख कर बैठ गई.

‘‘क्या सर दर्द हो रहा है.’’

‘‘नहीं बस चक्कर से आ रहे हैं…’’

‘‘रुको, अभी सिरदर्द दूर हो जाएगा…’’ तनु ने कहा.

भाभी बोल पड़ी, ‘‘अब क्या बाकी है?’’

तनु ने फोन उठाया और एक नंबर मिलाया, ‘‘हैलो आकाश, मैं ने फैसला कर लिया है… मुझे आप पसंद हैं. मैं आप से शादी करने को तैयार हूं. मुझे पूरा यकीन है कि मैं भी आप को पसंद हूं.’’

‘‘तुम ने फैसला ले कर मुझे बताने का जो समय चुना वह वाकई काबिलेतारीफ है,’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हूं… मगर भाभी इस बात को मानती ही नहीं… देखो मुझे धक्के मार कर अपने कमरे से बाहर निकालने पर उतारू है…’’

‘‘आकाश ने जेब से पैसे निकाले और भुट्टे वाली बुजुर्ग महिला के हाथ में थमा दिए.

उस की नजर उमड़ते बादलों पर ही थी. प्रश्नवाचक दृष्टि से उस ने

तनु की ओर देखा और दोनों बाहर निकल गए…’’

बढ़ते अमीर, घटते ग़रीब

देश में गरीबों की गिनती बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है जबकि उसी तेजी से कुछ सौ अमीरों की संपत्ति बढ़ रही है. अंतर्राष्ट्रीय संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भारतीय सरकारी आंकड़ों से ही निकाले गए निष्कर्ष के हिसाब से 100 अमीरों की संपत्ति 57.3 लाख करोड़ से ज्यादा है सिर्फ वर्ष 2020 में जबकि 4.6 करोड़ गरीब लोग बेहद गरीब हो गए हैं.

यह भेदभाव होना ही था क्योंकि जब से भारतीय जनता पार्टी आई है उस का मोटो पौराणिक आदेश है कि शूद्र और अछूत के पास संपत्ति न हो और बारबार पौराणिक कहानियों व स्मृतियों में कहा गया है कि शूद्र की संपत्ति राज्य छीन कर ब्राहमणों में बांट दें. इन्हीं ग्रंथों के प्रवचन सुन कर आए नेताओं ने शासन पाते ही इस दिशा में काम करना शुरू किया और नई टैक्नोलौजी ने उन का पूरा साथ दिया. नोटबंदी का असली मंतव्य यही था कि गरीब के पास नोट न बचें और अमीर अपना पैसा बैंकों व संपत्ति में रख सकें.

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भारतीय संस्था सीएमआईई के अनुसार, 84 फीसदी घरों को कोविड की महामारी के दौरान आर्थिक संकटों में घिरना पड़ा जबकि इस महामारी में अमीर और अमीर हुए जो शेयर बाजार में आई ऊंचाइयों से साफ है. आज भारत के 142 खरबपतियों के पास 719 अरब डौलर की संपत्ति है जो सब से निचले स्तर के 40 फीसदी यानी 76 करोड़ लोगों की 657 अरब डौलर संपत्ति से ज्यादा है. एक आंकड़े के अनुसार, अगर 10 सब से अमीर भारतीय हर रोज 7.5 करोड़ रुपए फालतू में खर्च करें और उस से कुछ संपत्ति न खरीदें तो भी उन्हें अपनी संपत्ति को समाप्त करने में 85 साल लगेंगे.

पंडेपुजारी और पादरी भारत और अमेरिका जैसे देशों में इस बढ़ते भेदभाव के लिए बहुत जिम्मेदार हैं. दोनों ही देशों में भगवानों के ये दुकानदार जबरदस्त प्रचार करते हैं कि ईश्वर सब देख रहा है, दयालु है, लोगों की रक्षा को तैयार खड़ा है और अगर लोगों के साथ कुछ बुरा हो रहा है तो वह उन के पापों के कारण ही हो रहा है जिस का एक मात्र उपाय उन्हीं धर्म के दुकानदारों की दुकान पर जा कर पूजापाठ करना और दान देना है. न भारत के मंदिर और न अमेरिका के चर्च अपनी आय व खर्च का ब्योरा आम जनता को बताते है. ये करों से मुक्त हैं और भव्य चर्च और मंदिर दोनों खूब बन रहे हैं. अमेरिकी अमीर तो जम कर भारतीय मंदिरों को प्रोत्साहित कर रहे हैं क्योंकि इसी की आड़ में वे नए ईसाई चर्च भी बनवा रहे हैं और उन में वह भव्यता ला रहे हैं जो यूरोप में 4-5 सदी पहले तक थी, अब वह कम हो गई है.

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भारत में आय के बढ़ते अंतर के लिए जिम्मेदार पौराणिक शासक ही हैं जो इस तरह की नीतियां बना रहे हैं जिन से शेयर बाजार चमके और सब्जी बाजार उजड़ें.

Valentine’s Special: रिश्तों की कसौटी- भाग 3: क्यों दुखी थी सुरभी

सुबह 6 बजे ही उस ने पापा को फोन लगाया. सुन कर सुरभी आश्वस्त हो गई कि पापा के लौटने में सप्ताह भर बाकी है. वह पापा की गैरमौजूदगी में ही अपनी योजना को अंजाम देना चाहती थी.

उस दिन वह दिल्ली में रह रहे दूसरे पत्रकार मित्रों से फोन पर बातें करती रही. दोपहर तक उसे यह सूचना मिल गई कि अमित साहनी इस समय दिल्ली में अपने पुश्तैनी मकान में हैं.

शाम को मां को बताया कि दिल्ली में उस की एक पुरानी सहेली एक डाक्युमेंटरी फिल्म तैयार कर रही है और इस फिल्म निर्माण का अनुभव वह भी लेना चाहती है. मां ने हमेशा की तरह हामी भर दी. सुरभी नर्स और कम्मो को कुछ हिदायतें दे कर दिल्ली चली गई.

अब समस्या थी अमित साहनी जैसी बड़ी हस्ती से मुलाकात की. दोस्तों की मदद से उन तक पहुचंने का समय उस के पास नहीं था, इसलिए उस ने योजना के अनुसार अपने ससुर ईश्वरनाथ से अपनी ही एक दोस्त का नाम ले कर अमित साहनी से मुलाकात का समय फिक्स कराया. ईश्वरनाथ के लिए यह कोई बड़ी बात न थी.

अगले दिन सुबह 10 बजे का वक्त सुरभी को दिया गया. आज ऐसे वक्त में पत्रकारिता का कोर्स उस के काम आ रहा था.

खैर, मां की नफरत से मिलने के लिए उस ने खुद को पूरी तरह से तैयार कर लिया.

अगले दिन पूरी जांचपड़ताल के बाद सुरभी ठीक 10 बजे अमित साहनी के सामने थी. वे इस उम्र में भी बहुत तंदुरुस्त और आकर्षक थे. पोतापोती व पत्नी भी उन के साथ थे.

परिवार सहित उन की कुछ तसवीरें लेने के बाद सुरभी ने उन से कुछ औपचारिक प्रश्न पूछे पर असल मुद्दे पर न आ सकी, क्योंकि उन की पत्नी भी कुछ दूरी पर बैठी थीं. सुरभी इस के लिए भी तैयार हो कर आई थी. उस ने अपनी आटोग्राफ बुक अमित साहनी की ओर बढ़ा दी.

अमित साहनी ने जैसे ही चश्मा लगा कर पेन पकड़ा, उन की नजर मालती की पुरानी तसवीर पर पड़ी. उस के नीचे लिखा था, ‘‘मैं मालतीजी की बेटी हूं और मेरा आप से मिलना बहुत जरूरी है.’’

पढ़ते ही अमित का हाथ रुक गया. उन्होंने प्यार भरी एक भरपूर नजर सुरभी पर डाली और बुक में कुछ लिख कर बुक सुरभी की ओर बढ़ा दी. फिर चश्मा उतार कर पत्नी से आंख बचा कर अपनी नम आंखों को पोंछा.

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सुरभी ने पढ़ा, लिखा था : ‘जीती रहो, अपना नंबर दे जाओ.’

पढ़ते ही सुरभी ने पर्स में से अपना कार्ड उन्हें थमा दिया और चली गई.

फोन से उस का पता मालूम कर तड़के साढ़े 5 बजे ही अमित साहनी सिर पर मफलर डाले सुरभी के सामने थे.

‘‘सुबह की सैर का यही 1 घंटा है जब मैं नितांत अकेला रहता हूं,’’ उन्होंने अंदर आते हुए कहा.

सुरभी उन्हें इस तरह देख आश्चर्य में तो जरूर थी, पर जल्दी ही खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘सर, समय बहुत कम है. इसलिए सीधी बात करना चाहती हूं.’’

‘‘मुझे भी तुम से यही कहना है,’’ अमित भी उसी लहजे में बोले.

तब तक वेटर चाय रख गया.

‘‘मेरी मम्मी आप की ही जबान से कुछ जानना चाहती हैं,’’ गंभीरता से सुरभी ने कहा.

सुन कर अमित साहनी की नजरें झुक गईं.

‘‘आप मेरे साथ कब चल रहे हैं मां से मिलने?’’ बिना कुछ सोचे सुरभी ने अगला प्रश्न किया.

‘‘अगर मैं तुम्हारे साथ चलने से मना कर दूं तो?’’ अमित साहनी ने सख्ती से पूछा.

‘‘मैं इस से ज्यादा आप से उम्मीद भी नहीं करती, मगर इनसानियत के नाते ही सही, अगर आप उन का जरा सा भी सम्मान करते हैं तो उन से जरूर मिलिएगा. वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं,’’ कहतेकहते नफरत और दुख से सुरभी की आंखें भर आईं.

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‘‘क्या हुआ मालती को?’’ चाय का कप मेज पर रख कर चौंकते हुए अमित ने पूछा.

‘‘उन्हें कैंसर है और पता नहीं अब कितने दिन की हैं…’’ सुरभी भरे गले से बोल गई.

‘‘ओह, सौरी बेटा, तुम जाओ, मैं जल्दी ही मुंबई आऊंगा,’’ अमित साहनी धीरे से बोले और सुरभी से उस के घर का पता ले कर चले गए.

दोपहर को सुरभी मां के पास पहुंच गई.

‘‘कैसी रही तेरी फिल्म?’’ मां ने पूछा.

‘‘अभी पूरी नहीं हुई मम्मी, पर वहां अच्छा लगा,’’ कह कर सुरभी मां के गले लग गई.

‘‘दीदी, कल रात मांजी खुद उठ कर अपने स्टोर रूम में गई थीं. लग रहा था जैसे कुछ ढूंढ़ रही हों. काफी परेशान लग रही थीं,’’ कम्मो ने सीढि़यां उतरते हुए कहा.

थोड़ी देर बाद मां से आंख बचा कर उस ने उन की डायरी स्टोर रूम में ही रख दी.

उसी रात सुरभी को अमित साहनी का फोन आया कि वह कल साढ़े 11 बजे की फ्लाइट से मुंबई आ रहे हैं. सुरभी को मां की डायरी का हर वह पन्ना याद आ रहा था जिस में लिखा था कि काश, मृत्यु से पहले एक बार अमित उस के सवालों के जवाब दे जाता. कल का दिन मां की जिंदगी का अहम दिन बनने जा रहा था. यही सोचते हुए सुरभी की आंख लग गई.

अगले दिन उस ने नर्स से दवा आदि के बारे में समझ कर उसे भी रात को आने को बोल दिया.

करीब 1 बजे अमित साहनी उन के घर पहुंचे. सुरभी ने हाथ जोड़ कर उन का अभिवादन किया तो उन्होंने ढेरोें आशीर्वाद दे डाले.

‘‘आप यहीं बैठिए, मैं मां को बता कर आती हूं. एक विनती है, हमारी मुलाकात का मां को पता न चले. शायद बेटी के आगे वे कमजोर पड़ जाएं,’’ सुरभी ने कहा और ऊपर चली गई.

‘‘मम्मी, आप से कोई मिलने आया है,’’ उस ने अनजान बनते हुए कहा.

‘‘कौन है?’’ मां ने सूप का बाउल कम्मो को पकड़ाते हुए पूछा.

‘‘कोई मिस्टर अमित साहनी नाम के सज्जन हैं. कह रहे हैं, दिल्ली से आए हैं,’’ सुरभी वैसे ही अनजान बनी रही.

‘‘क…क…कौन आया है?’’ मां के शब्दों में एक शक्ति सी आ गई थी.

‘‘ऐसा करती हूं आप यहीं रहिए. उन्हें ही ऊपर बुला लेते हैं,’’ मां के चेहरे पर आए भाव सुरभी से देखे नहीं जा रहे थे. वह जल्दी से कह कर बाहर आ गई.

मालती कुछ भी सोचने की हालत में नहीं थीं. यह वह मुलाकात थी जिस के बारे में उन्होंने हर दिन सोचा था.

थोड़ी देर में सुरभी के पीछेपीछे अमित साहनी कमरे में दाखिल हुए, मालती के पसंदीदा पीले गुलाबों के बुके के साथ. मालती का पूरा अस्तित्व कांप रहा था. फिर भी उन्होंने अमित का अभिवादन किया.

सुरभी इस समय की मां की मानसिक अवस्था को अच्छी तरह समझ रही थी. वह आज मां को खुल कर बात करने का मौका देना चाहती थी, इसलिए डा. आशुतोष के पास उन की कुछ रिपोर्ट्स लेने के बहाने वह घर से बाहर चली गई.

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‘‘कितने बेशर्म हो तुम जो इस तरह से मेरे सामने आ गए?’’ न चाहते हुए भी मालती क्रोध से चीख उठीं.

‘‘कैसी हो, मालती?’’ उस की बातों पर ध्यान न देते हुए अमित ने पूछा और पास के सोफे पर बैठ गए.

‘‘अभी तक जिंदा हूं,’’ मालती का क्रोध उफान पर था. उन का मन तो कर रहा था कि जा कर अमित का मुंह नोच लें.

इस के विपरीत अमित शांत बैठे थे. शायद वे भी चाहते थे कि मालती के अंदर का भरा क्रोध आज पूरी तरह से निकल जाए.

‘‘होटल ताज में ईश्वरनाथजी से मुलाकात हुई थी. उन्हीं से तुम्हारे बारे में पता चला. तभी से मन बारबार तुम से मिलने को कर रहा था,’’ अमित ने सुरभी के सिखाए शब्द दोहरा दिए. परंतु यह स्वयं उस के दिल की बात भी थी.

‘‘मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया, अमित?’’ अपलक अमित को देख रही मालती ने उन की बातों को अनसुना कर अपनी बात रखी.

इतने में कम्मो चाय और नाश्ता रख गई.

‘‘तुम्हें याद है वह दोपहरी जब मैं ने एक तसवीर के विषय में तुम से पूछा था और तुम ने उन्हें अपनी मां बताया था?’’ अमित ने मालती को पुरानी बातें याद दिलाईं.

मालती यों ही खामोश बैठी रहीं तो अमित ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘उस तसवीर को मैं तुम सब से छिपा कर एक शक दूर करने के लिए अपने साथ दिल्ली ले गया था. मेरा शक सही निकला था. यह वृंदा यानी तुम्हारी मां वही औरत थी जो दिल्ली में अपने पार्टनर के साथ एक मशहूर ब्यूटीपार्लर और मसाज सेंटर चलाती थी. इस से पहले वह यहीं मुंबई में मौडलिंग करती थी. उस का नया नाम वैंडी था.’’

इस के बाद अमित ने अपनी चाय बनाई और मालती की भी.

उस ने आगे बोलना शुरू किया, ‘‘उस मसाज सेंटर की आड़ में ड्रग्स की बिक्री, वेश्यावृत्ति जैसे धंधे होते थे और समाज के उच्च तबके के लोग वहां के ग्राहक थे.’’

‘‘ओह, तो यह बात थी. पर इस में मेरी क्या गलती थी?’’ रोते हुए मालती ने पूछा.

‘‘जब मैं ने एम.बी.ए. में नयानया दाखिला लिया था तब मेरे दोस्तों में से कुछ लड़के भी वहां के ग्राहक थे. एक बार हम दोस्तों ने दक्षिण भारत घूमने का 7 दिन का कार्यक्रम बनाया और हम सभी इस बात से बहुत रोमांचित थे कि उस मसाज सेंटर से हम लोगों ने जो 2 टौप की काल गर्ल्स बुक कराई थीं उन में से एक वैंडी भी थी जिसे हाई प्रोफाइल ग्राहकों के बीच ‘पुरानी शराब’ कह कर बुलाया जाता था. उस की उम्र उस के व्यापार के आड़े नहीं आई थी,’’ अमित ने अपनी बात जारी रखी. उसे अब मालती के सवाल भी सुनाई नहीं दे रहे थे.

चाय का कप मेज पर रखते हुए अमित ने फिर कहना शुरू किया, ‘‘मेरी परवरिश ने मेरे कदम जरूर बहका दिए थे मालती, पर मैं इतना भी नीचे नहीं गिरा था कि जिस स्त्री के साथ 7 दिन बिताए थे, उसी की मासूम और अनजान बेटी को पत्नी बना कर उस के साथ जिंदगी बिताता? मेरा विश्वास करो मालती, यह घटना तुम्हारे मिलने से पहले की है. मैं तुम से बहुत प्यार करता था. मुझे अपने परिवार की बदनामी का भी डर था, इसलिए तुम से बिना कुछ कहेसुने दूर हो गया,’’ कह कर अमित ने अपना सिर सोफे पर टिका दिया.

आज बरसों का बोझ उन के मन से हट गया था. मालती भी अब लेट गई थीं. वे अभी भी खामोश थीं.

थोड़ी देर बाद अमित चले गए. उन के जाने के बाद मालती बहुत देर तक रोती रहीं.

रात के खाने पर जब सुरभी ने अमित के बारे में पूछा तो उन्होंने उसे पुराना पारिवारिक मित्र बताया. लगभग 3 महीने बाद मालती चल बसीं. परंतु इतने समय उन के अंदर की खुशी को सभी ने महसूस किया था. उन के मृत चेहरे पर भी सुरभी ने गहरी संतुष्टि भरी मुसकान देखी थी.

मां की तेरहवीं वाले दिन अचानक सुरभी को उस डायरी की याद आई. उस में लिखा था : मुझे क्षमा कर देना अमित, तुम ने अपने साथसाथ मेरे परिवार की इज्जत भी रख ली थी. मैं पूर्ण रूप से तृप्त हूं. मेरी सारी प्यास बुझ गई.

पढ़ते ही सुरभी ने डायरी सीने से लगा ली. उस में उसे मां की गरमाहट महसूस हुई थी. आज उसे स्वयं पर गर्व था क्योंकि उस ने सही माने में मां के प्रति अपनी दोस्ती का फर्ज जो अदा किया था.

Valentine’s Special: डिवोर्सी- मुक्ति ने शादी के महीने भर बाद ही तलाक क्यों ले लिया

Valentine’s Special: डिवोर्सी- भाग 1: मुक्ति ने शादी के महीने भर बाद ही तलाक क्यों ले लिया

वह डिवोर्सी है. यह बात सारे स्टाफ को पता थी. मुझे तो इंटरव्यू के समय ही पता चल गया था. एक बड़े प्राइवेट कालेज में हमारा साक्षात्कार एकसाथ था. मेरे पास पुस्तकालय विज्ञान में डिगरी थी. उस के पास मास्टर डिगरी. कालेज की साक्षात्कार कमेटी में प्राचार्य महोदया जो कालेज की मालकिन, अध्यक्ष सभी कुछ वही एकमात्र थीं. हमें बताया गया था कि कमेटी इंटरव्यू लेगी, मगर जब कमरे के अंदर पहुंचे तो वही थीं यानी पूरी कमेटी स्नेहा ही थीं. उन्होंने हमारे भरे हुए फार्म और डिगरियां देखीं. फिर मुझ से कहा, ‘‘आप शादीशुदा हैं.’’ ‘‘जी.’’

‘‘बी. लिब. हैं?’’ ‘‘जी,’’ मैं ने कहा.

फिर उन्होंने मेरे पास खड़ी उस अति सुंदर व गोरी लड़की से पूछा, ‘‘आप की मास्टर डिगरी है? एम.लिब. हैं आप मुक्ति?’’ ‘‘जी,’’ उस ने कहा. लेकिन उस के जी कहने में मेरे जैसी दीनता नहीं थी.

‘‘आप डिवोर्सी हैं?’’ ‘‘जी,’’ उस ने बेझिझक कहा.

‘‘पूछ सकती हूं क्यों?’’ ‘‘व्यक्तिगत मैटर,’’ उस ने जवाब देना उचित नहीं समझा.

‘‘ओके,’’ कालेज की मालकिन, जो अध्यक्ष व प्राचार्य भी थीं, ने कहा. ‘‘तो आप आज से लाइब्रेरियन की पोस्ट संभालेंगी और कार्तिक आप सहायक लाइब्रेरियन. और हां अटैंडैंट की पोस्ट इस वर्ष नहीं है. आप दोनों को ही सब कुछ संभालना है.’’

‘‘जी,’’ हम दोनों के मुंह से एकसाथ निकला. इस प्राइवेट कालेज में मेरा वेतन क्व15 हजार मासिक था. और मेरी सीनियर मुक्ति का 20 हजार. मुक्ति अब मेरे लिए मुक्तिजी थी क्योंकि वे मुझ से बड़ी पोस्ट पर थीं.

मुक्ति के बाहर जाते ही मैं भी बाहर निकलने ही वाला था कि प्राचार्य महोदया ने मुझे रोकते हुए कहा, ‘‘कार्तिक डिवोर्सी है… संभल कर… भूखी शेरनी कच्चा खा जाती है शिकार को,’’ कह वे जोर से हंसती हुई आगे बोलीं, ‘‘मजाक कर रही थी, आप जा सकते हैं.’’ विशाल लाइब्रेरी कक्ष. काम बहुत ज्यादा नहीं रहता था. मैं मुक्तिजी के साथ ही काम करता था, बल्कि उन के अधीनस्थ था. मुझे उन के डिवोर्सी होने से हमदर्दी थी. दुख था… इतनी सुंदर स्त्री… कैसा बेवकूफ पति है, जिस ने इसे डिवोर्स दे दिया. लेकिन मुक्तिजी के चेहरे पर कोई दुख नहीं था. वे खूब खुश रहतीं. हरदम हंसीमजाक करती रहतीं. पहले तो उन्होंने मुझ से अपने नाम के आगे जी लगवाना बंद करवाया, ‘‘आप की उम्र 30 वर्ष है और मेरी 29. एक साल छोटी हूं आप से. यह जी लगाना बंद करिए, केवल मुक्ति कहा करिए.’’

‘‘लेकिन आप सीनियर हैं.’’ ‘‘यह कौन सी फौज या पुलिस की नौकरी है. इतने अनुशासन की जरूरत नहीं है. हम साथ काम करते हैं. दोस्तों की तरह बात करें तो ज्यादा सहज रहेगा मेरे लिए.’’

मैं उन की बात से सहमत था. इन 8 महीनों में हम एकदूसरे से बहुतघुल मिल गए थे. विद्यालय के काम में एकदूसरे की मदद कर दिया करते थे. अपनी हर बात एकदूसरे को बता दिया करते थे. उन्होंने अपने जीवन को ले कर, परिवार को ले कर कभी कोई शिकायत नहीं की और न ही मुझ से कभी मेरे परिवार के बारे में पूछा. वे सिर्फ इतना पूछतीं, ‘‘और घर में सब ठीक हैं?’’

उन के हंसीमजाक से मुझे कई बार लगता कि वे अपने अंदर के दर्द को छिपाने के लिए दिखावे की हंसी हंसती हैं. लेकिन मुझे बहुत समय बाद भी ऐसा कुछ नजर नहीं आया उन में. कोई दर्द, तकलीफ, परेशानी नहीं और मैं हद से ज्यादा जानने को उत्सुक था कि उन के पति ने उन्हें तलाक क्यों दिया? हम लंच साथ करते. चाय साथ पीते. इधरउधर की बातें भी दोस्तों की तरह मिल कर करते. कालेज के काम से भी कई बार साथ बाहर जाना होता.

Periods में ना करें ये 6 गलतियां

कोई बीमारी नहीं है. माहवारी महिलाओं को प्रकृति का एक अनमोल तोहफा है, जो महिलाओं को पूर्ण बनाता है. महिलाओं को माहवारी के दौरान शर्म की जगह गर्व महसूस करना चाहिए, क्योंकि वे पूर्ण हैं. लेकिन इस दौरान आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए जो आपकी सेहत के लिएं बेहद जरुरी हैं.

1. जानकारी जरूरी

हर लड़की को माहवारी की समस्या से जूझना पड़ता है. लेकिन यह समस्या तब और बड़ी लगने लगती है जब बिना किसी जानकारी के इस से निबटना पड़े. अकसर लड़कियां झिझक के कारण किसी से माहवारी के विषय में बात नहीं करतीं. नतीजा यह होता है कि अचानक पीरियड्स शुरू हो जाते हैं और वे घबरा जाती हैं. इस घबराहट में वे अपनी तबीयत खराब कर लेती हैं. जबकि उन्हें पहले से ही माहवारी की जानकारी हो तो इस स्थिति से निबटना उन के लिए आसान हो जाता है.

सभी मांओं को अपनी बेटियों को उन के शरीर में होने वाले प्राकृतिक बदलावों के बारे में पहले से बताना चाहिए. ऐसा करने से मांएं अपनी बेटियों को बेवजह तनाव का शिकार बनने से रोक पाएंगी.

2. उपेक्षित महसूस न करें

पुरानी रीतियों और रिवाजों के तहत माहवारी के दौरान लड़कियों पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं. जैसे रसोई में न जाओ, बिस्तर में न बैठो, पेड़पौधों को न छुओ. इस तरह की टोकाटाकी से लड़कियां खुद को उपेक्षित महसूस करने लगती हैं. माहवारी के दिन आते ही वे खुद को अपराधी सा महसूस करने लगती हैं.

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कई लड़कियां तो माहवारी  के दिनों में अवसादग्रस्त हो जाती हैं. इस तरह के मानसिक बदलाव के कारण रक्तस्राव में फर्क पड़ता है. किसी को रक्तस्राव अधिक होने लगता है तो किसी को बहुत कम. लेकिन इस स्थिति में बिलकुल भी तनाव नहीं लेना चाहिए, क्योंकि माहवारी होना एक प्राकृतिक क्रिया है.

3. साफसफाई है जरूरी

कई महिलाओं को भ्रम होता है कि माहवारी के समय केशों को नहीं धोना चाहिए. इस से माहवारी ठीक से नहीं हो पाती और रक्तस्राव भी कम होता है. कुछ महिलाएं तो माहवारी के समय नहाने तक को सही नहीं समझतीं और जब तक रक्तस्राव होता है तब तक वे नहीं नहातीं. दरअसल, उन का मानना होता है कि नहाने से माहवारी के समय अधिक दर्द होता है. लेकिन यह सिर्फ भ्रम है. उलटे माहवारी के समय नहाना बेहद जरूरी है. इस समय तो शरीर की साफसफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए खासकर योनि व उस के आसपास की सफाई बेहद जरूरी है.

4. सैनिटरी नैपकिन का रखरखाव

कई महिलाएं सैनिटरी नैपकिन को कहीं भी रख देती हैं. जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए. खासतौर पर खुले और इस्तेमाल किए जाने वाले सैनिटरी नैपकिन को हमेशा साफसुथरे स्थान पर रखना चाहिए. यदि इस्तेमाल किए जा रहे नैपकिन को गंदे स्थान पर रखा जाए तो उस में कीटाणु पनपने लगते हैं, जिस से संक्रमण फैलने का खतरा रहता है.

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इतना ही नहीं इस्तेमाल किए जा चुके पैड को फेंकने में भी सावधानी बरतनी चाहिए. खुले स्थान पर पैड कभी नहीं फेंकना चाहिए. पैड को हमेशा कागज में लपेट कर कूड़े के ढेर में फेंकना चाहिए.

5. सैनिटरी नैपकिन का चुनाव

माहवारी की जानकारी तब तक अधूरी है जब तक आप सही सैनिटरी नैपकिन के चुनाव के बारे में नहीं जानतीं. आजकल मार्केट में कई साइजों और वैराइटी में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध हैं. लेकिन आप को अपनी बेटी को कौटन लेयर वाले स्लिम सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल करने की सलाह देनी चाहिए.

डाक्टरों और हाल ही में की गई स्टडीज के अनुसार माहवारी के दौरान हर 6 घंटे के अंतराल पर नैपकिन बदलते रहना चाहिए. फिर चाहे रक्तस्राव कम हो रहा हो या अधिक. इस के अतिरिक्त उसे यह भी बताएं कि वही सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल करे, जो गीलेपन को अच्छी तरह सोख कर जैल में परिवर्तित कर दे.

6.अपनी परेशानी बेझिझक बताएं

कई बार मांएं बेटियों की बातों को यह कह कर अनसुनी कर देती हैं कि पीरियड्स में ऐसा तो होता ही है. लेकिन ऐसा करना गलत है, क्योंकि माहवारी की शुरुआत में लड़कियों को कई प्रकार की तकलीफें होती हैं, जिन्हें बताने में वे हिचकिचाहट महसूस करती हैं. जबकि अपनी मां को अपनी तकलीफ बता कर बेटी निश्चिंत हो जाती है.

इसलिए समयसमय पर मांओं को खुद भी बेटियों से पूछते रहना चाहिए कि उन्हें किस तरह की समस्या आ रही है. साथ ही बेटियों को भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी मांओं को अपनी परेशानी बतानी चाहिए ताकि समय रहते उस का इलाज करवाया जा सके.

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आज भी भारत में महिलाओं के बीच माहवारी के दौरान सैनिटरी नैपकिन की जगह कपड़ा इस्तेमाल करने से जुड़ी कई भ्रांतियां हैं. एक सर्वे के अनुसार भारत में केवल 12% महिलाएं ही माहवारी के दौरान साफसुथरे नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं. बाकी महिलाएं इन दिनों घर में पड़े पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं. कुछ महिलाएं कपड़े के अंदर रुई भर कर उसे पैडनुमा आकार दे कर इस्तेमाल करती हैं. जरूरत पड़ने पर दिन में 2-3 बार वे इसी तरह पैड बना कर उस का इस्तेमाल कर लेती हैं.

कई महिलाएं तो इतना भी नहीं करतीं. वे सिर्फ गंदे कपड़े को हटा कर उस की जगह साफ कपड़ा लगा लेती हैं. लेकिन ऐसा करना अपने  स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना है. महिलाएं ऐसा 2 वजहों से करती हैं. पहली वे महंगे सैनिटरी नैपकिन नहीं खरीदना चाहतीं, दूसरी उन में भ्रांति है कि नैपकिन का इस्तेमाल करने से रक्तस्राव ज्यादा होता है और संक्रमण फैलने का खतरा रहता है. जबकि ऐसा नहीं है.

सैनिटरी नैपकिन खरीदने में थोड़ा पैसा जरूर लगता है, लेकिन वे बेहद स्वच्छ होते हैं. उन के इस्तेमाल से किसी तरह का संक्रमण नहीं फैलता. वहीं कपड़े के इस्तेमाल से युरिन इन्फैक्शन, योनि के आसपास की त्वचा में खुजली आदि का खतरा हो जाता है. कपड़े औैर रुई के इस्तेमाल से त्वचा को औक्सीजन मिलने में दिक्कत होती है, जिस से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है. इस तरह के संक्रमण से बचने के लिए सैनिटरी नैपकिन से बेहतर कोई विकल्प नहीं है.

Valentine’s Special: 7 टिप्स- जब बौयफ्रैंड करे चीटिंग तो क्या करें और क्या नहीं

ऐसे कई कपल हैं जो रिलेशनशिप में होते हुए भी एक दूसरे को चीट करते हैं और जब उनकी सच्चाई सामने आती है तो पार्टनर को बहलाने फुसलाने लगते हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है कि जब पार्टनर की सच्चाई हमारे सामने आती है तब हम समझ नहीं पाते हैं कि क्या करें, क्या नहीं. गुस्से में ऐसी कई तरह की चीजें कर देते हैं जिस से नुकसान हमें ही होता है और हम अफसोस करते हैं कि हम ने क्यों किया. अगर आप का बौयफ्रैंड भी आप को  चीट कर रहा है या धोखा दे रहा है तो गुस्से में कुछ भी करने के बजाय इन बातों पर ध्यान दें.

1. सुसाइड करने की कोशिश न करें:

अगर आप का बौयफ्रैंड किसी औैर के साथ नजदीकियां बढ़ा रहा है तो इस का यह मतलब नहीं है कि आप की लाइफ खत्म हो गई है, इस के बाद आप की लाइफ का क्या होगा यह सोचकर आप उल्टी सीधी हरकतें न करें. एक बात हमेशा याद रखें ऐसा कर के आप किसी और को नहीं बल्कि खुद को नुकसान पहुंचा रही हैं, इसलिए ऐसी हरकत करने के बजाय आगे बढ़ने की कोशिश करें.

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2. सोशल साइट्स पर न निकालें भड़ास:

जब पार्टनर से लड़ाई होती है या पार्टनर चीट करते हैं तो अकसर लड़कियां फेसबुक पर डाल देती हैं, अजीब अजीब से स्टेटस लगाती हैं, उन की वौल पर लिख कर भड़ास निकालती हैं. अगर आप भी ऐसा करने की सोच रही हैं तो एक बात अच्छे से समझ लें, ऐसा करने से आप के पार्टनर की बदनामी तो होगी ही, इस से आप की भी बदनामी होगी. इसलिए बेहतर है कि सोशल साइट्स की बजाय आपस में झगड़े को सुलझाएं.

3. मारपीट कर हंगामा न करें:

पार्टनर को जब हम किसी दूसरे के साथ देखते हैं तो झगड़ने लगते हैं, जोरजोर से चिल्लाने लगते हैं, उस लड़की को गाली देने लगते हैं, पागलों की तरह बिहेव करने लगते हैं. लेकिन मारपीट करने के बजाय आप वहां से चुपचाप चली जाएं. अपने बौयफ्रैंड को अपनी गलती का एहसास होने दें क्योंकि मारपीट, लड़ाई झगड़े से कोई चीज सुधरती नहीं है बल्कि बिगड़ती जाती हैं.

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4. बदला लेने के बजाय दूरी बनाएं:

अगर आप ने अपने बौयफ्रैंड को किसी के साथ पकड़ा है तो दोनों से बदला लेने की कोशिश न करें, न ही उन के सामने चिल्ला चिल्ला कर पूछें कि ‘आखिर क्यों किया?’ ऐसा कर के आप खुद को कमजोर दिखाती हैं औैर सामने वाले को अपनी कमजोरी का फायदा उठाने का मौका देती हैं.

5. अपनी प्रौब्लम अपने तक रखें:

पार्टनर का झूठ सामने पर गुस्से में उस के पेरैंट्ंस व दोस्तों को इस बारे में बताने की गल्ती न करें. उस ने आप के साथ जो भी किया हो, पर उस प्रौब्लम को खुद हैंडल करने की कोशिश करें.

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6. प्यार में अंधे न हो जाएं:

आप प्यार करती हैं इस का यह मतलब नहीं है कि आप प्यार में एकदम अंधी हो जाएं, गलतियों को अनदेखा कर दे. ऐसा भी हो सकता है कि इस से पहले भी वह आप के पीठ पीछे इस तरह की हरकत कर चुका हो, लेकिन आप को पता नहीं चला हो.

7. खुद को कमजोर न दिखाएं:

जब बौयफ्रैंड की धोखाधड़ी का पता चलता है तब कुछ लड़कियां तो बोल्डली हैंडल कर लेती हैं लेकिन कुछ लड़कियां इमोशनली टूट जाती हैं और उन्हें रोते देख बौयफ्रैंड उन की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. इसलिए खुद को कमजोर दिखाने के बजाय कौफिडैंट दिखाएं.

वर्तमान समय में गायक व संगीतकार ‘की बोर्ड’ का उपयोग करने की बजाय इसे अब्यूज कर रहे हैं: शान

बौलीवुड के मशहूर संगीतकार स्व.मानस मुखर्जी के बेटे व बौलीवुड गायक शान किसी परिचय के मोहताज नही है. मूलतः बंगाली होते हुए भी वह हिंदी, उर्दू, पंजाबी,बंगला,तमिल,मराठी व गुजराती सहित ग्यारह भा-नवजयााओं में गाते आ रहे हैं. शान ऐसे गायक हैं, जो कि सामाजिक मुद्दो पर ‘यूनेस्को’ के लिए भी गीत गा चुके हैं. शान महज गयक ही नहीं बल्कि टीवी शो प्रजेंटर और टीवी के रियालिटी शो के जज तथा प्रतिस्पर्धियों के मेंटर भी रहे हैं.

इन दिनों वह फिल्म ‘‘छिपकली’’ के अपने द्वारा स्वरबद्ध गीत ‘‘मैं जिंदा हूं’’ को लेकर सूर्खियां बटोर रहे हैं.

प्रस्तुत है गायक, संगीतकार व टीवी शो के जज शान से एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश..

shaan

आप बहुमुखी प्रतिभा वाले गायक, संगीतकार,गीतकार हैं.आपने अभिनय भी किया. कई टीवी कार्यक्रमों का संचालन किया. कई टीवी रियालिटी शो के जज भी रहे. यदि आप अपने पूरे कैरियर पर निगाह डालते हैं, तो क्या पाते हैं?

सच कहूं तो मैं कोई बहुत बड़े सपने देखते हुए बौलीवुड से नही जुड़ा था.मैं आज भी ज्यादा सपने नहीं देखता.मैने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इतना कुछ काम करने का अवसर मिलेगा. लेकिन मुझे जितना कुछ मिला है, उसके लिए मैं ईश्वर का आभारी हूं. मेरी अब तक की इस सफल यात्रा में कई लोगों का बेहतरीन साथ और प्यार मिला है. लोगों ने अच्छे समय में तो साथ दिया ही, पर जब समय ज्यादा अच्छा नहीं चल रहा था, उस वक्त भी मुझे याद रखा. यह बात एक कलाकार के लिए बहुत मायने रखती है. हमने यहां देखा है कि जब एक कलाकार अपने कैरियर की बुलंदियों पर होता है, तब लोग उसके पीछे भागते हैं मगर जैसे ही उसके कैरियर में गिरावट आती है, तो लोग तुरंत उससे दूरी बना लेते हैं. मुझे लोग हमेश याद करते रहे, इसके लिए मैं खुद को सौभाग्यशली मानता हूं. लोगों ने हमेश मुझे बुलाकर काम दिया. मैं हर दूसरे दिन कुछ न कुछ अच्छा काम कर रहा हूं. शायद पिछले जन्म के कुछ अच्छे कर्म रहे होंगे.

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आपको नहीं लगता कि इसके पीछे कहीं न कहीं आपका अपना अच्छा स्वभाव व विनम्र व्यवहार भी एक वजह है?

मुझे ऐसा नहीं लगता. क्योंकि यहां हर किसी को अच्छा काम करना जरुरी है. हां स्वभाव का यह है कि जब आपका स्वभाव अच्छा नही होता है, मगर आपके अंदर काबीलियत होती है और आपका सितारा बुलंदी पर होता है. तो लोग आपको -हजयेलते हैं.ऐसे में लोग उसे सिर्फ काम के वक्त ही याद करते हैं.फिल्म इंडस्ट्री में मेरे सारे दोस्त हैं, जो ज्यादा काम न करते हुए भी जब चाहे तब एक दूसरे से फोन पर लंबी बात करते रहते हैं. हमारे बीच हंसी मजाक का दौर चलता रहता है.यह एक अच्छी बात है.मेेरे हिसाब से सभी अच्छे स्वभाव के ही हैं. कम से कम संगीत जगत में बुरे लोग कम ही हैं. हम सभी अच्छा काम करने के लिए प्रयासरत रहते हैं. माना कि इन दिनों काम की बजाय आपके नाम, शोहरत व सोशल मीडिया की पॉपुलारिटी के हिसाब से काम मिल रहा है.कुछ लोग आपको मिल रहे लाइक्स व व्यूज को देखकर काम देते हैं. लोग सोचते हैं कि सोशल मीडिया पर इसके फलोवअर्स ज्यादा हैं,तो इससे गंवाते हैं,जिससे गाने को ‘पुश’ मिलेगा.

आपके दादा जी गीतकार और आपके पिता जी संगीतकार थे. आपने इनसे क्या सीखा,जो आपकी हमेश मदद करती है?

यह हर कलाकार को मौलिक काम करना चाहिए.मेरे पिता जी इस बात को मानते थे. वैसे कई संगीतकार कुछ गानों से इंस्पायर होकर गाने बनाते हैं. कुछ तो नकल भी करते हैं. मेरे पिता जी के गाने भले ही कमर्शियल नहीं थे मगर उनकी खासियत थी कि वह मौलिक कम्पोजर थे. उनके किसी भी गाने को सुनकर आपके दिमाग में यह नहीं आ सकता कि यह फलां गाने से मिलता है. मेरी राय मुझे भी मौलिक काम करना बहुत जरुरी है.पर इन दिनों मैं देख रहा हूं कि यदि कोई गाना किसी लोकप्रिय गाने से मिलता हुआ है, तो लोग उसे स्वीकार कर रहे हैं.तो गाने में कैची चीज तो चाहिए. मगर किसी भी गाने की आप नकल न करें. लोग यह सुनकर न कहे कि यह गाना तो उस गाने की नकल है. या यह तो इंटरनेशनल गाना है, जिसे शान ने घुमाकर अपना बना दिया. मैं इससे हमेशा दूर रहना पसंद करता हूं. मैं जब गाना भी गाता हूं, तब भी मेरी कोशिश रहती है कि वह किसी से प्रेरित या नकल न हो. उसमें किसी अन्य की छाप न आए.गाना सुनकर लोग यह न कहे कि यह तो उस स्कूल का या उस तरह का गायक है. जब मैने गायन के क्षेत्र में कदम रखा था,उन दिनों दो स्कूल एक रवि जी का और एक किशोर कुमार दा के बने हुए थे. सौभाग्यवश मैं वैसा गायक हूं, जो कि किसी भी स्कूल से ताल्लुक नहीं रखता था. तो मैंने अपने दादा जी व पिता जी से सीखा कि हमेशा मौलिक काम ही करो.

shaan...

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आप अपने पिता की कुछ धुनों को लेकर काम करने वाले थे?

हां, मैने कुछ काम किया है.उनकी कुछ बहुत अच्छी गजलें बनी हैं.अब वर्तमान माहौल में उनकी गजलों को किस तरह से मार्केट करुं या रिलीज करुं, इसी कश्मकश में हूं. लेकिन उम्मीद है कि कोई न कोई रास्ता जरुर निकलेगा. कमाल की बात यह है कि मेरे पिता जी की इन गजलों को 35 से 40 व-ुनवजर्या हो गए हैं.उस जमाने में निदा फाजली साहब ने गजलें लिखीं, जिनके लिए मेरे पिता जी धुने बनायी.जब तक मैं हॅूं, मैं चाह रहा हॅूं,कि वह लोगों तक पहुंचे. अन्यथा यह सब मेरे साथ ही चला जाएगा. क्योकि अब न निदा साहब रहे और न ही पिता जी. मेरे पिता जी का 1996 में देहांत हो गया था.‘आएगी जरुर चिट्ठी..’’

अपनी बहन सागरिका के साथ भी कुछ कर रहे हैं?

-हां जी! उनके साथ कई गाने किए हैं. उनके साथ मैने आधे अधूरे कई गाने कर रखे हैं.पर कोविड के चलते सब कुछ अधर में लटका हुआ. हमने अपने पिता जी के कुछ गाने एक साथ किए हैं,जो कि आने बाकी है. इन दिनों आप आने वाली फिल्म ‘‘छिपकली’’ के लिए स्वरबद्ध गीत ‘‘मैं जिंदा हूं’’ को लेकर चर्चा में हैं??

फिल्म के निर्माता मीमो राय मूलतः बहुत बेहतरीन संगीतकार हैं. उन्होंने कई बंगला फिल्मों में संगीत दिया है. मैंने उनकी कई बंगाली भा-ुनवजयाा की फिल्मों के लिए भी गाया है. अब उसने एक बहादुरी कदम उठाते हुए हिंदी भा-ुनवजयाा की फिल्म ‘‘छिपकली’’ बनायी है. मेरे लिए मीमो राय छोटे भाई जैसा है. आज की तारीख में फिल्म निर्माण में अपना पैसा लगाकर कई लोग बुरी तरह से घायल भी हुए हैं. इसलिए मैं मेमो को लेकर कुछ ज्यादा ही कंसर्न हूं. लेकिन बिना छलांग लगाए कहीं पहुंचा भी नही सकता. मेमो को फिल्म जगत में कुछ बेहतरीन रचनात्मक काम करना है. तो मैने सोचा कि मैं अपनी तरफ से कुछ अच्छा रचनात्मक योगदान दे दूं. मैंने इस फिल्म में एक गाना ‘‘मैं जिंदा हूं’’ को मेमो के ही संगीत निर्देशन में गाया है. यह बहुत खूबसूरत व जज्बाती गाना है. फिल्म में यह गाना उस सिच्युएशन में आता है, जहां किरदार को लगता है कि उसने खुद को ही अपनी बीबी की हत्या की है.फिल्म में जिस तरह के हालात है, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके अलावा कौन हत्या कर सकता है? क्योंकि कमरे में वह पति पत्नी ही थे और पत्नी की मौत हुई है.

लेकिन उसको पता है कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया है.जिसके चलते वह बहुत ही ज्यादा कन्फ्यूज है. लोग कह रहे हैं कि देखो यह कैसा इंसान है ?अपनी पत्नी का खून कर दिया है.तो उसका जो कन्फ्यूजन व गिल्ट है, उसी पर यह ‘‘मैं जिंदा हूं’’ गाना है. इसकी सिच्युएशन बहुत भयंकर है. सोहम ने बहुत अच्छा गाना लिखा है.उसके अंदर जो कुछ भी उथल पुथल मची हुई है,वह सब इस गाने में आता है. उपर से यह किरदार लेखक भी है. जो लेखक इमानदारी से अच्छा लेखन करते हैं, उनके अंदर मसाला कम होता है, तो वह लोगों को कम पसंद आता है.इस वजह से भी लेखक महोदय फंसे हुए हैं. यह बैकग्राउंड सांग है, मगर इसे गाते हुए मजा आया. जब गाने के साथ अच्छे विज्युअल हों, तो गाने में मदद मिलती है.

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जब आप खुद किसी गाने का लेखन करने के बाद उसकी संगीत की धुन बनाकर खुद अपनी आवाज में गाते हैं. उसके आनंद और दूसरे गीतकार के गीत को अन्य संगीतकार के निर्देशन में गाने में से किसमें ज्यादा आनंद मिलता है?

आपका सवाल काफी भयंकर है. जब आप खुद संगीत की धुन बनाते हैं,तो उसे आप कम्फर्ट जोन में बनाते हैं.जब मैं यह जानता हॅूं कि मुझे ही गीत गाना है, तो मुझे अहसास होता है कि मैं उसे कितना स्ट्रेच/खींच सकता हूं, तो उसी हिसाब से मैं उसका संगीत रचता हूं. आपके दायरे आपके साथ हैं.मगर हर गाने के साथ अलग स्थिति होती है.

मसलन,जब मैं फिल्म ‘छिपकली’’ का गाना ‘‘मैं जिंदा हूं’’ के रिकार्डिंग के लिए पहुंचा, तो यह बहुत उंचा गाना था, मुझे इस बात की भनक भी नहीं थी. तो दोनों हालात में काम करने का अपना अलग आनंद है.जब खुद गाना बनाते हैं, तो उसके गीत लिखने या उसकी धुन बनाने में गीत गाने से अधिक आनंद की अनुभूति होती है.मगर जब हम दूसरे संगीतकार के लिए गाते हैं, तब हमें गायक के तौर पर गाने में ज्यादा मजा आता है.क्योंकि जब हम रिकार्डिंग स्टूडियो में पहुंच जाते हैं और उस वक्त गाने की धुन मिलती है, तो उसे सजाने की एक अलग चुनौती होती है.

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जब अलबम का जमाना था और एक अलबम में आठ से दस गाने हुआ करते थे. उस वक्त आपने काफी गीत गाए.अब सिंगल का जमाना आ गया है. यह कितना सकून देता है?

सिंगल का जमाना आ चुका है. हमें भी जमाने के साथ ही चलना होता है. पहले हर गाना पांच से सा-सजय़े पांच मिनट का हुआ करता था.अब गाने की लंबाई कम हो गयी है.अब लोगों के पास वक्त ही नही है.पहले होता यह था कि आपने गाने के अलबम की सीडी खरीद ली है,तो जब आपको समय मिला आपने अपना पसंद का गाना सुन लिया. आप एक बार नही कई बार सुन लेते थे.लोग अपनी गाड़ी में सीडी प्लेअर रखते थे और सुनते थे.घर के अंदर भी सीडी प्लेअर हुआ करता था.इस तरह आप गाने के साथ जुड़ जाते थे.और आप सीडी या गाना तभी खरीदेंगे,जब आप सुनिश्चित हों कि गायक में या गीत में कुछ बात है. आपने पहले कहीं कुछ सुना हो. और आपके मन में आए कि अब मुझे इसे फिर से सुनना है. इस वजह से उसकी कीमत/वैल्यू हुआ करती थी. अब उसकी वैल्यू नही रही. इसके बावजूद आपको एक सिंगल गाना निकालकर सिक्सर मारना है, जो कि बहुत ही कठिन काम हो गया है.इसी के चलते गायक व संगीतकार ही नहीं गीतकार पर ही दबाव बनाया गया है. ऐसे में इंसान रचनात्मक स्तर पर कन्फ्यूज्ड हो जाता है कि क्या करें? इतनी भीड़ में अपने गाने की भरी इज्जत बरकरार रखने के चक्कर में उससे कई बार उलटे सुलते गाने भी बन जाते हैं. लेकिन जब हम अलबम बनाते थे तो हमारे अंदर की खूबी किसी न किसी गाने में आ ही जाती थी. अलबम करने का अपना अलग मजा है.

shaan

आईपीएल,प्रो.कबड्डी लीग की तर्ज पर आप ने कुछ लोगों के साथ मिलकर ‘इंडियन म्यूजिक लीग’ बनायी है.इसके पीछे क्या सोच है?

संगीत के साथ कुछ बड़ा करने की सोच है.आप देख रहे होंगे कि टीवी के रियालिटी शो में जज या स्पेशल गेस्ट खुद परफार्म कर रहे हैं, गा रहे हैं.तो इसमें एक बात यह है कि जब कोई नया सिंगर/गायक गा रहा होता है,तब यह लोग बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं कि आपको इस तरह से गाना चाहिए था..वगैरह.. वगैरह..पर यह खुद करके दिखाएं, यह बात लोगों के दिमाग में आती है.तो हमें भी यह मौका मिला कि स्टेज पर जाएं, परफार्म करें,जिसे लोग देखें. इस शो के फार्मेट में कुछ बातें होती हैं कि कम्पटीशन कर दें. कम्पटीशन में किसी की हार या जीत होती ही है. कभी कभार सोच नगेटिव की ओर जा सकती है. कुछ लोगों के मन में होता है कि हम खेल रहे हैं, तो जीतकार ही जाएं. इसमें एक अलग जज्बा ओर जज्बात भी निकलते हैं. कुल मिलाकर बहुत अच्छा अनुभव रहा. कई ुनवजर्याों से हमारे जो दोस्त हैं, पर अपने अपने काम में व्यस्त होने के चलते एक साथ समय बिताना नही हो पाता, तो इस शो के वक्त हम सभी ने एक साथ लंबा वक्त भी बिताया. मजा किया.पार्टी की. कुछ अच्छी यादें संजोयी.

टीवी के रियालिटी शो, चाहे वह संगीत के हों या डांस के हों, को लेकर एक नई चर्चा शुरू हो गयी है कि क्या यह बच्चों के लिए फायदेमंद है या नुकसानदायक हैं?

यदि आप बड़ी सोच/ ब्राड सेंस में सोचें, तो आपकी सम-हजय में आएगा कि यदि किसी में हूनर है,तो उसे प्रोत्साहन मिल रहा है.अगर बच्चों की बात कर रहे हैं, तो एक रियालिटी शो के बाद किसी बच्चे को सिगर बनने का अवसर नहीं मिल पाता.पर बच्चा अपने माता पिता की देख रेख में है.दूसरी बात उस बच्चे की समझ में यह बात आ जाती है कि मेरे अंदर जो प्रतिभा है, उसका स्तर क्या है. कहां तक मैं इस प्रतिभा के बल पर पहुंच पाउंगा. उसके बाद उस पर नर्भर करता है कि वह और अधिक मेहनत कर खुद की प्रतिभा को तराश कर और बेहतर बनाता है या वह सोचे कि मुझसे बेहतर लोग हैं, इसलिए मैं अपना बोरिया बिस्तर यहीं पर बांध लूं.

अंततः नौकरी, कैरियर यह सब दुनियादारी वाली बाते हैं. जब संगीत पैशन बना जाता है, तब उससे अलग होना मुश्किल हो जाता है. आप खुद देख लीजिए कि कितने गायक सफल हो पाए हैं.रियालिटी शो से चमकने वाले मुश्किल से दो या तीन प्रतिशत गायक ही सफलता के पायदान पर हैं.फिर भी आपने कभी यह नही सुना होगा कि पहले मैं गाना गाया करता था, लेकिन आज कल मैं डाक्टर हॅूं. आपको ऐसे लोग जरुर मिलेंगें, जो पहले इंजीनियर या डाक्टर थे, वह अब गायक या संगीतकार या अभिनेता बने हुए हैं. देखिए, सच यही है कि संगीत या कला का जुनून कभी पीछा नहीं छोड़ता. यह हर माता पिता पर निर्भर करता है कि वह किस तरह अपने बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं. यदि आपने रियालिटी शो में अपने बच्चे की परफार्मेंस देखकर सिर्फ ताली बजायी और वाहवाही की, तो उसे सही मार्गदर्शन कैसे मिलेगा?

रियालिटी शो में जज के रूप में बैठी हस्तियां प्रतिस्पर्धी को लेकर जो लोग बड़े बड़े दावे करते हैं,वह एक भ्रम जाल है? क्या वह ऐसा गलत कर रहे हैं?

मैं तो जब से टीवी के रियालिटी शो से जुड़ा हॅूं, तो आज तक मुझे किसी ने भी स्क्रिप्ट नहीं दी. किसी ने मुझसे किसी प्रतिस्पर्धी को जबरन अच्छा कहने के लिए नही कहा. यदि मैं किसी शो में मेहमान के तौर पर भी गया हूं, तब भी ऐसा नही हुआ. हां, हाल ही में इस तरह की जो बात उठी है,उस शो में मैं गया नहीं था. मगर पवन जो विजेता है,  उसे मैने मैंटोर किया था,उसे काफी ट्रेनिंग दी थी. वह विजेता भी बना. उसे मैंने अपने घर में भी रखा.उसे मैने सम-हजयाया कि दुनिया में किस तरह लोगों के साथ पेश आना है.माना कि वह हिमाचल से आया था.पर फिर वह मुंबई में ही रहा. उसने फिल्म के लिए भी गाया. इसके बावजूद टोपी पहनकर यह कहना कि वह हिमाचल से आया है,तो गलत है. यह झूठ है.एक रियालिटी शो जीतने के बाद आप दूसरा रियालिटी शो कर रहे हो और किसी को पता न चलें,यह कैसे हो सकता है. इसमें खुलासा वाली कोई बात ही नहीं है.यह तो सिर्फ झूठ है. हम रियालिटी शो में जो कहते हैं,उसे कभी कभार एडिट कर दिया गया, तो गलत बात अलग है.जैसे हमारे आईपीएल में भी मिसनी थी, तो वह भी वॉयस आफ इंडिया में शोखर जी की टीम में थी.तो पता है कि वह उसकी विजेता है.पर चैनल की आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते शयद इस बात को नही उजागर किया जाता कि यह फलां चैनल के रियालिटी शो में थी. यह तकनीकी समस्या हो सकती. वर्ना जिसको अपना काम आता है,वह किसी की लिखी पटकथा के अनुसार रियालिटी षो में बोले,यह बात मैं मानने को तैयार नहीं हूं.  हर इंसान की अपनी पर्सनालिटी होती है. तो वह सोचते हैं कि इस उम्र में इसे कहां क्या समझाए. तो कुछ लोग बहुत उपर उपर से सुनते हैं.मेरे जैसे कुछ लोग बहुत गहराई में जाकर सुनते हैं. आपने सवाल किया है तो मैं झूठा जवाब नहीं देना चाहता. मेरी कोशिश रहती है कि मैं जो बोलना चाहता हूं वह सच्चाई में होनी चाहिए. मैंने कभी तकिया कलाम नही अपनाया. मैंने हमेशा दिल से काम करता हूं. मैं आज भी व्हाट्सअप पर लोगों के भेजे गाने सुनकर उन्हें सही राय देता रहता हूं. दूसरों को लेकर कोई प्रतिक्रिया देना गलत होगा.

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टीवी के रियालिटी शो का हिस्सा बनने के बाद संगीत के जुनून से कहीं ज्यादा टीवी से मिली शोहरत उस पर हावी रहती है?

हां! ऐसा स्वाभाविक है.सभी युवा लड़के लड़कियां होती हैं. इनमें उतनी परिपक्वता तो नहीं होती है कि वह शोहरत व सफलता के बीच के अंतर को समझ सकें. ऐसे वह लोग टीवी पर मिली शोहरत को ही सफलता समझ बैठते हैं.सफलता तो तब मिलेगी, जब आपका अपना मौलिक गाना सामने आएगा. अभी तो जो शोहरत मिली है, वह अस्थायी है.सफलता का अर्थ होता है कि लोग कई व-ुनवजर्याों तक आपको आपके काम की वजह से याद रखते हैं. इंस्टाग्राम का जमाना है.टीवी पर शोहरत बड़ी आसानी से मिल जाती है. लोग इंस्टाग्राम के फॉलोअवर्स देखकर खुद को महान मानने लगते हैं.पर इन सभी को सोचना चाहिए कि इस संसार से विदा लेने के बाद आप अपने पीछे क्या छोड़कर जाओगे. सिर्फ आपके गाने ही रह जाएंगे.

जब आपने करियर शुरू किया, उन दिनों लाइव रिकार्डिंग हुआ करती थी.अब ‘की बोर्ड’ व ट्यूनिंग वाला जमाना आ गया है.यह संगीत को कितना नुकसान पहुंचाती है?

एकदम शुरू शुरू में, मैंने एक या दो गाने ही लाइव रिकार्ड किए थे. मसलन फिल्म ‘राजू चाचा’ का गाना.पर अब ट्यूनिंग वाला जमानाआ गया है.‘की बोर्ड’ एक सहूलियत है. यानी कि संगीत को आप बेहतर बना रहे हो.मगर संगीत तो आपको बना है, जिसका स्तर गिर गाया है. हमें संगीत बनाना है, उसकी ट्यूनिंग करनी है.मगर आप ऐसा कुछ गा रहे हो, जिसमें दम नही है.सिर्फ ट्यूनर चल रहा है.ऐसे में श्रोता को चुनकर सुनना है. यदि चार में से तीन गाने अच्छे रखेंगे, तो लोगों को पता चल जाएगा कि कौन सा गाना खराब है. मेरी राय में की बोर्ड या कम्प्यूटर को संगीत की गिरावट के लिए दो-ुनवजया देना गलत है. सवाल यह है कि एक मशीन का हम उपयोग किस तरह से कर रहे हैं?

वर्तमान समय में गायक व संगीत कार इस मशीन का उपयोग करने की बजाय इसे अब्यूज कर रहे हैं. पर अच्छे गाने देर से ही सही अपनी जगह बना ही लेते हैं?

मैं यही मानना चाहूंगा. पर असल में ऐसा है नहीं.. जब से लाइक व व्यूज की गिनती शुरू हुई है, तब से एक अलग नजरिया बन गया है. अब लोग लाइक्स या व्यूज की संख्या देखकर ही गाना सुनना चाहते हैं. पर लाइक य व्यूज को लेकर किस तरह की धांधलेबाजी होती है, किस तरह का खेल होता है, इससे लोग अनभिज्ञ हैं. साठ के दशक के गाने ‘लग जा गले’ तो आज भी लोग सुनना चाहते हैं. उस वक्त यह गाना सफल न होता,तो आज लोग इसे कैसे जानते. इसलिए गाने का शुरू में चलना जरुरी है.मगर यदि शुरू में ही गाने को दफना दिया गया हो, तो वह कहां से आगे जाय़ेगा. जिस गाने पर अच्छी मार्केटिंग हो रही हो और उसमें बड़े स्टार हैं , तो उसका आगे जाना तय है, ऐसे में इस तरह के गाने का अच्छा बनना जरुरी है. लेकिन ऐसे गानो में भी संगीत पर काम नहीं.

Karan Kundra ने दिया तेजस्वी को सरप्राइज, ऐसे किया Bigg Boss विनर का वेलकम

‘बिग बॉस 15’ की ट्रॉफी  तेजस्‍वी प्रकाश (Tejasswi Prakash)  ने अपने नाम कर ली है. शो के ग्रैंड फिनाले एपिसोड में जैसे ही सलमान खान ने बिग बॉस 15 विनर (Bigg Boss 15 Winner) तेजस्‍वी प्रकाश का नाम लिया, उनके फैंस खुशी से खिल उठे. तेजस्वी की फैंस, फैमिली और फ्रेंड्स उन्हें लगातार बधाईयां और शुभकामनाएं दे रहे हैं.

तेजस्‍वी प्रकाश की फैमिली और करण कुंद्रा ने उनका शानदार स्वागत के लिए जमकर तैयारी की. दरअसल सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है, इसमें आप देख सकते हैं कि करण और तेजो के पिता नजर आ रहे हैं और बिग बॉस 15 विनर के स्वागत के लिए शानदार डेकोरेशन किया जा रहा है. तेजो एंट्री करते ही सरप्राइज हो जाती है.

 

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बिग बॉस 15 के विनर तेजस्‍वी प्रकाश को ट्रॉफी के साथ ही 40 लाख रुपये कैश प्राइज मनी भी मिली है. बता दें कि स्‍टेज पर तेजस्‍वी ने सबसे पहले अपने माता-पिता का नाम लिया और हमेशा सपोर्ट करने के लिए उन्हें शुक्रिया कहा.

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तेजस्‍वी ने सोशल मीडिया पर अपने मां-पापा के साथ फोटो शेयर करते हुए लिखा है, शुक्रिया तेजा ट्रूप्‍स और सभी लोगों का जिन्‍होंने इसे मुमकिन बनाया. चार महीने की एक बहुत ही चैलेंजिंग जर्नी के बाद सपना साकार हुआ है ट्रॉफी घर आ गई है.

 

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तेजस्‍वी ने न सिर्फ ‘बिग बॉस 15’ का ताज जीता, बल्‍क‍ि एकता कपूर के शो ‘नागिन 6’ में लीड रोल के लिए भी उनका नाम कंफर्म हो गया है. ग्रैंड फिनाले एपिसोड में ‘नागिन’ ऐक्‍ट्रेस अदा खान पहुंची थीं. उन्‍हीं के साथ सलमान खान ने ‘नागिन 6’ का ट्रेलर रिलीज किया, इसमें तेजस्‍वी प्रकाश लीड रोल में नजर आएंगी.

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अमानवीयता: नारी तेरी यही कहानी

दुस्साहस देखिए कि पहले युवती को उसके घर से दिनदहाड़े अपहरण करके उठाकर के ले आया जाता है फिर उसके बाल काटे जाते हैं उसके साथ  दुर्व्यवहार किया जाता है गंदी गंदी गालियां दी जाती है. उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जिसे सुनकर आप के रोंगटे खड़े हो जाएंगे कि आज भी क्या ऐसा दुस्साहस किया जा सकता है.

इस घटना की गूंज आज सारे देश में सुनाई दे रही है. बुधवार 26 जनवरी के दिन दोपहर को घटी इस लोमहर्षक घटना के संदर्भ में जान समझ करके आप भी कांप उठेगें कि आज भी देश में ऐसी घटना हो सकती है वह भी देश की राजधानी दिल्ली में.

विवेक विहार थाना क्षेत्र के कस्तूरबा नगर इलाके में बुधवार दोपहर को एक महिला का अपहरण कर लिया गया फिर उससे सामूहिक बलात्कार किया गया. यही नहीं आरोपियों ने पीड़िता के बाल काटे, जूते-चप्पल की माला पहनाई और मोहल्ले की सड़कों पर उन्हें घुमाया. ‌यह दृश्य पढ़कर आपको यह महसूस होगा कि किसी फिल्म का स्क्रिप्ट तो नहीं है मगर यह सच्ची घटना दिनदहाड़े देश की राजधानी दिल्ली के कस्तूरबा नगर में घटित हुई है और जिस पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मंत्री अमित शाह ने भी अफसोस जताया है.

सबसे ज्यादा चकित करने वाली और चिंतन करने की बात यह है कि यह घटना खुलेआम होती रही और किसी ने इसका विरोध भी नहीं किया यही नहीं लोग तमाशबीन बनकर के घटना का वीडियो बनाते रहे.

शाहदरा जिला पुलिस उपायुक्त आर सत्यसुंदरम ने 27 जनवरी को  यह बताया कि महिला  अपने सुसराल में थीं, तभी कुछ आरोपी उनके घर जा धमके और जबरन पीड़िता का अपहरण कर लिया।श. आरोपी पीड़िता को कस्तूरबा नगर स्थित उनके मायके के पास से अपने घर ले आया गया. प्रारंभिक जांच में सामने आया कि लड़का दोस्त था. लड़के ने पिछले साल नवंबर में आत्महत्या कर ली थी और उनका परिवार अब युवती को इस बात का जिम्मेदार ठहरा रहा है.

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नारी अत्याचार की यह घटना इस बात को इंगित करती है कि आज भी महिलाओं के साथ कभी भी कोई भी असामान्य घटना घटित हो सकती है और लोग पहले से भी ज्यादा अमानवीय होते चले जा रहे हैं जो कि हमारी चिंता का विषय है.

महिलाएं भी शामिल !

राजधानी दिल्ली में घटित घटना दूसरों के साथ महिलाओं के नाम भी सामने आए हैं जो सबसे ज्यादा चिंता का सबब है.

एक महिला का अपहरण, सामूहिक बलात्कार, बाल काट कर, मुंह पर कालिख पोत कर और जूतों की माला पहना कर सड़कों पर घुमाया जाता है और इस धड़कन में महिलाएं भी शामिल है यह घटनाक्रम बताता है कि मानवीय संवेदनाओं का कैसा  क्षरण हुआ है.

लेखक, पत्रकार अरविंद शेष के मुताबिक -एक इंसान होने के नाते इस घटना को सामने घटते और एक स्त्री के रूप में अपने साथ घटते हुए महसूस कीजिए!

सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली दिल्ली में यह ‘सामूहिक आयोजन’, जिसकी मुख्य सूत्रधार महिलाएं रहीं और बलात्कार करने वाले पुरुष. महिलाएं सब कुछ कर रही थीं.बलात्कार करते पुरुषों को और ज्यादा बर्बर तरीके से बलात्कार करने के लिए उकसा रही थीं, बाल काट कर मुंह पर कालिख पोत रही थीं, जूतों की माला पहना रही थीं और सड़कों पर घुमा रही थीं- युवती को थप्पड़ मारने, तालियां बजाने और बर्बरता से हंसने वाली भीड़ के मुख्य हिस्से के तौर पर शामिल थी.

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अरविंद शेष के मुताबिक- आपको क्या लगता है कि जॉम्बी की शक्लो-सूरत फिल्मों दिखाए गए जॉम्बियों की तरह होगी..? आप मासूम हैं! अलग-अलग वजहों से लोगों के भीतर जिस तरह के बर्ताव और जैसी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, वही प्रतीक रूप से जॉम्बी हैं और आने वाले वक्त में अगर फिल्मी जॉम्बी भी जमीन पर गले में गुलामी का पट्टा कसे दिखें तो हैरानी नहीं होगी!

हाईकोर्ट के अधिवक्ता बीके शुक्ला के मुताबिक दिल्ली में घटी दिया घटना महिला अत्याचार की जिसमें स्वयं महिलाएं शामिल है यह बताती है कि आज की शिक्षा और माहौल कितना दूषित हो चुका है जिसमें सबसे बड़ी भागीदारी टेलीविजन पर चल रहे धारावाहिक और फिल्में हैं.

वरिष्ठ चिकित्सक जी आर पंजवानी के मुताबिक यह घटना इस बात का साक्ष्य है कि लोग कितने अमानवीय और क्रूरतम होते चले जा रहे हैं देश समाज के लिए यह घटना बेहद चिंता जनक है.

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